7 ने र ॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम: ॥ 2223
गीशिवमहापुराण
* )
[ प्रथम-खण्ड--पूर्वार्ध ]
(सचित्र, मूल संस्कृत श्लोक --हिन्दी-व्याख्यासहित )
गीताप्रेस, गोरखपुर
» दो खण्ड (चती भी).
ओर सेट
„ मूल मोटा टाइप (तेलुगु भी)
॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः॥ 2223
महर्षि लेदव्यासप्रणीत
श्रीशिवमहापुराण
[ प्रथम-खण्ड--पूर्वार्ध ]
( विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता--सृष्टिखण्ड, सतीखण्ड, पार्वतीखण्ड, कुमारखण्ड और युद्धखण्ड )
[ सचित्र, मूल संस्कृत श्लोक हिन्दी व्याख्यासहित ]
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्व मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
2223 Shivmahapuranam_Part I Section_-l_l_Front
ह २०७६ प्रथम संस्करण ७,०००
श् मूल्य--₹ ३००
( तीन सौ रुपये )
प्रकाशक एवं मुद्रक--
गीताप्रेस, गोरखपुर--२७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान)
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पुराण वाङ्मयमें श्रीशिवमहापुराणका अत्यन्त महिमामय स्थान है। पुराणोंकी परिगणनामें वेदतुल्य,
पवित्र और सभी लक्षणोंसे युक्त यह पुराण चौथा है। शिवके उपासक इस पुराणको शैवभागवत मानते हैं।
इस ग्रन्थके आदि, मध्य तथा अन्तमें सर्वत्र भूतभावन भगवान् सदाशिवकी महिमाका प्रतिपादन किया
गया है। वेद-वेदान्तमें विलसित परमतत्त्व--परमात्माका इस पुराणमें शिव नामसे गान किया गया है।
सन् १९६२ में कल्याणके विशेषांकके रूपमें संक्षिप्त शिवपुराणाङ्कका प्रकाशन हुआ था,
जिसमें शिवपुराणकी कथाएँ साररूपमें हिन्दीमें प्रकाशित हुई थीं। भगवान् सदाशिवके प्रेमी पाठकोंका
पिछले बहुत वर्षोसे यह आग्रह था कि मूल शिवमहापुराणका सानुवाद प्रकाशन विशेषांकके रूपमें
किया जाय। इस दृष्टिसे मूल शिवमहापुराणके प्रकाशनकी योजना बनायी गयी, परंतु विशेषांककी
पृष्ठसंख्या सीमित होनेके कारण चौबीस हजार श्लोकोंके इस बृहत् पुराणका मूलसहित प्रकाशन एक
वर्षमें सम्भव नहीं था, अत: यह निर्णय लिया गया कि शिवमहापुराणके मूल श्लोक पुस्तकरूपमें प्रकाशित
कर दिये जाये तथा प्रत्येक श्लोकका अनुवाद श्लोकसंख्यासहित दो वर्षोमें सर्वसाधारणके लिये
विशेषांकके रूपमें प्रकाशित किया जाय। तदनुसार सम्पूर्ण मूल शिवमहापुराण पुस्तकरूपमें प्रकाशित
कर दिया गया तथा सन् २०१७ में श्रीशिवमहापुराण पूर्वार्ध ( विद्येश्वरसंहिता एवं रुद्रसंहिता )-का तथा
सन् २०१८ में इस पुराणके उत्तरार्ध ( शतरुद्रसंहितासे वायवीयसंहितातक )-का हिन्दी अनुवाद
विशेषांकके रूपमें प्रकाशित किया गया।
प्रतिपाद्य-विषयकी दृष्टिसे शिवमहापुराण अत्यन्त उपयोगी महापुराण है। इसमें भक्ति, ज्ञान, सदाचार,
शौचाचार, उपासना, लोकव्यवहार तथा मानवजीवनके परम कल्याणकी अनेक उपयोगी बातें निरूपित
हैं। शिवज्ञान, शैवीदीक्षा तथा शैवागमका यह अत्यन्त प्रौढ़ ग्रन्थ है। साधना एवं उपासना-सम्बन्धी
अनेकानेक सरल विधियाँ इसमें निरूपित हैं। कथाओंका तो यह आकर ग्रन्थ है। इसकी कथाएँ अत्यन्त
मनोरम, रोचक तथा बड़े ही कामकी हैं। मुख्य रूपसे इस पुराणमें देवोंके भी देव महादेव भगवान्
साम्बसदाशिवके सकल, निष्कल स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, उनके लीलावतारोंकी कथाएँ, द्वादश
ज्योतिर्लिंगोंके आख्यान, शिवरात्रि आदि ब्रतोंकी कथाएँ, शिवभक्तोंकी कथाएँ, लिंगरहस्य, लिंगोपासना,
पार्थिबलिंग, प्रणव, बिल्व, रुद्राक्ष और भस्म आदिके विषयमें विस्तारसे वर्णन है। यह पुराण उच्चकोटिके
सिद्धो, आत्मकल्याणकामी साधकों तथा साधारण आस्तिकजनों-सभीके लिये परम मंगलमय एवं
हितकारी है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्यमें तो इस पुराणके अध्ययन एवं मनन तथा इसके उपदेशोंके अनुसार चलनेकी
विशेष आवश्यकता प्रतीत होती है। शिवपुराणका पठन-पाठन सच्ची सुख-शान्तिके विस्तारमें परम
सहायक सिद्ध हो सकता है। शिवभक्तोंके उसी माँगको देखते हुए २ खण्डोंमें संस्कृत मूल हिन्दी
व्याख्याके साथ इसका प्रकाशन किया जा रहा है।
आस्तिकजन इस महापुराणको पढ़कर लाभ उठायें और लोक-परलोकमें सुख-शान्ति तथा मानव-
जीवनके परम लक्ष्यको प्राप्त करें, भगवान् सदाशिवसे यही प्रार्थना है।
= राधेश्याम खेमका
See
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॥ श्रीहरि: ॥
| श्रीशिवमहापुराणा
विषय-सूची
अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | |अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या
माहात्म्य
१. शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजीका जा चंचुलाका पार्वतीजीकी सखी होना........ २५
उन्हें शिवमहापुराणकी महिमा सुनाना.......... १३ | ५. चंचुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर
२. शिवपुराणके श्रवणसे देवराजकों शिवलोककी तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर
णात. NN, NR १७ बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन
३. चंचुलाका पासे भय एवं संसारसे वैराग्य... २१ दोनों दम्पतीका शिवधाममें सुखी होना........ ३०
४. चंचुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण ६. शिवपुराणके श्रवणकी विघि...................... ३५
सुनाना और समयानुसार शरीर छोड़कर शिवलोकमें ७. श्रोताओंके पालन करनेयोग्य नियमोंका वर्णन. ४०
विद्येश्वरसंहिता
१. प्रयागमें सूतजीसे मुनियोंका शीघ्र पापनाश वन्दन, प्रणब-जप, गायत्री-जप, दान, न्यायतः
करनेवाले साधनके विषयमे प्रश्न .............. ४५ धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदिकी विधि एवं
२. शिवपुराणका माहात्म्य एवं परिचय ड८ उनकी महिमाका वर्णन............................ ९०
३. साध्य-साधन आदिका विचार ५५ | १४. अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन,
४. श्रवण, कीर्तन और मनन--इन तीन साधनोंकी ज भगवान् शिवके द्वारा सातों वारोंका निर्माण तथा
श्रेष्ठताका प्रतिपादन ह us उनमें देवाराधनसे विभिन्न प्रकारके फलोंकी
५. भगवान् शिवके लिंग एवं साकार विग्रहकी प्रापिका कथन....................................... ९९
'पूजाके रहस्य तथा महत्त्वका वर्णन ५९ | १५. देश, काल, पात्र और दान आदिका विचार . १०४
६. ब्रह्मा और विष्णुके भयंकर युद्धको देखकर १६. मृत्तिका आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंके पूजनकी
देवताओंका कैलास-शिखरपर गमन ६३ विधि, उनके लिये नैवेद्यका विचार, पूजनके
७. भगवान् शंकरका ब्रह्मा और विष्णुके युद्धमें विभिन्न उपचारोंका फल, विशेष मास, वार, तिथि
अग्निस्तम्भरूपमें प्राकट्य, स्तम्भके आदि और एवं नक्षत्रोंके योगमें पूजनका विशेष फल तथा
अन्तकी जानकारीके लिये दोनोंका प्रस्थान... ६५ लिंगके वैज्ञानिक स्वरूपका विवेचन ........... ११०
८. भगवान् शंकरद्वारा ब्रह्मा और केतकी पुष्पको शाप १७. षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप
देना और पुनः अनुग्रह प्रदान करना ........... ६८ (अकार) और स्थूल रूप (पंचाक्षर मन्त्र)-का
९. महेश्वरा ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा,
सकल स्वरूपका परिचय देते हुए लिंग-पूजनका कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर कारणरुद्रके लोकों-
महत्व बताना. 5. .......... ९ ०१ ०००१२५०१५०5 ७० तकका विवेचन करके कालातीत, पंचावरण-
१०. सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्योंका प्रतिपादन, विशिष्ट शिवलोकके अनिर्वचनीय वैभवका
प्रणव एवं पंचाक्षर-मन्त्रको महत्ता, ब्रह्मा-विष्णुद्रारा निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता... १२१
भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तर्धान होना ७५ | १८. बन्धन और मोक्षका विवेचन, शिवपूजाका उपदेश,
११. शिवलिंगकी स्थापना, उसके लक्षण और पूजनकी लिंग आदिमें शिवपूजनका विधान, भस्मके स्वरूपका
विधिका वर्णन तथा शिवपदकी प्राप्ति करानेवाले निरूपण और महत्त्व, शिवके भस्मधारणका रहस्य,
सत्कर्मोंका विवेचन.................................. ७९ शिव एवं गुरु शब्दकी व्युत्पत्ति तथा विष्नशान्तिके
१२. मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रोका वर्णन, कालविशेषमें उपाय और शिवधर्मका निरूपण ................ १३६
विभिन्न नदियोंके जलमें स्नानके उत्तम फलका १९. पार्थिव शिवलिंगके पूजनका माहात्म्य.......... १५०
निदेश तथा तीर्थम पापसे बचे रहनेकी चेतावनी ८६ | २०, पार्थिव शिवलिंगके निर्माणकी रीति तथा वेद
१३. सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, सन्ध्या-
>
मस्त्रोंद्दाग उसके पूजनकी विस्तृत एवं संक्षिप्त
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(५)
अध्याय पृष्ठ-संख्या | | [अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या
बिधिका वर्णन १५३ | २३. भस्म, रुद्राक्ष और शिवनामके माहात्म्यका वर्णन १६९
२१. कामनाभेदसे पार्थिवलिंगके पूजनका विधान .. १६१ | २४. भस्म-माहात्म्यका निरूपण ......................... १७३
२२. शिव-नेवेद्य-भक्षणका निर्णय एवं बिल्वपत्रका २५. रुद्राक्षधारणकी महिमा तथा उसके विविध
आहोत Ne १६५ भ्रेदोंका वर्णन: 7.7. ४ ७३४१ १८४
रुद्रसंहिता
१-सृष्टिखण्ड ८. ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय
१. ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतजीद्वारा नारद- शरीरका;दर्शत+.-+-/. 55 = „००९०६४०४ न २३१
ब्रह्म-संवादकी अवतारणा........................... १९५ | ९. उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य, उनके द्वारा
२. नारद मुनिकी तपस्या, इनद्रद्वारा तपस्यामें विघ्न अपने स्वरूपका विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों
उपस्थित करना, नारदका कामपर विजय पाना देवताओंकी एकताका प्रतिपादन .................. २३५
और अहंकारसे युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और १०. श्रीहरिको सृष्टिको रक्षाका भार एवं भोग-मोक्ष-
रुद्रसे अपने तपका कथन ......................... १९८ 'दानका अधिकार देकर भगवान् शिवका अन्तर्धान
३. मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित होना
हए नारदजीका भगवान् विष्णुसे उनका रूप माँगना, ११. शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल ......... २४५
भगवानका अपने रूपके साथ वानरका-सा मुँह १२. भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी
देना, कन्याका भगवानको वरण करना और कुपित अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन... २५२
हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना ............ २०३ | १३. शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन .. २६०
४. नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना १४. विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे
और शाप देना, फिर मायाके दूर हो जानेपर शिवजीकी पूजाका माहात्म्य ...................... २६६
पश्चात्तापपूर्वक भगवानूके चरणोंमें गिरना और १५. सृष्टिका वर्णन > ७०० न्या य तळी २७४
शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका १६. ब्रह्माजीकी सम्तानोंका वर्णन तथा सती और शिवकीं
उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके महत्ताका प्रतिपादन
लिये ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और १७. यज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिका चरित्र
शिवके भजनका उपदेश देना २०८ | १८. शिवमन्दिरमें दीपदानके प्रभावसे पापमुक्त होकर
५. नारदजीका शिवतीर्थोंमें भ्रमण, शिवगणोंको गुणनिधिका दूसरे जन्ममें कलिंगदेशका राजा
शापोद्धारकी बात बताना तथा ब्रह्मलोकमें जाकर बनना और फिर शिवभक्तिके कारण कुबेर
ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमें प्रश्न करना ... २१५ पदकी प्राप्ति २८९
६. महाप्रलयकालमें केवल सद्ब्रह्मकी सत्ताका १९, कुबेरका काशीपुरीमें आकर तप करना, तपस्यासे
प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्मसे ईश्वरमूर्ति प्रसन्न उमासहित भगवान् विश्वनाथका प्रकट
(सदाशिव)-का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूत हो उसे दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना,
शक्ति (अम्बिका)-का प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वार कुबेरद्वारा शिवमैत्री प्राप्त करना .................. २९६
उत्तम क्षेत्र (काशी या आनन्दवन) -का प्रादुर्भाव, २०. भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा
शिवके वामांगसे परम पुरुष (विष्णु)-का आविर्भाव सृष्टिखण्डका उपसंहार ...........................- २९९
तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः २-सतीखण्ड
उत्पत्तिका वर्णन ..................................... २१९ | १. सतीचरित्रवर्णन, दक्षयज्ञविध्वंसका संक्षिप्त
७. भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, वृत्तान्त तथा सतीका पार्वतीरूपमें हिमालयके
शिवेच्छासे ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमल- यहाँ जन्म "लेना २०२००००००००0० र ३०५
नालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ ब्रह्माका २. सदाशिवसे त्रिदेवोंकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीसे देवता
'तप करना, श्रीहरिका उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त आदिकी सृष्टिके पश्चात् देवी सन्ध्या तथा
ब्रह्मा-विष्णुके बीचमें अग्निस्तम्भका प्रकट होना कामदेवका प्राकट्य........................... ३०९
तथा उसके ओर-छोरका पता न पाकर उन ३. कामदेवको विविध नामों एवं वरोंकी प्राप्ति, कामके.
दोनोंका उसे प्रणाम करना ........................ २२४ प्रभावसे ब्रह्मा तथा ऋषिगणोंका मुग्ध होना, धर्मद्वारा
स्तुति करनेपर भगवान् शिवका प्राकट्य और ब्रह्मा
तथा ऋषियोंको समझाना, ब्रह्मा तथा ऋषियोंसे
अग्निष्वात्त आदि पितृगणोंकी उत्पत्ति, ब्रह्माद्वारा
कामको शापकी प्राप्ति तथा निवारणका उपाय ३१
४. कामदेवके विवाहका वर्णन ....................... ३१९
५. ब्रह्माकी मानसपुत्री कुमारी सन्ध्याका आख्यान ३२३
६. सम्ध्याद्वरा तपस्या करना, प्रसन्न हो भगवान् शिवका
उसे दर्शन देना, सन्ध्याद्वारा की गयी शिवस्तुति,
सन्ध्याको अनेक वरोंकी प्राप्ति तथा महर्षि
मेधातिथिके यज्ञमें जानेका आदेश प्राप्त होना ३२८
७. महर्षि मेधातिथिकी यज्ञाग्निमें सन्ध्याद्वारा शरीर-
त्याग, पुनः अरुन्धतीके रूपमें यज्ञाग्निसे उत्पत्ति
एवं वसिष्ठमुनिके साथ उसका विवाह ....... ३३४
८. कामदेवके सहचर वसन्तके आविर्भावका वर्णन ३३६
९. कामदेवद्वारा भगवान् शिवको विचलित न कर
पाना, ब्रह्माजीद्वारा कामदेवके सहायक मारगणोंकी
उत्पत्ति; ब्रह्माजीका उन सबको शिवके पास भेजना,
उनका वहाँ विफल होना, गणोंसहित कामदेवका
वापस अपने आश्रमको लौटना................... ३४१
१०. ब्रह्मा और विष्णुके संवादमें शिवमाहात्म्यका वर्णन ३४६
११. ब्रह्माद्वारा जगदम्बिका शिवाकी स्तुति तथा
वरकी प्राप्ति... > ३५१
१२. दक्षप्रजापतिका तपस्याके प्रभावसे शक्तिका दर्शन
और उनसे रुद्रमोहनकी प्रार्थना करना.......... ३५६
१३. ब्रह्माकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ,
अपने पुत्र हर्यश्वो तथा सबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें
भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना .... ३५९
१४. दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्षके यहाँ देवी
शिवा (सती)-का प्राकट्य, सतीकी बाललीलाका
३६३
१५. सतीद्वारा नन्दा-ब्रतका अनुष्ठान तथा देवताओंद्वारा
शिवस्तृति ल क ३६७
१६. ब्रह्मा और विष्णुद्दार शिवसे विवाहके लिये प्रार्थना
'करना तथा उनकी इसके लिये स्वीकृति ..... ३७४
१७, भगवान् शिवद्वारा सतीको वर-प्राप्ति और शिवका
ब्रह्माजीकों दक्ष प्रजापतिके पास भेजना ........ ३७९
१८. देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके
घर जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार एवं सती तथा
शिवकबविवाह 3. १... ३८५
१९. शिवका सतीके साथ विवाह, विवाहके समय
शम्भुकी मायासे ब्रह्माका मोहित होना और
विष्णुद्वारा शिवतत्त्वका निरूपण .................. ३८९
अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या
२
२
२
२
२
३०.
३
३
३
३
*
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. सती और शिवका
एवं शिवका विवाहोत्सव, विवाहके अनन्तर
शिव और सतीका वृषभारूढ़ हो कैलासके
VON
. कैलास पर्वतपर भगवान् शिव एवं सतीकी मधुर
लीलाएँ.
विहार-वर्णन
सतीके पूछनेपर शिवद्वारा भक्तिकी महिमा तथा
नवधा भक्तिका निरूपण
. दण्डकारण्यमें शिवको रामके प्रति मस्तक झुकाते
देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके
द्वारा रामकी परीक्षा ..
. श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके
'पदपर अभिषेक, श्रीरामद्वारा सतीके मनका सन्देह
दूर करना, शिवद्वारा सतीका मानसिक रूपसे परित्याग
. सतीके उपाख्यानमें शिवके साथ दक्षका
मिण क लाला .......'.
. दक्षप्रजापतिद्वारा महान् यज्ञका प्रारम्भ, यज्ञमें
दक्षद्वारा शिवके न बुलाये जानेपर दधीचिद्वारा
दक्षकी भर्त्सना करना, दक्षके द्वारा शिव-निन्दा
करनेपर दधीचिका वहाँसे प्रस्थान...............
दक्षयज्ञका समाचार पाकर एवं शिवकी आज्ञा
प्राप्तकर देवी सतीका शिवगणोंके साथ पिताके
यज्ञमण्डपके लिये प्रस्थान.........................
. यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर तथा दक्षद्वारा
शिवनिन्दा सुनकर क्रुद्ध हो सतीका दक्ष तथा
४२७
४३२
४३६
देवताओंको फटकारना और प्राणत्यागका निश्चय ४४०
दक्षयज्ञमें सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको
भस्म कर देना, भूगुद्वारा यज्ञकुण्डसे ऋभुओंको
प्रकट करना, ऋभुओं और शंकरके गणोंका युद्ध,
भयभीत गणोंका पलायित होना .................
. यज्ञमण्डपमें आकाशवाणी द्वारा दक्षको फटकारना
तथा देवताओंको सावधान करना ................
. सतीके दग्ध होनेका समाचार सुनकर कुपित
हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और
महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ-विंध्वंस
'करेेको आज्ञा देना............................-.---
. गणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-
विध्वंसके लिये प्रस्थान............................
, दक्ष तथा देवताओंका अनेक अपशकुनों एवं
उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भयभीत होना.
- दक्षद्वारा यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे
प्रार्थना, भगवानका शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें
अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना
४४५
डड४८
४५६
अध्याय विषय
तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन
३६. युद्धमें शिवगणोंसे पराजित हो देवताओंका
पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका
रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको
युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी
बातचीत कनी
७. गणोंसहित वीरभद्रद्रारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षवध,
बीरभद्रका वापस कैलास पर्वतपर जाना, प्रसन्न
भगवान् शिवद्वारा उसे गणाध्यक्ष पद प्रदान करना
३८. दधीचि मुनि और राजा क्षुवके विवादका इतिहास,
शुक्राचार्यद्वारा दधीचिको महामृत्युंजय-मन्त्रका
उपदेश, मृत्युंजयमन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिको
अवध्यताकी प्राप्ति .................................
३९. श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिद्वारा
देवताओंको शाप देना तथा राजा क्षुवपर अनुग्रह करना
४०. देवताआँसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना
दुःख निवेदन करना, उन सभीको लेकर विष्णुका
कैलासगमन तथा भगवान् शिवसे मिलना ....
४१. देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति............
४२. भगवान् शिवका देवता आदिपर अनुग्रह, दक्षयज्ञ-
मण्डपमें पधारकर दक्षको जीवित करना तथा
दक्ष और विष्णु आदिद्वारा शिवकी स्तुति .....
४३. भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी
भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवोंकी एकता बताना,
दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, देवताओंका
अपने-अपने लोकोंको प्रस्थान तथा सतीखण्डका
उपसंहार और माहात्म्य.........................---
३-पार्वतीखण्ड
१. पितरोंकी कन्या मेनाके साथ हिमालयके विवाहका
वर्णन .
२. पितरोंकी तीन मानसी कन्याओं-मेना, धन्या
और कलावतीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा सनकादि-
द्वारा प्राप्त शाप एवं वरदानका वर्णन ..........
३. विष्णु आदि देवताओंका हिमालयके पास जाना,
उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी देवी
जगदम्बाकी स्तुति करना ..........................
४. उमादेवीका दिव्यरूपमें देवताओंको दर्शन देना और
अवतार ग्रहण करनेका आश्वासन देना ........
५. मेनाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर देवीका उन्हें प्रत्यक्ष
दर्शन देकर वरदान देना, मेनासे मैनाकका जन्म.
६. देवी उमाका हिमवानूके हृदय तथा मेनाके गर्भमें
आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वरा स्तवन, देवीका
दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे वार्तालाप तथा
(७)
पृष्ठ-संख्या
४६१
४६५
४७१
'ड७७
४८३
४८७
४९१
४९६
५००
५०५
५०८
५११
५१
५१९
१०. शिवजीके ललाटसे भौमोत्पत्ति
११. भगवान् शिवका तपस्याके लिये हिमालयपर
१३.
१४.
१५.
१७.
२०.
२१.
अध्याय विषय
पुनः नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना.
७. पार्वतीका नामकरण तथा उनकी बाललीलाएँ एवं
विद्याध्ययत ;-८-० 7० तल मल न
८. नारद मुनिका हिमालयके समीप गमन, वहाँ
पार्वतीका हाथ देखकर भावी लक्षणोंको बताना,
चिन्तित हिमवान्को शिवमहिमा बताना तथा
शिवसे विवाह करनेका परामर्श देना ...........
९. पार्वतीके विवाहके सम्बन्धमें मेना और हिमालयका
वार्तालाप, पार्वती और हिमालयद्वारा देखे गये
अपने स्वप्नका वर्णन
पृष्ठ-संख्या
५२३
५२८
५३०
आगमन, वहाँ पर्वतराज हिमालयसे वार्तालाप
१२. हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके
लिये उनसे आज्ञा माँगना, शिवद्वारा कारण बताते
हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना.......
पार्वती और परमेश्वरका दार्शनिक संवाद, शिवका
पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना,
पार्वतीका महेश्वरकी सेवामें तत्पर रहना......
तारकासुरकी उत्पत्तिके प्रसंगमें दितिपुत्र वज़्ांगकी
कथा, उसकी तपस्या तथा वरप्राप्तिका वर्णन
वरांगीके पुत्र तारकासुरकी उत्पत्ति, तारकासुरकी
तपस्या एवं ब्रह्माजीद्वारा उसे वरप्राप्ति, वरदानके
प्रभावसे तीनों लोकोंपर उसका अत्याचार ....
५५२
१६. तारकासुरसे उत्पीडित देवताओंको ब्रह्माजीद्वारा
सान्त्वना प्रदान करना ..............................
इन्द्रे स्मरण करनेपर कामदेवका उपस्थित
होना, शिवको तपसे विचलित करनेके लिये
इन्द्रद्दारा कामदेवको भेजना........................
१८. कामदेवद्वारा असमयमें वसन्त-ऋतुका प्रभाव
प्रकट करना, कुछ क्षणके लिये शिवका मोहित
होना, पुनः वैराग्य-भाव धारण करना
१९. भगवान् शिवको नेत्रज्चालासे कामदेवका भस्म
होना और रतिका विलाप, देवताओंद्वास रतिको
सान्त्वना प्रदान करना और भगवान् शिवसे
कामको जीवित करनेकी प्रार्थना करना ........
शिवकी क्रोधाग्निका वडवारूप-धारण और ब्रहमद्वारा
उसे समुद्रको समर्पित करना क
कामदेवके भस्म हो जानेपर पार्वतीका अपने घर
आगमन, हिमवान् तथा मेनाद्वारा उन्हें धैर्य प्रदान
करना, नारदद्वारा पार्वतीको पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश ५७७
५७१
५७५
२२. पार्वतीको तपस्या एवं उसके प्रभावका वर्णन ५८१
२३. हिमालय आदिका तपस्यानिरत पार्वतीके पास
(८)
अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या
जाना, पार्वतीका पिता हिमालय आदिको अपने
तपके विषयमें दृढ़ निश्चयकी बात बताना,
पार्वतीके तपके प्रभावसे त्रैलोक्यका संतप्त होना,
सभी देवताओंका भगवान् शंकरके पास जाना
२४. देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ
विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्का विवाहके
दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः
प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना
२५. भगवान् शंकरकी आज्ञासे सप्तर्षियोंद्वारा पार्वतीके
शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना और वह
वृत्तान्त भगवान् शिवको बताकर स्वर्गलोक जाना
२६. पार्वतीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शिवका
जटाधारी ब्राह्मणका वेष धारणकर पार्वतीके समीप
जाना, शिव-पार्वती-संवाद..........................
२७. जटाधारी ब्राह्मणद्वारा पार्वतीके समक्ष शिवजीके
स्वरूपकी निन्दा करना....
२८. पार्वतीद्वारा परमेश्वर शिवकी महत्ता प्रतिपादित
'करना और रोषपूर्वक जटाधारी ब्राह्मणको फटकारना,
शिवका पार्वतीके समक्ष प्रकट होना ...........
२९. शिव और पार्वतीका संवाद, विवाहविषयक
पार्वतीके अनुरोधको शिवद्वारा स्वीकार करना
३०. पार्वतीके पिताके घरमें आनेपर महामहोत्सवका
होना, महादेवजीका नटरूप धारणकर वहाँ
उपस्थित होना तथा अनेक लीलाएँ दिखाना,
शिवद्वारा पार्वतीकी याचना, किंतु माता-पिताके
द्वारा मना करनेपर अन्तर्धान हो जाना .........
३१. देवताओंके कहनेपर शिवका ब्राह्मण-वेषमें
'हिमालयके यहाँ जाना और शिवकी निन्दा करना
३२, ब्राह्मण-वेषधारी शिवद्वारा शिवस्वरूपकी निन्दा
सुनकर मेनाका कोपभवनमें गमन, शिवद्वारा
सप्तर्षियोंका स्मरण और उन्हें हिमालयके घर
भेजना, हिमालयकी शोभाका वर्णन तथा
हिमालयद्वारा सप्तर्षियोंका स्वागत.
३३. वसिष्ठपली अरुन्धतीद्वारा मेनाको समझाना तथा
सपतर्षियोंद्वारा हिमालयको शिवमाहात्म्य बताना
३४. सपतर्षियोंद्वार हिमालयको राजा अनरण्यका
आख्यान सुनाकर पार्वतीका विवाह शिवसे
करनेकी प्रेरणा देना.................................
३५. धर्मराजद्वारा मुनि मिप्पलादकी भार्या सती पद्माके
पातिब्रत्यकी परीक्षा, पद्माद्वारा धर्मराजको शाप
प्रदान करना तथा पुन: चारों युगोंमें शापकी
व्यवस्था करना, पातित्रत्यसे प्रसन्न हो धर्मराजद्वारा
'पद्माको अनेक वर प्रदान करना, महर्षि वसिष्ठद्वारा
'हिमवानूसे पद्माके दृष्टान्तद्वारा अपनी पुत्री
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३६.
३७.
३८.
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४८.
विषय
शिवको सौंपनेके लिये कहना
सप्तर्षियोंके समझानेपर हिमवान्का शिवके साथ
अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय करना,
सप्तर्षियोंद्वारा शिवके पास जाकर उन्हें सम्पूर्ण
वृत्तान्त बताकर अपने धामको जाना
हिमालयद्वारा विवाहके लिये लग्नपत्रिकाप्रेषण,
विवाहको सामग्रियोंकी तैयारी तथा अनेक
पर्वतों एवं नदियोंका दिव्य रूपमें सपरिवार
हिमालयके घर आगमन ...........................
हिमालयपुरीकी सजावट, विश्वकर्माद्वारा दिव्य-
मण्डप एवं देवताओंके निवासके लिये दिव्य-
लोकोंका निर्माण करना
. भगवान् शिवका नारद्जीके द्वारा सब देवताओंको
निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका
मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे
बाहर निकलना
. शिवबरातकी शोभा, भगवान् शिवका बरात
लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान ..............
. नारदद्वारा हिमालयगृहमें जाकर विश्वकर्माद्वार बनाये
गये विवाहमण्डपका दर्शनकर मोहित होना और
वापस आकर उस विचित्र रचनाका वर्णन करना
. हिमालयद्वारा प्रेषित मूर्तिमान् पर्वतों और
ब्राह्मणोंद्वारा बरातकी अगवानी, देवताओं और
पर्वतोंके मिलापका वर्णन ..........................
. मेनाद्वारा शिवको देखनेके लिये महलकी छतपर
जाना, नारदद्वारा सबका दर्शन कराना, शिवद्वारा
अद्भुत लीलाका प्रदर्शन, शिवगणों तथा शिवके
भयंकर वेषको देखकर मेनाका मूच्छित होना
शिवजीके रूपको देखकर मेनाका विलाप, पार्वती
तथा नारद आदि सभीको 'फटकारना, शिवके
साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, विष्णुद्वारा
मेनाको समझाना.....................................
भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको
प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता और क्षमा-प्रार्थना
तथा पुरवासिनी स्त्रियोका शिवके रूपका दर्शन
करके जन्म और जीवनको सफल मानना
जगरमें बरातियोंका प्रवेश, द्वाराचार तथा पार्वती द्वारा
कुलदेवताका पूजन
पाणिग्रहणके लिये हिमालयके
गमनोत्सवका वर्णन .................................
शिव-पार्वतीके विवाहका प्रारम्भ, हिमालयद्वारा
शिवके गोत्रके विषयमें प्रश्न होनेपर नारदजीके
द्वारा उत्तरके रूपमें शिवमाहात्म्य प्रतिपादित
करना, हर्षयुक्त हिमालयद्वारा कन्यादानकर विविध
६४६
६४९
६५३
६५७
६६२
६६६
६७१
६७३
६७८
६८७
६९४
अध्याय विषय
उपहार प्रदान करना ....
४९. अग्निपरिक्रमा करते समय पार्वतीके
देखकर ब्रह्माका मोहग्रस्त होना, बालखिल्योंकी
उत्पत्ति, शिवका कुपित होना, देवताओंद्वारा
शिवस्तुति 7... 8 शीत ती हा
५०. शिवा-शिवके विवाहकृत्यसम्पादनके अनन्तर
देवियोंका शिवसे मधुर वार्तालाप
५१. रतिके अनुरोधपर श्रीशंकरका कामदेवको जीवित
करना, देवताओंद्वारा शिवस्तुति दर
५२. हिमालयद्वारा सभी बरातियोंको भोजन कराना,
शिवका विश्वकर्माद्वारा निर्मित वासगृहमें शयन
करके प्रातःकाल जनवासेमें आगमन ............
५३. चतुर्थीकर्म, बरातका कई दिनोंतक ठहरना,
सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका बरातको विदा
करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी
कन्या सौंपना तथा बरातका पुरीके बाहर जाकर
ठहरना कक्ष
५४. मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मणपलीका
पार्वतीको पातिव्रतधर्मका उपदेश देना ..........
५५. शिव-पार्वती तथा बरातकी विदाई, भगवान् शिवका
समस्त देवताओंको विदा करके कैलासपर रहना
और शिव-विवाहोपाख्यानके श्रवणकी महिमा
४-कुमारखण्ड
१. कैलासपर भगवान् शिव एवं पार्वतीका विहार
२. भगवान् शिवके तेजसे स्कन्दका प्रादुर्भाव और
सर्वत्र महान् आनन्दोत्सवका होना
३. महर्षि विश्वामित्रद्वार बालक स्कन्दका संस्कार
सम्पन्न करना, बालक स्कन्दद्वारा क्रौँचपर्वतका
भेदन, इन्द्रद्वारा बालकपर वज्रप्रहार, शाखः
विशाख आदिका उत्पन होना, कार्तिकेयका षण्मुख
होकर छः कृत्तिकाओंका दुग्धपान करना
४. पार्वतीके कहनेपर शिवद्वारा देवताओं तथा कर्मसाक्षी
धर्मादिकोंसे कार्तिकेयके विषयमें जिज्ञासा करना
और अपने गणोंको कृत्तिकाओंके पास भेजना,
नन्दिकेश्वर तथा कार्तिकेयका वार्तालाप,
कार्तिकेयका कैलासके लिये प्रस्थान ............
५. पार्वतीके द्वारा प्रेषित रथपर आरूढ हो कार्तिकेयका
कैलासगमन/ कैलासपर महान् उत्सव होना,
कार्तिकेयका महाभिषेक तथा देवताओंद्वारा विविध
अस्त्र-शस्त्र तथा रलाभूषण प्रदान करना, कार्तिकियका
ब्रह्माण्डका अधिपतित्व प्राप्त करना
कुमार कार्तिकेयकी ऐश्वर्यमयी बाललीला
७. तारकासुरसे सम्बद्ध देवासुर-संग्राम का
७०६
७१४
७१८
७२१
७२८
७३३
७३८
७४८
अध्याय विषय
८. देवराज इन्द्र, विष्णु तथा वीरक आदिके साथ
तारकासुरका युद्ध .........--.---.----०---०-०:२५००२०
९, ब्रह्माजीका कार्तिकेयको तारकके वधके लिये प्रेरित
करना, तारकासुरद्वारा विष्णु तथा इनद्रकी भर्त्सना,
पुनः इन्द्रादिके साथ तारकासुरका युद्ध ........
. कुमार कार्तिकेय और तारकासुरका भीषण
संग्राम, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध,
देवताओंद्वारा दैत्य-सेनापर विजय प्राप्त करना,
सर्वत्र वरिजयोल्लास, देवताओंद्वार शिवा-शिव
तथा कुमारकी स्तुति..............-..--.--..-..३
कार्तिकेयद्वारा बाण तथा प्रलम्ब आदि असुरोंका
वध, कार्तिकेयचरितके श्रवणका माहात्म्य .....
विष्णु आदि देवताओं तथा मर्वतोंद्वारा कार्तिकेयकी
स्तुति और बरप्राप्ति, देवताओंके साथ कुमारका
कैलासगमन, कुमारको देखकर शिव-पार्वतीका
आनन्दित होना, देवोंद्वारा शिवस्तुति
गणेशोत्पत्तिका आख्यान, पार्वतीका अपने पुत्र
गणेशको अपने द्वारपर नियुक्त करना, शिव और
गणेशका वार्तालाप
द्वाररक्षक गणेश तथा शिवगणोंका परस्पर विवाद
गणेश तथा शिवगणाँका भयंकर युद्ध, पार्वतीद्वारा
दो शक्तियोंका प्राकट्य, शक्तियोंका अद्भुत पराक्रम
और शिवका कुपित होना .......................-
विष्णु तथा गणेशका युद्ध, शिवद्वारा त्रिशूलसे
गणेशका सिर काटा जाना ....................-.-
पुत्रके वधसे कुपित जगदम्बाका अनेक शक्तियोंको
उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना,
देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको
प्रसन्न करना, शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका
सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड्से
जोड़कर उन्हें जीवित करना .....................
पार्वतीद्वारा गणेशको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य
माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्षपद
प्रदान करना, गणेशचतुर्थीब्रतविधान तथा उसका
माहात्म्य, देवताओंका स्वलोकःगमन ...........
स्वामिकार्तिकिय और गणेशकी बालःलीला,
विवाहके विषयमें दोनोंका परस्पर विवाद,
शिवजीद्वार पृथ्वी-परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका
प्रस्थान, बुद्धिमान् गणेशजीका पृथ्वीरूप माता-
'पिताकी परिक्रमा और प्रसन्न शिवाःशिवद्वारा
गणेशके प्रथम विवाहकी स्वीकृति..............
२०. प्रजापति विश्वरूपकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक
११.
१२.
१३.
१४.
१५.
१६.
१७.
१८.
१९,
पृष्ठ-संख्या
७८३
७८७
७९०
दो कन्याओंके साथ गणेशजीका विवाह तथा
अध्याय
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ऱ्य
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२०
40]
११.
(१०)
विषय
|
अध्याय
विषय
उनसे "क्षेम? तथा “लाभ” नामक दो पुत्रोंकी
उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका पृथ्वीकी परिक्रमाकर
लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंचपर्वतपर चले
जाना, कुमारखण्डके श्रवणकी महिमा .........
५-युद्धखण्ड
- तारकासुरके पुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली एवं
कमलाक्षकी तपस्यासे प्रसन्न ब्रह्मद्वार उन्हें
वरको प्राप्ति, तीनों पुरोंकी शोभाका वर्णन ..
तारकपुत्रोंसे पीड़ित देवताओंका ब्रह्माजीके पास
जाना और उनके परामर्शके अनुसार असुर-वधके
लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना
-त्रिपुरके विनाशके लिये देवताओंका विष्णुसे
निवेदन करना, विष्णुद्वारा त्रिपुरविनाशके लिये
यज्ञकुण्डसे भूतसमुदायको प्रकट करना, त्रिपुरके
भयसे भूतोंका पलायित होना, पुनः विष्णुद्रारा
देवकार्यकी सिद्धिके लिये उपाय सोचना
त्रिपुरवासी दैत्योंको मोहित करनेके लिये भगवान्
विष्णुद्वारा एक मुनिरूप पुरुषकी उत्पत्ति,
उसकी सहायताके लिये नारदजीका त्रिपुरमें
गमन, त्रिपुराधिपका दीक्षा ग्रहण करना
मायावी यतिद्वारा अपने धर्मका उपदेश,
त्रिपुरवासियोंका उसे स्वीकार करना, वेदधर्मके
नष्ट हो जानेसे त्रिमुरमें अधर्माचरणकी प्रवृत्ति
. त्रिपुरध्वंसके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी
स्तुति
भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये देवताओंद्वारा
मन्त्र-जप, शिवका प्राकट्य तथा त्रिपुरविनाशके
लिये दिव्य रथ आदिके निर्माणके लिये विष्णुजीसे
कहना
- विश्वकमद्ठारा निर्मित सर्वदेवमय दिव्य रथका
वर्णन
« ब्रह्माजीको सारथी बनाकर भगवान् शंकरका
दिव्य रथमें आरूढ़ होकर अपने गणों तथा
देवसेनाके साथ त्रिपुरःवधके लिये प्रस्थान,
शिवका पशुपति नाम पड़नेका कारण ..........
भगवान् शिवका त्रिपुरपर सन्धान करना, गणेशजीका
विघ्न उपस्थित करना, आकाशवाणीद्वारा बोधित
होनेपर शिवद्वारा विध्ननाशक गणेशका पूजन,
अभिजित् मुहूर्तमें तीनों पुरोंका एकत्र होना और
शिवद्वारा बाणाग्निसे सम्पूर्ण त्रिपुरको भस्म
करना, मयदानवका बचा रहना ..................
त्रिपुरदाहके अनन्तर भगवान् शिवके रौद्ररूपसे
८१९
८२३
८२९
८३४
८३८
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८४८
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: पार्वतीको प्राप्त करनेके लिये जलन्धरका
भक्तिका वरदान प्राप्त करना
त्रिपुरदाहके अनन्तर शिवभक्त मयदानवका भगवान्
शिवकी शरणमें आना, शिवद्वारा उसे अपनी भक्ति
प्रदानकर वितललोकमें निवास करनेकी आज्ञा देना,
देवकार्य सम्पन्नकर शिवजीका अपने लोकमें जाना
. बृहस्पति तथा इन्द्रका शिवदर्शनके लिये कैलासकी
ओर प्रस्थान, सर्वज्ञ शिवका उनकी परीक्षा लेनेके
लिये दिगम्बर जटाधारी रूप धारणकर मार्ग रोकना,
क्रुद्ध इन्द्रद्वारा उनपर वज्रप्रहारकी चेष्टा, शंकरद्वारा
उनकी भुजाको स्तम्भित कर देना, बृहस्पतिद्वारा
उनकी स्तुति, शिवका प्रसन्न होना और अपनी
नेत्राग्निको क्षार-समुद्रमें फेंकना
. क्षारसमुद्रमें प्रक्षिप्त भगवान् शंकरकी नेत्राग्निसे
समुद्रके पुत्रके रूपमें जलन्धरका प्राकट्य,
कालनेमिकी पुत्री वृन्दाके साथ उसका विवाह
- राहुके शिरश्छेद तथा समुद्रमन्थनके समयके
देवताओंके छलको जानकर जलन्धरद्वारा क्रुद्ध
होकर स्वर्गपर आक्रमण, इन्द्रादि देवोंकी पराजय,
अमरावतीपर जलन्धरका आधिपत्य, भयभीत
देवताओंका सुमेरुकी गुफामें छिपना
. जलन्धरसे भयभीत देवताओंका विष्णुके समीप
जाकर स्तुति करना, विष्णुसहित देवताओंका
जलन्धरकी सेनाके साथ भयंकर युद्ध..........
विष्णु और जलन्धरके युद्धमें जलन्धरके पराक्रमसे
सन्तुष्ट विष्णुका देवों एवं लक्ष्मीसहित उसके
नगरमें निवास करना
- जलन्धरके आधिपत्यमें रहनेवाले दुखी देवताओंद्वारा
शंकरकी स्तुति, शंकरजीका देवर्षि नारदको
जलन्धरके पास भेजना, वहाँ देवोंको आश्वस्त
करके जारदजीका जलन्धरकी सभामें जाना,
उसके ऐश्वर्थको देखना तथा पार्वतीके सौन्दर्यका
वर्णनकर उसे प्राप्त करनेके लिये जलन्धरको
परामर्श देना र
शंकरके
'पास दूतप्रेषण, उसके वचनसे उत्पन्न क्रोधसे
शम्भुके भ्रूमध्यसे एक भयंकर पुरुषकी उत्पत्ति,
उससे भयभीत जलन्धरके दूतका पलायन, उस
पुरुषका कीर्तिमुख नामसे शिवगणोंमें प्रतिष्ठित
होना तथा शिवद्वारपर स्थित रहना.............
- दूतके द्वारा कैलासका वृत्तान्त जानकर जलन्धरका
अपनी सेनाको युद्धका आदेश देना, भयभीत
देवोंका शिवकी शरणमें जाना, शिवगणों तथा
जलन्धरकी सेनाका युद्ध, शिवद्वारा कृत्याको उत्पन
८७२
८७७
८८०
८८६
८८९
८९७
अध्याय
२१.
२३.
२४.
२५.
रै
दी
२७.
३१.
३२.
स्तुति
. विष्णुजीके मोहभंगके लिये शंकरजीको प्रेरणासे
. शंखचूडका राज्यपदपर अभिषेक,
विषय पृष्ठ-संख्या
करना, कृत्याद्वारा शुक्राचार्यको छिपा लेना .... ९०२
नन्दी, गणेश, कार्तिकेय आदि शिवगणोंका
कालनेमि, शुम्भ तथा निशुम्भके साथ घोर संग्राम,
वीरभद्र तथा जलन्धरका युद्ध, भयाकुल
शिवगणोंका शिवजीको सारा वृत्तान्त बताना.. ९०७
. श्रीशिव और जलन्धरका युद्ध, जलन्धखारा गान्धर्वी
मायासे शिवको मोहितकर शीघ्र ही पार्वतीके
पास पहुँचना, उसकी मायाको जानकर पार्वतीका
अदृश्य हो जाना और भगवान् विष्णुको
जलन्धरपत्नी वृन्दाके पास जानेके लिये कहना
विष्णुद्ारा माया उत्पन्नकर वृन्दाको स्वप्नके
माध्यमसे मोहित करना और स्वयं जलन्धरका
रूप धारणकर वृन्दाके पातित्रतका हरण करना,
वृन्दाद्वारा विष्णुको शाप देना तथा वृन्दाके
तेजका पार्वतीमें विलीन होना ...................
दैत्यराज जलन्धर तथा भगवान् शिवका घोर संग्राम,
भगवान् शिवद्वारा चक्रसे जलन्धरका शिरश्छेदन,
जलन्धरका तेज शिवमें प्रविष्ट होना, जलन्धरः
वधसे जगत्में सर्वत्र शान्तिका विस्तार ........
जलन्धरवधसे प्रसन्न देवताओंद्वारा भगवान्
९१५
९२५
देवोंद्रार मूलप्रकृतिकी स्तुति, मूलप्रकृतिद्वारा
आकाशवाणीके रूपमें देवोंको आश्वासन,
देवताओंद्वारा त्रिगुणात्मिका देवियोंका स्तवन,
विष्णुका मोहनाश, धात्री (ऑवला), मालती
तथा तुलसीकी उत्पत्तिका आख्यान है
शंखचूडकी उत्पत्तिकी कथा
९२८
९३३
. शंखचूडकी पुष्कर क्षेत्रमें तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे
चरकी प्राप्ति, ब्रह्माकी प्रेरणासे शंखचूडका
; उसके द्वारा देवोंपर
विजय, दुखी देवोंका ब्रह्माजीके साथ वैकुण्ठगमन,
विष्णुद्वार शंखचूडके पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना
और विष्णु तथा ब्रह्माका शिवलोक-गमन
९४०
„ब्रह्मा तथा विष्णुका शिवलोक पहुँचना, शिवलोककी
तथा शिवसभाकी शोभाका वर्णन, शिवसभाके
मध्य उन्हें अम्बासहित भगवान् शिवके दिव्य-
स्वरूपका दर्शन और शंखचूडसे प्राप्त कष्टोंसे
मुक्तिके लिये प्रार्थना
शिवद्वारा बरह्म विष्णुको शंखचूडका पूर्ववृत्तान्त बताना
और देवोंको शंखचूडवधका आश्वासन देना .
भगवान् शिवके द्वारा शंखचूडको समझानेके लिये
गन्धर्वराज चित्ररथ (पुष्पदन्त)-को दूतके रूपमे
भेजना, शंखचूडद्वारा सन्देशकी अवहेलना और
३७.
३८.
३
4°
°
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४५.
४६.
. शिव और शंखचूडका युद्ध,
युद्ध करनेका अपना निश्चय बताना, पुष्पदन्तका
वापस आकर सारा वृत्तान्त शिवसे निवेदित करना ९५२
. शंखचूडसे युद्धके लिये अपने गणोंके साथ
भगवान् शिवका प्रस्थान ९५५
. तुलसीसे विदा लेकर शंखचूडका युद्धके लिये
ससैन्य पुष्पभद्रा नदीके तटपर पहुँचना ९५८
. शंखचूडका अपने एक बुद्धिमान् दूतको शंकरके पास
भेजना, दूत तथा शिवको वार्ता, शंकरका सन्देश
लेकर दूतका वापस शंखचूडके पास आना .. ९६०
. शंखचूडको उद्देश्यकर देवताओंका दानवोंके
साथ महासंग्राम ...................................... ९६४
शंखचूडके साथ कार्तिकेय आदि महावीरोंका युद्ध ९६७
श्रीकालीका शंखचूडके साथ महान् युद्ध,
आकाशवाणी सुनकर कालीका शिवके पास
आकर युद्धका वृत्तान्त बताना
. शिव और शंखचूडके महाभयंकर युद्‘धमें शंखचूडके
सैनिकोंके संहारका वर्णन ....
शंकरको युद्धसे विरत करना, विष्णुका ब्राह्मणरूप
धारणकर शंखचूडका कवच माँगना, कवचहीन
शंखचूडका भगवान् शिवद्वार वध, सर्वत्र हर्षाल्लास ९७७
. शंखचूडका रूप धारणकर भगवान् विष्णुद्वारा
तुलसीके शीलका हरण, तुलसीद्वारा विष्णुको
पाषाण होनेका शाप देना, शंकरजीद्वारा तुलसीको
सान्त्वना, शंख, तुलसी, गण्डकी एवं शालग्रामकी
उत्पत्ति तथा माहात्म्यकी कथा ...................
अन्धकासुरकी उत्पत्तिकी कथा, शिवके वरदानसे
हिरण्याक्षद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें प्राप्त करना,
हिरण्या्षद्वारा पृथ्वीको पाताललोकमें ले जाना,
भगवान् विष्णुद्रार वाराहरूप धारणकर हिरण्याक्षका
वधकर पृथ्वीको यथास्थान स्थापित करना... ९८६
. हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्मासे वरदान पाकर
उसका अत्याचार, भगवान् नूसिंहद्वारा उसका
वध और प्रह्लादको राज्यप्राप्ति...................
अन्धकासुरकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे अनेक
वरोंकी प्राप्ति, त्रिलोकीको जीतकर उसका
स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, मन्त्रियोंद्वारा पार्वतीके
सौन्दर्यको सुनकर मुग्ध हो शिवके पास सन्देश
भेजना और शिवका उत्तर सुनकर क्रुद्ध हो
युद्धके लिये उद्योग करना........................ ९९६
अन्धकासुरका शिवकी सेनाके साथ युद्ध...... १००४
भगवान् शिव और अन्धकासुरका युद्ध, अन्धककी.
मायासे उसके रक्तसे अनेक अन्धकगणोंकी उत्पत्ति,
शिवको प्रेरणासे विष्णुका कालीरूप धारणकर
दानवोंके र्का पान करना, शिवद्वारा अन्धकको
अध्याय
ड७,
८.
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५२.
विषय
अपने त्रिशूलमें लटका लेना, अन्धककी स्तुतिसे
प्रसन्न हो शिवद्वारा उसे गाणपत्य पद प्रदान करना १०१०
शुक्राचार्यद्वारा युद्धमें मरे हुए दैत्योंको संजीवनी-
विद्यासे जीवित करना, दैत्योंका युद्धके लिये पुन:
उद्योग, नन्दीश्वरदवारा शिवको यह वृत्तान्त बतलाना,
शिवकी आज्ञासे नन्दीद्वारा युद्धस्थलसे शुक्राचार्यको
शिवके पास लाना, शिवद्वारा शुक्राचार्यको निगलना १०१६
शुक्राचार्यकी अनुपस्थितिसे अन्धकादि दैत्योंका
दुखी होना, शिवके उदरमें शुक्राचार्यद्वारा सभी
लोकों तथा अन्धकासुरके युद्धको देखना और फिर
शिवके शुक्ररूपमें बाहर निकलना, शिव-पार्वतीका
उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकारकर विदा करना ........
. शुक्राचार्यद्वारा शिवके उदरमें जपे गये मन्त्रका
वर्णन, अन्धकद्वारा भगवान् शिवकी नामरूपी
स्तुति-प्रार्थना, भगवान् शिवद्वारा अन्धकासुरको
जीवनदानपूर्वक गाणपत्य पद प्रदान करना... १०२५
. शुक्राचार्यद्वारा काशीमें शुक्रेश्वर लिंगकी स्थापनाकर
उनकी आराधना करना, मूर्त्यष्टक स्तोत्रसे उनका
स्तवन, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी-
विद्या प्रदान करना और ग्रहोंके मध्य प्रतिष्ठित करना १०२९
प्रह्मदकी वंशपरम्मरमें बलिपुत्र बाणासुरकी उत्पत्तिकी
कथा, शिवभक्त बाणासुद्धारा ताण्डव नृत्यके प्रदर्शनसे
शंकरको प्रसन्न करना, वरदानके रूपमें शंकरका
बाणासुरकी नगरीमें निवास करना, शिव-पार्वतीका
विहार, पार्वतीद्वारा बाणपुत्री ऊषाको वरदान.. १०३४
अभिमानी बाणासुरद्वारा भगवान् शिवसे युद्धकी
याचना, बाणपुत्री ऊषाका रात्रिके समय स्वप्नमें
अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा योगबले
अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, अन्तःपुरमें अनिरुद्ध
और ऊषाका मिलन तथा द्वारपालोंद्रारा यह
अध्याय
५५.
५६.
५
(5
५९.
>> ०
श्रीशिवमहापुराणनवाहपारायणक्रम:
. क्रुद्ध बाणासुरका अपनी सेनाके साथ अनिरुद्धपर
विषय
समाचार बाणासुरको बताना
पृष्ठ-संख्या
-- १०३९
आक्रमण और उसे नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके
स्तवनद्वारा अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना
. नारदजीद्वारा अनिरुद्धके बन्धनका समाचार पाकर
श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ
उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका
उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणासुरकी
सेनाका संहार करना................................
भगवान् कृष्ण तथा बाणासुरका संग्राम, श्रीकृष्णद्वारा
बाणकी भुजाओंका कारा जाना, सिर काटनेके
लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको शिवका रोकना
और उन्हें समझाना, बाणका गर्वापहरण, श्रीकृष्ण
और बाणासुरकी मित्रता, ऊषा-अनिरुद्धको लेकर
श्रीकृष्णका द्वारका आना...........................
बाणासुरका ताण्डवनृत्यद्वारा भगवान् शिवको
प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अनेक मनोऽभिलषित
वरदानोंकी प्राप्ति, बाणासुरकृत शिवस्तुति ..... १०५८
. महिषासुरके पुत्र गजासुरकी तपस्या तथा ब्रह्माद्वारा
वरप्राप्ति, उन्मत्त गजासुरद्वारा अत्याचार, उसका
काशीमें आना, देवतांद्वारा भगवान् शिवसे उसके
चधकी प्रार्थना, शिवद्वारा उसका वध और
उसकी प्रार्थनासे उसका चर्म धारणकर 'कृत्तिवासा'
नामसे विख्यात होना एवं कृत्तिवासेश्वर लिंगकी
स्थापना करता १ ` -००००९००००००००१०००४००० ००५74
. काशीके व्याघ्रेश्वर लिंग-माहात्म्यके सन्दर्भमें
दैत्य दुन्दुभिनिर्हादके वधकी कथा ..............
काशीके कन्दुकेश्वर शिवलिंगके प्रादुर्भावमें
पार्वतीद्वारा विदल एवं उत्पल दैत्योंके वधकी कथा,
रुद्रसंहिताका उपसंहार तथा इसका माहात्म्य. १०६९
१०६५
रुद्रसंहितायाः सतीखण्डस्य सप्तमाध्यायपर्यन्तम्
रुद्रसंहिताया: पार्वतीखण्डस्य पञ्चदशाध्यायपर्यन्तम्
रुद्रसंहितायाः कुमारखण्डस्य दशमाध्यायपर्यन्तम्
रुद्रसंहिताया: युद्धखण्डस्य एकचत्वारिंशदध्यायपर्यन्तम्
शतरुद्रसंहिताया:
कोटिरुद्रसंहिताया: त्रिचत्वारिंशदध्यायपर्यन्तम्
सम्पूर्णा उमासंहिता
वायवीयसंहितायाः पूर्वखण्डस्य अष्टाविशाध्यायपर्यन्तम्
छ नज! शिवाय
॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम: ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम: ॥
=_= श्रीशिवमहापुराण >
माहात्म्य
अथ प्रथमोऽध्यायः
शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजीका उन्हें शिवमहापुराणकी महिमा सुनाना
शौनक उवाच
हे हे सूत महाप्राज्ञ सर्वसिद्धान्तवित् प्रभो।
आख्याहि मे कथासारं पुराणानां विशेषतः ॥
सदाचारश्च सद्भक्तिर्विवेको वर्धते कथम्।
स्वविकारनिरासश्च सज्जनैः क्रियते कथम्॥
जीवाश्चासुरतां प्राप्ताः प्रायो घोरे कलाविह।
तस्य संशोधने किं हि बिद्यते परमायनम्॥
यदस्ति वस्तु परमं श्रेयसां श्रेय उत्तमम्।
पावनं पावनानां च साधनं तद्वदाधुना॥
येन तत्साधनेनाशु शुध्यत्यात्मा विशेषत: ।
शिवप्राप्तिर्भवेत्तात सदा निर्मलचेतसः॥
सूत उवाच
धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल श्रवणप्रीतिलालसः।
अतो विचार्य सुधिया वच्मि शास्त्रं महोत्तमम्॥
सर्वसिद्धान्तनिष्पन्नं भक्त्यादिकविवर्धनम्।
शिबतोषकरं दिव्यं श्रृणु वत्स रसायनम्॥
'कालव्यालमहात्रासविध्वंसकरमुत्तमम् ।
शैवं पुराणं परमं शिवेनोक्तं पुरा मुने॥
श्रीशौनकजी बोले-हे महाज्ञानी सूतजी!
सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता हे प्रभो! मुझसे पुराणोंको
'कथाओंके सारतत्त्वका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये ॥ १॥
सदाचार, भगवद्रक्ति और विवेककी वृद्धि कैसे
होती है तथा साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम-क्रोध
आदि मानसिक विकारोंका निवारण करते हैं ?॥ २॥
इस घोर कलियुगमें जीव प्राय: आसुर स्वभावके
हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध (दैवी सम्पत्तिसे
युक्त) बनानेके लिये सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है ?॥ ३॥
आप इस समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन
बताइये, जो कल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट
एवं परम मंगलकारी हो तथा पवित्र करनेवाले
उपायोंमें भी सर्वोत्तम पवित्रकारक उपाय हो॥ ४॥
तात! चह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे
शीघ्र ही अन्तःकरणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा
उससे निर्मल चित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवको
प्राप्ति हो जाय॥ ५॥
सूतजी बोले मुनिश्रेष्ठ शौनक! आप धन्य
हैं; आपके हदयमें पुराण-कथा सुननेके प्रति विशेष
प्रेम एबं लालसा है, इसलिये मैं शुद्ध बुद्धिसे
विचारकर परम उत्तम शास्त्रका वर्णन करता हूँ॥ ६॥
वत्स! सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तसे सम्पन्न,
भक्ति आदिको बढानेवाले, भगवान् शिवको सन्तुष्ट
करनेवाले तथा कानोंके लिये रसायनस्वरूप दिव्य
पुराणका श्रवण कीज़िये॥ ७॥
यह उत्तम शिवपुराण कालरूपी सर्पसे प्राप्त
होनेवाले महान् त्रास का विनाश करनेवाला है। हे
मुने! पूर्वकालमें शिवजीने इसे कहा था। गुरुदेव
१४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १
ooo
सनत्कुमारस्य मुनेरुपदेशात् परादरात्।
व्यासेनोक्तं तु संक्षेपात् कलिजानां हिताय च॥
एतस्मादपरं किञ्चित्पुराणाच्छैवतो मुने।
न विद्यते मनःशुद्धयै कलिजानां विशेषतः॥ १०
जन्मान्तरे भवेत् पुण्यं महद्यस्य सुधीमतः।
तस्य प्ररीतिर्भवेत्तत्र महाभाग्यवतो मुने॥ ११
एतच्छिवपुराणं हि परमं शास्त्रमुत्तमम्।
शिवरूपं क्षितौ ज्ञेयं सेवनीयं च सर्वथा॥ १२
पठनाच्छूवणादस्य भक्तिमान्नरसत्तमः।
सद्यः शिवपदप्राप्तिं लभते सर्वसाधनात्॥ १३
तस्मात् सर्वप्रयलेन काङ्क्षितं पठनं नृभिः।
तथास्य श्रवणं प्रेम्णा सर्वकामफलप्रदम्॥ १४
पुराणश्रवणाच्छम्भोर्निष्पापो जायते नर: ।
भुक्त्वा भोगान् सुविपुलान् शिवलोकमवाण्नुयात्॥ १५
राजसूयेन यत्पुण्यमग्निष्टोमशतेन च।
तत् पुण्यं लभते शम्भोः कथाश्रवणमात्रतः॥ १६
ये श्रृण्वन्ति मुने शैवं पुराणं शास्त्रमुत्तमम्।
ते मनुष्या न मन्तव्या रुद्रा एव न संशयः॥ १७
श्रृण्वतां तत् पुराणं हि तथा कीर्तयतां च तत्।
पादाम्बुजरजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः॥ १८
गन्तुं निःश्रेयसं स्थानं येऽभिवाञ्छन्ति देहिनः।
शैवं पुराणममलं भक्त्या शृण्वन्तु ते सदा॥ १९
सदा श्रोतुं यद्यशक्तो भवेत् स मुनिसत्तम।
नियतात्मा प्रतिदिनं शृणुयाद्वा मुहूर्तकम्॥ २०
यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तो मानवो भवेत्।
पुण्यमासादिषु मुने श्रृणुयाच्छिवपुराणकम्॥ २१
व्यासजीने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर कलियुगके
प्राणियोंके कल्याणके लिये बड़े आदरसे संक्षेपमें इस
पुराणका प्रतिपादन किया है॥ ८-९॥
हे मुने! विशेष रूपसे कलियुगके प्राणियोंकी
चित्तशुद्धिके लिये इस शिवपुराणके अतिरिक्त कोई
अन्य साधन नहीं है॥ १०॥
हे मुने! जिस बुद्धिमान् मनुष्यके पूर्वजन्मके बड़े
पुण्य होते हैं, उसी महाभाग्यशाली व्यक्तिकी इस
पुराणमें प्रीति होती है॥ ११॥
यह शिवपुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस
भूतलपर भगवान् शिवका वाङ्मय स्वरूप समझना चाहिये
और सब प्रकारसे इसका सेवन करना चाहिये ॥ १२॥
इसके पठन और श्रवणसे शिवभक्ति पाकर
श्रेष्ठतम स्थितिमें पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही
शिवपदको प्राप्त कर लेता है। इसलिये सम्पूर्ण यत्न
करके मनुष्योंने इस पुराणके अध्ययनको अभीष्ट
साधन माना है और इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी
सम्पूर्ण वांछित फलोंको देनेवाला है॥ १३-१४॥
भगवान् शिवके इस पुराणको सुननेसे मनुष्य
सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा बड़े-बड़े उत्कृष्ट
भोगोंका उपभोग करके [अन्तमें] शिवलोकको प्राप्त
कर लेता है॥ १५॥
राजसूययज्ञ और सैकड़ों अग्निष्टोमयज्ञोंसे जो
पुण्य प्राप्त होता है, वह भगवान् शिवकी कथाके
सुननेमात्रसे प्राप्त हो जाता है॥ १६॥
हे मुने! जो लोग इस श्रेष्ठ शास्त्र शिवपुराणका
श्रवण करते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं समझना चाहिये; वे
रुद्रस्वरूप ही हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ १७॥
इस पुराणका श्रवण और कीर्तन करनेवालोंके चरण:
कमलको धूलिको मुनिगण तीर्थ ही समझते हैं ॥ १८॥
जो प्राणी परमपदको प्राप्त करना चाहते हैं,
उन्हें सदा भक्तिपूर्वक इस निर्मल शिवपुराणका श्रवण
करना चाहिये॥ १९॥
हे मुनिश्रेष्ठ! यदि मनुष्य सदा इसे सुननेमें समर्थ
न हो, तो उसे प्रतिदिन स्थिर चित्तसे एक मुहूर्त भी
इसको सुनना चाहिये। हे मुने! यदि मनुष्य प्रतिदिन
सुननेमें भी अशक्त हो, तो उसे किसी पवित्र महीनेमें
इस शिवपुराणका श्रवण करना चाहिये॥ २०-२१॥
अ० १]
माहात्म्य
मुहूर्त वा तदर्धं वा तदर्धं वा क्षणं च वा।
ये शृण्वन्ति पुराणं तन्न तेषां दुर्गतिर्भवेत्॥ २२
तत्पुराणं च शृण्वानः पुरुषो यो मुनीश्वर।
स निस्तरति संसारं दरध्वा कर्ममहाटवीम्॥ २३
यत्पुण्यं सर्वदानेषु सर्वयज्ञेषु वा मुने।
शम्भोः पुराणश्रवणात्तत्फलं निश्चलं भवेत्॥ २४
विशेषतः कलौ शैवपुराणश्रवणादृते।
परो धर्मो न पुंसां हि मुक्तिसाधनकृन्मुने॥ २५
पुराणश्रवणं शम्भोर्नामसङ्कीर्तनं तथा।
'कल्पद्रुमफलं सम्यङ् मनुष्याणां न संशयः॥ २६
कलो दुर्मेधसां पुंसां धर्माचारोज्झितात्मनाम्।
हिताय विदधे शम्भुः पुराणाख्यं सुधारसम्॥ २७
एकोऽजरामरः स्याद्वै पिबन्नेवामृतं पुमान्।
शम्भोः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम्॥ २८
सदा सेव्या सदा सेव्या सदा सेव्या विशेषत: ।
एतच्छिवपुराणस्य कथा परमपावनी॥ २९
एतच्छिवपुराणस्य कथाश्रवणमात्रतः।
किं ब्रवीमि फलं तस्य शिवश्चित्तं समाश्रयेत्॥ ३०
चतुर्विशतिसाहस््रो ग्रन्थोऽयं सप्तसंहितः।
भक्तित्रिकसुसम्पूर्णः श्रृणुयात्तं परादरात्॥ ३१
विद्येशवरसंहिताद्या द्वितीया रुद्रसंहिता।
तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका॥ ३२
'पञ्चम्युमासंहितोक्ता षष्ठी कैलाससंहिता।
सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता इह॥
१५
जो लोग एक मुहूर्त उसका आधा, उसका भी
आधा अथवा क्षणमात्र भी इस पुराणका श्रवण करते
हैं, उनकी दुर्गति नहीं होती॥ २२॥
हे मुनीश्वर! जो पुरुष इस शिवपुराणकी कथाको
सुनता है, वह सुननेवाला पुरुष कर्मरूपी महावनको
जलाकर संसारके पार हो जाता है॥ २३॥
हे मुने! सभी दानों और सभी यज्ञोंसे जो पुण्य
मिलता है, वह फल भगवान् शिवके इस पुराणको
सुननेसे निश्चल हो जाता है॥ २४॥
हे मुने! विशेषकर इस कलिकालमें तो शिवपुराणके
श्रवणके अतिरिक्त मनुष्योंके लिये मुक्तिदायक कोई
अन्य श्रेष्ठ साधन नहीं है॥ २५॥
शिवपुराणका श्रवण और भगवान् शंकरके
नामका संकीर्तन--दोनों ही मनुष्योंको कल्पवृक्षके समान
सम्यक् फल देनेवाले हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥
कलियुगमें धर्माचरणसे शून्य चित्तवाले दुर्बुद्धि
मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् शिवने अमृतरसस्वरूप
शिवपुराणकी उद्धावना की है॥ २७॥
अमृतपान करनेसे तो केवल अमृतपान करनेवाला
ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवान् शिवका
यह कथामृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर कर देता
है॥ २८ ॥
इस शिवपुराणकी परम पवित्र कथाका विशेष
रूपसे सदा ही सेवन करना चाहिये, करना ही
चाहिये, करना ही चाहिये। इस शिवपुराणकी कथाके
श्रवणका क्या फल कहूँ? इसके श्रवणमात्रसे भगवान्
सदाशिव उस प्राणीके हृदयमें विराजमान हो जाते
हैं ॥ २९-३०॥
यह [शिवपुराण नामक] ग्रन्थ चौबीस हजार
श्लोकोंसे युक्त है। इसमें सात संहिताएँ हैं। मनुष्यको
चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे भली-भाँति
सम्पन्न हो बड़े आदरसे इसका श्रवण करे॥ ३१॥
पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रुद्रसंहिता,
तीसरी शतरुद्रसंहिता, चौथी कोटिरुद्रसंहिता और
पाँचवीं उमासंहिता कही गयी है; छठी कैलाससंहिता
और सातवीं वायवीय-संहिता--इस प्रकार इसमें सात
संहिताएँ हैं॥ ३२-३३॥
१६
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १
ससप्तसंहितं दिव्यं पुराणं शिवसंज्ञकम्
वरीवर्ति ब्रह्मतुल्यं सर्वोपरि गतिप्रदम्॥ ३४
एतच्छिवपुराणं हि सप्तसंहितमादरात्।
परिपूर्ण पठेद्यस्तु स जीवन्मुक्त उच्यते॥ ३५
पुमानज्ञानतस्तावद् भ्रमतेऽस्मिन्भवे मुने।
यावत्कर्णगतं नास्ति पुराणं शैवमुत्तमम्॥ ३६
किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैश्च भ्रमावहैः।
शैवं पुराणमेकं हि मुक्तिदानेन गर्जति॥ ३७
एतच्छिवपुराणस्य कथा भवति यदगृहे।
तीर्थभूतं हि तद् गेहं वसतां पापनाशनम्॥ ३८
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।
कलां शिवपुराणस्य नार्हन्ति खलु षोडशीम्॥ ३९
'तावत् स प्रोच्यते पापी पापकृन्मुनिसत्तम।
यावच्छिवपुराणं हि न श्रृणोति सुभक्तितः॥ ४०
गङ्गाद्याः पुण्यनद्यश्च सप्तपुर्यो गया तथा।
एतच्छिवपुराणस्य समतां यान्ति न क्वचित्॥ ४१
नित्यं शिवपुराणस्य श्लोकं श्लोकार्धमेव च।
स्वमुखेन पठेद्भक्त्या यदीच्छेत् परमां गतिम्॥ ४२
एतच्छिवपुराणं यो वाचयेदर्थतोऽनिशम्।
पटेद्वा प्रीतितो नित्यं स पुण्यात्मा न संशय: ॥ ४३
अन्तकाले हि यश्चैनं श्रृणुयाद्धक्तित: सुधी: ।
सुप्रसन्नो महेशानस्तस्मै यच्छति स्वं पदम्॥ ४४
एतच्छिवपुराणं यः पूजयेन्नित्यमादरात्।
स भुक्त्वेहाखिलान् कामानन्ते शिवपदं लभेत्॥ ४५
सात संहिताओंसे युक्त यह दिव्य शिवपुराण
परब्रह्म परमात्माके समान विराजमान है और सबसे
उत्कृष्ट गति प्रदान करनेवाला है॥ ३४॥
जो मनुष्य सात संहिताओंवाले इस
शिवपुराणको आदरपूर्वक पूरा पढ़ता है, वह जीवन्मुक्त
कहा जाता है॥ ३५॥
हे मुने! जबतक इस उत्तम शिवपुराणको सुनेका
सुअवसर नहीं प्राप्त होता, तबतक अज्ञानवश प्राणी
इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है॥ ३६॥
भ्रमित कर देनेवाले अनेक शास्त्रों और पुराणोंके
श्रवणसे क्या लाभ है, जबकि एक शिवपुराण ही
मुक्ति प्रदान करनेके लिये गर्जन कर रहा है॥ ३७॥
जिस घरमें इस शिवपुराणकी कथा होती है, वह
घर तीर्थस्वरूप ही है और उसमें निवास करनेवालोंके
पाप यह नष्ट कर देता है॥ ३८॥
हजारों अश्वमेधयज्ञ और सैकड़ों -वाजपेययज्ञ
शिवपुराणकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर
सकते ॥ ३९॥
हे मुनिश्रेष्ठ! कोई अधम प्राणी जबतक भक्तिपूर्वक
शिवपुराणका श्रवण नहीं करता, तभीतक उसे पापी
कहा जा सकता है॥ ४०॥
गंगा आदि पवित्र नदियाँ, [ मुक्तिदायिनी] सप्त
पुरियाँ तथा गयादि तीर्थ इस शिवपुराणकी समता
कभी नहीं कर सकते ॥ ४१॥
जिसे परमगतिकी कामना हो, उसे नित्य
शिवपुराणके एक श्लोक अथवा आधे श्लोकका ही
स्वयं भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये॥ ४२॥
जो निरन्तर अर्थानुसन्धानपूर्वक इस शिवपुराणको
बाँचता है अथवा नित्य प्रेमपूर्वक इसका पाठमात्र करता
है, वह पुण्यात्मा है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३ ॥
जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष अन्तकालमें भक्तिपूर्वक
पुराणको सुनता है, उसपर अत्यन्त प्रसन्न हुए
भगवान् महेश्वर उसे अपना पद (धाम) प्रदान करते
हैं ॥ ४४॥
जो प्रतिदिन आदरपूर्वक इस शिवपुराणका पूजन
करता है, वह इस संसारमें सम्पूर्ण भोगोंको भोगकर
अन्तमें भगवान् शिवके पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४५॥
अ० २]
माहात्म्य
१७
एतच्छिवपुराणस्य कुर्वन्नित्यमतन्द्रितः।
पट्टवस्त्रादिना सम्यक् सत्कारं स सुखी सदा॥ ४६
शैवं पुराणममलं शैवसर्वस्वमादरात्।
सेवनीयं प्रयलेन परत्रेह सुखेप्सुना॥ ४७
चतुर्वर्गप्रदं शैवं पुराणममलं परम्।
श्रोतव्यं सर्वदा प्रीत्या पठितव्यं विशेषतः ॥ ४८
बेदेतिहासशास्त्रेषु परं श्रेयस्करं महत्।
शैवं पुराणं विज्ञेयं सर्वथा हि मुमुक्षुभिः ॥ ४९
शैबं पुराणमिदमात्मविदां वरिष्ठं
सेव्यं सदा परमवस्तु सता समर्च्यम्।
तापत्रयाभिशमनं सुखदं सदैव
प्राणप्रियं विधिहरीशमुखामराणाम्॥ ५०
बन्दे शिवपुराणं हि सर्वदाहं प्रसन्नधीः।
शिवः प्रसन्नतां यायाद् दद्यात्स्वपदयो रतिम्॥ ५१
जो प्रतिदिन आलस्यरहित हो रेशमी वस्त्र
आदिके वेष्टनसे इस शिवपुराणका सत्कार करता है,
वह सदा सुखी होता है ॥ ४६॥
यह शिवपुराण निर्मल तथा शैवोंका सर्वस्व है;
इहलोक और परलोकमें सुख चाहनेवालेको आदरके
साथ प्रयत्नपूर्वक इसका सेवन करना चाहिये ॥ ४७॥
यह निर्मल एबं उत्तम शिवपुराण धर्म, अर्थ,
काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है,
अतः सदा प्रेमपूर्वक इसका श्रवण एवं विशेष रूपसे
पाठ करना चाहिये ॥ ४८॥
वेद, इतिहास तथा अन्य शास्त्रमें यह शिवपुराण
विशेष कल्याणकारी है-ऐसा मुमुक्षुजनोंको समझना
चाहिये ॥ ४९ ॥
यह शिवपुराण आत्मतत्त्वज्ञोंके लिये सदा
सेवनीय है, सत्पुरुषोंके लिये पूजनीय है, तीनों
प्रकारके तापोंका शमन करनेवाला है, सुख प्रदान
करनेवाला है तथा ब्रह्माःविष्णु-महेशादि देवताओंको
प्राणोंके समान प्रिय है॥ ५० ॥
ऐसे शिवपुराणको मैं प्रसन्नचित्तसे सदा वन्दन
करता हूँ। भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों और अपने
चरणकमलोंकी भक्ति मुझे प्रदान करें॥ ५१॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये तन्महिमवर्णतं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्यमें उसकी महिमावर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
शिवपुराणके श्रवणसे देवराजको शिवलोककी प्राप्ति
शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं परमार्थवित्।
अद्भुतेयं कथा दिव्या श्राविता कृपया हि न:॥ १
अघौघविध्वंसकरी मनःशुद्धिविधायिनी।
शिवसन्तोषजननी कथेयं नः श्रुताद्धुता॥ २
एतत्कथासमानं न भुवि किञ्चित् परात्परम्
निश्चयेनेति विज्ञातमस्माभिः कृपया तव॥ ३
शौनकजी बोले-हे महाभाग सूतजी! आप
धन्य हैं, परमार्थतत्त्वके ज्ञाता हैं, आपने कृपा करके
'हमलोगोंको यह बड़ी अद्भुत एवं दिव्य कथा सुनायी
है॥ १॥
हमने यह पापनाशिनी, मनको पवित्र करनेवाली
और भगवान् शिवको प्रसन्न करनेवाली अद्भुत कथा
सुनी॥ २॥
भूतलपर इस कथाके समान कल्याणका सर्वश्रेष्ठ
साधन दूसरा कोई नहीं है, यह बात हमने आज
आपकी कृपासे निश्चयपूर्वक समझ ली। हे सूतजी !
१८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २
के के विशुध्यन्त्यनया कथया पापिनः कलो ।
वद तान् कृपया सूत कृतार्थ भुवनं कुरू॥
सूत उवाच
ये मानवा: पापकृतो दुराचाररता: खला: ।
'कामादिनिरता नित्यं तेऽपि शुध्यन्त्यनेन वै॥ ५
ज्ञानयज्ञ: परोऽयं वै भुक्तिमुक्तिप्रदः सदा ।
शोधन: सर्वपापानां शिवसन्तोषकारक:॥ ६
तृष्णाकुलाः सत्यहीना: पितृमातृविदूषकाः।
दाम्भिका हिंसका ये च तेऽपि शुध्यन्त्यनेन वै॥ ७
स्ववर्णाश्रमध्मेभ्यो वर्जिता मत्सरान्विताः ।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि॥ ८
छलच्छद्मकरा ये च ये च क्रूराः सुनिर्दयाः।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि॥ ९
ब्रह्मस्वपुष्टाः सततं व्यभिचाररताश्च ये।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति 'कलावपि॥ १०
सदा पापरता ये च ये शठाएच दुराशयाः।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि॥ ११
मलिना दुर्धियोऽशान्ता देवताद्रव्यभोजिनः।
ज्ञानयज्ञेन तेऽनेन सम्पुनन्ति कलावपि॥ १२
पुराणस्यास्य पुण्यं सन्महापातकनाशनम्।
भुक्तिुक्तिप्रदं चेव शिवसन्तोषहेतुकम्॥ १३
अत्रैवो दाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यस्य श्रवणमात्रेण पापहानिर्भवत्यलम्॥ १४
आसीत् किरातनगरे ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः।
दरिद्रो रसविक्रेता वेदधर्मपराङ्मुखः॥ १५
सबध्यास्नानपरिभ्रष्टो वैश्यवृत्तिपरायणः।
देवराज इति ख्यातो विश्वस्तजनवञ्जकः॥ १६
कलियुगमें इस कथाके द्वारा कौन-कौन-से पापी शुद्ध
होते हैं ? उन्हें कृपापूर्वक बताइये और इस जगतको
कृतार्थं कीजिये ॥ ३-४॥
सूतजी बोले-हे मुने! जो मनुष्य पापी, दुराचारी,
खल तथा काम-क्रोध आदिमें निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं,
वे भी इस पुराणसे अवश्य शुद्ध हो जाते हैं ॥ ५॥
यह कथा वास्तवमें उत्तम ज्ञानयज्ञ है, जो सदा
सांसारिक भोग और मोक्षको देनेवाला है, सभी
पापोंको नष्ट करनेवाला है और भगवान् शिवको
प्रसन्न करनेवाला है। जो अत्यन्त लालची, सत्यविहीन,
अपने माता-पितासे द्वेष करनेवाले, पाखण्डी तथा
हिंसक वृत्तिके हैं; वे भी इस ज्ञानयज्ञसे शुद्ध हो जाते
हैं। अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन न करनेवाले और
ईर्ष्याग्रस्त लोग भी कलिकालमें इस ज्ञानयज्ञके द्वारा
पवित्र हो जाते हैं॥ ६-८॥
जो लोग छल-कपट करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले
और अत्यन्त निर्दयी हैं, कलियुगमें वे भी इस
ज्ञानयज्ञसे शुद्ध हो जाते हैं ब्राह्मणके धनसे पलनेवाले
तथा निरन्तर व्यभिचारपरायण जो लोग हैं, वे भी इस
ज्ञानयज्ञसे इस कलिकालमें भी पवित्र हो जाते हैं। जो
मनुष्य सदा पापकमोमें लिप्त रहते हैं, शठ हैं और
अत्यन्त दूषित विचारवाले हैं, वे कलियुगमें भी इस
ज्ञानयज्ञसे निर्मल हो जाते हैं। दुश्चरित्र, दुर्बुद्धि,
उद्विग्न चित्तवाले और देवताओंके द्रव्यका उपभोग
करनेवाले पापीजन भी कलिकालमें भी इस ज्ञानयज्ञसे
पवित्र हो जाते हैं॥ ९-१२॥
इस पुराणके श्रवणका पुण्य बड़े-बड़े पापोंको
नष्ट करता है, सांसारिक भोग तथा मोक्ष प्रदान करता
है और भगवान् शंकरको प्रसन्न करता है॥ १३॥
इस सम्बन्धमें मुनिगण इस प्राचीन इतिहासका
उदाहरण दिया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापोंका
पूर्णतया नाश हो जाता है॥ १४॥
पहलेकी बात है-किरातनगरमें एक ब्राह्मण
रहता था, जो अज्ञानी, दरिद्र, रस बेचनेवाला तथा
वैदिक धर्मसे विमुख था। वह स्नान-सन्ध्या आदिं
कासे भ्रष्ट हो गया था और वैश्यवृत्तिमें तत्पर रहता
था। उसका नाम था देवराज। वह अपने ऊपर
आ० २]
माहात्म्य
१९
स विप्रान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्राश्चापि तथापरान्।
हत्वा नानामिषेणैव तत्तद्धनमपाहरत्॥ १७
अधर्माद् बहुवित्तानि पश्चात्तेनार्जितानि वै।
न धर्माय धनं तस्य स्वल्पञ्चापीह पापिनः॥ १८
एकदैकतडागे स स्नातुं यातो महीसुरः।
वेश्यां शोभावती नाम दृष्ट्वा तत्रातिविह्ृल:॥ १९
स्ववशं धनिनं विप्रं ज्ञात्वा हृष्टाथ सुन्दरी
वार्तालापेन तच्चित्तं प्रीतिमत्समजायत॥ २०
स्त्रियं कर्तृं स तां मेने पतिं कर्तु च सा तथा।
एवं कामवशौ भूत्वा बहुकालं विजह्ृतुः॥ २९
आसने शयने पाने भोजने क्रीडने तथा।
दम्पतीव सदा द्वौ तु ववृताते परस्परम्॥ २२
मात्रा पित्रा तथा पल्या वारितोऽपि पुनः पुन: ।
नामन्यत वचस्तेषां पापवृत्तिपरायणः॥ २३
एकदे्ष्याबशाद् रात्रौ मातरं पितरं वधूम्।
प्रसुप्तान् न्यवधीद् दुष्टो धनं तेषां तथाहरत्॥ २४
आत्मनीनं धनं यच्च पित्रादीनां तथा धनम्।
वेश्यायै दत्तवान् सर्व कामी तद्गतमानसः॥ २५
सोऽभक्ष्यभक्षकः पापी मदिरापानलालसः।
एकपात्रे सदाभौक्षीत् सवेश्यो ब्राह्मणाधमः॥ २६
कदाचिद्दैवयोगेन प्रतिष्ठानमुपागत: ।
शिवालयं ददर्शासौ तत्र साधुजनावृतम्॥
स्थित्वा तत्र च विप्रोऽसौ ज्चरेणातिप्रपीडितः।
शुश्राव सततं शैवीं कथां विप्रमुखोद्गताम्॥ २८
विश्वास करनेवाले लोगोंको ठगा करता था। उसने
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दूसरोंको भी
अनेक बहानोंसे मारकर उनका धन हड़प लिया था।
बादमें उसने अधर्मसे बहुत सारा धन अर्जित कर
लिया, परंतु उस पापीका थोड़ा-सा भी धन कभी
धर्मके काममें नहीं लगा॥ १५--१८॥
एक दिन वह ब्राह्मण एक तालाबपर नहाने
गया। वहाँ शोभावती नामकी एक वेश्याकों देखकर
वह अत्यन्त मोहित हो गया। वह सुन्दरी भी उस
धनी ब्राह्मणको अपने वशीभूत हुआ जानकर प्रसन्न
हुई। आपसमें वार्तालापसे उनमें प्रीति उत्पन्न हो
गयी। उस ब्राह्मणने उस वेश्याको पत्नी बनाना तथा
उस वेश्याने उसे पति बनाना स्वीकार कर लिया। इस
प्रकार कामवश होकर वे दोनों बहुत समयतक विहार
करते रहे॥ १९--२१॥
बैठने, सोने, खाने-पीने तथा क्रीड़ामें वे दोनों
निरन्तर पति-पत्नीकी तरह व्यवहार करने लगे।
अपने माता-पिता तथा पत्नीके बार-बार रोकनेपर भी
पापकृत्यमें संलग्न वह ब्राह्मण उनकी बात नहीं
मानता था॥ २२-२३॥
एक दिन रात्रिमें उस दुष्टने ईर्ष्यावश अपने सोये
हुए माता-पिता और पत्नीको मार डाला और उनका सारा
धन हर लिया । वेश्यामें आसक्त चित्तवाले उस कामीने
अपना और पिता आदिका सारा धन उस वेश्याको दे
दिया। वह पापी अभक्ष्य भक्षण तथा मद्यपान करने
लगा और वह नीच ब्राह्मण उस वेश्याके साथ एक
ही पात्रमें सदा जूठा भोजन करने लगा॥ २४--२६॥
एक दिन घूमता-घामता वह दैवयोगसे
प्रतिष्ठानपुर (झुँसी-प्रयाग)-में जा पहुँचा। वहाँ उसने
एक शिवालय देखा, जहाँ बहुतसे साधु-महात्मा
एकत्र हुए थे॥ २७॥
देवराज उस शिवालयमें ठहर गया और वहाँ
उस ब्राह्मणको ज्वर आ गया। उस ज्वरसे उसको
बड़ी पीड़ा होने लगी। वहाँ एक ब्राह्मणदेवता
शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे। ज्वरमें पड़ा हुआ
देवराज ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुई उस
शिवकथाको निरन्तर सुनता रहा॥ २८॥
२०
श्रीशिवमहापुराण
[आ० २
देवराजश्च मासान्ते ज्वरेणापीडितो मृत: ।
बद्धो यमभटैः पाशैर्नीतो यमपुरं बलात्॥
तावच्छिवगणाः शुश्रास्त्रिशूलाञ्जितपाणयः।
भस्मभासितसर्वाङ्गा रुद्राक्षाञ्जरितविग्रहाः॥ ३०
शिवलोकात् समागत्य क्रुद्धा यमपुरी ययुः ।
ताडयित्वा तु तद्दूतांस्तर्जयित्वा पुनः पुनः॥ ३१
देवराजं समामोच्य विमाने परमाद्भुते।
उपवेश्य यदा दूताः कैलासं गन्तुमुत्सुकाः॥ ३२
तदा यमपुरीमध्ये महाकोलाहलोऽभवत्।
धर्मराजस्तु तं श्रुत्वा स्वालयाद् बहिरागमत्॥ ३३
दृष्ट्वाथ चतुरो दूतान् साक्षाद् रुद्रानिवापरान्।
पूजयामास धर्मज्ञो धर्मराजो यथाविधि॥ ३४
ज्ञानेन चक्षुषा सर्व वृत्तान्तं ज्ञातवान् यमः।
न भयातूपृष्टवान् किञ्चिच्छम्भोर्दूतान् महात्मनः ॥ ३५
पूजिताः प्रार्थितास्ते वै कैलासमगमंस्तदा।
ददुः शिवाय साम्बाय तं द्यावारिराशये॥ ३६
धन्या शिवपुराणस्य कथा परमपावनी।
यस्याः श्रवणमात्रेण पापीयानपि मुक्तिभाक् ॥ ३७
सदाशिवमहास्थानं परं धाम परं पदम्।
यदाहुर्वेदविद्वांसः सर्वलोकोपरि स्थितम्॥ ३८
ब्राह्मणा: कषत्रिया वैश्याः शूद्रा अन्येऽपि प्राणिनः।
हिंसिता धनलोभेन बहवो येन पापिना॥ ३९
मातृपितृवधूहन्ता वेश्यागामी च मद्यपः।
देवराजो द्विजसतत्र गत्वा मुक्तोऽभवत् क्षणात्॥ ४०
एक मासके बाद वह ज्वरसे अत्यन्त पीड़ित
होकर चल बसा। यमराजके दूत आये और उसे
पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमें ले गये॥ २९॥
इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके पार्षदगण
आ गये। उनके गौर अंग कर्पूरके समान उज्वल थे,
हाथ त्रिशूलसे सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अंग
भस्मसे उद्धासित थे और रुद्राक्षकी मालाएँ उनके
शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं। वे सब-के-सब क्रोध
करते हुए यमपुरीमें गये और यमराजके दूतोंको मार-
पीटकर, बारम्बार धमकाकर उन्होंने देवराजको उनके
चंगुलसे छुड़ा लिया और अत्यन्त अद्भुत विमानपर
बिठाकर जब वे शिवदूत कैलास जानेको उद्यत हुए,
उस समय यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच
गया॥ ३०--३२१/२॥
उस कोलाहलको सुनकर धर्मराज अपने भवनसे
बाहर आये। साक्षात् दूसरे रुद्रोंके समान प्रतीत
होनेवाले उन चारों दूतोंको देखकर धर्मज्ञ धर्मराजने
उनका विधिपूर्वक पूजन किया॥ ३३-३४॥
यमने ज्ञानदृष्टिसे देखकर सारा वृत्तान्त जान
लिया, उन्होंने भयके कारण भगवान् शिवके उन
महात्मा दूतोंसे कोई बात नहीं पूछी॥ ३५॥
यमराजसे पूजित तथा प्रार्थित होकर वे शिवदूत
कैलासको चले गये और उन्होंने उस ब्राह्मणको
दयासागर साम्ब शिवको दे दिया॥ ३६॥
शिवपुराणकी यह परम पवित्र कथा धन्य है, जिसके
सुननेसे पापीजन भी मुक्तिके योग्य बन जाते हैं | भगवान्
सदाशिवके परमधामको वेदज्ञ सभी लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ
बताते हैं बराह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र तथा अन्य प्राणी;
यहाँतक कि जिस पापीने धनके लोभसे अनेक लोगोंकी
हत्या की तथा अपने माता-पिता और पत्नीको भी मार
डाला; वह वेश्यागामी, शराबी ब्राह्मण देवराज भी इस
कथाके प्रभावसे भगवान् शिवके परमधामको प्राप्तकर
तत्क्षण मुक्त हो गया॥ ३७--४० ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिव्पुराणमाहात्म्ये देवराजमुक्तिवर्णनं
नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहाल्यमे' देवराजमुक्तिवर्णन
नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
॥णण**४०-००-----
अ० ३]
माहात्म्य
२९
अथ तृतीयोऽध्यायः
चंचुलाका पापसे भय एवं संसारसे वैराग्य
शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग सर्वज्ञोसि महामते।
त्वत्प्रसादात् कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पुनः॥ १
इतिहासमिमं श्रुत्वा मनो मेऽतीव मोदते।
अन्यामपि कथां शम्भोर्वद प्रेमविवर्धिनीम्॥ २
नामृतं पिबतां लोके मुक्तिः क्वापि सभाज्यते।
शम्भोः कथासुधापानं प्रत्यक्षं मुक्तिदायकम्॥ ३
धन्या धन्या कथा शम्भोस्त्वं धन्यो धन्य एव च।
यदाकर्णनमात्रेण शिवलोकं ब्रजेन्नरः॥ ४
सूत उवाच
श्रृणु शौनक वक्ष्यामि त्वदग्रे गुह्यामप्युत।
यतस्त्वं शिवभक्तानामग्रणीर्वेदवित्तमः॥ ५
समुद्रनिकटे देशे ग्रामो बाष्कलसंज्ञकः।
सन्ति यत्र पापिष्ठा वेदधर्मोज्झिता जना:॥ ६
दुष्टा दुर्विषयात्मानो निदैवा जिह्यवृत्तयः।
कृषीवलाः शस्त्रधराः परस्त्रीभोगिनः खला:॥ ७
ज्ञानवैराग्यसद्धर्म न जानन्ति परं हि ते।
कुकथाश्रवणाढ्येषु निरताः पशुबुद्धयः॥ ८
अन्ये वर्णाश्च कुधियः स्वधर्मविमुखाः खलाः।
कुकर्मनिरता नित्यं सदा विषयिणश्च ते॥ ९
स्त्रियः सर्वाश्च कुटिलाः स्वैरिण्यः पापलालसाः।
कुधियो व्यभिचारिण्यः सदवृत्ताचारवर्जिताः॥ १
शौनकजी बोले--हे महाभाग सूतजी! आप
सर्वज्ञ हैं। हे महामते! आपके कृपाप्रसादसे मैं
बारम्बार कृतार्थ हुआ। इस इतिहासको सुनकर मेरा
मन अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो रहा है। अतः अब
भगवान् शिवमें प्रेम बढानेवाली शिवसम्बन्धिनी दूसरी
कथाको भी कहिये॥ १-२॥
अमृत पीनेवालोंको लोकमें कहीं मुक्ति नहीं
प्राप्त होती है, किंतु भगवान् शंकरके कथामृतका पान
तो प्रत्यक्ष ही मुक्ति देनेवाला है। सदाशिवकी जिस.
कथाके सुननेमात्रसे मनुष्य शिवलोक प्राप्त कर लेता
है, वह कथा धन्य है, धन्य है और कथाका श्रवण
करानेवाले आप भी धन्य हैं, धन्य हैं॥ ३-४॥
सूतजी बोले-हे शौनक! सुनिये, मैं आपके
सामने गोपनीय कथावस्तुका भी वर्णन करूँगा;
क्योकि आप शिवभक्तोंमें अग्रगण्य तथा वेदवेत्ताओंमें
रेष्ठ हैं । समुद्रके निकटवर्ती प्रदेशमें एक बाष्कल `
नामक ग्राम है, जहाँ वैदिक धर्मसे विमुख महापापी
द्विज निवास करते हैं। वे सब-के-सब बड़े दुष्ट हैं,
उनका मन दूषित विषयभोगोंमें ही लगा रहता है। वे
न देवताओंपर विश्वास करते हैं न भाग्यपर; वे सभी
कुटिल वृत्तिबाले हैं । किसानी करते और भाँति-भाँतिके
घातक अस्त्र-शस्त्र रखते हें । वे परस्त्रीगमन करनेवाले
और खल हैं । ज्ञान, वैराग्य तथा सद्धर्मको वे बिलकुल
नहीं जानते हैं। वे सभी पशुबुद्धिवाले हैं और सदा
दूषित बातोंको सुननेमें संलग्न रहते हैं ॥ ५--८ ॥
(जहाँके द्विज ऐसे हों, वहाँके अन्य वर्णोके
'विषयमें क्या कहा जाय!) अन्य वर्णोके लोग भी
उन्हींकी भाँति कुत्सित विचार रखनेवाले, स्वधर्मविमुख
एवं खल हैं; वे सदा कुकर्ममें लगे रहते हैं और नित्य
विषयभोगोंमें ही डूबे रहते हैं॥ ९॥
वहाँकी सब स्त्रियाँ भी कुटिल स्वभावकी,
स्वेच्छाचारिणी, पापासक्त, कुत्सित व्रिचारवाली और
व्यभिचारिणी हैं। वे सद्व्यवहार तथा सदाचारसे
सर्वथा शून्य हैं॥ १०॥
ER)
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ३
एवं कुजनसंवासे ग्रामे बाष्कलसंज्ञिते।
तत्रैको बिन्दुगो नाम विप्र आसीन्महाधमः॥ १
स दुरात्मा महापापी सुदारोऽपि कुमार्गगः।
वेश्यापतिर्बभूवाथ कामाकुलितमानसः॥ १२
स्वपलीं चञ्जुलां नाम हित्वा नित्यं सुधर्मिणीम्।
रेमे स वेश्यया दुष्टः स्मरबाणप्रपीडितः॥ १३
एवं कालो व्यतीयाय महांस्तस्य कुकर्मिणः।
सा स्वधर्मभयात् क्लेशात् स्मरार्तापि च चञ्जुला॥ १४
अथ तस्याङ्गना सापि प्रखढनवयौवना।
अविषह्यस्मरावेशा स्वधर्माद्विरराम ह॥ १५
जारेण सङ्गता रात्रौ रेमे पापेन गुप्ततः।
पतिदृष्टिं वञ्जयित्वा भ्रष्टसत्त्वा कुमार्गगा॥ १६
कदाचित्तां दुराचारा स्वपत्नीं चञ्जुलां मुने।
जारेण सङ्गतां रात्रौ ददर्श स्मरविह्ृलाम्॥ १७
दृष्ट्वा तां दूषितां पत्नी कुकर्मासक्तमानसाम्।
जारेण सङ्गतां रात्रौ क्रोधाद् दुद्राव वेगतः॥ १८
तमागतं गृहे दुष्टमाज्ञाय बिन्दुगं खलः।
पलायितो द्रुतं जारो वेगतश्छद्मवान् स वै॥ १९
अथ स बिन्दुगः पत्नीं गृहीत्वा सुदुराशयः।
मुष्टिबन्धेन सन्तर्ज्य पुनः पुनरताडयत्॥ २०
सा नारी ताडिता भर्त्रा चञ्जुला स्वैरिणी खला।
कुपिता निर्भया प्राह स्वपतिं बिन्दुगं खलम्॥ २१
चञ्ललोवाच
भवान् प्रतिदिनं कामं रमते वेश्यया कुधीः।
मां विहाय स्वपत्नीं च युवतीं पतिसेविनीम्॥ २२
कुजनोंके निवासस्थान उस बाष्कल नामक
ग्राममें किसी समय एक बिन्दुग नामधारी ब्राह्मण
रहता था, वह बड़ा अधम था॥ ११॥
वह दुरात्मा और महापापी था। यद्यपि उसकी स्त्री
बड़ी सुन्दर थी, तो भी वह कुमार्गपर ही चलता था।
'कामवासनासे कलुषितचित्त वह वेश्यागामी था॥ १२॥
उसकी पत्नीका नाम चंचुला था, वह सदा
उत्तम धर्मके पालनमें लगी रहती थी, तो भी उसे
छोड़कर वह दुष्ट ब्राह्मण कामासक्त होकर वेश्यागामी
हो गया था॥ १३॥
इस तरह कुकर्ममें लगे हुए उस बिन्दुगके बहुत
वर्ष व्यतीत हो गये। उसकी स्त्री चंचुला कामसे
पीड़ित होनेपर भी स्वधर्मनाशके भयसे क्लेश सहकर
भी दीर्घकालतक धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुई। परंतु दुराचारी
पतिके आचरणसे प्रभावित होनेके कारण कामपीड़ित
हो आगे चलकर वह स्त्री भी दुराचारिणी हो
गयी॥ १४-१५ ॥
भ्रष्ट चरित्रवाली वह कुमार्गगामिनी अपने पतिकी
दृष्टि बचाकर रात्रिमें चोरी-छिपे अन्य पापी जार
पुरुषके साथ रमण करने लगी ॥ १६॥
हे मुने! एक बार उस ब्राह्मणने अपनी उस
दुराचारिणी पत्नी चंचुलाको कामासक्त हो परपुरुषके
साथ रात्रिमें संसर्गरत देख लिया॥ १७॥
उस दुष्ट तथा दुराचारमें आसक्त मनवाली
पलीको रातमें परपुरुषके साथ व्यभिचारत देखकर
बह क्रोधपूर्वक वेगसे दौड़ा॥ १८॥
उस दुष्ट बिन्दुको घरमें आया जानकर वह
कपटी व्यभिचारी तेजीसे भाग गया॥ १९॥
तब वह दुष्टात्मा बिन्टुग अपनी पलीको पकड़कर
उसे डाँटता हुआ मुक्कोंसे बार-बार पीटने लगा॥ २०॥
वह व्यभिचारिणी दुष्टा नारी चंचुला पीटी
जानेपर कुपित होकर निर्भयतापूर्वक अपने दुष्ट पति
बिन्दुगसे कहने लगी ॥ २१॥
चंचुला बोली-मुझ पतिपरायणा युवती
पलीको छोड़कर आप कुबुद्धिवश प्रतिदिन वेश्याके
साथ इच्छानुसार रमण करते हैं। आप ही बतायें कि
रूपवती तथा कामासक्त चित्तवाली मुझ युवतीकी
अ० ३]
रूपवत्या युवत्याश्च कामाकुलितचेतसः।
विना पतिविहारं स्यात् का गतिमे भवान् वदेत्॥ २३
अहं महारूपवती नवयोौवनविह्वला।
कथं सहे कामदुःखं तव सङ्गं विनार्तधीः॥ २४
सूत उवाच
इत्युक्तः स तया मूर्खो मूढधीर््राह्मणोऽधमः।
प्रोवाच बिन्दुगः पापी स्वधर्मविमुख: खलः ॥ २५
बिन्दु उवाच
सत्यमेतत्त्वयोक्तं हि कामव्याकुलचेतसा।
हितं वक्ष्यामि तस्मात्ते शृणु कान्ते भयं त्यज॥ २६
जारैर्विहर नित्यं त्वं चेतसा निर्भयेन वै।
धनमाकर्ष तेभ्यो हि दत्त्वा तेभ्यः परां रतिम्॥ २७
तद्धनं देहि सर्व मे वेश्यासंसक्तचेतसः।
महत्स्वार्थं भवेन्नूनं तवापि च ममापि च॥ २८
सूत उवाच
इति भर्तृवचः श्रुत्वा चञ्जुला तद्वधूश्च सा।
तथेति भर्तृवचनं प्रतिजग्राह हृष्टधी: ॥ २९
कृत्वैवं समयं तौ वै दम्पती दुष्टमानसौ।
कुकर्मनिरतौ जातौ निर्भयेन कुचेतसा॥ ३०
एवं तयोस्तु दम्पत्योर्दुराचारप्रवृत्तयोः।
महान् कालो व्यतीयाय निष्फलो मूढचेतसोः ॥ ३१
अथ विप्र: स कुमतिर्बिन्दुगो वृषलीपतिः।
कालेन निधनं प्राप्तो जगाम नरकं खलः॥ ३२
भुक्त्वा नरकदुःखानि बह्ृहानि स मूढधीः।
विन्ध्येऽभवत् पिशाचो हि गिरौ पापी भयङ्करः॥ ३३
मृते भर्तरि तस्मिन्वै दुराचारेऽथ बिन्दुगे।
उवास स्वगृहे पुत्रैश्चिरकालं विमूढधीः॥ ३४
एवं विहरती जारैः सा नारी चञ्जुलाह्वया।
आसीत् कामरता प्रीता किञ्चिदुत्क्रान्तयौवना॥ ३५
एकदा दैवयोगेन सम्प्राप्ते पुण्यपर्वणि।
सा नारी बन्धुभिः सार्धं गोकर्ण क्षेत्रमाययौ॥ ३६
प्रसङ्गात् सा तदा गत्वा कस्मिंश्चित् तीर्थपाथसि।
सस्नौ सामान्यतो यत्र तत्र बभ्राम बन्धुभिः॥ ३७
माहात्म्य
२३
बिना कया गति होती होगी ? मैं अत्यन्त
सुन्दर हूँ तथा नवयौवनसे उन्मत्त हूँ। आपके संसर्गके
बिना व्यथितचित्तवाली मैं कामजन्य दुःखको कैसे
सह सकती हुँ.?॥ २२-२४॥
सूतजी बोले--उस स्त्रीके इस प्रकार कहनेपर
वह मूढ्बुद्धि मूर्ख ब्राह्मणाधम स्वधर्मविमुख दुष्ट
पापी बिन्दुग कहने लगा--॥ २५॥
बिन्दुग बोला-कामसे व्याकुलचित्त होकर
तुमने यह सत्य ही कहा है। हे प्रिये! तुम भय त्याग
दो और मैं जो तुमसे हितकी बात कहता हूँ, उसे
सुनो | तुम निर्भय होकर नित्य परपुरुषोंके साथ संसर्ग
करो। उन्हें सन्तुष्ट करके उनसे धन खोंचो । वह सारा
धन वेश्याके प्रति आसक्त मनवाले मुझको दे दिया
करो। इससे तुम्हारा और मेरा दोनोंका ही स्वार्थ सिद्ध
हो जायगा॥ २६-२८॥
सूतजी बोले-पतिका यह वचन सुनकर
उसकी पली चंचुलाने प्रसन्न होकर उसकी कही बात
मान ली। उन दोनों दुराचारी पति-पत्लीने इस प्रकार
समझौता कर लिया तथा वे दोनों निर्भय चित्तसे
कुकर्ममें लीन हो गये॥ २९-३०॥
इस तरह दुराचारमें डूबे हुए उन मूढ़ चित्तवाले
पति-पत्लीका बहुत-सा समय व्यर्थ बीत गया॥ ३१॥
तदनन्तर शूद्रजातीय वेश्याका पति बना हुआ
वह दूषित बुद्धिवाला दुष्ट ब्राह्मण बिन्दुग समयानुसार
मृत्युको प्राप्त हो नरकमें जा पड़ा। बहुत दिनोंतक
नरकके दुःख भोगकर वह मूढ्बुद्धि पापी विनध्यपर्वतपर
भयंकर पिशाच हुआ॥ ३२-३३॥
इधर, उस दुराचारी पति बिन्दुगके मर जानेपर
वह मूढ्हदया चंचुला बहुत समयतक पुत्रोंके साथ
अपने घरमें ही रही॥ ३४॥
इस प्रकार प्रेमपूर्वक कामासक्त होकर जारोंके
साथ विहार करती हुई उस चंचुला नामक स्त्रीका
कुछ-कुछ यौवन समयके साथ ढलने लगा॥ ३५॥
एक दिन दैवयोगसे किसी पुण्य पर्वके आनेपर
वह स्त्री भाई-बन्धुओंके साथ गोकर्ण्षेत्रमें गयी ।
तीर्थयात्रियोंके संगसे उसने भी उस समय जाकर
किसी तीर्थके जलमें स्नान किया। फिर वह साधारणतया
र्ड
देवालयेऽथ कस्मिंश्चिद्दैवज्ञमुखत: शुभाम्।
शुश्राव सत्कथां शम्भोः पुण्यां पौराणिकां च सा॥ ३
योषितां जारसक्तानां नरके यमकिङ्कराः।
सन्तप्तलोहपरिघं क्षिपन्ति स्मरमन्दिरे॥ ३९
इति पौराणिकेनोत्तां श्रुत्वा वैराग्यवर्धिनीम्।
कथामासीद्भयोद्विग्रा चकम्पे तत्र सा च वै॥ ४०
कथा समाप्तौ सा नारी निर्गतेषु जनेषु च।
भीता रहसि तं प्राह शेवं संवाचकं द्विजम्॥ ४९
चञ्जुलोवाच
ब्रह्मन् त्वं शृण्वसदवृत्तमजानन्त्या स्वधर्मकम्।
शरुत्वा मामुद्धर स्वामिन् कृपां कृत्वातुलामपि॥ ४२
चरितं सूल्बणं पापं मया मूढधिया प्रभो।
नीतं पाँश्चल्यतः सर्वं यौवनं मदनान्धया॥ ४३
श्रुत्वेदं वचनं तेऽद्य वैराग्यरसजृम्भितम्।
जाता महाभया साहं सकम्पात्तवियोगिका॥ ४४
धिङ् मां मूढधियं पापां काममोहितचेतसम्।
निन्द्यं दुर्विषयासक्तां विमुखी हि स्वधर्मतः ॥ ४५
यदल्पस्य सुखस्यार्थे स्वकार्यस्य विनाशिनम्।
महापापं कृतं घोरमजानन्त्यातिकष्टदम्॥ ४६
यास्यामि दुर्गतिं कां कां घोरां हा कष्टदायिनीम्।
को ज्ञो यास्यति मां तत्र कुमार्गरतमानसाम् ॥ ४७
मरणे यमदूताँस्तान् कथं द्रक्ष्ये भयङ्करान्।
कथं पाशेर्बलात् कण्ठे बध्यमाना धृतिं लभे॥ ४८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ३
(मेला देखनेकी दृष्टिसे) बन्धुजनोंके साथ यत्र-तत्र
घूमने लगी। [घूमती-घामती] किसी देवमन्दिरमे
उसने एक दैवज्ञ ब्राह्मणके मुखसे भगवान् शिवकी
परम पवित्र एवं मंगलकारिणी उत्तम पौराणिक कथा
सुनी ॥ ३६--३८॥
[कथावाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि] 'जो
्त्रयाँ परपुरुषोंके साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरनेके
बाद जब यमलोकमें जाती हैं, तब यमराजके दूत
उनकी योनिमें तपे हुए लोहेका परिघ डालते हैं।'
पौराणिक ब्राह्मणके मुखसे यह वैराग्य बढ़ानेवाली
कथा सुनकर चंचुला भयसे व्याकुल हो वहाँ काँपने
लगी ॥ ३९-४०॥
जब कथा समाप्त हुई और लोग वहाँसे
बाहर चले गये, तब वह भयभीत नारी एकान्तमें
शिवपुराणकी कथा बाँचनेवाले उन ब्राह्मणसे कहने
लगी॥ ४१॥
चंचुलाने कहा- ब्रह्मन्! मैं अपने धर्मको नहीं
जानती थी। इसलिये मेरे द्वारा बड़ा दुराचार हुआ है।
स्वामिन्! इसे सुनकर मेरे ऊपर अनुपम कृपा करके
आप मेरा उद्धार कीजिये॥ ४२॥
हे प्रभो! मैंने मूढ़बुद्धिके कारण घोर पाप किया
है। मैंने कामान्ध होकर अपनी सम्पूर्ण युवावस्था
व्यभिचारमें बितायी है ॥ ४३ ॥
आज वैराग्य-रससे ओतप्रोत आपके इस
प्रवचनको सुनकर मुझे बड़ा भय लग रहा है । मैं काँप
उठी हूँ और मुझे इस संसारसे वैराग्य हो गया है।
मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनीको धिक्कार है। मैं सर्वथा
निन्दाके योग्य हूँ। मैं कुत्सित विषयोंमें फँसी हुई हूँ
और अपने धर्मसे विमुख हो गयी हूँ ॥ ४४-४५॥
थोडेसे सुखके लिये अपने हितका नाश
करनेवाले तथा भयंकर कष्ट देनेवाले घोर पाप मैंने
अनजानेमें ही कर डाले॥ ४६॥
हाय! न जाने किस-किस घोर कष्टदायक
दुर्गतिमें मुझे पड़ना पड़ेगा और वहाँ कौन बुद्धिमात्.
पुरुष कुमार्गमें मन लगानेवाली मुझ पापिनीका साथ
देगा? मृत्युकालमें उन भयंकर यमदूतोंको मैं कैसे
देखूँगी ? जब वे बलपूर्वक मेरे गलेमें फंदे डालकर
आ० ४]
कथं सहिष्ये नरके खण्डशो देहकृन्तनम्।
यातनां तत्र महतीं दुःखदां च विशेषत: ॥ ४९
दिवा चेष्टामिन्द्रियाणां कथं प्राप्स्यामि शोचती।
रात्रौ कथं लभिष्येऽहं निद्रां दुःखपरिप्लुता ॥ ५०
हा हतास्मि च दग्धास्मि विदीर्णहृदयास्मि च।
सर्वथाहं विनष्टास्मि पापिनी सर्वथाप्यहम्॥ ५१
हा विधे मां महापापे दत्त्वा दुशशेमुषीं हठात्।
अपैति यत् स्वधर्माद्वै सर्वसौख्यकरादहो॥ ५२
शूलप्रोतस्य शैलाग्रात्पततस्तुङ्गतो द्विज।
यहुःखं देहिनो घोरं तस्मात् कोटिगुणं मम॥ ५३
अश्वमेधशतं कृत्वा गङ्गां स्नात्वा शतं समाः।
न शुद्धिर्जायते प्रायो मत्पापस्य गरीयसः॥ ५४
किं करोमि क्व गच्छामि कं वा शरणमाश्रये।
कस्त्रायते मां लोकेऽस्मिन् पतन्तीं नरकार्णवे ॥ ५५
त्वमेव मे गुरुब्रहांस्त्वं माता त्वं पितासि च।
उद्धरोद्धर मां दीनां त्वामेव शरणं गताम्॥ ५६
सूत उवाच
इति सञ्जातनिवेंदां पतितां चरणद्वये।
उत्थाप्य कृपया धीमान् बभाषे ब्राह्मण: स हि ॥ ५७
माहात्म्य
२५
मुझे बाँधेंगे, तब मैं कैसे धीरज धारण कर सकूँगी ?
नरकमें जब मेरे शरीरके टुकड़े-टुकड़े किये जायँगे,
उस समय विशेष दु:ख देनेवाली उस महायातनाको
मैं वहाँ कैसे सहुँगी ?॥ ४७-४९ ॥
दुःख और शोकसे ग्रस्त होकर मैं दिनमें सहज
इन्द्रियव्यापार और रात्रिमें नींद कैसे प्राप्त कर सकूँगी ?
हाय! मैं मारी गयी ! मैं जल गयी ! मेरा हृदय विदीर्ण हो
गया और मैं सब प्रकारसे नष्ट हो गयी; क्योंकि मैं हर
तरहसे पापमें ही डूबी रही हूँ॥ ५०-५१॥
हाय विधाता! मुझ पापिनीको आपने हठातू
ऐसी दुर्बुद्धि क्यों दे दी, जो सभी प्रकारका सुख
देनेवाले स्वधर्मसे दूर कर देती है! हे द्विज! शूलसे
बिँधा हुआ व्यक्ति ऊँचे पर्वत-शिखरसे गिरनेपर जैसा
घोर कष्ट पाता है, उससे भी करोड़ गुना कष्ट मुझे
है। सैकड़ों अश्वमेधयज्ञ करके अथवा सैकड़ों वर्षोतक
गंगास्नान करनेपर भी मेरे घोर पापोंकी शुद्धि सम्भव
नहीं दीखती। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और किसका
आश्रय लूँ? मुझ नरकगामिनीकी इस संसारमें कौन
रक्षा करेगा ?॥ ५२-५५ ॥
हे ब्रह्मन्! आप ही मेरे गुरु हैं, आप ही माता और
आप ही पिता हैं। आपकी शरणमें आयी हुई मुझ दीन
अबलाका उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये ॥ ५६॥
सूतजी बोले--हे शौनक! इस प्रकार खेद
और वैराग्यसे युक्त हुई चंचुला उस ब्राह्मणके चरणोंमें
गिर पड़ी । तब उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने कृपापूर्वक उसे
उठाकर इस प्रकार कहा॥ ५७॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये चञ्जुलावैरागयवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहाल्यमें चंचुलावँराग्यवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
चंचुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण सुनाना और समयानुसार शरीर
छोड़कर शिवलोकमें जा चंचुलाका पार्वतीजीकी सखी होना
ब्राह्मण उवाच
दिष्ट्या काले प्रबुद्धासि शिवानुग्रहतो वराम्।
ब्राह्मण बोले--सौभाग्यकी बात है कि भगवान्
शंकरकी कृपासे शिवपुराणकी इस वैराग्ययुक्त तथा
इमां शिवपुराणस्य श्रुत्वा वैराग्यवत्कथाम्॥ ९ | श्रेष्ठ कथाको सुनकर तुम्हें समयपर चेत हो गया है।
मा भैषीद्विजपत्नि त्वं शिवस्य शरणं व्रज।
हे ब्राह्मणपत्नी ! तुम डरो मत, भगवान् शिवकी शरणमें
२६
शिवानुग्रहतः सर्व पापं सद्यो विनश्यति॥
वक्ष्यामि ते परं वस्तु शिवकीर्तिसमन्वितम्।
भविष्यति गतिर्येन सर्वदा ते सुखावहा॥ ३
सत्कथाश्रवणादेव जाता ते मतिरीदूशी।
पश्चात्तापान्विता शुद्धा वैराग्यं विषयेषु च॥ ४
पश्चात्तापः पापकृतां पापानां निष्कृतिः परा।
सर्वेषां वर्णितं सद्भिः सर्वपापविशोधनम्॥ ५
पश्चात्तापेनैव शुद्धि: प्रायश्चित्तं करोति स: ।
यथोपदिष्टं सद्भिर्हि सर्वपापविशोधनम्॥ ६
प्रायश्चित्तमधीकृत्य विधिवन्निर्भय: पुमान्
न याति सुगतिं प्रायः पश्चात्तापी न संशयः॥ ७
एतच्छिवपुराणस्य कथाश्रवणतो यथा।
जायते चित्तशुद्धिर्हि न तथान्यैरुपायतः॥ ८
शोध्यमानं दर्पणं हि यथा भवति निर्मलम्।
तथैतत्कथया चेतो विशुद्धिं यात्यसंशयम्॥ ९
विशुद्धे चेतसि शिवो नृणां तिष्ठति साम्बिकः।
ततो याति विशुद्धात्मा साम्बशम्भोः परं पदम्॥ १०
अतः सर्वस्य वर्गस्यैतत्कथासाधनं मतम्।
एतदर्थं महादेवो निर्ममे त्वाग्रहादिमाम्॥ १९
कथया सिध्यति ध्यानमनया गिरिजापतेः।
ध्यानाज्ज्ञानं परं तस्मात् कैवल्यं भवति भ्रुवम्॥ १२
असिद्धशङ्करध्यानः कथामेव श्रृणोति यः।
स प्राप्यान्यभवे ध्यानं शम्भोर्याति परां गतिम्॥ १३
एतत्कथाश्रवणतः कृत्वा ध्यानमुमापतेः।
ते पश्चात्तापिनः पापा बहवः सिद्धिमागताः ॥ १४
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ४
जाओ। शिवकी कृपासे सारा पाप तत्काल नष्ट हो
जाता है। मैं तुमसे भगवान् शिवकी कीर्तिकथासे युक्त
उस परम वस्तुका वर्णन करूँगा, जिससे तुम्हें सदा
सुख देनेवाली उत्तम गति प्राप्त होगी॥ १-३॥
शिवकी उत्तम कथा सुननेसे ही तुम्हारी बुद्धि इस
तरह पश्चात्तापसे युक्त एवं शुद्ध हो गयी है; साथ ही
तुम्हारे मनमें विषयोंके प्रति वैराग्य हो गया है । पश्चात्ताप
ही पाप करनेवाले पापियोंके लिये सबसे बड़ा प्रायश्चित्त
है। सत्पुरुषोंने सबके लिये पश्चात्तापको ही समस्त
पापोंका शोधक बताया है। पश्चात्तापसे ही पापोंकी
शुद्धि होती है | जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तवमें
पापोंका प्रायश्चित्त करता है; क्योंकि सत्पुरुषोंने समस्त
पापोंकी शुद्धिके लिये जैसे प्रायश््चित्तका उपदेश किया
है, वह सब पश्चात्तापसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४--६॥
जो पुरुष विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके निर्भय
हो जाता है, पर अपने कुकर्मके लिये पश्चात्ताप नहीं
करता, उसे प्राय: उत्तम गति नहीं प्राप्त होती। परंतु
जिसे अपने कुकृत्यपर हार्दिक पश्चात्ताप होता है, वह
अवश्य उत्तम गतिका भागी होता है, इसमें संशय नहीं
है। इस शिवपुराणकी कथा सुननेसे जैसी चित्तशुद्धि
होती है, वैसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती ॥ ७-८॥
जैसे दर्पण साफ करनेपर निर्मल हो जाता है,
उसी प्रकार इस शिवपुराणकी कथासे चित्त अत्यन्त
शुद्ध हो जाता है-इसमें संशय नहीं है । मनुष्योंके शुद्ध
चित्तमें जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिव विराजमान
रहते हैं। इससे वह विशुद्धात्मा पुरुष श्रीसाम्बसदाशिवके
परम पदको प्राप्त होता है॥ ९-१०॥
इस प्रकार यह कथारूपी साधन सभी प्राणियोंके
लिये उपकारी है और इसी कारण महादेवजीने इसको
आग्रहपूर्वक प्रकट किया है। इस कथासे भगवान्
उमापतिका ध्यान सिद्ध हो जाता है। उस ध्यानसे परम ज्ञान
और उससे मोक्षकी प्राप्ति निश्चय ही होती है । भगवान्
शंकरके ध्यानमें मग्न हुए बिना भी यदि कोई इस कथाको
मात्र सुनता है, वह दूसरे जन्ममें भगवानके ध्यानको
सिद्धकर परमपदको पा लेता है | इस कथाके श्रवणसे
भगवान् शंकरके ध्यानको प्राप्तकर पश्चात्ताप करनेवाले
पापी पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं॥ ११--१४॥
आ० ४]
माहात्म्य
२७
सर्वेषां श्रेयसां बीजं सत्कथाश्रवणं नृणाम्।
यथावर्त्म समाराध्यं भवबन्धगदापहम्॥ १५
कथाश्रवणतः शम्भोर्मननाच्य ततो हृदा।
निदिध्यासनतश्चैव चित्तशुद्धिर्भवत्यलम्॥ १६
अतो भक्तिर्महेशस्य पुत्राभ्यां भवति श्रुवम्।
तदनुग्रहतो दिव्या ततो मुक्तिर्न संशयः॥ १७
तद्विहीनः पशुर्ज्ञेयो मायाबन्धनसक्तधीः।
संसारबन्धनान्नैव मुक्तो भवति स श्नुवम्॥ १८
अतो हि द्विजपत्ति त्वं विषयेभ्यो निवृत्तधीः।
शृणु शम्भोः कथां चैतां भक्त्या परमपावनीम्॥ १९
शृण्वन्त्याः सत्कथामेतां शङ्करस्य परात्मनः।
शुद्द्धिमेष्यति चेतस्ते ततो मुक्तिमवाप्स्यसि॥ २०
ध्यायतः शिवपादाब्जं चेतसा निर्मलेन वे।
एकेन जन्मना मुक्तिः सत्यं सत्यं बदाम्यहम्॥ २१
सूत उवाच
इत्युक्त्वा स द्विजवरो वरः शैवः कृपार्द्रधी:।
तूष्णीं बभूव शुद्धात्मा शिवध्यानपरायणः॥ २२
अथ बिन्दुगपली सा चञ्जुलाह्वा प्रसन्नधीः ।
इत्युक्ता तेन विप्रेण समासीदबाष्पलोचना॥ २३
पपातारं द्विजेन्द्रस्य पादयोस्तस्य हृष्टधीः।
चञ्जुला साञ्जलिः सा च कृतार्थास्मीत्यभाषत॥ २४
अथ सोत्थाय सातङ्का साञ्जलिर्गदूदाक्षरम्।
तमुवाच महाशैवं द्विजं वैराग्ययुक् सुधीः ॥ २५
इस उत्तम कथाका श्रवण समस्त मनुष्योंके लिये
कल्याणका बीज है। अतः यथोचित (शास्त्रोक्त)
इसकी आराधना अथवा सेवा करनी चाहिये ।
यह कथा-श्रवण भव-बन्धनरूपी रोगका नाश करनेवाला
है। भगवान् शिवकी कथाको सुनकर फिर अपने
हृदयमें उसका मनन एवं निदिध्यासन करनेसे पूर्णतया
चित्तशुद्धि हो जाती है। चित्तशुद्धि होनेसे महेश्वरकी
भक्ति अपने दोनों पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य)-के साथ
निश्चय ही प्रकट होती है। तत्पश्चात् महेश्वरके
अनुग्रहसे दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं
है। जो शिवभक्तिसे बंचित है, उसे पशु समझना
चाहिये; क्योंकि उसका चित्त मायाके बन्धनमें आसक्त
है। वह निश्चय ही संसारबन्धनसे मुक्त नहीं हो
पाता॥ १५--१८॥
हे ब्राह्मणपत्नी! इसलिये तुम विषयोंसे मनको
हटा लो और भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी इस परम
पावन कथाको सुनो। परमात्मा शंकरकी इस कथाको
सुननेसे तुम्हारे चित्तकी शुद्धि होगी और उससे तुम्हें
मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी। निर्मल चित्तसे भगवान्
शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करनेवालेकी एक ही
जन्ममें मुक्ति हो जाती है-यह मैं तुमसे सत्य-सत्य
कहता हूँ॥ १९-२१॥
सूतजी बोले--शौनक ! इतना कहकर वे श्रेष्ठ
शिवभक्त ब्राह्मण मौन हो गये। उनका हृदय करुणासे
आर्द्रं हो गया था। वे शुद्धचित्त महात्मा भगवान्
शिवके ध्यानमें मग्न हो गये॥ २२॥
तदनन्तर बिन्दुगकी पत्नी चंचुला मन-ही-मन
प्रसन्न हो उठी। ब्राह्मणका उक्त उपदेश सुनकर
उसके नेत्रोमें आनन्दके आँसू छलक आये थे। वह
ब्राह्मणपत्नी चंचुला हर्षित हृदयसे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके
चरणोंमें गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली
“मैं कृतार्थ हो गयी'॥ २३-२४॥
तत्पश्चात् उठकर वैराग्ययुक्त तथा उत्तम
बुद्धिवाली वह स्त्री, जो अपने पापोंके कारण आतंकित.
थी, उन महान् शिवभक्त ब्राह्मणसे हाथ जोड़कर
गद्गद् वाणीमें कहने लगी॥ २५॥
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ४
२८
चजञ्जुलोवाच
ब्रह्मन् शैववर स्वामिन् धन्यस्त्वं परमार्थटूक् ।
परोपकारनिरतो वर्णनीयः सुसाधुषु॥
उद्धरोद्धर मां साधो पतन्तीं नरकार्णवे।
श्रुत्वा यां सुकथां शेवीं पुराणार्थविजृम्भिताम्॥ २७
विरक्तधीरहं जाता विषयेभ्यश्च सर्वतः।
सुश्रद्धा महती ह्येतत्पुराणश्रवणेऽधुना॥ २८
सूत उवाच
इत्युक्त्वा साञ्जलिः सा वै सम्प्राप्य तदनुग्रहम्।
तत्पुराणं श्रोतुकामातिष्ठत्तत्सेवने रता॥ २९
अथ शैववरो विप्रस्तस्मिन्नेव स्थले सुधी: ।
सत्कथां श्रावयामास तत्पुराणस्य तां स्त्रियम्॥ ३०
इत्थं तस्मिन् महाक्षेत्रे तस्मादेव द्विजोत्तमात्।
कथां शिवपुराणस्य सा शुश्राव महोत्तमाम्॥ ३१
भक्तिज्ञानविरागाणां वर्धिनी मुक्तिदायिनीम्।
बभूव सुकृतार्था सा श्रुत्वा तां सत्कथां पराम्॥ ३२
सदगुरोस्तस्य कृपया शुद्धचित्ता च सा द्रुतम्।
शिवानुग्रहतः शम्भोः रूपध्यानमवाप ह॥ ३३
इत्थं सद्गुरुमाश्रित्य सा प्राप्तशिवसन्मतिः।
दध्यौ मुहुर्मुहुः शम्भोश्चिदानन्दमयं वपुः॥ ३४
स्नात्वा तीर्थजले नित्यं जटावल्कलधारिणी।
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गी रुद्राक्षकृतभूषणा॥ ३५
शिवनामजपासक्ता वाग्यता मितभोजना।
गुरूपदिष्टमार्गेण सा शिवं समतोषयत्॥ ३६
एवं तस्याश्चञ्चुलायाः कुर्वन्त्या ध्यानमुत्तमम्।
बहुकालो व्यतीयाय शम्भोस्तत्रैव शौनक ॥ ३७
चंचुला बोली-हे ब्रह्मन्! हे शिवभक्तोंमें
श्रेष्ठ हे स्वामिन्! आप धन्य हैं, परमार्थदर्शी हैं और
सदा परोपकारमें लगे रहते हैं, इसलिये आप श्रेष्ठ
साधु पुरुषोंमें प्रशंसाके योग्य हैं। हे साधो! मैं नरकके
समुद्रमें गिर रही हूँ। आप मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार
कोजिये। पौराणिक अर्थतत्त्वसे सम्पन्न जिस सुन्दर
शिवपुराणकी कथाको सुनकर मेरे मनमें सम्पूर्ण
विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न हो गया, उसी इस शिवपुराणको
सुननेके लिये इस समय मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा हो रही
है॥ २६-२८॥
सूतजी बोले-एऐसा कहकर हाथ जोड़ उनका
अनुग्रह पाकर चंचुला उस शिवपुराणकी कथाको
सुननेकी इच्छा मनमें लिये उन ब्राह्मणदेवताकी सेवामें
तत्पर हो वहाँ रहने लगी॥ २९॥
तदनन्तर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और शुद्ध
बुद्धिवाले उन ब्राह्मणदेवताने उसी स्थानपर उस
स्त्रीको शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनायी ॥ ३०॥
इस प्रकार उस [ गोकर्ण नामक] महाक्षेत्रमें उन्हीं
श्रेष्ठ ब्राह्मणसे उसने शिवपुराणकी वह परम उत्तम
कथा सुनी, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बढ़ानेवाली
तथा मुक्ति देनेवाली है । उस परम उत्तम कथाको सुनकर
वह ब्राह्मणपत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी ॥ ३१-३२॥
उन सद्गुरुकी कृपासे उसका चित्त शीघ्र ही
शुद्ध हो गया, भगवान् शिवके अनुग्रहसे उसके
हदयमें शिवके सगुणरूपका चिन्तन होने लगा॥ ३३॥
इस प्रकार सद्गुरुका आश्रय लेकर उसने
भगवान् शिवमें लगी रहनेवाली उत्तम बुद्धि पाकर
शिवके सच्चिदानन्दमय स्वरूपका बारंबार चिन्तन
आरम्भ किया॥ ३४॥
वह प्रतिदिन तीर्थके जलमें स्नान करके जटा
और वल्कल धारण करने लगी तथा समूची देहमें
भस्म लगाकर रुद्राक्षके आभूषण धारण करने लगी।
वह भगवान् शिवके नामजपमें लगी रहती थी,
संयमित वाणी और अल्पाहार करते हुए गुरुके बताये
मार्गसे वह शिवजीको प्रसन्न करने लगी। हे शौनक!
इस प्रकार शम्भुका उत्तम ध्यान करते हुए उस
चंचुलाका बहुत-सा समय बीत गया॥ ३५--३७॥
आ० ४]
माहात्म्य
२ है
अथ कालेन पूर्णेन भक्तित्रिकसमन्विता।
समुत्ससर्ज देहं स्वमनायासेन चञ्जुला॥ ३८
विमानं द्रुतमायान्तं प्रेषितं त्रिपुरारिणा।
दिव्यं स्वगणसंयुक्तं नानाशोभासमन्वितम्॥ ३९
अथ तत्र समारूढा महेशानुचरैर्वरैः।
नीता शिवपुरीं सद्यो ध्वस्तसर्वमला च सा॥ ४०
दिव्यरूपधरा दिव्या दिव्यावयवशालिनी।
चनद्रार्धशेखरा गौरी विलसददिव्यभूषणा॥ ४१
गत्वा तत्र महादेवं सा ददर्श त्रिलोचनम्।
विष्णुब्रह्मादिभिर्देवैः सेव्यमानं सनातनम्॥ ४२
गणेशभृङ्गिनन्दीशवीरभन्रेश्वरादिभिः ।
उपास्यमानं सद्भक्त्या कोटिसूर्यसमप्रभम्॥ ४३
नीलग्रीवं पञ्चवक्त्रं त्र्यम्बकं चन्द्रशेखरम्।
वामाङ्गे बिभ्रतं गौरीं विद्युत्पुञझसमप्रभाम्॥ ४४
कर्पूरगौर गौरीशं सर्वालङ्कारधारिणम्।
सितभस्मलसद्देहे सितवस्त्रं महोज्ज्वलम्॥ ४५
दृष्ट्वैवं शङ्करं नारी सा मुमोदाति चञ्जुला।
सुसम्भ्रमान्महाप्रीता प्रणनाम पुनः पुनः॥ ४६
साञ्जलिः सा मुदा प्रेम्णा सन्तुष्टा च विनीतका।
आनन्दाश्रुजले युक्ता रोमहर्षसमन्विता॥ ४७
अथ सा वै करुणया पार्वत्या शङ्करेण च।
समानीतोपकण्ठं हि सुदृष्ट्या च विलोकिता॥ ४८
तत्पश्चात् समयके पूर्ण होनेपर भक्ति, ज्ञान और
युक्त हुई चंचुलाने अपने शरीरको बिना
किसी कष्टके त्याग दिया॥ ३८॥
इतनेमें ही त्रिपुरशत्रु भगवान् शिवका भेजा हुआ
एक दिव्य विमान द्रुत गतिसे वहाँ पहुँचा, जो उनके
अपने गणोंसे संयुक्त और भाँति-भाँतिके शोभा साधनोंसे
सम्पन्न था। चंचुला उस विमानपर आरूढ़ हुई और
भगवान् शिवके श्रेष्ठ पार्षदोंने उसे तत्काल शिवपुरीमें
पहुँचा दिया। उसके सारे मल धुल गये थे। वह
दिव्यरूपधारिणी दिव्यांगना हो गयी थी। उसके दिव्य
अवयव उसकी शोभा बढ़ाते थे। मस्तकपर अर्धचन्द्रका
मुकुट धारण किये वह गौरांगी देवी शोभाशाली दिव्य
आभूषणोंसे विभूषित थी॥ ३९--४१॥
वहाँ पहुँचकर उसने त्रिनेत्रधारी महादेवजीको
देखा। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता उन सनातन शिवकी
सेवा कर रहे थे। गणेश, भृंगी, नन्दीश, वीरभद्रेशवर
आदि गण उत्तम भक्तिके साथ उनकी उपासना कर
रहे थे। उनकी अंगकान्ति करोड़ों सूर्योके समान प्रकाशित
हो रही थी। कण्ठमें नील चिह्न शोभा पाता था।
उनके पाँच मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र
थे। मस्तकपर अर्धचन्द्राकार मुकुट शोभा देता था।
उन्होंने अपने वामांगमें गौरी देवीको बिठा रखा था,
जो विद्युत्-पुंजके समान प्रकाशित थीं। गौरीपति
महादेवजीकी कान्ति कपूरके समान गौर थी । उन्होंने सभी
अलंकार धारण कर रखे थे, उनका सारा शरीर श्वेत
भस्मसे भासित था। शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे
थे। वे अत्यन्त उज्ज्वल वर्णके थे॥ ४२-४५॥
इस प्रकार परम उज्चल भगवान् शंकरका
दर्शन करके वह ब्राह्मणपत्ली चंचुला बहुत प्रसन्न
हुई। अत्यन्त प्रीतियुक्त होकर उसने बड़ी उतावलीके
साथ भगवानूको बारंबार प्रणाम किया। फिर हाथ
जोड़कर वह बडे प्रेम, आनन्द और सन्तोषसे युक्त हो
विनीतभावसे खड़ी हो गयी। उसके नेत्रोसे आनन्दाश्रुओंकी
अविरल धारा बहने लगी तथा सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच
हो गया। उस समय भगवती पार्वती और भगवान्
शंकरने उसे बड़ी करुणाके साथ अपने पास बुलाया
और सौम्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। पार्वतीजीने तो
३० श्रीशिवमहापुराण [अ० ५
पार्वत्या सा कृता प्रीत्या स्वसखी दिव्यरूपिणी। दिव्यरूपधारिणी बिन्दुगप्रिया चंचुलाको प्रेमपूर्वक
दिव्यसौख्यान्विता तत्र चञ्जुला बिन्दुगप्रिया॥ ४९ | अपनी सखी बना लिया। वह उस परमानन्दघन
ज्योतिःस्वरूप सनातनधाममें अविचल निवास पाकर
तस्मिंल्लोके परानन्दघनज्योतिषि शाश्वते। दिव्य सौख्यसे सम्पन्न हो अक्षय सुखका अनुभव
लब्ध्वा निबासमचलं लेभे सुखमनाहतम्॥ ५० | करने लगी ॥ ४६--५०॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये चञ्जुलासद्गतिवर्णतं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें चंचुलासद्गतिवर्णन नामक चाथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
—_—S
अथ पञ्चमोऽध्यायः
चंचुलाके प्रयत्लसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी
कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन
दोनों दम्पतीका शिवधाममें सुखी होना
शौनक उवाच शौनकजी बोले--हे महाभाग सूतजी ! आप धन्य
सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधी:। हैं, आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें लगी हुई है । आपने
श्रावितेयं कथास्माकमद्भुता भक्तिवर्धिनी॥ १ | कृपापूर्वक यह शिवभक्तिको बढ़ानेवाली अद्भुत कथा
हमें सुनायी । हे महामते ! सद्गति प्राप्त करनेके बाद वहाँ
तत्र गत्वा किं चकार चञ्जुला प्राप्तसद्रतिः। जाकर चंचुलाने क्या किया और उसके पतिका क्या
तत् त्वं वद विशेषेण तत्पतेश्च महामते॥ २ | हुआ; यह सब वृत्तान्त विस्तारसे हमें बताइये ॥ १-२॥
सूतजी बोले-हे शौनक! एक दिन परमानन्दमें
निमग्न हुई चंचुलाने उमादेवीके पास जाकर प्रणाम
किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति
करने लगी ॥ ३॥
चद्चुलोवाच चंचुला बोली--हे गिरिराजनन्दिनी! हे
गिरिजे स्कन्दमातस्त्वं सेविता सर्वदा नरैः। स्कन्दमाता ! मनुष्योंने सदा आपकी सेवा की है । समस्त
सर्वसौख्यप्रदे शम्भुप्रिये ब्रह्मस्वरूपिणि॥ ४ | सुखोंको देनेवाली हे शम्भुप्रिये ! हे ब्रह्मस्वरूपिणि ! आप
विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेव्य हैं । आप ही
विष्ुब्रह्मादिभिस्सेव्या सगुणा निर्गुणापि च। | सगुणा और निर्गुणा भी हैं तथा आप ही सूक्ष्मा सच्निदानन्द-
त्वमाद्या प्रकृतिस्सृक्ष्मा सच्चिदानन्दरूपिणी॥ ५ | स्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं। आप ही संसारकी सृष्टि,
सृष्टिस्थितिलयकरी त्रिगुणा त्रिसुरालया। पालन और संहार करनेवाली हैं। तीनों गुणोंका आश्रय
ब्रह्मविष्णुमहेशानां भी आप ही हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर--इन तीनों
ब्रह्मविष्णुमहेशानां सुप्रतिष्ठाकरा परा॥ ६ देवताओंका आवास-स्थान तथा उनकी उत्तम प्रतिष्ठा
करनेवाली पराशक्ति आप ही हैं ॥ ४--६ ॥
सूतजी बोले--हे शौनक! जिसे सद्गति प्राप्त
2५६८-५६ हो चुकी थी, वह चंचुला इस प्रकार महेश्वरपली
इति स्तुत्वा महेशीं तां चञ्चला ग्रप्तसद्रतिः। | उमाकी स्तुति करके सिर झुकाये चुप हो गयी । उसके
विरराम नतस्कन्था प्रेमपूर्णाश्रुलोचना॥ ७ | नेत्रोमें प्रेमके आँसू उमड़ आये थे॥७॥
सूत उवाच
सा कदाचिदुमां देवीमुपगम्य प्रणम्य च।
सुतुष्टाव करौ बद्ध्वा परमानन्दसम्प्लुता॥ ३
आ० ५]
ततः सा करुणाविष्टा पार्वती शङ्करप्रिया।
तामुवाच महाप्रीत्या चञ्जुलां भक्तवत्सला॥ ८
पार्वत्युवाच
चञ्चुले सखि सुप्रीतानया स्तुत्यास्मि सुन्दरि।
किं याचसे वरं ब्रूहि नादेयं विद्यते तव॥ ९
सूत उवाच
इत्युक्ता सा गिरिजया चञ्जुला सुप्रणम्य ताम्।
पर्यपृच्छत सुप्रीत्या साञ्जलिर्नतमस्तका॥ १०
चञ्लुलोवाच
मम भर्ताधुना क्वास्ते नेव जानामि तद्गतिम्।
तेन युक्ता यथाहं वै भवामि गिरिजेऽनधे॥ ११
तथैव कुरू कल्याणि कृपया दीनवत्सले।
महादेवि महेशानि भर्ता मे वृषलीपतिः।
मत्तः पूर्व मृतः पापी न जाने कां गतिं गतः॥ १२
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याश्चञ्जुलाया हि पार्वती।
प्रत्युवाच सुसम्प्रीत्या गिरिजा नयवत्सला॥ १३
गिरिजोवाच
सुते भर्ता बिन्दुगाह्वो महापापी दुराशयः।
वेश्याभोगी महामूढो मृत्वा स नरकं गतः॥ १४
भुक्त्वा नरकदुःखानि विविधान्यमिताः समा: ।
पापशेषेण पापात्मा विन्ध्ये जात: पिशाचकः॥ १५
इदानीं स पिशाचोऽस्ति नानाक्लेशसमन्वितः।
तत्रैव वातभुरदुष्टः सर्वकष्टबहः सदा॥ १६
सूत उवाच
इति गौर्या वचः श्रुत्वा चञ्ुला सा शुभत्रता ।
पतिदुःखेन महता दुःखितासीत्तदा किल॥ १७
समाधाय ततश्चित्तं सुप्रणम्य महेश्वरीम्।
पुनः पप्रच्छ सा नारी हृदयेन विदूयता॥ १८
माहात्म्य
: ९
तब करुणासे भरी हुई शंकरप्रिया भक्तवत्सला
चंचुलाको सम्बोधित करके बडे प्रेमसे इस
प्रकार कहने लगीं ॥ ८॥
पार्वती बोलीं-हे सखी चंचुले! हे सुन्दरि!
मैं तुम्हारी की हुई इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ | बोलो,
क्या वर माँगती हो ? तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय
नहीं है॥ ९॥
सूतजी बोले-पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर
चंचुला उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर
नतमस्तक हो प्रेमपूर्वक पूछने लगी--॥ १०॥
चंचुला बोली-हे निष्पाप गिरिराजकुमारी!
मेरे पति बिन्दुग इस समय कहाँ हैं, उनकी कैसी गति
हुई है-यह मैं नहीं जानती ! कल्याणमयी दीनवत्सले!
मैं अपने उन पतिदेवसे जिस प्रकार संयुक्त हो सकूँ,
कृपा करके वैसा ही उपाय कीजिये। हे महेश्वरि! हे
महादेवि! मेरे पति एक शूद्रजातीय वेश्याके प्रति
आसक्त थे और पापमें ही डूबे रहते थे। उनकी मृत्यु
मुझसे पहले ही हो गयी थी। वे न जाने किस गतिको
प्राप्त हुए हैं॥ ११-१२॥
सूतजी बोले--चंचुलाका यह वचन सुनकर
नीतिवत्सला हिमालयपुत्री देवी पार्वतीने अत्यन्त प्रेमपूर्वक
यह उत्तर दिया-॥ १३॥
गिरिजा बोलीं-हे सुते! तुम्हारा बिन्दु
नामवाला पति बड़ा पापी था। उसका अन्तःकरण
बड़ा ही दूषित था। वेश्याका उपभोग करनेवाला वह
महामूढ़ मरनेके बाद नरकमें पड़ा; अगणित वर्षोतक
नरकमें नाना प्रकारके दुःख भोगकर वह पापात्मा
अपने शेष पापको भोगनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर
पिशाच हुआ है। इस समय वह पिशाचकी अवस्थामें
ही है और नाना प्रकारके क्लेश उठा रहा है। वह
दुष्ट वहीं वायु पीकर रहता है और सदा सब प्रकारके
कष्ट सहता है॥ १४-१६॥
सूतजी बोले-हे शौनक! गौरीदेवीकी यह
बात सुनकर उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली वह चंचुला
उस समय पतिके महान् दुःखसे दुखी हो गयी। फिर
मनको स्थिर करके उस ब्राह्मणपल्नीने व्यथित हृदयसे
महेश्वरीको प्रणाम करके पुनः पूछा--॥ १७-१८॥
३२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ५
चच्चुलोवाच
महेश्वरि महादेवि कृपां कुरू ममोपरि।
समुद्धर पतिं मेऽद्य दुष्टकर्मकरं खलम्॥ १९
केनोपायेन मे भर्ता पापात्मा स कुबुद्द्रिमान्।
सद्रतिं प्राप्नुयाद्देवि तद्वदाशु नमोऽस्तु ते॥ २०
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पार्वती भक्तवत्सला।
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा चञ्जुलां स्वसखीं च ताम्॥ २१
पार्वत्युवाच
श्रृणुयाद्यदि ते भर्ता पुण्यां शिवकथां पराम्।
निस्तीर्य दुर्गतिं सर्वा सद्वतिं प्राप्नुयादिति॥ २२
इति गोर्या वचः श्ररुत्वामृताक्षरमथादरात्।
कृताञ्जलिर्नतस्कन्धा प्रणनाम पुनः पुनः॥ २३
तत्कथाश्रवणं भर्तुः सर्वपापविशुद्धये।
सद्रतिप्राप्तये चैव प्रार्थयामास तां तदा॥ २४
सूत उवाच
तया मुुमुहुर्नार्या प्रार्थ्यमाना शिवप्रिया।
गौरी कृपान्वितासीत् सा महेशी भक्तवत्सला ॥ २५
अथ तुम्बुरुमाहूय शिवसत्कीर्तिगायकम्।
प्रीत्या गन्धर्वराजं हि गिरिकन्येदमब्रवीत्॥ २६
गिरिजोवाच
हे तुम्बुरो शिवप्रीत मम मानसकारक।
सहानया विन्ध्यशैलं भद्रं ते गच्छ सत्वरम्॥ २७
आस्ते तत्र महाघोरः पिशाचोऽतिभयङ्करः।
तद्वृत्तं शृणु सुप्रीत्यादितः सर्व ब्रवीमि ते॥ २८
पुराभवे पिशाचः स बिन्दुगाह्वोऽभवद् द्विजः।
अस्या नार्याः पतिर्दुष्टो मत्सख्या वृषलीपतिः ॥ २९
स्तानसशध्याक्रियाहीनोऽशौचः क्रोधविमूढधीः।
दुर्भक्षी सज्जनद्वेषी दुष्परिग्रहकारकः॥ ३०
चंचुला बोली--हे महेश्वरि! हे महादेवि! |
मुझपर कृपा कीजिये और दूषित कर्म करनेवाले मेरे
उस दुष्ट पतिका अब उद्धार कर दीजिये। हे देवि!
कुत्सित बुद्धिवाले मेरे उस पापात्मा पतिको किस
उपायसे उत्तम गति प्राप्त हो सकती है, यह शीघ्र
बताइये। आपको नमस्कार है॥ १९-२०॥
सूतजी बोले-उसकी यह बात सुनकर
भक्तवत्सला पार्वतीजी अपनी सखी चंचुलासे प्रसन्न
होकर ऐसा कहने लगीं ॥ २१॥
पार्वतीजी बोलीं-- तुम्हारा पति यदि शिवपुराणकी
पुण्यमयी उत्तम कथा सुने तो सारी दुर्गतिको पार
करके वह उत्तम गतिका भागी हो सकता है॥ २२॥
अमृतके समान मधुर अक्षरोंसे युक्त गौरीदेवीका
यह वचन आदरपूर्वक सुनकर चंचुलाने हाथ जोड़कर
मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अपने
पतिके समस्त पापोंकी शुद्धि तथा उत्तम गतिकी प्राप्तिके
लिये पार्वतीदेवीसे यह प्रार्थना की कि मेरे पतिको
शिवपुराण सुनानेकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २३-२४॥
सूतजी बोले-उस ब्राह्मणपल्ीके बारंबार
प्रार्थना करनेपर शिवप्रिया गौरीदेवीको बड़ी दया
आयी। उन भक्तवत्सला महेश्वरी गिरिराजकुमारीने
भगवान् शिवको उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले
गन्धर्वराज तुम्बुरुको बुलाकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस
प्रकार कहा- ॥ २५-२६॥
गिरिजा बोलीं--मेरे मनकी बातोंको जानकर
मेरे अभीष्ट कार्योको सिद्ध करनेवाले तथा शिवमें
प्रीति रखनेवाले हे तुम्बुरो! [मैं तुमसे एक बात कहती
हूँ।] तुम्हारा कल्याण हो तुम मेरी इस सखीके साथ
शीघ्र ही विन्ध्यपर्वतपर जाओ। वहाँ एक महाघोर
और भयंकर पिशाच रहता है। उसका वृत्तान्त तुम
आरम्भसे ही सुनो । मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ
बताती हूँ॥ २७-२८॥
पूर्वजन्ममें वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था।
वह मेरी इस सखी चंचुलाका पति था। परंतु वह दुष्ट
। स्नान-सन्ध्या आदि नित्यकर्म छोड़कर
वह अपवित्र रहने लगा | क्रोधके कारण उसकी बुद्धिपर
मूढ़ता छा गयी थी | वह कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं
देवताओं और मुनियोंद्वारा शिवस्तुति
2223
पार्वतीजी और सप्तर्षि
मयूरवाहन भगवान् कार्तिकेय
श्रीनारायणके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्राकट्य
र्रम
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१५
वधूवेषमें भगवती पार्वती
अ० ५]
हिंसकः शस्त्रधारी च सव्यहस्तेन भोजनी।
दीनानां पीडकः क्रूरः परवेशप्रदीपकः॥ ३१
चाण्डालाभिरतो नित्यं वेश्याभोगी महाखलः।
स्वपत्नीत्यागकृत् पापी दुष्टसङ्गरतस्तदा॥ ३२
तेन वेश्याकुसङ्गेन सुकृतं नाशितं महत्।
वित्तलोभेन महिषी निर्भया जारिणी कृता॥ ३३
आमृत्योः स दुराचारी कालेन निधनं गतः।
ययौ यमपुरं घोरं भोगस्थानं हि पापिनाम्॥ ३४
तत्र भुक्त्वा स दुष्टात्मा नरकानि बहूनि च।
इदानीं स पिशाचोऽस्ति विखध्येऽद्रौ पापभुक् खल: ॥ ३५
तस्याग्रे परमां पुण्यां सर्वपापविनाशिनीम्।
दिव्यां शिवपुराणस्य कथां कथय यत्नतः॥ ३६
द्रुतं शिवपुराणस्य कथाश्रवणतः परात्।
सर्वपापविशुद्धात्मा हास्यति प्रेततां च सः॥ ३७
मुक्तं च दुर्गतेस्तं वै बिन्दुगं त्वं पिशाचकम्।
मदाज्ञया विमानेन समानय शिवान्तिकम्॥ ३८
सूत उवाच
इत्यादिष्टो महेशान्या गन्धर्वेन्द्रश्च तुम्बुरु:।
मुमुदेऽतीवः मनसि भाग्यं निजमवर्णयत्॥ ३९
आरुह्य सुविमानं स सत्या तत्त्रियया सह।
ययौ विन्ध्याचले सोऽरं यत्रास्ते नारदप्रियः ॥ ४०
तत्रापश्यत् पिशाचं तं महाकायं महाहनुम्।
प्रहसन्तं रुदन्तं च वल्गन्तं विकटाकृतिम्॥
बलाजग्राह तं पाशैः पिशाचं चातिभीकरम्।
तुम्बुरुश्शिवसत्कीर्तिगायकश्च महाबली॥ ४२
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_3_]_Front
माहात्म्य
३३
कर पाता था। अभक्ष्यभक्षण, सजनोंसे द्वेष और दूषित
वस्तुओंका दान लेना-यही उसका स्वाभाविक कर्म बन
गया था। वह अस्त्र-शस्त्र लेकर हिंसा करता, बायें हाथसे
खाता, दीनोंको सताता और क्रूरतापूर्वक पराये घरोंमें
आग लगा देता था। वह चाण्डालोंसे प्रेम करता और
प्रतिदिन वेश्याके सम्पर्कमें रहता था। वह बड़ा दुष्ट
था। उस पापीने अपनी पत्नीका परित्याग कर दिया था
और वह दुष्टोंके संगमें निरत रहता था॥ २९-३२॥
उसने वेश्याके कुसंगसे अपने सारे पुण्य नष्ट
कर लिये और धनके लोभसे अपनी पत्नीको निर्भय
करके व्यभिचारिणी बना डाला॥ ३३॥
वह मृत्युपर्यन्त दुराचारमें ही फँसा रहा। फिर
समय आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी। वह पापियोंके
भोगस्थान घोर यमपुरमें गया और वहाँ बहुत-से
नरकोंको भोगकर वह दुष्टात्मा इस समय विन्ध्यपर्वतपर
पिशाच बना हुआ है । वहींपर वह दुष्ट पिशाच अपने
पापोंका फल भोग रहा है॥ ३४-३५॥
तुम उसके आगे यलपूर्वक शिवपुराणकी उस
दिव्य कथाका प्रवचन करो, जो परम पुण्यमयी तथा
समस्त पापोंका नाश करनेवाली है। उत्तम शिवपुराणको
कथाके श्रवणसे उसका हृदय शीघ्र ही समस्त पापोंसे
शुद्ध हो जायगा और वह प्रेतयोनिका परित्याग कर
देगा। दुर्गतिसे मुक्त होनेपर उस बिन्दुग नामक
'पिशाचको मेरी आज्ञासे विमानपर बिठाकर तुम
भगवान् शिवके समीप ले आओ॥ ३६-३८॥
सूतजी बोले--[ हे शौनक !] महेश्वरी उमाके
इस प्रकार आदेश देनेपर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन-ही-
मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने भाग्यकी
सराहना की । तत्पश्चात् उस पिशाचकी सती-साध्वी
पत्नी चंचुलाके साथ विमानपर बैठकर नारदके प्रिय
मित्र तुम्बुरु वेगपूर्वक विन्ध्याचल पर्वतपर गये, जहाँ
वह पिशाच रहता था॥ ३९-४०॥
वहाँ उन्होंने उस पिशाचको देखा। उसका शरीर
विशाल था और उसकी ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। वह कभी
हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था।उसकी आकृति
बड़ी विकराल थी। भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका
गान करनेवाले महाबली तुम्बुरुने उस अत्यन्त भयंकर
पिशाचको बलपूर्वक पाशोंद्वारा बाँध लिया ॥ ४९-४२॥
३४
श्रीशिवमहापुराण
[3s III
अथो शिवपुराणस्य वाचनार्थ स तुम्बुरुः।
निश्चित्य रचनां चक्रे महोत्सवसमन्विताम्॥
पिशाचं तारितुं देव्याः शासनात्तुम्बुरुर्गतः।
विन्ध्यं शिवपुराणं स ह्याद्रिं श्रावयितुं परम्॥ ४४
इति कोलाहलो जातः सर्वलोकेषु वै महान्।
तत्र तच्छुवणार्थाय ययुर्देवर्षयो द्रुतम्॥ ४५
समाजस्तत्र परमोऽद्भुतश्चासीच्छुभावहः।
तेषां शिवपुराणस्यागतानां श्रोतुमादरात्॥ ४६
पिशाचमथ तं पाशेर्बद्ध्वा समुपवेश्य च।
तुम्बुरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम्॥ ४७
आरभ्य संहितामाद्यां सप्तमीसंहितावधि।
स्पष्टं शिवपुराणं हि समाहात्म्यं समावदत्॥ ४८
शरुत्वा शिवपुराणं तु सप्तसंहितमादरात्।
बभूवुः सुकृतार्थास्ते सर्वे श्रोतार एव हि॥ ४९
स पिशाचो महापुण्यं श्रुत्वा शिवपुराणकम्।
विधूय कलुषं सर्व जहौ पेशाचिकं वपुः ॥ ५०
दिव्यरूपो बभूवाशु गौरवर्णः सितांशुकः।
सर्वालङ्कारदीपतङ्गस्त्रनेत्श्चन्द्रशेखरः ॥५१
दिव्यं दिव्यवपुर्भूत्वा तया स निजकान्तया।
जगौ स्वयमपि श्रीमांश्चरितं पार्वतीपतेः ॥ ५२
तद्वधूमिति सदृष्ट्वा सर्वे देवर्षयश्च ते।
बभूदुर्विस्मिताश्चित्ते परमानन्दसंयुताः ॥ ५३
सुकृतार्था "महेशस्य श्रुत्वा चरितमद्भुतम्।
स्व स्व धाम ययु: पीत्या शंसन्तः शाङ्करं यशः ॥ ५४
बिन्दुगः सोऽपि दिव्यात्मा सुविमानस्थितः 'सुखी।
स्वकान्तापाश्व॑ंग: माञ्छुशुभेऽतीव खस्थितः ॥ ५५
तदनन्तर तुम्बुरुने शिवपुराणकी कथा बा:
निश्चय करके महोत्सवयुक्त स्थान और
आदिकौ रचना की। इतनेमें ही सम्पूर्ण लोकोंमें ब्
वेगसे यह प्रचार हो गया कि देवी पार्वतीकी आज्ञा
एक पिशाचका उद्धार करनेके उद्देश्यसे शिवपुराण
उत्तम कथा सुनानेके लिये तुम्बुरु विन्ध्यपर्वतपर गो
हैं। तब तो उस कथाको सुननेके लोभसे बहुत!
देवता और ऋषि भी शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचे।
आदरपूर्वक शिवपुराण सुननेके लिये आये हुए लोगोंक
उस पर्वतपर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समार
जुट गया॥ ४३--४६॥
तत्पश्चात् तुम्बुरुने उस पिशाचको पाशह
बाँधकर आसनपर बिठाया और हाथमें वीण
लेकर गौरीपतिकी कथाका गान आरम्भ किया|
माहात्मयसहित पहली अर्थात् प्रथम संहितासे लेका
सातवीं संहितातक शिवपुराणकी कथाका उन्हा
स्पष्ट वर्णन किया॥ ४७-४८॥
सात संहितावाले शिवपुराणका आदरपूर्वक श्रव
करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये। उस पसन
पुण्यमय शिवपुराणको सुनकर उस पिशाचने अपने सो
पापोंको धोकर उस पैशाचिक शरीरको त्याग दिया। शी
ही उसका रूप दिव्य हो गया। अंगकान्ति गौरवर्णकी हे
गयी । शरीरपर श्वेत वस्त्र तथा सब प्रकारके पुरुषोचित
आभूषण उसके अंगोंको उद्धासित करने लगे। कह
त्रिनेत्रधारी चन्द्रशेखररूप हो गया॥ ४९--५१॥
इस प्रकार दिव्य देहधारी होकर श्रीमान् बिदुर
अपनी भार्या चंचुलाके साथ स्वयं भी पार्वतीपति
भगवान् शिवके दिव्य चरित्रका गुणगान करने लगा।
उसकी स्त्रीको इस प्रकार दिव्य रूपसे सुशोभित
देखकर वे सभी देवता और ऋषि बड़े विस्मित हु
उनका चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया। भगवा
महेश्वरका वह अद्भुत चरित्र सुनकर वे सभी श्रो
परम कृतार्थ हो प्रेमपूर्वक श्रीशिवका यशोगान करी
हुए अपने-अपने धामको चले गये॥ ५२-५४॥
दिव्यरूपधारी श्रीमान् बिन्दुग भी सुन्दर विमान
अपनी प्रियतमाके पास बैठकर सुखपूर्वक
स्थित हो परम शोभा पाने लगा॥५५॥
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_3. म
अ० ६]
अथ गायन् महेशस्य सुगुणान् सुमनोहरान्।
सतुम्बुरुर्जगामाशु सकान्तः शाङ्करं पदम् ॥ ५६
सुसत्कृतो महेशेन पार्वत्या च स बिन्दुग:।
स्वगणश्च कृतः प्रीत्या साभवद्विरिजासरी॥ ५७
तस्मिल्लोके परानन्दे घनज्योतिषि शाश्चते।
लब्ध्वा निवासमचलं लभेते परमं सुखम्॥ ५८
इत्येतत् कथितं पुण्यमितिहासमधघापहम्।
शिवाशिवपरानन्दं निर्मलं भक्तिवर्धनम्॥ ५९
य इदं शृणुयाद्भक्त्या कीर्तयेद्वा समाहितः।
स भुक्त्वा विपुलान् भोगानन्ते मुक्तिमवाप्नुयात्॥ ६०
झौनक उवाच
सूत सूत महाप्राज्ञ व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
धन्यस्त्वं शैववयोऽसि वर्णनीयमहदुण:॥ १
श्रीमच्छिवपुराणस्य श्रवणस्य विधिं वद।
येन सर्व लभेच्छोता सम्पूर्ण फलमुत्तमम्॥ २
सूत उवाच
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि सम्पूर्णफलहेतवे।
विधिं शिवपुराणस्य शौनक श्रवणे मुने॥ ३
दैवज्ञं च समाहूय सन्तोष्य च जनान्वितः।
मुहूर्त शोध्चयेच्छुद्धं निर्विघ्नेन समाप्तये॥ ४
वार्ता प्रेष्या प्रयलेन देशे देशे च सा शुभा।
भविष्यति कथा शैवी आगन्तव्यं शुभार्थिभिः॥ ५
2223 Shivmahapuranam._Part L_Section_3_2_Front
माहात्म्य
३५
तदनन्तर महेश््वरके सुन्दर एवं मनोहर गुणोंका
गान करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा तुम्बुरुके
साथ शीघ्र ही शिवधाममें जा पहुँचा। वहाँ भगवान्
महेश्वर तथा पार्वती देवीने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुगका
बड़ा सत्कार किया और उसे अपना गण बना लिया।
उसकी पत्नी चंचुला पार्वतीजीकी सखी हो गयी | उस
घनीभूतज्योतिःस्वरूप परमानन्दमय सनातनधाममें
अविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पती परम सुखी हो
गये॥ ५६-५८॥
यह उत्तम इतिहास मैंने आपको सुनाया, जो
पापोंका नाश करनेवाला, उमा-महेश्वरको आनन्द
देनेवाला, अत्यन्त पवित्र तथा उनमें भक्ति बढ़ानेवाला है।
जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा एकाग्रचित्त होकर
इसका पाठ करता है, वह अनेक सांसारिक सुखोंको
भोगकर अन्तमें मुक्ति प्राप्त करता है॥ ५९-६० ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये बिन्दुगसद्गतिवर्णतं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें बिन्दुगसद्गतिवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
शिवपुराणके श्रवणकी विधि
शौनकजी बोले--हे महाप्राज्ञ! हे व्यासशिष्य!
हे सूतजी! आपको नमस्कार है। आप धन्य हैं और
शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं। आपके महान् गुण वर्णन
करनेयोग्य हैं। अब आप कल्याणमय शिवपुराणके
श्रवणकी विधि बतलाइये, जिससे सभी श्रोताओंको
सम्पूर्ण उत्तम फलकी प्राप्ति हो सके॥ १-२॥
सूतजी बोले-हे शौनक! हे मुने! अब मैं
आपको सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये शिवपुराणके
श्रवणकी विधि बता रहा हूँ॥ ३॥
[सर्वप्रथम] किसी ज्योतिषीको बुलाकर दान-
मानसे सन्तुष्ट करके अपने सहयोगी लोगोंके साथ
बैठकर बिना किसी विघ्न-बाधाके कथाकी समाप्ति होनेके
उद्देश्यसे शुद्ध मुहूर्तका अनुसन्धान कराये। तदनन्तर
प्रयत्नपूर्वक देश-देशमें-स्थान-स्थानपर यह शुभ सन्देश
भेजे कि हमारे यहाँ शिवपुराणकी कथा होनेवाली है।
अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको [उसे
सुननेके लिये] अवश्य पधारना चाहिये ॥ ४-५॥
३६
श्रीशिवमहापुराण
[30 t
77
दूरे हरिकथाः केचिद् दूरे शङ्करकीतनाः।
स्त्रियः शूद्रादयो ये च बोधस्तेषां भवेद्यतः॥ ६
देशे देशे शाम्भवा ये कीर्तनश्रवणोत्सुकाः।
तेषामानयनं कार्य तत्प्रकारार्थमादरात्॥ ७
भविष्यति समाजोऽत्र साधूनां परमोत्सवः।
पारायणे पुराणस्य शैवस्य परमाद्लुतः॥ ८
श्रीमच्छिवपुराणाहृरसपानाय चादरात्।
आयान्त्वरं भवन्तश्च कृपया प्रेमतत्पराः॥ ९
नावकाशो यदि प्रेम्णागन्तव्यं दिनमेककम्।
सर्वथागमनं कार्य दुर्लभा च क्षणस्थितिः॥ १०
तेषामाह्णानमेवं हि कार्य सविनयं मुदा।
आगतानां च तेषां हि सर्वथा कार्य आदरः॥ ११
शिवालये च तीर्थे वा वने वापि गृहेऽथवा।
कार्य शिवपुराणस्य श्रवणस्थलमुत्तमम्॥ १२
कार्य संशोधनं भूमेलेपनं धातुमण्डनम्।
विचित्रा रचना दिव्या महोत्सवपुरस्सरम्॥ १३
गृहोपस्करमुदधृत्य निखिलं तदयोग्यकम्।
एकान्ते गृहकोणे चादृश्ये यलान्निवेशयेत्॥ १४
कर्तव्यो मण्डपोऽत्युच्चैः कदलीस्तम्भमण्डित: ।
फलपुष्पादिभिस्सम्यग्विष्वग्बैतानराजितः ॥ १५
चतुर्हिक्षु ध्वजारोपस्सपताकः सुशोभनः।
सुभक्तिः सर्वथा कार्या सर्वानन्दविधायिनी॥ १६
सङ्कल्प्यमासनं दिव्यं शङ्करस्य परात्मनः।
वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं सुखसाधनम्॥ १७
कक न पी
कुछ लोग भगवान् श्रीहरिकी कथासे बहुत द
पड़ गये हैं। कितने ही स्त्री, शूद्र आदि भगवा,
शंकरके कथा-कीर्तनसे वंचित रहते हैं--उन सब
भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये | दे
देशमें जो भगवान् शिवके भक्त हों तथा शिव-कथ
कीर्तन और श्रवणके लिये उत्सुक हों, उन सबके
आदरपूर्वक बुलवाना चाहिये॥ ६-७॥
[उन्हें कहलाना चाहिये कि] यहाँ सत्पुरुषो
आनन्द देनेवाला समाज तथा अति अद्भुत उत्सव होग्
जिसमें शिवपुराणका पारायण होगा। श्रीशिवपुराणक॑
रसमयी कथाका श्रवण करनेहेतु आपलोग प्रेमपूर्क
शीघ्र पधारनेकी कृपा करें। यदि समयका अभाव हे
तो प्रेमपूर्वक एक दिनके लिये भी आइये। आपके
निश्चय ही आना चाहिये; क्योंकि इस कथा
क्षणभरके लिये बैठनेका सौभाग्य भी दुर्लभ है। हू
प्रकार विनय और प्रसन्नतापूर्वक श्रोताओंको निमन्त्र
देना चाहिये और आये हुए लोगोंका सब प्रकारे
आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ८-११॥
शिवमन्दिरमें, तीर्थमें, वनप्रान्तमें अथवा घड़े
शिवपुराणको कथा सुननेके लिये उत्तम स्थानक
निर्माण करना चाहिये॥ १२॥
कथाभूमिको लीपकर शोधन करना चाहिये त4
धातु आदिसे उस स्थानको सुशोभित करना चाहिये!
महोत्सवके साथ-साथ वहाँ अद्भुत तथा सुन्दर व्यवस्थ
कर लेनी चाहिये। कथाके लिये अनुपयोगी घरे
साज-सामानको हटाकर घरके किसी एकान्त कोने
सुरक्षित रख देना चाहिये॥ १३-१४॥
केलेके खम्भाँसे सुशोभित एक ऊँचा कथामण्डी
तैयार कराये। उसे सब ओर फल-पुष्प आदिसे तर्ष
सुन्दर चंदोवेसे अलंकृत करे और चारों ओर ध्वर्ज'
पताका लगाकर तरह-तरहके सामानोंसे सजा
सुन्दर शोभासम्पन्न बना दे। भगवान् शिवके प्रति स
प्रकारसे उत्तम भक्ति करनी चाहिये; क्योंकि वही स
तरहसे आनन्दका विधान करनेवाली है॥ १५-१६॥
परमात्मा भगवान् शंकरके लिये दिव्य
निर्माण करना चाहिये तथा कथा-वाचकके लिये “
एक ऐसा दिव्य आसन बनाना चाहिये, जो
लिये सुखद हो सके॥ १७॥
2223 Shivmahapuranam._Part Lserion- 3-25
आ० ६]
श्रोतृणां कल्पनीयानि सुस्थलानि यथाईत:।
अन्येषां च स्थलान्येब साधारणतया मुने॥ १८
विवाहे यादृशं चित्तं तादृशं कार्यमेव हि।
अन्या चिन्ता विनिर्वार्या सर्वा शौनक लौकिकी ॥ १९
उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता प्राग्वदनस्तथा।
व्युत्क्रमः पादयोज्ञेयो विरोधो नास्ति कश्चन॥ २०
अथवा पूर्वदिग्ज्ञेया पूज्यपूजकमध्यतः।
अथवा सम्मुखे वक्तुः श्रोतृणामाननं स्मृतम्॥ २१
व्यासासनसमारूढो यदा पौराणिको द्विजः।
असमाप्तौ प्रसङ्गस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ॥ २२
बालो युवाथ वृद्धो वा दरिद्रो वापि दुर्बलः।
पुराणज्ञः सदा वन्द्यः पूज्यश्च सुकृतार्थिभिः॥ २३
नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन।
यस्य वक्त्रोदूता वाणी कामधेनुः शरीरिणाम्॥ २४
गुरवः सन्ति बहवो जन्मतो गुणतश्च वै।
परो गुरुः पुराणज्ञस्तेषां मध्ये विशेषतः॥ २५
भवकोटिसहस्रेषु भूत्वा भूत्वावसीदताम्।
यो ददाति परां मुक्ति कोऽन्यस्तस्मात् परो गुरुः ॥ २६
पुराणज्ञः शुचिर्दक्षः शान्तो विजितमत्सरः।
साधुः कारुण्यवान् वाग्मी वदेत्पुण्यकथामिमाम्॥ २७
आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरान्तकम्।
कथा शिवपुराणस्य वाच्या सम्यक् सुधीमता॥ २८
ये धूर्ता ये च दुर्वृत्ता ये चान्ये विजिगीषवः।
तेषां कुटिलवृत्तीनामग्रे नैव वदेत् कथाम्॥ २
माहात्म्य
३७
हे मुने! [नियमपूर्वक] कथा सुननेवाले श्रोताओंके
लिये भी यथायोग्य सुन्दर स्थानोंकी व्यवस्था करनी
चाहिये। अन्य लोगोंके लिये भी सामान्यरूपसे स्थान
बनाने चाहिये॥ १८॥
हे शौनकजी ! विवाहोत्सवमें जैसी उल्लासपूर्ण
मन:स्थिति होती है, वैसी ही इस कथोत्सवमें रखनी
चाहिये। सब प्रकारकी दूसरी लौकिक चिन्ताओंको
भूल जाना चाहिये॥ १९॥
वक्ता उत्तर दिशाकी ओर मुख करे तथा श्रोतागण
पूर्व दिशाकी ओर मुख करके पालथी लगाकर बैठें।
इस विषयमें भी कोई विरोध नहीं है कि पूज्य-
पूजकके बीच पूर्व दिशा रहे अथवा वक्ताके सम्मुख
श्रोताओंका मुख रहे--ऐसा कहा गया है॥ २०-२१॥
पौराणिक वक्ता व्यासासनपर जबतक विराजमान
रहें, तबतक प्रसंग-समाप्तिके पूर्व किसीको नमस्कार
नहीं करना चाहिये। पुराणका विद्वान् वक्ता चाहे
बालक, युवा, वृद्ध, दरिद्र अथवा दुर्बल-जैसा भी
हो, पुण्य चाहनेवालोंके लिये सदा वन्दनीय और पूज्य
होता है॥ २२-२३॥
जिसके मुखसे निकली हुई वाणी देहधारियोंके
लिये कामधेनुके समान अभीष्ट फल देनेवाली होती
है, उस पुराणवेत्ता वक्ताके प्रति तुच्छबुद्धि कभी नहीं
करनी चाहिये। संसारमें जन्म तथा गुणोंके कारण
बहुत-से गुरु होते हैं, परंतु उन सबमें पुराणोंका ज्ञाता
विद्वान् ही परम गुरु माना गया है॥ २४-२५॥
करोड़ों योनियोंमें जन्म ले-लेकर दुःख भोगते हुए.
प्राणियोंको जो मुक्ति प्रदान करता है, उस [पुराणवक्ता]-
से बड़ा दूसरा कौन गुरु हो सकता है ?॥ २६॥
पुराणवेत्ता पवित्र, दक्ष, शान्त, ईर्ष्यापर विजय
पानेवाला, साधु और दयालु होना चाहिये। ऐसा
प्रवचनकुशल विद्वान् इस पुण्यमयी कथाको कहे।
सूर्योदयसे आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक उत्तम
बुद्धिवाले विद्वान् पुरुषको शिवपुराणकी कथा सम्यकू
रीतिसे बाँचनी चाहिये॥ २७-२८॥
जो धूर्त, दुराचारी तथा दूसरेसे विवाद
करनेवाले और प्रपंची लोग हैं, उन कुटिलवृत्तिवाले
'लोगोंके सामने यह कथा नहीं कहनी चाहिये।
३८
श्रीशिवमहापुराण
[3s ETI
ज दुर्जनसमाकी्णे न तु दस्युसमावृते।
देशे न धूर्तसदने वदेत् पुण्यकथामिमाम्॥
'कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने हि मुहूर्तकम्
मलमूत्रोत्सर्जनार्थं तत्कथाकीर्तनान्नरैः ॥ ३१
वक्त्रा क्षौरं हि सङ्कार्यं दिनादर्वारब्रताप्तये।
कार्य संक्षेपतो नित्यकर्म सर्वं प्रयत्नत: ॥ ३२
वक्तुः पार्श्व सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः॥ ३३
'कथाविघ्नविनाशार्थ गणनाथं प्रपूजयेत्।
कथाधीशं शिवं भक्त्या पुस्तकं च विशेषतः ॥ ३४
कथां शिवपुराणस्य श्ृणुयादादरात्सुधीः।
श्रोता सुविधिना शुद्धः शुद्धचित्तः प्रसन्नधीः ॥ ३५
अनेककर्मविभ्रान्तः कामादिषड्विकारवान्।
स्त्रैणः पाखण्डवादी च वक्ता श्रोता न पुण्यभाक् ॥ ३६
लोकचिन्तां धनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत् फलमुत्तमम्॥ ३७
श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा: ।
वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः॥ ३८
अभक्ता ये कथां पुण्यां श्ण्वन्तीमां नराधमाः ।
तेषां श्रवणजं नास्ति फलं दुःखं भवे भवे॥ ३९
असम्पूज्य पुराणं ये यथाशक्त्या ह्युपायनैः।
श्रृण्वन्तीमां कथां मूढाः स्यर्दरिद्रा न पावनाः ॥ ४०
दुष्टॉसे भरे तथा डाकुओंसे घिरे प्रदेशमें और पू
व्यक्तिके घरमें इस पवित्र कथाको नहीं कह
चाहिये॥ २९-३० ॥
मध्याहनकालमें दो घड़ीतक कथा बन्द रख
चाहिये, जिससे कथा-कीर्तनसे अवकाश पाकर लो
शौच आदिसे निवृत्त हो सकें॥३१॥
कथा-प्रारम्भके दिनसे एक दिन पहले त्रत ग्रह
करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये। णि
दिनों कथा हो रही हो, उन दिनों प्रयत्नपूर्वक
प्रातःकालका सारा नित्यकर्म संक्षेपसे ही कर लेग
चाहिये। वक्ताके पास उसकी सहायताके लिये एड
दूसरा वैसा ही विद्वान् स्थापित करना चाहिये, जो सा
प्रकारके संशयोंको निवृत्त करनेमें समर्थ और लोगोंके
समझानेमें कुशल हो॥ ३२-३३॥
कथामें आनेवाले विघ्नोंकी निवृत्तिके लि
गणेशजीका पूजन करे। कथाके स्वामी भगवा]
शिवकी तथा विशेषतः शिवपुराण ग्रन्थकी भक्तिभावे
पूजा करे। तत्पश्चात् उत्तम बुद्धिवाला श्रोता विधिपूर्वक
तन-मनसे शुद्ध एवं प्रसन्नचित्त हो आदरपूर्वक
शिवपुराणकी कथा सुने॥ ३४-३५॥
जो वक्ता और श्रोता अनेक प्रकारके कर्मों
भटक रहे हों, काम आदि छः विकारोंसे युक्त हो,
्त्रीमें आसक्ति रखते हों और पाखण्डपूर्ण बातें कहते
हों, वे पुण्यके भागी नहीं होते। जो लौकिक चित्त
तथा धन, गृह एवं पुत्र आदिकी चिन्ताको छोड़कर
कथामें मन लगाये रहता है, उस शुद्धबुद्धि पुरुषको
उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। श्रद्धा और भक्तिसे
युक्त, दूसरे कर्मोमें मन नहीं लगानेवाले, मौन धारण
करनेवाले, पवित्र एवं उद्वेगशून्य श्रोता ही पुण्यकं
भागी होते हैं॥ ३६-३८॥
जो नराधम भक्तिरहित होकर इस पुण्यम
कथाको सुनते हैं, उन्हें श्रवणका कोई फल नहीं हर्ती
और वे जन्म-जन्मान्तरमें क्लेश भोगते ही रहते हँ!
यथाशक्ति उपचारोंसे इस पुराणकी पूजा किये बि
जो मूढ़जन इस कथाको सुनते हैं, वे अपवित्र और
दरिद्र होते हें ॥ ३९-४०॥
अ० ६]
माहात्म्य
३९
कथायां कथ्यमानायां गच्छन्त्यन्यत्र ये नरा: ।
भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दारादिसम्पद: ॥ ४९
सोष्णीषमस्तका ये च शृण्वन्तीमां कथां नरा: ।
तत्पुत्राश्च प्रजायन्ते पापिनः कुलदूषकाः ॥ ४२
ताम्बूलं भक्षयन्तो ये शृण्वन्तीमां कथां नरा: ।
स्वविष्ठां खादयन्त्येतान्नरके यमकिङ्कराः ॥ ४३
ये च तुङ्गासनारूढा: शृण्वन्तीमां कथां नरा: ।
भुक्त्वा ते नरकान् सर्वास्ततः काका भवन्ति हि॥ ४४
ये वीराद्यासनारूढा: शृण्वन्तीमां कथां शुभाम्।
भुक्त्वा ते नरकान् सर्वान्विषवृक्षा भवन्ति वै ॥ ४५
असम्प्रणम्य वक्तारं कथां शृण्वन्ति ये नराः।
भुक्त्वा ते नरकान् सर्वान् भवन्त्यर्जुनपादपाः॥ ४६
अनातुराः शयाना ये शृण्वन्तीमां कथां नरा: ।
भुक्त्वा ते नरकान् सर्वान् भवन्त्यजगरादयः॥ ४७
बक्तुः समासनारूढा ये शृण्वन्ति कथामिमाम्।
गुरुतल्पसमं पापं प्राप्यते नारकैः सदा॥ ४८
ये निन्दन्ति च वक्तारं कथां चेमां सुपावनीम्।
भवन्ति शुनका भुक्त्वा दुःखं जन्मशतं हि ते॥ ४९
कथायां वर्तमानायां दुर्वादं ये वदन्ति हि।
भुक्त्वा ते नरकान् घोरान् भवन्ति गर्दभास्ततः॥ ५०
'कदाचिन्नापि शृण्वन्ति कथामेतां सुपावनीम्।
भुक्त्वा ते नरकान् घोरान् भवन्ति वनसूकरा: ॥ ५१
कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये खलाः।
कोट्यब्दं नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकरा: ॥ ५२
एवं विचार्य शुद्धात्मा श्रोता वक्तृसुभक्तिमान्।
कथाश्रवणहेतोर्हि भवेत् प्रीत्योद्यतः सुधीः ॥
कथाविघ्नविनाशार्थं गणेशं पूजयेत् पुरा।
नित्यं सम्पाद्य सङ्क्षेपात् प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ ५४
नवग्रहांश्च सम्पूज्य सर्वतोभद्रदैवतम्।
शिवपूजोक्तविधिना पुस्तकं तत्समर्चयेत्॥ ५५
कथा कहे जाते समय बीचमें ही जो लोग उठकर
अन्यत्र चले जाते हैं, जन्मान्तरमें उनकी स्त्री आदि
सम्पत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। जो पुरुष सिरपर पगड़ी
आदि धारण करके इस कथाका श्रवण करते हैं, उनके
पापी और कुलकलंकी पुत्र उत्पन्न होते हैं ॥ ४१-४२॥
जो पुरुष पान चबाते हुए इस कथाको सुनते हैं, उन्हे
नरकमें यमदूत उनकी ही विष्ठा खिलाते हैं जो लोग ऊँचे
आसनपर बैठकर इस कथाका श्रवण करते हैं, वे समस्त
नरकोंको भोगकर काकयोनिमें जन्म लेते हैं ॥ ४३-४४॥
जो लोग वीरासन आदिसे बैठकर इस शुभ कथाको
सुनते हैं, वे अनेकों नरकोंको भोगकर विषवृक्षका जन्म
पाते हैं । कथा सुनानेवाले पौराणिकको अच्छी प्रकार
प्रणाम किये बिना जो लोग कथा सुनते हैं, वे सभी नरकोंको
भोगकर अर्जुनवृक्ष बनते हैं । रोगयुक्त न होनेपर भी जो
लोग लेटकर यह कथा सुनते हैं, वे सभी नरकोंको
भोगकर अन्तमें अजगर आदि योनियोंमें जन्म लेते हैं।
वक्ताके समान ऊँचाईवाले आसनपर बैठकर जो इस
कथाका श्रवण करते हैं, उन नारकीय लोगोंको गुरुशय्यापर
शयन करने-जैसा पाप लगता है ॥ ४५--४८ ॥
जो इस पवित्र कथा तथा वक्ताकी निन्दा करते
हैं, वे सौ जन्मोंतक दुःख भोगकर कुत्तेका जन्म पाते
हैं। कथा होते समय बीचमें जो गन्दी बातें बोलते हैं,
वे घोर नरक भोगनेके बाद गधेका जन्म पाते हैं। जो
कभी भी इस परम पवित्र कथाका श्रवण नहीं करते,
वे घोर नरक भोगनेके पश्चात् जंगली सूअरका जन्म
लेते हैं। जो दुष्ट कथाके बीचमें विघ्न डालते हैं, वे
करोड़ों वर्षोतक नरकयातनाओंको भोगकर गाँवके
सूअरका जन्म पाते हैं॥ ४९-५२॥
इसका विचार करके शुद्ध और प्रेमपूर्ण चित्तसे
बुद्धिमान् श्रोताको वक्ताके प्रति भक्तिभाव रखकर
कथाश्रवणका प्रयत्न करना चाहिये॥५३॥
सबसे पहले कथाके विघ्नोंका नाश करनेहेतु
गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये। अपने नित्यकर्मको
संक्षेपमें सम्पन्न करके प्रायश्चित्त करना चाहिये।
नवग्रह और सर्वतोभद्र देवताओंका पूजन करके
शिवपूजाकी बतायी गयी विधिसे शिवपुराणकी
पुस्तकका अर्चन करना चाहिये॥ ५४-५५॥
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श्रीशिवमहापुराण
[अ ७
पूजनान्ते महाभक्त्या करौ बद्ध्वा विनीतकः।
साक्षाच्छिवस्वरूपस्य पुस्तकस्य स्तुतिं चरेत्॥ ५६
श्रीमच्छिवपुराणाख्यः प्रत्यक्षस्त्वं महेश्वरः।
श्रवणार्थं स्वीकृतोऽसि सन्तुष्टो भव वै मयि॥ ५७
मनोरथो मदीयोऽयं कर्तव्यः सफलस्त्वया।
निर्विघ्नेन सुसम्पूर्ण कथाश्रवणमस्तु मे॥ ५८
भवाब्धिमग्रं दीनं मां समुद्धर भवार्णवात्।
कर्मग्राहगृहीताङ्गं दासोऽहं तव शङ्कर ५९
एवं शिवपुराणं हि साक्षाच्छिवस्वरूपकम्।
स्तुत्वा दीनवच: प्रोच्य वक्तुः पूजां समारभेत्॥ ६०
शिवपूजोक्तविधिना वक्तारं च समर्चयेत्।
सपुष्पवस्त्रभूषाभिर्धूपदीपादिनार्चयेत् ॥६१
तदग्रे शुद्धचित्तेन कर्तव्यो नियमस्तदा।
आसमाप्ति यथाशक्त्या धारणीयः सुयत्रत: ॥ ६२
'व्यासरूप प्रबोधाग्र्य शिवशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज़ञानं विनाशय॥ ६३
वरणं पञ्जविप्राणां कार्य वैकस्य भक्तितः।
शिवपञ्चार्णमन्त्रस्य जपः कार्यश्च तैः सदा॥ ६४
इत्युक्तस्ते मुने भक्त्या कथाश्रवणसद्विधिः।
श्रोतृणां चेव भक्तानां किमन्यच्छोोतुमिच्छसि॥ ६५
पूजनके अन्तमें विनम्र होकर बड़ी पूजात महाभवत्या करी बदल्या विनीतकः। | पूजनके अले विनम्र होकर बड़ी भरते
दोनों हाथ जोड़कर साक्षात् शिवस्वरूपिणी पुस्तक
इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये- श्रीशिवपुराणके रूप
आप प्रत्यक्ष सदाशिव हैं; हमने कथा सुननेके लिये आपन्ने
अंगीकार किया है। आप हमपर प्रसन्न हों। मेरा जे
मनोवांछित हो, उसे आप कृपापूर्वक सम्पन्न करें । मेरा य
कथाश्रवण निर्विघ्नरूपसे सुसम्पन्न हो | कर्मरूपी ग्राह्मे
ग्रस्त शरीरवाले मुझ दीनका आप संसारसागरसे उद्धा
कीजिये। हे शंकर! मैं आपका दास हँ ॥ ५६-५९
इस प्रकार साक्षात् शिवस्वरूप इ
शिवपुराणकी दीनतापूर्वक स्तुति करके वक्ताकी
पूजा आरम्भ करनी चाहिये। शिवपूजाकी बतायी गवौ
विधिसे पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप-दीपादिसे वक्ताका
पूजा करे। तदनन्तर शुद्धचित्तसे उनके सामने नियम
ग्रहण करे और कथासमाप्तिपर्यन्त यथाशक्ति उसका
प्रयत्नपूर्वक पालन करे ॥ ६०-६२॥
[तत्पश्चात् कथावाचक व्यासकी प्रार्थना
करे-] हे व्यासजीके समान ज्ञानीश्रेष्ठ, शिवशास्त्रके
मर्मज्ञ ब्राह्मणदेवता! आप इस कथाके प्रकाशसे मेरे
अज्ञानान्धकारको दूर करें। भक्तिपूर्वक पाँच अथवा
एक ब्राह्मणका वरण करे और उनके द्वारा शिवपंचाक्षर
मन्त्र (नमः शिवाय )-का जप कराये॥ ६३-६४॥
हे मुने! इस प्रकार मैंने भक्त श्रोताओंद्वार
भक्तिपूर्वक कथाश्रवणकी उत्तम विधि आपको बता
दी; अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?॥ ६५॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये श्रवणविधिवर्णनं नाम वष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्मयमें श्रवणविधिवर्णान नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
श्रोताओंके पालन करनेयोग्य नियमोंका वर्णन
शौनक उवाच
सूत सूत महाप्राज्ञ धन्यस्त्वं शैवपुङ्गव।
श्रावितेयं कथास्माकमद्भुतेयं शुभावहा॥ १
पुंसां शिवपुराणस्य श्रवणव्रतिनां मुने।
शौनकजी बोले-हे शिवभक्तोंमें श्रे
महाबुद्धमान् सूतजी! आप धन्य हैं, जो कि आफ
यह अद्भुत एवं कल्याणकारिणी कथा हमें सुनायी
हे मुने! शिवपुराणकी कथा सुननेके लिये ब्र
धारण करनेवाले लोगोंको किन नियमोंका पार्ली
करना चाहिये-यह भी कृपापूर्वक सबके
दयया नियमं वद॥ २ | दृष्टिसे बताइये ॥ १-२॥
अ० ७]
माहात्म्य
४१
सूत उवाच
नियमं शृणु सद्भक्त्या पुंसां तेषां च शौनक।
नियमात् सत्कथां श्रुत्वा निर्वि्नफलमुत्तमम्॥ ३
पुंसां दीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे।
श्रोतुकामैरतो वक्तुदीक्षा ग्राह्मा च तैर्मुने॥ ४
ब्रह्मचर्यमधस्सुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्।
कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाब्रती॥ ५
आसमाप्तपुराणं हि समुपोष्य सुशक्तिमान्।
शृणुयाद्भक्तितः शुद्धः पुराणं शैवमुत्तमम्॥ ६
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वा शृणुयात् सुखम्।
'फलाहारेण वा श्राव्यमेकभुक्तं न वा हि तत्॥ ७
एकवारं हविष्यान्नं भुञ्ज्यादेतत्कथाब्रती।
सुखसाध्यं यथा स्यात्तच्छूवणं कार्यमेव च॥ ८
भोजनं सुकरं मन्ये कथासु श्रवणप्रदम्।
नोपवासो वरश्चेत् स्यात् कथाश्रवणविष्नकृत्॥ ९
गरिष्ठं द्विदलं दग्धं निष्पावांश्च मसूरिकाम्।
भावदुष्टं पर्युषितं जग्ध्वा नित्यं कथाद्रती॥ १०
वार्ताकं च कलिन्दं च चिचिण्डं मूलकं तथा।
कूष्माण्डं नालिकेरं च मूलं जग्ध्वा कथात्रती ॥ ११
पलाण्डुं लशुनं हिङ्गुं गृञ्जनं मादकं हि तत्।
सस्तून्यामिषसंज्ञानि वर्जयेद्यः कथाव्रती॥ १२
'कामादिषड्विकारं च द्विजानां च विनिन्दनम्।
पतिब्रतासतां निन्दां वर्जयेद्यः कथाब्रती॥ १३
रजस्वलां न पश्येच्य पतितान्न वदेत् कथाम्।
द्विजद्विषो वेदवर्ज्यान्न वदेद्यः कथाद्रती॥
सूतजी बोले-हे शौनक! अब शिवपुराण सुनेका
ब्रत लेनेवाले पुरुषोंके लिये जो नियम हैं, उन्हें भक्तिपूर्वक
सुनिये। नियमपूर्वक इस श्रेष्ठ कथाको सुननेसे बिना
किसी विघ्न-बाधाके उत्तम फलकी प्राप्ति होती है॥ ३॥
दीक्षासे रहित लोगोंका कथाश्रवणमें अधिकार
नहीं है। अतः मुने! कथा सुननेकी इच्छावाले सब
लोगोंको पहले वक्तासे दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
कथात्रतीको ब्रह्मचर्यसे रहना, भूमिपर सोना, पत्तलमें
खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर ही अन्न
ग्रहण करना चाहिये ॥ ४-५॥
जिसमें शक्ति हो, वह पुराणकी समाप्तितक उपवास
करके शुद्धतापूर्वक भक्तिभावसे उत्तम शिवपुराणको
सुने। घृत अथवा दुग्ध पीकर सुखपूर्वक कथाश्रवण
करे अथवा फलाहार करके अथवा एक ही समय भोजन
करके इसे सुनना चाहिये। इस कथाका व्रत लेनेवाले
पुरुषको प्रतिदिन एक ही बार हविष्यान्न भोजन करना
चाहिये । जिस प्रकारसे कथाश्रवणका नियम सुखपूर्वक
पालित हो सके, वैसे ही करना चाहिये ॥ ६-८॥
कथाश्रवणमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले उपवासकी
तुलनामें तो मैं कथाश्रवणमें शक्ति प्रदान करनेवाले
भोजनको ही अच्छा समझता हूँ॥ ९॥
गरिष्ठ अन्न, दाल, जला अन्न, सेम, मसूर,
भावदूषित तथा बासी अन्नको खाकर कथा-व्रती पुरुष
कभी कथाको न सुने॥ १०॥
कथाव्रतीको बैंगन, तरबूज, चिचिंडा, मूली,
कोहड़ा, प्याज, नारियलका मूल तथा अन्य कन्द-
मूलका त्याग करना चाहिये॥ ११॥
जिसने कथाका व्रत ले रखा हो, वह पुरुष प्याज,
लहसुन, हींग, गाजर, मादक वस्तु तथा आमिष कही
जानेवाली वस्तुओंको त्याग दे। कथाका ब्रत लेनेवाला
जो पुरुष हो, उसे काम, क्रोध आदि छः विकारों,
ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा पतिव्रता और साधु-संतोंकी
निन्दाका त्याग कर देना चाहिये॥ १२-१३॥
कथाश्रवणका ब्रत धारण करनेवाला व्यक्ति
रजस्वला स्त्रीको न देखे, पतित मनुष्योंको कथाकी बात
न सुनाये, ब्राहमणोंसे द्रेष रखनेवालों और वेदबहिष्कृत
मनुष्योंके साथ सम्भाषण न करे॥ १४॥
४२
सत्यं शौचं दयां मौनमार्जवं विनयं तथा।
औदार्य मनसश्चैव कुर्यान्तित्यं कथाव्रती॥ १५
निष्कामश्च सकामश्च नियमाच्छृणुयात् कथाम्।
सकामः काममाप्नोति निष्क्रामो मोक्षमाप्रुयात् ॥ १६
दरिद्रश्च क्षयी रोगी पापी निर्भाग्य एव च।
अनपत्योऽपि पुरुषः शृणुयात् सत्कथामिमाम्॥ १७
काकवन्ध्यादयः सप्तविधा अपि खलस्त्रियः।
सत्रवदगर्भा च या नारी ताभ्यां श्राव्या कथा परा॥ १८
स्वेषां श्रवणं कार्य स्त्रीभिः पुंभिश्च यलतः।
एतच्छिवपुराणस्य विधिना च कथां मुने॥ १९
एतच्छिवपुराणस्य पारायणदिनानि वै।
अत्युत्तमानि बोध्यानि कोटियज्ञसमानि च॥ २०
एतेषु विधिना दत्तं यदल्पमपि वस्तु हि।
दिवसेषु वरिष्ठेषु तदक्षय्यफलं लभेत्॥ २१
एवं कृत्वा व्रतविधि श्रुत्वेमां परमां कथाम्।
परानन्दयुतः श्रीमानुद्यापनमथाचरेत्॥ २२
एतदुद्यापनविधिश्चतुर्दश्याः समो मतः।
कार्यस्तद्वद्धनाढ्यैश्च तदुक्तफलकाङ्क्षिभिः ॥ २३
अकिञ्चनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनग्रहः।
श्रवणेनेव पूतास्ते निष्कामाः शाम्भवा मता: ॥ २४
एवं शिवपुराणस्य पारायणमखोत्सवे।
समाप्ते श्रोतृभिर्भक्त्या पूजा कार्या प्रयत्नत: ॥ २५
शिवपूजनवत् सम्यक् पुस्तकस्य पुरो मुने।
पूजा कार्या सुविधिना वक्तुश्च तदनन्तरम्॥ २६
पुस्तकाच्छादनार्थं हि नवीनं चासनं शुभम्।
समर्चयेद् दृढं दिव्यं बन्धनार्थं च सूत्रकम्॥ २७
पुराणार्थ प्रयच्छन्ति ये सूत्रं वसनं नवम्।
भोगिनो ज्ञानसम्पन्नास्ते भवन्ति भवे भवे॥ २८
वक्त्रे दद्यान्महार्हाणि वस्तूनि विविधानि च।
वस्त्रभूषणपात्राणि दिव्यं बहु विशेषतः॥ २९
श्रीशिवमहापुराण
[अ ॥
— च्याच ना ळा ता अं
कथात्रती पुरुष प्रतिदिन सत्य, शौच, दया, मौ
सरलता, विनय तथा मनकी उदारता-इन सद्गुणोंको सरे
अपनाये रहे। श्रोता निष्काम हो या सकाम, वह
कथा सुने | सकाम पुरुष अपनी अभीष्ट कामनाको प्रा
करता है और निष्काम पुरुष मोक्ष पा लेता है । दार
क्षंयका रोगी, पापी, भाग्यहीन तथा सन्तानरहित पुर
भी इस उत्तम कथाको सुने ॥ १५--१७॥
काकवन्ध्या आदि जो सात प्रकारकी दुष्टा स्त्रि
हैं तथा जिस स्त्रीका गर्भ गिर जाता हो-इन सभीक्षे
शिवपुराणकी उत्तम कथा सुननी चाहिये । हे मुने। स्न
हो या पुरुष-सबको यत्मपूर्वक विधि-विधान
शिवपुराणकी उत्तम कथा सुननी चाहिये ॥ १८-१९।
इस शिवपुराणके कथापारायणके दिनोंके
अत्यन्त उत्तम और करोड़ों यज्ञोंके समान पकि
मानना चाहिये। इन श्रेष्ठ दिनोंमें विधिपूर्वक ज॑
थोड़ी-सी भी वस्तु दान की जाती है, उसका अक्षर
फल मिलता है॥ २०-२१॥
इस प्रकार व्रतधारण करके इस परम श्रे
कथाका श्रवण करके आनन्दपूर्वक श्रीमान् पुरुषोंके
इसका उद्यापन करना चाहिये। इसके उद्यापनकी
विधि शिवचतुर्दशीके उद्यापनके समान है । अतः यह
बताये गये फलकी आकांक्षावाले धनाढ्य लोगोंके
उसी प्रकारसे उद्यापन करना चाहिये। अल्पवित्तवाते
भक्तोंके लिये प्राय: उद्यापनकी आवश्यकता नहीं है
वे तो कथाश्रवणमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। शिव्ीब
निष्काम भक्त तो शिवस्वरूप ही होते हैं ॥ २२-२४
हे महर्षे! इस प्रकार शिवपुराणकी कथाके प?
एवं श्रवण-सम्बन्धी यज्ञोत्सवकी समाप्ति होगे
श्रोताओंको भक्ति एवं प्रयत्नपूर्वक भगवान् शिवकी
पूजाकी भाँति पुराण-पुस्तककी भी पूजा करनी चाहिये!
तदनन्तर विधिपूर्वक वक्ताका भी पूजन करना चाहिये!
पुस्तकको आच्छादित करनेके लिये नवीन एवं सुर
बस्ता बनाये और उसे बाँधनेके लिये दृढ़ एवं दिव्य स
लगाये; फिर उसका विधिवत् पूजन करे ॥ २५-२५
पुराणके लिये जो लोग नया वस्त्र और सूत्र
हैं, वे जन्म-जन्मान्तरमें भोग और ज्ञानसे सम्पन्न ही
हैं। कथावाचकको अनेक प्रकारके बहुमूल्य पदार्थ
चाहिये और उत्तम वस्त्र, आभूषण और सुन्दर
आ० ७]
आसनार्थ प्रयच्छन्ति पुराणस्य च ये नरा: ।
कम्बलाजिनवासांसि मञ्जं फलकमेव च॥ ३०
स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।
स्थित्वा ब्रह्मपदे कल्पं यान्ति शैवपदं तत: ॥ ३९
एवं कृत्वा विधानेन पुस्तकस्य प्रपूजनम्।
वक्तुश्च मुनिशार्दूल महोत्सवपुरस्सरम्॥ ३२
सहायार्थं स्थापितस्य पण्डितस्य प्रपूजनम्।
कुर्यात्तदनुसारेण किञ्चिदूनं धनादिभिः॥ ३३
समागतेभ्यो विप्रेभ्यो दद्यादन्नं धनादिकम्।
महोत्सवः प्रकर्तव्यो गीतेर्वाद्यशच नर्तनैः॥ ३४
विरक्तश्च भवेच्छोता परेऽहनि विशेषतः।
गीता वाच्या शिवेनोक्ता रामचन्द्राय या मुने॥ ३५
गृहस्थश्चेद्भवेच्छ्रोता कर्तव्यस्तेन धीमता।
होमः शुद्धेन हविषा कर्मणस्तस्य शान्तये॥ ३६
रुद्रसंहितया होमः प्रतिश्लोकेन वा मुने।
गायत्र्यास्तन्मयत्वाच्च पुराणस्यास्य तत्त्वत: ॥ ३७
अथवा मूलमन्त्रेण पञ्चवर्णेन शैवतः।
होमाशक्तौ बुधो होम्यं हविर्दद्याद् द्विजाय तत्॥ ३८
दोषयोः प्रशमार्थं च ऱ्यूनताधिकताख्ययोः।
पठेच्च शृणुयाद्भक्त्या शिवनामसहस्त्रकम्॥ ३९
तेन स्यात् सफलं सर्व सफलं नात्र संशयः।
यतो नास्त्यधिकं त्वस्मातूत्रैलोक्ये वस्तु किञ्जन॥ ४०
एकादशमितान् विप्रान् भोजयेन्मधुपायसैः।
दद्यात् तेभ्यो दक्षिणां च व्रतपूर्णत्वसिद्धये॥ ४१
शक्तौ पलत्रयमितस्वर्णेन सुन्दरं मुने।
सिंहं विधाय तत्रास्य पुराणस्य शुभाक्षरम्॥
माहात्म्य
४३
आदि विशेष रूपसे देने चाहिये । पुराणके आसनरूपमें
जो लोग कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, चौकी, तख्ता आदि
प्रदान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्त करके यथेच्छ सुखोंका
उपभोगकर पुनः कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें रहकर अन्तमें
शिवलोक प्राप्त करते हैं॥ २८-३१॥
मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार महान् उत्सवके साथ
पुस्तक और वक्ताकी विधिवत् पूजा करके वक्ताकी
सहायताके लिये स्थापित किये गये पण्डितका भी
उसीके अनुसार उससे कुछ ही कम धन आदिके द्वारा
सत्कार करे। वहाँ आये हुए ब्राह्मणोंको अन्न-धन
आदिका दान करे। साथ ही गीत, वाद्य और नृत्य
आदिके द्वारा महान् उत्सव करे॥ ३२-३४॥
हे मुने! यदि श्रोता विरक्त हो तो उसके लिये
कथा-समाप्तिके दिन विशेषरूपसे उस गीतांका पाठ
करना चाहिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजीके प्रति भगवान्
शिवने कहा था॥ ३५॥
यदि श्रोता गृहस्थ हो तो उस बुद्धिमानूको उस
श्रवण-कर्मकी शान्तिके लिये शुद्ध हविष्यके द्वारा होम
करना चाहिये। हे मुने! रुद्रसंहिताके प्रत्येक श्लोकद्वारा
होम करे अथवा गायत्री-मन्त्रसे होम करना चाहिये;
क्योंकि वास्तवमें यह पुराण गायत्रीमय हो है। अथवा
शिवपंचाक्षर मूलमन्त्रसे हवन करना उचित है। होम
करनेकी शक्ति न हो तो विद्वान् पुरुष यथाशक्ति
हवनीय हविष्यका ब्राह्मणको दान करे॥ ३६-३८॥
न्यूनातिरिक्ततारूप दोषोंकी शान्तिके लिये
भक्तिपूर्वक शिवसहस्रनामका पाठ अथवा श्रवण करे।
इससे सब कुछ सफल होता है, इसमें संशय नहीं है;
क्योंकि तीनों लोकोंमें उससे बढ़कर कोई वस्तु नहीं
है ॥ ३९-४०॥
कथाश्रवणसम्बन्धी व्रतकी पूर्णताकी सिद्धिके
लिये ग्यारह ब्राह्मणोंको मधुमिश्रित खीर भोजन कराये
और उन्हें दक्षिणा दे॥ ४१॥
मुने! यदि शक्ति हो तो तीन पल (बारह तोला)
सोनेका एक सुन्दर सिंहासन बनवाये और उसपर उत्तम
अक्षरोंमें लिखी अथवा लिखायी हुई शिंवपुराणकी
+ पद्मपुराणोक्त शिवगीता।
श्रीशिवमहापुराण
डड
लेखितं लिखितं वापि संस्थाप्य विधिना पुमान्।
सम्पूज्यावाहनाद्येश््च ह्युपचारैः सदक्षिणम्॥ ४३
वस्त्रभूषणगन्थाद्येः पूजिताय यतात्मने।
आचार्याय सुधीर्दद्याच्छिवसन्तोषहेतवे ॥ ४४
तेन दानप्रभावेण पुराणस्यास्य शौनक ।
सम्प्राप्यानुग्रहं शैवं मुक्तः स्याद्भवबन्धनात्॥ ४५
एवं कृते विधाने च श्रीमच्छिवपुराणकम्।
सम्पूर्णफलदं स्याद्वै भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥ ४६
इति ते कथितं सर्व किं भूयः श्रोतुमिच्छसि।
श्रीमच्छिवपुराणस्य माहात्म्यं सर्वकामदम्॥ ४७
श्रीमच्छिवपुराणं तु पुराणतिलकं स्मृतम्।
महच्छिवप्रियं रम्यं भवरोगनिवारणम्॥ ४८
ते जन्मभाजः खलु जीवलोके
ये बै सदा ध्यायन्ति विश्वनाथम्।
वाणी गुणान् स्तौति कथां श्रृणोति
्रोत्रद्वयं ते भवमुत्तरन्ति॥ ४९
'सकलगुणविभेदैर्नित्यमरस्यष्टरूपं
जगति च बहिरन्तर्भासमानं महिम्ना।
मनसि च बहिरन्तर्वाङ्मनोवृत्तिरूपं
परमशिवमनन्तानन्दसान्द्रं प्रपद्ये॥ ५०
[अ ७
MR >> जजजजनऋछऋऋऋ"ए"कक्तिऋ!”"'।शिशनन |
पुस्तक विधिपूर्वक स्थापित करे। तत्पश्चात् पुरुष
आवाहन आदि विविध उपचारोंसे उसकी पूजा करके
दक्षिणा चढ़ाये। तदनन्तर जितेन्द्रिय आचार्यका वर
आभूषण एवं गन्ध आदिसे पूजन करके उत्तम
श्रोता भगवान् शिवके सन्तोषके लिये दक्षिणासहित
वह पुस्तक उन्हें समर्पित कर दे॥ ४२--४४॥
हे शौनक! इस पुराणके उस दानके प्रभावे
भगवान् शिवका अनुग्रह पाकर पुरुष भवबन्धनसे
मुक्त हो जाता है। इस तरह विधि-विधानका पाला
करनेपर श्रीसम्पन्न शिवपुराण सम्पूर्ण फलको देनेवाला
तथा भोग और मोक्षका दाता होता है ॥ ४५-४६॥
हे मुने! मैने आपको शिवपुराणका यह सार
माहात्म्य, जो सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है, बता
दिया। अब और क्या सुनना चाहते हैं? श्रीसम्पन
शिवपुराण समस्त पुराणोंका तिलकस्वरूप माना गया
है। यह भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय, रमणीय तथ
भवरोगका निवारण करनेवाला है ॥ ४७-४८॥
जो सदा भगवान् विश्वनाथका ध्यान करते हैं,
जिनको वाणी शिवके गुणोंकी स्तुति करती है और
जिनके दोनों कान उनकी कथा सुनते हैं, इस जीवः
जगतूमें उन्हींका जन्म लेना सफल है, वे निश्चय ही
संसारसागरसे पार हो जाते हैं ॥ ४९॥
भिन्न-भिन्न प्रकारके समस्त गुण जिनके
सच्चिदानन्दमय स्वरूपका कभी स्पर्श नहीं करते, जे
अपनी महिमासे जगतूके बाहर और भीतर वाणी
एवं मनोवृत्तिरूपमें प्रकाशित होते हैं, उन अतत
आनन्दघनरूप परम शिवकी मैं शरण लेता हूँ॥ ५०॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे सनत्कुमारसंहितायां श्रीशिवपुराणश्रवणक्रतितां
विधिनिषेधपुस्तकवक्ृपूजनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणमें सनत्कुमारसंहिताके अन्तर्गत ्रीशिवपुराणके अ्रवणब्रतियोंके विधि-निषेध
ऑर ग्रन्थ तथा वक्ताके पूजनका वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
॥ श्रीशिवमहापुराणमाहात्म्य पूर्ण हुआ॥
॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम: ॥
= श्रीशिवमहापुराण चच
( प्रथम-खण्ड--पूर्वार्ध )
प्रथमा विद्येश्वरसंहिता
अथ प्रथमोऽध्यायः
प्रयागमें सूतजीसे मुनियोंका शीघ्र पापनाश करनेवाले साधनके विषयमे प्रश्न
आद्यन्तमङ्गलमजातसमानभाव-
मार्य तमीशमजरामरमात्मदेवम्।
पञ्चाननं प्रबलपञ्चविनोद्शीलं
सम्भावये मनसि शङ्करमम्बिकेशम्॥
व्यास उवाच
धर्मक्षेत्रे महाक्षेत्रे गङ्घाकालिन्दिसङ्गमे।
प्रयागे परमे पुण्ये ब्रह्मलोकस्य वर्त्मनि॥
मुनयः शंसितात्मानः सत्यव्रतपरायणाः।
महौजसो महाभागा महासत्रं वितेनिरे॥
तत्र सत्रं समाकर्ण्य व्यासशिष्यो महामुनिः ।
आजगाम मुनीन् द्रष्टुं सूतः पौराणिकोत्तमः ॥
तं दृष्ट्वा सूतमायान्तं हर्षिता मुनयस्तदा।
चेतसा सुप्रसन्नेन पूजां चक्रुर्यथाविधि॥
ततो विनयसंयुक्ताः प्रोचुः साञ्जलयश्च ते।
सुप्रसन्ना महात्मानः स्तुतिं कृत्वा यथाविधि॥
रोमहर्षण सर्वज्ञ भवान् वै भाग्यगौरवात्।
पुराणविद्यामखिलां व्यासात् प्रत्यर्थभीयिवान् ॥
तस्मादाश्चर्यभूतानां कथानां त्वं हि भाजनम्।
रलानामुरुसाराणां रत्नाकर इवार्णवः॥
जो आदि और अन्तमें [तथा मध्यमें भी] नित्य
मङ्गलमय हैं, जिनकी समानता अथवा तुलना कहीं भी
नहीं है, जो आत्माके स्वरूपको प्रकाशित करनेवाले
देवता (परमात्मा) हैं, जिनके पाँच मुख हैं और जो
खेल-ही-खेलमें-अनायास जगत्की रचना, पालन, संहार,
अनुग्रह एवं तिरोभावरूप-पाँच प्रबल कर्म करते रहते
हैं, उन सर्वश्रेष्ठ अजर-अमर ईश्वर अम्बिकापति
भगवान् शंकरका मैं मन-ही-मन चिन्तन करता हूँ।
व्यासजी बोले-जो धर्मका महान् क्षेत्र है,
जहाँ गंगा-यमुनाका संगम हुआ है, जो ब्रह्मलोकका
मार्ग है, उस परम पुण्यमय प्रयागमें सत्यत्रतमें तत्पर
रहनेवाले महातेजस्वी महाभाग महात्मा मुनियोंने एक
विशाल ज्ञानयज्ञका आयोजन किया॥ १-२॥
उस ज्ञानयज्ञका समाचार सुनकर पौराणिकशिरोमणि
व्यासशिष्य महामुनि सूतजी वहाँ मुनियोंका दर्शन
करनेके लिये आये॥ ३॥
सूतजीको आते देखकर वे सब मुनि उस समय
हर्षसे खिल उठे और अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे उन्होंने
उनका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया॥ ४॥
तत्पश्चात् उन प्रसन महात्माओंने उनकी विधिवत्
स्तुति करके विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उनसे इस
प्रकार कहा--॥ ५॥
हे सर्वज्ञ विद्वान् रोमहर्षणजी ! आपका भाग्य बड़ा
भारी है,-इसीसे आपने व्यासजीसे यथार्थरूपमें सम्पूर्ण
पुराण-विद्या प्राप्त की, इसलिये आप आश्चर्यस्वरूप
कथाओंके भण्डार हैं--ठीक उसी तरह, जैसे रत्नाकर
समुद्र बड़े-बड़े सारभूत रत्नोंका आगार है ॥ ६-७॥
४६
श्रीशिवमरहापुराण
[अ० १
Tr
यच्च भूतं च भव्यं च यच्चान्यद्वस्तु वर्तते।
ज त्वयाविदितं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते॥ ८
त्वं मद्दिष्टवशादस्य दर्शनार्थमिहागतः।
कुर्वन् किमपि नः श्रेयो न वृथागन्तुम्हसि॥ ९
तत्त्वं श्रुतं स्म नः सर्व पूर्वमेव शुभाशुभम्।
न तृप्तिमधिगच्छामः श्रवणेच्छा मुहुर्मुहुः ॥ १०
इदानीमेकमेवास्ति श्रोतव्यं सूत सन्मते।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेऽनुग्रहो भवेत्॥ ११
प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्यविवर्जिताः।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः॥ १२
परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १३
देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः।
मातृपितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिङ्कराः॥ १४
विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः॥ १५
त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः।
त्रिकालसन्ध्यया हीना ब्रह्मबोधविवर्जिताः॥ १६
अदयाः पण्डितंमन्याः स्वाचारव्रतलोपकाः।
कृष्युद्यमरताः क्रूरस्वभावा मलिनाशयाः ॥ १७
क्षत्रियाश्च तथा सर्वे स्वधर्मत्यागशीलिनः।
असत्सङ्गाः पापरता व्यभिचारपरायणाः॥ १८
अशूरा अरणप्रीताः पलायनपरायणाः।
कुचौरवृत्तयः शूद्राः कामकिङ्करचेतसः॥ १९
अल्ला)
तीनों लोकोंमें भूत, वर्तमान और भविष्यकी जे
बात है तथा अन्य भी जो कोई वस्तु है, वह आपके
अज्ञात नहीं है॥८॥
आप हमारे सौभाग्यसे इस यज्ञका दर्शन करनेळे
लिये यहाँ आ गये हैं और इसी व्याजसे हमारा कुछ
कल्याण करनेवाले हैं; क्योंकि आपका आगम]
निरर्थक नहीं हो सकता॥ ९॥
हमने पहले भी आपसे शुंभाशुभ-तत्त्वका पूर.
पूरा वर्णन सुना है, किंतु उससे तृप्ति नहीं होती, हमें
उसे सुननेकी बार-बार इच्छा होती है॥ १०॥
उत्तम बुद्धिवाले हे सूतजी! इस समय हमें एक
ही बात सुननी है; यदि आपका अनुग्रह हो तो गोपनीय
होनेपर भी आप उस विषयका वर्णन करें॥ ११॥
घोर कलियुग आनेपर मनुष्य पुण्यकर्मसे दूर रहेंगे,
दुराचारमें फँस जायेगे, सब-के-सब सत्यभाषणसे विमु
हो जायंगे, दूसरोंकी निन्दामें तत्पर होंगे । पराये धनको
हड़प लेनेकी इच्छा करेंगे, उनका मन परायौ
स्त्रियोमें आसक्त होगा तथा वे दूसरे प्राणियोंकी हिंसा
किया करेंगे। वे अपने शरीरको ही आत्मा समझेंगे।
वे मूढ़, नास्तिक तथा पशु-बुद्धि रखनेवाले होंगे, माता.
पितासे द्वेष रखेंगे तथा वे कामवश स्त्रियोंकी सेवागे
लगे रहेंगे॥ १२-१४॥
ब्राह्मण लोभरूपी ग्रहके ग्रास बन जायँगे, वेद
बेचकर जीविका चलायेंगे, धनका उपार्जन करनेकें
लिये ही विद्याका अभ्यास करेंगे, मदसे मोहित रहेंगे,
अपनी जातिके कर्म छोड़ देंगे, प्रायः दूसरोंको ठगेंगे
तीनों कालकी सन्ध्योपासनासे दूर रहेंगे और ब्रह्मज्ञा
शून्य होंगे। दयाहीन, अपनेको पण्डित माननेवाले,
अपने सदाचार-ब्रतसे रहित, कृषिकार्यमें तत्पर, कू
स्वभाववाले एवं दूषित विचारवाले होंगे ॥ १५-१५
समस्त क्षत्रिय भी अपने धर्मका त्याग करनेवाले
कुसंगी, पापी और व्यभिचारी होंगे॥ १८॥
उनमें शौर्यका अभाव होगा, वे युद्धसे विरत
रणमें प्रीति न होनेसे भागनेवाले होंगे । वे कुत्सित चौर्य
कर्मसे जीविका चलायेंगे, शूद्रोके समान बरताव क
और उनका चित्त कामका किंकर बना रहेगा ॥ १९॥
आ० १]
शस्त्रास्त्रविद्यया हीना धेनुविप्रावनोज्झिता: ।
शरण्यावनहीनाश्च कामिन्यूतिमृगा: सदा॥ २०
प्रजापालनसद्धर्मविहीना भोगतत्परा: ।
प्रजासंहारका दुष्टा जीवहिंसाकरा मुदा॥ २१
वैश्याः संस्कारहीनास्ते स्वधर्मत्यागशीलिनः।
कुपथाः स्तार्जनरतास्तुलाकर्मकुवृत्तयः॥ २२
गुरुदेवद्विजातीनां भक्तिहीनाः कुबुद्धयः।
अभोजितद्विजाः प्रायः कृपणा बद्धमुष्टयः॥ २३
कामिनीजारभावेषु सुरता मलिनाशयाः।
लोभमोहविचेतस्काः पूर्तादिषु वृषोज्झिता: ॥ २४
तदवच्छूद्राश्च ये केचिद् ब्राह्मणाचारतत्पराः।
उज्ज्वलाकृतयो मूढाः स्वधर्मत्यागशीलिनः॥ २५
कर्तारस्तपसां भूयो द्विजतेजोऽपहारकाः।
शिश्चल्पमृत्युकाराश्च मन्त्रोच्यारपरायणाः॥ २६
शालग्रामशिलादीनां पूजका होमतत्पराः।
प्रतिकूलविचाराश्च कुटिला द्विजदूषकाः॥ २७
धनवन्तः कुकर्माणो विद्यावन्तो विवादिनः।
आख्यानोपासनाधर्मवक्तारो धर्मलोपकाः॥ २८
सुभूपाकृतयो दम्भाः सुदातारो महामदाः।
विप्रादीन् सेवकान् मत्वा मन्यमाना निजं प्रभुम्॥ २९
स्वधर्मरहिता मूढाः सङ्कराः क्रूरबुद्धयः।
'महाभिमानिनो नित्यं चतुर्वर्णविलोपकाः॥ ३०
विद्येश्वरसंहिता
x9
वे शस्त्रास्त्रविद्याको नहीं जाननेवाले, गौ और
ब्राह्मणकी रक्षा न करनेवाले, शरणागतकी रक्षा न करनेवाले
तथा सदा कामिनीको खोजनेमें तत्पर रहेंगे॥ २०॥
प्रजापालनरूपी सदाचारसे रहित, भोगमें तत्पर,
प्रजाका संहार करनेवाले, दुष्ट और प्रसन्नतापूर्वक
जीवहिंसा करनेवाले होंगे॥ २१॥
वैश्य संस्कार-भ्रष्ट, स्वधर्मत्यागी, कुमार्गी,
धनोपार्जनपरायण तथा नाप-तौलमें अपनी कुत्सित
वृत्तिका परिचय देनेवाले होंगे॥ २२॥
वे गुरु, देवता और द्विजातियोंके प्रति भक्तिशून्य,
कुत्सित बुद्धिवाले, द्विजोंको भोजन न करानेवाले,
प्रायः कृपणताके कारण मुट्ठी बाँधकर रखनेवाले,
परायी स्त्रियोंके साथ कामरत, मलिन विचारवाले,
लोभ और मोहसे भ्रमित चित्तवाले और वापी-कूप-
तड़ाग आदिके निर्माण तथा यज्ञादि सत्कर्मोमें धर्मका
त्याग करनेवाले होंगे॥ २३-२४॥
इसी तरह कुछ शूद्र ब्राह्मणोंके आचारमें तत्पर
होंगे, उनकी आकृति उज्वल होगी अर्थात् वे अपना
कर्म-धर्म छोड़कर उज्वल वेश-भूषासे विभूषित हो
व्यर्थ घूमेंगे, वे मूढ़ होंगे और स्वभावतः ही अपने
धर्मका त्याग करनेवाले होंगे॥ २५॥
वे भाँति-भाँतिके तप करनेवाले होंगे, द्विजोंको
अपमानित करेंगे, छोटे बच्चोंकी अल्पमृत्यु होनेके
लिये आभिचारिक कर्म करेंगे, मन्त्रोंके उच्चारण
करनेमें तत्पर रहेंगे, शालग्रामकी मूर्ति आदि पूजेगे,
होम करेंगे, किसी-न-किसीके प्रतिकूल विचार सदा
करते रहेंगे, कुटिल स्वभाववाले होंगे और द्विजोंसे
द्वेष-भाव रखने वाले होंगे॥ २६-२७॥
वे यदि धनी हुए तो कुकर्ममें लग जायँगे, यदि विद्वान्
हुए तो विवाद करनेवाले होंगे, कथा और उपासनाधमोके
वक्ता होंगे और धर्मका लोप करनेवाले होंगे ॥ २८॥
वे सुन्दर राजाओंके समान वेष-भूषा धारण करनेवाले,
दम्भी, दानमानी, अतिशय अभिमानी, विप्र आदिको अपना
सेवक मानकर अपनेको स्वामी माननेवाले होंगे, वे अपने
धर्मसे शून्य, मूढ वर्णसंकर, क्रूरबुद्धिवाले, महाभिमानी और
सदा चारों वर्णेके धर्मका लोप करनेवाले होंगे॥ २९-३०॥
४८
सुकुलीनान्निजान् मत्वा चत्ुर्वणैर्विवर्तना:।
सर्ववर्णभ्रष्टकराः मूढाः सत्कर्मकारिण:॥ ३१
स्त्रियश्च प्रायशो भ्रष्टा भर्त्रवज्ञानकारिका:।
श्वशुरद्रोहकारिण्यो निर्भया मलिनाशनाः॥ ३२
कुहावभावनिरताः कुशीलाः स्मरविह्ृलाः।
जारसङ्गरता नित्यं स्वस्वामिविमुखास्तथा॥ ३३
तनया मातृपित्रोश्च भक्तिहीना दुराशयाः।
अविद्यापाठका नित्यं रोगग्रसितदेहकाः॥ ३४
एतेषां नष्टबुद्धीनां स्वधर्मत्यागशीलिनाम्।
परलोकेऽपीह लोके कथं सूत गतिर्भवेत्॥ ३५
इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते सततं हि नः।
परोपकारसदृशो नास्ति धर्मोऽपरः खलु॥ ३६
लघूपायेन येनैषां भवेत् सद्योऽघनाशनम्।
सर्वसिद्धान्तवित्त्वं हि कृपया तद्वदाधुना ॥ ३७
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्।
मनसा शङ्कर स्मृत्वा सूतः प्रोवाच तान् मुनीन्॥ ३८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २
वे अपनेको श्रेष्ठ कुलवाला मानकर चां
वर्णोंसे विपरीत व्यवहार करनेवाले, सभी
भ्रष्ट करनेवाले, मूढ़ और [अनुचित रूपसे] सत्कः
करनेमें तत्पर होंगे॥ ३१॥
कलियुगकी स्त्रियाँ प्रायः सदाचारसे भ्रष्ट होंगी,
पतिका अपमान करनेवाली होंगी, सास-ससुरसे द्रोह
करेंगी। किसीसे भय नहीं मानेंगी और मलिन भोज)
करेंगी॥ ३२॥
वे कुत्सित हाव-भावमें तत्पर होंगी, उनका
शील-स्वभाव बहुत बुरा होगा। वे काम-विहल
'परपतिसे रति करनेवाली और अपने पतिकी सेवासे
सदा विमुख रहेंगी॥ ३३॥
सन्तानें माता-पिताके प्रति श्रद्धारहित, दुष्ट
स्वभाववाली, असत् विद्या पढ़नेवाली और सद
रोगग्रस्त शरीरवाली होंगी॥ ३४॥
हे सूतजी! इस तरह जिनकी बुद्धि नष्ट हो गयौ
है और जिन्होंने अपने धर्मका त्याग कर दिया है, ऐसे
लोगोंको इहलोक और परलोकमें उत्तम गति कैसे
प्राप्त होगी ?॥ ३५॥
इसी चिन्तासे हमारा मन सदा व्याकुल रहता है;
परोपकारके समान दूसरा कोई धर्म नहीँ है, अत:
जिस छोटे उपायसे इन सबके पापोंका तत्काल नाश
हो जाय, उसे इस समय कृपापूर्वक बताइये; क्योंकि
आप समस्त सिद्धान्तोंके ज्ञाता हैं ॥ ३६-३७॥
व्यासजी बोले--उन भावितात्मा मुनियोंकी य
बात सुनकर सूतजी मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मर
करके उन मुनियोंसे इस प्रकार कहने लगे-- ॥ ३८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्योश्वरसंहितायां मुनिप्रश्ववर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुदयणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें मुनियोंके प्रश््नका वर्णन नामक पहला अध्याय पूर्णहुआ॥ (/
अथ द्वितीयोऽध्यायः
शिवपुराणका माहात्म्य एवं परिचय
सूत उवाच
साधु पृष्टं साधवो चस्त्रैलोक्यहितकारकम्।
गुरु स्मृत्वा भवत्स्नेहाद्वक्ष्ये तच्छृणुतादरात्॥ १
सूतजी बोले-हे साधु-महात्माओ! आप i
तीनों लोकोंका हित करनेवाली अच्छी बात पूछी है!
गुरुदेव व्यासजीका स्मरण करके आपलोगोंके स्नेहवर्श
विषयका वर्णन करूँगा, आपलोग आदरपूर्वक सुनें ॥ *
.
अ० २]
वेदान्तसारसर्वस्व॑ पुराणं
चैवमुत्तमम्।
सर्वाधौघोद्धारकरं परत्र
परमार्थदम्॥ २
कलिकल्मषविध्वंसि यस्मिञ्छिवयशः परम्।
विजृम्भते सदा विप्रशचतुर्वर्गफलप्रदम्॥ ३
तस्याध्ययनमात्रेण पुराणस्य द्विजोत्तमाः।
सर्वोत्तमस्य शैवस्य ते यास्यन्ति सुसद्रतिम्॥ ४
तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरस्सरम्।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ ५
तावत्कलिमहोत्पाताः सञ्जरिष्यन्ति निर्भयाः।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ ६
तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम्।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ ७
तावत्स्वरूपं दुर्बोधं शिवस्य महतामपि।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ ८
तावद्यमभटाः क्रूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ ९
तावत्सर्वपुराणानि प्रगर्जन्ति महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥ १०
विद्येश्वरसंहिता
४९
सबसे उत्तम जो शिवपुराण है, वह वेदान्तका सार-
सर्वस्व है तथा वक्ता और श्रोताका समस्त पापराशियोंसे
उद्धार करनेवाला है; [इतना ही नहीं] वह परलोकमें
परमार्थ वस्तुको देनेवाला है। कलिकी कल्मषराशिका
वह विनाशक है | उसमें भगवान् शिवके उत्तम यशका
वर्णन है हे ब्राह्मणो! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन
चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला वह पुराण सदा ही अपने
प्रभावसे विस्तारको प्राप्त हो रहा है॥ २-३॥
हे विप्रवरो! उस सर्वोत्तम शिवपुराणके
अध्ययनमात्रसे वे कलियुगके पापासक्त जीव श्रेष्ठतम
गतिको प्राप्त हो जायँगे॥ ४॥
अहो ! ब्रह्महत्या आदि महान् पाप तभीतक रहेंगे
अर्थात् अपने फलको देनेमें समर्थ होंगे, जबतक जगत्में
शिवपुराणका उदय नहीं होगा। [आशय यह है कि
शिवपुराण सुननेके बाद अन्तःकरण शिवभक्तिपरायण
होकर अतिशय स्वच्छ हो जायगा। अत: किसी भी
पापकर्ममें मानवको प्रवृत्ति ही नहीं होगी, तब ब्रह्महत्या
आदि भयंकर पाप न होनेके कारण उस पापके फल-
भोगकी सम्भावना ही नहीं है] ॥ ५॥
कलियुगके महान् उत्पात तभीतक निर्भय होकर
विचरेंगे, जबतक यहाँ जगत्में शिवपुराणका उदय
नहीं होगा॥ ६॥
सभी शास्त्र परस्पर तभीतक विवाद करेंगे,
जबतक जगत्में शिवपुराणका उदय नहीँ होगा [अर्थात्
शिवपुराणके आ जानेपर किसी प्रकारका विवाद ही
नहीं रह जायगा। सभी प्रकारसे भुक्ति-मुक्तिप्रदाता
यही रहेगा] ॥७॥
अहो! महान् व्यक्तियोंक लिये भी तभीतक
शिवका स्वरूप दुर्बोध्य रहेगा, जबतक इस जगतूमें
शिवपुराणका उदय नहीं होगा॥८॥
अहो! क्रूर यमदूत तभीतक निर्भय होकर
पृथ्वीपर घूमेंगे, जबतक जगत्में शिवपुराणका उदय
नहीं होगा॥ ९॥
सभी पुराण पृथिवीपर गर्जन तभीतक करेंगे,
जबतक शिवपुराणका जगतूमें उदय नहीं होगा॥ १०॥
५०
तावत्सर्वाणि तीर्थानि विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति जगत्यहो॥
तावत्सर्वे मुदा मन्त्रा विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले॥ १२
तावत्सर्वाणि क्षेत्राणि विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले॥ १३
तावत्सर्वाणि पीठानि विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यत्ति महीतले॥ १४
तावत्सर्वाणि दानानि विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले॥ १५
तावत्सर्वे च ते देवा विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले॥ १६
तावत्सर्वे च सिद्धान्ता विवदन्ते महीतले।
यावच्छिवपुराणं हि नोदेष्यति महीतले॥ १७
अस्य शैवपुराणस्य कीर्तनश्रवणाद् द्विजाः।
फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्येन मुनिसत्तमाः ॥ १८
तथापि तस्य माहात्यं वक्ष्ये किज्जित्तु वोऽनघाः।
चित्तमाधाय श्रृणुत व्यासेनोक्तं पुरा मम॥ १९
एतच्छिवपुराणं हि श्लोकं श्लोकार्धमेव च।
यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापानमुच्यते क्षणात्॥ २०
एतच्छिवपुराणं हि यः प्रत्यहमतन्द्रित: ।
यथाशक्ति पठेद् भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते॥ २१
एतच्छिवपुराणं हि यो भ्त्यार्चयते सदा।
दिने दिनेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्॥ २२
श्रीशिवमहापुराण
[अ २
इस पृथिवीपर तीर्थोका विवाद तभीतक रहेगा
जबतक इस जगत्में शिवपुराणका उदय नहीं होगा।
[आशय यह है कि मुक्ति-प्राप्त्यर्थ एवं पापके नाशके
लिये मानव विभिन्न तीर्थोंका सेवन करेंगे, किंतु
शिवपुराणके आनेके बाद सभी लोग सभी पापोंके
नाशके लिये शिवपुराणका ही सेवन करेंगे] । सभी मन्त्र
पृथ्वीपर तभीतक आनन्दपूर्वक विवाद करेंगे, जबतक
पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा॥ ११-१२॥
सभी क्षेत्र तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे,
जबतक पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा॥ १३॥
सभी पीठ तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे,
जबतक पृथ्वीपर शिवपुराणका उदय नहीं होगा॥ १४॥
सभी दान पृथ्वीपर तभीतक विवाद करेंगे,
जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा॥ १५॥
सभी देवगण तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे,
जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा॥ १६॥
सभी सिद्धान्त तभीतक पृथ्वीपर विवाद करेंगे,
जबतक शिवपुराणका पृथ्वीपर उदय नहीं होगा॥ १७॥
हे विप्रो! हे श्रेष्ठ मुनिगण ! इस शिवपुराणके कीर्तन
करने और सुननेसे जो-जो फल होते हैं, उन फलोंको मैं
सम्पूर्ण रूपसे नहीं कह सकता हूँ, [ अर्थात् शब्दोंके द्वारा
इसके सभी फलोंको नहीं कहा जा सकता है] ॥ १८॥
हे निष्पाप मुनिगण! तथापि शिवपुराणका कुछ
माहात्म्य आप लोगोंसे कहता हूँ, जो व्यासजीने पहले
मुझसे कहा था, आपलोग चित्त लगाकर ध्यानपूर्वक
सुनें॥ १९॥
जो भक्तिपूर्वक इस शिवपुराणका एक श्लोक
या आधा श्लोक भी पढ़ता है, वह उसी क्षण
पापसे छुटकारा पा जाता है॥ २०॥
जो आलस्यरहित होकर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक
इस शिवपुराणका यथाशक्ति पाठ करता है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ २१॥
जो इस शिवपुराणकी सदा पूजा करता है,
वह निःसन्देह प्रतिदिन अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त
करता है॥ २२॥
अ० २]
विद्येश्वरसंहिता
५१
एतच्छिवपुराणं यः साधारणपदेच्छया।
अन्यतः शृणुयात् सोऽपि मत्तो मुच्येत पातकात्॥ २३
एतच्छिवपुराणं यो नमस्कुर्याददूरतः ।
सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः॥ २४
एतच्छिवपुराणं वै लिखित्वा पुस्तकं स्वयम्।
यो दद्याच्छिवभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २५
अधीतेषु च शास्त्रेषु वेदेषु व्याकृतेषु च।
यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत्॥ २६
एतच्छिवपुराणं हि चत्ुर्दश्यामुपोषित:।
शिवभक्तसभायां यो व्याकरोति स उत्तमः॥ २७
प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं लभेत्।
इह भुवत्वाखिलान् कामानन्ते निर्वाणतां व्रजेत्॥ २८
उपोषितश्चतुर्दश्यां रात्रौ जागरणान्वितः।
यः पठेच्छणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम्॥ २९
कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकशः ।
आत्मतुल्यधनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे॥ ३०
विप्रेभ्यो व्यासमुख्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते।
तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः॥ ३१
एतच्छिवपुराणं हि गायते योऽप्यहर्निशम्।
आज्ञां तस्य प्रतीक्षेरन् देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ३२
एतच्छिवपुराणं यः पठञ्छृण्वन् हि नित्यशः।
यद्यत् करोति सत्कर्म तत्कोटिगुणितं भवेत्॥ ३३
समाहितः पठेद्यस्तु तत्र श्रीरुद्रसंहिताम्।
स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत्॥ ३४
तां रुद्रसंहितां यस्तु भैरवप्रतिमान्तिके।
त्रि: पठेत्परत्यहं मौनी स कामानखिलाँल्लभेत्॥ ३५
जो व्यक्ति साधारण पदकी प्राप्तिकी इच्छासे
इस शिवपुराणको मुझसे अथवा अन्य किसीसे सुनता
है, वह भी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ २३॥
जो इस शिवपुराणको समीपसे प्रणाम करता है,
चह सभी देवोंकी पूजाका फल प्राप्त करता है; इसमें
संशय नहीं है॥ २४॥
जो इस शिवपुराणको स्वयं लिखकर शिवभक्तोंको
दान करता है, उसके पुण्यफलको सुनें॥ २५॥
शास्त्रोंका अध्ययन करने और वेदोंका पाठ
करनेसे जो दुर्लभ फल प्राप्त होता है, वह फल
उसको प्राप्त होता है॥ २६॥
जो चतुर्दशी तिथिके दिन उपवास करके इस
शिवपुराणका शिवभक्तोंके समाजमें पाठ करता है--
वह श्रेष्ठ पुरुष है। वह व्यक्ति शिवपुराणके प्रत्येक
अक्षरकी संख्याके अनुरूप गायत्रीके पुरश्चरणका फल
प्राप्त करता है और इस लोकमें सभी अभीष्ट सुखोंको
भोगकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है॥ २७-२८॥
जो चतुर्दशीकी रातमें उपवासपूर्वक जागरण
करके शिवपुराणका पाठ करता है या इसे सुनता है,
उसका पुण्य-फल मैं कहता हूँ॥ २९॥
कुरुक्षेत्र आदि सभी तीर्थोमें, पूर्ण सूर्यग्रहणमें
अपनी शक्तिके अनुसार विप्रोंको और मुख्य
कथावाचकोंको धन देनेसे जो फल प्राप्त होता है,
वही फल उस व्यक्तिको प्राप्त होता है, यह सत्य है,
सत्य है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ ३०-३१॥
जो व्यक्ति इस शिवपुराणका दिन-रात गान
करता है, इन्द्र आदि देवगण उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा
करते रहते हैं॥ ३२॥
इस शिवपुराणका पाठ करनेवाला और सुननेवाला
व्यक्ति जो-जो श्रेष्ठ कर्म करता है, वह कोटिगुना हो
जाता है [अर्थात् कोटिगुना फल देता है] ॥ ३३॥
जो भलीभाँति ध्यानपूर्वक उसमें भी श्रीरद्रसंहिताका
पाठ करता है, वह यदि ब्रह्मघाती भी हो तो तीन
दिनोंमें पवित्रात्मा हो जाता है॥ ३४॥
जो भैरवकी मूर्तिक पास मौन धारणकर
श्रीरुद्रसंहिताका प्रतिदिन तीन बार पाठ करता है, वह
सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ३५॥
श्रीशिवमहापुराण
[अ० रे
५२
©) UD HE EE क.
तां रुद्रसंहितां यस्तु सम्पठेद् वटबिल्वयोः।
प्रदक्षिणां प्रकुर्वाणो ब्रह्महत्या निवर्तते॥
कैलाससंहिता तत्र ततोऽपि परमा स्मृता।
ब्रह्मस्वरूपिणी साक्षात् प्रणवार्थप्रकाशिका॥ ३७
कैलाससंहितायास्तु माहात्म्यं वेत्ति शङ्करः।
कृत्स्नं तदर्धं व्यासश्च तदर्धं वेद्म्यहं द्विजा:॥ ३८
तत्र किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते।
यज्ज्ञात्वा तत्क्षणाल्लोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्॥ ३९
न नाशयति यत्पापं सा रौद्री संहिता द्विजाः।
तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥ ४०
शिवेनोपनिषत्सिन्धुमन्थनोत्पादितां मुदा।
कुमारायार्पितां तां वै सुधां पीत्वामरो भवेत्॥ ४९
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं कर्तुमुद्यतः ।
मासमात्रं संहितां तां पठित्वा मुच्यते ततः॥ ४२
दुषप्तिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।
पापं सकृत् कीर्तनेन संहिता सा विनाशयेत्॥ ४३
शिवालये बिल्ववने संहितां तां पठेत् तु यः।
स यत्फलमवाप्नोति तद्वाचोऽपि न गोचरे॥ ४४
संहितां तं पठन् भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद् द्विजान्।
तस्य ये पितरः सर्वे यान्ति शम्भोः परं पदम्॥ ४५
चतुर्दश्यां निराहारो यः पठेत्संहितां च ताम्।
बिल्वमूले शिवः साक्षात् स देवैश्च प्रपूज्यते ॥ ४६
अप्यन्याः संहितास्तत्र सर्वकामफलप्रदाः
उभे विशिष्टे विज्ञेये लीलाविज्ञानपूरिते॥ ४७
- | अल त ८...
जो व्यक्ति वट और बिल्ववृक्षकी प्रदक्षिणा
करते हुए उस रुद्रसंहिताका पाठ करता है, वह
ब्रह्महत्याके दोषसे भी छुटकारा पा जाता है॥ ३६॥
प्रणवके अर्थको प्रकाशित करनेवाली ब्रह्मरूपिणी
साक्षात् कैलाससंहिता रुद्रसंहितासे भी श्रेष्ठ कही
गयी है॥ ३७॥
हे द्विजो! कैलाससंहिताका सम्पूर्ण माहात्म्य तो
शंकरजी ही जानते हैं, उससे आधा माहात्म्य व्यासजी
जानते हैं और उसका भी आधा मैं जानता हूँ॥ ३८॥
उसके सम्पूर्ण माहात्म्यका वर्णन तो मैं नहीं कर
सकता, कुछ ही अंश कहूँगा, जिसको जानकर उसी
क्षण चित्तकी शुद्धि प्राप्त हो जायगी॥ ३९॥
हे द्विजो! लोकमें ढूँढ़नेपर भी मैंने ऐसे किसी पापको
नहीं देखा, जिसे वह रुद्रसंहिता नष्ट न कर सके॥ ४०॥
उपनिषद्रूपी सागरका मन्थन करके शिवने
आनन्दपूर्वक इस रुद्रसंहितारूपी अमृतको उत्पन्न
किया और कुमार कार्तिकेयको समर्पित किया; जिसे
पीकर मानव अमर हो जाता है॥ ४१॥
ब्रह्महत्या आदि पापोंकी निष्कृति करनेके लिये
तत्पर मनुष्य महीनेभर रुद्रसंहिताका पाठ करके उन
पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४२॥
दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य, दुरालापसे जो पाप होता है;
वह इस रौद्रीसंहिताका एक बार कीर्तन करनेसे नष्ट
हो जाता है॥ ४३॥
जो व्यक्ति शिवालयमें अथवा बेलके वनमें इस
संहिताका पाठ करता है, वह उससे जो फल प्राप्त करता
है, उसका वर्णन वाणीसे नहीं किया जा सकता ॥ ४४॥
जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस संहिताका पाठ करते
हुए श्रद्धके समय ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसके
सभी पितर शम्भुके परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ४५॥
चतुर्दशीके दिन निराहार रहकर जो बेलकें
वृक्षके नीचे इस संहिताका पाठ करता है, वह साक्षात
शिव होकर सभी देवोंसे पूजित होता है॥ ४६॥
उसमें अन्य संहिताएँ सभी कामनाओंके फलको
पूर्ण करनेवाली हैं, किंतु लीला और विज्ञानसे परिपूर्ण
इन दोनों संहिताओंको विशिष्ट समझना चाहिये ॥ ४४॥
अ० २]
तदिदं शेवमाख्यातं पुराणं वेदसम्मितम्।
निर्मितं तच्छिवेनैव प्रथमं ब्रह्मसम्मितम्॥ ४८
विद्येशं च तथा रौद्रं वैनायकमथौमिकम्।
मात्रं रुद्रैकादशकं कैलासं शतरुद्रकम्॥ ४९
कोटिरुद्रसहस्त्राद्यं कोटिरुद्रं तथैव च।
वायवीयं धर्मसंज्ञं पुराणमिति भेदतः॥ ५०
संहिता द्वादशमिता महापुण्यतरा मता: ।
तासां सङ्ख्यां बरुवे विप्राः शृणुताद्रतोऽखिलम्॥ ५९
विद्येशं दशसाहस्त्रं रुद्रं वैनायकं तथा।
औमं मातृपुराणाख्यं प्रत्येकाष्टसहस्त्रकम्॥ ५२
त्रयोदशसहस्त्रं हि रुद्रैकादशकं द्विजाः।
षट्सहस्त्रं च कैलासं शतरुद्रं तदर्धकम्॥ ५३
कोटिरुद्रं त्रिगुणितमेकादशसहस्त्रकम्।
सहस्त्रकोटिरुद्राख्यमुदितं ग्रन्थसङ्ख्यया॥ ५४
वायवीयं खाब्धिशतं धर्म रविसहस्त्रकम्।
तदेवं लक्षसङ्ख्याकं शैवं सङ्ख्याविभेदतः॥ ५५
व्यासेन तत्तु सङ्क्षिप्तं चतुर्विशत्सहस्तरकम्।
शैवं तत्र चतुर्थं वै पुराणं सप्तसंहितम्॥ ५६
शिवेन कल्पितं पूर्व पुराणं ग्रन्थसङ्ख्यया।
शतकोटिप्रमाणं हि पुरा सृष्टौ सुविस्तृतम्॥ ५७
व्यस्तेऽष्टादशधा चैव पुराणे द्वापरादिषु।
चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते कृते द्वैपायनादिभिः॥ ५८
प्रोक्तं शिवपुराणं हि चतुर्विशत्सहस्त्रकम्।
श्लोकानां सङ्ख्यया सप्तसंहितं ब्रह्मसम्मितम्॥
विद्येश्वरसंहिता
५३
इस शिवपुराणको वेदके तुल्य माना गया है।
इस वेदकल्प पुराणका सबसे पहले भगवान् शिवने ही
प्रणयन किया था॥ ४८॥
विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता,
उमासंहिता, मातृसंहिता, एकादशरुद्रसंहिता,
कैलाससंहिता, शतरुद्रसंहिता, कोटिरुद्रसंहिता,
सहस्रकोटिरद्रसंहिता, वायवीयसंहिता तथा धर्मसंहिता
इस प्रकार इस पुराणके बारह भेद हैं ॥ ४९-५०॥
ये बारहों संहिताएँ अत्यन्त पुण्यमयी मानी गयी
हैं। ब्राह्मणो! अब मैं उनके श्लोकोंकी संख्या बता
रहा हूँ। आपलोग वह सब आदरपूर्वक सुनें।
विद्येशवरसंहितामें दस हजार श्लोक हैं। रुद्रसंहिता,
विनायकसंहिता, उमासंहिता और मातृसंहिता-इनमेंसे
प्रत्येकमें आठ-आठ हजार श्लोक हैं॥५१-५२॥
हे ब्राह्मणो! एकादशरुद्रसंहितामें तेरह हजार,
कैलाससंहितामें छ: हजार, शतरद्रसंहितामें तीन हजार,
कोटिरद्रसंहितामें नौ हजार, सहस्रकोटिस्ट्रसंहितामें ग्यारह
हजार, वायवीयसंहितामें चार हजार तथा धर्मसंहितामें
बारह हजार श्लोक हैं । इस प्रकार संख्याके अनुसार मूल
शिवपुराणकी श्लोकसंख्या एक लाख है ॥ ५३--५५॥
परंतु व्यासजीने उसे चौबीस हजार श्लोकोंमें
संक्षिप्त कर दिया है । पुराणोंकी क्रमसंख्याके विचारसे
इस शिबपुराणका स्थान चौथा है; इसमें सात संहिताएँ.
हैं॥ ५६॥
पूर्वकालमें भगवान् शिवने श्लोकसंख्याकी दृष्टिसे
सौ करोड़ श्लोकोंका एक ही पुराणग्रन्थ बनाया था |
सृष्टिके आदिमें निर्मित हुआ वह पुराणसाहित्य
अत्यन्त विस्तृत था॥ ५७॥
तत्पश्चात् द्वापर आदि युगोंमें दवैपायन व्यास आदि
महर्षियोंने जब पुराणका अठारह भागोंमें विभाजन
कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणोंका संक्षिप्त
स्वरूप केवल चार लाख श्लोकोंका रह गया ॥ ५८॥
श्लोकसंख्याके अनुसार यह शिवपुराण चौबीस
हजार श्लोकोंवाला कहा गया है। यह वेदतुल्य पुराण
सात संहिताओंमें विभाजित है॥ ५९॥
५
श्रीशिवमहापुराण
[ अ २
विद्येश्वराख्या तत्राद्या रौद्री ज्ञेया द्वितीयिका।
तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिका
पञ्चमी चैवमौम्याख्या षष्ठी कैलाससंज्ञिका।
सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता मता: ॥ ६१
ससप्तसंहितं दिव्यं पुराणं शिवसंज्ञकम्।
वरीवर्ति ब्रह्मतुल्यं सर्वोपरिगतिप्रदम्॥ ६२
एतच्छिवपुराणं हि सप्तसंहितमादरात्।
परिपूर्ण पठेद्यस्तु स जीवन्मुक्त उच्यते॥ ६३
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च।
एतच्छिवपुराणस्य नाईन्त्यल्पां कलामपि॥ ६४
शैवं पुराणममलं शिवकीर्तितं तद्
व्यासेन शैवप्रवणेन च सङ्गृहीतम्।
सङ्क्षेपतः सकलजीवगुणोपकारं
तापत्रयघ्नमतुलं शिवदं सतां हि॥ ६५
विकैतवो धर्म इह प्रगीतो
` देदान्तविज्ञानमयः
अमत्सरान्तर्बुधवेद्यवस्तु
सत्क्लूप्तमत्रौत्रिवर्गयुक्तम्
प्रधान: ।
॥६६
शैवं पुराणतिलकं खलु सत्पुराणं
यो वै पठेच्च शृणुयात् परमादरेण
शम्भुप्रियः स हि लभेत् परमां गतिं वै॥ ६७
इसकी पहली संहिताका नाम
है, दूसरी रुद्रसंहिता समझनी चाहिये, तीसरीका नाम
शतरुद्रसंहिता, चौथीका कोरिरुद्रसंहिता, पाँचवींका
नाम उमासंहिंता, छठीका कैलाससंहिता और सातवींका
नाम वायवीयसंहिता है। इस प्रकार ये सात संहिताएँ
मानी गयी हैं॥ ६०-६१॥
इन सात संहिताओंसे युक्त दिव्य शिवपुराण
वेदके तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान
करनेवाला है॥ ६२॥
सात संहिताओंसे समन्वित इस सम्पूर्ण
शिवपुराणको जो आद्योपान्त आदरपूर्वक पढ़ता है,
वह जीवन्मुक्त कहा जाता है॥६३॥
वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास तथा सैकड़ों आगम
इस शिवपुराणको अल्प कलाके समान भी नहीं
हैं ॥ ६४॥
यह निर्मल शिवपुराण भगवान् शिवके द्वारा
ही प्रतिपादित है। शैवशिरोमणि भगवान् व्यासे
इसे संक्षेपकर संकलित किया है। यह समस्त
जीवसमुदायके लिये उपकारक, त्रिविध तापोंका
नाशक, तुलनारहित एवं सत्पुरुषोंको कल्याण प्रदान
करनेवाला है॥ ६५॥
इसमें वेदान्त-विज्ञानमय, प्रधान तथा निष्कपट
धर्मका प्रतिपादन किया गया है। यह पुराण ईर्ष्यारहित
अन्तःकरणवाले विद्वानोंके लिये जाननेकी वस्तु. है,
इसमें श्रेष्ठ मन्त्रसमूहोंका संकलन है और यह धर्म,
अर्थ तथा कामसे समन्वित है अर्थात्-इस त्रिवर्गकी
प्राप्तिके साधनका भी इसमें वर्णन है॥ ६६॥
यह उत्तम शिवपुराण समस्त पुराणोंमें श्रेष्ठ है।
वेद-वेदानतमेंवेद्यरूपसे विलसित परम वस्तु-परमात्माका
इसमें गान किया गया है। जो बड़े आदरसे इसे पढ़ता
और सुनता है, वह भगवान् शिवका प्रिय होकर परम
गति प्राप्त कर लेता है॥ ६७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां युनिप्रशनोत्तरवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें मुनिप्रश्नोत्तर-वर्णण
नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
आ० ३]
विद्येश्वरसंहिता
५५
अथ तृतीयोऽध्यायः
साध्य-साधन आदिका विचार
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्यं वचः सौतं प्रोचुस्ते परमर्षयः।
वेदान्तसारसर्वस्वं पुराणं श्रावयाद्भुतम्॥ ९
इति श्रुत्वा मुनीनां स वचनं सुप्रहर्षितः।
संस्मरञ्छङ्करं सूतः प्रोवाच मुनिसत्तमान्॥ २
सूत उवाच
भृण्वन्तु ऋषयः सर्वे स्मृत्वा शिवमनामयम्।
पुराणप्रवणं शैवं पुराणं वेदसारजम्॥ ३
यत्र गीतं त्रिकं प्रीत्या भक्तिज्ञानविरागकम्॥ ४
वेदान्तवेद्यं सद्वस्तु विशेषेण प्रवर्णितम्॥ ५
शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे पुराणं वेदसारजम्।
पुरा कालेन महता कल्येऽतीते पुनः पुनः॥ ६
अस्मिन्नुपस्थिते कल्पे प्रवृत्ते सृष्टिकर्मणि।
मुनीनां षट्कुलीनानां ब्रुवतामितरेतरम्॥ ७
इदं परमिदं नेति विवादः सुमहानभूत्।
तेऽभिजग्मुर्विधातारं ब्रह्माणं प्रष्टुमव्ययम्॥ ८
वाग्भिर्विनयगर्भाभिः सर्वे प्राज्ञलयोऽब्रुवन्।
त्वं हि सर्वजगद्धाता सर्वकारणकारणम्॥ ९
कः पुमान् सर्वतत्त्वेभ्यः पुराणः परतः परः।
ब्रह्मोवाच
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह॥ १०
यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम्।
सह भूतेन्द्रियैः सवैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥ ११
एष देवो महादेवः सर्वज्ञो जगदीश्वरः।
अयं तु परया भक्त्या दृश्यते नान्यथा क्वचित्॥ १२
रुद्रो हरिर्हरश्चैव तथान्ये च सुरेश्चराः।
भक्त्या परमया तस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥ १३
व्यासजी बोले-सूतजीका यह वचन सुनकर
सब महर्षि बोले-अब आप हमें वेदान्तके सार-
सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराणको सुनाइये॥ १॥
मुनियोंका यह वचन सुनकर अतिशय प्रसन्न हो
वे सूतजी शंकरजीका स्मरण करते हुए उन श्रेष्ठ
मुनियोंसे कहने लगे॥ २॥
सूतजी बोले-आप सब महर्षिण रोग-
शोकसे रहित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण
करके वेदके सारतत्त्वसे प्रकट पुराणप्रवर शिवपुराणको
सुनिये। जिसमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य-इन तीनोंका
्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्य
सद्दस्तुका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है ॥ ३--५॥
हे ऋषिगण! अब आपलोग वेदके सारभूत
पुराणको सुनें । बहुत कालमें पुनः-पुनः पूर्वकल्प व्यतीत
होनेपर इस वर्तमान कल्पमें जब सृष्टिकर्म आरम्भ हुआ
था, उन दिनों छः कुलोंके महर्षि परस्पर वाद-विवाद
करते हुए कहने लगे--' अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है
और अमुक नहीं है।' उनके इस विवादने अत्यन्त महान्
रूप धारण कर लिया। तब वे सब-के-सब अपनी शंकाके
समाधानके लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजीके पास
गये और हाथ जोड़कर विनयभरी वाणीमें बोले-[हे
प्रभो !] आप सम्पूर्ण जगतका धारण-पोषण करनेवाले
हैं तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं; हम यह जानना
चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्त्वोंसे परे परात्पर पुराणपुरुष
कौन हैं ?॥ ६-९१/२॥
ब्रह्माजी बोले--जहाँसे मनसहित वाणी उन्हें न
पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और
इन्द्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् समस्त भूतों एवं
इन्द्रियोंक साथ पहले प्रकट हुआ है, वे ही ये देव, महादेव
सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण जगतूके स्वामी हैं। ये ही सबसे
उत्कृष्ट हैं। उत्तम भक्तिसे ही इनका साक्षात्कार होता
है, दूसरे किसी उपायसे कहीं इनका दर्शन नहीं होता।
रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्तिभावसे
उनका नित्य दर्शन करना चाहते हैं ॥ १०--१३॥
५६
्रीशिवमहापुराण
[अ० ३
१222222
बहुनात्र किमुक्तेन शिवे भक्त्या विमुच्यते।
प्रसादादेवताभक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः।
यथेहाङ्कुरतो बीजं बीजतो वा यथाङ्करः॥ १४
तस्मादीशप्रसादार्थं यूयं गत्वा भुवं द्विजाः।
दीर्घसत्रं समाकृध्वं यूयं वर्षसहसतरकम्॥ १५
अमुष्यैवाध्वरेशस्य शिवस्यैव प्रसादतः।
वेदोक्तविद्यासारं तु ज्ञायते साध्यसाधनम्॥ १६
मुनय ऊचुः
अथ किं परमं साध्यं किं वा तत्साधनं परम्।
साधकः कीदृशस्तत्र तदिदं ब्रूहि तत्त्वत: ॥ १७
ब्रह्मोवाच
साध्यं शिवपदप्राप्तिः साधनं तस्य सेवनम्।
साधकस्तत्प्रसादाद्यो नित्यादिफलनिस्पृहः॥ १८
कर्म कृत्वा तु वेदोक्तं तदर्पितमहाफलम्।
परमेशपदप्राप्तः सालोक्यादिक्रमात्ततः॥ १९
तत्तद्भक्त्यनुसारेण सर्वेषां परमं फलम्।
तत्साधनं बहुविधं साक्षादीशेन बोधितम्॥ २०
सङ्क्षिप्य तत्र वः सारं साधनं प्रब्रवीम्यहम्।
श्रोत्रेण श्रवणं तस्य वचसा कीर्तनं तथा॥ २१
मनसा मननं तस्य महासाधनमुच्यते।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च मन्तव्यश्च महेश्वरः॥ २२
इति श्रुतिः प्रमाणं नः साधनेनामुना परम्।
साध्यं व्रजत सर्वार्थसाधनैकपरायणाः॥ २३
प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्ट्वा तत्र लोकः प्रवर्तते।
अप्रत्यक्षं हि सर्वत्र ज्ञात्वा श्रोत्रेण चेष्टते॥ २४
अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, भगवान्
शिवमें भक्ति होनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो
जाता है। देवताओंके कृपाप्रसादसे ही उनमें भक्ति
होती है और भक्तिसे देवताका कृपाप्रसाद प्राप्त होता
है--ठीक उसी तरह, जैसे यहाँ अंकुरसे बीज और
बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है। इसलिये हे द्विजो!
आप लोग भगवान् शंकरका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके
लिये भूतलपर जाकर वहाँ सहस्र वर्षातक चलनेवाले
एक विशाल यज्ञका आयोजन करें॥ १४-१५॥
इन यज्ञपति भगवान् शिवकी ही कृपासे वेदोक्त
विद्याके सारभूत साध्य-साधनका ज्ञान होता है॥ १६॥
मुनिगण बोले-हे भगवन्! परम साध्य क्या
है और उसका परम साधन क्या है ? उसका साधक
कैसा होता है? ये सभी बातें यथार्थ रूपसे कहें ॥ १७॥
ब्रह्माजी बोले--शिवपदकी प्राप्ति ही साध्य
है, उनकी सेवा ही साधन है तथा उनके प्रसादसे जो
नित्य-नैमित्तिक आदि फलोंकी ओरसे निःस्पृह होता
है, वही साधक है॥ १८॥
वेदोक्त कर्मका अनुष्ठान करके उसके महान्
फलको भगवान् शिवके चरणोंमें समर्पित कर देना ही
परमेश्वरपदकी प्राप्ति है। वही सालोक्य आदिके
क्रमसे प्राप्त होनेवाली मुक्ति है॥ १९॥
उन-उन पुरुषोंकी भक्तिके अनुसार उन सबको
उत्कृष्ट फलकी प्राप्ति होती है। उस भक्तिके साधन
अनेक प्रकारके हैं, जिनका प्रतिपादन साक्षात् महेश्वरे
ही किया है॥ २०॥
उसे संक्षिप्त करके मैं सारभूत साधनको बता रहा
हूँ। कानसे भगवानूके नाम-गुण और लीलाओंका श्रवण,
वाणीद्वारा उनका कीर्तन तथा मनके द्वारा उनका मनन
इन तीनोंको महान् साधन कहा गया है। [तात्पर्य यह
कि] महेश्वरका श्रवण, कीर्तन और मनन करना चाहिये
यह श्रुतिका वाक्य हम सबके लिये प्रमाणभूत है।
मनोरथोंकी सिद्धिमें लगे हुए आपलोग इसी साधनसे पस
साध्यको प्रप्त हं । लोग प्रत्यक्ष वस्तुको नेतरसे दे खर्क
उसमें प्रवृत्त होते हैं; परंतु जिस वस्तुका कहीं भी प्रत्यक्ष
दर्शन नहीं होता, उसे श्रवणेन्द्रियद्वारा जान-सुनकर मरु
उसकी प्राप्तिके लिये चेष्टा करता है ॥ २१-२४॥
आ० ४]
तस्माच्छूवणमेवादौ श्रुत्वा गुरुमुखाद बुध:।
ततः संसाधयेदन्यत् कीर्तनं मननं सुधीः ॥ २५
क्रमान्मननपर्यन्ते साधनेऽस्मिन् सुसाधिते।
शिवयोगो भवेत्तेन सालोक्यादिक्रमाच्छनैः॥ २६
सर्वाङ्गव्याधयः पश्चात् सर्वानन्दश्च लीयते।
अभ्यासात् क्लेशमेतद् वै पश्चादाद्यन्तमङ्गलम्॥ २७
विद्येश्वरसंहिता
५७
अत: पहला साधन श्रवण ही है। उसके द्वारा
गुरुके मुखसे तत्त्वको सुनकर बुद्धिशाली विद्वान् पुरुष
अन्य साधन-कीर्तन एवं मननकी सिद्धि करे॥ २५॥
क्रमशः मननपर्यन्त इस साधनकी अच्छी तरह
साधना कर लेनेपर उसके द्वारा सालोक्य आदिके क्रमसे
धीरे-धीरे भगवान् शिवका संयोग प्राप्त होता है ॥ २६॥
पहले सारे अंगोंके रोग नष्ट हो जाते हैं।
तत्पश्चात् सब प्रकारका लौकिक आनन्द भी विलीन
हो जाता है। अभ्यासके ही समय यह साधन कष्टप्रद
है, किंतु बादमें निरन्तर मंगल देनेवाला है ॥ २७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्योशवरसंहितायां साध्यसाधनविचारं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येशवरसंहितामें साध्यसाथनविचार नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
— Soo
अथ चतुर्थोऽध्यायः
श्रवण, कीर्तन और मनन--इन तीन साधनोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
मुनय ऊचुः
मननं कीदृशं ब्रह्मञ्छूवणं चापि कीदूशम्।
कीर्तनं वा कथं तस्य कीर्तयैतद्य॒थायथम्॥ १
ब्रह्मोवाच
पूजाजपेशगुणरूपविलासनाम्नां
युक्तिप्रियेण मनसा परिशोधनं यत्।
तत्सन्ततं मननमीश्वरदृष्टिलभ्यं
सर्वेषु साधनवरेष्वपि मुख्यमुख्यम्॥ २
गीतात्मना श्रुतिपदेन च भाषया वा
।
बाचा स्फुटं तु रसवत् स्तवनं यदस्य
तत्कीर्तनं भवति साधनमत्र मध्यम्॥ ३
येनापि केन करणेन च शब्दपुञ्
यत्र क्वचिच्छिवपरं श्रवणेन्द्रियेण।
स्त्रीकेलिवद् दूढतरं प्रणिधीयते यत्
तद्वै बुधाः श्रवणमत्र जगत्प्रसिद्धम्॥ ४
सत्सङ्गमेन भवति श्रवणं पुरस्तात्
सङ्कीर्तनं पशुपतेरथ तद् दूढे स्यात्।
सर्वोत्तमं भवति तन्मननं तदन्ते
सर्वं हि सम्भवति शङ्करदृष्टिपाते। ५
मुनिगण बोले-हे ब्रह्मन्! मनन कैसा होता
है, श्रवणका स्वरूप कैसा है और उनका कीर्तन कैसे
किया जाता है, यथार्थ रूपमें आप वर्णन करें॥ १॥
ब्रह्माजी बोले [हे मुनियो!] भगवान् शंकरकी
पूजा, उनके नामोंका जप तथा उनके गुण, रूप, विलास
और नामोंका युक्तिपरायण चित्तके द्वारा जो निरन्तर
परिशोधन या चिन्तन होता है, उसीको मनन कहा गया
है, वह महेश्वरकी कृपादृष्टिसे उपलब्ध होता है। वह
समस्त श्रेष्ठ साधनोंमें प्रमुखतम है ॥ २॥
शम्भुके प्रताप, गुण, रूप, विलास और नामको
प्रकट करनेवाले संगीत, वेदवाक्य या भाषाके द्वारा
अनुरागपूर्वक उनकी स्तुति ही मध्यम साधन है,
जिसको कीर्तन शब्दसे कहा जाता है॥३॥
हे ज्ञानियो! स्त्रीक्रीड़ामें जैसे मनकी आसक्ति
होती है, वैसे ही किसी कारणसे किसी स्थानमें
शिवविषयक वाणियोंमें श्रवणेन्द्रियकी दृढतर आसक्ति
ही जगत्में श्रबणके नामसे प्रसिद्ध है॥ ४॥
सर्वप्रथम सजनोंकी संगतिसे श्रवण सिद्ध होता है,
बादमें शिवजीका कीर्तन दृढ़ होता है और अन्तमें सभी
साधनोंसे श्रेष्ठ शंकरविषयक मनन उत्पन्न होता है,
किंतु यह सब उनकी कृपादृष्टिसे ही सम्भव होता है॥५॥
५८
सूत उवाच
अस्मिन् साधनमाहात्मये पुरा वृत्तं मुनीश्वराः।
युष्मदर्थं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमवधानतः॥ ६
पुरा मम गुरुर्व्यास: पराशरमुनेः सुतः।
तपश्चचार सम्भ्रान्तः सरस्वत्यास्तटे शुभे॥ ७
गच्छन् यदृच्छया तत्र विमानेनार्करोचिषा।
सनत्कुमारो भगवान् ददर्श मम देशिकम्॥ ८
ध्यानारूढः प्रबुद्धोऽसौ ददर्श तमजात्मजम्।
प्रणिपत्याह सम्भ्रान्तः परं कौतूहलं मुनिः॥ ९
दत्त्वार्घ्यमस्मै प्रददौ देवयोग्यं च विष्टरम्।
प्रसन्नः प्राह तं प्रह्वं प्रभुर्गम्भीरया गिरा॥ १०
सनत्कुमार उवाच
सत्यं वस्तु मुने दध्याः साक्षात्करणगोचरः।
स शिवोऽथ सहायोऽत्र तपश्चरसि किंकृते॥ ११
एवमुक्तः कुमारेण प्रोवाच स्वाशयं मुनिः।
धर्मार्थकाममोक्षाश्च वेदमार्गे कृतादराः ॥ १२
बहुधा स्थापिता लोके मया त्वत्कृपया तथा।
एवंभूतस्य मेऽप्येवं गुरुभूतस्य सर्वतः॥ १३
मुक्तिसाधनकं ज्ञानं नोदेति परमाद्भुतम्
तपश्चरामि मुक्त्यर्थं न जाने तत्र कारणम्॥ १४
इत्थं कुमारो भगवान् व्यासेन मुनिनार्थितः।
समर्थः प्राह विप्रेन्दा निश्चयं मुक्तिकारणम्॥ १५
श्रवणं कीर्तनं शम्भोर्मननं च महत्तरम्।
त्रयं साधनमुक्तं च विद्यते वेदसम्मतम्॥ १६
पुराहमथ सम्भ्रान्तो हान्यसाधनसम्भ्रम: ।
अचले मन्दरे शैले तपश्चरणमाचरम्॥ १७
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ¥
`
सूतजी बोले--मुनीश्वरो! इस साधनका माहात्य
बतानेके प्रसंगमें मैं आपलोगोंके लिये एक
प्राचीन वृत्तान्तका वर्णन करूँगा, उसे ध्यान देकर
आपलोग सुनें॥ ६॥
पूर्व कालमें पराशर मुनिके पुत्र मेरे गुरु व्यासदेवजी
सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर तपस्या कर रहे थे॥ ७॥
एक दिन सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानसे यात्रा करते
हुए भगवान् सनत्कुमार अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे।
उन्होंने मेरे गुरुदेवको वहाँ देखा॥ ८॥
वे ध्यानमें मग्न थे। उससे जगनेपर उन्होंने
ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमारजीको अपने सामने उपस्थित
देखा। वे बड़े वेगसे उठे और उनके चरणोंमें प्रणाम
करके मुनिने उन्हें अर्घ्य प्रदान करके देवताओंके
बैठनेयोग्य आसन भी अर्पित किया। तब प्रसन्न हुए
भगवान् सनत्कुमार विनीत भावसे खड़े हुए व्यासजीसे
गम्भीर वाणीमें कहने लगे॥ ९-१०॥
सनत्कुमार बोले-हे मुने! आप सत्य सनातन
भगवान् शंकरका हृदयसे ध्यान कीजिये, तब वे शिव
प्रत्यक्ष होकर आपकी सहायता करेंगे; आप यहाँ तप
किसलिये कर रहे हैं ?॥ ११॥
इस प्रकार सनत्कुमारके कहनेपर मुनि व्यासे
अपना आशय कहा--मैंने आपकी कृपासे वेदसम्मत
धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी कथाको मानवसमाजमें
अनेक प्रकारसे प्रदर्शित किया है॥ १२९/२॥ मुर
इस प्रकार सर्वथा गुरुस्वरूप होनेपर भी मुझमें
मुक्तिके साधन ज्ञानका उदय नहीं हुआ है--यह
आश्चर्य ही है। मुक्तिका साधन न जाननेके कारण
उसके लिये मैं तपस्या कर रहा हूँ॥ १३-१४॥
हे विप्रेन्द्रों! इस प्रकार जब व्यासमुनिने भगवान
सनत्कुमारसे प्रार्थना की, तब वे समर्थ सनत्कुमारजी
मुक्तिका निश्चित कारण बताने लगे॥ १५॥
भगवान् शंकरका श्रवण, कीर्तन, मनन
कू महत्तर साधन कहे गये हैं। ये तीनों है
दसम्मत हैं ॥ १६॥
पूर्वकालमें मैं दूसरे-दूसरे साधनोंके सम्भर
पड़कर घूमता-घामता मन्दराचलपर जा पहुँचा औ
वहाँ तपस्या करने लगा॥ १७॥
अ० ५]
विद्येश्वरसंहिता
५९
शिवाज्ञया तत: प्राप्तो भगवान् नन्दिकेश्वर:।
स मे दयालुर्भगवान् सर्वसाक्षी गणेशवरः॥ १८
उवाच मह्यं सस्नेहं मुक्तिसाधनमुत्तमम्।
श्रवणं कीर्तनं शम्भोर्मननं वेदसम्मतम्॥ १९
त्रिकं च साधनं मुक्तेः शिवेन मम भाषितम्।
श्रवणादित्रिकं ब्रह्मन् कुरुष्वेति मुहुर्मुहुः ॥ २०
एवमुक्त्वा ततो व्यासं सानुगो विधिनन्दनः।
जगाम स्वविमानेन पदं परमशोभनम्॥ २१
एवमुक्तं समासेन पूर्ववृत्तान्तमुत्तमम्।
ऋषय ऊचुः
श्रवणादित्रयं सूत मुक्त्युपायस्त्वयेरितः॥ २२
श्रवणादित्रिकेऽशक्तः किं कृत्वा मुच्यते जन: ।
अयल्लेनैव मुक्तिः स्यात् कर्मणा केन हेतुना॥ २३
तदनन्तर महेश्वर शिवकी आज्ञासे भगवान्
नन्दिकेश्वर वहाँ आये । उनकी मुझपर बड़ी दया थी।
वे सबके साक्षी तथा शिवगणोंके स्वामी भगवान्
नन्दिकेश्वर मुझे स्नेहपूर्वक मुक्तिका उत्तम साधन
बताते हुए बोले--' भगवान् शंकरका श्रवण, कीर्तन
और मनन-ये तीनों साधन वेदसम्मत हैं और मुक्तिके
साक्षात् कारण हैं; यह बात स्वयं भगवान् शिवने
मुझसे कही है । अतः हे ब्रह्मन्! आप श्रवणादि तीनों
साधनोंका बार-बार अनुष्ठान करें॥ १८-२०॥
व्यासजीसे बार-बार ऐसा कहकर अनुगामियासहित
ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार अपने विमानसे परम सुन्दर ब्रह्मधामको
चले गये। इस प्रकार पूर्वकालके इस उत्तम वृत्तान्तका
मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है ॥ २१९/२॥
ऋषिगण बोले-हे सूतजी! आपने श्रवण
आदि तीनों साधनोंको मुक्तिका उपाय बताया है। जो
मनुष्य श्रवण आदि तीनों साधनोंमें असमर्थ हो, वह
किस उपायका अवलम्बन करके मुक्त हो सकता है
और किस साधनभूत कर्मके द्वारा बिना यत्नके ही मोक्ष
मिल सकता है ?॥ २२-२३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायाँ साध्यसाधनखण्डे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाथनखण्डमें चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भगवान् शिवके लिंग एवं साकार विग्रहकी पूजाके रहस्य तथा महत्त्वका वर्णन
सूत उवाच
श्रवणादित्रिकेऽशक्तो लिङ्गं वेरं च शाङ्करम्
संस्थाप्य नित्यमभ्यर्च्य तरेत् संसारसागरम्॥ ९
अपि द्रव्यं वहेदेब यथाबलमवञ्चयन्।
अर्पयेल्लिङ्कवेरार्थमर्चयेदपि सन्ततम्॥ २
मण्डपं गोपुरं तीर्थं मठं क्षेत्रं तथोत्सवम्।
वस्त्रं गन्धं च माल्यं च धूपं दीपं च भक्तितः॥ ३
सूतजी बोले-हे शौनक! जो श्रवण, कीर्तन
और मनन--इन तीनों साधनोंके अनुष्ठानमें समर्थ
न हो, वह भगवान् शंकरके लिंग एवं मूर्तिकी
स्थापनाकर नित्य उसकी पूजा करके संसारसागरसे
पार हो सकता है॥ १॥
छल न करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार
धनराशि ले जाय और उसे शिवलिंग अथवा शिवमूर्तिकी
सेवाके लिये अर्पित कर दे, साथ ही निरन्तर उस लिंग
एवं मूर्तिकी पूजा भी करे॥ २॥
उसके लिये भक्तिभावसे मण्डप, गोपुर, तीर्थ, मठ
एवं क्षेत्रकी स्थापना करे तथा उत्सव करे और वस्त्र,
गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा मालपुआ आदि व्यंजनोंसे
६०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ५
_ ७! व स्स क मल ह
विविधान्नं च नेवेद्यमपूपव्यज्ञनेर्युतम्।
छत्रं ध्वजं च व्यजनं चामरं चापि साङ्गकम्॥ ४
राजोपचारवत् सर्व॑ धारयेल्लिङ्गवेरयोः।
प्रदक्षिणां नमस्कारं यथाशक्ति जपं तथा॥ ५
आवाहनादि सर्गान्तं नित्यं कुर्यात् सुभक्तितः।
इत्थमभ्यर्चयन् देवं लिङ्गे वेरे च शाङ्करे॥ ६
सिद्धिमेति शिवप्रीत्या हित्वापि श्रवणादिकम्
लिङ्गवेरार्चनामात्रान्मुक्ताः पूर्वे महाजनाः॥ ७
मुनय ऊचुः
वेरमात्रे तु सर्वत्र पूज्यन्ते देवतागणाः।
लिङ्गे वेरे च सर्वत्र कथं सम्पूज्यते शिवः॥ ८
सूत उवाच
अहो मुनीश्वराः पुण्यं प्रश्नमेतन्महाद्भुतम्।
अत्र वक्ता महादेवो नान्योऽस्ति पुरुषः क्वचित्॥ ९
शिवेनोक्तं प्रवक्ष्यामि क्रमाद् गुरुमुखाच्छुतम्।
शिवैको ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलः परिकीर्तितः ॥ १०
रूपत्वात् सकलस्तद्वत्तस्मात् सकलनिष्कल:।
निष्कलत्वानिराकारं लिङ्गं तस्य समागतम्॥ ११
सकलत्वात् तथा वेरं साकारं तस्य सङ्गतम्।
सकलाकलरूपत्वाद् ब्रह्मशब्दाभिधः परः॥ १२
यक्त भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य अन्न नैवेद्यके रूपम
समर्पित करे। छत्र, ध्वजा, व्यजन, चामर तथा अर
अंगोंसहित राजोपचारकी भाति सब वस्तुएँ भगवान्
शिवके लिंग एवं मूर्तिपर चढ़ाये। प्रदक्षिणा, नमस्कार
तथा यथाशक्ति जप करे॥ ३--५॥
आवाहनसे लेकर विसर्जनतक सारा कार्य प्रतिदिन
भक्तिभावसे सम्पन्न करे। इस प्रकार शिवलिंग अथवा
शिवमूर्तिमें भगवान् शंकरकी पूजा करनेवाला पुरुष श्रवण
आदि साधनोंका अनुष्ठान न करे तो भी भगवान् शिवकी
प्रसन्नतासे सिद्धि प्राप्त कर लेता है। पहलेके बहुतसे
महात्मा पुरुष लिंग तथा शिवमूर्तिकी पूजा करनेमात्रसे
भवबन्धनसे मुक्त हो चुके हैं॥ ६-७॥
ऋषिगण बोले--मूर्तिमें ही सर्वत्र देवताओंकी
पूजा होती है, परंतु भगवान् शिवकी पूजा सब जगह
मूर्तिमें और लिंगमें भी क्यों की जाती है ?॥ ८॥
सूतजी बोले--हे मुनीश्वरे ! आप लोगोंका यह प्रश्न
तो बड़ा ही पवित्र और अत्यन्त अद्भुत है। इस विषयमें
महादेवजी ही वक्ता हो सकते हैं; कोई पुरुष कभी और
कहीं भी इसका यथार्थ प्रतिपादन नहीं कर सकता ॥ ९॥
इस विषयमें भगवान् शिवने जो कुछ कहा है
और उसे मैंने गुरुजीके मुखसे जिस प्रकार सुना है,
उसी तरह क्रमशः वर्णन करूँगा। एकमात्र भगवान्
शिव ही ब्रह्मरूप होनेके कारण निष्कल (निराकार)
कहे गये हैं॥ १०॥
रूपवान् होनेके कारण उन्हें “सकल' भी कहा गया
है। इसलिये वे सकल और निष्कल दोनों हैं । शिवके
निष्कल-निराकार होनेके कारण ही उनकी पूजाकी
आधारभूत लिंग भी निराकार ही प्राप्त हुआ है अर्थात
शिवलिंग शिवके निराकार स्वरूपका प्रतीक है॥ ११॥
इसी तरह शिवके सकल या साकार
कारण उनकी पूजाका आधारभूत विग्रह साकार प्राप
होता है अर्थात् शिवका साकार विग्रह उनके साकार
स्वरूपका प्रतीक होता है। सकल और अर्क
(समस्त अंग-आकारसहित साकार और अंग-आकी ,
सर्वथा रहित निराकार)-रूप होनेसे ही वे 'ब्रह
शब्दसे कहे जानेवाले परमात्मा हैं ॥ १२॥
अ० ५]
अपि लिङ्गे च वेरे च नित्यमभ्यर्च्यते जने: ।
अङ्रहात्वात्तदद्येषां निष्कलत्वं न हि क्वचित्॥ १३
तस्मात्ते निष्कले लिङ्गे नाराध्यन्ते सुरेश्वराः।
अब्रह्मत्वाच्च जीवत्वात्तथान्ये देवतागणाः॥ १४
तूष्णी सकलमात्रत्वादर्च्यन्ते वेरमात्रके।
जीवत्वं शङ्करान्येषां ब्रह्मत्वं शङ्करस्य च॥ १५
वेदान्तसारसंसिद्धं प्रणवार्थे प्रकाशनात्।
एवमेव पुरा पृष्टो मन्दरे नन्दिकेश्वरः ॥ १६
सनत्कुमारमुनिना ब्रह्मपुत्रेण धीमता।
सनत्कुमार उवाच
शिवान्यदेववश्यानां सर्वेषामपि सर्वतः॥ १७
बेरमात्रं च पूजार्थं श्रुतं दृष्टं च भूरिशः।
शिवमात्रस्य पूजायां लिङ्गं वेरं च दृष्यते॥ १८
अतस्तद् ब्रूहि कल्याण तत्त्वं मे साधुबोधनम्।
नन्दिकेश्वर उवाच
अनुत्तरमिमं प्रश्नं रहस्यं ब्रह्मलक्षणम्॥ १९
कथयामि शिवेनोक्तं भक्तियुक्तस्य तेऽनघ।
शिवस्य ब्रह्मरूपत्वान्निष्कलत्वाच्च निष्कलम्॥ २०
लिङ्गं तस्यैव पूजायां सर्ववेदेषु सम्मतम्।
तस्यैव सकलत्वाच्च तथा सकलनिष्कलम्॥ २
सकलं च तथा वेरं पूजायां लोकसम्मतम्।
विद्येश्वरसंहिता
६१
यही कारण है कि सब लोग लिंग (निराकार)
और मूर्ति (साकार)-दोनोंमें ही सदा भगवान्
शिवकी पूजा करते हैं। शिवसे भिन्न जो देवता हैं,
वे साक्षात् ब्रह्म नहीं हैं, इसलिये कहीं भी उनके लिये
निराकार लिंग नहीं उपलब्ध होता॥ १३॥
अतः सुरेश्वर (इन्द्र, ब्रह्मा) आदि देवगण भी
निष्कल लिंगमें पूजित नहीं होते हैं, सभी देवगण ब्रह्म
न होनेसे, अपितु सगुण जीव होनेके कारण केवल
मूर्तिमें ही पूजे जाते हैं। शंकरके अतिरिक्त अन्य
देवोंका जीवत्व और सदाशिवका ब्रह्मत्व वेदोंके
सारभूत उपनिषदोंसे सिद्ध होता है। वहाँ प्रणव
(३#कार) -के तत्त्वरूपसे भगवान् शिवका ही प्रतिपादन
किया गया है॥ १४-१५९/२॥
इसी प्रकार पूर्वमें मन्दराचल पर्वतपर ज्ञानवान्
ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनिने नन्दिकेश्वरसे प्रश्न किया
था॥ १६९/२॥
सनत्कुमार बोले-[हे भगवन्!] शिवके
अतिरिक्त उनके वशमें रहनेवाले जो अन्य देवता हैं,
उन सबको पूजाके लिये सर्वत्र प्रायः वेर (मूर्ति) -मात्र
ही अधिक संख्यामें देखा और सुना जाता है। केवल
भगवान् शिवकी ही पूजामें लिंग और वेर दोनोंका
उपयोग देखनेमें आता है। अतः हे कल्याणमय
नन्दिकेश्वर! इस विषयमें जो तत्त्वकी बात हो, उसे
मुझे इस प्रकार बताइये, जिससे अच्छी तरह समझमें
आ जाय॥ १७-१८९/२॥
नन्दिकेश्वर बोले-हे निष्पाप ब्रह्मकुमार!
हम-जैसे लोगोंके द्वारा आपके इस प्रश्नका कोई उत्तर
नहीं दिया जा सकता; क्योंकि यह गोपनीय विषय है
और लिंग साक्षात् ब्रह्मका प्रतीक है। इस विषयमें
भगवान् शिवने जो कुछ बताया है, उसे मैं आप
शिवभक्तके समक्ष कहता हूँ । भगवान् शिव ब्रह्मस्वरूप
और निष्कल (निराकार) हैं; इसलिये उन्हींकी पूजामें
निष्कल लिंगका उपयोग होता है । सम्पूर्ण वेदोंका यही
मत है। वे ही सकल हैं । इस प्रकार वे निराकार तथा
साकार दोनों हैं । भगवान् शंकर निष्कल-निराकार होते
हुए भी कलाओंसे युक्त हैं, इसलिये उनकी साकार
रूपमेंप्रतिमापूजा भी लोकसम्मत है ॥ १९--२११/२॥
६२
शिवान्येषां च जीवत्वात् सकलत्वाच्च सर्वतः ॥ २२
बेरमात्रं च पूजायां सम्मतं वेदनिर्णये।
स्वाविर्भावे च देवानां सकलं रूपमेव हि॥ २३
शिवस्य लिङ्गं वेरं च दर्शने दृश्यते खलु।
सनत्कुमार उवाच
उक्तं त्वया महाभाग लिङ्गवेरप्रचारणम्॥ २४
शिवस्य च तदन्येषां विभज्य परमार्थतः।
तस्मात्तदेव परमं लिङ्गं वेरादिसम्भवम्॥ २५
श्रोतुमिच्छामि योगीन्द्र लिङ्गाविर्भावलक्षणम्।
नन्दिकेश्चर उवाच
श्रृणु वत्स भवत्प्रीत्या वक्ष्यामि परमार्थतः॥ २६
पुरा कल्पे महाकाले प्रपन्ने लोकविश्रुते
अयुध्येतां महात्मानो ब्रह्मविष्णू परस्परम्॥ २७
तयोर्मानं निराकर्तुं तन्मध्ये परमेश्वरः।
निष्कलस्तम्भरूपेण स्वरूपं समदर्शयत्॥ २८
ततः स्वलिङ्चिह्त्वात् स्तम्भतो निष्कलं शिव: ।
स्वलिङ्गं दर्शयामास जगतां हितकाम्यया॥ २९
तदाप्रभृति लोकेषु निष्कलं लिङ्गमैश्चरम्।
सकलं च तथा वेरं शिवस्यैव प्रकल्पितम्॥ ३०
शिवान्येषां तु देवानां वेरमात्रं प्रकल्पितम्।
तत्तद् बेरं तु देवानां तत्तद्धोगप्रदं शुभम्।
शिवस्य लिङ्गवेरत्वं भोगमोक्षप्रदं शुभम्॥ ३१
श्रीशिवमहापुराण
[अo ५
शंकरके अतिरिक्त अन्य देवताओंमें
तथा सगुणत्व होनेके कारण वेदके मतमें उनकी
मूर्तिमात्रमें ही पूजा मान्य है। इसी प्रकार उन
देवताओंके आविर्भावके समय उनका समग्र साकार
रूप प्रकट होता है, जबकि भगवान् सदाशिवके
दर्शनमें साकार और निराकार (ज्योतिरूप) दोनोंकी
ही प्राप्ति होती है॥ २२-२३१/२॥
सनत्कुमार बोले-- हे महाभाग! आपने
शिव तथा दूसरे देवताओंके पूजनमें लिंग और वेरके
प्रचारका जो रहस्य विभागपूर्वक बताया है, वह यथार्थ
है। इसलिये लिंग और वेरकी आदि उत्पत्तिका जो
उत्तम वृत्तान्त है, उसीको मैं इस समय सुनना चाहता
हूँ। हे योगीन्द्र! लिंगके प्राकट्यका रहस्य सूचित
करनेवाला प्रसंग मुझे सुनाइये ॥ २४-२५१/२॥
नन्दिकेश्वर बोले--हे वत्स! आपके प्रति
प्रीतिके कारण मैं यथार्थ रूपमें वर्णन करता हूँ, सुनिये।
लोकविख्यात पूर्वकल्पके बहुत दिन व्यतीत हो जानेपर
एक समय महात्मा ब्रह्मा और विष्णु परस्पर लड़ने
लगे॥ २६-२७॥
उन दोनोंके अभिमानको मिटानेके लिये
[त्रिगुणातीत] परमेश्वरने उनके मध्यमें निष्कल स्तम्भके
रूपमें अपना स्वरूप प्रकट किया ॥ २८ ॥
जगतूका कल्याण करनेकी इच्छासे उस स्तम्भसे
निराकार परमेश्वर शिवने अपने लिंग--चिहनके कारण
लिंगका आविर्भाव किया॥ २९ ॥
उसी समयसे लोकमें परमेश्वर शंकरके निर्गुण
लिंग और सगुण मूर्तिकी पूजा प्रचलित हुई ॥ ३० ॥
शिवके अतिरिक्त अन्य देवोंकी मूर्तिमात्रकी
ही प्रकल्पना हुई । वे देव-प्रतिमाएँ पूजित हो नियर
शुभ कल्याणको देनेवाली हुई और शिवका लिग
तथा उनकी प्रतिमा दोनों ही भोग और मोक्षकी
देनेवाली हुई॥ ३१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवलिङ्गमहिमवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येशवरसंहितामें शिवलिंगकी महिमाका
वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥५॥
आ० ६]
विद्येश्वरसंहिता
६३
अथ षष्ठोऽध्यायः
ब्रह्मा और विष्णुके भयंकर युद्धको देखकर देवताओंका कैलास-शिखरपर गमन
नन्दिकेश्वर उवाच
पुरा कदाचिद्योगीन्द्र विष्णुर्विषधरासनः।
सुष्वाप परया भूत्या स्वानुगैरपि संवृतः॥ ९
यदृच्छयागतस्तत्र ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
अपृच्छत् पुण्डरीकाक्षं शयानं सर्वसुन्दरम्॥ २
कस्त्वं पुरुषवच्छेषे दृष्ट्वा मामपि दृप्तवत्।
उत्तिष्ठ वत्स मां पश्य तव नाथमिहागतम्॥ ३
आगतं गुरुमाराध्यं दृष्ट्वा यो दृप्तवच्चरेत्।
द्रोहिणस्तस्य मूढस्य प्रायश्चित्तं विधीयते॥ ४
इति श्रुत्वा वचः क्रुद्धो बहिः शान्तवदाचरन्।
स्वस्ति ते स्वागतं वत्स तिष्ठ पीठमितो विश॥ ५
किमु ते व्यग्रवद्वक्त्रं विभाति विषमेक्षणम्।
ब्रह्मोवाच
वत्स विष्णो महामानमागतं कालवेगतः॥ ६
पितामहश्च जगतः पाता च तव वत्सक।
विष्णुरुवाच
मत्स्थं जगदिदं वत्स मनुषे त्वं हि चोरवत्॥ ७
मन्नाभिकमलाज्ातः पुत्रस्त्वं भाषसे वृथा।
नन्दिकेश्वर उवाच
एवं हि वदतोस्तत्र मुग्धयोरजयोस्तदा॥ ८
अहमेव वरो न त्वमहं प्रभुरहं प्रभुः।
परस्परं हन्तुकामौ चक्रतुः समरोद्यमम्॥ ९
युयुधातेऽमरौ वीरौ हंसपक्षीन्द्रवाहनौ।
वैरञ्च्या वैष्णवाश्चैवं मिथो युयुधिरे तदा॥
नन्दिकेश्वर बोले--हे योगीन्द्र! प्राचीनकालमें
किसी समय शेषशायी भगवान् विष्णु अपनी पराशक्ति
लक्ष्मीजी तथा अन्य पार्षदोंसे घिरे हुए शयन कर रहे
थे॥१॥
उसी समय ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने अपनी
इच्छासे वहाँ आकर उन परम सुन्दर कमलनेत्र
विष्णुसे पूछा-तुम कौन हो, जो मुझे आया देखकर
भी उद्धत पुरुषके समान सो रहे हो? हे वत्स! उठो
और यहाँ अपने प्रभु-मुझे देखो। जो पुरुष अपने
रेष्ठ गुरुजनको आया हुआ देखकर उद्धतके समान
आचरण करता है, उस मूर्ख गुरुद्रोहीके लिये
प्रायश्चित्तका विधान किया गया है॥ २--४॥
[ब्रह्माके] इस वचनको सुनकर क्रोधित होनेपर
भी बाहरसे शान्त व्यवहार करते हुए भगवान् विष्णु
बोले--हे वत्स! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारा स्वागत
है। आओ, इस आसनपर बैठो । तुम्हारे मुखमण्डलसे
व्यग्रता प्रदर्शित हो रही है और तुम्हारे नेत्र विपरीत
भाव सूचित कर रहे हैं॥ ५९/२॥
ब्रह्माजी बोले-हे वत्स! हे विष्णो! कालके
प्रभावसे तुम्हें बहुत अभिमान हो गया है। हे वत्स! मैं
जगतूका पितामह और तुम्हारा रक्षक हूँ॥ ६१/२॥
विष्णु बोले-हे वत्स! यह जगत् मुझमें ही
स्थित है, तुम केवल चोरके समान दूसरेकी सम्पत्तिको
व्यर्थं अपनी मानते हो! तुम मेरे नाभिकमलसे उत्पन्न
हो, अतः तुम मेरे पुत्र हो, तुम तो व्यर्थ बातें कह रहे
हो ?॥ ७१/२॥
नन्दिकेश्वर बोले [हे मुने!] उस समय वे
अजन्मा ब्रह्मा और विष्णु मोहवश 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं
स्वामी हूँ, तुम नहीं'-इस प्रकार बोलते-बोलते
परस्पर एक-दूसरेको मारनेकी इच्छासे युद्ध करनेके
लिये उद्यत हो गये॥ ८-९॥
हंस और गरुडपर आरूढ होकर वे दोनों वीर
ब्रह्मा और विष्णु युद्ध करने लगे, तब ब्रह्मा और
विष्णुके गण भी परस्पर युद्ध करने लगे॥ १०॥
दड
श्रीशिवमहापुराण
[अ \
तावद्विमानगतयः सर्वां वै देवजातयः।
दिदृक्षवः समाजग्मुः समरं तं महाद्भुतम्॥ ११
क्षिपन्तः पुष्पवर्षाणि पश्यन्तः स्वैरमम्बरे।
सुपर्णवाहनस्तत्र क्रुद्धो वै ब्रह्मवक्षसि॥ १२
मुमोच बाणानसहाननस्त्रांश्च विविधान् बहून्।
मुमोचाथ विधिः क्रुद्धो विष्णोरुरसि दुःसहान्॥ १३
बाणाननलसङ्काशानस्त्रांश्च बहुशस्तदा।
तदाश्चर्यमिति स्पष्टं तयोः समरगोचरम्॥ १४
समीक्ष्य दैवतगणाः शशंसुर्भृशमाकुलाः।
ततो विष्णुः सुसंक्रुद्धः श्वसन् व्यसनकर्शितः॥ १५
माहेश्वरास्त्रं मतिमान् सन्दधे ब्रह्मणोपरि।
ततो ब्रह्मा भृशं क्रुद्धः कम्पयन् विश्वमेव हि॥ १६
अस्त्रं पाशुपतं घोरं सन्दधे विष्णुवक्षसि।
ततस्तदुत्थितं व्योम्नि तपनायुतसन्निभम्॥ १७
सहस्त्रमुखमत्युग्रं चण्डवातभयङ्करम्।
अस्त्रद्वयमिदं तत्र ब्रह्यविष्ण्वोर्भयङ्करम्॥ १८
इत्थं बभूव समरं ब्रह्मविष्ण्वोः परस्परम्।
ततो देवगणाः सर्वे विषण्णा भूशमाकुला: ।
ऊचुः परस्परं तात राजक्षोभे यथा द्विजाः॥ १९
सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः ।
यस्मात् प्रवर्तते तस्मै ब्रह्मणे च त्रिशूलिने॥ २०
अशक्यमन्यैर्यदनुग्रहं विना
तृणक्षयोऽप्यत्र यदृच्छया क्वचित्॥ २१
इति देवा भयं कृत्वा विचिन्वन्तः शिवक्षयम्।
जग्मुः कैलासशिखरं यत्रास्ते चन्द्रशेखरः ॥ २२
दृष्ट्वैवममरा हृष्टाः पदं तत्पारमेश्चरम्।
प्रणेमुः प्रणवाकारं प्रविष्टास्तत्र सद्मनि॥ २३
उस समय सभी देवगण उस परम
युद्धको देखनेकी इच्छासे विमानपर चढ़कर वह
पहुँच गये। [वहाँ आकर] आकाशमें
हो पुष्पकी वृष्टि करते हुए वे युद्ध देखने लगे।
गरुडवाहन भगवान् विष्णुने क्रुद्ध होकर ब्रह्माके
वक्षःस्थलपर अनेक प्रकारके असंख्य दुःसह बाणो
और अस्त्रोंसे प्रहार किया॥ ११-१२१/२॥
तब विधाता भी क्रुद्ध होकर विष्णुके हृदयपा
अग्निके समान बाण और अनेक प्रकारके अस्त्रं
छोड़ने लगे। उस समय देवगण उन दोनोंका वह अद्भुत
युद्ध देखकर अतिशय व्याकुल हो गये और ब्रह्मा तथा
विष्णुकी प्रशंसा करने लगे ॥ १३-१४१/२॥
तत्पश्चात् युद्धमें तत्पर महाज्ञानी विष्णुने अतिशय
क्रोधके साथ श्रान्त हो दीर्घ निःश्वास लेते हुए ब्रह्माको
लक्ष्यकर भयंकर माहेश्वर अस्त्रका संधान किया।
ब्रह्माने भी अतिशय क्रोधमें आकर विष्णुके हृदयको
लक्ष्यकर ब्रह्माण्डको कम्पित करते हुए भयंकर पाशुपत
अस्त्रका प्रयोग किया। ब्रह्मा और विष्णुके सूर्यके
समान हजारों मुखवाले, अत्यन्त उग्र तथा प्रचण्ड
आँधीके समान भयंकर दोनों अस्त्र आकाशमें प्रकट हो
गये॥ १५-१८॥
इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णुका आपसमें भयंकर युद्ध
होने लगा। हे तात! उस युद्धको देखकर सभी देवगण
राजविप्लवके समय ब्राह्मणोंके समान अतिशय दुखी और
व्याकुल होकर परस्पर कहने लगे--जिसके द्वारा
सृष्टि, स्थिति, प्रलय, तिरोभाव तथा अनुग्रह होता है
और जिसकी कृपाके बिना इस भूमण्डलपर
इच्छासे एक तृणका भी विनाश करनेमें कोई भी समर्थ
नहीं है, उन त्रिशूलधारी ब्रह्मस्वरूप महेश्वरको नमस्कार
है॥ १९--२१॥
भयभीत देवतागण इस प्रकार सोचते हुए चन्र
महेश्वर जहाँ विराजमान थे, उस शिवस्थान
शिखरपर गये॥ २२॥
शिवके उस प्रणवाकार स्थानको देखकर वै
देवता प्रसन्न हुए और प्रणाम करके भवनमें
हुए॥ २३॥
न
आ० ७]
विद्येश्वरसंहिता
६५
तेऽपि तत्र सभामध्ये मण्डपे मणिविष्टरे।.
विराजमानमुमया ददृशुर्देवपुङ्गवम्॥ २४
सव्योत्तरेतरपदं तदर्पितकराम्बुजम्।
स्वगणैः सर्वतो जुष्टं सर्वलक्षणलक्षितम्॥ २५
वीज्यमानं विशेषज्ञेः स्त्रीजनैस्तीब्रभावनैः।
शंस्यमानं सदा वेदैरनुगृह्न्तमीश्चरम्॥ २६
दृष्ट्वैवमीशममराः सन्तोषसलिलेक्षणाः।
दण्डवद् दूरतो वत्स नमश्षक्रुर्महागणाः॥ २७
तानवेक्ष्य पतिर्देवान् समीपे चाह्ययद् गणे: ।
अथ संह्वादयन् देवान् देवो देवशिखामणिः।
अवोचदथ गम्भीरे वचनं मधुमङ्गलम्॥ २८
उन्होंने वहाँ सभाके मध्यमें स्थित मण्डपमें देवी
पार्वतीके साथ रत्ममय आसनपर विराजमान देवश्रेष्ठ
शंकरका दर्शन किया। बे वाम चरणके ऊपर दक्षिण
चरण और उसके ऊपर वाम करकमल रखे हुए थे,
समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे और चारों ओर शिवगण
उनकी सेवामें तत्पर थे, शिवके प्रति उत्तम भक्तिभाववाली
कुशल रमणियाँ उनपर चँवर डुला रही थीं, वेद निरन्तर
उनकी स्तुति कर रहे थे और वे अनुग्रहकी दृष्टिसे
सबको देख रहे थे। हे वत्स! उन महेश्वर शिवको
देखकर आनन्दाश्रुसे परिपूर्ण जेत्रोंबाले देवताओंने दूरसे
ही उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया॥ २४--२७॥
भगवान् शंकरने उन देवोंको देखकर अपने गणोंसे
उन्हें समीप बुलवाया और देवशिरोमणि महादेव
उन देवताओंको आनन्दित करते हुए अर्थगम्भीर,
मंगलमय तथा सुमधुर वचन कहने लगे॥ २८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्योश्वरसंहितायां देवानां कैलासयात्रावर्णनं नाम षडोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहितामें देवताओंकी कैलासयात्राका
वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
भगवान् शंकरका ब्रह्मा और विष्णुके युद्धमें अग्निस्तम्भरूपमें प्राकट्य, स्तम्भके
आदि और अन्तकी जानकारीके लिये दोनोंका प्रस्थान
ईश्वर उवाच
वत्सकाः स्वस्ति व: कच्चिद्वर्तत मम शासनात्।
जगच्च देवतावंशः स्वस्वकर्मणि किं न वा॥ १
प्रागेव विदितं युद्धं ब्रह्मविष्ण्वोर्मया सुराः।
भवतामभितापेन पौनरुक्त्येन भाषितम्॥ २
इति सस्मितया माध्व्या कुमार परिभाषया।.
समतोषयदम्बायाः स॒ पतिस्तत्सुरव्रजम्॥ ३
अथ युद्धाङ्गणं गन्तुं हरिधात्रोरधीश्वरः।
आज्ञापयदूणेशानां शतं तत्रैव संसदि॥ ४
ततो वाद्यं बहुविधं प्रयाणाय परेशितुः।
गणेश्वराश्च सन्नद्धा नानावाहनभूषणाः॥ ५
2223 Shivmahapuranam_Part L_Section_4_l_Front
शिवजी बोले-हे पुत्रो! आपकी कुशल तो
है? मेरे अनुशासनमें जगत् तथा देवश्रेष्ठ अपने-अपने
कार्योमें लगे तो हैं ? हे देवताओ ! ब्रह्मा और विष्णुके
बीच होनेवाले युद्धका वृत्तान्त तो मुझे पहलेसे ही
ज्ञात था; आपलोगोंने [यहाँ आनेका] परिश्रम करके
उसे पुनः बताया है। हे सनत्कुमार! उमापति शंकरने
इस प्रकार मुसकराते हुए मधुर वाणीमें उन देवगणोंको
सन्तुष्ट किया॥ १-३॥
इसके बाद महादेवजीने ब्रह्मा और विष्णुकी
युद्धस्थलीमें जानेके लिये अपने सैकड़ों गणोंको वहीं
सभामें आज्ञा दी। तब महादेवजीके प्रयाणके लिये
अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे और उनके गणाध्यक्ष
भी अनेक प्रकार से सज-धजकर वाहनोंपर सवार
होकर जानेके लिये तैयार हो गये ॥ ४-५॥
६६
प्रणवाकारमाद्यन्तं पञ्ञमण्डलमण्डितम्।
आरुरोह रथं भद्रमम्बिकापतिरी श्वर: ।
ससूनुगणमिन्द्राद्या: सर्वेऽप्यनुययुः सुरा: ॥ ६
चित्रध्वजव्यजनचामरपुष्पवर्ष-
सङ्गीतनृत्यनिवहैरपि वाद्यवगैः।
सम्मानितः पशुपतिः परया च देव्या
साकं तयोः समरभूमिमगात् ससैन्यः ॥ ७
समीक्ष्य तु तयोर्युद्धं निगूढोऽभ्नं समास्थितः।
समाप्तवाद्यनिर्घोषः शान्तोरुगणनिःस्वनः॥ ८
अथ ब्रह्माच्युतौ वीरौ हन्तुकामौ परस्परम्।
माहेश्वरेण चास्त्रेण तथा पाशुपतेन च॥ ९
अस्त्रज्वालैरथो दग्धं ब्रह्मविष्णवोर्जगत्त्रयम्।
ईशोऽपि तं निरीक्ष्याथ ह्यकालप्रलयं भृशम्॥ १०
'महानलस्तम्भविभीषणाकृति-
बभूव तन्मध्यतले स निष्कलः॥ ११
ते अस्त्रे चापि सज्चाले लोकसंहरणक्षमे।
निपेततुः क्षणेनैव ह्याविर्भूते महानले॥ १२
दृष्ट्वा तदद्भुतं चित्रमस्त्रशान्तिकरं शुभम्।
किमेतदद्भुताकारमित्यूचुश्च परस्परम्॥ १३
अतीन्द्रियमिदं स्तम्भमग्निरूपं किमुत्थितम्।
अस्योर्ध्वमपि चाधश्च आवयोर्लक्ष्यमेव हि॥ १४
इति व्यवस्थितौ वीरौ मिलितौ वीरमानिनौ।
तत्परौ तत्परीक्षार्थं प्रतस्थातेऽथ सत्वरम्॥ १५
आवयोर्मिश्रयोस्तत्र कार्यमेकं न सम्भवेत्।
इत्युक्त्वा सूकरतनुरविष्णुस्तस्यादिमीयिवान्॥ १६
तथा ब्रह्मा हंसतनुस्तदन्तं वीक्षितुं ययौ।
भित्त्वा पातालनिलयं गत्वा दूरतरं हरिः॥ १७
जापश्यत्तस्य संस्थानं स्तम्भस्यानलवर्चसः।
श्रान्तः स सूकरहरिः प्राप पूर्व रणाङ्गणम्॥ १८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ७
. /झ/ ल्ह/ल्ू--- 35 oy oo यऱड
भगवान् उमापति पाँच मण्डलोंसे सुशोभित
आगेसे पीछेतक प्रणव ( ३» )-की आकृतिवाले
रथपर आरूढ़ हो गये। इस प्रकार पुत्रों और
प्रस्थान किये हुए शिवजीके पीछे-पीछे इन्द्र आदि
सभी देवगण भी चल पड़े। विचित्र ध्वजाएँ, पंखे
चँवर, पुष्पवृष्टि, संगीत, नृत्य और वाद्योंसे सम्मानित
पशुपति भगवान् शिव भगवती उमाके साथ सेनासहित
उन दोनों (ब्रह्मा और विष्णु)-को युद्धभूमिमें आ
पहुँचे ॥ ६-७॥
उन दोनोंका युद्ध देखकर शिवजीने गणोंका
कोलाहल तथा वाद्योंकी ध्वनि बन्द करा दी तथा वे
छिपकर आकाशमें स्थित हो गये। उधर शूरवीर ब्रह्मा
और विष्णु एक-दूसरेको मारनेकी इच्छासे माहेश्वरास्त्र
और पाशुपतास्त्रका परस्पर सन्धान कर रहे थे। ब्रह्मा
और विष्णुके अस्त्रोंकी ज्वालासे तीनों लोक जलने
लगे। निराकार भगवान् शंकर इस अकाल प्रलयको
आया देखकर एक भयंकर विशाल अग्निस्तम्भके
रूपमें उन दोनोंके बीच प्रकट हो गये॥ ८-११॥
संसारको नष्ट करनेमें सक्षम वे दोनों दिव्यास्त्र
अपने तेजसहित उस महान् अग्निस्तम्भके प्रकट होते
ही तत्क्षण शान्त हो गये। दिव्यास्त्रोंको शान्त
करनेवाले इस आश्चर्यकारी तथा शुभ (अग्निस्तम्भ)-
को देखकर सभी लोग परस्पर कहने लगे कि यह
अद्भुत आकारवाला (स्तम्भ) क्या है ?॥ १२-१३॥
यह दिव्य अग्निस्तम्भ कैसे प्रकट हो गया ? इसकी
ऊँचाईकी और इसकी जड़की हम दोनों जाँच करें
ऐसा एक साथ निश्चय करके वे दोनों अभिमानी वीर
उसकी परीक्षा करनेको तत्पर हो गये और शीप्रतापूर्वक
चल पड़े। हम दोनोंके साथ रहनेसे यह कार्य सम्पन
नहीं होगा-एऐसा कहकर विष्णुने सूकरका रूप धारण
किया और उसकी जड़की खोजमें चले । उसी प्रकार
ब्रह्म भी हंसका रूप धारण करके उसका अन्त
लिये चल पड़े। पाताललोकको खोदकर बहुत दूरतर्क
जानेपर भी विष्णुको उस अग्निके समान तेजस्वी स्तम्भी
आधार नहीँ दीखा। तब थक-हारकर सूकराकृतिं
रणभूमिमें वापस आ गये ॥ १४-१८॥
2223 Shivmahapuranam_Part I Section-4-)-Be FE
आ० ७]
विद्येश्वरसंहिता
६७
अथ गच्छंस्तु व्योम्ना च विधिस्तात पिता तव।
ददर्श केतकीपुष्पं किज्िद्विच्युतमद्धुतम्॥ १९
अतिसौरभ्यमम्लानं बहुवर्षच्युतं तथा ।
अन्वीक्ष्य च तयोः कृत्यं भगवान् परमेश्वर: ॥ २०
परिहासं तु कृतवान्कम्पनाच्चलितं शिर: ।
तस्मात्तावनुगृह्णातुं च्युतं केतकमुत्तमम्॥ २१
किं त्वं पतसि पुष्पेश पुष्पराट् केन वै धृत: ।
आदिमस्याप्रमेयस्य स्तम्भमध्याच्च्युतश्चिरम्॥ २२
न सम्पश्यामि तस्मात्त्वं जह्याशामन्तदर्शने।
अस्यान्तस्य च सेवार्थ हंसमूर्तिरिहागतः॥ २३
इतः परं सखे मेऽद्य त्वया कर्तव्यमीप्सितम्।
मया सह त्वया वाच्यमेतद्विष्णोश्च सन्निधो ॥ २४
स्तम्भान्तो वीक्षितो धात्रा तत्र साक्ष्यहमच्युत।
इत्युक्त्वा केतकं तत्र प्रणनाम पुनः पुनः।
असत्यमपि शस्तं स्यादापदीत्यनुशासनम्॥ २५
समीक्ष्य तत्राच्युतमायतश्रमं
प्रनष्टहर्षं तु ननर्त हर्षात्।
उवाच चैनं परमार्थमच्युतं
चण्ढात्तवादः स विधिस्ततोऽच्युतम्॥
स्तम्भाग्रमेतत् समुदीक्षितं हरे
तत्रैव साक्षी ननु केतकं त्विदम्।
ततोऽवदत्तत्र हि केतकं मूषा
तथेति तद्धातृवचस्तदन्तिके॥ २७
तत्सत्यमितीव चिन्तयं-
श्चकार तस्मै विधये नमः स्वयम्।
घोडशैरुपचारैश्च पूजयामास तं विधिम्॥ २८
हरिश्चं
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_4_2_Front
हे तात! आकाशमार्गसे जाते हुए आपके पिता
ब्रह्मजीने मार्गमे अद्धुत केतकी (केवड़े)-के पुष्पको
गिरते देखा। अनेक वर्षोसे गिरते रहनेपर भी वह
ताजा और अति सुगन्धयुक्त था। ब्रह्मा और विष्णुके
इस विग्रहपूर्ण कृत्यको देखकर भगवान् परमेश्वर हँस
पड़े, जिससे कम्पनके कारण उनका मस्तक हिला
और वह श्रेष्ठ केतकी पुष्प उन दोनोंके ऊपर कृपा
करनेके लिये गिरा॥ १९-२१॥
[ब्रह्माजीने उससे पूछा--] हे पुष्पराज! तुम्हें
किसने धारण कर रखा था और तुम क्यों गिर रहे
हो? [केतकीने उत्तर दिया-] इस पुरातन और
अप्रमेय स्तम्भके बीचसे मैं बहुत समयसे गिर रहा
हुँ। फिर भी इसके आदिको नहीं देख सका।
अतः आप भी इस स्तम्भका अन्त देखनेकी आशा
छोड़ दें॥ २२१/२॥
[ब्रह्माजीने कहा-] मैं तो हंसका रूप लेकर
इसका अन्त देखनेके लिये यहाँ आया हूँ। अब हे
मित्र! मेरा एक अभिलषित काम तुम्हें करना पड़ेगा।
विष्णुके पास मेरे साथ चलकर तुम्हें इतना कहना है
कि 'ब्रह्माने इस स्तम्भका अन्त देख लिया है। हे
अच्युत! मैं इस बातका साक्षी हूँ।' केतकीसे ऐसा
कहकर ब्रह्माने उसे बार-बार प्रणाम किया और कहा
कि आपत्कालमें तो मिथ्या भाषण भी प्रशस्त माना
गया है-यह शास्त्रकी आज्ञा है॥ २३-२५॥
वहाँ अति परिश्रमसे थके और [स्तम्भका अन्त
न मिलनेसे] उदास विष्णुको देखकर ब्रह्मा प्रसन्नतासे
नाच उठे और षण्ढ (नपुंसक)-के समान पूर्ण बातें
बनाकर अच्युत विष्णुसे इस प्रकार कहने लगे-हे हरे!
मैंने इस स्तम्भका अग्रभाग देख लिया है; इसका साक्षी
यह केतकी पुष्प है। तब उस केतकीने भी झूठ ही
विष्णुके समक्ष कह दिया कि ब्रह्माकी बात यथार्थ
है॥ २६-२७॥
विष्णुने उस बातको सत्य मानकर ब्रह्माको
स्वयं प्रणाम किया और उनका षोडशोपचार पूजन
किया॥ २८॥
६८
विधिं प्रहर्त् शठमग्निलिङ्गतः
स ईश्वरस्तत्र बभूव साकृतिः।
समुत्थितः स्वामिविलोकनात् पुनः
प्रकम्पपाणिः परिगृह्य तत्पदम्॥ २९
आद्यन्तहीनवपुषि त्वयि मोहबुद्धया
भूयान् विमर्श इह नावति कामनोत्थः ।
स त्वं प्रसीद करुणाकर कश्मलं नौ
मृष्टं क्षमस्व विहितं भवतैव केल्या॥ ३०
ईश्वर उवाच
वत्स प्रसन्नोऽस्मि हरे यतस्त्व-
मीशत्वमिच्छन्नपि सत्यवाक्यम्।
ब्रूयास्ततस्ते भविता जनेषु
साम्यं मया सत्कृतिरप्यलप्सि॥ ३१
इतः परं ते पृथगात्मनश्च
क्षेत्रप्रतिष्ठोत्सवपूजनं च॥ ३२
इति देवः पुरा प्रीतः सत्येन हरये परम्।
ददौ स्वसाम्यमत्यर्थं देवसङ्घे च पश्यति॥ ३३
श्रीशिवमहापुराण
[अs ८
उसी समय कपटी ब्रह्माको दण्डित करनेके लिये
उस प्रज्वलित स्तम्भ लिंगसे महेश्वर प्रकट हो गये,
तब परमेश्वरको प्रकट हुआ देखकर विष्णु उठ खे
हुए और काँपते हाथोंसे उनका चरण पकड़कर कहने
लगे। हे करुणाकर! आदि और अन्तसे
शरीरवाले आप परमेश्वरके विषयमें मैंने मोहबुद्धिसे
बहुत विचार किया; किंतु कामनाओंसे उत्पन्न बह
विचार सफल नहीं हुआ। अतः आप हमपर प्रसन्न
हों, हमारे पापको नष्ट करें और हमें क्षमा करें; यह
सब आपकी लीलासे ही हुआ है॥ २९-३०॥
ईश्वर बोले-हे वत्स! मैं तुमपर प्रसन
हूँ; क्योंकि श्रेष्ठताकी कामना होनेपर भी तुमने
सत्य वचनका पालन किया, इसलिये लोगोंमें तुम मेर
समान ही प्रतिष्ठा और सत्कार प्राप्त करोगे। हे हरे
अबसे आपकी पृथक् मूर्ति बनाकर पुण्य क्षेत्रे
प्रतिष्ठित की जायगी और उसका उत्सवपूर्वक पूजन
होगा॥ ३१-३२॥
इस प्रकार परमेश्वरने विष्णुकी सत्यनिष्ठासे
प्रसन्न होकर देवताओंके सामने उन्हें अपनी समानता
प्रदान की थी॥ ३३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायामनलस्तम्भाविष्कारवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहितामें अग्निस्तम्भके प्राकट्यका
वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
भगवान् शंकरद्वारा ब्रह्मा और केतकी पुष्पको शाप देना और पुनः अनुग्रह प्रदान करना
नन्दिकेश्वर उवाच
ससर्जाथ महादेवः पुरुषं कञ्चिदद्भुतम्।
भैरवाख्यं भ्रुवोर्मध्याद् ब्रह्मदर्पजिघांसया॥ १
स वै तदा तत्र पतिं प्रणम्य शिवमङ्गणे।
किं कार्य करवाण्यत्र शीघ्रमाज्ञापय प्रभो॥ २
शिव उवाच
वत्स योऽयं विधिः साक्षाजजगतामाद्यदैवतम्।
नूनमर्चय खड्गेन तिग्मेन जवसा परम्॥ ३
नन्दिकेश्वर बोले--तदुपरान्त महादेव शिवजीने
ब्रह्माके गर्वको मिरानेकी इच्छासे अपनी भूकुटीके
मध्यसे भैरव नामक एक अद्भुत पुरुषको उत्पन
किया। उस भैरवने रणभूमिमें अपने स्वामी शिवजीकी
प्रणाम करके पूछा कि हे प्रभो! आप शीघ्र आज्ञा दे
मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ ?॥ १-२॥
शिवजी बोले--हे वत्स! ये जो ब्रह्मा हैं) वे ई
सृष्टिके आदि देवता हैं, तुम वेगपूर्वक तीक्ष्ण
इनकी पूजा करो अर्थात् इनका वध कर दो॥ ३॥
2223 Shivmabiapurenann, एथ68०07०7:4:2- 5
अ० ८]
विद्येश्वरसंहिता
६९
स वै गृहीत्वैककरेण केशं
तत्पञ्चमं दृप्तमसत्यभाषिणम्।
छित्त्वा शिरो ह्यस्य निहन्तुमुद्यतः
प्रकम्पयन् खड्गमतिस्फुटं करैः॥ ४
तवोत्सृष्टविभूषणाम्बर-
सत्रगुत्तरीयामलकेशसंहतिः \
प्रवातरम्भेव लतेव चञ्चलः
पपात खै भैरवपादपड्डजे॥ ५
तावद्विधिं तात दिदुक्षुरच्युतः
कृपालुरस्मत्पतिपादपल्लवम् ।
निषिच्य बराष्पैरवदत् कृताञ्जलि-
र्यथा शिशुः स्वं पितरं कलाक्षरम्॥ ६
अच्युत उवाच
त्वया प्रयतेन पुरा हि दत्तं
यदस्य पञ्चाननमीश
तस्मात् क्षमस्वाद्यमनुग्रहार्ह
कुरु प्रसादं विधये हामुष्मै॥ ७
इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाङ्गणे।
निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः॥ ८
पिता
चिह्मम्।
अथाह देव: कितवं विधिं विगतकन्धरम्।
बरहम॑स्त्वमईणाकाङ्क्षी शठेशत्वं समास्थितः॥ ९
जातस्ते सत्कृतिलोंके भूयात् स्थानोत्सवादिकम्।
ब्रह्मोवाच
स्वामिन् प्रसीदाद्य महाविभूते
मन्ये बरं मे शिरसः प्रमोक्षम्॥
नमस्तुभ्यं भगवते बन्धवे विश्वयोनये।
सहिष्णवे च दोषाणां शम्भवे शैलधन्वने॥ १९
ईश्वर उवाच
अराजभयमेतद्वै जगत् सर्वं नशिष्यति।
ततस्त्वं जहि दण्डाई वह लोकधुरं शिशो॥ १२
बरं ददामि ते तत्र गृहाण दुर्लभं परम्।
वैतानिकेषु गृहोषु यज्ञेषु च भवान् गुरुः॥ १३
निष्फलस्त्वदृते यज्ञः साङ्गश्च सहदक्षिणः।
तब भैरव एक हाथसे [ब्रह्माके] केश पकड़कर
असत्य भाषण करनेवाले उनके उद्धत पाँचवें सिरको
काटकर हाथोंमें तलवार भाँजते हुए उन्हें मार
डालनेके लिये उद्यत हुए॥ ४॥
[हे सनत्कुमार!] तब आपके पिता अपने आभूषण,
वस्त्र, माला, उत्तरीय एवं निर्मल बालोंके बिखर जानेसे
आँधीमें झकझोरे हुए केलेके पेड और लतागुल्मोंके
समान कम्पित होकर भैरवके चरण-कमलोंपर गिर पड़े।
हे तात! तब ब्रह्माकी रक्षा करनेकी इच्छासे कृपालु
विष्णुने मेरे स्वामी भगवान् शंकरके चरणकमलोंको
अपने अश्रु-जलसे भिगोते हुए हाथ जोड़कर इस
प्रकार प्रार्थना की, जैसे एक छोटा बालक अपने
पिताके प्रति टूटी-फूटी वाणीमें करता है॥ ५-६॥
अच्युत बोले-[हे ईश!] आपने ही पहले
कृपापूर्वक इन ब्रह्माको पंचाननरूप प्रदान किया था।
इसलिये ये आपके अनुग्रह करनेयोग्य हैं, इनका
अपराध क्षमा करें और इनपर प्रसन्न हों॥ ७॥
भगवान् अच्युतके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना
किये जानेपर शिवजीने प्रसन्न होकर देवताओंके
सामने ही ब्रह्माको दण्डित करनेसे भैरवको रोक
दिया। शिवजीने एक सिरसे विहीन कपटी ब्रह्मासे
कहा-हे ब्रह्मन्! तुम श्रेष्ठता पानेके चक्कसमें
शठेशत्वको प्राप्त हो गये हो। इसलिये संसासमें
तुम्हारा सत्कार नहीं होगा और तुम्हारे मन्दिर तथा
पूजनोत्सव आदि नहीं होंगे॥ ८-९१/२॥
ब्रह्माजी बोले--हे महाविभूतिसम्पन्न स्वामिन्!
आप मुझपर प्रसन्न होइये; मैं [आपकी कृपासे]
अपने सिरके कटनेको भी आज श्रेष्ठ समझता हूँ।
विश्वके कारण, विश्वबन्धु, दोषोंको सह लेनेवाले
और पर्वतके समान कठोर धनुष धारण करनेवाले
आप भगवान् शिवको नमस्कार है॥ १०-११॥
ईश्वर बोले-हे वत्स! अनुशासनका भय नहीँ
रहनेसे यह सारा संसार नष्ट हो जायगा। अतः तुम
दण्डनीयको दण्ड दो और इस संसारकी व्यवस्था
चलाओ। तुम्हें एक परम दुर्लभ वर भी देता हूँ, जिसे
ग्रहण करो। अग्निहोत्र आदि वैतानिक और गृह्य यज्ञोंमें
आप ही श्रेष्ठ रहेंगे। सर्वांगपूर्ण और पुष्कल दक्षिणावाला
यज्ञ भी आपके बिना निष्फल होगा॥ १२-१३१/२॥
७०
अथाह देवः कितवं केतकं कूटसाक्षिणम्॥ १४
रे रे केतक दुष्टस्त्वं शठ दूरमितो व्रज।
ममापि प्रेम ते पुष्पे माभूत्पूजास्वितः परम्॥ १५
इत्युक्ते तत्र देवेन केतकं देवजातयः।
सर्वा निवारयामासुस्तत्पार्श्वादन्यतस्तदा॥ १६
केतक उवाच
नमस्ते नाथ मे जन्म निष्फलं भवदाज्ञया।
सफलं क्रियतां तात क्षम्यतां मम किल्बिषम्॥ १७
ज्ञानाज्ञानकृतं पापं नाशयत्येव ते स्मृतिः।
तादृशे त्वयि दृष्टे मे मिथ्यादोषः कुतो भवेत्॥ १८
तथा स्तुतस्तु भगवान् केतकेन सभास्थले।
न मे त्वद्धारणं योग्यं सत्यवागहमीश्वरः॥ १९
मदीयास्त्वां धरिष्यन्ति जन्म ते सफलं तत: ।
त्वं वै वितानव्याजेन ममोपरि भविष्यसि॥ २०
इत्यनुगृह्य भगवान् केतकं विधिमाधवौ।
विरराज सभामध्ये सर्वदेवैरभिष्टुतः॥ २१
श्रीशिवमहापुराण
[अs MRR Sih
तब भगवान् शिवने झूठी गवाही देनेवाले क
केतक पुष्पसे कहा--अरे शठ केतक ! तुम दुष्ट हे
यहाँसे दूर चले जाओ । मेरी पूजामें उपस्थित तन्न,
फूल मुझे प्रिय नहीं होगा। शिवजीद्वारा इस प्रका
कहते ही सभी देवताओंने केतकीको उनके पासे
हटाकर अन्यत्र भेज दिया॥ १४--१६॥
केतक बोला--हे नाथ! आपको नमस्का!
है। आपकी आज्ञाके कारण मेरा तो जन्म ही निष्फत
हो गया है । हे तात! मेरा अपराध क्षमा करें और मे
जन्म सफल कर दें। जाने-अनजानेमें हुए पाप आपके
स्मरणमात्रसे नष्ट हो जाते हैं, फिर ऐसे प्रभावशाली
आपके साक्षात् दर्शन करनेपर भी मेरे झूठ बोलनेका
दोष कैसे रह सकता है ?॥ १७-१८॥
उस सभास्थलमें केतक पुष्पके इस प्रका
स्तुति करनेपर भगवान् सदाशिवने कहा-मैं सत्र
बोलनेवाला हूँ, अतः मेरे द्वारा तुझे धारण किया जागा
उचित नहीं है, किंतु मेरे ही अपने (विष्णु आदि
देवगण) तुम्हें धारण करेंगे और तुम्हारा जन्म सफल
होगा और मण्डप आदिके बहाने तुम मेरे ऊपर भौ
उपस्थित रहोगे॥ १९-२०॥
इस प्रकार भगवान् शंकर ब्रह्मा, विष्णु और
केतकी पुष्पपर अनुग्रह करके सभी देवताओंसे सुर
होकर सभामें सुशोभित हुए॥ २१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्योश्वरसंहितायां शिवानुग्रहवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें शिवकी कृपाका
वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः
महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका
परिचय देते हुए लिंगपूजनका महत्त्व बताना
नन्दिकेश्वर उवाच
तत्रान्तरे तौ च नाथं प्रणम्य विधिमाधवौ ।
नन्दिकेश्वर बोले--वे दोनों--ब्रह्मा और वि
भगवान् शंकरको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड
बद्धाञ्जलिपुटौ तूष्णीं तस्थतुर्दक्षवामगौ॥ ९ | उनके दायें-बायें भागमें चुपचाप खड़े हो गये। पि.
तत्र संस्थाप्य तौ देवं सकुटुम्बं वरासने।
उन्होंने वहाँ [साक्षात् प्रकट] पूजनीय
कुटुम्बसहित श्रेष्ठ आसनपर स्थापित करके पर्व
पूजयामासतुः पूज्यं पुण्यैः पुरुषवस्तुभि:॥ २ पुरुष-वस्तुओंद्वारा उनका पूजन किया॥ १-२॥
आ० ९]
विद्येश्वरसंहिता
७१
पौरुषं प्राकृतं वस्तु ज्ञेयं दीर्घाल्पकालिकम्।
हारनूपुरकेयूरकिरीटमणिकुण्डलैः ॥ ३
यज्ञसूत्रोत्तरीयस्त्रवक्षौममाल्यादुलीयकै: ।
पुष्पताम्बूलकर्पूरचन्दनागुरुलेपनै: ॥ ४
धूपदीपसितच्छत्रव्यजनध्वजचामरैः \
अन्यैर्दिव्योपहारैश्रच वाङ्मनोतीतवैभवैः॥ ५
पतियोग्यैः पश्चलभ्यैस्तौ समार्चयतां पतिम्।
यद्ाच्छेष्ठतमं वस्तु पतियोग्यं हितध्वज॥ ६
तद्वस्त्वखिलमीशोऽपि पारम्पर्यचिकीर्षया।
सभ्यानां प्रददौ हृष्टः पृथक् तत्र यथाक्रमम्॥ ७
कोलाहलो महानासौत्तत्र तद्वस्तु गृह्णताम्।
तत्रैव ब्रह्मविष्णुभ्यां चार्चितः शङ्करः पुरा ८
प्रसन्नः प्राह तौ नम्रौ सस्मितं भक्तिवर्धनः।
ईश्वर उवाच
तुष्टोऽहमद्य वां वत्सौ पूजयास्मिन् महादिने॥
दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरम्
शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया॥ १०
एतत्काले तु यः कुर्यात् पूजां मल्लिङ्गवेरयोः।
कुर्यात् स जगतः कृत्यं स्थितिसर्गादिकं पुमान्॥ ११
दीर्घकालतक अविकृतभावसे सुस्थित रहनेवाली
चस्तुओंको पुरुषवस्तु कहते हैं और अल्पकालतक ही
'टिकनेवाली सस्तुएँ. प्राकृतवस्तु कहलाती हैं-इस
तरह वस्तुके ये दो भेद जानने चाहिये। [किन पुरुष-
वस्तुओंसे उन्होंने भगवान् शिवका पूजन किया, यह
बताया जाता है-] हार, नूपुर, केयूर, किरीट,
मणिमय कुण्डल, यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, पुष्प-
माला, रेशमी वस्त्र, हार, मुद्रिका (अँगूठी), पुष्प,
ताम्बूल, कपूर, चन्दन एवं अगुरुका अनुलेप, धूप,
दीप, श्वेतछत्र, व्यजन, ध्वजा, चँवर तथा अन्यान्य
दिव्य उपहारोंद्वारा उन दोनोंने अपने स्वामी महेश्वरका
पूजन किया, जिन महेश्वरका वैभव वाणी और मनकी
पहुँचसे परे था, जो केवल पशुपति परमात्माके ही
योग्य थे और जिन्हें पशु (बद्ध जीव) नहीं पा सकते
थे॥ ३--५४/२॥
हे सनत्कुमार! स्वामीके योग्य जो-जो उत्तम
वस्तुएँ थीं, उन सभी वस्तुओंका भगवान् शंकरने भी
प्रसन्नतापूर्वक यथोचित रूपसे सभासदोंके बीच वितरण
कर दिया, जिससे यह श्रेष्ठ परम्परा बनी रहे कि प्राप्त
पदार्थोंका वितरण आश्रितोंमें करना चाहिये। उन
चस्तुओंको ग्रहण करनेवाले सभासदोंमें वहाँ कोलाहल
मच गया। इस प्रकार वहाँ पहले ही ब्रह्मा तथा
विष्णुसे पूजित हुए भक्तिवर्धक भगवान् शिव विनम्र
उन दोनों देवताओंसे हँसकर कहने लगे॥ ६-८९/२॥
ईश्वर बोले-हे पुत्रो! आजका दिन महान्
है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है,
इससे मैं तुमलोगोंपर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह
दिन परम पवित्र और महान्-से-महान् होगा। आजकी
यह तिथि शिवरात्रिके नामसे विख्यात होकर मेरे लिये
परम प्रिय होगी ॥ ९-१०॥
इस समय जो मेरे लिंग (निष्कल-अंग-
आकृतिसे रहित निराकार स्वरूपके प्रतीक) और वेर
(सकल--साकाररूपके प्रतीक विग्रह)-की पूजा करेगा,
वह पुरुष जगतूकी सृष्टि और पालन आदि कार्य भी
कर सकता है॥ ११॥
७२
श्रीशिवमहापुराण
[ अण १
शिवरात्रावहोरात्रं निराहारो जितेन्द्रिय: ।
अर्चयेद्वा यथान्यायं यथाबलमवञ्चकः॥ १२
यत्फलं मम पूजायां वर्षमेकं निरन्तरम्।
तत्फलं लभते सद्यः शिवरात्रौ मदर्चनात्॥ १३
मद्धर्मवृद्धिकालोऽयं चन्द्रकाल इवाम्बुधेः।
प्रतिष्ठाद्युत्सवो यत्र मामको मङ्गलायनः॥ १४
यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा।
स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादाद्राक्रक्षमर्भको ॥ १५
आद्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम्।
मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः॥ १६
अलं दर्शनमात्रेण फलं तस्मिन् दिने शुभे।
अभ्यर्चनं चेदधिकं फलं वाचामगोचरम्॥ १७
रणरङ्गतलेऽमुष्मिन् यदहं लिङ्गवर्ष्मणा।
जृम्भतो लिङ्गवत्तस्माल्लिङ्गस्थानमिदं भवेत्॥ १८
अनाद्यन्तमिदं स्तम्भमणुमात्रं भविष्यति।
दर्शनार्थं हि जगतां पूजनार्थं हि पुत्रकौ॥ १९
भोगावहमिदं लिङ्गं भुक्तिमुक्त्येकसाधनम्।
दर्शनस्पर्शनध्यानाज्जन्तूनां जन्ममोचनम्॥ २०
अनलाचलसङ्काशं यदिदं लिङ्गमुत्थितम्।
अरुणाचलमित्येव तदिदं ख्यातिमेष्यति॥ २१
अत्र तीर्थं च बहुधा भविष्यति महत्तरम्।
मुक्तिरप्यत्र जन्तूनां वासेन मरणेन च॥ २२
जो शिवरात्रिको दिन-रात निराहार एवं
रहकर अपनी शक्तिके अनुसार निष्कपट भावसे मेत
यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलनेवाले फलका वर्ण,
सुनो। एक वर्षतक निरन्तर मेरी पूजा करनेपर जो फ्त
मिलता है, वह सारा फल केवल शिवरात्रिको मेरा पूजा
करनेसे मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता है॥ १२-१३।
जैसे पूर्ण चन्द्रमाका उदय समुद्रकी वृद्धिका
अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे धर्मकी
वृद्धिका समय है। इस तिथिमें मेरी स्थापना आदिका
मंगलमय उत्सव होना चाहिये॥ १४॥
हे वत्सो! पहले मैं जब ज्योतिर्मय स्तम्भरूपे
प्रकट हुआ था, उस समय मार्गशीर्षमासमें आर्द्रा नक्षा
था। अतः जो पुरुष मार्गशीर्षमासमें आर्द्रा नक्षत्र होने
मुझ उमापतिका दर्शन करता है अथवा मेरी मूर्ति या
लिंगकी ही झाँकीका दर्शन करता है, वह मेरे लिये
कार्तिकेयसे भी अधिक प्रिय है। उस शुभ दिन मे
दर्शनमात्रसे पूरा फल प्राप्त होता है। यदि [ दर्शनकें
साथ-साथ] मेरा पूजन भी किया जाय तो उसका अधिक
फल प्राप्त होता है, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो
सकता॥ १५-१७॥
इस रणभूमिमें मैं लिंगरूपसे प्रकट होकर बहुत
बड़ा हो गया था। अत: उस लिंगके कारण यह
भूतल लिंगस्थानके जामसे प्रसिद्ध हुआ। हे पुत्रो!
जगत्के लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें
इसके लिये यह अनादि और अनन्त ज्योतिःस्तम्भ
अत्यन्त छोटा हो जायगा। यह लिंग सब प्रकारे
भोगोंको सुलभ करानेवाला और भोग तथा मोक्षी
एकमात्र साधन होगा। इसका दर्शन, स्पर्श तथा ध्यात
प्राणियोंको जन्म और मृत्युसे छुटकारा दिलानेवार्ली
होगा॥ १८-२०॥ 4
अग्निके पहाड़-जैसा जो यह शिवलिंग वश
प्रकट हुआ है, इसके कारण यह स्थान अरुणा
नामसे प्रसिद्ध होगा। यहाँ अनेक प्रकारके बडे
तीर्थ प्रकट होंगे। इस स्थानमें निवास करने या मी
जीवोंका मोक्ष हो जायगा॥ २१-२२॥
आ० ९]
विद्येश्वरसंहिता
७३
रथोत्सवादिकल्याणं जनावासं तु सर्वतः।
अत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्व कोटिगुणं भवेत्॥ २३
मत्क्षेत्रादपि सर्वस्मात् क्षेत्रमेतन्महत्तरम्।
अत्र संस्मृतिमात्रेण मुक्तिर्भवति देहिनाम्॥ २४
तस्मान्महत्तरमिदं क्षेत्रमत्यन्तशो भनम् ।
सर्वकल्याणसम्पूर्ण सर्वमुक्तिकरं शुभम्॥ २५
अर्च॑यित्वात्र मामेव लिङ्गे लिङ्गिनमीश्वरम्।
सालोक्यं चैव सामीप्यं सारूप्यं साष्टिरिव च॥ २६
सायुज्यमिति पञ्चैते क्रियादीनां फलं मतम्।
सर्वेऽपि यूयं सकलं प्राप्स्यथाशु मनोरथम्॥ २७
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्यनुगृह्य भगवान् विनीतौ विधिमाधवौ।
यत्पूर्वं प्रहतं युद्धे तयोः सैन्यं परस्परम्॥ २८
तदुत्थापयदत्यर्थं स्वशक्त्यामृतधारया।
तयोमोढ्यं च वैरं च व्यपनेतुमुवाच तो॥ २९
सकलं निष्कलं चेति स्वरूपद्दयमस्ति मे।
नान्यस्य कस्यचित्तस्मादन्यः सर्वोऽप्यनीश्वरः ॥ ३०
पुरस्तात् स्तम्भरूपेण पश्चाद् रूपेण चार्भकौ।
ब्रह्मत्वं निष्कलं प्रोक्तमीशत्वं सकलं तथा॥ ३१
द्वयं ममैव संसिद्धं न मदन्यस्य कस्यचित्
तस्मादीशत्वमन्येषां युवयोरपि न क्वचित्॥ ३२
तदज्ञानेन वां वृत्तमीशमानं महाद्धुतम्।
तन्निराकर्तुमत्रैवमुत्थितोऽहं रणक्षितौ॥
त्यजतं मानमात्मीयं मयीशे कुरुतं मतिम्।
मत्प्रसादेन लोकेषु सर्वोऽप्यर्थः प्रकाशते॥ ३४
गुरूक्तिर्व्यञ्जकं तत्र प्रमाणं वा पुनः पुनः।
ब्रह्मतत्त्वमिदं गूढं भवत्प्रीत्या भणाम्यहम्॥ ३५
रथोत्सवादिके आयोजनसे यहाँ सर्वत्र अनेक लोग
कल्याणकारी रूपसे निवास करेंगे । इस स्थानपर किया
गया दान, हवन तथा जप-यह सब करोड़गुना फल
देनेवाला होगा । यह क्षेत्र मेरे सभी क्षेत्रोंमें श्रेष्ठतम होगा।
यहाँ मेरा स्मरण करनेमात्रसे प्राणियोंकी मुक्ति हो
जायगी । अतः यह परम रमणीय क्षेत्र अति महत्त्वपूर्ण
है। यह सभी प्रकारके कल्याणांसे पूर्ण, शुभ और
सबको मुक्ति प्रदान करनेवाला होगा ॥ २३-२५॥
इस लिंगमें मुझ लिंगेशवरकी अर्चना करके
मनुष्य सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, साष्टि और
सायुज्य-इन पाँचों प्रकारकी मुक्तियोंका अधिकार
प्राप्त कर लेगा। आपलोगोंको भी शीघ्र ही सभी
मनोवांछित फल प्राप्त होंगे॥ २६-२७॥
नन्दिकेश्वर बोले--इस प्रकार विनम्र ब्रह्मा
तथा विष्णुपर अनुग्रह करके भगवान् शंकरने उनके जो
सैन्यदल परस्पर युद्धमें मारे गये थे, उन्हें अपनी अमृतवर्षिणी
शक्तिसे जीवित कर दिया । उन दोनों ब्रह्मा और विष्णुकी
मूढ़ता और [पारस्परिक] वैरको मिटानेके लिये भगवान्
शंकर उन दोनोंसे कहने लगे-॥ २८-२९॥
मेरे दो रूप हैं-“सकल' और ' निष्कल '। दूसरे
किसीके ऐसे रूप नहीं हैं, अतः [मेरे अतिरिक्त]
अन्य सब अनीश्वर हैं। हे पुत्रो ! पहले मैं स्तम्भरूपसे
प्रकट हुआ, फिर अपने साक्षात्-रूपसे। 'ब्रह्मभाव'
मेरा 'निष्कल' रूप और “महेश्वरभाव' सकल रूप
है। ये दोनों मेरे ही सिद्धरूप हैं; मेरे अतिरिक्त किसी
दूसरेके नहीं हैं । इस कारण तुम दोनोंका अथवा अन्य
किसीका भी ईश्वरत्व कभी नहीं है॥ ३०-३२॥
अज्ञानके कारण तुम दोनोंको जो यह ईशत्वका
आश्चर्यजनक अभिमान उत्पन्न हो गया था, उसे
दूर करनेके लिये ही मैं इस रणभूमिमें प्रकट हुआ हूँ।
उस अपने अभिमानको छोड़ दो और मुझ
पस्मेश्वरमें [अपनी] बुद्धि स्थिर करो। मेरे अनुग्रहसे
ही सभी लोकोंमें सब कुछ प्रकाशित होता है। इस
गूढ़ ब्रह्मतत्त्वको तुम्हारे प्रति प्रेम होनेके कारण ही मैं
बता रहा हूँ॥ ३३-३५॥
छ्ड
श्रीशिवमहापुराण
[अ १
`
अहमेव परं ब्रह्म मत्स्वरूपं कलाकलम्।
ब्रहमत्वादीश्वरश्राहं कृत्यं मेऽनुग्रहादिकम्॥ ३६
बृहत्त्वाद बृंहणत्वाच्य ब्रह्माहं ब्रह्मकेशवौ।
समत्वाद्ययापकत्वाच्च तथैवात्माहमर्भको॥ ३७
अनात्मानः परे सर्वे जीवा एव न संशयः।
अनुग्रहाद्यं सर्गान्तं जगत्कृत्यं च पञ्चकम्॥ ३८
ईशत्वादेव मे नित्यं न मदन्यस्य कस्यचित्।
आदौ ब्रह्मत्वबुद्धयर्थ निष्कलं लिङ्गमुत्थितम्॥ ३९
तस्मादज्ञातमीशत्वं व्यक्तं द्योतयितुं हि वाम्।
सकलोऽहमतो जातः साक्षादीशस्तु तत्क्षणात्॥ ४०
सकलत्वमतो ज्ञेयमीशत्वं मयि सत्वरम्।
'यदिदं निष्कलं स्तम्भं मम ब्रह्मत्वबोधकम्॥ ४१
लिङ्गलक्षणयुक्तत्वान्मम लिङ्गं भवेदिदम्।
तदिदं नित्यमभ्यर्यं युवाभ्यामत्र पुत्रको॥ ४२
मदात्मकमिदं नित्यं मम सान्निध्यकारणम्।
महत्पूज्यमिदं नित्यमरभेदाल्लिङ्गलिङ्गिनोः॥ ४३
यत्र प्रतिष्ठितं येन मदीयं लिङ्गमीदृशम्।
तत्र प्रतिष्ठितः सोऽहमप्रतिष्ठोऽपि वत्सकौ ॥ ४४
मत्साम्यमेकलिङ्गस्य स्थापने फलमीरितम्।
द्वितीये स्थापिते लिङ्गे मदैक्यं फलमेव हि॥ ४५
मैं ही परब्रह्म हूँ। कल (सगुण) और अक
(निर्गुण) ये दोनों मेरे ही स्वरूप हैं। मेरा
ब्रह्मरूप होनेके कारण मैं ईश्वर भी हूँ। जीवों
अनुग्रह आदि करना मेरा कार्य है। हे ब्रह्मा औ
केशव! सबसे बृहत् और जगतूकी वृद्धि करनेवाल
होनेके कारण मैं 'ब्रह्म' हूँ। हे पुत्रो! सर्वत्र समरूप
स्थित और व्यापक होनेसे मैं ही सबका आल
हूँ॥ ३६-३७॥
अन्य सभी जीव अनात्मरूप हैं; इसमें सन्के
नहीं है। सर्गसे लेकर अनुग्रहतक (आत्मा या ईश्वर
भिन्न) जो जगत्-सम्बन्धी पाँच कृत्य हैं, वे सदा मै
ही हैं, मेरे अतिरिक्त दूसरे किसीके नहीं हैं; क्योंकि
मैं ही सबका ईश्वर हूँ। पहले मेरी ब्रह्मरूपताका बोध
करानेके लिये “निष्कल' लिंग प्रकट हुआ था, फि
तुम दोनोंको अज्ञात ईश्वरत्वका स्पष्ट साक्षात्का
करानेके लिये मैं साक्षात् जगदीश्वर ही "सकल!
रूपमें तत्काल प्रकट हो गया। अत: मुझमें जो ईशत
है, उसे ही मेरा सकलरूप जानना चाहिये तथा जे
यह मेरा निष्कल स्तम्भ है, वह मेरे ब्रह्मस्वरूपका
बोध करानेवाला है । हे पुत्रो! लिंग-लक्षणयुक्त होनेके
कारण यह मेरा ही लिंग (चिह्न) है। तुम दोनोंको
प्रतिदिन यहाँ रहकर इसका पूजन करना चाहिये। य
मेरा ही स्वरूप है और मेरे सामीप्यकी प्रि
करानेवाला है। लिंग और लिंगीमें नित्य अभेद होगें
कारण मेरे इस लिंगका महान् पुरुषोंको भी पूर्ण
करना चाहिये॥ ३८--४३॥
हे वत्सो! जहाँ-जहाँ जिस किसीने मेरे लिंगी
स्थापित कर लिया, वहाँ मैं अप्रतिष्ठित होनेपर भै
प्रतिष्ठित हो जाता हूँ॥ ४४॥
मेरे एक लिंगकी स्थापना करनेका फल म
समानताकी प्राप्ति बताया गया है। एकके बाद दृ
शिवलिंगकी भी स्थापना कर दी गयी, तब
मेरे साथ एकत्व (सायुज्य मोक्ष)-रूप फल
होता है॥ ४५॥
अ० १०]
विद्येश्वरसंहिता ७५
लिङ्गं प्राधान्यतः स्थाप्यं तथा बेरं तु गौणकम्।
प्रधानतया शिवलिंगकी ही स्थापना करनी
लिङ्गाभावे न तत्क्षेत्रं सवेरमपि सर्वतः॥ ४६ | चाहिये। मूर्तिकी स्थापना उसकी अपेक्षा गौण है।
शिवलिंगके अभावमें सब ओरसे मूर्तियुक्त होनेपर
भी वह स्थान क्षेत्र नहीं कहलाता ॥ ४६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवस्य महेश्वराभिधानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योश्वरसंहितामें शिवके महेशवरत्वका
वर्णन नामक नाँवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्योंका प्रतिपादन, प्रणव एवं पंचाक्षर-मन्त्रकी महत्ता,
ब्रह्मा-विष्णुद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तर्धान होना
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः
सर्गादिपञ्जकृत्यस्य लक्षणं ब्रूहि नौ प्रभो।
शिव उवाच
मत्कृत्यबोधनं गुह्यं कृपया प्रब्रवीमि वाम्॥
सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः ।
पञ्जैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतो॥
सर्गः संसारसंरम्भस्तत््रतिष्ठा स्थितिर्मता।
संहारो मर्दनं तस्य तिरोभावस्तदुत्क्रमः॥
तन्मोक्षोऽनुग्रहस्तन्मे कृत्यमेवं हि पञ्चकम्।
कृत्यमेतद्वहत्यन्यस्तूष्णी गोपुरबिम्बवत्॥
सर्गादि यच्चतुःकृत्यं संसारपरिजृम्भणम्।
पञ्चमं मुक्तिहेतुवै नित्यं मयि च सुस्थिरम्॥
तदिदं पञ्चभूतेषु दूश्यते मामकैर्जनैः।
सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहारः पावके तथा॥
तिरोभाबोऽनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे।
सृज्यते धरया सर्वमद्भिः सर्वं प्रवर्धते॥
अर्यते तेजसा सर्व॑ वायुना चापनीयते।
व्ोम्नानुगह्यते सर्व ज्ञेयमेवं हि सूरिभिः॥
ब्रह्मा और विष्णु बोले-हे प्रभो! हम दोनोंको
| आदि पाँच कृत्योंका लक्षण बताइ्ये ॥ */२॥
शिवजी बोले--मेरे कृत्योंको समझना अत्यन्त
गहन है, तथापि मैं कृपापूर्वक तुम दोनोंको उनके विषयमें
बता रहा हूँ । हे ब्रह्मा और अच्युत ! सृष्टि, स्थिति, संहार,
तिरोभाव और अनुग्रह- ये पाँच ही मेरे जगत्-सम्बन्धी
कार्य हैं, जो नित्यसिद्ध हैं। संसारकी रचनाका जो आरम्भ
है, वह ' सर्ग है। मुझसे पालित होकर सृष्टिका सुस्थिररूपसे
रहना ही उसकी “स्थिति ' कहा गया है । उसका विनाश
ही “संहार” है। प्राणोंका उत्क्रमण ही “तिरोभाव” है।
इन सबसे छुटकारा मिल जाना ही मेरा “अनुग्रह है।
इस प्रकार मेरे पाँच कृत्य हैं । इन मेरे कर्तव्योंको चुपचाप
अन्य पंचभूतादि वहन करते रहते हैं, जैसे जलमें पड़नेवाले
गोपुर-बिम्बमें आवागमन होता रहता है॥ १-४॥
सृष्टि आदि जो चार कृत्य हैं, वे संसारका विस्तार
करनेवाले हैं। पाँचवाँ कृत्य अनुग्रह मोक्षका हेतु है।
बह सदा मुझमें ही अचल भावसे स्थिर रहता है। मेरे
भक्तजन इन पाँचों कृत्योंको पाँचों भूतोंमें देखते हैं।
सृष्टि भूतलमें, स्थिति जलमें, संहार अग्निमें, तिरोभाव
वायुमें और अनुग्रह आकाशमें स्थित है। पृथ्वीसे सबकी
सृष्टि होती है, जलसे सबकी वृद्धि होती है, आग सबको
जला देती है, वायु सबको एक स्थानसे दूसरे स्थानको
ले जाती हैं और आकाश सबको अनुगृहीत करता है=
यह विद्वान् पुरुषोंको जानना चाहिये ॥ ५--८॥ |
७६
पञ्चकृत्यमिदं वोढुं ममास्ति मुखपञ्चकम्।
चतुर्दिक्षु चतुर्वक्त्रं तन्मध्ये पञ्चमं मुखम्॥ ९
युवाभ्यां तपसा लब्धमेतत्कृत्यद्वयं सुतौ।
सृष्टिस्थित्यभिधं भाग्यं मत्तः प्रीतादतिप्रियम् १०
तथा रूद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम्।
अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते॥ ११
तत्सर्व पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम्।
न तद् रुद्रमहेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादूशम्॥ १२
रूपे वेषे च कृत्ये च वाहने चासने तथा।
आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम्॥ १३
मद्भयानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम्
मज्ज्ञाने सति मैवं स्यान्मानं रूपं महेशवत्॥ १४
तस्मान्मज्ज्ञानसिद्धयर्थं मन्त्रमोंकारनामकम्।
इतः परं प्रजपतं मामकं मानभञ्जनम्॥ १५
उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्।
ॐकारो मन्मुखाजज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः ॥ १६
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः।
तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्।
मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८
जादो मध्यमुखादेवं पञ्जचधासौ विजुम्भितः।
एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९
नामरूपात्मकं सर्व वेदभूतकुलद्वयम्।
व्याप्तमेतेन मत्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० %
== SS CCC कक
इन पाँच कृत्योंका भार वहन करनेके लिये
मेरे पाँच मुख हैं। चार दिशाओंमें चार मुख हैं औ
इनके बीचमें पाँचवाँ मुख है । हे पुत्रो! तुम दोनो
तपस्या करके प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वरसे
सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किये हैं।३
दोनों तुम्हें बहुत प्रिय हैं। इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरा
रुद्र और महेश्वरने दो अन्य उत्तम कृत्य--संहार औ.
तिरोभाव मुझसे प्राप्त किये हैं, परंतु अनुग्रह नामक
कृत्य कोई नहीं पा सकता॥ ९--११॥
उन सभी पहलेके कर्माको तुम दोनोंने समयानुसा!
भुला दिया। रुद्र और महेश्वर अपने कर्मोंको नहीँ
भूले हैं, इसलिये मैंने उन्हें अपनी समानता प्रदान कौ
है। वे रूप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुष
आदिमें मेरे समान ही हैं॥ १२-१३॥
हे पुत्रो! मेरे ध्यानसे शून्य होनेके काण
तुम दोनोंमें मूढ़ता आ गयी है, मेरा ज्ञान रहनेप
महेशके समान अभिमान और स्वरूप नहीं रहता
इसलिये मेरे ज्ञानकी सिद्धिके लिये मेरे ओंकार नामक
मन्त्रका तुम दोनों जप करो, यह अभिमानको दू
करनेवाला है॥ १४-१५॥
पूर्वकालमें मैंने अपने स्वरूपभूत मन्त्रका उपदेश
किया है, जो ओंकारके रूपमे प्रसिद्ध है । वह महामंगलकां
मन्त्र है । सबसे पहले मेरे मुखसे ओंकार (3%) प्रकर
हुआ, जो मेरे स्वरूपका बोध करानेवाला है। ओंका(
वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ह
है। प्रतिदिन ओंकारका निरन्तर स्मरण करनेसे मेर है
सदा स्मरण होता रहता है॥ १६-१७॥
पहले मेरे उत्तरवती मुखसे अकार, परि
मुखसे उकार, दक्षिण मुखसे मकार, पूर्ववर्ती
बिन्दु तथा मध्यवर्ती मुखसे नाद उत्पन्न हुआ।
प्रकार पाँच अवयवोंसे युक्त होकर ओंकारका
हुआ है। इन सभी अवयवोंसे एकीभूत होकर
प्रणव ३ नामक एक अक्षर हो गया। यह
रूपात्मक सारा जगत् तथा वेद-वर्णित स्रुरु
दोनों कुल इस प्रणव-मन्त्रसे व्याप्त हैं। यह मर
और शक्ति दोनोंका बोधक है॥ १८-२०॥
श
आ० १०]
विद्येश्वरसंहिता
७७
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्।
अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१
अस्मात् पञ्चाक्षराजाता मातृकाः पञ्चभेदतः।
तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपादरायत्रिरिव हि॥ २२
बेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मन्त्रकोटयः।
तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्॥ २३
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति।
सकला मन्त्रराजानः साक्षाद्धोगप्रदाः शुभाः॥ २४
नन्दिकेश्वर उवाच
पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः
प्रकल्प्य मन्त्रं च समादिशत् परम्।
निधाय तच्छीर्ष्णि कराम्बुजं शनै-
रुदङ्मुखं संस्थितयोः सहाम्बिकः॥ २५
त्रिरुच्यार्याग्रहीन्मन्त्रं यन्त्रतन्त्रोक्तिपूर्वकम्।
शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समार्पयत्॥ २६
प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदन्तिके
तमूचतुर्देववरं जगदगुरुम्॥ २७
्रह्माच्युतावूचतुः
नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे।
नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने॥
नम: प्रणववाच्याय नमः प्रणबलिङ्गिने।
नमः सृष्ट्यादिकत्रें च नमः पञ्चमुखाय ते॥ २९
इसी प्रणवसे पंचाक्षरमन्त्रकी उत्पत्ति हुई है, जो
मेरे सकल रूपका बोधक है। वह अकारादि क्रमसे और
नकारादि क्रमसे क्रमशः प्रकाशमें आया है। [3%
नमः शिवाय] इस पंचाक्षरमन्त्रसे मातृकावर्ण प्रकट
हुए हैं, जो पाँच भेदवाले हैं।* उसीसे शिरोमन्त्र तथा
चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्रीका प्राकट्य हुआ है। उस
गायत्रीसे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और उन वेदोंसे
करोड़ों मन्त्र निकले हैं । उन-उन मन्त्रोसे भिन्न-भिन्न
कार्यांकी सिद्धि होती है, परंतु इस प्रणव एवं पंचाक्षरसे
सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है । इस मूलमन्त्रसे भोग
और मोक्ष दोनों ही सिद्ध होते हैं। मेरे सकल स्वरूपसे
सम्बन्ध रखनेवाले सभी मन्त्रराज साक्षात् भोग प्रदान
करनेवाले और शुभकारक हैं ॥ २१-२४॥
नन्दिकेश्वर बोले--तदनन्तर जगदम्बा पार्वतीके
साथ बैठे हुए गुरुवर महादेवजीने उत्तराभिमुख बैठे
हुए ब्रह्मा और विष्णुको परदा करनेवाले वस्त्रसे
आच्छादित करके उनके मस्तकपर अपना करकमल
रखकर धीरे-धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मन्त्रका
उपदेश दिया ॥ २५॥
यन्त्र-तन्त्रमें बतायी हुई विधिके पालन-
पूर्वक तीन बार मन्त्रका उच्चारण करके भगवान् शिवने
उन दोनों शिष्योंको मन्त्रकी दीक्षा दी। तत्पश्चात् उन
शिष्योंने गुरुदक्षिणाके रूपमें अपने-आपको ही समर्पित
कर दिया और दोनों हाथ जोड़कर उनके समीप खड़े
हो उन देवश्रेष्ठ जगद्गुरुका स्तवन किया॥ २६-२७॥
ब्रह्मा और विष्णु बोले [हे प्रभो] आप
निष्कलरूप हैं; आपको नमस्कार है। आप निष्कल तेजसे
प्रकाशित होते हैं; आपको नमस्कार है। आप सबके स्वामी
हैं; आपको नमस्कार है। आप सर्वात्माको नमस्कार
है अथवा सकल-स्वरूप आप महेश्वरको नमस्कार
है। आप प्रणवके वाच्यार्थ हैं; आपको नमस्कार है।
आप प्रणवलिंग-वाले हैं; आपको नमस्कार है । सृष्टि,
पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह करनेवाले
आपको नमस्कार है। आपके पाँच मुख हैं; आपको
नमस्कार है। पंचब्रह्मस्वरूप पाँच कृत्यवाले आपको
60 3 8800608 34822 ७ > ऱ्य क््क्य्किपिप पा
* अइ उ ऋ लृ-ये पाँच मूलभूत स्वर हैं तथा व्यंजन भी पाँच-पाँच वर्णासे युक्त पाँच वर्गवाले हैं।
७८ श्रीशिवमहापुराण
CS TD i क.
पञ्जब्रह्मस्वरूपाय पञ्चकृत्याय ते नमः।
आत्मने ब्रह्मणे तुभ्यमनन्तगुणशक्तये॥ ३०
सकलाकलरूपाय शम्भवे गुरवे नमः।
इति स्तुत्वा गुरुं पदयब्रह्या विष्णुश्च नेमतुः॥ ३१
ईश्वर उवाच
बत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम्।
जपतं प्रणवं मन्त्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्॥ ३२
ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्चतम्।
आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जप्यं त्वक्षयं भवेत्॥ ३३
' सूर्यगत्या महारद्रायामेकं कोटिगुणं भवेत्।
मृगशीर्षान्तिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा॥ ३४
आर्द्रासमं सदा ज्ञेयं पूजाहोमादितर्पणे।
दर्शनं तु प्रभाते च प्रातःसङ्गवकालयोः॥ ३५
चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत्।
प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते॥ ३६
लिङ्गं वेरं च मे तुल्यं यजतां लिङ्गमुत्तमम्।
तस्माल्लिङ्गं परं पूज्यं बेरादपि मुमुक्षुभिः॥ ३७
लिङ्गमोङ्कारमन्त्रेण वेरं पञ्चाक्षरेण तु।
स्वयमेव हि सदद्रव्ये: प्रतिष्ठाप्यं परैरपि॥ ३८
पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत्।
इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवान्तर्हितः शिवः॥ ३९
[अ १३
नमस्कार है। आप सबके आत्मा हैं, ब्रह्म हैं,
गुण और आपकी शक्तियाँ अनन्त हैं, आपके
नमस्कार है। आपके सकल और निष्कल दो रूप हैं
आप सद्गुरु एवं शम्भु हैं, आपको नमस्कार है। ज्ञ
पद्योंद्रार अपने गुरु महेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा औः
विष्णुने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २८--३१॥
ईश्वर बोले--हे वत्सो! मैंने तुम दोनोंसे सा
तत्त्व कहा और दिखा दिया। तुमदोनों देवीके द्वार
उपदिष्ट प्रणव (३%), जो मेरा ही स्वरूप है-का
निरन्तर जप करो॥ ३२॥
[इसके जपसे] ज्ञान, स्थिर भाग्य--सब कुछ
सदाके लिये प्राप्त हो जाता है। आर्द्रा नक्षत्रसे युक्त
चतुर्दशीको प्रणवका जप किया जाय तो वह अक्षय फल
देनेवाला होता है । सूर्यकी संक्रान्तिसे युक्त महा-आद्र
नक्षत्रमें एक बार किया हुआ प्रणवजप कोटिगुने जपका
फल देता है। मृगशिरा नक्षत्रका अन्तिम भाग तथा पुनर्वसुका
आदिभाग पूजा, होम और तर्पण आदिके लिये सदा
आद्रकि समान ही होता है-यह जानना चाहिये । मेर
या मेरे लिंगका दर्शन प्रभातकालमें ही प्रातः तथा संगव
(मध्याह्नके पूर्व) -कालमें करना चाहिये ॥ ३३--३५॥
मेर दर्शन-पूजनके लिये चतुर्दशी तिथि निशीथव्यापिनी
अथवा प्रदोषव्यापिनी लेनी चाहिये; क्योंकि परवर्तिनी
(अमावास्या) तिथिसे संयुक्त चतुर्दशीकी ही प्रशंसा
की जाती है। पूजा करनेवालोंके लिये मेरी मूर्ति तथा
लिंग दोनों समान हैं, फिर भी मूर्तिकी अपेक्षा लिंगका
स्थान श्रेष्ठ है । इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको चाहिये कि वै
वेर (मूर्ति)-से भी श्रेष्ठ समझकर लिंगका ही पूर्ण
करें । लिंगका ॐकारमन्त्रसे और वेरका पंचाक्षरमलै
पूजन करना चाहिये। शिवलिंगकी स्वयं ही स्थाप
करके अथवा दूसरोंसे भी स्थापना करवाकर उत्तम द्रव्य
उपचारोसे पूजा करनी चाहिये; इससे मेरा पद सुलभ है
जाता है। इस प्रकार उन दोनों शिष्योंको उपदेश दर
भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ३६-३९ |
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां ओंकारोपदेशवर्णन॑ नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येशवरसंहितामें ऑकारोपदेशका
वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
अ० १९]
विद्येश्वरसंहिता
७९
मी अथैकादशोऽध्यायः
शिवलिंगकी स्थापना, उसके लक्षण और पूजनकी विधिका वर्णन तथा
शिवपदकी प्राप्ति करानेवाले सत्कर्मोका विवेचन
ऋषय ऊचुः
कथं लिङ्गं प्रतिष्ठाप्यं कथं वा तस्य लक्षणम्।
कथं वा तत्समभ्यर्च्यं देशे काले च केन हि॥ १
सूत उवाच
युष्मदर्थं प्रवक्ष्यामि बुध्यतामवधानतः।
अनुकूले शुभे काले पुण्ये तीर्थे तटे तथा॥ २
यथेष्टं लिड्डमारोप्यं यत्र स्यान्नित्यमर्चनम्।
पार्थिवेन तथाप्येन तैजसेन यथारुचि॥ ३
'कल्पलक्षणसंयुक्तं लिङ्गं पूजाफलं लभेत्।
सर्वलक्षणसंयुक्तं सद्यः पूजाफलप्रदम्॥ ४
चरे विशिष्यते सूक्ष्मं स्थावरे स्थूलमेव हि।
सलक्षणं सपीठं च स्थापयेच्छिवनिर्मितम्॥ ५
मण्डलं चतुरस्त्रं वा त्रिकोणमथवा तथा।
खट्वाङ्गवन्मध्यसूक्ष्मं लिङ्गपीठं महाफलम्॥ ६
प्रथमं मृच्छिलादिभ्यो लिङ्गं लोहादिभिः कृतम्।
येन लिङ्गं तेन पीठं स्थावरे हि विशिष्यते॥
लिङ्गं पीठं चरे त्वेकं लिङ्गं बाणकृतं विना।
लिङ्गप्रमाणं कर्तृणां द्वादशाङ्कुलमुत्तमम्॥ ८
ऋषिगण बोले-[हे सूतजी!] शिवलिंगकी
स्थापना कैसे करनी चाहिये, उसका लक्षण क्या है
तथा उसकी पूजा कैसे करनी चाहिये, किस देश-
कालमें करनी चाहिये और किस द्रव्यके द्वारा उसका
निर्माण होना चाहिये ?॥ १॥
सूतजी बोले- [हे महर्षियो!] मैं आपलोगोंके
लिये इस विषयका वर्णन करता हूँ। ध्यान देकर
समझिये। अनुकूल एवं शुभ समयमें किसी पवित्र तीर्थमें
अथवा नदी आदिके तटपर अपनी रुचिके अनुसार ऐसी
जगह शिवलिंगकी स्थापना करनी चाहिये, जहाँ नित्य
पूजन हो सके । पार्थिव द्रव्यसे, जलमय द्रव्यसे अथवा
धातुमय पदार्थसे अपनी रुचिके अनुसार कल्पोक्त लक्षणोंसे
युक्त शिवलिंगका निर्माण करके उसकी पूजा करनेसे
उपासकको उस पूजनका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है।
सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त शिवलिंग तत्काल पूजाका
फल देनेवाला होता है॥ २-४॥
यदि चलप्रतिष्ठा करनी हो तो इसके लिये छोटा-
सा शिवलिंग और यदि अचलप्रतिष्ठा करनी हो तो
स्थूल शिवलिंग श्रेष्ठ माना जाता है । उत्तम लक्षणोंसे
युक्त पीठसहित शिवलिंगकी स्थापना करनी चाहिये।
शिवलिंगका पीठ मण्डलाकार (गोल), चौकोर,
त्रिकोण अथवा खट्वांगके आकारका (ऊपर गोल
तथा आगे लम्बा) होना चाहिये । ऐसा लिंगपीठ महान्
फल देनेवाला होता है॥५-६॥
पहले मिट्टी, प्रस्तर आदिसे अथवा लोहे आदिसे
शिवलिंगका निर्माण करना चाहिये। जिस द्रव्यसे
शिवलिंगका निर्माण हो, उसीसे उसका पीठ भी
बनाना चाहिये-यही स्थावर (अचल प्रतिष्ठावाले)
'शिवलिंगकी विशेष बात है। चर (चलप्रतिष्ठावाले)
शिवलिंगमें भी लिंग और पीठका एक ही उपादान
होना चाहिये, किंतु बाणलिंगके लिये यह नियम नहीं
है। लिंगकी लम्बाई निर्माणकर्ताके बारह अंगुलके
८०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ११
न्यूनं चेत्फलमल्पं स्यादधिकं नैव दुष्यते।
कर्तुरेकाडुलन्यूनं चरेऽपि च तथैव हि॥ ९
आदौ विमानं शिल्पेन कार्य देवगणैर्युतम्।
तत्र गर्भगृहे रम्ये दृढे दर्पणसन्निभे॥ १०
भूषिते नवरल्नैश्र दिग्द्वा च प्रधानके।
नीलं रक्तं च वेडूर्य श्यामं मारकतं तथा॥ ११
मुक्ताप्रवालगोमेदवज्राणि नवरल्रकम्।
मध्ये लिङ्गं महद् द्रव्यं निःक्षिपेत्सहवैदिके ॥ १२
सम्पूज्य लिङ्गं सद्याद्यैः पञ्जस्थाने यथाक्रमम्।
अग्नौ च हुत्वा बहुधा हविषा सकुलं च माम्॥ १३
अभ्यर्च्य गुरुमाचार्यमर्थेः कामैश्च बान्धवम्।
दद्यादैश्र्यमर्थिभ्यो जडमप्यजडं तथा॥ १४
स्थावरं जङ्गमं जीवं सर्व सन्तोष्य यत्नतः।
सुवर्णपूरिते श्वभ्रे नवरलैश्च॒पूरिते॥ १५
सद्यादि ब्रह्म चोच्चार्य ध्यात्वा देवं परं शुभम्।
उदीर्यं च महामन्त्रमोंकारं नादघोषितम्॥ १६
लिङ्गं तत्र प्रतिष्ठाप्य लिङ्गं पीठेन योजयेत्।
लिङ्गं सपीठं निक्षिप्य नित्यलेपेन बन्धयेत्॥ १७
क . याशा.
बराबर होनी चाहिये--ऐसा ही शिवलिंग उत्तम
गया है। इससे कम लम्बाई हो तो फलमें कमी
जाती है, अधिक हो तो कोई दोष नहीं है। चर लिंगे
भी वैसा ही नियम है, उसकी लम्बाई कम-से-कम्
कर्ताके एक अंगुलके बराबर होनी चाहिये॥ ७-१
पहले शिल्पशास्त्रके अनुसार एक विमान या
देवालय बनवाये, जो देवगणोंकी मूर्तियोंसे अलंकृत
हो। उसका गर्भगृह बहुत ही सुन्दर, सुदृढ़ और दर्पणके
समान स्वच्छ हो। उसे नौ प्रकारके रत्नोंसे विभूषित
किया गया हो। उसमें पूर्व और पश्चिम दिशामें दे
मुख्य द्वार हों। जहाँ शिवलिंगकी स्थापना करनी हो,
उस स्थानके गर्तमें नीलम, लाल रत्न, वैदूर्य, श्याम
रत्न, मरकत, मोती, मूँगा, गोमेद और हीरा-इन नै
रत्नोंको तथा अन्य महत्त्वपूर्ण द्रव्योंको वैदिक मन्त्रोंके
साथ छोड़े। सद्योजात आदि पाँच वैदिक मन्त्रोंद्वाग
शिवलिंगका पाँच स्थानोंमें क्रमश: पूजन करके
अग्निमें हविष्यकी अनेक आहुतियाँ दे और परिवारसहित
मेरी पूजा करके गुरुस्वरूप आचार्यको धन तथा भाई
बन्धुओंको अभिलषित वस्तुआंसे सन्तुष्ट करे। याचकोंकी
जड़ (सुवर्ण, गृह एवं भू-सम्पत्ति) तथा चेतन (गै
आदि) वैभव प्रदान करे॥ १०--१४॥
स्थावर-जंगम सभी जीवोंको यत्नपूर्वक सन्तुष्ट
करके एक गड्ढेमें सुवर्ण तथा नौ प्रकारके रल
भरकर सद्योजातादि* वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण करके
परम कल्याणकारी महादेवजीका ध्यान करे। तत्पश्चा
नादघोषसे युक्त महामन्त्र ओंकारका उच्चारण करके
उक्त गड्ढेमें शिवलिंगकी स्थापना करके उसे पीठे
संयुक्त करे। इस प्रकार पीठयुक्त लिंगकी स्थापन
करके उसे नित्य लेप (दीर्घकालतक टिके रहनेवाले
मसाले)-से जोड़कर स्थिर करे॥ १५-१७॥
* ३ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नम: ।
भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥
३ वामदेवाय जमो ज्येष्ठाय नम: श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नम: कालाय नम: कलविकरणाय नमो बलविकरणाय
बलाय जमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥
३८ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो
नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्॥
ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्मधिपतिब्रहमणो
ऽभिपति्ब्रह्या शिवो मे अस्तु सदा शिवोम्॥
अ० १९]
एवं वेरं च संस्थाप्यं तत्रैव परमं शुभम्।
पञ्चाक्षरेण वेरं तु उत्सवार्थं बहिस्तथा॥ १८
वेरं गुरुभ्यो गृह्णीयात्साधुभिः पूजितं तु वा।
एवं लिङ्गे च वेरे च पूजा शिवपदप्रदा॥ १९
पुनश्च द्विविधं प्रोक्तं स्थावरं जङ्गमं तथा।
स्थावरं लिङ्गमित्याहुस्तरुगुल्मादिकं तथा॥ २०
जङ्गमं लिङ्गमित्याहुः कृमिकीटादिकं तथा।
स्थावरस्य च शुश्रूषा जडुमस्य च तर्पणम्॥ २१
तत्तत्सुखानुरागेण शिवपूजां विदुर्बुधाः।
'पीठमम्बामयं सर्व शिवलिङ्गं च चिन्मयम्॥ २२
यथा देवीमुमामङ्के धृत्वा तिष्ठति शङ्करः।
तथा लिङ्गमिदं पीठं धृत्वा तिष्ठति सन्ततम्॥ २
एवं स्थाप्य महालिङ्गं पूजयेदुपचारकैः।
नित्यपूजा यथाशक्ति ध्वजादिकरणं तथा॥ २४
इति संस्थापयेल्लिङ्गं साक्षाच्छिवपदप्रदम्।
अथवा चरलिङ्गं तु षोडशैरुपचारकेः॥ २५
पूजयेच्च यथान्यायं क्रमाच्छिवपदप्रदम्।
आवाहनं चासनं च अर्घ्य पाद्यं तथैव च॥ २६
विद्येश्वरसंहिता
८९
इसी प्रकार वहाँ पंचाक्षर मन्त्रसे परम सुन्दर वेर
(मूर्ति)-की भी स्थापना करनी चाहिये (सारांश यह
कि भूमि-संस्कार आदिकी सारी विधि जैसी लिंगप्रतिष्ठाके
लिये कही गयी है, वैसी ही वेर (मूर्ति)-प्रतिष्ठाके
लिये भी समझनी चाहिये। अन्तर इतना ही है कि
लिंगप्रतिष्ठाके लिये प्रणवमन्त्रके उच्चारणका विधान
है, परंतु वेरकी प्रतिष्ठा पंचाक्षरमन्त्रसे करनी चाहिये) ।
जहाँ लिंगकी प्रतिष्ठा हुई है, वहाँ भी उत्सवके लिये
और बाहर सवारी निकालने आदिके निमित्त वेर ( मूर्ति )-
को रखना आवश्यक है॥ १८॥
वेरको बाहरसे भी लिया जा सकता है।
उसे गुरुजनोंसे ग्रहण करे। बाह्य वेर वही लेनेयोग्य है,
जो साधुपुरुषोंद्वारा पूजित हो । इस प्रकार लिंगमें और
वेरमें भी की हुई महादेवजीकी पूजा शिवपद प्रदान
करनेवाली होती है । स्थावर और जंगमके भेदसे लिंग
भी दो प्रकारका कहा गया है। वृक्ष, लता आदिको
स्थावर लिंग कहते हैं और कृमि-कीट आदिको जंगम
लिंग। सींचने आदिके द्वारा स्थावर लिंगकी सेवा
करनी चाहिये और जंगम लिंगको आहार एवं जल
आदि देकर तृप्त करना उचित है। उन स्थावर-जंगम
जीवोंको सुख पहुँचानेमें अनुरक्त होना भगवान् शिवका
पूजन है-ऐसा विद्वान् पुरुष मानते हैं। [इस प्रकार
चराचर जीवोंको ही भगवान् शंकरके प्रतीक मानकर
उनका पूजन करना चाहिये |] ॥ १९-२१९/२॥
सभी पीठ पराप्रकृति जगदम्बाका स्वरूप हैं
और समस्त शिवलिंग चैतन्यस्वरूप हैं । जैसे भगवान्
शंकर देवी पार्वतीको गोदमें बिठाकर विराजते हैं,
उसी प्रकार यह शिवलिंग सदा पीठके साथ ही
विराजमान होता है॥ २२-२३॥
इस तरह महालिंगकी स्थापना करके विविध
उपचारोंद्वारा उसका पूजन करे। अपनी शक्तिके
अनुसार नित्य पूजा करनी चाहिये तथा देवालयके पास
ध्वजारोपण आदि करना चाहिये। इस प्रकार साक्षात्
शिवका पद प्रदान करनेवाले लिंगकी स्थापना करे
अथवा चर लिंगमें षोडशोपचारोंद्वारा यथोचित रीतिसे
क्रमशः पूजन करे; यह पूजन भी शिवपद प्रदान
८२
तदङ्काचमनं चैव स्तानमभ्यङ्गपूर्वकम्।
वस्त्रं गन्धं तथा पुष्यं धूपं दीपं निवेदनम्॥ २७
नीराजनं च ताम्बूलं नमस्कारो विसर्जनम्।
अधवार्घ्यादिकं कृत्वा नेवेद्यान्तं यथाविधि॥ २८
अथाभिषेकं नेवेद्यं नमस्कारं च तर्पणम्।
यथाशक्ति सदा कुर्यात्क्रमाच्छिवपदप्रदम्॥ २९
अथवा मानुषे लिङ्गेऽप्यार्षे दैवे स्वयम्भुवि।
स्थापितेऽपूर्वके लिङ्गे सोपचारं यथा तथा॥ ३०
पूजोपकरणे दत्ते यत्किञ्चित्फलमश्नुते।
प्रदक्षिणानमस्कारैः क्रमाच्छिवपदप्रदम्॥ ३१
लिङ्गदर्शनमात्रं वा नियमेन शिवप्रदम्।
मृत्पिष्टगोशकृत्पुष्पैः करवीरेण वा फलैः॥ ३२
गुडेन नवनीतेन भस्मनान्नैर्यथारुचि।
लिङ्गं यत्नेन कृत्वान्ते यजेत्तदनुसारतः॥ ३३
अङ्गष्ठादावपि तथा पूजामिच्छन्ति केचन।
लिङ्गकर्मणि सर्वत्र निषेधोऽस्ति न कर्हिचित्॥ ३४
सर्वत्र फलदाता हि प्रयासानुगुणं शिवः।
अथवा लिङ्गदानं वा लिङ्गमौल्यमथापि वा॥ ३५
श्रद्धया शिवभक्ताय दत्तं शिवपदप्रदम्।
अथवा प्रणवं नित्यं जपेहशसहस्त्रकम्॥ ३६
सन्ध्ययोश्च सहस्त्रं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्
जपकाले मकारान्तं मनःशुद्धिकरं भवेत्॥ ३७
श्रीशिवमहापुराण
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करनेवाला है । आवाहन, आसन, अर्घ्य, पाद्य पाद्य
आचमन, अभ्यंगपूर्वक स्नान, वस्त्र, गनध, पुष्प ण
दीप, नैवेद्य, ताम्बूल-समर्पण, नीराजन, नमस्कार ङ्ग
विसर्जन-ये सोलह उपचार हैं । अथवा अर्घ्यसे लेक
नैवेद्यतक विधिवत् पूजन करे। अभिषेक, नैवे
नमस्कार और तर्पण-ये सब यथाशक्ति नित्य को
इस तरह किया हुआ शिवका पूजन शिवपदकी प्राणि
करानेवाला होता है ॥ २४--२९॥
अथवा किसी मनुष्यके द्वारा स्थापित शिवलिंगे
ऋषियोंद्वारा स्थापित शिवलिंगमें, देवताओं द्वारा स्थाफि
शिवलिंगमें, अपने-आप प्रकट हुए स्वयम्भूलिंगमें तथ
अपने द्वारा नूतन स्थापित हुए शिवलिंगमें भी उपचार
समर्पणपूर्वक जैसे-तैसे पूजन करनेसे या पूजनकी
सामग्री देनेसे भी मनुष्य ऊपर जो कुछ कहा गया है,
वह सारा फल प्राप्त कर लेता है। क्रमश: परिक्रम
और नमस्कार करनेसे भी शिवलिंग शिवपदकी प्राह
करानेवाला होता है। यदि नियमपूर्वक शिवलिंगग़
दर्शनमात्र कर लिया जाय तो वह भी कल्याणप्रद होत
है। मिट्टी, आटा, गायके गोबर, फूल, कनेरपुष्प, फल
गुड़, मक्खन, भस्म अथवा अन्नसे भी अपनी रुच्े
अनुसार शिवलिंग बनाकर तदनुसार उसका पूजा
करे॥ ३०--३३॥
कुछ लोग हाथके अँगूठे आदिपर भी पूर्ण
करना चाहते हैं। लिंगका निर्माण कहीं भी कणे
किसी प्रकारका निषेध नहीं है। भगवान् शिव स्वी
ही भक्तके प्रयत्नके अनुसार फल प्रदान कर देते है
अथवा श्रद्धापूर्वक शिवभक्तको शिवलिंगका दान *
लिंगके मूल्यका दान करनेसे भी शिवलोककी प्रा
होती है॥ ३४-३५९/२॥
अथवा प्रतिदिन दस हजार प्रणवमन्त्रका जप i
अथवा दोनों सन्ध्याओंके समय एक-एक हे
प्रणवका जप किया करे। यह क्रम भी शिवपदकी
करानेवाला है--ऐसा जानना चाहिये। जपकाती
मकारान्त प्रणवका उच्चारण मनकी शुद्धि करनेवाला i
है। समाधिमें मानसिक जपका विधान है तथा अन्यर्
अ० ११]
समाधौ मानसं प्रोक्तमुपांशु सार्वकालिकम्।
समानप्रणवं चेमं बिन्दुनादयुत॑ विदुः ॥ ३८
अथ पञ्चाक्षरं नित्यं जपेदयुतमादरात्।
सन्ध्ययोश्च सहस्त्रं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्॥ ३९
प्रणवेनादिसंयुक्तं ब्राह्मणानां विशिष्यते।
दीक्षायुक्तं गुरोग्राह्म॑ मन्त्रं हाथ फलाप्तये॥ ४०
कुम्भस्नानं मन्त्रदीक्षां मातृकान्यासमेव च।
ब्राह्मण: सत्यपूतात्मा गुरुर्ज्ञानी विशिष्यते॥ ४१
द्विजानां च नमः पूर्वमन्येषां च नमोऽन्तकम्।
स्त्रीणां च केचिदिच्छन्ति नमोऽन्तं च यथाविधि॥ ४२
विप्रस्त्रीणां नमः पूर्वमिदमिच्छन्ति केचन।
पञ्चकोटिजपं कृत्वा सदाशिवसमो भवेत्॥ ४३
एकद्वित्रिचतुःकोट्या ब्रह्मादीनां पदं ब्रजेत्।
जपेदक्षरलक्षं वा अक्षराणां पृथक्पृथक् ॥ ४४
अथवाक्षरलक्षं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।
सहस्रं तु सहस्राणां सहस्रेण दिनेन हि॥
जपेन्मन्त्रादिष्टसिद्िर्नित्यं ब्राह्मणभोजनात्।
विद्येश्वरसंहिता
८३
समय उपांशु* जप ही करना चाहिये । नाद और बिन्दुसे
युक्त ओंकारके उच्चारणको विद्वान् पुरुष समानप्रणव
कहते हैं । यदि प्रतिदिन आदरपूर्वक दस हजार पंचाक्षर
मन्त्रका जप किया जाय अथवा दोनों सन्ध्याओंके समय
एक-एक हजारका ही जप किया जाय तो उसे शिवपदकी
प्राप्ति करानेवाला समझना चाहिये ॥ ३६--३९॥
ब्रा्मणोंके लिये आदिमें प्रणवसे युक्त
पंचाक्षरमन्त्र अच्छा बताया गया है। फलको
प्राप्तिके लिये दीक्षापूर्वक गुरुसे मन्त्र ग्रहण करना
चाहिये। कलशसे किया हुआ स्नान, मन्त्रको दीक्षा,
मातृकाओंका न्यास, सत्यसे पवित्र अन्तःकरणवाला
ब्राह्मण तथा ज्ञानी गुरु--इन सबको उत्तम माना गया
है ॥ ४०-४१॥
द्विजोंके लिये ' नमः शिवाय' के उच्चारणका
विधान है। द्विजेतरोंके लिये अन्तमें नमः-पदके प्रयोगकी
विधि है अर्थात् वे 'शिवाय नमः' इस मन्त्रका
उच्चारण करें। स्त्रियॉके लिये भी कहीं-कहीं विधिपूर्वक
अन्तमें नमः जोड़कर उच्चारणका ही विधान है
अर्थात् कोई-कोई ऋषि ब्राह्मणकी स्त्रियोंके लिये
नमःपूर्वक शिवायके जपकी अनुमति देते हैं अर्थात् वे
“नमः शिवाय' का जप करें। पंचाक्षरमन्त्रका पाँच
करोड़ जप करके मनुष्य भगवान् सदाशिवके समान
हो जाता है। एक, दो, तीन अथवा चार करोडका जप
करनेसे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा महेश्वरका पद
प्राप्त होता है अथवा मन्त्रमें जितने अक्षर हैं, उनका
पृथक्-पृथक् एक-एक लाख जप करे अथवा समस्त
अक्षरोंका एक साथ ही जितने अक्षर हों, उतने लाख
जप करे। इस तरहके जपको शिवपदकी प्राप्ति
'करानेवाला समझना चाहिये। यदि एक हजार दिनोंमें
प्रतिदिन एक सहस्र जपके क्रमसे पंचाक्षर-मन्त्रका
दस लाख जप पूरा कर लिया जाय और प्रतिदिन
ब्राह्मण-भोजन कराया जाय तो उस मन्त्रसे अभीष्ट
कार्यकी सिद्धि होती है॥ ४२-४५९/२॥
* मन््ाक्षरोंका इतने धीमे स्वरमें उच्चारण करे कि उसे दूसरा कोई सुन न सके, ऐसे जपको उपांशु कहते हैं।
८४
अष्टोत्तरसहस्रं वै गायत्रीं प्रातरेव हि॥
ब्राह्मणस्तु जपेन्नित्यं क्रमाच्छिवपदप्रदाम्।
बेदमन्त्रांश्च सूक्तानि जपेन्नियममास्थितः॥ ४७
एकं दशार्णमन्त्रं च शतोनं च तदूर्ध्वकम्।
अयुतं च सहस्रं च शतमेकं विना भवेत्॥ ४८
बेदपारायणं चैव ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।
अन्यान्बहुतरान्मन्त्राञ्जपेदक्षरलक्षतः ॥ ४९
एकाक्षरांस्तथा मन्त्राञ्पेदक्षरकोटितः।
तत: परं जपेच्चैव सहस्त्रं भक्तिपूर्वकम्॥ ५०
एवं कुर्याद्यथाशक्ति क्रमाच्छिवपदं लभेत्।
नित्यं रुचिकरं त्वेकं मन्त्रमामरणान्तिकम्॥ ५१
सहस््रमोमिति जपेत् सर्वाभीष्टं शिवाज्ञया।
पुष्पारामादिकं वापि तथा सम्मार्जनादिकम्॥ ५२
शिवाय शिवकार्याथे कृत्वा शिवपदं लभेत्।
शिवक्षेत्रे तथा वासं नित्यं कुर्याच्च भक्तितः ॥ ५३
जडानामजडानां च सर्वेषां भुक्तिमुक्तिदम्।
तस्माद्वासं शिवक्षेत्रे कुर्यादामरणं बुधः॥ ५४
लिङ्गाद्धस्तशतं पुण्यं क्षेत्रे मानुषके विदुः।
सहस्त्रारक्रिमात्रं तु पुण्यं क्षेत्रे तथार्षके ॥ ५५
श्रीशिवमहापुराण
[अ पऱ्या `
ब्राह्मणको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रातः
एक हजार आठ बार गायत्रीका जप करे। ऐसा होने
गायत्री क्रमशः शिवका पद प्रदान करनेवाली होती ३,
वेदमनों और वैदिक सूक्तोंका भी नियमपूर्वक जप कर
चाहिये ॥ ४६-४७ ॥
एकाक्षर मन्त्र दस हजार, दशार्ण मन्त्र फे
हजार, सौसे कम अक्षरवाले मन्त्र एक सौ और उस
अधिक अक्षरवाले मन्त्र यथाशक्ति एकसे अधिक बा्
जपने चाहिये ॥ ४८॥
वेदोंके पारायणको भी शिवपदकी प्राए
'करानेवाला जानना चाहिये। अन्यान्य जो बहुत
मन्त्र हैं, उनका भी जितने अक्षर हों, उतने लाख जा
करना चाहिये॥ ४९॥
एकाक्षर मन्त्रोंको उसी प्रकार करोड़की संख्ये
जपना चाहिये। अधिक अक्षरवाले मन्त्र हजार
संख्यामें भक्तिपूर्वक जपने चाहिये॥ ५०॥
इस प्रकार जो यथाशक्ति जप करता है, वह
क्रमशः शिवपद प्राप्त कर लेता है। अपनी रुचिवे
अनुसार किसी एक मन्त्रको अपनाकर मृत्युपर्यन
प्रतिदिन उसका जप करना चाहिये अथवा “ओग
(३५) ' इस मन्त्रका प्रतिदिन एक सहस्र जप कला
चाहिये। ऐसा करनेपर भगवान् शिवकी आजे
सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है॥ ५११/२॥
जो मनुष्य भगवान् शिवके लिये फुलवाड़ी व
बगीचे आदि लगाता है तथा शिवके सेवाकार्यके लिंगे
मन्दिरमें झाड़ने-बुहारने आदिकी व्यवस्था करता है
वह इस पुण्यकर्मको करके शिवपद प्राप्त कर लेत
है। भगवान् शिवके जो [काशी आदि] क्षेत्र हैं,
भक्तिपूर्वक नित्य निवास करे। वे जड, चेतन सभीकी
भोग और मोक्ष देनेवाले होते हैं। अतः वि
पुरुषको भगवान् शिवके क्षेत्रमें मृत्युपर्यन्त तरव
करना चाहिये॥ ५२-५४॥ व
मनुष्योंद्वारा स्थापित शिवलिंगसे चारों ओर
हाथतक पुण्यक्षेत्र कहा गया है तथा ऋषियोंद्वारा स्थापि
शिवलिंगके चारों ओर एक हजार हाथतक पुण्र है
+
अ० १९]
लिङ्गे तथा ज्ञेयं सहस्ारत्रमानत,।
धनुष्प्रमाणसाहस्त्रं पुण्यं क्षेत्रे स्वयम्भुवि॥ ५६
पुण्यक्षेत्रे स्थिता वापी कूपाद्यं पुष्कराणि च।
शिवगङ्गेति विज्ञेयं शिरस्य वचनं यथा॥ ५७
तत्र स्नात्वा तथा दत्त्वा जपित्वा हि शिवं व्रजेत्।
शिवक्षेत्रं समाश्रित्य वसेदामरणं तथा ॥ ५८
द्वाहं दशाहं मास्यं वा सपिण्डीकरणं तु वा।
आब्दिकं वा शिवक्षेत्रे क्षेत्रे पिण्डमथापि वा॥ ५९
सर्वपापविनिर्मुक्तः सद्यः शिवपदं लभेत्।
अथवा सप्तरात्रं वा वसेद्वा पञ्चरात्रकम्॥ ६०
्रिरात्रमेकरात्रं वा क्रमाच्छिवपदं लभेत्।
स्ववर्णानुगुणं लोके स्वाचारात्प्राप्नुते नरः॥ ६१
वर्णोद्धारेण भक्त्या च तत्फलातिशयं नरः।
सर्वं कृतं कामनया सद्यः फलमवाण्नुयात्॥ ६२
सर्वं कृतमकामेन साक्षाच्छिवपदप्रदम्।
प्रतर्मध्याह्वसायाह्महस्त्रष्वेकतः क्रमात्॥ ६३
प्रातर्विधिकरं ज्ञेयं मध्याह्णं कामिकं तथा।
सायाह्नं शान्तिकं ज्ञेयं रात्रावपि तथैव हि॥
कालो निशीथो वै प्रोक्तो मध्ययामद्वयं निशि।
शिवपूजा विशेषेण तत्काले5भीष्टसिद्धिदा॥ ६५
एवं ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्।
'कलौ युगे विशेषेण 'फलसिद्धिस्तु कर्मणा॥ ६६
विद्येश्वरसंहिता
८५
है । इसी प्रकार देवताओंद्वारा स्थापित शिवलिंगके चारों
ओर भी एक हजार हाथतक पुण्यक्षेत्र समझना चाहिये ।
स्वयम्भू लिंगके चारों ओर तो एक हजार धनुष (चार
हजार हाथ)-तक पुण्यक्षेत्र होता है ॥ ५५-५६॥
पुण्यक्षेत्रमें स्थित बावडी, कुआँ और पोखरे
आदिको शिवगंगा समझना चाहिये--भगवान् शिवका
ऐसा ही वचन है। वहाँ स्नान, दान और जप करके
मनुष्य भगवान् शिवको प्राप्त कर लेता है। अतः
मृत्युपर्यन्त शिवके क्षेत्रका आश्रय लेकर रहना चाहिये।
जो शिवके क्षेत्रमें अपने किसी मृत-सम्बन्धीका दाह,
दशाह, मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण अथवा वार्षिक
श्राद्ध करता है अथवा कभी भी शिकके क्षेत्रमें अपने
पितरोंको पिण्ड देता है, वह तत्काल सब पापोंसे मुक्त
हो जाता है और अन्तमें शिवपद पाता है? अथवा
शिकके क्षेत्रमें सात, पाँच, तीन या एक ही रात निवास
कर ले। ऐसा करनेसे भी क्रमश: शिवपदकी प्राप्ति
होती है॥ ५७--६०१/२॥
लोकमें अपने-अपने वर्णके अनुरूप सदाचारका
पालन करनेसे भी मनुष्य शिवपदको प्राप्त कर लेता है ।
वर्णानुकूल आचरणसे तथा भक्तिभावसे वह अपने
सत्कर्मका अतिशय फल पाता है, कामनापूर्वक किये
हुए अपने कर्मके अभीष्ट फलको शीघ्र ही पा लेता है।
निष्कामभावसे किया हुआ सारा कर्म साक्षात् शिवपदकी
प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ ६१-६२१/२॥
दिनके तीन विभाग होते हैं-प्रातः, मध्याह्न और
सायाह्न । इन तीनोंमें क्रमशः एक-एक प्रकारके कर्मका
सम्पादन किया जाता है। प्रातःकालको शास्त्रविहित
नित्यकर्मके अनुष्ठानका समय जानना चाहिये।
मध्याह्नकाल सकाम-कर्मके लिये उपयोगी है तथा
सायंकाल शान्ति-कर्मके लिये उपयुक्त है--ऐसा जानना
चाहिये । इसी प्रकार रात्रिमें भी समयका विभाजन किया
गया है । रातके चार प्रहरोंमेंसे जो नीचके दो प्रहर हैं,
उन्हें निशीथकाल कहा गया है । विशेषतः उस कालमें
की हुई भगवान् शिवको पूजा अभीष्ट फलको देनेवाली
होती है--ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त
"फलका भागी होता है । विशेषत: कलियुगमें कर्मसे ही
८६
उक्तेन केनचिद्वापि ह्यधिकारविभेदतः।
सद्वृत्तिः पापभीरुश्रेततत्तत्फलमवाप्नुयात्॥ ६७
ऋषय ऊचुः
अथ क्षेत्राणि पुण्यानि समासात्कथयस्व नः।
सर्वाः स्त्रियश्च पुरुषा यान्याश्रित्य पदं लभेत्॥ ६८
सूत योगिवरश्रेष्ठ शिवक्षेत्रागमांस्तथा।
सूत उवाच
शृणुत श्रद्धया सर्वक्षेत्राणि च तदागमान्॥ ६९
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १२
MR अ
'फलकी सिद्धि होती है। अपने-अपने अधिकारके
अनुसार ऊपर कहे गये किसी भी कर्मके द्वार
शिवाराधन करनेवाला पुरुष यदि सदाचारी है और
पापसे डरता है तो वह उन-उन कर्मांका पूरा-पूर
फल अवश्य प्राप्त कर लेता है॥ ६३-६७॥
ऋषिगण बोले-हे सूतजी! अब आप हमें
पुण्यकषेत्र बताइये, जिनका आश्रय लेकर सभी स्त्री
पुरुष शिवपद प्राप्त कर लें। हे सूतजी ! हे योगिवरोंमे
श्रेष्ठ शिवक्षेत्रों तथा शैवागमों (शिवविषयक शास्त्रों)
का भी वर्णन कीजिये॥ ६८ /२॥
सूतजी बोले-[हे ऋषियो!] सभी क्षेत्रों और
आगमोंका वर्णन श्रद्धापूर्वक सुनिये॥ ६९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवलिङ्गपूजादिवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येशवरसंहितामें शिवलिंगकी पूजादिका
वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रोंका वर्णन, कालविशेषमें विभिन्न नदियोंके जलमें स्नानके
उत्तम फलका निर्देश तथा तीर्थोमें पापसे बचे रहनेकी चेतावनी
सूत उवाच
श्रृणुध्वमृषयः प्राज्ञाः शिवक्षेत्रं वरिमुक्तिदम्।
तदागमांस्ततो वक्ष्ये लोकरक्षार्थमेव हि॥ १
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना।
शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति॥ २
तत्र तत्र शिवक्षेत्रं तत्र तत्र निवासिनाम्।
मोक्षार्थं कृपया देवः क्षेत्रं कल्पितवाम्प्रभुः ॥ ३
परिग्रहाद् ऋषीणां च देवानां च परिग्रहात्।
स्वयम्भूतान्यथान्यानि लोकरक्षार्थमेव हि॥ ४
तीर्थे क्षेत्रे सदा कार्य स्नानदानजंपादिकम्।
अन्यथा
अथास्मिन्भारते वर्षे प्राप्नोति मरणं नरः।
स्वयम्भूस्थानवासेन पुनर्मानुष्यमाप्नुयात्॥ ६
रोगदारिद्र्थमूकत्वाद्याप्नुयान्नरः॥ ५
सूतजी बोले-हे बुद्धिमान् महर्षियो ! मोक्षदायक
शिवक्षेत्रोका वर्णन सुनिये। तत्पश्चात् मैं लोकरक्षाके
लिये शिवसम्बन्धी आगमोंका वर्णन करूँगा। पर्वत,
वन और काननोंसहित इस पृथ्वीका विस्तार पचास करोड़
योजन है। भगवान् शिवकी आज्ञासे पृथ्वी सम्पूर्ण जगत्को
धारण करके स्थित है। भगवान् शिवने भूतलपर विभिन
स्थानोंमें वहाँके निवासियोंको कृपापूर्वक मोक्ष देनेके
लिये शिवक्षेत्रका निर्माण किया है॥ १-३॥ य
कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें देवताओं तथा ऋषियों
अपना वासस्थान बनाकर अनुगृहीत किया है। इसीलिग
उनमें तीर्थत्व प्रकट हो गया है तथा अन्य बहुत
तीर्थक्षेत्र ऐसे हैं, जो लोकोंकी रक्षाके लिये स्व
प्रादर्भूत हुए हैं। तीर्थ और क्षेत्रमें जानेपर मनुष्यकी
सदा स्नान, दान और जप आदि करना चाहिये ho 4
अन्यथा वह रोग, दरिद्रता तथा मूकता आदि दोषी
भागी होता है। जो मनुष्य इस भारतवर्षके
आ० १२]
क्षेत्रे पापस्य करणं दूढं भवति भूसुरा:।
पुण्यक्षेत्रे निवासे हि पापमण्वपि नाचरेत्॥ ७
येन केनाप्युपायेन पुण्यक्षेत्रे बसेन्नरः।
सिन्धोः शतनदीतीरे सन्ति क्षेत्राण्यनेकशः॥ ८
सरस्वती नदी पुण्या प्रोक्ता षष्टिमुखा तथा।
तत्तत्तीरे वसेत््राज्ञः क्रमाद् ब्रह्मपदं लभेत्॥ ९
हिमवद्विरिजा गङ्गा पुण्या शतमुखा नदी।
तत्तीरे चैव काश्यादिपुण्यक्षेत्राण्यनेकशः॥ १०
तत्र तीरं प्रशस्तं हि मृगे मृगबृहस्पतौ।
शोणभद्रो दशमुखः पुण्योऽभीष्टफलप्रदः॥ ११
तत्र स्नानोपवासेन पदं वैनायकं लभेत्।
चतुर्विशमुखा पुण्या नर्मदा च महानदी॥ १२
तस्यां स्नानेन वासेन पदं वैष्णवमाण्नुयात्।
तमसा द्वादशमुखा रेवा दशमुखा नदी॥ १३
गोदावरी महापुण्या ब्रह्मगोवधनाशिनी।
एकविंशमुखा प्रोक्ता रुद्रलोकप्रदायिनी॥ १४
कृष्णा वेणी पुण्यनदी सर्वपापक्षयावहा
साष्टादशमुखा प्रोक्ता विष्णुलोकप्रदायिनी ॥ १५
तुङ्गभद्रा दशमुखा ब्रह्मलोकप्रदायिनी।
सुवर्णमुखरी पुण्या प्रोक्ता नवमुखा तथा॥ १६
तत्रैव सुप्रजायन्ते ब्रह्मलोकच्युतास्तथा।
सरस्वती च पम्पा च कन्या श्वेतनदी शुभा॥ १७
एतासां तीरवासेन इन्द्रलोकमवाप्तुयात्।
सहाद्विजा महापुण्या कावेरीति महानदी॥ १८
विद्येश्वरसंहिता
८७
स्वयम्भू तीर्थोमें वास करके मरता है, उसे पुनः
| ही प्राप्त होती है । हे ब्राह्मणो ! पुण्यक्षेत्रमें
पापकर्म किया जाय तो वह और भी दृढ़ हो जाता
है। अत: पुण्यक्षेत्रमें निवास करते समय थोड़ा-सा भी
पाप न करे। जिस किसी भी उपायसे मनुष्यको
पुण्यक्षेत्रमे वास करना चाहिये ॥ ४--७१/२॥
सिन्धु और गंगा नदीके तटपर बहुत-से पुण्यक्षेत्र
हैं। सरस्वती नदी परम पवित्र और साठ मुखवाली
कही गयी है अर्थात् उसकी साठ धाराएँ हैं। जो
विद्वान् पुरुष सरस्वतीकी उन-उन धाराओंके तटपर
निवास करता है, वह क्रमश: ब्रह्मपदको पा लेता है।
हिमालय पर्वतसे निकली हुई पुण्यसलिला गंगा सौ
मुखवाली नदी है, उसके तटपर काशी आदि अनेक
पुण्यक्षेत्र हैं। वहाँ मकरराशिके सूर्य होनेपर गंगाकी
तटभूमि पहलेसे भी अधिक प्रशस्त एवं पुण्यदायक
हो जाती है। शोणभद्र नदकी दस धाराएँ हैं, वह
बृहस्पतिके मकरराशिमें आनेपर अत्यन्त पवित्र तथा
अभीष्ट फल देनेवाला हो जाता है। उस समय वहाँ
स्नान और उपवास करनेसे विनायकपदकी प्राप्ति
होती है। पुण्यसलिला महानदी नर्मदाके चौबीस मुख
(स्रोत) हैं। उसमें स्नान तथा उसके तटपर निवास
करनेसे मनुष्यको वैष्णनपदकी प्राप्ति होती है। तमसा
नदीके बारह तथा रेवाके दस मुख हैं । परम पुण्यमयी
गोदावरीके इक्कीस मुख बताये गये हैं। वह ब्रह्महत्या
तथा गोवधके पापका भी नाश करनेवाली एवं
रुद्रलोक देनेवाली है। कृष्णवेणी नदीका जल बड़ा
पवित्र है। वह नदी समस्त पापोंका नाश करनेवाली
है। उसके अठारह मुख बताये गये हैं तथा वह
विष्णुलोक प्रदान करनेवाली है। तुंगभद्राके दस मुख
हैं, बह ब्रह्मलोक देनेवाली है। पुण्यसलिला सुवर्णमुखरीके
नौ मुख कहे गये हैं। ब्रह्मलोकसे लौटे हुए जीव
उसीके तटपर जन्म लेते हैं। सरस्वती, पम्पा, कन्याकुमारी
तथा शुभकारक श्वेत नदी-ये सभी पुण्यक्षेत्र हैं।
इनके तटपर निवास करनेसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती
है। सह्य पर्वतसे निकली हुई महानदी कावेरी परम
पुण्यमयी है। उसके सत्ताईस मुख बताये गये हैं। वह
८८
सप्तविंशमुखा प्रोक्ता सर्वाभीष्टप्रदायिनी।
तत्तीराः स्वर्गदाश्चैव ब्रह्मविष्णुपदप्रदाः॥ १९
शिवलोकप्रदाः शैवास्तथाभीष्टफलप्रदाः।
नैमिषे बदरे स्तायान्मेषगे च गुरौ रवौ॥ २०
ब्रह्मलोकप्रदं विद्यात्ततः पूजादिकं तथा।
सिन्धुनद्यां तथा स्नानं सिंहे कर्कटगे रवौ॥ २१
केदारोदकपानं च स्नानं च ज्ञानदं विदुः।
गोदावर्या सिंहमासे स्नायात्सिहबृहस्पतौ॥ २२
शिवलोकप्रदमिति शिवेनोक्तं तथा पुरा।
यमुनाशोणयोः स्नायाद् गुरौ कन्यागते रवौ॥ २३
धर्मलोके दन्तिलोके महाभोगप्रदं विदुः।
कावेर्याञ्च तथा स्नायात्तुलागे तु रवौ गुरौ॥ २४
विष्णोर्वचनमाहात्म्यात्सर्वाभीष्टप्रदं विदुः।
वृश्चिके मासि सम्प्राप्ते तथार्के गुरुवृश्चिके ॥ २५
नर्मदायां नदीस्नानाद्विष्णुलोकमवाप्नुयात्।
सुवर्णमुखरीस्नानं चापगे च गुरौ रवो॥ २६
शिवलोकप्रदमिति ब्रह्मणो वचनं यथा।
मृगमासि तथा स्नायाजाह्वव्यां मृगगे गुरौ॥ २७
शिवलोकप्रदमिति ब्रह्मणो वचनं यथा।
ब्रह्मविष्ण्वोः पदे भुक्त्वा तदन्ते ज्ञानमाप्नुयात्॥ २८
श्रीशिवमहापुराण
[अण १२
भ) TITS
सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली है। उसके ततर
स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले तथा ब्रह्मा और
पद देनेवाले हैं। कावेरीके जो तट शैवक्षेत्रके अन्तर्गत
हैं, वे अभीष्ट फल देनेके साथ ही शिवलोक प्रदान
करनेवाले भी हैं ॥ ८-१९९/२॥
नैमिषारण्य तथा बदरिकाश्रमे सूर्य और बृहस्पतिके
मेषराशिमें आनेपर यदि स्नान करे तो उस समय वहाँ
किये हुए स्नान-पूजन आदिको ब्रह्मलोककी प्राणि
'करानेवाला जानना चाहिये। सिंह और कर्कराशिमें
सूर्यकी संक्रान्ति होनेपर सिन्धुनदीमें किया हुआ स्नान
तथा केदारतीर्थके जलका पान एवं स्नान ज्ञानदायक
माना गया है॥ २०-२१९/२॥
जब बृहस्पति सिंहराशिमें स्थित हों, उस समय
सिंहकी संक्रान्तिसे युक्त भाद्रपदमासमें यदि गोदावरीके
'जलमें स्नान किया जाय, तो वह शिवलोककी प्राणि
करानेवाला होता है-ऐसा पूर्वकालमें स्वयं भगवान्
शिवने कहा था। जब सूर्य और बृहस्पति कन्याराशिमें
स्थित हों, तब यमुना और शोणभद्रमें स्नान करे। वह
स्नान धर्मराज तथा गणेशजीके लोकमें महान् भोग
प्रदान करानेवाला होता है-यह महर्षियोंकी मान्यता
है। जब सूर्य और बृहस्पति तुलाराशिमें स्थित हों, उस
समय कावेरी नदीमें स्नान करे। वह स्नान भगवान्
विष्णुके वचनकी महिमासे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी
देनेवाला माना गया है। जब सूर्य और बृहस्पति
वृश्चिक राशिपर आ जायूँ, तब मार्गशीर्षके महीने
नर्मदामें स्नान करनेसे विष्णुलोकी प्राप्ति होती है।
सूर्य और बृहस्पतिके धनुराशिमें स्थित होनेपर सुवर्णमुख
नदीमें किया हुआ स्नान शिवलोक प्रदान करानेवाला
होता है, यह ब्रह्माजीका वचन है। जब सूर्य और
बृहस्पति मकरराशिमें स्थित हों, उस समय
गंगाजीके जलमें स्नान करना चाहिये। ब्रह्माजीकी
कथन है कि वह स्नान शिवलोककी प्राप्त करतेवर्ण
होता है। शिवलोकके पश्चात् ब्रह्मा और
स्थानोंमें सुख भोगकर अन्तमें मनुष्यको ज्ञानकी
हो जाती है॥ २२-२८॥
आ० १२]
गङ्गायां माघमासे तु तथा कुम्भगते रवौ।
श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तिलोदकमथापि वा॥ २९
वंशद्दयपितृणां च कुलकोट्युद्धरं विदुः।
कृष्णावेण्यां प्रशंसन्ति मीनगे च गुरौ रवौ॥ ३०
तत्तत्तीर्थे च तन्मासि स्नानमिन्द्रपदप्रदम्।
गङ्घां वा सह्यजां वापि समाश्रित्य वसेद् बुधः॥ ३१
तत्कालकृतपापस्य क्षयो भवति निश्चितम्।
रुद्रलोकप्रदान्येव सन्ति क्षेत्राण्यनेकशः॥ ३२
ताम्रपर्णी वेगवती ब्रह्मलोकफलप्रदे।
तयोस्तीरे हि सन्त्येव क्षेत्राणि स्वर्गदानि च॥ ३३
सन्त क्षेत्राणि तन्मध्ये पुण्यदानि च भूरिशः।
तत्र तत्र वसम्पराज्ञस्तादूशं च फलं लभेत्॥ ३४
सदाचारेण सद्वृत्त्या सदा भावनयापि च।
वसेद् दयालुः प्राज्ञो वै नान्यथा तत्फलं लभेत्॥ ३५
पुण्यक्षेत्रे कृतं पुण्यं बहुधा ऋद्द्रिमृच्छति।
पुण्यक्षेत्रे कृतं पापं महदण्वपि जायते॥ ३६
तत्कालं जीवनार्थश्चेत्पुण्येन क्षयमेष्यति।
पुण्यमैश्वर्यदं प्राहुः कायिकं वाचिकं तथा॥ ३७
मानसं च तथा पापं तादृशं नाशयेद् द्विजाः।
मानसं वज्रलेपं तु कल्पकल्पानुगं तथा॥ ३८
ध्यानादेव हि तन्नश्येन्नान्यथा नाशमृच्छति।
वाचिकं जपजालेन कायिकं कायशोषणात्॥ ३९
दानाद्धनकृतं नश्येन्नान्यथा कल्पकोटिभिः ।
क्वचित्पापेन पुण्यं च वृद्धिपूर्वेण नश्यति॥ ४०
विद्येश्वरसंहिता
८९
माघमासमें तथा सूर्यके कुम्भराशिमें स्थित होनेपर
फाल्गुनमासमें गंगाजीके तटपर किया हुआ श्राद्ध, पिण्डदान
अथवा तिलोदकदान पिता और नाना दोनों कुलोंके
पितरोंकी अनेकों पीढ़ियोंका उद्धार करनेवाला म्राना
गया है । सूर्य और बृहस्पति जब मीनराशिमें स्थित हों,
तब कृष्णवेणी नदीमें किये गये स्नानकी ऋषियोंने
प्रशंसा को है । उन-उन महीनोंमें पूर्वोक्त तीर्थोमें किया
हुआ स्नान इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला होता है । विद्वान्
पुरुष गंगा अथवा कावेरी नदीका आश्रय लेकर तीर्थवास
करे। ऐसा करनेसे उस समयमें किये हुए पापका निश्चय
ही नाश हो जाता है॥ २९-३११/२॥
रुद्रलोक प्रदान करनेवाले बहुत-से क्षेत्र हैं । ताम्रपणी
और वेगवती-ये दोनों नदियाँ ब्रह्मलोककी प्राप्तिरूप
'फल देनेवाली हैं । उन दोनोंके तटपर अनेक स्वर्गदायक
क्षेत्र हे । उन दोनोंके मध्यमे बहुत-से पुण्यप्रद क्षेत्र हैं।
वहाँ निवास करनेवाला विद्वान् पुरुष वैसे फलका भागी
होता है। सदाचार, उत्तम वृत्ति तथा सद्भावनाके साथ
मनमें दयाभाव रखते हुए विद्वान् पुरुषको तीर्थमें निवास
करना चाहिये, अन्यथा उसका फल नहीं मिलता।
पुण्यक्षेत्रमें किया हुआ थोड़ा-सा पुण्य भी अनेक प्रकारसे
वृद्धिको प्राप्त होता है तथा वहाँ किया हुआ छोटा-सा
पाप भी महान् हो जाता है । यदि पुण्यक्षेत्रमें रहकर ही
जीवन बितानेका निश्चय हो, तो उस पुण्यसंकल्पसे
उसका पहलेका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जायगा;
क्योंकि पुण्यको ऐश्वर्यदायक कहा गया है | हे ब्राह्मणो!
तीर्थवासजनित पुण्य कायिक, वाचिक और मानसिक
सारे पापोंका नाश कर देता है। तीर्थमें किया हुआ
मानसिक पाप वज्रलेप हो जाता है । वह कई कल्पोंतक
पीछा नहीं छोड़ता है॥ ३२-३८॥
वैसा पाप केवल ध्यानसे ही नष्ट होता है,
अन्यथा नष्ट नहीं होता। वाचिक पाप जपसे तथा
कायिक पाप शरीरको सुखाने-जैसे कठोर तपसे नष्ट
होता है। धनोपार्जनमें हुए पाप दानसे नष्ट होते हैं
अन्यथा करोड़ों कल्पोंमें भी उनका नाश नहीं होता।
कभी-कभी अतिशय मात्रामें बढे पापोंसे पुण्य भी नष्ट
हो जाते हैं। पुण्य और पाप दोनोंका बीजांश, वृद्धयंश
९०
बीजांशश्चैव वृद्धयंशो भोगांशः पुण्यपापयो: ।
ज्ञाननाश्यो हि बीजांशो वृद्धिरुक्तप्रकारत:॥ ४१
भोगांशो भोगनाश्यस्तु नान्यथा पुण्यकोटिभिः।
बीजप्ररोहे नष्टे तु शेषो भोगाय कल्पते॥ ४२
देवानां पूजया चैव ब्राह्मणानां च दानतः।
तपोधिक्याच्च कालेन भोग: सह्यो भवेन्नृणाम्
तस्मात्पापमकृत्वैव वस्तव्यं सुखमिच्छता॥ ४३
श्रीशिवमहापुराण
[° १३
व सर NNR.
और भोगांश होता है। बीजांशका नाश ज्ञानसे
वृद्धयंशका ऊपर लिखे प्रकारसे तथा भोगांशका नाश
भोगनेसे होता है। अन्य किसी प्रकारसे करोड़ों पुष्य
करके भी पापके भोगांश नहीं मिट सकते। पाप.
बीजके अंकुरित हो जानेपर उसका अंश नष्ट होनेप
भी शेष पाप भोगना ही पड़ता है । देवताओंकी पूजा,
ब्राह्मणोंको दान तथा अधिक तप करनेसे समय पाका
'पापभोग मनुष्योंके सहनेयोग्य हो जाते हैं। इसलिये
सुख चाहनेवाले व्यक्तिको पापोंसे बचकर ही तीर्थवास
करना चाहिये॥ ३९-४३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवक्षेत्रवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
॥इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहितामें शिवक्षेत्रका
वर्णन नामक बारहवां अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, सन्ध्यावन्दन, प्रणव-जप, गायत्री-जप, दान,
न्यायतः धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदिकी विधि एवं उनकी महिमाका वर्णन
ऋषय ऊचुः
सदाचारं श्रावयाशु येन लोकाञ्जयेद् बुधः।
धर्माधर्ममयान्त्रूहि स्वर्गनारकदांस्तथा॥ १
सूत उवाच
सदाचारयुतो विद्वान् ब्राह्मणो नाम नामतः।
वेदाचारयुतो विप्रो ह्ोतरेकैकवान्द्रिजः॥ २
अल्पाचारोऽल्पवेदश्च क्षत्रियो राजसेवकः।
किञ्चिदाचारवान्वैश्यः कृषिवाणिज्यकृत्तथा॥ ३
शूद्रब्राह्मण इत्युक्तः स्वयमेव हि कर्षकः।
असूयालुः परद्रोही चण्डालद्विज उच्यते॥ ४
ऋषिगण बोले-[हे सूतजी!] अब आए
शीघ्र ही हमें वह सदाचार सुनाइये, जिससे विद्वा
पुरुष पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। स्वा
प्रदान करनेवाले धर्ममय आचारों तथा नरकका कष्ट
देनेवाले अधर्ममय आचारोंका भी वर्णन कीजिये॥ १॥
सूतजी बोले [हे ऋषियो !] सदाचारका पाला
करनेवाला विद्वान् ब्राह्मण ही वास्तवमें “ब्राह्मण नाप
धारण करनेका अधिकारी है। जो केवल वेदोक्त आचाखा
पालन करनेवाला है, उस ब्राह्मणकी ' विप्र' संज्ञा
है। सदाचार, वेदाचार तथा विद्या-इनमेंसे एक
गुणसे ही युक्त होनेपर उसे 'द्विज' कहते हैं। जिस
स्वल्पमात्रामें ही आचारका पालन देखा जाता है, जिसी
वेदाध्ययन भी बहुत कम किया है तथा जो राजकी
सेवक (पुरोहित, मन्त्री आदि) है, उसे '
कहते हैं। जो ब्राह्मण कृषि तथा वाणिज्य कर्म करेवर्त
है और कुछ-कुछ ब्राह्मणोचित आचारका भी पाल
करता है, वह “वैश्यब्राह्मण' है तथा जो स्वयं
जोतता (हल चलाता) है, उसे 'शूद्रब्राह्मण ' कहा गे.
है। जो दूसरोंके दोष देखनेवाला और परोही है, “
“चाण्डालद्विज' कहते हैं॥ २--४॥
आ० १३]
पृथिवीपालको राजा इतरे क्षत्रिया मता:।
धान्यादिक्रयवान्वैश्य इतरो वणिगुच्यते॥ ५
बरहमक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते।
कर्षको वृषलो ज्ञेय इतरे चैव दस्यव:॥ ६
सर्वो ह्युषः प्राङ्मुखश्च चिन्तयेद् देवपूर्वकान्।
धर्मानर्थाश्च तत्क्लेशानायं च व्ययमेव च॥ ७
आयुद्वेंषश्च मरणं पापं भाग्यं तथैव च।
व्याधिः पुष्टिस्तथा शक्तिः प्रातरुत्थानदिक्फलम्॥ ८
निशान्त्ययामोषा ज्ञेया यामार्ध सन्धिरुच्यते।
तत्काले तु समुत्थाय विण्मूत्रे विसृजेद् द्विज:॥ ९
गृहाद् दूरं ततो गत्वा बाह्यतः प्रावृतस्तथा।
उदङ्मुखः समाविश्य प्रतिबन्धेऽन्यदिङ्मुखः॥ १०
जलाग्निब्राह्मणादीनां देवानां नाभिमुख्यतः।
लिङ्गं पिधाय वामेन मुखमन्येन पाणिना॥ ११
मलमुत्सृज्य चोत्थाय न पश्येच्चैव तन्मलम्।
उद्धृतेन जलेनैव शौचं कुर्याजलाद् बहिः॥ १२
अथवा देवपित्रर्षितीर्थावतरणं विना।
सप्त वा पञ्च वा त्रीन्वा गुदं संशोधयेन्मृदा॥ १३
लिङ्गे कर्कोटमात्रं तु गुदे प्रसूतिरिष्यते।
तत उत्थाय पद्धस्तशौचं गण्डूषमष्टकम्॥ १४
विद्येश्वरसंहिता
९१
इसी तरह क्षत्रियोमें भी जो पृथ्वीका पालन `
करता है, वह राजा है। दूसरे लोग राजत्वहीन क्षत्रिय
माने गये हैं। वैश्योंमें भी जो धान्य आदि वस्तुओंका
क्रय-विक्रय करता है, वह वैश्य है; दूसरोंको वणिक्
कहते हैं। जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंकी सेवामें
लगा रहता है, वह शूद्र कहलाता है। जो शुद्र हल
जोतनेका काम करता है, उसे वृषल समझना चाहिये।
शेष शूद्र दस्यु कहलाते हैं॥ ५-६॥
इन सभी वर्णोके मनुष्यांको चाहिये कि वे
उषःकालमें उठकर पूर्वाभिमुख हो सबसे पहले
देवताओंका, फिर धर्मका, पुनः अर्थका, तदनन्तर
उसकी प्राप्तिके लिये उठाये जानेवाले क्लेशोंका तथा
आय और व्ययका भी चिन्तन करें॥ ७॥
प्रातःकाल उठकर [पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण
आदि] आठ दिशाओंकी ओर मुख करके बैठनेपर
क्रमशः आयु, द्वेष, मरण, पाप, भाग्य, व्याधि, पुष्टि
और शक्ति प्राप्त होती है॥ ८॥
रातके पिछले पहरको उष:काल जानना चाहिये।
उस अन्तिम पहरका जो आधा या मध्यभाग है, उसे
सन्धि कहते हैं । उस सन्धिकालमें उठकर द्विजको मल-
मूत्र आदिका त्याग करना चाहिये। घरसे दूर जाकर
बाहरसे अपने शरीरको ढके रखकर दिनमें उत्तराभिमुख
बैठकर मल-मूत्रका त्याग करे | यदि उत्तराभिमुख बैठनेमें
कोई रुकावट हो तो दूसरी दिशाकी ओर मुख करके
बैठे।जल, अग्नि, ब्राह्मण आदि तथा देवताओंका सामना
बचाकर बैठे । बायें हाथसे उपस्थको ढँककर तथा दाहिने
हाथसे मुखको ढककर मलत्याग करे और उठनेपर
उस मलको न देखे । तदनन्तर जलाशयसे बाहर निकाले
हुए जलसे ही गुदाकी शुद्धि करे; अथवा देवताओं,
पितरों तथा ऋषियोंके तीर्थोमें उतरे बिना ही प्राप्त
हुए जलसे शुद्धि करनी चाहिये। गुदामें सात, पाँच
या तीन बार मिट्टीसे उसे धोकर शुद्ध करे। लिंगमें
ककोड़ेके फलके बराबर मिट्टी लेकर लगाये और
उसे धो दे। परंतु गुदामें लगानेके लिये एक पसर
मिट्टीकी आवश्यकता होती है। लिंग और गुदाकी
शुद्धिके पश्चात् उठकर अन्यत्र जाय और हाथःपैरोंकी
शुद्धि करके आठ बार कुल्ला करे॥ ९--१४॥
९२
येन केन च पत्रेण काष्ठेन च जलाद् बहिः।
कार्य सन्तर्जनीं त्यज्य दन्तधावनमीरितम्॥ १५
जलदेवान्नमस्कृत्य मन्त्रेण स्नानमाचरेत्।
अशक्तः कण्ठदघ्नं वा कटिदघ्नमथापि वा॥ १६
आजानुजलमाविश्य मन्त्रस्नानं समाचरेत्।
देवादींस्तर्षयेद्विद्वांस्तत्र तीर्थजलेन च॥ १७
धौतवस्त्रं समादाय पञ्चकच्छेन धारयेत्।
उत्तरीयं च किञ्चैव धार्यं सर्वेषु कर्मसु॥ १८
जद्यादितीर्थस्नाने तु स्नानवस्त्रं न शोधयेत्।
वापीकूपगृहादौ तु स्नानादूर्ध्वं नयेद् बुधः॥ १९
शिलादार्वादिके वापि जले वापि स्थलेऽपि वा।
संशोध्य पीडयेददसत्रं पितृणां तृप्तये द्विजाः॥ २०
जाबालकोक्तमन्त्रेण भस्मना च त्रिपुण्ड्कम्।
अन्यथा चेजले पातस्ततो नरकमृच्छति॥ २१
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ®
जिस किसी वृक्षके पत्तेसे अथवा उसके
काष्ठसे जलके बाहर दातुन करना चाहये। उस
तर्जनी अँगुलीका उपयोग न करे। यह
विधान बताया गया है। तदनन्तर जल-
देवताओंको नमस्कार करके मन्त्रपाठ करते हुए स्रा
करे। यदि कण्ठतक या कमरतक पानीमें खडे होनेकी
शक्ति न हो तो घुटनेतक जलमें खड़ा होकर अफ़े
ऊपर जल छिड़ककर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नानकार्य सम्पन
करे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वहाँ तीर्थजलपे
देवता आदिका स्नानांग तर्पण भी करे॥ १५-१७॥
इसके बाद धौतवस्त्र लेकर पाँच कच्छ करके
उसे धारण करे। साथ ही कोई उत्तरीय भी धारण का
ले; क्योंकि सन्ध्या-वन्दन आदि सभी कर्मोमें उसकी
आवश्यकता होती है। नदी आदि तीर्थोमें स्ता
करनेपर स्नान-सम्बन्धी उतारे हुए वस्त्रको वहाँ न
धोये। स्नानके पश्चात् विद्वान् पुरुष उस वस्त्रको
बावड़ीमें, कुएँके पास अथवा घर आदिमें ले जाग
और वहाँ पत्थरपर, लकड़ी आदिपर, जलमें या
स्थलमें अच्छी तरह धोकर उस वस्त्रको निचोड़े। हे
द्विजो! वस्त्रको निचोड़नेसे जो जल गिरता है, वह
पितरोंकी तृप्तिके लिये होता है॥ १८-२०॥
इसके बाद जाबालि-उपनिषद्में बताये गये
[अग्निरिति] मन्त्रसे भस्म लेकर उसके द्वारा त्रिपुण्ड
लगाये।* इस विधिका पालन न किया जाय, इसके
पूर्व ही यदि जलमें भस्म गिर जाय तो कर्ता नरका
जाता है। 'आपो हि ष्ठा” इस मन्त्रसे पाप-शातिं
* जाबालि-उपनिषद्में भस्मधारणकी विधि इस प्रकार कही गयी है--
“ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म व्योमेति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म' इस मन्त्रसे भस्मे
अभिमन्त्रित करे।
“मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो
सदमित्त्वा हवामहे'॥
इस मनत्रसे उठाकर जलसे मले, तत्पश्चात्
गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वौरात्तुद्र भामिनो वधीर्हविष्यत
'त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥'
इत्यादि मन्त्रसे मस्तक, ललाट, वक्षःस्थल और कन्धोंपर त्रिपुण्ड करे।
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यहेवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु ज्यायुषम्॥'
तथा--
“ज्यम्बक॑ यजामहे सुगन्धिं पृष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्थनान्मृत्योमुक्षीय मामृतात् ॥'
--इन दोनों मन्त्रॉंको तीन-तीन बार पढ़ते हुए तीन रेखाएँ खींचे। i
अ० १३]
आपोहिष्ठेति शिरसि प्रोक्षयेत्पापशान्तये।
यस्येति मन्त्रं पादे तु सन्धिपरोक्षणमुच्यते॥ २२
हृदये मूर्ध्नि पादे च मूर्ध्नि हृत्पाद एव च।
हृत्यादमूर्थ्न सम्प्रोक्ष्य मन्त्रस्नानं विदुर्बुधाः ॥ २३
ईषत्स्पर्शे च दौःस्वास्थ्ये राजराष्ट्रभयेऽपि च।
अगत्या गतिकाले च मन्त्रस्नानं समाचरेत्॥ २४
प्रातः सूर्यानुवाकेन सायमग्न्यनुवाकतः।
अपः पीत्वा तथा मध्ये पुनः प्रोक्षणमाचरेत्॥ २५
गायत्र्या जपमन्त्रान्ते त्रिरूर्ध्वं प्राग्विनिक्षिपेत्।
मन्त्रेण सह चैकं वै मध्येऽर्ध्यं तु रवेद्विजा:॥ २६
अथ जाते च सायाह्ने भुवि पश्चिमदिङ्मुखः।
उद्धृत्य दद्यात् प्रातस्तु मध्याहवेऽङ्गुलिभिस्तथा ॥ २७
अङ्गुलीनां च रन्ध्रेण लम्बं पश्येद् दिवाकरम्।
आत्मप्रदक्षिणं कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत्॥ २८
सायं मुहूतादर्वाक्तु कृता सन्ध्या वृथा भवेत्।
अकालात्काल इत्युक्तो दिनेऽतीते यथाक्रमम्॥ २९
विद्येश्वरसंहिता
९३
लिये सिरपर जल छिड्के तथा “यस्य क्षयाय '--इस
मन्त्रको पढ़कर पैरपर जल छिड्के; इसे सन्धिप्रोक्षण
कहते हैं। 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्रमें तीन
ऋचाएँ हैं और प्रत्येक ऋचामें गायत्री छन्दके तीन-
तीन चरण हैं। इनमेंसे प्रथम ऋचाके तीन चरणोंका
पाठ करते हुए क्रमशः पैर, मस्तक और हृदयमें जल
छिड्के; दूसरी ऋचाके तीन चरणोंको पढ़कर क्रमशः
मस्तक, हृदय और पैरमें जल छिड़के तथा तीसरी
ऋचाके तीन चरणोंका पाठ करते हुए क्रमशः हृदय,
पैर और मस्तकका जलसे प्रोक्षण करे-इसे विद्वान्
पुरुष मन्त्रस्नान मानते हैं॥ २१-२३॥
किसी अपवित्र वस्तुसे किंचित् स्पर्श हो जानेपर,
अपना स्वास्थ्य ठीक न रहनेपर, राजभय या राष्ट्रभय
उपस्थित होनेपर तथा यात्राकालमें जलकी उपलब्धि
न होनेकी विवशता आ जानेपर मन्त्रस्नान करना
चाहिये। प्रातःकाल [सूर्यश्च मा मन्युश्च-इस]
सूर्यानुवाकसे तथा सायंकाल [अग्निश्च मा मन्युश्च
इस] अग्नि-सम्बन्धी अनुवाकसे जलका आचमन करके
पुनः जलसे अपने अंगोंका प्रोक्षण करे। मध्याहनकालमें
भी [आपः पुनन्तु-इस] मन्त्रसे आचमन करके
पूर्ववत् प्रोक्षण करना चाहिये॥ २४-२५॥
प्रातःकालकी सन्ध्योपासनामें गायत्रीमन्त्रका जप
करके तीन बार ऊपरकी ओर सूर्यदेवको अर्घ्य
देना चाहिये। हे ब्राह्मणो! मध्याहकालमें गायत्री-
मन्त्रके उच्चारणपूर्वक सूर्यको एक ही अर्घ्य देना
चाहिये । फिर सायंकाल आनेपर पश््चिमकी ओर मुख
करके बैठ जाय और पृथ्वीपर ही सूर्यके लिये अर्घ्य
दे [ऊपरकी ओर नहीं] । प्रातःकाल और मध्याहकालके
समय अंजलिमें अर्घ्यजल लेकर अँगुलियोंकी ओरसे
सूर्यदेवके लिये अर्घ्य दे। अँगुलियोंके ठिद्रसे ढलते
हुए सूर्यको देखे तथा उनके लिये आत्म-प्रदक्षिणा
करके शुद्ध आचमन करे॥ २६--२८॥
सायंकालमें सूर्यास्तसे दो घड़ी पहले की हुई
सन्ध्या निष्फल होती है; क्योंकि वह सायं सन्ध्याका
समय नहीं है। ठीक समयपर सन्ध्या करनी चाहिये
ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है। यदि सन्ध्योपासना किये
श्रीशिवमहापुराण
९४
दिवातीते च गायत्रीं शतं नित्यं क्रमाज्जपेत्
आदशाहात्परातीतं गायत्रीं लक्षमभ्यसेत्॥ ३०
मासातीते तु नित्ये हि पुनश्चोपनयं चरेत्।
इंशो गौरी गुहो विष्णुर्ब्रह्मा चन्द्रश्च वै यमः॥ ३१
एवंरूपांश्च वै देवांस्तर्पयेदर्थसिद्धये।
ब्रह्मार्पणं ततः कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत्॥ ३२
तीर्थदक्षिणतः शस्ते मठे मन्त्रालये बुधः।
तत्र देवालये वापि गृहे वा नियतस्थले॥ ३३
सर्वान्देवान्नमस्कृत्य स्थिरबुद्धिः स्थिरासनः।
प्रणवं पूर्वमभ्यस्य गायत्रीमभ्यसेत्ततः॥ ३४
जीवब्रहौक्यविषयं बुद्ध्वा प्रणवमभ्यसेत्।
त्रैलोक्यसृष्टिकर्तारं स्थितिकर्तारमच्युतम्॥ ३५
संहर्तारं तथा रुद्रं स्वप्रकाशमुपास्महे।
ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां च मनोवृत्तीर्थियस्तथा॥ ३६
भोगमोक्षप्रदे धर्मे ज्ञाने च प्रेरयेत्सदा ।
इत्थमर्थं धिया ध्यायन्ब्रह्म प्राप्नोति निश्चयम्॥ ३७
केवलं वा जपेन्नित्यं ब्राह्मण्यस्य च पूर्तये।
सहस्रमभ्यसेन्नित्यं प्रतर्बराह्मणपुङ्गवः ॥ ३८
अन्येषां च यथाशक्ति मध्याह्ने च शतं जपेत्।
सायं द्विदशकं ज्ञेयं शिखाष्टकसमन्वितम्॥ ३९
[अ शर
बिना दिन बीत जाय तो प्रत्येक समयके लिये
प्रायश्चित्त करना चाहिये। यदि एक दिन बीते
प्रत्येक बीते हुए सन्ध्याकालके लिये नित्य-नियफे
अतिरिक्त सौ गायत्री-मन्त्रका अधिक जप करे।
नित्यकर्मके लुप्त हुए दस दिनसे अधिक बीत जो
तो उसके प्रायश्चित्तरूपमें एक लाख गायत्रीका ऊ
करना चाहिये। यदि एक मासतक नित्यकर्म छूट जा;
तो पुनः अपना उपनयनसंस्कार कराये॥ २९-३०१
अर्थसिद्धिके लिये ईश, गौरी, कार्तिकेय, विणु
ब्रह्मा, चन्द्रमा और यमका तथा ऐसे ही अन्य देवताओंक
भी शुद्ध जलसे तर्पण करे। तत्पश्चात् तर्पण कर्मने
बरह्मा्पण करके शुद्ध आचमन करे | तीर्थके दक्षिण भाग
प्रशस्त मठमें, मन्त्रालयमें, देवालयमें, घरमें अथवा अर
किसी नियत स्थानमें आसनपर स्थिरतापूर्वक बैठका
विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धिको स्थिर करे और सम
देवताओंको नमस्कार करके पहले प्रणवका जप करेगे
पश्चात् गायत्री-मन्त्रकी आवृत्ति करे॥ ३१-३४॥
प्रणवके अ, उ, म् इन तीनों अक्षरोंसे जीव औ
ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन होता है-इस बातको जान
प्रणवका जप करना चाहिये। जपकालमें यह भाव
करनी चाहिये कि हम तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवात
ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार केवत
रुद्रकी-जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उपासना करे
यह ब्रह्मस्वरूप ओंकार हमारी कमेन्रियों और जञाने
वृत्तियोंको, मनकी वृत्तियोंको तथा बुद्धिवृत्तियोंको स
भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञानकी
प्रेरित करे। बुद्धिके द्वारा प्रणवके इस अर्थका विं
करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निरश्व ह
ब्रह्मो प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसन्थानके
भी प्रणवका नित्य जप करना चाहिये, इससे राम
पूर्ति होती है | ब्राह्मणत्वकी पूर्तिके लिये श्रेष्ठ राह
प्रतिदिन प्रात:काल एक सहस्त्र गायत्री-मन्त्रका जप क
चाहिये मध्याहकालमें सौ बार और सायंकालमें हि
बार जपकी विधि है। अन्य वर्णके लोग
क्षत्रिय और वैश्यको तीनों सन्ध्याओके समय
गायत्री-जप करना चाहिये ॥ ३५--३९ ॥
अ० १३]
मूलाधारं समारभ्य द्वादशांशस्थितांस्तथा ।
विद्येशब्रह्मविष्णवीशजीवात्मपरमेश्वरान्
॥ ४०
ब्रह्मबुद्धया तदैक्यं च सोऽहं भावनया जपेत्।
तानेव ब्रह्मरन्श्रादौ कायाद् बाह्ये च भावयेत्॥ ४१
महत्तत्त्वं समारभ्य शरीरं तु सहस्त्रकम्।
एकैकस्माजपादेकमतिक्रम्य शनैः शनेः॥ ४२
परस्मिन्योजयेज्जीवं जपतत्त्वमुदाहृतम्।
शतद्विदशकं देहं शिखाष्टकसमन्वितम्॥ ४३
मन्त्राणां जप एवं हि जपमादिक्रमाद्विदुः।
सहस्त्रं ब्राह्मदं विद्याच्छतमैन््रप्रदं विदुः ॥ ४४
इतरत्त्वात्मरक्षार्थ ब्रह्मयोनिषु जायते।
दिवाकरमुपस्थाय नित्यमित्थं समाचरेत्॥ ४५
लक्षद्वादशयुक्तस्तु पूर्णब्राह्मण ईरितः।
गायत्र्या लक्षहीनं तु वेदकार्ये न योजयेत्॥ ४६
आसप्ततेस्तु नियमं पश्चात््रब्राजनं चरेत्।
प्रतरद्वादशसाहस्त्रं प्रत्राजी प्रणवं जपेत्॥ ४७
दिने दिने त्वतिक्रान्ते नित्यमेवं क्रमाज्पेत्।
मासादौ क्रमशोऽतीते सार्धलक्षजपेन हि॥ ४८
अत ऊर्ध्वमतिक्रान्ते पुनः प्रैषं समाचरेत्।
एवं कृत्वा दोषशान्तिरन्यथा रौरवं ्रजेत्॥ ४९
विद्येश्वरसंहिता
९५
[शरीरके भीतर मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर,
अनाहत, आज्ञा और सहस्रारये छः चक्र हैं ।] इनमें
मूलाधारसे लेकर सहस्रारतक छहों स्थानोंमें क्रमशः
विद्येश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, ईश, जीवात्मा और परमेश्वर
स्थित हैं । इन सबमें ब्रह्मबुद्धि करके इनकी एकताका
निश्चय करे और वह ब्रह्म मैं हूँ--ऐसी भावनासे युक्त
होकर जप करे । उन्हीं विद्येश्वर आदिको ब्रह्मर-्र आदिमें
तथा इस शरीरसे बाहर भी भावना करे। महत्तत्त्वसे
लेकर पंचभूतपर्यन्त तत्त्वोंसे बना हुआ जो शरीर है, ऐसे
सहस्रों शरीरोंका एक-एक अजपा गायत्रीके जपसे एक-
एकके क्रमसे अतिक्रमण करके जीवको धीरे-धीरे पस्मात्मासे
संयुक्त करे-यह जपका तत्त्व बताया गया है । सौ अथवा
अट्टाईस मन्त्रोंके जपसे उतने ही शरीरोंका अतिक्रमण
होता है । इस प्रकार जो मनत्रोंका जप है, इसीको आदिक्रमसे
वास्तविक जप जानना चाहिये ॥ ४०-४३१/२॥
एक हजार बार किया हुआ जप ब्रह्मलोक प्रदान
करनेवाला होता है--ऐसा जानना चाहिये। सौ बार
किया हुआ जप इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला माना गया
है । ब्राह्मणेतर पुरुष आत्मरक्षाके लिये जो स्वल्पमात्रामें
जप करता है, वह ब्राह्मणके कुलमें जन्म लेता है । इस
प्रकार प्रतिदिन सूर्योपस्थान करके उपर्युक्तरूपसे जपका
अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥
बारह लाख गायत्रीका जप करनेवाला पुरुष
पूर्णरूपसे ब्राह्मण कहा गया है। जिस ब्राह्मणने एक
लाख गायत्रीका भी जप न किया हो, उसे वैदिक कार्यमें
न लगाये । सत्तर वर्षकी अवस्थातक नियमपालनपूर्वक
कार्य करे। इसके बाद गृह त्यागकर संन्यास ले ले।
परिव्राजक या संन्यासी पुरुष नित्य प्रातःकाल बारह
हजार प्रणवका जप करे। यदि एक दिन नियमका उल्लंघन
हो जाय, तो दूसरे दिन उसके बदलेमें उतना मन्त्र और
अधिक जपना चाहिये; इस प्रकार जपको चलानेका
प्रयत्न करना चाहिये। यदि क्रमश: एक मास उल्लंघनका
व्यतीत हो गया हो तो डेढ़ लाख जप करके उसका
प्रायश्चित्त करना चाहिये ।इससे अधिक समयतक नियमका
उल्लंघन हो जाय तो पुनः नये सिरेसे गुरुसे नियम ग्रहण
करे। ऐसा करनेसे दोषोंकी शान्ति होती है, अन्यथा
रौरव नरकमें जाना पड़ता है॥ ४६-४९ ॥
९६
धर्मार्थयोस्ततो यतं कुर्यात्कामी न चेतरः।
ब्राह्मणो मुक्तिकामः स्याद् ब्रह्मज्ञानं सदाभ्यसेत्॥ ५०
धर्माद्थोऽर्थतो भोगो भोगाद्वैराग्यसम्भवः।
धर्मार्जितार्थभोगेन वैराग्यमुपजायते ॥ ५१
विपरीतार्थभोगेन राग एव प्रजायते।
धर्मश्च द्विविधः प्रोक्तो द्रव्यदेहद्व्येन च॥ ५२
दरव्यमिज्यादिरूपं स्यात्तीर्थस्नानादि दैहिकम्।
धर्मेण धनमाप्नोति तपसा दिव्यरूपताम्॥ ५३
निष्कामः शुद्धिमाप्नोति शुद्धया ज्ञानं न संशयः।
कृतादौ हि तपः श्लाध्यं द्रव्यधर्मः कलौ युगे॥ ५४
कृते ध्यानाऱ्ज्ञानसिद्धिस्त्रेतायां तपसा तथा।
द्वापरे यजनाज्जानं प्रतिमापूजया कलो ॥ ५५
यादृशं पुण्यपापं वा तादृशं फलमेव हि।
्रव्यदेहाङ्गभेदेन न्यूनवृद्धिक्षयादिकम्॥ ५६
अधमो हिंसिकारूपो धर्मस्तु सुखरूपकः।
अधर्माद् दुःखमाप्नोति धर्माद्वै सुखमेधते ॥ ५७
विद्याद् दुवृत्तितो दुः खं सुखं विद्यात्सुवृत्तित:।
धर्मार्जनमतः कुर्याद्धोगमोक्षप्रसिद्धये॥ ५८
सकुटुम्बस्य विप्रस्य चतुर्जनयुतस्य च।
शतवर्षस्य वृत्तिं तु दद्यात्तदव्रह्लोकदम्॥ ५९
श्रीशिवमहापुराण
[ अण © RN eS
जो सकाम भावनासे युक्त गृहस्थ ब्राह्मण है, मोडे
धर्म तथा अर्थकेलिये यत्न करना चाहिये | मुमुक्षु आह
तो सदा ज्ञानका ही अभ्यास करना चाहिये। पपी
अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे भोग सुलभ होता है भी
उस भोगसे वैराग्यकी प्राप्ति होती है । धर्मपूर्वक उर्पा$
धनसे जो भोग प्राप्त होता है, उससे एक दिन अछ
बैराग्यका उदय होता है। धर्मके विपरीत अधर्मसे उपाशि
धनके द्वारा जो भोग प्राप्त होता है, उससे भोगोंके पर
आसक्ति उत्पन्न होती है ॥ ५०-५१९/२॥
धर्म दो प्रकारका कहा गया है--द्रव्यके द्ञ
सम्पादित होनेवाला और शरीरसे किया जानेवालर।
द्रव्यधर्म यज्ञ आदिके रूपमें और शरीरधर्म तीर्थ-सा
आदिके रूपमें पाये जाते हैं । मनुष्य धर्मसे धन प
है, तपस्यासे उसे दिव्य रूपकी प्राप्ति होती है।
कामनाओंका त्याग करनेवाले पुरुषके अन्त:करणक॑
शुद्धि होती है; उस शुद्धिसे ज्ञानका उदय होता है
इसमें संशय नहीं है ॥ ५२-५३१/२॥
सत्ययुग आदिमें तपको ही प्रशस्त कहा गया,
किंतु कलियुगमेंद्रव्यसाध्य धर्म अच्छा माना गयाहै।
सत्ययुगमें ध्यानसे, त्रेतामें तपस्यासे और द्वापरमें के
करनेसे ज्ञानकी सिद्धि होती है, परंतु कलियुगमें प्रति
(भगवद्िग्रह) -की पूजासे ज्ञानलाभ होता है ॥ ५४५५
जिसका जैसा पुण्य या पाप होता है, उसे वैर
ही फल प्राप्त होता है। द्रव्य, देह अथवा औं
न्यूनता, वृद्धि अथवा क्षय आदिके रूपमें वह फॅ
प्रकट होता है॥ ५६॥
अधर्म हिंसा (दु:ख) -रूप है और धर्म सुख
है। मनुष्य अधर्मसे दुःख पाता है और धर्मसे सुख रश
अभ्युदयका भागी होता है। दुराचारसे दुःख प्राप्त
है और सदाचारसे सुख । अतः भोग और मोक्षकी
लिये धर्मका उपार्जन करना चाहिये ॥ ५७-५८॥
जिसके घरमें कम-से-कम चार मनुष्य हैं,
कुटुम्बी ब्राह्मणको जो सौ वर्षके लिये जीविका ( जीव
निर्वाहकी सामग्री) देता है, उसके लिये व्ह
ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला होता है । एक ह
अ० १३]
विद्येश्वरसंहिता
९७
£---- > EE स्का .|/|/ै/ै""रर_
चान्द्रायणसहस्त्रं तु ब्रह्मलोकप्रदं विहुः।
सहस्त्रस्य कुटुम्बस्य प्रतिष्ठां क्षत्रियश्चरेत्॥ ६०
इन्द्रलोकप्रदं विद्यादयुतं ब्रह्मलोकदम्।
यां देवतां पुरस्कृत्य दानमाचरते नरः॥ ६१
तत्तल्लोकमवाप्नोति इति वेदविदो विदुः।
अर्थहीनः सदा कुर्यात्तपसामर्जनं तथा॥ ६२
तीर्थाच्च तपसा प्राप्यं सुखमक्षय्यमश्नुते।
अर्थार्जनमथो वक्ष्ये न्यायतः सुसमाहितः॥ ६३
कृतात्प्रतिग्रहाच्चैव याजनाच्च विशुद्धतः।
अदैन्यादनतिक्लेशाद् ब्राह्मणो धनमर्जयेत्॥ ६४
क्षत्रियो बाहुवीर्येण कृषिगोरक्षणाद् विशः।
न्यायार्जितस्य वित्तस्य दानात्सिद्द्धिं समश्नुते॥ ६५
ज्ञानसिद्धद्या मोक्षसिद्धिः सर्वेषां गुर्वनुग्रहात्।
मोक्षात्स्वरूपसिद्धिः स्यात्परानन्दं समश्नुते॥ ६६
सत्सङ्कात्सर्वमेतद्वै नराणां जायते द्विजाः।
धनधान्यादिकं सर्व देयं वै गृहमेधिना॥ ६७
यद्यत्काले वस्तुजातं फलं वा धान्यमेव च।
तत्तत्सर्व ब्राह्मणेभ्यो देयं वै हितमिच्छता॥ ६८
जलं चैव सदा देयमन्नं क्षुद््याधिशान्तये।
क्षेत्रं धान्यं तथामान्नमन्नमेव चतुर्विधम्॥ ६९
यावत्कालं यदन्नं वै भुक्त्वा श्रवणमेधते।
तावत्कृतस्य पुण्यस्य त्वर्धं दातुर्न संशय: ॥ ७०
2223 Shivmahapuranam._Part I_Section_5_I_Front
चान्द्रायण ब्रतका अनुष्ठान ब्रह्मलोकदायक माना गया
। जो क्षत्रिय एक हजार कुटुम्बोंको जीविका और
आवास देता है, उसका वह कर्म इन्द्रलोककी प्राप्ति
करानेवाला होता है और दस हजार कुटुम्बोंको दिया
हुआ आश्रयदान ब्रह्मलोक प्रदान करता है । दाता पुरुष
जिस देवताके उद्देश्यसे दान करता है अर्थात् वह दानके
द्वारा जिस देवताको प्रसन्न करना चाहता है, उसीका
लोक उसे प्राप्त होता है-ऐसा वेदवेत्ता पुरुष कहते
हैं । धनहीन पुरुष सदा तपस्याका उपार्जन करे; क्योंकि
तपस्या और तीर्थसेवनसे अक्षय सुख पाकर मनुष्य उसका
उपभोग करता है ॥ ५९--६२१/२॥
अब मैं न्यायतः धनके उपार्जनकी विधि बता
रहा हूँ। ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा सावधान
रहकर विशुद्ध प्रतिग्रह (दानग्रहण) तथा याजन
(यज्ञ कराने) आदिसे धनका अर्जन करे। वह इसके
लिये कहीं दीनता न दिखाये और न अत्यन्त
क्लेशदायक कर्म ही करे। क्षत्रिय बाहुबलसे धनका
उपार्जन करे और वैश्य कृषि एवं गोरक्षासे । न्यायोपार्जित
धनका दान करनेसे दाताको ज्ञानकी सिद्धि होती है।
ज्ञानसिद्धिद्रारा सब पुरुषोंको गुरुकृपासे मोक्षसिद्धि
सुलभ होती है। मोक्षसे स्वरूपकी सिद्धि (ब्रह्मरूपसे
स्थिति) प्राप्त होती है, जिससे [मुक्त पुरुष] परमानन्दका
अनुभव करता है। हे द्विजो! मनुष्योंको यह सब
सत्संगसे प्राप्त है॥ ६३-६६१/२॥
गृहस्थाश्रमीको धन-धान्य आदि सभी वस्तुओंका
दान करना चाहिये। अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको जिस
कालमें जो फल अथवा धान्यादि वस्तुएँ उत्पन्न होती
हैं, उन्हें ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये॥ ६७-६८॥
वह तृषा-निवृत्तिके लिये जल तथा क्षुधारूपी रोगकी
शान्तिके लिये सदा अन्नका दान करे। खेत, धान्य,
कच्चा अन्न तथा भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य-ये
चार प्रकारके सिद्ध अन्न दान करने चाहिये। जिसके
अन्नको खाकर मनुष्य जबतक कथा- श्रवण आदि सद्धर्मका
पालन करता है, उतने समयतक उसके किये हुए
पुण्यफलका आधा भाग दाताको मिल जाता है; इसमें
संशय नहीं है॥६९-७०॥
९८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १ Nii कणणणण
ग्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा ।
पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं ब्रजेतू॥
आत्मवित्तं त्रिधा कुर्याद्धर्मवृद्धयात्मभोगत:।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात्तु धर्मत: ॥ ७२
वित्तस्य वर्धनं कुर्याद् वृद्धयंशेन हि साधकः।
हितेन मितमेध्येन भोगं भोगांशतश्चरेत्॥ ७३
कृष्यर्जिते दशांशं हि देयं पापस्य शुद्धये।
शेषेण कुर्याद्धर्मादि अन्यथा रौरवं व्रजेत्॥ ७४
अथवा पापबुद्धिः स्यात्क्षयं वा सस्यमेष्यति।
वृद्धिवाणिज्यके देयं षडंशं हि विचक्षणैः ॥ ७५
शुद्धप्रतिग्रहे देयं चतुर्थाशं द्विजोत्तमैः।
अकस्मादुत्थितेऽर्थे हि देयमर्धं द्विजोत्तमैः॥ ७६
असत्प्रतिग्रहे सर्व दुर्दानं सागरे क्षिपेत्
आहूय दानं कर्तव्यमात्मभोगसमृद्धये॥ ७७
पृष्टं सर्व सदा देयमात्मशक्त्यनुसारतः।
जन्मान्तरे ऋणी हि स्याददत्ते पृष्टवस्तुनि॥ ७८
परेषां च तथा दोषं न प्रशंसेद्विचक्षण:।
विद्वेषेण तथा ब्रह्मन् श्रुतं दृष्टं च नो वदेत्॥ ७९
न वदेत्सर्वजन्तूनां हृदि रोषकरं बुधः।
सन्ध्ययोरग्िकार्यं च कुर्यादिश्र्यसिद्धये॥ ८०
अशक्तस्त्वेककाले वा सूर्याग्नी च यथाविधि।
तण्डुलं धान्यमाज्यं वा फलं कन्दं हविस्तथा ॥ ८१
दान लेनेवाला पुरुष दानमे प्राप्त हुई वस्तुका दा
तथा तपस्या करके अपने प्रतिग्रहजनित पापकी
करे; अन्यथा उसे रौरव नरकमें गिरना पड़ता है | अप
धनके तीन भाग करे--एक भाग धर्मके लिये, दूसरा भग
वृद्धिके लिये तथा तीसरा भाग अपने उपभोगके लिये।
नित्य, नैमित्तिक और काम्य--ये तीनों प्रकारके कर्म
धर्मार्थ रखे हुए धनसे करे | साधकको चाहिये कि व्ह
वृद्धिके लिये रखे हुए धनसे ऐसा व्यापार करे, जिससे
उस धनकी वृद्धि हो तथा उपभोगके लिये रक्षित धनसे
हितकारक, परिमित एवं पवित्र भोग भोगे ॥ ७१--७३॥
खेतीसे पैदा किये हुए धनका दसवाँ अंश दान का
दे। इससे पापकी शुद्धि होती है। शेष धनसे धर्म, वृद्धि
एवं उपभोग करे, अन्यथा वह रौरव नरकमें पड़ता है
अथवा उसकी बुद्धि पापसे परिपूर्ण हो जाती है या खेती
ही चौपट हो जाती है । वृद्धिके लिये किये गये व्यापारं
प्राप्त हुए धनका छठा भाग दान कर दे॥ ७४-७५॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दानमे प्राप्त हुए शुद्ध पदार्थोका
चतुर्थांश दान कर देना चाहिये। उन्हें अकस्मात् प्राप
हुए धनका तो आधा भाग दान कर ही देना चाहिये।
असतू-प्रतिग्रह (दूषित दान) -में प्राप्त सम्पूर्ण पदार्थोको
समुद्रमें फेंक देना चाहिये। अपने भोगकी समृद्धे
लिये ब्राह्मणोंको बुलाकर दान करना चाहिये । किसीके
द्वारा याचना करनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सदैव ही
सब कुछ देना चाहिये। यदि माँगे जानेपर [शर्कति
रहते हुए] वह पदार्थ न दिया जाय तो दूसरे जनमे
वह ऋण चुकाना पड़ता है॥ ७६--७८॥
विद्वान्को चाहिये कि वह दूसरोंके दोषोंका वर्णी
न करे। हे ब्रह्मन्! द्वेषवश दूसरोंके सुने या देखे हुए
छिद्रको भी प्रकट न करे। विद्वान् पुरुष ऐसी बात १
कहे, जो समस्त प्राणियोंके हृदयमें रोष पैदा करनेवाली
हो॥ ७९१/२॥ ही.
ऐश्वर्यकी सिद्धिके लिये दोनों सम्ध्या
समय अग्निहोत्र करे, यदि असमर्थ हो तो वह णत
ही समय सूर्य और अग्निको विधिपूर्वक दी
आहुतिसे सन्तुष्ट करे। चावल, धान्य, घी, फल, क€
तथा हविष्य--इनके द्वारा विधिपूर्वक
2223 Shivmahapuranam_Part | Section.5-L-Be
आ० १४]
विद्येश्वरसंहिता
९९
स्थालीपाकं तथा कुर्याद्यथान्यायं यथाविधि।
प्रधानहोममात्रं वा हव्याभावे समाचरेत्॥ ८२
नित्यसन्धानमित्युक्तं तमजस्त्रं विदुर्बुधा: ।
अथवा जपमात्रं वा सूर्यवन्दनमेव च॥ ८३
एवमात्मार्थिनः कुर्युरर्थार्थी च यथाविधि।
ब्रह्मयज्ञता नित्यं देवपूजारतास्तथा॥ ८४
अग्निपूजापरा नित्यं गुरुपूजारतास्तथा।
ब्राह्मणानां तृप्तिकराः सर्वे स्वर्गस्य भागिन: ॥ ८५
बनाये तथा यथोचित रीतिसे सूर्य और अग्निको अर्पित
करे। यदि हविष्यका अभाव हो तो प्रधान होममात्र
करे। सदा सुरक्षित रहनेवाली अग्निको विद्वान् पुरुष
अजस्रकी संज्ञा देते हैं। यदि असमर्थ हो तो सन्ध्याकालमें
जपमात्र या सूर्यकी वन्दनामात्र कर ले॥ ८०-८३॥
आत्मज्ञानकी इच्छावाले तथा धनार्थी पुरुषको
भी इस प्रकार विधिवत् उपासना करनी चाहिये। जो
सदा ब्रह्मयज्ञमें तत्पर रहते हैं, देवताओंकी पूजामें लगे
रहते हैं, नित्य अग्निपूजा एवं गुरुपूजामें अनुरक्त होते
हैं तथा ब्राह्मणोंको तृप्त किया करते हैं, वे सब लोग
स्वर्गके भागी होते हैं ॥ ८४-८५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येशवरसंहितायां सदाचारवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहितामें सदाचारवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
— oo
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन, भगवान् शिवके द्वारा सातों वारोंका
निर्माण तथा उनमें देवाराधनसे विभिन्न प्रकारके फलोंकी प्राप्तिका कथन
ऋषय ऊचुः
अग्नियज्ञं देवयज्ञं ब्रह्मयज्ञं तथैव च।
गुरुपूजां ब्रह्मतृप्ति क्रमेण ब्रूहि नः प्रभो॥ १
सूत उवाच
अग्नौ जुहोति यद् द्रव्यमग्नियज्ञः स उच्यते।
ब्रहमचर्याश्रमस्थानां समिदाधानमेव हि॥ २
समिदग्नौ व्रताद्यं च विशेषयजनादिकम्
प्रथमाश्रमिणामेवं यावदौपासनं द्विजाः॥ ३
आत्मन्यारोपितारनीनां वनिनां यतिनां द्विजाः।
हितं च मितमेध्यान्नं स्वकाले भोजनं हुतिः॥ ४
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_S_2_Front
ऋषिगण बोले--हे प्रभो! अग्नियज्ञ, देवयज्ञ,
ब्रह्मयज्ञ, गुरुपूजा तथा ब्रह्मतृप्तिका क्रमशः हमारे
समक्ष वर्णन कीजिये॥ १॥
सूतजी बोले--हे महर्षियो ! गृहस्थ पुरुष अग्निमें
सायंकाल और प्रातःकाल जो चावल आदि द्रव्यकी
आहुति देता है, उसीको अग्नियज्ञ कहते हैं। जो ब्रह्मचर्य
आश्रममें स्थित हैं, उन ब्रह्मचारियोंके लिये समिधाका
आधान ही अग्नियज्ञ है वे समिधाका ही अग्निमें हवन
करें। हे ब्राह्मणो ! ब्रह्मचर्य आश्रममें निवास करनेवाले
द्विजोंका जबतक विवाह न हो जाय और वे औपासनाग्निकी
प्रतिष्ठा न कर लें, तबतक उनके लिये अग्निमें समिधाकी
आहुति, ब्रत आदिका पालन तथा विशेष यजन आदि
ही कर्तव्य है (यही उनके लिये अग्नियज्ञ है) । हे
द्विजो! जिन्होंने बाह्य अग्निको विसर्जित करके अपनी
आत्ममें ही अग्निका आरोप कर लिया है, ऐसे
वानप्रस्थियों और संन्यासियोंके लिये यही हवन या
अग्नियज्ञ है कि वे विहित समयपर हितकर, परिमित
और पवित्र अन्नका भोजन कर लें ॥ २--४॥
१००
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १
OS '`
औपासनार्निसन्धानं समारभ्य सुरक्षितम्।
कुण्डे वाप्यथ भाण्डे वा तदजस्रं समीरितम्॥ ५
अग्निमात्मन्यरण्यां वा राजदैववशाद् श्रुवम्।
अग्नित्यागभयादुक्तं समारोपितमुच्यते॥ ६
सम्पत्करी तथा ज्ञेया सायमग्न्याहुतिरद्विजाः।
आयुष्करीति विज्ञेया प्रातः सूर्याहुतिस्तथा॥ ७
अग्नियज्ञो ह्ययं प्रोक्तो दिवा सूर्यनिवेशनात्।
इन्द्रादीन्सकलान्देवानुददिश्याग्नौ जुहोति यत्॥ ८
देवयज्ञं हि तं विद्यातस्थालीपाकादिकान्क्रतून्।
चौलादिकं तथा ज्ञेयं लौकिकारनौ प्रतिष्ठितम् ९
ब्रह्मयज्ञं द्विजः कुर्याद् देवानां तृप्तयेऽसकृत्।
ब्रह्मयज्ञ इति प्रोक्तो वेदस्याध्ययनं भवेत्॥ १०
नित्यानन्तरमासायं ततस्तु न विधीयते।
अनग्नौ देवयजनं शृणुत श्रद्धयादरात्॥ ११
आदिसृष्टौ महादेवः सर्वज्ञः करुणाकरः।
सर्वलोकोपकारार्थ वारान्कल्पितवान्प्रभुः॥ १२
संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्।
आदावारोग्यदं वारं स्ववारं कृतवान्प्रभुः॥ १३
सम्पत्करं स्वमायाया वारं च कृतवांस्ततः।
जनने दुर्गतिक्रान्ते कुमारस्य ततः परम्॥ १४
औपासनाग्निको ग्रहण करके जब कुण्ड अथव
भाण्डमें सुरक्षित कर लिया जाय, तब उसे अजन
कहा जाता है। राजविप्लव या दुर्दैवसे अग्नित्यागढ़
भय उपस्थित हो जानेपर जब अग्निको स्वयं आत्मन
अथवा अरणीमें स्थापित कर लिया जाता है, तब उसे
समारोपित कहते हैं ॥ ५-६॥
हे ब्राह्मणो! सायंकाल अग्निके लिये दी ह
आहुति सम्पत्ति प्रदान करनेवाली होती है, ऐसा
जानना चाहिये और प्रातःकाल सूर्यदेवको दी हुई
आहुति आयुकी वृद्धि करनेवाली होती है, यह बात
अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये। दिनमें अग्निदेव
सूर्यमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं । अतः प्रातःकाल सूर्यको
दी हुई आहुति भी अग्नियज्ञ ही हैं॥ ७॥
इन्द्र आदि समस्त देवताओंके उद्देश्यसे अममे
जो आहुति दी जाती है, उसे देवयज्ञ समझना चाहिये।
स्थालीपाक आदि यज्ञोंको देवयज्ञ ही मानना चाहिये।
लौकिक अग्निमें प्रतिष्ठित जो चूडाकरण आदि
संस्कार-निमित्तक हवन-कर्म हैं, उन्हें भी देवयज्ञके ही
अन्तर्गत जानना चाहिये । [अब ब्रह्मयज्ञका वर्णन सुनिये।]
द्विजको चाहिये कि वह देवताओंकी तृप्तिके लिये निस्त
ब्रह्मयज्ञ करे। वेदोंका जो नित्य अध्ययन होता है, उसीको
ब्रह्मयज्ञ कहा गया है। प्रातः नित्यकर्मके अनन्त
सायंकालतक ब्रह्मयज्ञ किया जा सकता है । उसके बाद
रातमें इसका विधान नहीं है ॥ ८-१०१/२॥
अग्निके बिना देवयज्ञ कैसे सम्पन्न होता है, इस
आपलोग श्रद्धासे और आदरपूर्वक सुनिये । सृष्ट
आरम्भमें सर्वज्ञ, दयालु और सर्वसमर्थ महादेवजीते
समस्त लोकोंके उपकारके लिये वारोंकी कल्पना की!
वे भगवान् शिव संसाररूपी रोगको दूर करनेके लिंग
वैद्य हैं। सबके ज्ञाता तथा समस्त औषधोंके
औषध हैं। उन भगवानूने पहले अपने वारकी की
की, जो आरोग्य प्रदान करनेवाला है। तत्प
उन्होंने अपनी मायाशक्तिका वार बनाया, जो
प्रदान करनेवाला है। जन्मकालमें दुर्गतिग्रस्त
रक्षाके लिये उन्होंने कुमारके वारकी कल्पना व
तत्पश्चात् सर्वसमर्थ महादेवजीने आलस्य और पापी
2223 Shivmahapuranam_Part का वि
आ० ९४]
आलस्यदुरितक्रान्त्यै वारं
विद्येश्वरसंहिता
१०१
RRS We 0000,0.
कल्पितवान्प्रभुः निवृत्ति तथा समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे
रक्षकस्य तथा विष्णोर्लोकानां हितकाम्यया॥ १५
पुष्ट्यर्थ चैव रक्षार्थ वारं कल्पितवान्प्रभुः ।
आयुष्करं ततो वारमायुषां कर्तुरेव हि॥ १६
त्रैलोक्यसृष्टिकर्तुर्हि ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
जगदायुष्यसिद्भ्यर्थं वारं कल्पितवान्प्रभुः ॥ १७
आदौ त्रैलोक्यवृद्ध्यर्थं पुण्यपापे प्रकल्पिते।
तयोः कर्त्रोस्ततो वारमिन्द्रस्य च यमस्य च॥ १८
भोगप्रदं मृत्युहरं लोकानां च प्रकल्पितम्।
आदित्यादीन्स्वस्वरूपान्सुखदुःखस्य सूचकान्॥ १९
बारेशान्कल्पयित्वादौ ज्योतिश्चक्रे प्रतिष्ठितान्
स्वस्ववारे हि तेषां तु पूजा स्वस्वफलप्रदा ॥ २०
आरोग्यं सम्पदश्चैव व्याधीनां शान्तिरेव च।
पुष्टिरायुस्तथा भोगो मृतेर्हनिर्यथाक्रमम्॥ २१
वारक्रमफलं प्रहुर्देवप्रीतिपुरःसरम्।
अन्येषामपि देवानां पूजायाः फलदः शिवः॥ २२
देवानां प्रीतये पूजा पञ्चधैव प्रकल्पिता।
तत्तन्मन्त्रजपो होमो दानं चैव तपस्तथा॥ २३
स्थण्डिले प्रतिमायां च ह्यग्नौ ब्राह्मणविग्रहे।
समाराधनमित्येवं षोडशैरुपचारकैः ॥ २४
लोकरक्षक भगवान् विष्णुका वार बनाया। इसके बाद
स्वामी भगवान् शिवने पुष्टि और रक्षाके लिये
आयुःकर्ता तथा त्रिलोकस्रष्टा परमेष्ठी ब्रह्माका
आयुष्कारक वार बनाया, जिससे सम्पूर्ण जगतूके
आयुष्यकी सिद्धि हो सके। इसके बाद तीनों लोकोंकी
वृद्धिके लिये पहले पुण्य-पापकी रचना की; तत्पश्चात्
उनके करनेवाले लोगोंको शुभाशुभ फल देनेके लिये
भगवान् शिवने इन्द्र और यमके वारोंका निर्माण किया।
ये दोनों वार क्रमशः भोग देनेवाले तथा लोगोंके
मृत्युभयको दूर करनेवाले हैं ॥ ११९--१८१/२॥
इसके बाद सूर्य आदि सात ग्रहोंको, जो अपने ही
स्वरूपभूत तथा प्राणियोंके लिये सुख-दुःखके सूचक
हैं; भगवान् शिवने उपर्युक्त सात वारोंका स्वामी निश्चित
किया । वे सब-के-सब ग्रह नक्षत्रोंके ज्योतिर्मय मण्डलमें
प्रतिष्ठित हैं । [शिवके वार या दिनके स्वामी सूर्य हैं ।
शक्तिसम्बन्धी वारके स्वामी सोम हैं । कुमारसम्बन्धी
दिनके अधिपति मंगल हैं । विष्णुवारके स्वामी बुध हैं।
ब्रह्माजीके वारके अधिपति बृहस्पति हैं । इन्द्रवारके स्वामी
शुक्र और यमवारके स्वामी शनैश्चर हैं |] अपने-अपने
वारमें की हुई उन देवताओंकी पूजा उनके अपने-अपने
'फलको देनेवाली होती है॥ १९-२०॥
सूर्य आरोग्यके और चन्द्रमा सम्मत्तिके दाता हैं।
मंगल व्याधियोंका निवारण करते हैं, बुध पुष्टि देते हैं,
बृहस्पति आयुकी वृद्धि करते हैं, शुक्र भोग देते हैं और
शनैश्चर मृत्युका निवारण करते हैं। ये सात वारोंके
क्रमशः फल बताये गये हैं, जो उनःउन देवताओंकी
प्रीतिसे प्राप्त होते हैं। अन्य देवताओंकी भी पूजाका
फल देनेवाले भगवान् शिव ही हैं। देवताओंकी प्रसन्नताके
लिये पूजाकी पाँच प्रकारकी ही पद्धति बनायी गयी।
उन-उन देवताओंके मन्त्रोंका जप यह पहला प्रकार है ।
उनके लिये होम करना दूसरा, दान करना तीसरा तथा
तप करना चौथा प्रकार है। किसी वेदीपर, प्रतिमामें,
अग्निमें अथवा ब्राह्मणके शरीरमें आराध्य देवताकी
भावना करके सोलह उपचारोंसे उनकी पूजा या
आराधना करना पाँचवाँ प्रकार है॥ २१-२४॥
श्रीशिवमहापुराण
१०२
तथोत्तरम्।
नेत्रयोः शिरसो रोगे तथा कुष्ठस्य शान्तये ॥ २५
आदित्यं पूजयित्वा तु ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः।
दिनं मासं तथा वर्ष वर्षत्रयमथापि वा॥ २६
प्रारब्धं प्रबलं चेत्स्यान्नश्येद् रोगजरादिकम्।
जपाद्यमिष्टदेवस्य वारादीनां फलं विदुः॥ २७
पापशान्तिर्विशेषेण ह्यादिवारे निवेदयेत्।
आदित्यस्यैव देवानां ब्राह्मणानां विशिष्टदम्॥ २८
सोमवारे च लक्ष्मयादीन्सम्पदर्थ यजेद् बुधः।
आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपल्रीकांश्च भोजयेत्॥ २९
काल्यादीन्भौमवारे तु यजेद् रोगप्रशान्तये।
माषमुद्राढकान्नेन ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ ३०
सौम्यवारे तथा विष्णुं दध्यन्नेन यजेद् बुध:।
पुत्रमित्रकलत्रादिपुष्टिर्भवति सर्वदा॥ ३१
आयुष्कामो गुरोर्वारे देवानां पुष्टिसिद्धये।
उपवीतेन सस्त्रेण क्षीराज्येन यजेद् बुधः॥ ३२
भोगार्थ भृगुवारे तु यजेद् देवान्समाहितः।
षड्रसोपेतमन्नं च दद्याद् ब्राह्मणतृप्तये॥ ३३
स्त्रीणां च तृप्तये तद्वद् देयं वस्त्रादिकं शुभम्।
अपमृत्युहरे मन्दे रुद्रादींश्च यजेद् बुधः॥ ३४
तिलहोमेन दानेन तिलान्नेन च भोजयेत्।
इत्थं यजेच्च विबुधानारोग्यादिफलं लभेत्॥ ३५
[अ ५
इनमें पूजाके उत्तरोत्तर आधार श्रेष्ठ हैं। पू
पूर्वके अभावमें उत्तरोत्तर आधारका अवलम्बन को
चाहिये । दोनों नेत्रों तथा मस्तकके रोग और कुछ
रोगकी शान्तिके लिये भगवान् सूर्यकी पूजा के
ब्राह्मणोंको भोजन कराये। तदनन्तर एक दिन, ण
मास, एक वर्ष अथवा तीन वर्षतक लगातार ऐन
साधन करना चाहिये। इससे यदि प्रबल
निर्माण हो जाय तो रोग एवं जरा आदिका नाश हे
जाता है । इष्टदेवके नाममन्त्रोंका जप आदि साधा
वार आदिके अनुसार फल देते हैं ॥ २५--२७॥
रविवारको सूर्यदेवके लिये, अन्य देवताओंढ़े
लिये तथा ब्राह्मणोंके लिये विशिष्ट वस्तु अर्पित को
यह साधन विशिष्ट फल देनेवाला होता है तथा इसके
द्वारा विशेषरूपसे पापोंकी शान्ति होती है ॥ २८॥
विद्वान् पुरुष सोमवारको सम्पत्तिकी प्रापे
लिये लक्ष्मी आदिकी पूजा करे तथा सपलीक
ब्राह्मणोंको घृतपक्व अन्नका भोजन कराये। मंगलवारके
रोगोंकी शान्तिके लिये काली आदिकी पूजा करे त्ष
उड़द, मूँग एवं अरहरकी दाल आदिसे युक्त अन
ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ २९-३०॥
विद्वान् पुरुष बुधवारको दधियुक्त अन्नसे भगवा
विष्णुका पूजन करे-ऐसा करनेसे सदा पुत्र, मि
और स्त्री आदिकी पुष्टि होती है । जो दीर्घायु होनेकी
इच्छा रखता हो, वह गुरुवारको देवताओंकी
लिये वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा घृतमिश्रित खीरसे यर्णी
पूजन करे॥ ३१-३२॥
भोगोंकी प्राप्तिके लिये शुक्रवारको एकाग्र
होकर देवताओंका पूजन करे और ब्राह्मणोंकी
लिये षड्रसयुक्त अन्नका दान करे। इसी प्रक
स्त्रियोंकी प्रसन्नताके लिये सुन्दर वस्त्र आदिका द
करे। शनैश्चर अपमृत्युका निवारण करनेवाला &
दिन बुद्धिमान् पुरुष रुद्र आदिकी पूजा करे। आहार
होमसे, दानसे देवताओंको सन्तुष्ट करके त
तिलमिश्रित अन्न भोजन कराये। जो इस
देवताओंकी पूजा करेगा, वह आरोग्य आदिं फ
भागी होगा॥ ३३-३५॥
अ० १४]
देवानां नित्ययजने विशेषयजनेऽपि च।
स्नाने दाने जपे होमे ब्राह्मणानां च तर्पणे॥ ३६
तिथिनक्षत्रयोगे च तत्तददेवप्रपूजने।
आदिवारादिवारेषु सर्वज्ञो जगदीश्वर: ॥ ३७
तत्तद्रूपेण सर्वेषामारोग्यादिफलप्रदः।
देशकालानुसारेण तथा पात्रानुसारतः ॥ ३८
द्रव्यं श्रद्धानुसारेण तथा लोकानुसारतः।
तारतम्यक्रमाद् देवस्त्वारोग्यादीन्प्रयच्छति ॥ ३९
शुभादावशुभान्ते च जन्मक्षेषु गृहे गृही।
आरोग्यादिसमृद्भ्यर्थमादित्यादीन्ग्रहान्यजेत् ॥ ४०
तस्माद्वै देवयजनं सर्वाभीष्टफलप्रदम्।
समन्त्रकं ब्राह्मणानामन्येषां चैव तान्त्रिकम्॥ ४१
यथाशक्त्यनुरूपेण कर्तव्यं सर्वदा नरैः।
सप्तस्वपि च वारेषु नरैः शुभफलेप्सुभिः ॥ ४२
दरिद्रस्तपसा देवान्यजेदाढ्यो धनेन हि।
पुनश्लैवंविधं धर्म कुरुते श्रद्धया सह॥ ४३
पुनश्च भोगान्विविधान्धुक्त्वा भूमौ प्रजायते।
छायां जलाशयं ब्रह्मप्रतिष्ठां धर्मसञ्चयम्॥ ४४
सर्वं च वित्तवान्कुर्यात्सदा भोगप्रसिद्धये।
कालाच्च पुण्यपाकेन ज्ञानसिद्धिः प्रजायते॥ ४५
य इमं भृणुतेऽध्यायं पठते वा नरो द्विजाः।
श्रवणस्योपकर्ता च देवयज्ञफलं लभेत्॥ ४६
विद्येश्वरसंहिता
१०३
देवताओंके नित्य-पूजन, विशेष-पूजन, स्नान, दान,
जप, होम तथा ब्राह्मण-तर्पण आदिमें एवं रवि आदि
वारोंमें विशेष तिथि और नक्षत्रोंका योग प्राप्त होनेपर
विभिन्न देवताओंके पूजनमें सर्वज्ञ जगदीश्वर भगवान्
शिव ही उन-उन देवताओंके रूपमें पूजित होकर सब
लोगोंको आरोग्य आदि फल प्रदान करते हैं । देश, काल,
पात्र, द्रव्य, श्रद्धा एवं लोकके अनुसार उनके तारतम्य
क्रमका ध्यान रखते हुए महादेवजी आराधना करनेवाले
लोगोंको आरोग्य आदि फल देते हैं ॥ ३६-३९॥
शुभ (मांगलिक कर्म) -के आरम्भमें और अशुभ
(अन्त्येष्टि आदि कर्म)-के अन्तमें तथा जन्म-नक्षत्रोंके
आनेपर गृहस्थ पुरुष अपने घरमें आरोग्य आदिकी समृद्धिके
लिये सूर्य आदि ग्रहोंका पूजन करे | इससे सिद्ध है कि
देवताओंका यजन सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला
है ।ब्राह्मणोंका देवयजन कर्म वैदिक मन्त्रके साथ होना
चाहिये [यहाँ ब्राह्मण शब्द क्षत्रिय और वैश्यका भी
उपलक्षण है]। शूद्र आदि दूसरोंका देवयज्ञ तान्त्रिक
विधिसे होना चाहिये। शुभ फलकी इच्छा रखनेवाले
मनुष्योंको सातों ही दिन अपनी शक्तिके अनुसार सदा
देवपूजन करना चाहिये ॥ ४०--४२॥
निर्धन मनुष्य तपस्या (व्रत आदिके कष्ट-सहन)-
द्वारा और धनी धनके द्वारा देवताओंकी आराधना करे।
वह बार-बार श्रद्धापूर्वक इस तरहके धर्मका अनुष्ठान
करता है और बारम्बार पुण्यलोकोंमें नाना प्रकारके फल
भोगकर पुनः इस पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करता है । धनवान्
पुरुष सदा भोगसिद्धिके लिये मार्गमें वृक्ष आदि लगाकर
लोगोंके लिये छायाकी व्यवस्था करे, जलाशय (कुआँ,
बावली और पोखरे) बनवाये, वेद-शास्त्रोंकी प्रतिष्ठाके
लिये पाठशालाका निर्माण करे तथा अन्यान्य प्रकारसे
भी धर्मका संग्रह करता रहे । समयानुसार पुण्यकर्मोंके
परिपाकसे [ अन्तःकरण शुद्ध होनेपर] ज्ञानकी सिद्धि
हो जाती है । द्विजो! जो इस अध्यायको सुनता, पढ़ता,
अथवा दूसरोंको सुनाता है, उसे देवयज्ञका फल प्राप्त
होता है ॥ ४३--४६॥
इति श्रीशिवमहाएुराणे प्रथमायां विद्येशवरसंहितायां अग्नियज्चादिवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहितामें अग्नियज्ञ आदिका
वर्णन नामक चाँदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
——— ore
१०४
श्रीशिवमहापुराण
I
[ अ० १
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
देश, काल, पात्र और दान आदिका विचार
ऋषय ऊचुः
देशादीन्क्रमशो ब्रूहि सूत सर्वार्थवित्तम।
सूत उवाच
शुद्धं गृहं समफलं देवयज्ञादिकर्मसु॥
ततो दशगुणं गोष्ठं जलतीरं ततो दश।
ततो दशगुणं बिल्वतुलस्यश्वत्थमूलकम्॥
ततो देवालयं विद्यात्तीर्थतीरं ततो दश।
ततो दशगुणं नद्यास्तीर्थनद्यास्ततो दश॥
सप्तगङ्गानदीतीर्थं तस्या दशगुणं भवेत्।
गङ्गा गोदावरी चैव कावेरी ताम्रप्णिका॥
सिन्धुश्च सरयू रेवा सप्त गङ्गाः प्रकीर्तिताः।
ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश॥
सर्वस्मादधिकं ज्ञेयं यत्र वा रोचते मनः।
कृते पूर्णफलं ज्ञेयं यज्ञदानादिकं तथा॥
तरेतायुगे त्रिपादं च द्वापरेऽर्धं सदा स्मृतम्।
कलौ पादं तु विज्ञेयं तत्पादोनं ततोऽर्धके॥
kx
ऋषिगण बोले-समस्त पदार्थोके जाता
श्रेष्ठ हे सूतजी ! अब आप क्रमश: देश, काल आदिक
वर्णन करें॥ \१/२॥
सूतजी बोले--हे महर्षियो! देवयज्ञ आरि
कर्मोमें अपना शुद्ध गृह समान फल देनेवाला होत
है अर्थात् अपने घरमें किये हुए देवयज्ञ आहि
शास्त्रोक्त कर्म फलको सममात्रामें देनेवाले होते हैं
गोशालाका स्थान घरकी अपेक्षा दसगुना फल देत
है। जलाशयका तट उससे भी दसगुना महत्त्व रख
है तथा जहाँ बेल, तुलसी एवं पीपलवृक्षका मूत
निकट हो, वह स्थान जलाशयसे भी दस गुना अधिक
फल देनेवाला होता है॥ १-२॥
देवालयको उससे भी दस गुना महत्त्वका स्थान
जानना चाहिये। तीर्थभूमिका तट देवालयसे भी दप
गुना महत्त्व रखता है और उससे दसगुना श्रेष्ठ है
नदीका किनारा | उससे दस गुना उत्कृष्ट है तीर्थनदीका
तट और उससे भी दस गुना महत्त्व रखता है सप्तगंग
नामक नदियोंका तीर्थ । गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्ण,
सिन्धु, सरयू और नर्मदा-इन सात नदियोंको सप्तगंग
कहा गया है। समुद्रके तटका स्थान इनसे भी द
गुना अधिक पवित्र माना गया है और पर्वतके शिखरी
प्रदेश समुद्रतटसे भी दस गुना पावन है। सबसे अधि
महत्त्वका वह स्थान जानना चाहिये, जहाँ मन ली
जाय [यहाँतक देशका वर्णन हुआ, अब कार्ल
तारतम्य बताया जाता है-] ॥ ३-५*/२॥
सत्ययुगे यज्ञ, दान आदि कर्म पूर्ण फॅ
देनेवाले होते हैं--ऐसा जानना चाहिये। त्रेतायुग
उसका तीन चौथाई फल मिलता है । द्वापरे स्प
आधे ही फलको प्राप्ति कही गयी है। कलियुग
चौथाई ही फलकी प्राप्ति समझनी चाहिये और अ
कलियुग बीतनेपर उस फलमेंसे भी एक चतुर्थांश
हो जाता है॥ ६-७॥
अ० १५]
शुद्धात्मनः शुद्धदिने पुण्यं समफलं विदुः।
तस्माद् दशगुणं ज्ञेयं रविसङ्क्रमणे बुधाः॥ ८
विषुवे तद्दशगुणमयने तददश स्मृतम्।
तद्दश मृगसङ्क्रान्तौ तच्चन्द्रग्रहणे दश॥ ९
ततश्च सूर्यग्रहणे पूर्ण कालोत्तमे विदुः।
जगद्रूपस्य सूर्यस्य विषयोगाच्च रोगदम्॥ १०
अतस्तद्विषशान्त्यर्थं स्तानदानजपांश्चरेत्।
विषशान्त्यर्थकालत्वात्स कालः पुण्यदः स्मृतः॥ ११
जन्मर्क्षे च व्रतान्ते च सूर्यरागोपमं विदुः।
महतां सङ्गकालश्च कोट्यर्कग्रहणं विदुः १२
तपोनिष्ठा ज्ञाननिष्ठा योगिनो यतयस्तथा।
पूजायाः पात्रमेते हि पापसङ्क्षयकारणम्॥ १३
चतुर्विंशतिलक्षं वा गायत्र्या जपसंयुतः।
ब्राह्मणस्तु भवेत्पात्रं सम्पूर्णफलभोगदम्॥ १४
पतनात्त्रायत इति पात्रं शास्त्रे प्रयुज्यते।
दातुश्च पातकात्त्राणात्यात्रमित्यभिधीयते॥ १५
विद्येश्वरसंहिता
१०५
शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषको शुद्ध एवं पवित्र
दिन सम फल देनेवाला होता है। हे विद्वान् ब्राह्मणो !
सूर्य-संक्रान्तिके दिन किया हुआ सत्कर्म पूर्वोक्त शुद्ध
दिनकी अपेक्षा दस गुना फल देनेवाला होता है-यह
जानना चाहिये। उससे भी दस गुना अधिक महत्त्व
कर्मका है, जो विषुव* नामक योगमें किया जाता
है। दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन अर्थात् कर्ककी
संक्रान्तिमें किये हुए मुण्यकर्मका महत्त्व विषुवसे भी
दस गुना अधिक माना गया है। उससे भी दसगुना
अधिक मकर-संक्रान्तिमें और उससे भी दस गुना
अधिक चन्द्रग्रहणमें किये हुए पुण्यका महत्त्व है।
सूर्यग्रहणका समय सबसे उत्तम है। उसमें किये गये
पुण्यकर्मका फल चद््रप्रहणसे भी अधिक और पूर्णमात्रामें
होता है-इस बातको विज्ञ पुरुष जानते हैं । जगद्रूपी
सूर्यका राहुूपी विषसे संयोग होता है, इसलिये
सूर्यग्रहणका समय रोग प्रदान करनेवाला है। अतः
उस विषकी शान्तिके लिये उस समय स्नान, दान और
जप करना चाहिये। वह काल विषकी शान्तिके
लिये उपयोगी होनेके कारण पुण्यप्रद माना गया
है॥ ८-११॥
जन्म-नक्षत्रके दिन तथा ब्रतकी पूर्तिके दिनका
समय सूर्यग्रहणके समान ही समझा जाता है। परंतु
महापुरुषोंके संगका काल करोड़ों सूर्यग्रहणके समान
पावन है--ऐसा ज्ञानी पुरुष मानते हैं॥ १२॥
तपोनिष्ठ योगी और ज्ञाननिष्ठ यति-ये पूजाके
पात्र हैं; क्योंकि ये पापोंके नाशमें कारण होते हैं।
जिसने चौबीस लाख गायत्रीका जप कर लिया हो,
वह ब्राह्मण भी पूजाका पात्र है; उसका पूजन सम्पूर्ण
"फलों और भोगोंको देनेमें समर्थ है। जो पतनसे त्राण
करता अर्थात् नरकमें गिरनेसे बचाता है, उसके लिये
[इसी गुणके कारण शास्त्रमें] पात्र शब्दका प्रयोग
होता है। वह दाताको पापसे त्राण प्रदान करनेके
कारण पात्र कहलाता है॥ १३-१५॥
+ ज्योतिषके अनुसार वह समय जबकि सूर्य विषुव रेखापर पहुँचता है और दिन तथा रात दोनों बराबर होते हैं।
यह वर्षमे दो बार आता है--एक तो सौर चैत्रमासकी नवमी तिथि या अँगरेजी दिनांक २१ मार्चको और दूसरा आश्विनकी
नवमी तिथि या अँगरेजी दिनांक २२ सितम्बरको।
१०६
गायकं त्रायते पाताद्वायत्रीत्युच्यते हि सा।
यथार्थहीनो लोकेऽस्मिन्परस्यार्थं न यच्छति॥ १६
अर्थवानिह यो लोके परस्यार्थ प्रयच्छति।
स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरान्सन्त्रातुमर्हति॥ १७
गायत्रीजपशुद्धो हि शुद्धब्राह्मण उच्यते।
तस्माद् दाने जपे होमे पूजायां सर्वकर्मणि॥ १८
दानं कर्तु तथा त्रातुं पात्रत्वं ब्राह्मणोऽर्हति।
अन्नस्य क्षुधितं पात्रं नारीनरमयात्मकम्॥ १९
ब्राह्मणं श्रेष्ठमाहूय यत्काले सुसमाहितम्।
तदर्थं शब्दमर्थं वा सद्बोधकमभीष्टदम्॥ २०
इच्छावतः प्रदानं च सम्पूर्णफलदं विदुः।
यत्प्रशनानन्तरं दत्तं तदर्धफलदं विदुः॥ २१
यत्सेवकाय दत्तं स्यात्तत्पादफलदं विदुः।
जातिमात्रस्य विप्रस्य दीनवृत्तेद्विजर्षभा:॥ २२
दत्तमर्थं हि भोगाय भूर्लोके दशवार्षिकम्।
वेदयुक्तस्य विप्रस्य स्वर्ग हि दशवार्षिकम्॥ २३
गायत्रीजपयुक्तस्य सत्ये हि दशवार्षिकम्।
विष्णुभक्तस्य विप्रस्य दत्तं वैकुण्ठदं विदुः॥ २४
शिवभक्तस्य विप्रस्य दत्तं कैलासदं विदुः।
तत्तल्लोकोपभोगार्थं सर्वेषां दानमिष्यते॥ २५
श्रीशिवमहापुराण
[3s TN
गायत्री अपना गान करनेवालेका अधोगति
त्राण करती है, इसलिये वह गायत्री कहलाती है
जैसे इस लोकमें जो धनहीन है, वह दूसरेको धन र
दे सकता-जो यहाँ धनवान् है, वही दूसरेको घा
सकता है, उसी तरह जो स्वयं शुद्ध और
है, वही दूसरे मनुष्योंका त्राण या उद्धार कर सको
है। जो गायत्रीका जप करके शुद्ध हो गया है, कह
शुद्ध ब्राह्मण कहा जाता है। इसलिये दान, जप, होप
पूजा-इन सभी कर्माके लिये वही शुद्ध पात्र है । ऐप
ब्राह्मण ही दान लेने तथा रक्षा करनेकी पात्रता रख
है॥ १६-१८१/२॥
स्त्री हो या पुरुष-जो भी भूखा हो, वह
अन्नदानका पात्र है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको समय
बुलाकर उसे धन अथवा उत्तम वाणीसे सन्तुष्ट कल
चाहिये, इससे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है।
जिसको जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे वह वस्तु बिन
माँगे ही दे दी जाय, तो दाताको उस दानका पूए
पूरा फल प्राप्त होता है--ऐसी महर्षियोंकी मान्या
है। जो याचना करनेके बाद दिया गया हो, वह दाग
आधा ही फल देनेवाला बताया गया है। अपे
सेवकको दिया हुआ दान एक चौथाई फल देनेवाल
कहा गया है। हे विप्रवरो! जो जातिमात्रसे ब्राह्मण ह
और दीनतापूर्ण वृत्तिसे जीवन बिताता है, उसे दि
हुआ धनका दान दाताको इस भूतलपर दस वर्षोतर्क
भोग प्रदान करनेवाला होता है। वही दान यर
वेदवेत्ता ब्राह्मणको दिया जाय, तो वह
देवताओंके दस वर्षोतक दिव्य भोग देनेवाला है
है॥ १९-२३॥
गायत्री-जापक ब्राह्मणको दान देनेसे सत्यलोक
दस वर्षोतक पुण्यभोग प्राप्त होता है और विषु
ब्राह्मणको दिया गया दान वैकुण्ठकी प्राप्ति करावर
जाना जाता है। शिवभक्त विप्रको दिया हुआ
कैलासकी प्राप्ति कराने वाला कहा गया हैं। £
प्रकार सबको इन लोकोंमें भोगप्राप्तिके लिये दर्ग
चाहिये ॥ २४-२५ ॥
अ० १५]
दशाङ्गमन्तं विप्रस्य भानुवारे ददन्नरः।
परजन्मनि चारोग्यं दशवर्ष समश्नुते॥ २६
बरहुमानमथाह्वानमभ्यङ्गं पादसेवनम्
वासो गन्धाद्यर्चनं च घृतापूपरसोत्तरम्॥ २७
षडूसं व्यञ्जनं चैव ताम्बूलं दक्षिणोत्तरम्।
नमश्चानुगमश्चैव स्वन्नदानं दशाङ्गकम्॥ २८
दशाङ्गमन्तं विप्रेभ्यो दशभ्यो वै ददन्नरः।
अर्कवारे तथारोग्यं शतवर्षं समश्नुते॥ २९
सोमवारादिवारेषु तत्तद्वारगुणं फलम्।
अन्नदानस्य विज्ञेयं भूलोंके परजन्मनि॥ ३०
सप्तस्वपि च वारेषु दशभ्यश्च दशाङ्गकम्।
अन्नं दत्त्वा शतं वर्षमारोग्यादिकमश्नुते॥ ३१
एवं शतेभ्यो विप्रेभ्यो भानुवारे ददन्नरः।
सहस्त्रवर्षमारोग्यं शर्वलोके समश्नुते॥ ३२
सहस्रेभ्यस्तथा दत्त्वाऽयुतवर्षं समश्नुते
एवं सोमादिवारेषु विज्ञेयं हि विपश्चिता॥ ३३
भानुवारे सहस्त्राणां गायत्रीपूतचेतसाम्।
अन्नं दत्त्वा सत्यलोके ह्यारोग्यादि समश्नुते॥ ३४
अयुतानां तथा दत्त्वा विष्णुलोके समश्नुते।
अनं दत्त्वा तु लक्षाणां रुद्रलोके समश्नुते॥ ३५
बालानां ब्रह्मबुद्ध्या हि देयं विद्यार्थिभिनरैः।
यूनां च विष्णुबुद्ध्या हि पत्रकामार्थिभिर्नरैः॥ ३६
वृद्धानां रुद्रबुद्धया हि देयं ज्ञानार्थिभिरनरेः।
बालस्त्री भारतीबुद्धया बुद्धिकामेनरोत्तमैः ॥ ३७
लक्ष्मीबुद्धया युवस्त्रीषु भोगकामैर्नरोत्तमैः।
वृद्धासु पार्वतीबुद्धया देयमात्मार्थिभिर्जनैः॥ ३८
विद्येश्वरसंहिता
१०७
रविवारके दिन ब्राह्मणको दशांग अन्न देनेवाला
दूसरे जन्ममें दस वर्षांतक निरोग रहता है ।
बहुत सम्मानपूर्वक बुलाना, अभ्यंग (चन्दन आदि),
'पादसेवन, वस्त्र, गन्ध आदिसे पूजन, घीके मालपुए
आदि सुन्दर भोजन, छहों रस, व्यंजन, दक्षिणासहित
ताम्बूल, नमस्कार और (जाते समय) अनुगमन--ये
अन्नदानके दस अंग कहे गये हैं॥ २६-२८॥
दस ब्राह्मणोंको रविवारके दिन दशांग अन्नका
दान करनेवाला सौ वर्षतक निरोग रहता है। सोमवार
आदि विभिन्न वारोंमें अन्नदानका फल उन-उन वारोंके
अनुसार दूसरे जन्ममें इस पृथ्वीलोकमे प्राप्त होता है--
ऐसा जानना चाहिये । सातों वारोंमें दस-दस ब्राह्मणोंको
दशांग अन्नदान करनेसे सौ वर्षतक आरोग्यादि फल
प्राप्त होते हैं। इस प्रकार रविवारके दिन ब्राह्मणोंको
अन्नदान करने वाला मनुष्य हजार वर्षोतक शिवलोकमें
आरोग्यलाभ करता है। इसी प्रकार हजार ब्राह्मणोंको
अन्नदान करके मनुष्य दस हजार वर्षोतक आरोग्यभोग
करता है। विद्वान्को सोमवार आदि दिनोंके विषयमें भी
ऐसा ही जानना चाहिये॥ २९-३३॥
रविवारको गायत्रीजपसे पवित्र अन्तःकरणवाले
एक हजार ब्राह्मणोंको अन्नदान करके मनुष्य सत्यलोकमें
आरोग्यादि भोगोंको प्राप्त करता है। इसी प्रकार दस
हजार ब्राह्मणोंको दान देनेसे विष्णुलोकमें ऐसी प्राप्ति
होती है और एक लाख ब्राह्मणोंको अन्नदान करनेसे
रुद्रलोकमें भोगादिकी प्राप्ति होती है॥ ३४-३५॥
विद्याकी कामनावाले मनुष्योंको ब्रह्मबुद्धिसे
बालकोंको दशांग अन्नका दान करना चाहिये, पुत्रकी
कामनावाले लोगोंको विष्णुबुद्धिसे युवकोंको दान
करना चाहिये और ज्ञानप्राप्तिकी इच्छावालोंको रुद्रबुद्धिसे
वृद्धजनोंको दान देना चाहिये। इसी प्रकार बुद्धिको
कामना करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्योंको सरस्वतीबुद्भिसे
बालिकाओंको दशांग अन्नका दान करना चाहिये।
सुखभोगकी कामनावाले श्रेष्ठजनोंको लक्ष्मीबुद्धिसे
युबतियोंको दान देना चाहिये। आत्मज्ञानको इच्छावाले
लोगोंको पार्वतीबुद्धिसे वृद्धा स्त्रियोंको अन्नदान
करना चाहिये॥ ३६-३८॥
१०८
शिलवृत्त्योञ्छवृत्त्या च गुरुदक्षिणयार्जितम्।
शुद्धद्रव्यमिति प्ररहुस्तत्पूर्णफलदं विदुः॥ ३९
शुक्लप्रतिग्रहाहत्तं मध्यमं द्रव्यमुच्यते।
कृषिवाणिज्यकोपेतमधमं द्रव्यमुच्यते॥ ४०
क्षत्रियाणां विशां चैव शौर्यवाणिज्यकार्जितम्।
उत्तमं द्रव्यमित्याहुः शूद्राणां भृतकार्जितम्॥ ४१
स्त्रीणां धर्मार्थिनां द्रव्यं पैतृकं भर्तृकं तथा।
गवादीनां द्वादशानां चैत्रादिषु यथाक्रमम्॥ ४२
सम्भूय वा पुण्यकाले दद्यादिष्टसमृद्धये।
गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च॥ ४३
रप्यं लवणकूष्माण्डं कन्या द्वादशकं तथा।
गोदानाहत्तगव्येन गोमयेनोपकारिणा ॥ ४४
धनधान्याद्याश्रितानां दुरितानां निवारणम्।
जलस्नेहाद्याश्रितानां दुरितानां तु गोजलैः॥ ४५
कायिकादित्रयाणां तु क्षीरदध्याज्यकैस्तथा।
तथा तेषां च पुष्टिश्च विज्ञेया हि विपश्चिता॥ ४६
भूदानं तु प्रतिष्ठार्थमिह चामुत्र च द्विजाः।
तिलदानं बलार्थं हि सदा मृत्युजयं विदुः ॥ ४७
श्रीशिवमहापुराण
PR स्स न न्न पाय >+औऔ
* किसानके द्वारा खेतमें बोये हुए अन्नको काटकर ले जानेके बाद उनसे गिरे हुए एक-एक दानेको दोनों
तथा उक्त खेतमें एक-एक बाल (धान्यके गुच्छों)-को चुननेको 'शिल' कहते हउ
चुनने (उठाने)-को "उञ्छ'
[ अ० १५
व आ
ब्राह्मणके लिये शिल तथा उञ्छ* वृत्तिसे लाग
हुआ और गुरुदक्षिणामें प्राप्त हुआ अन्न-धन
द्रव्य कहलाता है; उसका दान दाताको पूर्ण फत
देनेवाला बताया गया है॥ ३९॥
शुद्ध (शुक्ल) प्रतिग्रह (दान)-में मिला हुआ
द्रव्य मध्यम द्रव्य कहा जाता है और खेती, व्याप
आदिसे प्राप्त धन अधम द्रव्य कहा जाता है॥ ४०।
क्षत्रियोंका शौर्यसे कमाया हुआ, वैश्योंका व्यापार
कमाया हुआ और शूद्रोंका सेवावृत्तिसे प्राप्त किव
हुआ धन भी उत्तम द्रव्य कहलाता है। धर्मकी इच्छ
रखनेवाली स्त्रियोंको जो धन पिता एवं पतिसे मिल
हुआ हो, उनके लिये वह उत्तम द्रव्य है॥ ४११/॥
गौ आदि बारह वस्तुओंका चैत्र आदि बाहू
महीनोंमें क्रमशः दान करना चाहिये अथवा किसी
पुण्यकालमें एकत्रित करके अपनी अभीष्ट प्राप्तिके
लिये इनका दान करना चाहिये | गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण,
घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चाँदी, नमक, कोंहड़ा और
कन्या-ये ही वे बारह वस्तुएँ हैं ॥ ४२-४३९/२॥
गोदानमें दी हुई गायके उपकारी गोबरसे धन
धान्यादि ठोस पदार्थाके आश्रयसे टिके पापोंका नाश
होता है और उसके गोमूत्रसे जल-तेल आदि तरल
पदार्थोमें रहनेवाले पापोंका नाश होता है। उसके दूध
दही और घीसे कायिक, वाचिक तथा मानसिक तीन
प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। उनसे कायिक आदि
पुण्यकर्मोंकी पुष्टि भी होती है-ऐसा बुद्धिम
मनुष्यको जानना चाहिये ॥ ४४--४६॥
हे ब्राह्मणो! भूमिका दान इहलोक और परलोकम
प्रतिष्ठा (आश्रय)-की प्राप्ति करानेवाला है । तिलकी
दान बलवर्धक एवं मृत्युका निवारक कहा गया ह|
अंगुलि
धात्यकणादानं कणिशाद्यर्जनं शिलम् ।' मनुस्मृतिके टीकाकार आचार्य शरीराघवानन्दजीने बाजार आदिमे क्रय-विक्रयके अ",
गिरे हुए अनके दानोंके चुननेको 'उज्छ” और खेत कट जानेके बाद खेतमें पड़े हुए धान्यादिकी बालोंको बीनता ki
कहा है। (मनु० ४।५ की व्याख्या)
अ० १५]
हिरण्यं जाठराग्नेस्तु वृद्धिदं वीर्यद॑ तथा ।
आज्यं पुष्टिकरं विद्याहठसत्रमायुष्करं विदुः॥ ४८
धान्यमन्नसमृद्भ्यर्थं मधुराहारदं गुङम्।
रौप्यं रेतोऽभिवृद्धयर्थं षड़सार्थ तु लावणम्॥ ४९
सर्व सर्वसमृद्धयर्थं कूष्माण्डं पुष्टिदं विदुः।
प्राप्तिदं सर्वभोगानामिह चामुत्र च द्विजाः ॥ ५०
यावज्जीवनमुक्तं हि कन्यादानं तु भोगदम्।
पनसाम्रकपित्थानां वृक्षाणां फलमेव च॥ ५१
कदल्याद्यौषधीनां च फलं गुल्मोद्भवं तथा।
माषादीनां च मुद्रानां फलं शाकादिकं तथा॥ ५२
मरीचिसर्षपाद्यानां शाकोपकरणं तथा।
यदूतौ यत्फलं सिद्धं तद्देयं हि विपश्चिता॥ ५३
शरोत्रादीन्द्रियतृप्तिश्च सदा देया विपश्चिता।
शब्दादिदशभोगार्थं दिगादीनां च तुष्टिदा॥ ५४
वेदशास्त्रं समादाय बुद्ध्वा गुरुमुखात्स्वयम्
कर्मणां फलमस्तीति बुद्धिरास्तिक्यमुच्यते॥ ५५
बन्धुराजभयाद् बुद्धिः श्रद्धा सा च कनीयसी
विद्येश्वरसंहिता
१०९
सुवर्णका दान जठराग्निको बढ़ानेवाला तथा वीर्यदायक
है। घीके दानको पुष्टिकारक जानना चाहिये वस्त्रका
दान आयुकी वृद्धि करानेवाला है--ऐसा जानना चाहिये।
धान्यका दान अन्नकी समृद्धिमें कारण होता है।
गुड़का दान मधुर भोजनकी प्राप्ति करानेवाला होता
है। चाँदीके दानसे वीर्यकी वृद्धि होती है। लवणका
दान षड्रस भोजनकी प्राप्ति कराता है । सब प्रकारका
दान सम्पूर्ण समृद्धिकी सिद्धिके लिये होता है। विज्ञ
पुरुष कूष्माण्डके दानको मुष्टिदायक मानते हैं।
कन्याका दान आजीवन भोग देनेवाला कहा गया है।
हे ब्राह्मणो! वह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण
भोगोंकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ४७--५०१/२॥
कटहल-आम, कैथ आदि वृक्षोंके फल, केला
आदि ओषधियोंके फल तथा जो फल लता एवं
गुल्मोंसे उत्पन्न हुए हों, मुष्ट (आवरणयुक्त) फल
जैसे-नारियल, बादाम आदि, उड़द, मूँग आदि दालें,
शाक, मिर्च, सरसों आदि, तेल-मसाले और ऋतुओंमें
तैयार होनेवाले फल समय-समयपर बुद्धिमान् व्यक्तिद्वारा
दान किये जाने चाहिये॥ ५१-५३॥
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिन वस्तुओंसे
श्रवण आदि इस्द्रियोंकी तृप्ति होती है, उनका
सदा दान करे। श्रोत्र आदि दस इन्द्रियोंके जो शब्द
आदि दस विषय हैं, उनका दान किया जाय, तो वे
भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं तथा दिशा आदि इन्द्रिय
देवताओंको* सन्तुष्ट करते हैं। वेद और शास्त्रको
गुरुमुखसे ग्रहण करके गुरुके उपदेशसे अथवा स्वयं
ही बोध प्राप्त करनेके पश्चात् जो बुद्धिका यह
निश्चय होता है कि “काका फल अवश्य मिलता
है', इसीको उच्चकोटिकी “आस्तिकता! कहते हैं।
भाई-बन्धु अथवा राजाके भयसे जो आस्तिकता-बुद्धि
या श्रद्धा होती है, वह कनिष्ठ श्रेणीको आस्तिकता
है॥ ५४-५५१/३॥
+ श्रवणेन्द्रियके देवता दिशा, नेत्रके सूर्य, नासिकाके अश्विनीकुमार, रसनेन्द्रियके वरुण, त्वगिन्द्रियके वायु,
वागिन्द्रियके अग्नि, लिंगके प्रजापति, गुदाके मित्र, हाथोंके इन्द्र और पैरोंके देवता विष्णु हैं।
११०
सर्वाभावे दरिद्रस्तु वाचा वा कर्मणा यजेत्॥ ५६
वाचिकं यजनं विद्यान्मनत्रस्तोत्रजपादिकम्।
तीर्थयात्रा व्रताद्यं हि कायिकं यजनं विदुः॥ ५७
येन केनाप्युपायेन ह्यल्पं वा यदि वा बहु।
देवतार्पणबुद्धया च कृतं भोगाय कल्पते॥ ५८
तपश्चर्या च दानं च कर्तव्यमुभयं सदा।
प्रतिश्रयं प्रदातव्यं स्ववर्ण गुणशोभितम्॥ ५९
देवानां तृप्तयेऽत्यर्थं सर्वभोगप्रदं बुधैः।
इहामुत्रोत्तमं जन्म सदा भोगं लभेद् बुधः।
ईश्वरार्पणबुद्धया हि कृत्वा मोक्षफलं लभेत्॥ ६०
य इमं पठतेऽध्यायं यः शृणोति सदा नरः।
तस्य वैधर्मबुद्धिश्च ज्ञानसिद्द्रिः प्रजायते॥ ६१
श्रीशिवमहापुराण
खडक स्स्स
[ 30 ५
जो सर्वथा दरिद्र है, जिसके पास सभी
अभाव है, वह वाणी अथवा कर्म (शरीर
यजन करे। मन्त्र, स्तोत्र और जप आदिको
किया गया यजन समझना चाहिये तथा तीर्थयात्रा
ब्रत आदिको विद्वान् पुरुष शारीरिक यजन मानने है,
जिस किसी भी उपायसे थोड़ा हो या बहुत, देवता
बुद्धिसे जो कुछ भी दिया अथवा किया जाय, कह
दान या सत्कर्म भोगोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ होत
है॥ ५६-५८॥
तपस्या और दान-ये दो कर्म मनुष्यको सदा
करने चाहिये तथा ऐसे गृहका दान करना चाहिये,
जो अपने वर्ण (चमक-दमक या सफाई) और
गुण (सुख-सुविधा)-से सुशोभित हो। बुद्धिमा
पुरुष देवताओंकी तृप्तिके लिये जो कुछ देते हैं,
वह अतिशय मात्रामें और सब प्रकारके भोग प्रदाः
करनेवाला होता है। उस दानसे विद्वान् पुरा
इहलोक और परलोकमें उत्तम जन्म और सदा सुलभ
होनेवाला भोग पाता है । ईश्वरार्पण-बुद्धिसे यज्ञ, दा
आदि कर्म करके मनुष्य मोक्ष-फलका भागी होता
है॥ ५९-६० ॥
जो मनुष्य इस अध्यायका सदा पाठ अथवा
श्रवण करता है, उसे धार्मिक बुद्धि प्राप्त होती है तथा
उसमें ज्ञानका उदय होता है॥६१॥
) डर
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येशवरसंहितायां देशकालपात्रादिवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहाषुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें देश: काल-पात्र आदिका
वर्णन नामक पन्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
मृत्तिका आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंके पूजनकी विधि, उनके लिये नैवेद्यका विचार,
पूजनके विभिन्न उपचारोंका फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रोंके योगमें
पूजनका विशेष फल तथा लिंगके वैज्ञानिक स्वरूपका विवेचन
ऋषय ऊचुः
पार्थिवप्रतिमापूजाविधानं ब्रूहि सत्तम।
ऋषिगण बोले-हे साधुशिरोमणे! अब अ
पार्थिव प्रतिमाकी पूजाका वह विधान ओर
जिस पूजा-विधानसे समस्त अभीष्ट वस्तु
येन पूजाविधानेन सर्वाभीष्टमवाप्यते॥ १ | प्राप्ति होती है॥ १॥
अ० १६]
सूत उवाच
सुसाधु पृष्टं युष्माभिः सदा सर्वार्थदायकम्।
सद्यो दुःखस्य शमनं शृणुत प्रब्रवीमि व:॥ २
अपपृत्युहरं कालमृत्योश्चापि विनाशनम्।
सद्यः कलत्रपुत्रादिधनधान्यप्रदं द्विजाः॥ ३
अन्नादिभोज्यं वस्त्रादि सर्वमुत्पद्यते यतः।
ततो मृदादिप्रतिमापूजाभीष्टप्रदा भुवि॥ ४
पुरुषाणां च नारीणामधिकारोऽत्र निश्चितम्।
नद्यां तडागे कूपे वा जलान्तर्मृदमाहरेत्॥ ५
संशोध्य गन्धचूर्णेन पेषयित्वा सुमण्डपे।
हस्तेन प्रतिमां कुर्यात्क्षीरेण च सुसंस्कृताम्॥ ६
अङ्कप्रत्यङ्गकोपेतामायुधैश्च समन्विताम्।
पद्मासनस्थितां कृत्वा पूजयेदादरेण हि॥ ७
विघ्नेशादित्यविष्णूनामम्बायाश्च शिवस्य च।
शिवस्य शिवलिङ्गं च सर्वदा पूजयेद् द्विजः॥ ८
षोडशैरुपचारैश्च कुयांत्तत्फलसिद्धये।
पुष्पेण प्रोक्षणं कुर्यादभिषेकं समन्त्रकम्॥ ९
शाल्यन्नेनैव नैवेद्यं सर्वं कुडवमानतः।
गृहे तु कुडवं ज्ञेयं मानुषे प्रस्थमिष्यते॥ १०
दैवे प्रस्थत्रयं योग्यं स्वयम्भोः प्रस्थपञ्चकम्।
एवं पूर्णफलं विद्यादधिकं वै द्वयं त्रयम्॥ ११
सहस्रपूजया सत्यं सत्यलोकं लभेद् द्विजः।
विद्येश्वरसंहिता
११९
सूतजी बोले--हे महर्षियो! तुमलोगोंने बहुत
बात पूछी है। पार्थिव प्रतिमाका पूजन सदा
सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है तथा दुःखका तत्काल
निवारण करनेवाला है। मैं उसका वर्णन करता हूँ,
[ध्यान देकर] सुनिये॥२॥
हे द्विजो! यह पूजा अकाल मृत्युको हरनेवाली तथा
काल और मृत्युका भी नाश करनेवाली है। यह
शीघ्र ही स्त्री, पुत्र और धन-धान्यको प्रदान करनेवाली
है। इसलिये पृथ्वी आदिकी बनी हुई देवप्रतिमाओंकी
पूजा इस भूतलपर अभीष्टदायक मानी गयी है;
निश्चय ही इसमें पुरुषोंका और स््त्रियोंका भी
अधिकार है॥ ३-४१/२॥
नदी, पोखरे अथवा कुएँमें प्रवेश करके पानीके
भीतरसे मिट्टी ले आये। तत्पश्चात् गन्ध-चूर्णके द्वारा
उसका संशोधन करके शुद्ध मण्डपमें रखकर उसे महीन
बनाये तथा हाथसे प्रतिमा बनाये और दूधसे उसका
सम्यक् संस्कार करे। उस प्रतिमामें अंग-प्रत्यंग अच्छी
तरह प्रकट हुए हों तथा वह सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रासे
सम्पन्न बनायी गयी हो। तदनन्तर उसे पद्मासनपर
स्थापित करके आदरपूर्वक उसका पूजन करे।
गणेश, सूर्य, विष्णु, दुर्गा और शिवजीको प्रतिमाका एवं
शिवजीके शिवलिंगका द्विजको सदा पूजन करना
चाहिये। पूजनजनित फलकी सिद्धिके लिये सोलह
उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये ॥ ५--८१/२॥
पुष्पसे प्रोक्षण और मन्त्रपाठपूर्वक अभिषेक करे।
अगहनीके चावलसे नैवेद्य तैयार करे। सारा नैवेद्य एक
कुडव (लगभग पावभर) होना चाहिये । घरमें पार्थिव-
पूजनके लिये एक कुडव और बाहर किसी मनुष्यद्वारा
स्थापित शिवलिंगके पूजनके लिये एक प्रस्थ (सेरभर)
नैवेद्य तैयार करना आवश्यक है--ऐसा जानना चाहिये ।
देवताओंद्वारा स्थापित शिवलिंगके लिये तीन सेर नैवेद्य
अर्पित करना उचित है और स्वयं प्रकट हुए लिंगके
लिये पाँच सेर। ऐसा करनेसे पूर्ण फलकी प्राप्ति समझनी
चाहिये। इससे दुगुना या तिगुना करनेपर और अधिक
फल प्राप्त होता है । इस प्रकार सहस्र बार पूजन करनेसे
द्विज सत्यलोकको प्राप्त कर लेता है॥ ९-१११/२॥
११२
द्वादशाङ्कलमायामं द्विगुणं च ततोऽधिकम्॥ १२
प्रमाणमङ्कुलस्यैकं तदूर्ध्वं पञ्चकत्रयम्।
अयोदारुकृतं पात्रं शिवमित्युच्यते बुधैः ॥ १३
तदष्टभागः प्रस्थः स्यात्तच्चतुष्कुडवं मतम्।
दशप्रस्थं शतप्रस्थं सहस्त्रप्रस्थमेव च॥ १४
जलतैलादिगन्धानां यथायोग्यं च मानतः।
मानुषार्षस्वयम्भूनां महापूजेति कथ्यते॥ १५
अभिषेकादात्मशुद्दिर्गन्धात्पुण्यमवाप्यते ।
आयुस्तृप्तिश्च नैवेद्याद् धूपादर्थमवाप्यते॥ १६
दीपाज्ज्ञानमवाप्नोति ताम्बूलाद्भोगमाप्नुयात्।
तस्मात्स्नानादिकं षट्कं प्रयलेन प्रसाधयेत्॥ १७
जमस्कारो जपश्चैव सर्वाभीष्टप्रदावुभौ।
पूजान्ते च सदा कार्यों भोगमोक्षार्थिभिर्नरे: ॥ १८
सम्पूज्य मनसा पूर्व कुयत्तत्तत्सदा नरः।
देवानां पूजया चैव तत्तल्लोकमवाप्नुयात्॥ १९
तदवान्तरलोके च यथेष्टं भोग्यमाप्यते।
तद्विशेषाऱ्य्रवक्ष्यामि श्रृणुत श्रद्धया द्विजा:॥ २०
विघ्नेशपूजया सम्यगभूर्लोकेऽभीष्टमाप्नुयात्।
शुक्रवारे चतुर्थ्याञ्च सिते श्रावणभाद्रके॥ २१
भिषगृक्षे धनुर्मासे विघ्नेशं विधिवद्यजेत्।
शतं पूजा सहस्रं वा तत्सङ्रख्याकदिनैर्रजेत्॥ २२
श्रीशिवमहापुराण
[अ ५३
न्ल््त्ल्त्त्त्त्त्त्त्त््क्ततत TCO TRE NN
बारह अँगुल चौड़ा, इससे दूना और एक ऊँ;
अधिक अर्थात् पचीस अँगुल लम्बा तथा पन्द्रह अँ.
ऊँचा जो लोहे या लकड़ीका बना हुआ पात्र होता है
उसे विद्वान् पुरुष शिव कहते हैं। उसका आठवां भा
प्रस्थ कहलाता है, जो चार कुडवके बराबर माना गवे
है। मनुष्यद्वारा स्थापित शिवलिंगके लिये दस
ऋषियोंद्वारा स्थापित शिवलिंगके लिये सौ प्रस्थ औ
स्वयम्भू शिवलिंगके लिये एक सहस्र प्रस्थ नैवेद्य निवेद]
किया जाय तथा जल, तैल आदि एवं गन्ध द्रव्योंकी भ
यथायोग्य मात्रा रखी जाय तो यह उन शिवलिंगों्
महापूजा बतायी जाती है॥ १२-१५॥
देवताका अभिषेक करनेसे आत्मशुद्धि होती है,
गन्धसे पुण्यकी प्राप्ति होती है, नैवेद्य अर्पण करने
आयु बढ़ती है और तृप्ति होती है, धूप निवेदन केम
धनको प्राप्ति होती है, दीप दिखानेसे ज्ञानका उदय
होता है और ताम्बूल समर्पण करनेसे भोगकी उपलब्धि
होती है। इसलिये स्नान आदि छः उपचारोंको
यत्लपूर्वक अर्पित करे॥ १६-१७॥
नमस्कार और जप--ये दोनों सम्पूर्ण अभीष्ट फलके
देनेवाले हैं । इसलिये भोग और मोक्षकी इच्छा रखगेवाले
लोगोंको पूजाके अन्तमें सदा ही जप और नमस्का!
करना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि वह सदा पहले
मनसे पूजा करके फिर उन-उन उपचारोंसे पूजा कर!
देवताओंकी पूजासे उन-उन देवताओंके लोकोंकी प्रात
होती है तथा उनके अवान्तर लोकमें भी यथेष्ट भोगकी
वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ॥ १८-१९१/२॥
हे द्विजो ! अब मैं देवपूजासे ग्राप्त होनेवाले
फलोंका वर्णन करता हुँ। आपलोग श्रद्धापूर्वक स
विघ्नराज गणेशकी पूजासे भूलोकमें उत्तम अभी
वस्तुको प्राप्ति होती है शुक्रवारको, श्रावण और
मासोंकी शुक्लपक्षकी चतुर्थीको और पौषमासमें शतम
नक्षत्रके आनेपर विधिपूर्वक गणेशजीकी पूजा
चाहिये। सौ या सहस्र दिनोंमें सौ या सहस्त्र बार
करे । देवता और अमिनिमें श्रद्धा रखते हुए किया
उनका नित्य पूजन मनुष्योंको पुत्र एबं अभीष्ट
प्रदान करता है । वह समस्त पापोंका शमन तरथा भि
अ० १६]
विद्येश्वरसंहिता
देवाग्निश्रद्धया नित्यं पुत्रदं चेष्टदं नृणाम्।
सर्वपापप्रशमनं तत्तददुरितनाशनम्॥ २३
वारपूजां शिवादीनामात्मशुद्धिप्रदां विदुः।
तिथिनक्षत्रयोगानामाधारं सार्वकामिकम्॥ २४
तथा वृद्द्रक्षयाभावात्पूर्णब्रह्मात्मकं विदुः।
उदयादुदयं वारो ज्रह्यप्रभृतिकर्मणाम्॥ २५
तिथ्यादौ देवपूजा हि पूर्णभोगप्रदा नृणाम्।
पूर्वभागः पितृणां तु निशियुक्तः प्रशस्यते॥ २६
परभागस्तु देवानां दिवायुक्तः प्रशस्यते।
उदयव्यापिनी ग्राह्या मध्याह्वे यदि सा तिथि: ॥ २७
देवकार्ये तथा ग्राह्मास्तिथिऋक्षादिकाः शुभाः ।
सम्यग्विचार्य वारादीन्कुर्यात्पूजाजपादिकम्॥ २८
पूर्जायते ह्यनेनेति वेदेष्वर्थस्य योजना।
पूर्भोगफलसिब्द्श्च जायते तेन कर्मणा॥
मनोभावांस्तथा ज्ञानम्रिष्टभोगार्थयोजनात्।
पूजाशब्दार्थ एवं हि विश्रुतो लोकवेदयोः ३०
नित्यं नैमित्तिकं कालात्सद्यः काम्ये स्वनुष्ठिते।
नित्यं मासं च पक्षं च वर्ष चैव यथाक्रमम्॥ ३९
ततत्तत्कर्मफलतप्राप्तिस्तादूक्यापक्षयः क्रमात्।
११३
भिन्न दुष्कर्मोका विनाश करनेवाला है । विभिन्न वारोंमें
की हुई शिव आदिकी पूजाको आत्मशुद्धि प्रदान
करनेवाली समझना चाहिये | वार या दिन तिथि, नक्षत्र
और योगोंका आधार है। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला
है। उसमें वृद्धि और क्षय नहीं होता है, इसलिये उसे
पूर्ण ब्रह्मस्वरूप मानना चाहिये । सूर्योदयकालसे लेकर
दूसरे सूर्योदयकाल आनेतक एक वारकी स्थिति मानी
गयी है, जो ब्राह्मण आदि सभी वर्णोके कर्मोंका आधार
है । विहित तिथिके पूर्वभागमें की हुई देवपूजा मनुष्योंको
पूर्ण भोग प्रदान करनेवाली होती है ॥ २०--२५*/२॥
यदि मध्याह्के बाद तिथिका आरम्भ होता है, तो
रात्रियुक्त तिथिका पूर्वभाग पितरोंके श्राद्ध आदि कर्मके
लिये उत्तम बताया जाता है । ऐसी तिथिका परभाग ही
दिनसे युक्त होता है, अतः वही देवकर्मके लिये प्रशस्त
माना गया है। यदि मध्याहकालतक तिथि रहे तो
उदयव्यापिनी तिथिको ही देवकार्यमें ग्रहण करना चाहिये।
इसी तरह शुभ तिथि एवं नक्षत्र आदि देवकार्यमें ग्राह्य
होते हैं। वार आदिका भलीभाँति विचार करके पूजा
और जप आदि करने चाहिये॥ २६--२८॥
वेदोंमें पूजा-शब्दके अर्थकी इस प्रकार योजना
कही गयी है- पूर्जायते अनेन इति पूजा।' यह
पूजाशब्दकी व्युत्पत्ति है। पू: का अर्थ है भोग और
फलकी सिद्धि-वह जिस कर्मसे सम्पन्न होती है,
उसका नाम पूजा है। मनोवांछित वस्तु तथा ज्ञान--
ये ही अभीष्ट वस्तुएँ हैं; सकाम भाववालेको अभीष्ट
भोग अपेक्षित होता है और निष्काम भाववालेको
अर्थ-पारमार्थिक ज्ञान । ये दोनों ही पूजाशब्दके अर्थ
हैं; इनकी योजना करनेसे ही पूजा-शब्दकी सार्थकता
है। इस प्रकार लोक और वेदमें पूजा-शब्दका अर्थ
विख्यात है। नित्य और नैमित्तिक कर्म कालान्तरमें
फल देते हैं, किंतु काम्य कर्मका यदि भलीभाँति
अनुष्ठान हुआ हो तो वह तत्काल फलदायक होता
है। प्रतिदिन एक पक्ष, एक मास और एक वर्षतक
लगातार पूजन करनेसे उन-उन कर्माके फलकी प्राप्ति
होती है और उनसे वैसे ही पापोंका क्रमशः क्षय होता
है॥ २९-३११/२॥
१९४
महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके॥ ३२
पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा।
चैत्रे चतुर्थ्यां पूजा च कृता मासफलप्रदा॥ ३३
वर्षभोगप्रदा ज्ञेया कृता वै सिंहभाद्रके।
श्रावणादित्यवारे च सप्तम्यां हस्तभे दिने॥ ३४
माघशुक्ले च सप्तम्यामादित्ययजनं चरेत्।
ज्येष्ठभाद्रकसौम्ये च द्वादश्यां श्रवणर्क्षके ॥ ३५
कृतं श्रीविष्णुयजनमिष्टसम्पत्करं विदुः।
श्रावणे विष्णुयजनम्िष्टारोग्यप्रदं भवेत्॥ ३६
गवादीऱ्द्वादशानर्थान्साङ्कान्दत्त्वा तु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति द्वादश्यां विष्णुतर्पणात्॥ ३७
द्वादश्यां द्वादशान्विप्रान् विष्णो द्वादशनामतः।
षोडशैरुपचारैश्च यजेत्तत्प्रीतिमाप्नुयात्॥ ३८
एवं च सर्वदेवानां तत्तदद्वादशनामकैः।
द्वादशब्रह्मयजनं तत्तत्प्रीतिकरं भवेत्॥ ३९
कर्कटे सोमवारे च नवम्यां मृगशीर्षके।
अम्बां यजेद् भूतिकामः सर्वभोगफलप्रदाम्॥ ४०
आश्वयुक्छुक्लनवमी सर्वाभीष्टफलप्रदा।
आदिवारे चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे विशेषतः॥ ४१
आर्द्रायां च महार्द्रायां शिवपूजा विशिष्यते।
श्रीशिवमहापुराण
[अ ण्या ०0००9 र
प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको
हुई महागणपतिकी पूजा एक पक्षके पापोंका न
करनेवाली और एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फ
देनेवाली होती है चैत्रमासमें चतु्थीको की हुई पूज
एक मासतक किये गये पूजनका फल देनेवाली होती
है और जब सूर्य सिंह राशिपर स्थित हों, उस समय
भाद्रपदमासकी चतुर्थीको की हुई गणेशजीकी पूजाको
एक वर्षतक [मनोवांछित] भोग प्रदान करनेवाली
जानना चाहिये ॥ ३२-३३९/२॥
श्रावणमासके रविवारको, हस्त नक्षत्रसे युक्त
सप्तमी तिथिको तथा माघशुक्ला सप्तमीको भगवान्
सूर्यका पूजन करना चाहिये | ज्येष्ठ तथा भाद्रपदमासोके
बुधवारको, श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशी तिथिको तथा
केवल द्वादशीको भी किया गया भगवान् विष्णुका
पूजन अभीष्ट सम्पत्तिको देनेवाला माना गया है।
श्रावणमासमें की जानेवाली श्रीहरिकी पूजा अभीष्ट
मनोरथ और आरोग्य प्रदान करनेवाली होती है | आं
एवं उपकरणोंसहित पूर्वोक्त गौ आदि बारह वस्तुओंका
दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसीको
द्वादशी तिथिमें आराधनाद्वारा श्रीविष्णुकी तृप्ति करके
मनुष्य प्राप्त कर लेता है। जो द्वादशी तिथिको भगवान्
विष्णुके बारह नामोंद्वारा बारह ब्राह्मणोंका षोडशोपचार
पूजन करता है, वह उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर लेता
है। इसी प्रकार सम्पूर्ण देवताओंके विभिन्न बारह
नामोंद्वारा बारह ब्राह्मणोंका किया हुआ पूजन उन-उन
देवताओंको प्रसन्न करनेवाला होता है ॥ ३४-३९॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको कर्ककी
संक्रान्तिसे युक्त श्रावणमासमें नवमी तिथिको मृगशिर
नक्षत्रके योगमें सम्पूर्ण मनोवांछित भोगों और फलोंकी
देनेवाली अम्बिकाका पूजन करना चाहिये। आश्विन
मासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथि सम्पूर्ण अभीष्ट
फलोंको देनेवाली है। उसी मासके कृष्णपक्षकी
चतुर्दशीको यदि रविवार पड़ा हो तो उस दितर्की
महत्त्व विशेष बढ़ जाता है। उसके साथ ही यि
आर्द्रा और महाद्रा (सूर्यसंक्रान्तिसे युक्त आर्द्रा) वी
योग हो तो उक्त अवसरोंपर की हुई शिवपूजार्की
कौ
अ० १६]
विद्येश्वरसंहिता
१९५
माघकृष्णचतुर्दश्यां सर्वाभीष्टफलप्रदा ॥ ४२
आयुष्करी मृत्युहरा सर्वसिद्धिकरी नृणाम्।
ज्येष्ठमासे महार्द्रायां चतुर्दशीदिनेऽपि च॥ ४३
मार्गशीषार्द्रकायां वा षोडशैरुपचारकैः।
तत्तन्मूर्तिशिवं पूज्य तस्य वै पाददर्शनम्॥ ४४
शिवस्य यजनं ज्ञेयं भोगमोक्षप्रदं नृणाम्।
वारादिदेवयजनं कार्तिके हि विशिष्यते॥ ४५
कार्तिके मासि सम्प्राप्ते सर्वान्देवान्यजेद् बुधः।
दानेन तपसा होमैर्जपेन नियमेन च॥ ४६
षोडशैरुपचारैश्च प्रतिमाविप्रमनत्रकैः ।
ब्राह्मणानां भोजनेन निष्कामार्तिहरो भवेत्॥ ४७
कार्तिके देवयजनं सर्वभोगप्रदं भवेत्।
व्याधीनां हरणं चैव भवेद्भूतग्रहक्षयः॥ ४८
कार्तिकादित्यवारेषु नृणामादित्यपूजनात्।
तैलकार्पासदानात्तु भवेत्कुष्ठादिसङ्क्षयः॥
हरीतकीमरीचीनां वस्त्रक्षीरादिदानतः ।
ब्रह्मप्रतिष्ठया चैव क्षयरोगक्षयो भवेत् ॥ ५०
दीपसर्षपदानाच्च अपस्मारक्षयो भवेत्।
कृत्तिकासोमवारेषु शिवस्य यजनं नृणाम्॥ ५१
महादारिद्रधशमनं सर्वसम्पत्करं भवेत्।
गृहक्षेत्रादिदानाच्च गृहोपकरणादिना॥ ५२
कृत्तिकाभौमवारेषु स्कन्दस्य यजनान्तृणाम्।
दीपघण्टादिदानाद्वै ॥ ५३
विशेष महत्त्व माना गया है। माघ कृष्ण चतुर्दशीको
शिवजीकी की हुई पूजा सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको
देनेवाली है। वह मनुष्योंकी आयु बढ़ाती है, मृत्युको
दूर हटाती है और समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति कराती
है ॥ ४०--४२१/२॥
ज्येष्ठमासमें चतुर्दशीको यदि महार्द्राका योग हो
अथवा मार्गशीर्षमासमें किसी भी तिथिको यदि आर्द्रा
नक्षत्र हो तो उस अवसरपर विभिन्न वस्तुओंकी बनी
हुई मूर्तिके रूपमें शिवजीकी जो सोलह उपचारोंसे पूजा
करता है, उस पुण्यात्माके चरणोंका दर्शन करना चाहिये।
भगवान् शिवकी पूजा मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाली
है--ऐसा जानना चाहिये। कार्तिक मासमें प्रत्येक वार
और तिथि आदिमें देवपूजाका विशेष महत्त्व है।
कार्तिकमास आनेपर विद्वान् पुरुष दान, तप, होम,
जप और नियम आदिके द्वारा समस्त देवताओंका
षोडशोपचारोंसे पूजन करे। उस पूजनमें देवप्रतिमा,
ब्राह्मण तथा मन्त्रोंका उपयोग आवश्यक है । ब्राह्मणोंको
भोजन करानेसे वह पूजन-कर्म सम्पन्न होता है । पूजकको
चाहिये कि वह कामनाओंको त्यागकर पीड़ारहित (शान्त)
हो देवाराधनमें तत्पर रहे ॥ ४३-४७॥
कार्तिकमासमें देवताओंका यजन-पूजन समस्त
भोगोंको देनेवाला होता है; यह व्याधियोंको हर लेनेवाला
और भूतों तथा ग्रहोंका विनाश भी करनेवाला है।
कार्तिकमासके रविवारोंको भगवान् सूर्यकी पूजा करने
और तेल तथा कपासका दान करनेसे मनुष्योंके कोढ़
आदि रोगोंका नाश होता है । हरें, काली मिर्च, वस्त्र
तथा दूध आदिके दानसे और ब्राहमणोंकी प्रतिष्ठा करनेसे
क्षयके रोगका नाश होता है। दीप और सरसोंके दानसे
मिरगीका रोग मिट जाता है ॥ ४८--५०१/२॥
कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त सोमवारोंको किया हुआ
शिवजीका पूजन मनुष्योंके महान् दाख्थिको मिटानेवाला
और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला है। घरकी आवश्यक
सामग्रियोंके साथ गृह और क्षेत्र आदिका दान करनेसे
भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। कृत्तिकायुक्त
मंगलवारोंको श्रीस्कन्दका पूजन करनेसे तथा दीपक
एवं घण्टा आदिका दान देनेसे मनुष्योंको शीघ्र ही
वाक्सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥५१-५३॥
११५६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १६
कृत्तिकासोम्यवारेषु विष्णोवे यजनं नृणाम्।
दध्योदनस्य दानं च सत्सन्तानकरं भवेत् ॥ ५४
कृत्तिकागुरुवारेषु ब्रह्मणो यजनाद्धनैः ।
मधुस्वर्णाज्यदानेन भोगवृद्धिर्भवेन्नृणाम्॥ ५५
कृत्तिकाशुक्रवारेषु गजतुण्डस्य याजनात्।
गन्धपुष्पान्नदानेन भोगवृद््विर्भवेन्तृणाम्॥ ५६
बन्ध्या सुपुत्रं लभते स्वर्णरोप्यादिदानतः।
कृत्तिकाशनिवारेषु दिक्पालानां च वन्दनम्॥ ५७
दिग्गजानां च नागानां सेतुपानां च पूजनम्।
त्र्यम्बकस्य च रुद्रस्य विष्णोः पापहरस्य च॥ ५८
ज्ञानदं ब्रह्मणश्चैव धन्वन्तर्यश्चिनोस्तथा।
रोगापमृत्युहरणं तत्कालव्याधिशान्तिदम्॥ ५९
लवणायसतैलानां माषादीनां च दानतः।
त्रिकटुफलगन्धानां जलादीनां च दानतः॥ ६०
द्रवाणां कठिनानां च प्रस्थेन पलमानतः।
स्वर्गप्राप्तिर्धनुर्मासे ह्युषःकाले च पूजनम्॥ ६१
शिवादीनां च सर्वेषां क्रमाद्वै सर्वसिद्धये।
शाल्यन्नस्य हविष्यस्य नैवेद्यं शस्तमुच्यते॥ ६२
विविधान्नस्य नैवेद्यं धनुर्मासे व्रिशिष्यते।
मार्गशीर्षेऽन्नदस्यैव सर्वमिष्टफलं भवेत्॥ ६३
पापक्षयं चेष्टसिद्धिं चारोग्यं धर्ममेव च।
सम्यग्बेदपरिज्ञानं सदनुष्ठानमेव च॥ ६४
इहामुत्र महाभोगानन्ते योगं च शाश्चतम्।
वेदान्तज्ञानसिद्धिं च मार्गशीर्षान्नदो लभेत्॥ ६५
कृत्तिकायुक्त बुधवारोंको किया हुआ
यजन तथा दही-भातका दान मनुष्योंको उत्तम सन्तानकी
प्राप्ति करानेवाला होता है । कृत्तिकायुक्त गुरुवारोंको धने
ब्रह्माजीका पूजन तथा मधु, सोना और घीका दान करने
मनुष्योंके भोग-वैभवकी वृद्धि होती है ॥ ५४-५५ |
कृत्तिकायुक्त शुक्रवारोंको गजानन गणेशजीकी पूजा
करनेसे तथा गन्ध, पुष्प एवं अन्नका दान देनेसे मानबोंके
सुख भोगनेयोग्य पदार्थोकी वृद्धि होती है। उस दिन
सोना, चाँदी आदिका दान करनेसे वन्ध्याको भी उत्तम
पुत्रकी प्राप्ति होती है। कृत्तिकायुक्त शनिवारोंको
दिक्पालोंकी वन्दना, दिग्गजों-नागों-सेतुपालोंका पूजन
और त्रिनेत्रधारी रुद्र तथा पापहारी विष्णुका पूजन
ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाला है । ब्रह्मा, धन्वन्तरि एवं दोनों
अश्विनीकुमारोंका पूजन करनेसे रोग तथा अपमृत्युका
निवारण होता है और तात्कालिक व्याधियोंकी शान्ति
हो जाती है। नमक, लोहा, तेल और उड़द आदिका;
त्रिकटु (सोंठ, पीपल और गोल मिर्च), फल, गन्ध
और जल आदिका तथा [घृत आदि] द्रव-पदार्थोंका
और [सुवर्ण, मोती, धान्य आदि] ठोस वस्तुओंका भी
दान देनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है । इनमेंसे नमक
आदिका मान कम-से-कम एक प्रस्थ (सेर) और सुवर्ण
आदिका मान कम-से-कम एक पल होना चाहिये।
धनुकी संक्रान्तिसे युक्त पौषमासमें उष:कालमें शिव
आदि समस्त देवताओंका पूजन क्रमशः समस्त
सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है। इस पूजनमें
अगहनीके चावलसे तैयार किये गये हविष्यका नैवेद्य
उत्तम बताया जाता है। पौषमासमें नाना प्रकारके अन्नका
नैवेद्य विशेष महत्त्व रखता है॥ ५६--६२१/२॥
मार्गशीर्षमासमें केवल अन्नका दान करनेवाले
मनुष्यको सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति हो जाती है।
मार्गशीर्षमासमें अन्नका दान करनेवाले मनुष्यके सारे
पाप नष्ट हो जाते हैं, वह अभीष्ट-सिद्धि, आरोग्य,
धर्म, वेदका सम्यक् ज्ञान, उत्तम अनुष्ठानका फल,
इहलोक और परलोकमें महान् भोग तथा
सनातन योग (मोक्ष) तथा वेदान्तज्ञानकी सिद्धि प्रा
कर लेता है। जो भोगकी इच्छा रखनेवाला है, व
अ० १६]
विद्येश्वरसंहिता
११७
मार्गशीर्षे ह्युषःकाले दिनत्रयमथापि वा।
यजेद् देवान्भोगकामो नाधनुर्मासिको भवेत्॥ ६६
यावत्सङ्गवकालं तु धनुर्मासो विधीयते।
धनुर्मासे निराहारो मासमात्रं जितेन्द्रियः ॥ ६७
आमध्याह्णं जपेद् विप्रो गायत्रीं वेदमातरम्।
पञ्चाक्षरादिकान्मन्त्रान्पश्चादासुप्तिकं जपेत्॥ ६८
ज्ञानं लब्ध्वा च देहान्ते विप्रो मुक्तिमवाप्नुयात्।
अन्येषां नरनारीणां त्रिःस्नानेन जपेन च॥ ६९
सदा पञ्चाक्षरस्यैव विशुद्धं ज्ञानमाप्यते।
इष्टमन्त्रान्सदा जप्त्वा महापापक्षयं लभेत्॥ ७०
धनुर्मासे विशेषेण महानैवेद्यमाचरेत्।
शालितण्डुलभारेण मरीचप्रस्थकेन च॥ ७१
गणनाद् द्वादशं सर्वं मध्वाज्यकुडवेन हि।
द्रोणयुक्तेन मुद्रेन द्वादशव्यञ्जनेन च॥ ७२
घृतपक्वैरपूपैश्च मोदकैः शालिकादिभिः।
द्वादशैश्च दधिक्षीरैद्वादशप्रस्थकेन च॥ ७३
नारिकेलफलादीनां तथा गणनया सह।
द्वादशक्रमुकैर्युक्तं पद्त्रिशत्पत्रकैर्युतम्॥ ७४
कर्पूरखुरचूर्णेन ।
ताम्बूलयुक्त तु यदा महानैवेद्यलक्षणम्॥ ७५
महानेवेद्यमेतद्वै देवतार्पणपूर्वकम्।
वर्णानुक्रमपूर्वेण तद्भक्तेभ्यः प्रदापयेत्॥
एवं चौदननेवेद्याद्भूमौ राष्ट्रपतिर्भवेत्।
महानैवेद्यदानेन नरः स्तर्गमवाण्नुयात्॥ ७७
महानैवेद्यदानेन सहस्रेण द्टिजर्षभाः।
सत्यलोकं च तल्लोके पूर्णमायुरवाप्तुयात्॥ ७८
सहस्त्राणां च त्रिंशत्या महानैवेद्यदानतः।
तदूर्ध्वलोकमाप्यैव न पुनर्जन्मभारभवेत्॥। ७९
मनुष्य मार्गशीर्षमास आनेपर कम-से-कम तीन दिन
भी उषःकालमें अवश्य देवताओंका पूजन करे और
पौषमासको पूजनसे खाली न जाने दे। उषःकालसे
लेकर संगवकालतक ही पौषमासमें पूजनका विशेष
महत्त्व बताया गया है। पौषमासमें पूरे महीनेभर
जितेन्द्रिय और निराहार रहकर द्विज प्रातःकालसे
मध्याहनकालतक वेदमाता गायत्रीका जप करे।
तत्पश्चात् रातको सोनेके समयतक पंचाक्षर आदि
मन्त्रोंका जप करे। ऐसा करनेवाला ब्राह्मण ज्ञान
पाकर शरीर छूटनेके बाद मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
द्विजेतर नर-नारियोंको त्रिकाल स्नान और पंचाक्षर
मन्त्रके ही निरन्तर जपसे विशुद्ध ज्ञान प्राप्त हो जाता
है। इष्ट मन्त्रॉंका सदा जप करनेसे बड़े-से-बड़े
पापोंका भी नाश हो जाता है ॥ ६३-७०॥
पौषमासमें विशेषरूपसे महानैवेद्य चढ़ाना चाहिये।
यहाँ बतायी सभी वस्तुएँ बारहकी संख्यामें समझनी
चाहिये-चावल (बारह) भार, काली मिर्च (बारह)
प्रस्थर, मधु और घृत (बारह) कुडव, मूँग (बारह)
द्रोणः, बारह प्रकारके व्यंजन, घीमें तले हुए पूए, लड्डू
और चावलके मिष्टान्न (बारह) प्रस्थ, दही और दूध
और बारह नारियल आदि फल, बारह सुपारी, कर्पूर,
'कत्था और पाँच प्रकारके सुगन्धद्रव्योंसे युक्त छत्तीस
पत्ते पानसे महानैवेद्य बनता है ॥ ७१-७५॥
इस महानैवेद्यको देवताओंको अर्पण करके
वर्णानुसार उस देवताके भक्तोंको दे देना चाहिये। इस
प्रकारके ओदन-तैवेद्यसे मनुष्य पृथ्वीपर राष्ट्रका स्वामी
होता है। महानैवेद्यके दानसे स्वर्गप्राप्ति होती है। हे
द्विजश्रेष्ठो । एक हजार महानैवेद्योंके दानसे सत्यलोक
प्राप्त होता है और उस लोकें पूर्णायु प्राप्त होती है एवं
तीस हजार महानैवेद्योंके दानसे उसके ऊपरके लोकोंकी
प्राप्ति होती है तथा पुनर्जन्म नहीं होता॥ ७६-७९॥
१--४-चार धानकी एक गुंजी या एक रतत होती है। पाँच रत्तीका एक पण (आधे मासेसे कुछ अधिक), आठ
पणका एक धरण,
आठ धरणका एक पल (ढाई छटँकके लगभग), सौ पल (सोलह सेरके लगभग)-की एक तुला
होती है, बीस तुलाका एक भार होता है, अर्थात् आजके मापसे आठ मनका एक भार होता है। पावभरका एक कुडव
होता है, चार कुडवका एक प्रस्थ अर्थात् एक सेर होता है। चार सेर (प्रस्थ)-का एक आढक और आठ आढक (३२
सेर)-का एक द्रोण होता है। तीन द्रोणकी एक खारी और आठ द्रोणका एक वाह होता है।
११८
सहस्त्राणां च षट्त्रिंशजन्मनेवेद्यमीरितम्।
तावन्नैवेद्यदानं तु महापूर्णं तदुच्यते॥ ८०
महापूर्णस्य नेवेद्य जन्मनैवेद्यमिष्यते।
जन्मनेवेद्यदानेन पुनर्जन्म न विद्यते॥८१
ऊर्जे मासि दिने पुण्ये जन्मनेवेद्यमाचरेत्।
सङ्क्रान्तिपातजन्मर्क्षपौर्णमास्यादिसंयुते ॥ ८२
अब्दजन्मदिने कुर्याज्जन्मनेवेद्यमुत्तमम्।
मासान्तरेषु जन्मर्क्षपूर्णयोगदिनेऽपि च॥ ८३
मेलने च शनैर्वापि तावत्साहस्त्रमाचरेत्।
जन्मनैवेद्यदानेन जन्मार्पणफलं लभेत्॥ ८४
जन्मार्पणाच्छिवः प्रीतः स्वसायुज्यं ददाति हि।
इदं तज्जन्मनेवेद्यं शिवस्यैव प्रदापयेत्॥ ८५
योनिलिङ्गस्वरूपेण शिवो जन्मनिरूपकः ।
तस्माज्जन्मनिवृत्त्यर्थ जन्मपूजा शिवस्य हि॥ ८६
बिन्दुनादात्मकं सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम्।
बिन्दुः शक्तिः शिवो नादः शिवशक्त्यात्मकं जगत्॥ ८७
नादाधारमिदं विन्दुर्बिन्द्राधारमिदं जगत्।
जगदाधारभूतौ हि बिन्दुनादौ व्यवस्थितौ॥ ८८
बिन्दुनादयुतं सर्वं सकलीकरणं भवेत्।
सकलीकरणाज्जन्म जगत्प्राप्नोत्यसंशयम्॥ ८९
बिन्दुनादात्मकं लिङ्गं जगत्कारणमुच्यते
बिन्दुर्देवी शिवो नांद: शिवलिङ्गं तु कथ्यते॥ ९०
'तस्माजन्मनिवृत्त्यर्थं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्।
माता देवी बिन्दुरूपा नादरूपः शिवः पिता॥ ९१
पूजिताभ्यां पितृभ्यां तु परमानन्द एव हि।
परमानन्दलाभार्थ शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्॥ ९२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १६
छत्तीस हजार महानैवेद्योंको जन्मनैवेद्य
गया है। उतने नैवेद्योंका दान महापूर्ण कहलाता है
महापूर्ण नैवेद्य ही जन्मनैवेद्य कहा गया है। जन्मनेवेद्यफे
दानसे पुनर्जन्म नहीं होता॥ ८०-८१ ॥
कार्तिक मासमें संक्रान्ति, व्यतीपात, जन्मनश्षत्र
पूर्णिमा आदि किसी पवित्र दिनको जन्मनैवेद्य चढ़ान
चाहिये। संवत्सरके प्रारम्भिक दिनको भी उत्तम
जन्मनैवेद्यका अर्पण करना चाहिये। किसी अन्य
महीनेमें भी जन्मनक्षत्रके पूर्ण योगके दिन तथा
अधिक पुण्ययोगोंके मिलनेपर धीरे-धीरे छत्तीस हजार
महानैवेद्य अर्पण करे | जन्मनैवेद्यके दानसे जन्मार्पणका
फल प्राप्त होता है। जन्मार्पणसे प्रसन्न होकर भगवान्
शंकर अपना सायुज्य प्रदान करते हैं। इसलिये इस
जन्मनैवेद्यको शिवको ही अर्पण करना चाहिये। योनि
और लिंगरूपमें विराजमान शिव जन्मको देनेवाले हैं,
अतः पुनर्जन्मकी निवृत्तिके लिये जन्मनैवेद्यसे शिवकी
पूजा करनी चाहिये॥ ८२-८६॥
सारा चराचर जगत् बिन्दु-नादस्वरूप है। बिन्दु
शक्ति है और नाद शिव। इस तरह यह जगत् शिव
शक्तिस्वरूप ही है। नाद बिन्दुका और बिन्दु इस जगतका
आधार है, ये बिन्दु और नाद (शक्ति और शिव)
सम्पूर्ण जगतूके आधाररूपसे स्थित हैं। बिन्दु और
नादसे युक्त सब कुछ शिवस्वरूप है; क्योंकि वही
सबका आधार है। आधारमें ही आधेयका समावेश
अथवा लय होता है। यही सकलीकरण है। इस
सकलीकरणकी स्थितिसे ही सृष्टिकालमें जगत्का
प्रादुर्भाव होता है; इसमें संशय नहीं है। शिवलिंग
बिन्दुनादस्वरूप है, अत: उसे जगतका कारण बताया
जाता है। बिन्दु देवी है और नाद शिव, इन दोनोंका
संयुक्तरूप ही शिवलिंग कहलाता है। अतः जन्मके
संकटसे छुटकारा पानेके लिये शिबलिंगकी पूर्ण
करनी चाहिये। बिन्दुरूपा देवी उमा माता हैं और
नादस्वरूप भगवान् शिव पिता। इन माता-पिता
पूजित होनेसे परमानन्दकी ही प्राप्ति होती है । अर्तः
परमानन्दका लाभ लेनेके लिये शिवलिंगका विशेषै
पूजन करे॥ ८७--९२॥
अ० १६]
विद्येश्वरसंहिता
११९
सा देवी जगतां माता स शिवो जगतः पिता।
पित्रोः शुश्रूषके नित्यं कृपाधिक्यं हि वर्धते॥ ९३
कृपयान्तर्गतेश्वर्यं पूजकस्य ददाति हि।
तस्मादन्तर्गतानन्दलाभार्थं॑ मुनिपुङ्गवाः॥ ९४
पितृमातृस्वरूपेण शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्
भर्गः पुरुषरूपो हि भर्गा प्रकृतिरुच्यते॥ ९५
अव्यक्तान्तरधिष्ठानं गर्भः पुरुष उच्यते।
सुव्यक्तान्तरधिष्ठानं गर्भः प्रकृतिरुच्यते॥ ९६
पुरुषस्त्वादिगर्भो हि गर्भवाञ्जनको यतः।
पुरुषात्प्रकृतौ युक्तं प्रथमं जन्म कथ्यते॥ ९७
प्रकृतेर्व्यक्ततां यातं द्वितीयं जन्म कथ्यते।
जन्म जन्तुर्मत्युजन्म पुरुषात्प्रतिपद्यते॥ ९८
अन्यतो भाव्यतेऽवश्यं मायया जन्म कथ्यते।
जीर्यते जन्मकालाद्यत्तस्माज्जीव इति स्मृतः॥ ९९
जन्यते तन्यते पाशैजीवशब्दार्थ एव हि।
जन्मपाशनिवृत्त्यर्थ जन्मलिङ्गं प्रपूजयेत्॥ १००
भ॑ वृद्धिं गच्छतीत्यर्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते
प्राकृतैः शब्दमात्राद्ये: प्राकृतेन्द्ियभोजनात्॥ १
भगस्येदं भोगमिति शब्दार्थो मुख्यतः श्रुतः।
मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवाञ्छिव उच्यते॥ १०२
भगवान्भोगदाता हि नान्यो भोगप्रदायकः।
भगस्वामी च भगवान्भर्ग इत्युच्यते बुधैः ॥ १०३
भगेन सहितं लिङ्गं भगं लिङ्गेन संयुतम्।
इहामुत्र च भोगार्थ नित्यभोगार्थमेव च॥ १०४
भगवन्तं महादेवं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्।
वे देवी उमा जगत्की माता हैं और भगवान् शिव
जगतूके पिता । जो इनकी सेवा करता है, उस पुत्रपर इन
दोनों माता-पिताकी कृपा नित्य अधिकाधिक बढ़ती रहती
है। वे पूजकपर कृपा करके उसे अपना आन्तरिक ऐश्वर्य
प्रदान करते हैं। अत: हे मुनीश्वरो ! आन्तरिक आनन्दकी
प्राप्तिके लिये शिबलिंगको माता-पिताका स्वरूप मानकर
उसकी पूजा करनी चाहिये। भर्ग (शिव) पुरुषरूप है
और भर्गा (शिवा अथवा शक्ति) प्रकृति कहलाती है।
अव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानरूप गर्भको पुरुष कहते हैं
और सुव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानभूत गर्भको प्रकृति।
पुरुष आदिगर्भ है, वह प्रकृतिरूप गर्भसे युक्त होनेके
कारण गर्भवान् है; क्योंकि वही प्रकृतिका जनक है।
प्रकृतिमें जो पुरुषका संयोग होता है, यही पुरुषसे उसका
प्रथम जन्म कहलाता है । अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत््वादिके
क्रमसे जो जगतका व्यक्त होना है, यही उस प्रकृतिका
द्वितीय जन्म कहलाता है। जीव पुरुषसे ही बार-बार
जन्म और मृत्युको प्राप्त होता है । मायाद्रारा अन्यरूपसे
प्रकट किया जाना ही उसका जन्म कहलाता है । जीवका
शरीर जन्मकालसे ही जीर्ण (छः भावविकारोंसे युक्त)
होने लगता है, इसीलिये उसे “जीव' यह संज्ञा दी गयी
है। जो जन्म लेता और विविध पाशोंद्वारा बन्धनमें पड़ता
है, उसका नाम जीव है, जन्म और बन्धन जीव-शब्दका ही
अर्थ है। अत: जन्ममृत्युरूपी बन्धनकी निवृत्तिके लिये
जन्मके अधिष्ठानभूत माता-पितृस्वरूप शिवलिंगका
भली-भाँति पूजन करना चाहिये ॥ ९३-१००॥
शब्दादि पंचतन्मात्राओं तथा पंचेन्द्रियांसे विषय
ग्रहण करनेसे ' भ' अर्थात् वृद्धिको ' गच्छति’ अर्थात्
प्राप्त होती है, इसलिये ' भग' शब्दका अर्थ प्रकृति है।
भोग ही भगका मुख्य शब्दार्थ है। मुख्य ' भग' प्रकृति
है और ' भगवान्' शिव कहे जाते हैं ॥ १०१-१०२॥
भगवान् ही भोग प्रदान करते हैं, दूसरा कोई नहीं दे
सकता । भग (प्रकृति)-का स्वामी भगवान् ही विद्वानोंद्वारा
भर्ग कहा जाता है । भग-प्रकृतिसे संयुक्त परमात्मलिंग
और लिंगसंयुक्त भग-प्रकृति ही इस लोक और परलोकमें
नित्य भोग प्रदान करते हैं, अत: भगवान् महादेवके
शिवलिंगकी पूजा करनी चाहिये॥ १०३-१०४९/२॥
१२०
लोकप्रसविता सूर्यस्तच्चिह्नं प्रसवाद्धवेत्॥ १०५
लिङ्गे प्रसूतिकर्तारं लिङ्गिनं पुरुषो यजेत्।
लिङ्गार्थगमकं चिह्णं लिङ्गमित्यभिधीयते॥ १०६
लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः।
शिवशक्त्योश्च चिह्ृस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते॥ १०७
स्वचिह्णपूजनात्प्रीतश्चिह्रकार्यं न वीयते।
चिह्नकार्यं तु जन्मादि जन्माद्यं विनिवर्तते॥ १०८
प्राकृतैः पुरुषैश्चापि बाह्याभ्यन्तरसम्भवैः।
षोडशैरुपचारैश्च शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्॥ १०९
एवमादित्यवारे हि पूजा जन्मनिवर्तिका
आदिवारे महालिङ्गं प्रणवेनैव पूजयेत्॥ ११०
आदिवारे पञ्जगव्यैरभिषेको विशिष्यते।
गोमयं गोजलं क्षीरं दध्याज्यं पञ्चगव्यकम्॥ १११
कषीराद्यं च पृथक्चैव मधुना चेक्षुसारकैः।
गव्यक्षीरान्ननैवेद्यं प्रणवेनैव कारयेत्॥ ११२
'प्रणवं ध्वनिलिङ्गं तु नादलिङ्गं स्वयम्भुवः ।
बिन्दुलिङ्गं तु यन्त्रं स्यान्मकारं तु प्रतिष्ठितम्॥ ११३
मक !
उकारं चरलिङ्गं स्यादकारं गुरुविग्रहम्।
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १६
संसारको उत्पन्न करनेवाले सूर्य हैं और उत्पन
करनेके कारण जगत् ही उनका (प्रत्यक्ष) चिह्न है।
[इसलिये उनका एक नाम भग भी है।]
लिंगमें जगत्को उत्पन्न करनेवाले लिंगीकी ही
करनी चाहिये। सृष्टिके अर्थको बतानेवाले चिहके
रूपमें ही उसे लिंग कहा जाता है॥ १०५-१०६॥
लिंग परमपुरुष शिवका बोध कराता है | इस प्रका
शिव और शक्तिके मिलनके प्रतीकको ही शिवलिंग
कहा गया है। अपने चिहृके पूजनसे प्रसन्न होकर महादेव
उस चिहनके कार्यरूप जन्मादिको समाप्त कर देते हैं
तथा पूजकको पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती अत: सभी
लोगोंको यथाप्राप्त बाह्य और मानसिक षोडशोपचारोंसे
शिवलिंगका पूजन करना चाहिये ॥ १०७-१०९॥
रविवारको की गयी पूजा पुनर्जन्मका निवारण
कर देती है। रविवारको महालिंगकी प्रणव (ॐ)
से ही पूजा करनी चाहिये। उस दिन पंचगव्यसे किया
गया अभिषेक विशेष महत्त्वका होता है। गोबर,
गोमूत्र, गोदुग्ध, उसका दही और गोघृत-ये पंचगव्य
कहे जाते हैं॥ ११०-१११॥
गायका दूध, गायका दही और गायका घी-
इन तीनोंको पूजनके लिये शहद और शक्करके साथ
पृथक-पृथक् भी रखे और इन सबको मिलाकर
सम्मिलितरूपसे पंचामृत भी तैयार कर ले। (इनके
द्वारा शिवलिंगका अभिषेक एवं स्नान करायें), फिर
गायके दूध और अन्नके मेलसे नैवेद्य तैयार कळे
प्रणव मन्त्रके उच्चारणपूर्वक उसे भगवान् शिवकी
अर्पित करे। सम्पूर्ण प्रणवको ध्वनिलिंग कहते है।
स्वयम्भूलिंग नादस्वरूप होनेके कारण नादलिंग कही
गया है। यन्त्र या अर्घा बिन्दुस्वरूप होनेके कारण
बिन्दुलिंगके रूपमें विख्यात है। उसमें
प्रतिष्ठित जो शिवलिंग है, वह मकार-स्वरूप हैं
इसलिये मकारलिंग कहलाता है। सवारी निकाली
आदिके लिये जो चरलिंग होता है, वह उकारस्वर् |
होनेसे उकारलिंग कहा गया है तथा पूजाकी दीष
देनेवाले जो गुरु या आचार्य हैं, उनका
अकारका प्रतीक होनेसे अकारलिंग माना गया हैं।
अ० १७] विद्येश्वरसंहिता
षड्लिङ्गपूजया नित्यं जीवन्मुक्तो न संशय: ॥ १९४
१२९
इस प्रकार प्रणवमें प्रतिष्ठित अकार, उकार, मकार,
बिन्दु, नाद और ध्वनिके रूपमें लिंगके छः भेद हैं। इन
छहों लिंगोंकी नित्य पूजा करनेसे साधक जीवन्मुक्त
हो जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ ११२-११४॥
शिवस्य भक्त्या पूजा हि जन्ममुक्तिकरी नृणाम्। भक्तिपूर्वक की गयी शिवपूजा मनुष्योंको पुनर्जन्मसे
रुद्राक्षधारणात्पादमर्धं वै भूतिधारणात्॥ ११५ | छुटकारा दिलाती है । रुद्राक्षधारणसे एक चौथाई, विभूति
त्रिपादं मन्त्रजाप्याच्च पूजया पूर्णभक्तिमान्। (भस्म)-धारणसे आधा, मन्त्रजपसे तीन चौथाई और
शिवलिडू मै मोक्ष र पूजासे पूर्ण फल प्राप्त होता है। शिवलिंग और शिवभक्तकी
शिवलिक च भकत यपूण र पूजा करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है हे द्विजो! जो
इस अध्यायको ध्यानपूर्वक पढता-सुनता है, उसकी
शिवभक्ति सुदृढ़ होकर बढ़ती रहती है॥ ११५--११७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां पार्थिवपूजाप्रकारादिवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें पार्थिव पूजा आदिका प्रकार वर्णन
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः।
तस्यैव शिवभक्तिश्च वर्धते सुदृढा द्विजाः॥ ११७
अथ सप्तदशोऽध्यायः
षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य, उसके सूक्ष्म रूप ( ॐकार ) और स्थूल रूप ( पंचाक्षर
मन्त्र )-का विवेचन, उसके जपकी विधि एवं महिमा, कार्यब्रह्मके लोकोंसे लेकर
कारणरुद्रके लोकोंतकका विवेचन करके कालातीत, पंचावरणविशिष्ट शिवलोकके
अनिर्वचनीय वैभवका निरूपण तथा शिवभक्तोंके सत्कारकी महत्ता
ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले--हे महामुने! हे प्रभो! आप
प्रणवस्य च माहात्म्यं षड्लिङ्गस्य महामुने। हमारे लिये क्रमशः षड्लिंगस्वरूप प्रणवका माहात्म्य
शिवभक्तस्य पूजां च क्रमशो ब्रूहि नः प्रभो॥ १ | तथा शिवभक्तके पूजनकी विधि बताइये॥ १॥
सूत उवाच सूतजीने कहा--महर्षियो ! आपलोग तपस्याके
तपोधनैर्भवद्भिश्च सम्यक् प्रश्नस्त्वयं कृतः। धनी हैं, आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया
अस्योत्तरं महादेवो जानाति स्म न चापरः॥ २ है। किंतु ha तळ -. उत्तर महादेवजी ही
र जानते हैं, दूसरा कोई नहीं । तथापि भगवान् शिवकी
तथापि वक्ष्य तमह aa क ३ | कृपासे ही मैं इस विषयका वर्णन करूँगा। वे भगवान्
शिवोठ्सप्राकचयुष्माकारक्षा हा 3, शिव हमारी और आपलोगोंकी रक्षाका महान् भार
बारम्बार स्वयं ही ग्रहण करें॥ २-३॥
“प्र' नाम है प्रकृतिसे उत्पन्न संसाररूपी
महासागरका। ' प्रणव' इसे पार करनेके लिये दूसरी
प्रो हि प्रकृतिजातस्य संसारस्य महोदधेः। (नव) नाव है। इसलिये विद्वान् इस ओंकारको
नवं नावांतरमिति प्रणवं वै विदुर्बुधाः ४ | 'प्रणव' की संज्ञा देते हैं। [ 3४कार अपने जप करनेवाले
१२२
प्रः प्रपञ्जो न नास्ति वो युष्माकं प्रणवं विदुः।
प्रकर्षेण नयेद्यास्मान्मोक्षं वः प्रणवं विदुः॥ ५
स्वमन्त्रजापकानां च पूजकानां च योगिनाम्।
सर्वकर्मक्षयं कृत्वा दिव्यज्ञानं तु नूतनम्॥ ६
तमेब मायारहितं नूतनं परिचक्षते।
प्रकर्षेण महात्मानं नवं शुद्धस्वरूपकम्॥ ७
नूतनं वै करोतीति प्रणवं तं विदुर्बुधाः ।
प्रणवं द्विविधं प्रोक्तं सूक्ष्मस्थूलविभेदतः॥ ८
सूक्ष्ममेकाक्षरं विद्यात्स्थूलं पञ्चाक्षरं विदुः।
सूक्ष्ममव्यक्तपञ्चार्ण॑ सुव्यक्तार्णं तथेतरत्॥ ९
जीवन्मुक्तस्य सूक्ष्मं हि सर्वसारं हितस्य हि।
मन्त्रेणार्थानुसन्धानं स्वदेहविलयावधि॥ १०
स्वदेहे गलिते पूर्ण शिवं प्राप्नोति निश्चयः।
केवलं मन्त्रजापी तु योगं प्राप्नोति निश्चयः॥ ११
चट्त्रिंशत्कोटिजापी तु निश्चयं योगमाप्नुयात्।
सूक्ष्मं च द्विविधं ज्ञेयं हृस्वदीर्घविभेदतः॥ १२
श्रीशिवमहापुराण
[अ १५
साधकोंसे कहता है-] प्रपञ्च न नास्ति वो युष्माकं प्रणवं विदुः। | साधकोंसे कहता है--] “प्रपंच, न-नहों ¬ प्र-प्रपंच, न--नही है, व...
तुमलोगोंके लिये।' अतः इस भावको लेकर भी ञान
पुरुष “ ओम् को ' प्रणव' नामसे जानते हैं । इसका दूस
भाव यह है-- प्र-प्रकर्षण, न-नयेत्, व:- युष्मान भोक
इति वा प्रणवः। अर्थात् यह तुम सब उपासकोंको
बलपूर्वक मोक्षतक पहुँचा देगा।' इस अभिप्रायसे भी
इसे ऋषि-मुनि “प्रणव ' कहते हैं ॥ ४-५॥
अपना जप करनेवाले योगियोंके तथा अपने मन्रकी
पूजा करनेवाले उपासकके समस्त कमका नाश करके
यह दिव्य नूतन ज्ञान देता है; इसलिये भी इसका जाम्
प्रणव है। उन मायारहित महेश्वरको ही नव अर्थात्
नूतन कहते हैं। वे परमात्मा प्रकृष्टरूपसे नव अर्थात्
शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये “प्रणव' कहलाते हैं। प्रणव
साधकको नव अर्थात नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है।
इसलिये भी विद्वान् पुरुष उसे “प्रणव ' कहते हैं । अथवा
प्रकृष्टरूपसे नव--दिव्य परमात्मज्ञान प्रकट करता है,
इसलिये वह प्रणव कहा गया है ॥ ६-७९/२॥
प्रणवके दो भेद बताये गये हैं-स्थूल और सूक्ष्म।
एक अक्षररूप जो “ओम् है, उसे सूक्ष्म प्रणव जानना
चाहिये और “नम: शिवाय ' इस पाँच अक्षरवाले मन्त्रको
स्थूल प्रणव समझना चाहिये । जिसमें पाँच अक्षर व्यक्त
नहीं हैं, वह सूक्ष्म है और जिसमें पाँचों अक्षर सुस्पष्टरूपसे
व्यक्त हैं, वह स्थूल है । जीवन्मुक्त पुरुषके लिये सूक्ष्म
प्रणवके जपका विधान है। वही उसके लिये समस्त
साधनोंका सार है। (यद्यपि जीवन्मुक्तके लिये किसी
साधनको आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह सिद्धरूप
है, तथापि दूसरोंकी दृष्टिमें जबतक उसका शरीर रहती
है, तबतक उसके द्वारा प्रणव-जपकी सहज साधती
स्वतः होती रहती है |) वह अपनी देहका विलय होनेतर्क
सूक्ष्म प्रणव मन्त्रका जप और उसके अर्थभूत परमात्म
तत्वका अनुसंधान करता रहता है। जब शरीर नष्ट ही
जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिवको प्राप्त की
लेता है-यह सुनिश्चित है॥ ८--१०१/२॥
जो केवल मन्त्रका जप करता है, उसे निश्चय
योगको प्राप्ति होती है। जिसने छत्तीस करोड़ म्री
जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जा
है। सूक्ष्म प्रणवके भी हस्व और दीर्घके भेदसे दो र
अ० १७]
विद्येश्वरसंहिता
१२३
अकारश्च उकारश्च मकारश्च ततः परम्।
बिन्दुनादयुतं तद्धि शब्दकालकलान्वितम्॥ १३
दीर्घप्रणवमेवं हि योगिनामेव हृदगतम्।
मकारं तन्त्रितत्त्वं हि हृस्वप्रणव उच्यते॥ १४
शिवः शक्तिस्तयोरैक्यं मकारं तु त्रिकात्मकम्।
हृस्वमेवं हि जाप्यं स्यात्सर्वपापक्षयैषिणाम्॥ १५
भूबायुकनकाणाँद्यौः शब्दाद्याश्च तथा दश।
आशान्वये दश पुनः प्रवृत्ता इति कथ्यते॥ १६
हृस्वमेव प्रवृत्तानां निवृत्तानां तु दीर्घकम्।
व्याहृत्यादौ च मन्त्रादौ कामं शब्दकलायुतम्॥ १७
वेदादौ च प्रयोज्यं स्याद्वन्दने सन्ध्ययोरपि।
नवकोटिजपाञ्जप्वा संशुद्धः पुरुषो भवेत्॥ १८
पुनश्च नवकोट्या तु पृथिवीजयमाण्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्या तु ह्यपां जयमवाप्तुयात्॥
पुनश्च नवकोट्या तु तेजसां जयमाण्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्या तु वायोर्जयमवाण्तुयात्।
आकाशजयमाप्नोति नवकोटिजपेन वै॥ २०
गन्धादीनां क्रमेणैव नवकोटिजपेन बै।
अहङ्कारस्य शच बै॥ २९
सहस््रमन्त्रजप्तेन नित्यशुद्धो भवेत्युमान्।
ततः परं स्वसिद्ध्यर्थं जपो भवति हि द्विजाः॥ २२
जानने चाहिये । अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद, शब्द,
काल और कला-इनसे युक्त जो प्रणव है, उसे “दीर्घ
प्रणव' कहते हैं । बह योगियोंके ही हृदयमें स्थित होता
है। मकारपर्यन्त जो ओम् है, वह अ उ म्-इन तीन
तत्त्वोंसे युक्त है । इसीको ' हस्व प्रणव? कहते हैं । ' अ'
शिव है, 'उ' शक्ति है और मकार इन दोनोंकी एकता
है; वह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर हस्व प्रणवका
जप करना चाहिये। जो अपने समस्त पापोंका क्षय
करना चाहते हैं, उनके लिये इस हस्व प्रणवका जप
अत्यन्त आवश्यक है॥ ११-१५॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-ये पाँच
भूत तथा शब्द, स्पर्श आदि इनके पाँच विषय-ये सब
मिलकर दस वस्तुएँ मनुष्योंकी कामनाके विषय हैं।
इनकी आशा मनमें लेकर जो कर्मोके अनुष्ठानमें संलग्न
होते हैं, वे दस प्रकारके पुरुष प्रवृत्त अथवा प्रवृत्तिमार्गी
कहलाते हैं तथा जो निष्कामभावसे शास्त्रविहित कर्मोंका
अनुष्ठान करते हैं, वे निवृत्त अथवा निवृत्तिमार्गी कहे
गये हैं । प्रवृत्त पुरुषोंको हस्व प्रणवका ही जप करना
चाहिये और निवृत्त पुरुषोंको दीर्घ प्रणवका । व्याहतियों
तथा अन्य मनत्रोंके आदिमें इच्छानुसार शब्द और कलासे
युक्त प्रणवका उच्चारण करना चाहिये । वेदके आदिमें
और दोनों संध्याओंकी उपासनाके समय भी ओंकारका
उच्चारण करना चाहिये ॥ १६-१७१/२॥
प्रणवका नौ करोड़ जप करनेसे मनुष्य शुद्ध हो
जाता है । पुन: नौ करोड़का जप करनेसे वह पृथ्वीतत्त्वपर
विजय पा लेता है। तत्पश्चात् पुनः नौ करोडका जप
करके वह जल-तत्त्वको जीत लेता है । पुन: नौ करोड़
जपसे वह अग्नितत्त्वपर विजय पाता है । तदनन्तर फिर
नौ करोड्का जप करके वह वायु-तत्त्वपर विजयी होता
है और फिर नौ करोड़के जपसे आकाशको अपने अधिकारमें
कर लेता है। इसी प्रकार नौ-नौ करोड़का जप करके
वह क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दपर विजय
पाता है, इसके बाद फिर नौ करोडका जप करके अहंकारको
भी जीत लेता है॥ १८-२१॥
हे द्विजो! मनुष्य एक हजार मन्त्रोंके जप
करनेसे नित्य शुद्ध होता है, इसके अनन्तर अपनी
सिद्धिके लिये जप किया जाता है॥२२॥
१२४
एवमष्टोत्तशतकोटिजप्तेन वै पुनः।
प्रणवेन प्रबुद्धस्तु शुद्धयोगमवाप्नुयात्॥ २३
शुद्धयोगेन संयुक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः।
सदा जपन्सदा ध्यायञ्छिवं प्रणवरूपिणम् २४
समाधिस्थो महायोगी शिव एव न संशयः।
ऋषिच्छन्दो देवतादि न्यस्य देहे पुनर्जपेत्॥ २५
प्रणवं मातृकायुक्तं देहे न्यस्य ऋषिर्भवेत्
दशमातृषडध्वादि सर्व न्यासफलं लभेत्॥ २६
प्रवृत्तानां च मिश्राणां स्थूलप्रणवमिष्यते।
श्रीशिवमहापुराण
[अ० To III
इस तरह एक सौ आठ करोड़
करके उत्कृष्ट बोधको प्राप्त हुआ पुरुष शुद्ध
प्राप्त कर लेता है। शुद्ध योगसे युक्त होनेपर
जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। स
प्रणवका जप और प्रणवरूपी शिवका ध्यान करे.
करते समाधिमें स्थित हुआ महायोगी पुरुष साक्षात्
शिव ही है; इसमें संशय नहीं है। पहले अपने शरीर
प्रणवके ऋषि, छन्द और देवता आदिका न्यास करे
फिर जप आरम्भ करना चाहिये। अकारादि मातृकावर्ण
युक्त प्रणवका अपने अंगोंमें न्यास करके मनुष्य ऋषि
हो जाता है । मन्त्रोंके दशविध* संस्कार, मातृकान्याप
तथा षडध्वशोधन' आदिके साथ सम्पूर्ण न्यासका फल
उसे प्राप्त हो जाता है । प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति-निवृत्तिसे
मिश्रित भाववाले पुरुषोंके लिये स्थूल प्रणवका जप
ही अभीष्टका साधक होता है॥ २३-२६१/२॥
* मन्त्रोंके दस संस्कार ये हैं-जनन, दीपन, बोधन,
आप्यायन। इनकी विधि इस प्रकार है-
ताडून, अभिषेचन, विमलीकरण, जीवन, तर्पण, गोपन और
भोजपत्रपर गोरोचन, कुंकुम, चन्दनादिसे आत्माभिमुख त्रिकोण लिखे, फिर तीनों कोणोंमें छ:-छ: समान रेखाएं
खींचे। ऐसा करनेपर ४९ त्रिकोण कोष्ठ बनेंगे। उनमें ईशानकोणसे मातृकावर्ण लिखकर देवताका आवाहन-पूजन करके
मन्त्रका एक-एक वर्ण उच्चारण करके अलग पत्रपर लिखे। ऐसा करनेपर 'जनन' नामका प्रथम संस्कार होगा।
हंसमन्त्रका सम्पुट करनेसे एक हजार जपद्वारा मन्त्रका दूसरा 'दीपन' संस्कार होता है। यथा-हंसः रामाय नमः
सोऽहम्।
हुँ-बीज-सम्मुटित मन्त्रका पाँच हजार जप करनेसे “बोधन' नामक तीसरा संस्कार होता है। यथा-हुँ रामाय
नमः हूँ।
'फट्-सम्पुटित मन्त्रका एक हजार जप करनेसे *ताडन' नामक चतुर्थ संस्कार होता है। यथा--फट् रामा
नमः फट् |
भूर्जपत्रपर मन्त्र लिखकर 'रों हंसः ओं' इस मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करे और उस अभिमन्त्रित जलसे
अश्वत्थपत्रादिद्वारा मन्त्रका अभिषेक करे। ऐसा करनेपर ' अभिषेक' नामक पाँचवाँ संस्कार होता है ।
“ओं त्रों वषट्' इन वर्णोंसे सम्पुटित मन्त्रका एक हजार जप करनेसे 'विमलीकरण' नामक छठा संस्कार हो
है यथा-ओं त्रों वषट् रामाय नम: वषट् त्रों ओं।
स्वधा-वषट्-सम्पुटित मूलमन्त्रका एक हजार जप करनेसे 'जीवन' नामक सातवाँ संस्कार होता है। यथा-स
'वषटू रामाय नम: वषट् स्वधा।
दुग्ध, जल एवं घृतके द्वारा मूलमन्त्रसे सौ बार तर्पण करना ही 'तर्पण' संस्कार है।
हीं-बीज-सम्पुटित एक हजार जप करनेसे 'गोपन'
नामक नवम संस्कार होता है। यथा-हीं रामाय नमः ह
हा-बीज-सम्मुटित एक हजार जप करनेसे “आप्यायन नामक दसवाँ संस्कार होता है। यथा-हाँ र
नम: हौं।
इस प्रकार संस्कृत किया हुआ मन्त्र शीघ्र सिद्धिप्रद होता है। व्ह
१. षडध्व-शोधनका कार्य होत्री दीक्षाके अन्तर्गत है । उसमें पहले कुण्डमें या वेदीपर अग्निस्थापन होता हैं।
षडध्वाका शोधन करके होमसे ही दीक्षा सम्पन्न होती है। विस्तार-भयसे अधिक विवरण नहीं दिया जा रहा हैं।
अ० १७]
क्रियातपोजपेर्युक्तास्त्रिविधा: शिवयोगिनः ॥ २७
धनादिविभवैश्चैव कराच्ड्डैन॑मादिभि:।
क्रियया पूजया युक्त: क्रियायोगीति कथ्यते॥ २८
पूजायुक्तश्च मितभुग्बाह्नोन्द्रियजयान्वित: ।
परद्रोहादिरहितस्तपोयोगीति कथ्यते॥ २९
एतैर्युक्तः सदा शुद्धः सर्वकामादिवर्जित:।
सदा जपपरः शान्तो जपयोगीति तं विदुः॥ ३०
उपचारैः षोडशभिः पूजया शिवयोगिनाम्।
सालोक्यादिक्रमेणैव शुद्धो मुक्तिं लभेन्नरः॥ ३१
जपयोगमथो वक्ष्ये गदतः शृणुत द्विजाः।
तपःकतुर्जपः प्रोक्तो यज्पन्परिमार्जते॥ ३२
शिवनाम नमःपूर्वं चतुर्थ्यां पद्जतत्त्तकम्।
स्थूलप्रणवरूपं हि शिवपञ्जाक्षरं द्विजा:॥ ३३
पञ्चाक्षरजपेनैव सर्वसिद्धिं लभेन्तरः।
प्रणवेनादिसंयुक्तं सदा पञ्चाक्षरं जपेत्॥
गुरूपदेशं सङ्गम्य सुखवासे सुभूतले
पूर्वपक्षे समारभ्य कृष्णभूतावधि द्विजाः॥ ३५
माघं भाद्रं विशिष्टं तु सर्वकालोत्तमोत्तमम्।
विद्येश्वरसंहिता
१२५
क्रिया, तप और जपके योगसे शिवयोगी तीन
प्रकारके होते हैं--[वे क्रमश: क्रियायोगी, तपोयोगी
और जपयोगी कहलाते हैं।] जो धन आदि वैभवोंसे
पूजा-सामग्रीका संचय करके हाथ आदि अंगोंसे
नमस्कारादि क्रिया करते हुए इष्टदेवकी पूजामें लगा
रहता है, वह 'क्रियायोगी' कहलाता है। पूजामें
संलग्न रहकर जो परिमित भोजन करता हुआ बाह्य
इन्द्रियोंको जीतकर वशमें किये रहता है और मनको
भी वशमें करके परद्रोह आदिसे दूर रहता हैं, वह
“तपोयोगी' कहलाता है। इन सभी सद्गुणोंसे युक्त
होकर जो सदा शुद्धभावसे रहता तथा समस्त काम
आदि दोषोंसे रहित हो शान्तचित्तसे निरन्तर जप
किया करता है, उसे महात्मा पुरुष “जपयोगी' मानते
हैं। जो मनुष्य सोलह प्रकारके उपचारोंसे शिवयोगी
महात्माओंकी पूजा करता है, वह शुद्ध होकर
सालोक्य आदिके क्रमसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट मुक्तिको
प्राप्त कर लेता है॥ २७-३१॥
हे द्विजो! अब मैं जपयोगका वर्णन करता हूँ,
आप सब लोग ध्यान देकर सुनें । तपस्या करनेवालेके
लिये जपका उपदेश किया गया है; क्योंकि वह जप
'करते-करते अपने आपको सर्वथा शुद्ध (निष्पाप) कर
लेता है। हे ब्राह्मणो! पहले “नमः' पद हो, उसके
बाद चतुर्थी विभक्तिमें “शिव' शब्द हो, तो पंचतत्त्वात्मक
“नमः शिवाय' मन्त्र होता है। इसे “शिव-पंचाक्षर'
कहते हैं। यह स्थूल प्रणवरूप है। इस पंचाक्षरके
जपसे ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता
है। पंचाक्षरमन्त्रके आदिमें ओंकार लगाकर ही सदा
उसका जप करना चाहिये। हे द्विजो! गुरुके मुखसे
पंचाक्षरमन्त्रका उपदेश पाकर जहाँ सुखपूर्वक निवास
किया जा सके, ऐसी उत्तम भूमिपर महीनेके पूर्वपक्ष
(शुक्ल)-में प्रतिपदासे आरम्भ करके कृष्णपक्षको
चतुर्दशीतक निरन्तर जप करता रहे। माघ और
भादोंके महीने अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं।
यह समय सब समयोंसे उत्तमोत्तम माना गया
है॥ ३२-३५४/२॥
१२६
एकवारं मिताशी तु वाग्यतो नियतेन्द्रिय:॥ ३६
स्वस्य राजपितृणां च नित्यं शुश्रूषणं चरेत्
सहस्त्रजपमात्रेण भवेच्छुद्धोऽन्यथा ऋणी॥ ३७
पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षं जपेच्छिवमनुस्मरन्।
पद्मासनस्थं शिवदं गङ्गाचन्द्रकलान्वितम्॥ ३८
वामोरुस्थितशक्त्या च विराजन्तं महागणैः।
मृगटङ्कधरं देवं वरदाभयपाणिकम्॥ ३९
सदानुग्रहकर्तारं सदाशिवमनुस्मरन्।
सम्पूज्य मनसा पूर्व हृदि वा सूर्यमण्डले॥ ४०
जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां प्राङ्मुखः शुद्धकर्मकृत्।
प्रातः कृष्णचतुर्दश्यां नित्यकर्म समाप्य च॥ ४१
मनोरमे शुचौ देशे नियतः शुद्धमानसः।
पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य सहस्त्रं द्वादशं जपेत्॥ ४२
वरयेच्च सपल्लीकान् शेवान्वे ब्राह्मणोत्तमान्।
एकं गुरुवरं शिष्टं वरयेत्साम्बमूर्तिकम्॥ ४३
ईशानं चाथ पुरुषमघोरं वाममेव च।
सद्योजातं च पञ्चैव शिवभक्तान्द्रजोत्तमान्॥ ४४
पूजाद्रव्याणि सम्पाद्य शिवपूजां समारभेत्।
शिवपूजां च विधिवत्कृत्वा होमं समारभेत्॥ ४५
मुखान्तं च स्वसूत्रेण कृत्वा होमं समाचरेत्।
दशैकं वा शतैकं वा सहस्रैकमथापि वा॥ ४६
श्रीशिवमरहापुराण
[अ ना आका ` `
साधकको चाहिये कि वह प्रतिदिन एक
परिमित भोजन करे, मौन रहे, इन्द्रियोंको वशमें य
अपने स्वामी एवं माता-पिताकी नित्य सेवा करे। क
नियमसे रहकर जप करनेवाला पुरुष एक
जपसे ही शुद्ध हो जाता है, अन्यथा वह ऋणी होत
है। भगवान् शिवका निरन्तर चिन्तन करते हुए पंचाक्ष.
मन्त्रका पाँच लाख जप करे। [जपकालमें इस प्रका
ध्यान करे] कल्याणदाता भगवान् शिव कमलके
आसनपर विराजमान हैं, उनका मस्तक श्रीगंगाज॑
तथा चन्द्रमाकी कलासे सुशोभित है, उनकी बाय
जाँघपर आदिशक्ति भगवती उमा बैठी हैं, वहाँ खडे
हुए बड़े-बड़े गण भगवान् शिवकी शोभा बढ़ा रहे हैं.
महादेवजी अपने चार हाथोंमें मृगमुद्रा, टंक तथा क
एवं अभयकी मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। इस प्रका
सदा सबपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् सदाशिवका
बार-बार स्मरण करते हुए हृदय अथवा सूर्यमण्डलमं
पहले उनकी मानसिक पूजा करके फिर पूर्वाभिमुख
हो पूर्वोक्त पंचाक्षरी विद्याका जप करे। उन दिनो
साधक सदा शुद्ध कर्म ही करे। जपकी समाणिके
दिन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको प्रातःकाल नित्यकर्म
सम्पन्न करके शुद्ध एवं सुन्दर स्थानमें [शौच
संतोषादि] नियमोंसे युक्त होकर शुद्ध हृदयसे पंचाक्षर
मन्त्रका बारह हजार जप करे॥ ३६-४२॥
तत्पश्चात् सपत्नीक पाँच ब्राह्मणोंका, जो श्रेष्ट
एवं शिवभक्त हों, वरण करे। इनके अतिरिक्त एर
श्रेष्ठ आचार्यका भी वरण करे और उसे साम्बसदाशिवकी
स्वरूप समझे। ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तरी
सद्योजात-इन पाँचोकेप्रतीकस्वरूप श्रेष्ठ और शिवर्भर
ब्राह्मणोंका वरण करनेके पश्चात् पूजन- सामग्री
एकत्र करके भगवान् शिवका पूजन आरम्भ क॑!
विधिपूर्वक शिवकी पूजा सम्पन्न करके होम आरए
करे। अपने गृह्यसूत्रे अनुसार मुखान्त कर्म
[अर्थात् परिसमूहन, उपलेपन, उल्लेखन, मृदू-उद्धर
और अभ्युक्षण-इन पंच भू-संस्कारोंके पश्चात्
स्वाभिमुख अग्निको स्थापित करके कुशकण्डिवी
करनेके अनन्तर प्रज्वलित अग्निमें
आहुति देकर] पश्चात् होमका कार्य आरम्भ की
अ० १७]
विद्येश्वरसंहिता
१२७
कापिलेन घृतेनैव जुहुयात्स्वयमेव हि।
कारयेच्छिवभक्तेर्वाष्यष्टोत्तशतं बुध:॥ ४७
होमान्ते दक्षिणा देया गुरोगोंमिथुनं तथा।
ईशानादिस्वरूपांस्तान्गुरुं साम्बं विभाव्य च॥ ४८
तेषां पत्सिक्ततोयेन स्वशिरः स्नानमाचरेत्।
घट्त्रिंशत्कोटितीर्थेषु सद्यः स्नानफलं लभेत्॥ ४९
दशाङ्कमन्नं तेषां वै दद्याद्वै भक्तिपूर्वकम्।
पराबुद्ध्या गुरोः पत्लीमीशानादिक्रमेण तु॥ ५०
परमाऱ्नेन सम्पूज्य यथाविभवविस्तरम्।
रद्राक्षवस्त्रपूर्व च बटकापूपकेर्युतम्॥ ५१
बलिदानं ततः कृत्वा भूरि भोजनमाचरेत्।
ततः सम्प्रार्थ्य देवेशं जपं तावत्समापयेत्॥ ५२
पुरश्चरणमेवं तु कृत्वा मन्त्री भवेन्नरः।
पुनश्च पञ्जलक्षेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥ ५३
अतलादि समारभ्य सत्यलोकावधि क्रमात्।
पञ्जलक्षजपात्तत्तल्लोकै श्वर्यमवाप्नुयात् ॥ ५४
मध्ये मृतश्चेद्धोगान्ते भूमौ तज्जापको भवेत्।
पुनश्च पञ्जलक्षेण ब्रह्मसामीप्यमाप्नुयात्॥
पुनश्च पञ्जलक्षेण सारूप्येश्वर्यमाप्नुयात्।
आहत्य शतलक्षेण साक्षाद् ब्रह्मसमो भ्वेत्॥ ५६
कार्यब्रह्मण एवं हि सायुज्यं प्रतिपद्य वै।
यथेष्टं भोगमाप्नोति तद् ब्रह्म प्रलयावधि॥ ५७
कपिला गायके घीसे ग्यारह, एक सौ एक अथवा
एक हजार एक आहुतियाँ स्वयं ही दे अथवा विद्वान्
पुरुष शिवभक्त ब्राह्मणोंसे एक सौ आठ आहुतियाँ
दिलाये॥ ४३--४७॥
'होमकर्म समाप्त होनेपर गुरुको दक्षिणाके
रूपमें एक गाय और बैल देने चाहिये। ईशान आदिके
प्रतीकरूप जिन पाँच ब्राह्मणोंका वरण किया गया हो,
उनको ईशान आदिका ही स्वरूप समझे तथा आचार्यको
साम्बसदाशिवका स्वरूप माने। इसी भावनाके साथ
उन सबके चरण धोये और उनके चरणोदकसे अपने
मस्तकको सींचे। ऐसा करनेसे वह साधक छत्तीस करोड़
तीर्थोँमें स्नान करनेका फल तत्काल प्राप्त कर लेता
है। उन ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक दशांग अन्न देना चाहिये।
गुरुपत्नीको पराशक्ति मानकर उनका भी पूजन करे।
ईशानादिःक्रमसे उन सभी ब्राह्मणोंका उत्तम अन्नसे
पूजन करके अपने वैभव-विस्तारके अनुसार रुद्राक्ष,
वस्त्र, बडा और पूआ आदि अर्पित करे। तदनन्तर
दिकपालादिको बलि देकर ब्राह्मणोंको भरपूर भोजन
कराये। इसके बाद देवेश्वर शिवसे प्रार्थना करके
अपना जप समाप्त करे। इस प्रकार पुरश्चरण करके
मनुष्य उस मन्त्रको सिद्ध कर लेता है। फिर पाँच लाख
जप करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है।
तदनन्तर पुनः पाँच लाख जप करनेपर मनुष्य अतलसे
लेकर सत्यलोकतकके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त कर
लेता है॥ ४८--५४॥
यदि अनुष्ठान पूर्ण होनेके पहले बीचमें ही
साधककी मृत्यु हो जाय तो वह परलोकमें उत्तम भोग
भोगनेके पश्चात् पुनः पृथ्वीपर जन्म लेकर पंचाक्षरः
मन्त्रके जपका अनुष्ठान करता है । [समस्त लोकोंका
ऐश्वर्य पानेके पश्चात् मन्त्रको सिद्ध करनेवाला] वह
पुरुष यदि पुनः पाँच लाख जप करे तो उसे
ब्रह्माजीका सामीप्य प्राप्त होता है। पुन: पाँच लाख
जप करनेसे उसे सारूप्य नामक ऐश्वर्य प्राप्त होता
है। सौ लाख जप करनेसे वह साक्षात् ब्रह्माके समान
हो जाता है। इस तरह कार्य-ब्रह्म (हिरण्यगर्भ)-का
१२८
पुनश्च तपसा दीप्तः क्रमान्मुक्तो भविष्यति॥ ५८
पृथ्व्यादिकार्यभूतेभ्यो लोका वै निर्मिताः क्रमात्।
पातालादि च सत्यान्तं ब्रह्मलोकाश्रतुर्दश॥ ५९
सत्यादूर्ध्वं क्षमान्तं वै विष्णुलोकाश्चतुर्दश।
क्षमालोके कार्यविष्णुवैकुण्ठे वरपत्तने॥ ६०
कार्यलक्ष्म्या महाभोगी रक्षां कृत्वाधितिष्ठति।
तदूर्ध्वगाश्च शुच्यन्ता लोकाष्टाविंशतिः स्थिताः ॥ ६१
शुचौ लोके तु कैलासे रुद्रो वे भूतहृत्स्थितः
षडुत्तराश्च पञ्चाशदहिंसान्तास्तदुर्ध्वगाः॥ ६२
अहिंसालोकमास्थाय ज्ञानकैलासके पुरे।
कार्येश्वरस्तिरोभावं सर्वान्कृत्वाधितिष्ठति॥ ६३
तदन्ते कालचक्रं हि कालातीतस्ततः परम्।
शिवेनाधिष्ठितस्तत्र कालश्षक्रेश्वराह्ृयः॥ ६४
माहिषं धर्ममास्थाय सर्वान्कालेन युञ्जति।
असत्यश्चाशुचिश्चैव हिंसा चैवाथ निर्घृणा॥ ६५
असत्यादिचतुष्पादः सर्वांशः कामरूपधृक् ।
जास्तिक्यलक्षमीर्दुःसङ्गो वेदबाह्यध्वनिः सदा॥ ६६
क्रोधसङ्गः कृष्णवणों महामहिषवेषवान्।
तावान्महेश्वरः प्रोक्तस्तिरोधास्तावदेव हि॥ ६७
तदर्वाक्कर्मभोगो हि तदूर्ध्वं ज्ञानभोगकम्।
तदर्वाक्कर्ममाया हि ज्ञानमाया तदूर्ध्वकम्॥ ६८
मा लक्ष्मी: कर्मभोगो वै याति मायेति कथ्यते।
मा लक्ष्मीज्ञानभोगो वै याति मायेति कथ्यते ॥ ६९
श्रीशिवमहापुराण [
= त आका ` अ
पुनः कल्पान्तरे वृत्ते ब्रह्मपुत्रः स॒ जायते । सायुज्य प्राप्त करके वह उस ब्रह्माका प्रलय
उस लोकमें यथेष्ट भोग भोगता है। प
कल्पका आरम्भ होनेपर वह ब्रह्माजीका पुत्र होता है
उस समय फिर तपस्या करके दिव्य तेजसे प्रकाश ।
होकर वह क्रमश: मुक्त हो जाता है॥५५--५८ |
पृथ्वी आदि कार्यस्वरूप भूतोंद्वारा
लेकर सत्यलोकपर्यन्त ब्रह्माजीके चौदह लोक क्रमश.
निर्मित हुए हैं। सत्यलोकसे ऊपर क्षमालोकतक जे
चौदह भुवन हैं, वे भगवान् विष्णुके लोक हैं। उ
क्षमालोक वाले श्रेष्ठ वैकुण्ठमें महाभोगी
कार्यलक्ष्मीसहित सबकी रक्षा करते हुए विराजमा
रहते हैं। क्षमालोकसे ऊपर शुचिलोकपर्यन्त अदर
भुवन स्थित हैं। शुचिलोकके अन्तर्गत कैलासपं
प्राणियोंका संहार करनेवाले रुद्रदेव विराजमान हैं|
शुचिलोकसे ऊपर अहिंसालोकपर्यन्त छप्पन भुवनोंकी
स्थिति है। अहिंसालोकका आश्रय लेकर जो ज्ञान
कैलास नामक नगर शोभा पाता है, उसमें कार्यभूत
महेश्वर सबको अदृश्य करके रहते हैं। अहिंसालोकके
अन्तमें कालचक्रकी स्थिति है। तदनन्तर कालातीत
स्थित है; जहाँ कालचक्रेश्वर नामक शिव माहि
धर्मका आश्रय लेकर सबको कालसे संयुक्त किये
रहते हैं ॥ ५९-६४१/२॥
असत्य, अशुचि, हिंसा, निर्दयता-ये असत
आदि चार पाद कामरूप धारण करनेवाले शिवके
अंश हैं। नास्तिकतायुक्त लक्ष्मी, दुःसंग, वेदबा
शब्द, क्रोधका संग, कृष्ण वर्णये महामहिं
रूपवाले हैं। यहाँतक महेश्वरके विराट्: स्वरूपर्ी
वर्णन किया गया। वहींतक लोकोंका तिरोधान अर्ब
लय होता है। उससे नीचे कर्मोका भोग है और उसे
ऊपर ज्ञानका भोग, उसके नीचे कर्ममाया है औँ
उसके ऊपर ज्ञानमाया॥ ६५--६८॥
[अब मैं कर्ममाया और ज्ञानमायाका ता
बता रहा हूँ--] “मा” का अर्थ है लक्ष्मी;
कर्मभोग यात-प्राप्त होता है, इसलिये वह म
अथवा कर्ममाया कहलाती है। इसी तरह मा अर्थ
लक्ष्मीसे ज्ञानभोग यात अर्थात् प्राप्त होता है, इसलिग
अ० १७]
विद्येश्वरसंहिता
१२९
तदूर्ध्वं नित्यभोगो हि तदर्वाडर नश्वरं विहुः।
तदर्वाक्च तिरोधानं तदूर्ध्वं न तिरोधनम्॥ ७०
तदर्वाक् पाशबन्थो हि तदूर्ध्वं नहि बन्धनम्।
तदर्वाक् परिवर्तन्ते काम्यकर्मानुसारिणः ॥ ७१
निष्कामकर्मभोगस्तु तदूर्ध्वं परिकीर्तितः।
तदर्वाक् परिवर्तन्ते बिन्दुपूजापरायणाः॥ ७२
तदूर्ध्वं हि व्रजन्त्येव निष्कामा लिङ्गपूजकाः।
तदर्वाकू परिवर्तन्ते शिवान्यसुरपूजकाः ॥ ७३
शिवैकनिरता ये च तदूर्ध्व सम्प्रयान्ति ते।
तदर्वाग्जीवकोटिः स्यात्तदूर्ध्वं परकोटिकाः ॥ ७४
सांसारिकास्तदर्वाक् च मुक्ताः खलु तदूर्ध्वगा: ।
तदर्वाकू परिवर्तन्ते प्राकृतद्रव्यपूजकाः॥ ७५
तदूर्ध्वं हि ब्रजन्त्येते पौरुषद्रव्यपूजकाः।
तदर्वाक्छक्तिलिङ्गं तु शिवलिङ्गं तदूर्ध्वकम्॥
तदर्वागावृतं लिङ्गं तदूर्ध्वं हि निराकृति।
तदर्वाक्कल्पितं लिङ्गं तदूर्ध्वं बै न कल्पितम्॥ ७७
तदर्वागबाह्णलिङ्गं स्यादन्तरङ्गं तदू््वकम्।
तदर्वाक्छक्तिलोका हि शतं वै द्वादशाधिकम्॥ ७८
तदर्वाग्बिन्दुरूपं हि नादरूपं तदुत्तरम्।
तदर्वाक्कर्मलोकस्तु तदूर्ध्वं ज्ञानलोककः ॥ ७९
जमस्कारस्तदूर्ध्वं हि मदाहङ्कारनाशतः।
जनं तस्मात् तिरोधानं प्रत्यायाति न ना यतः ॥ ८०
ज्ञानशब्दार्थ एवं हि तिरोधाननिवारणात्।
तदर्वाक् परिवर्तन्ते ह्याधिभौतिकपूजकाः॥ ८९
आध्यात्मिकार्चका एव तदूर्ध्व सम्प्रयान्त वै।
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_6_l_Front
उसे माया या ज्ञानमाया कहा गया है। उपर्युक्त सीमासे
नीचे नश्वर भोग हैं और ऊपर नित्य भोग। उससे
नीचे ही तिरोधान अथवा लय है, ऊपर तिरोधान नहीं
है। वहाँसे नीचे ही कर्ममय पाशोंद्वारा बन्धन होता है।
ऊपर बन्धनका सदा अभाव है। उससे नीचे ही जीव
सकाम कर्मोंका अनुसरण करते हुए विभिन्न लोकों
और योनियोंमें चक्कर काटते हैं। उससे ऊपरके
लोकोंमें निष्क्राम कर्मका ही भोग बताया गया
है॥ ६९-७११/२॥
बिन्दुपूजामें तत्पर रहनेवाले उपासक वहाँसे
नीचेके लोकोंमें ही घूमते हैं। उसके ऊपर तो
निष्कामभावसे शिवलिंगकी पूजा करनेवाले उपासक
ही जाते हैं। उसके नीचे शिवके अतिरिक्त अन्य
देवताओंकी पूजा करनेवाले घूमते रहते हैं। जो
एकमात्र शिवकी ही उपासनामें तत्पर हैं, वे उससे
ऊपरके लोकोंमें जाते हैं। वहाँसे नीचे जीवकोटि है
और ऊपर ईश्वरकोटि॥ ७२-७४॥
नीचे संसारी जीव रहते हैं और ऊपर मुक्त लोग।
प्राकृत द्रव्योंसे पूजा करनेवाले उसके नीचे रहते हैं और
पौरुष द्रव्योंसे पूजा करने वाले उससे ऊपर जाते हैं।
उसके नीचे शक्तिलिंग है और उसके ऊपर शिवलिंग।
उसके नीचे सगुण लिंग है और उसके ऊपर निर्गुण
'लिंग। उसके नीचे कल्पित लिंग है और उसके ऊपर
कल्पित नहीं है। उसके नीचे आधिभौतिक लिंग और
उसके ऊपर आध्यात्मिक लिंग है । उसके नीचे एक सौ
बारह शक्ति-लोक हैं । उसके नीचे बिन्दुरूप और उसके
ऊपर नादरूप है । उसके नीचे कर्मलोक है और उसके
ऊपर ज्ञानलोक ॥ ७५--७९॥
इसी प्रकार उसके ऊपर मद और अहंकारका
नाश करनेवाली नम्रता है, वहाँ जन्मजनित तिरोधान
नहीं है। उसका निवारण किये बिना वहाँ किसीका
प्रवेश सम्भव नहीं है । इस प्रकार तिरोधानका निवारण
करनेसे वहाँ ज्ञानशब्दका अर्थ ही प्रकाशित होता है।
आधिभौतिक पूजा करनेवाले लोग उससे नीचेके
लोकोंमें ही चक्कर काटते हैं। जो आध्यात्मिक
उपासना करनेवाले हैं, वे ही उससे ऊपरको जाते हैं।
१३०
श्रीशिवमहापुराण
श्र
[अ १७
तावद्वै वेदिभागं तन्महालोकात्मलिड्ठके ॥ ८२
प्रकृत्याद्यष्टबन्धोऽपि वेद्यते सम्प्रतिष्ठित: ।
एवमेतादृशं ज्ञेयं सर्वं लौकिकवैदिकम्॥ ८३
अधर्ममहिषारूढं कालचक्रं तरन्ति ते।
सत्यादिधर्मयुक्ता ये शिवपूजापराश्च ये॥ ८४
तदूर्ध्वं वृषभो धर्मो ब्रह्माचर्यस्वरूपधृक् ।
सत्यादिपादयुक्तस्तु शिवलोकाग्रतः स्थित: ॥ ८५
क्षमाश्रङ्गः शमश्रोत्रो वेदध्वनिविभूषितः।
आस्तिक्यचक्षुर्निश्वासगुरुबुद्धिमना वृषः॥ ८६
क्रियादिवृषभा ज्ञेयाः कारणादिषु सर्वदा।
तं क्रियावृषभं धर्म कालातीतोऽधितिष्ठति॥ ८७
ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्वस्वायुर्दिनमुच्यते।
तदूर्ध्वं न दिनं रात्रिर्न जन्ममरणादिकम्॥ ८८
पुनः कारणसत्यान्ताः कारणब्रह्मणस्तथा।
गन्धादिभ्यस्तु भूतेभ्यस्तदूर्ध्वं निर्मिताः सदा॥ ८९
सूक्ष्मगन्धस्वरूपा हि स्थिता लोकाश्चतुर्दश।
पुनः कारणविष्णोवै स्थिता लोकाश्चतुर्दश ॥ ९०
पुनः कारणरुद्रस्य लोकाष्टाविंशका मता: ।
पुनश्च कारणेशस्य षट्पञ्चाशत्तदूर्ध्वगाः ॥ ९१
ततः परं ब्रह्मचर्यलोकाख्यं शिवसम्मतम्।
तत्रैव ज्ञानकैलासे पञ्चावरणसंयुते॥ ९२
प्रञश्रमण्डलसंयुक्तं पञ्चब्रह्मकलान्वितम्।
आदिशक्तिसमायुक्तमादिलिङ्गं तु तत्र वै॥ ९३
शिवालयमिदं प्रोक्तं शिवस्य परमात्मनः।
परशक्त्या समायुक्तस्तत्रैव परमेश्वर: ॥ ९४
सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः।
पञ्चकृत्यप्रवीणोऽसौ सच्चिदानन्दविग्रहः॥॥ ९५
इस प्रकार वहाँतक महालोकरूपी आत्मलिंग
विभागको जानना चाहिये और प्रकृति आदि (
महत्, अहंकार, पंच तन्मात्राएँ) आठ बन्धोंको भै
जाने। इस प्रकार सब लौकिक तथा वैदिक स्वरूपे
जानना चाहिये॥ ८०-८३॥
जो सत्य-अहिंसा आदि धर्मोसे युक्त होकर भगवा
शिवके पूजनमें तत्पर रहते हैं, वे अधर्मरूप भैंसेपर आए
कालचक्रको पार कर जाते हैं। कालचक्रेश्वरकी सीमातक
जो विराट् महेश्वरलोक बताया गया है, उससे ऊप
वृषभके आकारमें धर्मको स्थिति है। वह ब्रह्मचर्यका
मूर्तिमान् रूप हैं उसके सत्य, शौच, अहिंसा और दया--
ये चार पाद हैं | वह शिवलोकके आगे स्थित है। क्षम
उसके सींग हैं, शम कान हैं, वे वेदध्वनिरूपी शब्दे
विभूषित हैं । आस्तिकता उसके दोनों नेत्र हैं, नि:श्वास
ही उसकी श्रेष्ठ बुद्धि एवं मन है । क्रिया आदि धर्मरूपी
जो वृषभ हैं, वे कारण आदिमें सर्वदा स्थित हैं-एऐसा
जानना चाहिये । उस क्रियारूप वृषभाकार धर्मपर कालातीत
शिव आरूढ़ होते हैं ॥ ८४--८७॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी जो अपनी-अपनी
आयु है, उसीको दिन कहते हैं । जहाँ धर्मरूपी वृषभकी
स्थिति है, उससे ऊपर न दिन है, न रात्रि और वहाँ
जन्म-मरण आदि भी नहीं है । फिर कारणस्वरूप ब्रह्माके
भी कारण सत्यलोकपर्यन्त चौदह लोक स्थित हैं, जो
पांचभौतिक गन्ध आदिसे परे हैं । उनकी सनातन स्थिति
है। सूक्ष्म गन्ध ही उनका स्वरूप है ॥ ८८-८९ /२॥
इसके ऊपर कारणरूप विष्णुके चौदह लोक
स्थित हैं। उनसे भी ऊपर फिर कारणरूपी र्क
अट्ठाईस लोकोंकी स्थिति मानी गयी है। फिर उतम
भी ऊपर कारणेश शिवके छप्पन लोक विद्यमान हँ ।
तदनन्तर शिवसम्मत ब्रह्मचर्यलोक है और वहीँ प
आवरणोंसे युक्त ज्ञानमय कैलास है; वहाँपर ही.
मण्डलों, पाँच ब्रह्मकलाओं और आदिशक्तिसे संग"
आदिलिंग प्रतिष्ठित है। उसे परमात्मा शिवका शिवार
कहा गया है। वहीं पराशक्तिसे युक्त परमेश्वर शि
निवास करते हैं। वे सृष्टि, पालन, संहार, तिरो
और अनुग्रह-इन पाँचों कृत्योंमें प्रवीण हैं।
श्रीविग्रह सच्चिदानन्दस्वरूप है ॥ ९०--९५॥
2223 Shiymahapuranam_Part [_.8०७०१-6-- |
न १७]
विद्येश्वरसंहिता
१३१
ध्यानधर्मः सदा यस्य सदानुग्रहतत्पर:।
समाध्यासनमासीन: स्वात्मारामो विराजते॥ ९६
तस्य सन्दर्शनं साध्यं कर्मध्यानादिभि: क्रमात्।
नित्यादिकर्मयजनाच्छिवकर्ममतिर्भवेत् ॥ ९७
क्रियादिशिवकर्मभ्यः शिवज्ञानं प्रसाधयेत्।
तद्दर्शनगताः सर्वे मुक्ता एव न संशयः॥ ९८
मुक्तिरात्मस्वरूपेण स्वात्मारामत्वमेव हि।
क्रियातपोजपज्ञानध्यानधर्मेषु सुस्थित: ॥ ९९
शिवस्य दर्शनं लब्ध्वा स्वात्मारामत्वमेव हि।
यथा रविः स्वकिरणादशुद्भिमपनेष्यति॥ १ |
कृपाविचक्षण: शम्भुरज्ञानमपनेष्यति।
अज्ञानविनिवृत्तौ तु शिवज्ञानं प्रवर्तते ॥ १०१
शिवज्ञानात्स्वस्वरूपमात्मारामत्वमेष्यति ।
आत्मारामत्वसंसिद्धौं कृतकृत्यो भवेन्नरः॥ १०२
पुनश्च शतलक्षेण ब्रह्मणः पदमाप्नुवात्।
पुनश्च शतलक्षेण विष्णोः पदमवाण्नुयात्॥ १०३
पुनश्च शतलक्षेण रुद्रस्य पदमाप्नुयात्
पुनश्च शतलक्षेण ऐश्वर्य पदमाप्तुयात्॥ १०४
पुनश्चेवंविधेनेव जपेन सुसमाहितः।
शिवलोकादिभूतं हि कालचक्रमवाण्तुयात्॥ १०५
2223 Shivmahapuranam_Part J_Section_6_2.Front
वे सदा ध्यानरूपी धर्में ही स्थित रहते हैं और
सदा सबपर अनुग्रह किया करते हैं। वे स्वात्माराम
हैं और समाधिरूपी आसनपर आसीन हो सुशोभित
होते हैं। कर्म एवं ध्यान आदिका अनुष्ठान करनेसें
क्रमशः साधनपथमें आगे बढ़नेपर उनका दर्शन साध्य
होता है । नित्य-नैमित्तिक आदि कमाँद्वारा देवताओंका
यजन करनेसे भगवान् शिवके समाराधन-कर्ममें मन
लगता है। क्रिया आदि जो शिवसम्बन्धी कर्म हैं,
उनके द्वारा शिवज्ञान सिद्ध करे। जिन्होंने शिवतत्त्वका
साक्षात्कार कर लिया है अथवा जिनपर शिवकी
कृपादृष्टि पड़ चुकी है, वे सब मुक्त ही हैं; इसमें
संशय नहीं है॥ ९६-९८॥
आत्मस्वरूपसे जो स्थिति है, वही मुक्ति है।
एकमात्र अपने आत्मामें रमण या आनन्दका अनुभव
करना ही मुक्तिका स्वरूप है। जो पुरुष क्रिया, तप,
जप, ज्ञान और ध्यानरूपी धर्मोमें भलीभाँति स्थित है,
वह शिवका साक्षात्कार करके स्वात्मारामत्वस्वरूप
मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है। जैसे सूर्य अपनी
किरणोंसे अशुद्धिको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार कृपा
करनेमें कुशल भगवान् शिव अपने भक्तके अज्ञानको
मिटा देते हैं। अज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर शिवज्ञान
स्वत: प्रकट हो जाता है। शिवज्ञानसे अपना विशुद्ध
स्वरूप आत्मारामन्त प्राप्त होता है और आत्मारामत्वकी
सम्यक् सिद्धि हो जानेपर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता
है॥ ९९-१०२॥
(शिव मन्त्रका) सौ लाख जप करेसे ब्रह्मपदकी
प्राप्ति होती है और फिर सौ लाख जप करनेसे
विष्णुपद प्राप्त होता है॥ १०३॥
पुनः सौ लाख (शिवमन्त्रका) जप करनेसे
रुद्रका पद प्राप्त होता है। उसके बाद फिर सौ लाख
जप करनेपर ऐश्वर्यमय पदकी प्राप्ति हो जाती
है॥ १०४॥
फिर इसी प्रकार सम्यकू रूपसे जप करनेपर
शिवलोकके आदिभूत अर्थात् शिवलोकके आधारभूत
निर्माता कालचक्रको प्राप्त किया जा सकता है॥ १०५॥
श्३२
श्रीशिवमहापुराण
ह
[अ १
कालचक्रं पक्चचक्रमेकेकेन क्रमोत्तरे।
सृष्टिमोहो ब्रह्मचक्रं भोगमोहो तु वैष्णवम्॥ १०६
कोपमोहौ रोद्रचक्रं भ्रमणं चैश्वरं विदुः।
शिवचक्रं ज्ञानमोहौ पञ्चचक्रं विदुर्बुधाः ॥ १०७
पुनश्च दशकोट्या हि कारणब्रह्मणः पदम्।
पुनश्च दशकोट्या हि तत्पदैश्वर्यमाप्नुयात्॥ १०८
एवं क्रमेण विष्ण्वादेः पदं लब्ध्वा महौजसः ।
क्रमेण तत्पदेश्वर्य लब्ध्वा चैव महात्मनः ॥ १०९
शतकोटिमनुं जप्त्वा पञ्जोत्तरमतन्द्रितः।
शिवलोकमवाप्नोति पञ्जमावरणाद् बहिः॥ ११०
राजसं मण्डपं तत्र नन्दिसंस्थानमुत्तमम्।
तपोरूपश्च॒ वृषभस्तत्रैव परिदृश्यते॥ १११
सद्योजातस्य तत्स्थानं पञ्जमावरणं परम्।
वामदेवस्य च स्थानं चतुर्थावरणं पुनः॥ ११२
अघोरनिलयं पश्चात् तृतीयावरण परम्।
पुरुषस्यैव साम्बस्य द्वितीयावरणं शुभम्॥ ११३
ईशानस्य परस्यैव प्रथमावरणं ततः।
ध्यानधर्मस्य च स्थानं पञ्चमं मण्डपं ततः॥ ११४
बलिनाथस्य संस्थानं तत्र पूर्णामृतप्रदम्।
चतुर्थं मण्डपं पश्चाच्चन्द्रशेखरमूर्तिमत्॥ ११५
सोमस्कन्दस्य च स्थानं तृतीयं मण्डपं परम्
द्वितीयं मण्डपं नृत्यमण्डपं प्राहुरास्तिकाः ॥ ११६
प्रथमं मूलमायायाः स्थानं तत्रैव शोभनम्।
तत परं गर्भगृहं लिङ्गस्थानं परं शुभम्॥ ११७
यह कालचक्र पंचचक्रोंसे युक्त है, जो एके
पश्चात् एकमें स्थित हैं । सृष्टि और मोहसे युक्त मच
भोग तथा मोहसे युक्त वैष्णवचक्र, कोप एवं मोह
युक्त रौद्रचक्र, भ्रमणसे युक्त ईश्वरचक्र और ज्ञान ते
मोहसे युक्त शिवचक्र है। ऐसा इन पाँच चक्रोंके
बुद्धिमानोंका कहना है॥ १०६-१०७॥
पुनः दस करोड़ (शिवमन्त्रका) जप करे
कारणब्रह्मका पद प्राप्त होता है । तदनन्तर दस करेइ
जप करनेसे ऐश्वर्ययुक्त पदकी प्राप्ति होती है॥ १०८)
इस प्रकार क्रमशः जप करता हुआ प्राणी
ओजस्वी विष्णुके पदको प्राप्तकर पुन: उसी क्रमसे
जपता हुआ महात्माओंके उस ऐश्वर्यपदको प्रा
करता है॥ १०९॥
बिना असावधानी किये १०५ करोड़ मन्त्रोंका
जप करनेके पश्चात् वह प्राणी पाँच आवरणों (पशु
पाश, माया, शक्ति, रोध)-से बाहर स्थित शिवलोक
प्राप्त करता है॥ ११०॥
वहाँ (उस शिवलोकमें) राजसमण्डप है,
नन्दीश्वरका उत्तम निवास है। तपस्यारूपी वृषभ
वहींपर दिखायी देता है॥ १११॥
वहींपर पाँचों आवरणोंसे बाहर सद्योजात (अर्थात्
तत्काल आवरणरहित हुए भगवान् शिव)-का स्थानं
है। पुनः चतुर्थ आवरणमें वामदेवका स्थान है॥ ११२॥
उसके पश्चात् तृतीयावरणमें अघोर शिवक।
दूसरे आवरणमें साम्बशिवका मंगलमय त्थी
प्रथमावरणमें ईशान शिवका निवासस्थान है। उसके
पश्चात् पंचम मण्डप है, जहाँ ध्यान और
निवास रहता है॥ ११३-११४॥
तदनन्तर चतुर्थ मण्डप है, वहाँपर चन््रशेखरकी
मूर्तिसे युक्त भगवान् बलिनाथका वासस्थान है,
पूर्ण अमृतको प्रदान करनेवाला है ॥ ११५॥
तृतीय मण्डपमें सोमस्कन्दका परम
है। उसके पश्चात् द्वितीय मण्डप है, आस्तिक लौ
जिसे नृत्यमण्डप कहते हैं ॥ ११६॥
प्रथम मण्डपमें मूलमायाका स्थान है, वहाँ
अत्यन्त शोभा वास करती है। उसके परे गर्भगृह हैं
जहाँपर शिवका लिंगस्थान है॥ ११७॥
2223 Shivmabapuranam_Part L section 6-2- |
जद १७]
विद्येश्वरसंहिता
१३३
नन्दिसंस्थानतः पश्चान्न विदुः शिववैभवम्।
नन्दीश्वरो बहिस्तिष्ठन्पञ्चाक्षरमुपासते॥ ११८
एवं गुरुक्रमाल्लब्धं नन्दीशाच्च मया पुनः।
ततः परं स्वसंवेद्यं शिवेनैवानुभावितम्॥ ११९
शिवस्य कृपया साक्षाच्छिवलोकस्य वैभवम्।
विज्ञातुं शक्यते सवैर्नान्यथेत्याहुरास्तिकाः॥ १२०
एवं क्रमेण मुक्ताः स्युर्ब्राह्मणा वै जितेन्द्रियाः ।
अन्येषां च क्रमं वक्ष्ये गदतः श्रृणुतादरात्॥ १२९
गुरूपदेशाजाप्यं वै ब्राह्मणानां नमोऽन्तकम्।
पञ्चाक्षरं पञ्जलक्षमायुष्यं प्रजपेद्विधिः ॥ १२२
्त्रीत्वापनयनार्थं तु पञ्चलक्षं जपेत्पुनः।
मन्त्रेण पुरुषो भूत्वा क्रमान्मुक्तो भवेद् बुधः ॥ १२
क्षत्रियः पञ्जलक्षेण ्षत्रत्वमपनेष्यति।
पुनश्च पञ्जलक्षेण क्षत्रियो ब्राह्मणो भवेत्॥ १२४
मन्त्रसिद्धर्जपाच्चैव क्रमान्मुक्तो भवेन्नरः।
वैश्यस्तु पञ्जलक्षेण वैश्यत्वमपनेष्यति॥ १२५
पुनश्च पञ्जलक्षेण मनत्रक्षत्रिय उच्यते।
पुनश्च॒ पञ्चलक्षेण ्षत्रत्वमपनेष्यति॥ १२६
पुनश्च पञ्लक्षेण मन्त्रब्राह्मण उच्यते।
शूद्रश्चैव नमोऽन्तेन पञ्जविंशतिलक्षतः ॥ १२७
जन्दीस्थानके पश्चात् शिवके वैभवको कोई नहीं
जान सकता है। नन्दीश्वर (गर्भगृहसे) बाहर रहकर
शिवके पंचाक्षर मन्त्रकी उपासना करते हैं ॥ ११८॥
इस प्रकार गुरुपरम्परासे नन्दीश्वर और
सनत्कुमारके संवादकी जानकारी मुझे हुई है।
उसके पश्चात्का परम रहस्य स्वसंवेद्य है, जिसका
अनुभव स्वयं शिव करते हैं॥ ११९॥
आस्तिकजनोंका कहना है कि साक्षात् शिवकी
कृपासे ही शिवलोकके ऐश्वर्यको लोग जान सकते हैं,
अन्यथा असम्भव है॥ १२०॥
इस प्रकारसे शिवका साक्षात्कार प्राप्तकर जितेन्द्रिय
ब्राह्मण मुक्त हो जाते हैं अर्थात् मोक्षको प्राप्त कर लेते
हैं। अब मैं अन्य क्षत्रियादि वर्णोके विषयमें कहूँगा।
उसे आदरपूर्वक आप सब सुनें॥ १२१॥
यदि ब्राह्मणको आयु प्राप्त करनेकी इच्छा है तो
उसे गुरुके द्वारा बताये गये उपदेशके अनुसार इस
शिवके पंचाक्षरमन्त्रका विधिपूर्वक पाँच लाख जप
करना चाहिये॥ १२२॥
यदि स्त्री स्त्रीत्व अर्थात् स्त्रीयोनिसे मुक्त होना
चाहती है तो बह भी पाँच लाख पंचाक्षर मन्त्रोंका
जप करे। उन मन्त्रके प्रभावसे पुरुषका जन्म लेकर
वह क्रमशः मुक्त हो जाती है॥ १२३॥
क्षत्रिय पाँच लाख मन्त्रोंका जप करके क्षत्रियत्वको
दूर कर लेता है अर्थात क्षत्रियवर्णमें रहनेवाले गुणोंसे
वह मुक्त हो जाता है। तदनन्तर पुनः पाँच लाख
मन्त्रोंका जप करनेपर वह ब्राह्मण हो जाता है । फिर
उतनेही मनत्रोके जपसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो जाती है
और तत्पश्चात् उसी क्रमसे पाँच लाख मन्त्रोंका जप
करनेपर वह मनुष्य मुक्त हो जाता है। वैश्य पंचलक्ष
मन्त्रोंका जप करनेसे अपने वैश्यत्व (गुण)-का
परित्याग कर देता है। पुनः पंचलक्ष मन्त्रका जप
करनेपर वह मन्त्र-क्षत्रिय कहलानेका अधिकारी हो
जाता है | उसके बाद पाँच लाख मन्त्रोंका जप करनेसे
कषत्रियत्वको दूर कर देता है। तदनन्तर पुनः पंचलक्ष
मन्त्रका जप करके मन्त्र-ब्राह्मण कहलानेका अधिकारी
हो जाता है। इसी प्रकार शूद्र भी मन्त्रके अन्तमें जमः
१३४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ १७
मन्त्रविप्रत्वमापद्य पश्चाच्छुद्धो भवेद् द्विज: ।
नारी वाथ नरो वाथ ब्राह्मणो वान्य एव वा॥ १२८
नमो$न्तं वा नमः पूर्वमातुरः सर्वदा जपेत्।
तत्र स्त्रीणां तथैवोह्य गुरुर्निर्दर्शयेत्क्रमात्॥ १२९
साधकः पञ्ञलक्षान्ते शिवप्रीत्यर्थमेव हि।
महाभिषेकनेवेद्यं कृत्वा भक्तांश्च पूजयेत्॥ १३०
पूजया शिवभक्तस्य शिवः प्रीततरो भवेत्।
शिवस्य शिवभक्तस्य भेदो नास्ति शिवो हि सः॥ १३१
शिवस्वरूपमन्त्रस्य धारणाच्छिव एव हि।
शिवभक्तशरीरे हि शिवे तत्परमो भवेत्॥ १३२
शिवभक्ताः क्रियाः सर्वा वेदसर्वक्रियां विदुः।
यावद्यावच्छिवं मन्त्रं येन जप्तं भवेत्क्रमात्॥ १३३
तावद्वै शिवसान्निध्यं तस्मिन्देहे न संशयः।
देवीलिङ्गं भवेद् रूपं शिवभक्तस्त्रियास्तथा॥ १३४
यावन्मन्त्रं जपेददेव्यास्तावत्सान्निध्यमस्ति हि।
शिवं सम्पूजयेद्धीमान्स्वयं वै शब्दरूपभाक् ॥ १३५
स्वयं चैव शिवो भूत्वा परां शक्तिं प्रपूजयेत्।
शक्तिं वेरं च लिङ्गं च ह्यालेख्यामायया यजेत्॥ १३६
। णच क SS oT RNS -
शब्द लगाकर यदि २५ लाख मन्त्रोंका जप करता है
तो वह शूद्र मन्त्रविप्रत्वको प्राप्त द्विज (ब्राह्मण) के
जाता है। चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष, ब्राह्मण हो या
अन्य ही कोई वर्ण हो, पंचाक्षर मन्त्रका जप करनेसे
सभी शुद्ध हो जाते हैं॥ १२४-१२८॥
जो कामनापूर्तिके लिये आतुर है, उसे चाहिये
कि वह नमः को आदि-अन्तमें लगाकर शिवमन्त्रका
सदैव जप करता रहे। स्त्रियों तथा शूद्रोंके लिये
मन्त्रजपका जैसा स्वरूप कहा गया है, उसीके अनुसार
गुरुको भी चाहिये कि वह उन्हें निर्देश दे॥ १२९॥
साधकको चाहिये कि वह पाँच लाख जप
करनेके पश्चात् भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये
महाभिषेक एवं नैवेद्य निवेदन करके शिवभक्तोंका
पूजन करे॥ १३०॥
शिवभक्तकी पूजासे भगवान् शिव बहुत प्रसन
होते हैं। शिव और उनके भक्तमें कोई भेद नहीं है।
वह साक्षात् शिवस्वरूप ही है॥ १३१॥
शिवस्वरूप मन्त्रको धारण करके वह शिव ही
हो जाता है, शिवभक्तका शरीर शिवरूप ही है। अतः
उसकी सेवामें तत्पर रहना चाहिये॥ १३२॥
जो शिवके भक्त हैं, वे लोक और वेदकी
सारी क्रियाओंको जानते हैं। जो क्रमशः जितना-
जितना शिवमन्त्रका जप कर लेता है, उसके शरीरको
उतना ही उतना शिवका सामीप्य प्राप्त हो जाता हैं,
इसमें संशय नहीं है। शिवभक्त स्त्रीका रूप देवी
पार्वतीका ही स्वरूप है। बह जितना मन्त्र जपती है
उसे उतना ही देवीका सांनिध्य प्राप्त होता जाता
है॥ १३३-१३४१/२॥
बुद्धिमान् व्यक्तिको शिवका पूजन करी
चाहिये, इससे वह साक्षात् मन्त्रूप हो जाता है।
साधक स्वयं शिवस्वरूप होकर पराशक्तिका पूर्ण
करे। शक्ति, वेर (मूर्ति) तथा लिंगका चित्र बार्क
अथवा मिट्टी आदिसे इनकी आकृतिका निर्माण
प्राणप्रतिष्ठापूर्वक निष्कपट भावसे इनका
करे ॥ १३५-१३६॥
जै १७]
विद्येश्वरसंहिता
शिवलिङ्गं शिवं मत्वा स्वात्मानं शक्तिरूपकम्।
शक्तिलिङ्गं च देवीं च मत्वा स्वं शिवरूपकम्॥ १३७
शिबलिङ्गं नादरूपं बिन्दुरूपं सशक्तिकम्।
उपप्रधानभावेन अन्योन्यासक्तलिङ्गकम्॥ १३८
पूजयेच्च शिवं शक्तिं स शिवो मूलभावनात्।
शिवभक्ताञ्छिवमन्त्रूपकाञ्छिवरूपकान् ॥ १३९
षोडशैरुपचारैश्च पूजयेदिष्टमाप्नुयात्।
येन शुश्रूषणाद्यैश्च शिवभक्तस्य लिङ्गिनः ॥ १४०
आनन्दं जनयेद्विद्वाञ्छिवः प्रीततरो भवेत्।
शिवभक्तान्सपल्लीकान्यल्या सह सदैव तत्॥ १४१
पूजयेद्भोजनाद्यैश्च पञ्च वा दश वा शतम्।
धने देहे च मन्त्रे च भावनायामवञ्चकः॥ १४२
शिवशक्तिस्वरूपेण न पुनर्जायते भुवि।
नाभेरधो ब्रह्मभागमाकण्ठं विष्णुभागकम्॥ १४३
मुखं लिङ्गमिति प्रोक्तं शिवभक्तशरीरकम्।
मृतान्दाहादियुक्तान्वा दाहादिरहितान्मृतान्॥ १४४
उद्दिश्य पूजयेदादिपितरं शिवमेव हि।
पूजां कृत्वादिमातुश्च शिवभक्तांश्च पूजयेत्॥
पितृलोकं समासाद्य क्रमान्मुक्तो भवेन्मृतः ।
क्रियायुक्तदशभ्यश्च तपोयुक्तो विशिष्यते॥ १४६
तपोयुक्तशतेभ्यश्च जपयुक्तो विशिष्यते।
जपयुक्तसहस््रेभ्यः शिवज्ञानी विशिष्यते॥ १४७
शिबज्ञानिषु लक्षेषु ध्यानयुक्तो विशिष्यते।
ध्यानयुक्तेषु कोटिभ्यः समाधिस्थो विशिष्यते॥ १४८
१३५
शिवलिंगको शिव मानकर अपनेको शक्तिरूप
समझकर, शक्तिलिंगको देवी और अपनेको शिवरूप
समझकर शिवलिंगको नादरूप तथा शक्तिको बिन्दुरूप
मानकर परस्पर सटे हुए शक्तिलिंग और शिवलिंगके
प्रति उपप्रधान और प्रधानकी भावना रखते हुए जो
शिव और शक्तिका पूजन करता है, वह मूलरूपी भावना
करनेके कारण शिवरूप ही है । शिवभक्त शिवमन्त्ररूप
होनेके कारण शिवके ही स्वरूप हैं॥ १३७-१३९॥
जो सोलह उपचारोंसे उनकी पूजा करता है, उसे
अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है। जो शिवलिंगोपासक
'शिवभक्तकी सेवा आदि करके उसे आनन्द प्रदान करता
है, उस विद्वान्पर भगवान् शिव बड़े प्रसन्न होते हैं ।
पाँच, दस या सौ सपत्नीक शिवभक्तोंको बुलाकर भोजन
आदिके द्वारा पलीसहित उनका सदैव समादर करे। धनमें,
देहमें और मन्त्रमें शिवभावना रखते हुए उन्हें शिव और
शक्तिका स्वरूप जानकर निष्कपटभावसे उनकी पूजा
करे | ऐसा करनेवाला पुरुष शिवशक्तिस्वरूप होकर इस
भूतलपर फिर जन्म नहीं लेता है॥ १४०-१४२/३॥
शिवभक्तकी नाभिके नीचेका भाग ब्रह्मभाग
तथा नाभिसे ऊपर कण्ठपर्यन्त तकका भाग विष्णुभाग
और मुख शिवलिंगस्वरूप कहा गया है। मृत्युके
पश्चात् (जिनका) दाहादि संस्कार हुआ हो अथवा
जो दाहादि संस्कारसे रहित हों, उन पितरोंके उद्देश्यसे
शिवको ही आदिपितर मानकर उनकी पूजा करनी
चाहिये। पुनः आदिमाता शिवकी शक्तिकी पूजाकर्
शिवभक्तोंका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला
पुरुष मरनेके पश्चात् क्रमशः मितूलोकको प्राप्त करता
है। तदनन्तर उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। दस
क्रियावान् पुरुषोंसे युक्त योगियोंकी अपेक्षा एक
तपोयुक्त प्राणी श्रेष्ठ है ॥ १४३- १४६॥
सौ तपोयुक्तं (तपस्वियों)-की अपेक्षा एक
जपयुक्त जापक विशिष्ट है । सहस्र जपयुक्त जापकोंकी
अपेक्षा एक शिवज्ञानीका विशेष महत्त्व है ॥ १४७॥
एक लाख शिवज्ञानियोंसे शिवका ध्यान करनेवाला
एक ध्यानी श्रेष्ठ है और करोड़ ध्यानियोंकी अपेक्षा
शिवके लिये एक समाधिस्थ श्रेष्ठ है ॥ १४८॥
१३६
उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यात्पूजायामुत्तरोत्तरम् ।
फलं वैशिष्ट्यरूपं च दुर्विज्ञेयं मनीषिभिः ॥ १४९
तस्माद्वै शिवभक्तस्य माहात्म्यं वेत्ति को नरः।
शिवशक्त्योः पूजनं च शिवभक्तस्य पूजनम्॥ १५०
कुरुते यो नरो भक्त्या स शिवः शिवमेधते।
य॒ इमं पठतेऽध्यायमर्थवद्वेदसम्मतम्॥ १५१
शिवज्ञानी भवेद्विप्रः शिवेन सह मोदते।
श्रावयेच्छिवभक्तांश्च विशेषज्ञो मुनीश्वराः॥ १५२
शिवप्रसादसिद्धिः स्याच्छिवस्य कृपया बुधाः ॥ १५३
श्रीशिवमहापुराण
[ अण १८
Mmm जा. |
इस प्रकार उत्तरोत्तर वैशिष्ट्य-क्रमसे की जानेबाली
पूजासे प्राप्त फलमें भी विशिष्टता आ जाती है
जिसको जानना विद्वानोंके लिये भी कठिन है | इर
कारणसे शिवभक्तकी महिमाकों कौन मनुष्य जाग
सकता हैं। जो मनुष्य शिवशक्ति और शिवभक्तकौ
पूजा भक्तिपूर्वक करता है, वह शिवस्वरूप होक
सदैव कल्याणको प्राप्त करता है । जो ब्राह्मण इस
वेदसम्मत अध्यायको अर्थसहित पढ़ता है, बह
शिवज्ञानी होकर शिवके साथ आनन्द प्राप्त करता है।
हे मुनीश्वरो ! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि यह अध्याय
वह शिवभक्तोंको सुनाये॥ १४९--१५२॥
हे बुधजनो! ऐसा करनेसे भगवान् शिवकी
कृपासे उनका अनुग्रह प्राप्त हो जाता है॥ १५३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां प्रणवपञ्चाक्षरमन्त्रमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्याय; ॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें प्रणवयुक्त पंचाक्षर मन्त्रका
माहात्म्य-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥
—— oe
अथाष्टादशोऽध्यायः
बन्धन और मोक्षका विवेचन, शिवपूजाका उपदेश, लिंग आदिमें शिवपूजनका विधान,
भस्मके स्वरूपका निरूपण और महत्त्व, शिवके भस्मधारणका रहस्य, शिव एवं
गुरु शब्दकी व्युत्पत्ति तथा विघ्नशान्तिके उपाय और शिवधर्मका निरूपण
ऋषय ऊचुः
बन्धमोक्षस्वरूपं हि ब्रूहि सर्वार्थवित्तम।
सूत उवाच
बन्धं मोक्षं तथोपायं वक्ष्येऽहं श्ृणुतादरात्॥ १
प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन बद्धो जीवः स उच्यते।
प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन निर्मुक्तो मुक्त उच्यते॥ २
प्रकृत्यादिवशीकारो मोक्ष इत्युच्यते स्वतः।
बद्धजीवस्तु निर्मुक्तो मुक्तजीवः स कथ्यते॥ ३
प्रकृत्यग्रे ततो बुद्धिरहङ्कारो गुणात्मकः।
'पञ्चतन्मात्रमित्येतत्प्रृत्याद्यष्टकं विदुः॥ ४
ऋषिगण बोले--हे सर्वज्ञोमें श्रेष्ठ ! बन्धन और
मोक्षका स्वरूप क्या है? यह हमें बताइये ॥ '/२॥
सूतजी बोले [हे महर्षियो!] मैं बन्धन और
मोक्षका स्वरूप तथा मोक्षके उपायका वर्णन करुँगा।
आपलोग आदरपूर्वक सुनें। जो प्रकृति आदि आर
बन्धनोसे बँधा हुआ है, वह जीव बद्ध कहलाता है
और जो उन आठों बन्थनोंसे छूटा हुआ है, उसे मुर्ण
कहते हैं। प्रकृति आदिको वशमें कर लेना मोग
कहलाता है। बन्धन आगन्तुक है और मोक्ष स्वतःसिड
है। बद्ध जीव जब बन्धनसे मुक्त हो जाता है, (१
उसे मुक्त जीव कहते हैं ॥ १-३॥ ह...
प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), त्रिगुणात्मक अहक
और पाँच तन्मात्राएँ--इन्हें ज्ञानी पुरुष प्रकृत्या
मानते हैं । प्रकृति आदि आठ तत्त्वोके समूहे देहौ
य १८]
विद्येश्वरसंहिता
१३७
प्रकृत्याद्यष्टजो देहो देहजं कर्म उच्यते।
पुनश्च कर्मजो देहो जन्म कर्म पुनः पुनः॥ ५
शरीरं त्रिविधं ज्ञेयं स्थूलं सूक्ष्मं च कारणम्।
स्थूलं व्यापारदं प्रोक्तं सूक्ष्ममिन्द्रियभोगदम्॥ ६
कारणं त्वात्मभोगार्थं जीवकर्मानुरूपतः।
सुखं दुःखं पुण्यपापैः कर्मभिः फलमश्नुते॥ ७
तस्माद्धि कर्मरज्ज्वा हि बद्धो जीवः पुनः पुनः।
शरीरत्रयकर्मभ्यां चक्रवद् भ्राम्यते सदा॥ ८
चक्रभ्रमनिवृत्त्यर्थ चक्रकर्तारमीडयेत्।
प्रकृत्यादिमहाचक्रं प्रकृतेः परतः शिवः॥ ९
चक्रकर्ता महेशो हि प्रकृतेः परतो यतः।
पिबति वाथ वमति जीवाबालो जलं यथा॥ १०
शिवस्तथा प्रकृत्यादि वशीकृत्याधितिष्ठति।
सर्व वशीकृतं यस्मात्तस्माच्छिव इति स्मृतः।
शिव एव हि सर्वज्ञः परिपूर्णश्च निःस्पृहः॥ १
सर्वज्ञता
स्वतन्त्रता
अनन्तशक्तिश्च
यन्मानसैश्र्यमवैति
अतः शिवप्रसादेन प्रकृत्यादि वशं भवेत्।
शिवप्रसादलाभार्थं शिवमेव प्रपूजयेत् १३
वेदः॥ १२
निःस्पृहस्य च पूर्णस्य तस्य पूजा कथं भवेत्।
शिबोददेशकृतं कर्म प्रसादजनकं भवेत्॥ १४
उत्पत्ति हुई है। देहसे कर्म उत्पन्न होता है और फिर
कर्मसे नूतन देहकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार बार-
बार जन्म और कर्म होते रहते हैं॥४-५॥
शरीरको स्थूल, सूक्ष्म और कारणके भेदसे तीन
प्रकारका जानना चाहिये । स्थूल शरीर (जाग्रत-अवस्थामें)
व्यापार करानेवाला, सूक्ष्म शरीर (जाग्रत् और स्वप्न-
अवस्थाओंमें) इन्द्रिय-भोग प्रदान करनेवाला तथा
कारणशरीर (सुषुप्तावस्थामें) आत्मानन्दकी अनुभूति
करानेवाला कहा गया है । जीवको उसके प्रारब्ध-कर्मानुसार
सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। वह अपने पुण्यकर्मेके फलस्वरूप
सुख और पापकर्मोके फलस्वरूप दुःख प्राप्त करता
है। अतः कर्मपाशसे बँधा हुआ जीव अपने त्रिविध
शरीरसे होनेवाले शुभाशुभ कर्मोद्वारा सदा चक्रकी भाँति
बार-बार घुमाया जाता है॥ ६--८ ॥
इस चक्रवत् भ्रमणकी निवृत्तिके लिये चक्रकर्ताका
स्तवन एवं आराधन करना चाहिये । प्रकृति आदि जो
आठ पाश बतलाये गये हैं, उनका समुदाय ही
महाचक्र है और जो प्रकृतिसे परे हैं, वे परमात्मा शिव
हैं। भगवान् महेश्वर ही प्रकृति आदि महाचक्रके कर्ता
हैं; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे हैं। जैसे बकायन नामक
वृक्षका थाला जलको पीता और उगलता है, उसी
प्रकार शिव प्रकृति आदिको अपने वशमें करके उसपर
शासन करते हैं। उन्होंने सबको वशमें कर लिया है,
इसीलिये वे शिव कहे गये हैं। शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण
तथा निःस्पृह हैं॥ ९-११॥
सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त
शक्ति आदिसे संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त
शक्तियोंको धारण करना-महेश्वरके इन छः प्रकारके
मानसिक ऐश्वर्योको केवल वेद जानता है । अतः भगवान्
शिवके अनुग्रहसे ही प्रकृति आदि आठों तत्त्व वशमें
होते हैं। भगवान् शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिये
उन्हींका पूजन करना चाहिये॥ १२-९३॥
शिव तो परिपूर्ण हैं, निःस्पृह हैं; उनकी पूजा कैसे
हो सकती है? [इसका उत्तर यह है कि] भगवान्
शिवके उद्देश्यसे-उनकी प्रसन्नताके लिये किया हुआ
१३८
लिङ्गे वेरे भक्तजने शिवमुद्दिश्य पूजयेत्।
कायेन मनसा वाचा धनेनापि प्रपूजयेत्॥ १५
पूजया तु महेशो हि प्रकृतेः परमः शिवः।
प्रसादं कुरुते सत्यं पूजकस्य विशेषत: ॥ १६
शिवप्रसादात्कर्माद्यं क्रमेण स्ववशं भवेत्।
कर्मारभ्य प्रकृत्यन्तं यदा सर्व वशं भवेत्॥ १७
तदा मुक्त इति प्रोक्तः स्वात्मारामो विराजते।
प्रसादात्परमेशस्य कर्मदेहो यदा वशः॥ १८
तदा बै शिवलोके तु वासः सालोक्यमुच्यते ।
सामीप्यं याति साम्बस्य तन्मात्रे च वशं गते॥ १९
तदा तु शिवसायुज्यमायुधाद्यैः क्रियादिभिः।
महाप्रसादलाभे च बुद्धिश्चापि वशा भवेत्॥ २०
बुद्धिस्तु कार्य प्रकृतेस्तत्साष्टिरिति कथ्यते।
पुनर्महाप्रसादेन प्रकृतिर्वशमेष्यति॥ २१
शिवस्य मानसैश्वर्यं तदाऽयत्नं भविष्यति।
सार्वज्ञाद्यं शिवैश्वर्यं लब्ध्वा स्वात्मनि राजते॥ २२
तत्सायुज्यमिति प््रहुर्वेदागमपरायणाः।
एवं क्रमेण मुक्तिः स्याल्लिङ्गादौ पूजया स्वत: ॥ २३
अतः शिवप्रसादार्थ क्रियाद्यैः पूजयेच्छिवम्।
शिवक्रिया शिवतपः शिवमन्त्रजपः सदा॥ २४
शिवज्ञानं शिवध्यानमुत्रोत्तरमभ्यसेत्।
आमसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वै शिवचिन्तया॥ २५
सद्यादिभिश्च कुसुमैरर्चयेच्छिवमेष्यति।
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १८
सत्कर्म उनके कृपाप्रसादको प्राप्त करानेवाला होता है।
शिवलिंगमें, शिवकी प्रतिमामें तथा शिवभक्तजनोंमें शिवक्
भावना करके उनकी प्रसन्नताके लिये पूजा करनी चाहिये।
वह पूजन शरीरसे, मनसे, वाणीसे और धनसे भी किया
जा सकता है । उस पूजासे प्रकृतिसे परे महेश्वर पूजकफ
विशेष कृपा करते हैं; यह सत्य है॥ १४--१६॥
शिवकी कृपासे कर्म आदि सभी बन्धन अपने
वशमें हो जाते हैं। कर्मसे लेकर प्रकृतिपर्यन्त सब कुछ
जब वशमें हो जाता है, तब वह जीव मुक्त कहलाता
है और स्वात्मारामरूपसे विराजमान होता है। परमेश्वर
शिवकी कृपासे जब कर्मजनित शरीर अपने वशमें हो
जाता है, तब भगवान् शिवके लोकमें निवास प्राप
होता है; इसीको सालोक्यमुक्ति कहते हैं। जब
तन्मात्राएँ वशमें हो जाती हैं, तब जीव जगदम्बासहित
शिवका सामीप्य प्राप्त कर लेता है। यह सामीप्यमुक्ति
है, उसके आयुध आदि और क्रिया आदि सब कुछ
भगवान् शिवके समान हो जाते हैं। भगवानूका
महाप्रसाद प्राप्त होनेपर बुद्धि भी वशमें हो जाती है।
बुद्धि प्रकृतिका कार्य है। उसका वशमें होना सार्ष्टिमुक्ति
कही गयी है। पुनः भगवानूका महान् अनुग्रह प्राप्त
होनेपर प्रकृति वशमें हो जायगी॥ १७--२१॥
उस समय भगवान् शिवका मानसिक ऐश्वर्य
बिना यल्के ही प्राप्त हो जायगा। सर्वज्ञता आदि जो
शिवके ऐश्वर्य हैं, उन्हें पाकर मुक्त पुरुष अपनी
आत्मामें ही विराजमान होता है। वेद और शास्त्र
विश्वास रखनेवाले विद्वान् पुरुष इसीको सायुज्यमुर्ति
कहते हैं। इस प्रकार लिंग आदिमें शिवकी पूजा
करनेसे क्रमशः मुक्ति स्वतः प्राप्त हो जाती है।
इसलिये शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिये
तत्सम्बन्धी क्रिया आदिके द्वारा उन्हींका पूजन करता
चाहिये। शिवक्रिया, शिवतप, शिवमन्त्र-जप, शिव
और शिवध्यानके लिये सदा उत्तरोत्तर अभ्यास बढ़ी
चाहिये प्रतिदिन प्रातःकालसे रातको सोते समयर्ष
और जन्मकालसे लेकर मृत्युपर्यन्त सारा समय भवर
शिवके चिन्तनमें ही बिताना चाहिये । सद्योजातादि मत्र
नाना प्रकारके पुष्पोंसे जो शिवकी पूजा कर
है, वह शिवको ही प्राप्त होगा॥ २२-२५/२॥
.
जे १८]
विद्येश्वरसंहिता
१३९
ऋषय ऊचुः
लिङ्गादौ शिवपूजाया विधानं ब्रूहि सुव्रत ॥ २६
सूत उवाच
लिङ्गानां च क्रमं वक्ष्ये यथावच्छृणुत द्विजाः।
तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम्॥ २७
सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपं तु निष्कलम्।
स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते॥ २८
तयोः पूजा तपः प्रोक्तं साक्षान्मोक्षप्रदे उभे।
पौरुषप्रकृतिभूतानि लिङ्गानि सुबहूनि च॥ २९
तानि विस्तरतो वक्तुं शिवो वेत्ति न चापरः।
भूविकाराणि लिङ्गानि ज्ञातानि प्रब्रवीमि वः॥ ३०
स्वयम्भूलिङ्गं प्रथमं बिन्दुलिङ्गं द्वितीयकम्।
प्रतिष्ठितं चरं चैव गुरुलिङ्गं तु पञ्चमम्॥ ३१
देवर्षितपसा तुष्टः सानिध्यार्थं तु तत्र वै।
पृथिव्यन्तर्गतः शवो बीजं वै नादरूपतः॥ ३२
स्थावरा्करवद्भूमिमुद्भिद्य व्यक्त एव सः।
स्वयम्भूतं जातमिति स्वयम्भूरिति तं विदुः॥ ३३
तल्लिङ्गपूजया ज्ञानं स्वयमेव प्रवर्धते।
सुवर्णरजतादौ वा पृथिव्यां स्थण्डिलेऽपि वा॥
स्वहस्ताल्लिखितं लिङ्गं शुद्धप्रणवमन्त्रकम्।
चन्त्रलिङ्गं समालिख्य प्रतिष्ठावाहनं चरेत्॥ ३५
बिन्दुनादमयं लिङ्गं स्थावरं जङ्गमं च यत्।
भावनामयमेतद्धि शिवदृष्टं न संशयः॥ ३६
यत्र विश्वस्यते शम्भुस्तत्र तस्मै फलप्रदः।
स्वहस्ताल्लिखिते यन्त्रे स्थावरादावकृत्रिमे॥ ३७
आवाह्य पूजयेच्छम्भुं षोडशैरुपचारकैः।
स्वयमैश्वर्यमाप्नोति ज्ञानमभ्यासतो भवेत्॥ ३८
ऋषिगण बोले-हे सुव्रत! अब आप लिंग
आदिमें शिवजीकी पूजाका विधान बताइये ॥ २६॥
सूतजी बोले-हे द्विजो! मैं लिंगोंके क्रमका
यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, आप लोग सुनिये। वह
प्रणव ही समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला प्रथम
लिंग है। उसे सूक्ष्म प्रणवरूप समझिये। सूक्ष्मलिंग
निष्कल होता है और स्थूललिंग सकल। पंचाक्षर
मन्त्रको ही स्थूललिंग कहते हैं। उन दोनों प्रकारके
लिंगोंका पूजन तप कहलाता है। वे दोनों ही लिंग
साक्षात् मोक्ष देनेवाले हैं। पौरुषलिंग और प्रकृतिलिंगके
रूपमें बहुत-से लिंग हैं। उन्हें भगवान् शिव ही
विस्तारपूर्वक बता सकते हैं; दूसरा कोई नहीं जानता।
पृथ्वीके विकारभूत जो-जो लिंग ज्ञात हैं, उन-उनको
मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ २७--३०॥
उनमें प्रथम स्वयम्भूलिंग, दूसरा बिन्दुलिंग,
तीसरा प्रतिष्ठित लिंग, चौथा चरलिंग और पाँचवाँ
गुरुलिंग है। देवर्षियोंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर
उनके समीप प्रकट होनेके लिये पृथ्वीके अन्तर्गत
बीजरूपसे व्याप्त हुए भगवान् शिव वृक्षोंके अंकुरकी
भाँति भूमिको भेदकर नादलिंग रूपमें व्याप्त हो जाते
हैं। वे स्वत: व्यक्त हुए शिव ही स्वयं प्रकट होनेके
कारण स्वयम्भू नाम धारण करते हैं। ज्ञानीजन उन्हें
स्वयम्भूलिंगके रूपमें जानते हैं॥ ३१-३३॥
उस स्वयम्भूलिंगकी पूजासे उपासकका ज्ञान स्वयं
ही बढ़ने लगता है । सोने-चाँदी आदिके पत्रपर, भूमिपर
अथवा वेदीपर अपने हाथसे लिखित जो शुद्ध प्रणव
मन्त्रूप लिंग है, उसमें तथा यन्त्रलिंगका आलेखन
करके उसमें भगवान् शिवकी प्रतिष्ठा और आवाहन
करे। ऐसा बिन्दुनादमय लिंग स्थावर और जंगम दोनों
ही प्रकारका होता है। इसमें शिवका दर्शन भावनामय
ही है; इसमें सन्देह नहीं है। जिसको जहाँ भगवान्
शंकरके प्रकट होनेका विश्वास हो, उसके लिये वहीँ
प्रकट होकर वे अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। अपने
हाथसे लिखे हुए यन्त्रमें अथवा अकृत्रिम स्थावर आदिमें
भगवान् शिवका आवाहन करके सोलह उपचारोंसे उनकी
पूजा करे। ऐसा करनेसे साधक स्वयं ही ऐश्वर्यको
प्राप्त कर लेता है और इस साधनके अभ्याससे उसको
ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है॥ ३४--३८॥
१४०
देवैश्च ऋषिभिश्चापि स्वात्मसिद्धर्थमेव हि।
समऱ्त्रेणात्महस्तेन कृतं यच्छुद्धमण्डले॥ ३९
शुद्धभावनया चैव स्थापितं लिङ्गमुत्तम्।
तल्लिङ्गं पौरुषं प्राहुस्तत्प्रतिष्ठितमुच्यते॥ ४०
तल्लिङ्गपूजया नित्यं पौरुषैश्वर्यमाप्तुयात्।
महद्धिर्ब्राह्मणैश्रापि राजभिश्च महाधनैः॥ ४१
शिल्पिना कल्पितं लिङ्गं मन्त्रेण स्थापितं च यत्।
प्रतिष्ठितं प्राकृतं हि प्राकृतेश्वर्यभोगदम्॥ ४२
यदूर्जितं च नित्यं च तद्धि पौरुषमुच्यते
यद् दुर्बलमनित्यं च तद्धि प्राकृतमुच्यते॥ ४३
लिङ्गं नाभिस्तथा जिह्वा नासाग्रं च शिखा क्रमात्।
कट्यादिषु त्रिलोकेषु लिङ्गमाध्यात्मिकं चरम्॥ ४४
पर्वतं पौरुषं प्रोक्तं भूतलं प्राकृतं विदुः।
वृक्षादि पौरुषं ज्ञेयं गुल्मादि प्राकृतं विदुः॥ ४५
षाष्टिकं प्राकृतं ज्ञेयं शालिगोधूमपौरुषम्।
ऐश्वर्य पौरुषं विद्यादणिमाद्यष्टसिद्धिदम्॥ ४६
सुस्त्रीधनादिविषयं प्राकृतं प्राहुरास्तिकाः।
प्रथमं चरलिङ्गेषु रसलिङ्गं प्रकथ्यते॥ ४७
रसलिङ्गं ब्राह्मणानां सर्वाभीष्टप्रदं भवेत्।
बाणलिङ्गं क्षत्रियाणां महाराज्यप्रदं शुभम्॥ ४८
स्वर्णलिङ्गं तु बैश्यानां महाधनपतित्वदम्।
शिलालिङ्घं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम्॥ ४९
स्फाटिकं बाणलिङ्गं च सर्वेषां सर्वकामदम्।
स्वीयाभावेऽन्यदीयं तु पूजायां न निषिद्धयते ॥ ५०
स्त्रीणां तु पार्थिवं लिङ्गं सभर्तृणां विशेषतः।
श्रीशिवमहापुराण
[ 3० ----- 5 2... >> पपप
देवताओं और ऋषियोंने आत्मसिद्धिके (ह
अपने हाथसे वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक
मण्डलमें शुद्ध भावनाद्वारा जिस उत्तम शिवलिंग
स्थापना की है, उसे पौरुषलिंग कहते हैं तथा वह
प्रतिष्ठित लिंग कहलाता है। उस लिंगकी पूज
करनेसे सदा पौरुष ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है । महान
ब्राह्मणों और महाधनी राजाओंद्वारा किसी शिल्यीऐे
शिवलिंगका निर्माण कराकर मन्त्रपूर्वक जिस लिंगक्ग
स्थापना तथा प्रतिष्ठा की गयी हो, वह प्राकृतलिंग
है, वह [शिवलिंग] प्राकृत ऐश्वर्य-भोगको देनेवाला
होता है। जो शक्तिशाली और नित्य होता है, उसे
पौरुषलिंग कहते हैं और जो दुर्बल तथा अनित्य होता
है, वह प्राकृतलिंग कहलाता है ॥ ३९-४३॥
लिंग, नाभि, जिह्वा, नासिकाका अग्र भाग और
शिखाके क्रमसे कटि, हृदय और मस्तक तीनों
स्थानोंमें जो लिंगकी भावना की गयी है, उस
आध्यात्मिक लिंगको ही चरलिंग कहते हैं। पर्वतको
पौरुषलिंग बताया गया है और भूतलको विद्वान् पुरुष
प्राकृतलिंग मानते हैं | वृक्ष आदिको पौरुषलिंग जानता
चाहिये। गुल्म आदिको प्राकृतलिंग कहा गया है।
साठी नामक धान्यको प्राकृतलिंग समझना चाहिये
और शालि (अगहनी) एवं गेहुँको पौरुषलिंग।
अणिमा आदि आठों सिद्धियोंको देनेवाला जो ऐश्वर्य
है, उसे पौरुष ऐश्वर्य जानना चाहिये । सुन्दर स्त्री तथा
धन आदि विषयोंको आस्तिक पुरुष प्राकृत ऐश्वर्य
कहते हैं ॥ ४४--४६१/२॥
चरलिंगोंमें सबसे प्रथम रसलिंगका वर्णन किरी
जाता है। रसलिंग ब्राह्मणोंको उनकी सारी अभीर
वस्तुओंको देनेवाला है । शुभकारक बाणलिंग क्षत्रियंकी
महान् राज्यकी प्राप्ति करानेवाला है। सुवर्ण
वैश्योंको महाधनपतिका पद प्रदान करानेवाला है
सुन्दर शिलालिंग शूद्रोंको महाशुद्धि देनेवाला
स्फटिकलिंग तथा बाणलिंग सब लोगोंको उती
समस्त कामनाएँ प्रदान करते हैं। अपना न॑ द
दूसरेका स्फटिक या बाणलिंग भी पूजाके लि
निषिद्ध नहीं है। स्त्रियों, विशेषतः सधवाओंके
ह १८]
विद्येश्वरसंहिता
१४९
विधवानां प्रवृत्तानां स्फाटिकं परिकीर्तितम्॥ ५१
विधवानां निवृत्तानां रसलिङ्गं वरिशिष्यते।
बाल्ये वा यौवने वापि वार्धके वापि सुव्रताः ॥ ५२
शुद्धस्फटिकलिङ्गं तु स्त्रीणां तत्सर्वभोगदम्।
प्रवृत्तानां पीठपूजा सर्वाभीष्टप्रदा भुवि॥ ५३
पात्रेणैव प्रवृत्तस्तु सर्वपूजां समाचरेत्।
नैवेद्यं चाभिषेकान्ते शाल्यन्नेन समाचरेत्॥ ५४
पूजान्ते स्थापयेल्लिङ्गं सम्पुटेषु पृथग्गृहे।
करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत्॥ ५५
निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते।
विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत्॥ ५६
पूजां कृत्वाथ तल्लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा।
विभूतिस्त्रिविधा प्रोक्ता लोकवेदशिवार्निभिः ॥
लोकाग्निजमथो भस्म द्रव्यशुद्भ्यर्थमावहेत्।
मृद्दारुलोहरूपाणां धान्यानां च तथैव च॥ ५८
तिलादीनां च द्रव्याणां वस्त्रादीनां तथैव च।
तथा पर्युषितानां च भस्मना शुद्धिरिष्यते॥ ५९
शवादिभिर्दूषितानां च भस्मता शुद्धिरिष्यते।
सजलं निर्जलं भस्म यथायोग्यं तु योजयेत्॥ ६०
वेदाग्निजं तथा भस्म तत्कर्मान्तेषु धारयेत्।
मन्त्रेण क्रियया जन्यं कर्माग्नौ भस्मरूपधृक् ॥ ६१
तद्भस्मधारणात्कर्म स्वात्मन्यारोपितं भवेत्।
अधघोरेणात्ममन्त्रेण बिल्वकाष्टं प्रदाहयेत्॥ ६२
शिवाग्निरिति सम्प्रोक्तस्तेन दग्धं शिवाग्निजम्।
पार्थिवलिंगकी पूजाका विधान है । प्रवृत्तिमार्गमें स्थित
विधवाओंके लिये स्फटिकलिंगकी पूजा बतायी गयी
है। परंतु विरक्त विधवाओंके लिये रसलिंगकी पूजाको
ही श्रेष्ठ कहा गया है हे सुत्रतो ! बचपनमें, युवावस्थामें
और बुढ़पेमें भी शुद्ध स्फटिकमय शिवलिंगका पूजन
स्त्रयोंको समस्त भोग प्रदान करनेवाला है। गृहासक्त
स्त्रयोंके लिये पीठपूजा भूतलपर सम्पूर्ण अभीष्टको
देनेवाली है ॥ ४७--५३॥
प्रवृत्तिमार्गमें चलनेवाला पुरुष सुपत्र गुरुके सहयोगसे
ही समस्त पूजाकर्म सम्पन्न करे। इष्टदेवका अभिषेक
करनेके पश्चात् अगहनीके चावलसे बने हुए [खीर
आदि पक््वान्नोंद्वारा] नैवेद्य अर्पण करे | पूजाके अन्तमें
शिवलिंगको पधराकर घरके भीतर पृथक् सम्मुटमें स्थापित
करे। जो निवृत्तिमार्गी पुरुष हैं, उनके लिये हाथपर ही
शिवलिंग-पूजाका विधान है । उन्हें भिक्षादिसे ग्राप्त हुए
अपने भोजनको ही नैवेद्यरूपमें निवेदित करना चाहिये।
निवृत्त पुरुषोंके लिये सूक्ष्मलिंग ही श्रेष्ठ बताया जाता
है। वे विभूतिके द्वारा पूजन करें और विभूतिको ही
नैवेद्यरूपसे निवेदित भी करें । पूजा करके उस लिंगको
सदा अपने मस्तकपर धारण करें॥ ५४-५६ /२॥
विभूति तीन प्रकारकी बतायी गयी है--
लोकाग्निजनित, वेदाग्निजनित और शिवाग्निजनित।
'लोकाग्निजनित या लौकिक भस्मको द्रव्योंकी शुद्धिके
लिये लाकर रखे । मिट्टी, लकड़ी और लोहेके पात्रोंकी,
धान्योंकी, तिल आदि द्रव्योंकी, वस्त्र आदिकी तथा
पर्युषित वस्तुओंकी शुद्धि भस्मसे होती है । कुत्ते आदिसे
दूषित हुए पात्रोंकी भी शुद्धि भस्मसे ही मानी गयी है।
वस्तु-विशेषकी शुद्धिके लिये यथायोग्य सजल अथवा
निर्जल भस्मका उपयोग करना चाहिये ॥ ५७-६० ॥
वेदाग्निजनित जो भस्म है, उसको उन-उन वैदिक
कर्मोंके अन्तमें धारण करना चाहिये । मन्त्र और क्रियासे
जनित जो होमकर्म है, वह अग्निमें भस्मका रूप धारण
करता है। उस भस्मको धारण करनेसे वह कर्म आत्मामें
आरोपित हो जाता है। अघोर-मूर्तिधारी शिवका जो
अपना मन्त्र है, उसे पढ़कर बेलको लकड़ीको जलाये।
उस मन्त्रसे अभिमन्त्रित अग्निको शिवाग्नि कहा गया
९४२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १८
कपिलागोमयं पूर्व केवलं गव्यमेव वा॥ ६३
शम्यश्वत्थपलाशान्वा वटारग्वधबिल्वकान्।
शिवाग्निना दहेच्छुद्धं तद्वै भस्म शिवाग्निजम् ॥ ६४
दर्भारनौ वा दहेत्काष्ठं शिवमन्त्रं समुच्चरन्।
सम्यक्संशोध्य वस्त्रेण नवकुम्भे निधापयेत्॥ ६५
दीप्त्यर्थं तत्तु सङ्ग्राह्यं मन्यते पूज्यतेऽपि च।
भस्मशब्दार्थ एवं हि शिवः पूर्व तथाकरोत्॥ ६६
यथा स्वविषये राजा सारं गृह्णाति यत्करम्।
यथा मनुष्याः सस्यादीन्दरध्वा सारं भजन्ति वे ॥ ६७
यथा हि जाठराग्निश्च भक्ष्यादीन्विविधान्बहून्।
दग्ध्वा सारतरं सारात्स्वदेहं परिपुष्यति॥ ६८
तथा प्रपञ्चकर्तापि स शिवः परमेश्वर: ।
स्वाधिष्ठेयप्रपञ्चस्य दग्ध्वा सारं गृहीतवान्॥ ६९
दग्ध्वा प्रपञ्चं तद्भस्म स्वात्मन्यारोपयेच्छिवः।
उद्धूलनस्य व्याजेन जगत्सारं गृहीतवान्॥ ७०
स्वरत्नं स्थापयामास स्वकीये हि शरीरके।
केशमाकाशसारेण वायुसारेण वै मुखम्॥ ७१
हृदयं चाग्निसारेण त्वपां सारेण वै कटिम्।
जानुं चावनिसारेण तद्वत्सर्वं तदङ्गकम्॥ ७२
ब्रह्मविष्णवोश्च रुद्राणां सारं चैव त्रिपुण्डूकम्।
तथा तिलकरूपेण ललाटान्ते महेश्वर: ॥ ७३
भूवृद्धया सर्वमेतद्धि मन्यते स्वयमित्यसो।
प्रपञ्जसारसर्वस्वमनेनेव वशीकृतम्॥ ७४
है। उसके द्वारा जले हुए काष्ठका जो भस्म है,
शिवाग्निजनित है। कपिला गायके गोबर अथव
गायमात्रके गोबरको तथा शमी, पीपल, पलाश
वट, अमलतास और बिल्व--इनकी लकड़ियोंक्े
शिवाग्निसे जलाये। वह शुद्ध भस्म शिवाग्निजनित
माना गया है अथवा कुशकी अग्निमें शिवमनरके
उच्चारणपूर्वक काष्ठको जलाये। फिर उस भस्मको
कपड़ेसे अच्छी तरह छानकर नये घड़ेमें भरकर रद
दे। उसे समय-समयपर अपनी कान्ति या शोभाकी
वृद्धिके लिये धारण करे | ऐसा करनेवाला पुरुष सम्मानित
एवं पूजित होता है॥ ६१--६५६/२॥
पूर्वकालमें भगवान् शिवने भस्म शब्दका ऐसा ही
अर्थ प्रकट किया था। जैसे राजा अपने राज्यमें सारभूत
करको ग्रहण करता है, जैसे मनुष्य सस्य आदिको
जलाकर (पकाकर) उसका सार ग्रहण करते हैं तथा
जैसे जठरानल नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थांको
भारी मात्रामें ग्रहण करके उसे जलाकर सारतर वसु
ग्रहण करता और उस सारतर वस्तुसे स्वदेहका पोषण
करता है, उसी प्रकार प्रपंचकर्ता परमेश्वर शिवने भी
अपनेमें आधेय रूपसे विद्यमान प्रपंचको जलाकर
भस्मरूपसे उसके सारतत्त्वको ग्रहण किया है । प्रपंचको
दग्ध करके शिवने उसके भस्मको अपने शरीरमें लगाया
है। उन्होंने विभूति (भस्म) पोतनेके बहाने जगतके
सारको ही ग्रहण किया है॥ ६६--७०॥
शिवने अपने शरीरमें अपने लिये रत्नस्वरूप भस्मकी
इस प्रकार स्थापित किया है--आकाशके सारतत्वसे
केश, वायुके सारतत्त्वसे मुख, अग्निके सारतत्तसे हद
जलके सारतत्त्वसे कटिभाग और पृथ्वीके सारतत्वसे
घुटनेको धारण किया है। इसी तरह उनके सारे अ
विभिन्न वस्तुओंके साररूप हैं ॥ ७३-७२ ॥
महेश्वरने अपने ललाटके मध्यमें तिलकरूपरै
जो त्रिपुण्ड धारण किया है, वह ब्रह्मा, विष्णु और
रुद्रका सारतत्त्व है। वे इन सब वस्तुओंको ज
अभ्युदयका हेतु मानते हैं । इन भगवान् शिवने ही प्र
सार-सर्वस्वको अपने वशमें किया है। अतः इन्हें अग्नौ
ठ्य १८]
विद्येश्वरसंहिता
१४३
SSS HES To कद मी
तस्मादस्य वशीकर्ता नान्योऽस्ति स शिव: स्मृतः।
यथा सर्वमृगाणां च हिंसको मृगहिंसकः ॥ ७५
अस्य हिंसामृगो नास्ति तस्मात्सिंह इतीरितः।
शं नित्यं सुखमानन्दमिकारः पुरुषः स्मृतः ॥ ७६
चकारः शक्तिरमृतं मेलनं शिव उच्यते।
तस्मादेवं स्वमात्मानं शिवं कृत्वार्चयेच्छिवम्॥ ७७
तस्मादुद्धूलनं पूर्व त्रिपुण्डुं धारयेत्परम्।
पूजाकाले हि सजलं शुद्ध्यर्थं निर्जलं भवेत्॥ ७८
दिवा वा यदि वा रात्रौ नारी वाथ नरोऽपि वा।
पूजार्थं सजलं भस्म त्रिपुण्ड्रेणैव धारयेत्॥ ७९
त्रिपुण्डं सजलं भस्म धृत्वा पूजां करोति यः।
शिवपूजाफलं साङ्गं तस्यैव हि सुनिश्चितम्॥ ८०
भस्म वै शिवमन्त्रेण धृत्वा हयुच्चाश्रमी भवेत्।
शिवाश्रमीति सम्प्रोक्तः शिवैकपरमो यतः॥ ८
शिवब्रतैकनिष्ठस्य नाशौचं न च सूतकम्!
ललाटेऽग्रे सितं भस्म तिलकं धारयेन्मृदा॥ ८२
स्वहस्ताद् गुरुहस्ताद्वा शिवभक्तस्य लक्षणम्।
गुणान्सुन्ध इति प्रोक्तो गुरुशब्दस्य विग्रहः ॥ ८३
सविकारानाजसादीन्ुणान्रुन्ये व्यपोहति।
गुणातीतः परशिवो गुरुरूपं समाश्रितः ॥ ८४
गुणत्रयं व्यपोह्याग्रे शिव बोधयतीति सः।
विश्वस्तानां तु शिष्याणां गुरुरित्यभिधीयते॥ ८५
वशमें करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, इसीलिये वे
शिव कहे जाते हैं। जैसे समस्त मृगोंका हिंसक मृग
(पशु) सिंह कहलाता है और उसकी हिंसा करनेवाला
दूसरा कोई मृग नहीं है, अतएव उसे सिंह कहा गया
है॥ ७३-७५१/२॥
शकारका अर्थ है नित्यसुख एवं आनन्द।
इकारको पुरुष और वकारको अमृतस्वरूपा शक्ति
कहा गया है। इन सबका सम्मिलित रूप ही शिव
कहलाता है। अतः इस रूपमें भगवान् शिवको अपनी
आत्मा मानकर उनकी पूजा करनी चाहिये। [साधक]
पहले अपने अंगोंमें भस्म लगाये, फिर ललाटमें उत्तम
त्रिपुण्ड धारण करे। पूजाकालमें सजल भस्मका
उपयोग होता है और द्रव्यशुद्धिके लिये निर्जल
भस्मका॥ ७६--७८॥
दिन हो अथवा रात्रि, नारी हो या पुरुष; पूजा
करनेके लिये उसे भस्म जलसहित ही त्रिपुण्ड्रूपमें
(ललाटपर) धारण करना चाहिये । जलमिश्रित भस्मको
त्रिपुण्ड्रूपमें धारणकर जो व्यक्ति शिवकी पूजा करता
है, उसे सांग शिवकी पूजाका फल तुरंत प्राप्त होता
है, यह सुनिश्चित है। जो (प्राणी) शिवमन्त्रके द्वारा
भस्मको धारण करता है, वह सभी (ब्रह्मचर्य,
गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास) आश्रमोंमें श्रेष्ठ होता
है। उसे शिवाश्रमी कहा जाता है; क्योंकि वह
एकमात्र शिवको ही परम श्रेष्ठ मानता है। शिव-ब्रतमें
एकमात्र शिवमें ही निष्ठा रखनेवालेको न तो अशौचका
दोष लगता है और न तो सूतकका। ललाटके
अग्रभागमें अपने हाथसे या गुरुके हाथसे श्वेत भस्म
या मिट्टीसे तिलक लगाना चाहिये, यह शिवभक्तका
लक्षण है ॥ ७९--८२१/२॥
जो गुणोंका रोध करता है, वह गुरु है-यह
'गुरु' शब्दका विग्रह कहा गया है। गुणातीत परम
शिव राजस आदि सविकार गुणोंका अवरोध करते
हैं-दूर हटाते हैं, इसलिये वे सबके गुरुरूपका आश्रय
लेकर स्थित हैं । गुरु विश्वासी शिष्योंके तीनों गुणोंको
पहले दूर करके उन्हें शिवतत्त्वका बोध कराते हैं,
इसीलिये गुरु कहलाते हैं॥ ८३--८५॥
२४४
श्रीशिबमहापुराण
[ अ० १८
तस्माद् गुरुशरीरं तु गुरुलिड्रं भवेद् बुध:।
गुरुलिङ्गस्य पूजा तु गुरुशुश्रूषणं भवेत् ॥ ८६
श्रुतं करोति शुश्रूषा कायेन मनसा गिरा।
उक्तं यद् गुरुणा पूर्व शक्यं वाऽशक्यमेव वा ॥ ८७
करोत्येव हि पूतात्मा प्राणैरपि धनेरपि।
तस्माद्वै शासने योग्यः शिष्य इत्यभिधीयते ॥ ८८
शरीराद्यर्थकं सर्वं गुरोर्दत््ता सुशिष्यकः।
अग्रपाकं निवेद्याग्रे भुझ्जीयाद् गुर्वनुज्ञया ॥ ८९
शिष्यः पुत्र इति प्रोक्तः सदा शिष्यत्वयोगतः।
जिह्नालिड्रान्मत्रशुक्रं कर्णयोनौ निषिच्य वै॥ ९०
जातः पुत्रो मन्त्रपुत्रः पितरं पूजयेद् गुरुम्।
निमज्जयति पुत्रं वै संसारे जनकः पिता॥ ९१
सन्तारयति संसाराद् गुरुवै बोधकः पिता।
उभयोरन्तरं ज्ञात्वा पितरं गुरुमर्चयेत्॥ ९२
अङ्गशुश्रूषया चापि धनाद्यैः स्वार्जितेगुरुम्।
पादादिकेशपर्यन्तं लिङ्गान्यङ्गानि यद्गुरोः॥ ९३
धनरूपैः पादुकाद्यैः पादसङ्ग्रहणादिभिः।
स्तानाभिषेकनेवेद्यैर्भोजनेश्च प्रपूजयेत्॥ ९४
गुरुपूजैव पूजा स्याच्छिवस्य परमात्मनः।
गुरुसेवा तु यत्सर्वमात्मशुद्धिकरी भवेत्॥ ९५
गुरोः शेषः शिवोच्छिष्टं जलमन्नादिनिर्मितम्।
शिष्याणां शिवभक्तानां ग्राह्यं भोज्यं भवेद् द्विजा: ॥ ९६
गुर्वनुज्ञाविरहितं चोरवत्सकलं भवेत्।
गुरोरपि विशेषज्ञं यलाद् गृह्णीत वै गुरुम्॥ ९७
अज्ञानमोचनं साध्यं विशेषज्ञो हि मोचकः।
अतः बुद्धिमान् शिष्यको उन गुरुके जाद पजर र मलल भवेद् बुधः। | अतः बुद्धिमान. शिष्यको उन गुरुके शह
गुरुलिंग समझना चाहिये। गुरुजीकी सेवा-शुत्रूषा हो
गुरुलिंगकी पूजा होती है । शरीर, मन और वाणीसे कौ
गयी गुरुसेवासे शास्त्रज्ञान प्राप्त होता है । अपनी शक्तिसे
शक्य अथवा अशक्य जिस बातका भी आदेश गुरुने
दिया हो, उसका पालन प्राण और धन लगाकर पवित्रात्मा
शिष्य करता है, इसीलिये इस प्रकार अनुशासित
रहनेवालेको शिष्य कहा जाता है ॥ ८६-८८॥
सुशील शिष्यको शरीर-धारणके सभी साधन
गुरुको अर्पित करके तथा अन्नका पहला पाक उन्हें
समर्पित करके उनकी आज्ञा लेकर भोजन करना
चाहिये। शिष्यको निरन्तर गुरुके सान्तिध्यके कारण पुत्र
कहा जाता है। जिह्वारूप लिंगसे मन्त्ररूपी शुक्रका
कानरूपी योनिमें आधान करके जो पुत्र उत्पन्न होता है,
उसे मन्त्रपुत्र कहते हैं । उसे अपने पितास्वरूप गुरुक
सेवा करनी ही चाहिये। शरीरको उत्पन्न करनेवाला
पिता तो संसारप्रपंचमें पुत्रको डुबोता है । ज्ञान देनेवाला
गुरुरूप पिता संसारसागरसे पार कर देता है । इन दोनों
'पिताओंके अन्तरको जानकर गुरुरूप पिताकी अपने
कमाये धनसे तथा अपने शरीरसे विशेष सेवा-पूजा करनी
चाहिये। पैरसे केशपर्यन्त जो गुरुके शरीरके अंग हैं,
उनकी भिन्न-भिन्न प्रकारसे यथा-स्वयं अर्जित धनके
द्वार उपयोगकी सामग्री प्राप्त कराकर, अपने हाथोंसे पैर
दबाकर, स्नान-अभिषेक आदि कराकर तथा नैवेद्यः
भोजनादि देकर पूजा करनी चाहिये ॥ ८९--९४॥
गुरुकी पूजा ही परमात्मा शिवकी पूजा है!
गुरुके उपयोगसे बचा हुआ सारा पदार्थ आत्मशुदि
करनेवाला होता है॥ ९५॥
हे द्विजो! गुरुका शेष, जल तथा अन्न आदिसे
बना हुआ शिवोच्छिष्ट शिवभक्तों और शिष्योंकें लिये
ग्राह्य तथा भोज्य है | गुरुकी आज्ञाके बिना
लाया हुआ सब कुछ वैसा ही है, जैसे चोर चोरी करके
लायी हुई वस्तुका उपयोग करता है गुरुसे भी
ज्ञानवान् पुरुष मिल जाय, तो उसे भी यत्नपूर्वक गु
बना लेना चाहिये। अज्ञानरूपी बन्थनसे छूटना ह
जीवमात्रके लिये साध्य पुरुषार्थ है। अतः जो विशेर्ष
ज्ञानवान् है, बही जीवको उस बन्धनसे छुड़ा सक्ती
है॥ ९६-९७१/२॥
न १८]
विद्येश्वरसंहिता
१४५
आदौ च विघ्नशमनं कर्तव्यं कर्मपूर्तये ॥ ९८
निर्विघ्नेन कृतं साङ्गं कर्म वे सफलं भवेत्।
तस्मात्सकलकर्मादौ विघ्नेशं पूजयेद् बुधः ॥ ९९
सर्वबाधानिवृत्त्र्थ सर्वान्देवान् यजेद् बुध: ।
ज्चरादिग्रन्थिरोगाश्च बाधा ह्याध्यात्मिकी मता॥ १००
पिशाचजम्बुकादीनां वल्मीकाद्युद्धवे तथा।
अकस्मादेव गोधादिजन्तूनां पतनेऽपि च॥ १०९
गृहे कच्छपसर्पसत्रीदुर्जनादर्शनेऽपि च।
वृक्षनारीगवादीनां प्रसूतिविषयेऽपि च॥ १०२
भाविदुःखं समायाति तस्मात्ते भौतिका मता: ।
अमेध्याशनिपातश्च महामारी तथैव च॥ १०३
ज्वरमारी विषूचिश्च गोमारी च मसूरिका।
जन्मर्क्षग्रहसङ्क्रान्तिग्रहयोगाः स्वराशिके ॥ १०४
दुःस्वप्नदर्शनाद्याश्च मता वै ह्याधिदैविकाः।
शवचाण्डालपतितस्पर्शादन्तगृहे गते॥ १०५
एतादूशे समुत्पन्ने भाविदुःखस्य सूचके।
शान्तियज्ञं तु मत्िमान्कुरयात्तद्देषशान्तये॥ १०६
देवालयेऽथ गोष्ठे वा चैत्ये वापि गृहाङ्गणे।
प्रदेशोन्नतधिष्ण्ये वै द्विहस्ते च स्वलङ्कृते॥ १०७
भारमात्रं ब्रीहिधान्यं प्रस्थाप्य परिसृत्य च।
मध्ये विलिख्य कमलं तथा दिक्षु विलिख्य वै॥ १०८
तन्तुना वेष्टितं कुम्भं नवगुग्गुलधूपितम्।
मध्ये स्थाप्य महाकुम्भ तथा दिक्ष्वपि विन्यसेत्॥ १०९
सनालाम्रककूर्चादीन्कलशांश्च॒तथाष्टसु।
पूरयन्मन्त्रपूतेन प्जद्रव्ययुतेन हि॥ ११
प्रक्षिपे्नवरल्ानि जीलादीन्क्रमशस्तथा।
कर्मज्ञं च वरयेद् बुधः॥ ९१९
कर्मकी सांगोपांग पूर्तिके लिये पहले विघ्नशान्ति
करनी चाहिये। निर्विघ्नतापूर्वक तथा सांग सम्पन्न
हुआ कार्य ही सफल होता है। इसलिये सभी कर्मोके
प्रारम्भमें बुद्धिमान् व्यक्तिको विघ्नविनाशक गणपतिका
पूजन करना चाहिये। सभी बाधाओंको दूर करनेके
लिये विद्वान् व्यक्तिको सभी देवताओंकी पूजा करनी
चाहिये ॥ ९८-९९१/२॥
ज्वर आदि ग्रन्थिरोग आध्यात्मिक बाधा कही जाती
है। पिशाच और सियार आदिका दीखना, बाँबीका
जमीनपर उठ आना, अकस्मात् छिपकली आदि
जन्तुओंका गिरना, घरमें कच्छप, साँप, दुष्ट स्त्रीका
दीखना, वृक्ष, नारी और गौ आदिकी प्रसूतिका दर्शन
होना आगामी दुःखका संकेत होता है। अतः यह
आधिभौतिक बाधा मानी जाती है। किसी अपवित्र
वस्तुका गिरना, बिजली गिरना, महामारी, ज्वरमारी,
हैजा, गोमारी, मसूरिका (एक प्रकारका शीतला
रोग), जन्मनक्षत्रपर ग्रहण, संक्रान्ति, अपनी राशिमें
अनेक ग्रहोंका योग होना तथा दुःस्वप्नदर्शश आदि
आधिदैविक बाधा कही जाती है॥ १००--१०४१/२॥
शव, चाण्डाल और पतितका स्पर्श अथवा
इनका घरके भीतर आना भावी दुःखका सूचक होता
है। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि उस दोषकी
शान्तिके लिये शान्तियज्ञ करे। किसी मन्दिर, गोशाला,
यज्ञशाला अथवा घरके आँगनमें जहाँ दो हाथपर
ऊँची जमीन हो, उसे अच्छी तरह साफ करके उसपर
एक भार धान रखकर उसे फैला दे। उसके बीचमें
कमल बनाये तथा कोणसहित आठों दिशाओंमें भी
कमल बना दे। फिर प्रधान कलशमें सूत्र बाँधकर तथा
गुग्गुलकी धूप दिखाकर उसे बीचमें तथा दिशाओंमें
बनाये गये कमलोंपर अन्य आठ कलश स्थापित कर
दे॥ १०५-१०९॥
आठ कलशोंमें कमल, आम्रपल्लव, कुशा डालकर
[गन्ध आदि] पंचद्रव्योंसे युक्त मन्त्रपूत जलसे उन्हें
भरे। उन समस्त कलशोंमें नीलम आदि नवरत्नोंको
क्रमशः डालना चाहिये । तत्पश्चात् बुद्धिमान् यजमान
कर्मकाण्डको जाननेवाले सपत्नीक आचार्यका वरण
१४६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १८
सुवर्णप्रतिमां विष्णोरिन्द्रादीनां च निक्षिपेत्।
सशिरस्के मध्यकुम्भे विष्णुमावाह्य पूजयेत्॥ ११२
प्रागादिषु यथामनत्रमिनद्रादीन्क्रमशो यजेत्।
तत्तन्नाम्ना चतुर्थ्या च नमोऽन्तेन यथाक्रमम्॥ ११३
आवाहनादिकं सर्वमाचार्येणैव कारयेत्।
आचार्यऋत्विजैः सार्ध तन्मन्त्रा्प्रजपेच्छतम्॥ ११४
कुम्भस्य पश्चिमे भागे जपान्ते होममाचरेत्
'कोटिं लक्षं सहस्त्रं वा शतमष्टोत्तरं बुधाः॥ ११५
एकाहं वा नवाहं वा तथा मण्डलमेव वा।
यथायोग्यं प्रकुर्वीत कालदेशानुसारतः॥ ११६
शमीहोमश्च शान्त्यर्थे वृत्त्यर्थे च पलाशकम्।
समिदन्नाज्यकेर्द्रव्यै्नाम्ना मन्त्रेण वा हुनेत्॥ ११७
प्रारम्भे यत्कृतं द्रव्यं तत्तक्रियान्तं समाचरेत्।
पुण्याहं वाचयित्वान्ते दिने सम्प्रोक्षयेज्जले: ॥ १९८
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्यावदाहुतिसङ्ख्यया ।
आचार्यश्च हविष्याशी ऋत्विजश्च भवेद् बुधाः॥ १९९
आदित्यादीन्ग्रहानिष्ट्वा सर्वहोमान्त एव हि।
ऋत्विगभ्यो दक्षिणां दद्यान्नवरलं यथाक्रमम्॥ १२०
दशदानं ततः कुर्याद् भूरिदानं ततः परम्।
बालानामुपनीतानां गृहिणां वनिनां धनम्॥ १२१
कन्यानां च सभर्तृणां विधवानां ततः परम्।
तन्त्रोपकरणं सर्वमाचार्याय निवेदयेत्॥ १२२
करे। भगवान् विष्णुकी स्वर्णप्रतिमा तथा सुवरणप्रतिमा विष्णोरिद्रादीनां च निक्षिपेत् | करे। भगवान् विष्णुको स्वर्णप्रतिमा तथा इ
देवताओंकी भी प्रतिमाएँ बनाकर उन कलश
छोड़े। पूर्णपात्रसे ढके मध्यकलशपर भगवान्
आवाहन करके उनकी पूजा करे। पूर्व दिशासे प्रारम्भ
करके सभी दिशाओंमें मन्त्रानुसार इन्द्रादिका क्रमश;
पूजन करना चाहिये | उनके नामोंमें चतुर्थी विभक्तिसहित
नमःका प्रयोग करते हुए उनका पूजन करना
चाहिये॥ ११०-११३॥
आवाहनादि सारे कार्य आचार्यद्वारा सम्पन
कराये तथा आचार्य और ऋत्विजोंसहित उन देवताओंके
मन्त्रोंको सौ-सौ बार जपे। कलशोंकी पश्चिम दिशामें
जपके बाद होम करना चाहिये। हे विद्वज्जनो! वह
जपहोम करोड़, लाख, हजार अथवा १०८ कौ
संख्यामें हो सकता है। इस विधिसे एक दिन, नौ
दिन अथवा चालीस दिनोंमें देश-कालकी व्यवस्थाके
अनुसार [शान्तियज्ञ] यथोचित रूपमें सम्मन
करे॥ ११४-११६॥
शान्तिके लिये शमी तथा वृत्ति (रोजगार)-के
लिये पलाशकी समिधासे, अन्न, घृत तथा [ सुगन्धित]
द्रव्योंसे उन देवताओंके नाम अथवा मन्त्रोंसे हवन
करना चाहिये। प्रारम्भमें जिस द्रव्यका उपयोग किया
हो, अन्ततक उसीका प्रयोग करते रहना चाहिये।
अन्तिम दिन पुण्याहवाचन कराकर कलशोंके जलसे
प्रोक्षण करना चाहिये । तत्पश्चात् आहुतिकी संख्याके
बराबर ब्राह्णोंको भोजन कराये | हे विद्वानो ! आचार्य
और ऋत्विजोंको हविष्यका भोजन करी
चाहिये॥ ११७--११९ ॥
सूर्य आदि नवग्रहोंका होमके अन्तमें पूर्णा
करना चाहिये । ऋत्विजोंको क्रमानुसार
दक्षिणा देनी चाहिये । तत्पश्चात् दशदान करे
उसके बाद भूयसीदान करना चाहिये। बाल
यज्ञोपवीती, गृहस्थाश्रमी और वानप्रस्थियोंको धन
दान करना चाहिये। तत्पश्चात् कन्या, सधवा
विधवा स्त्रियोंको देनेके अनन्तर बची हुई तथा
बची हुई सारी सामग्री आचार्यको समर्पित कर
चाहिये॥ १२०--१२२॥
नन १८]
विद्येश्वरसंहिता
उत्पातानां च मारीणां दुःखस्वामी यम: स्मृतः।
तस्माद्यमस्य प्रीत्यर्थ कालदानं प्रदापयेत्॥ १२३
शतनिष्केण वा कुर्याहशनिष्केण वा पुन: ।
पाशांकुशधरं कालं कुर्यात्पुरुषरूपिणम्॥ १२४
ततस्वर्णप्रतिमादानं कुर्याद्दक्षिणया सह।
तिलदानं ततः कुर्यात्पूर्णायुष्यप्रसिद्धये॥ १२५
आज्यावेक्षणदानं च कुर्याद्व्याधिनिवृत्तये।
सहस्त्रं भोजयेद्विप्रान्दरिद्रः शतमेव वा॥ १२६
वित्ताभावे दरिद्रस्तु यथाशक्ति समाचरेत्।
भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये॥ १२७
महाभिषेकं नैवेद्यं शिवस्यान्ते तु कारयेत्
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्धूरिभोजनरूपतः ॥ १२८
एवं कृतेन यज्ञेन दोषशान्तिमवाप्नुयात्।
शान्तियज्ञमिमं कुर्याद्वर्षे वर्षे तु फाल्गुने॥ १२९
दुर्दर्शनादौ सद्यो वै मासमात्रे समाचरेत्।
महापापादिसम्प्राप्तौ कुर्याद्भैरवपूजनम्॥ १३०
महाव्याधिसमुत्पत्तौ सङ्कल्पं पुनराचरेत्।
सर्वाभावे दरिद्रस्तु दीपदानमथाचरेत्॥ १३१
तदप्यशक्तः स्तात्वा वै यत्किञ्चिद् दानमाचरेत्।
दिवाकरं नमस्कुर्यान्मनत्रेणाष्टोत्तरं शतम्॥ १३२
सहस्रमयुतं लक्षं कोटिं वा कारयेद् बुधः ।
जमस्कारात्मयज्ञेन तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः॥ १३३
त्वत्स्वरूपेऽर्पिता बुद्धिर्न तेऽशून्ये च रोचते।
या चास्त्यस्मदहनतेति त्वयि दृष्टे विवर्जिता॥ १३४
नम्रोऽहं हि स्वदेहेन भो महांस्त्वमसि प्रभो।
न शून्यो मत्स्वरूपो वै तव दासोऽस्मि साम्प्रतम्॥ १३५
यथायोग्यं स्वात्मयज्ञं नमस्कारं प्रकल्पयेत्।
अथात्र शिवनैवेद्यं दत्त्वा ताम्बूलमाहरेत्॥
१४७
उत्पात, महामारी और दुःखोंके स्वामी यमराज
माने जाते हैं। इसलिये यमराजकी प्रसन्नताके लिये
कालप्रतिमाका दान करना चाहिये। सौ निष्क या दस
निष्कके परिमाणकी पाश और अंकुश धारण कौ
हुई पुरुषके आकारकी स्वर्णप्रतिमा बनाये। उस
स्वर्णप्रतिमाका दक्षिणासहित दान करना चाहिये | उसके
बाद पूर्णायु प्राप्त करनेहेतु तिलका दान करना चाहिये।
रोगनिवारणके लिये घृतमें अपनी परछाई देखकर दान
करना चाहिये। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराना
चाहिये, धनाभावमें सौ अथवा यथाशक्ति ब्राह्मणोंको
भोजन कराना चाहिये॥ १२३-१२६९/२॥
भूत आदिकी शान्तिक लिये भैरवकी
महापूजा करे। अन्तमें भगवान् शिवका महाभिषेक
और नैवेद्य समर्पित करके ब्राह्मणोंको भूरिभोजन
कराना चाहिये ॥ १२७-१२८॥
इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करनेसे दोषोंकी शान्ति
हो जाती है । इस शान्तियज्ञका प्रतिवर्ष फाल्गुनमासमें
आयोजन करना चाहिये। अशुभ दर्शन होनेपर तुरंत
अथवा एक महीनेके भीतर यज्ञका आयोजन करना
चाहिये। महापाप हो जाय, तो भेरवकी पूजा करनी
चाहिये । महाव्याधि हो जाय, तो यज्ञका पुनः संकल्प
लेकर उसे सम्पन्न करना चाहिये। अकिंचन दरिद्र
व्यक्ति तो केवल दीपदान कर दे। उतना भीन हो
सके, तो स्नान करके कुछ दान कर दे। एक सौ आठ,
एक हजार, दस हजार, एक लाख या एक करोड़
मन्त्रोंसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करे। इस नमस्कारात्मक
यज्ञसे सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं ॥ १२९-१३३॥
भगवान् शिवको इस प्रकार प्रार्थना करे-मेरी
बुद्धि आपके ज्योतिर्मय पूर्णस्वरूपमें लगी है। मुझमें
जो अहंता थी, बह आपके दर्शनसे नष्ट हो गयी है। मैं
अपनी देहसे आपको प्रणाम करता हूँ। हे प्रभो! आप
महान् हैं । आप पूर्ण हैं और मेरा स्वरूप भी आप ही हैं,
तो भी इस समय में आपका दास हूँ। इस प्रकार
यथायोग्य नमस्कारपूर्वक स्वात्मयज्ञ करना चाहिये।
तत्पश्चात् भगवान् शिवको नैवेद्य देकर ताम्बूल समर्पित
करना चाहिये॥ १३४-१३६॥
१४८
शिवप्रदक्षिणं कुर्यात्स्वयमष्टोत्तर शतम् ।
सहस्त्रमयुतं लक्षं कोटिमन्येन कारयेत्॥ १३७
शिवप्रदक्षिणात्सर्व पातकं नश्यति क्षणात्।
दुःखस्य मूलं व्याधिहि व्याधेर्मूलं हि पातकम्॥ १३८
धर्मेणैव हि पापानामपनोदनमीरितम्।
शिवोद्देशकृतो धर्मः क्षमः पापविनोदने॥ १३९
अध्यक्षं शिवधर्मेषु प्रदक्षिणमितीरितम्।
क्रियया जपरूपं हि प्रणवं तु प्रदक्षिणम्॥ १४०
जननं मरणं द्वद्वं मायाचक्रमितीरितम्।
शिवस्य मायाचक्रं हि बलिपीठं तदुच्यते॥ १४१
बलिपीठं समारभ्य प्रादक्षिण्यक्रमेण वै।
पदे पदान्तरं गत्वा बलिपीठं समाविशेत्॥ १४२
नमस्कारं ततः कुर्यात्प्रदक्षिणमितीरितम्।
निर्गमाज्जननं प्राप्तं नमस्त्वात्मसमर्पणम्॥ १४३
जननं मरणं द्रनद्रं शिवमायासमर्पितम्।
शिवमायार्पितद्वन्द्दो न पुनस्त्वात्मभागभवेत्॥ १४४
यावहेहं क्रियाधीनः स जीवो बद्ध उच्यते।
देहत्रयवशीकारे मोक्ष इत्युच्यते बुधैः॥ १४५
मायाचक्रप्रणेता हि शिवः परमकारणम्।
शिवमायार्पितद्वनद्रं शिवस्तु परिमार्जति॥ १४६
शिवेन कल्पितं द्वन्द्वं तस्मिन्नेव समर्पयेत्।
शिवस्यातिप्रियं विद्यात्प्रदक्षिणनमो बुधाः॥ १४७
प्रदक्षिणनमस्काराः शिवस्य परमात्मनः।
षोडशैरुपचारैश्च कृता पूजा फलप्रदा॥ १४८
प्रदक्षिणाऽविनाश्यं हि पातकं नास्ति भूतले।
तस्मात्प्रदक्षिणेनैव सर्वपापं विनाशयेत्॥ १४९
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १८
तब स्वयं १०८ बार शिवकी प्रदक्षिणा
चाहिये। एक हजार, दस हजार, एक लाख या करे
प्रदक्षिणा दूसरोंके द्वारा करायी जा सकती है। शिक्ष
प्रदक्षिणासे सारे पापोंका तत्क्षण नाश हो जाता है,
दुःखका मूल व्याधि है और व्याधिका मूल पापे
होता है। धर्माचरणसे ही पापोंका नाश बताया गया
है। भगवान् शिवके उद्देश्यसे किया गया धर्माचरण
पापोंका नाश करनेमें समर्थ होता है॥ १३७--१३९॥
शिवके धर्मोमें प्रदक्षिणाको प्रधान कहा गया
है। क्रियासे जपरूप होकर प्रणव ही प्रदक्षिणा बन
जाता है। जन्म और मरणका इन्द्र ही मायाचक्र
कहा गया है। शिवका मायाचक्र ही बलिपीठ
कहलाता है। बलिपीठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणाके
क्रमसे एक पैरके पीछे दूसरा पैर रखते हुए बलिपीठमें
पुनः प्रवेश करना चाहिये। तत्पश्चात् नमस्कार
करना चाहिये। इसे प्रदक्षिणा कहा जाता है।
बलिपीठसे बाहर निकलना जन्म प्राप्त होना और
नमस्कार करना ही आत्मसमर्पण है॥ १४०--१४३॥
जन्म और मरणरूप द्वन्द भगवान् शिवकी मायासे
प्राप्त है। जो इन दोनोंको शिवकी मायाको ही अर्पित
कर देता है, वह फिर शरीरके बन्धनमें नहीं पड़ता।
जबतक शरीर रहता है, तबतक जो क्रियाके ही अधीन
है, बह जीव बद्ध कहलाता है। स्थूल, सूक्ष्म और
कारण--तीनों शरीरोंको वशमें कर लेनेपर जीवका मो
हो जाता है, ऐसा ज्ञानी पुरुषोंका कथन है । मायाचक्रके
निर्माता भगवान् शिव ही परम कारण हैं। वे
मायाके दिये हुए द्रन्द्रका स्वयं ही परिमार्जन करते हैं|
अत: शिवके द्वारा कल्पित हुआ इन्र उन्हींको समपि
कर देना चाहिये ॥ १४४ १४६१/२॥
हे विद्वानो! प्रदक्षिणा और नमस्कार शिवकी
अतिप्रिय हैं, ऐसा जानना चाहिये। भगवान्.
प्रदक्षिणा, नमस्कार और षोडशोपचार पूजन
फलदायी होता है। ऐसा कोई पाप इस पृथ्वी पर ह
है, जो शिवप्रदक्षिणासे नष्ट न हो सके। इसत
प्रदक्षिणाका आश्रय लेकर सभी पापोंका नाश
लेना चाहिये ॥ १४७--१४९॥
न
१४९
ose ० TOE Ci Si
जो शिवकी पूजामें तत्पर हो, वह मौन रहे, सत्य आदि
॥ १५०
ऐश्वर्य दिव्यदेहश्च ज्ञानमज्ञानसङ्क्षयः।
शिवसानिध्यमित्येतत्क्रियादीनां फलं भवेत्॥ १५१
करणेन फलं याति तमसः परिहापनात्।
जन्मनः परिमार्जित्वाज्जबुद्धया जनितानिव॥ १५२
यथादेशं यथाकालं यथादेहं यथाधनम्।
यथायोग्यं प्रकुर्वीत क्रियादीन् शिवभक्तिमान्॥ १५३
ज्यायार्जितसुवित्तेन वसेत्प्राज्ञः शिवस्थले।
जीवहिंसादिरहितमतिक्लेशविवर्जितम् ॥ १५४
पञ्चाक्षरेण जप्तं च तोयमन्नं विदुः सुखम्।
अथवाहुर्दरिद्रस्य भिक्षान्नं ज्ञानदं भवेत्॥ १५५
शिवभक्तस्य भिक्षान्नं शिवभक्तिविवर्धनम्।
शम्भुसत्रमिति प्राहुर्भिक्षान्नं शिवयोगिनः ॥ १५६
येन केनाप्युपायेन यत्र कुत्रापि भूतले।
शुद्धान्नभुक्सदा मौनी रहस्यं न प्रकाशयेत्॥ १५७
प्रकाशयेत्तु भक्तानां शिवमाहात्म्यमेव हि।
रहस्यं शिवमन्त्रस्य शिवो जानाति नापरः॥ १५८
शिवभक्तो वसेनित्यं शिवलिङ्गं समाश्रित: ।
स्थाणुलिङ्काश्रयेणैव स्थाणुर्भवति भूसुराः॥ १५९
पूजया चरलिड्कस्य क्रमान्मुक्तो भवेद् ध्रुवम्
सर्वमुक्तं समासेन साध्यसाधनमुत्तमम्॥ १६०
व्यासेन यत्पुरा प्रोक्तं यच्छतं हिं मया पुरा।
भद्रमस्तु हि बोऽस्माकं शिवभक्तिृढास्तु सा ॥ १६१
य इमं पठतेऽध्यायं यः श्रृणोति नरः सदा।
शिवज्ञानं स लभते शिवस्य कृपया बुधाः॥ १६२
| तथा क्रिया, जप, तप, ज्ञान और ध्यानमेंसे
'एक-एकका अनुष्ठान करता रहे । ऐश्वर्य, दिव्य शरीरकी
प्राप्ति, ज्ञानका उदय, अज्ञानका निवारण और भगवान्,
शिवके सामीप्यका लाभ--ये क्रमशः क्रिया आदिके फल
हैं निष्काम कर्म करनेसे अज्ञानका निवारण हो जानेके
कारण शिवभक्त पुरुष उसके यथोक्त फलको पाता है ।
शिवभक्त पुरुष देश, काल, शरीर और धनके अनुसार
यथायोग्य क्रिया आदिका अनुष्ठान करे॥ १५०--१५३ ॥
न्यायोपार्जित उत्तम धनसे निर्वाह करते हुए विद्वान्
पुरुष शिवके स्थानमें निवास करे। जीवहिंसा आदिसे
रहित और अत्यन्त क्लेशशून्य जीवन बताते हुए पंचाक्षर
मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित अन्न और जलको सुखस्वरूप
माना गया है अथवा यह भी कहते हैं कि दरिद्र पुरुषके
लिये भिक्षासे प्राप्त हुआ अन्न ज्ञान देनेवाला होता है,
शिवभक्तको भिक्षान्न प्राप्त हो, तो वह शिवभक्तिको
बढ़ानेवाला होता है । शिवयोगी पुरुष भिक्षान्नको शम्भुसत्र
कहते हैं जिस किसी भी उपायसे जहाँ-कहीं भी भूतलपर
शुद्ध अन्नका भोजन करते हुए सदा मौनभावसे रहे
और अपने साधनका रहस्य किसीपर प्रकट न करे।
भक्तोंके समक्ष ही शिवके माहात्म्यको प्रकाशित करे।
शिवमन्त्रके रहस्यको भगवान् शिव ही जानते हैं, दूसरा
कोई नहीं जान पाता॥ १५४--१५८॥
'शिवभक्तको सदा शिवलिंगके आश्रित होकर वास
करना चाहिये। हे ब्राह्मणो! शिवलिंगाश्रयके प्रभावसे
वह भक्त भी शिवरूप ही हो जाता है । चरलिंगकी पूजा
करनेसे वह क्रमशः अवश्य ही मुक्त हो जाता है । महर्षि
व्यासने पूर्वकालमें जो कहा था और मैंने जैसा सुना था,
उस सब साध्य और साधनका संक्षेपमें मैंने वर्णन कर
दिया। आप सबका कल्याण हो और भगवान् शिवमें
आपकी दृढ़ भक्ति बनी रहे । जो मनुष्य इस अध्यायका
पाठ करता है अथवा जो इसे सुनता है, हे विज्ञजनो!
बह भगवान् शिवको कृपासे शिवज्ञानको प्राप्त कर लेता
है॥ १५९-१६२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायांविद्वेश्वरसंहिताया साध्यसाधनखण्डे शिवलिज्ञमाहात्यवर्णन नामाष्यदशोऽध्यायः ॥ १८॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत प्रथम विद्योशवरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें शिवलिङ्गके
माहाल्यका वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥
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[अ० १३
शा एफ पल पक जज . / >> त्च्छ
१५० श्रीशिवमहापुराण
अथैकोनविंशो$ध्याय:
पार्थिव शिवलिंगके पूजनका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले-हे सूतजी! आप चिरंजीव
सूत सूत चिरञ्जीव धन्यस्त्वं शिवभक्तिमान्। हों। आप धन्य हैं, जो परम शिवभक्त हैं । आपने शुष
सम्यगुक्तस्त्वया लिङ्गमहिमा सत्फलप्रदः॥ १
यत्र॒ पार्थिवमाहेशलिङ्गस्य महिमाधुना।
सर्वोत्कृष्टश्च कथितो व्यासतो ब्रूहि तं पुन:॥ २
सूत उवाच
श्रुणुध्वमृषय: सर्वे सद्भक्त्यादरतोऽखिलाः।
शिवपार्थिवलिङ्गस्य महिमा प्रोच्यते मया॥ ३
उक्तेष्वेतेषु लिङ्गेषु पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्।
तस्य पूजनतो विप्रा बहवः सिद्धिमागताः॥ ४
हरिब्रह्मा च ऋषयः सप्रजापतयस्तथा।
सम्पूज्य पार्थिवं लिङ्गं प्रापुः सर्वेष्सितं द्विजा: ॥ ५
देवासुरमनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः।
अन्येऽपि बहवः सिद्धिं तं सम्पूज्य गताः पराम्॥ ६
कृते रलमयं लिङ्गं त्रेतायां हेमसम्भवम्।
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे॥ ७
अष्टमूर्तिषु सर्वासु मूर्तिवे पार्थिवी वरा।
अनन्यपूजिता विप्रास्तपस्तस्मान्महत्फलम्॥ ८
यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठः महेश्वरः।
एवं सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते॥ ९
यथा नदीषु सर्वासु ज्येष्ठा श्रेष्ठा सुरापगा।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते॥ १०
यथा सर्वेषु मन्त्रेषु प्रणवो हि महान्स्मृतः।
तथेदं पार्थिवं श्रेष्ठमाराध्यं पूज्यमेव हि॥ ११
यथा सर्वेषु वणेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठ उच्यते।
'फलको देनेवाली शिवलिंगकी महिमा सम्यकू प्रकारे
बतायी। अब आप व्यासजीद्वारा वर्णित भगान
शिवके सर्वोत्कृष्ट पार्थिव लिंगकी महिमाका वर्णन
करें ॥ १-२॥
सूतजी बोले--हे ऋषियो ! मैं शिवके पार्थिव
'लिंगकी महिमा बता रहा हूँ, आप लोग भक्ति और
आदरसहित इसका श्रवण करें। हे द्विजो! अभीतक
बताये हुए सभी शिवलिंगोंमें पार्थिव लिंग सर्वोत्तम है।
उसकी पूजा करनेसे अनेक भक्तोंको सिद्धि प्राप्त हुई
है॥ ३-४॥
हे ब्राह्मणो ! ब्रह्मा, विष्णु, प्रजापति तथा अनेक
ऋषियोंने पार्थिव लिंगकी पूजा करके अपना सम्पूर्ण
अभीष्ट प्राप्त किया है । देव, असुर, मनुष्य, गर्व
नाग, राक्षसगण और अन्य प्राणियोंने भी उसकी पूजा
करके परम सिद्धि प्राप्त की है॥ ५-६॥
सत्ययुगमें मणिलिंग, त्रेतायुगमें स्वर्णलिंग,
द्वापरयुगमे पारदलिंग और कलियुगमें पार्थिवलिंगकी
श्रेष्ठ कहा गया है। भगवान् शिवकी सभी आठ*
मूर्तियोंमें पार्थिव मूर्ति श्रेष्ठ है। किसी अन्यद्वार १
पूजी हुई (नवनिर्मित) पार्थिव मूर्तिकी पूजा करते
तपस्यासे भी अधिक फल मिलता है॥ ७:८॥
जैसे सभी देवताओंमें शंकर ज्येष्ठ और श्रेष्ठ की
जाते हैं, उसी प्रकार सभी लिंगमूर्तियोंमें पार्थिवाला
श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे सभी नदियोंमें गंगा जेर
और श्रेष्ठ कही जाती है, वैसे ही सभी लिंगमूर्तियों)
पार्थिव लिंग श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे सभी मत्र
प्रणव (3) महान् कहा गया है, उसी प्रकार
यह पार्थिबलिंग श्रेष्ठ, आराध्य तथा पूजनीय होती
जैसे सभी वर्णम ब्राह्मण श्रेष्ठ कहा जाता है,
= पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा तथा यजमान-ये शिवकी आठ मूर्तियाँ हैं।
डे १९]
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥ १२
यथा पुरीषु सर्वासु काशी श्रेष्ठतमा स्मृता।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते॥ १३
यथा त्रतेषु सर्वेषु शिवरात्रिव्रतं परम्।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते॥ १४
यथा देवीषु सर्वासु शैवी शक्तिः परा स्मृता।
तथा सर्वेषु लिङ्गेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते॥ १५
प्रकृत्य पार्थिवं लिङ्गं योऽन्यदेवं प्रपूजयेत्।
वृथा भवति सा पूजा स्नानदानादिकं वृथा॥ १६
पार्थिवाराधनं पुण्यं धन्यमायुर्विवर्धनम्।
तुष्टिदं पुष्टिदं श्रीदं कार्य साधकसत्तमैः ॥ १७
यथालब्धोपचारैश्च भक्तिश्रद्धासमन्वितः।
पूजयेत्पार्थिवं लिङ्गं सर्वकामार्थसिद्धिदम्॥ १८
यः कृत्वा पार्थिवं लिङ्गं पूजयेच्छुभवेदिकम्।
इहेव धनवाउ्छीमानन्ते रुद्रोऽभिजायते॥ १९
त्रिसश्यं योऽर्चयेल्लिङ्गं कृत्वा बिल्वेन पार्थिवम्।
दशैकादशकं यावत्तस्य पुण्यफलं श्रृणु॥ २०
अनेनैव स्वदेहेन रुद्रलोके महीयते।
पापहं सर्वमर्त्यानां दर्शनात्स्पर्शनादपि॥ २१
जीवन्मुक्तः स वै ज्ञानी शिव एव न संशयः।
तस्य दर्शनमात्रेण भुक्ति्मुक्तिश्च जायते॥ २२
शिवं यः पूजयेनित्यं कत्वा लिङ्गं तु पार्थिवम्।
यावज्जीवनपर्यन्तं स॒ याति शिवमन्दिरम्॥ २३
मूडेनाप्रमितान्वषांञ्छिवलोके हि तिष्ठति।
सकामः पुनरागत्य राजेन्दर भारते भवेत्॥ २४
निष्कामः पूजयेन्नित्यं पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्।
शिवलोके सदा हिष्ेत्तस्य सायुज्यमाप्तुयात्॥ २५
विद्येश्वरसंहिता
१५१
सभी लिंगमूर्तियोंमें पार्थिवलिंग श्रेष्ठ कहा जाता
है। जैसे सभी पुरियोंमें काशीको श्रेष्ठतम कहा गया है,
वैसे ही सभी शिवलिंगोंमें पार्थिवलिंग श्रेष्ठ कहा जाता
है । जैसे सभी ब्रतोंमें शिवरात्रिका व्रत सर्वोपरि है, उसी
प्रकार सभी शिवलिंगोंमें पार्थिवलिंग सर्वश्रेष्ठ कहा जाता
है। जैसे सभी देवियोंमें शैवी शक्ति प्रधान मानी जाती
है, उसी प्रकार सभी शिवलिंगोंमें पार्थिवलिंग प्रधान
माना जाता है ॥ ९--१५॥
जो पार्थिवलिंगका निर्माण करनेके बाद किसी
अन्य देवताकी पूजा करता है, उसकी वह पूजा तथा
स्नान-दान आदिकी क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं।
पार्थिव-पूजन अत्यन्त पुण्यदायी तथा सब प्रकारसे
धन्य करनेवाला, दीर्घायुष्य देनेवाला है। यह तुष्टि,
पुष्टि और लक्ष्मी प्रदान करनेवाला है, अतः श्रेष्ठ
साधकोंको पूजन अवश्य करना चाहिये॥ १६-१७॥
उपलब्ध उपचारोंसे भक्ति-श्रद्धापूर्वक पार्थिव
लिंगका पूजन करना चाहिये; यह सभी कामनाओंको
सिद्धि देनेवाला है। जों सुन्दर वेदीसहित पार्थिव
लिंगका निर्माण करके उसकी पूजा करता है, वह इस
लोकमें धन-धान्यसे सम्पन्न होकर अन्तमें रुद्रलोककों
प्राप्त करता है। जो पार्थिवलिंगका निर्माण करके
बिल्वपत्रोंसे ग्यारह वर्षतक उसका त्रिकाल पूजन
करता है, उसके पुण्यफलको सुनिये। वह अपने इसी
शरीरसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसके
दर्शन और स्पर्शसे मनुष्योंके सभी पाप नष्ट हो जाते
हैं। बह जीवन्मुक्त ज्ञानी और शिवस्वरूप है; इसमें
संशय नहीं है। उसके दर्शनमात्रसे भोग और मोक्षकी
प्राप्ति होती है॥ १८--२२॥
जो पार्थिव शिवलिंगका निर्माण करके जीवनपर्यन्त
नित्य उसका पूजन करता है, वह शिवलोक प्राप्त
करता है। वह असंख्य वर्षोंतक भगवान् शिवके
सान्निध्यमें शिवलोकमें वास करता है और कोई
कामना शेष रहनेपर वह भारतवर्षमें सम्राट् बनता है ।
जो निष्कामभावसे नित्य उत्तम पार्थिवलिंगका पूजन
करता है, वह सदाके लिये शिवलोकमें वास करता है
और शिवसायुज्यको प्राप्त कर लेता है॥ २३--२५॥
१५२
पार्थिवं शिवलिङ्गं च विप्रो यदि न पूजयेत्।
स याति नरकं घोरं शूलप्रोतं सुदारुणम्॥ २६
यथाकथञ्चिद्विधिना रम्यं लिङ्गं प्रकारयेत्।
पञ्जसूत्रविधानं च पार्थिवे न विचारयेत्॥ २७
अखण्डं तद्धि कर्तव्यं न विखण्डं प्रकारयेत्
विखण्डं तु प्रकुर्वाणो नैव पूजाफलं लभेत्॥ २८
रत्नजं हेमजं लिङ्गं पारदं स्फाटिकं तथा।
पार्थिवं पुष्परागोत्थमखण्डं तु प्रकारयेत्॥ २९
अखण्डं तु चरं लिङ्गं द्विखण्डमचरं स्मृतम्।
खण्डाखण्डविचारोऽयं सचराचरयोः स्मृतः॥ ३०
वेदिका तु महाविद्या लिङ्गं देवो महेश्वरः ।
अतो हि स्थावरे लिङ्गे स्मृता श्रेष्ठा द्विखण्डता ॥ ३१
द्विखण्डं स्थावरं लिङ्गं कर्तव्यं हि विधानतः।
अखण्डं जङ्गमं प्रोक्तं शैवसिद्धान्तवेदिभिः॥ ३२
द्विखण्डं तु चरं लिङ्गं कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः।
नैव सिद्धान्तवेत्तारो मुनयः शास्त्रकोविदाः॥ ३३
अखण्डं स्थावरं लिङ्गं द्विखण्डं चरमेव च।
ये कुर्वन्ति नरा मूढा न पूजाफलभागिनः॥ ३४
'तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना अखण्डं चरसंज्ञकम्।
द्विखण्डं स्थावरं लिङ्गं कर्तव्यं परया मुदा॥ ३५
अखण्डे तु चरे पूजा सम्पूर्णफलदायिनी।
द्विखण्डे तु चरे पूजा महाहानिप्रदा स्मृता॥ ३६
अखण्डे स्थावरे पूजा न कामफलदायिनी।
प्रत्यवायकरी नित्यमित्युक्तं शास्त्रवेदिभिः॥ ३७
श्रीशिवमहापुराण
[अ १९
यदि ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंगका पूजन
करता है, तो वह अत्यन्त दारुण शूलप्रोत नामक घोर
नरकमें जाता है। किसी भी विधिसे सुन्दर पार्थिवलिङ्ग
निर्माण करना चाहिये, किंतु उसमें पंचसूत्रविधान नह
करना चाहिये॥ २६-२७॥
उसे अखण्ड रूपमें बनाना चाहिये, खण्डितरूफों
नहीं। खण्डित लिंगका निर्माण करनेवाला पूजाका
'फल नहीं प्राप्त करता है। मणिलिंग, स्वर्णलिंग
पारदलिंग, स्फटिकलिंग, पुष्परागलिंग और पार्थिवलिंगको
अखण्ड ही बनाना चाहिये ॥ २८-२९॥
अखण्ड लिंग चरलिंग होता है और दो खण्डवाला
अचरलिंग कहा गया है। इस प्रकार चर और अचा
लिंगका यह खण्ड-अखण्ड विधान कहा गया है।
स्थावरलिंगमें वेदिका भगवती महाविद्याका रूप है
और लिंग भगवान् महेश्वरका स्वरूप है। इसलिये
स्थावर (अचर)-लिंगोंमें वेदिकायुक्त द्विखण्ड लिंग
ही श्रेष्ठ माना गया है॥ ३०-३१॥
द्विखण्ड (वेदिकायुक्त) स्थावर लिंगका विधानपूर्वक
निर्माण करना चीहये। शिवसिद्धान्तके जाननेवालोंने
अखण्ड लिंगको जंगम (चर) लिंग माना है । अज्ञानतावश
ही कुछ लोग चरलिंगको दो खण्डोंमें (वेदिका और
लिंग) बना लेते हैं, शास्त्रोंको जाननेवाले सिद्धान्तमर्मर
मुनिजन ऐसा नहीं करते। जो मूढ़जन अचरलिंगको
अखण्ड तथा चरलिंगको द्विखण्ड रूपमें बनाते हैं, उ
'शिवपूजाका फल नहीं प्राप्त होता॥ ३२--३४॥
इसलिये अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक
चरलिंगको अखण्ड तथा अचरलिंगको द्विखण्ड बर
चाहिये। अखण्ड चरलिंगमें की गयी पूजासे समू
फलकी प्राप्ति होती है। द्विखण्ड चरलिंगकी पर
महान् अनिष्टकर कही गयी है। उसी प्रकार
अचरलिंगकी पूजासे कामना सिद्ध नहीं होती; उप i
तो अनिष्ट प्राप्त होता है--ऐसा शास्त्र
कहा है॥ ३५--३७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे
पार्थिवशिवलिङ्गपूजनमाहात्म्यवर्णनं नामेकोनविशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येशवरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें पार्थिव
शिवलिंगके पूजनका माहात्म्यवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १९॥
— ee
र
ड २०]
विद्येश्वरसंहिता १५३
अथ विंशोऽध्यायः
पार्थिव शिवलिंगके निर्माणकी रीति तथा वेद-मनत्रोद्रारा उसके
पूजनकी विस्तृत एवं संक्षिप्त विधिका वर्णन
सूत उवाच सूतजी बोले-हे महर्षियो! अब मैं
अथ वैदिकभक्तानां पार्थिवार्चा निगद्यते।
वैदिकेनैव मार्गेण भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥ ९
सत्रोक्तविधिना स्नात्वा सन्ध्यां कृत्वा यथाविधि।
ब्रह्मयज्ञं विधायादौ ततस्तर्पणमाचरेत्॥ २
नैत्यिकं सकलं कामं विधायानन्तरं पुमान्।
शिवस्मरणपूर्वं हि भस्मरुद्राक्षधारकः॥ ३
वेदोक्तविधिना सम्यक् सम्पूर्णफलसिद्धये।
पूजयेत्परया भक्त्या पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्॥ ४
नदीतीरे तडागे च पर्वते काननेऽपि च।
शिवालये शुचौ देशे पार्थिवार्चा विधीयते॥ ५
शुद्धप्रदेशसम्भूतां मृदमाहृत्य यलत:।
शिवलिङ्गं प्रकल्पेत सावधानतया द्विजा:॥ ६
विप्रे गौरा स्मृता शोणा बाहुजे पीतवर्णका।
वैश्ये कृष्णा पादजाते ह्यथवा यत्र या भवेत्॥ ७
सङ्गृह्य मृत्तिकां लिङ्गनिर्माणार्थं प्रयलतः।
अतीव शुभदेशे च स्थापयेत्तां मृदं शुभाम्॥ ८
संशोध्य च जलेनापि पिण्डीकृत्य शनैः शनेः।
विधीयेत शुभं लिङ्गं पार्थिवं वेदमार्गत:॥ ९
ततः सम्पूजयेद्धक्त्या भुक्तिमुक्तिफलाप्तये।
तत्प्रकारमहं वच्मि शृणुध्वं सविधानतः॥ १०
कर्मके प्रति श्रद्धाभक्ति रखनेवाले लोगोंके
लिये वेदोक्त मार्गसे ही पार्थिव-पूजाकी पद्धतिका
वर्णन करता हूँ। यह पूजा भोग और मोक्ष दोनोंको
देनेवाली है। आह्निकसूत्रोंमें बतायी हुई विधिके
अनुसार स्नान और सन्ध्योपासना करके पहले ब्रह्मयज्ञ
करे। तत्पश्चात् देवताओं, ऋषियों, सनकादि मनुष्यों
और पितरोंका तर्पण करे। मनुष्यको चाहिये कि
अपनी रुचिके अनुसार सम्पूर्ण नित्यकर्मको पूर्ण करके
शिवस्मरणपूर्वक भस्म तथा रुद्राक्ष धारण करे।
तत्पश्चात् सम्पूर्ण मनोवांछित फलकी सिद्धिके लिये
ऊँची भक्तिभावनाके साथ उत्तम पार्थिव लिंगको
वेदोक्त विधिसे भलीभाँति पूजा करे॥ १-४॥
नदी या तालाबके किनारे, पर्वतपर, वनमें,
शिवालयमें अथवा और किसी पवित्र स्थानमें पार्थिव-
पूजा करनेका विधान है। हे ब्राह्मणो! शुद्ध स्थानसे
निकाली हुई मिट्टीको यलपूर्वक लाकर बड़ी सावधानीके
साथ शिवलिंगका निर्माण करे। ब्राह्मणके लिये श्वेत,
क्षत्रियके लिये लाल, वैश्यके लिये पीली और शूद्रके
लिये काली मिट्टीसे शिवलिंग बनानेका विधान है
अथवा जहाँ जो मिट्टी मिल जाय, उसीसे शिवलिंग
बनाये॥ ५-७॥
शिवलिंग बनानेके लिये प्रयत्नपूर्वक मिट्टीका
संग्रह करके उस शुभ मृत्तिकाको अत्यन्त शुद्ध
स्थानमें रखे । फिर उसकी शुद्धि करके जलसे सानकर
पिण्ड बना ले और वेदोक्त मार्गसे धीरे-धीरे सुन्दर
पार्थिव लिंगकी रचना करे। तत्पश्चात् भोग और
मोक्षरूप 'फलकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक उसका
पूजन करें। उस पार्थिवलिंगके पूजनकी जो विधि
है, उसे मैं विधानपूर्वक बता रहा हूँ, आप लोग
सुनिये॥ ८-१०॥
१५४
श्रीशिबमहापुराण
[अ 3
नमः शिवाय मन्त्रेणार्चनद्रव्यं च प्रोक्षयेत्
भूरसीति च मन्त्रेण क्षेत्रसिद्धिं प्रकारयेत्॥ ११
आपोऽस्मानिति मन्त्रेण जलसंस्कारमाचरेत्।
नमस्ते रुद्रमन्त्रेण स्फाटिकाबन्धमुच्यते॥ १२
शम्भवायेति मन्त्रेण क्षेत्रशुद्धिं प्रकारयेत्।
कुर्यात्पञ्जामृतस्यापि नमःपूर्वेण प्रोक्षणम्॥ १३
नीलग्रीवाय मन्त्रेण नमःपूर्वेण भक्तिमान्।
चरेच्छङ्करलिङ्गस्य प्रतिष्ठापनमुत्तमम्॥ १४
भक्तितस्तत एतत्ते रुद्रावेति च मन्त्रतः।
आसनं रमणीयं वै दद्याद्वेदिकमार्गकृत्॥ १५
मानो महान्तमिति च मन्त्रेणावाहनं चरेत्।
या ते रुद्रेण मन्त्रेण सञ्भरेदुपवेशनम्॥ १६
मन्त्रेण यामिषुमिति न्यासं कुर्याच्छिवस्य च।
अध्यवोचदिति प्रेम्णाधिवासं मनुनाचरेत्॥ १७
मनुनासौ जीव इति देवतान्यासमाचरेत्।
असौ योऽवसर्पतीति चाचरेदुपसर्पणम्॥ १८
' ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रका
करते हुए समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण को
उसपर जल छिड़के। इसके बाद ' भूरसि” इत्या
मन्त्रसे क्षेत्रसिद्धि करे॥ ११॥
फिर “आपो अस्मान्०'* इस मन्त्रसे जलक
संस्कार करे | इसके बाद “नमस्ते रुद्र०'* इस मन्न
स्फाटिकाबन्ध (स्फटिक शिलाका घेरा) बनाने
बात कही गयी है | “नमः शम्भवाय० '* इस मन्न
क्षेत्रशुद्धि और पंचामृतका प्रोक्षण करे।
शिवभक्त पुरुष “नम: ' पूर्वक 'नीलग्रीवाय० '' मन्न
शिवलिंगकी उत्तम प्रतिष्ठा करे। इसके बाद वैदिक
रीतिसे पूजन-कर्म करनेवाला उपासक भक्तिपूर्वक
“एतत्ते रुद्राव०' इस मन्त्रसे रमणीय आसन दे।
“मा नो महान्तम्० ” इस मन्त्रसे आवाहन करे, "या
ते रुद्र०” इस मन्त्रसे भगवान् शिवको आसनफ
समासीन करे। “यामिषुं०” इस मन्त्रसे शिवके
अंगोंमें न्यास करे। ' अध्यबोचत्०'*” इस मन्रमे
प्रेमपूर्वक अधिवासन करे। ' असौ यस्ताम्रो० इस
मन्त्रसे शिवलिंगमें इष्टदेवता शिवका न्यास को।
' असौ योऽवसर्पति० "२ इस मन्त्रसे उपसर्पण (देवताके
१. भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री । पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दूरं ह पृथिवीं मा हि सौः।
२. आपो अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु। विश्वँ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा प
'एमि। दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवाई शग्मां परि दधे भत्रं वर्णं पुष्यन्। (यजु ४।२)
३. नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः। (यजु० १६।१)
४. नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च। (यजु० १६। डी
५. जमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे। अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽकरं नमः। (यजु० १६।८)
६. एतत्ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि। अवततधन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा अहिशसन्नः शिवोऽतीहिं। र
(यजु० ३१
७. मा नो महान्तमुत मा नो अर्भक मा न उक्षितम्। मा नो वधी: पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र हि
(यजु० १६३
८. या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि। (यजु० १६। शो
९. यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिशसीः पुरुषं जगत्। (यजु० १६! ३)
१०. अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्। अहाँश्च सर्वाञ्जम्भयन्तसर्वाश्च यातुधान्योऽधराचीः परा सुव |
)
(यजु० १६ | र
११. असौ यस्ताम्रो अरुण उत बशरुः सुमड्रलः। ये चैन रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्नशोऽवैषाःहेर्ऽ व
(यजु० १
१२. असौ यो$वसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः। उतैनं गोपा अदृश्रनदृश्रन्नुदहार्य: स दृष्टो मृडयाति नः । हणे
(यजु० १
ग ० २०]
नमोऽस्तु नीलग्रीवायेति पाद्यं मनुनाहरेत्।
अर्घ्य च रुद्रगायत्र्याचमनं त्यम्बक्रेण च॥ १९
पयः पृथिव्यां मन्त्रेण पयसा स्नानमाचरेत्।
दधिक्राव्णेति मन्त्रेण दधिस्नानं च कारयेत्॥ २०
घृतस्नानं खलु घृतं घृतयावेति मन्त्रतः।
मधुव्वाता मधुनक्तं मधुमान्न इति त्र्यूचा॥ २९
मधुखण्डस्नपनं प्रोक्तमिति पञ्चामृतं स्मृतम्।
अथवा पाद्यमन्त्रेण स्नानं पञ्जामृतेन च॥ २२
मानस्तोके इति प्रेम्णा मन्त्रेण कटिबन्धनम्।
नमो धृष्णवे इति वा उत्तरीयं च धारयेत्॥ २३
या ते हेतिरिति प्रेम्णा ऋक्चतुष्केण वैदिक: ।
शिवाय विधिना भक्तश्चरेदस्त्रसमर्पणम्॥ २४
नमः श्वभ्य इति प्रेम्णा गन्धं दद्यादूचा सुधीः।
नमस्तक्षभ्य इति चाक्षतान्मन्त्रेण चार्पयेत्॥ २५
विद्येश्वरसंहिता
१५५
समीप गमन) करे। इसके बाद “नमोऽस्तु
नीलग्रीवाय०” इस मन्त्रसे इष्टदेवको पाद्य समर्पित
करे। 'रुद्रगायत्री' से अर्घ्य दे। “त्र्यम्बकं०
मन्त्रसे आचमन कराये। "पयः पृथिव्याम्०‡ इस
मन्त्रसे दुग्धस्नान कराये। “ दधिक्राव्णो" इस
मन्त्रसे दधिस्तान कराये। 'घृतं घृतपावा०' इस
मन्त्रसे घृतस्नान कराये। “मधु वाता०", “मधु
नक्तं० “, ' मधुमान्नो इन तीन ऋचाओंसे मधुस्तान
और शर्करा-स्नान कराये। इन दुग्ध आदि पाँच
वस्तुओंको पंचामृत कहते हैं अथवा पाद्यसमर्पणके
लिये कहे गये 'नमोऽस्तु नीलग्रीबाय०' इत्यादि
मन्त्रद्वारा पंचामृतसे स्नान कराये। तदनन्तर “मा
नस्तोके० '*” इस मन्त्रसे प्रेमपूर्वक भगवान् शिवको
कटिबन्ध (करधनी) अर्पित करे। 'नमो धृष्णवे०'**
इस मन्त्रका उच्चारण करके आराध्य देवताको उत्तरीय
धारण कराये। “या ते हेतिः०'९९ इत्यादि चार
ऋचाओंको पढ़कर वेदज्ञ भक्त प्रेमसे विधिपूर्वक
भगवान् शिवके लिये वस्त्र [एवं यज्ञोपवीत] समर्पित
करें। इसके बाद “नमः श्वभ्य०' इत्यादि मन्त्रको
१. यह मन्त्र पहले दिया जा चुका है।
२. तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।
३. त्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्थनान्मृत्योरमुक्षीय मामृतात्। ज्यम्बक यजामहे सुगन्धिं
पतिवेदनम् उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः। (यजुः ३।६०)
४. पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्। (यजु० १८।३६)
५. दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखा करत्प्रण आयूईषि तारिषत्। (यजुः २३।३२)
६. घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा। दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो
दिगभ्यः स्वाहा। (यजु ६।१९)
७. मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः । (यजु० १३।२७)
८. मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवई रज:। मधु द्यौरस्तु नः पिता। (यजु० १३।२८)
९. मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँर अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः। (यजु० १३।२९)
१०. मा स्तोके तनये मा न आयुषि मा जो गोषु मा नो अश्वेषु रौरिषः। मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः
सदमित् त्वा हवामहे। (यजु १६।१६)
११. जमो धृष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्ष्णेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने
च। (यजु० १६।३६)
१२. या ते हेतिमांढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः। तयास्मान्विशवतस्त्वमयक्ष्मया परि भुज (११)। परि ते धन्वनो
हेतिरस्मान्वृणक्त विश्वतः। अथो य इषुधिस्तवारे अस्मन्नि धेहि तम् (१२)। अवतत्य धनुष्ट्वऽ सहस्राक्ष शतेषुधे। निशीर्य
शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव ( १३) | नमस्त आयुधायानातताय धृष्णवे। उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तब धन्वने
ह ता र इवपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च जमो नीलग्रीवाय
च शितिकण्ठाय च। (यजुः १६। २८)
१५६
श्रीशिवमहापुराण
[अ %
जमः पार्याय इति वा पुष्पं मन्त्रेण चार्पयेत्।
जमः पणर्णाय इति वा बिल्वपत्रसमर्पणम्॥ २६
नमः कपर्दिने चेति धूपं दद्याद्यथाविधि।
दीपं दद्याद्यथोक्तं तु नम आशव इत्यूचा॥ २७
जमो ज्येष्ठाय मन्त्रेण दद्यान्नैवेद्यमुत्तमम्।
मनुना त्र्यम्बकमिति पुनराचमनं स्मृतम्॥ २८
इमा रुद्रायेति ऋचा कुर्यात्फलसमर्पणम्।
नमो व्रज्यायेति ऋचा सकलं शम्भवेऽर्पयेत्॥ २९
मानो महान्तमिति च मानस्तोके इति ततः।
मन्त्रद्ययेनैकादशाक्षते रुद्रान्प्रपूजयेत् ॥ ३०
हिरण्यगर्भ इति त्र्यूचा दक्षिणां हि समर्पयेत्।
देवस्यत्वेति मन्त्रेण ह्यभिषेकं चरेदबुध:॥ ३१
पढ़कर शुद्ध बुद्धिवाला भक्त पुरुष भगवानूको
गन्ध (सुगन्धित चन्दन एवं रोली) चहद
'नमस्तक्षभ्यो०'` इस मन्त्रसे अक्षत अर्पित हे
“नमः पार्याय०' इस मन्त्रसे फूल चढ़ाये। रे
पर्णाय०'* इस मन्त्रसे बिल्वपत्र समर्पण करे । नप,
कपर्दिने च०' इत्यादि मन्त्रसे विधिपूर्वक धूप दं
“नम आशवे०'* इस ऋचासे शास्त्रोक्त विधिकर
अनुसार दीप निवेदित करे । तत्पश्चात् [हाथ धोकर]
“नमो ज्येष्ठाय०'* इस मन्त्रसे उत्तम नैवेद्य आपि
करे। फिर पूर्वोक्त त्र्यम्बक मन्त्रसे आचमन कराये-
ऐसा कहा गया है। “इमा रुद्राय०'* इस ऋचे
फल समर्पण करे। फिर “नमो व्रज्याय० इस
मन्त्रसे भगवान् शिवको अपना सब कुछ समर्पित का
दे। तदनन्तर “मा नो महान्तम्०' तथा 'मा
नस्तोके०'-इन पूर्वोक्त दो मन्त्रोंद्वारा केवल अक्षतोे
ग्यारह रुद्रोंका पूजन करे। फिर “हिरण्यगर्भ:०"
इत्यादि मन्त्रसे जो तीन ऋचाओंके रूपमें पठित है,
दक्षिणा चढ़ाये | ' देवस्य त्वा० '*" इस मन्त्रसे विद्वान
पुरुष आराध्यदेवका अभिषेक करे। दीपके लिये
१. नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः कुलालेभ्यः कमरिभ्यश्च वो नमो नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो
नमो नमः श्वनिभ्यों मृगयुभ्यश्च वो नम:। (यजु० १६।२७)
२. नमः पार्याय चावार्याय च जमः प्रतरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्याव
च। (यजु० १६।४२)
३. नमः पर्णाय च पर्णशदाय च नम उद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नम आखिदते च प्रखिदते च नम इषुकृद्भयो ध्र
वो नमो नमो व: किरिकेभ्यो देवाना: हृदयेभ्यो नमो विचिन्वत्केभ्यो नमो विश्षिणत्केभ्यो नम आनि्हतेभ्य:। (यजु० १६।४)
४. नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च जमे
मीढुष्टमाय चेषुमते च। (यजु० १६।२९)
५. जम आशवे चाजिराय च नमः शीकघ्रथाय च शीभ्यायं च नम ऊर्म्याय चावस्वन्याय च नमो नादेयाय च रीय
च। (यजु १६।३१)
६. जमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चापरजाय च जमो मध्यमाय चापगल्भाय च नमो
बुध्याय च। (यजु० १६।३२)
जघन्याय *
७. इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मती: । यथा शमसद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्ट ग्रामे अस्मिन
(यजु० १६ ४८)
८. जमो ब्रज्याय च गोष्ठ्याय च नमस्तल्प्याय च गेह्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्याय च नमः काट्याय च
च। (यजु० १६।४४)
९. हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा
(यजुः
वरिधी |
३। 3)
|
१०. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्चिनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। अश्विनोभेषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभि है
(यजु० २९
हि २०]
दीपमन्त्रेण वा शम्भोर्नीराजनविधिं चरेत्।
पुष्पाञ्जलिं चरेद्भक्त्या इमा रुद्राय च ज््यूचा ॥ ३२
मानो महान्तमिति च चरेत्प्राज्ञः प्रदक्षिणाम्
मानस्तोकेति मन्त्रेण साष्टाङ्गं प्रणमेत्सुधीः ॥ ३३
एष ते इति मन्त्रेण शिवमुद्रा प्रदर्शयेत्।
यतो यत इत्यभयां ज्ञानाख्यां त्र्यम्बकेण च॥ ३४
नमः सेनेति मन्त्रेण महामुद्रां प्रदर्शयेत्।
दर्शयेद्धेनुमुद्रां च नमो गोभ्य ऋचानया॥ ३५
पञ्च मुद्राः प्रदर्श्याथ शिवमन्त्रजपं चरेत्।
शतरूद्रियमन्त्रेण जपेद् वेदविचक्षणः॥ ३६
ततः पञ्चाङ्गपाठं च कुयाद् वेदविचक्षणः।
देवागात्विति मन्त्रेण कुर्याच्छम्भोर्विसर्जनम्॥ ३७
इत्युक्तः शिवपूजाया व्यासतो वैदिको विधिः।
समासतश्च श्रृणुत वैदिकं विधिमुत्तमम्॥ ३८
ऋचा सद्योजातमिति मृदाहरणमाचरेत्।
वामदेवाय इति च जललप्रक्षेपमाचरेत्॥ ३९
अघोरेण च मन्त्रेण लिङ्गनिर्माणमाचरेत्।
तत्पुरुषाय मन्त्रेणाह्वानं कुर्याद्यथाविधि॥ ४०
विद्येश्वरसंहिता
१५७
बताये हुए “नम आशबे०' इत्यादि मन्त्रसे भगवान्
शिवकी नीराजना (आरती) करे। तत्पश्चात् "इमा
रुद्राय० ' इत्यादि तीन ऋचाओंसे भक्तिपूर्वक रुद्रदेवको
पुष्पांजलि अर्पित करे। “मा नो महान्तम्०' इस
मन्त्रसे विज्ञ उपासक पूजनीय देवताकी परिक्रमा करे।
फिर उत्तम बुद्धिवाला उपासक “मा नस्तोके०' इस
मन्त्रसे भगवानूको साष्टांग प्रणाम करे। “एष ते०'*
इस मन्त्रसे शिवमुद्राका प्रदर्शन करे। "यतो यतः०'२
इस मन्त्रसे अभय नामक मुद्राका, "त्र्यम्बकं ' मन्त्रसे
ज्ञान नामक मुद्राका तथा “नम: सेना०' इत्यादि
मनत्रसे महामुद्राका प्रदर्शन करे। “नमो गोभ्य० ' इस
ऋचाद्वारा धेनुमुद्रा दिखाये । इस तरह पाँच मुद्राओंका
प्रदर्शन करके शिवसम्बन्धी मन्त्रोंका जप करे अथवा
वेदज्ञ पुरुष 'शतरुद्रिय'* मन्त्रकी आवृत्ति करे।
तत्पश्चात् वेदज्ञ पुरुष पंचांग पाठ करे। तदनन्तर
“देवा गातु०" इत्यादि मन्त्रसे भगवान् शंकरका
विसर्जन करे। इस प्रकार शिवपूजाकी वैदिक विधिका
विस्तारसे प्रतिपादन किया गया॥ १२-३७९/२॥
[हे महर्षियो!] अब संध्षेपमें पार्थिवपूजनकी
वैदिक विधिको सुनें। 'सद्योजातम्० ' इस ऋचासे
पार्थिवलिंग बनानेके लिये मिट्टी ले आये।
“वामदेवाय० मन्त्र पढ़कर उसमें जल डाले।
[जब मिट्टी सनकर तैयार हो जाय, तब] *अघोर०'*
मन्त्रसे लिंग निर्माण करे। फिर 'तत्पुरुषाय० ९° इस
मन्त्रसे उसमें भगवान् शिवका विधिवत् आवाहन
१. एष ते रुद्र भाग: सह स्वस्लाम्बिकया तं जुषस्व स्वाहा। एष ते रुद्र भाग आखुस्ते पशुः॥ (यजु ३।५७)
२. यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥ (यजु० ३६।२३)
३. नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्व वो नमो रथिभ्यो अर्थेभ्यश्च वो नमो नमः। क्षतृभ्यः संग्रहीतृभ्यश्च वो नमो नमो
महद्भ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमः॥ (यजु १६।२६ )
४. नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्य: सौरभेयीभ्य एवं च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नम: ॥ (गोमतीविद्या)
५, यजुर्वेदका वह अंश, जिसमें रुद्रके सौ या उससे अधिक नाम आये हैं और उनके द्वारा रुद्रदेवकी स्तुति की गयी है।
(देखिये यजु० अध्याय १६)
६. देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। मतसस्मत इमं देव यज्ञर स्वाहा वाते धाः ॥ (यजु० ८।२१})
७. सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै तमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥
८. ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय जमो
बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः
जमो मनोन्मनाय नम: ।
९. ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः
१०. ॐ तत्पुरुषाय विदे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् |
१५८
श्रीशिवमहापुराण
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संयोजयेद्वेदिकायामीशानमनुना हरम्।
अन्यत्सर्वं विधानं च कुर्यात्संक्षेपतः सुधी: ॥ ४१
पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण गुरुदत्तेन वा तथा।
कुर्यात्पूजां षोडशोपचारेण विधिवत्सुधीः ॥ ४२
भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमहि।
उग्राय उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने॥ ४३
अनेन मनुना वापि पूजयेच्छङ्करं सुधीः।
सुभक्त्या च भ्रमं त्यक्त्वा भक्त्यैव फलदः शिवः॥ ४४
इत्यपि प्रोक्तमादृत्य वैदिकं क्रमपूजनम्।
प्रोच्यतेऽन्यविधिः सम्यक्साधारणतया द्विजा: ४५
पूजा पार्थिवलिङ्गस्य संप्रोक्ता शिवनामभिः।
तां शृणुध्वं मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायिनीम्॥ ४६
हरो महेश्वरः शम्भुः शूलपाणिः पिनाकधृक् ।
शिवः पशुपतिश्चैव महादेव इति क्रमात्॥ ४७
मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव चा
स्नपनं पूजनं चेव क्षमस्वेति विसर्जनम्॥ ४८
३ॐ+कारादिचतुर्थ्यनतैर्नमो ऽन्तैर्नामभिः क्रमात्।
कर्तव्याश्च क्रियाः सर्वा भक्त्या परमया मुदा॥ ४९
करे। तदनन्तर “ईशान०'* मन्त्रसे संयोजबेदेद्कायाभीशानमतुता.. हरम् | | करे। तदन्त 'ईशान०'” मनसे भगवान् शिळ
वेदीपर स्थापित करे। इनके सिवाय अन्य
विधानोंको भी शुद्ध बुद्धिवाला उपासक संक्षेपस हौ
सम्पन्न करे | इसके बाद विद्वान् पुरुष पंचाक्षर मजे
अथवा गुरुके द्वारा दिये हुए अन्य किसी
मन्त्रसे सोलह उपचारोंद्रार विधिवत् पूजन को
अथवा--' भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमहि। उग्राय
उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने ॥'
--इस मन्त्रद्वार विद्वान् उपासक भगवान् शंकरङ्गी
पूजा करे। वह भ्रम छोड़कर उत्तम भक्तिसे शिवकी
आराधना करे; क्योंकि भगवान् शिव भक्तिसे ही
[मनोवांछित] फल देते हैं ॥ ३८--४४॥
हे ब्राह्मणो ! यह जो वैदिक विधिसे पूजनका क्रम
बताया गया है, इसका पूर्णरूपसे आदर करता हुआ मैं
पूजाकी एक दूसरी विधि भी बता रहा हूँ, जो उत्तम
होनेके साथ ही सर्वसाधारणके लिये उपयोगी है। हे
मुनिवरो! पार्थिवलिंगकी पूजा भगवान् शिवके नामोंसे
बतायी गयी है । वह पूजा सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाली
है, में उसे बताता हूँ, सुनो ! हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि,
पिनाकधृक्, शिव, पशुपति और महादेव [ये क्रमशः
शिवके आठ नाम कहे गये हैं ।] इनमेंसे प्रथम नामके
द्वारा अर्थात् ' ७ हराय नमः' का उच्चारण करके
पार्थिवलिंग बनानेके लिये मिट्टी लाये । दूसरे नाम अर्था
' ॐ महेश्वराय नमः ' का उच्चारण करके लिंगतिर्माण
करे। फिर" ॐ शम्भवे नमः ' बोलकर उस पार्थिवलिंगवी
प्रतिष्ठा करे तत्पश्चात् * ॐ शूलपाणये नमः ' क्र
उस पार्थिबलिंगमें भगवान् शिवका आवाहन करे।' 32
पिनाकधृषे नमः ' कहकर उस शिवलिंगको हग
' ॐ शिवाय नमः' बोलकर उसकी पूजा करे। पि
' ॐ पशुपतये नमः' कहकर क्षमा-प्रार्थना करे और
अन्तमें ' ॐ महादेवाय नम: ' कहकर
विसर्जन कर दे। इस प्रकार प्रत्येक नामके आदि!
' ॐ ' कार और अन्तमें चतुर्थी विभक्तिके साथ त
पद लगाकर बड़े आनन्द और i
[पूजनसम्बन्धी] सारे कार्य करने चाहिये ॥ ४५४
* ॐ ईशान: सर्वविद्यातामीशवरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिबरह्मणोऽधिपतित्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम्॥
ले २०]
विद्येश्वरसंहिता
१५९
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कृत्वा न्यासविधिं सम्यक् षडङ्गं करयोस्तथा।
षडक्षरेण मन्त्रेण ततो ध्यानं समाचरेत्॥ ५०
कैलासपीठासनमध्यसंस्थं
भक्तैः सनन्दादिभिरर्च्यमानम्।
भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं
ध्यायेदुमालिङ्गितविश्वभूषणम् ॥ ५१
ध्यायेन्नित्यं
रजतगिरिनिभं
रलाकल्पोज्ज्चलाङ्गं
परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणे-
व्याघ्रकृत्तिं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं
पञ्चवक्त्रं ्रिनेत्रम्॥ ५२
महेशं
चारुचन्द्रावतंसं
वसानम्.
इति ध्यात्वा च सम्पूज्य पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्।
जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं गुरुदत्तं यथाविधि॥ ५३
स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः।
नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्रा: पठेद वै शतरुद्रियम्॥ ५४
ततः साक्षतपुष्पाणि गृहीत्वा्जलिना मुदा।
प्रार्थयेच्छडूरे भक्त्या मन्त्रैरेभिः सुभक्तितः ॥ ५५
तावकस्त्वदगुणप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मूड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा भूतनाथ प्रसीद मे॥
षडक्षरमन्त्रसे अंगन्यास और करन्यासको
विधि भलीभाँति सम्पन्न करके नीचे लिखे अनुसार
ध्यान करे-
कैलास पर्वतपर एक सुन्दर सिंहासनके मध्यभागमें
विराजमान, सनन्द आदि भक्तोंसे पूजित, भक्तोंके
दुःखरूप दावानलको नष्ट कर देनेवाले, अप्रमेय,
उमाके साथ समासीन तथा विश्वके भूषणस्वरूप
भगवान् शिवका चिन्तन करना चाहिये। भगवान्
महेश्वरका प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करे-उनकी
अंगकान्ति चाँदीके पर्वतकी भाँति गौर है, वे अपने
मस्तकपर मनोहर चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं,
रलोंके आभूषण धारण करनेसे उनका श्रीअंग और
भी उद्धासित हो उठा है, उनके चार हाथोंमें क्रमशः
परशु, मृगमुद्रा, वर एवं अभयमुद्रा सुशोभित हैं, वे
सदा प्रसन्न रहते हैं। कमलके आसनपर बैठे हुए हैं,
देवतालोग चारों ओर खड़े होकर उनको स्तुति कर
रहे हैं, उन्होंने वस्त्रके रूपमें व्याघ्रचर्म धारण कर
रखा है, वे इस विश्वके आदि हैं, बीज (कारण)-
रूप हैं, सबका समस्त भय हर लेनेवाले हैं, उनके
पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन-तीन नेत्र
हैं॥ ५०-५२॥
इस प्रकार ध्यान करके तथा उत्तम पार्थिव
लिंगका पूजन करके गुरुके दिये हुए पंचाक्षरमन्त्रका
विधिपूर्वक जप करे। हे विप्रवरो! विद्वान् पुरुषको
चाहिये कि वह देवेश्वर शिवको प्रणाम करते हुए
नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन करे तथा
शतरुद्रिय (यजु० १६वें अध्यायके मन्त्रो)-का पाठ
करे। तत्पश्चात् अंजलिमें अक्षत और फूल लेकर
उत्तम भक्तिभावसे निम्नांकित मन्त्रोंको पढ़ते हुए प्रेम
और प्रसन्नताके साथ भगवान् शंकरसे इस प्रकार
प्रार्थना करे-- ॥ ५३--५५॥
*सबको सुख देनेवाले हे कृपानिधान! हे भूतनाथ!
हे शिव! मैं आपका हूँ, आपके गुणोंमें ही मेरे प्राण
बसते हैं अथवा आपके गुण ही मेरे प्राण-मेरे
जीवनसर्वस्त् हैं, मेरा चित्त सदा आपके ही चिन्तनमें
लगा हुआ है-यह जानकर मुझपर प्रसन्न होइये,
१६०
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाजपपूजादिकं मया ।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शङ्कर ५७
अहं पापी महानद्य पावनश्च भवान्महान्।
इति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि तथा कुरु ॥ ५८
वेदैः पुराणैः सिद्धान्तै्ऋषिभिर्विविधैरपि।
ज ज्ञातोऽसि महादेव कुतोऽहं त्वां सदाशिव॥ ५९
यथा तथा त्वदीयोऽस्मि सर्वभावैर्महे श्वर।
रक्षणीयस्त्वयाहं वै प्रसीद परमेश्वर ॥ ६०
इत्येवं चाक्षतान्ुष्पाण्यारोप्य च शिवोपरि।
प्रणमेद्भक्तितः शम्भुं साष्टाङ्गं विधिवन्मुने॥ ६१
ततः प्रदक्षिणां कुर्याद्यथोक्तविधिना सुधीः।
पुनः स्तुवीत देवेशं स्तुतिभिः श्रद्धयान्वितः॥ ६२
ततो गलरवं कृत्वा प्रणमेच्छुचिनम्रधीः।
कुर्याद्विजञप्तिमादृत्य विसर्जनमथाचरेत्॥ ६३
इत्युक्ता मुनिशार्दूलाः पार्थिवार्चा विधानतः।
भुक्तिदा मुक्तिदा चैव शिवभक्तिविवर्धिनी॥ ६४
इत्यध्यायं सुचित्तेन यः पठेच्छृणुयादपि।
सर्वपापविशुद्धात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ ६५
आयुरारोग्यदं चैव यशस्यं स्वर्ग्यमेव च।
पुत्रपौत्रादिसुखदमाख्यानमिदमुत्तमम् ॥६६
श्रीशिवमहापुराण
[अ MR
कृपा कीजिये। हे शंकर! मैंने अनजानमें अक्ष
जानबूझकर यदि कभी आपका जप और पूजन आहि
किया हो, तो आपकी कृपासे वह सफल हो स्ह
हे गौरीनाथ! मैं इस समय महान् पापी हूँ और आ
सदासे ही परम महान् पतितपावन हैं-इस
विचार करके आप जैसा चाहें, वैसा करें। हे महादेव!
हे सदाशिव! वेदों, पुराणों, नाना प्रकारके शास्त्रीय
सिद्धान्तों और विभिन्न महर्षियोंने भी अबतक आपके
पूर्णरूपसे नहीं जाना है, तो फिर मैं कैसे जान सकता
हूँ। हे महेश्वर! मैं जैसा हूँ, वैसा ही, उसी रूपे
सम्पूर्ण भावसे आपका हूँ, आपके आश्रित हूँ, इसलिये
आपसे रक्षा पानेके योग्य हूँ। हे परमेश्वर! आए
मुझपर प्रसन्न होइये।' हे मुने! इस प्रकार प्रार्थना
करके हाथमें लिये हुए अक्षत और पुष्पको भगवान
शिवके ऊपर चढ़ाकर उन शम्भुदेवको भक्तिभावसे
विधिपूर्वक साष्टांग प्रणाम करे। तदनन्तर शुद्ध
बुद्धिबाला उपासक शास्त्रोक्त विधिसे इष्टदेवकी
परिक्रमा करे। फिर श्रद्धापूर्वक स्तुतियोंद्वारा देवेश्वर
शिवकी स्तुति करे | इसके बाद गला बजाकर (गलेमे
अव्यक्त शब्दका उच्चारण करके) पवित्र एवं विगीत
चित्तवाला साधक भगवानको प्रणाम करे। फिर
आदरपूर्वक विज्ञप्ति करें और उसके बाद विसर्ज
करे॥ ५६-६३॥
हे मुनिवरो! इस प्रकार विधिपूर्वक पार्थिवपूर्ज
बतायी गयी, जो भोग और मोक्ष देनेवाली तथा भगवा
शिवके प्रति भक्तिभावको बढानेवाली है। जो मर
इस अध्यायका शुद्धचित्तसे पाठ अथवा श्रवण
है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सभी कामी
प्राप्त करता है। यह उत्तम कथा दीर्घायुष्य, आर
यश, स्वर्ग, पुत्र-पौत्र आदि सभी सुखोंको प्रदान
है ॥ ६४-६६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे
पार्थिवशिवलिङ्गपूजनविधिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमे पार्थिव शिवलिंगे
पूजनकी विधिका वर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
— ree
न २१]
विद्येश्वरसंहिता
१६१
अथैकविंशोऽध्यायः
'कामनाभेदसे पार्थिवलिंगके पूजनका विधान
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
सम्यगुक्तं त्वया तात पार्थिवार्चाविधानकम्॥ १
कामनाभेदमाश्रित्य सङ्ख्यां ब्रूहि विधानत:।
शिवपार्थिवलिङ्गानां कृपया दीनवत्सल॥ २
सूत उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे पार्थिवार्चाविधानकम्।
यस्यानुष्ठानमात्रेण कृतकृत्यो भवेन्नरः॥ ३
अकृत्वा पार्थिवं लिङ्गं योऽन्यदेवं प्रपूजयेत्।
वृथा भवति सा पूजा दमदानादिकं वृथा॥ ४
सङ्ख्या पार्थिबलिङ्गानां यथाकामं निगद्यते।
सङ्ख्या सद्यो मुनिश्रेष्ठ निश्चयेन फलप्रदा॥ ५
प्रथमावाहनं तत्र प्रतिष्ठा पूजनं पृथक्।
लिङ्गाकारं समं तत्र सर्व ज्ञेयं पृथक्पृथक् ॥ ६
विद्यार्थी पुरुषः प्रीत्या सहस्त्रमितपार्थिवम्।
पूजयेच्छिवलिङ्गं हि निश्चयात्तत्फलप्रदम्॥
नर: पार्थिबलिङ्गानां धनार्थी च तदर्धकम्।
पुत्रार्थी सार्धसाहस्त्र वस्त्रार्थी शतपञ्चकम्॥ ८
मोक्षाथी कोटिगुणितं भूकामश्च सहस्रकम्।
दयार्थी च त्रिसाहस्रं तीर्थार्थी द्विसहस्रकम् ९
सुहृत्कामी त्रिसाहस्रं 'वश्याथी शतमष्टकम्
मारणारी सप्तशतं मोहनार्थी शताष्टकम्॥ १०
उच्चाटनपरश्रैव सहस्रं च यथोक्ततः।
स्तम्भनार्थी सहस्त्रं तु द्वेषणार्थी तदर्धकम्॥ ११
निगडान्मुक्तिकामस्तु सहस्त्र सार्धमुत्तमम्।
महाराजभये पञ्जशतं ज्ञेयं विचक्षणैः॥ १२
2223 Shivmahapuranam-Part I_Section_7_l_Front
ऋषिगण बोले--हे व्यासशिष्य सूतजी! हे
महाभाग! आपको नमस्कार है। हे तात! आपने
अच्छी प्रकारसे पार्थिवार्चनकी विधि बतायी। अब
सकाम पूजनमें मनोवांछित पदार्थके अनुसार कितनी
संख्यामें पार्थिव लिंगोंके पूजनकी विधि है, हे
दीनवत्सल! इसे कृपापूर्वक बताइये॥ १-२॥
सूतजी बोले-हे ऋषियो! आप सब लोग
पार्थिव-पूजनकी विधिका श्रवण करें, जिसका अनुष्ठान
करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। पार्थिवलिंगके
पूजनको छोड़कर जो लोग अन्य देवोंके यजनमें लगे
रहते हैं, उनकी वह पूजा, तप तथा दानादि व्यर्थ हो
जाता है॥ ३-४॥
अब मैं कामनाके अनुसार पार्थिबलिंगोंको संख्या
बताता हूँ, हे मुनिश्रेष्ठ! अधिक संख्यामें अर्चन तो
निश्चय ही फलदायी होता है । प्रथम आवाहन, तब
प्रतिष्ठा, तदनन्तर सभी लिंगोंका पूजन अलग-अलग.
करना चाहिये। लिंगोंका आकार तो एक समान ही
रखना चाहिये॥ ५-६॥
विद्याप्राप्तिकी कामनासे पुरुष भक्तिपूर्वक एक
हजार पार्थिव शिवलिंगोंका पूजन करे। इससे निश्चय
ही उस फलकी प्राप्ति हो जाती है। धन चाहनेवाले
पुरुषको उसके आधे (पाँच सौ), पुत्र चाहनेवालेको
डेढ़ हजार और चस्त्रॉंकी आकांक्षावालेको पाँच सौ
शिवलिंगोंका पूजन करना चाहिये ॥७-८॥
मोक्षकी कामनावाले व्यक्तिको एक करोड़,
भूमिकी अभिलाषावालेको एक हजार, दयाप्राप्तिकी
इच्छावालेको तीन हजार और तीर्थाटनको इच्छावालेको
दो हजार शिवलिंगोंकी पूजा करनी चाहिये। मित्रप्राप्तिकी
इच्छावालेको तीन हजार तथा अभिचार कर्मोमें पाँच
सौसे लेकर एक हजारतक पार्थिव शिवलिंगोंके
पूजनकी विधि है। (कारागार आदिके) बन्धनसे
छुटकारेकी इच्छासे डेढ़ हजार तथा राजभयसे मुक्तिकी
इच्छासे पाँच सौ शिबलिंगोंका पूजन बुद्धिमानोंको
जानना चाहिंये॥ ९--१२॥
१६२
श्रीशिवमहापुराण
[3s शशश 000१ १
चौरादिसङ्कटे ज्ञेयं पार्थिवानां शतद्वयम्।
डाकिन्यादिभये पञ्चशतमुक्तं च पार्थिवम्॥ १३
दारिव्र्ये पञ्चसाहस्त्रमयुतं सर्वकामदम्।
अथ नित्यविधिं वक्ष्ये श्रुणुध्वं मुनिसत्तमाः ॥ १४
एकं पापहरं प्रोक्तं द्विलिङ्गं चार्थसिद्धिदम्।
त्रिलिङ्गं सर्वकामानां कारणं परमीरितम्॥ १५
उत्तरोत्तरमेवं स्यात्पूर्वोक्तगणनावधि।
मतान्तरमथो वक्ष्ये सङ्ख्यायां मुनिभेदतः॥ १६
लिङ्गानामयुतं कृत्वा पार्थिवानां सुबुद्धिमान्।
निर्भयो हि भवेन्नूनं महाराजभयं हरेत्॥ १७
कारागृहादिमुक्त्यर्थमयुतं कारयेद् बुधः।
डाकिन्यादिभये सप्तसहस्त्रं कारयेत्तथा॥ १८
अपुत्रः पञ्चपञ्चाशत् सहस्त्राणि प्रकारयेत्।
लिङ्गानामयुतेनैव कन्यकासन्ततिं लभेत्॥ १९
लिङ्गानामयुतेनैव विष्णवाद्यरश्वर्यमाप्नुयात्।
लिङ्गानां प्रयुतेनैव ह्यतुलां श्रियमाप्नुयात्॥ २०
कोटिमेकां तु लिङ्गानां यः करोति नरो भुवि।
शिव एव भवेत्सोऽपि नात्र कार्या विचारणा ॥ २१
अर्चा पार्थिवलिङ्गानां कोटियज्ञफलप्रदा।
भुक्तिदा मुक्तिदा नित्यं ततः कामर्थिनां नृणाम्॥ २२
विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः।
महाहानिर्भवेत्तस्य॒ दुर्वृत्तस्य दुरात्मनः॥ २३
चोर आदिके संकटसे बचनेके लिये दो सौ ल्क
डाकिनी आदिके भयसे मुक्तिहेतु पाँच सौ \
शिवलिंगोंका पूजन बताया गया है । दरिद्रतासे हरकन
लिये पाँच हजार और सभी कामनाओंकी सिद्धिके
लिये दस हजार पार्थिव शिवलिंगोंका पूजन कश
चाहिये। हे मुनिश्रेष्ठो ! अब मैं
बताता हूँ, आप लोग सुनें॥ १३-१४॥
एक पार्थिवलिंगका नित्य पूजन पापोंका नाश
करनेवाला और दो लिंगोंका पूजन अर्थकी सिद्धि
करनेवाला बताया गया है। तीन लिंगोंका पूजन सभी
कामनाओंकी सिद्धिका मुख्य हेतु कहा गया है। पव
बतायी गयी संख्याविधिमें भी उत्तरोत्तर संख्या अधिक
"फलदायिनी होती है। अन्य मुनियोंके मतसे संख्याका
जो अन्तर है, वह भी अब बताता हूँ॥ १५-१६॥
बुद्धिमान् मनुष्य दस हजार पार्थिव शिवलिंगोंका
अर्चन करके महान् राजभयसे भी मुक्त होकर निर्भय
हो जाता है। कारागार आदिसे छूटनेके लिये दस
हजार लिंगोंका अर्चन करना चाहिये और डाकिनी
आदिके भयसे छूटनेके लिये सात हजार लिंगार्चा
कराना चाहिये॥ १७-१८॥
पुत्रहीन पुरुष पचपन हजार लिंगार्चन करे,
कन्या-सन्तानकी प्राप्ति दस हजार लिंगार्चनसे हो
जाती है। दस हजार लिंगार्चनसे विष्णु आदिं
देवोंके समान ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है। द
लाख शिवलिंगार्चनसे अतुल सम्पत्ति प्राप्त हो जातै
है॥ १९-२०॥
जो मनुष्य पृथ्वीपर एक करोड़ शिवलिंग
अर्चन कर लेता है, वह तो शिवरूप ही हो जाता है
इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। पार्थिवपूजा करोड़
यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली है। इसलिये सर्व
भक्तोंके लिये यह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान कौ
है। जिस मनुष्यका समय रोज बिना लिंगाची
व्यतीत होता है, उस दुराचारी तथा दुष्टात्मा र्ति
महान् हानि होती है॥ २१-२३॥
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2223 Shivmahapuranam_Part [56०४० 3
डच २१]
विद्येश्वरसंहिता
१६३
एकतः सर्वदानानि ब्रतानि विविधानि च।
तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गार्चा चैकतः स्मृता ॥ २४
कलो लिङ्गार्चनं श्रेष्ठं यथा लोके प्रदृश्यते।
तथान्यन्नास्ति शास्त्राणामेष सिद्धान्तनिश्चयः ॥ २५
भुक्तिमुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम्।
पूजयित्वा नरो नित्यं शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २६
शिवनाममयं लिङ्गं नित्यं पूज्यं महर्षिभिः।
यतश्च सर्वलिङ्गेषु तस्मात्पूज्यं विधानतः॥ २७
उत्तमं मध्यमं नीचं त्रिविधं लिङ्गमीरितम्।
मानतो मुनिशार्दूलास्तच्छृणुध्वं वदाम्यहम्॥ २८
चतुरद्भु लमुच्छायं रम्यं वेदिकया युतम्।
उत्तमं लिङ्गमाख्यातं मुनिभिः शास्त्रकोविदैः ॥ २९
तदर्द्धं मध्यमं प्रोक्तं तदर्द्धमधमं स्मृतम्।
इत्थं त्रिव्रिधमाख्यातमुत्तरोत्तरतः परम्॥ |
अनेकलिङ्गं यो नित्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितः।
पूजयेत्स लभेत्कामान्मनसा मानसेप्सितान्॥ ३१
न लिङ्गाराधनादन्यत्पुण्यं वेदचतुष्टये।
विद्यते सर्वशास्त्राणामेष एव विनिश्रयः॥ ३२
सर्वमेतत्परित्यज्य -कर्मजालमशेषतः।
भक्त्या परमया विद्वॉल्लिङ्गमेकं प्रपूजयेत्॥ ३३
लिङ्गेऽच्चितेऽर्चितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
संसाराम्बुधिमग्नानां नान्यत्तरणसाधनम्॥ ३४
अज्ञानतिमिरान्धानां 'विषयासक्तचेतसाम्।
प्लवो नान्योऽस्ति जगति लिङ्गाराधनमन्तस॥ २५
2223 Shivmabapuranam-Part LSection-7_2_Front
एक ओर सारे दान, विविध व्रत, तीर्थ, नियम
और यज्ञ हैं तथा उनके समकक्ष दूसरी ओर पार्थिव
शिवलिंगका पूजन माना गया है | कलियुगमें तो जैसा
श्रेष्ठ लिंगार्चन दिखायी देता है, वैसा अन्य कोई
साधन नहीं है-यह समस्त शास्त्रोंका निश्चित
सिद्धान्त है। शिवलिंग भोग और मोक्ष देनेवाला तथा
विविध आपदाओंका निवारण करनेवाला है। इसका
नित्य अर्चन करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता
है॥ २४-२६॥
महर्षियोंको शिवनाममय इस लिंगकी नित्य
पूजा करनी चाहिये। यह सभी लिंगोंमें श्रेष्ठ है, अतः
विधानपूर्वक इसकी पूजा करनी चाहिये। हे मुनिवरो !
परिमाणके अनुसार लिंग तीन प्रकारके कहे गये हैं-
उत्तम, मध्यम और अधम। उसे आपलोग सुनें; मैं
बताता हूँ। जो चार अँगुल ऊँचा और देखनेमें सुन्दर
हो तथा बेदीसे युक्त हो, उस शिवलिंगको शास्त्रज्ञ
महर्षियोंने उत्तम कहा है। उससे आधा मध्यम और
उससे भी आधा अधम माना गया है। इस तरह तीन
प्रकारके शिवलिंग कहे गये हैं, जो उत्तरोत्तर श्रेष्ठ
हैं॥ २७-३०॥
जो भक्ति तथा श्रद्धासे युक्त होकर अनेक
लिंगोंकी मनसे नित्य पूजा करता हैं, बह मनोवांछित
'कामनाओंकी प्राप्ति कर लेता है॥ ३१॥
चारों वेदोंमें लिंगार्चनसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं
है; सभी शास्त्रोंका भी यह निर्णय है॥ ३२॥
विद्वान्को चाहिये कि इस समस्त कर्म-प्रपंचका
त्याग करके परम भक्तिके साथ एकमात्र शिवलिंगका
विधिवत् पूजन करे॥ ३३॥
केवल शिवलिंगको पूजा हो जानेपर समग्र
चराचर जगतूकी पूजा हो जाती है। संसार-सागरमें
डूबे हुए लोगोंके तरनेका अन्य कोई भी साधन नहीं
है॥ ३४॥
अज्ञानरूपी अन्धकारसे अन्धे हुए तथा विषय-
बासनाओंमें आसक्त चित्तवाले लोगोंके लिये इस
जगतमें [भवसागरसे पार होनेहेतु] लिंगार्चतके अतिरिक्त
अन्य कोई नौका नहीं है॥ ३५॥
१६४
हरिब्रह्मादयो देवा मुनयो यक्षराक्षसाः।
गन्धर्वाश्चारणाः सिद्धा दैतेया दानवास्तथा॥ ३६
नागा: शेषप्रभृतयो गरुडाद्याः खगास्तथा।
सप्रजापतयश्चान्ये मनवः किन्नरा नराः॥ ३७
पूजयित्वा महाभक्त्या लिङ्गं सर्वार्थसिद्धिदम्।
प्राप्ता: कामानभीष्टांश्च तांस्तान्सर्वान्हृदि स्थितान्॥ ३८
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा प्रतिलोमजः।
पूजयेत्सततं लिङ्गं तत्तन्मन्त्रेण सादरम्॥ ३९
किं बहूक्तेन मुनयः स्त्रीणामपि तथान्यतः।
अधिकारोऽस्ति सर्वेषां शिवलिङ्गार्चने द्विजाः ॥ ४०
द्विजानां वैदिकेनापि मार्गेणाराधनं वरम्।
अन्येषामपि जन्तूनां वैदिकेन न सम्मतम्॥ ४१
बैदिकानां द्विजानां च पूजा वैदिकमार्गतः ।
कर्तव्या नान्यमार्गेण इत्याह भगवान् शिवः॥ ४२
'दधीचिगोतमादीनां शापेनाद्ग्धचेतसाम्।
द्विजानां जायते श्रद्धा नैव बैदिककर्मणि॥ ४३
यो वैदिकमनादूत्य कर्म स्मार्तमथापि वा।
अन्यत्समाचरेन्मत्यो न सङ्कल्पफलं लभेत्॥ ४४
इत्थं कृत्वार्चनं शम्भोनेवेद्यान्तं विधानतः।
पूजयेदष्टमूर्तीश्च तत्रेव त्रिजगन्मयीः॥ ४५
क्षितिरापोऽनलो वायुराकाशः सूर्यसोमकौ।
यजमान इति त्वष्टो मूर्तयः परिकीर्तिताः ॥ ४६
शर्वो भवश्च रुद्रश्च उग्रो भीम इतीश्वरः।
महादेवः पशुपतिरेतान्मूर्तिभिरर्चयेत्॥ ४७
पूजयेत्परिवारं च ततः शम्भोः सुभक्तितः।
ईशानादिक्रमात्तत्र चन्दनाक्षतपत्रकैः ॥ ४८
ईशानं नन्दिनं चण्डं महाकालं च भृङ्गिणम्।
वृषं स्कन्दं कपर्दीशं सोमं शुक्रं च तत्क्रमात्॥ ४९
अग्रतो वीरभत्रं च पृष्ठे कीर्त्तेमुखं तथा।
तत एकादशान् रुद्रान्पूजयेद्विधिना ततः॥ ५०
श्रीशिवमहापुराण
[अ २ > TT तप पफहपतखतग* 8५ जफाहता
ब्रह्मा-विष्णु आदि देवता, मुनिगण, यक्ष, रा
गन्धर्व, चारण, सिद्धजन, दैत्य, दानव, शेष आदि नाग, गरू
आदि पक्षी, प्रजापति, मनु, किन्नर और मानव समर
अर्थसिद्धि प्रदान करनेवाले शिवलिंगकी महान् भक्तिके
साथ पूजा करके अपने मनमें स्थित उन-उन
अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर चुके हैं ॥ ३६-३८ |
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा विलोम संकर
कोई भी क्यों न हो, वह अपने अधिकारके अनुसार
वैदिक अथवा तान्त्रिक मनत्रसे सदा आदरपूर्वक शिवलिंगकी
पूजा करे। हे ब्राह्मणो! हे महर्षियो! अधिक कहनेसे
कया लाभ! शिवलिंगका पूजन करनेमें स्त्रियोंका तथा
अन्य सब लोगोंका भी अधिकार है ॥ ३९-४०॥
द्विजोंके लिये वैदिक पद्धतिसे ही शिवलिंगकी
पूजा श्रेष्ठ है, परंतु अन्य लोगोंके लिये बैदिक मार्गसे
पूजा करनेकी सम्मति नहीं है । वेदज्ञ ट्विजोंको वैदिक
मार्गसे ही पूजन करना चाहिये, अन्य मार्गसे नहीं-यह
भगवान् शिवका कथन है। दधीचि, गौतम आदिके
शापसे जिनका चित्त दग्ध हो गया है, उन द्विजोंकी
वैदिक कर्में श्रद्धा नहीं होती। जो मनुष्य वेदों तथा
स्मृतियोंमें कहे हुए सत्कर्मोकी अवहेलना करके दूस
कर्मको करने लगता है, उसका मनोरथ कभी सफल नहीं
होता॥ ४१-४४॥
इस प्रकार विधिपूर्वक भगवान् शंकरका नैवेद्यात
पूजन करके उनकी त्रिभुवनमयी आठ मूर्तियोंका भी
वहीं पूजन करे | पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश
सूर्य, चन्द्रमा तथा यजमान-ये भगवान् शंकरकी अर्ण
मूर्तियाँ कही गयी हैं इन मूर्तियोंके साथ-साथ शर्व, ११
रुद्र, उग्र, भीम, ईश्वर, महादेव तथा पशुपति-इन नामोंकी
भी अर्चना करे। तदनन्तर चन्दन, अक्षत और
लेकर वहाँ ईशान आदिके क्रमसे भगवान् शिरवे
परिवारका उत्तम भक्तिभावसे पूजन करे | ईशान, न!
चण्ड, महाकाल, भृगी, वृष, स्कन्द, कपर्दीश्वर, सोम री
शुक्र-ये दस शिवके परिवार हैं, [जो क्रमशः ईश"
आदि दसों दिशाओंमें पूजनीय हैं ।] तत्पश्चात्
शिवके समक्ष वीरभद्रका और पीछे कीर्तिमुखका पा
करके विधिपूर्वक ग्यारह रुद्रोंकी पूजा करे ॥ ४५ *
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2223 Shivmahapuranam. Part I.Seciion_7-2-2 5
2 २२]
विद्येश्वरसंहिता
१६५
ततः पञ्चाक्षरं जप्त्वा शतरुद्रियमेव च।
सतुतीर्नानाविधाः कृत्वा पञ्चाङ्गपठनं तथा॥ ५१
त्ततः प्रदक्षिणां कृत्वा नत्वा लिङ्गं विसर्जयेत्।
इति प्रोक्तमशेषं च शिवपूजनमादरात्॥ ५२
रात्राबुदङ्मुखः कुर्याद् देवकार्यं सदैव हि।
शिवार्चनं सदाप्येवं शुचिः कुर्यादुदङ्मुखः॥ ५३
न प्राचीमग्रतः शम्भोनोंदीचीं शक्तिसंहिताम्।
न प्रतीचीं यतः पृष्ठमतो ग्राह्यं समाश्रयेत्॥ ५४
विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया।
बिल्वपत्रं विना नैव पूजयेच्छङ्करं बुधः॥ |
भस्माप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठाः प्रवृत्ते शिवपूजने।
तस्मान्मृदापि कर्तव्यं ललाटे च त्रिपुण्डूकम्॥ ५६
इसके बाद पंचाक्षर-मन्त्रका जप करके शतरुद्रियका
पाठ तथा नाना प्रकारकी स्तुतियाँ करके शिवपंचांगका
पाठ करे। तत्पश्चात् परिक्रमा और नमस्कार करके
शिवलिंगका विसर्जन करे। इस प्रकार मैंने शिवपूजनकी
सम्पूर्ण विधिका आदरपूर्वक वर्णन किया। रात्रिमें
देवकार्यको सदा उत्तराभिमुख होकर ही करना चाहिये।
इसी प्रकार शिवपूजन भी पवित्र भावसे सदा उत्तराभिमुख
होकर ही करना उचित है। जहाँ शिवलिंग स्थापित
हो, उससे पूर्व दिशाका आश्रय लेकर बैठना या
खड़ा नहीं होना चाहिये; क्योंकि वह दिशा भगवान्
शिवके आगे या सामने पड़ती है (इष्टदेवका सामना
रोकना ठीक नहीं है) । शिवलिंगसे उत्तर दिशामें भी
न बैठे; क्योंकि उधर भगवान् शंकरका वामांग है,
जिसमें शक्तिस्वरूपा देवी उमा विराजमान हैं। पूजकको
शिवलिंगसे पश्चिम दिशामें भी नहीं बैठना चाहिये;
क्योंकि वह आराध्यदेवका पृष्ठभाग है (पीछेकी
ओरसे पूजा करना उचित नहीं है) अतः अवशिष्ट
दक्षिण दिशा ही ग्राह्म है, उसीका आश्रय लेना
चाहिये। [तात्पर्य यह कि शिवलिंगसे दक्षिण दिशामें
उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूजा करे।] विद्वान्
पुरुषको चाहिये कि वह बिना भस्मका त्रिपुण्ड
लगाये, बिना रुद्राक्षको माला धारण किये तथा
बिल्वपत्रका बिना संग्रह किये भगवान् शंकरकी पूजा
न करे। हे मुनिबरो! शिवपूजन आरम्भ करते समय
यदि भस्म न मिले, तो मिट्टीसे ही ललाटमें त्रिपुण्ड
अवश्य कर लेना चाहिये॥ ५१-५६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमाया विद्येशवरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे पार्थिवपूजनवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत प्रथम विद्येश्चरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें
पार्थिव-पूजन-वर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥
— re
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
शिव-नैवेद्य-भक्षणका निर्णय एवं बिल्वपत्रका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः
अग्राह्यं शिवनैवेद्यमिति पूर्व श्रुतं वच:
ऋषिगण बोले-हे महामुने! हमने पहले
सुना है कि भगवान् शिवको अर्पित किया गया नैवेद्य
अग्राह्य होता है, अतएव नैवेद्यके विषयमें निर्णय और
बरूहि तन्निर्णयं ख़िल्वमाहात्म्यमपि सन्मुने॥ ९ | बिल्वपत्रका माहात्म्य भी 'कहिये॥ १॥
१६६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २२
सूत उवाच
शृणुध्वं मुनयः सर्वे सावधानतयाधुना।
सर्व वदामि सम्प्रीत्या धन्या यूयं शिवत्रता: ॥
शिवभक्तः शुचिः शुद्धः सदव्रती दूढनिश्चयः।
भक्षयेच्छिवनैवेद्यं त्यजेदग्राह्मभावनाम्॥ ३
दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः।
भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः॥ ४
अलं यागसहस्रेणाप्यलं यागार्बुदैरपि।
भक्षिते शिवनैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ५
यद्गृहे शिवनेवेद्यप्रचारोऽपि प्रजायते।
तद्गृहं पावनं सर्वमन्यपावनकारणम्॥ ६
आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा।
भक्षणीयं प्रयलेन शिवस्मरणपूर्वकम्॥ ७
आगतं शिवनेवेद्यमन्यदा ग्राह्ममित्यपि।
विलम्बे पापसम्बन्धो भवत्येव हि मानवः॥ ८
न यस्य शिवनैवेद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते।
स पापिष्ठः गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि श्रुवम्॥ ९
हृदये चन्द्रकान्ते च स्वर्णरूप्यादिनिर्मिते।
शिवदीक्षावता भक्तेनेदं भक्ष्यमितीर्यते ॥ १०
शिवदीक्षान्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम्।
` सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम्॥ ११ | शिवनेवेद्यको
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सूतजी बोले--हे मुनियो! अब आप सब
सावधानीसे सुनें। मैं प्रेमपूर्वक सब कुछ कह रहा हूँ
आप लोग शिवत्रत धारण करनेवाले हैं, अत: आपलोग
धन्य हैं ॥ २॥
जो शिवका भक्त, पवित्र, शुद्ध, सद्त्रती
तथा दृढनिश्चयी है, उसे शिवनैवेद्य अवश्य ग्रहण
करना चाहिये और अग्राह्य भावनाका त्याग कर देना
चाहिये॥ ३॥
शिवनैवेद्यको देखनेमात्रसे ही सभी पाप दूर हो
जाते हैं और शिवका नैवेद्य भक्षण करनेसे तो करोड़ों
पुण्य स्वतः आ जाते हैं॥ ४॥
हजार यज्ञोंकी बात कौन कहे, अर्बुद यज्ञ करनेसे
भी वह पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता है, जो शिवनेवेद्य
खानेसे प्राप्त हो जाता है। शिवका नैवेद्य खानेसे तो
शिवसायुज्यकी प्राप्ति भी हो जाती है ॥ ५॥
जिस घरमें शिवको नैवेद्य लगाया जाता है या
अन्त्रसे शिवको समर्पित नैवेद्य प्रसादरूपमें आ जाता
है, वह घर पवित्र हो जाता है और वह अन्यको भी
पवित्र करनेवाला हो जाता है॥ ६॥
आये हुए शिवनैवेद्यको प्रसन्नतापूर्वक सिर
झुकाकर ग्रहण करके भगवान् शिवका स्मरण करते
हुए उसे खा लेना चाहिये॥ ७॥
आये हुए शिवनैवेद्यको दूसरे समयमें ग्रहण
करूँगा--ऐसी भावना करके जो मनुष्य उसे ग्रहण
करनेमें विलम्ब करता है, उसे पाप लगता है॥ ८॥
जिसमें शिवनैवेद्य ग्रहण करनेकी इच्छा उत्पल
नहीं होती, वह महान् पापी होता है और निश्चित
रूपसे नरकको जाता है॥ ९॥
हदयमें अवस्थित शिवलिंग या चन्द्रकान्तमणिसे
बने हुए शिवलिंग अथवा स्वर्ण या चाँदीसे बनाये
गये शिवलिंगको समर्पित किया गया नैवेद्य शिवकी
दीक्षा लिये भक्तको खाना ही चाहिये--ऐसा कहा
गया है॥ १०॥
इतना ही नहीं शिवदीक्षित भक्त समस्त
शिवलिंगोंके लिये समर्पित महाप्रसादरूप शुभ
खा सकता है॥ ११॥
के २२]
विद्येश्वरसंहिता १६७
अन्यदीक्षायुजां नृणां
शृणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनेवेद्यभक्षणे ॥ १२
शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः।
पाषाणे राजते स्वर्णे सुरसिद्धप्रतिष्ठिते॥ १३
काश्मीरे स्फाटिके राले ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः ।
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोनेवेद्यभक्षणम्॥ १४
ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत्।
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति॥ १५
चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः।
चण्डाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तितः॥ १६
बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धे लिङ्गे स्वयम्भुवि।
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत्॥ १७
स्नापयित्वा विधानेन यो लिङ्गस्नपनोदकम्।
त्रिःपिबेत्त्रिविधं पापं तस्येहाशु विनश्यति॥ १८
अग्राह्यं शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम्।
शालग्रामशिलासङ्गात्सर्वं याति पवित्रताम्॥
लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्मं मुनीश्वराः।
सुपवित्रं च तज्ज्ेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः॥ २०
नैवेद्यनिर्णयः प्रोक्त इत्थं वो मुनिसत्तमाः।
शृणुध्वं बिल्वमाहात्म्यं सावधानतयादरात्॥ २१
महादेवस्वरूपोऽयं बिल्वो देवैरपि स्तुतः।
यथाकथञ्जिदेतस्य महिमा ज्ञायते कथम्॥ २२
जिन मनुष्योंने अन्य देवोंकी दीक्षा ली है
और शिवकी भक्तिमें वे अनुरक्त रहते हैं, उनके लिये
शिवनैवेद्यके भक्षणके विषयमें निर्णयको प्रेमपूर्वक
आप सब सुनें॥ १२॥
हे ब्राह्मणो! शालग्राममें उत्पन्न शिवलिंग, रसलिंग
(पारदलिंग), पाषाणलिंग, रजतलिंग, स्वर्णलिंग,
देवों और सिद्ध मुनियोंके द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग,
केसरके बने हुए लिंग, स्फटिकलिंग, रत्ललिंग और
ज्योतिलिंग आदि समस्त शिवलिंगोंके लिये समर्पित
नैवेद्यका भक्षण करना चान्द्रायण-ब्रतके समान फल
देनेवाला कहा गया है॥ १३-१४॥
यदि ब्रह्महत्या करनेवाला भी पवित्र होकर शिवका
पवित्र निर्माल्य धारण करता है और उसे खाता है,
उसके सम्पूर्ण पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ १५॥
जहाँ चण्डका अधिकार हो, वहाँ शिवलिंगके
लिये समर्पित नैवेद्यका भक्षण मनुष्योंकों नहीं करना
चाहिये; जहाँ चण्डका अधिकार न हो, वहाँ भक्तिपूर्वक
भक्षण करना चाहिये॥ १६॥
बाणलिंग, लौहलिंग, सिद्धलिंग, स्वयम्भूलिंग
और अन्य समस्त प्रतिमाओंमें चण्डका अधिकार नहीं
होता है॥ १७॥
जो विधिपूर्वक शिवलिंगको स्नान कराकर उस
स्नानजलको तीन बार पीता हैं, उसके समस्त पाप
शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं॥ १८॥
[चण्डके द्वारा अधिकृत होनेके कारण] अग्राह्य
शिवनैवेद्य पत्र-पुष्प-फल और जल--यह सब
शालग्रामशिलाके स्पर्शसे पवित्र हो जाता है॥ १९॥
हे मुनीश्वरो ! शिवलिंगके ऊपर जो भी द्रव्य चढ़ाया
जाता है, वह अग्राह्य है और जो लिंगके स्पर्शसे बाहर
है, उसे अत्यन्त पवित्र जानना चाहिये॥ २०॥
हे मुनिश्रेष्ठो। इस प्रकार मैंने शिवनैवेद्यका
निर्णय कह दिया। अब आप सब सावधानीसे
बिल्वपत्रके माहात्म्यको आदरपूर्वक सुनें॥ २१॥
बिल्ववृक्ष तो महादेवस्वरूप है, देवोंके द्वारा भी
इसकी स्तुति की गयी हैं, अतः जिस किसी प्रकारसे
उसकी महिमाको कैसे जाना जा सकता है॥ २२॥
१६८
पुण्यतीर्थानि यावन्ति लोकेषु प्रथितान्यपि।
तानि सर्वाणि तीर्थानि बिल्वमूले वसन्ति हि॥ २
बिल्वमूले महादेवं लिङ्गरूपिणमव्ययम्।
'यः पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद् श्रुवम्॥ २४
बिल्वमूले जलेर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्जति।
स सर्वतीर्थस्तातः स्यात्स एव भुवि पावनः॥ २५
एतस्य बिल्वमूलस्याथालवालमनुत्तमम्।
जलाकुलं महादेवो दृष्ट्वा तुष्टो भवत्यलम्॥ २६
पूजयेद् बिल्वमूलं यो गन्धपुष्पादिभिर्नरः।
शिवलोकमवाप्नोति सन्ततिर्वर्धते सुखम्॥ २७
बिल्वमूले दीपमालां यः कल्पयति सादरम्।
स तत्त्वज्ञानसम्पन्नो महेशान्तर्गतो भवेत्॥ २८
बिल्वशाखां समादाय हस्तेन नवपल्लवम्।
गृहीत्वा पूजयेद् बिल्वं स च पापैः प्रमुच्यते॥ २९
बिल्वमूले शिवरतं भोजयेद्यस्तु भक्तितः।
एकं वा कोटिगुणितं तस्य पुण्यं प्रजायते॥ ३०
बिल्वमूले क्षीरयुक्तमन्नमाज्येन संयुतम्।
यो दद्याच्छिवभक्ताय स दरिद्रो न जायते॥ ३१
साङ्गोपाङ्गमिति प्रोक्तं शिवलिङ्गप्रपूजनम्।
प्रवृत्तानां निवृत्तानां भेदतो द्विविधं द्विजाः॥ ३२
प्रवृत्तानां पीठपूजा सर्वाभीष्टप्रदा भुवि।
पात्रेणैव प्रवृत्तस्तु सर्वपूजां समाचरेत्॥ ३३
जैवेद्यमभिषेकान्ते शाल्यन्नेन समाचरेत्।
| पूजान्ते स्थापयेल्लिङ्गं पुटे शुद्धे पृथग्गृहे॥ ३४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २२
संसारमें जितने भी प्रसिद्ध तीर्थ हैं, वे सब तोथ
बिल्वके मूलमें निवास करते हैं ॥ २३॥
जो पुण्यात्मा बिल्ववृक्षके मूलमें लिंगरूपी अव्यय
भगवान् महादेवकी पूजा करता है, वह निश्चित रूपसे
शिवको प्राप्त कर लेता है॥ २४॥
जो प्राणी बिल्ववृक्षके मूलमें शिवजीके मस्तकपर
अभिषेक करता है, वह समस्त तीर्थामें स्नान करनेका
फल प्राप्तकर पृथ्वीपर पवित्र हो जाता है॥ २५॥
इस बिल्ववृक्षके मूलमें बने हुए उत्तम
थालेको जलसे परिपूर्ण देखकर भगवान् शिव अत्यन्त
प्रसन्न होते हैं ॥ २६॥
जो व्यक्ति गन्ध-पुष्पादिसे बिल्ववृक्षके मूलका
पूजन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त करता है और
उसके सन्तान और सुखकी अभिवृद्धि होती है ॥ २७॥
जो मनुष्य बिल्ववृक्षके मूलमें आदरपूर्वक
'दीपमालाका दान करता है, वह तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न
होकर महादेवके सान्निध्यको प्राप्त हो जाता है॥ २८॥
जो बिल्वशाखाको हाथसे पकड़कर उसके
नवपल्लवको ग्रहण करके बिल्वकी पूजा करता है,
वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २९॥
जो पुरुष भक्तिपूर्वक बिल्ववृक्षके नीचे एक
शिवभक्तको भोजन कराता है, उसे करोड़ों मनुष्योंको
भोजन करानेका पुण्य प्राप्त होता है॥ ३०॥
जो बिल्ववृक्षके नीचे दूध और घीसे युक्त अन
शिव-भक्तको प्रदान करता है, वह दरिद्र नहीं रह
जाता है॥ ३१॥
हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने सांगोपांग शिवलिंगके
पूजनविधानको कह दिया है। इसमें भी प्रवृत्तो और
निवृत्तोंके लिये दो भेद हैं॥ ३२॥
प्रवृत्तिमार्गियोंक लिये पीठपूजा इस भूतलपर
सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देने वाली होती है । प्रवृत्त
पुरुषको चाहिये कि सुपात्र गुरु आदिके द्वारा ही सारी
पूजा सम्पन्न करे॥ ३३॥
शिवलिंगका अभिषेक करनेके पश्चात् अगहनी
अनसे नैवेद्य लगाना चाहिये। पूजाके अन्तमें उस
रिवलिंगको किसी शुद्ध पुट (डिब्बे)-में रख देता
चाहिये अथवा किसी दूसरे शुद्ध घरमे स्थापित कर
|
डे २३]
विद्येश्वरसंहिता १६९
'करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत्।
निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते॥ ३५
विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत्।
पूजां कृत्वा तथा लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा॥ ३६
देना चाहिये। निवृत्तिमार्गी उपासकोंके लिये हाथपर
ही शिवपूजाका विधान है। उन्हें [भिक्षा आदिसे
प्राप्त] अपने भोजनको ही नैवेद्यरूपमें अर्पित करना
चाहिये | निवृत्तिमार्गियोंके लिये परात्पर सूक्ष्म लिंग ही
श्रेष्ठ बताया गया है। उन्हें चाहिये कि विभूतिसे ही
पूजा करें और विभूतिका ही नैवेद्य शिवको प्रदान
करें। पूजा करनेके पश्चात् उस विभूतिस्वरूप लिंगको
सिरपर सदा धारण करना चाहिये॥ ३४--३६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे शिवनैवेद्यवर्णन नाम द्वाविशोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्योश्वरसंहिताके साध्यसाथनखण्डमें शिवनेवेद्यवर्णन
नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥
— ore
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
भस्म, रुद्राक्ष और शिवनामके माहात्म्यका वर्णन
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
तदेव व्यासतो ब्रूहि भस्ममाहात्म्यमुत्तमम्॥ १
तथा रुद्राक्षमाहात्म्यं नाममाहात्म्यमुत्तमम्।
त्रितयं ब्रूहि सुप्रीत्या ममानन्दय मानसम्॥ २
सूत उवाच
साधु पृष्टं भवद्भिश्च लोकानां हितकारकम्।
भवन्तो वै महाधन्याः पवित्राः कुलभूषणाः ॥ ३
येषां चैव शिवः साक्षाद् दैवतं परमं शुभम्।
सदाशिवकथा लोके वल्लभा भवतां सदा॥ ४
ते धन्याश्च कृतार्थाश्च सफलं देहधारणम्।
उद्धृतं च कुलं तेषां ये शिवं समुपासते॥ ५
शिवनाम मुखे यस्य सदा शिवशिवेति च।
पापानि न स्पृशन्त्येव खदिराङ्गारकं यथा॥
ऋषिगण बोले-हे महाभाग व्यासशिष्य
सूतजी! आपको नमस्कार है। अब आप परम उत्तम
भस्म-माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥
भस्ममाहात्म्य, रुद्राक्षमाहात्म्य तथा उत्तम
नाममाहात्म्य-इन तीनोंका परम प्रसन्नतापूर्वक
प्रतिपादन कीजिये और हमारे हृदयको आनन्दित
कीजिये॥ २॥
सूतजी बोले-हे महर्षयो! आप लोगोंने
बहुत उत्तम बात पूछी है; यह समस्त लोकोंके लिये
हितकारक विषय है। आप लोग महाधन्य, पवित्र
तथा अपने कुलके भूषणस्वरूप हैं॥ ३॥
इस संसारमें कल्याणकारी परमदेवस्वरूप भगवान्
शिव जिनके देवता हैं, ऐसे आप सबके लिये यह
शिवकी कथा अत्यन्त प्रिय है॥ ४॥
चे ही धन्य और कृतार्थ हैं, उन्हींका शरीर धारण
करना भी सफल है और उन्होंने ही अपने कुलका उद्धार
कर लिया है, जो शिवकी उपासना करते हैं॥ ५॥
जिनके मुखमें भगवान् शिवका नाम है, जो
अपने मुखसे सदा शिवःशिव इस नामका उच्चारण
करते रहते हैं, पाप उनका उसी तरह स्पर्श नहीं करते,
जैसे खदिर वृक्षके अंगारको छूनेका साहस कोई भी
प्राणी नहीं कर सकता ॥ ६॥
१७०
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २३
श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं मुखं व्याहरते यदा।
तन्मुखं पावनं तीर्थ सर्वपापविनाशनम्॥
तन्मुखं च तथा यो वै पश्यति प्रीतिमान्नरः।
तीर्थजन्यं फलं तस्य भवतीति सुनिश्चितम् ८
यत्र त्रयं सदा तिष्ठेदेतच्छुभतरं द्विजाः।
तस्य दर्शनमात्रेण वेणीस्नानफलं लभेत्॥ ९
शिवनाम विभूतिश्च तथा रुद्राक्ष एव च।
एतत्त्रयं महापुण्यं त्रिवेणीसदृशं स्मृतम्॥ १०
एतत्त्रयं शरीरे च यस्य तिष्ठति नित्यशः।
तस्यैव दर्शनं लोके दुर्लभं पापहारकम्॥ १९
तद्दर्शनं यथा वेणी नोभयोरन्तरं मनाक्।
एवं यो न विजानाति स पापिष्ठो न संशय: ॥ १२
विभूतिर्यस्य नो भाले नाडे रुद्राक्षधारणम्।
नास्ये शिवमयी वाणी तं त्यजेदधमं यथा॥ १३
शैवं नाम यथा गङ्गा विभूतिर्यमुना मता।
रुद्राक्षं विधिजा प्रोक्ता सर्वपापविनाशिनी ॥ १४
शरीरे च त्रयं यस्य तत्फलं चैकतः स्थितम्।
एकतो वेणिकायाश्च स्नानजं तु फलं बुधैः॥ १५
तदेवं तुलितं पूर्व ब्रह्मणा हितकारिणा।
समानं चैव तजातं तस्माद् धार्यं सदा बुधैः॥ १६
तहिनं हि समारभ्य ब्रहमविष्णवादिभिः सुरैः।
' धार्यते त्रितयं तच्च दर्शनात्पापहारकम्॥ १७
हे शिव! आपको नमस्कार है (
नमस्तुभ्यम्)-जिस मुखसे ऐसा उच्चारण होता है,
वह मुख समस्त पापोंका विनाश करनेवाला पावन
तीर्थ बन जाता है। जो मनुष्य उस
मुखका दर्शन करता है, उसे निश्चय ही तीर्थसेवनजनित
फल प्राप्त होता है॥ ७-८॥
हे ब्राह्मणो! शिवका नाम, विभूति (भस्म) तथा
रुद्राक्ष-ये तीनों त्रिवेणीके समान परम पुण्यवाले माने
गये हैं । जहाँ ये तीनों शुभतर वस्तुएँ सर्वदा रहती हैं,
उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य त्रिवेणीस्नानका फल पा
लेता है॥ ९-१०॥
जिसके शरीरपर भस्म, रुद्राक्ष और मुखमें
शिवनाम--ये तीनों नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका
पापविनाशक दर्शन संसारमें दुर्लभ है॥ ११॥
उस पुण्यात्माका दर्शन त्रिवेणीके समान ही है,
भस्म, रुद्राक्ष तथा शिवनामका जप करनेवाले और
त्रिवेणी--इन दोनोंमें रंचमात्र भी अन्तर नहीं है-ऐसा
जो नहीं जानता, वह निश्चित ही पापी है; इसमें
सन्देह नहीं है॥ १२॥
जिसके मस्तकपर विभूति नहीं है, अंगमें रुद्राक्ष
नहीं है और मुखमें शिवमयी वाणी नहीं है, उसे
अधम व्यक्तिके समान त्याग देना चाहिये ॥ १३॥
भगवान् शिवका नाम गंगा है। विभूति यमुना
मानी गयी है तथा रुद्राक्षको सरस्वती कहा गया है।
इन तीनोंकी संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापोंका नाश
करनेवाली है॥ १४॥
बहुत पहलेकी बात है, हितकारी ब्रह्माने जिसके
शरीरमें उक्त ये तीनों-त्रिपुण्डू, रुद्राक्ष और शिवनाम
संयुक्त रूपसे विद्यमान थे, उनके फलको तुलाके पलड़ेमें
एक ओर रखकर, त्रिवेणीमें स्नान करनेसे उत्पन्न फलकी
दूसरी ओरके पलड़ेमें रखा और तुलना की, तो दोनों
बराबर ही उतरे। अतएव विद्वानोंको चाहिये कि ईन
तीनोंको सदा अपने शरीरपर धारण करें॥ १५-१६॥
उसी दिनसे ब्रह्मा, विष्णु आदि देव भी दर्शनमात्रसे
पापोंको नष्ट कर देनेवाले इन तीनों (रुद्राक्ष, विभूति
और शिवनाम)-को धारण करने लगे॥ १७॥
जे २३]
विद्येश्वरसंहिता
१७१
ऋषय ऊचुः
ईदूशं हि फलं प्रोक्तं नामादित्रितयोद्धवम्।
तन्माहात्म्यं विशेषेण वक्तुमहसि सुक्रत॥ १८
सूत उवाच
ऋषयो हि महाप्राज्ञाः सच्छैवा ज्ञानिनां वरा: ।
तन्माहात्म्यं हि सद्भक्त्या शृणुतादरतो द्विजाः ॥ १९
सुगूढमपि शास्त्रेषु पुराणेषु श्रुतिष्वपि।
भवत्स्नेहान्मया विप्राः प्रकाशः क्रियतेऽधुना ॥ २०
'कस्तत्त्रितयमाहात्म्यं सञ्जानाति द्विजोत्तमाः।
महेश्वरं विना सर्व ब्रह्माण्डे सदसत्परम्॥ २१
वच्म्यहं नाममाहात्म्यं यथाभक्ति समासतः।
शृणुत प्रीतितो विप्राः सर्वपापहरं परम्॥ २२
शिवेति नामदावाग्नेर्महापातकपर्वताः।
भस्मीभवन्त्यनायासात्सत्यं सत्यं न संशयः॥ २३
पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपि शौनक।
शिवनामैकनश्यानि नान्यनश्यानि सर्वथा॥
स वैदिकः स पुण्यात्मा स धन्यः स बुधो मतः।
शिवनामजपासक्तो यो नित्यं भुवि मानव: ॥ २५
भवन्ति विविधा धर्मास्तेषां सद्यः फलोन्मुखाः ।
येषां भवति विश्वासः शिवनामजपे मुने॥ २६
ऋषिगण बोले--हे सुव्रत! [ भस्म, रुद्राक्ष और
शिवनाम] इन तीनोंको धारण करनेसे इस प्रकार
उत्पन्न होनेवाले फलका वर्णन तो आपने कह दिया
है, किंतु अब आप विशेष रूपसे उनके माहात्म्यका
वर्णन करें ॥ १८॥
सूतजी बोले--ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ! हे
शिवभक्त ऋषियो और विप्रो! आप सब सद्भक्ति तथा
आदरपूर्वक उक्त भस्म, रुद्राक्ष और शिवनाम-इन
तीनोंका माहात्म्य सुनें॥ १९॥
शास्त्रों, पुराणों और श्रुतियोंमें भी इनका माहात्म्य
अत्यन्त गूढ़ कहा गया है। हे विप्रो! आप सबके
स्नेहवश इस समय मैं [उस रहस्यको खोलकर]
प्रकाशित करने जा रहा हूँ॥ २०॥
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इन तीनोंकी महिमाको
सदसद्विलक्षण भगवान् महेश्वरके बिना दूसरा कौन
भलीभाँति जान सकता है। इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ
है, बह सब तो केवल महेश्वर ही जानते हैं॥ २१॥
हे विप्रगण! मैं अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार
संक्षेपसे भगवन्नामकी महिमाका कुछ वर्णन करता
हूँ। आप सबलोग प्रेमपूर्वक उसे सुनें। यह नाम-
माहात्म्य समस्तं पापोंको हर लेनेवाला सर्वोत्तम
साधन है॥२२॥
“शिव '-इस नामरूपी दावानलसें महान् पातकरूपी
पर्वत अनायास ही भस्म हो जाता है-यह सत्य है,
सत्य है; इसमें संशय नहीं हैं॥ २३॥
हे शौनक! पापमूलक जो नाना प्रकारके दुःख
हैं, वे एकमात्र शिवनाम (भगवन्नाम)-से ही नष्ट
होनेवाले हैं; दूसरे साधनोंसे सम्पूर्ण यत्न करनेपर भी
पूर्णतया नष्ट नहीं होते हैं॥ २४॥
जो मनुष्य इस भूतलपर सदा भगवान् शिवके
नामोंके जपमें ही लगा हुआ है, वह वेदोंका ज्ञाता है,
वह पुण्यात्मा है, वह धन्यवादका पात्र है तथा वह
विद्वान् माना गया है॥ २५॥
हे मुने! जिनका शिवनामजपमें विश्वास है,
उनके द्वारा आचरित नाना प्रकारके धर्म तत्काल फल
देनेके लिये उत्सुक हो जाते हैं॥ २६॥
१७२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २३
पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवनामतः।
भुवि तावन्ति पापानि क्रियन्ते न नरैर्मुने॥
ब्रह्महत्यादिपापानां राशीनप्रमितान्मुने।
शिवनाम हुतं प्रोक्तं नाशयत्यखिलान्नरैः॥ २८
शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ये।
संसारमूलपापानि तानि नश्यन्त्यसंशयम्॥ २९
संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने।
शिवनामकुठारेण विनाशो जायते ध्रुवम्॥ ३०
शिवनामामृतं पेयं पापदावानलार्दितैः।
पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि॥ ३१
शिवेति नामपीयूषवर्षधारापरिप्लुताः।
संसारदवमध्येऽपि न शोचन्ति कदाचन॥ ३२
शिवनाम्नि महद्भक्तिर्जाता येषां महात्मनाम्।
तद्विधानां तु सहसा मुक्तिर्भवति सर्वथा॥ ३३
अनेकजन्मभियेन तपस्तप्तं मुनीश्वर।
शिवनाम्नि भवेद्भक्तिः सर्वपापापहारिणी॥ ३४
यस्यासाधारणी शम्भुनाम्नि भक्तिरखणि्डता।
तस्यैव मोक्षः सुलभो नान्यस्येति मतिर्मम ॥ ३५
कृत्वाप्यनेकपापानि शिवनामजपादरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवत्येव न संशयः॥ ३६
भवन्ति भस्मसाद् वृक्षा दवदग्धा यथा बने।
तथा तावन्ति दग्धानि पापानि शिवनामतः॥ ३७
यो नित्यं भस्मपूताङ्गः शिवनामजपादरः ।
स तरत्येव संसारमघोरमपि शौनक॥ ३८
हे महर्षे! भगवान् शिवके नामसे पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवनामतः। | हे महे! भगवान् शिवके नामसे जितने प
नष्ट होते हैं, उतने पाप मनुष्य इस भूतलपर कर ही
नहीं सकता ॥ २७॥
हे मुने ! ब्रह्महत्या-जैसे पापोंकी समस्त
राशियाँ शिवनाम लेनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं॥ २८॥
जो शिवनामरूपी नौकापर आरूढ़ होकर संसार.
समुद्रको पार करते हैं, उनके जन्म-मरणरूप संसारके
मूलभूत वे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ २९॥
हे महामुने! संसारके मूलभूत पातकरूपी
वृक्षका शिवनामरूपी कुठारसे निश्चय ही नाश हो
जाता है ॥ ३०॥
जो पापरूपी दावानलसे पीड़ित हैं, उन्हें
शिवनामरूपी अमृतका पान करना चाहिये। पापोंके
दावानलसे दग्ध होनेवाले लोगोंको उस शिवनामामृतके
बिना शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ३१॥
जो शिवनामरूपी सुधाकी वृष्टिजनित धारामें
गोते लगा रहे हैं, वे संसाररूपी दावानलके बीचमें
खड़े होनेपर भी कदापि शोकके भागी नहीं होते॥ ३२॥
जिन महात्माओंके मनमें शिवनामके प्रति बड़ी
भारी भक्ति है, ऐसे लोगोंकी सहसा और सर्वथा मुक्ति
होती है॥ ३३॥
हे मुनीश्वर! जिसने अनेक जन्मोंतक तपस्या
को है, उसीकी शिवनामके प्रति भक्ति होती है, जो
समस्त पापोंका नाश करनेवाली है॥ ३४॥
जिसके मनमें भगवान् शिवके नामके प्रति कभी
खण्डित न होनेवाली असाधारण भक्ति प्रकट हुई है,
उसीके लिये मोक्ष सुलभ है--यह मेरा मत है॥ ३५॥
जो अनेक पाप करके भी भगवान् शिवके नाम
जपमें आदरपूर्वक लग गया है, वह समस्त पापोंसे
मुक्त हो ही जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ ३६॥
जैसे वनमें दावानलसे दग्ध हुए वृक्ष भस्म ही
जाते हैं, उसी प्रकार शिवनामरूपी दावानलसे दग्ध होकर
उस समयतकके सारे पाप भस्म हो जाते हैं॥ ३७॥
हे शौनक! जिसके अंग नित्य भस्म लगानेसे पि
हो गये हैं तथा जो शिवनामजपका आदर करने लगा हैं
वह घोर संसारसागरको भी पार कर ही लेता है ॥ ३८॥
डं २४]
विद्येश्वरसंहिता
१७३
ब्रह्मस्वहरणं कृत्वा हत्वापि ब्राह्मणान्बहून्।
न लिप्यते नरः पापैः शिवनामजपादरः ॥ ३९
विलोक्य वेदानखिलान् शिवनामजप: परः।
संसारतरणोपाय इति पूर्वैर्विनिश्चितम्॥ ४०
किं बहूक्त्या मुनिश्रेष्ठाः श्लोकेनैकेन वच्म्यहम्।
शिवाभिधानमाहात्म्यं सर्वपापापहारणम्॥ ४१
पापानां हरणे शम्भोर्नाम्नः शक्तिर्हि यावती।
शक्नोति पातकं तावत्कर्तु नापि नरः क्वचित्॥ ४२
शिवनामप्रभावेण लेभे सद्गतिमुत्तमाम्।
इन्द्रद्युम्ननृप: पूर्वं महापापयुतो मुने॥ ४३
तथा काचिद् द्विजा योषाऽसौ मुने बहुपापिनी।
शिवनामप्रभावेण लेभे सदगतिमुत्तमाम्॥ ४४
इत्युक्तं वो द्विजश्रेष्ठा नाममाहात्म्यमुत्तमम्।
शृणुध्वं भस्ममाहात्म्यं सर्वपावनपावनम्॥ ४५
ब्राह्मणोंका धनहरण और अनेक ब्राह्मणोंकी
करके भी जो आदरपूर्वक शिवके नामका जप
करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता है [अर्थात् उसे
किसी भी प्रकारका पाप नहीं लगता है]॥ ३९॥
सम्पूर्ण वेदोंका अवलोकन करके पूर्ववर्ती
महर्षियोंने यही निश्चित किया है कि भगवान् शिंवके
नामका जप संसारसागरको पार करनेके लिये सर्वोत्तम
उपाय है॥ ४०॥
हे मुनिवरो! अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं
शिव-नामके सर्वपापहारी माहात्म्यका वर्णन एक ही
श्लोकमें करता हूँ.॥ ४१॥
भगवान् शंकरके एक नाममें भी पापहरणकी
जितनी शक्ति है, उतना पातक मनुष्य कभी कर ही
नहीं सकता॥ ४२॥
हे मुने! पूर्वकालमें महापापी राजा इन्द्रद्युम्नने
शिवनामके प्रभावसे ही उत्तम सद्गति प्राप्त की
थी॥ ४३॥
इसी तरह कोई ब्राह्मणी युवती भी जो बहुत पाप
कर चुकी थी, शिवनामके प्रभावसे ही उत्तम गतिको
प्राप्त हुई ॥४४॥
हे द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे
भगवन्नामके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया है । अब
आप लोग भस्मका माहात्म्य सुनें, जो समस्त पावन
वस्तुओंको भी पवित्र करनेवाला है ॥ ४५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे
शिवनाममाहात्म्यवर्णतं नाम त्रयोर्विशोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणमें प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें
नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
अथ चतुर्विशोऽध्यायः
भस्म-माहात्म्यका निरूपण
सूत उवाच
द्विविधं भस्म सम्प्रोक्तं सर्वमङ्गलदं परम्।
सूतजी बोले-हे महर्षियो! भस्म सम्पूर्ण
मंगलोंको देनेवाला तथा उत्तम है, उसके दो भेद
बताये गये हैं। में उन भेदोंका वर्णन करता हूँ, आप
तत्प्रकारमहं वक्ष्ये सावधानतया श्रृणु॥ १ लोग सावधान होकर सुनिये॥ १॥
१७४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २४
एकं ज्ञेयं महाभस्म द्वितीयं स्वल्पसंज्ञकम्।
महाभस्म इति प्रोक्तं भस्म नानाविधं परम्॥
तद्भस्म त्रिविधं प्रोक्तं श्रोतं स्मार्त च लौकिकम्
भस्मैव स्वल्पसंज्ञं हि बहुधा परिकीर्तितम्॥ ३
श्रौतं भस्म तथा स्मार्त द्विजानामेव कीर्तितम्
अन्येषामपि सर्वेषामपरं भस्म लौकिकम्॥ ४
धारणं मन्त्रतः प्रोक्तं द्विजानां मुनिपुङ्गवैः ।
केवलं धारणं ज्ञेयमन्येषां मन्त्रवर्जितम्॥ ५
आग्नेयमुच्यते भस्म दग्धगोमयसम्भवम्।
'तदपि द्रव्यमित्युक्तं त्रिपुण्ड्रस्य महामुने॥ ६
अग्निहोत्रोत्थितं भस्म सङ्ग्राह्यं वा मनीषिभिः ।
अन्ययज्ञोत्थितं वापि त्रिपुण्ड्रस्य च धारणे॥ ७
अग्निरित्यादिभिर्मनत्रर्जाबालोपनिषद्गतैः ।
सप्तभिर्धूलनं कार्य भस्मना सजलेन च॥ ८
बर्णानामाश्रमाणां च मन्त्रतोऽमन्त्रतोऽपि च।
त्रिपुण्ड्रोदधूलनं प्रोक्तं जाबालैराद्रेण च॥ ९
भस्मनोदधूलनं चैव धृतं तिर्यक् त्रिपुण्ड्कम्।
प्रमादादपि मोक्षार्थी न त्यजेदिति वै श्रुतिः ॥ १०
शिवेन विष्णुना चैव धृतं तिर्यक् त्रिपुण्डूकम्।
उमादेव्या च लक्ष्म्या च स्तुतमन्येश्व नित्यशः ॥ १९
ब्रह्मणैः क्षत्रियैवेश्यै: शूद्ररपि च सङ्करैः।
अपध्रशेर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोदधूलनात्मना॥ १२
उद्धूलनं त्रिपुण्ड च श्रद्धया नाचरन्ति ये।
तेषां नास्ति समाचारो वर्णाश्रमसमन्वितः॥ १३
एकको “महाभस्म' जानना चाहिये और
“स्वल्पभस्म'। महाभस्मके भी अनेक भेद हैं। बह तीन
प्रकारका कहा गया है- श्रौत, स्मार्त और लौकिक |
स्वल्पभस्मके भी बहुत-से भेदोंका वर्णन किया गया
है। श्रौत और स्मार्त भस्मको केवल द्विजोंके ही
उपयोगमें आनेके योग्य कहा गया है। तीसरा जो
लौकिक भस्म है, वह अन्य लोगोंके भी उपयोगमें आ
सकता है॥ २--४॥
श्रेष्ठ महर्षियोंने यह बताया है कि द्विजोंको
वैदिक मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भस्म धारण करना
चाहिये। दूसरे लोगोंके लिये बिना मन्त्रके ही केवल
धारण करनेका विधान है॥ ५॥
जले हुए गोबरसे उत्पन्न होनेवाला भस्म आग्नेय
कहलाता है। हे महामुने! वह भी त्रिपुण्डका द्रव्य
है--ऐसा कहा गया है॥६॥
अग्निहोत्रसे उत्पन्न हुए भस्मका भी मनीषी
पुरुषोंको संग्रह करना चाहिये । अन्य यज्ञसे प्रकट हुआ
भस्म भी त्रिपुण्ड्धारणके काममें आ सकता है ॥ ७॥
जाबालोपनिषद्में आये हुए ' अग्नि: ' इत्यादि
सात मन््रंद्वारा जलमिश्रित भस्मसे धूलन (विभिन
अंगोंमें मर्दन या लेपन) करना चाहिये॥ ८॥
महर्षि जाबालिने सभी वर्णो और आश्रमोंके
लिये मन्त्रसे या बिना मन्त्रके भी आदरपूर्वक भस्मसे
त्रिपुण्ड लगानेकी आवश्यकता बतायी है ॥ ९॥
समस्त अंगोंमें सजल भस्मको मलता
अथवा विभिन्न अंगोंमें तिरछा त्रिपुण्ड लगाना-इतं
कार्योको मोक्षार्थी पुरुष प्रमादसे भी न छोड़े-ऐसा
श्रुतिका आदेश है॥ १०॥
भगवान् शिव और विष्णुने भी तिर्यक् त्रिपुण्ड
धारण किया है। अन्य देवियोंसहित भगवती उमा और
लक्ष्मीदेवीने भी वाणीद्वारा इसकी प्रशंसा की है॥ ११॥
ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों, शुद्रों, वर्णसंकरो तथा
जातिभ्रष्ट पुरुषोंने भी उद्धूलन एवं त्रिपुण्ड्के रूपमे
भस्मको धारण किया है॥ १२॥
जो लोग श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मका उदू
(लेप) तथा त्रिपुण्ड् धारण करनेका आचरण नहीं
हैं, उनमें वरणाश्रम:समन्वित सदाचारकी कमी है॥ १२॥
ड २४]
उद्धूलनं त्रिपुण्डूं च श्रद्धया नाचरन्ति ये।
तेषां नास्ति विनिर्मुक्ति: संसाराजन्मकोटिभिः ॥ १४
उद्धूलनं त्रिपुण्डूं च श्रद्धया नाचरन्ति ये।
तेषां नास्ति शिवज्ञानं कल्पकोटिशतैरपि॥ १५
उदधूलनं त्रिपुण्डूं च श्रद्धया नाचरन्ति ये।
ते महापातकेर्युक्ता इति शास्त्रीयनिर्णयः॥ १६
उदधूलनं त्रिपुण्ड च श्रद्धया नाचरन्ति ये।
तेषामाचरितं सर्व विपरीतफलाय हि॥ १७
महापातकयुक्तानां जन्तूनां शर्वविद्विषाम्।
त्रिपुण्ड्रोदधूलनद्वेषो जायते सुदूढं मुने॥ १८
शिवाग्निकार्यं यः कृत्वा कुर्यात्तरियायुषात्मवित्।
मुच्यते सर्वपापैस्तु स्पृष्टेन भस्मना नरः॥ १९
सितेन भस्मना कुर्यात्त्रिसन्ध्यं यस्त्रपुण्ड्कम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवेन सह मोदते॥ २०
सितेन भस्मना कुर्याल्लाटे तु त्रिपुण्डूकम्।
योऽसावनादिभूतान्हि लोकानाप्तोऽमृतो भवेत्॥ २१
अकृत्वा भस्मना स्नानं न जपेद्वै षडक्षरम्।
त्रिपुण्डूं च रचित्वा तु विधिना भस्मना जपेत्॥ २
अद्यो वाधमो वापि सर्वपापान्वितो$पि वा।
उपपापान्वितो वापि मूर्खो वा पतितोऽपि वा॥ २३
यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं भूतिशासनर्सयुतः।
सर्वतीथैश्च क्रतुभिः सानिध्यं क्रियते सदा॥ २४
त्रिपुण्ड्सहितो जीवः पूज्यः सवैः सुरासुरैः।
पापान्वितोऽपि शुद्धात्मा किं पुनः श्रद्धया युतः॥ २५
विद्येश्वरसंहिता
१७५
जिनके द्वारा श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मलेप और
तरिपुण्ड्धारणका आचरण नहीं किया जाता है, उनकी
विनिर्मुक्ति करोड़ों जन्मोंमें भी संसारसे सम्भव नहीं
है॥ १४॥
जो श्रद्धापूर्वक शरीरमें भस्मलेप और त्रिपुण्ड
धारणका आचारपालन नहीं करते हैं, उन्हें सौ करोड़
कल्पोंमें भी शिवका ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥
जो श्रद्धापूर्वक भस्मलेप तथा त्रिपुण्ड्रधारण नहीं
करते हैं, वे महापातकॉंसे युक्त हो जाते हैं, ऐसा
शास्त्रोंका निर्णय है॥ १६॥
जो श्रद्धापूर्वक भस्मोद्धूलन और त्रिपुण्ड्धारण
नहीं करते हैं, उन लोगोंका सम्पूर्ण आचरण विपरीत
फल प्रदान करनेवाला हो जाता है॥ १७॥
हे मुनियो! जो महापातकोंसे युक्त और समस्त
प्राणियोंसे द्वेष करनेवाले हैं, वे ही त्रिपुण्ड्धारण तथा
भस्मोद्धूलनसे अत्यधिक द्वेष करते हैं॥ १८॥
जो आत्मज्ञानी मनुष्य शिवाग्नि (अग्निहोत्र) -
का कार्य करके “त्र्यायुषं जमदग्ने: '-इस मन्त्रसे
भस्मका मात्र स्पर्श ही कर लेता है, वह समस्त पापोंसे
मुक्त हो जाता है॥ १९॥
जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकालोंमें श्वेत भस्मके
द्वारा त्रिपुण्ड धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त
होकर शिवसान्तिध्यका आनन्द भोगता है॥ २०॥
जो व्यक्ति श्वेत भस्मसे अपने मस्तकपर त्रिपुण्डू
धारण करता है, वह अनादिभूत लोकोंको प्राप्तकर
अमर हो जाता है॥ २१॥
बिना भस्मस्तान किये षडक्षर [३ नमः
शिवाय'] मन्त्रका जप नहीं करना चाहिये।
विधिपूर्वक भस्मसे त्रिपुण्ड धारण करके ही इसका
जप करना चाहिये॥ २२॥
'दयाहीन, अधम, महापापोंसे युक्त, उपपापोंसे
युक्त, मूर्ख अथवा पतित व्यक्ति भी जिस देशमें नित्य
भस्म धारण करते रहते हैं, बह देश सदैव सम्पूर्ण
तीर्थो और यज्ञोंसे परिपूर्ण ही रहता है॥ २३-२४॥
त्रिपुण्ड्धारण करनेवाला पापी जीव भी समस्त
देवों और असुरोंके द्वारा पूज्य है । यदि पुण्यात्मा त्रिपुण्ड्से
युक्त है, तो उसके लिये कहना ही क्या ॥ २५॥
१७६
यस्मिन्देशे शिवज्ञानी भूतिशासनसंयुतः।
गतो यदूच्छयाद्यापि तस्मिंस्तीर्थाः समागताः ॥
बहुनात्र किमुक्तेन धार्यं भस्म सदा बुधैः।
लिङ्गार्चनं सदा कार्य जप्यो मन्त्रः षडक्षरः॥ २७
ब्रह्मणा विष्णुना वापि रुद्रेण मुनिभिः सुरैः।
भस्मधारणमाहात्म्यं न शक्यं परिभाषितुम्॥ २८
इति वर्णाश्रमाचारो लुप्तवर्णक्रियोऽपि च।
पापात्सकृत्त्रपुण्डूस्य धारणात्सोऽपि मुच्यते॥ २९
ये भस्मधारिणं त्यक्त्वा कर्म कुर्वन्ति मानवा: ।
तेषां नास्ति विनिर्मोक्षः संसाराज्न्मकोटिभिः॥ ३०
तेनाधीतं गुरोः सर्व तेन सर्वमनुष्ठितम्।
येन विप्रेण शिरसि त्रिपुण्डूं भस्मना कृतम्॥ ३१
ये भस्मधारिणं दृष्ट्वा नराः कुर्वन्ति ताडनम्।
तेषां चण्डालतो जन्म ब्रह्मन्नूह्यं विपश्चिता॥ ३२
मानस्तोकेन मन्त्रेण मन्त्रितं भस्म धारयेत्।
ब्राह्मण: क्षत्रियश्चैव प्रोक्तष्वङ्गेषु भक्तिमान्॥ ३३
वैश्यस्त्रयम्बकेनैव शूद्र: पञ्चाक्षरेण तु।
अन्यासां विधवास्त्रीणां विधिः प्रोक्तश्च शूद्रवत्॥ ३४
पञ्चब्रह्मादिमनुभिर्गृहस्थस्य विधीयते।
त्रियम्बकेन मनुना विधिवे ब्रह्मचारिणः ॥ ३५
अघोरेणाथ मनुना विपिनस्थविधिः स्मृतः।
यतिस्तु प्रणवेनैव त्रिपुण्डादीनि कारयेत्॥ ३६
श्रीशिवमहापुराण
[ अण २४
भस्म धारण करनेवाला शिवज्ञानी जिस पेम सिनो भूतिशासनसंयुतः। | भस्म धारण करनेवाला शिवज्ञानी जिस दे
स्वेच्छया चला जाता है, उस देशमें समस्त तीर्थ आ
जाते हैं ॥ २६॥
इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय]
विद्वानोंको सदैव भस्म धारण करना चाहिये एवं लिंगार्चन
करके षडक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २७॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, मुनिगण और देवताओंके
द्वारा भी भस्म-धारण करनेके महत्त्वका वर्णन किया
जाना सम्भव नहीं है॥ २८॥
जिसने अपने वर्ण तथा आश्रमधर्मसे सम्बन्धित
आचार तथा क्रियाएँ लुप्त कर दी हैं, यदि वह भी
त्रिपुण्ड धारण करता है, तो समस्त पापोंसे मुक्त हो
जाता है ॥ २९॥
जो भस्मधारण करनेवालेको त्यागकर धार्मिक
कृत्य करते हैं, उनको करोड़ों जन्म लेनेपर भी
संसारसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो पाती है॥ ३०॥
जिस ब्राह्मणने भस्मसे अपने सिरपर त्रिपुण्ड धारण
कर लिया है, उसने मानो गुरुसे सब कुछ पढ़ लिया है
और सभी धार्मिक अनुष्ठान कर लिये हैं ॥ ३१॥
जो मनुष्य भस्म धारण करनेवालेको देखकर
उसे कष्ट देते हैं, वे निश्चित ही चाण्डालसे उत्पन्न
हुए हैं-ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये॥ ३२॥
भक्तिपरायण ब्राह्मण और क्षत्रियको “मा नस्तोके
तनये०'-इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मको शास्त्रसम्मत
कहे गये अंगोंपर धारण करना चाहिये॥ ३३॥
वैश्य "त्र्यम्बकं यजामहे'--इस मन्त्रसे और
शूद्र "शिवाय नमः'-इस पंचाक्षरमन्त्रसे भस्मको
अभिमन्त्रितकर धारण करे; विधवा स्त्रियोंके लिये [ भस्मः
धारणको] विधि शूद्रोंक समान कही गयी है ॥ ३४॥
पाँच ब्रह्मादि मन््रों*से [अभिमन्त्रित भस्मके
दवारा] गृहस्थ त्रिपुण्ड धारण करे । ब्रह्मचारी 'त्र्यम्बक
'यजामहे-इस मन्त्रसे [ भस्मको अभिमन्त्रित करके]
और वानप्रस्थी ' अघोरेभ्योऽथ०' इस मन्त्रसे भस्मकी
अभिमन्त्रित करके त्रिपुण्ड धारण करे, किंतु यति
[संन्यासी] प्रणवके मन्त्रसे [भस्मको अभिमि
करके] त्रिपुण्ड धारण करे॥ ३५-३६॥
| अघोर, ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेवके मन्त्र ही पंचब्रह्मके ध्यान है ये मन्त्र पृ०-सं० ८० पर दिये गये हैं।
_ २४]
विद्येश्वरसंहिता
१७७
अतिवर्णाश्रमी नित्यं शिवोऽहं भावनात्परात्।
शिवयोगी च नियतमीशानेनापि धारयेत्॥ ३७
न त्याज्यं सर्ववर्णैश्च भस्मधारणमुत्तमम्।
अन्यैरपि यथा जीवैः सदेति शिवशासनम्॥ ३८
भस्मस्नानेन यावन्तः कणाः स्ताङ्गे प्रतिष्ठिताः ।
तावन्ति शिवलिङ्गानि तनौ धत्ते हि धारकः॥ ३९
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चापि च सङ्कराः।
स्त्रियोऽथ विधवा बाला: प्राप्ता पाखण्डिकास्तथा॥ ४०
ब्रह्मचारी गृही वन्यः संन्यासी वा ब्रती तथा।
नार्यो भस्मत्रिपुणड्राङ्का मुक्ता एव न संशयः॥ ४१
ज्ञानाज्ञानधृतो वापि वह्निदाहसमो यथा।
ज्ञानाज्ञानधृतं भस्म पावयेत्सकलं नरम्॥ ४२
नाशनीयाजलमन्नमल्पमपि वा भस्माक्षधृत्या विना
भुक्त्वा वाथ गृही वनीपतियतिर्वर्णी तथा सङ्करः ।
एनोभुङ् नरकं प्रयाति स तदा गायत्निजापेन तद्
वर्णाना तु यतेस्तु मुख्यप्रणवाजापेन मुक्ति्भवेत्॥ ४३
त्रिपुण्ड ये विनिन्दन्ति निन्दन्ति शिवमेव ते।
धारयन्ति च ये भक्त्या धारयन्ति तमेव ते॥ ४४
धिग्भस्मरहितं भालं धिग्ग्राममशिवालयम्।
धिगनीशार्चनं जन्म धिग्विद्यामशिवाश्रयाम्॥
जो वर्णाश्रम धर्मसे परे है, वह “शिबोऽहं'-
इस भावनासे नित्य त्रिपुण्ड धारण करे और जो
शिवयोगी है, वह “ईशानः सर्वविद्यानाम्इस
भावनाको करता हुआ त्रिपुण्ड धारण करे॥ ३७॥
सभी वर्णोके द्वारा भस्म-धारण करनेके इस
उत्तम कार्यको नहीं छोड़ना चाहिये; अन्य जीवोंको
भी सदा भस्म धारण करना चाहिये-एऐसा भगवान्
शिवका आदेश है॥ ३८॥
भस्म-स्नान करनेसे जितने कण शरीरमें प्रवेश
करते हैं, उतने ही शिबलिंगोंको वह धारक अपने
शरीरमें धारण करता है॥ ३९॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री
(सधवा), विधवा, बालक, पाखण्डी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ,
वानप्रस्थी, संन्यासी, व्रती और संन्यासिनी स्त्रियाँ
ये सभी भस्मके त्रिपुण्ड-धारणके प्रभावके द्वारा मुक्त
हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ४०-४१॥
जैसे ज्ञानवश या अज्ञानवश धारण की गयी
अग्नि सबको समान रूपसे जलाती है, बैसे ही ज्ञान
या अज्ञानवश धारण किया गया भस्म भी समानरूपसे
सभी मनुष्योंको पवित्र करता है ॥ ४२॥
भस्म तथा रुद्राक्ष-धारणके बिना जल अथवा
अन्नको अंशमात्र भी नहीं खाना चाहिये। गृहस्थ,
वानप्रस्थ, संन्यासी और वर्णसंकर जातिका व्यक्ति
यदि भस्म एवं रुद्राक्षको धारण किये बिना भोजन
करता है, तो वह मात्र पाप ही खाता है और नरककी
ओर प्रस्थान करता है। ऐसे समयमें उक्त वर्णधर्मोका
वह व्यक्ति गायत्री मन्त्रके जपसे तथा यति. (संन्यासी)
मुख्य प्रणवमन्त्रके जपसे प्रायश्चित्त करके मुक्ति प्राप्त
कर सकता है॥४३॥
जो त्रिपुण्डूकी निन्दा करते हैं, बे साक्षात् शिवकी
ही निन्दा करते हैं और जो त्रिपुण्डूको धारण करते हैं,
वे साक्षात् उन्हीं शिवको ही धारण करते हैं ॥ ४४॥
भस्मरहित भालको धिक्कार है, शिवालय
(शिवमन्दिर) -रहित ग्रामको धिक्कार है, शिवार्चनसे
रहित जन्मको धिक्कार है और शिवज्ञानरहित विद्याको
धिक्कार है॥ ४५॥
१७८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २६
ये निन्दन्ति महेश्वरं त्रिजगतामाधारभूतं हरं
ये निन्दन्ति त्रिपुण्डूधारणकरं दोषस्तु तहर्शने।
ते वै सङ्करसूकरासुरखरश्चक्रो ष्टुकीटोपमा
जाता एव भवन्ति पापपरमास्ते नारकाः केवलम्॥
ते दृष्ट्वा शशिभास्करो निशि दिने स्वणनेऽपि नो केवलं
पश्यन्तु श्रुतिरुद्रसूक्तजपतो मुच्येत तेनादृताः ।
तत्सम्भाषणतो भवेद्धि नरकं निस्तारवानास्थितं
ये भस्मादिविधारणं हि पुरुषं निन्दन्ति मन्दा हि ते॥ ४७
न तान्त्रिकस्त्वधिकृतो नोर्ध्वपुण्डूधरो मुने।
सन्तप्तचक्रचिह्णोऽत्र शिवयज्ञे बहिष्कृतः ॥ ४८
तत्रैते बहवो लोका बृहज्ञाबालचोदिताः।
ते विचार्याः प्रयत्नेन ततो भस्मरतो भवेत्॥ ४९
यच्चन्दनैश्चन्दनकेऽपि मिश्र
धार्यं हि भस्मैव त्रिपुण्ड्भस्मना।
विभूतिभालोपरि किञ्चनापि
धार्यं सदा नो यदि सन्ति बुद्धयः॥ ५०
्तरीभिस्त्रपुण्ड्मलकावधि धारणीयं
भस्म द्विजादिभिरथो विधवाभिरेवम्।
तद्त्सदाश्रमवतां विशदा विभूति-
धार्यापवर्गफलदा सकलाघहन्त्री॥ ५१
ञ्ञ Me. | |
जो लोग तीनों लोकोंके आधारस्वरूप महेश्वर
भगवान् शिवको निन्दा करते हैं और त्रिपुण्ड धारण
करनेवालेकी निन्दा करते हैं, उनको तो देखनेसे ही पाप
लगता है। वे वर्णसंकर, सुअर, असुर, खर ( गधा),
श्वान (कुत्ता), क्रोष्टु (सियार) तथा कीड़े-मकोड़ेके
समान ही उत्पन्न होते हैं और उन नरकगामी व्यक्तियोंका
[यह] जन्म मात्र पाप करनेके लिये ही होता है ॥ ४६॥
भगवान् शिवकी तथा त्रिपुण्ड धारण करनेवाले
उनके भक्तोंकी जो निन्दा करते हैं, उन्हें रातमें
देखनेपर चन्द्रमाके दर्शनसे और दिनमें देखनेपर सूर्यके
दर्शनसे शुद्धि प्राप्त होती है। [मात्र, इतना ही नहीं
स्वप्नमें भी उन्हें देखनेसे पाप लगता है, अत: ] स्वणमें
जो उन्हें देखे, उसको अपनी शुद्धिके लिये श्रुतिमें कहे
गाये रुद्रसूक्तका आदरपूर्वक पाठ करना चाहिये, तभी
उससे छुटकारा मिल सकता है। उनसे बात करनेसे नरक
होता है। उस नरकसे मुक्ति प्राप्त करना असम्भव है।
जो भस्मतत्रिपुण्ड आदि धारण करनेवाले पुरुषकी
निन्दा करते हैं, वे निश्चित ही मूर्ख हैं ॥ ४७॥
हे मुने ! तान्त्रिक, ऊर्ध्वत्रिपुण्ड़ धारण करनेवाले
तथा तपाये हुए चक्र आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले
इस शिवयज्ञके अधिकारी नहीं हैं, वे इस यज्ञसे
बहिष्कृत हैं ॥ ४८ ॥
बृहज्ाबालोपनिषद्में कहे गये वे लोग ही उस
यज्ञमें अधिकारी हैं। प्रयत्नपूर्वक उन्हें शिवयज्ञके
कार्यमें सम्मिलित करना चाहिये। उन्हें भस्म लगाना
चाहिये ॥ ४९॥
विभूतिका चन्दनसे या चन्दनमें विभूतिका मिश्रणकर
बनाये गये मिश्रित भस्मसे [मस्तकपर] त्रिपुण्ड धारण
करना चाहिये। कुछ भी हो मस्तकपर विभूति धारण
करना आवश्यक है | यदि बुद्धि नहीं है, तो भी यह
करना सदा लोगोंके लिये आवश्यक ही है ॥ ५०॥
ब्रह्मचारिणी, सधवा तथा विधवा स्त्रियों और
ब्राह्मणादि द्विजोंको केशपर्यन्त भस्म धारण करना चाहिये!
इसी प्रकार ब्रह्मचर्यादि आश्रमवालोंको भी स्वच्छ विभति
धारण करना उचित है; क्योंकि विभूति मोक्ष देनेवाली
और समस्त पापोंका नाश करनेवाली है॥५१॥
द २४]
त्रिपुण्ड कुरुते यस्तु भस्मना विधिपूर्वकम्
महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः ॥ ५२
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यति:।
ब्रह्मक्षत्राश्च विद्शूद्रास्तथान्ये पतिताधमाः॥ ५३
उदधूलनं त्रिपुण्ड च धृत्वा शुद्धा भवन्ति च।
भस्मनो विधिना सम्यक् पापराशिं विहाय च॥ ५४
भस्मधारी विशेषेण स्त्रीगोहत्यादिपातकैः।
वीरहत्याश्रहत्याभ्यां मुच्यते नात्र संशयः॥ ५५
परद्रव्यापहरणं परदाराभिमर्शनम्।
परनिन्दां परक्षेत्रहरणं परपीडनम्॥ ५६
सस्यारामादिहरणं गृहदाहादिकर्म च।
गोहिरण्यमहिष्यादितिलकम्बलवाससाम् ॥ ५७
अन्नधान्यजलादीनां नीचेभ्यश्च परिग्रहः।
दाशवेश्यामतङ्गीषु वृषलीषु नटीषु च॥ ५८
रजस्वलासु कन्यासु विधवासु च मैथुनम्।
मांसचर्मरसादीनां लवणस्य च विक्रयः॥ ५९
पैशुन्यं कूटवादश्च साक्षिमिथ्याभिलाषिणाम्।
एवमादीन्यसङ्ख्यानि पापानि विविधानि च।
सद्य एव विनश्यन्ति त्रिपुण्डूस्य च धारणात्॥ ६०
शिवद्रव्यापहरणं शिवनिन्दा च कुत्रचित्।
निन्दा च शिवभक्तानां प्रायश्चित्तेर्न शुध्यति॥ ६१
रुद्राक्षं यस्य गात्रेषु ललाटे तु त्रिपुण्डूकम्।
स चाण्डालोऽपि सम्पूज्यः :॥ ६२
यानि तीर्थानि लोकेऽस्मिन् गङ्गाद्याः सरितश्च याः।
स्नातो भवति सर्वत्र ललाटे यस्त्रिपुण्डूकम्॥ ६२
विद्येश्वरसंहिता
१७९
जो भस्मद्वारा विधिपूर्वक त्रिपुण्ड धारण करता
वह [ब्रह्महत्यादि] महापातकसमूहों और [उच्छिष्ट
अन्नादिभक्षण] उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५२॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी [ये
चारों आश्रम]; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य
वर्णसंकर [ये चारों वर्ण और उपवर्णके लोग];
पतित अथवा नीच मनुष्य भी विधिपूर्वक शरीरपर
भस्म-उद्धूलन और त्रिपुण्ड धारण करके शुद्ध हो
जाते हैं; [क्योंकि] सम्यकू रूपसे [ धारण की गयी]
भस्मसे [तत्काल ही] पापराशिसे मुक्ति प्राप्त हो
जाती हैं॥५३-५४॥
भस्म धारण करनेवाला व्यक्ति विशेष रूपसे
स्त्रीहत्या, गोहत्या, वीरहत्या और अश्वहत्या आदि
पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५५॥
दूसरेके द्रव्यका अपहरण, पायी स्त्रीका अभिमर्शन,
दूसरेकी निन्दा, पराये खेतका अपहरण, दूसरेको कष्ट
देना, फसल और बाग आदिका अपहरण, घर फूँकना
(जलाना) आदि कर्म, नीचोंसे गाय, सोना, भैंस,
तिल-कम्बल, वस्त्र, अन्न, धान्य तथा जल आदिका
परिग्रह, दाश (मछुवारा), वेश्या, मतंगी, (चाण्डाली),
शूद्रा, नटी, रजस्वला, कन्या और विधवा [स्त्रियों ]-
से मैथुन, मांस, चर्म, रस तथा नमकका विक्रय,
पैशुन्य (चुगली) और अस्पष्ट बात, असत्य गवाही
आदि देना-इस प्रकारसे अन्य असंख्य विभिन्न
प्रकारके पाप त्रिपुण्ड धारण करनेके प्रभावसे तत्काल
ही नष्ट हो जाते हैं॥ ५६-६०॥
भगवान् शिवके द्रव्यका अपहरण और जहाँ-
कहीं शिवकी निन्दा करनेवाला तथा शिवके भक्तोंकी
निन्दा करनेवाला व्यक्ति प्रायश्चित्त करनेपर भी शुद्ध
नहीं होता है॥ ६१॥
जिसने शरीरपर रुद्राक्ष और मस्तकपर त्रिपुण्डू
धारण किया है, ऐसा मनुष्य यदि चाण्डाल भी है, तो
भी वह सभी वर्णोमें श्रेष्ठतम और सम्पूज्य है ॥ ६२॥
जो मस्तकपर त्रिपुण्ड धारण करता है, वह इस
संसारमें जितने भी तीर्थ हैं और गंगा आदि जितनी
नदियाँ हैं, उन सबमें स्नान किये हुएके समान
[पुण्यफल प्राप्त करनेवाला] होता है॥६३॥
१८०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २४
सप्तकोटिमहामन्त्रा: पञ्चाक्षरपुरस्सराः।
तथान्ये कोटिशो मन्त्राः शेवकैवल्यहेतवः॥
अन्ये मन्त्राश्च देवानां सर्वसौख्यकरा मुने।
ते सर्वे तस्य वश्याः स्युर्यो बिभर्ति त्रिपुण्डूकम्॥ ६५
सहस्त्रं पूर्वजातानां सहस्त्रं जनयिष्यताम्।
स्ववंशजानां ज्ञातीनामुद्धरेदयस्त्रिपुण्ड्कृत्॥ ६६
इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्दीर्घायुर्व्याधिवर्जितः।
जीवितान्ते च मरणं सुखेनैव प्रपद्यते॥ ६७
अष्टेश्वर्यगुणोपेतं प्राप्य दिव्यवपुः शिवम्।
दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यत्रिदशसेवितम्॥ ६८
विद्याधराणां सर्वेषां गन्धर्वाणां महौजसाम्।
इच्धादिलोकपालानां लोकेषु च यथाक्रमम्॥ ६९
भुक्त्वा भोगान्सुविपुलान्प्रजेशानां पदेषु च।
ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्र कन्याशतं रमेत्॥ ७०
तत्र ब्रह्मायुषो मानं भुक्त्वा भोगाननेकशः।
विष्णोलोंके लभेद्भोगं यावद् ब्रह्मशतात्ययः ॥ ७१
शिवलोकं ततः प्राप्य लब्ध्वेष्टं काममक्षयम्।
शिवसायुज्यमाप्नोति संशयो नात्र जायते॥ ७२
सर्वोपनिषदां सारं समालोक्य मुहुर्मुहु: ।
इदमेव हि निर्णीतं परं श्रेयस्त्रिपुण्डकम्॥ ७३
विभूतिं निन्दते यो वै ब्राह्मण: सोऽन्यजातकः।
प्रयाति नरके घोरे यावद् ब्रह्मा चतुर्मुखः ॥ ७४
'पंचाक्षरमन्त्रसे लेकर सात करोड़ ससोटिमहामत्रः . पञाक्षरुसः। | पचाम लेकर सात करोड़ महामन दो
अन्य करोड़ों मन्त्र शिवकैवल्यको प्रदान करनेवाले
होते हैं॥ ६४॥
हे मुने! [विष्णु आदि] देवताओंके [लिये
प्रतिपादित] अन्य जो मन्त्र हैं, वे सभी सुखोंको
देनेवाले हैं, जो त्रिपुण्ड धारण करता है, उसके वशमें
वे सब मन्त्र स्वत: ही हो जाते हैं॥ ६५॥
त्रिपुण्ड धारण करनेवाला मनुष्य अपने वंश और
गोत्रमें उत्पन्न हजारों पूर्वजोंका और भविष्यमें उत्पन्न
होनेवाली हजारों सन्तानोंका उद्धार करता है॥ ६६॥
जो त्रिपुण्ड धारण करता है, उसे इस लोकें
रोगरहित दीर्घ आयु प्राप्त होती है और वह सम्पूर्ण
भोगोंका उपभोग करके जीवनके अन्तिम समयमें
सुखपूर्वक ही मृत्युको प्राप्त करता है। वह मृत्युके
पश्चात् अणिमा, महिमा आदि आठों ऐश्वर्या और
सद्गुणोंसे युक्त दिव्य शरीरवाले शिवको प्राप्त करता
है और दिव्यलोकके देवोंसे सेवित दिव्य विमानपर
चढ़कर शिवलोकको जाता है॥ ६७-६८॥
वहाँपर वह सभी विद्याधरं और महापराक्रमी गन्धवों,
इन्द्रादि लोकपालोंके लोकोंमें क्रमश: जाकर बहुत-से
भोगोंका उपभोग करता हुआ प्रजापतियोंके पदों तथा
ब्रह्माके पदपर आसीन होकर वहाँ [दिव्यलोककी]
सैकड़ों कन्याओंके साथ आनन्दित होता है ॥ ६९-७०॥
वह उस लोकमें ब्रह्माकी आयुके बराबर आयुको
प्राप्तकर अनेक सुखोंका भोग करके विष्णुलोकको
जाता है और ब्रह्माके सौ वर्षोतक सुखोंका भोग प्राप्त
करता है। तदनन्तर वह शिवलोकको जाकर इच्छानुकूल
अक्षय कामनाओंको प्राप्तकर शिवका सान्निध्य प्र
कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७१-७२॥
सभी उपनिषदोंके सारको बार-बार सम्य
रूपसे देखकर यही निर्णय लिया गया है कि त्रिपु
धारण करना ही परम श्रेष्ठ है॥ ७३॥
जो ब्राह्मण विभूतिकी निन्दा करता हैं, व
ब्राह्मण नहीं है, अपितु अन्य जातिका है और विभूति
निन्दाके कारण उसे चतुर्मुख ब्रह्माकी आयुसीमा
नरक भोगना पड़ता है ॥७४॥
जे २४]
श्राद्धे यज्ञे जपे होमे वैश्वदेवे सुरार्चने।
धृतत्रिपुण्डुः पूतात्मा मृत्युं जयति मानवः ॥ ७५
जलस्नानं मलत्यागे भस्मस्नानं सदा शुचि:।
मन्त्रस्नानं हरेत्पापं ज्ञानस्नाने परं पदम्॥ ७६
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति भस्मस्नानकरो नर:॥ ७७
भस्मस्नानं परं तीर्थ गङ्गास्नानं दिने दिने।
भस्मरूपी शिवः साक्षाद्भस्म त्रैलोक्यपावनम् ॥ ७८
न तत्स्नानं न तद्ध्यानं न तद्दानं जपो न सः।
त्रिपुणड्रेण विना येन विप्रेण यदनुष्ठितम्॥ ७९
वानप्रस्थस्य कन्यानां दीक्षाहीननृणां तथा।
मध्याह्वत्प्रागजलेयुक्तं परतो जलवर्जितम्॥ ८०
एवं त्रिपुण्ड यः कुर्यान्नित्यं नियतमानसः।
शिवभक्त: स विज्ञेयो भुक्तिं मुक्ति च विन्दति॥ ८१
यस्याङ्के नैव रुद्राक्ष एकोऽपि बहुपुण्यदः।
तस्य जन्म निरर्थं स्यात्रिपुण्ड्रहितों यदि॥ ८२
एवं त्रिपुण्ड्माहात्म्यं समासात् कथितं मया।
रहस्यं सर्वजन्तूनां गोपनीयमिदं त्वया॥८३
तिस्रो रेखा भवन्त्येव स्थानेषु मुनिपुङ्गवाः।
ललाटादिषु सर्वेषु यथोक्तेषु बुधैमुने ॥ ८४
विद्येश्वरसंहिता
१८१
श्राद्ध, यज्ञ, जप, होम, बलिवैश्वदेव और
देवपूजनके समय जो पूतात्मा मनुष्य त्रिपुण्ड धारण
करता है, वह मृत्युको भी जीत लेता है ॥७५॥
मलत्याग करनेपर [शुद्धिके लिये] जलस्नान किया
जाता है, भस्मस्नान करनेपर सदा पवित्रता आती है,
मन्त्रस्नान पापका हरण करता है और ज्ञानरूपी जलमें
अवगाहन करनेपर परमपदकी प्राप्ति होती है ॥ ७६॥
समस्त तीर्थोमें [स्नान करनेसे] जो पुण्य और
फल प्राप्त होता है, वह फल, भस्मस्तान करनेवालेको
प्राप्त हो जाता है॥ ७७॥
भस्मस्नान ही परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो प्रतिदिन
गंगा (तीर्थ)-स्तानके समान है। भस्म तो भस्मरूपी
साक्षात् शिव है, जो त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाला
है॥७८॥
बिना त्रिपुण्ड धारण किये हुए जो ब्राह्मण
स्नान, ध्यान, दान और जप आदि अनुष्ठान कर्म
करता हैं, वह न तो स्नान है, न ध्यान है, न दान है
और न जप आदि अन्य अनुष्ठित कर्म ही है॥ ७९॥
वानप्रस्थ, कन्या और दीक्षारहित मनुष्योंको
मध्याहृके पूर्व ही जलसे युक्त त्रिपुण्ड धारण करना
चाहिये, किंतु मध्याहनके पश्चात् जलरहित भस्मसे
त्रिपुण्ड धारण करना उचित है। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक
दृढ़ निश्चयवाला जो व्यक्ति नित्य त्रिपुण्ड धारण
करता है, उसे ही शिवभक्त जानना चाहिये। उसीको
भुक्ति तथा मुक्ति भी प्राप्त होती है॥ ८०-८१॥
जिसके अंगपर प्रचुर पुण्य देनेवाला एक भी
रुद्राक्ष नहीं है और वह त्रिपुण्ड्से भी रहित है, उसका
जन्म लेना व्यर्थ है॥ ८२॥
[इसके पश्चात् भस्मधारण तथा त्रिपुण्ड्की महिमा
एवं विधि बताकर सूतजीने फिर कहा-हे महर्षियो!]
इस प्रकार मैंने संक्षेपसे त्रिपुण्ड्का माहात्म्य बताया है।
यह समस्त प्राणियोंके लिये गोपनीय रहस्य है । अतः
आपको भी इसे गुप्त ही रखना चाहिये ॥ ८३॥
मुनिवरो! ललाट आदि. सभी निर्दिष्ट स्थानोंमें
जो भस्मसे तीन तिरछी रेखाएँ बनायी जाती हैं,
उन्हींको विद्वानोंने त्रिपुण्ड कहा है॥ ८४॥
१८२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २४
श्रुवोर्मध्यं समारभ्य यावदन्तो भवेद् भ्रुवोः ।
तावत्प्रमाणं सन्धार्य ललाटे च त्रिपुण्डूकम्॥
मध्यमानामिकाङ्गुल्या मध्ये तु प्रतिलोमतः।
अङ्गुष्ठेन कृता रेखा त्रिपुण्ड्ाख्याभिधीयते॥ ८६
मध्येऽङ्गलिभिरादाय तिसृभिर्भस्म यत्लतः।
त्रिपुण्डुं धारयेद्भक्त्या भुक्तिमुक्तिप्रदं परम्॥ ८७
त्रिसृणामपि रेखानां प्रत्येकं नवदेवताः।
सर्वत्राङ्गेषु ता वक्ष्ये सावधानतया श्रृणु॥ ८८
अकारो गार्हपत्याम्रिर्भुर्धर्मश्चव रजोगुणः।
ऋग्बेदश्च क्रियाशक्तिः प्रातःसवनमेव च॥ ८९
महादेवश्च रेखायाः प्रथमायाश्च देवता।
विज्ञेया मुनिशार्दूलाः शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९०
उकारो दक्षिणाग्निश्च नभस्तत्त्वं यजुस्तथा।
मध्यन्दिनं च सवनमिच्छाशक्त्यन्तरात्मकौ॥ ९९
महेश्वरश्च रेखाया द्वितीयायाश्च देवता।
विज्ञेया मुनिशार्दूल शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९२
मकाराहवनीयौ च परमात्मा तमो दिवौ।
ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयं सवनं तथा॥ ९३
शिवश्चैव च रेखायास्तृतीयायाश्च देवता।
विज्ञेया मुनिशार्दूल शिवदीक्षापरायणैः ॥ ९४
एवं नित्यं नमस्कृत्य सद्भक्त्या स्थानदेवताः ।
त्रिपुण्डं धारयेच्छुद्धो भुक्ति मुक्तिं च विन्दति॥ ९५
इत्युक्ताः स्थानदेवाश्च स्वाङ्गेषु मुनी श्वरा: ।
तेषां सम्बन्धिनो भक्त्या स्थानानि श्रृणु साम्प्रतम्॥ ९६
भौहोंके मध्य भागसे लेकर जहाँतक सोम्य समार्य यावदन्तो भवेद् बोः | भोहोके मध्य भागले लेकर जहाँतक भू
अन्त है, उतना बड़ा त्रिपुण्ड ललारमें धारण करना
चाहिये॥ ८५॥
मध्यमा और अनामिका अँगुलीसे दो रेखाएँ
करके बीचमें अंगुष्ठद्वारा प्रतिलोमभावसे की गयी
रेखा त्रिपुण्ड कहलाती है अथवा बीचकी तीन
अँगुलियोंसे भस्म लेकर यलपूर्वक भक्तिभावसे ललाएें
त्रिपुण्ड़ धारण करे । त्रिपुण्ड अत्यन्त उत्तम तथा भोग
और मोक्षको देनेवाला है ॥ ८६-८७॥
त्रिपुण्ड्की तीनों रेखाओंमेंसे प्रत्येकके नौ-नौ
देवता हैं, जो सभी अंगोंमें स्थित हैं, मैं उनका परिचय
देता हूँ, सावधान होकर सुनें॥ ८८ ॥
है मुनिवरो! प्रणवका प्रथम अक्षर अकार,
गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद,
क्रियाशक्ति, प्रातःसवन तथा महादेव--ये त्रिपुण्ड्की
प्रथम रेखाके नौ देवता हैं, यह बात शिवदीक्षापरायण
पुरुषोंको अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये ॥ ८९-९०॥
हे मुनिश्रेष्ठो! प्रणवका दूसरा अक्षर उकार,
दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्त्वगुण, यजुर्वेद, माध्यन्दिनसवन,
इच्छाशक्ति, अन्तरात्मा तथा महेश्वर--ये दूसरी रेखाके
नौ देवता हैं-एऐसा शिवदीक्षित लोगोंको जानता
चाहिये॥ ९१-९२॥
हे मुनिश्रेष्ठो! प्रणवका तीसरा अक्षर मकार,
आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति
सामवेद, तृतीय सवन तथा शिव--ये तीसरी रेखाके
नौ देवता हैं--ऐसा शिवदीक्षित भक्तांको जात
चाहिये॥ ९३-९४॥
इस प्रकार स्थानदेवताओंको उत्तम भक्तिभावसे
नित्य नमस्कार करके स्नान आदिसे शुद्ध हुआ पुरर
यदि त्रिपुण्ड धारण करे, तो भोग और मोक्षको भी
प्राप्त कर लेता है॥ ९५॥
हे मुनीश्वरो! ये सम्पूर्ण अंगोमें स्थानद
बताये गये हैं, अब उनसे सम्बन्धित स्थान बताता ई
भक्तिपूर्वक सुनिये॥ ९६॥
डक २४]
विद्येश्वरसंहिता
१८३
द्वात्रिंशत्स्थानके वार्धषोडशस्थानकेऽपि च।
अष्टस्थाने तथा चैव पञ्चस्थानेऽपि नान्यसेत्॥ ९७
उत्तमाङ्गे ललाटे च ।
नासावक्त्रगलेष्वेवं हस्तयोरुभयोस्ततः॥ ९८
कूर्परे मणिबन्धे च हदये पार्श्वयो हयोः ।
नाभौ मुष्कद्वये चैवमूरवोर्गुल्फे च जानुनि॥ ९९
जङ्घाद्वये पदद्वन्द्वे द्वत्रिंशत्स्थानमुत्तमम्।
अग्न्यब्भूवायुदिग्देशदिक्पालान् वसुभिः सह ॥ १००
धरा ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानिलोऽनलः।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्ट प्रकीर्तिताः॥ १०१
एतेषां नाममात्रेण त्रिपुण्डूं धारयेद् बुध: ।
कुर्याद्वा षोडशस्थाने त्रिपुण्ड तु समाहितः॥ १०२
शीर्षके च ललाटे च कण्ठे चांसद्वये भुजे।
कूर्परे मणिबन्धे च हदये नाभिपार्श्वके॥ १०३
पृष्ठे चैवं प्रतिष्ठाप्य यजेत्तत्राश्चिदैवते।
शिवं शक्तिं तथा रुद्रमीशं नारदमेव च॥ १०४
वामादिनवशक्तीश्च एता षोडश देवताः।
नासत्यौ दस्त्रकश्चैव अश्चिनौ द्वौ प्रकीर्तितौ॥ १०५
अथवा मूर्शि केशे च कर्णयोर्वदने तथा।
बाहुद्वये च हृदये नाभ्यामूरुयुगे तथा॥ १०६
जानुद्वये च पदयोः पृष्ठभागे च षोडश।
शिवश्चन्द्रश्न रुद्र: को विघ्नेशो विष्णुरेव वा ॥ १०७
श्रीश्चैव हृदये शम्भुस्तथा नाभौ प्रजापतिः।
नागश्च नागकन्याश्च उभयोर्ऋषिकन्यकाः॥ १०८
पादयोश्च समुद्राश्च तीर्थाः पृष्ठे विशालतः।
इत्येवं षोडशस्थानमष्टस्थानमथोच्यते॥ १०९
गुह्यस्थानं ललाटश्च कर्णद्वयमनुत्तमम्।
अंसयुग्मं च हृदयं नाभिरित्येवमष्टकम्॥ ११०
ब्रह्मा च ऋषयः सप्त देवताश्च प्रकीर्तिता: ।
इत्येवं तु समुद्दिष्टं भस्मविद्धिरमुंनीश्वराः ॥ १९९
बत्तीस, सोलह, आठ अथवा पाँच स्थानोंमें मनुष्य
्रिपुण्डूका न्यास करे | मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों
नेत्र, दोनों नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों हाथ, दोनों कोहनी,
दोनों कलाई, हृदय, दोनों पार्श्वभाग, नाभि, दोनों अण्डकोष,
दोनों ऊरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिण्डली और
दोनों पैर--ये बत्तीस उत्तम स्थान हैं; इनमें क्रमश: अग्नि,
जल, पृथ्वी, वायु, दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल तथा
आठ वसुओंका निवास है ॥ ९७-१००॥
धरा (धर), ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल,
प्रत्यूष और प्रभास-ये आठ वसु कहे गये हैं। इन
सबका नाममात्र लेकर इनके स्थानोंमें विद्वान् पुरुष
त्रिपुण्ड धारण करे। अथवा एकाग्रचित्त होकर सोलह
स्थानोंमें ही त्रिपुण्ड धारण करे॥ १०१-१०२॥
मस्तक, ललाट, कण्ठ, दोनों कन्धों, दोनों भुजाओं,
दोनों कोहनियों तथा दोनों कलाइयोंमें, हृदयमें, नाभिमें,
दोनों पसलियोंमें तथा पृष्ठभागमें त्रिपुण्ड लगाकर वहाँ
दोनों अश््विनीकुमारों, शिव, शक्ति, रुद्र, ईश तथा नारदका
और वामा आदि नौ शक्तियोंका पूजन करे। ये सब
मिलकर सोलह देवता हैं। अश्विनीकुमार युगल कहे
गये हैं-नासत्य और दस्र॥ १०३-१०५॥
अथवा मस्तक, केश, दोनों कान, मुख, दोनों
भुजा, हृदय, नाभि, दोनों ऊरु, दोनों जानु, दोनों पैर
और पृष्ठभाग-इन सोलह स्थानोंमें सोलह त्रिपुण्ड़का
न्यास करे। मस्तकमें शिव, केशोंमें चन्द्रमा, दोनों
कानोंमें रुद्र और ब्रह्मा, मुखमें विघ्नराज गणेश, दोनों
भुजाओंमें विष्णु और लक्ष्मी, हृदयमें शम्भु, नाभिमें
प्रजापति, दोनों ऊरुओंमें नाग और नागकन्या, दोनों
घुटनोंमें ऋषिकन्याएँ, दोनों पैरोंमें समुद्र तथा विशाल
पृष्ठभागमें सम्पूर्ण तीर्थ देवतारूपसे विराजमान हैं।
इस प्रकार सोलह स्थानोंका परिचय दिया गया। अब
आठ स्थान बताये जा रहे हैं॥ १०६-१०९॥
गुह्य स्थान, ललाट, परम उत्तम कर्णयुगल, दोनों
कन्थे, हदय और नाभि-ये आठ स्थान हैं। इनमें
ब्रह्मा तथा सप्तर्षि-ये आठ देवता बताये गये हैं। हे
मुनीश्वरो! भस्मके स्थानको जाननेवाले विद्वानोंने इस
तरह आठ स्थानोंका परिचय दिया है। अथवा
१८४
अथवा मस्तकं बाहू हृदयं नाभिरेव च।
पञ्चस्थानान्यमून्याहुर्धारणे भस्मविज्ञनाः॥ ११२
यथासम्भवनं कुर्याद्ेशकालाद्यपेक्षया।
उद्धूलनेउप्यशक्तश्नेत्रिपुण्ड्रादीनि कारयेत्॥ ११३
त्रिनेत्रं त्रिगुणाधारं त्रिदेवजनकं शिवम्।
स्मरन्नमः शिवायेति ललाटे तु त्रिपुण्ड्कम्॥ ११४
ईशाभ्यां नम इत्युक्तवा पार्श्वयोश्च त्रिपुण्डूकम्।
बीजाभ्यां नम इत्युक्त्वा धारयेत्तु प्रकोष्ठयोः॥ ११५
कुर्यादधः पितृभ्यां च उमेशाभ्यां तथोपरि।
भीमायेति ततः पृष्ठे शिरसः पश्चिमे तथा॥ ११६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २५
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मस्तक, दोनों भुजाएँ, हृदय और नाभि-इन पाँच
स्थानोंको भस्मवेत्ता पुरुषोंने भस्म धारणके योग्य
बताया है। यथासम्भव देश, काल आदिक
अपेक्षा रखते हुए उद्धूलन (भस्म)-को अभिमन्त्रित
करना और जलमें मिलाना आदि कार्य करे। यदि
उद्धूलनमें भी असमर्थ हो, तो त्रिपुण्ड आदि
लगाये ॥ ११०-११३॥
त्रिनेत्रधारी, तीनों गुणोंके आधार तथा तीनो
देवताओंके जनक भगवान् शिवका स्मरण करते हुए
“नमः शिवाय’ कहकर ललाटमें त्रिपुण्ड लगाये।
“ईशाभ्यां नमः '--ऐसा कहकर दोनों पार्श्वभागोंमें
त्रिपुण्ड धारण करे। “बीजाभ्यां नम: '--यह बोलकर
दोनों प्रकोष्ठोंमें भस्म लगाये। “पितृभ्यां नम:'
कहकर नीचेके अंगमें, “उमेशाभ्यां नमः ' कहकर
ऊपरके अंगमें तथा ' भीमाय नमः' कहकर पीठमें
और सिरके पिछले भागमें त्रिपुण्ड लगाना
चाहिये ॥ ११४-११६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां भस्मधारणवर्णनं नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४॥
॥ इस प्रकार शिवमहापुराणके प्रथम विद्योशवरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें
भस्मधारणवर्णन नामक चोबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
रुद्राक्षधारणकी महिमा तथा उसके विविध भेदोंका वर्णन
सूत उवाच
शौनकर्षे महाप्राज्ञ शिवरूप महामते।
शृणु रु्राक्षमाहात्म्यं समासात् कथयाम्यहम्॥ १
शिवप्रियतमो ज्ञेयो रुद्राक्षः परपावनः।
दर्शनात् स्पर्शनाजाप्यात् सर्वपापहरः स्मृतः॥ २
पुरा रुद्राक्षमहिमा देव्यग्रे कथितो मुने।
लोकोपकरणार्थाय शिवेन परमात्मना॥ ३
शिव उवाच
श्रूयतां तु महेशानि रुद्राक्षमहिमा शिवे।
कथयामि तव प्रीत्या भक्तानां हितकाम्यया॥ ४
सूतजी बोले--हे महाप्राज्ञ! हे महामते ! शिवरूप
हे शौनक ऋषे! अब मैं संक्षेपसे रुद्राक्षका माहात्य
बता रहा हूँ, सुनिये॥ १॥
द्राक्ष शिवको बहुत ही प्रिय है। इसे परम
पावन समझना चाहिये। रुद्राक्षके दर्शने, स्पर्शसे
तथा उसपर जप करनेसे वह समस्त पापोंका अपहर
करनेवाला माना गया है॥ २॥
हे मुने! पूर्वकालमें परमात्मा शिवने सर्म
लोकोंका उपकार करनेके लिये देवी पार्वतीके साम
रुदराक्षकी महिमाका वर्णन किया था॥ ३॥ र
शिवजी बोले--हे महेश्वरि! हे शिवे!
आपके प्रेमवश भक्तोंके हितकी कामनासे रुर
महिमाका वर्णन करता हूँ, सुनिये॥ ४॥
जे २५]
दिव्यवर्षसहस्त्राणि महेशानि पुनः पुरा।
तपः प्रकुर्वतस्त्रस्तं मनः संयम्य वै मम॥ ५
स्वतन्त्रेण परेशेन लोकोपकृतिकारिणा।
लीलया परमेशानि चक्षुरुन्मीलितं मया॥ ६
पुटाभ्यां चारुचक्षुर्भ्यां पतिता जलबिन्दवः।
तत्राश्रुबिन्दुतो जाता वृक्षा रुद्राक्षसंज्ञकाः॥ ७
स्थावरत्वमनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात्।
ते दत्ता विष्णुभक्तेभ्यश्चतुर्वर्णेभ्य एव च॥ ८
भूमौ गौडोद्भवांश्रक्रे रुद्राक्षाञ्छिववल्लभान्।
मथुरायामयोध्यायां लङ्कायां मलये तथा॥ ९
सह्याद्रौ च तथा काश्यां देशेष्वन्येषु वा तथा।
परानसह्यपापौघभेदनाञ्छुतिनोदनान् ॥ १०
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा जाता ममाज्ञया।
रुद्रक्षास्ते पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥ ११
श्वेतरक्ताः पीतकृष्णा वणां ज्ञेयाः क्रमाद् बुधैः ।
स्वजातीयं नृभिर्धार्य रुद्राक्षं वर्णतः क्रमात्॥ १२
वणैस्तु तत्फलं धार्य भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः।
शिवभ्रक्तैर्विशेषेण शिवयोः प्रीतये सदा॥ १३
धात्रीफलप्रमाणं यच्छेष्ठमेतदुदाहृतम्।
बदरीफलमात्रं तु मध्यमं सम्प्रकीर्तितम्॥ १४
अधमं चणमात्रं स्यात्. प्रक्रियेषा परोच्यते।
शृणु पार्वति सुप्रीत्या भक्तानां हितकाम्यया॥ १५
विद्येश्वरसंहिता
१८५
हे महेशानि! पूर्वकालकी बात है, मैं मनको
संयममें रखकर हजारों दिव्य वर्षोतक घोर तपस्यामें
लगा रहा॥५॥
हे परमेश्वरि! मैं सम्पूर्ण लोकोंका उपकार
करनेवाला स्वतन्त्र परमेश्वर हूँ। [एक दिन सहसा
मेरा मन क्षुब्ध हो उठा।] अतः उस समय मैंने
लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले ॥ ६॥
नेत्र खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटोंसे कुछ
जलकी बूँदें गिरीं। आँसूकी उन बूँदोंसे वहाँ रुद्राक्ष
नामक वृक्ष पैदा हो गये ॥ ७॥
भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये बे अश्रुबिन्दु
स्थावरभावको प्राप्त हो गये । वे रुद्राक्ष मैंने विष्णुभक्तोंको
तथा चारों वर्णोके लोगोंको बाँट दिये॥ ८॥
भूतलपर अपने प्रिय रुद्राक्षोंको मैंने गौड़ देशमें
उत्पन्न किया। मथुरा, अयोध्या, लंका, मलयाचल,
सह्यगिरिं, काशी तथा अन्य देशोंमें भी उनके अंकुर
उगाये। वे उत्तम रुद्राक्ष असह्य पापसमूहोंका भेदन
करनेवाले तथा श्रृतियोंके भी प्रेरक हैं॥ ९-१०॥
मेरी आज्ञासे वे रुद्राक्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
तथा शूद्र जातिके भेदसे इस भूतलपर प्रकट हुए।
रुदराक्षोंकी ही जातिके शुभाक्ष भी हैं॥ ११॥
उन ब्राह्मणादि जातिवाले रुद्राक्षोंके वर्ण श्वेत,
रक्त, पीत तथा कृष्ण जानने चाहिये। मनुष्योंको
चाहिये कि वे क्रमशः वर्णके अनुसार अपनी जातिका
ही रुद्राक्ष धारण करें॥ १२॥
भोग और मोक्षकी इच्छा रखनेवाले चारों
वर्णोके लोगों और विशेषतः शिवभक्तोंको शिव-
पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये रुद्राक्षके फलोंको अवश्य
धारण करना चाहिये॥ १३॥
आँवलेके फलके बराबर जो रुद्राक्ष हो, वह श्रेष्ठ
बताया गया है । जो बेरके फलके बराबर हो, उसे मध्यम
श्रेणीका कहा गया है। जो चनेके बराबर हो, उसकी
गणना निम्न कोटिमें की गयी है। हे पार्वति! अब इसकी
उत्तमताको परखनेकी यह दूसरी प्रक्रिया भक्तोंकी
हितकामनासे बतायी जाती है। अतः आप भलीभाँति
प्रेमपूर्वक इस विषयको सुनिये ॥ १४-१५॥
१८६
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २५
बदरीफलमात्रं च यत् स्यात् किल महेश्वरि।
तथापि फलदं लोके सुखसौ भाग्यवर्धनम्॥ १
धात्रीफलसमं यत् स्यात् सर्वारिष्टविनाशनम्।
गुञ्जया सदृशं यत् स्यात् सर्वार्थफलसाधनम्॥ १७
यथा यथा लघुः स्याद्वै तथाधिकफलप्रदः।
एकैकतः फलं प्रोक्तं दशांशैरधिकं बुधैः॥ १८
रुद्राक्षधारणं प्रोक्तं पापनाशनहेतवे।
तस्माच्च धारणीयो वै सर्वार्थसाधनो भ्रुवम्॥ १९
यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्षः फलदः शुभः।
न तथा दृश्यतेऽन्या च मालिका परमेश्वरि॥ २०
समाः स्निग्धा दृढाः स्थूलाः कण्टकैः संयुताः शुभा: ।
रु्राक्षाः कामदा देवि भुक्तिमुक्तिप्रद: सदा॥ २१
कृमिदुष्टं छिन्नभिन्नं कण्टकैहीनमेव च।
व्रणयुक्तमवृत्तं च रुद्राक्षान् षड् विवर्जयेत्॥ २२
स्वयमेव कृतद्वारं रुद्राक्ष स्यादिहोत्तमम्।
यत्तु पौरुषयलेन कृतं तन्मध्यमं भवेत्॥ २३
रुद्राक्षधारणं प्रोक्तं महापातकनाशनम्।
रूद्रसङ्ख्याशतं धृत्वा रुद्ररूपो भवेन्नरः॥ २४
एकादशशतानीह धृत्वा यत्फलमाप्यते।
तत्फलं शक्यते नैव वक्तुं वर्षशतैरपि॥ २५
हे महेश्वरि! जो रुद्राक्ष बेरके फलके आ जो. बरके-फलदे
होता है, वह उतना छोटा होनेपर भी लोकमें उत्तम
फल देनेवाला तथा सुख-सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला
होता है॥ १६॥
जो रुद्राक्ष ऑवलेके फलके बराबर होता है, वह
समस्त अरिष्टोंका विनाश करनेवाला होता है तथा जो
गुंजाफलके समान बहुत छोटा होता है, वह
मनोरथों और फलोंकी सिद्धि करनेवाला होता है ॥ १७॥
रुद्राक्ष जैसे-जैसे छोटा होता है, वैसे-वैसे अधिक
फल देनेवाला होता है। एक छोटे रुद्राक्षको विद्वान
एक बड़े रद्राक्षसे दस गुना अधिक फल देनेवाला
बताया है॥ १८॥
पापोंका नाश करनेके लिये सद्राक्षधारण आवश्यक
बताया गया है। वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट
मनोर॒थोंका साधक है, अतः उसे अवश्य ही धारण
करना चाहिये॥ १९॥
हे परमेश्वरि! लोकमें मंगलमय रुद्राक्ष जैसा
फल देनेवाला देखा जाता हैं, वैसी फलदायिनी दूसरी
कोई माला नहीं दिखायी देती ॥ २०॥
हे देवि! समान आकार-प्रकारवाले, चिकने,
सुदृढ़, स्थूल, कण्टकयुक्त (उभरे हुए छोटे-छोटे
दानोंवाले) और सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थोके
दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं॥ २१॥
जिसे कोड़ोंने दूषित कर दिया हो, जो खण्डित
हो, फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो
व्रणयुक्त हो तथा जो पूरा-पूरा गोल न हो, इन छ
प्रकारके रुद्राक्षोंको त्याग देना चाहिये॥ २२॥
जिस रुद्राक्षमें अपने आप ही डोरा पिरोनेके
योग्य छिद्र हो गया हो, वही यहाँ उत्तम माना गर्मी
हैं । जिसमें मनुष्यके प्रयसे छेद किया गया हो, र्द
मध्यम श्रेणीका होता है॥ २३॥
रुद्राक्षधारण बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला
बताया गया है | ग्यारह सौ रुद्राक्षोंको धारण
मनुष्य रुद्रस्वरूप ही हो जाता है॥ २४॥
इस जगत्में ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करे
मनुष्य जिस फलको पाता है, उसका वर्णन सेक
वर्षोमें भी नहीं किया जा सकता॥ २५॥
व २५]
शतार्धेन युतैः पञ्चशतेवै मुकुटं मतम्।
रुद्रक्षेविरचेत्सम्यग्भक्तिमान्पुरुषो वर: ॥ २६
त्रिभिः शतैः षष्लियुक्तेस्त्रिरावृत्त्या तथा पुन: ।
सद्राक्षैरूपवीतं च :॥ २७
शिखायां च त्रयं प्रोक्तं रुद्राक्षाणां महेश्वरि।
कर्णयोः षट् च षट् चैव वामदक्षिणयोस्तथा ॥ २८
शतमेकोत्तरं कण्ठे बाह्योवै रुद्र्सङ्ख्यया।
कूर्परद्वारयोस्तत्र मणिबन्धे तथा पुनः॥ २९
उपवीते त्रयं धार्य शिवभक्तिरतेर्नरैः।
शेषानुर्वरितान्पञ्च सम्मितान्धारयेत्कटौ॥ ३०
एतत्सङ्ख्या धृता येन रुद्राक्षा: परमेश्वरि।
तद्रूपं तु प्रणम्यं हि स्तुत्यं सवैरमहेशवत्॥ ३१
एवंभूतं स्थितं ध्याने यदा कृत्वासने जनम्।
शिवेति व्याहरंश्चैव दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते॥ ३२
शताधिकसहस्त्रस्य विधिरेष प्रकीर्तितः।
तदभावे प्रकारोऽन्यः शुभः सम्प्रोच्यते मया॥ ३३
शिखायामेकरुद्राक्षं शिरसा त्रिंशतं वहेत्।
पञ्चाशच्च गले दध्याद् बाह्वोः षोडश षोडश॥ ३४
मणिबन्धे द्वादश द्विस्कन्थे पञ्चशतं वहेत्।
अष्टोत्तरशतैर्माल्यमुपवीतं प्रकल्पयेत्॥ ३५
एवं सहस्त्ररुद्राक्षान्थारयेद्यो दृढव्रतः।
तं नमन्ति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ३६
एकं शिखायां रुद्राक्षं चत्वारिशत्तु मस्तके।
द्वात्रिंशत्कण्ठदेशे तु वक्षस्यष्टोत्तरं शतम्॥ ३७
एकैकं कर्णयोः षट् षट् बाह्वोः षोडश षोडश।
करयो रविमानेन द्विगुणेन मुनीश्वर॥ ३८
विद्येश्वरसंहिता
१८७
भक्तिमान् पुरुष भलीभाँति साढे पाँच सौ रुद्राक्षके
दानोंका सुन्दर मुकुट बनाये। तीन सौ साठ दानोंको
लम्बे सूत्रमें पिरोकर एक हार बना ले । वैसे-वैसे तीन
हार बनाकर भक्तिपरायण पुरुष उनका यज्ञोपवीत
तैयार करे॥ २६-२७॥
हे महेश्वरि! शिवभक्त मनुष्योंको शिखामें तीन,
दाहिने और बाँयें दोनों कानोंमें क्रमश: छ:-छ:,
कण्ठमें एक सौ एक, भुजाओंमें ग्यारह-ग्यारह, दोनों
कुहनियों और दोनों मणिबन्धोंमें पुनः ग्यारह-ग्यारह,
यज्ञोपवीतमें तीन तथा कटिप्रदेशमें गुप्त रूपसे पाँच
रुद्राक्ष धारण करना चाहिये। हे परमेश्वरि! [उपर्युक्त
कहो गयी] इस संख्याके अनुसार जो व्यक्ति रुद्राक्ष
धारण करता है, उसका स्वरूप भगवान् शंकरके
समान सभी लोगोंके लिये प्रणम्य और स्तुत्य हो जाता
है॥ २८--३१॥
इस प्रकार रुद्राक्षसे युक्त होकर मनुष्य जब
आसन लगाकर ध्यानपूर्वक शिवका नाम जपने लगता
है, तो उसको देखकर पाप स्वत: छोड़कर भाग जाते
हैं॥ ३२॥
इस तरह मैंने एक हजार एक सौ रद्राक्षोंको
धारण करनेकी विधि कह दी है। इतने रुद्राक्षोंक न
प्राप्त होनेपर मैं दूसरे प्रकारकी कल्याणकारी विधि
कह रहा हूँ॥ ३३॥
शिखामें एक, सिरपर तीस, गलेमें पचास और
दोनों भुजाओंमें सोलह-सोलह रुद्राक्ष धारण करना
चाहिये॥ ३४॥
दोनों मणिबन्धोंपर बारह, दोनों स्कन्धोंमें पाँच
सौ और एक सौ आठ रुद्राक्षोंकी माला बनाकर
यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करना चाहिये॥ ३५॥
इस प्रकार दृढ़ निश्चय करनेवाला जो मनुष्य
एक हजार रुद्राक्षोंको धारण करता है, वह रुद्र-
स्वरूप है; समस्त देवगण जैसे शिवको नमस्कार
करते हैं, वैसे ही उसको भी नमन करते हैं॥ ३६॥
शिखामें एक, मस्तकपर चालीस, कण्ठप्रदेशमें
बत्तीस, वक्षःस्थलपर एक सौ आठ, प्रत्येक कानमें
एक-एक, भुजबन्धोंमें छ:-छ: या सोलह-सोलह,
दोनों हाथोंमें उनका दुगुना अथवा हे मुनीश्वर!
१८८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २५
सङ्ख्या प्रीतिधृता येन सोऽपि शैवजनः पर: ।
शिववत्पूजनीयो हि वन्द्यः सर्वेरभीक्ष्णशः॥
शिरसीशानमन्त्रेण कर्णे तत्पुरुषेण च।
अघोरेण गले धार्य तेनेव हृदयेऽपि च॥ ४०
अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत्सुधीः ।
पञ्जदशाक्षग्रथितां वामदेवेन चोदरे॥ ४१
पञ्चब्रह्मभिरङ्गैश्च त्रिमालां पञ्च सप्त च।
अथ वा मूलमन्त्रेण सर्वानिक्षांस्तु धारयेत्॥ ४२
मद्यं मांसं तु लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च।
श्लेष्मान्तकं विड्वराहं भक्षणे वर्जयेत्ततः ॥ ४३
वलक्षं रुद्राक्षं द्विजतनुभिरेवेह विहितं
सुरक्तं क्षत्राणां प्रमुदितमुमे पीतमसकृत्।
ततो वेश्यैधार्य प्रतिदिवसमावश्यकमहो
तथा कृष्णं शूद्रैः श्रुतिगदितमार्गोऽयमगजे॥ ४४
वर्णी वनी गृहयतिर्नियमेन दध्या-
देतद्रहस्यपरमो न हि जातु तिष्ठेत्।
रुद्राक्षधारणमिदं सुकृतैश्च लभ्यं
प्रयान्ति ॥ ४५
आदावामलकास्ततो लघुतरा
रुग्णास्ततः कण्टके;
सन्दष्टाः कृमिभिस्तनूपकरण-
च्छिद्रेण हीनास्तथा।
धार्या नैव शुभेप्सुभिश्चणकवद्
रद्राक्षमप्यन्ततो
रुद्राक्षो मम लिङ्गमङ्गलमुमे
सूक्ष्मं प्रशस्तं सदा ॥ ४६
सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां शिवाज्ञया।
धार्याः सदैव रुद्राक्षा यतीनां प्रणवेन हि॥ ४७
अअ ताअ
प्रतिपूर्वक जितनी इच्छा हो, उतने रुदराक्षोंको धारण
करना चाहिये। ऐसा जो करता है, वह शिवभक्त सभी
लोगोंके लिये शिवके समान पूजनीय, वन्दनीय और
बार-बार दर्शने योग्य हो जाता है ॥ ३७--३९||
सिरपर ईशानमन्त्रसे, कानमें तत्पुरुषमन्त्रसे तथा
गले और हृदयमें अघोरमन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करना
चाहिये ॥ ४० ॥
विद्वान् पुरुष दोनों हाथोंमें अघोर बीजमन्त्रसे
रुद्राक्ष धारण करे और उदरपर वामदेवमन्त्रसे पन्द्रह
रुद्राक्षोंद्रार गूँथी हुई माला धारण करे॥ ४१॥
सद्योजात आदि पाँच ब्रह्ममन्त्रों तथा अंगमन्त्रोंके
द्वारा रुद्राक्षकी तीन, पाँच या सात मालाएँ धारण करे
अथवा मूलमन्त्र [नमः शिवाय]-से ही समस्त
रुद्राक्षोंको धारण करे ॥ ४२॥
रुदराक्षधारी पुरुष अपने खान-पानमें मदिरा,
मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा, विड्वराह
आदिको त्याग दे॥ ४३॥
हे गिरिराजनन्दिनी उमे! श्वेत रुद्राक्ष केवल
ब्राह्मणोंको ही धारण करना चाहिये। गहरे लाल
रंगका रुद्राक्ष क्षत्रियोंक लिये हितकर बताया गया हैं।
वैश्योंके लिये प्रतिदिन बार-बार पीले रुद्राक्षको धारण
करना आवश्यक है और शूद्रोंको काले रंगका रुद्राक्ष
धारण करना चाहिये-यह वेदोक्त मार्ग है ॥ ४४॥
ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और संन्यासी-
सबको नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है।
इसे धारण किये बिना न रहे, यह परम रहस्य है। इसे
धारण करनेका सौभाग्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।
इसको त्यागनेवाला व्यक्ति नरकको जाता है ॥ ४५॥
हे उमे! पहले आँवलेके बराबर और फिर उससे
भी छोटे रुद्राक्ष धारण करे । जो रोगयुक्त हों, जिनमें दाने
न हों, जिन्हें कीड़ोंने खा लिया हो, जिनमें पिरोनेयोग्य
छेद न हो, ऐसे रुद्राक्ष मंगलाकांक्षी पुरुषोंको नहीं धारण
करना चाहिये। रुद्राक्ष मेरा मंगलमय लिंगविग्रह हैं।
वह अन्तत: चनेके बराबर लघुतर होता है । सूक्ष्म स््रक्षको
ही सदा प्रशस्त माना गया है ॥ ४६॥
सभी आश्रमों, समस्त वर्णो, स्त्रियों और की
भी भगवान् शिवको आज्ञाके अनुसार सदैव र्र
धारण करना चाहिये। यतियोके लिये प्रणवे
उच्चारणपूर्वक रुद्राक्ष धारण करनेका विधान हैं ४४
कु २५]
दिवा बिभ्रद्रात्रिकृते रात्रो बिभ्रद्दिवाकृते:।
प्रातर्मध्याह्मसायाह्ले मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४८
ये त्रिपुण्डूधरा लोके जटाधारिण एव ये।
ये रुद्राक्षधरास्ते वै यमलोकं प्रयान्ति न॥ ४९
रुद्राक्षमेकं शिरसा बिभर्ति
तथा त्रिपुण्डुं च ललाटमध्ये।
पञ्चाक्षरं ये हि जपन्ति मन्त्र
पूज्या भवद्भिः खलु ते हि साधवः॥ ५०
यस्याङ्के नास्ति रुद्राक्षस्त्रपुण्डुं भालपट्टके ।
मुखे पञ्चाक्षरं नास्ति तमानय यमालयम्॥ ५१
जञात्वा ज्ञात्वा तत्प्रभावं भस्मरुद्राक्षधारिणः।
ते पूज्याः सर्वदास्माकं नो नेतव्याः कदाचन॥ ५२
एवमाज्ञापयामास कालोऽपि निजकिङ्करान्।
तथेति मत्वा ते सर्वे तृष्णीमासन्सुविस्मिताः॥ ५३
अत एव महादेवि रुद्राक्षोऽप्यघनाशनः।
तद्धरो मत्प्रियः शुद्धोऽत्यघवानपि पार्वति॥ ५४
हस्ते बाहौ तथा मूर्ध्नि रुद्राक्षं धारयेत्तु य: ।
अवध्यः सर्वभूतानां रुद्ररूपी चरेद्धवि॥ ५५
सुरासुराणां सर्वेषां बन्दनीयः सदा स वै।
पूजनीयो हि दृष्टस्य पापहा च यथा शिवः॥ ५६
ध्यानज्ञानावमुक्तोऽपि रुद्राक्षं धारयेत्तु यः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥ ५७
रुद्राक्षेण जपन्मन्त्रं पुण्यं कोटिगुणं भवेत्।
दशकोटिगुणं पुण्यं धारणाल्लभते नरः॥ ५८
विद्येश्वरसंहिता
१८९
मनुष्य दिनमें [रुद्राक्ष धारण करनेसे] रात्रिमें
किये गये पापोंसे और रात्रिमें [रुद्राक्ष धारण करनेसे]
दिनमें किये गये पापोंसे; प्रातः, मध्याहन और सायंकाल
[रुद्राक्ष धारण करनेसे] किये गये समस्त पापोंसे मुक्त
हो जाता है ॥ ४८॥
संसारमें जितने भी त्रिपुण्ड धारण करनेवाले हैं,
जटाधारी हैं और रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं, वे
यमलोकको नहीं जाते हैं ॥ ४९॥
जिनके ललाटमें त्रिपुण्ड लगा हो और सभी
अंग रुद्राक्षसे विभूषित हों तथा जो पंचाक्षरमन्त्रका
जप कर रहे हों, वे आप-सदृश पुरुषोंके पूज्य हैं; वे
वस्तुतः साधु हैं ॥ ५०॥
[यम अपने गणोंको आदेश करते हैं कि] जिसके
शरीरपर रुद्राक्ष नहीं है, मस्तकपर त्रिपुण्ड नहीं है और
मुखमें ' ॐ नमः शिवाय' यह पंचाक्षर मन्त्र नहीं है,
उसको यमलोक लाया जाय। [भस्म एवं रुद्राक्षके]
उस प्रभावको जानकर या न जानकर जो भस्म और
रुद्राक्षको धारण करनेवाले हैं, वे सर्वदा हमारे लिये
पूज्य हैं; उन्हें यमलोक नहीं लाना चाहिये ॥ ५१-५२॥
कालने भी इस प्रकारसे अपने गणोंको आदेश
दिया, तब “वैसा ही होगा'-ऐसा कहकर
आश्चर्यचकित सभी गण चुप हो गये॥५३॥
इसलिये हे महादेवि! रुद्राक्ष भी पापोंका नाशक
है। हे पार्वति! उसको धारण करनेवाला मनुष्य पापी
होनेपर भी मेरे लिये प्रिय है और शुद्ध है॥ ५४॥
हाथमे, भुजाओंमें और सिरपर जो रुद्राक्ष धारण
करता है, वह समस्त प्राणियासे अवध्य है और
पृथ्वीपर रुद्ररूप होकर विचरण करता है॥ ५५॥
सभी देवों और असुरोंके लिये वह सदैव वन्दनीय
एवं पूजनीय है। वह दर्शन करनेवाले प्राणीके पापोंका
शिवके समान ही नाश करनेवाला है ॥ ५६॥
ध्यान और ज्ञानसे रहित होनेपर भी जो रुद्राक्ष
धारण करता हैं, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर
परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ५७॥
मणि आदिकी अपेक्षा स्द्राक्षके द्वारा मन्त्रजप करनेसे
करोड़ गुना पुण्य प्राप्त होता है और उसको धारण
करनेसे तो दस करोड़ गुना पुण्यलाभ होता है॥५८॥
१९०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २५
यावत्कालं हि जीवस्य शरीरस्थो भवेत्स वै।
तावत्कालं स्वल्पमृत्युर्न तं देवि विबाधते॥
त्रिपुण्ड्रेण च संयुक्तं रुद्राक्षाविलसाडुकम्।
मृत्युञ्जयं जपन्तं च दृष्ट्वा रुद्रफलं लभेतू॥ ६०
पञ्चदेवप्रियश्चैव सर्वदेवप्रियस्तथा।
सर्वमन्त्राञ्जपेद्भक्तो रुद्राक्षमालया प्रिये ॥ ६१
विष्ण्वादिदेवभक्ताश्च धारयेयुर्न संशय: ।
रुद्रभक्तो विशेषेण रुद्राक्षान्धारयेत्सदा॥ ६२
रुद्राक्षा विविधाः प्रोक्तास्तेषां भेदान् वदाम्यहम्।
शृणु पार्वति सद्भक्त्या भृक्तिमुक्तिफलप्रदान्॥ ६३
'एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्भक्तिमुक्तिफलप्रदः।
तस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ६४
यत्र सम्पूजितस्तत्र लक्ष्मीर्दूरतरा न हि।
नश्यन्त्युपद्रवाः सर्वे सर्वकामा भवन्ति हि॥ ६५
द्विवक्त्रो देवदेवेशः सर्वकामफलप्रदः।
विशेषतः स रुद्राक्षो गोवधं नाशयेद् द्रुतम्॥ ६६
त्रिवक्त्रो यो हि रुद्राक्ष: साक्षात्साधनदः सदा।
तत्प्रभावाद्भवेयुवे विद्याः सर्वाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६७
चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति।
दर्शनात् स्पर्शनात् सद्यश्चतुर्वर्गफलप्रद: ॥ ६८
भ्न
हे देवि! यह रुद्राक्ष, प्राणीके शरीरपर जबतक
रहता है, तबतक स्वल्पृत्यु उसे बाधा नहीं
पहुँचाती है॥ ५९॥
त्रिपुण्डूको धारणकर तथा रुद्राक्षसे सुशोभित
अंगवाला होकर मृत्युंजयका जप कर रहे उस
[पुण्यवान् मनुष्य]-को देखकर ही रुद्रदर्शनका फल
प्राप्त हो जाता है॥ ६०॥
हे प्रिये! पंचदेवप्रिय [ अर्थात् स्मार्त और वैष्णव]
तथा सर्वदेवप्रिय सभी लोग रुद्राक्षकी मालासे समस्त
मन्त्रोंका जप कर सकते हैं ॥ ६१॥
विष्णु आदि देवताओंके भक्तोंको भी निस्सन्देह
इसे धारण करना चाहिये । रुद्रभक्तोंके लिये तो विशेष
रूपसे रुद्राक्ष धारण करना आवश्यक है ॥ ६२॥
हे पार्वति! रुद्राक्ष अनेक प्रकारके बताये गये हैं।
मैं उनके भेदोंका वर्णन करता हूँ। वे भेद भोग और
मोक्षरूप फल देनेवाले हैं। तुम उत्तम भक्तिभावसे
उनका परिचय सुनो॥ ६३॥
एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिवका स्वरूप
है। वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है।
उसके दर्शनमात्रसे ही ब्रह्महत्याका पाप नष्ट हो
जाता है॥ ६४॥
जहाँ रुद्राक्षकी पूजा होती है, वहाँसे लक्ष्मी दूर
नहीं जातीं, उस स्थानके सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं
तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती
हैं॥ ६५॥
दो मुखाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है।
वह सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाला है | वर्ह
विशेष रूपसे गोहत्याका पाप नष्ट करता है॥६६॥
तीन मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधनका
फल देनेवाला है, उसके प्रभावसे सारी
प्रतिष्ठित हो जाती हैं ॥ ६७॥
चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्माका रूप है
और ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति देनेवाला है।
दर्शन और स्पर्शसे शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम
मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थांकी प्राप्ति होती है ॥ 5८
जे २५]
पञ्चवक्त्रः स्वयं रूद्रः कालाग्निर्नामतः प्रभुः।
सर्वमुक्तिप्रदश्चैव सर्वकामफलप्रद: ॥ ६९
अगम्यागमनं पापमभक्ष्यस्य च भक्षणम्।
इत्यादिसर्वपापानि पञ्चवक्त्रो व्यपोहति॥ ७०
षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु धारणाद् दक्षिणे भुजे।
ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्मुच्यते नात्र संशय: ॥ ७१
सप्तवक्त्रो महेशानि हानड्रो नाम नामतः।
धारणात्तस्य देवेशि दरि्रोऽपीश्वरो भवेत्॥ ७२
रद्राक्षश्चाष्टवक्त्रश्च वसुमूर्तिश्च भैरवः।
धारणात्तस्य पूर्णायुर्मृतो भवति शूलभृत्॥ ७३
भैरबो नववक्त्रश्च कपिलश्च मुनिः स्मृतः।
दुर्गा वा तदधिष्ठात्री नवरूपा महेश्वरी॥ ७४
तं धारयेद्वामहस्ते रुद्राक्षं भक्तितत्परः।
सर्वेश्वरो भवेन्नूनं मम तुल्यो न संशयः॥ ७५
दशवक्त्रो महेशानि स्वयं देवो जनार्दन:
धारणात्तस्य देवेशि सर्वान्कामानवाण्नुयात्॥ ७६
एकादशमुखो यस्तु रुद्राक्षः परमेश्चरि।
स रुद्रो धारणात्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७७
द्वादशास्यं तु रुद्राक्षं धारयेत् केशदेशके।
आदित्याश्चैव ते सर्वे द्वादशैव स्थितास्तथा॥ ७८
विद्येश्वरसंहिता
१९१
पाँच मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्निरुद्ररूप
है। वह सब कुछ करनेमें समर्थ, सबको मुक्ति
देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला
है। बह पंचमुख रुद्राक्ष अगम्या स्त्रीके साथ गमन
और पापान्न-भक्षणसे उत्पन्न समस्त पापोंको दूर कर
देता है॥ ६९-७०॥
छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिकेयका स्वरूप है।
यदि दाहिनी बाँहमें उसे धारण किया जाय, तो धारण
करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो
जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥७१॥
हे महेश्वरि! सात मुखवाला रुद्राक्ष अनंग
नामसे प्रसिद्ध है। हे देवेशि! उसको धारण करनेसे
दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है॥७२॥
आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरवरूप है ।
उसको धारण करनेसे मनुष्य पूर्णायु होता है और
मृत्युके पश्चात् शूलधारी शंकर हो जाता है॥ ७३॥
नौ मुखवाले रुद्राक्षको भैरव तथा कपिलमुनिका
प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करनेवाली
महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री देवी मानी गयी
हैं॥ ७४॥
जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर अपने बायें
हाथमें नवमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह निश्चय
ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है; इसमें संशय नहीं
है ॥ ७५॥
हे महेश्वरि! दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात्
भगवान् विष्णुका रूप है। हे देवेशि! उसको धारण
करनेसे मनुष्यकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती
हैं ॥ ७६॥
है परमेश्वरि! ग्यारह मुखवाला जो रुद्राक्ष है,
वह रुद्ररूप है; उसको धारण करनेसे मनुष्य सर्वत्र
विजयी होता है॥ ७७॥
बारह मुखवाले रुद्राक्षको केशप्रदेशमें धारण
करे। उसको धारण करनेसे मानों मस्तकपर बारहों
आदित्य विराजमान हो जाते हैं ॥७८॥
१९२
त्रयोदशमुखो विश्वेदेवस्तद्भारणान्नरः।
सर्वान्कामानवाप्रोति सौभाग्यं मङ्गलं लभेत्॥
चतुर्दशमुखो यो हि रुद्राक्षः परमः शिवः।
धारयेन्मूर्ध्नि तं भक्त्या सर्वपापं प्रणश्यति॥ ८०
इति रुद्राक्षभेदा हि प्रोक्ता बै मुखभेदतः।
तत्तन्मन्त्राञ्छृणु प्रीत्या क्रमाच्छैलेश्वरात्मजे॥ ८१
ॐ हीं नमः १ ॐ नमः २ > क्लीं नमः ३
ॐ ह्वीं नमः ४ ॐ ह्वीं नमः ५ ॐ हूं हुं
जमः ६ ॐ हुं नमः ७ ॐ हुं नमः ८ ॐ ह्रां
हुं नमः ९ ॐ हीं नमः १० ॐ हीं हुं नमः
११ ॐ क्राँ क्षाँ रौ नमः १२ ॐ हीं
जमः १३ ३५ नमः १४
भक्तिश्रद्धायुतश्चैव सर्वकामार्थसिद्धये।
रुद्राक्षान्धारयेन्मन्त्रेदेि आलस्यवर्जितः॥ ८२
विना मन्त्रेण यो धत्ते रुद्राक्षं भुवि मानवः।
स याति नरकं घोरं यावदिद्धाश्चतुर्दश॥ ८३
रुद्राक्षमालिनं दृष्ट्वा भूतप्रेतपिशाचकाः ।
डाकिनी शाकिनी चैव ये चान्ये द्रोहकारका: ॥ ८४
कृत्रिमं चैव यत्किञ्जिदभिचारादिकं च यत्।
तत्सर्व दूरतो याति दृष्ट्वा शङ्कितविग्रहम्॥ ८५
रद्राक्षमालिनं दृष्ट्वा शिवो विष्णुः प्रसीदति।
देवी गणपतिः सूर्यः सुराश्चन्येऽपि पार्वति॥ ८६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २५
तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्वेदेवोंका
है। उसको धारण करके मनुष्य सम्पूर्ण अभी
प्राप्त करता है तथा सौभाग्य और मंगललाभ करता
है॥ ७९॥
चौदह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह परमशिवरूप
है। उसे भक्तिपूर्वक मस्तकपर धारण करे, इससे
समस्त पापोंका नाश हो जाता है॥८०॥
हे गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मुखोंके भेदसे
रुद्राक्षके [चौदह] भेद बताये गये। अब तुम क्रमशः
उन रुद्राक्षोके धारण करनेके मन्त्रोंको प्रसन्नतापूर्वक
सुनो--
१-३७ हीं नमः। २-3 नम: । ३-क्लीं नम:।
४-३ हीं नम: । ५-३ हीं नम: । ६-३ हीं हुं नमः|
७-३७ हुं नम: | ८-३ हुं नमः। ९-३ हीं हुं नमः।
१०-३७ हीं नम: । ११-३ हीं हुं नम: | १२-ॐ ब्रा
क्षौं रों नम: | १३-३% हीं नम: । १४-३ नम: [-
इन चौदह मन्त्रोंद्रारा क्रमशः एकसे लेकर चौदह
मुखवाले रुद्राक्षोंको धारण करनेका विधान है।]
साधकको चाहिये कि वह निद्रा और आलस्यका
त्याग करके श्रद्धाभक्तिसे सम्पन्न होकर सम्पूर्ण
मनोरथोंकी सिद्धिके लिये उक्त मन्त्रंद्वारा उन-उन
रुदराक्षोंको धारण करे॥ ८१-८२॥
इस पृथ्वीपर जो मनुष्य मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित
किये बिना ही रुद्राक्ष धारण करता है, वह क्रमशः
चौदह इन्रोंके कालपर्यन्त घोर नरकको जाता है॥८३॥
रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले पुरुषको देखर्कर
भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा जो अरी
द्रोहकारी राक्षस आदि हैं, वे सब-के-सब दूर भा
जाते हैं। जो कृत्रिम अभिचार आदि कर्म प्रयुक्त होत
हैं, वे सब रुद्राक्षधारीको देखकर सशंक हो दूर चै
जाते हैं ॥ ८४-८५ ॥
हे पार्वति! रुद्राक्षमालाधारी पुरुषको देखर्कर
शिव, भगवान् विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य रण
अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं॥ ८६॥
ह २५]
विद्येश्वरसंहिता
१९३
एवं ज्ञात्वा तु माहात्म्यं रुद्राक्षस्य महेश्चरि।
सम्यग्धार्याः समन्त्राश्च भक्त्या धर्मविवृद्धये ॥ ८७
इत्युक्तं गिरिजाग्रे हि शिवेन परमात्मना।
भस्मरुद्राक्षमाहात्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ८८
शिवस्यातिप्रियौ ज्ञेयौ भस्मरुद्राक्षधारिणौ।
तद्धारणप्रभावाद्धि भुक्तिर्मुक्तिर्न संशयः॥ ८९
भस्मरुद्राक्षधारी यः शिवभक्तः स उच्यते।
पञ्चाक्षरजपासक्तः परिपूर्णश्च सन्मुखे॥ ९०
विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया।
पूजितोऽपि महादेवो नाभीष्टफलदायकः ॥ ९१
तत्सर्वं च समाख्यातं यत्पृष्टं हि मुनीश्वर।
भस्मरुद्राक्षमाहात्म्यं सर्वकामसमृद्द्धिदम्॥ ९२
एतद्यः शृणुयान्नित्यं माहात्म्यं परमं शुभम्।
रद्राक्षभस्मनोर्भक्त्या सर्वान्कामानवाण्नुयात्॥ ९३
इह सर्वसुखं भुक्त्वा पुत्रपौत्रादिसंयुतः।
लभेत्परत्र सन्मोक्षं शिवस्यातिप्रियो भवेत्॥
वि्येश्वरसंहितेयं कथिता वो मुनीश्वराः।
सर्वसिद्द्रिप्रदा नित्यं मुक्तिदा शिवशासनात्॥ ९५
हे महेश्वरि! इस प्रकार रुद्राक्षकी महिमाको
जानकर धर्मकी वृद्धिके लिये भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त
मन्त्रंद्रारा विधिवत् उसे धारण करना चाहिये ॥ ८७॥
[हे मुनीश्वरो!] इस प्रकार परमात्मा शिवने
भगवती पार्वतीके सामने भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान
करनेवाले भस्म तथा रद्राक्षके माहात्म्यका वर्णन
किया था॥८८॥
भस्म और रुद्राक्षको धारण करनेवाले मनुष्य
भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय हैं। उसको धारण
करनेके प्रभावसे ही भुक्ति-मुक्ति दोनों प्राप्त हो जाती
है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ८९॥
भस्म और रुद्राक्ष धारण करनेवाला मनुष्य
शिवभक्त कहा जाता है। भस्म एवं रद्राक्षसे युक्त
होकर जो मनुष्य [शिवप्रतिमाके सामने स्थित होकर]
' ॐ नमः शिवाय'-इस पंचाक्षर मन्त्रका जप
करता है, वह पूर्ण भक्त कहलाता है॥९०॥
बिना भस्मका त्रिपुण्ड धारण किये और
बिना रद्राक्ष-माला लिये जो महादेवकी पूजा करता है,
उससे पूजित होनेपर भी महादेव अभीष्ट फल प्रदान
नहीं करते हैं॥९१॥
हे मुनीश्वर! सभी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले
भस्म और रद्राक्षके माहात्म्यको मैंने सुनाया। जो इस
रुद्राक्ष और भस्मके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है,
उसकी सभी कामना पूर्ण हो जाती हैं। वह पुत्र-पौत्र
आदिके साथ इस लोकमें सभी प्रकारके सुख भोगकर
अन्तमें मोक्षको प्राप्त होता है और भगवान् शिवका
अतिप्रिय हो जाता है॥ ९२-९४॥
हे मुनीश्वरो! इस प्रकार मैंने शिवकी आज्ञाके
अनुसार उत्तम मुक्ति देनेवाली विद्येश्वरसंहिता आपके
समक्ष कही ॥ ९५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे रद्रक्षमाहात्म्यवर्णतं नाम पञ्चविँशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
॥ इस प्रकार
प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णन
नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
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॥ समाप्तेयं प्रथमा विद्येश्वरसंहिता॥ १॥
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पञ्चमुख भगवान् शिव
अ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम: ॥
श्रीशिवमहापुराण >:
द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमः सृष्टिखण्डः
अथ प्रथमोऽध्यायः
ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतजीद्वारा नारद-ब्रह्म-संवादकी अवतारणा
विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं
गौरीपतिं बिदिततत्त्वमनन्तकीर्तिम्।
मायाश्रयं विगतमायमचितन्त्यरूपं
बोधस्वरूपममलं हि शिवं नमामि॥ १
बन्दे शिवं तं प्रकृतेरनादिं
प्रशान्तमेकं पुरुषोत्तमं हि।
स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा
नभोवदन्तर्बहिरास्थितो यः॥ २
वन्देऽन्तरस्थं निजगूढरूपं
शिवं स्वतः स्त्रष्टुमिदं विचष्टे।
जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति
यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवत्तम्॥ ३
व्यास उवाच
जगतः पितरं शम्भुं जगतो मातरं शिवाम्।
तत्पुत्रञ्च गणाधीशं नत्वैतद्वर्णयामहे ॥ ४
एकदा मुनयः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः।
पप्रच्छुर्वरया भक्त्या सूतं ते शौनकादयः॥ ५
ऋषय ऊचुः
विदयेश्वरसंहितायाः श्रुता सा सत्कथा शुभा।
साध्यसाधनखण्डाख्या रम्याद्या भक्तवत्सला।
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जो विश्वकी उत्पत्ति-स्थिति और लय आदिके
एकमात्र कारण हैं, गिरिराजकुमारी उमाके पति हैं, तत्त्वज्ञ
हैं, जिनकी कीर्तिका कहीं अन्त नहीं है, जो मायाके
आश्रय होकर भी उससे अत्यन्त दूर हैं, जिनका स्वरूप
अचिन्त्य है, जो बोधस्वरूप हैं तथा निर्विकार हैं, उन
भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १॥
मैं स्वभावसे ही उन अनादि, शान्तस्वरूप,
पुरुषोत्तम शिवकी बन्दना करता हूँ, जो अपनी मायासे
इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करके आकाशकी भाँति
इसके भीतर और बाहर भी स्थित हैं॥ २॥
जैसे लोहा चुम्बकसे आकृष्ट होकर उसके पास
ही लटका रहता है, उसी प्रकार ये सारे जगत् सदा
सब ओर जिसके आस-पास ही भ्रमण करते हैं,
जिन्होंने अपनेसे ही इस प्रपंचको रचनेकी विधि
बतायी थी, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे विराजमान
हैं तथा जिनका अपना स्वरूप अत्यन्त गूढ़ है, उन
भगवान् शिवकी मैं सादर वन्दना करता हूँ॥ ३॥
व्यासजी बोले--जगतूके पिता भगवान् शिव,
जगन्माता कल्याणमयी पार्वती तथा उनके पुत्रगणेशजीको
नमस्कार करके हम इस पुराणका वर्णन करते हैं ॥ ४॥
एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें निवास
करनेवाले शौनक आदि सभी मुनियोंने उत्तम भक्तिभावके
साथ सूतजीसे पूछा-॥५॥
ऋषिगण बोले-[हे सूतजी!] विद्येश्वर
संहिताको जो साध्य-साधन-खण्ड नामवाली शुभ तथा
उत्तम कथा है, उसे हमलोगोंने सुन लिया। उसका आदिभाग
बहुत ही रमणीय है तथा वह शिवभक्तोंपर भगवान्
शिवका वात्सल्य-स्तेह प्रकट करनेवाली है॥ ६॥
१९६
श्रीशिवमहापुराण
[अ १
सूत सूत महाभाग चिरञ्जीव सुखी भव।
यच्छावयसि नस्तात शाङ्करी परमां कथाम्॥
पिबन्तस्त्वन्मुखाम्भोजच्युतं ज्ञानामृतं वयम्।
अवितृसाः पुनः किञ्चितप्रष्टुमिच्छामहेऽनघ॥ ८
व्यासप्रसादात्सर्वज्ञो प्राप्तोऽसि कृतकृत्यताम्।
नाज्ञातं विद्यते किञ्चिद्भूतं भव्यं भवच्च यत्॥ ९
गुरोर्व्यासस्य सद्भक्त्या समासाद्य कृपां पराम्।
सर्व ज्ञातं विशेषेण सर्व सार्थं कृतं जनुः॥ १०
इदानीं कथय प्राज्ञ शिवरूपमनुत्तमम्।
दिव्यानि वै चरित्राणि शिवयोरप्यशेषतः॥ ११
अगुणो गुणतां याति कथं लोके महेश्वर: ।
शिवतत्त्वं वयं सर्वे न जानीमो विचारतः॥ १२
सृष्टेः पूर्व कथं शम्भुः स्वरूपेणावतिष्ठते।
सृष्टिमध्ये स हि कथं क्रीडन्संवर्तते प्रभुः ॥ १३
तदन्ते च कथं देवः स तिष्ठति महेश्वरः।
कथं प्रसन्नतां याति शङ्करो लोकशङ्करः॥ १४
स प्रसन्नो महेशानः किं प्रयच्छति सत्फलम्।
स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च तत्सर्व कथयस्व न:॥ १५
सद्यः प्रसन्नो भगवान्भवतीत्यनुशुश्रुम।
भक्तप्रयासं स महान्न पश्यति दयापरः॥ १६
ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवाङ्गजाः।
महेशस्तत्र पूर्णाशः स्वयमेव शिवोऽपरः॥ १७
तस्याविर्भावमाख्याहि चरितानि विशेषत: ।
उमाविर्भावमाख्याहि तद्विवाहं तथा प्रभो॥ १८
तद्गार्हस्थ्यं विशेषेण तथा लीला: परा अपि।
एतत्सर्वं तद्यच्च कथनीयं त्वयानघ॥ १९
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हे महाभाग! हे सूतजी ! हे तात! आप हमलोगोंको
सदाशिव भगवान् शंकरकी उत्तम कथाका श्रवण
रहे हैं, अतएव आप चिरकालतक जीवित रहें और
सदा सुखी रहें। आपके मुखकमलसे निकल रहे
ज्ञानामृतका पूर्ण रूपसे पान करते हुए भी हमलोग
तृप्त नहीं हो पा रहे हैं, इसलिये हे अनघ (पुण्यात्मा)।
हम सब पुनः कुछ पूछना चाहते हैं॥ ७-८ ॥
भगवान् व्यासकी कृपासे आप सर्वज्ञ एवं
हैं । आपके लिये भूत-भविष्य और वर्तमानका कुछ भी
अज्ञात नहीं है अर्थात् सब कुछ आपको ज्ञात है॥ ९॥
अपनी सद्भक्तिके द्वारा गुरु व्यासजीसे परमकृपाको
प्राप्तकर आप विशेष रूपसे सब कुछ जान गये हैं और
अपने सम्पूर्ण जीवनको भी कृतार्थ कर लिया है ॥ १०॥
हे विद्वन्! अब आप भगवान् शिवके परम उत्तम
स्वरूपका वर्णन कीजिये। साथ ही शिव और
पार्वतीके दिव्य चरित्रोंका पूर्णरूपसे श्रवण कराइये॥ ११॥
निर्गुण महेश्वर लोकमें सगुणरूप कैसे धारण
करते हैं ? हम सबलोग विचार करनेपर भी शिवके
तत्त्वको नहीं समझ पाते॥ १२॥
सृष्टिके पूर्वमे भगवान् शिव किस प्रकार अपने
स्वरूपसे स्थित होते हैं, पुन: सृष्टिके मध्यकालमें वे
भगवान् किस तरह क्रीड़ा करते हुए सम्यक् व्यवहार
करते हैं। सृष्टिकल्पका अन्त होनेपर वे महेश्वरदेव
किस रूपमें स्थित रहते हैं ? लोककल्याणकारी शंकर
कैसे प्रसन्न होते हैं॥ १३-१४॥
प्रसन्न हुए महेश्वर अपने भक्तों तथा दूसरोंको
कौन-सा उत्तम फल प्रदान करते हैं ? यह सब हमसे
कहिये। हमने सुना है कि भगवान् शिव शीघ्र प्रसल
हो जाते हैं। वे महान् दयालु हैं, इसलिये वे अपने
भक्तोंका कष्ट नहीं देख सकते॥ १५-१६॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश--ये तीनों देवता शिवके
ही अंगसे उत्पन्न हुए हैं । इनमें महेश तो पूर्णां हैं, वे
स्वयं ही दूसरे शिव हैं। आप उनके प्राकट्यकी कथा
तथा उनके विशेष चरित्रका वर्णन कीजिये। हे प्रभो!
आप उमाके आविर्भाव और उनके विवाहकी भी कथा
कहिये। विशेषतः उनके गार्हस्थ्यधर्मका और है
लीलाओंका भी वर्णन कीजिये। हे निष्पाप सूतजी!
सब तथा अन्य बातें भी आप बतायें॥ १७--१९ |
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ड १]
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
१९७
व्यास उवाच
इति पृष्टस्तदा तैस्तु सूतो हर्षसमन्वितः।
स्मृत्वा शम्भुपदाम्भोजं प्रत्युवाच मुनीश्वरान्॥ २०
सूत उवाच
सम्यक् पृष्टं भवद्भिश्च धन्या यूयं मुनीश्वराः ।
सदाशिवकथायां वो यज्जाता नेष्ठिकी मति: ॥ २१
सदाशिवकथाप्रश्नः पुरुषांस्त्रीन्पुनाति हि।
वक्तारं पृच्छकं श्रोतृञ्जाह्वीसलिलं यथा॥ २२
शम्भोर्गुणानुवादात्को विरज्येत पुमान्द्रिजाः।
विना पशुष्नं त्रिविधजनानन्दकरात्सदा॥ २३
गीयमानो वितृष्णैश्च भवरोगौषधोऽपि हि।
मनःश्रोत्राभिरामश्च यतः सर्वार्थदः स वै॥ २४
कथयामि यथाबुद्धि भवत्प्रश्नानुसारतः।
शिवलीलां प्रयत्नेन द्विजास्तां शृणुतादरात्॥ २५
भवद्भिः पृच्छ्यते यद्वत्तत्तथा नारदेन वै।
पृष्टं पित्रे प्रेरितेन हरिणा शिवरूपिणा॥ २६
ब्रह्मा शरुत्वा सुतवचः शिवभक्तः प्रसन्नधीः ।
जगौ शिवयशः प्रीत्या हर्षयन्मुनिसत्तमम्॥ २७
व्यास उवाच
सूतोक्तमिति तद्वाक्यमाकर्ण्य द्विजसत्तमाः।
पप्रच्छुस्तत्सुसंवादं कुतूहलसमन्विताः ॥
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग शेवोत्तम महामते।
श्रुत्वा तब वचो रम्यं चेतो नः सकुतूहलम्॥ २९
कदा बभूब सुखकृद्विधिनारदयोरमहान्।
संवादो यत्र गिरिशसुलीला भवमोचनी॥ ३०
विधिनारदसंवादपूर्वकं शाङ्करं यशः।
ब्रूहि नस्तात तत्प्रीत्या तत्तत्प्रश्नानुसारत:॥ ३९
व्यासजी बोले--उनके ऐसा पूछनेपर सूतजी
प्रसन्न हो उठे और भगवान् शंकरके चरणकमलोंका
स्मरण करके मुनीश्वरोंसे कहने लगे ॥ २०॥
सूतजी बोले--हे मुनीश्वरो! आपलोगोंने बड़ी
उत्तम बात पूछी है। आपलोग धन्य हैं, जो कि
भगवान् सदाशिवकी कथामें आपलोगोंकी आन्तरिक
निष्ठा हुई है, सदाशिवसे सम्बन्धित कथा वक्ता,
पूछनेवाले और सुननेवाले-इन तीनों प्रकारके पुरुषोंको
गंगाजीके समान पवित्र करती है॥ २१-२२॥
हे द्विजो! पशुओंकी हिंसा करनेवाले निष्ठुर कसाईके
सिवा दूसरा कौन पुरुष तीनों प्रकारके लोगोंको सदा
आनन्द देनेवाले शिव-गुणानुवादको सुननेसे ऊब सकता
है । जिनके मनमें कोई तृष्णा नहीं है, ऐसे महात्मा पुरुष
भगवान् शिवके उन गुणोंका गान करते हैं; क्योंकि वह
संसाररूपी रोगकी दवा है, मन तथा कानोंको प्रिय लगनेवाला
है और सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है॥ २३-२४॥
हे ब्राह्मणो! आपलोगोंके प्रश्नके अनुसार मैं
यथाबुद्धि प्रयत्नपूर्वक शिवलीलाका वर्णन करता हूँ,
आपलोग आदरपूर्वक सुनें ॥ २५॥
जैसे आपलोग पूछ रहे हैं, उसी प्रकार नारदजीने
शिवरूपी भगवान् विष्णुसे प्रेरित होकर अपने पिता
ब्रह्माजीसे पूछा था। अपने पुत्र नारदका प्रश्न सुनकर
शिवभक्त ब्रह्माजीका चित्त प्रसन्न हो गया और वे उन
मुनिश्रेष्ठको हर्ष प्रदान करते हुए प्रेमपूर्वक भगवान्
शिवके यशका गान करने लगे॥ २६-२७॥
'व्यासजी बोले-सूतजीके द्वारा कथित उस
वचनको सुनकर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण आश्चर्यचकित हो
उठे और उन लोगोंने उस विषयको उनसे पूछा-- ॥ २८॥
ऋषिगण बोले-हे सूतजी! हे महाभाग! हे
शिवभक्तोमें श्रेष्ठ! हे महामते! आपके सुन्दर वचनको
सुनकर हमारे हृदयमें कौतूहल हो रहा है॥ २९॥
ब्रह्मा और नारदका यह महान् सुख देनेवाला
संवाद कब हुआ था, जिसमें संसारसे मुक्ति प्रदान
करनेवाली शिवलीला वर्णित है॥ ३०॥
हे तात! प्रेमपूर्वक नारदके द्वारा पूछे गये उन-
उन प्रश्नोंक अनुसार भगवान् शंकरके यशका गुणानुवाद्
करनेवाले ब्रह्मा और नारदके संवादका वर्णन करें॥ ३१५॥
१९८ श्रीशिवमहापुराण [3७३
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्। आत्मज्ञानी उन सुनियोंके ऐसे वचनको सुनकर
सूतः प्रोवाच सुप्रीतस्तत्संवादानुसारतः॥ ३२ | प्रसन्न हुए सूतजी उस ब्रह्म-नारद-संवादके ३ अनुसार
[कही गयी शिवकथाको] कहने लगे॥ ३२॥
इतिं श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने युनिप्रश्तवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः णशा
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें
मुनि-प्रश्न-वर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
नारद मुनिकी तपस्या, इन्द्रद्वारा तपस्यामें विघ्न उपस्थित करना, नारदका कामपर विजय
पाना और अहंकारसे युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रसे अपने तपका कथन
सूत उवाच
एकस्मिन्समये विप्रा नारदो मुनिसत्तमः।
ब्रह्मपुत्रो विनीतात्मा तपोऽर्थं मन आदधे॥
हिमशैलगुहा काचिदेका परमशोभना।
यत्समीपे सुरनदी सदा वहति वेगतः॥
तत्राश्रमो महादिव्यो नानाशोभासमन्वितः।
तपोऽर्थं स ययौ तत्र नारदो दिव्यदर्शनः ॥
तां दृष्ट्वा मुनिशार्दूलस्तेपे स सुचिरं तपः।
बध्वासनं दूढे मौनी प्राणानायम्य शुद्धधीः ॥
चक्रे मुनिः समाधिं तमहम्ब्रहोति यत्र ह।
विज्ञानं भवति ब्रह्मसाक्षात्कारकरं द्विजाः॥
इत्थं तपति तस्मिन्वै नारदे मुनिसत्तमे।
चकम्पेऽथ शुनासीरो मनस्सन्तापविद्वल:॥
मनसीति विचिन्त्यासौ मुनिर्मे राज्यमिच्छति।
तद्विष्लकरणार्थं हि हरिर्यत्नमियेष सः॥
सस्मार स स्मरं शक्रश्चेतसा देवनायकः।
आजगाम द्रुतं कामः समधीर्महिषीयुतः॥
सूतजी बोले--[हे मुनियो!] एक समयकी
बात है, ब्रह्माजीके पुत्र, मुनिशिरोमणि, विनीतचित्त
नारदजीने तपस्याके लिये मनमें विचार किया॥ १॥
हिमालय पर्वतमें कोई एक परम शोभा-सम्पन
गुफा थी, जिसके निकट देवनदी गंगा निरन्तर वेगपूर्वक
बहती थीं ॥ २॥
वहाँ एक महान् दिव्य आश्रम था, जो जाना
प्रकारको शोभासे सुशोभित था। वे दिव्यदर्शी नारदजी
तपस्या करनेके लिये वहाँ गये ॥ ३॥
उस गुफाको देखकर मुनिवर नारदजी बड़े प्रसन
हुए और सुदीर्घकालतक वहाँ तपस्या करते रहे | उनका
अन्तःकरण शुद्ध था। वे दृढ़तापूर्वक आसन बाँधकर
मौन हो प्राणायामपूर्वक समाधिमें स्थित हो गये ॥ ४ ॥
हे ब्राह्मणो ! उन्होंने वह समाधि लगायी, जिसमें
ब्रह्मका साक्षात्कार करानेवाला 'अहं ब्रह्मास्मि' [मैं
ब्रह्म हूँ]--यह विज्ञान प्रकट होता है॥५॥
मुनिवर नारदजी जब इस प्रकार तपस्या करने
लगे, तब देवराज इन्द्र काँप उठे और मानसिक
सन्तापसे व्याकुल हो गये॥ ६॥
“वे नारद मुनि मेरा राज्य लेना चाहते हैं मन
ही-मन ऐसा सोचकर इन्द्रने उनकी तपस्यामें वि
| लिये प्रयत्न करनेकी इच्छा की। उस संम
देवनायक इनद्रने मनसे कामदेवका स्मरण कि
[स्मरण करते ही ] समान बुद्धिवाले कामदेव
पली रतिके साथ आ गये ॥ ७-८॥
ऱ्य २]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
१९९
अथागतं स्मरं दृष्ट्वा सम्बोध्य सुरराट् प्रभु:।
उवाच तं प्रपश्याशु स्वार्थे कुटिलशेमुषिः॥ ९
इन्द्र उवाच
मित्रवर्य महावीर सर्वदा हितकारक।
शृणु प्रीत्या वचो मे त्वं कुरु साहास्यमात्मना॥ १०
त्वदबलान्मे बहूनाञ्च तपोगर्वो विनाशितः।
मद्राज्यस्थिरता मित्र त्वदनुग्रहतः सदा॥ ११
हिमशैलगुहायां हि मुनिस्तपति नारद्ः।
मनसोद्दिश्य विश्वेशं महासंयमवान्दृढः ॥ १२
याचेन्न विधितो राज्यं स ममेति विशङ्कितः।
अद्यैव गच्छ तत्र त्वं तत्तपोविघ्नमाचर॥ १३
इत्याज्ञप्तो महेन्द्रेण स कामः समधुप्रियः।
जगाम तत्स्थलं गर्वादुपायं स्वं चकार ह॥ १४
रचयामास तत्राशु स्वकलाः सकला अपि।
सन्तोऽपि स्वप्रभावं चकार विविधं मदात्॥ १५
न बभूव मुनेश्चेतो विकृतं मुनिसत्तमाः।
भ्रष्टो बभूव तद्गवों महेशानुग्रहेण ह॥ १६
श्ृणुतादरतस्तत्र कारणं शौनकादयः।
ईश्वरनुग्रहेणात्र न प्रभावः स्मरस्य हि॥ १७
अत्रैव शम्भुनाकारि सुतपश्च स्मरारिणा।
अत्रैव दग्धस्तेनाशु कामो मुनितपोपहः॥
कामजीवनहेतोर्हि रत्या सम्प्रार्थिते: सुरेः।
सम्प्रार्थित उवाचेदं शङ्करो लोकशङ्करः॥ १९
'कञ्जित्समयमासाद्य जीविष्यति सुराः स्मरः।
परन्त्विह स्मरोपायश्चलिष्यति न कश्चन॥ २०
आये हुए कामदेवको देखकर कपटबुद्धि देवराज
इन्द्र शीघ्र ही स्वार्थके लिये उनको सम्बोधित करते
हुए कहने लगे-॥ ९॥
इन्द्र बोले_मित्रोमें श्रेष्ठ! हे महावीर! हे
सर्वदा हितकारक! तुम प्रेमपूर्वक मेरे वचनोंको सुनो
और मेरी सहायता करो॥ १०॥
हे मित्र! तुम्हारे बलसे मैंने बहुत लोगोंकी
तपस्याका गर्व नष्ट किया है । तुम्हारी कृपासे ही मेरा
यह राज्य स्थिर है॥ ११॥
पूर्णरूपसे संयमित होकर दृढनिश्चयी देवर्षि
नारद मनसे विश्वेश्वर भगवान् शंकरकी प्राप्तिका लक्ष्य
बनाकर हिमालयको गुफामें तपस्या कर रहे हैं ॥ १२॥
मुझे यह शंका है कि [तपस्यासे प्रसन्न] ब्रह्मासे
वे मेरा राज्य ही न माँग लें। आज ही तुम वहाँ चले
जाओ और उनकी तपस्यामें विघ्न डालो ॥ १३॥
इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर वे कामदेव वसन्तको
साथ लेकर बड़े गर्वसे उस स्थानपर गये और अपना
उपाय करने लगे॥ १४॥
उन्होंने वहाँ शीघ्र ही अपनी सारी कलाएँ रच
डालीं। बसन्तने भी मदमत्त होकर अनेक प्रकारसे
अपना प्रभाव प्रकट किया॥ १५॥
हे मुनिवरो! [कामदेव और वसन्तके अथक
प्रयत्न करनेपर भी] नारदमुनिके चित्तमें विकार नहीं
उत्पन्न हुआ। महादेवजीके अनुग्रहसे उन दोनोंका
गर्व चूर्ण हो गया॥ १६॥
हे शौनक आदि महर्षियो ! ऐसा होनेमें जो कारण
था, उसे आदरपूर्वक सुनिये । महादेवजीकी कृपासे ही
[नारदमुनिपर] कामदेवका कोई प्रभाव नहीं पड़ा ॥ १७॥
पहले उसी आश्रममें कामशत्रु भगवान् शिवने
उत्तम तपस्या की थी और वहींपर उन्होंने मुनियोंकी
तपस्याका नाश करनेवाले कामदेवको शीघ्र ही भस्म
कर डाला था॥ १८॥
उस समय रतिने कामदेवको पुन: जीवित करनेके
लिये देवताओंसे प्रार्थना की। तब देवताओंने समस्त
लोकोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरसे याचना
की। इसपर वे बोले-हे देवताओ! कुछ समय व्यतीत
होनेके बाद कामदेव जीवित तो हो जायँगे, परंतु यहाँ
उनका कोई उपाय नहीं चल सकेगा ॥ १९-२०॥
२००
श्रीशिवमहापुराण
[अ २
इह यावददृश्यते भूर्जनेः स्थित्वामराः सदा ।
कामबाणप्रभावोऽत्र न चलिष्यत्यसंशयम्॥
इति शम्भूक्तितः कामो मिथ्यात्मगतिकस्तदा।
जारदे स जगामाशु दिवमिन्द्रसमीपतः॥ २२
आचख्यौ सर्ववृत्तान्तं प्रभावं च मुनेः स्मरः।
तदाज्ञया ययौ स्थानं स्वकीयं समधुप्रियः॥ २३
विस्मितोऽभूत्सुराधीशः प्रशशंसाथ नारदम्।
तद्वृत्तान्तानभिज्ञो हि मोहितः शिवमायया॥ २४
दुर्जेया शाम्भवी माया सर्वेषां प्राणिनामिह।
भक्तं विनार्पितात्मानं तया सम्मोह्यते जगत्॥ २५
नारदोऽपि चिरं तस्थौ तत्रेशानुग्रहेण ह।
पूर्ण मत्वा तपस्तत्स्वं विरराम ततो मुनिः॥ २६
कामाज्यं निजं मत्वा गर्वितोऽभून्ुनीश्वरः।
वृथैव विगतज्ञानः शिवमायाविमोहितः॥ २७
धन्या धन्या महामाया शाम्भवी मुनिसत्तमा:।
तद्गतिं न हि पश्यन्ति विष्णुब्रह्मादयोऽपि हि॥ २८
तया सम्मोहितोऽतीव नारदो मुनिसत्तमः।
कैलासं प्रययौ शीघ्र स्ववृत्तं गदितुं मदी॥ २९
रुद्रं नत्वाब्रवीत्सर्व स्ववृत्तं गर्ववान्मुनिः।
मत्त्वात्मानं महात्मानं स्वप्रभुञ्च स्मरञ्जयम्॥ ३०
तच्छुत्वा शङ्करः प्राह नारदं भक्तवत्सलः।
स्वमायामोहितं हेत्वनभिज्ञं भ्रष्टचेतसम्॥ ३१
° 0 0 = त च मळाला कळ ..
हे अमरगण! यहाँ खडे होकर लोग चारों ओर
जितनी दूरतककी भूमिको नेत्रोंसे देख पाते ह
वहाँतक कामदेवके बाणोंका प्रभाव नहीं चल सकेगा
इसमें संशय नहीं है॥ २१॥ f
भगवान् शंकरकी इस उक्तिके अनुसार उस
समय वहाँ नारदजीके प्रति कामदेवका अपना प्रभाव
मिथ्या सिद्ध हुआ। वे शीघ्र ही स्वर्गलोकमें इद्रके
पास लौट गये॥ २२॥
वहाँ कामदेवने अपना सारा वृत्तान्त और मुनिका
प्रभाव कह दिया। तत्पश्चात् इन्द्रकी आज्ञासे वे
वसन्तके साथ अपने स्थानको लौट गये॥ २३॥
उस समय देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ।
उन्होंने नारदजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। परंतु शिवकी
मायासे मोहित होनेके कारण वे उस पूर्ववृत्तान्तका
स्मरण न कर सके॥ २४॥
वास्तवमें इस संसारमें सभी प्राणियोंके लिये शम्भुकी
मायाको जानना अत्यन्त कठिन है । जिसने अपने-आपको
शिवको समर्पित कर दिया है, उस भक्तको छोड़कर
शेष सम्पूर्ण जगत् उनकी मायासे मोहित हो जाता है॥ २५॥
नारदजी भी भगवान् शंकरकी कृपासे वहाँ चिर-
कालतक तपस्यामें लगे रहे । अन्तमें अपनी तपस्याको
पूर्ण हुआ जानकर वे मुनि उससे विरत हो गये ॥ २६॥
'कामदेवपर अपनी विजय मानकर उन मुनीश्वरको
व्यर्थ ही गर्व हो गया। भगवान् शिवकी मायासे मोहित
होनेके कारण उन्हें यथार्थ बातका ज्ञान नहीं रहा ॥ २७॥
हे मुनिश्रेष्ठो! भगवान् शम्भुकी महामाया धन्य
है, धन्य है। ब्रह्मा, विष्णु आदि देव भी
गतिको नहीं देख पाते हैं ॥ २८॥
उस मायासे अत्यन्त मोहित मुनिशिरोमणि नार
गर्वयुक्त होकर अपना [कामविजय-सम्बन्थी] वृत्तात
बतानेके लिये तुरंत ही कैलास पर्वतपर गये ॥ २९॥
वहाँ रुद्रदेवको नमस्कार करके गर्वसे भरे हुए
मुनिने अपने आपको महात्मा, प्रभु तथा
मानकर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा॥ ३०॥
यह सुनकर भक्तवत्सल शंकरजी अपनी मासे
मोहित, वास्तविक कारणसे अनभिज्ञ तथा श्रष्टरवि
नारदसे कहने लगे-॥ ३१॥
दे २]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२०१
रुद्र उवाच
हे तात नारद प्राज्ञ धन्यस्त्वं शृणु मद्वच: ।
बाच्यमेवं न कुत्रापि हरेरग्रे विशेषत: ॥ ३२
पृच्छमानोऽपि न ब्रूयाः स्ववृत्तं मे यदुक्तवान्।
गोप्यं गोप्यं सर्वथा हि नैव वाच्यं कदाचन॥ ३३
शास्म्यहं त्वां विशेषेण मम प्रियतमो भवान्।
विष्णुभक्तो यतस्त्वं हि तद्भक्तोऽतीव मेऽनुगः॥ ३४
शास्ति स्मेत्थञ्च बहुशो रूद्रः सूतिकरः प्रभुः ।
नारदो न हितं मेने शिवमायाविमोहितः॥ ३५
प्रबला भाविनी कर्मगतिज्ञेया विचक्षणैः।
न निवार्या जनैः कैश्चिदपीच्छा सैव शाङ्करी॥ ३६
ततः स मुनिवर्यो हि ब्रह्मलोकं जगाम ह।
विधिं नत्वाब्रवीत्कामजयं स्वस्य तपोबलात्॥ ३७
तदाकर्ण्य विधिः सोऽथ स्मृत्वा शम्भुपदाम्बुजम्।
विज्ञाय कारणं सर्व निषिषेध सुतं तदा॥ ३८
मेने हितं न विध्युक्तं नारदो ज्ञानिसत्तमः।
शिवमायामोहितश्च रूढचित्तमदाङ्कुरः॥
शिवेच्छा यादूशी लोके भवत्येव हि सा तदा।
तदधीनं जगत्सर्वं वचस्तत्त्यां स्थितं यतः॥ ४०
नारदोऽथ ययौ शीध्रं विष्णुलोकं विनष्टधीः।
मदाङ्कुरमना वृत्तं गदितुं स्वं तदग्रतः॥ ४१
रुद्र बोले--हे तात! हे नारद! हे प्राज्ञ! तुम
धन्य हो। मेरी बात सुनो, अबसे फिर कभी ऐसी बात
कहीं भी न कहना और विशेषतः भगवान् विष्णुके
सामने तो इसकी चर्चा कदापि न करना॥ ३२॥
तुमने मुझसे अपना जो वृत्तान्त बताया है, उसे
पूछनेपर भी दूसरोंके सामने न कहना। यह [सिद्धिः
सम्बन्धी] वृत्तान्त सर्वथा गुप्त रखनेयोग्य है, इसे
कभी किसीसे प्रकट नहीं करना चाहिये ॥३३॥
तुम मुझे विशेष प्रिय हो, इसीलिये [अधिक
जोर देकर] मैं तुम्हें यह शिक्षा देता हूँ; क्योंकि तुम
भगवान् विष्णुके भक्त हो और उनके भक्त होते हुए
मेरे अत्यन्त अनुगामी हो॥ ३४॥
इस प्रकार बहुत कुछ कहकर संसारको सृष्टि
करनेवाले भगवान् रुद्रने नारदजीको शिक्षा दी, परंतु
शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण नारदजीने उनकी
दी हुई शिक्षाको अपने लिये हितकर नहीं माना। भावी
कर्मगति अत्यन्त बलवान् होती है, उसे बुद्धिमान् लोग
ही जान सकते हैं । भगवान् शिवकी इच्छाको कोई भी
मनुष्य नहीं टाल सकता ॥ ३५-३६॥
तदनन्तर मुनिशिरोमणि नारद ब्रह्मलोकमें गये।
वहाँ ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपने तपोबलसे
कामदेवको जीत लेनेकी बात कही ॥ ३७॥
उनकी वह बात सुनकर ब्रह्माजीने भगवान्
शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके और समस्त
कारण जानकर अपने पुत्रको यह सब कहनेसे मना
किया॥ ३८॥
नारदजी शिवकी मायासे मोहित थे, अतएव
उनके चित्तमें मदका अंकुर जम गया था। इसलिये
ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ नारदजीने ब्रह्माजीकी बातको अपने
लिये हितकर नहीं समझा॥ ३९॥
इस लोकमें शिवकी जैसी इच्छा होती है, वैसा
ही होता है। समस्त विश्व उन्हांकी इच्छाके अधीन
है और उन्हींकी वाणीरूपी तन्त्रीसे बँधा हुआ
है॥ ४० ॥
तब नष्ट बुद्धिवाले नारदजी अपना सारा वृत्तान्त
गर्वपूर्वक भगवान् विष्णुके सामने कहनेके लिये
वहाँसे शीघ्र ही विष्णुलोकमें गये॥ ४९॥
२०२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २
आगच्छन्तं मुनिं दृष्ट्वा नारदं विष्णुरादरात्।
उत्थित्वाग्रे गतोऽरं तं शिश्लेष ज्ञातहेतुकः॥
स्वासने समुपावेश्य स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्।
हरिः प्राह वचस्तथ्यं नारदं मदनाशनम्॥ ४३
विष्णुरुवाच
कुत आगम्यते तात किमर्थमिह चागत:।
धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल तीर्थोऽहं तु तवागमात्॥ ४४
विष्णुवाक्यमिति श्रुत्वा नारदो गर्वितो मुनिः।
स्ववृत्तं सर्वमाचष्ट समदं मदमोहितः॥ ४५
श्रुत्वा मुनिवचो विष्णुः समदं कारणं तत: ।
ज्ञातवानखिलं स्मृत्वा शिवपादाम्बुजं हृदि॥ ४६
तुष्टाव गिरिशं भक्त्या शिवात्मा शैवराङ्करिः।
साञ्जलि्विसुधीर्नप्रमस्तकः परमेश्वरम्॥ ४७
विष्णुरुवाच
देव देव महादेव प्रसीद परमेश्वर।
धन्यस्त्वं शिव धन्या ते माया सर्वविमोहिनी॥ ४८
इत्यादि स स्तुतिं कृत्वा शिवस्य परमात्मनः ।
निमील्य नयने ध्यात्वा विरराम पदाम्बुजम्॥ ४९
यत्कर्तव्यं शङ्करस्य स ज्ञात्वा विश्वपालकः ।
शिवशासनतः प्राह हृदाथ मुनिसत्तमम् ॥ ५०
विष्णुरुवाच
धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल तपोनिधिरुदारधीः।
भक्तित्रिकं न यस्यास्ति काममोहादयो मुने॥ ५९
विकारास्तस्य सद्यो वै भवन्त्यखिलदुः खदाः।
नैष्ठिको ब्रह्मचारी त्वं ज्ञानवैराग्यवान्सदा॥ ५२
नारद मुनिको आते देखकर भगवान् विष्णु बहे
आदरसे उठकर शीघ्र ही आगे बढे और उन्होंने मुनिको
हृदयसे लगा लिया। उन्हें मुनिके आगमनके हेतुका ज्ञान
पहलेसे ही था । नारदजीको अपने आसनपर बैठाकर भगवान्
शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके श्रीहरि उनसे यथार्थ
तथा गर्वनाशक वचन कहने लगे-- ॥ ४२-४३ ॥
विष्णु बोले--हे तात! आप कहाँसे आ रहे हैं?
यहाँ किसलिये आपका आगमन हुआ है ? हे मुनिश्रेष्ठ।
आप धन्य हैं। आपके शुभागमनसे मैं पवित्र हो गया ॥ ४४॥
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर गर्वसे भरे
हुए नारद मुनिने मदसे मोहित होकर अपना सारा
वृत्तान्त बड़े अभिमानके साथ बताया ॥ ४५॥
नारद मुनिका वह अहंकारयुक्त वचन सुनकर
मन-ही-मन शिवके चरणारविन्दोंका स्मरणकर भगवान्
विष्णुने उनके कामविजयके समस्त यथार्थ कारणको
पूर्णरूपसे जान लिया॥ ४६॥
उसके पश्चात् शिवके आत्मस्वरूप, परम शैव,
सुबुद्ध भगवान् विष्णु भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर
हाथ जोड़कर परमेश्वर कैलासपति शंकरकी स्तुति
करने लगें ॥ ४७॥
विष्णु बोले_ हे देवेश्वर! हे महादेव ! हे परमेश्वर!
आप प्रसन्न हों। हे शिव! आप धन्य हैं और सबको
विमोहित करनेवाली आपकी माया भी धन्य है ॥ ४८॥
इस प्रकार परमात्मा शिवकी स्तुति करके हरि
अपने नेत्रोंकी बन्दकर उनके चरणकमलोंमें ध्यानस्थित
होकर चुप हो गये॥ ४९॥
विश्वपालक हरि शिवके द्वारा जो होना था, उसे
हदयसे जानकर शिवके आज्ञानुसार मुनिश्रेष्ठ नारदजीसें
कहने लगे ॥५०॥
विष्णु बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! आप धन्य हैं, आप
तपस्याके भण्डार हैं और आपका हृदय भी बड़ा उदार
है। हे मुने! जिसके भीतर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नहीं
होते, उसीके मनमें समस्त दु:खोंको देनेवाले काम, मोह
आदि विकार शीघ्र उत्पन्न होते हैं। आप तो नैष्टिक
ब्रह्मचारी हैं और सदा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त रहते हैं, पिर
आपमें कामविकार कैसे आ सकता है। आप तो जसै
निर्विकार तथा शुद्ध बुद्धिवाले हैं ॥ ५१-५२॥
ह ३]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२०३
कथं कामविकारी स्याज्जन्मनाविकृतः सुधीः ।
इत्याद्युक्तं वचो भूरि श्रुत्वा स मुनिसत्तमः ॥ ५३
विजहास हदा नत्वा प्रत्युवाच वचो हरिम्।
नारद उवाच
किंप्रभावः स्मरः स्वामिन्कृपा यद्यस्ति ते मयि॥ ५४
इत्युक्त्वा हरिमानम्य ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥ ५५
श्रीहरिकी कही हुई बहुत-सी बातें सुनकर
मुनिशिरोमणि नारदजी जोर-जोरसे हँसने लगे और
मन-ही-मन भगवानूको प्रणाम करके इस प्रकार कहने
लगे-॥ ५३१/२॥
नारदजी बोले-हे स्वामिन्! यदि मुझपर
आपकी कृपा है, तब कामदेवका मेरे ऊपर क्या प्रभाव
हो सकता है। ऐसा कहकर भगवानूके चरणोंमे
मस्तक झुकाकर इच्छानुसार विचरनेवाले नारदमुनि
बहाँसे चले गये॥ ५४-५५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदतपोवर्णन नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें
नारदतपोवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित हुए नारदजीका भगवान् विष्णुसे
उनका रूप माँगना, भगवानका अपने रूपके साथ वानरका-सा मुँह देना,
कन्याका भगवानको वरण करना और कुपित हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
अद्भुतेयं कथा तात वर्णिता कृपया हि नः॥ १
मुनौ गते हरिस्तात किञ्चकार ततः परम्।
नारदोऽपि गतः कुत्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सूतः पौराणिकोत्तमः।
प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा नानासूतिकरं बुधः॥ ३
सूत उवाच
मुनौ यदृच्छया विष्णुर्गते तस्मिन्हि जारदे।
शिवेच्छया चकाराशु मायां मायाविशारदः॥ ४
मुनिमार्गस्य मध्ये तु विरेचे जगरं महत्!
शतयोजनविस्तारमद्भुतं सुमनोहरम्॥ ५
ऋषिगण बोले--हे सूत! हे सूत! हे महाभाग!
हे व्यासशिष्य! आपको नमस्कार है। हे तात!
कृपापूर्वक आपने हम सभीको जो कथा सुनायी है,
यह निश्चित ही आश्चर्यजनक है॥ १॥
हे तात! मुनिके चले जानेके पश्चात् भगवान्
विष्णुने क्या किया और नारदजी कहाँ गये ? वह सब
आप हमलोगोंको बतायें॥ २॥
व्यासजी बोले-उन ऋषियोंकी बात
सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ तथा बुद्धिमान् सूतजी
नाना प्रकारकी सृष्टि करनेवाले शिवका स्मरण करके
कहने लगे-॥ ३॥
सूतजी बोले [हे महर्षियो!] उन नारदमुनिके
इच्छानुसार वहाँसे चले जानेपर भगवान् शिवको
इच्छासे मायाविशारद श्रीहरिने तत्काल अपनी माया
प्रकट की ॥ ४॥
उन्होंने मुनिके मार्गमें एक विशाल, सौ योजन
विस्तारवाले, अद्भुत तथा अत्यन्त मनोहर नगरकी
रचना की॥५॥
२०४
श्रीशिवमहापुराण
हि.
[अ ३
स्वलोकादधिकं रम्यं नानावस्तुविराजितम्।
जरनारीविहाराढ्यं चतुर्वर्णाकुलं परम्॥
शीलनिधिर्नामेश्वर्यसमन्वितः।
महोत्सवसमन्वितः॥ ७
तत्र राजा
सुतास्वयम्वरोद्युक्तो
चतुर्दिगभ्यः समायातैः संयुतं नृपनन्दनैः।
जानावेषैः सुशोभैश्च तत्कन्यावरणोत्सुकैः॥ ८
एतादृशं पुरं दृष्ट्वा मोहं प्राप्तोऽथ नारद: ।
कौतुकी तन्नृपद्वारं जगाम मदनैधितः॥ ९
आगतं मुनिवर्य तं दृष्ट्वा शीलनिधिर्नृपः।
उपवेश्यार्चयाञ्चक्रे रलसिंहासने वरे॥ १०
अथ राजा स्वतनयां नामतः श्रीमतीं वराम्।
जारदस्य समानीय पादयोः समपातयत्॥ ११
तत्कन्यां प्रेक्ष्य स मुनिर्नारदः प्राह विस्मित: ।
केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा॥ १२
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा प्राह कृताञ्जलिः।
दुहितेयं मम मुने श्रीमती नाम नामतः॥ १३
प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषती शुभम्।
सा स्वयम्बरसम्प्राप्ता सर्वलक्षणलक्षिता॥ १४
अस्या भाग्यं वद मुने सर्व जातकमादरात्।
कीदृशं तनयेयं मे वरमाप्स्यति तद्वद॥ १५
इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामिच्छुः कामविह्वलः।
समाभाष्य स राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्॥ १६
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भगवानूने उसे अपने वैकुण्ठलोकसे भी
अधिक रमणीय बनाया था। नाना प्रकारकी कस्तु
उस नगरकी शोभा बढ़ाती थीं। वहाँ स्त्रियों और
पुरुषोंके लिये बहुत-से विहारस्थल थे। वह नगर चारे
वर्णोके लोगोंसे युक्त था॥६॥
वहाँ शीलनिधि नामक ऐश्वर्यशाली राजा राज्य
करते थे। वे अपनी पुत्रीका स्वयंवर करनेके लिये
उद्यत थे। अतः उन्होंने महान् उत्सवका आयोजन
किया था। उनकी कन्याका वरण करनेके लिये
उत्सुक हो चारों दिशाओंसे बहुत-से राजकुमार आये
थे, जो नाना प्रकारकी वेशभूषा तथा सुन्दर शोभासे
प्रकाशित हो रहे थे। उन राजकुमारोंसे वह नगर भरा-
पूरा दिखायी देता था॥ ७-८॥
ऐसे राजनगरको देख नारदजी मोहित हो गये।
वे कौतुकी कामासक्त नारद राजा शीलनिधिके
द्वारपर गये ॥ ९॥
मुनिश्रेष्ठ नारदको आया देखकर राजा
शीलनिधिने उन्हें श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बिठाकर
उनका पूजन किया॥ १०॥
तत्पश्चात् राजाने श्रीमती नामक अपनी सुन्दरी
कन्याको बुलवाकर उससे नारदजीके चरणोंमें प्रणाम
करवाया॥ ११॥
उस कन्याको देखकर नारदमुनि चकित हो गये
और बोले-हे राजन्! यह देवकन्याके समान सुन्दरी
तथा महाभाग्यशालिनी कन्या कौन है ?॥ १२॥
उनको यह बात सुनकर राजाने हाथ
जोड़कर कहा-हे मुने! यह मेरी पुत्री है, इसका नाम
श्रीमती है॥ १३॥
अब इसके विवाहका समय आ गया है। गर्ह
अपने लिये सुन्दर वर चुननेके निमित्त स्वयंवरमें जानेवाली
है। इसमें सब प्रकारके शुभ लक्षण लक्षित होते हैं ॥ १४॥
हे महषें! आप जन्मस्थ जातक ग्रहोंके
इसका सम्पूर्ण भाग्य बतायें और यह मेरी पुत्री कैसा
वर प्राप्त करेगी, यह भी कहें ॥ १५॥
राजाके इस प्रकार पूछनेपर कामसे विहत
मुनिश्रेष्ठ नारद उस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छा
लिये राजाको सम्बोधित करके यह वाक्य बोले ॥ १६
न ३]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२०५
सुतेयं तव भूपाल सर्वलक्षणलक्षिता।
महाभाग्यवती धन्या लक्ष्मीरिव गुणालया॥ १७
सर्वेश्वरोऽजितो वीरो गिरीशसदूशो विभुः।
अस्याः पतिर्शुबं भावी कामजित्सुरसत्तमः॥ १८
इत्युक्त्वा नृपमामन्त्रय ययौ यादृच्छिको मुनि: ।
बभूव कामविवशः शिवमायाविमोहितः॥ १९
चित्ते विचिन्त्य स मुनिराण्नुयां कन्यकां कथम्।
स्वयम्वरे नृपालानामेकं मां वृणुयात्कथम्॥ २०
सौन्दर्यं सर्वनारीणां प्रियं भवति सर्वथा।
तद् दृष्ट्वैव प्रसन्ना सा स्ववशा नात्र संशय: ॥ २१
विधायेत्थं विष्णुरूपं ग्रहीतुं मुनिसत्तमः।
विष्णुलोकं जगामाशु नारदः स्मरविह्ृलः॥ २२
प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह।
रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि स्ववृत्तान्तमशेषतः॥ २३
तथेत्युक्ते तथाभूते शिवेच्छाकार्यकर्तरि।
बूहीत्युक्ततति श्रीशे मुनिराह च केशवम्॥ २४
नारद उवाच
त्वदीयो भूपतिः शीलनिधिः स वृषतत्परः।
तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती वरवर्णिनी॥
जगन्मोहिन्यभिख्याता त्रैलोक्येऽप्यतिसुन्दरी।
परिणेतुमहं विष्णो तामिच्छाम्यद्य मा चिरम्॥ २६
स्वयम्वरं चकारासौ भूपतिस्तनयेच्छया।
चतुर्दिग्भ्यः समायाता राजपुत्राः सहस्त्रशः ॥ २७
यदि दास्यसि रूपं मे तदा तां प्राणुयां शरुवम्।
त्वद्रूपं सा विना कण्ठे जयमालां न धास्यति॥ २८
हे भूपाल! आपकी यह पुत्री समस्त शुभ लक्षणोंसे
सम्पन्न, परम सौभाग्यवती, धन्य और साक्षात् लक्ष्मीको
भाँति समस्त गुणोंकी आगार है। इसका पति निश्चय
ही भगवान् शंकरके समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसीसे
पराजित न होनेवाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण
देवताओंमें श्रेष्ठ होगा ॥ १७-१८॥
ऐसा कहकर राजासे विदा लेकर इच्छानुसार
विचरनेवाले नारदमुनि बहाँसे चल दिये। वे कामके
बशीभूत हो गये थे। शिवकी मायाने उन्हें विशेष
मोहमें डाल दिया था॥ १९॥
वे मुनि मन-ही-मन सोचने लगे कि मैं इस
राजकुमारीको कैसे प्राप्त करूँ! स्वयंवरमें आये हुए
नरेशोंमेंसे सबको छोड़कर यह एकमात्र मेरा ही वरण
कैसे करें! ॥ २०॥
समस्त नारियोंको सौन्दर्य सर्वथा प्रिय होता है।
सौन्दर्यको देखकर ही वह प्रसन्नतापूर्वक मेरे अधीन हो
सकती है, इसमें संशय नहीं है । ऐसा विचारकर कामसे
विह्वल हुए मुनिवर नारद भगवान् विष्णुका रूप ग्रहण करनेके
लिये तत्काल उनके लोकमें जा पहुँचे ॥ २१-२२॥
वहाँ भगवान् विष्णुको प्रणाम करके वे यह
वचन बोले-[हे भगवन्!] मैं एकान्तमें आपसे
अपना सारा वृत्तान्त कहूँगा॥ २३॥
तब “बहुत अच्छा'-यह कहकर शिव-इच्छित
कर्म करनेवाले लक्ष्मीपति श्रीहरि नारदजीके साथ
एकान्तमें जा बैठे और बोले-हे मुने! अब आप अपनी
बात कहिये, तब केशवसे मुनि नारदजीने कहा ॥ २४॥
नारदजी बोले-हे भगवन्! आपके भक्त जो
राजा शीलनिधि हैं, वे सदा धर्मपालनमें तत्पर रहते
हैं। उनकी एक विशाललोचना कन्या है, जो बहुत
ही सुन्दरी है। उसका नाम श्रीमती है॥ २५॥
वह जगन्मोहिनीके रूपमें विख्यात है और तीनों
लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दरी है । हे विष्णो! आज मैं
शीघ्र ही उस कन्यासे विवाह करना चाहता हूँ॥ २६॥
राजा शीलनिधिने अपनी पुत्रीकी इच्छासे स्वयंवर
रचाया है, इसलिये चारों दिशाओंसे वहाँ हजारों राजकुमार
आये हुए हैं । यदि आप अपना रूप मुझे दे दें, तो मैं उसे
निश्चित ही प्राप्त कर लूँगा। आपके रूपके बिना वह
मेरे कण्ठमें जयमाला नहीं डालेगी ॥ २७-२८॥
२०६
श्रीशिवमहापुराण
ग
[अर डे
स्वरूपं देहि मे नाथ सेवकोऽहं प्रियस्तव।
वृणुयान्मां यथा सा वै श्रीमती क्षितिपात्मजा॥ २
सूत उवाच
वचः श्रुत्वा मुनेरित्थं विहस्य मधुसूदनः।
शाङ्करीं प्रभुतां बुध्वा प्रत्युवाच दयापरः॥ ३०
विष्णुरुवाच
स्वेष्टदेशं मुने गच्छ करिष्यामि हितं तव।
भिषग्वरो यथार्तस्य यतः प्रियतरोऽसि मे॥ ३१
इत्युक्त्वा मुनये तस्मै ददौ विष्णुर्मुखं हरेः।
स्वरूपमनुगृह्यास्य तिरोधानं जगाम सः॥ ३२
एवमुक्तो मुनिर्हृष्टः स्वरूपं प्राप्य वे हरेः।
मेने कृतार्थमात्मानं तद्यत्नं न बुबोध सः॥ ३३
अथ तत्र गतः शीघ्र नारदो मुनिसत्तमः।
चक्रे स्वयम्बरं यत्र राजपुत्रैः समाकुलम्॥ ३४
स्वयम्बरसभा दिव्या राजपुत्रसमावृता।
शुशुभेऽतीव विप्रेनद्रा यथा शक्रसभापरा॥ ३५
तस्यां नृपसभायां वै नारदः समुपाविशत्।
स्थित्वा तत्र विचित्तयेति प्रीतियुक्तेन चेतसा॥ ३६
मां वरिष्यति नान्यं सा विष्णुरूपधरं श्रुवम्।
आननस्य कुरूपत्वं न वेद मुनिसत्तमः॥ ३७
पूर्वरूपं मुनिं सर्वे ददृशुस्तत्र मानवाः।
तद्धेदं बुबुधुस्ते न राजपुत्रादयो द्विजाः ॥ ३८
तत्र रुद्रगणौ द्वौ तद्रक्षणार्थ समागतौ।
विप्ररूपधरौ गूढौ तद्भेदं जज्ञुः परम्॥ ३९
मूढं मत्वा मुनिं तौ तन्निकटं जग्मतुर्गणौ।
कुरुतस्तत्प्रहासं वै भाषमाणौ परस्परम्॥ ४०
वा पा हज आपका प्रिय सेवक हे 0 मुले >
हे नाथ! मैं आपका प्रिय सेवक हूँ, अत. आप
मुझे अपना स्वरूप दे दीजिये, जिससे वह राजकुमारी
श्रीमती निश्चय ही मुझे वरण कर ले॥ २९॥
सूतजी बोले--हे महर्षियो! नारदमुनिकी ऐसी
बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और शंकरके
प्रभावका अनुभव करके उन दयालु प्रभुने उन्हें इस
प्रकार उत्तर दिया॥ ३०॥
विष्णु बोले-हे मुने! आप अपने अभीष्ट स्थानको
जाइये, मैं उसी तरह आपका हितसाधन करूँगा, जैसे
श्रेष्ठ वैद्य [अत्यन्त] पीड़ित रोगीका हित करता है;
क्योंकि आप मुझे विशेष प्रिय हैं॥ ३१॥
ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने नारदमुनिको मुख
तो वानरका दे दिया और शेष अंगोंमें अपने-जैसा
स्वरूप देकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये॥ ३२॥
भगवानूको पूर्वोक्त बात सुनकर और उनका
मनोहर रूप प्राप्त हो गया--समझकर नारद मुनिको
बड़ा हर्ष हुआ। वे अपनेको कृतकृत्य मानने लगे,
किंतु भगवानूके प्रयत्नको वे समझ न सके ॥ ३३॥
तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र ही उस स्थानपर
जा पहुँचे, जहाँ राजा शीलनिधिने राजकुमारोंसे भरी
हुई स्वयंवरसभाका आयोजन किया था॥ ३४॥
है विप्रवरो! राजपुत्रोंसे घिरी हुई वह दिव्य
स्वयंवरसभा दूसरी इन्द्रसभाके समान अत्यन्त शोभा पा
रही थी॥ ३५॥
नारदजी उस राजसभामें जा बैठे और वहाँ बैठकर
प्रसन्न मनसे बार-बार यही सोचने लगे । मैं भगवान् विष्णुके
समान रूप धारण किये हूँ, अत: वह राजकुमारी अवश्य
मेरा ही वरण करेगी, दूसरेका नहीं । मुनिश्रेष्ठ नारदकी
यह ज्ञात नहीं था कि मेरा मुँह कुरूप है॥ ३६-२७॥
हे विप्रो! उस सभामें बैठे हुए सभी मनुष्योंने मुनिकी
उनके पूर्वरूपमें ही देखा। राजकुमार आदि कोई
उनके रूपपरिवर्तनके रहस्यको न जान सके ॥ ३८॥
वहाँ नारदजीकी रक्षाके लिये भगवान् रद्रके
गण आये थे, जो ब्राह्मणका रूप धारण करके गूर
वहाँ बैठे थे। वे ही नारदजीके रूपपरिवर्तनके उर
भेदको जानते थे। मुनिको कामावेशसे मूढ़ हुआ
वे दोनों गण उनके निकट गये और आपसमें
करते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे॥ ३९-४०॥
डे ३]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२०७
पश्य नारदरूपं हि विष्णोरिव महोत्तमम्।
मुखं तु वानरस्येव विकटं च भयङ्करम्॥ ४१
इच्छत्ययं नृपसुतां वृथैव स्मरमोहितः।
इत्युक्त्वा सच्छलं वाक्यमुपहासं प्रचक्रतुः ॥ ४२
न शुश्राव यथार्थ तु तद्वाक्यं स्मरविह्लः।
पर्यैक्षच्छीमतीं तां वै तल्लिप्सुमोहितो मुनिः ॥ ४३
एतस्मिन्नन्तरे भूपकन्या चान्तःपुरात्तु सा।
स्त्रीभिः समावृता तत्राजगाम वरवर्णिनी॥ ४४
मालां हिरण्मयीं रम्यामादाय शुभलक्षणा।
तत्र स्वयम्वरे रेजे स्थिता मध्ये रमेव सा॥ ४५
बभ्राम सा सभां सर्वा मालामादाय सुव्रता।
वरमन्वेषती तत्र स्वात्माभीष्टं नृपात्मजा॥ ४६
वानरास्यं विष्णुतनुं मुनिं दृष्ट्वा चुकोप सा।
दृष्टिं निवार्य च ततः प्रस्थिता प्रीतमानसा॥ ४७
न दृष्ट्वा स्ववरं तत्र त्रस्तासीन्मनेप्सितम्।
अन्तःसभास्थिता कस्मिन्नर्पयामास न स्त्रजम्॥ ४८
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुराजगाम नृपाकृतिः।
ज दृष्टः कैश्चिदपरैः केवलं सा ददर्श हि॥ ४९
अथ सा तं समालोक्य प्रसन्नवदनाम्बुजा।
अर्पयामास तत्कण्ठे तां मालां वरवर्णिनी॥
तामादाय ततो विष्णू राजरूपधरः प्रभुः।
अन्तर्धानमगात्सद्यः स्वस्थानं प्रययौ किल॥ ५१
सर्वे राजकुमाराश्च निराशाः श्रीमतीं प्रति।
मुनिस्तु विह्वलोऽतीव बभूव मदनातुरः ५२
देखो, नारदका रूप तो निश्चित ही भगवान् विष्णुके
समान श्रेष्ठ है, किंतु मुख वानरके समान विकट और
महाभयंकर। काममोहित ये व्यर्थमें ही राजपुत्रीको प्राप्त
करनेकी इच्छा कर रहे हैं । इस प्रकारकी कपटपूर्ण बातें
कहकर वे नारदका उपहास करने लगे ॥ ४१-४२॥
मुनि तो कामसे विह्वल थे, अतः उन्होंने उनकी
यथार्थ बात भी अनसुनी कर दी। वे मोहित हो उस
* श्रीमती ' को प्राप्त करनेकी इच्छासे उसके आगमनकी
प्रतीक्षा करने लगे ॥ ४३॥
इसी बीच स्त्रियोंसे घिरी हुई वह सुन्दरी राजकन्या
अन्तःपुरसे वहाँ आयी। अपने हाथमें सोनेको सुन्दर
माला लिये हुए वह शुभलक्षणा राजकुमारी स्वयंवरके
मध्यभागमें लक्ष्मीके समान खड़ी हुई अपूर्व शोभा पा
रही थी॥ ४४-४५॥
उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली बह भूपकन्या
हाथमें माला लेकर अपने मनके अनुरूप वरका अन्वेषण
करती हुई सारी सभामें भ्रमण करने लगी॥ ४६॥
नारदमुनिका भगवान् विष्णुके समान शरीर
और वानरःजैसा मुँह देखकर वह कुपित हो गयी और
उनकी ओरसे दृष्टि हटाकर प्रसन्न मनसे दूसरी ओर
चली गयी॥ ४७॥
स्वयंवरसभामें अपने मनोवांछित वर्को न देखकर
वह दुःखित हो गयी। राजकुमारी उस सभाके भीतर
चुपचाप खड़ी रह गयी और उसने किसीके गलेमें
जयमाला नहीं डाली ॥ ४८ ॥
इतनेमें राजाके समान वेशभूषा धारण किये हुए
भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे । किन्ही दूसरे लोगोंने उनको
वहाँ नहीं देखा, केवल उस कन्याने ही उन्हें देखा ॥ ४९ ॥
भगवानूको देखते ही उस परमसुन्दरी राजकुमारीका
मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उसने तत्काल ही उनके
कण्ठमें वह माला पहना दी॥ ५०॥
राजाका रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु
उस राजकुमारीको साथ लेकर तुरंत अदृश्य हो गये
और अपने धाममें जा पहुँचे॥५१॥
इधर, सब राजकुमार श्रीमतीकी ओरसे निराश
हो गये। नारदमुनि तो कामवेदनासे आतुर हो रहे थे,
इसलिये वे अत्यन्त विहल हो उठे॥५२॥
२०८
श्रीशिवमहापुराण
[3s x
तदा तावूचतुः सद्यो नारदं स्मरविह्वलम्।
विप्ररूपधरौ रुद्रगणो ज्ञानविशारदौ॥ ५३
गणावूचतुः
हे नारद मुने त्वं हि वृथा मदनमोहितः।
तल्लिप्सुः स्वमुखं पश्य वानरस्येव गर्हितम्॥ ५४
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य तयोर्वाक्यं नारदो विस्मितोऽभवत्
मुखं ददर्श मुकुरे शिवमायाविमोहितः॥ ५५
स्वमुखं वानरस्येव दृष्ट्वा चुक्रोध सत्वरम्।
शापं द॒दौ तयोस्तत्र गणयोरमोहितो मुनिः॥ ५६
युवां ममोपहासं वै चक्रतुर्ब्राह्मणस्य हि।
भवेतां राक्षसौ विप्रवीर्यजौ वै तदाकृती॥ ५७
श्रुत्वा हरगणावित्थं स्वशापं ज्ञानिसत्तमौ।
न किञ्चिदूचतुस्तौ हि मुनिमाज्ञाय मोहितम्॥ ५८
स्वस्थानं जग्मतुर्विप्रा उदासीनौ शिवस्तुतिम्।
चक्रतुर्मन्यमानौ वै शिवेच्छां सकलां सदा॥ ५९
तब वे दोनों विप्ररूपधारी ज्ञानविशारद
कामविहृल नारदजीसे कहने लगे- ॥५३॥
गण बोले-हे नारद! हे मुने! आप व्यर्थ ही
कामसे मोहित हो रहे हैं और [सौन्दर्यके बलसे]
राजकुमारीको पाना चाहते हैं। वानरके समान अपना
घृणित मुँह तो देख लीजिये॥ ५४॥
सूतजी बोले--हे महर्षियो! उन रुद्रगणोंका
यह वचन सुनकर नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ। बे
शिवकी मायासे मोहित थे । उन्होंने दर्पणमें अपना मुँह
देखा॥ ५५॥
वानरके समान अपना मुँह देखकर वे तुरंत
ही कुपित हो उठे और मायासे मोहित होनेके कारण
उन दोनों शिवगणोंको वहाँ यह शाप दे दिया-तुम
दोनोंने मुझ ब्राह्मणका उपहास किया है, अत: तुम
दोनों ब्राह्मणके वीर्यसे उत्पन्न राक्षस हो जाओ।
[ब्राह्मणकी सन्तान होनेपर भी] तुम्हारे आकार
राक्षसके समान ही होंगे॥ ५६-५७॥
इस प्रकार अपने लिये शाप सुनकर ज्ञानियोंमें
श्रेष्ठ वे दोनों शिवगण मुनिको मोहित जानकर कुछ
नहीं बोले ॥ ५८ ॥
हे ब्राह्मणो! वे सदा सब घटनाओंमें भगवान्
शिवको इच्छा मानते थे, अत: उदासीन भावसे अपने
स्थानको चले गये और भगवान् शिवकी स्तुति कणे
लगे॥ ५९ ॥
रुद्रगण
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदमोहवर्णनं नाम तृतीयोऽ ध्याय: ॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें
नारदमोहवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना, फिर मायाके दूर हो
जानेपर पश्चात्तापपूर्वक भगवानूके चरणोंमें गिरना और शुद्धिका उपाय पूछना तथा
भगवान् विष्णुका उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये
ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और शिवके भजनका उपदेश देना
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाप्राज्ञ वर्णिता ह्यद्धता कथा।
धन्या तु शाम्भवी माया तदधीनं चराचरम्॥ १
ऋषिगण बोले--हे महाप्राज्ञ! हे सूत ह आप
बड़ी अद्भुत कथाका वर्णन किया है । भगवान्
माया धन्य है। यह चराचर जगत् उसीके अधीन है॥ * ॥
ह ४]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२०९
गतयोर्गणयोः शम्भोः स्वयमात्पेच्छया विभोः ।
किञ्चकार मुनिः क्रुद्धो नारदः स्मरविह्वलः ॥ २
सूत उवाच
विमोहितो मुनिर्दत्त्वा तयोः शापं यथोचितम्।
जले मुखं निरीक्ष्याथ स्वरूपं गिरिशेच्छया॥ ३
शिवेच्छया न प्रबुद्धः स्मृत्वा हरिकृतच्छलम्।
क्रोधं दुर्विषहं कृत्वा विष्णुलोकं जगाम ह॥ ४
उवाच वचनं क्रुद्धः समिद्ध इव पावकः।
दुरुक्तिगर्भितं व्यङ्गं नष्टज्ञानः शिवेच्छया॥ ५
नारद उवाच
हे हरे त्वं महादुष्टः कपटी विश्वमोहनः।
परोत्साहं न सहसे मायावी मलिनाशयः॥ ६
मोहिनीरूपमादाय कपटं कृतवान्मुरा।
असुरेभ्योऽपाययस्त्वं वारुणीममृतं न हि॥ ७
चेत्पिबेन्न विषं रुद्रो दयां कृत्वा महेश्वरः।
भवेननष्टाखिला माया तव व्याजरते हरे॥ ८
गति: सकपटा तेऽतिप्रिया विष्णो विशेषतः।
साधुस्वभावो न भवान्स्वतन्न: प्रभुणा कृतः॥ ९
कृतं समुचितं नैव शिवेन परमात्मना।
तत्प्रभावबलं ध्यात्वा स्वतन्त्रकृतिकारकः॥ १
त्वद्गतिं सुसमाञ्ञाय पश्चात्तापमवाप सः।
विप्रं सर्वोपरि प्राह स्वोक्तवेदप्रमाणकृत्॥ १९
तज्ज्ञात्वाहं हरे त्वाद्य शिक्षयिष्यामि तद्बलात्
यथा न कुर्याः कुत्रापीदृशं कर्म कदाचन॥ १२
भगवान् शंकरके वे दोनों गण जब अपनी
इच्छासे [कहीं अन्यत्र] चले गये, तब कामविहल
और [अपमानसे] क्रुद्ध मुनि नारदने क्या किया ?॥ २॥
सूतजी बोले-शिवकी इच्छासे विमोहित [उस
राजकुमारीके प्रति विशेष आसक्ति होनेके कारण
अन्य अर्थ-अनर्थके ज्ञानसे रहित] मुनिने उन दोनोंको
यथोचित शाप देकर जलमें अपना मुख और स्वरूप
देखा॥ ३॥
शिव-इच्छाके कारण उन्हें ज्ञान नहीं हुआ और
विष्णुके द्वारा किये गये छलका स्मरण करके दुःसह
क्रोधमें आकर वे उसी समय विष्णुलोकमें जा पहुँचें।
शिवकी इच्छासे ज्ञान-शून्य तथा समिधायुक्त जल रही
अग्निके समान क्रुद्ध वे [नारद] विष्णुसे अत्यन्त
अप्रिय व्यंग्य वचन कहने लगे- ॥ ४-५॥
नारदजी बोले-हे हरे! तुम बड़े दुष्ट हो,
कपटी हो और समस्त विश्वको मोहमें डाले रहते हो।
दूसरोंका उत्साह तुमसे सहा नहीं जाता। तुम मायावी
हो और तुम्हारा अन्तःकरण मलिन है॥ ६॥
पूर्वकालमें तुमने मोहिनीरूप धारण करके कपट
किया, असुरोंको वारुणी मदिरा पिलायी और उन्हें
अमृत नहीं पीने दिया ॥७॥
'छल-कपटमें ही रत रहनेवाले हे हरे! यदि
महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते, तो तुम्हारी
सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती॥८॥
हे विष्णो! कपटपूर्ण चाल तुम्हें अधिक प्रिय
है। तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है, भगवान् शंकरने
तुम्हें स्वतन्त्र बना दिया है ॥ ९॥
परमात्मा शंकरके द्वारा ऐसा करके अच्छा नहीं
किया गया और तुम उनके प्रभावबलको जानकर
स्वतन्त्र होकर कार्य करते रहते हो। तुम्हारी इस
चाल-ढालको समझकर अब वे (भगवान् शिव) भी
पश्चात्ताप करते होंगे॥ १०९/२॥
अपनी वाणीरूप वेदकी प्रामाणिकता स्थापित
करनेवाले महादेवजीने ब्राह्मणको सर्वोपरि बताया है। .
हे हरे! इस बातको जानकर आज मैं बलपूर्वक तुम्हें
ऐसी सीख दूँगा, जिससे तुम फिर कभी कहीं भी ऐसा
कर्म नहीं कर सकोगे॥ ११-१२॥'
२१०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० शू
अद्यापि निर्भयस्त्वं हि सङ्गं नापस्तरस्विना।
इदानीं लप्स्यसे विष्णो फलं स्वकृतकर्मण: ॥ १
इत्थमुक्त्वा हरि सोऽथ मुनिर्मायाविमोहितः।
शशाप क्रोधनिर्विण्णो ब्रह्मतेजः प्रदर्शयन्॥ १४
स्त्रीकृते व्याकुलं विष्णो मामकाषीर्विमोहकः।
अन्वकार्षीः स्वरूपेण येन कापट्यकार्यकृत्॥ १५
तद्रूपेण मनुष्यस्त्वं भव तद्दुःखभुग्घरे।
यन्मुखं कृतवान्मे त्वं ते भवन्तु सहायिनः॥ १६
त्वं स्त्रीवियोगजं दुःखं लभस्व परदुःखदः।
मनुष्यगतिकः प्रायो भवाज्ञानविमोहितः॥ १७
इति शप्त्वा हरि मोहान्नारदोऽज्ञानमोहितः।
विष्णुर्जग्राह तं शापं प्रशंसन् शाम्भवीमजाम्॥ १८
अथ शम्भुर्महालीलो निश्चकर्ष विमोहिनीम्।
स्वमायां मोहितो ज्ञानी नारदोऽप्यभवद्यया॥ १९
अन्तर्हितायां मायायां पूर्ववन्मतिमानभूत्।
नारदो विस्मितमनाः प्राप्तबोधो निराकुलः ॥ २०
पश्चात्तापमवाप्याति निनिन्द स्वं मुहुर्मुहु: ।
प्रशशंस तदा मायां शाम्भवीं ज्ञानिमोहिनीम्॥ २१
अथ ज्ञात्वा मुनिः सर्व मायाविभ्रममात्मनः।
`= अपतत्पादयोर्विष्णोर्नारदो वैष्णवोत्तमः॥ २२
आका आ ््् फ _फ_ न
अबतक किसी तेजस्वी पुरुषसे तुम्हारा पाला
नहीं पड़ा था, इसलिये आजतक तुम निडर बने
हो, परंतु हे विष्णो! अब तुम्हें अपने द्वारा किये गये
कर्मका फल मिलेगा॥ १३॥
भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर मायामोहित नारद
मुनि अपने ब्रह्मतेजका प्रदर्शन करते हुए क्रोधसे खिन
हो उठे और शाप देते हुए बोले-॥ १४॥
हे विष्णो! तुमने स्त्रीके लिये मुझे व्याकुल
किया है। तुम इसी तरह सबको मोहमें डालते रहते
हो। यह कपटपूर्ण कार्य करते हुए तुमने जिस
स्वरूपसे मुझे संयुक्त किया था, उसी स्वरूपसे हे होरे!
तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्रीके लिये दूसरोंको दु:ख
देनेवाले तुम भी स्त्रीके वियोगका दुःख भोगो। तुमने
जिन वानरोंके समान मेरा मुँह बनाया था, वे ही उस
समय तुम्हारे सहायक हों। तुम दूसरोंको [स्त्री-
विरहका] दुःख देनेवाले हो, अत: स्वयं भी तुम्हें
स्त्रीके वियोगका दुःख प्राप्त हो और अज्ञानसे मोहित
मनुष्योंके समान तुम्हारी स्थिति हो॥ १५--१७॥
अज्ञानसे मोहित हुए नारदजीने मोहवश श्रीहरिको
जब इस तरह शाप दिया, तब उन विष्णुने
शम्भुकी मायाकी प्रशंसा करते हुए उस शापको
स्वीकार कर लिया॥ १८॥
तदनन्तर महालीला करनेवाले शम्भुने अपनी
उस विश्वमोहिनी मायाको, जिसके कारण ज्ञानी
नारदमुनि भी मोहित हो गये थे, खींच लिया॥ १९॥
उस मायाके तिरोहित होते ही नारदजी पूर्ववत्
शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो गये। उन्हें पूर्ववत् ज्ञान प्राप्त
हो गया और उनकी सारी व्याकुलता जाती रही।
इससे उनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ॥ २०॥
वे पश्चात्ताप करके बार-बार अपनी निन्दा करी
लगे। उस समय उन्होंने ज्ञानीको भी मोहमें
भगवान् शम्भुको मायाकी सराहना की॥ २१॥
तदनन्तर यह जानकर कि मायाके कारण हीं
भ्रममें पड़ गया था, वैष्णबशिरोमणि नारदजी भर्व
विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े॥ २२॥
ड ४]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२११
हर्युपस्थापितः प्राह वचनं नष्टदुर्मति: ।
मया दुरुक्तयः प्रोक्ता मोहितेन कुबुद्धिना ॥ २३
दत्तः शापोऽपि ते नाथ वितथं कुरु तं प्रभो।
महत्पापमकार्ष हि यास्यामि निरयं श्रुवम्॥ २४
कमुपायं हरे कुर्या दासोऽहं ते तमादिश।
येन पापकुलं नश्येन्निरयो न भवेन्मम॥ २५
इत्युक्त्वा स पुनर्विष्णोः पादयोर्मुनिसत्तमः।
पपात सुमतिर्भक्त्या पश्चात्तापमुपागतः॥ २६
अथ विष्णुस्तमुत्थाप्य बभाषे सूनृतं वचः।
विष्णुरुवाच
न खेदं कुरु मे भक्तवरस्त्वं नात्र संशयः ॥ २७
श्रुणु तात प्रवक्ष्यामि सुहितं तव निश्चयात्।
निरस्ते न भविता शिवः शं ते विधास्यति॥ २८
यदकार्षीः शिववचो वितथं मदमोहितः।
स दत्तवानीदूशं ते फलं कर्मफलप्रदः॥ २९
शिवेच्छयाखिलं जातं कुर्वित्थं निश्चितां मतिम्।
गर्वापहर्ता स स्वामी शङ्करः परमेश्वरः ॥ ३०
परं ब्रह्म परात्मा स सच्चिदानन्दबोधनः।
निर्गुणो निर्विकारी च रजःसत्त्वतमःपरः॥
स एवादाय मायां स्वां त्रिधा भवति रूपतः।
ब्रह्मविष्णुमहेशात्मा निर्गुणोऽनिर्गुणोऽपि सः ॥ ३२
निर्गुणत्वे शिवाह्यो हि परमात्मा महेश्वरः।
परं ब्रह्माव्ययोऽनन्तो महादेवेति गीयते॥ ३३
तत्सेवया विधिः स्त्रष्टा पालको जगतामहम्।
स्वयं सर्वस्य संहारी रुद्ररूपेण सर्वदा॥ ३४
भगवान् श्रीहरिने उन्हें उठाकर खड़ा कर दिया। उस
समय अपनी दुर्बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण वे बोले
मायासे मोहित होनेके कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी,
इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत दुर्वचन कहे हैं। हे
नाथ! मैंने आपको शाप तक दे डाला है। हे प्रभो! उस
शापको आप मिथ्या कर दीजिये । हाय ! मैंने बहुत बड़ा
पाप किया है, अब मैं निश्चय ही नरकमें पड़ँगा। हे
हरे! मैं आपका दास हूँ | अतः बताइये, मैं क्या उपाय--
कौन-सा प्रायश्चित्त करूँ, जिससे मेरा पाप-समूह नष्ट
हो जाय और मुझे नरकमें न गिरना पडे ॥ २३--२५॥
ऐसा कहकर शुद्ध बुद्धिवाले मुनिशिरोमणि नारदजी
पुन: भक्तिभावसे भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े।
उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था । तब श्रीविष्णु
उन्हें उठाकर मधुर वाणीमें कहने लगे-॥ २६/२॥
विष्णु बोले-हे तात! खेद मत कीजिये। आप
मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं, इसमें संशय नहीं है। मैं आपको एक
बात बताता हूँ, सुनिये । उससे निश्चय ही आपका परम
हित होगा, आपको नरकमें नहीं जाना पड़ेगा । भगवान्
शिव आपका कल्याण करेंगे॥ २७-२८॥
आपने मदसे मोहित होकर जो भगवान् शिवकी
बात नहीं मानी थी-उसकी अवहेलना कर दी थी,
उसी अपराधका ऐसा फल भगवान् शिवने आपको
दिया है, क्योंकि वे ही कर्मफलके दाता हैं ॥ २९॥
आप अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लीजिये कि
भगवान् शिवकी इच्छासे ही यह सब कुछ हुआ है। सबके
स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्वको दूर करनेवाले हैं ॥ ३०॥
वे ही परब्रह्म हैं, परमात्मा हैं, उन्हींका सच्चिदानन्द
रूपसें बोध होता है, वे निर्गुण हैं, निर्विकार हैं और
सत्त्व, रज तथा तम--इन तीनों गुणोंसे परे हैं ॥ ३१॥
वे ही अपनी मायाको लेकर ब्रह्मा, विष्णु और
महेश-इन तीन रूपोंमें प्रकट होते हैं। निर्गुण और
सगुण भी वे ही हैं॥ ३२॥
निर्गुण अबस्थामें उन्हींका नाम शिव है। वे ही
परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त और
महादेव आदि नामोंसे कहे जाते हैं॥ ३३॥
उन्हींकी सेवासे ब्रह्माजी जगतूके ष्टा हुए हैं,
मैं तीनों लोकोंका पालन करता हूँ और वे स्वयं ही
रुद्ररूपसे सदा सबका संहार करते हैं॥ ३४॥
२१२
श्रीशिवमहापुराण
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साक्षी शिवस्वरूपेण मायाभिन्नः स निर्गुणः ।
स्वेच्छाचारी संविहारी भक्तानुग्रहकारकः॥
श्रृणु त्वं नारद मुने सदुपायं सुखप्रदम्।
सर्वपापापहर्तार भुक्तिमुक्तिप्रद सदा॥ ३६
त्यक्त्वा स्वसंशयं सर्व गायन् शङ्करसद्यशः।
शतनामशिवस्तोत्रं सदानन्यमतिर्जप॥ ३७
यज्पित्वा द्रुतं सर्व तव पापं विनश्यति।
इत्युक्त्वा नारदं विष्णुः पुनः प्राह दयान्वितः ॥ ३८
मुने न कुरु शोकं त्वं त्वया किञ्चित्कृतं न हि।
स्वेच्छया कृतवान्शाम्भुरिदं सर्व न संशयः॥ ३९
अहार्षीत्त्वन्मतिं दिव्यां कामक्लेशमदात्स ते।
त्वन्मुखाद्दापयाञ्चक्रे शापं मे स महेश्वरः ॥ ४०
इत्थं स्वचरितं लोके प्रकटीकृतवान् स्वयम्।
मृत्यु्जयः कालकालो भक्तोद्धारपरायणः॥ ४१
न मे शिवसमानोऽस्ति प्रियः स्वामी सुखप्रदः ।
सर्वशक्तिप्रदो मेऽस्ति स एव परमेश्वर: ॥ ४२
तस्योपास्यां कुरु मुने तमेव सततं भज।
तद्यशः श्रृणु गाय त्वं कुरु नित्यं तदर्चनम्॥ ४३
कायेन मनसा वाचा यः शङ्करमुपैति भोः।
स पण्डित इति ज्ञेयः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ४४
शिवेति नामदावाग्नर्महापातकपर्वताः।
भस्मीभवन्त्यनायासात्सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ४५
वे शिवस्वरूपसे सबके साक्षी हैं, साक्षी शिवस्वरूपेण मायाभिनः स निुणः। | ` चे शिवस्वरूपे सबके साक्षी हे, मायाते १
और निर्गुण हैं । स्वतन्त्र होनेके कारण वे अपनी
इच्छाके अनुसार चलते हैं। उनका विहार-आचार
व्यवहार उत्तम हैं और वे भक्तोंपर दया करनेवाले
हैं॥ ३५॥
हे नारद मुने ! मैं आपको एक सुन्दर उपाय बताता
हूँ, जो सुखद, समस्त पापोंका नाश करनेवाला और
सदा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है, आप उसे सुनिये॥ ३६॥
अपने समस्त संशयोंको त्यागकर आप
शंकरके सुयशका गान कीजिये और सदा अनन्यभावसे
शिवके शतनामस्तोत्रका पाठ कीजिये। जिसका
पाठ करनेसे आपके समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो
जायँगे॥ ३७१/२॥
इस प्रकार नारदसे कहकर दयालु भगवान् विष्णुने
उनसे पुन: कहा-हे मुने! आप शोक न करें । आपने तो
कुछ किया ही नहीं है। यह सब तो भगवान् शंकरने अपनी
इच्छासे किया है । इसमें शंका नहीं है॥ ३८-३९॥
उन्होंने ही आपकी दिव्य बुद्धिका हरण कर
लिया था। उन्होंने ही आपको कामका कष्ट भी दिया
और उन्हीं भगवान् शंकरने आपके मुखसे मुझे यह
शाप भी दिलाया है॥ ४०॥
इस प्रकार उन्होंने संसारमें अपने चरित्रको स्वयं
प्रकट किया है [इसमें अन्य किसीका दोष नहीं है]।
वे मृत्युको जीतनेवाले, कालके भी काल और
भक्तोंका उद्धार करनेमें तत्पर रहनेवाले हँ ॥ ४१॥
मुझे शिवके समान अन्य कोई प्रिय नहीं है | वे
ही मेरे स्वामी हैं, सुख और शक्ति देनेवाले हैं। वे
महेश्वर ही मेरे सब कुछ हैं॥ ४२॥
हे मुने! आप उन्हींकी उपासना करें, सदैव
उन्हींका भजन करें, उन्हींके यशका श्रवण और गात
करें तथा नित्य उन्हींकी अर्चना करें॥ ४३॥
हे मुने! जो शरीर, मन तथा वाणीसे शंकरकी
प्राप्त कर लेता है, वही पण्डित है--ऐसा जाना
चाहिये और वही जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ ४४
शिव-नामरूपी इस दावाग्निसे
पर्वत अनायास ही जलकर भस्म हो जाते हैं, ब
पूर्णतया सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४५॥
ड ४]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२१३
पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपि तान्यतः।
शिवार्चनैकनश्यानि नान्यनश्यानि सर्वथा॥ ४६
स वैदिकः स पुण्यात्मा स धन्यः स बुधो मुने।
यः सदा कायवाक् चित्ते: शरणं याति शङ्करम्॥ ४७
भवन्ति विविधा धर्मा येषां सद्यः फलोन्मुखाः ।
तेषां भवति विश्वासस्त्रपुरान्तकपूजने॥ ४८
पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवपूजया।
भुवि तावन्ति पापानि न सन्त्येव महामुने॥ ४९
ब्रह्महत्यादिपापानां राशयोऽप्यमिता मुने।
शिवस्मृत्या विनश्यन्ति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ५०
शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ते।
संसारमूलपापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम्॥ ५९
संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने।
शिवनामकुठारेण विनाशो जायते श्रुवम्॥ ५२
शिवनामामृतं पेयं पापदावानलार्दितैः।
पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि॥ ५३
शिवेति नामपीयूषवर्षधारापरिप्लुताः ।
संसारदवमध्येऽपि न शोचन्ति न संशयः ॥ ५४
न भक्तिः शङ्करे पुंसां रागद्वेषरतात्मनाम्।
तद्विरुद्धजनानां हि मुक्तिर्भवति सर्वथा॥
अनन्तजन्मभिर्येन तपस्तप्तं भविष्यति
तस्यै भक्तिर्भवति भवानीप्राणवल्लभे॥ ५६
जातापि शङ्करे भक्तिरन्यसाधारणी वृथा।
परं त्वव्यभिचारेण शिवभक्तिरपेक्षिता॥ ५७
संसारमें पापोंके मूलभूत जितने भी प्रकारके दुःख
हैं, वे सर्वथा मात्र शिवपूजनसे ही नष्ट हो जाते हैं।
अन्य उपायोंसे [उनका] नाश सम्भव नहीं है ॥ ४६॥
हे मुने! वही वैदिक है, वही पुण्यात्मा है, वही
धन्य है और वही बुद्धिमान् है, जो सदा शरीर, वाणी
और मनसे भगवान् शंकरकी शरणमें चला जाता है ॥ ४७॥
जिनके विविध प्रकारके धर्मकृत्य तत्काल
फलोन्मुख (फल देनेवाले) होते हैं, उनका पूर्ण
विश्वास त्रिपुरके विनाशक शिवमें होता है ॥ ४८ ॥
महामुने! शिवकी पूजासे जितने पाप नष्ट हो
जाते हैं, उतने पाप तो पृथ्वीमें हैं ही नहीं॥ ४९ ॥
हे मुने! ब्रह्महत्यादि पापोंकी अपरिमित राशियाँ
भी शिवका स्मरण करनेसे नष्ट हो जाती हैं, यह मैं
पूर्ण सत्य कह रहा हूँ॥ ५०॥
शिव-नामका कीर्तन करनेवाले लोग ही
शिवनामकी नौकासे संसाररूपी सागरको पार कर
जाते हैं। संसारका मूल पाप-समूह है, उसका नाश
नामकीर्तनसे निश्चित ही हो जाता है॥५१॥
हे महामुने! शिवनामरूपी कुठारसे संसारके
मूलभूत पापोंका नाश अवश्य हो जाता है॥ ५२॥
पापरूपी दावानलसे दग्ध हुए लोगोंको शिव-
नामरूपी अमृत पीना चाहिये, पापकी दावाग्निसे तपे
हुए लोगोंको उसके बिना शान्ति देनेका कोई अन्य
उपाय नहीं मिल सकता॥ ५३॥
शिव--इस नामकी अमृतमयी वर्षाकी धारासे नहाये
हुए लोग संसारके पापोंकी दावाग्निके मध्य रहते हुए
भी शोक नहीं करते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ५४॥
राग-द्वेषमें निरन्तर लगे रहनेवाले लोगोंकी शिवके
प्रति भक्ति नहीं होती है, किंतु इसके विपरीत अर्थात्
पापोंसे विरत रहनेवाले लोगोंकी मुक्ति तो निश्चित ही
होती है॥५५॥
जिसने अनन्त जन्मोंमें अपनी तपस्यासे शरीरको
जलाया होगा, उसीकी भक्ति भवानीप्राणवल्लभ शिवके
लिये सम्भव है॥५६॥
भगवान् शिवके प्रति अनन्यतापूर्वक की गयी
“शिव-नाम-भक्ति' के अतिरिक्त अन्य साधारण भक्ति
व्यर्थ ही हो जाती है ॥ ५७॥
२१४
श्रीशिवमहापुराण
[ अठ ¥
यस्यासाधारणी शम्भौ भक्तिरव्यभिचारिणी।
तस्यैव मोक्षः सुलभो नान्यस्येति मतिर्मम॥
कृत्वाप्यनन्तपापानि यदि भक्तिर्महेश्वरे।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवत्येव न संशय: ॥ ५९
भवन्ति भस्मसाद् वृक्षा दवदग्धा यथा वने।
तथा भवन्ति दग्धानि शाङ्कराणामघान्यपि॥ ६०
यो नित्यं भस्मपूताङ्गो शिवपूजोन्मुखो भवेत्।
स तरत्येव संसारमपारमतिदारुणम्॥ ६१
ब्रह्मस्वहरणं कृत्वा हत्वापि ब्राह्मणान्बहून्।
न लिप्यते नरः पापेर्विरूपाक्षस्य सेवक:॥ ६२
विलोक्य वेदानखिलान् शिवस्यैवार्चनं परम्।
संसारनाशनोपाय इति पूर्वैर्विनिश्चितम्॥ ६३
अद्यप्रभृति यलेन सावधानो यथाविधि।
साम्बं सदाशिवं भक्त्या भज नित्यं महेश्वरम्॥ ६४
आपादमस्तकं सम्यग्भस्मनोदधूल्य सादरम्।
सर्वश्रुतिश्रुत॑ शैवं मन्त्रं जप षडक्षरम्॥ ६५
स्वाङ्गेषु प्रयलेन रुद्राक्षान् शिववल्लभान्।
धारयस्वातिसद्भक्त्या समन्त्रं विधिपूर्वकम् ॥ ६६
शृणु शैवीं कथां नित्यं वद शैवीं कथां सदा।
पूजयस्वातियत्लेन शिवभक्तान्पुनः पुनः॥ ६७
अप्रमादेन सततं शिवैकशरणो भव।
शिवार्चनेन सततमानन्दः प्राप्यते यतः॥ ६८
भगवान् शिवके प्रति जिसकी वस्वासाधारणी शम्भौ भक्तिरव्यभिचारिणी। | भवान् शके प्रति जिसकी भक्ति एक
तथा असाधारण होती है, उसको ही मोक्ष प्राप्त होता
है। अन्यके लिये वह सुलभ नहीं है-ऐसा मेरा
विश्वास है॥५८॥
अनन्त पाप करनेके पश्चात् भी यदि प्राणी भगवान्
शंकरमें भक्ति करने लगता है, तो वह सभी पापोंसे
निर्मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५९॥
जिस प्रकार वनमें दावाग्निसे वृक्ष [जलकर]
भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार शिव-भक्तोंके पाप भी
[शिव-भक्तिके प्रभावसे] नष्ट हो जाते हैं॥६०॥
जो मनुष्य नित्य अपने शरीरको भस्मसे पवित्रकर
शिवकी पूजामें लगा रहता है, वह महान् कष्ट
देनेवाले संसाररूपी अपार सागरको निश्चित ही पार
कर जाता है॥ ६१॥
ब्राह्मणोंका धन हरण करके और बहुतसे
ब्राह्मणोंको हत्या करके भी जो मनुष्य विरूपाक्ष
भगवान् शंकरकी सेवामें लग जाता है, उसे उन
पापोंसे लिप्त नहीं होना पड़ता॥ ६२॥
सम्पूर्ण वेदोंका अवलोकन करके पूर्ववर्ती
विद्ठानोंने यही निश्चय किया है कि भगवान् शिवकी
पूजा ही संसार-बन्धनके नाशका उपाय है॥६३॥
[हे मुने!] आजसे यत्लपूर्वक सावधान रहकर
विधि-विधानके साथ भक्तिभावसे नित्य जगदम्बा
पार्वतीसहित महेश्वर सदाशिवका भजन कीजिये॥ ६४॥
पैरसे लेकर सिरतक भस्मका लेपन करके
सम्यक् रूपसे आदरपूर्वक सभी श्रुतियोंसे सुने गये
षडक्षर शैव-मन्त्र (३ नमः शिवाय)-का जप
कीजिये ॥ ६५ ॥
प्रयत्नपूर्वक [बताये गये नियमानुसार] भगवा
शिवके प्रिय रुद्राक्षको धारण करके अत्यन्त सद्भि
ही सविधि मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ ६६॥
नित्य शिवकी ही कथा सुनिये और कहिे।
ma यल करके बारम्बार शिव-भक्तोंका पूर्ग
या कोजिये ॥ ६७॥
प्रमादसे रहित होकर सदा एकमात्र शिवकी
शरणमें रहिये, क्योंकि शिवके पूजनसे ही
आनन्द प्राप्त होता रहता है॥ ६८॥
५]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२१५
= क्ला ७ MS
उरस्याधाय विशदे शिवस्य चरणाम्बुजौ।
शिवतीर्थानि विचर प्रथमं मुनिसत्तम॥ ६९
पश्यन्माहात्म्यमतुल॑ शङ्करस्य परात्मन: ।
गच्छानन्दवनं पश्चाच्छम्भुप्रियतमं मुने॥ ७०
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा पूजनं कुरु भक्तितः।
नत्वा स्तुत्वा विशेषेण निर्विकल्पो भविष्यसि ॥ ७१
ततश्च भवता नूनं विधेयं गमनं मुने।
ब्रह्मलोके स्वकामार्थं शासनान्मम भक्तितः॥ ७२
नत्वा स्तुत्वा विशेषेण विधिं स्वजनकं मुने।
प्रष्टव्यं शिवमाहात्म्यं बहुशः प्रीतचेतसा॥ ७३
स शैवप्रबरो ब्रह्मा माहात्म्यं शङ्करस्य ते।
श्राबयिष्यति सुप्रीत्या शतनामस्तवं च हि॥ ७४
अद्यतस्त्वं भव मुने शैवः शिवपरायणः।
मुक्तिभागी विशेषेण शिवस्ते शं विधास्यति॥ ७५
इत्थं विष्णुर्मुनिं प्रीत्या ह्युपदिश्य प्रसनधीः।
समृत्वा नुत्वा शिवं स्तुत्वा ततस्त्वन्तरधीयत॥ ७६
हे मुनिश्रेष्ठ! अपने हृदयमें भगवान् शिवके
उज्चल चरणारविन्दोंकी स्थापना करके पहले शिवके
तीर्थोमें विचरण कीजिये॥ ६९॥
हे मुने! इस प्रकार परमात्मा शंकरके अनुपम
माहात्म्यका दर्शन करते हुए, अन्तमें आनन्दवन
(काशी) जाइये, वह स्थान भगवान् शिवको बहुत ही
प्रिय है ॥ ७०॥
वहाँ विश्वनाथजीका दर्शन करके भक्तिपूर्वक
उनकी पूजा कीजिये। विशेषतः उनकी स्तुति-वन्दना
करके आप निर्विकल्प (संशयरहित) हो जायँगे॥ ७१॥
है मुने! इसके बाद आपको मेरी आज्ञासे
भक्तिपूर्वक अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये निश्चय ही
ब्रह्मलोकमें जाना चाहिये ॥७२॥
हे मुने ! वहाँ अपने पिता ब्रह्माजीकी विशेषरूपसे
स्तुति-वन्दना करके आपको प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे बारम्बार
शिव-महिमाके विषयमें प्रश्न करना चाहिये॥ ७३ ॥
ब्रह्माजी शिव-भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं, वे आपको
अत्यन्त प्रसन्नताके साथ भगवान् शंकरका माहात्म्य
और शतनाम-स्तोत्र सुनायेंगे ॥\७४॥
हे मुने! आजसे आप शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले
शिवभक्त हो जाइये और विशेषरूपसे मोक्षके भागी
बनिये। भगवान् शिव आपका कल्याण करेंगे ॥ ७५॥
इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए भगवान् विष्णु
नारदमुनिको प्रेमपूर्वक उपदेश देकर शिवजीका स्मरण,
वन्दन और स्तवन करके वहाँसे अन्तर्धान हो गये॥ ७६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदाय
विष्णूपदेशवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुब्रसंहिताके प्रथम खण्डमें
नारदः विष्णु-उपदेश-वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
— or re
अथ पञ्चमोऽध्यायः
नारदजीका शिवतीर्थोमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा
ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमे प्रश्न करना
सूत उवाच
अन्तर्हिते हरौ विप्रा नारदो मुनिसत्तमः।
सूतजी बोले--मह्षियो! भगवान् श्रीहरिके
अन्तर्धान हो जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारद शिवलिंगोंका
विचचार महीं पश्यन् शिवलिङ्गानि भक्तितः॥ १ भक्तिपूर्वक दर्शन करते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे॥ १॥
२१६
श्रीशिवमहापुराण
[आ० Sole IN
पृथिव्या अटनं कृत्वा शिवरूपाण्यनेकशः।
ददर्श प्रीतितो विप्रा भुक्तिमुक्तिप्रदानि सः॥
अथ तं विचरन्तं कौ नारदं दिव्यदर्शनम्।
ज्ञात्वा शम्भुगणौ तौ तु सुचित्तमुपजग्मतुः॥ ३
शिरसा सुप्रणम्याशु गणावूचतुरादरात्।
गृहीत्वा चरणौ तस्य शापोद्धारेच्छया च तो॥ ४
शिवगणावूचुः
ब्रह्मपुत्र सुरर्षे हि श्रृणु प्रीत्यावयोर्वचः।
तवापराधकर्तारावावां विप्रौ न वस्तुतः॥ ५
आवां हरगणौ विप्र तवागस्कारिणौ मुने।
स्वयम्वरे राजपुत्र्या मायामोहितचेतसा॥ ६
त्वया दत्तश्च नौ शापः परेशप्रेरितेन ह।
जञात्वा कुसमयं तत्र मौनमेव हि जीवनम्॥ ७
स्वकर्मणः फलं प्राप्तं कस्यापि न हि दूषणम्।
सुप्रसन्नो भव विभो कुर्वनुग्रहमद्य नौ॥ ८
सूत उवाच
वच आकर्ण्य गणयोरिति भक्त्युक्तमादरात्।
प्रत्युवाच मुनिः प्रीत्या पश्चात्तापमवाप्य स:॥ ९
नारद उवाच
शृणुतं मे महादेवगणौ मान्यतमौ सताम्।
वचनं सुखदं मोहनि्मुक्तं च यथार्थकम्॥ १०
पुरा मम ।
सर्वथा मोहमापन्न: शप्तवान्वां तदि ११
यदुक्तं तत्तथा भावि तथापि श्रृणुतां गणौ।
शापोद्धारमहं वच्मि क्षमेथामघमद्य मे॥ १२
क
ब्राह्मणो! भूमण्डलपर घूम-फिरकर उन्होंने
और मोक्ष देनेवाले बहुतसे शिवलिंगोंका प्रेमपूर्वक
दर्शन किया॥२॥
दिव्यदर्शी नारदजी भूतलके तीर्थोमें विचर रहे है
और इस समय उनका चित्त शुद्ध है--यह जानकर
वे दोनों शिवगण उनके पास गये॥ ३॥
वे दोनों शिवगण शापसे उद्धारकी इच्छासे
आदरपूर्वक मस्तक झुकाकर भलीभाँति प्रणाम करके
मुनिके दोनों पैर पकड़कर आदरपूर्वक उनसे कहने
लगे ॥ ४॥
शिवगण बोले-हे ब्रह्मपुत्र देवर्षे ! प्रेमपूर्वक
हम दोनोंकी बातोंको सुनिये। वास्तवमें हम दोनों ही
आपका अपराध करनेवाले हैं, ब्राह्मण नहीं हैं ॥५॥
हे मुने! हे विप्र! आपका अपराध करनेवाले हम
दोनों शिवके गण हैं । राजकुमारी श्रीमतीके स्वयंवरमें
आपका चित्त मायासे मोहित हो रहा था। उस समय
परमेश्वरकी प्रेरणासे आपने हम दोनोंको शाप दे
दिया। वहाँ कुसमय जानकर हमने चुप रह जाना ही
अपनी जीवन-रक्षाका उपाय समझा॥ ६-७॥
इसमें किसीका दोष नहीं है। हमें अपने कर्मका
ही फल प्राप्त हुआ है। प्रभो! अब आप प्रसन्न होइये
और हम दोनोंपर अनुग्रह कीजिये॥ ८॥
सूतजी बोले--उन दोनों गणोंके द्वारा भक्तिपूर्वक
कहे गये वचनोंको सुनकर पश्चात्ताप करते हुए देवर्ष
नारद प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ९॥
नारदजी बोले--आप दोनों महादेवके गण हैं
और सत्पुरुषोंके लिये परम सम्माननीय हैं, अतः मेरे
मोहरहित एवं सुखदायक यथार्थ वचनको सुतिये॥ १०॥
पहले निश्चय ही शिवेच्छावश मेरी बुद्धि १
हो गयी थी और मैं सर्वथा मोहके वशीभूत हो गी
था। इसीलिये आप दोनोंको कुबुद्धिवाले मैंने शाप दै
दिया॥ ११॥
हे शिवगणो! मैंने जो कुछ कहा है, वह बै
ही होगा, फिर भी मेरी बात सुनें। मैं आपके
शापोद्धारकी बात बता रहा हूँ। आपलोग आर्ज
अपराधको क्षमा कर दें॥ १२॥
EF ५]
वीर्यान्मुनिवरस्याप्त्वा
स्यातां विभवसंयुक्तो बलिनौ सुप्रतापिनौ॥ १३
सर्वब्रह्माण्डराजानो शिवभक्तौ जितेन्द्रियौ।
शिवापरतनोर्मृत्युं प्राप्य स्वं पदमाप्स्यथः॥ १४
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य मुनेर्वाक्यं नारदस्य महात्मन: ।
उभौ हरगणौ प्रीतो स्वं पदं जग्मतुर्मुदा॥ १५
नारदोऽपि परं प्रीतो ध्यायन् शिवमनन्यधीः।
विचचार महीं पश्यन् शिवतीर्थान्यभीक्ष्णशः॥ १६
काशीं प्राप्याथ स मुनिः सर्वोपरिविराजिताम्।
शिवप्रियां शम्भुसुखप्रदां शम्भुस्वरूपिणीम्॥ १७
दृष्ट्वा काशीं कृतार्थो$भूत्काशीनाथं ददर्श ह।
आनर्च परमप्रीत्या परमानन्दसंयुतः॥ १८
समुदः सेव्य तां काशीं कृतार्थो मुनिसत्तमः।
जमन्संवर्णयन्भक्त्या संस्मरन्प्रेमविहृलः॥ १९
ब्रह्मलोकं जगामाथ शिवस्मरणसन्मतिः।
शिवतत्त्वं विशेषेण ज्ञातुमिच्छुः स नारदः॥ २०
नत्वा तत्र विधिं भक्त्या स्तुत्वा च विविधेस्तवे: ।
पप्रच्छ शिवसत्तत्त्व शिवसंयुक्तमानसः॥ २१
नारद उवाच
ब्रह्मन्ब्रह्मस्वरूपज्ञ पितामह जगत्प्रभो।
त्वत्प्रसादान्मया सर्व विष्णोर्माहात्प्यमुत्तमम्॥ २२
भक्तिमार्ग ज्ञानमार्ग तपोमार्ग सुदुस्तरम्।
दानमार्ग च तीर्थानां मार्ग च श्रुतवानहम्॥
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२९७
मुनिवर विश्रवाके वीर्यसे जन्म ग्रहण करके
आप सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रसिद्ध [कुम्भकर्ण-रावण]
राक्षसराजका शरीर प्राप्त करेंगे और बलवान्, वैभवसे
युक्त तथा परम प्रतापी होंगे॥ १३॥
समस्त ब्रह्माण्डके राजा होकर शिवभक्त एवं
जितेन्द्रिय होंगे और शिवके ही दूसरे स्वरूप श्रीविष्णुके
हाथों मृत्यु पाकर फिर आप दोनों अपने पदपर
प्रतिष्ठित हो जायँगे॥ १४॥
सूतजी बोले--हे महर्षियो! महात्मा नारदमुनिकी
यह बात सुनकर वे दोनों शिवगण प्रसन्न होकर
सानन्द अपने स्थानको लौट गये॥ १५॥
नारदजी भी अत्यन्त आनन्दित हो अनन्य भावसे
भगवान् शिवका ध्यान तथा शिवतीर्थांका दर्शन करते
हुए बारम्बार भूमण्डलमें विचरने लगे॥ १६॥
अन्तमें वे सबके ऊपर विराजमान काशीपुरीमें
गये, जो शिवजीकी प्रिय, शिवस्वरूपिणी एवं शिवको
सुख देनेवाली है ॥ १७॥
काशीपुरीका दर्शन करके नारदजी कृतार्थ हो
गये । उन्होंने भगवान् काशीनाथका दर्शन किया और
परम प्रीति एवं परमानन्दसे युक्त हो उनकी पूजा की ॥ १८ ॥
काशीका सानन्द सेवन करके वे मुनिश्रेष्ठ
कृतार्थताका अनुभव करने लगे और प्रेमसे विह्वल हो
उसका नमन, वर्णन तथा स्मरण करते हुए ब्रह्मलोकको
गये। निरन्तर शिवका स्मरण करनेसे शुद्ध-बुद्धिको
प्राप्त देवर्षि नारदने वहाँ पहुँचकर विशेषरूपसे
'शिवतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्रह्माजीको
भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और जाना प्रकारके स्तोत्रोंद्रार
उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछा।
उस समय नारदजीका हृदय भगवान् शंकरके प्रति
भक्तिभावनासे परिपूर्ण था॥ १९-२१॥
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! परब्रह्म परमात्माके
स्वरूपको जाननेवाले हे पितामह! हे जगत्प्रभो!
आपके कृपाप्रसादसे मैंने भगवान् विष्णुके उत्तम
माहात्म्यका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त किया है॥ २२॥
भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, अत्यन्त दुस्तर तपोमार्ग,
दानमार्ग तथा तीर्थमार्गका भी वर्णन सुना है, परंतु
शिवतत्त्वका ज्ञान मुझे अभीतक नहीं हुआ है । मैं भगवान्
२१८
श्रीशिवमहापुराण
[अ = न `` पी यी
ज ज्ञातं शिवतत्त्वं च पूजाविधिमतः क्रमात्।
चरित्रं विविधं तस्य निवेदय मम प्रभो॥ २४
निर्गुणोऽपि शिवस्तात सगुणः शङ्करः कथम्।
शिवतत्त्वं न जानामि मोहितः शिवमायया॥ २५
सृष्टेः पूर्व कथं शम्भुः स्वरूपेण प्रतिष्ठितः ।
सृष्टिमध्ये स हि कथं क्रीडन्संवर्तते प्रभुः ॥ २६
तदन्ते च कथं देवः स तिष्ठति महेश्वरः।
कथं प्रसन्नतां याति शङ्करो लोकशङ्करः॥ २७
सन्तुष्टश्च स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च महे श्वर: ।
किं फलं यच्छति विधे तत्सर्व कथयस्व मे॥ २८
सद्यः प्रसन्नो भगवान्भवतीत्यनुसंश्रुतम्।
भक्तप्रयासं स महान्न पश्यति दयापरः॥ २९
ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवांशजाः।
महेशस्तत्र पूर्णांशः स्वयमेव शिवः परः॥ ३०
तस्याविर्भावमाख्याहि चरितानि विशेषत: ।
उमाविर्भावमाख्याहि तद्विवाहं तथा विभो॥ ३१
तद्गार्हस्थ्यं विशेषेण तथा लीलाः परा अपि।
एतत्सर्वं तथान्यच्च कथनीयं त्वयानघ॥ ३२
तदुत्पत्तिं विवाहं च शिवायास्तु विशेषत: ।
प्रब्रूहि मे प्रजानाथ गुहजन्म तथेव च॥ ३३
बहुभ्यश्च श्रुतं पूर्व न तृप्तोऽस्मि जगत्प्रभो।
अतस्त्वां शरणं प्राप्त: कृपां कुरु ममोपरि॥ ३४
इति श्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्याङ्गजस्य हि।
उवाच वचनं तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३५
शंकरकी पूजा-विधिको भी नहीं जानता। अत: हे प्रभो
आप क्रमशः इन विषयोंको तथा भगवान् शिवके विविध
चरित्रोंको मुझे बतानेकी कृपा करें॥ २३-२४॥ |
हे तात! शिव तो निर्गुण होते हुए भी सगुण है,
यह कैसे सम्भव है । शिवकी मायासे मोहित होनेके
कारण मैं शिवके तत्त्वको नहीं जान पा रहा हूँ॥२५॥
सृष्टिके पूर्व भगवान् शंकर किस स्वरूपसे ३
रहते हैं और सृष्टिके मध्यमें कैसी क्रीडा करते हुए
स्थित रहते हैं । सृष्टिके अन्तमें बे देव महेश्वर किस
प्रकारसे रहते हैं और संसारका कल्याण करनेवाले वे
सदाशिव किस प्रकार प्रसन्न रहते हैं ॥ २६-२७॥
हे विधाता ! वे सन्तुष्ट होकर अपने भक्तों और अनय
लोगोंको कैसा फल देते हैं, वह सब हमें बताये । मैंने सुना
है कि वे भगवान् तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं । परमदयालु
वे भक्तके कष्टको नहीं देख पाते हैं ॥ २८-२९॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश-ये तीनों देव शिवके
ही अंश हैं। महेश उनमें पूर्ण अंश हैं और स्वयंम
वे परात्पर शिव है॥ ३०॥
आप उन महेश्वर शिवके आविर्भाव एवं उनके
चरित्रको विशेष रूपसे कहें। हे प्रभो! [इस कथाके
साथ ही] उमा (पार्वती)-के आविर्भाव और उनके
विवाहकी भी चर्चा करें॥ ३१॥
उनके गृहस्थ आश्रम और उस आश्रममें की
गयी विशिष्ट लीलाओंका वर्णन करें। हे निष्पाप! इन
सब [कथाओं]-के साथ अन्य जो कहनेयोग्य बात
हैं, उनका भी वर्णन करें॥ ३२॥
हे प्रजानाथ! उन (शिव) और शिवाके आविर्भाव
एवं विवाहका प्रसंग विशेष रूपसे कहें तथा
जन्मकी कथा भी मुझे सुनायें ॥ ३३॥ ब
हे जगत्प्रभो! पहले बहुत लोगोंसे मैंने ये ब
सुनी हैं, किंतु तृप्त नहीं हो सका हूँ, इसीलिये आपकी
शरणमें आया हूँ। आप मुझपर कृपा करें॥ ३४
अपने पुत्र नारदकी यह बात सुनकर
ब्रह्मा वहाँ इस प्रकार कहने लगे-॥ ३५॥
इति शिवमहापुराण डरिवीयाया खसंहितायां प्रथमखण्डे सृषट्युपाख्याने नारदप्रश्नवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
/ इस प्रकार श्रीशिवमहापुद्रणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानका
नारद-प्रएन-वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
—
कक ६]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२१९
pre अथ षष्ठोऽध्यायः
महाप्रलयकालमें केवल सद्ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्मसे
ईश्वरमूर्ति ( सदाशिव )-का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूत शक्ति ( अम्बिका )-का
प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र ( काशी या आनन्दवन )-का प्रादुर्भाव,
शिवके वामांगसे परम पुरुष ( विष्णु )-का आविर्भाव तथा उनके
सकाशे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन
ब्रह्मोवाच
भो ब्रह्मन्साधु पृष्टोऽहं त्वया विबुधसत्तम।
लोकोपकारिणा नित्यं लोकानां हितकाम्यया ॥ १
यच्छुत्वा सर्वलोकानां सर्वपापक्षयो भवेत् ।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शिवतत्त्वमनामयम्॥ २
शिवतत्त्वं मया नेव विष्णुनापि यथार्थतः।
ज्ञातं च परमं रूपमद्भुतं च परेण न॥ ३
महाप्रलयकाले च नष्टे स्थावरजङ्गमे।
आसीत्तमोमयं सर्वमनर्कग्रहतारकम्॥ ४
अचन्द्रमनहोरात्रमनग्न्यनिलभूजलम् ।
अप्रधानं वियच्छून्यमन्यतेजोविवर्जितम्॥ ५
अदृष्टत्वादिरहितं शब्दस्पर्शसमुज्झितम्।
अव्यक्तगन्धरूपं च रसत्यक्तमदिङ्मुखम्॥ ६
इत्थं सत्यन्धतमसे सूचीभेद्ये निरन्तरे।
तत्सदब्रह्मेति यच्छुत्वा सदेकं प्रतिपद्यते॥ ७
इतीदृशं यदा नासीद्यत्तत्सदसदात्मकम्।
योगिनोऽन्तर्हिताकाशे यत्पश्यन्ति निरन्तरम् ८
ब्रह्माजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे देवशिरोमणे | आप
सदा समस्त जगत्के उपकारमें ही लगें रहते हैं।
आपने लोगोंके हितकी कामनासे यह बहुत उत्तम बात
पूछी है॥ १॥
जिसके सुननेसे सम्पूर्ण लोकोंके समस्त पापोंका
क्षय हो जाता है, उस अनामय शिव-तत्त्वका मैं
आपसे वर्णन करता हूँ॥ २॥
शिवतत्त्वका स्वरूप बड़ा ही उत्कृष्ट और अद्भुत
है, जिसे यथार्थरूपसे न मैं जान पाया हूँ, न विष्णु ही
जान पाये और न अन्य कोई दूसरा ही जान पाया है॥ ३॥
जिस समय यह प्रलयकाल हुआ, उस समय समस्त
चराचर जगत् नष्ट हो गया, सर्वत्र केवल अन्धकार-
ही-अन्धकार था।न सूर्य ही दिखायी देते थे और अन्यान्य
ग्रहों तथा नक्षत्रोंका भी पता नहीं था॥ ४॥
न चन्द्र था, न दिन होता था, न रात ही थी; अग्नि,
पृथ्वी, वायु और जलकी भी सत्ता नहीं थी । [उस समय]
प्रधान तत्त्व (अव्याकृत प्रकृति) -से रहित सूना आकाशमात्र
शेष था, दूसरे किसी तेजकी उपलब्धि नहीं होती थी॥ ५॥
अदृष्ट आदिका भी अस्तित्व नहीं था, शब्द और
स्पर्श भी साथ छोड़ चुके थे, गन्ध और रूपकी भी
अभिव्यक्ति नहीं होती थी । रसका भी अभाव हो गया
था और दिशांओंका भी भान नहीं होता था॥ ६॥
इस प्रकार सब ओर निरन्तर सूचीभेद्य घोर अन्धकार
फैला हुआ था। उस समय “तत्सदब्रह्म'-इस श्रुतिमें
जो 'सत्' सुना जाता है, एकमात्र वही शेष था॥ ७॥
जब “यह', “बह”, ' ऐसा', 'जो' इत्यादि रूपसे
निर्दिष्ट होनेवाला भावाभावात्मक जगत् नहीं था, उस
समय एकमात्र वह “सत्? ही शेष था, जिसे योगीजन
अपने हृदयाकाशके भीतर निरन्तर देखते हैं॥ ८॥
२२०
श्रीशिवमहापुराण
[3s ७ > पणपकण्ण्ण्णागाााााा--
ह. 00.0. > © अल
अमनोगोचरं वाचां विषयं न कदाचन।
अनामरूपवर्ण च न च स्थूलं न यत्कृशम्॥ ९
अहृस्वदीर्घमलघु गुरुत्वपरिवर्जितम्।
न यत्रोपचयः कश्चित्तथा नोपचयोऽपि च॥ १०
अभिधत्ते सचकितं यदस्तीति श्रुतिः पुनः।
सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं महः॥ ११
अप्रमेयमनाधारमविकारमनाकृति |
निर्गुणं योगिगम्यं च सर्वव्याप्येककारकम्॥ १२
निर्विकल्पं निरारम्भं निर्मायं निरुपद्रवम्।
अद्वितीयमनाद्यन्तमविकाशं चिदात्मकम्॥ १३
यस्येत्थं संविकल्पन्ते संज्ञासंज्ञोक्तितः स्म वै।
कियता चैव कालेन द्वितीयेच्छाऽभवत्किल॥ १४
अमूर्तेन स्वमूर्तिश्च तेनाकल्पि स्वलीलया।
स्ैश्वर्यगुणोपेता सर्वज्ञानमयी शुभा॥ १५
सर्वगा सर्वरूपा च सर्वदृक्सर्वकारिणी।
सर्वेकवन्द्या साद्या सर्वदा सर्वसंस्कृतिः॥ १६
परिकल्पयेति तां मू्तिमैश्वरीं शुद्धरूपिणीम्।
अद्वितीयमनाद्यन्तं सर्वाभासं चिदात्मकम्।
अन्तर्दधे पराख्यं यद् ब्रह्म सर्वगमव्ययम्॥ १७
अमूर्ते यत्पराख्यं बै तस्य मूर्तिः सदाशिव: ।
अर्वाचीनाः पराचीना ईश्वरं तं जगुर्बुधाः॥ १८
शक्तिस्तदैकलेनापि स्वैरं विहरता तनुः।
स्वविग्रहात्स्वयं सृष्टा स्वशरीरानपायिनी॥ १९
प्रधानं प्रकृतिं तां च मायां गुणवतीं पराम्।
बुद्धितत्त्वस्य ॥ २०
वह सत्तत्त्व मनका विषय नहीं है।
वहाँतक कभी पहुँच नहीं होती। वह नाम तथा रूपः
रंगसे भी शून्य है। वह न स्थूल है, न कृश है, न हस्व
है, न दीर्घ हैं, न लघु है और न गुरु ही है। उसमे न
कभी वृद्धि होती है और न हास ही होता है॥ ९. १०॥
श्रुति भी उसके विषयमें चकितभावसे ' है...
इतना ही कहती है [अर्थात् उसकी सत्तामात्रका हौ
निरूपण कर पाती है, उसका कोई विशेष विवरण
देनेमें असमर्थ हो जाती है] । वह सत्य, ज्ञानस्वरूप,
अनन्त, परमानन्दमय, परम ज्योतिःस्वरूप, अप्रमेय,
आधाररहित, निर्विकार, निराकार, निर्गुण, योगिगम्य,
सर्वव्यापी, सबका एकमात्र कारण, निर्विकल्प, निरास्भ
मायाशून्य, उपद्रवरहित, अद्वितीय, अनादि, अननत,
संकोच-विकाससे शून्य तथा चिन्मय है॥ ११-१३॥
जिस परब्रह्मके विषयमें ज्ञान और अज्ञानसे पूर्ण
उक्तियोंद्वारा इस प्रकार [ऊपर बताये अनुसार] विकल्प
किये जाते हैं, उसने कुछ कालके बाद [ सृष्टिका समय
आनेपर] द्वितीय होनेकी इच्छा प्रकट की--उसके भीतर
एकसे अनेक होनेका संकल्प उदित हुआ ॥ १४॥
तब उस निराकार परमात्माने अपनी लीलाशक्तिसे
अपने लिये मूर्ति (आकार)-की कल्पना की । वह मूर्ति
सम्पूर्ण ऐश्वर्यगुणोंसे सम्पन्न, सर्वज्ञानमयी, शुभस्वरूपा,
सर्वव्यापिनी, सर्वरूपा, सर्वदर्शिनी, सर्वकारिणी, सबकी
एकमात्र वन्दनीया, सर्वाद्या, सब कुछ देनेवाली और
सम्पूर्ण संस्कृतियोंका केन्द्र थी ॥ १५-१६॥
उस शुद्धरूपिणी ईश्वरमूर्तिकी कल्पना करके वह
अद्वितीय, अनादि, अनन्त, सर्वप्रकाशक, चिन्मय,
और अविनाशी परब्रह्म अन्तर्हित हो गया॥ १७॥
जो मूर्तिरहित परमब्रह्म है, उसीकी मूर्ति (चिर
आकार) भगवान् सदाशिव हैं। अर्वाचीन और प्राच
विद्वान् उन्हींको ईश्वर कहते हैं॥ १८॥
उस समय एकाकी रहकर स्वेच्छानुसार
करनेवाले उन सदाशिवने अपने विग्रहसे स्वयं ही ए
स्वरूपभूता शक्तिकी सृष्टि की, जो उनके अग
शरीअंगसे कभी अलग होनेवाली नहीँ थी॥ १९॥
उस पराशक्तिको प्रधान, प्रकृति, गुणवती,
बुद्धितत्वकी जननी तथा विकाररहित बताया गया है॥ ९°
जी ६]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
साशक्तिरम्बिका प्रोक्ता प्रकृतिः सकलेश्वरी।
त्रिदेवजननी नित्या मूलकारणमित्युत॥ २९
अस्या अष्टौ भुजाश्चासन्विचित्रवदना शुभा।
राकाचन्द्रसहस्त्रस्य वदने भाश्च नित्यश:॥२२
नानाभरणसंयुक्ता नानागतिसमन्विता।
नानायुधधरा देवी फुल्लपङ्कजलोचना॥ २३
अचिन्त्यतेजसा युक्ता सर्वयोनिः समुद्यता।
एकाकिनी यदा माया संयोगाच्चाप्यनेकिका॥ २४
परः पुमानीश्वरः स शिवः शम्भुरनीश्वरः।
शीर्षे मन्दाकिनीधारी भालचन्द्रस्त्रिलोचनः॥ २५
पञ्चवक्त्रः प्रसन्नात्मा दशबाहस्त्रिशूलधृक्।
कर्पूरगौरसुसितो भस्मोदधूलितविग्रहः॥ २६
युगपच्च तया शक्त्या साकं कालस्वरूपिणा।
शिवलोकाभिधं क्षेत्रं निर्मितं तेन ब्रह्मणा॥ २७
तदेव काशिकेत्येतत््रोच्यते क्षेत्रमुत्तमम्
परं निर्वाणसङ्ख्यानं सर्वोपरि विराजितम्॥ २८
ताभ्यां च रममाणाभ्यां तस्मिन्क्षेत्रे मनोरमे।
परमानन्दरूपाभ्यां परमानन्दरूपिणम्॥ २९
मुने प्रलयकालेऽपि न तत्क्षेत्रं कदाचन।
विमुक्तं हि शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः ॥ ३
२२१
वह शक्ति अम्बिका कही गयी हैं। उसीको
प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी, नित्या और मूलकारण
भी कहते हैं॥ २१॥
सदाशिवद्वारा प्रकट की गयी उस शक्तिकी
आठ भुजाएँ हैं । उस [शुभलक्षणा देवी]-के मुखकी
शोभा विचित्र है। वह अकेली ही अपने मुखमण्डलमें
सदा पूर्णिमाके एक सहस्र चन्द्रमाओंकी कान्ति धारण
करती है॥ २२॥
नाना प्रकारके आभूषण उसके श्रीअंगोंको शोभा
बढ़ाते हैं । वह देवी नाना प्रकारकी गतियोंसे सम्पन्न है
और अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करती है।
उसके नेत्र खिले हुए कमलके समान जान पड़ते हैं॥ २३॥
वह अचिन्त्य तेजसे जगमगाती रहती है।
बह सबकी योनि है और सदा उद्यमशील रहती है।
एकाकिनी होनेपर भी बह माया संयोगवशात् अनेक
हो जाती है॥ २४॥
वे जो सदाशिव हैं, उन्हें परमपुरुष, ईश्वर,
शिव, शम्भु और अनीश्वर कहते हैं। वे अपने
मस्तकपर आकाश-गंगाको धारण करते हैं। उनके
भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पाते हैं। उनके [पाँच मुख
हैं और प्रत्येक मुखमें] तीन नेत्र हैं॥ २५॥
[पाँच मुख होनेके कारण] वे पंचमुख कहलाते
हैं। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है। वे दस
भुजाओंसे युक्त और त्रिशूलधारी हैं। उनके श्रीअंगोंकी
प्रभा कर्पूरके समान श्वेत-गौर है। वे अपने सारे
अंगोंमें भस्म समाये रहते हैं॥ २६॥
उन कालरूपी ब्रह्मने एक ही समय शक्तिके साथ
“शिवलोक” नामक क्षेत्रका निर्माण किया था॥ २७॥
उस उत्तम क्षेत्रको ही काशी कहते हैं। वह परम
निर्वाण या मोक्षका स्थान है, जो सबके ऊपर
विराजमान है॥ २८॥
ये प्रिया-प्रियतमरूप शक्ति और शिव, जो
परमानन्दस्वरूप हैं, उस मनोरम क्षेत्रमें नित्य निवास
करते हैं। बह ['काशीपुरी] परमानन्दरूपिणी है॥ २९॥
हे मुने ! शिव और शिवाने प्रलयकालमें भी कभी
उस क्षेत्रको अपने सानिध्यसे मुक्त नहीं किया है। इसलिये
विद्वान् पुरुष उसे ' अविमुक्त क्षेत्र भी कहते हैं॥ ३०॥
२२२
श्रीशिवमहापुराण
[3s या मय स
अस्यानन्दवनं नाम पुराकारि पिनाकिना।
क्षेत्रस्यानन्दहेतुत्वादविमुक्तमनन्तरम् ॥ ३
अथानन्दवने तस्मिन् शिवयो रममाणयो:।
इच्छेत्यभूत्सुरषें हि सृज्यः कोऽप्यपरः किल॥ ३२
यस्मिन् ज्यस्य महाभारमावां स्वस्वैरचारिणौ।
निर्वाणधारणं कुर्वः केवलं काशिशायिनो॥ ३३
स एव सर्व कुरुतां स एव परिपातु च।
स एव संवृणोत्वन्ते मदनुग्रहतः सदा॥ ३४
चेतः समुद्रमाकुञ्च्य चिन्ताकल्लोललोलितम्।
सत्त्वरलं त्मोग्राहं रजोविद्रुमवल्लितम्॥ ३५
यस्य प्रसादात्तिष्ठावः सुखमानन्दकानने।
परिक्षिप्मनोवृत्तो बहिश्चिन्तातुरे सुखम्॥ ३६
सम्प्रधार्येति स विभुस्तया शक्त्या परेशवरः।
सव्ये व्यापारयाज्ञक्रे दशमेऽङ्गे सुधासवम्॥ ३७
ततः |
शान्त: सत्त्वगुणोद्रिक्तो गाम्भीर्यामितसागरः॥ ३८
तथा च क्षमया युक्तो मुनेऽलब्धोपमोऽभवत्।
इन्दनीलद्युतिः :॥ ३९
र् |
ह्यपराजितः॥ ४०
'लसत््रचण्डदोर्दण्डयुगलो
वह क्षेत्र आनन्दका हेतु है, इसलिये पिनाके
शिवने पहले उसका नाम ' आनन्दवन' रखा था। उसके
बाद वह 'अविमुक्त' के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३१॥
हे देवर्षे! एक समय उस आनन्दवनमें रमण
करते हुए शिवा और शिवके मनमें यह इच्छा हुई कि
किसी दूसरे पुरुषकी भी सृष्टि करनी चाहिये, जिसपर
सृष्टि-संचालनका महान् भार रखकर हम दोनों केवल
काशीमें रहकर इच्छानुसार विचरण करें और निर्वाण
धारण करें॥ ३२-३३॥
वही पुरुष हमारे अनुग्रहसे सदा सबकी सृष्टि
करे, वही पालन करे और अन्तमें वही सबका संहार
भी करे॥ ३४॥
यह चित्त एक समुद्रके समान है । इसमें चिन्ताकी
उत्ताल तरंगें उठ-उठकर इसे चंचल बनाये रहती हैं।
इसमें सत्त्वगुणरूपी रत्न, तमोगुणरूपी ग्राह और
रजोगुणरूपी मूँगे भरे हुए हैं। इस विशाल चित्त-
समुद्रको संकुचित करके हम दोनों उस पुरुषके प्रसादे
आनन्दकानन (काशी )-में सुखपूर्वक निवास करें, [यह
आनन्दवन वह स्थान है] जहाँ हमारी मनोवृत्ति सब
ओरसे सिमटकर इसीमें लगी हुई है तथा जिसके बाहरका
जगत् चिन्तासे आतुर प्रतीत होता है ॥ ३५-३६॥
ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित सर्वव्यापी
परमेश्वर शिवने अपने वामभागके दसवें अंगपर
अमृतका सिंचन किया ॥ ३७॥
वहाँ उसी समय एक पुरुष प्रकट हुआ, जो
तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर था। वह शातं
था। उसमें सत्त्तगुणकी अधिकता थी तथा वर्ह
गम्भीरताका अथाह सागर था॥ ३८॥
मुने! क्षमा गुणसे युक्त उस पुरुषके लिये
ढूँढ़नेपर भी कहीं कोई उपमा नहीं मिलती थी। उसकी
कान्ति इद्धनील मणिके समान श्याम थी। उसके
अंग-अंगसे दिव्य शोभा छिटक रही थी और नेत
प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पा रहे थे॥ ३९॥
उसके श्रीअंगोंपर सुवर्णसदृश कान्तिवाले भरी
सुन्दर रेशमी पीताम्बर शोभा दे रहे थे।
पराजित न होनेवाला वह वीर पुरुष अपने प्रर
भुजदण्डोंसे सुशोभित हो रहा था॥ ४०॥
_ ६]
रद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
ततः स पुरुषः शम्भं प्रणम्य परमेश्वरम्।
नामानि कुरु मे स्वामिन्वद कर्म जगावति॥ ४१
तच्छुत्वा वचनं प्राह शङ्करः प्रहसन्प्रभुः।
पुरुषं तं महेशानो वाचा मेघगभीरया॥ ४२
शिव उवाच
विष्णिवति व्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं भविष्यति।
बहून्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणि ह॥ ४३
तपः कुरु दूढो भूत्वा परमं कार्यसाधनम्।
इत्युक्त्वा श्वासमार्गेण ददौ च निगमं ततः॥ ४४
ततोऽच्युतः शिवं नत्वा चकार विपुलं तप: ।
अन्तर्धानं गतः शक्त्या सलोकः परमेश्वर: ॥ ४५
दिव्यं द्वादशसाहस्त्रं वर्ष तप्त्वापि चाच्युतः ।
न प्राप स्वाभिलषितं सर्वदं शम्भुदर्शनम्॥ ४६
ततः संशयमापन्नश्चिन्तितं हृदि सादरम्।
मयाद्य किं प्रकर्तव्यमिति विष्णुः शिवं स्मरन्॥ ४७
एतस्मिन्नन्तरे बाणी समुत्पन्ना शिवाच्छुभा।
तपः पुनः प्रकर्तव्यं संशयस्यापनुत्तये॥ ४८
ततस्तेन च तच्छुत्वा तपस्तप्तं सुदारुणम्
बहुकालं तदा ब्रह्ाध्यानमार्गपरेण हि॥ ४९
ततः स॒ पुरुषो विष्णुः प्रबुद्धो ध्यानमार्गतः।
सुप्रीतो विस्मयं प्राप्त: किं यत्तत््वमहो इति॥ ५०
परिश्रमवतस्तस्य विष्णोः स्वाङ्गेभ्य एव च।
जलधारा हि संयाता विविधाः शिवमायया॥ ५९
अभिव्याप्तं च सकलं शून्यं यत्तन्महामुने।
ब्रह्मरूपं जलमभूत्स्पर्शनात्पापनाशनम्॥
२२३
तदनन्तर उस पुरुषने परमेश्वर शिवको प्रणाम
करके कहा-हे स्वामिन्! मेरे नाम निश्चित कीजिये
और काम बताइये ॥ ४१॥
उस पुरुषकी यह बात सुनकर महेश्वर भगवान्
शंकर हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे
कहने लगे ॥ ४२॥
शिवजी बोले-हे वत्स! व्यापक होनेके
कारण तुम्हारा “विष्णु' नाम विख्यात होगा। इसके
अतिरिक्त और भी बहुतसे नाम होंगे, जो भक्तोंको
सुख देनेवाले होंगे ॥ ४३॥
तुम सुस्थिर होकर उत्तम तप करो, क्योंकि वही
समस्त कार्याँका साधन है । ऐसा कहकर भगवान् शिवने
श्वासमार्गसे श्रीविष्णुको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया ॥ ४४॥
तदनन्तर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले
श्रीहरि भगवान् शिवको प्रणाम करके बहुत बड़ी
तपस्या करने लगे और शक्तिसहित परमेश्वर शिव भी
पार्षदगणोंके साथ वहाँसे अदृश्य हो गये॥ ४५॥
बारह हजार दिव्य वर्षोतक तपस्या करनेके
पश्चात् भी विष्णु अपने अभीष्ट फलस्वरूप, सर्वस्व
देनेवाले भगवान् शिवका दर्शन प्राप्त न कर सके ॥ ४६॥
तब विष्णुको बड़ा सन्देह हुआ। उन्होंने हृदयमें
शिवका स्मरण करते हुए सोचा कि अब मुझे क्या
करना चाहिये। इसी बीच शिवकी मंगलमयी [आकाश]
वाणी हुई कि सन्देह दूर करनेके लिये पुनः तपस्या
करनी चाहिये ॥ ४७-४८ ॥
[शिवकी] उस [वाणी]-को सुनकर विष्णुने
ब्रहममें ध्यानको अवस्थितकर [पुनः] दीर्घकालतक
अत्यन्त कठिन तपस्या की ॥ ४९॥
तदनन्तर ब्रह्मकी ध्यानावस्थामें ही विष्णुको
बोध हो आया और वे प्रसन्न होकर यह सोचने लगे
कि अरे! वह महान् तत्त्व है क्या ?॥ ५०॥
उस समय शिवकी इच्छासे तपस्याके परिश्रममें
निरत विष्णुके अंगोंसे अनेक प्रकारकी जलधाराएँ
निकलने लगीं॥ ५१॥
हे महामुने! उस जलसे सारा सूना आकाश
व्याप्त हो गया। वह ब्रह्मरूप जल अपने स्पर्शमात्रसे
सब पापोंका नाश करनेवाला सिद्ध हुआ॥ ५२॥
२२४
श्रीशिवमहापुराण
[अण = आआआ
तदा श्रान्तश्च पुरुषो विष्णुस्तस्मिञ्जले स्वयम् ।
सुष्वाप परमप्रीतो बहुकालं विमोहिंतः॥ ५३
जारायणेति नामापि तस्यासीच्छुतिसम्मतम्।
नान्यत्किछ्ित्तदा ह्यासीत्प्राकृतं पुरुषं विना॥ ५४
एतस्मिन्नन्तरे काले तत्त्वान्यासन्महात्मनः।
तत्प्रकारं शृणु प्राज्ञ गदतो मे महामते॥ ५५
प्रकृतेश्च महानासौीन्महतश्च॒ गुणास्त्रयः।
अहङ्कारस्ततो जातस्त्रिविधो गुणभेदतः ॥ ५६
तन्मात्रश्च ततो जाताः पञ्ज भूतानि वै ततः।
तदैव तानीन्द्रियाणि ज्ञानकर्ममयानि च॥ ५७
तत्त्वानामिति सङ्ख्यानमुक्तं ते ऋषिसत्तम।
जडात्मकं च तत्सर्वं प्रकृतेः पुरुषं विना॥ ५८
तत्तदैकीकृतं तत्त्वं चतुर्विशतिसङ्ख्यकम्।
शिवेच्छया गृहीत्वा स सुष्वाप ब्रह्मरूपके ॥ ५९
उस समय थके हुए परम पुरुष विष्णु मोहि
होकर दीर्घकालतक बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमे सेत
रहे॥५३॥
नार अर्थात् जलमें शयन करनेके कारण ही
उनका “नारायण '--यह श्रुतिसम्मत नाम प्रसिद्ध हुआ।
उस समय उन परम पुरुष नारायणके अतिरिक्त दूसरी
कोई प्राकृत वस्तु नहीं थी॥ ५४॥
उसके बाद ही उन महात्मा नारायणदेवसे यथासमय
सभी तत्त्व प्रकट हुए। हे महामते! हे विद्वन्! मैं उन
तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बता रहा हूँ, सुनिये॥५५॥
प्रकृतिसे महत्त्व प्रकट हुआ और महत्ते सत्त्वारे
तीनों गुण। इन गुणोंके भेदसे ही त्रिविध अहंकारकी
उत्पत्ति हुई। अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ हुईं और उन
तन्मात्राओसे पाँच भूत प्रकट हुए । उसी समय ज्ञानेद्धियों
और कर्मेन्द्रियोंका भी प्रादुर्भाव हुआ॥ ५६-५७॥
हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने आपको तत्त्वोंकी
संख्या बतायी है। इनमेंसे पुरुषको छोड़कर शेष सारे
तत्त्व प्रकृतिसे प्रकट हुए हैं, इसलिये सब-के-सब जड़
हैं ॥ ५८ ॥
तत्त्वोंकी संख्या चौबीस है। उस समय एकाकार
हुए चौबीस तत्त्वोंको ग्रहण करके वे परम पुरुष
नारायण भगवान् शिवकी इच्छासे ब्रह्मरूप जलमें सो
गये॥५९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां सद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने विष्णूत्पत्तिवर्णानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानका
विष्णु-उत्पत्ति-वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
७७७ ७७
अथ सप्तमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, शिवेच्छासे ब्रह्माजीका उससे प्रकट होता
'कमलनालके उद्गमका पता लगानेमें
दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्म-विष्णुके
असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हं
बीचमें अग्निस्तम्भका प्रकट होना तथा
उसके ओर-छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना
ब्रह्मोवाच
सुप्ते नारायणे देवे नाभौ पङ्कजमुत्तमम्।
आविर्बभूव सहसा बृहद्वे शङ्करेच्छया॥ १
ब्रह्माजी बोले-हे देवर्षे! जब नि
जलमें शयन करने लगे, उस समय उनकी ना
भगवान् शंकरकी इच्छासे सहसा एक विशाल
उत्तम कमल प्रकट हुआ॥ १॥
डे ७]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२२५
अनन्तयष्टिकायुक्त॑ कर्णिकारसमप्रभम्।
अनन्तयोजनायाममनन्तोच्छायसंयुतम्ू_॥ २
'कोटिसूर्यप्रतीकाशं सुन्दरं तत्त्वसंयुतम्।
अत्यद्भुतं महारम्यं दर्शनीयमनुत्तमम्॥ ३
कृत्वा यत्नं पूर्ववत्स शङ्करः परमेश्वरः।
दक्षणाङ्गान्निजान्मां वै साम्बः शम्भुरजीजनत्॥ ४
स मायामोहितं कृत्वा मां महेशो द्रुतं मुने।
तन्नाभिपङ्कजादाविर्भावयामास लीलया॥ ५
एवं पद्यात्ततो जज्ञे पुत्रोऽहं हेमगर्भकः।
चतुर्मुखो रक्तवर्णस्त्रिपुण्ड्ाङ्कितमस्तकः॥ ६
त्न्मायामोहितश्चाहं नाविदं कमलं विना।
स्वदेहजनकं तात पितरं ज्ञानदुर्बलः॥ ७
कोऽहं वा कुत आयातः किं कार्य तु मदीयकम्।
कस्य पुत्रोऽहमुत्पन्नः केनैव निर्मितो$धुना ॥
इति संशयमापन्नं बुद्धिर्मां समपद्यत।
किमर्थं मोहमायामि तज्ज्ञानं सुकरं खलु॥ ९
एतत्कमलपुष्पस्य पत्रारोहस्थलं ह्यधः।
मत्कर्ता च स वै तत्र भविष्यति न संशयः॥ १०
इति बुद्धिं समास्थाय कमलादवरोहयम्।
नाले नाले गतस्तत्र वर्षाणां शतकं मुने॥ १९
ज लब्धं तु मया तत्र -कमलस्थानमुत्तमम्।
संशयं च पुनः प्राप्तः कमले गन्तुमुत्सुकः॥ १२
आरुरोहाथ कमलं नालमार्गेण वै मुने।
कुड्मलं कमलस्याथ लब्धवात्त विमोहितः॥ १३
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_9_l_Front
उसमें असंख्य नालदण्ड थे, उसकी कान्ति
कनेरके फूलके समान पीले रंगकी थी तथा उसकी
लम्बाई और ऊँचाई भी अनन्त योजन थी। वह कमल
करोड़ों सूरयोके समान प्रकाशित, सुन्दर, सम्पूर्ण
तत्त्वोंसे युक्त, अत्यन्त अद्भुत, परम रमणीय, दर्शनके
योग्य तथा सबसे उत्तम था॥ २-३॥
तत्पश्चात् कल्याणकारी परमेश्वर साम्बसदाशिवने
पूर्ववत् प्रयत्न करके मुझे अपने दाहिने अंगसे उत्पन्न
किया॥ ४॥
हे मुने! उन महेश्वरने मुझे तुरंत ही अपनी मायासे
मोहित करके नारायणदेवके नाभिकमलमें डाल दिया
और लीलापूर्वक मुझे वहाँसे प्रकट किया॥ ५॥
इस प्रकार उस कमलसे पुत्रके रूपमें मुझ हिरण्य-
गर्भका जन्म हुआ । मेरे चार मुख हुए और शरीरकी कान्ति
लाल हुई । मेरे मस्तक त्रिपुण्ड्की रेखासे अंकित थे॥ ६॥
हे तात! भगवान् शिवकी मायासे मोहित होनेके
कारण मेरी ज्ञानशक्ति इतनी दुर्बल हो रही थी कि मैंने
उस कमलके अतिरिक्त दूसरे किसीको अपने शरीरका
जनक या पिता नहीं जाना ॥७॥
मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, मेरा कार्य क्या है,
मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ और किसने इस
समय मेरा निर्माण किया है--इस प्रकार संशयमें पडे
हुए मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ-मैं किसलिये
मोहमें पड़ा हुआ हूँ? जिसने मुझे उत्पन्न किया है,
उसका पता लगाना तो बहुत सरल है ॥ ८-९॥
इस कमलपुष्पका जो पत्रयुक्त नाल है, उसका
उद्गमस्थान इस जलके भीतर नीचेकी ओर है।
जिसने मुझे उत्पन्न किया है, वह पुरुष भी वहीं होगा,
इसमें संशय नहीं है॥ १०॥
ऐसा निश्चय करके मैंने अपनेको कमलसे नीचे
उतारा। हे मुने! उस कमलकी एक-एक नालमें गया
और सैकड़ों वर्षोतक वहाँ भ्रमण करता रहा॥ ११॥
कहीं भी उस कमलके उद्गमका उत्तम स्थान मुझे
नहीं मिला। तब पुनः संशयमें पड़कर मैं उस कमलपुष्पपर
जानेके लिये उत्सुक हुआ और हे मुने ! नालके मार्गसे
उस कमलपर चढ़ने लगा। इस तरह बहुत ऊपर जानेपर
भी मैं उस कमलके कोशको न पा सका। उस दशामें
मैं और भी मोहित हो उठा॥ १२-१३॥
२२६
श्रीशिबमहापुराण
[अ _ = = === नाणका `
नालमार्गेण भ्रमतो गतं वर्षशतं पुनः।
क्षणमात्रं तदा तत्र ततस्तिष्ठन्विमोहितः॥
तदा वाणी समुत्पन्ना तपेति परमा शुभा।
शिवेच्छया परा व्योम्नो मोहविध्वंसिनी मुने॥ १५
तच्छुत्वा व्योमवचनं द्वादशाब्दं प्रयलतः।
पुनस्तप्तं तपो घोरे द्रष्टुं स्वजनकं तदा॥ १६
तदा हि भगवान्विष्णुश्चतुर्बाहुः सुलोचनः।
मय्येवानुग्रहं कर्तु द्रुतमाविर्बभूव ह॥ १७
शङ्खचक्रायुभकरो गदापद्मधरः परः।
घनश्यामलसर्वाङ्गः पीताम्बरधरः परः॥ १८
मुकुटादिमहाभूषः प्रसनमुखपङ्कज:।
कोटिकन्दर्पसङ्काशः सन्दृष्टो मोहितेन स: ॥ १९
तद् दृष्ट्वा सुन्दरं रूपं विस्मयं परमं गत: ।
कालाभं काञ्चनाभं च सर्वात्मानं चतुर्भुजम्॥ २०
तथाभूतमहं दृष्ट्वा सदसन्मयमात्मना।
नारायणं महाबाहुं हर्षितो ह्यभवं तदा॥ २१
मायया मोहितः शम्भोस्तदा लीलात्मनः प्रभो. ।
अविज्ञाय स्वजनकं तमवोचं प्रहर्षितः ॥ २२
ब्रह्मोवाच
कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम्।
तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण सुदृढेन तु॥ २३
प्रबुद्धयोत्थाय शयनात्समासीनः क्षणं बशी।
ददर्श निद्राविक्लिन्न :॥ २४
मामत्र संस्थितं भासाध्यासितो भगवान्हरिः।
आह चोत्थाय ब्रह्माणं हसन्मां मधुरं सकृत्॥ २५
मुझे नालमार्गसे भ्रमण करते हुए पुन; सैकड़ों
वर्ष व्यतीत हो गये, [किंतु उसका कोई पता न चल
सका] तब मैं मोहित (किंकर्तव्यविमूढ़ ) होकर एक
क्षण वहीं रुक गया॥ १४॥
हे मुने! उस समय भगवान् शिवकी इच्छा
परम मंगलमयी तथा उत्तम आकाशवाणी प्रकर हुई
जो मेरे मोहका विध्वंस करनेवाली थी, उस बाणी
कहा--'तप' तपस्या करो॥ १५॥
उस आकाशवाणीको सुनकर मैंने अपने जन्मदाता
पिताका दर्शन करनेके लिये उस समय पुनः
बारह वर्षोतक घोर तपस्या की॥ १६॥
तब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही चार भुजाओं
और सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित भगवान् विष्णु वहाँ सहसा
प्रकट हो गये | उन परम पुरुषने अपने हाथोंमें शंख, चक्र
गदा और पद्म धारण कर रखे थे । उनके सारे अंग सजल
जलधरके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित थे | उन परम
प्रभुने सुन्दर पीताम्बर पहन रखा था । उनके मस्तक आदि
अंगोंमें मुकुट आदि महामूल्यवान् आभूषण शोभा पा
रहे थे। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था।
मैं उनकी छविपर मोहित हो रहा था। वे मुझे करोड़ों
कामदेवोंके समान मनोहर दिखायी दिये ॥ १७--१९॥
उन चतुर्भुज भगवान् विष्णुका वह अत्यन्त सुन्दर
रूप देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । बे साँवली और
सुनहरी आभासे उद्धासित हो रहे थे॥ २०॥
उस समय उन सदसत्स्वरूप, सर्वात्मा, महाबाहु
नारायणदेवको वहाँ उस रूपमें अपने साथ देखकर
मुझे बड़ा हर्ष हुआ॥ २१॥
मैं उस समय प्रभु शम्भुकी लीलासे मोहित हो
रहा था, इसलिये मैं अपने उत्पन्न करनेवालेको न जानकर
अति हर्षित होकर उनसे कहने लगा--॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले मैंने उन सनातन पुरुषको हाथ
उठाकर कहा कि आप कौन हैं, उस समय हाथके तीव्र
तथा सुदृढ़ प्रहारसे क्षणमात्रमें ही वे जितेन्द्रियं जा
करके शय्यासे उठकर बैठ गये। तदनन्तर अविर्कर्श
रूपसे निद्रारहित होकर उन राजीवलोचन भगवान्
मुझको वहाँपर अवस्थित देखा और हँसते हुए बा
बार मधुर वाणीमें [वे] कहने लगे--॥ २३-२५॥
म दे ES
डे ७]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखएड )
२२७
विष्णुरुवाच
स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाह्युते।
निर्भयो भव दास्येऽहं सर्वान्कामान्न संशय: ॥ २६
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभः।
रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम्॥ २७
ब्रह्मोवाच
भाषसे वत्स वत्सेति सर्वसंहारकारणम्।
मामिहाति स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ॥ २८
कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम्।
सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विष्णुसम्भवम्॥ २९
विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम्।
किमर्थ भाषसे मोहाहठक्तुमर्हसि सत्वरम्॥ ३०
बेदो मां वक्ति नियमात्स्वयंभुवमजं विभुम्।
पितामहं स्वराजं च परमेष्ठिनमुत्तमम्॥ ३१
इत्याकर्ण्य हरिर्वाक्यं मम क्रुद्धो रमापतिः।
सोऽपि मामाह जाने त्वां कर्तारमिति लोकतः॥ ३२
विष्णुरुवाच
कर्तु धर्तु भवानङ्गादवतीणों ममाव्ययात्।
विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम्॥
पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्
विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्धवम्॥ ३४
नारायणं महाबाहुं सर्वव्यापकमीश्वरम्।
मन्नाभिपद्यतस्त्वं हि प्रसूतो नात्र संशयः॥ ३५
तवापराधो नास्त्यत्र त्वयि मायाकृतं मम।
शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम्॥ ३६
कर्ता हर्ता च भर्ता च न मयास्ति समो विभुः।
अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह ॥ ३७
अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभु:।
अद्य दृष्टं शरुतं सर्व जगत्यस्मिद्राचरम्॥ ३८
2223 Shivmahapuranam Part I-Section-9_2-Front
विष्णुजी बोले--हे वत्स! आपका स्वागत
है। हे महाद्युतिमान् पितामह! आपका स्वागत है।
निर्भय होकर रहिये। मैं आपकी सभी कामनाओंको
पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ २६॥
[हे देवर्षे !] उनके मन्दहासयुक्त उस वचनको
सुनकर रजोगुणके कारण शत्रुता मान बैठा देवश्रेष्ठ मैं
उन जनार्दन भगवान् विष्णुसे कहने लगा- ॥ २७॥
ब्रह्माजी बोले--हे निष्पाप! समस्त संहारके
कारणभूत मुझे आप हँसते हुए जो हे वत्स! हे वत्स!
कह रहे हैं, बह तो वैसे ही लग रहा है, जैसे कोई गुरु
अपने शिष्यको हे वत्स! हे वत्स! कह रहा हो ॥ २८॥
मैं ही संसारका साक्षात् कर्ता, प्रकृतिका प्रवर्तक,
सनातन, अजन्मा, विष्णु, ब्रह्मा, विष्णुको उत्पन्न
करनेवाला विश्वात्मा, विधाता, धाता और पुण्डरीकाक्ष
हूँ। आप अज्ञानवश मुझे हे वत्स! हे वत्स! ऐसा क्यों
कह रहे हैं ? इसका कारण शीघ्र बताइये॥ २९-३०॥
नियमतः वेद भी मुझे स्वयम्भू, अज, विभु, पितामह,
स्वराज, सर्वोत्तम और परमेष्ठी कहते हैं॥ ३१॥
मेरे इस वचनको सुनकर लक्ष्मीपति भगवान् हरि
करुद्ध हो उठे और कहने लगे कि मैं जानता हूँ
संसार आपको जगतका कर्ता मानता हैं॥ ३२॥
विष्णुजी बोले--आप संसारकी सृष्टि करने और
पालन करनेके लिये मुझ अव्ययके अंगसे अवतीर्ण हुए
हैं, फिर भी आप मुझ जगन्नाथ, नारायण, पुरुष, परमात्मा,
निर्विकार, पुरुहूत, पुरुष्टुतू, विष्णु, अच्युत, ईशान, संसारके
उत्पत्ति-स्थानरूप, नारायण, महाबाहु और सर्वव्यापकको
भूल गये हैं। मेरे ही नाभिकमलसे आप उत्पन्न हुए हैं,
इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३३--३५॥
इस विषयमें आपका अपराध भी नहीं है,
आपके ऊपर तो मेरी माया है। हे चतुर्मुख! सुनिये,
यह सत्य है कि मैं ही सभी देवोंका ईश्वर हूँ॥ ३६॥
मैं ही कर्ता, हर्ता और भर्ता हूँ। मेरे समान अन्य
शक्तिशाली कोई देव नहीं है। हे पितामह! मैं ही
परब्रह्म तथा परम तत्त्व हूँ॥ ३७॥
मैं ही परमज्योति और बह परमात्मा विभु हूँ,
इस जगत्में आज जो यह सब चराचर दिखायी दे रहा
है और सुनायी पड़ रहा है, हे चतुर्मुख! यह जो कुछ
२२८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ७
तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्व॑ मन्मयमित्यथ।
मया सृष्टं पुराव्यक्तं चतुर्विशतितत्त्वकम्॥
नित्यं तेष्वणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधभयादयः।
प्रभावाच्च भवानङ्कान्यनेकानीह लीलया॥ ४०
सृष्टा बुद्धिर्मया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा तत: ।
तन्मात्रं पञ्चकं तस्मान्मनो देहेन्द्रियाणि च॥ ४१
आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया।
इति बुद्ध्वा प्रजानाथ शरणं ब्रज मे विधे॥ ४२
अहं त्वां सर्वदुःखेभ्यो रक्षिष्यामि न संशयः ।
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मा क्रोधसमन्वितः ।
को वा त्वमिति सम्भर्ल्स्यत्रुवं मायाविमो हितः ॥ ४३
किमर्थं भाषसे भूरि बहृनर्थकरं वचः।
नेश्वरस्त्वं परं ब्रह्म कश्चित्कर्ता भवेत्तव॥ ४४
मायया मोहितश्चाहं युद्धं चक्रे सुदारुणम्।
हरिणा तेन बै सार्ध शङ्करस्य महाप्रभोः ॥ ४५
एवं मम हरेश्चासीत्सङ्गरो रोमहर्षणः।
प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः॥ ४६
एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः' पुरः।
विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं तथावयोः॥ ४७
॥ ४८
ज़्वालामालासहस््राद्य॑ कालानलशतोपमम्।
भी है, वह मुझमें व्याप्त है--ऐसा आप जान लें। मैंने
ही सृष्टिके पहले जगतूके चौबीस अव्यक्त तत्त्वोकी
रचना की है॥ ३८-३९॥
उन्हीं तत्त्वोंसे प्राणियोंके शरीरधारक अणुओंका
निर्माण होता है और क्रोध, भय आदि षड्गुणोंकी
सृष्टि हुई है। मेरे प्रभाव और मेरी लीलासे ही आपके
अनेक अंग हैं॥ ४०॥
मैंने ही बुद्धितत्त्वकी सृष्टि की है और उसमें
तीन प्रकारके अहंकार उत्पन्न किये हैं। तदनन्तर
उससे रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श--इन पंचतन्मात्राओं,
मन एवं चक्षु, जिह्वा, घ्राण, श्रोत्र तथा त्वचा--इन
पाँच ज्ञानेन्द्रियों और वाकू, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ--
इन पाँच कर्मेन्द्रयों, क्षिति, जल, पावक, गगन और
वायु-इन पंच महाभूतों तथा अन्य सभी भौतिक
पदार्थोको रचना लीलासे ही की है। हे प्रजापते! हे
ब्रह्मन्! ऐसा जानकर आप मेरी शरणमें आ जाइये,
मैं सभी दुःखोंसे आपकी रक्षा करूँगा, इसमें संशय
नहीं है ॥ ४१-४२१/२॥
ब्रह्माजी बोले--विष्णुका यह वचन सुनकर
मुझ ब्रह्माको क्रोध आ गया और मायाके वशीभूत
हुआ मैं उनको डाँटते हुए पूछने लगा कि आप कौन
हैं और किसलिये इतना अधिक निरर्थक बोल रहे हैं?
आप न ईश्वर हैं, न परब्रह्म हैं। आपका कोई कर्ता
अवश्य है॥ ४३-४४॥
महाप्रभु शंकरकी मायासे विमोहित मैं उन
भगवान् विष्णुके साथ भयंकर युद्ध करने लगा॥ ४५॥
उस प्रलयकालीन महासमुद्रके मध्य रजोगुणके
'कारण परस्पर बढ़ी शत्रुतासे हमारा और विष्णुका
रोमांचकारी युद्ध होने लगा॥ ४६॥
इसी बीच हम दोनोंके छिड़े विवादको शान्त
करनेके लिये और ज्ञान प्रदान करनेके लिये हम
दोनोंके सामने ही एक लिंग प्रकट हुआ॥ ४७॥
वह लिंग अग्निकी प्रचण्ड हजार ज्वालाओंसे
भी अधिक ज्चालासमूहोंवाला, सैकड़ों कालाग्नियोंके
समान कान्तिमान्, क्षय एवं वृद्धिसे रहित, आदिः मध्य
और अन्तसे विहीन था॥४८॥
2223 Shivmabapuranam_Part I_Section_9_2_Back
डव ७]
अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं ` विश्वसम्भवम्।
तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान्हरिः ॥ ४९
मोहितं चाह मामत्र किमर्थ स्पर्धसे5धुना।
आगतस्तु तृतीयोऽत्र तिष्ठतां युद्धमावयो: ॥ ५०
कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।
अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥ ५१
परीक्षार्थं प्रजानाथ तस्य वै वायुवेगतः।
भवानुर्ध्वंप्रयलेन गन्तुमर्हसि सत्वरम्॥ ५२
ब्रह्मोवाच
एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा।
वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान्मुने ॥ ५३
तदाप्रभृति मामाहुर्हसहंसो विराडिति।
हंस हंसेति यो ब्रूयात्स हंसोऽथ भविष्यति॥ ५४
सुश्रेतो ह्यनलप्रख्यो विश्वतः पक्षसंयुतः।
मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोर्ध्व चोर्ध्वतः पुरा ॥ ५५
नारायणोऽपि विश्वात्मा सुश्चेतो ह्ाभवत्तदा।
दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्॥ ५६
मेरुपर्वतवर्ष्माणं गोरतीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम्।
कालादित्यसमाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्॥ ५७
हृस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दूढमनौपमम्।
वाराहाकारमास्थाय गतवांस्तदधो जवात्॥
एवं वर्षसहस्रं च चरन्विष्णुरधो गतः।
तदाप्रभृति लोकेषु श्रेतवाराहसंज्ञक: ॥ ५९
कल्पो बभूव देवर्षे नराणां कालसंज्ञकः।
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२२९
वह उपमारहित, अनिर्देश्य, बिना किसीके द्वारा
उपस्थापित, अव्यक्त और विश्शवसर्जक था। उस
लिंगकी सहस्र ज्वालाओंके समूहको देखनेमात्रसे ही
भगवान् विष्णु मोहित हो -उठे॥ ४९॥
शिवकी मायासे मोहित मुझसे वे कहने लगे कि
इस समय मुझसे तुम इतनी स्पर्धा क्यों कर रहे हो?
हम दोनोंके मध्य तो एक तीसरा भी आ गया है,
इसलिये युद्ध रोक दिया जाय॥५०॥
हम दोनों इस अग्निसे उत्पन्न लिंगकी परीक्षा
करें कि यह कहाँसे प्रकट हुआ है। मैं इस अनुपम
अग्निस्तम्भके नीचे जाऊँगा और हे प्रजानाथ! आप
इसकी परीक्षा करनेके लिये वायुवेगसे प्रयत्नपूर्वक
शीघ्र ऊपरकी ओर जायँ॥ ५१-५२॥
ब्रह्माजी बोले--तब ऐसा कहकर विश्वात्मा
भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण किया और हे
मुने! मैंने भी शीघ्र हंसका रूप बना लिया॥५३॥
उसी समयसे लोग मुझे हंस-हंस और विराट् ऐसा
कहने लगे। जो 'हंस-हंस' यह कहकर मेरे नामका
जप करता है, वह हंसस्वरूप ही हो जाता है ॥ ५४॥
अत्यन्त श्वेत, अग्निके समान, चारों ओरसे पंखोंसे
युक्त और मन॑ तथा वायुके वेगवाला होकर मैं ऊपरकें
भी ऊपर लिंगका पता लगाते हुए चला गया॥ ५५॥
उसी समय विश्वात्मा नारायणने भी अत्यन्त
श्वेत स्वरूप धारण किया। दस योजन चौड़े, सौ
योजन लम्बे मेरुपर्वतके समान शरीरवाले, श्वेत तथा
अत्यन्त तेज दाढ़ोंसे युक्त, प्रलयकालीन सूर्यके समान
कान्तिमान्, दीर्घ नासिकासे सुशोभित, भयंकर [घुर-
घुरकी] ध्वनि करनेवाले, छोटे-छोटे पैरोंसे युक्त,
विचित्र अंगोंवाले, विजय प्राप्त करनेकी इच्छासे
परिपूर्ण, दृढ़ तथा अनुपम वाराहका स्वरूप धारण
करके बे भगवान् विष्णु भी अत्यन्त वेगसे उसके
नीचेकी ओर गये ॥ ५६-५८॥
इस प्रकार रूप धारणकर भगवान् विष्णु एक
हजार वर्षतक नीचेकी ओर ही चलते रहे। उसी
समयसे [पृथिवी आदि] लोकोंमें शवेतवाराह नामक
कल्पका प्रादुर्भाव हुआ। हे देवर्षे! यह मनुष्योंकी
कालगणनाकी अवधि है॥ ५९१/२॥
२३०
बभ्राम बहुधा विष्णुः प्रभविष्णुरधोगत: ॥
नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकर: ।
तावत्कालं गतश्चोर्ध्वमहमप्यरिंसूदन॥ ६१
सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया।
श्रान्तो न दृष्ट्वा तस्यान्तमहं कालादधोगतः॥ ६२
तथैव भगवान्विष्णुः श्रान्तः कमललोचनः।
सर्वदेवनिभस्तूर्णमुत्थिः स महावपुः॥ ६३
समागतो मया सार्थ प्रणिपत्य भवं मुहुः।
मायया मोहितः शम्भोस्तस्थो संविग्नमानसः ॥ ६४
पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव ह्यग्रत: परमेश्वरम्।
प्रणिपत्य मया सार्ध सस्मार किमिदं त्विति॥ ६५
अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम्।
अलिङ्गं लिङ्गता प्रप्त ध्यानमार्गेऽप्यगोचरम्॥ ६६
स्वस्थं चित्तं तदा कृत्वा नमस्कारपरायणौ।
बभूवतुरुभावावामहं हरिरपि ध्रुवम्॥ ६७
जानीवो न हि ते रूपं योऽसि सोऽसि महाप्रभो ।
नमोऽस्तु ते महेशान रूपं दर्शय नौ त्वरम्॥ ६८
एवं शरच्छतान्यासन्नमस्कारं प्रकुर्वतोः।
श्रीशिवमहापुराणः
आवयोर्मुनिशादूल मदमास्थितयोस्तदा॥ ६९
[ अ० ७
इधर [अत्यन्त तीव्र गतिसे] नीचेकी ओरसे जाते
हुए महातेजस्वी विष्णु बहुत प्रकारसे भ्रमण करते रहे,
किंतु महावाराहरूपधारी विष्णु उस ज्योतिर्लिंगके
मूलका अल्प भाग भी न देख सके॥ ६०१/३॥
हे अरिसूदन! तबतक मैं भी उस ज्योतिर्लिंगके
अन्तका पता लगानेके लिये वेगसे ऊपरकी ओर जाता
रहा। यत्नपूर्वक उस ज्योतिर्लिंगके अन्तको जाननेका
इच्छुक मैं अत्यन्त परिश्रमके कारण थक गया और
उसका अन्त बिना देखे ही थोड़े समयमें नीचेकी ओर
लौट पड़ा॥६१-६२॥
उसी प्रकार सर्वदेवस्वरूप, महाकाय, कमललोचन,
भगवान् विष्णु भी थकानके कारण ज्योतिर्लिंगका
अन्त देखे बिना ही ऊपर निकल आये ॥ ६३॥
शिवकी मायासे विमोहित विष्णु आकर मेरे
साथ ही भगवान् शिवको बार-बार प्रणाम करके
व्याकुल चित्तसे वहाँ खड़े रहे॥ ६४॥
पृष्ठ प्रदेशकी ओरसे, पाश्वोकी ओर और
आगेकी ओरसे परमेश्वर शिवको मेरे साथ ही प्रणाम
करके विष्णु भी सोचने लगे कि यह क्या है ?॥ ६५॥
वह रूप तो अनिर्देश्य, नाम तथा कर्मसे रहित,
अलिंग होते हुए भी लिंगताको प्राप्त और ध्यानमार्गसे
अगम्य था। तदनन्तर अपने मनको शान्त करके मैं
और विष्णु दोनों शिवको बार-बार प्रणामकर कहने
लगे-हे महाप्रभो! हम आपके स्वरूपको नहीं
जानते। आप जो हैं, वही हैं, आपको हमारा नमस्कार
है। हे महेशान! आप शीघ्र ही हमें अपने स्वरूपका
दर्शन करायें ॥ ६६--६८॥
है मुनिश्रेष्ठ इस प्रकार अहंकारसे आविष्ट हुए
हम दोनोंको वहाँ नमस्कार करते हुए सैकड़ों वर्ष बीत
गये॥ ६९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्द्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने
विष्णुब्रहाविवादवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय
विष्णु-ब्रह्मा-विवादःवर्णन नामक
रु्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानका
सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
—— ee
न ८]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२३१
अथाष्टमोऽध्यायः
ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन
ब्रह्मोवाच
एवं तयोर्मुनिश्रेष्ठ दर्शनं काङ्क्षमाणयोः।
विगर्वयोश्च सुरयोः सदा नौ स्थितयोर्मुने॥ १
दयालुरभवच्छम्भुर्दीनानां प्रतिपालकः।
गर्विणां गर्वहर्ता च सर्वेषां प्रभुरव्ययः॥ २
तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः।
ओमोमिति सुरुशरेष्ठात्सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः॥ ३
किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन्महास्वनः।
विष्णुः सर्वसुराराध्यो निवैरस्तुष्टचेतसा॥ ४
लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तथापश्यत्सनातनम्।
आद्यं वर्णमकाराख्यमुकारं चोत्तरे ततः॥ ५
मकारं मध्यतश्चैव नादमन्तेऽस्य चोमिति।
सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे॥ ६
उत्तरे पावकप्रख्यमुकारमृषिसत्तम।
शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं तस्य मध्यतः॥ ७
तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकसुप्रभम्।
तुरीयातीतममलं निष्कलं निरुपद्र्वम्॥ ८
निट केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम्।
सबाह्याभ्यन्तरे चैव बाह्याभ्यन्तरसंस्थितम्॥ ९
आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यादिकारणम् ।
सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्मपरायणम्॥ १०
कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।
अधो गम्मिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥
ब्रह्माजी बोले मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार हम
दोनों देवता गर्वरहित हो निरन्तर प्रणाम करते रहे | हम
दोनोंके मनमें एक ही अभिलाषा थी कि इस ज्योतिर्लिंगके
रूपमें प्रकट हुए परमेश्वर प्रत्यक्ष दर्शन दें॥ १॥
दीनोंके प्रतिपालक, अहंकारियोंका गर्व चूर्ण
करनेवाले तथा सबके प्रभु अविनाशी शंकर हम
दोनोंपर दयालु हो गये॥ २॥
उस समय वहाँ उन सुरश्रेष्ठसे ओम्-ओम् ऐसा
शब्दरूप नाद प्रकट हुआ, जो स्पष्टरूपसे प्लुत स्वरमें
सुनायी दे रहा था॥३॥
जोरसे प्रकट होनेवाले उस शब्दके विषयमें
“यह क्या है'-ऐसा सोचते हुए समस्त देवताओंके
आराध्य भगवान् विष्णु मेरे साथ सन्तुष्टचित्तसे खड़े
रहे। वे सर्वथा वैरभावसे रहित थे॥४॥
उन्होंने लिंगके दक्षिण भागमें सनातन आदिवर्ण
अकारका दर्शन किया । तदनन्तर उत्तर भागमें उकारका,
मध्यभागमें मकारका और अन्तमें ' ओम्' इस नादका
साक्षात् दर्शन किया॥ ५९/२॥
हे ऋषिश्रेष्ठ। दक्षिण भागमें प्रकट हुए आदिवर्ण
अकारको सूर्य-मण्डलके समान तेजोमय देखकर
उन्होंने उत्तर भागमें उकार वर्णको अग्निके समान
देखा। हे मुनिश्रेष्ठ! इसी तरह उन्होंने मध्यभागमें
मकारको चन्द्रमण्डलके समान देखा॥ ६-७॥
तदनन्तर उसके ऊपर शुद्ध स्फटिक मणिके
समान निर्मल प्रभासे युक्त, तुरीयातीत, अमल, निष्कल,
निरुपद्रव, निर्हन्द्र, अद्वितीय, शून्यमय, बाह्य और
आभ्यन्तरके भेदसे रहित, बाह्याभ्यन्तर-भेदसे युक्त,
जगत्के भीतर और बाहर स्वयं ही स्थित, आदि, मध्य
और अन्तसे रहित, आनन्दके आदिकारण तथा सबके
परम आश्रय, सत्य, आनन्द एवं अमृतस्वरूप परब्रह्मका
साक्षात्कार किया॥ ८-१०॥
[उस समय श्रीहरिं यह सोचने लगे कि] यह
अग्निस्तम्भ यहाँ कहाँसे प्रकट हुआ है? हम दोनों
फिर इसकी परीक्षा करें। मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भके
२३२
वेदशब्दोभयावेशं विश्वात्मानं व्यचिन्तयत्।
तदाभवदृषिस्तत्र ऋषेः सारतमः स्मृतः॥
तेनैव ऋषिणा विष्णुरज्ञातवान्परमेश्वरम्।
महादेवं परं ब्रह्म शब्दब्रह्मतनुं परम्॥ १३
चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह।
अप्राप्य तन्निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः॥ १४
एकाक्षरेण तद्वाक्यमृतं परमकारणम्।
सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम्॥ १५
एकाक्षरादकाराख्याद्भगवान्बीजकोऽण्डजः।
एकाक्षरादुकाराख्याद्धरिः परमकारणम्॥ १६
आही
सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहक: ॥ १७
मकाराख्यस्तु यो नित्यमनुग्रहकरोऽभवत्।
मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीज उच्यते॥ १८
उकाराख्यो हरियोंनि: प्रधानपुरुषेश्वरः।
बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः ॥ १९
बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः।
अस्य लिङ्गादभूद् बीजमकारो बीजिनः प्रभोः ॥ २०
उकारयोनौ निःक्षिप्तमवर्धत समन्ततः।
सोवर्णमभवच्चाण्डमावेद्य तदलक्षणम्॥ २१
अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम्।
ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम्॥ २२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ८
नीचे जाऊँगा। ऐसा विचार करते हुए श्रीहरिने वेद
और शब्द दोनोंके आवेशसे युक्त विश्वात्मा शिवका
चिन्तन किया। तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जो
ऋषिसमूहके परम साररूप माने जाते हैं ॥ ११-१२॥
उन्हीं ऋषिके द्वारा परमेश्वर श्रीविष्णुने जाना
कि इस शब्दब्रह्ममय शरीरवाले परम लिंगके रूपमें
साक्षात् परब्रह्मस्वरूप महादेवजी ही यहाँ प्रकट हुए
हैं॥ १३॥
ये चिन्तारहित अथवा अचिन्त्य रुद्र हैं, जहाँ
जाकर मनसहित वाणी उसे प्राप्त किये बिना ही लौट
आती है, उस परब्रह्म परमात्मा शिवका वाचक
एकाक्षर प्रणव ही है, वे इसके वाच्यार्थरूप हैं ॥ १४॥
उस परम कारण, ऋत, सत्य, आनन्द एवं
अमृतस्वरूप परात्पर परब्रह्मको इस एकाक्षरके द्वारा
ही जाना जा सकता है॥ १५॥
प्रणवके एक अक्षर अकारसे जगत्के बीजभूत
अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्माका बोध होता है। उसके
दूसरे एक अक्षर उकारसे परमकारणरूप श्रीहरिका
बोध होता है और तीसरे एक अक्षर मकारसे भगवान्
नीललोहित शिवका ज्ञान होता है। अकार सृष्टिकर्ता
है, उकार मोहमें डालनेवाला है और मकार नित्य
अनुग्रह करनेवाला है। मकार-बोध्य सर्वव्यापी शिव
बीजी [बीजमात्रके स्वामी] हैं और अकारसंज्ञक मुझ
ब्रह्माको बीज कहा जाता है। उकारसंज्ञक श्रीहरि
योनि हैं। प्रधान और पुरुषके भी ईश्वर जो महेश्वर
हैं, वे बीजी, बीज और योनि भी हैं। उन्हींको नाद
कहा गया है॥ १६-१९॥
बीजी अपनी इच्छासे ही अपने बीजको अनेक
रूपोंमें विभक्त करके स्थित हैं। इन बीजी भगवान्
महेश्वरके लिंगसे अकाररूप बीज प्रकट हुआ॥ २०॥
जो उकाररूप योनिमें स्थापित होकर सब
ओर बढ़ने लगा, वह सुवर्णमय अण्डके रूपमें ही
बतानेयोग्य था। उसका अन्य कोई विशेष लक्षण नहीं
लक्षित होता था॥ २१॥
वह दिव्य अण्ड अनेक वर्षोतक जलमें ही
स्थित रहा। तदनन्तर एक हजार वर्षके बाद उस
अण्डके दो टुकड़े हो गये। जलमें स्थित हुआ वह
हि ८]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२३३
अण्डमप्सु स्थितं साक्षाद् व्याघातेनेश्रेण तु।
तथास्य सुशुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम्॥ २३
जज्ञे सा द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा।
तस्मादण्डाद्भवो जज्ञे ककाराख्यश्चतुर्मुखः॥ २४
स स्त्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः।
एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः॥ २५
यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम्।
एवमेव हरे ब्रहमन्नित्याहुश्चावयोस्तदा॥ २६
ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छक्तिसम्भवैः।
मन्त्रैमहेश्वर॑ देवं तुष्टाव सुमहोदयम्॥ २७
एतस्मिन्नन्तरेऽन्यच्य रूपमद्भुतसुन्दरम्।
ददर्श च मया सार्ध भगवान्विश्वरपालकः॥ २८
पञ्चवक्त्रं दशभुजं गौरकर्पूरवन्मुने।
नानाकान्तिसमायुक्तं नानाभूषणभूषितम्॥ २९
महोदारं महावीर्यं महापुरुषलक्षणम्।
तं दृष्ट्वा परमं रूपं कृतारथोऽभून्मया हरिः॥ ३०
अथ प्रसन्नो भगवान्महेशः परमेश्वरः।
दिव्यं शब्दमयं रूपमाख्याय प्रहसन्स्थितः॥ ३१
अकारस्तस्य मूर्धा हि ललाटो दीर्घ उच्यते।
इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम्॥ ३२
उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाम उच्यते।
ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः॥
अण्ड अजन्मा ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका स्थान था और
साक्षात् महेश्वरके आघातसे ही फूटकर दो भागोंमें
बँट गया था। उस अवस्थामें ऊपर स्थित हुआ उसका
सुवर्णमय कपाल बड़ी शोभा पाने लगा॥ २२-२३॥
वही झुलोकके रूपमें प्रकट हुआ तथा जो
उसका दूसरा नीचेवाला कपाल था, वही यह पाँच
लक्षणाँसे युक्त पृथिवी है। उस अण्डसे चतुर्भुज ब्रह्मा
उत्पन्न हुए, जिनकी “क'” संज्ञा है॥ २४॥
वे समस्त लोकोंके स्रष्टा हैं। इस प्रकार वे
भगवान् महेश्वर ही 'अ', 'उ' और "म्'-इन
त्रिविध रूपोंमें वर्णित हुए हैं। इसी अभिप्रायसे उन
ज्योतिर्लिगस्वरूप सदाशिवने ' ओम्', ' ओम्'-ऐसा
कहा-यह बात यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्र कहते हैं॥ २५॥
यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्रोंका यह कथन सुनकर
ऋचाओं और साममन्त्रोंने भी हमसे आदरपूर्वक यह
कहा-हे हरे! हे ब्रह्मन्! यह बात ऐसी ही है॥ २६॥
इस तरह देवेश्वर शिवको जानकर श्रीहरिने
शक्तिसम्भूत मन्त्रोद्वारा उत्तम एवं महान् अभ्युदयसे
शोभित होनेवाले उन महेश्वर देवका स्तवन किया॥ २७॥
इसी बीचमें विश्वपालक भगवान् विष्णुने मेरे साथ
एक और भी अद्भुत एवं सुन्दर रूपको देखा ॥ २८॥
हे मुने! वह रूप पाँच मुखों और दस भुजाओंसे
अलंकृत था। उसकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी।
वह नाना प्रकारकी छटाओंसे और भाँति-भाँतिके
आभूषणोंसे विभूषित था॥ २९॥
उस परम उदार, महापराक्रमी और महापुरुषके
लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त उत्कृष्ट रूपका दर्शन करके
मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये॥ ३०॥
तत्पश्चात् परमेश्वर भगवान् महेश प्रसन्न होकर
अपने दिव्य शब्दमय रूपको प्रकट करके हँसते हुए
खड़े हो गये॥ ३१॥
[हस्व] अकार उनका मस्तक और दीर्घ
अकार ललाट है। इकार दाहिना नेत्र और ईकार बायाँ
नेत्र है॥ ३२॥
उकारको उनका दाहिना और ऊकारको बायाँ
कान बताया जाता है। ऋकार उन पस्मेश्वरका दायाँ
कपोल है और ऋकार उनका बायाँ कपोल है।
२३४
वामं कपोलमृकारो लू लृ नासापुटे उभे।
एकारश्रोष्ठ ऊर्ध्वश्च ह्यैकारस्त्वधरो विभोः॥
ओकारश्च तथौकारो दन्तपड्क्तिद्वयं क्रमात्।
अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य शूलिनः॥ ३५
'कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्ज हस्ताश्च दक्षिणे।
चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तास्तु वामतः॥ ३६
'टादिपञ्चाक्षरं पादास्तादि पञ्चाक्षरं तथा।
पकार उदरं तस्य फकारः पार्श्व उच्यते॥ ३७
बकारो वामपार्श्वस्तु भकारः स्कन्ध उच्यते।
मकारो हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः॥ ३८
यकारादिसकारान्ता विभोवै सप्तधातवः।
हकारो नाभिरूपो हि क्षकारो घ्राण उच्यते ॥ ३९
एवं शब्दमयं रूपमगुणस्य गुणात्मनः।
दृष्ट्वा तमुमया सार्ध कृतार्थोऽभून्मया हरि: ॥ ४०
एवं दृष्ट्वा महेशानं शब्दब्रह्मतनुं शिवम्।
प्रणम्य च मया विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः ॥ ४१
ॐकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्जकसंयुतम्।
शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम्॥ ४२
मेधाकारमभूद्धूयः सर्वधर्मार्थसाधकम् ।
गावत्रीप्रभवं मन्त्रं सहितं वश्यकारकम्॥ ४३
चतुर्विशतिवर्णा्यं चतुष्कलमनुत्तमम्।
अथ पञ्जसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम्॥ ४४
आभिचारिकमत्यर्थ प्रायस्त्रिंशच्छुभाक्षरम्।
यजुरवेदसमायुक्तं पञ्जविंशच्छुभाक्षरम्॥ ४५
'कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा।
त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लेहितम्॥ ४६ है
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ८
लू और लृ-ये उनकी नासिकाके दोनों छिद्र हैं।
एकार उन सर्वव्यापी प्रभुका ऊपरी ओष्ठ है और
ऐकार अधर है॥ ३३-३४॥
ओकार तथा औकार--ये दोनों क्रमश: उनकी
ऊपर और नीचेकी दो दंतपंक्तियाँ हैं। अं और अ: उन
देवाधिदेव शूलधारी शिवके दोनों तालु हैं॥ ३५॥
क आदि पाँच अक्षर उनके दाहिने पाँच हाथ हैं
और च आदि पाँच अक्षर बायें पाँच हाथ हैं॥ ३६॥
ट आदि और त आदि पाँच-पाँच अक्षर उनके पैर
हैं। पकार पेट है । फकारको दाहिना पार्श्व बताया जाता है
और बकारको बायाँ पार्श्व । भकारको कंधा कहा जाता है।
मकार उन योगी महादेव शम्भुका हृदय है ॥ ३७-३८॥
यसे लेकर स तक [य, र, ल, व, श, ष तथा
स-ये सात अक्षर] सर्वव्यापी शिवकी सात धातुएँ
हैं। हकारको उनकी नाभि और क्षकारको नासिका
कहा जाता है॥ ३९॥
इस प्रकार निर्गुण एवं गुण-स्वरूप परमात्माके
शब्दमय रूपको भगवती उमासहित देखकर श्रीहरि
मेरे साथ कृतार्थ हो गये॥ ४०॥
इस प्रकार शब्द ब्रह्ममय-शरीरधारी महेश्वर
शिवका दर्शन पाकर मेरे साथ श्रीहरिने उन्हें प्रणाम
करके पुनः ऊपरकी ओर देखा ॥४१॥
उस समय उन्हें पाँच कलाओंसे युक्त,
ओंकारजनित, शुद्ध स्फटिक मणिके समान सुन्दर,
अडतीस अक्षरोंवाले मनत्रका साक्षात्कार हुआ॥ ४२॥
पुन: सम्पूर्ण धर्म तथा अर्थका साधक, बुद्धिस्वरूप,
अत्यन्त हितकारक और सबको वशमें करनेवाला
गायत्री नामक महान् मन्त्र लक्षित हुआ। वह चौबीस
अक्षरों तथा चार कलाओंसे युक्त श्रेष्ठ मन्त्र है।
पंचाक्षरमन्त्र (नमः शिवाय) आठ कलाओंसे युक्त
है ॥ ४३-४४॥
अभिचारसिद्भिके लिये प्रयोग किया जानेवाला
मन्त्र तीस अक्षरोंसे सम्पन्न है, किंतु यजुर्वेदमें प्रयुक्त
मन्त्र पच्चीस सुन्दर अक्षरोंका ही है॥ ४५॥
यह आठ कलाओसे युक्त तथा सुश्वेत मन्त्र है,
जिसका प्रयोग शान्तिकर्मकी सिद्धिके लिये किया जाता
। इस मन्त्रके अतिरिक्त तेरह. कलाओंसे युक्त जो श्रेष्ठ
E ९]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२३५
बभूवुरस्य चोत्तत्तिवृद्धिसंहारकारणम्।
चर्णा एकाधिका: षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु॥ ४७
पुनर्मृत्युञ्जयं मन्त्रं पञ्चाक्षरमतः परम्।
चिन्तामणिं तथा मन्त्रं दक्षिणामूर्तिसंज्ञकम्॥ ४८
ततस्तत्त्वमसीत्युक्तं महावाक्यं हरस्य च।
पञ्जमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान्हरिः ॥ ४९
अथ दृष्ट्या कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम्।
ईशानमीशमुकुटं पुरुषाख्यं पुरातनम्॥ ५०
अघोरहृदयं हृद्यं सर्वगुह्यं सदाशिवम्।
वामपादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम्॥ ५१
विश्वतः पादवन्तं तं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम्।
ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम्॥ ५२
तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः साम्बं वरदमीश्वरम्।
मया च सहितो विष्णुर्भगवांस्तुष्टचेतसा॥ ५३
मन्त्र है, वह बाल, युवा और वृद्ध आदि अवस्थाओंमें
आनेवाले क्रमके अनुसार उत्पत्ति, पालन तथा संहारका
कारणरूप है । इसमें इकसठ वर्ण होते हैं ॥ ४६-४७॥
इसके पश्चात् विष्णुने मृत्युंजयमन्त्र, पंचाक्षरमन्त्र,
चिन्तामणिमनत्र^ तथा दक्षिणामूर्तिमनत्रः को देखा॥ ४८॥
इसके बाद भगवान् विष्णुने शंकरको “तत््मसि-
वही तुम हो '--यह महावाक्य कहा। इस प्रकार उक्त
पंचमन्त्रोंको प्राप्त करके वे भगवान् श्रीहरि उनका
जप करने लगे॥ ४९॥
इसके पश्चात् ऋक्, यजुः, सामरूप वर्णोको
कलाओंसे युक्त, ईशान, ईशोंके मुकुट, पुरातन, पुरुष,
अघोरहदय, मनोहर, सर्वगुह्य, सदाशिव, ताण्डव-नृत्यादि
कालोंमें वामपादपर अवस्थित रहनेवाले, महादेव, महान्
सर्पराजको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, चारों
ओर चरण और नेत्रवाले, कल्याणकारी, ब्रह्माके अधिपति,
सृष्टिःस्थितिःसंहारके कारणभूत, वरदायक साम्बमहेश्वरको
देखकर भगवान् विष्णु प्रसन्न मनसे प्रिय वचनोंद्वारा मेरे
साथ उनकी स्तुति करने लगे॥ ५०-५३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शब्दब्रह्मतनुवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
शब्दब्रह्म-तनु-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूपका विवेचन
तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंकी एकताका प्रतिपादन
ब्रह्मोवाच
अथाकर्ण्य नुतिं विष्णुकृतां स्वस्य महेश्वर: ।
प्रादुर्बभूव सुप्रीतः सवामः करुणानिधिः॥ १
पञ्चवकत्रस्त्रिनयनो भालचन्द्रो जटाधरः।
गौरवर्णो विशालाक्षो भस्मोदधूलितविग्रहः॥ २
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] भगवान् विष्णुके
द्वारा की हुई अपनी स्तुति सुनकर करुणानिधि महेश्वर
प्रसन्न हुए और उमादेवीके साथ सहसा वहाँ प्रकट
हो गये॥ १॥
[उस समय] उनके पाँच मुख और प्रत्येक
मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। भालदेशमें
चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था। सिरपर जटा धारण
किये, गौरवर्ण, विशाल नेत्रवाले शिवने अपने सम्पूर्ण
अंगोंमें विभूति लगा रखी थी॥ २॥
१. ' क्ष्म्यौ ¬यह चिन्तामणिमन्त्र है।
२. ' नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रयच्छ स्वाहा।-यह दक्षिणमूर्ति नामक मन्त्र है।
२३६
दशबाहुर्नीलगल: सर्वाभरणभूषित: ।
सर्वाङ्गसुन्दरो भस्मत्रिपुण्ड्राड्रितमस्तक: ॥
तं दृष्ट्या तादृशं देवं सवामं परमेश्वरम्।
तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्विष्णुमया सह॥ ४
निगमं श्वासरूपेण ददौ तस्मै ततो हरः।
विष्णवे च प्रसन्नात्मा महेशः करुणाकरः॥ ५
ततो ज्ञानमदात्तस्मै रहस्यं परमात्मने।
परमात्मा पुनर्मह्यं दत्तवान्कृपया मुने॥ ६
सम्प्राप्य निगमं विष्णुः पप्रच्छ पुनरेव तम्।
कृतार्थः साञ्जलिर्नत्वा मया सह महेश्वरम्॥ ७
विष्णुरुवाच
कथं च तुष्यसे देव मया पूज्यः कथं प्रभो।
कथं ध्यानं प्रकर्तव्यं कथं व्रजसि वश्यताम्॥ ८
किं कर्तव्यं महादेव ह्यावाभ्यां तव शासनात्।
सदा सदाज्ञापय नौ प्रीत्यर्थ कुरु शङ्कर॥ ९
एतत्सर्वं महाराज कृपां कृत्वावयोः प्रभो।
कथनीयं तथान्यच्च विज्ञाय स्वानुगो शिव॥ १०
ब्रह्मोवाच
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नो भगवान्हरः।
उवाच वचनं प्रीत्या सुप्रसन्नः कृपानिधिः॥ ११
श्रीशिव उवाच
भक्त्या च भवतोर्नूनं प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ।
पश्यन्तं मां महादेवं भयं सर्व विमुञ्जताम्॥ १२
मम लिङ्गं सदा पूज्यं ध्येयं चैतादृशं मम।
इदानीं दृश्यते यद्वत्तथा कार्य प्रयत्नतः ॥ १३
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ९
उनकी दस भुजाएँ थीं । उनके कण्ठमें नीला चिहृ
था। वे समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे । उन सर्वांगसुन्दर
शिवके मस्तक भस्ममय त्रिपुण्ड्से अंकित थे॥३॥
ऐसे परमेश्वर महादेवजीको भगवती उमाके
साथ उपस्थित देखकर भगवान् विष्णुने मेरे साथ पुन:
प्रिय वचनोंद्रार उनकी स्तुति की ॥ ४॥
तब करुणाकर भगवान् महेश्वर शिवने प्रसन्नचित्त
होकर उन श्रीविष्णुदेवको श्वासरूपसे वेदका उपदेश
दिया॥५॥
हे मुने! उसके बाद शिवने परमात्मा श्रीहरिको
गुह्य ज्ञान प्रदान किया। फिर उन परमात्माने कृपा
करके मुझे भी वह ज्ञान दिया॥६॥
वेदका ज्ञान प्राप्तकर कृतार्थ हुए भगवान्
विष्णुने मेरे साथ हाथ जोड़कर महेश्वरको नमस्कार
करके पुनः उनसे पूछा ॥ ७॥
विष्णुजी बोले-हे देव! आप कैसे प्रसन्न
होते हैं हे प्रभो! मैं आपकी पूजा किस प्रकार करूँ?
आपका ध्यान किस प्रकारसे किया जाय और आप
किस विधिसे वशमें हो जाते हैं ?॥ ८॥
हे महादेव! आपकी आज्ञासे हम लोगोंको क्या
करना चाहिये ? हे शंकर! कौन कार्य अच्छा है और कौन
बुरा है, इस विवेके लिये हम दोनोंके ऊपर कल्याणहेतु
आप प्रसन्न हों और उचित बतानेकी कृपा करें॥ ९॥
हे महाराज! हे प्रभो! हे शिव! हम दोनोंपर
कृपा करके यह सब एवं अन्य जो कहनेयोग्य है, वह
सब हम दोनोंको अपना अनुचर समझकर बतायें॥ १०॥
ब्रह्माजी बोले-[हे मुने!] [ श्रीहरिकौ] यह
बात सुनकर प्रसन्न हुए कृपानिधान भगवान् शिव
प्रीतिपूर्वक यह बात कहने लगे॥ ११॥
श्रीशिवजी बोले-हे सुरक्रेष्ठणण! मैं आप
दोनोंकी भक्तिसे निश्चय ही बहुत प्रसन्न हूँ। आपलोग
मुझ महादेवकी ओर देखते हुए सभी भयोंको छोड़
दीजिये ॥ १२॥
मेरा यह लिंग सदा पूज्य है, सदा ही ध्येय है।
इस समय आपलोगोंको मेरा स्वरूप जैसा दिखायी
देता है, वैसे ही लिंगरूपका प्रयलपूर्वक पूजन-चिन्तन
करना चाहिये॥ १३॥
28 ९]
पूजितो लिङ्गरूपेण प्रसन्नो विविधं फलम्।
दास्यामि सर्वलोकेभ्यो मनोऽभीष्टान्यनेकशः॥ १४
यदा दुःखं भवेत्तत्र युवयोः सुरसत्तमौ।
पूजिते मम लिङ्गे च तदा स्याद् दुःखनाशनम्॥ १५
युवां प्रसूतौ प्रकृतेर्मदीयाया महाबलौ।
सव्यापसव्यगात्राभ्यां मम सर्वेश्वरस्य हि॥ १६
अयं मे दक्षिणात्पार्श्वाद् ब्रह्मा लोकपितामहः।
वामपार्श्वाच्च विष्णुस्त्वं समुत्पन्नः परात्मनः॥ १७
प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्यां यथेष्सितम्।
मयि भक्तिर्दूढा भूयाद्युवयोरभ्यनुञ्ञया॥ १८
पार्थिवीं चैव मन्मूर्ति विधाय कुरुतं युवाम्।
सेवां च विविधां प्राज्ञौ कृत्वा सुखमवाप्स्यथः॥ १९
ब्रह्मन्सृष्टिं कुरु त्वं हि मदाज्ञापरिपालकः।
वत्स वत्स हरे त्वं च पालयैवं चराचरम्॥ २०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा नौ प्रभुस्ताभ्यां पूजाविधिमदाच्छुभाम्।
येनैव पूजितः शम्भुः फलं यच्छत्यनेकशः॥ २१
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च सहितो हरिः।
प्रत्युबाच महेशानं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ २२
विष्णुरुवाच
यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ।
भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी ॥ २३
त्वमप्यवतरस्वाद्य लीलया निर्गुणोऽपि हि।
सहायं कुरु नौ तात त्वं परः परमेश्वरः ॥ २४
आवयोदेँबदेवेश विवादमपि शोभनम्।
इहागतो भवान्यस्माद्विवादशमनाय नौ॥ २५
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२३७
लिंगरूपसे पूजा गया मैं प्रसन्न होकर सभी
लोगोंको अनेक प्रकारके फल तो दूँगा ही, साथ ही
मनकी अन्य अनेक अभिलाषाएँ भी पूरी करूँगा। हे
देवश्रेष्ठ जब भी आपलोगोंको कष्ट हो, तब मेरे
लिंगकी पूजा करें, जिससे आपलोगोंके कष्टका नाश
हो जायगा॥ १४-१५॥
आप दोनों महाबली देवता मेरी स्वरूपभूत
प्रकृतिसे और मुझ सर्वेश्वरके दायें और बायें अंगोंसे
प्रकट हुए हैं॥ १६॥
ये लोकपितामह ब्रह्मा मुझ परमात्माके दाहिने
पार्श्वसे उत्पन्न हुए हैं और आप विष्णु वाम पार्श्वसे
प्रकट हुए हैं॥ १७॥
मैं आप दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हँ. और
मनोवांछित वर दे रहा हूँ। मेरी आज्ञासे आप दोनोंकी
मुझमें सुदूढ़ भक्ति हो॥ १८॥
हे विद्वानो! मेरी पार्थिव-मूर्ति बनाकर आप दोनों
उसकी अनेक प्रकारसे पूजा करें। ऐसा करनेपर
आपलोगोंको सुख प्राप्त होगा॥ १९॥
हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञाका पालन करते हुए
जगतूकी सृष्टि कीजिये और हे विष्णो! आप इस
चराचर जगतूका पालन कीजिये॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले-हम दोनोंसे ऐसा कहकर
भगवान् शंकरने हमें पूजाको उत्तम विधि प्रदान की,
जिसके अनुसार पूजित होनेपर शिव अनेक प्रकारके
फल देते हैं॥ २१॥
शम्भुकी यह बात सुनकर श्रीहरि मेरे साथ महेश्वरको
हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे ॥ २२॥
विष्णु बोले--[हे प्रभो!] यदि हमारे प्रति
आपमें प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हमें वर
देना चाहते हैं, तो हम यही वर माँगते हैं कि आपमें
हम दोनोंकी सदा अविचल भक्ति बनी रहे॥ २३॥
आप निर्गुण हैं, फिर भी अपनी लीलासे आप
अवतार धारण कीजिये। हे तात! आप परमेश्वर हैं,
हमलोगोंकी सहायता करें॥ २४॥
हे देवदेवेश्वर! हम दोनोंका विवाद शुभदायक
रहा, जिसके कारण आप हम दोनोंके विवादको शान्त
करनेके लिये यहाँ प्रकट हुए॥ २५॥
ब्रह्मोवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम्।
प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटः स्वयम्॥
श्रीमहेश उवाच
प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ताहं सगुणोऽगुणः।
परब्रह्म निर्विकारी सच्चिदानन्दलक्षणः॥ २७
त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया।
सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलोऽहं सदा हरे॥ २८
स्तुतोऽहं यत्त्वया विष्णो ब्रह्मणा मेऽवतारणे।
प्रार्थनां तां करिष्यामि सत्यां यद्भक्तवत्सलः॥ २९
मद्रूपं परमं ब्रह्मन्नीदूशं भवदङ्गतः।
प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्र: प्रकीर्तितः ॥ ३०
मदंशात्तस्य सामर्थ्य न्यूनं नैव भविष्यति।
योऽहं सोऽहं न भेदोऽस्ति पूजाविधिविधानतः॥ ३१
यथा च ज्योतिषः सङ्गाजलादेः स्पर्शता न वै।
तथा ममागुणस्यापि संयोगाद् बन्धनं न हि॥ ३२
शिवरूपं ममैतच्च रुद्रोऽपि शिववत्तदा।
ज तत्र परभेदो वै कर्तव्यश्च महामुने॥ ३३
वस्तुतो ह्येकरूपं हि द्विधा भिन्नं जगत्युत।
अतो भेदो न विज्ञेयः शिवे रुद्रे कदाचन॥ ३४
सुवर्णस्य यथैकस्य वस्तुत्वं नैव गच्छति।
अलङ्कृतिकृते देव नामभेदो न स्तुतः ॥ ३५
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ९
ब्रह्माजी बोले-[हे मुने!] श्रीहरिकी यह
बात सुनकर भगवान् हरने मस्तक झुकाकर प्रणाम
करके स्थित हुए उन श्रीहरिसे पुन: कहा। वे विष्णु
स्वयं हाथ जोड़कर खड़े रहे॥ २६॥
श्रीमहेश बोले--मैं सृष्टि, पालन और संहारका
कर्ता, सगुण, निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानन्दलक्षणवाला
तथा परब्रह्म परमात्मा हूँ॥ २७॥
हे विष्णो! सृष्टि, रक्षा और प्रलयरूप गुणोंके
भेदसे मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रका नाम धारण
करके तीन स्वरूपोंमें विभक्त हुआ हूँ। हे हरे! मै
वास्तवमें सदा निष्कल हुँ॥ २८॥
हे विष्णो! आपने और ब्रह्माने मेरे अवतारके
निमित्त जो मेरी स्तुति की है, उस प्रार्थनाको मैं अवश्य
सत्य करूँगा; क्योंकि मैं भक्तवत्सल हुँ ॥ २९॥
ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही परम उत्कृष्ट रूप तुम्हारे
शरीरसे इस लोकमें प्रकट होगा, जो नामसे “रुद्र'
कहलायेगा॥ ३०॥
मेरे अंशसे प्रकट हुए रुद्रकी सामर्थ्य मुझसे कम
नहीं होगी। जो मैं हूँ, वही ये रुद्र हैं। पूजाके विधि-
विधानकी दृष्टिसे भी मुझमें और उनमें कोई अन्तर
नहीं है॥३१॥
जैसे जल आदिके साथ ज्योतिर्मय बिम्बका
(प्रतिबिम्बके रूपमें) सम्पर्क होनेपर भी बिम्बमें
स्पर्शदोष नहीं लगता, उसी प्रकार मुझ निर्गुण
परमात्माको भी किसीके संयोगसे बन्धन नहीं प्राप्त
होता॥ ३२॥
यह मेरा शिवरूप है। जब रुद्र प्रकट होंगे, तब
वे भी शिवके ही तुल्य होंगे। हे महामुने! [मुझमें
और] उनमें परस्पर भेद नहीं करना चाहिये॥ ३३॥
वास्तवमें एक ही रूप सब जगत्में [व्यवहारः
निर्वाहके लिये] दो रूपोंमें विभक्त हो गया है। अतः
शिव और रूद्रमें कभी भी भेद नहीं मानना चाहिये॥ ३४॥
[शिव और रुद्रमें भेद वैसे ही नहीं है] जैसे
एक सुवर्णखण्डमें समरूपसे एक ही वस्तुतत्त्
विद्यमान रहता है, किंतु उसीका आभूषण बना देनेपर
नामभेद आ जाता है। वस्तुतत्त्वकी दृष्टिसे उसमें भेद
नहीं होता॥ ३५ ॥
९]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२३९
यथैकस्य मृदो भेदो नानापात्रे न वस्तुत: ।
कारणस्यैव कार्ये न सन्निधानं निदर्शनम्॥ ३६
ज्ञातव्यं बुधवयेश्व निर्मलज्ञानिभिः सुरौ।
एवं ज्ञात्वा भवदशभ्यां तु न दृश्यं भेदकारणम्॥ ३७
वस्तुवत् सर्वदूश्यं च शिवरूपं मतं मम।
अहं भवानजश्चैव रुद्रो योऽयं भविष्यति॥ ३८
एकरूपा न भेदस्तु भेदे वै बन्धनं भवेत्।
तथापि च मदीयं हि शिवरूपं सनातनम्॥ ३९
मूलीभूतं सदोक्तं च सत्यज्ञानमनन्तकम्।
एवं ज्ञात्वा सदा ध्येयं मनसा चैव तत्त्वतः ॥ ४०
श्रूयतां चैव भो ब्रह्मन् यद्गोप्यं कथ्यते मया।
भवन्तौ प्रकृतेर्यातौ नायं वै प्रकृतेः पुनः ॥ ४९
मदाज्ञा जायते तत्र ब्रह्मणो भुकुटेरहम्।
गुणेष्वपि यथा प्रोक्तस्तामसः प्रकृतो हरः॥ ४२
वैकारिकश्च विज्ञेयो योऽहङ्कार उदाहृतः।
नामतो वस्तुतो नैव तामसः परिचक्ष्यते॥ ४३
एतस्मात्कारणाद्. ब्रह्मन्करणीयमिदं त्वया।
सृष्टिकर्ता भव ब्रहन्सष्टेश्च पालको हरिः॥ ४४
मदीयश्च तथांशो यो लयकर्ता भविष्यति।
इयं या प्रकृतिर्देवी ह्युमाख्या परमेश्वरी॥ ४५
तस्यास्तु शक्तिर्वाग्देवी ब्रह्माणं सा भजिष्यति।
अन्या शक्ति: पुनस्तत्र प्रकृतेः सम्भविष्यति॥ ४६
समाश्रयिष्यते विष्णुं लक्ष्मीरूपेण सा तदा।
पुनश्च काली नाम्ना सा मदंशं प्राप्स्यति ्रुवम्॥ ४७
जिस प्रकार एक ही मिट्टीसे बने हुए नाना
प्रकारके पात्रोंमें नाम और रूपका तो भेद आ जाता
है, किंतु मिट्टीका भेद नहीं होता; क्योंकि कार्यमें
कारणकी ही विद्यमानता दिखायी देती है। हे देवो!
निर्मल ज्ञानवाले श्रेष्ठ विद्वानोंको यह जान लेना
चाहिये। ऐसा समझकर आपलोग भी शिव और रुद्रमें
भेदबुद्धिवाली दृष्टिसे न देखें ॥ ३६-३७॥
वास्तवमें सारा दृश्य ही मेरा शिवरूप है--ऐसा
मेरा मत है। मैं, आप, ब्रह्मा तथा जो ये रुद्र प्रकट
होंगे, वे सब-के-सब एकरूप हैं, इनमें भेद नहीं है।
भेद माननेपर अवश्य ही बन्धन होगा। तथापि मेरे
शिवरूपको ही सर्वदा सनातन, मूलकारण, सत्यञ्ञानमय
तथा अनन्त कहा गया है--ऐसा जानकर आपलोगोंको
सदा मनसे मेरे यथार्थ स्वरूपका ध्यान करना
चाहिये॥ ३८--४० ॥
हे ब्रह्मन्! सुनिये, मैं आपको एक गोपनीय बात
बता रहा हूँ। आप दोनों प्रकृतिसे उत्पन्न हुए हैं, किंतु
ये रुद्र प्रकृतिसे उत्पन्न नहीं हैं ॥ ४१॥
मैं अपनी इच्छासे स्वयं ब्रह्माजीकी भ्रुकुटिसे प्रकट
हुआ हूँ। गुणोंमें भी मेरा प्राकट्य कहा गया है । जैसा
कि लोगोंने कहा है कि हर तामस प्रकृतिके हैं । वास्तवमें
उस रूपमें अहंकारका वर्णन हुआ है । उस अहंकारको
केवल तामस ही नहीं, वैकारिक [ सात्त्विक] भी समझना
चाहिये; [सात्त्विक देवगण वैकारिक अहंकारकी ही
सृष्टि हैं ।] यह तामस और सात्त्विक आदि भेद केवल
नाममात्रका है, वस्तुत: नहीं है। वास्तवमें हरको तामस
नहीं कहा जा सकता॥ ४२-४३ ॥
हे ब्रह्मन्! इस कारणसे आपको ऐसा करना
चाहिये। हे ब्रह्मन्! आप इस सृष्टिके निर्माता बनें और
श्रीहरि इसका पालन करनेवाले हों॥ ४४॥
मेरे अंशसे प्रकट होनेवाले जो रुद्र हैं, वे इसका
प्रलय करनेवाले होंगे। ये जो उमा नामसे विख्यात परमेश्वरी
प्रकृति देवी हैं, इन्हींकी शक्तिभूता वाग्देवी ब्रह्माजीका
सेवन करेंगी। पुन: इन प्रकृति देवीसे वहाँ जो दूसरी
शक्ति प्रकट होंगी, वे लक्ष्मीरूपसे भगवान् विष्णुका
आश्रय लेंगी। तदनन्तर पुन: काली नामसे जो तीसरी
शक्ति प्रकट होंगी, वे निश्चय ही मेरे अंशभूत रुद्रदेबको
२४०
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ९
ज्योतीरूपेण सा तत्र कार्यार्थे सम्भविष्यति।
एवं देव्यास्तथा प्रोक्ताः शक्तयः परमाः शुभाः ॥
सृष्टिस्थितिलयानां हि कार्य तासां क्रमाद् ध्रुवम्।
एतस्याः प्रकृतेरंशा मत्प्रियाया: सुरोत्तम॥ ४९
त्वं च लक्ष्मीमुपाश्रित्य कार्य कर्तुमिहाहसि।
ब्रह्मंस्त्वं च गिरां देवीं प्रकृत्यंशामवाप्य च॥ ५०
सृष्टिकार्यं हृदा कर्तु मनिनर्देशादिहार्हसि।
अहं कालीं समाश्रित्य मत्प्रियांशां परात्पराम्॥ ५१
रुद्ररूपेण प्रलयं करिष्ये कार्यमुत्तमम्।
चतुर्वर्णमयं लोकं तत्सवैराश्रमैश्ुवम्॥ ५२
तदन्येरविविधैः कार्य: कृत्वा सुखमवाप्स्यथः।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्तो लोकानां हितकारकः॥ ५३
मुक्तिदोऽत्र भवानद्य भव लोके मदाज्ञया।
मददर्शने फलं यद्त्तदेव तव दर्शने॥ ५४
इति दत्तो वरस्तेऽद्य सत्यं सत्यं न संशय: ।
ममैव हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये ह्याम्॥ ५५
उभयोरन्तरं यो वै न जानाति मनो मम।
वामाङ्गजो मम हरिर्दक्षिणाड्रोद्धवो विधिः॥ ५६
महाप्रलयकृद् रुद्रो विश्वात्मा हृदयोद्भवः।
त्रिधा भिन ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया ॥ ५७
सर्गरक्षालयकरस्त्रिगुण रज आदिभिः।
गुणभिन्नः शिवः साक्षात्प्रकृतेः पुरुषात्पर: ॥ ५८
परं ब्रह्माद्रयो नित्योऽनन्तः पूर्णो निरञ्जनः।
अत्तस्तमो बहिःसत्त्वस्त्रिजगत्पालको हरिः॥ ५९
अन्तः सत्तवस्तमोबाह्य्त्रिजगल्लयकृद्धरः ॥ ६०
प्राप्त होंगी । वे कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ ज्योतिरूपसे
प्रकट होंगी। इस प्रकार मैंने देवीकी शुभस्वरूपा
पराशक्तियोंको बता दिया॥ ४५-४८॥
उनका कार्य क्रमशः सृष्टि, पालन और संहारका
सम्पादन ही है। हे सुरश्रेष्ठ! ये सब-की-सब मेरी
प्रिया प्रकृति देवीकी अंशभूता हैं ॥ ४९॥
हे हरे! आप लक्ष्मीका सहारा लेकर कार्य
कोजिये। हे ब्रह्मन्! आप प्रकृतिकी अंशभूता वाग्देवीको
प्राप्तकर मेरी आज्ञाके अनुसार मनसे सृष्टिकार्यका
संचालन करें और मैं अपनी प्रियाकी अंशभूता परात्पर
कालीका आश्रय लेकर रुद्ररूपसे प्रलयसम्बन्धी उत्तम
कार्य करूंगा। आप सब लोग अवश्य ही सम्पूर्ण
आश्रमों तथा उनसे भिन्न अन्य विविध कार्योद्वारा
चारों वर्णोसे भरे हुए लोककी सृष्टि एवं रक्षा आदि
करके सुख पायेंगे॥ ५०-५२१/२॥
[हे हरे!] आप ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा
सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी हैं। अत: अब आप मेरी
आज्ञासे जगतूमें [सब लोगोंके लिये] मुक्तिदाता बनें।
मेरा दर्शन होनेपर जो फल प्राप्त होता है, बही फल
आपका दर्शन होनेपर भी प्राप्त होगा। मैंने आज
आपको यह वर दे दिया, यह सत्य है, सत्य है, इसमें
संशय नहीं है। मेरे हृदयमें विष्णु हैं और विष्णुके
हृदयमें मैं हूँ ॥ ५३-५५ ॥
जो इन दोनोंमें अन्तर नहीं समझता, वही मेरा
मन है अर्थात् वही मुझे प्रिय है। श्रीहरि मेरे बायें
अंगसे प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए
हैं और महाप्रलयकारी विश्वात्मा रुद्र मेरे हृदयसे
प्रादुर्भूत हुए हैं। हे विष्णो! मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और
भव नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हो गया हूँ। मैं रज
आदि तीनों गुणोंके द्वारा सृष्टि, पालन तथा संहार
करता हूँ॥ ५६-५७१/२॥
शिव गुणोंसे भिन्न हैं और वे साक्षात् प्रकृति
तथा पुरुषसे भी परे हैं। वे अद्वितीय, नित्य, अनन्त,
पूर्ण एवं निरंजन परब्रह्म हैं। तीनों लोकोंका पालन
करनेवाले श्रीहरि भीतर तमोगुण और बाहर सत्त्वगुण
धारण करते हैं। त्रिलोकीका संहार करनेवाले रुद्रदेव
भीतर सत्त्वगुण और बाहर तमोगुण धारण करते हैं
हद १०]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२४१
अन्तर्बहीरजश्नेव त्रिजगत्ृष्टिकृद्विधिः।
एवं गुणास्त्रिदेवेषु गुणभिन्नः शिवः स्मृतः॥ ६१
विष्णो सृष्टिकरं प्रीत्या पालयैनं पिताम्रहम्।
सम्पूज्यस्त्रिषु लोकेषु भविष्यसि मदाज्ञया ॥ ६२
तव सेव्यो विधेश्चापि रूद्र एव भविष्यति।
शिवपूर्णावतारो हि त्रिजगल्लयकारकः॥ ६३
पादमे भविष्यति सुतः कल्पे तब पितामह: ।
तदा द्रक्ष्यसि मां चैव सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मज:॥ ६४
एवमुक्त्वा महेशानः कृपां कृत्वातुलां हरः।
पुनः प्रोवाच सुप्रीत्या विष्णुं सर्वेश्वरः प्रभु:॥ ६५
तथा त्रिभुवनकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी बाहर
और भीतरसे भी रजोगुणी ही हैं। इस प्रकार ब्रह्मा,
विष्णु तथा रुद्र इन तीनों देवताओंमें गुण हैं, परंतु
शिव गुणातीत माने गये हैं ॥ ५८-६११/३॥
हे विष्णो! आप मेरी आज्ञासे इन सृष्टिकर्ता
पितामहका प्रसन्नतापूर्वक पालन कीजिये। ऐसा करनेसे
आप तीनों लोकोंमें पूजनीय होंगे ॥ ६२॥
ये रुद्र आपके और ब्रह्माके सेव्य होंगे; क्योंकि
त्रैलोक्यके लयकर्ता ये रुद्र शिवके पूर्णावतार हैं॥ ६३ ॥
पाझकल्पमें पितामह आपके पुत्र होंगे । उस समय
आप मुझे देखेंगे और वे ब्रह्मा भी मुझे देखेंगे ॥ ६४॥
ऐसा कहकर महेश, हर, सर्वेश्वर, प्रभु अतुलनीय
कृपाकर पुन: प्रेमपूर्वक विष्णुसे कहने लगे-- ॥ ६५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्द्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शिवतत्त्ववर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुब्रसंहिताके प्रथम खण्डके सृष्टि-उपाख्यानमें
शिवतत््ववर्णन नामक नाँवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
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अथ दशमोऽध्यायः
श्रीहरिको सृष्टिकी रक्षाका भार एवं भोग-मोक्ष-दानका अधिकार
देकर भगवान् शिवका अन्तर्धान होना
परमेश्वर उवाच
अन्यच्छृणु हरे विष्णो शासनं मम सुव्रत।
सदा सर्वेषु लोकेषु मान्यः पूज्यो भविष्यसि॥ १
ब्रह्मणा निर्मिते लोके यदा दुःखं प्रजायते।
तदा त्वं सर्वदुःखानां नाशाय तत्परो भव॥ २
सहायं ते करिष्यामि सर्वकाये च दुःसहे।
तव शत्रून्हनिष्यामि दुःसाध्यान्परमोत्कटान्॥ ३
विविधानवतारांश्च गृहीत्वा कीर्तिमुत्तमाम्।
विस्तारय हरे लोके तारणाय परो भव॥ ४
गुणरूपो ह्यहं रुद्रो ह्यनेन वपुषा _सदा।
कार्य करिष्ये लोकानां तवाशक्यं न संशयः॥ ५
परमेश्वर शिवजी बोले--उत्तम ब्रतका पालन
करनेवाले हे हरे! हे विष्णो! अब आप मेरी दूसरी
आज्ञा सुनें। उसका पालन करनेसे आप सदा समस्त
लोकोंमें माननीय और पूजनीय होंगे॥ १॥
ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये लोकमें जब कोई संकट
उत्पन्न हो, तब आप उन सम्पूर्ण दुःखोंका नाश
करनेके लिये सदा तत्पर रहना॥ २॥
मैं सम्पूर्ण दुस्सह कार्योमें आपकी सहायता
करूँगा। आपके दुर्जेय और अत्यन्त उत्कट शत्रुओंको
मैं मार गिराऊँगा॥ ३॥
हे हरे! आप नाना प्रकारके अवतार धारण करके
लोकमें अपनी उत्तम कोर्तिका विस्तार कीजिये और
संसारमें प्राणियोंके उद्धारके लिये तत्पर रहिये॥ ४॥
गुणरूप धारणकर मैं रुद्र निश्चित ही अपने इस
शरीरसे संसारके उन कार्योंको करूँगा, जो आपसे
सम्भव नहीं हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥५॥
२४२
श्रीशिवमहापुराण
[ अण २०
रूद्रध्येयो भवांश्चैव भवदध्येयो हरस्तथा।
युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किञ्जन॥
चस्तुतश्चापि चैकत्वं वरतोऽपि तथैव च।
लीलयापि महाविष्णो सत्यं सत्यं न संशयः॥ ७
रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव निन्दां करिष्यति।
तस्य पुण्यं च निखिलं द्रुतं भस्म भविष्यति॥ ८
नरके पतनं तस्य त्वदद्वेषात्पुरुषोत्तम।
मदाज्ञया भवेद्विष्णो सत्यं सत्यं न संशयः॥ ९
लोकेऽस्मिन्मुक्तिदो नृणां भुक्तिदश्च विशेषतः।
ध्येयः पूज्यश्च भक्तानां निग्रहानुग्रहौ कुरु॥ १०
इत्युक्त्वा मां च धातारं हस्ते धृत्वा स्वयं हरिम्।
कथयामास दुःखेषु सहायो भव सर्वदा॥ ११
सर्वाध्यक्षश्च सर्वेषु भक्तिमुक्तिप्रदायकः।
भव त्वं सर्वदा श्रेष्ठः सर्वकामप्रसाधकः॥ १२
सर्वेषां प्राणरूपश्च भव त्वं च ममाज्ञया।
सङ्कटे भजनीयो हि स रुद्रो मत्तनुर्हरे॥ १३
त्वां यः समाश्रितो नूनं मामेव स समाश्रितः।
अन्तरं यश्च जानाति निरये पतति ्रुवम्॥ १४
आयुर्बलं श्रृणुष्वाद्य त्रिदेवानां विशेषत: ।
सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ब्रह्मविष्णुहरात्मनाम्॥ १५
चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते।
रात्रिश्च तावती तस्य मानमेतत्क्रमेण ह॥ १६
तेषां त्रिंशदिनैमांसो द्वादशैस्तैश्च वत्सरः।
शतवर्षप्रमाणेन ब्रह्मायुः परिकीर्तितम्॥ १७
आप रुद्रके ध्येय हैं और रुद्र आपके ध्येय है \
आप दोनोंमें और आप तथा रुद्रमें कुछ भी अन्तर
नहीं है॥ ६॥
हे महाविष्णो ! लीलासे भेद होनेपर भी वस्तुत:
आपलोग एक ही तत्त्व हैं। यह सत्य है, सत्य है,
इसमें संशय नहीं है ॥७॥
जो मनुष्य रुद्रका भक्त होकर आपकी निन्दा
करेगा, उसका सारा पुण्य तत्काल भस्म हो जायगा ॥ ८॥
हे पुरुषोत्तम विष्णो! आपसे द्वेष करनेके कारण
मेरी आज्ञासे उसको नरकमें गिरना पड़ेगा । यह सत्य
है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है॥ ९॥
आप इस लोकमें मनुष्योंके लिये विशेषत:
भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले और भक्तोंके ध्येय
तथा पूज्य होकर प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह
कीजिये॥ १०॥
ऐसा कहकर भगवान् शिवने मेरा हाथ पकड़
लिया और श्रीविष्णुको सौंपफर उनसे कहा-आप
सँकरके समय सदा इनकी सहायता करते रहें ॥ ११॥
सबके अध्यक्ष होकर आप सभीको भक्ति और
मुक्ति प्रदान करें तथा सर्वदा समस्त कामनाओंके
साधक एवं सर्वश्रेष्ठ बने रहें ॥ १२॥
हे हरे! यह मेरी आज्ञा है कि आप सबके
प्राणस्वरूप होइये और संकटकाल आनेपर निश्चय
ही मेरे शरीररूप उस रुद्रका भजन कीजियें॥ १३॥
जो आपकी शरणमें आ गया, वह निश्चय ही
मेरी शरणमें आ गया। जो मुझमें और आपमें अन्तर
समझता है, वह अवश्य ही नरकमें गिरता है॥ १४॥
अब आप तीनों देवताओंके आयुबलको
विशेषरूपसे सुनिये । ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी एकतामें
[किसी प्रकारका] सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५॥
एक हजार चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन कहा
जाता है और उतनी ही उनकी रात्रि होती है। इस
प्रकार क्रमसे यह ब्रह्माके एक दिन और एक रात्रिका
परिमाण है॥ १६॥
इस प्रकारके तीस दिनोंका एक मास और बारह
मासोंका एक वर्ष होता है। सौ वर्षके परिमाणको
ब्रह्माको आयु कहा गया है॥ १७॥
ड १०]
ब्रह्मणो वर्षमात्रेण दिनं वैष्णवमुच्यते।
सोऽपि वर्षशतं यावदात्ममानेन जीवति॥ १८
वैष्णवेन तु वर्षेण दिनं रौद्रं भवेद् श्रुवम्।
हरो वर्षशते याते नररूपेण संस्थितः ॥ १९
यावदुच्छ्वसितं वक्त्रे सदाशिवसमुद्भवम्।
पश्चाच्छक्तिं समभ्येति यावन्निःश्वसितं भवेत्॥ २०
निःश्वासोच्छ्वसितानां च स्वेषामेव देहिनाम्।
ब्रह्मविष्णुहराणां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्॥ २१
एकविंशसहस्त्राणि शतैः षड्भिः शतानि च।
अहोरात्राणि चोक्तानि प्रमाणं सुरसत्तमौ॥ २२
षड्भिरुच्छ्वासनिःश्वासैः पलमेकं प्रवर्तितम्।
घटी षष्टिपला प्रोक्ता सा षष्ट्या च दिनं निशा॥ २३
निःश्वासोच्छ्वासितानां च परिसङ् ख्या न विद्यते।
सदाशिवसमुत्थानमेतस्मात्सोऽक्षयः स्मृतः॥ २४
इत्थं रूपं त्वया तावद्रक्षणीयं ममाज्ञया
तावत्सृष्टेश्च कार्य वै कर्तव्यं विविधैर्गुणैः ॥ २५
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च भगवान्हरिः ।
प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी॥ २६
विष्णुरुवाच
शङ्कर श्रूयतामेतत्कृपासिन्थो जगत्पते।
सर्वमेतत्करिष्यामि भवदाज्ञावशानुगः ॥ २७
मम ध्येयः सदा त्वं च भविष्यसि न चान्यथा।
भवतः सर्वसामर्थ्यं लब्धं चैव पुरा मया॥ २८
क्षणमात्रमपि स्वामिंस्तव ध्यानं परं मम।
चेतसो दूरतो नैव सङ्गच्छतु कदाचन॥ २९
मम भक्तश्च यः स्वामिंस्तव निन्दां करिष्यति ।
तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं श्रुवम्॥ ३०
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२४३
ब्रह्माके एक वर्षके बराबर विष्णुका एक दिन
कहा जाता है। वे विष्णु भी अपने सौ वर्षके
प्रमाणतक जीवित रहते हैं ॥ १८॥
विष्णुके एक वर्षके बराबर रुद्रका एक दिन
होता है। भगवान् रुद्र भी उस मानके अनुसार नररूपमें
सौ वर्षतक स्थित रहते हैं॥ १९॥
तदनन्तर शिवके मुखसे एक श्वास निकलता है
और जबतक वह निकलता रहता है, तबतक वह शक्तिको
प्राप्तकर पुनः जब निःश्वास लेते हैं, तबतक ब्रह्मा,
विष्णु, शिव, गन्धर्व, नाग और राक्षस आदि सभी
देहधारियोंके निःश्वास और उच्छ्वासको बाहर और
भीतर ले जानेके क्रमकी संख्या हे सुरसत्तम! दिन-रातमें
मिलाकर इक्कीस हजारका सौ गुना एवं छ: सौ अर्थात्
इक्कोस लाख छः सौ कही गयी है॥ २०--२२॥
छः उच्छ्वास और छः: नि:श्वासका एक पल
होता है। साठ पलोंकी एक घटी और साठ घटी-
प्रमाणको एक दिन और रात्रि कहते हैं ॥ २३॥
सदाशिवके निःश्वासों और उच्छ्वासोंकी गणना
नहीं की जा सकती है। अतः शिवजी सदैव प्रबुद्ध
और अक्षय हैं॥ २४॥
मेरी आज्ञासे तुम्हें अपने विविध गुणोंके द्वारा
सृष्टिके इस प्रकारके होनेवाले कार्योंकी रक्षा करनी
चाहिये ॥ २५॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवर्षे! भगवान् शिवका
यह वचन सुनकर सबको वशमें करनेवाले भगवान्
विष्णु मेरे साथ विश्वनाथको प्रणाम करके मन्द स्वरमें
उनसे कहने लगे ॥ २६॥
विष्णुजी बोले-हे शंकर! हे करुणासिन्धो!
हे जगत्पते! मेरी यह बात सुनिये। मैं आपकी आज्ञाके
अधीन रहकर यह सब कुछ करूँगा॥ २७॥
आप ही मेरे सदा ध्येय होंगे, इसमें अन्यथा नहीं
है। मैंने पूर्वकालमें भी आपसे समस्त सामर्थ्य प्राप्त
किया था॥ २८॥
हे स्वामिन्! क्षणमात्र भी आपका श्रेष्ठ ध्यान
मेरे चित्तसे कभी दूर न हो॥ २९॥
हे स्वामिन्! मेरा जो भक्त आपकी निन्दा करे,
उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें॥ ३०॥
२४४
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १०
त्वद्भक्तो यो भवेत् स्वामिन्मम प्रियतरो हि सः।
एवं वै यो विजानाति तस्य मुक्तिर्न दुर्लभा॥ ३
महिमा च मदीयोऽद्य वर्धितो भवता श्रुवम्।
कदाचिदगुणश्चैव जायते क्षम्यतामिति॥ ३२
ब्रह्मोवाच
तदा शम्भुस्तदीयं हि श्रुत्वा वचनमुत्तमम्
उवाच विष्णुं सुप्रीत्या क्षम्या तेऽगुणता मया॥ ३३
एवमुक्त्वा हरि नौ स कराभ्यां परमेश्वर: ।
पस्पर्श सकलाङ्गेषु कृपया तु कृपानिधिः ॥ ३४
आदिश्य विविधान्धर्मान्सर्वदुःखहरो हरः।
ददौ वराननेकांश्रावयोर्हितचिकीर्षया॥ ३५
'ततः स भगवान् शम्भुः कृपया भक्तवत्सलः।
दृष्ट्या सम्पश्यतोः शीध्रं तत्रैवान्तरधीयत॥ ३६
तदाप्रभृति लोकेऽस्मिल्लिङ्गपूजाविधिः स्मृतः।
लिङ्गे प्रतिष्ठितः शम्भुर्भुक्तिमुक्तिप्रदायकः॥ ३७
लिङ्गवेदिर्महादेबी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः।
लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रेव निखिलं जगत्॥ ३८
यस्तु लैङ्गं पठेनित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ।
षण्मासाच्छिवरूपो वै नात्र कार्या विचारणा॥ ३९
यस्तु लिङ्गसमीपे तु कार्य किञ्चित्करोति च।
तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्नोमि महामुने॥ ४०
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हे नाथ! जो आपका भक्त है, वह मुझे अत्यन्त
प्रिय है। जो ऐसा जानता है, उसके लिये मोक्ष दुर्लभ
नहीं है॥ ३१॥
आज आपने निश्चय ही मेरी महिमा बढ़ा दी
है, यदि कभी कोई अवगुण आ जाय, तो उसे
क्षमा करें॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर विष्णुके द्वारा कहे
गये श्रेष्ठ वचनको सुनकर शिवजीने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक
विष्णुसे कहा कि मैंने आपके अवगुणोंको क्षमा कर
दिया है॥ ३३॥
विष्णुसे ऐसा कहकर उन कृपानिधि परमेश्वरने
कृपापूर्वक अपने हाथोंसे हम दोनोंके सम्पूर्ण अंगोंका
स्पर्श किया॥ ३४॥
सर्वदुःखहारी सदाशिवने नाना प्रकारके धर्मोका
उपदेशकर हम दोनोंके हितकी इच्छासे अनेक प्रकारके
वर दिये॥ ३५॥
इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शम्भु कृपापूर्वक
हमारी ओर देखकर हम दोनोंके देखते-देखते शीघ्र
वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ३६॥
तभीसे इस लोकमें लिंगपूजाका विधान प्रचलित
हुआ है। लिंगमें प्रतिष्ठित भगवान् शिव भोग और
मोक्षं देनेवाले हैं॥ ३७॥
शिवलिंगकी वेदी महादेवीका स्वरूप है और
लिंग साक्षात् महेश्वर है। लयकारक होनेके कारण ही
इसे लिंग कहा गया है, इसीमें सम्पूर्ण जगत् स्थित
रहता है॥ ३८॥
जो शिवलिंगके समीप स्थिर होकर नित्य इस
लिंगके आख्यानको पढ़ता है, वह छ: मासमें ही शिवरूप
हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ३९॥
हे महामुने! जो शिवलिंगके समीप कोई भी
कार्य करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन करनेमें मैं
समर्थ नहीं हूँ॥ ४०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ख्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने परमशिवतत्त्ववर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
परमशिवतत्त्ववर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
—_ ere
कक ११]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २४५
MMMM... DI 2:
'ड।
अथैकादशोऽध्यायः
शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।
श्राविताद्याद्भुता शैवी कथा परमपावनी ॥ ९
तत्राद्धुता महादिव्या लिङ्गत्पत्तिः श्रुता शुभा।
श्रुत्वा यस्याः प्रभावं च दुःखनाशो भवेदिह॥ २
ब्रह्ममारदसंवादमनुसृत्य दयानिधे।
शिवार्चनविधिं ब्रूहि येन तुष्टो भवेच्छिवः॥ ३
ब्राह्मणैः क्षत्रियेवेश्यै: शूद्वैर्वा पूज्यते शिवः।
कथं कार्य च तद् बूहि यथा व्यासमुखाच्छुतम्॥ ४
तच्छुत्वा वचनं तेषां शर्मदं श्रुतिसम्मतम्।
उवाच सकलं प्रीत्या मुनिप्रशनानुसारतः॥ ५
सूत उवाच
साधु पृष्टं भवद्भिश्च तद्रहस्यं मुनीश्वराः ।
तदहं कथयाम्यद्य यथाबुद्धि यथाश्रुतम्॥ ६
भवद्भिः पृच्छ्यते यद्वत्तथा व्यासेन वै पुरा।
पृष्टं सनत्कुमाराय तच्छतं हथुपमन्युना॥ ७
ततो व्यासेन वै श्रुत्वा शिवपूजादिकं च यत्।
मह्यं च पाठितं तेन लोकानां हितकाम्यया॥ ८
तच्छतं चैव कृष्णेन हथुपमन्योर्महात्मनः।
तदहं कथयिष्यामि यथा ब्रह्मावदत्पुरा॥ ९
ब्रह्मोवाच
श्रृणु नारद वक्ष्यामि सङ्क्षेपाल्लिङ्गपूजनम्।
वक्तुं वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरान्मुने॥ १०
एवं तु शांकरं रूपं सुखं स्वच्छं सनातनम्
पूजयेत्परया भक्त्या सर्वकामफलाप्तये ॥ ११९
ऋषि बोले--हे व्यासशिष्य महाभाग सूतजी !
आपको नमस्कार है, आज आपने भगवान् शिवकी
अद्भुत एवं परम पवित्र कथा सुनायी है॥ १॥
उसमें अद्भुत, महादिव्य तथा कल्याणकारिणी
लिंगोत्पत्ति हमलोगोंने सुनी, जिसके प्रभावको सुननेसे
इस लोकमें दुःखोंका नाश हो जाता है॥ २॥
हे दयानिधे! ब्रह्मा और नारदजीके संवादके
अनुसार आप हमें शिवपूजनकी वह विधि बताइये,
जिससे भगवान् शिव सन्तुष्ट होते हैं ॥ ३॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-सभी शिवकी
पूजा करते हैं । वह पूजन कैसे करना चाहिये ? आपने
व्यासजीके मुखसे इस विषयको जिस प्रकार सुना हो,
वह बताइये ॥ ४॥
महर्षियोंका वह कल्याणप्रद एवं श्रुतिसम्मत
वचन सुनकर सूतजी उन मुनियोंके प्रश्नके अनुसार
सब बातें प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे ॥ ५॥
सूतजी बोले--मुनीश्वरो! आपलोगोंने बहुत
अच्छी बात पूछी है, परंतु वह रहस्यकी बात है। मैंने
इस विषयको जैसा सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है,
उसके अनुसार आज कह रहा हूँ॥६॥
जैसे आपलोग पूछ रहे हैं, उसी तरह पूर्वकालमें
व्यासजीने सनत्कुमारजीसे पूछा था। फिर उसे
उपमन्युजीने भी सुना था॥७॥
तब व्यासजीने शिवपूजन आदि जो भी था, उसे
सुनकर लोकहितकी कामनासे मुझे पढ़ा दिया था॥ ८ ॥
इसी विषयको भगवान् श्रीकृष्णने महात्मा उपमन्युसे
सुना था। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नारदजीसे इस विषयमें
जो कुछ कहा था, वही इस समय मैं कहुँगा॥ ९॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मैं संक्षेपमें लिंगपूजनकी
विधि बता रहा हूँ, सुनिये। हे मुने! इसका वर्णन सौ
वर्षोमें भी नहीं किया जा सकता हैं। जो भगवान्
शंकरका सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है, सभी
मनोवांछित फलोंकी प्राप्तिके लिये उसका उत्तम
भक्तिभावसे पूजन करे॥ १०-११॥
२४६
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ११
दारिद्र्यं रोगदुःखं च पीडनं शत्रुसम्भवम्।
पापं चतुर्विधं तावद्यावन्नार्चयते शिवम्॥ १
सम्पूजिते शिवे देवे सर्वदुःखं विलीयते।
सम्पद्यते सुखं सर्वं पश्चान्मुक्तिरवाप्यते॥ १३
यो बै मानुष्यमाश्रित्य मुख्यं सन्तानतः सुखम्।
तेन पूज्यो महादेवः सर्वकार्यार्थसाधकः॥ १४
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्न विधिवत्क्रमात्।
शङ्करार्चा प्रकुर्वन्तु सर्वकामार्थसिद्धये॥ १५
प्रातःकाले समुत्थाय मुहूर्ते ब्रह्मसंज्ञके।
गुरोश्च स्मरणं कृत्वा शंभोश्चैव तथा पुनः॥ १६
तीर्थानां स्मरणं कृत्वा ध्यानं चेव हरेरपि।
ममापि निर्जराणां वै मुन्यादीनां तथा मुने॥ १७
ततः स्तोत्रं शंभुनाम गृह्णीयाद्विधिपूर्वकम्।
ततोत्थाय मलोत्सर्ग दक्षिणस्यां चरेदिशि॥ १८
एकान्ते तु विधिं कुर्यान्मलोत्सर्गस्य यच्छुतम्।
तदेव कथयाम्यद्य श्रृण्वाधाय मनो मुने॥ १९
शुद्धां मृदं द्विजो लिप्यात्पंचवारं विशुद्धये।
क्षत्रियश्च चतुर्वारं वैश्यो वारत्रयं तथा॥ २०
शूद्रो द्विवारं च मृदं गृहणीयाद्रिधिशुद्धये।
गुदे वाथ सकृल्लिंगे वारमेकं प्रयलतः॥ २१
दशवारं वामहस्ते सप्तवारं द्वयोस्तथा।
प्रत्येक पादयोस्तात त्रिवारं करयोः पुनः॥ २२
स्त्रीभिश्च शूद्रवत्कार्य मृदाग्रहणमुत्तमम्।
हस्तौ पादौ च प्रक्षाल्य पूर्ववन्मृदमाहरेत्॥ २३
"7 ञ ्् रू रस स्फ्तत 5 5-5 ाीजHl⁄८0८⁄ऑअअथजतजक्बभइजइआजणँ⁄०⁄न्औऑ:dेऑEऑE/Z/dféजCऔआाध
दरिद्रता, रोग, दुःख तथा शत्रुजनित पीडा-_ये
चार प्रकारके पाप-कष्ट तभीतक रहते हैं, जबतक
मनुष्य भगवान् शिवका पूजन नहीं करता है॥ १२॥
भगवान् शिवकी पूजा होते ही सारे दुःख
विलीन हो जाते हैं और समस्त सुखोंकी प्राप्ति हो
जाती है। तत्पश्चात् [समय आनेपर उपासककी]
मुक्ति भी हो जाती है॥ १३॥
जो मानवशरीरका आश्रय लेकर मुख्यतया
सन्तानसुखकी कामना करता है, उसे चाहिये कि
सम्पूर्ण कार्यों और मनोरथोंके साधक महादेवजीकी
पूजा करे॥ १४॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी सम्पूर्ण
कामनाओं तथा प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये क्रमसे
विधिके अनुसार भगवान् शंकरकी पूजा करें ॥ १५॥
प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर गुरु तथा
शिवका स्मरण करके पुनः तीर्थोंका चिन्तन करके
भगवान् विष्णुका ध्यान करे। हे मुने! इसके बाद मेरा,
देवताओंका और मुनि आदिका भी स्मरण-चिन्तन
करके स्तोत्र-पाठपूर्वक शंकरजीका विधिपूर्वक नाम
ले॥ १६-१७१/२॥
उसके बाद शय्यासे उठकर निवासस्थानसे
दक्षिण दिशामें जाकर मलत्याग करें। हे मुने!
एकान्तमें मलोत्सर्ग करना चाहिये । उससे शुद्ध होनेके
लिये जो विधि मैंने सुन रखी है, आप लोगोंसे उसीको
आज कहता हूँ, मनको एकाग्र करके सुनें ॥ १८-१९॥
ब्राह्मण [गुदाकी] शुद्धिके लिये पाँच बार
मिट्टीका लेप करे और धोये। क्षत्रिय चार बार, वैश्य
तीन बार और शूद्र दो बार विधिपूर्वक गुदाकी शुद्धिके
लिये उसमें मिट्टी लगाये। लिंगमें भी एक बार
प्रयत्नपूर्वक मिट्टी लगानी चाहिये ॥ २०-२१॥ नो
तत्पश्चात् बायें हाथमें दस बार और दोनो
हाथोंमें सात बार मिट्टी लगाये । हे तात! प्रत्येक पैरमें
तीन-तीन बार मिट्टी लगाये, फिर दोनों हाथोंमें भी तीन
बार मिट्टी लगाकर धोये॥ २२॥
्त्रियॉको शूद्रकी भाँति अच्छी तरह मिट्टी
लगानी चाहिये। हाथ-पैर धोकर पूर्ववत् शुद्ध मिट्टीका
संग्रह करना चाहिये॥ २३॥
ड ११]
दन्तकाष्ठं ततः कुर्यात्स्ववर्णक्रमतो नर:॥ २४
विप्रः कुर्याहन्तकाष्ठं द्वादशांगुलमानतः।
एकादशांगुलं राजा वैश्यः कुर्याइशांगुलम्॥ २५
शूद्रो नवांगुलं कुर्यादिति मानमिदं स्मृतम्।
कालदोषं विचार्यैव मनुदृष्ट विवर्जयेत्॥ २६
षष्ट्याद्यामाश्च नवमी ब्रतमस्तं रवेर्दिनम्।
तथा श्राद्धदिनं तात निषिद्धं रदधावने॥ २७
स्नानं तु विधिवत्कार्य तीर्थादिषु क्रमेण तु।
देशकालविशेषेण स्नानं कार्य समन्त्रकम्॥ २८
आचम्य प्रथमं तत्र धौतवस्त्राणि धारयेत्।
एकान्ते सुस्थले स्थित्वा संध्याविधिमथाचरेत्॥ २९
यथायोग्यं विधिं कृत्वा पूजाविधिमथारभेत्।
मनस्तु सुस्थिरं कृत्वा पूजागारं प्रविश्य च॥ ३०
पूजाविधिं समादाय स्वासने ह्युपविश्य वे।
न्यासादिकं विधायादौ पूजयेत् क्रमशो हरम्॥ ३१
प्रथमं च गणाधीशं द्वारपालांस्तथैव च।
दिक्पालांश्च सुसंपूज्य पश्चात्पीठं प्रकल्पयेत्॥ ३२
अथवाष्टदलं कृत्वा पूजाद्रव्यं समीपतः।
उपविश्य ततस्तत्र उपवेश्य शिवम् प्रभुम्॥ ३३
आचमनत्रयं कृत्वा प्रक्षाल्य च पुनः करौ।
प्राणायामत्रयं कृत्वा मध्ये ध्यायेच्च त्र्यम्बकम्॥ ३४
पंचवक्त्रं दशभुजं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।
सर्वाभरणसंयुक्तं व्याप्रचमांत्तरीयकम्॥ ३५
तस्य सारूप्यतां स्मृत्वा दहेत्पापं नरः सदा।
शिवं ततः समुत्थाप्य पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ३६
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
अ) पे "४७
इसके बाद मनुष्यको अपने वर्णके अनुसार
दातौन करना चाहिये। ब्राह्मणको बारह अँगुलकी
दातौन करनी चाहिये । क्षत्रिय ग्यारह अँगुल, वैश्य
दस अँगुल और शूद्र नौ अँगुलकी दातौन करे।
दातौनका यह मान बताया गया है। मनुस्मृतिके
अनुसार कांलदोषका विचार करके ही दातौन करे या
त्याग दे॥ २४--२६॥
है तात! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी,
ब्रतका दिन, सूर्यास्तका समय, रविवार तथा
श्राद्धदिवस--ये दन्तधावनके लिये वर्जित हैं ॥ २७॥
[दन्तधावनके पश्चात्] तीर्थ आदिमें विधिपूर्वक
स्नान करना चाहिये, विशेष देश-काल आनेपर
मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करना चाहिये ॥ २८॥
[स्नानके पश्चात्] पहले आचमन करके धुला
हुआ वस्त्र धारण करे। फिर सुन्दर एकान्त स्थलमें
बैठकर सन्ध्याविधिका अनुष्ठान करे॥ २९॥
यथायोग्य सन्ध्याविधि करके पूजाका कार्य
आरम्भ करे। मनको सुस्थिर करके पूजागृहमें प्रवेशकर
वहाँ पूजन-सामग्री लेकर सुन्दर आसनपर बैठे।
पहले न्यास आदि करके क्रमशः महादेवजीकी पूजा
करे॥ ३०-३१॥
[शिवको पूजासे] पहले गणेशजीकी, द्वारपालोंकी
और दिक्पालोंकी भलीभाँति पूजा करके बादमें देवताके
लिये पीठकी स्थापना करे॥ ३२॥
अथवा अष्टदलकमल बनाकर पूजाद्रव्यके समीप
बैठकर उस कमलपर ही भगवान् शिवको समासीन
करे। तत्पश्चात् तीन बार आचमन करके पुन: दोनों
हाथ धोकर तीन प्राणायाम करके मध्यम प्राणायाम
अर्थात् कुम्भक करते समय त्रिनेत्रधारी भगवान्
शिवका इस प्रकार ध्यान करे-उनके पाँच मुख हैं,
दस भुजाएँ हैं, शुद्ध सफटिकके समान उनकी कान्ति
है, वे सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं तथा वे
व्याश्रचर्मका उत्तरीय ओढे हुए हैं। उनके सारूप्यकी
भावना करके मनुष्य सदाके लिये अपने पापको भस्म
कर डाले। [इस प्रकारकी भावनासे युक्त होकर]
वहाँपर शिवको प्रतिष्ठापितकर उन परमेश्वरी पूजा
करे॥ ३३--३६॥
२४८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० ११
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देहशुद्धिं ततः कृत्वा मूलमन्त्रं न्यसेत्क्रमात्।
सर्वत्र प्रणवेनैव षडंगन्यासमाचरेत्॥
कृत्वा हृदि प्रयोगं च ततः पूजां समारभेत्।
पाद्यार्घाचमनार्थं च पात्राणि च प्रकल्पयेत्॥ ३८
स्थापयेद्विविधान्कुम्भान्नव धीमान्यथाविधि।
दरभैराच्छाद्य तैरेव संस्थाप्याभ्युक्ष्य वारिणा॥ ३९
तेषु तेषु च सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम्।
प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्द्रिमान्॥ ४०
उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत्
जातीकंकोलकर्पूरवटमूलतमालकम् ॥ ४१
चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके ।
एतत्सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्यन्दनान्वितम्॥ ४२
पा्श्वयोर्देवदेवस्य नंदीशं तु समर्चयेत्।
गंधैर्धूपैस्तथा दीपैर्विविधैः पूजयेच्छिवम्॥ ४३
लिंगशुद्धिं ततः कृत्वा मुदा युक्तो नरस्तदा।
यथोचितं तु मंत्रौघैः प्रणवादिनमोऽन्तकेः ॥ ४४
कल्पयेदासनं स्वस्तिपद्यादि प्रणवेन तु।
तस्मात्पूर्वदिशं साक्षादणिमामयमक्षरम्॥ ४५
लघिमा दक्षिणं चैव महिमा पश्चिमं तथा।
प्राप्तिश्चैवोत्तरं पत्रं प्राकाम्यं पावकस्य च॥ ४६
ईशित्वं नैतं पत्रं वशित्वं वायुगोचरे।
सर्वज्ञत्वं तथैशान्यं कर्णिका सोम उच्यते॥ ४७
सोमस्याधस्तथा सूर्यस्तस्याधः पावकस्त्वयम्।
धर्मादीनपि तस्याधो भवतः कल्पयेत् क्रमात् ॥ ४८
अव्यक्तादि चतुर्दिक्षु सोमस्यान्ते गुणत्रयम्।
सद्योजातं प्रपद्यामीत्यावाह्य परमेश्वरम्॥ ४९
वामदेवेन मंत्रेण ि्ठेच्चैवासनोपरि।
शरीरशुद्धि करके मूलमन्त्रका क्रमश: न्यास करे
अथवा सर्वत्र प्रणवसे ही षडंगन्यास करे॥ ३७॥
इस प्रकार हृदयादि न्यास करके पूजा आरम्भ
करे। पाद्य, अर्ध्य और आचमनके लिये पात्रोको तैयार
करके रखे॥ ३८॥
बुद्धिमान् पुरुष विधिपूर्वक भिन्न-भिन्न प्रकारके
नौ कलश स्थापित करे। उन्हें कुशाओंसे ढककर
कुशाओंसे ही जल लेकर उन सबका प्रोक्षण करे | उन-
उन सभी पात्रोमें शीतल जल डाले । तत्पश्चात् बुद्धिमान्
पुरुष देख-भालकर प्रणवमन्त्रके द्वारा उनमें इन द्रव्योंको
डाले। खस और चन्दनको पाद्यपात्रमें रखे । चमेलीके
फूल, शीतलचीनी, कपूर, बड़की जड़ तथा तमाल
इन सबको यथोचितरूपसे [ कूट-पीसकर ] चूर्ण बनाकर
आचमनीय पात्र (पंचपात्र) -में डाले । यह सब चन्दनसहित
सभी पात्रोंमें डालना चाहिये ॥ ३९--४२॥
देवाधिदेव महादेवजीके पार्श्वभागमें नन्दीशवरका
पूजन करे। गन्ध, धूप, दीप आदि विविध उपचारोंसे
शिवको पूजा करे॥४३॥
फिर प्रसन्नतापूर्वक लिंगशुद्धि करके मनुष्य
उचित रूपसे मन्त्रसमूहोंके आदिमें “प्रणव' तथा
अन्तमें “नमः' पद जोड़कर उनके द्वारा [इष्टदेवके
लिये] अथवा प्रणवका उच्चारण करके स्वस्ति, पद्म
आदि आसनकी कल्पना करे। पुनः यह भावना करे
कि इस कमलका पूर्वदल साक्षात् अणिमा नामक
ऐश्वर्यरूप तथा अविनाशी है। दक्षिणदल लघिमा है।
पश्चिमदल महिमा है। उत्तरदल प्राप्ति है। अग्निकोणका
दल प्राकाम्य है। नैऋत्यकोणका दल ईशित्व हैं।
वायव्यकोणका दल वशित्व है। ईशानकोणका दल
सर्वज्ञत्व है और उस कमलकी कर्णिकाको सोम कहा
जाता है ॥ ४४--४७॥
इस सोमके नीचे सूर्य है, सूर्यके नीचे यह अग्नि
है और अग्निके भी नीचे धर्म आदिकी क्रमशः कल्पना
करे | इसके पश्चात् चारों दिशाओमें अव्यक्त आदिकी
तथा सोमके नीचे तीनों गुणोंकी कल्पना करे। इसके
बाद ' ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि’ इत्यादि मन्त्रसे परमेश्वर
शिवका आवाहन करके ' ३४ वामदेवाय नमः ' इत्यादि
वामदेवमन्त्रसे उन्हें आसनपर विराजमान करे। फिर
F ११]
सानिश्य॑ रुद्रगायत्र्या अघोरेण निरोधयेत्॥ ५०
ईशानः सर्वविद्यानामिति मंत्रेण पूजयेत्।
पाद्यमाचनीयं च विधायार्घ्यं प्रदापयेत् ॥ ५१
स्नापयेद्विधिना रुद्रं गंधचंदनवारिणा।
पञ्जगव्यविधानेन गृह्यपात्रेअभिमंत्रय च॥ ५२
प्रणवेनैव गव्येन स्नापयेत्पयसा च तम्।
दध्ना च मधुना चैव तथा चेक्षुरसेन तु॥ ५३
घृतेन तु तथा पूज्यं सर्वकामहितावहम्।
पुण्यैद्द्रव्यैर्महादेवं प्रणवेनाभिषेचयेत्॥ ५४
'पवित्रजलभाण्डेषु मंत्रे: तोयं क्षिपेत्ततः।
शुद्धीकृत्य यथान्यायं सितवस्त्रेण साधक:॥ ५५
तावद् दूरं न कर्तव्यं न यावच्चन्दनं क्षिपेत्।
तंदुलैः सुन्दरैस्तत्र पूजयेच्छंकरं मुदा ॥ ५६
कुशापामार्गकर्पूरजातिचंपकपाटले: ।
करवीरैः सितैश्चैव मल्लिकाकमलोत्पले:॥ ५७
अपूर्वपुष्पैर्विविधे श्रन्दनाचैस्तथैव च्च।
जलेन जलधारां च कल्पयेत्परमेश्वरे॥ ५८
पात्रैश्च विविधैर्देवं स्नापयेच्च महेश्वरम्।
मंत्रपूर्व॑ प्रकर्तव्या पूजा सर्वफलप्रदा॥ ५९
मन्त्रांश्च तुभ्यं तांस्तात सर्वकामार्थसिद्धये।
प्रवक्ष्यामि समासेन सावधानतया श्रृणु॥ ६०
पवमानेन मंत्रेण तथा वाइ्मयकेन च।
रुद्रेण नीलरुद्रेण सुशुक्लेन शुभेन च॥ ६१
होतारेण तथा शीर्ष्णा शुभेनाथर्वणेन च।
शांत्या वाथ पुनः शांत्या भारुण्डेनारुणेन च॥ ६२
अर्थाभीष्टेन साम्ना च तथा देवव्रतेन च॥ ६३
रथन्तरेण पुष्येण सूक्तेन पुरुषेण च।
मृत्युंजयेन मंत्रेण तथा पंचाक्षरेण च॥ ६४
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
चनक ५. ड९
“ॐ तत्पुरुषाय विदाहे' इत्यादि रुद्रगायत्रीद्वारा
इष्टदेवका सान्निध्य प्राप्त करके उन्हें '3&
अघोरेभ्योऽथ' इत्यादि अघोर मन्त्रसे वहाँ निरुद्ध
करे। तत्पश्चात् * ॐ ईशानः सर्व-विद्यानाम्' इत्यादि
मन्त्रसे आराध्य देवका पूजन करे । पाद्य और आचमनीय
अर्पित करके अर्घ्य दे॥ ४८-५१॥
तत्पश्चात् गन्ध और चन्दनमिश्रित जलसे विधिपूर्वक
रुद्रदेवको स्नान कराये | फिर पंचगव्यनिर्माणकी विधिसे
पाँचों द्रव्योंको एक पात्रमें लेकर प्रणवसे ही अभिमन्त्रित
करके उन मिश्रित गव्यपदार्थोद्वारा भगवानको स्नान
कराये । तत्पश्चात् पृथक्-पृथक् दूध, दही, मधु, गन्नेके
रस तथा घीसे नहलाकर समस्त अभीष्टोंके दाता और
हितकारी पूजनीय महादेवजीका प्रणवके उच्चारणपूर्वक
पवित्र द्र॒व्योंद्रारा अभिषेक करे ॥ ५२-५४॥
साधक श्वेत सस्त्रसे उस जलको यथोचित
रीतिसे छान ले और पवित्र जलपात्रमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक
जल डाले॥ ५५॥
जलधारा तबतक बन्द न करे, जबतक इष्टदेवको
चन्दन न चढ़ाये । तब सुन्दर अक्षतोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक
शंकरजीकी पूजा करे। उनके ऊपर कुश, अपामार्ग,
कपूर, चमेली, चम्पा, गुलाब, श्वेत कनेर, बेला, कमल
और उत्पल आदि भाँति-भाँतिके अपूर्व पुष्पों एवं चन्दनसे
उनकी पूजा करे | परमेश्वर शिवके ऊपर जलकी धारा
गिरती रहे, इसकी भी व्यवस्था करे॥ ५६-५८॥
जलसे भरे भाँति-भाँतिके पात्रोंद्वारा महेश्वरको
स्नान कराये। इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक समस्त
फलोंको देनेवाली पूजा करनी चाहिये॥ ५९ ॥
हे तात! अब मैं आपको समस्त मनोवांछित
'कामनाओंकी सिद्धिके लिये उन [पूजासम्बन्धी] मन्त्रोको
भी संक्षेपमें बता रहा हूँ, सावधानीके साथ सुनिये ॥ ६०॥
पावमानमन्त्रसे, “वाङ्मे०' इत्यादि मन्त्रसे,
रुद्रमन्त्रसे, नीलरुद्रमन्त्रसे, सुन्दर एवं शुभ पुरुषसूक्तसे,
श्रीसूक्तसे, सुन्दर अथर्वशीर्षके मन्त्रसे, “आ नो
भद्रा०' इत्यादि शान्तिमन्त्रसे, शान्तिसम्बन्धी दूसरे
मन्त्रोंसे, भारुण्ड मन्त्र और अरुणमन्त्रोंसे, अर्थाभीष्टसाम
तथा देवत्रतसामसे, ' अभि त्वा०' इत्यादि स्थन्तरसामसे,
पुरुषसूक्तसे, मृत्युंजयमन्त्रसे तथा पंचाक्षरमन्त्रसे पूजा
करे॥ ६१--६४॥
२५०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १ १
७७ 0... >... SSDS CE CHEE ENN
जलधाराः सहस्रेण शतेनैकोत्तरेण वा।
कर्तव्या वेदमार्गेण नामभिर्वाथ वा पुनः॥ ६५
ततश्चंदनपुष्पादि रोपणीयं शिवोपरि
दापयेत्प्रणवेनैव मुखवासादिकं तथा॥ ६६
ततः स्फटिकसंकाशं देवं निष्कलमक्षयम्।
कारणं सर्वलोकानां सर्वलोकमयं परम्॥ ६७
बरहोन्रोपनद्रविष्ण्वाद्यरपि देवैरगोचरम्।
वेदविद्धिर्हि वेदांते त्वगोचरमिति स्मृतम्॥ ६८
आदिमध्यान्तरहितं भेषजं सर्वरोगिणाम्।
शिवतत्त्वमिति ख्यातं शिवलिंगं व्यवस्थितम्॥ ६९
प्रणवेनेव मंत्रेण पूजयेल्लिंगमूर्द्धनि।
धूपैदीपैश्च नैवेद्येस्ताम्बूलैः सुन्दरैस्तथा॥ ७०
नीराजनेन रम्येण यथोक्तविधिना ततः।
नमस्कारैः स्तवैश्चान्यरमनत्रर्नानाविधैरपि॥ ७१
अर्ध्यं दत्त्वा तु पुष्पाणि पादयोः सुविकीर्य च।
प्रणिपत्य च देवेशमात्मनाराध्येच्छिवम्॥ ७२
हस्ते गृहीत्वा पुष्पाणि समुत्थाय कृतांजलिः।
प्रार्थयेत्पुनरीशानं मंत्रेणानेन शंकरम्॥ ७३
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाजपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर॥ ७४
पठित्वैवं च पुष्पाणि शिवोपरि मुदा न्यसेत्।
'तत: स्वस्त्ययनं कृत्वा ह्याशिषो विविधास्तथा ॥ ७५
मार्जनं तु ततः कार्यं शिवस्योपरि वै पुनः।
नमस्कारं ततः क्षांतिं पुनरागमनाय च॥ ७६
एक सहस्र अथवा एक सौ एक जलधाराएँ
बैदिक विधिसे शिवके नाममन्त्रसे प्रदान करे ॥ ६५॥
तदनन्तर भगवान् शंकरके ऊपर चन्दन और फूल
आदि चढ़ाये | प्रणवसे ताम्बूल आदि अर्पित करे ॥ ६६॥
इसके बाद जो स्फटिकमणिके समान निर्मल,
निष्कल, अविनाशी, सर्वलोककारण, सर्वलोकमय,
परमदेव हैं, जो ब्रह्मा, इन्द्र, उपेन्द्र, विष्णु आदि
देवताओंको भी गोचर न होनेवाले, वेदवेत्ता विद्वानोंके
द्वारा वेदान्तमें [मन-वाणीसे] अगोचर बताये गये हैं,
जो आदि-मध्य-अन्तसे रहित, समस्त रोगियोंके लिये
औषधरूप, शिवतत्त्वके नामसे विख्यात तथा शिवलिंगके
रूपमें प्रतिष्ठित हैं, उन भगवान् शिवका शिवलिंगके
मस्तकपर प्रणवमन्त्रसे ही पूजन करे | धूप, दीप, नैवेद्य,
सुन्दर ताम्बूल, सुरम्य आरती, स्तोत्रं तथा नाना
प्रकारके मन्त्रों एवं नमस्कारोंद्वारा यथोक्त विधिसे
उनकी पूजा करे॥ ६७-७१॥
तत्पश्चात् अर्घ्य देकर भगवान्के चरणोंमें फूल
बिखेरकर और साष्टांग प्रणाम करके देवेश्वर शिवको
आराधना करे ॥ ७२॥
इसके बाद हाथमें फूल लेकर खड़ा हो करके
दोनों हाथ जोड़कर सर्वेश्वर शंकरकी पुनः प्रार्थना
करे-हे शिव! मैंने अनजानमें अथवा जान-बूझकर
जो जप-पूजा आदि सत्कर्म किये हों, वे आपकी कृपासे
सफल हों ॥ ७३-७४॥
इस प्रकार पढ़कर भगवान् शिवके ऊपर
प्रसन्नतापूर्वक फूल चढ़ाये । तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन
करके नाना प्रकारकी आशी: * प्रार्थना करे | फिर शिवके
ऊपर मार्जनर करना चाहिये | इसके बाद नमस्कार करके
अपराधके लिये क्षमा--्रार्थना* करते हुए पुनरागमनके
१. “३% स्वस्त न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो
बृहस्पतिर्दधातु॥' इत्यादि स्वस्तिवाचनसम्बन्थी मन्त्र हैं।
२. 'काले वर्षतु पर्जन्य: पृथिवी शस्यशालिनी। देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणा: सन्तु निर्भया: ॥ सर्वे च सुखितः सु
सर्वे सन्तु निरामया: । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥' इत्यादि आशी: प्रार्थनाएँ हैं।
३. "ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः' (यजु० ११।५०--५२) इत्यादि तीन मार्जन-मन्त्र कहे गये हैं। इन्हें पढ़ते हुए
इष्टदेवपर जल छिड्कना 'मार्जन' कहलाता है।
४. "अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। तानि सर्वाणि मे देव क्षमस्व परमेश्वर ॥' इत्यादि क्षमाप्रार्थनासम्बन्धी
श्लोक हैं।
डड ११]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२५१
अघोरमन्त्रमुच्चार्य नमस्कारं प्रकल्पयेत्।
प्रार्थयेच्च पुनस्तत्र सर्वभावसमन्वितः॥ ७७
शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः शिवे भक्तिर्भवे भवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम॥ ७८
इति संप्रार्थ्य देवेशं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।
पूजयेत्पर्या भक्त्या गलनादैर्विशेषतः॥ ७९
नमस्कारं ततः कृत्वा परिवारगणैः सह।
प्रहर्षमतुलं लब्ध्वा कार्यं कुर्याद्यथासुखम्॥ ८०
एवं यः पूजयेन्नित्यं शिवभक्तिपरायणः।
तस्य बै सकला सिद्धिर्जायते तु पदे पदे॥ ८१
वाग्मी स जायते तस्य मनोऽभीष्टफलं श्रुवम्।
रोगं दुःखं च शोकं च ह्यदरेगं कृत्रिमं तथा॥ ८२
कौटिल्यं च गरं चैव यह्यहुःखमुपस्थितम्।
तहुःखं नाशयत्येव शिवः शिवकरः परः॥ ८३
कल्याणं जायते तस्य शुक्लपक्षे यथा शशी।
वर्धते सदुणस्तत्र ध्रुवं शंकरपूजनात्॥ ८४
इति पूजाविधिः शंभोः प्रोक्तस्ते मुनिसत्तम।
अतः परं च शुश्रूषुः किं प्रष्टासि च नारद॥ ८५
लिये विसर्जन! करना चाहिये। इसके बाद अघोर?
मन्त्रका उच्चारण करके नमस्कार करे। फिर सम्पूर्ण
भावसे युक्त होकर इस प्रकार प्रार्थना करे--प्रत्येक
जन्ममें शिवमें मेरी भक्ति हों, शिवमें भक्ति हो,
शिवमें भक्ति हो। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई
मुझे शरण देनेवाला नहीं है। हे महादेव! आप ही मेरे
लिये शरणदाता हैं ॥ ७५--७८ ॥
इस प्रकार प्रार्थना करके पराभक्तिके द्वारा
सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता देवेश्वर शिवका पूजन करे।
विशेषतः गलेकी ध्वनिसे भगवानको सन्तुष्ट करे॥ ७९ ॥
तत्पश्चात् परिब्रारजनोंके साथ नमस्कार करके
अनुपम प्रसन्नता प्राप्त करके समस्त [लौकिक] कार्य
सुखपूर्वक करता रहे ॥ ८०॥
जो इस प्रकार शिवभक्तिपरायण होकर प्रतिदिन
पूजन करता है, उसे अवश्य ही पग-पगपर सब
प्रकारकी सिद्धि प्राप्त होती है॥ ८१॥
वह उत्तम वक्ता होता है तथा उसे मनोवांछित
फलकी निश्चय ही प्राप्ति होती है । रोग, दुःख, शोक,
दूसरोंके निमित्तसे होनेवाला उद्ठेग, कुटिलता, विष तथा
अन्य जो-जो कष्ट उपस्थित होता है, उसे कल्याणकारी
परम शिव अवश्य नष्ट कर देते हैं ॥ ८२-८३॥
उस उपासकका कल्याण होता है। जैसे शुक्लपक्षमें
चन्द्रमा बढ़ता है, वैसे ही शंकरको पूजासे उसमें
अवश्य ही सद्गुणोंकी वृद्धि होती है॥ ८४॥
हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने शिवकी पूजाका
विधान आपको बताया। हे नारद! अब आप और
क्या पूछना तथा सुनना चाहते हैं ?॥ ८५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने
शिवपूजाविधिवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
शिवपूजाविधिवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११ ॥
—
१. "यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। अभीष्टफलदानाय पुनरागमनाय च॥' इत्यादि विसर्जनसम्बन्धी श्लोक हैं।
२. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते$स्तु रुद्ररूपेभ्यः |
२५२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १२
अथ द्वादशोऽध्यायः
भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन
नारद उवाच
ब्रहमन्प्रजापते तात धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः।
एतदेव पुनः सम्यरब्रूहि मे विस्तराद्विधे॥ १
ब्रह्मोवाच
एकस्मिन्समये तात ऋषीनाहूय सर्वतः।
निर्जरांश्रावदं प्रीत्या सुवचः पद्मसंभवः॥ २
यदि नित्यसुखे श्रद्धा यदि सिद्धेश्च कामुकाः ।
आगन्तव्यं मया सार्धं तीरं क्षीरपयोनिधेः॥ ३
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा गतास्ते हि मया सह।
यत्रास्ते भगवान्विष्णुः सर्वेषां हितकारकः॥ ४
तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं जनार्दनम्।
उपतस्थुः सुरा नत्वा सुकृताञ्जलयो मुने॥ ५
तदृष्ट्वा च तदा विष्णुब्रह्माद्यानमरान्स्थितान्।
स्मरन् शिवपदांभोजमन्रवीत्परमं वचः॥ ६
विष्णुरुवाच
किमर्थमागता यूयं ब्रह्माद्याश्च सुरर्षयः।
सर्व वदत तत्प्रीत्या किं कार्य विद्यतेऽधुना॥ ७
ब्रह्मोवाच
इति पृष्टास्तदा तेन विष्णुना च मया सुरा: ।
पुनः प्रणम्य तं प्रीत्या किं कार्य विद्यतेऽधुना।
विनिवेदयितुं कार्य हब्रुवन्वचनं शुभम्॥ ८
देवा ऊचुः
नित्यं सेवा तु कस्यैव कार्या दुःखापहारिणी॥ ९
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा भगवान्भक्तवत्सलः।
सामरस्य मम प्रीत्या कृपया वाक्यमब्रवीत्॥ १०
श्रीभगवानुवाच
ब्रह्मन् श्रृणु सुरैः सम्यक् श्रुतं च भवता पुरा।
तथापि कथ्यते तुभ्यं देवेभ्यश्च तथा पुनः॥ ११
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! हे प्रजापते! हे तात!
आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें
लगी हुई है हे विधे! आप पुन: इसी विषयका
प्रकारसे विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! एक समयकी बात
है; कमलसे उत्पन्न होनेवाले मैंने चारों ओरसे ऋषियों
और देवताओंको बुलाकर प्रेमपूर्वक सुन्दर और मधुर
वाणीमें कहा-॥ २॥
यदि आप सब नित्य सुख प्राप्त करनेकी इच्छा
रखते हैं और नित्य अपने मनोरथकी सिद्धि चाहते हैं
तो मेरे साथ क्षीरसागरके तटपर आयें॥ ३॥
इस वचनको सुनकर वे सब मेरे साथ वहाँपर
गये, जहाँ सर्वकल्याणकारी भगवान् विष्णु निवास
करते हैं॥ ४॥
हे मुने! वहाँपर जाकर सभी देवता भगवान्
जगन्नाथ देवदेवेश्वर जनार्दन विष्णुको हाथ जोड़कर
प्रणाम करके खड़े हो गये। ब्रह्मा आदि उन उपस्थित
देवताओंको देखकर [मनमें] शिवके चरणकमलका
स्मरण करते हुए विष्णु कहने लगे- ॥ ५-६॥
विष्णुजी बोले--हे ब्रह्मादि देवो और ऋषियों!
आपलोग यहाँ किसलिये आये हुए हैं ? प्रेमपूर्वक सब
कुछ कहें ? इस समय कौन-सा कार्य आ पड़ा ?॥ ७॥
ब्रह्माजी बोले भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा
पूछनेपर मैंने उन्हें प्रणाम किया और उपस्थित उन सभी
देवताओंसे कहा कि इस समय आप सबके आनेका क्या
प्रयोजन है ? इसका निवेदन आप सब करें॥ ८॥
देवता बोले [हे विष्णो !] किसकी सेवा है,
जो सभी दुःखोंको दूर करनेवाली है, जिसको कि हमें
नित्य करना चाहिये। देवताओंका यह वचन सुनकर
भक्तवत्सल भगवान् विष्णु देवताओंसहित मेरी प्रसनताके
लिये कृपापूर्वक यह वाक्य कहने लगे ॥ ९-१०॥
श्रीभगवान् बोले-हे ब्रह्मन्! देवोंके सार्थ
आपने पहले भी इस विषयमें सुना है, किंतु आज पुनः
आपको और देवताओंको बता रहा हूँ॥ ११॥
जी १२]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२५३
दृष्टं च दृश्यतेऽद्यैव किं पुनः पृच्छ्तेऽधुना।
ब्रह्मन्देवैः समस्तैश्च बहुधा कार्यतत्पर: ॥ १२
सेव्यः सेव्यः सदा देवः शंकरः सर्वदुःखहा।
ममापि कथितं तेन ब्रह्मणोऽपि विशेषत: ॥ १ ३
प्रस्तुतं चैव दृष्टं वः सर्व दृष्टान्तमद्भुतम्।
त्याज्यं तदर्चनं नैव कदापि सुखमीप्सुभिः ॥ १४
सन्त्यज्य देवदेवेशं लिंगमूर्ति महेश्वरम्।
तारपुत्रास्तथैवैते नष्ट्ास्तेऽपि सबान्धवाः ॥ १५
मया च मोहितास्ते वै मायया दूरतः कृताः।
सर्वे विनष्टाः प्रध्वस्ताः शिवेन रहिता यदा॥ १६
तस्मात्सदा पूजनीयो लिंगमूर्तिधरो हरः।
सेवनीयो विशेषेण श्रद्धया देवसत्तम॥ १७
शर्वलिङ्गार्चनादेव देवा दैत्याश्च सत्तमाः।
अहं त्वं च तथा ब्रह्मन्कथं तद्विस्मृतं त्वया॥ १८
तल्लिङ्गमर्चयेन्नित्यं येन केनापि हेतुना।
तस्मात् ब्रहमन्सुरैः शर्वः सर्वकामफलेप्सया॥ १९
सा हानिस्तन्महाछित्रं सान्धता सा च मुग्धता।
यन्मुहूर्तं क्षणं वापि शिवं नैव समर्चयेत्॥ २०
भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः।
भवसंस्मरणा ये च न ते दुःखस्य भाजनाः॥ २१
भवनानि मनोज्ञानि मनोज्ञाभरणाः स्त्रियः।
धनं च तुष्टिपर्यन्तं पुत्रपोत्रादिसंतति:॥ २२
आरोग्यं च शरीरं च प्रतिष्ठां चाप्यलौक्रिकीम्।
ये वांछति महाभागाः सुखं वा त्रिदशालयम्॥ २३
अंते मुक्तिफलं चैव भक्तिं वा परमेशितुः।
पूर्वपुण्यातिरिकेण तेऽर्चयन्ति सदाशिवम्॥ २४
हे ब्रह्मन्! अपने-अपने कार्योमें संलग्न समस्त
देवोंके साथ आपने जो देखा है और इस समय जो देख
रहे हैं, उसके विषयमें बार-बार क्यों पूछ रहे हैं 2॥ १२॥
सभी दुःखोंको दूर करनेवाले शंकरजीकी ही
सदा सेवा करनी चाहिये। यह बात स्वयं ही उन्होंने
विशेषकर मुझसे और ब्रह्मासे भी कही थी॥ १३॥
इस अद्धुत दृष्टान्तको आप सब लोगोंने भी
देखा है। अतः सुख चाहनेवाले लोगोंको कभी भी
उनका पूजन नहीं छोड़ना चाहिये॥ १४॥
देवदेवेश्वर भगवान् शंकरके लिंगमूर्तिरूप
महेश्वरका त्याग करके अपने बन्धु-बान्धवोसहित
तारपुत्र नष्ट हो गये। [शिवकी आराधनाका परित्याग
करनेके कारण] वे सब मेरे द्वारा मायासे मोहित कर
दिये गये और जब वे शिवकी भक्तिसे वंचित हो गये,
तब वे सब नष्ट और ध्वस्त हो गये॥ १५-१६॥
अतः हे देवसत्तम! लिंगमूर्ति धारण करनेवाले
भगवान् शंकरको विशेष श्रद्धाके साथ सदैव पूजा और
सेवा करनी चाहिये | शिवलिंगकी पूजा करनेसे ही देवता,
दैत्य, हम और आप सभी श्रेष्ठताको प्राप्त कर सके हैं,
हे ब्रह्मन्! आपने उसे कैसे भुला दिया है ?॥ १७-१८॥
इसलिये जिस किसी भी तरहसे भगवान् शिवके
लिंगका पूजन नित्य करना ही चाहिये। हे ब्रह्मन्!
सभी मनोकामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंको
भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ १९॥
वही [मनुष्यके जीवनकी बहुत बड़ी] हानि है,
वही [उसके चरित्रका] बहुत बड़ा छिद्र है, वही उसकी
अन्धता और वही महामूर्खता है, जिस मुहूर्त अथवा
क्षणमें मनुष्य शिवका पूजन नहीं करता है॥ २०॥
जो शिवभक्तिपरायण हैं, जो शिवमें अनुरक्त
चित्तवाले हैं और जो शिवका स्मरण करते हैं, वे
दुःखके पात्र नहीं होते। जो महाभाग मनको अच्छे
लगनेवाले सुन्दर-सुन्दर भवन, सुन्दर आभूषणोंसे युक्त
स्त्रियाँ, इच्छानुकूल धन, पुत्र-पौत्रादि सन्तति, निरोग
शरीर, अलौकिक प्रतिष्ठा, स्वर्गलोकका सुख,
अन्तकालमें मुक्तिलाभ तथा परमेश्वरकी भक्ति चाहते
हैं, वे पूर्वजन्मकृत पुण्याधिक्यके कारण सदाशिवकी
अर्चना किया करते हैं ॥ २१--२४॥
२५४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १२
योऽर्चयेच्छिवलिंगं वै नित्यं भक्तिपरायणः।
तस्य वै सफला सिद्धिर्न स पापैः प्रयुज्यते॥ २५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ताश्च तदा देवाः प्रणिपत्य हरिं स्वयम्।
लिंगानि प्रार्थयामासु सर्वकामाप्तये नृणाम्॥ २६
तच्छुत्वा च तदा विष्णुर्विश्वकर्माणमब्रवीत्।
अहं च मुनिशार्दूल जीवोद्धारपरायणः॥ २७
विश्वकर्मन्यथा शम्भोः कल्पयित्वा शुभानि च।
लिंगानि सर्वदेवेभ्यो देयानि वचनान्मम॥ २८
ब्रह्मोवाच
लिंगानि कल्पयित्वैवमधिकारानुरूपतः।
विश्वकर्मा ददौ तेभ्यो नियोगान्मम वा हरे: ॥ २९
तदेव कथयाम्यद्य श्रूयतामृषिसत्तम।
पद्मरागमयं शक्रो हैमं विश्रवसः सुतः॥ ३०
पीतं मणिमयं धर्मो वरुणः श्यामलं शिवम्।
इन्द्रनीलमयं विष्णुर्ब्रह्मा हेममयं तथा॥ ३१
विश्वेदेवास्तथा रोप्यं वसवश्च तथैव च।
आरकूटमयं वापि पार्थिवं ह्यश्विनौ मुने॥ ३२
लक्ष्मीश्च स्फाटिकं देवी ह्यदित्यास्ताम्रनिर्मितम्।
मौक्तिकं सोमराजो वै वज़लिंगं विभावसुः॥ ३३
मृण्मयं चैव विप्रेंद्रा विप्रपल्यस्तथैव च।
चांदनं च मयो नागाः प्रवालमयमादरात्॥ ३४
जवनीतमयं देवी योगी भस्ममयं तथा।
यक्षा दधिमयं लिंगं छाया पिष्टमयं तथा॥ ३५
शिवलिंगं च ब्रह्माणी रलं पूजयति श्रुवम्।
पारदं पार्थिवं बाणः समर्चति परेऽपि वा॥ ३६
जो भक्तिपरायण मनुष्य शिवलिंगकी नित्य पूजा
करता है, उसीकी सिद्धि सफल होती है और वह
पापोंसे लिप्त नहीं होता है॥ २५॥
ब्रह्माजी बोले_श्रीभगवान् विष्णुने जब
देवताओंसे ऐसा कहा, तब उन्होंने साक्षात् हरिको
प्रणाम करके मनुष्योंकी समस्त कामनाओंकी प्राप्तिके
लिये उनसे शिवलिंग देनेकी प्रार्थना की ॥ २६॥
उसको सुनकर भगवान् विष्णुने विश्वकर्मासे
कहा-हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तो जीवोंका उद्धार करनेमें
तत्पर हूँ। हे विश्वकर्मन्! मेरी आज्ञासे आप भगवान्
शिवके कल्याणकारी लिंगोंका निर्माण करके उन्हे
सभी देवताओंको प्रदान कीजिये ॥ २७-२८॥
ब्रह्माजी बोले--तब विश्वकर्माने अधिकारके
अनुसार शिवलिंगोंका निर्माण करके मेरी और
विष्णुकी आज्ञासे उन सभी शिवलिंगोंको उन
देवताओंको प्रदान किया॥ २९॥
हे ऋषिश्रेष्ठ! वही मैं आज आपसे कह रहा
हूँ, सुनिये । इन्द्र पद़रागमणिसे बने शिवलिंग, विश्रवापुत्र
कुबेर सुवर्णलिंग, धर्म पीतवर्ण पुखराजकी मणिसे
निर्मित लिंग, वरुण श्यामवर्णकी मणियोंसे बने हुए
लिंग, विष्णु इनद्रनीलमणिसे निर्मित लिंग, ब्रह्मा सुवर्णसे
बने शिवलिंग, हे मुने! सभी विश्वेदेव चाँदीसे निर्मित
शिवलिंग, वसुगण पीतलके शिवलिंग, अश्विनीकुमार
पार्थिव लिंग, देवी लक्ष्मी स्फटिकमणिनिर्मित लिंग,
सभी आदित्य ताम्रनिर्मित लिंग, सोमराज चन्द्रमा
मौक्तिक शिवलिंग, अग्निदेव बज्रमणि [हीरे]-से बने
शिवलिंग, श्रेष्ठ ब्राह्मण और उनकी पत्तियाँ मृण्मय
पार्थिव शिवलिंग, मयदानव चन्दनके शिवलिंग, नाग
मूँगेसे बने शिवलिंगका आदरपूर्वक विधिवत् पूजन
करते हैं॥ ३०--३४॥
देवी दुर्गा मक्खनसे बने हुए शिवलिंग, योगी
भस्मनिर्मित शिवलिंग, यक्ष दधिनिर्मित शिवलिंग तथां
छाया चाबलके आटेकी पीठीसे बने हुए शिवलिंगकी
विधिवत् पूजा करती हैं | ब्रह्माणी देवी रत्नमय
शिवलिंगकी पूजा करती हैं। बाणासुर पारेसे बगे
शिवलिंग तथा दूसरे लोग मिट्टी आदिसे बताये गये
पार्थिव शिवलिंगका विधिवत् पूजन करते हैं ॥ ३५-२६ |
ड १२]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२५५
एवंविधानि लिंगानि दत्तानि विश्वकर्मणा।
ते पूजयन्ति सर्वे वै देवा ऋषिगणास्तथा॥ ३७
विष्णुर्दत््वा च लिंगानि देवेभ्यो हितकाम्यया।
पूजाविधिं समाचष्ट ब्रह्मणे मे पिनाकिनः ॥ ३८
तच्छुत्वा वचनं तस्य ब्रह्माहं देवसत्तमैः।
आगच्छं च स्वकं धाम हर्षनिर्भरमानसः ॥ ३९
तत्रागत्य ऋषीन्सर्वान्देवांश्चाहं तथा मुने।
शिवपूजाविधिं सम्यगब्रुवं सकलेष्टदम्॥ ४०
ब्रह्मोवाच
श्रूयतामृषयः सर्वे सामराः प्रेमतत्पराः।
शिवपूजाविधिं प्रीत्या कथये भुक्तिमुक्तिदम्॥ ४१
मानुषं जन्म सम्प्राप्य दुर्लभं सर्वजन्तुषु।
तत्रापि सत्कुले देवा दुष्प्राप्यं च मुनीश्वराः॥ ४२
अव्यंगं चैव विप्रेषु साचारेषु सुपुण्यतः।
शिवसंतोषहेतोश्च कर्म स्वोक्तं समाचरेत्॥ ४३
यद्यज्ञातिसमुष्दिष्टं तत्तत्कर्म न लंघयेत्।
यावहानस्य सम्पत्तिस्तावत्कर्म समावहेत्॥ ४४
कर्मयज्ञसहस्त्रेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते।
तपोयज्ञसहस्त्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ ४५
ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्।
यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति॥ ४६
ध्यानयज्ञरतस्यास्य सदा सन्निहितः शिंवः।
नास्ति विज्ञानिनां किंचित्पायश्चित्तादिशोधनम्॥ ४७
विश्वकर्माने इसी प्रकारके शिवलिंग देवताओं
और ऋियोंको भी दिये थे, जिनकी पूजा वे सभी
देवता और ऋषि सदैव करते रहते हैं ॥ ३७॥
देवताओंकी हितकामनाके लिये विष्णुने उन्हें
शिवलिंग प्रदान करके मुझ ब्रह्मासे शिवका पूजन-
विधान भी बताया | उनके द्वारा कहे गये शिवलिंगके उस
पूजनविधानको सुनकर प्रसन्नचित्त मैं ब्रह्मा देवताओंकें
साथ अपने स्थानपर लौट आया॥ ३८-३९॥
हे मुने! वहाँ आकरके मैंने सभी देवों और
ऋषियोंको सम्पूर्ण अभीष्टकी सिद्धि करनेवाले
शिवलिंगके पूजन-विधानको सम्यक् रूपसे
बताया ॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले--हे सभी देवताओ और ऋषियो !
सुनिये। मैं प्रसन्नतापूर्वक आप सबसे शिवपूजनकी
उस विधिका वर्णन करने जा रहा हूँ, जो भोग और
मोक्षको देनेवाली है॥ ४१॥
हे देवो! हे मुनीशवरो! सभी जीव-जन्तुओंमें
मनुष्यका जन्म प्राप्त करना दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम
कुलमें जन्म लेना तो अत्यन्त दुर्लभ है। उत्तम कुलमें
भी सदाचारी ब्राह्मणोंके यहाँ जन्म लेना अच्छे पुण्योंसे
ही सम्भव है। अतः भगवान् सदाशिवकी प्रसन्नताके
लिये सदैव स्ववर्णाश्रम-विहित कर्म करते रहना
चाहिये ॥ ४२-४३॥
जिस जातिके लिये जो जो सत्कर्म बताया गया
है, उस-उस कर्मका उल्लंघन नहीं करना चाहिये,
जितनी सम्पत्ति हो, उसके अनुसार दानकर्म करना
चाहिये ॥ ४४॥
कर्ममय सहस्रों यज्ञोंकी अपेक्षा तपयज्ञ श्रेष्ठ
है। सहस्नों तपयज्ञोंकी अपेक्षा जपयज्ञका महत्त्व
अधिक है। ध्यान-यज्ञसे बढ़कर तो कोई वस्तु है ही
नहीं। ध्यान ज्ञानका साधन है; क्योंकि योगी ध्यानके
द्वारा अपने इष्टदेव एकरस सदाशिवका साक्षात्कार
करता है॥ ४५-४६ ॥
भगवान् सदाशिव सदैव ध्यानयञमें तत्पर रहनेवाले
उपासकके सान्निध्यमें रहते हैं । जो विज्ञानसे सम्पन्न
हैं, उनकी शुद्धिके लिये किसी प्रायश्चित्त आदिकी
आवश्यकता नहीं है॥ ४७॥
२५६
विशुद्धा विद्यया ये च ब्रह्मन्त्रह्मविदो जना: ।
जास्ति क्रिया च तेषां वै सुखं दुःखं विचारतः ॥ ४८
धर्माधमौ जपो होमो ध्यानं ध्यानविधिस्तथा।
सर्वदा निर्विकारास्ते विद्यया च तयामराः॥ ४९
परानंदकरं लिंगं विशुद्धं शिवमक्षरम्।
निष्कलं सर्वगं ज्ञेयं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ ५०
लिंगं तु द्विविधं परोक्तं बाह्यमाभ्यंतरं द्विजाः।
बाह्यं स्थूलं समुद्दिष्टं सूक्ष्ममाभ्यंतरं मतम्॥ ५१
कर्मयज्ञरता ये च स्थूललिंगार्चने रताः।
असतां भावनार्थाय सूक्ष्मेण स्थूलविग्रहाः॥ ५२
आध्यात्मिकं तु यल्लिंगं प्रत्यक्षं यस्य नो भवेत्।
स तल्लिंगे तथा स्थूले कल्पयेच्च न चान्यथा॥ ५३
ज्ञानिनां सूक्ष्मममलं भावात््रत्यक्षमव्ययम्।
यथा स्थूलमयुक्तानामुत्कृष्टादौ प्रकल्पितम्॥ ५४
अहो विचारतो नास्ति ह्यन्यत्तत्वार्थवादिनः।
निष्फलं सकलं चित्ते सर्व शिवमयं जगत्॥ ५५
एवं ज्ञानविमुक्तानां नास्ति दोषविकल्पना।
विधिश्चैव तथा नास्ति विहिताविहिते तथा॥ ५६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १२
RRS RSS सन स्त मळ हक
हे ब्रह्मन्! जो ब्रह्मविद् विशुद्ध ब्रह्मविद्याके द्वार
ब्रह्म-साक्षात्कार कर लेते हैं, उन्हें क्रिया, सुख-दु:ख,
धर्म-अधर्म, जप, होम, ध्यान और ध्यान-विधिको
जानने तथा करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे इस
विद्यासे सदा निर्विकार रहते हैं और अन्तमें अमर हो
जाते हैं ॥ ४८-४९ ॥
इस शिवलिंगको परमानन्द देनेवाला, विशुद्ध,
कल्याणस्वरूप, अविनाशी, निष्कल, सर्वव्यापक तथा
योगियोंके हृदयमें अवस्थित रहनेवाला जानना
चाहिये ॥ ५० ॥
हे द्विजो! शिवलिंग दो प्रकारका बताया गया
है--बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य लिंगको स्थूल एवं
आभ्यन्तर लिंगको सूक्ष्म माना गया है॥५१॥
जो कर्मयज्ञमें तत्पर रहनेवाले हैं, वे स्थूल
लिंगकी अर्चनामें रत रहते हैं । सूक्ष्मतया शिवके प्रति
ध्यान करनेमें अशक्त अज्ञानियोंके लिये शिवके इस
स्थूलविग्रहकी कल्पना की गयीं है। जिसको इस
आध्यात्मिक सूक्ष्मलिंगका प्रत्यक्षीकरण नहीं होता है,
उसे उस स्थूल लिंगमें इस सूक्ष्म लिंगकी कल्पना
करनी चाहिये, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं
है ॥ ५२-५३ ॥
ज्ञानियोंके लिये सूक्ष्मलिंगकी पूजाका विधान है,
[जिसमें ध्यानकी प्रधानता होती है।] ध्यान करनेसे
उस शिवका साक्षात्कार होता है, जो सदैव निर्मल
और अव्यय रहनेवाला है। जिस प्रकार अज्ञानियोंके
लिये स्थूल लिंगकी उत्कृष्टता बतायी गयी है, उसी
प्रकार ज्ञानियोंके लिये इस सूक्ष्मलिंगको उत्तम माना
गया है॥५४॥
दूसरे तत्त्वार्थवादियोके विचारसे आगे कोई
अन्तर नहीं है; क्योंकि निष्कल तथा कलामयरूपसे
वह सबके चित्तमें रहता है । सम्पूर्ण जगत् शिवस्वरूप
ही है॥५५॥
इस प्रकार ज्ञानके द्वारा शिवका साक्षात्कार
करके विमुक्त हुए लोगोंको कोई भी पाप नहीं लगता ।
उनके लिये विधि-निषेध और विहित-अविहित कु
भी नहीं है॥५६॥
ब १२]
यथा जलेषु 'कमलं सलिलेर्नावलिप्यते।
तथा ज्ञानी गृहे तिष्ठन्कर्मणा नावबध्यते॥ ५७
इति ज्ञानं समुत्पन्नं यावन्नेव नरस्य वे।
तावच्च कर्मणा देवं शिवमाराधयेन्नरः॥ ५८
प्रत्ययार्थं च जगतामेकस्थोऽपि दिवाकरः।
एकोऽपि बहुधा दृष्टो जलाधारादिवस्तुषु॥ ५९
दृश्यते श्रूयते लोके यद्यत्सदसदात्मकम्।
तत्तत्सर्वं सुरा वित्त परं ब्रह्म शिवात्मकम्॥ ६०
भेदो जलानां लोकेऽस्मिन्प्रतिभावेऽविचारतः।
एवमाहुस्तथा चान्ये सर्वे वेदार्थतत्त्वगा:॥ ६१
हृदि संसारिणः साक्षात्सकलः परमेश्वरः।
इति विज्ञानयुक्तस्य किं तस्य प्रतिमादिभिः॥ ६२
इति विज्ञानहीनस्य प्रतिमाकल्पना शुभा।
पदमुच्चैः समारोढुं पुंसो ह्यालम्बनं स्मृतम्॥ ६३
आलम्बनं विना तस्य पदमुच्चैः सुदुष्करम्
निर्गुणप्राप्तये नृणां प्रतिमालम्बनं स्मृतम्॥ ६४
सगुणानिनि्गुणप्राप्तिर्भवतीति सुनिश्चितम्।
एवं च सर्वदेवानां प्रतिमा प्रत्ययावहा॥ ६५
देवश्चायं महीयान्वै तस्यार्थे पूजनं त्विदम्।
गंधचन्दनपुष्पादि किमर्थं प्रतिमां विना॥
2223 Shivmahapuranam_Part L_SectionI0_l_Front
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२५७
जिस प्रकार जलके भीतर रहते हुए भी
कमल जलसे लिप्त नहीं होता हैं, उसी प्रकार घरमें
रहते हुए भी ज्ञानी पुरुषको कर्म अपने बन्धनमें बाँध
नहीं पाते हैं॥ ५७॥
इस प्रकारका ज्ञान जबतक मनुष्यको प्राप्त न
हो जाय, तबतक उसे कर्मविहित स्थूल या सूक्ष्म
शिवलिंगका निर्माणादि करके सदाशिवकी ही
आराधना करनी चाहिये ॥ ५८॥
जिस प्रकार विश्वासके लिये जगत्में सूर्य एक
ही स्थित है और एक होते हुए भी जलके आधार
जलाशय आदि वस्तुओंमें [अपने प्रतिबिम्बके कारण]
बहुत-से रूपोंमें दिखायी पड़ता है, उसी प्रकार हे
देवो! यह सत्-असत्रूप जो कुछ भी इस संसारमें
सुनायी और दिखायी दे रहा है, उसे आपलोग
शिवस्वरूप परब्रह्म ही समझें ॥ ५९-६०॥
जलतत्त्वके एक होनेपर भी उनके सम्बन्धमें जो
भेद प्रतीत होता है, वह संसारमें सम्यक् विचार न
करनेके कारण ही है--ऐसा अन्य सभी वेदार्थतत्त्वज्
भी कहते हैं ॥ ६१॥
संसारियोंके हृदयमें सकल लिंगस्वरूप साक्षात्
परमेश्वरका वास है-ऐसा ज्ञान जिसको हो गया है,
उसको प्रतिमा आदिसे क्या प्रयोजन हैं!॥ ६२॥
इस प्रकारके ज्ञानसे हीन प्राणीके लिये
शुभ प्रतिमाकी कल्पना की गयी है; क्योंकि ऊँचे
स्थानपर चढ़नेके लिये मनुष्यके लिये आलम्बन
आवश्यक बताया गया है॥६३॥
जैसे आलम्बनके बिना ऊँचे स्थानपर चढ़ना
मनुष्यके लिये अत्यन्त कठिन ही नहीं सर्वथा असम्भव
है, वैसे ही निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रतिमाका
अवलम्बन आवश्यक कहा गया है ॥ ६४॥
सगुणसे ही निर्गुणकी प्राप्ति होती है--ऐसा
निश्चित है। इस प्रकार सभी देवताओंकी प्रतिमाएँ उन
देवोंमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये होती हैं ॥ ६५॥
ये देव सभी देवताओंसे महान् हैं। इन्हींके लिये
यह पूजनका विधान है। यदि प्रतिमा न हो, तो गन्ध-
चन्दन, पुष्पादिकी आवश्यकता किस कार्यसिद्धिके
लिये रह जायगी॥ ६६॥
२५८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १२
D7
तावच्च प्रतिमा पूज्या यावद्विज्ञानसम्भवः।
ज्ञानाभावे न पूज्येत पतनं तस्य निश्चितम्॥
एतस्मात्कारणाद्रिप्राः श्रूयतां परमार्थतः।
स्वजात्युक्तं तु यत्कर्म कर्तव्यं तत्प्रयत्नतः॥ ६८
यत्र यत्र यथा भक्तिः कर्तव्यं पूजनादिकम्।
विना पूजनदानादि पातकं न च दूरतः॥ ६९
यावच्च पातकं देहे तावत्सिद्धिर्न जायते।
गते च पातके तस्य सर्व च सफलं भवेत्॥ ७०
यथा च मलिने वस्त्रे रंग: शुभतरो न हि।
क्षालने हि कृते शुद्धे सर्वो रंग: प्रसञ्ञते॥ ७१
तथा च निर्मले देहे देवानां सम्यगर्चया।
ज्ञानरंगः प्रजायेत तदा विज्ञानसंभवः॥ ७२
विज्ञानस्य च सन्मूलं भक्तिरव्यभिचारिणी।
ज्ञानस्यापि च सन्मूलं भक्तिरेवाऽभिधीयते॥ ७३
भक्तेमूल॑ तु सत्कर्म स्वेष्टदेवादिपूजनम्।
तन्मूलं सदगुरुः प्रोक्तस्तन्मूलं संगतिः सताम्॥ ७४
संगत्या गुरुराप्येत गुरोर्मनत्रादिपूजनम्।
पूजनाजायते भक्तिर्भक्त्या ज्ञानं प्रजायते॥ ७५
विज्ञानं जायते
विज्ञानं च यदा जातं तदा भेदो निवर्तते॥ ७६
भेदे निवृत्ते सकले दुंद्वदुःखबिहीनता।
इ्ंद्रदुःखविहीनस्तु शिवरूपो भवत्यसौ॥ ७७
दंद्राप्राप्तौ न जायेतां सुखदुःखे विजानतः।
विहिताविहिते तस्य न स्यातां च सुरर्षयः ॥ ७८
प्रतिमाका पूजन तबतक करते रहना चाहिये
जबतक विज्ञान [परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञान] प्राप्त नहीं
हो जाता । बिना ज्ञान प्राप्त किये ही जो प्रतिमाका पूजन
छोड़ देता है, उसका निश्चित ही पतन होता है ॥ ६७॥
हे ब्राह्मणो! इस कारण आपलोग परमार्थरूपसे
सुनें। अपनी जातिके अनुसार [शास्त्रोमें] जो कर्म
बताया गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ ६८॥
जहाँ-जहाँ जैसी भक्ति हो, वहाँ-वहाँ तदनुरूप
पूजनादि कर्म करना चाहिये; क्योकि पूजन, दान
आदिके बिना पाप दूर नहीं होता॥ ६९॥
जबतक शरीरमें पाप रहता है, तबतक सिद्धिकी
प्राप्ति नहीं होती है। पापके दूर हो जानेपर उसका
सब कुछ सफल हो जाता है॥ ७०॥
जिस प्रकार मलिन वस्त्रमें रंग बहुत सुन्दर नहीं
चढता, किंतु उसे भली प्रकारसे धोकर स्वच्छ कर
लेनेपर पूरा रंग अच्छी तरहसे चढ़ता है, उसी प्रकार
देवताओंकी विधिवत् पूजा करनेसे जब निर्मल शरीरमें
ज्ञानरूपी रंग चढता है, तब जाकर उस ब्रह्मविज्ञानका
प्रादुर्भाव होता है॥ ७१-७२॥
विज्ञानका मूल अनन्य भक्ति है और ज्ञानका
मूल भी भक्ति ही कही जाती है॥७३॥
भक्तिका मूल सत्कर्म और अपने इष्टदेव आदिका
पूजन है और उसका मूल सद्गुरु कहे गये हैं और
उन सद्गुरुका मूल सत्संगति है॥ ७४॥
सत्संगतिसे सद्गुरुको प्राप्त करना चाहिये।
सद्गुरुसे प्राप्त मन्त्रसे देवपूजन आदि सत्कर्म करने
चाहिये; क्योंकि देवपूजनसे भक्ति उत्पन्न होती है और
उस भक्तिसे ज्ञानका प्रादुर्भाव होता है ॥ ७५॥
ज्ञानसे परब्रह्मके प्रकाशक विज्ञानका उदय होता
है। जब विज्ञानका उदय हो जाता है, तब भेदबुद्धि
[स्वतः ही] नष्ट हो जाती है॥ ७६॥
समस्त भेदोंके नष्ट हो जानेपर द्वन्द्र-दुःख भी
नष्ट हो जाते हँ दन्द्र-दुःखसे रहित हो जानेपर वर्ह
साधक शिवस्वरूप हो जाता है॥ ७७॥
हे देवर्षियो | द्वन्दके नष्ट हो जानेपर ज्ञानीकों सुख-
दुःखकी अनुभूति नहीं होती और विहित-अविहितका
प्रपंच भी उसके लिये नहीं रह जाता है ॥ ७८ ॥
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च १२]
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२५९
ईदृशो विरलो लोके गृहाश्रमविवर्जितः।
यदि लोके भवत्यस्मिन्दर्शनात्पापहारकः ॥ ७९
तीर्थानि श्लाघयन्तीह तादृशं ज्ञानवित्तमम्।
देवाश्च मुनयः सर्वे परब्रह्मात्मकं शिवम्॥ ८०
तादृशानि न तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः।
ते पुनन्त्युरुकालेन विज्ञानी दर्शनादपि॥ ८१
यावदगृहाश्रमे तिष्ठेत्तावदाकारपूजनम्।
कुर्याच्छेष्ठस्य सुप्रीत्या सुरेषु खलु पंचसु॥ ८२
अथवा च शिवः पूज्यो मूलमेकं विशिष्यते।
मूले सिक्ते तथा शाखाः तृप्ताः सन्त्यखिलाः सुरा: ॥ ८३
शाखासु च सुतृप्तासु मूलं तृप्तं न कर्हिचित्।
एवं सर्वेषु तृप्तेषु सुरेषु मुनिसत्तमाः॥ ८४
सर्वथा शिवतृप्तिर्नो विज्ञेया सूक्ष्मबुद्धिभिः।
शिवे च पूजिते देवाः पूजिताः सर्व एव हि॥ ८५
तस्माच्च पूजयेद्देव शंकरं लोकशंकरम्
सर्वकामफलावाप्त्यै सर्वभूतहिते रतः॥ ८६
इस संसारमें ऐसा गृहस्थाश्रमरहित प्राणी
विरला ही होता है। यदि लोकमें कोई हो, तो उसके
| ही पाप नष्ट हो जाते हैं। सभी तीर्थ,
देवता और मुनि भी उस प्रकारके परब्रह्ममय शिवस्वरूप
परमज्ञानीकी प्रशंसा करते रहते हैं॥ ७९-८०॥
बैसे न तो तीर्थ हैं, न मिट्टी और पत्थरसे बने
देवता ही हैं, वे तो बहुत समयके बाद पवित्र करते
हैं, किंतु विज्ञानी दर्शनमात्रसे पवित्र कर देता है॥ ८१॥
जबतक मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे, तबतक
प्रेमपूर्वक उसे पाँच देवताओं (गणेश, सूर्य, विष्णु,
शिव तथा देवी)-की और उनमें भी सर्वश्रेष्ठ भगवान्
सदाशिवकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये अथवा
मात्र सदाशिवकी ही पूजा करनी चाहिये; एकमात्र वे
ही सबके मूल कहे गये हैं। हे देवो! जैसे मूल
(जड़)-के सींचे जानेपर सभी शाखाएँ स्वत: तृप्त हो
जाती हैं, वैसे ही सर्वदेवमय सदाशिवके ही पूजनसे
सभी देवतांओंका पूजन हो जाता है और वे प्रसन्न
हो जाते हैं॥ ८२-८३॥
जैसे वृक्षकी शाखाओंके तृप्त होनेपर अर्थात्
उन्हें सींचनेपर कभी भी मूलकी तृप्ति नहीं होती,
वैसे ही हे मुनिश्रेष्ठो! सभी देवताओंके तृप्त
होनेपर शिवकी भी तृप्ति नहीं होती है-एऐसा सूक्ष्म
बुद्धिवाले लोगोंको जानना चाहिये। शिवके पूजित
हो जानेपर सभी देवताओंका पूजन स्वतः ही हो जाता
है॥ ८४-८५॥
अतः सभी प्राणियोके कल्याणमें लगे हुए
मनुष्यको चाहिये कि वह सभी कामनाओंकी
'फलप्राप्तिके लिये संसारका कल्याण करनेवाले
भगवान् सदाशिवकी पूजा करे॥ ८६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने पूजाविधिवर्णने
सारासारविचारवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें पूजा-विधि-
वर्णनःक्रममें सारासारःविचारवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
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२६०
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १३
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
ब्रह्मोवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि पूजाविधिमनुत्तमम्।
श्रूयतामृषयो देवाः सर्वकामसुखावहम्॥ १
ब्राह्म मुहूर्ते चोत्थाय संस्मरेत्साम्बकं शिवम्।
कुर्यत्तित्प्रार्थनां भक्त्या सांजलिर्नतमस्तकः॥ २
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश उत्तिष्ठ हृदयेशय।
उत्तिष्ठ त्वमुमास्वामिन्ब्रह्माण्डे मङ्गलं कुरु॥ ३
जानामि धर्म न च मे प्रवृत्ति-
र्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।
महादेव हृदि स्थितेन
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि॥ ४
इत्युक्त्वा वचनं भक्त्या स्मृत्वा च गुरुपादके।
बहिर्गच्छेक्षिणाशां त्यागार्थं मलमूत्रयोः॥ ५
त्वया
देहशुद्धिं ततः कृत्वा स मृज्जलविशोधनेै: ।
हस्तौ पादौ च प्रक्षाल्य दंतधावनमाचरेत्॥ ६
दिवानाथे त्वनुदिते कृत्वा वै दन्तधावनम्।
मुखं षोडशवारं तु प्रक्षाल्यांजलिभिस्तथा॥ ७
षष्ठ्याद्यामाश्च तिथयो नवम्यर्कदिने तथा।
वर्ज्याः सुरर्षयो यलाद्वक्तेन रदधावने॥ ८
यथावकाशं सुस्नायाऱ्नद्यादिष्वथवा गृहे।
देशकालाविरुद्धं च स्नानं कार्य नरेण च॥ ९
रवेर्दिने तथा श्राद्धे संक्रान्तौ ग्रहणे तथा।
महादाने तथा तीर्थ ह्युपवासदिने तथा॥ १०
अशाँचेऽप्यथवा प्राप्ते न स्नायादुष्णवारिणा।
यथा साभिमुखं स्नायात्तीर्थादौ भक्तिमान्नरः॥ ११
ब्रह्माजी बोले--अब मैं पूजाकी सर्वोत्तम
विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट सुखोंको सुलभ
करानेवाली है। हे देवताओ तथा ऋषियो! आपलोग
ध्यान देकर सुनें॥ १॥
उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्म मुहूर्तमें
उठकर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवका स्मरण
करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक
उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे-॥ २॥
हे देवेश्वर! उठिये, उठिये। मेरे हृदयमें शयन
करनेवाले देवता! उठिये। हे उमाकान्त! उठिये और
ब्रह्माण्डमें सबका मंगल कीजिये। मैं धर्मको जानता
हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती, मैं अधर्मको
जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। हे
महादेव! आप मेरे हृदयमें स्थित होकर मुझे जैसी
प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ॥ ३-४॥
भक्तिपूर्वक यह वचन कहकर और गुरुके
चरणोंका स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिण दिशामें
मलमूत्रका त्याग करनेके लिये जाय॥५॥
इसके बाद मिट्टी और जलसे शरीरकी शुद्धि
करके दोनों हाथों और पैरोंको धोकर दन्तधावन
करे॥ ६॥
सूर्योदय होनेसे पहले ही दातौन करके मुँहको
सोलह बार जलकी अँजलियोंसे धोये। हे देवताओं
तथा ऋषियो ! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावास्या और नवमी
तिथियों तथा रविवारके दिन शिवभक्तको यलपूर्वक
दातौनको त्याग देना चाहिये ॥ ७-८॥
अवकाशके अनुसार नदी आदिमें जाकर अथवा
घरमें ही भलीभाँति स्नान करे। मनुष्यको देश और
कालके विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये॥ ९॥
रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ,
उपवासदिवस अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्य गर्म
जलसे स्नान न करे। शिवभक्तिसे युक्त मनुष्य तीर्थ
आदियें प्रवाहके सम्मुख होकर स्नान करे॥ १०-११॥
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ट १३]
तैलाभ्यंगं च कुर्वीत वारान्दृष्ट्वा क्रमेण च।
नित्यमभ्यंगके चैव वासितं वा न दूषितम्॥ १२
श्राद्धे च ग्रहणे चेवोपवासे प्रतिपद्दिने।
अथवा सार्षपं तैलं न दुष्येद् ग्रहणं विना॥ १३
देशं कालं विचाय्यैवं स्नानं कुर्याद्यथाविधि।
उत्तराभिमुखश्चैव प्राङ्मुखोऽप्यथवा पुनः॥ १४
उच्छिष्टेनैव चस्त्रेण न स्नायात्स कदाचन।
शुद्धवस्त्रेण स स्नायात्तददेवस्मृतिपूर्वकम्॥ १५
परधार्य्यं च नोच्छिष्टं रात्रौ च विधृतं च यत्।
तेन स्नानं तथा कार्य क्षालितं च परित्यजेत्॥ १६
तर्पणं च ततः कार्यं देवर्षिपितृतृप्तिदम्।
धौतवस्त्रं ततो धार्य पुनराचमनं चरेत्॥ १७
शुचौ देशे ततो गत्वा गोमयाद्यपमार्जिते।
आसनं च शुभं तत्र रचनीयं द्विजोत्तमाः॥ १८
शुद्धकाष्ठसमुत्पन्नं पूर्ण स्तरितमेव वा।
चित्रासनं तथा कुर्यात्सर्वकामफलप्रदम्॥ १९
यथायोग्यं पुनर्ग्राह्म॑ मृगचर्मादिकं च यत्।
तत्रोपविश्य कुवीत त्रिपुण्डूं भस्मना सुधीः ॥ २०
जपस्तपस्तथा दानं त्रिपुण्ड्रात्सफलं भवेत्।
अभावे भस्मनस्तत्र जलस्यादि प्रकीर्तितम्॥ २१
एवं कृत्वा त्रिपुण्ड्रं च रुद्राक्षान्धारयेन्नरः।
सम्पाद्य च स्वकं कर्म पुनराराधयेच्छिवम्॥
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२६१
जो नहानेके पहले तेल लगाना चाहे, उसे
विहित एवं निषिद्ध दिनोंका विचार करके ही
तैलाभ्यंग करना चाहिये। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक
तेल लगाता हो, उसके लिये किसी भी दिन तैलाभ्यंग
करना दोषपूर्ण नहीं है अथवा जो तेल इत्र आदिसे
वासित हो, उसका लगाना किसी भी दिन दूषित
नहीं है॥१२॥
श्राद्ध, ग्रहण, उपवास और प्रतिपदाके दिन तेल
नहीं लगाना चाहिये। सरसोंका तेल ग्रहणको छोड़कर
किसी भी दिन दूषित नहीं होता॥ १३॥
इस तरह देश-कालका विचार करके ही
विधिपूर्वक स्नान करे | स्नानके समय अपने मुखको
उत्तर अथवा पूर्वकी ओर रखना चाहिये ॥ १४॥
उच्छिष्ट वस्त्र धारण करके स्नान कभी न करे।
शुद्ध वस्त्र धारण करके इष्टदेवका स्मरण करते हुए
स्नान करना चाहिये॥ १५॥
जिस वस्त्रको दूसरेने धारण किया हो तथा जिसे
स्वयं रातमें धारण किया गया हो, उससे तभी स्नान
किया जा सकता है, जब उसे धो लिया गया हो ॥ १६॥
इसके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको
तृप्ति देनेवाला तर्पण करना चाहिये। उसके बाद धुला
हुआ वस्त्र पहने और आचमन करे॥ १७॥
हे श्रेष्ठ द्विजो! तदनन्तर गोबर आदिसे लीप-
पोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध स्थानमें जाकर वहाँ
सुन्दर आसनकी व्यवस्था करे। वह आसन विशुद्ध
काष्ठका बना हुआ, पूरा फैला हुआ तथा चित्रमय
होना चाहियें। ऐसा आसन सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको
देनेवाला है॥ १८-१९॥
उसके ऊपर बिछानेके लिये यथायोग्य मृगचर्म
आदि ग्रहण करे। शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष उस आसनपर
बैठकर भस्मसे त्रिपुण्ड लगाये॥ २०॥
त्रिपुण्ड्से जप, तप तथा दान सफल होते
हैं। भस्मके अभावमेंत्रिपुण्डका साधन जल आदि बताया
गया है॥ २१॥
इस तरह त्रिपुण्ड करके मनुष्य रुद्राक्ष धारण
करे और अपने (सन्ध्योपासना आदि) नित्यकर्मका
सम्पादन करके पुनः शिवकी आराधना करे॥ २२॥
२६२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १३
पुनराचमनं कृत्वा त्रिवारं मंत्रपूर्वकम्।
एकं वाथ प्रकुर्याच्च गंगाबिन्दुरिति ब्रुवन्॥ २३
अन्नोदकं तथा तत्र शिवपूजार्थमाहरेत्।
अन्यद्वस्तु च यत्किंचिद्यथाशक्ति समीपगम्॥ २४
कृत्वा स्थेयं च तत्रैव धैर्यमास्थाय वै पुनः।
अर्घपात्रं तथा चैकं जलगंधाक्षतेर्युतम्॥ २५
दक्षिणांसे तथा स्थाप्यमुपचारस्य क्लृप्तये।
गुरोश्च स्मरणां कृत्वा तदनुज्ञामवाप्य च॥ २६
संकल्पं विधिवत्कृत्वा कामनां च नियुज्य वे।
पूजयेत्परया भक्त्या शिवं सपरिवारकम्॥ २७
मुद्रामेकां प्रदश्यैव पूजयेद्रिघ्नहारकम्।
सिंदूरादिपदार्थेश्र सिद्धिबुद्धिसमन्वितम्॥ २८
लक्षलाभयुतं तत्र पूजयित्वा नमेत्पुन: ।
चतुर्थ्यन्तै्नामपदैर्नमोऽन्तैः प्रणवादिभिः॥ २९
क्षमाप्यैनं तदा देवं भ्रात्रा चैव समन्वितम्।
पूजयेत्परया भक्त्या नमस्कुर्यात्पुनः पुनः॥ ३०
द्वारपालं सदा द्वारि तिष्ठन्तं च महोदरम्।
पूजयित्वा ततः पश्चात्पूजयेद्विरिजां सतीम्॥ ३१
चंदनैः कुंकुमेश्चैव धूपैदीपैरनेकशः।
नैवद्येर्विविधैश्चेव पूजयित्वा ततः शिवम्॥ ३२
नमस्कृत्य पुनस्तत्र गच्छेच्च शिवसञ्निधौ।
यदि गेहे पार्थिवीं वा हैमीं वा राजतीं तथा॥ ३३
धातुजन्यां तथैवान्या पारदां वा प्रकल्पयेत्।
नमस्कृत्य पुनस्तां च पूजयेद्भक्तितत्परः॥ ३४
तस्यां तु पूजितायां वै सर्वे स्युः पूजितास्तथा।
स्थापयेच्च मृदा लिंगं विधाय विधिपूर्वकम्॥ ३५
कर्तव्यं सर्वथा तत्र नियमाः स्वगृहे स्थितैः।
प्राणप्रतिष्ठा कुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च॥ ३६
——— EO रू COR
तत्पश्चात् तीन बार मन्त्रपूर्वक आचमन करे
अथवा “गंगाबिन्दुः -ऐसा उच्चारण करते हुए एक
बार आचमन करे॥ २३॥
तत्पश्चात् वहाँ शिवकी पूजाके लिये अन्न और
जल लाकर रखे। दूसरी कोई भी जो वस्तु आवश्यक
हो, उसे यथाशक्ति जुटाकर अपने पास रखे ॥ २४॥
इस प्रकार पूजन-सामग्रीका संग्रह करके वहाँ
धैर्य धारण करके जल, गन्ध और अक्षतसे युक्त एक
अर्धघ्यपात्र लेकर उसे दाहिने भागमें रखे, उससे
उपचारकी सिद्धि होती है। फिर गुरुका स्मरण करके
उनकी आज्ञा लेकर विधिवत् सकाम संकल्प करके
पराभक्तिसे सपरिवार शिवका पूजन करे॥ २५--२७॥
एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारोंद्वारा
सिद्धि-बुद्धिसहित विघ्नहारी गणेशका पूजन करे।
लक्ष और लाभसे युक्त गणेशजीका पूजन करके उनके
नामके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नम: जोड़कर
नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए
नमस्कार करे। यथा-ॐ गणपतये नमः अथवा ॐ
लक्षलाभयुताय सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये
नमः ॥ २८-२९॥
तदनन्तर उनसे क्षमाप्रार्थना करके पुनः भाई
कार्तिकेयसहित गणेशजीका पराभक्तिसे पूजन करके
उन्हें बारंबार नमस्कार करे॥ ३०॥
तत्पश्चात् सदा द्वापर खड़े रहनेवाले
महोदरका पूजन करके सती-साध्वी गिरिराजनन्दिनी
उमाकी पूजा करे॥ ३१॥
चन्दन, कुंकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों
तथा नाना प्रकारके नैवेद्योसे शिवाका पूजन करके
नमस्कार करनेके पश्चात् साधक शिवजीके समीप जाय।
यथासम्भव अपने घरमें मिट्टी, सोना, चाँदी, धातु या अन्य
[द्रव्य] पारे आदिकी शिवप्रतिमा बनाये और उसे नमस्कार
करके भक्तिपरायण होकर पूजा करे | उसकी पूजा हो
जानेपर सभी देवता पूजित हो जाते हैं ॥ ३२-३४/२॥
मिट्टीका शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी
स्थापना करे | अपने घरमें रहनेवाले लोगोंको स्थापना"
सम्बन्धी सभी नियमोंका सर्वथा पालन करना चाहिये।
भूतशुद्धि करके प्राणप्रतिष्ठा करे॥ ३५-३६॥
ड १३]
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२६३
दिक्पालान्पूजयेत्तत्र स्थापयित्वा शिवालये।
गृहे शिवः सदा पूज्यो मूलमन्त्राभियोगतः॥ ३७
तत्र तु द्वारपालानां नियमो नास्ति सर्वथा ।
गृहे लिंगं च यत्पूज्यं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ३८
पूजाकाले च सांगं वै परिवारेण संयुतम्।
आवाह्य पूजयेद्देवं नियमोऽत्र न विद्यते॥ ३९
शिवस्य सन्निधिं कृत्वा स्वासनं परिकल्पयेत्।
उदङ्मुखस्तदा स्थित्वा पुनराचमनं चरेत्॥ ४०
प्रक्षाल्य हस्तौ पश्चाद्वै प्राणायामं प्रकल्पयेत्।
मूलमंत्रेण तत्रैव दशावर्तं नयेन्नरः॥ ४१
पंचमुद्राः प्रकर्तव्या: पूजावश्यं करे स्थिता।
एता मुद्राः प्रदश्यैव चरेत्पूजाविधिं नर: ॥ ४२
दीपं कृत्वा तदा तत्र नमस्कारं गुरोरथ।
बध्वा पद्मासनं तत्र भद्रासनमथापि वा॥ ४३
उत्तानासनकं कृत्वा पर्यकासनकं तथा।
यथासुखं तथा स्थित्वा प्रयोगं पुनरेव च॥ ४४
कृत्वा पूजां पुरा जातां वट्ठकेनैव तारयेत्।
यदि वा स्वयमेवेह गृहे न नियमोऽस्ति च॥ ४५
पश्चाच्चैवार्घपात्रेण क्षालयेल्लिंगमुत्तमम्।
अनन्यमानसो भूत्वा पूजाद्रव्यं निधाय च॥ ४६
पश्चाच्चावाहयेद्देव॑ मंत्रेणानेन वै नरः।
कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम्॥ ४७
यथोक्तरूपिणं शंभुं निर्गुणं गुणरूपिणम्।
पंचवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम्॥
कर्पूरगौरं दिव्यांगं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम्।
शिवालयमें दिक्पालोंकी भी स्थापना करके
उनकी पूजा करे। घरमें सदा मूलमन्त्रका प्रयोग करके
शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ३७॥
घरमे द्वारपालोंके पूजनका सर्वथा नियम नहीं है;
क्योंकि घरमें जिस शिवलिंगकी पूजा की जाती है,
उसमें सभी देवता प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ३८॥
घरपर होनेवाली शिवकी पूजाके समय अंगॉसहित
तथा सपरिवार उन सदाशिवका आवाहन करके पूजन
किया जाय, ऐसा कोई नियम नहीं है॥ ३९॥
भगवान् शिवके समीप ही अपने लिये
आसनकी व्यवस्था करे। उस समय उत्तराभिमुख
बैठकर आचमन करे॥ ४०॥
उसके बाद दोनों हाथोंका प्रक्षालन करके
प्राणायाम करे। प्राणायामकालमें मनुष्यको मूलमन्त्रको
दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये॥ ४१॥
हाथोंसे पाँच मुद्राएँ दिखाये। यह पूजाका
आवश्यक अंग है | इन मुद्राओंका प्रदर्शन करके ही
मनुष्य पूजाविधिका अनुसरण करे॥ ४२॥
तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरुको नमस्कार
करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे अथवा
उत्तानासन या पर्यकासनका आश्रय लेकर सुखपूर्वक
बैठे और पुनः पूजनका प्रयोग करे । पुराने समयमें तो
पत्थरकी बटियाकी ही श्रद्धापूर्वक पूजा करके लोग
भवसागरसे पार हो जाते थे। यदि वे शुद्ध रूपमें
स्वयमेव घरमें विद्यमान हैं, तो उसके लिये कोई
नियमकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४३--४५॥
तत्पश्चात् अर्ध्यपात्रसे उत्तम शिवलिंगका प्रक्षालन
करे। मनको भगवान् शिवसे अन्यत्र न ले जाकर
पूजा-सामग्रीको अपने पास रखकर निम्नाँकित मन्त्रसमूहसे
महादेवजीका आवाहन करे॥ ४६९/२॥
जो कैलासके शिखरपर निवास करते हैं,
पार्वतीदेवीके पति हैं, समस्त देवताओंसे उत्तम हैं,
जिनके स्वरूपका शास्त्रोमें यथावत् वर्णन किया गया
है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच
मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन-तीन
नेत्र हैं, जिनकी ध्वजापर वृषभ चिह्न अंकित है,
जिनके अंगकी कान्ति कर्पूरके समान गौर है, जो
२६४
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १३
व्याघ्नचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम्॥ ४९
वासुक्यादिपरीतांगं पिनाकाद्यायुधान्वितम्।
सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीह निरंतरम्॥ ५०
जयजयेति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुञ्जकैः।
तेजसा दुःसहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम्॥ ५१
शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपंकजम्।
वेदैः शास्त्रैर्यथागीतं विष्णुब्रह्मनुतं सदा॥ ५२
भक्तवत्सलमानंदं शिवमावाहयाम्यहम्।
एवं ध्यात्वा शिवं साम्बमासनं परिकल्पयेत्॥ ५३
चतुर्थ्यन्तपदेनैव सर्व॑ कुर्याद्यथाक्रमम्।
ततः पाद्यं प्रदद्याद्वै ततोऽर्घ्यं शंकराय च॥ ५४
ततश्चाचमनं कृत्वा शम्भवे परमात्मने।
पश्चाच्च पंचभिर्द्रव्ये: स्नापयेच्छंकरं मुदा॥ ५५
वेदमनत्रर्यथायोग्यं नामभिर्वा समन्त्रकैः।
चतुर्थ्यन्तपदैर्भक्त्या द्रव्याण्येवार्पयेत्तदा॥ ५६
तथाभिलषितं द्रव्यमर्पयेच्छङ्करोपरि।
ततश्च वारुणं स्नानं करणीयं शिवाय वै॥ ५७
सुगंधं चंदनं दद्यादन्यलेपानि यत्नतः।
ससुगंध्जलेनैव जलधारां प्रकल्पयेत्॥ ५८
वेदमंत्रैः षडङ्गै्वा नामभी रुद्रसंख्यया।
यथावकाशं तां दत्वा वस्त्रेण मार्जयेत्ततः॥ ५९
पश्चादाचमनं दद्यात्ततो वस्त्रं समर्पयेत्।
तिलाश्चैव यवा वापि गोधूमा मुद्रमाषकाः॥ ६०
अर्पणीयाः शिवायैवं मंत्रेर्नानाविधैरपि।
ततः पुष्पाणि देयानि पंचास्याय महात्मने॥ ६९
दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुटसे सुशोभित तथा
सिरपर जटाजूट धारण करनेवाले हैं, जो हाथीकी
खाल पहनते हैं और व्याघ्रचर्म ओढते हैं,
स्वरूप शुभ है, जिनके अंगोंमें वासुकि आदि नाग
लिपरे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते
हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर नृत्य करती
रहती हैं, भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी
सेवामें लगे रहते हैं, दुस्सह तेजके कारण जिनकी
ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओंसे सेवित हैं,
जो सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, जिनका
मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ है, वेदों और
शास्त्रोंने जिनकी महिमाका यथावत् गान किया है,
विष्णु और ब्रह्मा भी सदा जिनकी स्तुति करते हैं तथा
जो भक्तवत्सल हैं, उन परमानन्दस्वरूप शिवका मैं
आवाहन करता हूँ। इस प्रकार साम्बशिवका ध्यान
करके उनके लिये आसन दे॥ ४७-५३॥
चतुर्थ्यन्त पदसे ही क्रमशः सब कुछ अर्पित
करे। [यथा-साम्बाय सदाशिवाय नमः आसनं
समर्पयामि इत्यादि।] तत्पश्चात् भगवान् शंकरको
पाद्य और अर्घ्य दे। तदनन्तर परमात्मा शम्भुको
आचमन कराकर पंचामृतसम्बन्धी द्रव्योंदवारा प्रसन्नता-
पूर्वक शंकरको स्नान कराये ॥ ५४-५५ ॥
वेदमन्त्रों अथवा समन्त्रक चतुर्थ्यन्त नामपदोंका
उच्चारण करके भक्तिपूर्वक यथायोग्य समस्त
द्रव्य भगवान्को अर्पित करे | अभीष्ट द्रव्यको शंकरके
ऊपर चढ़ाये। फिर भगवान् शिवको जलधारासे स्नान
कराये ॥ ५६-५७॥
स्नानके पश्चात् उनके श्रीअंगोंमें सुगन्धित चन्दन
तथा अन्य द्रव्योंका यत्लपूर्वक लेप करे। तत्पश्चात
सुगन्धित जलसे ही उनके ऊपर जलधारा गिराकर
अभिषेक करे। वेदमन्तरों, षडंगों अथवा शिवकें
ग्यारह जामोंद्वारा यथावकाश जलधारा चढ़ाकर वस्त्रसे
शिवलिंगको अच्छी तरह पोछे ॥ ५८-५९॥
तदनन्तर आचमन प्रदान करे और वस्त्र समर्पित
करे। जाना प्रकारके मन्त्रोंद्रार भगवान् शिवको तिल
जौ, गेहूँ, मूँग और उड़द अर्पित करे। फिर पाँच
मुखवाले परमात्मा शिवको पुष्प चढ़ाये॥ ६०-६१॥
के १३]
प्रतिवक्त्रं यथाध्यानं यथायोग्याभिलाषत: ।
कमलैः शतपत्रैश्च शंखपुष्पै: परैस्तथा॥ ६२
कुशपुष्पैश्च धत्तूरेमन्दारेद्रोणसंभवे: ।
तथा च तुलसौपत्रैबिल्वपत्रैविशेषतः ॥ ६३
पूजयेत्परया भक्त्या शंकरं भक्तवत्सलम्।
सर्वाभावे बिल्वपत्रमर्पणीयं शिवाय वै॥ ६४
बिल्वपत्रार्पणेनेव सर्वपूजा प्रसिध्यति।
ततः सुगंधचूर्णं वै वासितं तैलमुत्तमम्॥ ६५
अर्पणीयं च विविधं शिवाय परया मुदा।
ततो धूपः प्रकर्तव्यो गुग्गुलागुरुभिर्मुदा॥ ६६
दीपो देयस्ततस्तस्मै शंकराय घृताप्लुतः।
अर्घ दद्यात्पुनस्तस्मै मंत्रेणानेन भक्तितः॥ ६७
कारयेद्भावतो भक्त्या वस्त्रेण मुखमार्जनम्।
रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर॥ ६८
भुक्तिमुक्तिफलं देहि गृहीत्वार्घं नमोऽस्तु ते।
ततो देयं शिवायैव नेवेद्यं विविधं शुभम्॥ ६९
तत आचमनं प्रीत्या कारयेद्वाविलम्बतः।
ततः शिवाय ताम्बूलं सांगोपाङ्गं विधाय च॥ ७०
कुर्यादारार्तिकं पञ्चवर्तिकामनुसंख्यया।
पादयोश्च चतुर्वारं द्विःकृत्वो नाभिमण्डले॥ ७१
एककृत्वो मुखे सप्तकृत्वः सर्वाङ्ग एव हि।
ततो ध्यानं यथोक्तं वै कृत्वा मंत्रमुदीरयेत्॥ ७२
यथासङ्ख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मन्त्रविधिं नरः।
गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मन्त्रजपं सुधीः ॥
गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मन्त्रमुदीरयेत्।
यथासंख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मनत्रविधिं नरः ॥ ७४
स्तोत्रैर्नानाविधै: प्रीत्या स्तुवीत वृषभध्वजम्।
ततः प्रदक्षिणां कुर्याच्छिवस्य च शनैः शनैः ॥ ७५
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२६५
प्रत्येक मुखपर ध्यानके अनुसार यथोचित
अभिलाषा करके कमल, शतपत्र, शंखपुष्प, कुशपुष्प,
धतूर, मन्दार, द्रोणपुष्प, तुलसीदल तथा बिल्वपत्रके
द्वारा पराभक्तिके साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी
विशेष पूजा करे। अन्य सब चस्तुओंका अभाव
होनेपर शिवको केवल बिल्वपत्र ही अर्पित
करे॥ ६२-६४॥
बिल्वपत्र समर्पित होनेसे हीं शिवकी पूजा
सफल होती है। तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा
सुवासित उत्तम तैल, इत्र आदि विविध वस्तुएँ बड़े
हर्षके साथ भगवान् शिवको अर्पित करे। तदनन्तर
प्रसन्नतापूर्वक गुग्गुल और अगुरु आदिसे धूप निवेदित
करे॥ ६५-६६ ॥
तदनन्तर शंकरजीको घृतपूर्ण दीपक दे। इसके
बाद निम्न मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुनः अर्घ्य दे और
भक्तिभावसे वस्त्रद्वारा उनके मुखका मार्जन करे-- हे
शंकर! आपको नमस्कार है। आप इस अर्घ्यको
स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, सुख
दीजिये तथा भोग और मोक्षका फल प्रदान कीजिये।'
इसके बाद भगवान् शिवको भाँति-भाँतिके उत्तम
नैवेद्य अर्पित करे॥ ६७--६९॥
इसके पश्चात् प्रेमपूर्वक शीघ्र आचमन कराये।
तदनन्तर सांगोपांग ताम्बूल बनाकर शिवको समर्पित
करे। इसके अनन्तर पाँच बत्तीकी आरती बनाकर
भगवान्को दिखाये। पैरोंमें चार बार, नाभिमण्डलके
सामने दो बार, मुखके समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण
अंगोंमें सात बार आरती दिखाये। तत्पश्चात् यथोक्त
ध्यान करके मन्त्रका उच्चारण करें ॥७०--७२॥
बुद्धिमान् मनुष्यको गुरुके द्वारा बताये गये
नियमके अनुसार ही मन्त्रका जप करना चाहिये।
अथवा अपने ज्ञानके अनुसार जितनी संख्यामें हो
सके, उतनी संख्यामें ही मन्त्रोंका विधिवत् उच्चारण
करे ॥ ७३-७४ ॥
प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे वृषभध्वज
शंकरकी स्तुति करे। तत्पश्चात् धीरे-धीरे शिवकी
परिक्रमा करे॥ ७५॥
२६६
श्रीशिवमहापुराण
[ अण १४
जमस्कारांस्ततः कुर्यात्साष्टांगं विधिवत्पुमान्।
ततः पुष्पांजलिर्देयो मंत्रेणानेन भक्तितः॥ ७६
शंकराय परेशाय शिवसन्तोषहेतवे।
अज्ञानाद्यदि वा ज्जानाद्यद्यत्पूजादिकं मया॥ ७७
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर।
तावकस्त्वद्रतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड॥ ७८
इति विज्ञाय गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे।
भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलंबनम्॥ ७९
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो।
इत्यादि बहुविज्ञप्तिं कृत्वा सम्यर्विधानतः॥ ८०
पुष्पांजलिं समप्येंव पुनः कुर्यान्नतिं मुहुः ।
स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो॥ ८१
पूजाकाले पुनर्नाथ त्वयागन्तव्यमादरात्।
इति संप्रार्थ्य बहुशः शंकरं भक्तवत्सलम्॥ ८२
विसर्जयेत्स्वहदये तदपो मूर्ध्नि विन्यसेत्।
इति प्रोक्तमशेषेण मुनयः शिवपूजनम्।
भुक्तिमक्तिप्रदं चैव किमन्यच्छोतुमर्हथ॥ ८३
>. निक लिन िघृकज फक््छत _ . _ __. क्क्
इसके बाद भक्त पुरुष साष्टांग प्रणाम करे और
शिवकी प्रसन्नताके लिये उन परमेश्वर शंकरको इस
मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि दे-हे शंकर! मैंने
अज्ञानसे या जान-बूझकर जो-जो पूजन आदि किया
है, वह आपकी कृपासे सफल हो । हे मृड ! ! मैं आपका
हूँ, मेरे प्राण सदा आपमें लगे हुए हैं, मेरा चित्त सदा
आपका ही चिन्तन करता है--ऐसा जानकर हे
गौरीनाथ! हे भूतनाथ! आप मुझपर प्रसन्न होइये । हे
प्रभो! धरतीपर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके
लिये भूमि ही सहारा है, उसी प्रकार जिन्होंने आपके
प्रति अपराध किये हैं, उनके लिये भी आप ही
शरणदाता हैं ॥ ७६--७९१/२॥
इस प्रकार बहुविध प्रार्थना करके उत्तम विधिसे
पुष्पांजलि अर्पित करनेके पश्चात् पुनः भगवानको
बार-बार नमस्कार करे। [तत्पश्चात् यह बोलकर
विसर्जन करना चाहिये] हे देवेश! हे प्रभो! अब आप
परिवारसहित अपने स्थानको जायँँ। नाथ! जब
पूजाका समय हो, तब पुनः आप आदरपूर्वक
पधारें॥ ८०-८१९/३॥
इस प्रकार भक्तवत्सल शंकरकी बारम्बार प्रार्थना
करके उनका विसर्जन करे और उस जलको अपने
हदयमें लगाये तथा मस्तकपर चढ़ाये॥ ८२१/२॥
हे ऋषियो! इस तरह मैंने शिवपूजनकी सारी
विधि बता दी, जो भोग और मोक्षको देनेवाली है।
अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं ?॥ ८३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने
शिवपूजनवर्णन॑ नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम सृष्टिखण्डमें सृष्टि-
उपाख्यानमें शिवपूजनवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
क ये
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः
व्यासशिष्य महाभाग कथय त्वं प्रमाणत:।
कैः पुष्पैः पूजितः शम्भुः किं किं यच्छति वै फलम्॥ १
ऋषिगण बोले--हे महाभाग! हे व्यासशिष्य !
आप सप्रमाण हमें यह बतायें कि किन-किन पुष्मोंसे
पूजन करनेपर भगवान् सदाशिव कौन-कौन-सा फल
प्रदान करते हैं ?॥ १॥
Fl १४]
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२६७
सूत उवाच
शौनकाद्याश्च ऋषयः शृणुतादरतोऽखिलम्।
कथयाम्यद्य सुप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम्॥ २
एष एव विधिः पृष्टो नारदेन महर्षिणा।
प्रोवाच परमप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम्॥ ३
ब्रह्मोवाच
कमलेर्बिल्वपत्रैश्च शतपत्रैस्तथा पुनः।
शंखपुष्पैस्तथा देवं लक्ष्मीकामोऽर्चयेच्छिवम्॥ ४
एतैश्च लक्षसङ्ख्याकैः पूजितश्चेद्भवेच्छिवः।
पापहानिस्तथा विप्र लक्ष्मीः स्यान्नात्र संशयः॥ ५
विंशतिः कमलानां तु प्रस्थमेकमुदाहृतम्।
बिल्वो दलसहस्त्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम्॥ ६
शतपत्रसहस्त्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम्।
पलैः षोडशभिः प्रस्थः पलं टंकदशस्मृतः॥ ७
अनेनैव तु मानेन तुलामारोपयेद्यदा।
सर्वान्कामानवाप्नोति निष्क्रामश्चेच्छिवो भवेत्॥ ८
राज्यस्य कामुको यो वै पार्थिवानां च पूजया।
तोषयेच्छंकरं देवं दशकोट्या मुनीश्वराः॥ ९
लिंगं शिवं तथा पुष्पमखण्डं तण्डुलं तथा।
चर्चितं चंदनेनेव जलधारां तथा पुनः॥ १०
प्रतिरूपं तथा मंत्रं बिल्वीदलमनुत्तमम्।
अथवा शतपत्रं च कमलं वा तथा पुनः॥ ११
शंखपुष्पैस्तथा प्रोक्तं विशेषेण पुरातनैः।
सर्वकामफलं दिव्यं परत्रेहापि सर्वथा॥ १२
धूपं दीपं च नैवेद्यमर्घ चारार्तिकं तथा।
प्रदक्षिणां नमस्कारं क्षमापनविसर्जने॥ १३
कृत्वा साङ्गं तथा भोज्यं कृतं येन भवेदिह।
तस्य वै सर्वथा राज्यं शंकरः प्रददाति च॥
सूतजी बोले-हे शौनकादि ऋषियो! आप
आदरपूर्वक सब सुनें । मैं बड़े प्रेमसे पुष्पार्पणकी विधि
बता रहा हूँ॥ २॥
देवर्षि नारदने भी इसी विधिको विधाता
ब्रह्माजीसे पूछा था। तब उन्होंने बड़े ही प्रेमसे शिव-
मुष्पार्पणकी विधि बतासी थी॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! लक्ष्मीप्राप्तिक
इच्छावालेको कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्पसे
भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। हे विप्र! यदि
एक लाखकी संख्यामें इन पुष्पोंद्राग भगवान् शिवकी पूजा
की जाय, तो सारे पापोंका नाश होता है और लक्ष्मीकी
भी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है॥ ४-५ ॥
बीस कमलोंका एक प्रस्थ बताया गया है और
एक सहन्त बिल्वपत्रोंका आधा प्रस्थ कहा गया है ॥ ६॥
एक सहस्र शतपत्रसे आधे प्रस्थकी परिभाषा की
गयी है। सोलह पलोंका एक प्रस्थ होता है और दस
टंकोंका एक पल | जब इसी मानसे [ पत्र, पुष्प आदिको]
तुलापर रखे, तो बह सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता
है और यदि निष्कामभावनासे युक्त है, तो वह [इस
पूजनसे] शिवस्वरूप हो जाता है ॥ ७-८ ॥
हे मुनीश्वरो! जो राज्य प्राप्त करनेका इच्छुक
है, उसको दस करोड़ पार्थिव शिवलिंगोंकी पूजाके
द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न करना चाहिये॥ ९॥
प्रत्येक पार्थिव-लिंगपर मन्त्रसहित पुष्प, खण्डरहित
धानके अक्षत और सुगन्धित चन्दन चढ़ाकर अखण्ड
जलधारासे अभिषेक करना चाहिये। तदनन्तर प्रत्येक
पार्थिव लिंगपर मन्त्रसहित अच्छे-अच्छे बिल्वपत्र
अथवा शतपत्र और कमलपुष्प समर्पित करना चाहिये।
प्राचीन ऋषियोंने कहा है कि यदि शिबलिंगपर
शंखपुष्मीके फूल चढ़ाये जायँ, तो इस लोक और
परलोकमें सभी कामनाओंका दिव्य फल प्राप्त होता
है॥ १०--१२॥
धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य, आरती, प्रदक्षिणा,
नमस्कार, क्षमाप्रार्थथा और विसर्जन करके जिसने
ब्राह्मणभोजन करा दिया, उसे भगवान् शंकर अवश्य
ही राज्य प्रदान करते हैं । जो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बननेका
इच्छुक है, वह [उपर्युक्त कही गयी विधिके अनुसार]
२६८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १४
प्राधान्यकामुको यो वै तदर्धेनार्चयेत्पुमान्।
कारागृहगतो यो वै लक्षेनैवार्चयेद्धरम्॥ १५
रोगग्रस्तो यदा स्याद्वै तदर्धेनार्चयेच्छिवम्।
कन्याकामो भवेद्यो वै तदर्धेन शिवं पुनः॥ १६
विद्याकामस्तथा यः स्यात्तदर्धेनार्चयेच्छिवम्।
वाणीकामो भवेद्यो वै घृतेनैवार्चयेच्छिवम्॥ १७
उच्चाटनार्थं शत्रूणां तन्मितेनैव पूजनम्।
मारणे वै तु लक्षेण मोहने तु तदर्धतः॥ १८
सामन्तानां जये चैव कोटिपूजा प्रशस्यते।
राज्ञामयुतसंख्यं च वशीकरणकर्मणि॥ १९
यशसे च तथा संख्या वाहनाद्यैः सहस्त्रिका।
मुक्तिकामोऽर्चयेच्छंभुं पंचकोट्या सुभक्तितः ॥ २०
ज्ञानार्थी पूजयेत्कोट्या शंकरं लोकशंकरम्।
शिवदर्शनकामो वै तदर्धेन प्रपूजयेत्॥ २१
तथा मृत्युंजयो जाप्यः कामनाफलरूपतः।
पंचलक्षो जपो यर्हि प्रत्यक्षं तु भवेच्छिवः ॥ २२
लक्षेण भजते कश्चिद् द्वितीये जातिसंभवः।
तृतीये कामनालाभश्चतुर्थे तं प्रपश्यति॥ २३
~ 7 त्सया स्वि स्का य 898 989 898 9 9 9 9 9 5----
उसके आधे अर्थात् पाँच करोड़ पार्थिव शिवलिंगोंका
यथाविधि पूजन करे। कारागारमें पड़े मनुष्यको एक
लाख पार्थिवलिंगोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करनी
चाहिये ॥ १३-१५॥
यदि रोगग्रस्त हो, तो उसे उस संख्याके आधे
अर्थात् पचास हजार पार्थिव लिंगोंसे शिवका पूजन
करना चाहिये। कन्या चाहनेवाले मनुष्यको उसके
आधे अर्थात् पच्चीस हजार पार्थिव लिंगोंसे शिवका
पूजन करना चाहिये ॥ १६॥
जो विद्या प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है, उसे
चाहिये कि वह उसके भी आधे पार्थिव लिंगोंसे
शिवको अर्चना करे। जो वाणीका अभिलाषी हो, उसे
घीसे शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ १७॥
अभिचारादि कमामें कमलपुष्पोंसे शिवपूजनका
विधान है। सामन्त राजाओंपर विजय प्राप्त करनेके
लिये एक करोड़ कमलपुष्पोंसे शिवका पूजन करना
प्रशस्त माना गया है। राजाओंको अपने अनुकूल
करनेके लिये दस लाख कमलपुष्मोंसे पूजन करनेका
विधान है॥ १८-१९॥
यश प्राप्त करनेके लिये उतनी ही संख्या
कही गयी है और वाहन आदिकी प्राप्तिके लिये एक
हजार पार्थिव लिंगोंकी पूजा करनी चाहिये। मोक्ष
चाहनेवालेको पाँच करोड़ कमलपुष्पोंसे उत्तम भक्तिके
साथ शिवको पूजा करनी चाहिये॥ २०॥
ज्ञान चाहनेवाला एक करोड़ कमलपुष्मसे लोकः
कल्याणकारी शिवका पूजन करे और शिवका दर्शन
प्राप्त करनेका इच्छुक उसके आधे कमलपुष्मसे
उनकी पूजा करे। कामनाओंकी पूर्तिके लिये
महामृत्युंजय मन्त्रका जप भी करना चाहिये। पाँच
लाख महामृत्युंजय मन्त्रका जप करनेपर भगवान्
सदाशिव निश्चित ही प्रत्यक्ष हो जाते हैं ॥ २१-२२॥
एक लाखके जपसे शरीरकी शुद्धि होती है,
दूसरे लाखके जपसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता
तीसरे लाखके जपसे सम्पूर्ण काम्य वस्तुएँ प्राप्त
होती हैं। चौथे लाखका जप होनेपर भगवान् शिवका
चय ० १४]
पंचमं च यदा लक्षं फलं यच्छत्यसंशयम्।
अनेनैव तु मंत्रेण दशलक्षे फलं भवेत्॥ २४
मुक्तिकामो भवेद्यो वै दर्भैश्च पूजनं चरेत्।
लक्षसंख्या तु सर्वत्र ज्ञातव्या ऋषिसत्तम॥ २५
आयुःकामो भवेद्यो वै दूर्वाभिः पूजनं चरेत्।
पुत्रकामो भवेद्यो वै धत्तूरकुसुमैश्चरेत्॥ २६
रक्तदण्डश्च धत्तूरः पूजने शुभदः स्मृतः।
अगस्त्यकुसुमैश्चैव पूजकस्य महद्यशः ॥ २७
भुक्तिमुक्तिफलं तस्य तुलस्या पूजयेद्यदि।
अर्कपुष्पैः प्रतापश्च कुब्जकह्णारकैस्तथा॥ २८
जपाकुसुमपूजा तु शत्रूणां मृत्युदा स्मृता।
रोगोच्याटनकानीह करवीराणि वै क्रमात्॥ २९
बंधूकैरभूषणावाप्तिर्जात्या वाहान्न संशयः।
अतसीपुष्पकैदेंब॑ विष्णुवल्लभतामियात्॥ ३०
शमीपत्रैस्तथा मुक्तिः प्राप्यते पुरुषेण च।
मल्लिकाकुसुमैर्दततः स्त्रियं शुभतरां शिवः॥ ३१
यूथिकाकुसुमैः शस्तै्गृहं नैव विमुच्यते।
'कर्णिकारैस्तथा वस्त्रसंपत्तिर्जायते नृणाम्॥ ३२
निर्गुण्डीकुसुमैलोके मनो निर्मलतां ब्रजेत्।
विल्वपत्रैस्तथा लक्षैः सर्वान्कामानवाण्तुयात्॥
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२६९
दर्शन होता है और जब पाँचबें लाखका जप पूरा
होता है, तब भगवान् शिव जपका फल निःसन्देह
प्रदान करते हैं । इसी मन्त्रका दस लाख जप हो जाय,
तो सम्पूर्ण फलकी सिद्धि होती है॥ २३-२४॥
जो मोक्षको अभिलाषा रखता हैं, वह एक
लाख दभाँद्वारा शिवका पूजन करे। मुनिश्रेष्ठ!
शिवकी पूजामें सर्वत्र लाखकी ही संख्या समझनी
चाहिये॥ २५॥
आयुकी इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओंद्वारा
पूजन करे। जिसे पुत्रकी अभिलाषा हो, वह धतूरेके
एक लाख फूलोंसे पूजा करे॥ २६॥
लाल डंठलवाला धतूरा पूजनमें शुभदायक माना
गया है। अगस्त्यके फूलोंसे पूजा करनेवाले पुरुषको
महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥ २७॥
यदि तुलसीदलसे शिवकी पूजा करे, तो उपासकको
भोग और मोक्षका फल प्राप्त होता हैं। लाल और
सफेद मदार, अपामार्ग और कह्रारके फूलोंद्वारा पूजा
करनेसे प्रतापकी प्राप्ति होती है॥ २८॥
अड्हुलके फूलोंसे की हुई पूजा शत्रुविनाशक
कही गयी है। करवीरके एक लाख फूल यदि
शिवपूजनके उपयोगमें लाये जायें, तो वे यहाँ रोगोंका
उच्चाटन करनेवाले होते हैं ॥ २९॥
बन्धूक [गुलदुपहरिया]-के फूलोंद्वारा [पूजन
करनेसे] आभूषणकी प्राप्ति होती है। चमेलीसे शिवकी
पूजा करके मनुष्य वाहनोंको उपलब्ध करता है, इसमें
संशय नहीं है। अतसीके फूलोंसे महादेवजीका पूजन
करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुका प्रिय हो जाता है॥ ३०॥
शमीपत्रोंसे [पूजा करके] मनुष्य मोक्ष प्राप्त
कर लेता है। बेलाके फूल चढ़ानेपर भगवान् शिव
अत्यन्त शुभलक्षणा पत्नी प्रदान करते हैं॥ ३१॥
जूहीके फूलोंसे पूजा की जाय, तो घरमें कभी
अन्नकी कमी नहीं होती । कनेरके फूलोंसे पूजा करनेपर
मनुष्योंको वस्त्र-सम्पदाकी प्राप्ति होती है॥३२॥
सेंदुआरि या शेफालिकाके फूलोंसे लोकमें
शिवका पूजन किया जाय, तो मन निर्मल होता है।
एक लाख बिल्वपत्रोंसे पूजन करनेपर मनुष्य अपनी
सारी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ३३॥
२७०
श्रीशिवमहापुराण
[ अ १४
श्ुज्ारहारपुष्पैस्तु वर्धते सुखसम्पदा।
ऋतुजातानि पुष्पाणि मुक्तिदानि न संशयः ॥ ३४
राजिकाकुसुमानीह शत्रूणां मृत्युदानि च।
एषां लक्षं शिवे दद्याहद्याच्च विपुलं फलम्॥ ३५
विद्यते कुसुमं तन्न यनैव शिववल्लभम्।
चम्पकं केतकं हित्वा त्वन्यत्सर्वं समर्पयेत्॥ ३६
अतः परं च धान्यानां पूजने शंकरस्य च।
प्रमाणं च फलं सर्व प्रीत्या श्रृणु च सत्तम॥ ३७
तंदुलारोपणे नृणां लक्ष्मी वृद्धिः प्रजायते।
अखण्डितविधौ विप्र सम्यग्भक्त्या शिवोपरि॥ ३८
षट्केनैव तु प्रस्थानां तदर्धेन तथा पुनः।
पलद्वयं तथा लक्षमानेन समुदाहृतम्॥ ३९
पूजां रुद्रप्रधानेन कृत्वा वस्त्रं सुसुन्दरम्।
शिवोपरि न्यसेत्तत्र तंदुलार्पणमुत्तमम्॥ ४०
उपरि श्रीफलं त्वेकं गन्धपुष्पादिभिस्तथा।
रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत्॥ ४१
प्राजापत्यद्वयं रौप्यमाषसंख्या च दक्षिणा।
देया तदुपदेष्ट्रे हि शक्त्या वा दक्षिणा मता॥ ४२
आदित्यसंख्यया तत्र ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः।
लक्षपूजा तथा जाता साङ्गं च मन्त्रपूर्वकम्॥ ४३
शतमष्टोत्तरं तत्र मंत्रे विधिरुदाहृतः।
तिलानां च पलं लक्षं महापातकनाशनम्॥ ४४
एकादशपलैरेव लक्षमानमुदाहृतम्।
पूर्ववत्पूजनं तत्र कर्तव्यं हितकाम्यया॥ ४५
शिळ भ णा ० ०२२८८२...
हरसिंगारके फूलोंसे पूजा करनेपर सुख-सम्पत्तिकी
वृद्धि होती है। ऋतुमें पैदा होनेवाले फूल [यदि
शिवकी पूजामें समर्पित किये जायं, तो वे] मोक्ष
देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ३४॥
राईके फूल शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी होते
हैं। इन फूलोंको एक लाखकी संख्यामें शिवके ऊपर
चढ़ाया जाय, तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते
हैं॥ ३५॥
चम्पा और केवड़ेको छोड़कर अन्य कोई ऐसा
फूल नहीं है, जो भगवान् शिवको प्रिय न हो, अन्य
सभी पुष्पोंको समर्पित करना चाहिये॥ ३६॥
हे सत्तम! अब इसके अनन्तर शंकरके पूजनमें
धान्योंका प्रमाण तथा [उनके अर्पणका] फल--यह
सब प्रेमपूर्वक सुनिये ॥ ३७॥
हे विप्र! महादेवके ऊपर परम भक्तिसे अखण्डित
चावल चढ़ानेसे मनुष्योंकी लक्ष्मी बढ़ती है॥ ३८॥
साढ़े छः प्रस्थ और दो पलभर चावल संख्यामें
एक लाख हो जाते है ऐसा लोगोंका कहना है ॥ ३९॥
रुद्रप्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके
ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसीपर चावल
रखकर समर्पित करे, तो उत्तम है॥ ४०॥
तत्पश्चात् उसके ऊपर गन्ध, पुष्प आदिके साथ
एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे, तो
पूजाका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है ॥ ४१॥
प्रजापति देवतासे चिह्नांकित दो चाँदीके रुपये
अथवा माषसंख्यासे उपदेष्टाको दक्षिणा देनी चाहिये
अथवा यथाशक्ति जितनी दक्षिणा हो सके, उतनी
दक्षिणा बतायी गयी है॥ ४२॥
वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये।
इससे मनपूर्वक सांगोपांग लक्षपूजा सम्पन्न होती है।
जहाँ सौ मन्त्र जपनेकी विधि हो, वहाँ एक सौ आठ
मन्त्र जपनेका विधान बताया गया है ॥ ४३/२॥
एक लाख पल तिलोंका अर्पण पातकोंका नाश
करनेवाला होता है | ग्यारह पल (६४ माशा)-में एक
लाखकी संख्यामें तिल होते हैं। [ अत: इस परिमाणके
अनुसार] तिलद्वारा अपने कल्याणके लिये पूर्वकी
पूर्वोक्त विधिसे शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४४-४५॥
ड ९४]
भोज्या वै ब्राह्मणास्तस्मादत्र कार्या नरेण हि।
महापातकजं दुःखं तत्क्षणान्नश्यति श्रुवम्॥ ४६
यवपूजा तथा प्रोक्ता लक्षेण परमा शिवे।
प्रस्थानामष्टकं चैव तथा प्रस्थार्धकं पुन: ॥ ४७
पलद्वययुतं तत्र मानमेतत्पुरातनम्।
यवपूजा च मुनिभिः स्वर्गसौख्यविवर्धिनी॥ ४८
प्राजापत्यं ब्राह्मणानां कर्तव्यं च फलेप्सुभिः।
गोधूमान्नैस्तथा पूजा प्रशस्ता शंकरस्य वै॥ ४९
संततिर्वर्धते तस्य यदि लक्षावधिः कृता।
द्रोणार्धेन भवेल्लक्षं विधानं विधिपूर्वकम्॥ ५०
मुद्रानां पूजने देवः शिवो यच्छति वै सुखम्।
प्रस्थानां सप्तकेनैव प्रस्थार्धेनाथवा पुनः॥ ५१
पलद्वययुतेनैव लक्षमुक्तं पुरातनैः।
ब्राह्मणाश्च तथा भोज्या रुद्रसंख्याप्रमाणतः॥ ५२
प्रियंगुपूजनादेव धर्माध्यक्षे परात्मनि।
धर्मार्थकामा वर्धन्ते पूजा सर्वसुखावहा॥ ५३
प्रस्थैकेन च तस्योक्तं लक्षमेकं पुरातनेः।
ब्रह्मभोजं तथाप्रोक्तमर्कसंख्याप्रमाणतः॥ ५४
राजिकापूजनं शंभोः शत्रोर्मृत्युकरं स्मृतम्।
सर्षपाणां तथा लक्षं पलैर्विशतिसंख्यया॥ ५५
तेषां च पूजनादेव शत्रोर्मृत्युरुदाहृतः।
आढकीनां दलैशचैव शोभयित्वार्चयेच्छिवम्॥ ५६
वृता गौश्च प्रदातव्या बलीवर्दस्तथैव च।
मरीचिसम्भवा पूजा शत्रोर्नाशकरी स्मृता॥
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२७१
इस अवसरपर मनुष्यको ब्राह्मणोंको भोजन
कराना चाहिये। इससे महापातकजन्य दुःख निश्चित
ही दूर हो जाता है ॥ ४६॥
इसी प्रकार एक लाख यवसे भी कीं गयी
शिवकी पूजा उत्तम कही गयी है। साढे आठ प्रस्थ
और दो पल (साढ़े आठ सेर तेरह माशा) यव प्राचीन
परिमाणके अनुसार संख्यामें एक लाख यवके बराबर
होते हैं। मुनियोंने यवके द्वारा की गयी पूजाको
स्वर्गका सुख प्रदान करनेवाली बताया है ॥ ४७-४८॥
फलप्राप्तिके इच्छुक लोगोंको (यवपूजा करनेके
पश्चात्) ब्राह्मणोंके लिये प्रजापति देवताके द्रव्यभूत
चाँदीके रुपये भी दक्षिणारूपमें देना चाहिये । गेहुँसे भी
की गयी शिवपूजा प्रशस्त है। यदि एक लाख गेहुँसे
शिवकी पूजा की जाय, तो उसकी सन्ततिकी अभिवृद्धि
होती है। विधानतः आधा द्रोण (आठ सेर) परिमाणमें
गेहुँकी संख्या एक लाख होती है। शेष विधान
विधिपूर्वक करने चाहिये ॥ ४९-५०॥
(एक लाख) मूँगसे पूजन किये जानेपर भगवान्
शिव सुख देते हैं। साढ़े सात प्रस्थ और दो पल (साढ़े
सात सेर तेरह माशा भर) मूँग संख्यामें एक लाख
होती है-ऐसा प्राचीन लोगोंने कहा है । इसमें ग्यारह
ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये॥ ५१-५२॥
प्रियंगु (काकुन)-के द्वारा धर्माध्यक्ष परमात्मा
शिवकी पूजा करनेपर धर्म, अर्थ और कामकी
अभिवृद्धि होती है। बह पूजा सभी सुखोंको देनेवाली
है। प्राचीन लोगोंने कहा है कि एक प्रस्थमें एक
लाख प्रियंगु होते हैं। इसके अनन्तर बारह ब्राह्मणोंको
भोजन कराना बताया गया है॥ ५३-५४॥
राईसे की गयी शिवपूजा शत्रुविनाशक कही गयी
है।बीस पल (३० माशा) भर सरसोंके एक लाख दाने
हो जाते हैं । उन एक लाख सरसोंके दानोंसे की गयी
शिवकी पूजा निश्चित ही शब्रुके लिये घातक होती
है--ऐसा कहा गया है । अरहरकी पत्तियासे शिवजीको
सुशोभित करके उनका पूजन करना चाहिये ॥ ५५-५६ ॥
शिवकी पूजा करनेके पश्चात् एक गौ और एक
बैलका दान करना चाहिये। मरीचि (काली मिर्च) -से
की गयी शिवकी पूजा शत्रुका नाश करनेवाली बतायी
२७२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १४
आढकीनां दलेश्चेव रंजयित्वार्चयेच्छिवम्।
नानासुखकरी होषा पूजा सर्वफलप्रदा ॥ ५८
धान्यमानमिति प्रोक्तं मया ते मुनिसत्तम।
लक्षमानं तु पुष्पाणां श्रृणु प्रीत्या मुनीश्वर॥ ५९
प्रस्थानां च तथा चैकं शंखपुष्पसमुद्भवम्।
प्रोक्तं व्यासेन लक्षं हि सूक्ष्ममानप्रदर्शिना॥ ६०
प्रस्थैरकादशैर्जातिलक्षमानं प्रकीर्तितम्
यूथिकायास्तथा मानं राजिकायास्तदर्धकम्॥ ६१
प्रस्थैर्विशतिकैश्चैव मल्लिकामानमुत्तमम्।
तिलपुष्पैस्तथा मानं प्रस्थान्यूनं तथैव च॥ ६२
ततश्च त्रिगुणं मानं करवीरभवे स्मृतम्।
निर्गुडीकुसुमे मानं तथैव कथितं बुधैः॥ ६३
कणिकारे तथा मानं शिरीषकुसुमे पुनः।
बंधुजीवे तथा मानं प्रस्थानां दशकेन च॥ ६४
इत्याद्यर्विविधैमानं दृष्ट्वा कुर्याच्छिवार्चनम्।
सर्वकामसमृद्भ्यर्थ मुक्तचर्थं कामनोज्झित: ॥ ६५
अत: परं प्रवक्ष्यामि धारापूजाफलं महत्।
यस्य श्रवणमात्रेण कल्याणं जायते नृणाम्॥ ६६
विधानपूर्वकं पूजां कृत्वा भक्त्या शिवस्य वै।
पश्चाच्च जलधारा हि कर्तव्या भक्तितत्परैः ॥ ६७
ज्चरप्रलापशांत्यर्थ जलधारा शुभावहा।
शतरुद्रियमंत्रेण रुद्रस्यैकादशेन तु॥ ६८
रूद्र्जाप्येन वा तत्र सूक्तेन पौरुषेण वा।
षडंगेनाथ वा तत्र महामृत्युंजयेन च॥ ६९
गायत्र्या वा नमोऽन्तैश्च नामभिः प्रणवादिभिः।
मत्र्वाथागमोक्तैशच जलधारादिकं तथा॥ ७०
गयी है। अरहरकी पत्तियोंसे रँग करके शिवकी पूजा
करनी चाहिये । यह पूजा नाना प्रकारके सुख एवं सभी
अभीष्ट फलोंको देनेवाली है ॥ ५७-५८ ॥
हे मुनिसत्तम! [शिवपूजामें ] इस प्रकारसे प्रयुक्त
धान्योंका परिमाण तो हमने आपलोगोंको बता दिया
है। हे मुनीश्वर! अब प्रेमपूर्वक एक लाख पुष्पोंका
परिमाण भी सुनें॥ ५९॥
सूक्ष्म मानकों प्रदर्शित करनेवाले व्यासजीने
एक प्रस्थमें शंखपुष्पीके पुष्पोंकी संख्या एक लाख
बतायी है॥ ६० ॥
ग्यारह प्रस्थमें चमेलीके फूलोंका मान एक लाख
कहा गया है। इतना ही जूहीके फूलोंका मान है और
उसका आधा राईके फूलोंका मान होता है॥ ६१॥
मल्लिका [मालती]-के लाख फूलोंका पूर्ण
मान बीस प्रस्थ है। तिलके पुष्योंका मान मल्लिकाके
मानकी अपेक्षा एक प्रस्थ कम होता है॥ ६२॥
कनेरके पुष्पोंका मान तिलके पुष्पोंके मानका
तिगुना कहा गया है । पण्डितोंने निर्गुण्डीके पुष्पोंका
भी उतना ही मान बताया है॥ ६३॥
केवडा, शिरीष तथा बन्धुजीव (दुपहरिया)-के एक
लाख पुष्पोंका मान दस प्रस्थके बराबर होता है ॥ ६४॥
इस तरह अनेक प्रकारके मानको दृष्टिमें
रखकर सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये तथा मुक्ति
प्राप्त करनेके लिये कामनारहित होकर शिवकी पूजा
करनी चाहिये॥ ६५॥
अब मैं जलधारा-पूजाके महान् फलको कह
रहा हूँ, जिसके श्रबणमात्रसे ही मनुष्योंका कल्याण
हो जाता है॥६६॥
भक्तिपूर्वक सदाशिवकी विधिवत् पूजा करनेके
पश्चात् उन्हें जलधारा समर्पित करे॥ ६७॥
[सन्निपातादि] ज्चरमें होनेवाले प्रलापकी
शान्तिके लिये भगवान् शिवको दी जानेवाली
कल्याणकारी जलधारा शतरुद्रिय मन्त्रसे, एकादश रुद्रसे,
रुद्रमन््रोंक जपसे, पुरुषसूक्तसे, छ: ऋचावाले रुद्रसूक्तसे,
महामृत्युंजयमत्त्रसे, गायत्रीमन्नसे अथवा शिवके शास्त्रत
नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः पद जोड़कर
बने हुए मन्त्रोंद्वारा अर्पित करनी चाहिये ॥ ६८--७० |
ड १४]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२७३
सुखसन्तानवृद्धयर्थ धारापूजनमुत्तमम्।
जानाद्रव्यैः शुभैर्दिव्ये: प्रीत्या सद्धस्मधारिणा ॥ ७१
घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।
तदा वंशस्य विस्तारो जायते नात्र संशयः । ७२
एवमयुतमन्त्रेण कार्य वै शिवपूजनम्।
प्रमेहरोगशान्त्यर्थं प्राप्नुयाच्च मनेप्सितम्।
षण्ढत्वं यदादातस्तदा घृतसुपूजनम्।
ब्रह्मभोज्यं तथा प्रोक्तं प्राजापत्यं मुनीश्वरैः ॥ ७३
केवलं दुग्धधारा च तदा कार्या विशेषतः।
शर्करामिश्रिता तत्र यदा बुद्धिजडो भवेत्॥ ७४
तस्य सञ्जायते जीवसदूशी बुद्धिरुत्तमा।
यावन्मंत्रायुतं न स्यात्तावद्धाराप्रपूजनम्॥ ७५
यदा चोच्चाटनं देहे जायते कारणं विना।
यत्र कुत्रापि वा प्रेम दुःखं च परिवर्धितम्॥ ७६
स्वगृहे कलहो नित्यं यदा चैव प्रजायते।
तद्धारायां कृतायां वै सर्व दुःखं विलीयते॥
शत्रूणां तापनार्थ वै तैलधारा शिवोपरि।
कर्तव्या सुप्रयत्नेन कार्यसिद्धिर्धरुवं भवेत्॥ ७८
वासितेनैव तैलेन भोगवृद्धिः प्रजायते।
सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेद् ्रुवम्॥ ७९
मधुना यक्षराजो वै गच्छेच्च शिवपूजनात्।
धारा चेक्षुरसस्यापि सर्वानन्दकरी शिवे॥ ८०
धारा गंगाजलस्यैव भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।
एताः सर्वाश्च याः प्रोक्ता मृत्युंजयसमुद्धवा: ॥ ८९
सुख और सन्तानकी वृद्धिके लिये जलधाराद्वारा
पूजन उत्तम होता है। उत्तम भस्म धारण करके
उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके शुभ एवं दिव्य
दरव्ोंद्वारा शिवकी पूजा करनी चाहिये और शिवपर
उनके सहस्त्रनाम मन्त्रोंसे घृतकी धारा गिरानी चाहिये ।
ऐसा करनेपर वंशका विस्तार होता है, इसमें संशय
नहीं है॥ ७१-७२॥
इस प्रकार यदि दस हजार मन्त्रोंद्रारा शिवजीकी
पूजा की जाय तो प्रमेह रोगकी शान्ति होती है और
उपासकको मनोवांछित फलकी प्राप्ति हो जाती है।
यदि कोई नपुंसकताको प्राप्त हो तो वह घीसे
शिवजीकी भलीभाँति पूजा करे। इसके पश्चात्
ब्राह्मणोंको भोजन कराये, साथ ही उसके लिये
मुनीश्वरोने प्राजापत्यत्रतका भी विधान किया है॥ ७३॥
यदि बुद्धि जड़ हो जाय, तो उस अवस्थामें
पूजकको केवल शर्करामिश्रित दुगधकी धारा चढ़ानी
चाहिये। ऐसा करनेपर उसकी बृहस्पतिके समान
उत्तम बुद्धि हों जाती है। जबतक दस हजार मन्त्र न
हो जायँँ, तबतक दुग्धधाराद्वारा भगवान् शिवका पूजन
करते रहना चाहिये ॥ ७४-७५ ॥
जब शरीरमें अकारण ही उच्चाटन होने लगे
जी उचट जाय, जहाँ कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़
जाय और अपने घरमें सदा कलह होने लगे, तब पूर्वोक्त
रूपसे दूधकी धारा चढ़ानेसे सारा दुःख नष्ट हो
जाता है ॥ ७६-७७॥
शत्रुओंको सन्तप्त करनेके लिये पूर्ण प्रयत्नके
साथ भगवान् शंकरके ऊपर तेलकी धारा अर्पित
करनी चाहिये। ऐसा करनेपर निश्चित ही कर्मकी
सिद्धि होती है ॥७८॥
सुगन्धित तेलकी धारा अर्पित करनेपर भोगोंको
वृद्धि होती है.। यदि मधुकी धारासे शिवको पूजा की
जाय, तो राजयक्ष्माका रोग दूर हो जाता है। शिवजीके
ऊपर ईखके रसकी धारा चढ़ायी जाय, तो वह भी सम्पूर्ण
आनन्दकी प्राप्ति करानेवाली होती है ॥ ७९-८०॥
गंगाजलकी धारा तो भोग और मोक्ष दोनों
फलोंको देनेवाली है। ये सब जो-जो धाराएँ बतायी
गयी हैं, इन सबको मृत्युंजय मन्त्रसे चढ़ाना चाहिये,
२७४
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १५
तत्रायुतप्रमाणं हि कर्तव्यं तद्विधानतः।
कर्तव्यं ब्राह्मणानां च भोज्यं वै रुद्रसंख्यया॥ ८२
एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वर।
एतद्वै सफलं लोके सर्वकामहितावहम्॥ ८३
स्कन्दोमासहितं शंभुं संपूज्य व्रिधिना सह।
यत्फलं लभते भक्त्या तद्वदामि यथाश्रुतम्॥ ८४
अत्र भुक्त्वाखिलं सौख्यं पतरपोत्रादिभिः शुभम्।
ततो याति महेशस्य लोकं सर्वसुखावहम्॥ ८५
सूर्यकोटिप्रतीकाशेर्विमानैः सर्वकामगैः।
रूद्रकन्यासमाकीणेर्गेयवाद्समन्तितैः ॥८६
क्रीडते शिवभूतश्व यावदाभूतसंप्लवम्।
ततो मोक्षमवाप्नोति विज्ञान प्राप्य चाव्ययम्॥ ८७
उसमें भी उक्त मन्त्रका विधानत: दस हजार जप
करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना
चाहिये॥ ८१-८२॥
हे मुनीश्वर! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने
आपको बता दिया। संसारमें सदाशिवकी यह पूजा
समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ और सफल
है॥ ८३॥
भक्तिपूर्वक यथाविधि स्कन्द और उमाके सहित
भगवान् शम्भुकी पूजा करके भक्त जो फल प्राप्त करता
है, उसे जैसा सुना है, वैसा ही कह रहा हूँ ॥ ८४॥
वह इस लोकमें पुत्र-पौत्र आदिके साथ समस्त
सुखोंका उपभोग करके अन्तमें सभी सुखोंको देनेवाले
शिवलोकको जाता है॥ ८५॥
वह भक्त वहाँ करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान
तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर
गान-वाद्ययन्त्रोंसे युक्त रुद्रकन्याओंसे घिरकर बैठे हुए
शिवरूपमें प्रलयपर्यन्त क्रीड़ा करता है। तदनन्तर अविनाशी
परम ज्ञानको प्राप्त करके मोक्षको पा लेता है॥ ८६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने
शिवपूजाविधानवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
शिवपूजनवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
सृष्टिका वर्णन
नारद उवाच
विधे विधे महाभाग धन्यस्त्वं सुरसत्तम।
आविताद्याद्धता शैवकथा परमपावनी॥ १
तत्राद्धुता महादिव्या लिङ्गोतपत्तिः शरुता शुभा।
श्रुत्वा यस्याः प्रभावं च दुःखनाशो भवेदिह॥ २
अनंतरं च यज्जातं माहात्म्यं चरितं तथा।
सृष्टेश्चैव प्रकारं च कथय त्वं विशेषतः॥ ३
नारदजी बोले-हे महाभाग! हे विधे! हे
देवश्रेष्ठ! आप धन्य हैं। आपने आज यह शिवकी
परमपावनी अद्भुत कथा सुनायी ॥ १॥
इसमें सदाशिवकी लिंगोत्पत्तिकी जो कथा
हमने सुनी है, वह महादिव्य, कल्याणकारी और
अद्भुत है; जिसके प्रभावमात्रको ही सुनकर दुःख
नष्ट हो जाते हैं॥ २॥
इस कथाके पश्चात् जो हुआ, उसका
माहात्म्य और उसके चरित्रका वर्णन करें। यह सृष्टि
किस प्रकारसे हुई, इसका भी आप विशेष रूपसे
वर्णन करें ?॥ ३॥
च्य १५]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२७५
ब्रह्मोवाच
सम्यक् पृष्टं च भवता यज्जातं तदनंतरम्।
कथ्ययिष्यामि संक्षेपाद्य॒था पूर्वं श्रुतं मया॥ ४
अंतर्हिते तदा देवे शिवरूपे सनातने।
अहं विष्णुश्च विप्रेन्द्र अधिकं सुखमाम्तबान्॥ ५
मया च विष्णुना रूपं हंसवाराहयोस्तदा।
संवृतं तु ततस्ताभ्यां लोकसर्गावनेच्छया॥ ६
नारद उवाच
विधे ब्रह्मन् महाप्राज्ञ संशयो हृदि मे महान्।
कृपां कृत्वातुलां शीघ्रं तं नाशयितुमर्हसि॥ ७
हंसवाराहयो रूपं युवाभ्यां च धृतं कथम्।
अन्यद्रूपं व्रिहायैव किमत्र वद कारणम्॥ ८
सूत उवाच
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य महात्मनः।
स्मृत्वा शिवपदांभोजं ब्रह्मा सादरमब्रवीत्॥ ९
ब्रह्मोवाच
हंसस्य चोर्ध्वगमने गतिर्भवति निश्चला।
तत्त्वातत््वविवेकोऽस्ति जलदुग्धविभागवत्॥ १०
अज्ञानज्ञानयोस्तत्त्वं विवेचयति ह॑सकः।
हंसरूपं धृतं तेन ब्रह्मणा सृष्टिकारिणा॥ १
विवेको नैव लब्धश्च यतो हंसो व्यलीयत।
शिवस्वरूपतत्त्वस्य ज्योतिूपस्य नारद॥ १२
सृष्टिप्रवृत्तिकामस्य कथं ज्ञानं प्रजायते।
यतो लब्धो विवेकोऽपि न मया हंसरूपिणा॥ १३
गमने$धो वराहस्य गतिर्भवति निश्चला।
धृतं वाराहरूपं हि विष्णुना वनचारिणा॥ १४
ब्रह्माजी बोले-आपने यह उचित ही पूछा
हैं। तदनन्तर जो हुआ और मैंने जैसा पहले सुना है,
वैसा ही मैं संक्षेपमें कहूँगा॥ ४॥
हे विप्रेन्द्र! जब सनातनदेव शिव अपने स्वरूपमें
अन्तर्धान हो गये, तब मैंने और भगवान् विष्णुने महान्
सुखकी अनुभूति की॥५॥
तदनन्तर हम दोनों--ब्रह्मा और विष्णुने अपने-
अपने हंस और वाराहरूपका परित्याग किया। सृष्टि-
संरचना और उसके पालनकी इच्छासे हमदोनों उस
शिवकी मायाके दोनों प्रकारोंसे घिर गये ॥ ६॥
नारदजी बोले-हे विधे! हे महाप्राज्ञ ब्रह्मन्!
मेरे हृदयमें महान् सन्देह है। अतुलनीय कृपा करके
शीघ्र ही उसको नष्ट करें॥ ७॥
अन्य रूपोंको छोड़कर आप दोनोंने हंस और
वाराहका ही रूप क्यों धारण किया, इसका क्या
कारण है? बताइये॥ ८॥
सूतजी बोले--महात्मा नारदजीका यह वचन
सुनकर ब्रह्माने शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके
आदरपूर्वक यह कहना प्रारम्भ किया॥ ९॥
ब्रह्माजी बोले-हंसकी निश्चल गति ऊपरकी
ओर गमन करनेमें ही होती है। जल और दूधको
पृथक्-पृथक् करनेके समान तत्त्व और अतत्त्वको भी
जाननेमें वह समर्थ होता है॥ १०॥
अज्ञान एवं ज्ञानके तत्त्वका विवेचन हंस ही कर
सकता है | इसलिये सृष्टिकर्ता मुझ ब्रह्माने हंसका रूप
धारण किया॥ ११॥
हे नारद! प्रकाश-स्वरूप शिवतत्त्वका विवेक
वह हंसरूप प्राप्त न कर सका, अतः उसे छोड़
देना पड़ा ॥ १२॥
सृष्टिसंरचनाके लिये तत्पर प्रवृत्तिको ज्ञानको
प्राप्ति कैसे हो सकती है ? जब हंसरूपमें मैं नहीं जान
सका, तो मैंने उस रूपको छोड़ दिया॥ १३॥
नीचेकी ओर जानेमें वाराहकी निश्चल गति
होती है, इसलिये विष्णुने उस सदाशिवके अद्भुत
लिंगके मूलभागमें पहुँचनेकी इच्छासे वाराहका ही
रूप धारण किया॥ १४॥
२७६
श्रीशिवमहापुराण
[अ १५
अथवा भवकल्पार्थ तद्रूपं हि प्रकल्पितम्।
विष्णुना च वराहस्य भुवनावनकारिणा॥
'यददिनं हि समारभ्य तद्रूपं धृतवान्हरिः।
तद्दिनं प्रतिकल्पोऽसौ कल्यो वाराहसंज्ञकः॥ १६
तदिच्छा वा यदा जाता तस्य रूपस्य धारणे।
तद्दिनं प्रतिकल्पोऽसौ कल्पो वाराहसंज्ञकः॥ १७
इति प्रश्नोत्तरं दत्तं प्रस्तुतं श्रृणु नारद।
स्मृत्वा शिवपदांभोजं वक्ष्ये सृष्टिविधिं मुने॥ १८
अंतर्हिते महादेवे त्वहं लोकपितामहः।
तदीयं वचनं कर्तुमध्यायन्ध्यानतत्परः॥ १९
नमस्कृत्य तदा शंभुं ज्ञानं प्राप्य हरेस्तदा।
आनंदं परमं गत्वा सृष्टिं कर्तृ मनो दधे॥ २०
विष्णुश्चापि तदा तत्र प्रणिपत्य सदाशिवम्।
उपदिश्य च मां तात ह्यंतर्धानमुपागतः॥ २१
ब्रह्माण्डाच्च बहिर्गत्वा प्राप्य शम्भोरनुग्रहम्।
बैकुंठनगरं गत्वा तत्रोवास हरिः सदा॥ २२
अहं स्मृत्वा शिवं तत्र विष्णुं वै सृष्टिकाम्यया।
पूर्व सृष्टं जलं यच्च तत्रांजलिमुदाक्षिपम्॥ २३
अतोऽण्डमभवत्तत्र चतुर्विशतिसंज्ञकम्।
विराङ्रूपमभूद्रिप्र जलरूपमपश्यतः॥ २४
ततः संशयमापन्नस्तपस्तेपे सुदारुणम्।
द्वादशाब्दमहं तत्र विष्णुध्यानपरायणः॥ २५
तस्मिंश्च समये तात प्रादुर्भूतो हरिः स्वयम्।
मामुवाच महाप्रीत्या मदङ्गं संस्पृशन्मुदा॥ २६
अथवा संसारका पालन करनेवाले विष्णुने जगते
वाराहकल्पको बनानेके लिये उस रूपको धारण
किया॥ १५॥
जिस दिन भगवानूने उस रूपको धारण किया
उसी दिनसे वह [श्वेत] वाराह-संज्क-कल्प प्रारम्भ
हुआ था॥ १६॥
अथवा उन महेश्वरकी जब यह इच्छा हुई कि
विवादमें फँसे हम दोनोंके द्वारा हंस और वाराहका
रूप धारण किया जाय, उसी दिनसे उस वाराह नामके
कल्पका भी प्रादुर्भाव हुआ॥ १७॥
हे नारद! सुनिये। मैंने इस प्रकारसे तुम्हारे
प्रश्नोंका उत्तर प्रस्तुत कर दिया है। हे मुने! अब
सदाशिवके चरणकमलका स्मरण करके मैं
सृष्टिसूजनकी विधि बता रहा हूँ॥ १८॥
[ब्रह्माजी बोले-हे मुने!] जब महादेवजी अन्तर्धान
हो गये, तब मैं उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये
ध्यानमग्न हो कर्तव्यका विचार करने लगा॥ १९॥
उस समय भगवान् शंकरको नमस्कार करके
श्रीहरिसे ज्ञान पाकर, परमानन्दको प्राप्त होकर मैंने
सृष्टि करनेका ही निश्चय किया। हे तात! भगवान्
विष्णु भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे उपदेश
देकर तत्काल अदृश्य हो गये॥ २०-२१॥
वे ब्रह्माण्डसे बाहर जाकर भगवान् शिवकी
कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाममें पहुँचकर सदा वहीं
रहने लगे॥ २२॥
मैंने सृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और विष्णुका
स्मरण करके पहलेके रचे हुए जलमें अपनी अंजलि
डालकर जलको ऊपरकी ओर उछाला॥ २३॥
इससे वहाँ चौबीस ततत्वोंवाला एक अण्ड प्रकट
हुआ। हे विप्र! उस जलरूप अण्डको मैं देख भी न
सका, इतनेमें वह विराट् आकारवाला हो गया॥ २४॥
[उसमें चेतनता न देखकर] मुझे बड़ा संशय
हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। बारह
वर्षोतक मैं भगवान् विष्णुके चित्तनमें लगा रहा॥ २५॥
हे तात! उस समयके पूर्ण होनेपर भगवान् श्रीहरि
स्वयं प्रकट हुए और बडे प्रेमसे मेरे अंगोंका स्पर्श करते
हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे-- ॥ २६॥
बज १५]
विष्णुरुवाच
बरं ब्रूहि प्रसन्नोऽस्मि नादेयो विद्यते तव।
ब्रह्मन् शंभुप्रसादेन सर्व दातुं समर्थकः ॥ २७
ब्रह्मोवाच
युक्तमेतन्महाभाग दत्तोऽहं शंभुना च ते।
तदुक्तं याचते मेऽद्य देहि विष्णो नमोऽस्तु ते॥ २८
विराङ्रूपमिदं ह्मण्डं चतुर्विशतिसंज्ञकम्।
न चैतन्यं भवत्यादौ जडीभूतं प्रदूश्यते॥ २९
प्रादुर्भूतो भवानद्य शिवानुग्रहतो हरे।
प्राप्तं शंकरसंभूत्या ह्यण्डं चैतन्यमावह॥ ३०
इत्युक्ते च महाविष्णुः शंभोराज्ञापरायणः।
अनंतरूपमास्थाय प्रविवेश तदण्डकम्॥ ३९
सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्त्रपात्।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्त्वा तदण्डं व्याप्तवानिति॥ ३२
परविष्टे विष्णुना तस्मिन्नण्डे सम्यकस्तुतेन मे।
सचेतनमभूदण्डं चतुर्विशतिसंज्ञकम्॥ ३३
पातालादिसमारभ्य सत्यलोकाधिपः स्वयम्।
राजते स्म हरिस्तत्र वैराजः पुरुषः प्रभुः ॥
कैलासनगरं रम्यं सर्वोपरिविराजितम्।
निवासार्थं निजस्यैव पंचवक्त्रश्वकार ह॥ ३५
ब्रह्मांडस्य तथा नाशे वैकुण्ठस्य च तस्य च।
कदाचिदेव देवर्षे नाशो नास्ति तयोरिह॥ ३६
सत्यं पदमुपाश्रित्य स्थितोऽहं मुनिसत्तम।
सृष्टिकामोऽभवं तात महादेवाज्ञया ह्यहम् ॥ २७
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२७७
विष्णु बोले हे ब्रह्मन्! आप वर माँगिये। मैं
प्रसन्न हूँ। मुझे आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है।
भगवान् शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें
समर्थ हूँ॥ २७॥
ब्रह्माजी बोले-हे महाभाग! आपने जो मुझपर
कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान्
शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया था। हे
विष्णो! आपको नमस्कार है, आज मैं आपसे जो
कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये॥ २८॥
हे प्रभो! यह विराट्रूप तथा चौबीस तत्त्वोंसे
बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है,
यह जडीभूत दिखायी देता है ॥ २९॥
हे हरे इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप
यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरको शक्तिसे सम्भूत इस
अण्डमें चेतनता लाइयें॥ ३०॥
मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आज्ञामें तत्पर रहनेवाले
महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय लेकर उस अण्डमें
प्रवेश किया॥ ३१॥
उस समय उन परमपुरुषके सहस्रों मस्तक,
सहस्रो नेत्र और सहस्त्रों पैर थे। उन्होंने भूमिको सब
ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया॥ ३२॥
मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति किये जानेपर जब
शरीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस
तत्त्वोंवाला अण्ड सचेतन हो गया॥ ३३॥
पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले
उस अण्डके रूपमें वहाँ विराट् श्रीहरि ही विराज
रहे थे॥ ३४॥
पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये
सुरम्य केलास-नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे
ऊपर सुशोभित होता है॥ ३५॥
हे देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर
भी वैकुण्ठ और कैलास-उन दोनोंका कभी नाश
नहीं होता॥ ३६॥
हे मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर
रहता हूँ। हे तात! महादेवजीकी आज्ञासे हीं मुझमें
सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है ॥ ३७॥
२७८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १५
प्रादुरभवत्पापसर्गक: ।
बुद्धिपूर्वस्तमोपमः॥
सिसृक्षोथ मे
अविद्यापञ्जकस्तात
ततः प्रसन्नचित्तोऽहमसृजं स्थावराभिधम्।
मुख्यसर्ग च निःसंगमध्यायं शंभुशासनात्॥ ३९
तं दृष्ट्वा मे सिसृक्षोश्च ज्ञात्वा साधकमात्मनः ।
सर्गोऽवर्तत दुः खाढ्यस्तिर्यकस्त्रोता न साधकः ॥ ४०
तं चासाधकमाज्ञाय पुनश्चिन्तयतश्च मे।
अभवत्साच्चिकः सर्ग ऊर्ध्वस्त्रोता इति द्रुतम्॥ ४१
देवसर्गः प्रतिख्यातः सत्योऽतीव सुखावह: ।
तमप्यसाधकं मत्वाऽचिन्तयं प्रभुमात्मनः॥ ४२
प्रादुरासीत्ततः सगो राजसः शंकराज्ञया।
अर्वाक्स्रोता इति ख्यातो मानुषः परसाधकः॥ ४३
महादेवाज्ञया सर्गस्ततो भूतादिकोऽभवत्।
इति पंचविधा सृष्टिः प्रवृत्ता वै कृता मया॥ ४४
त्रयः सर्गाः प्रकृत्याश्च ब्रह्मणः परिकीर्तिताः ।
तत्राद्यो महतः सर्गो द्वितीयः सूक्ष्मभौतिकः ॥ ४५
वैकारिकस्तृतीयश्च इत्येते प्राकृतास्त्रयः।
एवं चाष्टविधाः सर्गाः प्राकृतैवैकृतैः सह॥ ४६
कौमारो नवमः प्रोक्तः प्राकृतो वैकृतश्च सः।
'एषामवांतरो भेदो मया वक्तुं न शक्यते॥ ४७
हे तात! जब मैं सृष्टिकी इच्छासे चिन्तन करने
लगा, उस समय पहले मुझसे पापपूर्ण
सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्यापंचक ( पंचपर्व
अविद्या) कहते हैं ॥ ३८॥
उसके पश्चात् प्रसन्नचित्त मैंने स्थावरसंज्ञक
मुख्य सर्ग (पहले सर्ग)-की संरचना की, जो सृष्टिः
सामर्थ्यसे रहित था, पुनः शिवकी आज्ञासे मैंने ध्यान
किया॥ ३९॥
उस मुख्य सर्गको वैसा देखकर अपना कार्य
साधनेके लिये सृष्टि करनेके इच्छुक मैने दुः खसे
परिपूर्ण तिर्यक्स्तरोत [तिरछे उड्नेवाले] सर्ग (दूसरे
सर्ग)-का सृजन किया, वह भी पुरुषार्थसाधक नहीँ
था॥ ४०॥
उसे भी पुरुषार्थसाधनकी शक्तिसे रहित जानकर
जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे
शीघ्र ही (तीसरे) सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ,
जिसे ऊर्ध्वस्नोता कहते हें ॥ ४१ ॥
यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ । यह देवसर्ग
सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी
पुरुषार्थसाधनसे रहित मानकर मैने अन्य सर्गके लिये
अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया॥ ४२॥
तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी
सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अर्वाकृस्नोता (चौथा
सर्ग) कहा गया है, जो मनुष्य-सर्ग कहलाता है, वह
सर्ग पुरुषार्थसाधनका अधिकारी हुआ॥ ४३॥
तदनन्तर महादेवजीकी आज्ञासे भूत आदिकी
सृष्टि [ भूतसर्ग-पाँचवाँ सर्ग] हुई। इस प्रकार मैंने
पाँच प्रकारकी सृष्टि की॥ ४४॥
इनके अतिरिक्त तीन प्रकारके सर्ग मुझ ब्रह्मा और
प्रकृतिके सान्िध्यसे उत्पन्न हुए | इनमें पहला महत्तत्त्वका
सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओंका सर्ग
और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है। इस तरह ये
तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकारके
सर्गोको मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं ॥ ४५-४६॥
इनके अतिरिक्त नौवाँ कौमारसर्ग है, जो प्राकृत
और वैकृत भी है। इन सबके अवान्तर भेद हैं, जिनका
वर्णन मैं नहीं कर सकता। उसका उपयोग बहुत थोड़ा
नी. १५]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२७९
अल्पत्वादुपयोगस्य वच्मि सर्ग द्विजात्मकम्।
कौमारः सनकादीनां यत्र सर्गो महानभूत्॥ ४८
सनकाद्याः सुता मे हि मानसा ब्रह्मसंमिताः।
महावैराग्यसंपन्ना अभवन्पंच सुत्रता: ॥ ४९
मयाज्ञप्ता अपि च ते संसारविमुखा बुधाः।
शिवध्यानैकमनसो न सृष्टौ चक्रिरे मतिम्॥ ५०
प्रत्युत्तरे च तैर्दत्तं श्रुत्वाहं मुनिसत्तम।
अकार्ष क्रोधमत्युग्रं मोहमाप्तरच नारद॥ ५१
क्रुद्धस्य मोहितस्याथ विह्वलस्य मुने मम।
क्रोधेन खलु नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिंदवः॥ ५२
तस्मिन्नवसरे तत्र स्मृतेन मनसा मया।
प्रबोधितोऽहं त्वरितमागतेन हि विष्णुना॥ ५३
तपः कुरु शिवस्येति हरिणा शिक्षितोऽप्यहम्।
तपोऽकारि महद् घोरं परमं मुनिसत्तम॥ ५४
तपस्यतश्च सृष्ट्यर्थं भ्रुवोर्घ्राणस्य मध्यतः।
अविमुक्ताभिधादेशात्स्वकीयान्मे विशेषतः॥ ५५
त्रिमूर्तीनां महेशस्य प्रादुरासीद् घृणानिधिः ।
अर्द्धनारीश्वरो भूत्वा पूर्णांशः सकलेश्वरः ॥ ५६
तमजं शंकरं साक्षात्तेजोराशिमुमापतिम्।
सर्वज्ञं सर्वकर्तारं नीललोहितसंज्ञकम्॥ ५७
दृष्ट्वा नत्वा महाभक्त्या स्ुत्वाहं तु प्रहर्षित: ।
अवोचं देवदेवेशं सृज त्वं विविधाः प्रजाः॥
श्रुत्वा मम वचः सोऽथ देवदेवो महेश्वरः।
ससर्ज स्वात्मनस्तुल्यान् रुद्रो रुद्रगणान्बहून्॥ ५९
है। अब मैं द्विजात्मक सर्गका वर्णन कह रहा हूँ।
इसीका दूसरा नाम कौमारसर्ग है, जिसमें सनक-सनन्दन
आदि कुमारोंकी महान् सृष्टि हुई है ॥ ४७-४८ ॥
सनक आदि मेरे पाँच* मानसपुत्र हैं, जो मुझ
ब्रह्माके ही समान हैं। वे महान् वैराग्यसे सम्पन्न तथा
उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले हुए॥ ४९ ॥
उनका मन सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें ही
लगा रहता है। वे संसारसे विमुख एवं ज्ञानी हैं।
उन्होंने मेरे आदेश देनेपर भी सृष्टिके कार्यमें मन नहीं
लगाया॥ ५० ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! सनकादि कुमारोंके दिये हुए
नकारात्मक उत्तरको सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध
प्रकट किया। किंतु हे नारद! मुझे मोह हो गया॥ ५१॥
हे मुने! क्रोध और मोहसे विहृल मुझ ब्रह्माके
नेत्रोंसे क्रोधवश आँसूकी बूँदें गिरने लगीं॥ ५२॥
उस अवसरपर मैंने मन-ही-मन भगवान् विष्णुका
स्मरण किया। वे शीघ्र ही आ गये और समझाते हुए
मुझसे कहने लगे-॥५३॥
आप भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तपस्या
कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरिने जब मुझे ऐसी शिक्षा
दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा ॥ ५४॥
सृष्टिके लिये तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौंहों
और नासिकाके मध्यभागसे जो उनका अपना ही
अविमुक्त नामक स्थान है, महेश््वरकी तीन मूर्तियोंमें
अन्यतम, पूर्णांश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान्
शिव अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट हुए॥ ५५-५६॥
जो जन्मसे रहित, तेजकी राशि, सर्वज्ञ तथा
सर्वकर्ता हैं, उन नीललोहित-नामधारी भगवान्
उमावल्लभको सामने देखकर बड़ी भक्तिसे मस्तक
झुकाकर उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और
उन देवदेवेश्वरसे बोला-हे प्रभो! आप विविध
जीवोंकी सृष्टि करें॥ ५७-५८॥
मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर
रुद्रने अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि
को॥५९॥
* सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार तथा सनत्सुजात।
२८०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १६
अवोचं पुनरेवेशं महारुद्रं महेश्वरम्।
जन्ममृत्युभयाविष्टाः सृज देव प्रजा इति॥ ६०
एवं श्रुत्वा महादेवो मद्वचः करुणानिधिः।
प्रहस्योवाच मां सद्यः प्रहस्य मुनिसत्तम॥ ६१
महादेव उवाच
जन्ममृत्युभयाविष्टा नाहं स्त्रक्ष्ये प्रजा विधे।
अशोभनाः कर्मवशा निमग्ना दुःखवारिधौ॥ ६२
अहं दुःखोदधौ मग्ना उद्धरिष्यामि च प्रजाः।
सम्यग् ज्ञानप्रदानेन गुरुमूर्तिपरिग्रहः॥ ६३
त्वमेव सृज दुःखाढ्याः प्रजाः सर्वाः प्रजापते।
मदाज्ञया न बद्धस्त्वं मायया संभविष्यसि॥ ६४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा मां स भगवान्सुश्रीमान्नीललोहितः।
सगणः पश्यतो मे हि द्रुतमन्तर्दधे हरः॥ ६५
तब मैंने स्वामी महेश्वर महारुद्रसे फिर कहा...
हे देव! आप ऐसे जीवोंकी सृष्टि करें, जो जन्म और
मृत्युके भयसे युक्त हों॥ ६०॥
हे मुनिश्रेष्ठ! मेरी ऐसी बात सुनकर
महादेवजी हँसकर मुझसे कहने लगे- ॥ ६१॥
महादेवजी बोले--विधे ! मैं जन्म और मृत्युके
भयसे युक्त अशोभन जीवोंकी सृष्टि नहीं करूँगा;
क्योंकि वे कर्मोके अधीन होकर दुःखके समुद्रमें डूबे
रहेंगे॥ ६२ ॥
मैं तो गुरुका स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान
प्रदानकर दुःखके सागरमें डूबे हुए उन जीवोंका
उद्धारमात्र करूँगा, उन्हें पार करूंगा॥ ६३॥
हे प्रजापते! दुःखमें डूबे हुए समस्त जीवोंकी
सृष्टि तो आप करें। मेरी आज्ञासे इस कार्यमें प्रवृत्त
होनेके कारण आपको माया नहीं बाँध सकेगी ॥ ६४॥
ब्रह्माजी बोले-मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान्
भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-ही-देखते
अपने पार्षदोंके साथ तत्काल अन्तर्धान हो गये ॥ ६५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रदरसहितायां प्रथमखण्डे सुष्ट्युपक्रमे खावतारविशरविवर्णन नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहाषुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुब्रसंहिताके प्रथम खण्डे सृष्टिके उपक्रममें
रुद्रावताराविर्भाववर्णन नामक पनद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी सन्तानोंका वर्णन तथा सती और शिवकी महत्ताका प्रतिपादन
ब्रह्मोवाच
शब्दादीनि च भूतानि पंचीकृत्वाहमात्मना।
तेभ्यः स्थूलं नभो वायुं वह्निं चैव जलं महीम्॥ १
पर्वतांश्च समुद्रांश्च वृक्षादीनपि नारद।
॥
सृष्ट्यन्तानपरांश्रापि नाहं तुष्टोऽभवं मुने।
ततो ध्यात्वा शिवं साम्बं साधकानसृजं मुने॥ ३
२
मरीचिं च स्वनेत्राभ्यां हृदयाद् भृगुमेव च।
शिरसोऽङ्गिरसं व्यानात्पुलहं मुनिसत्तमम्॥ ४
उदानाच्च पुलस्त्यं हि वसिष्ठं च समानत: ।
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! तदनन्तर मैंने शब्द
आदि सूक्ष्मभूतोंका स्वयं ही पंचीकरण करके उनसे
स्थूल आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवीकी सृष्टि
की । पर्वतों, समुद्रं, वृक्षों और कलासे लेकर युगपर्यन्त
कालोंकी रचना की॥ १-२॥
मुने! उत्पत्ति और विनाशवाले और भी बहुतसे
पदार्थोका मैंने निर्माण किया, परंतु इससे मुझे सन्तोष
नहीं हुआ। तब साम्बशिवका ध्यान करके
साधनापरायण पुरुषोंकी सृष्टि की ॥ ३॥
अपने दोनों जेत्रॉसे मरीचिको, हृदयसे भूगुको,
सिरसे अंगिराको, व्यानवायुसे मुनिश्रेष्ठ पुलहकी,
उदानवायुसे पुलस्त्यको, समानवायुसे वसिष्ठको, अपानसे
जे १६]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२८९
क्रतुं त्वपानाच्छोत्राभ्यामत्रिं दक्षं च प्राणत:॥ ५
असूजं त्वां तदोत्संगाच्छायाया: कर्दमं मुनिम्।
संकल्पादसृजं धर्म सर्वसाधनसाधनम्॥ ६
एवमेतानहं सृष्ट्वा कृतार्थः साधकोत्तमान्।
अभवं मुनिशार्दूल महादेवप्रसादतः ॥ ७
ततो मदाज्ञया तात धर्मः सङ्कल्पसम्भवः।
मानवं रूपमापन्नः साधकैस्तु प्रवर्तित: ॥ ८
ततोऽसजं स्वगात्रेभ्यो विविधेभ्योऽमितान्सुतान्।
सुरासुरादिकांस्तेभ्यो दत्त्वा तां तां तनुं मुने॥ ९
ततोऽहं शंकरेणाथ प्रेरितोऽन्तर्गतेन हि।
द्विधा कृत्वात्मनो देहं द्विरूपश्चाभवं मुने॥ १०
अर्धेन नारी पुरुषश्चार्धन संततो मुने।
स तस्यामसृजद् द्रंद्द॑ सर्वसाधनमुत्तमम्॥ ११
स्वायंभुवो मनुस्तत्र पुरुषः परसाधनम्।
शतरूपाभिधा नारी योगिनी सा तपस्विनी॥ १२
सा पुनर्मनुना तेन गृहीतातीव शोभना।
विवाहविधिना तातासृजत्सर्ग समैथुनम्॥ १३
तस्यां तेन समुत्पन्नस्तनयश्च प्रियव्रतः।
तथैवोत्तानपादश्रच तथा कन्यात्रयं पुनः॥
आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः।
आकूतिं रुचये प्रादात्कर्दमाय तु मध्यमाम्॥ १५
ददौ प्रसूतिं दक्षायोत्तानपादानुजां सुताम्।
तासां प्रसूतिप्रसवैः सर्वं व्याप्तं चराचरम्॥ १६
आकूत्यां च रुचेश्चाभूद दंद्वं यज्ञश्च दक्षिणा।
यज्ञस्य जज्ञिरे पुत्रा दक्षिणायां च द्वादश॥ १७
क्रतुको, दोनों कानोंसे अत्रिको, प्राणवायुसे दक्षको,
गोदसे आपको तथा छायासे कर्दम मुनिको उत्पन्न
किया और संकल्पसे समस्त साधनोंके साधनरूप
धर्मको उत्पन्न किया॥ ४--६॥
हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार महादेवजीकी कृपासे
इन उत्तम साधकोंकी सृष्टि करके मैंने अपने-आपको
कृतार्थ समझा ॥ ७॥
हे तात! तत्पश्चात् संकल्पसे उत्पन्न हुआ धर्म
मेरी आज्ञासे मानवरूप धारण करके उत्तम साधकोंके
द्वारा आगे प्रवर्तित हुआ॥ ८॥
हे मुने! इसके बाद मैंने अपने विभिन्न अंगोंसे
देवता, असुर आदि असंख्य पुत्रोंकी सृष्टि की और
उन्हें भिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किया॥ ९॥
हे मुने! तदनन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकरकी
प्रेरणासे अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके मैं
दो रूपोंवाला हो गया॥ १०॥
हे नारद! आधे शरीरसे मैं स्त्री हो गया और
आधेसे पुरुष। उस पुरुषने उस स्त्रीके गर्भसे
सर्वसाधनसमर्थ उत्तम जोडेको उत्पन्न किया॥ १९॥
उस जोड़ेमें जो पुरुष था, वही स्वायम्भुव मनुके
नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्वायम्भुव मनु उच्चकोटिके
साधक हुए तथा जो स्त्री थी, वह शतरूपा कहलायी।
बह योगिनी एवं तपस्विनी हुई॥ १२॥
हे तात! मनुने वैवाहिक विधिसे अत्यन्त सुन्दरी
शतरूपाका पाणिग्रहण किया और उससे वे मैथुनजनित
सृष्टि उत्पन्न करने लगे॥ १३॥
उन्होंने शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक
दो पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं। कन्याओंके
नाम थे-आकूति, देवहूति और प्रसूति। मनुने आकूतिका
विवाह प्रजापति रुचिके साथ किया, मझली पुत्री
देवहूति कर्दमको ब्याह दी और उत्तानपादकी सबसे
छोटी बहन प्रसूति प्रजापति दक्षको दे दी। उनमें
प्रसूतिकी सन्तानोंसे समस्त चराचर जगत् व्याप्त
है॥ १४-१६॥
रुचिके द्वारा आकूतिके गर्भसे यज्ञ और दक्षिणा
नामक स्त्री-पुरुषका जोड़ा उत्पन्न हुआ। यज्ञसे
दक्षिणाके गर्भसे बारह पुत्र हुए॥ १७॥
हे ८२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ १६
देवहूत्यां कर्द॑माच्च बह्यो जाताः सुता मुने।
दक्षाज्ञाताश्चतस्त्रश्च तथा पुत्र्यश्च विंशतिः॥ १८
धर्माय दत्ता दक्षेण श्रद्धाद्यास्तु त्रयोदश।
शृणु तासां च नामानि धर्मस्त्रीणां मुनीश्वर॥ १९
श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिमेधा तथा क्रिया।
बुद्धिलंजा वसुः शांतिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश २०
ताभ्यां शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः ।
ख्यातिः सत्पथसंभूति: स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा॥ २१
सन्नतिश्रानुरूपा च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा।
भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः॥ २२
पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा।
अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्॥ २३
ख्यातास्ता जगृहुः कन्या भृग्वाद्याः साधका वरा: ।
ततः संपूरितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ २४
एवं कर्मानुरूपेण प्राणिनामम्बिकापतेः।
आज्ञया बहवो जाता असंख्याता द्विजर्षभाः ॥ २५
'कल्पभेदेन दक्षस्य षष्टिः कन्याः प्रकीर्तिताः ।
तासां दश च धर्माय शशिने सप्तविंशतिम् २६
विधिना दत्तवान्दक्षः कश्यपाय त्रयोदश।
चतस्त्रः पररूपाय ददौ ताक्ष्याय नारद्॥ २७
भृग्वंगिरःकृशाश्चेभ्यो द्वे द्वे कन्ये च दत्तवान्।
ताभ्यस्तेभ्यस्तु संजाता बह्वी सृष्टिश्चराचरा॥ २८
त्रयोदशमितास्तस्मै कश्यपाय महात्मने।
दत्ता दक्षेण याः कन्या विधिवन्मुनिसत्तम॥ २९
तासां प्रसूतिभिर्व्यपतं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
स्थावरं जंगमं चैव शून्यं नैव तु किंचन॥ ३०
देवाश्च ऋषयश्चैव दैत्याश्चैव प्रजज्ञिरे।
वृक्षाश्च पक्षिणश्चैव सर्वे पर्वतवीरुधः॥ ३१
दक्षकन्याप्रसूतेश्च॒ व्याप्तमेवं चराचरम्।
पातालतलमारभ्य सत्यलोकावधि ध्रुबम्॥ ३२
4: SS Oo CS कक
हे मुने! कर्दमद्वारा देवहूतिके गर्भसे बहुत-सी
ुत्रियँ उत्पन्न हुई। दक्षसे चौबीस कन्याएँ हुई ॥ १८ |
दक्षने उनमेंसे श्रद्धा आदि तेरह कन्याओंका
विवाह धर्मके साथ कर दिया। हे मुनीश्वर! धर्मकी
उन पत्नियोंके नाम सुनिये॥ १९॥
श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया,
बुद्धि, लज्जा, वसु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति-ये सब
तेरह हैं ॥ २०॥
इनसे छोटी शेष ग्यारह सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याएँ
ख्याति, सत्पथा, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति,
अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा थीं। भृगु, भव,
मरीचि, मुनि अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ क्रतु,
अत्रि, वसिष्ठ, वह्नि और पितरोंने क्रमश: इन ख्याति
आदि कन्याओंका पाणिग्रहण किया। भृगु आदि मुनि
श्रेष्ठ साधक हैं । इनकी सन्तानोंसे समस्त त्रैलोक्य
भरा हुआ है॥ २१-२४॥
इस प्रकार अम्बिकापति महादेवजीकी आज्ञासे
प्राणियोंके अपने पूर्वकर्मोके अनुसार असंख्य श्रेष्ठ
द्विज उत्पन्न हुए॥ २५॥
कल्पभेदसे दक्षकी साठ कन्याएँ बतायी गयी
हैं। दक्षने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, सत्ताईस
कन्याएँ चन्द्रमाको और तेरह कन्याएँ कश्यपको
विधिपूर्वक प्रदान कर दी। हे नारद! उन्होंने चार
कन्याओंका विवाह श्रेष्ठ रूपवाले ताक्ष्यके साथ कर
दिया। उन्होंने भृगु, अंगिरा और कृशाश्वको दो-दो
कन्याएँ अर्पित कौं। उन-उन स्त्रियों तथा पुरुषोंसे
बहुत-सी चराचर सृष्टि हुई॥ २६--२८॥
हे मुनिश्रेष्ठ! दक्षने महात्मा कश्यपको जिन
तेरह कन्याओंका विधिपूर्वक दान किया था, उनकी
सन्तानॉसे सारा त्रैलोक्य व्याप्त हो गया। स्थावर और
जंगम कोई भी सृष्टि ऐसी नहीँ, जो उनकी सम्तानोंसे
शून्य हो॥ २९-३०॥
देवता, ऋषि, दैत्य, वृक्ष, पक्षी, पर्वत तथा तूर्ण
लता आदि सभी [कश्यपपत्नियोंसे] पैदा हुए। इ
प्रकार दक्ष-कन्याओंकी सन्तानोंसे सारा चराचर जगत.
व्याप्त हो गया। पातालसे लेकर
समस्त ब्रह्माण्ड निश्चय ही [उनकी सन्तानोंसे] सदी
बै. १६]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२८३
ब्रह्माण्डं सकलं व्याप्तं शून्यं नैव कदाचन ।
एवं सृष्टिः कृता सम्यरब्रह्मणा शंभुशासनात् ॥ ३३
सती नाम त्रिशूलाग्रे सदा रुद्रेण रक्षिता।
तपोऽर्थं निर्मिता पूर्व शंभुना सर्वविष्णुना॥ ३४
सैव दक्षात्समुद्धूता लोककार्यार्थमेब च।
लीलां चकार बहुशो भक्तोद्धरणहेतवे॥ ३५
बामांगो यस्य वैकुंठो दक्षिणांगोऽहमेव च।
रुद्रो हृदयजो यस्य त्रिविधस्तु शिवः स्मृतः॥ ३६
अहं विष्णुश्च रुद्रश्च गुणास्त्रय उदाहृताः।
स्वयं सदा निर्गुणश्च परब्रह्माव्ययः शिवः॥ ३७
विष्णुः सत्त्वं रजोऽहं च तमो रूद्र उदाहृतः।
लोकाचारत इत्येबं नामतो वस्तुतोऽन्यथा॥ ३८
अंतस्तमो बहिः सत्त्वो विष्णू रुद्रस्तथा मतः।
अंतः सत्त्वस्तमो बाह्यो रजोऽहं सर्वथा मुने॥ ३९
राजसी च सुरा देवी सत्त्वरूपा तु सा सती।
लक्ष्मीस्तमोमयी ज्ञेया त्रिरूपा च शिवा परा ॥ ४०
एवं शिवा सती भूत्वा शंकरेण विवाहिता।
पितुर्यज्ञे तनु त्यकत्वा नादरात् स्वपदं ययौ॥ ४१
पुनश्च पार्वती जाता देवप्रार्थनया शिवा।
तपः कृत्वा सुविपुलं पुनः शिवमुपागता॥
तस्या नामान्यनेकानि जातानि च मुनीश्वर।
कालिका चंडिका भद्रा चामुंडा विजया जया॥ ४३
जयंती भद्रकाली च दुर्गा भगवतीति च।
भरा रहता है, कभी रिक्त नहीं होता। इस प्रकार
भगवान् शंकरकी आज्ञासे ब्रह्माजीने भलीभाँति सृष्टि
की ॥ ३१-३३॥
पूर्वकालमें सर्वव्यापी शम्भुने जिन्हें तपस्याके
लिये प्रकट किया था, रुद्रदेवके रूपमें उन्होंने
त्रिशूलके अग्रभागपर रखकर उनकी सदा रक्षा की।
वे ही सती देवी लोकहितका कार्य सम्पादित करनेके
लिये दक्षसे प्रकट हुईं। उन्होंने भक्तोंके उद्धारके लिये
अनेक लीलाएँ कीं॥ ३४-३५॥
जिनका वामांग वैकुण्ठ विष्णु हैं, दक्षिणभाग
स्वयं मैं हूँ और रुद्र जिनके हृदयसे उत्पन्न हैं, उन
शिवजीको तीन प्रकारका कहा गया है॥ ३६॥
मैं ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों गुणोंसे युक्त
कहे गये हैं, किंतु परब्रह्म, अव्यय शिव स्वयं सदा
निर्गुण ही रहते हैं। विष्णु सत्त्वगुण, मैं रजोगुण और
रुद्र तमोगुणवाले कहे गये हैं। लोकाचारमें ऐसा
व्यवहार नामके कारण किया जाता है, किंतु वस्तुतत्त्व
इससे सर्वथा भिन्न है ॥ ३७-३८॥
विष्णु अन्तःकरणसे तमोगुण और बाहरसे
सत्त्वगुणसे युक्त माने गये हैं। रुद्र अन्तःकरणसे
सत्त्वगुण और बाहरसे तमोगुणवाले हैं और हे मुने!
मैं सर्वथा रजोगुणवाला ही हूँ॥ ३९॥
ऐसे ही सुरादेवी रजोगुणी हैं, वे सतीदेवी
सत्त्वस्वरूपा हैं और लक्ष्मी तमोमयी हैं, इस प्रकार
पराम्बाको भी तीन रूपोंवाली जानना चाहिये ॥ ४०॥
इस प्रकार देवी शिवा ही सती होकर
भगवान् शंकरसे ब्याही गयीं, किंतु पिताके यज्ञमें
पतिके अपमानके कारण उन्होंने अपने शरीरको त्याग
दिया और फिर उसे ग्रहण नहीं किया। वे अपने
परमपदको प्राप्त हो गयीं॥ ४१॥
तत्पश्चात् देवताओंकी प्रार्थनासे वे ही शिवा
पार्वतीरूपसे प्रकट हुई और बड़ी भारी तपस्या करके
उन्होंने पुनः भगवान् शिवको प्राप्त कर लिया॥ ४२॥
हे मुनीश्वर! [इस जगत्में] उनके अनेक नाम
प्रसिद्ध हुए। उनके कालिका, चण्डिका, भद्रा, चामुण्डा,
विजया, जया, जयन्ती, भद्रकाली, दुर्गा, भगवती,
कामाख्या, कामदा, अम्बा, मृडानी और सर्वमंगला
र्ड ८ढ
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १७
कामाख्या कामदा ह्म्बा मृडानी सर्वमंगला॥ ४४
नामधेयान्यनेकानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च।
गुणकर्मानुरूपाणि प्रायशस्तत्र पार्वती ॥ ४५
गुणमय्यस्तथा देव्यो देवा गुणमयास्त्रयः।
मिलित्वा विविधं सृष्टेश्चक्रुस्ते कार्यमुत्तमम्॥ ४६
एवं सृष्टिप्रकारस्ते वर्णितो मुनिसत्तम।
शिवाज्ञया विरचितो ब्रह्मांडस्य मयाखिलः॥ ४७
परं ब्रह्म शिवः प्रोक्तस्तस्य रूपास्त्रयः सुराः।
अहं विष्णुश्च रुद्रश्च गुणभेदानुरूपतः॥ ४८
शिवया रमते स्वैरं शिवलोके मनोरमे।
स्वतंत्रः परमात्मा हि निर्गुणः सगुणोऽपि वै॥ ४९
तस्य पूर्णावतारो हि रुद्रः साक्षाच्छिवः स्मृतः।
कैलासे भवनं रम्यं पंचवक्त्रश्चकार ह।
ब्रह्मांडस्य तथा नाशे तस्य नाशोऽस्ति वै न हि॥ ५०
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आदि अनेक नाम हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले है
ये नाम उनके गुण और कर्मोके अनुसार हैं, इनमें भी
पार्वती नाम प्रधान है ॥ ४३-४५॥
इस प्रकार गुणमयी तीनों देवियों और गुणमय
तीनों देवताओंने मिलकर सृष्टिके उत्तम कार्यको निष्पन्न
किया। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपसे सृष्टिक्रमका
वर्णन किया है। ब्रह्माण्डका यह सारा भाग
शिवकी आज्ञासे मेरे द्वारा रचा गया है ॥ ४६-४७॥
भगवान् शिवको परब्रह्म कहा गया है । मैं, विष्णु
और रुद्र-ये तीनों देवता गुणभेदसे उन्हींके रूप हैं ॥ ४८ ॥
निर्गुण तथा सगुणरूपवाले वे स्वतन्त्र परमात्मा
मनोरम शिवलोकमें शिवाके साथ स्वच्छन्द विहार करते
हैं । उनके पूर्णावतार रुद्र ही साक्षात् शिव कहे गये हैं।
उन्हीं पंचमुख शिवने कैलासपर अपना रमणीक भवन
बना रखा है । [ प्रलयकालमें] ब्रह्माण्डका नाश होनेपर
भी उसका नाश कभी नहीं होता ॥ ४९-५०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सुष्ट्युपक्रमे
ब्रह्मनारदसंवादे सृष्टिवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपक्रममें
सृष्टिवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
सज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिका चरित्र
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारद: ।
पुनः पप्रच्छ तं नत्वा विनयेन मुनीश्वराः॥ १
नारद उवाच
कदा गतो हि कैलासं शंकरो भक्तवत्सल: ।
क्व वा सखित्वं तस्यासीत् कुबेरेण महात्मना ॥
किं चकार हरस्तत्र परिपूर्णः शिवाकृतिः।
एतत्सर्व समाचक्ष्व परं कोतूहलं मम॥ ३
२
ब्रह्मोवाच
श्रृणु नारद वक्ष्यामि चरितं शशिमौलिनः।
यथा जगाम कैलासं सखित्वं धनदस्य च॥
सूतजी बोले--हे मुनीश्वरो! ब्रह्माजीकी
यह बात सुनकर नारदजीने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम
करके पुनः पूछा-॥ १॥
जारदजी बोले--भक्तवत्सल भगवान् शंकर
कैलासपर्वतपर कब गये और महात्मा कुबेरके साथ
उनकी मैत्री कब हुई॥ २॥
परिपूर्ण मंगलविग्रह महादेवजीने वहाँ कया
किया ? यह सब मुझे बताइये। [इसे सुननेके लिये]
मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मैं चन्रमौलि भगवान्
शंकरके चरित्रका वर्णन करता हूँ। वे जिस प्रकार
कैलास पर्वतपर गये और कुबेरकी उनके साथ मैत्री
हुई, यह सब सुनिये॥ ४॥
< १७]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२८५
आसीत् काम्पिल्यनगरे सोमयाजिकुलोद्भवः ।
दीक्षितो यज्ञदत्ताख्यो यज्ञविद्याविशारद:॥ ५
बेदवेदांगवित्पराज्ञो वेदान्तादिषु दक्षिण: ।
राजमान्योऽथ बहुधा वदान्यः कीर्तिभाजनः॥ ६
अग्निशुश्रूषणरतो
सुन्दरो
वेदाध्ययनतत्पर: ।
रमणीयांगश्चन्द्रबिंबसमाकृतिः॥ ७
आसीद् गुणनिधिर्नाम दीक्षितस्यास्य वे सुत: ।
कृतोपनयनः सोऽष्टौ विद्यां जग्राह भूरिश:।
अथ पित्रानभिज्ञातो द्यूतकर्मरतोऽभवत्॥ ८
आदायादाय बहुशो धनं मातुः सकाशतः।
समदाद् द्यूतकारेभ्यो मैत्रीं तेश्च चकार स:॥ ९
सन्त्यक्तब्राह्मणाचार: सन्ध्यास्तानपराङ्मुखः।
निन्दको वेदशास्त्राणां देवब्राह्मणनिन्दकः॥ १०
स्मृत्याचारविहीनस्तु गीतवाद्यविनोदभाक्।
नटपाखण्डभाण्डैस्तु बद्धप्रेमपरंपरः॥ ११
प्रेरितोऽपि जनन्या स न ययौ पितुरन्तिकम्।
गृहकार्यान्तरव्यास्तो दीक्षितो दीक्षितायिनीम्॥ १२
यदा यदैव तां पृच्छेदये गुणनिधिः सुतः।
ज दृश्यते मया गेहे कल्याणि विदधाति किम्॥ १३
तदा तदेति सा ब्रूयादिदानीं स बहिर्गतः।
स्नात्वा समर्च्य चै देवानेतावन्तमनेहसम्॥
अधीत्याध्ययनार्थं स द्वित्रैमित्रेः समं ययौ।
एकपुत्रेति तन्माता प्रतारयति दीक्षितम्॥ १५
न तत्कर्म च तदवृत्तं किंचिद्वेत्ति स दीक्षितः।
सर्व केशान्तकर्मास्य चक्रे वर्षेऽथ षोडशे॥ १६
काम्पिल्यनगरमें सोमयाग करनेवाले कुलमें उत्पन्न
यज्ञविद्याविशारद यज्ञदत्त नामका एक दीक्षित ब्राह्मण
था। वह वेदवेदांगका ज्ञाता, प्रबुद्ध, वेदान्तादिमें दक्ष,
अनेक राजाओंसे सम्मानित, परम उदार और यशस्वी
था॥ ५-६॥
वह अग्निहोत्र आदि कर्मोमें सदैव संलग्न
रहनेवाला, वेदाध्ययनपरायण, सुन्दर, रमणीय अंगोंवाला
तथा चन्द्रबिम्बके समान आकृतिवाला था॥७॥
इस दीक्षित ब्राह्मणके गुणनिधि नामक एक पुत्र
था, उपनयन-संस्कार हो जानेके बाद उसने आठ
विद्याओंका भलीभाँति अध्ययन किया, किंतु पिताके
अनजानमें वह झूतकर्ममें प्रवृत्त हो गया॥८॥
उसने अपनी माताके पाससे बहुत-सा धन ले-
लेकर जुआरियोंको सौंप दिया और उनसे मित्रता कर
ली॥९॥
वह ब्राह्मणके लिये अपेक्षित आचारूविचारसे
रहित, सन्ध्या-स्नान आदि कमाँसे पराङ्मुख, वेदशास्त्र
आदिका निन्दक, देवताओं और ब्राह्मणोंका अपमान
करनेवाला और स्मार्ताचार-विचारसे रहित होकर
गाने-बजानेमें आनन्द लेने लगा। उसने नटों,
पाखण्डियों तथा भाण्डोंसे प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर
लिया॥ १०-११॥
माताके द्वारा प्रेरित किये जानेपर भी वह पिताके
समीप कभी भी नहीं गया । घरके अन्य कर्मेमें व्यस्त वह
दीक्षित ब्राह्मण जब-जब अपनी दीक्षित पत्नीसे पूछता
कि हे कल्याणि! घरमें मुझे पुत्र गुणनिधि नहीं दिखायी
पड़ रहा है, वह क्या कर रहा है ?॥ १२-१३॥
वह तब-तब यही कहती कि वह इस समय
स्नान करके तथा देवताओंकी पूजा करके बाहर गया
है। अभीतक पढ़कर वह अपने दो-तीन मित्रोंके
साथ पढ्नेके लिये गया हुआ है। इस प्रकार उस
गुणनिधिकी एकपुत्रा माता सदैव दीक्षितको धोखा
देती रही॥ १४-१५॥
वह दीक्षित ब्राह्मण उस पुत्रके कर्म और
आचरणको कुछ भी नहीं जान पाता था, सोलहवें
वर्षमें उसने उसके केशान्त कर्म आदि सब संस्कार
भी कर दिये॥ १६॥
के ८६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १७
अथो स दीक्षितो यज्ञदत्तः पुत्रस्य तस्य च।
गृह्योक्तेल विधानेन पाणिग्राहमकारयत्॥ १७
प्रत्यहं तस्य जननी सुतं गुणनिधिं मृदु।
शास्ति स्नेहार्द्रहदया ह्युपवेश्य स्म नारद्॥ १८
क्रोधनस्तेऽस्ति तनय स महात्मा पितेत्यलम्।
यदि ज्ञास्यति ते वृत्तं त्वां च मां ताडयिष्यति॥ १९
आच्छादयामि ते नित्यं पितुरग्रे कुचेष्टितम्।
'लोकमान्योऽस्ति ते तातः सदाचारैर्न वै धने: ॥ २०
ब्राह्मणानां धनं तात सद्विद्या साधुसंगमः ।
किमर्थं न करोषि त्वं स्वरुचिं प्रीतमानसः॥ २१
सच्छोत्रियास्तेऽनूचाना दीक्षिताः सोमयाजिनः।
इति रूढिमिह प्राप्तास्तव पूर्वपितामहाः॥ २२
त्यक्त्वा दुर्वृत्तसंसर्ग साधुसंगरतो भव।
सद्विद्यासु मनो धेहि ब्राह्मणाचारमाचर॥ २३
तातानुरूपो रूपेण यशसा कुलशीलतः।
ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां स्वकाम्॥ २४
ऊनविंशतिकोऽसि त्वमेषा षोडशवार्षिकी।
एतां संवृणु सद्वृत्तां पितृभक्तियुतो भव॥ २५
श्वशुरोऽपि हि ते मान्यः सर्वत्र गुणशीलतः।
ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां सुत॥ २६
मातुलास्तेऽतुलाः पुत्र विद्याशीलकुलादिभिः।
तेभ्योऽपि न बिभेषि त्वं शुद्धोऽस्युभयवंशतः ॥ २७
पश्यैतानप्रतिवेश्मस्थान्ब्राह्मणानां कुमारकान्।
गृहेऽपि शिष्यान्पश्यैतान्पितुस्ते विनयोचितान्॥ २८
कक ७ ० जीका
इसके पश्चात् उस दीक्षित यज्ञदत्तने गृहासूत्रमें
कहे गये विधानके अनुसार अपने उस पुत्रका पाणिग्रहण
संस्कार भी कर दिया॥ १७॥
हे नारद! स्नेहसे आर्द्र हृदयवाली उसकी माता
पासमें बैठाकर मृदु भाषामें उस पुत्र गुणनिधिको प्रतिदिन
समझाती थी कि हे पुत्र! तुम्हारे महात्मा पिता अत्यन्त
क्रोधी स्वभाववाले हैं । यदि वे तुम्हारे आचरणको जान
जायंगे, तो तुमको और मुझको भी मारेंगे॥ १८-१९॥
तुम्हारे पिताके सामने मैं तुम्हारी इस बुराईको नित्य
छिपा देती हूँ । तुम्हारे पिताकी समाजमें प्रतिष्ठा सदाचारसे
ही है, धनसे नहं । हे पुत्र! ब्राह्मणोंका धन तो उत्तम
विद्या और सजनोंका संसर्ग है। तुम प्रसन्नमन होकर
अपनी रुचि उनमें क्यों नहीं लगा रहे हो॥ २०-२१॥
तुम्हारे पितामह आदि पूर्वज सुयोग्य, श्रोत्रिय,
वेदविद्यामें पारंगत विद्वान्, दीक्षित, सोमयाज्ञिक ब्राह्मण
हैं--ऐसी लोकप्रसिद्धिको प्राप्त किये थे॥ २२॥
अतः तुम दुष्टोंकी संगति छोड़कर साधुओंकी
संगतिमें तत्पर होओ, सद्ठिद्याओंमें मन लगाओ और
ब्राह्मणोचित सदाचारका पालन करो॥ २३॥
तुम रूपसे पिताके अनुरूप ही हो। यश, कुल
और शीलसे भी उनके अनुरूप बनो। इन कमाँसे तुम
लज्जित क्यों नहीं होते हो? अपने बुरे आचरणोंको
छोड़ दो ॥ २४॥
तुम उन्नीस वर्षके हो गये हो और यह [तुम्हारी
पली] सोलह वर्षकी है। इस सदाचारिणीका वरण
करो अर्थात् इससे मधुर सम्बन्ध स्थापित करो और
पिताकी भक्तिमें तत्पर हो जाओ ॥ २५॥
तुम्हारे श्वसुर भी अपने गुण और शीलके
कारण सर्वत्र पूजे जाते हैं। हे पुत्र! [उन्हें देखकर
और उनकी प्रशस्तिको सुनकर भी] तुम्हें लज्जा नहीं
आती है, अपनी बुरी आदतोंको छोड़ दो॥ २६॥
हे पुत्र! तुम्हारे सभी मामा भी विद्या, शील तथा
कुल आदिसे अतुलनीय हैं । तुम उनसे भी नहीं डरते।
तुम तो दोनों वंशॉंसे शुद्ध हो॥ २७॥
तुम इन पड़ोसी ब्रा्मणकुमारोंको देखो और
अपने घरमें ही अपने पिताके इन विनयशील शिष्योंकी
ही देखो॥ २८॥
ह १७]
राजापि श्रोष्यति यदा तव दुश्चेष्टितं सुत।
श्रद्धां विहाय ते ताते वृत्तिलोपं करिष्यति ॥ २९
बालचेष्टितमेवैतद् वदन्त्यद्यापि ते जना: ।
अनन्तरं हरिष्यन्ति युक्तां दीक्षिततामिह॥ ३०
सर्वेऽप्याक्षारयिष्यन्ति तब तातं च मामपि।
मातुश्चरित्रं तनयो धत्ते दुर्भाषणैरिति॥ ३१
पितापि ते न पापीयाञ्छुतिस्मृतिपथानुगः।
तदडङ्घ्रिलीनमनसो मम साक्षी महेश्वरः॥ ३२
न चर्तुस्नातयापीह मुखं दुष्टस्य वीक्षितम्।
अहो बलीयान्स विधिर्येन जातो भवानिति॥ ३३
प्रतिक्षणं जनन्येति शिक्ष्यमाणोऽतिदुर्मतिः।
न तत्याज च तद्धर्म दुर्बोधो व्यसनी यतः॥ ३४
मृगयामद्यपैशुन्यानृतचोर्यदुरोदरैः ।
स वारदारेरव्यसनेरेभिः कोऽत्र न खंडित: ॥ ३५
यद्यन्मध्यगृहे पश्येत्तत्तन्नीत्वा सुदुर्मति:।
अर्पयेद् द्यूतकाराणां सकुप्यं वसनादिकम्॥ ३६
न्यस्तां रत्नमयीं गेहे करस्य पितुरूर्मिकाम्।
चोरवित्वैकदादाय हुरोद्रकरेऽर्पयत्॥ ३७
दीक्षितेन परिज्ञातो दैवाद् द्यूतकृतः करे।
उवाच दीक्षितस्तं च कुतो लब्धा त्वयोर्मिका॥ ३८
पष्टस्तेनाथ निर्बधादसकृत्तमुबाच सः।
मामाक्षिपसि विप्रोच्चैः किं मया चौर्यकर्मणा॥
लब्धा मुद्रा त्वदीयेन पुत्रेणैव समर्पिता।
मम मातुर्हि पूर्वेद्युर्जि्वा नीतो हि शाटकः॥ ४०
रूद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२८७
हे पुत्र! राजा भी जब तुम्हारे इस दुष्टाचरणको
सुनेंगे, तो तुम्हारे पिताके प्रति अपनी श्रद्धा त्यागकर
उनकी वृत्ति भी समाप्त कर देंगे॥ २९॥
अभी तो लोग यह कह रहे हैं कि यह
लड्कपनकी दुश्चेष्टा है। इसके पश्चात् वे प्राप्त हुई
प्रतिष्ठित दीक्षितकी उपाधि भी छीन लेंगे॥ ३०॥
सभी लोग तुम्हारे पिताको और मुझको भी दुष्ट
वचनोंसे धिक्कारेंगे और कहेंगे कि इसकी माता दुश्चरित्रा
है; क्योंकि माताके चरित्रको ही पुत्र धारण करता है॥ ३१॥
तुम्हारे पिता पापी नहीं हैं, वे तो श्रुति-स्मृतियोंके
पथपर अनुगमन करनेवाले हैं । उन्हींके चरणोंमें मेरा मन
लगा रहता है, जिसके साक्षी भगवान् सदाशिव हैं ॥ ३२॥
मैंने ऋतुसमयमें किसी दुष्टका मुख भी नहीं
देखा [जिसका तुम्हारे ऊपर प्रभाव पड़ गया हो]।
अरे वह विधाता ही बलवान् हैं, जिसके कारण
तुम्हारे-जैसा पुत्र उत्पन्न हुआ है॥ ३३॥
माताके द्वारा इस प्रकार हर समय समझाये जानेपर
भी उस अत्यन्त दुष्ट बुद्धिवालेने अपने उस दुष्कर्मका
परित्याग नहीं किया; क्योंकि व्यसन प्राप्त प्राणी दुर्बोध
होता है। मृगया (शिकार), मद्य, पैशुन्य (चुगली),
असत्यभाषण, चोरी, द्यूत और वेश्यागमन आदि-इन
व्यसनोंसे कौन खण्डित नहीं हो जाता है॥ ३४-३५॥
वह दुष्ट जो-जो सन्दूक, वस्त्र आदि वस्तुओंको
'घरमें देखता, उन-उन वस्तुओंको ले जाकर जुआरियोंको
सौंप देता था। एक बार घरमें पिताके हाथकी एक
रत्नजटित अँगूठी रखी थी, उसे चुरा करके उसने
किसी जुआरीके हाथमें दे दिया॥ ३६-३७॥
संयोगसे दीक्षितने किसी जुआरीके हाथमें उस
अँगूठीको देख लिया और उससे पूछा कि तुम्हें यह
अँगूठी कहाँसे प्राप्त हुई है ?॥ ३८॥
उस दीक्षितके द्वारा बार-बार कठोरतासे पूछे
जानेपर उस जुआरीने कहा-हे ब्राह्मण! आप जोर-
जोरसे मुझपर क्यों आक्षेप कर रहे हैं ? क्या मैंने इसे
चोरीसे प्राप्त किया है ? आपके पुत्रने ही मुद्रा लेकर
इसको मुझे दिया है। इसके पहले भी मेरे द्वारा जुएमें
जीत लिये जानेपर उसने अपनी माताकी साड़ी भी
चुराकर मुझे दी हैं॥ ३९-४०॥
२८८
श्रीशिवमहापुराण
[अ १७
न केवलं मपमैवैतदंगुलीयं समर्पितम्।
अन्येषां द्यूतकर्तृणां भूरि तेनार्पितं वसु॥
रत्नकुप्यदुकूलानि भूङ्गारप्रभृतीनि च।
भाजनानि विचित्राणि कांस्यताम्रमयानि च॥ ४२
जग्नीकृत्य प्रतिदिनं बध्यते द्यूतकारिभिः।
न तेन सदृशः कश्चिदाक्षिको भूमिमण्डले॥ ४३
अद्यावधि त्वया विप्र दुरोदरशिरोमणिः।
कथं नाज्ञायि तनयोऽविनयानयकोविदः॥ ४४
इति श्र्रुत्वा त्रपाभारविनम्रतरकन्धरः।
प्रावृत्य वाससा मौलिं प्राविशन्निजमन्दिरम्॥ ४५
'महापतिब्रतामस्य पली प्रोवाच तामथ।
स दीक्षितो यज्ञदत्तः श्रोतकर्मपरायणः॥ ४६
यज्ञदत्त उवाच
दीक्षितायनि कुत्रास्ति धूतो गुणनिधिः सुत: ।
अथ तिष्ठतु किं तेन क्व सा मम शुभोर्मिका॥ ४७
अंगोद्वर्तनकाले या त्वया मेऽङ्गुलितो हता।
सा त्वं रलमयीं शीघ्रं तामानीय प्रयच्छ मे॥ ४८
इति श्रुत्वाथ तद्वाक्यं भीता सा दीक्षितायनी।
प्रोवाच स्नानमध्याह्णी क्रियां निष्पादयंत्यथ॥ ४९
व्यग्रास्ि देवपूजार्थमुपहारादिकर्मणि।
समयोऽयमतिक्रामेदतिथीनां प्रियातिथे ॥ ५०
इदानीमेव पक्वान्नकरणव्यग्रया मया।
स्थापिता भाजने क्वापि विस्मृतेति न वेद्म्यहम्॥ ५१
दीक्षित उवाच
हं हेऽसत्पुत्रजननि नित्यं सत्यप्रभाषिणि।
यदा यदा त्वां सम्पृच्छे तनय: क्व गतस्त्विति॥ ५२
'तदा तदेति त्वं ब्रूयान्नाथेदानीं स निर्गत: ।
अधीत्याध्ययनार्थं च द्वित्रैमित्रे: सयुग्बहिः॥ ५३
कुतस्ते शाटकः पलि मांजिष्ठो यो मयार्पित: ।
लंबते योऽनिशं धाम्नि तथ्यं ब्रूहि भयं त्यज॥ ५४
उसने मात्र मुझको ही यह ऑँगूठी नहीं न. केवलं ममेवैतवंगुलीय॑ समपितम्। | उसने सत्र ुझको ही यह अहं दोहे आज
अन्य जुआरियोंको भी उसने बहुत-सा धन दिया है॥ ४१॥
रत्नोंकी सन्दूक, रेशमी वस्त्र, सोनेकी झारी
आदि वस्तुएँ, अच्छे-अच्छे काँसे और ताँबेके पात्र भी
उसने दिये हैं ॥ ४२॥
जुआरी लोग उसे प्रतिदिन नग्न करके बांधते
रहते हैं। इस भूमण्डलपर उसके समान कोई दूसरा
जुआरी नहीं है। हे विप्र! आजतक आप जुआरियोंमें
अग्रणी और अविनय तथा अनीतिमें प्रवीण अपने
पुत्रको क्यों जान नहीं सके ?॥ ४३-४४॥
ऐसा सुनकर लज्जाके भारसे उस ब्राह्मणका सिर
झुक गया और अपने सिरको वस्त्रसे ढँककर वह
अपने घर चला आया॥ ४५॥
तदनन्तर वह श्रौतकर्मपरायण दीक्षित यज्ञदत्त
अपनी महान् पतिव्रता पत्नीसे कहने लगा- ॥ ४६॥
यज्ञदत्त बोला-हे दीक्षितायनि! धूर्त पुत्र
गुणनिधि कहाँ है, कहीं भी बैठा हो, उससे क्या लाभ
है ? वह मेरी सुन्दर-सी अँगूठी कहाँ है ?॥ ४७॥
तुमने मेरे शरीरमें तैल, उबटन आदि लगानेके
समय मेरी अँगुलीसे जिसको निकाल लिया था, उस
रत्नजटित अँगूठीको लाकर शीघ्र ही मुझे दो ॥ ४८॥
उसके इस वचनको सुनकर वह दीक्षितायनी भयभीत
हो उठी और बोली-इस समय मैं मध्याह्नकालकी
स्नान-क्रियाओंको सम्पन्न कर रही हूँ॥४९॥
देवपूजाके लिये अर्पित की जानेवाली सामग्रियोंको
एकत्रित करनेमें मैं व्याकुल हूँ। हे अतिथिप्रिय! यह
अतिथियोंका समय कहीं अतिक्रमण न कर जाय । इसलिये
मैं भोजन बनानेमें व्यस्त हूँ । मैंने किसी पात्रमें अँगूठीकी
रख दिया है। अभी याद नहीं आ रहा है॥ ५०-५१॥
दीक्षित बोला--अरे दुष्ट पुत्रको उत्पन
कणनवाली ! हे सदा सच बोलनेवाली ! मैने जब-जब तुझसे
यह पूछा कि पुत्र कहाँ गया है ? तब-तब तूने यही कहत
है नाथ! अभी पढ़कर वह अपने दो-तीन मित्रोंके साथ
पुन: पढ़नेके लिये बाहर चला गया है ॥ ५२-५३ | ,
हे पत्नि! तुम्हारी वह मंजीठी रंगकी साड़ी के
है? जिसको मैंने तुम्हें दिया था, जो घरमें रोज टॅग
रहती थी। सच-सच बताओ, डरो मत॥ ५४॥
अ० १८]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२८९
साम्प्रतं नेक्ष्यते सोऽपि भृंगारो मणिमंडितः।
पट्टसूत्रमयी सापि त्रिपटी या मयार्षिता॥ ५५
कव दाक्षिणात्यं तत्कांस्यं गौडी ताप्रघटी क्व सा।
नागदंतमयी सा क्व सुखकोतुकमंचिका॥ ५६
कव सा पर्वतदेशीया चन्द्रकांतिरिवाद्भुता।
दीपकव्यग्रहस्ताग्रालंकृता शालभञ्जिका॥ ५७
किं बहूक्तेन कुलजे तुभ्यं कुप्याम्यहं वृथा।
तदाभ्यवहरिष्येऽहमुपयंस्याम्यहं यदा॥ ५८
अनपत्योऽस्मि तेनाहं दुष्टेन कुलदूषिणा।
उत्तिष्ठानय पाथस्त्वं तस्मै दद्यां तिलांजलिम्॥ ५९
अपुत्रत्वं बरं नृणां कुपुत्रात्कुलपांसनात्।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे नीतिरेषा सनातनी॥ ६०
स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तस्मिनेवाह्नि कस्यचित्
श्रोत्रियस्य सुतां प्राप्य पाणिं जग्राह दीक्षितः ॥ ६
मणिजटित वह सोनेकी झारी भी इस समय नहीं
दिखायी दे रही है और न तो वह रेशमी-त्रिपटी
(दुपट्टा) ही दिखायी दे रही है, जिसको रखनेके
लिये तुम्हें मैंने दिया था॥ ५५॥
दक्षिण देशमें बननेवाला वह कांसेका पात्र और
गौड़ देशमें बननेवाली वह ताँबेकी घटी कहाँ है ? हाथी-
दाँतसे बनी हुई वह सुख देनेवाली मचियाँ कहाँ है ॥ ५६॥
पर्वतीय-क्षेत्रोंमें पायी जानेवाली, चन्द्रकान्त मणिके
समान अद्भुत, हाथमें दीपक लिये वह श्रृंगारयुक्त
शालभंजिका कहाँ है॥ ५७॥
अधिक कहनेसे लाभ ही क्या ? हे कुलजे! मैं
तुझपर व्यर्थ ही क्रोध कर रहा हूँ। अब तो मेरा भोजन
तभी होगा, जब मैं दूसरा विवाह कर लूँगा॥ ५८॥
कुलको दूषित करनेवाले उस दुष्टके रहते हुए
भी अब मैं निःसन्तान हूँ। उठो और जल लाओ। मैं
उसे तिलांजलि देता हूँ॥ ५९॥
कुलको कलंकित करनेवाले कुपुत्रकी अपेक्षा
मनुष्यका पुत्रहीन होना श्रेयस्कर है । कुलकी भलाईके
लिये एकका परित्याग कर देना चाहिये-यह सनातन
नियम है ॥ ६०॥
तदनन्तर उस दीक्षित ब्राह्मणने स्वान करके,
अपनी नित्यःक्रिया सम्पन्न करके उसी दिन किसी
श्रोत्रिय ब्राह्मणकी कन्याको प्राप्त करके उसके साथ
विवाह कर लिया॥ ६१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ्द्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने गुणनिधिचरित्रवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
गुणतिधिचरित्रवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥
—— oe
अधथाष्टादशोऽध्यायः
शिवमन्दिरमें दीपदानके प्रभावसे पापमुक्त होकर गुणनिधिका दूसरे जन्ममें कलिंगदेशका
राजा बनना और फिर शिवभक्तिके कारण कुबेर पदकी प्राप्ति
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा तथा स वृत्तान्त प्राक्तनं स्वं विनिंद्य च।
कांचिददिशं समालोक्य निर्ययौ दीक्षितांगजः॥ ९
कियच्चिरं ततो गत्वा यज्ञदत्तात्मजः स हि।
दुष्टो गुणनिधिस्तस्थौ गतोत्साहो विसर्जित: ॥ २
2223 Shivmahapuranam_Part J_Section_ll_lFront
ब्रह्माजी बोले-उन वृत्तान्तोंको सुनकर
वह दीक्षितपुत्र अपने भाग्यकी निन्दा करके किसी
दिशाको देखकर अपने घरसे चल पड़ा। कुछ
कालतक चलनेके पश्चात् वह यज्ञदत्तपुत्र दुष्ट
गुणनिधि थक जानेके कारण उत्साहहीन होकर
वहीं रुक गया॥ १-२॥
२९०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० आ ८
चिंतामवाप महतीं क्व यामि करवाणि किम्।
जाहमभ्यस्तविद्योऽस्मि न चैवातिधनोऽस्म्यहम्॥
देशांतरे यस्य धनं स सद्यः सुखमेधते।
भयमस्ति धने चौरात्स विघ्नः सर्वतो भवः॥ ४
याजकस्य कुले जन्म कथं मे व्यसनं महत्।
अहो बलीयान्हि विधिर्भावि कर्मानुसंधयेत्॥ ५
भिक्षितुं नाधिगच्छामि न मे परिचितः क्वचित्।
ज च पार्श्वे धनं किञ्जित्किमत्र शरणं भवेत्॥ ६
सदानभ्युदिते भानौ प्रसूर्मे मिष्टभोजनम्।
दद्यादद्यात्र कं याचे न चेह जननी मम॥ ७
ब्रह्मोवाच
इति चिंतयतस्तस्य बहुशस्तत्र नारद।
अतिदीनं तरोर्मूले भानुरस्ताचलं गतः॥ ८
एतस्मिन्नेव समये कश्चिन्माहेशवरो नरः।
सहोपहारानादाय नगराद् बहिरभ्यगात्॥ ९
जानाविधान्महादिव्यान्स्वजनैः परिवारितः ।
समभ्यचितुमीशानं शिवरात्रावुपोषितः॥ १०
शिवालयं प्रविश्याथ स भक्तः शिवसक्तधी: ।
यथोचितं सुचित्तेन पूजयामास शंकरम्॥ ११
पक्वानगंधमाघ्राय यज्ञदत्तात्मजो द्विज:।
पितृत्यक्तो मातृहीनः क्षुधितः स 'तमन्वगात्॥ १२
इदमन्नं मया ग्राह्यं शिवायोपकृतं निशि।
सुप्ते शैवजने दैवात्सर्वस्मिन्विविधं महत् ॥ १३
इत्याशामवलम्ब्याथ द्वारि शम्भोरुपाविशत्।
ददर्श च महापूजां तेन भक्तेन निर्मिताम्॥ १४
विधाय नृत्यगीतादि भक्ताः सुप्ताः क्षणे यदा।
नैवेद्य॑ स तदादातुं भर्गागारं विवेश ह॥ १५
वह बहुत बड़ी चिन्तामें पड़ गया कि अब मै
कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? मैंने विद्याका अभ्यास भी नहीं
किया और न तो मेरे पास अत्यधिक धन ही है ॥३॥
दूसरे देशमें तत्काल सुख तो उसीको प्राप्त होता है
जिसके पास धन रहता है। यद्यपि धन रहनेपर चोरसे भय
होता है, किंतु यह विघ्न सर्वत्र उत्पन्न हो सकता है॥४॥
अरे! याजकके कुलमें जन्म होनेपर भी मुझमें
इतना बड़ा दुर्व्यसन कैसे आ गया! यह आश्चर्य है,
किंतु भाग्य बड़ा बलवान् है, वही मनुष्यके भावी
कर्मका अनुसन्धान करता है॥५॥
मैं भिक्षा माँगनेके लिये नहीं जाता हूँ । मेरा यहाँ
कोई परिचित भी नहीं है और न मेरे पास कुछ धन
ही है। मेरे लिये कोई शरण तो होनी ही चाहिये॥ ६॥
सदैव सूर्योदय होनेके पूर्व ही मेरी माता मुझे
मधुर भोजन देती थीं। आज मैं यहाँ किससे माँग
मेरी माता भी तो यहाँ नहीं हैं ॥७॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! इस प्रकार बहुत-सी
चिन्ता करते हुए वृक्षके नीचे बैठे-बैठे वह अत्यधिक दीन-
हीन हो उठा, इतनेमें सूर्य अस्ताचलको चला गया ॥ ८॥
इसी समय कोई शिवभक्त मनुष्य अनेक प्रकारकी
परम दिव्य पूजा-सामग्रियाँ लेकर शिवरात्रिके दिन
उपवासपूर्वक महेश्वरकी पूजा करनेके लिये अपने
परिवारजनोंके साथ नगरसे बाहर निकला॥ ९-१०॥
शिवजीमें रत चित्तवाले उस भक्तने शिवालयमें
प्रवेश करके सावधान मनसे यथोचित रूपसे शंकरकी
पूजा को। [ भगवान् शिवके लिये लगाये गये नैवेद्यके]
पक्वाननोंकी गन्धको सूँघकर पिताके द्वारा परित्यक्त,
मातृहीन तथा भूखसे व्याकुल यज्ञदत्तका पुत्र वह
ब्राह्मण गुणनिधि उसके पास पहुँचा॥ ११-१२॥
[उसने सोचा कि] ये सभी शिवभक्त जब
राज़िमें सो जायँगे, तब मैं शिवपर चढ़ाये गये इस विविध
नैवेद्यको भाग्यवश प्राप्त करूँगा। ऐसी आशा करके
वह भगवान् शंकरके द्वारपर बैठ गया और उस भक्तके
द्वार की गयी महापूजाको देखने लगा॥ १३-१४॥
भक्तलोग जिस समय [ भगवान् शिवके सामने]
नृत्य-गीत आदि करके सो गये, उसी समय वह नैवेद्यकों
लेनेके लिये भगवान् शिवके मन्दिरमें घुस गया॥ १५ |
2223 Shivmahapuranam Part T Section {]_I_Back
अ० १८]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२९१
दीपं मन्दप्रभं दृष्ट्वा पक्वान्नवीक्षणाय सः।
निजचैलांचलाद्वर्ति कृत्वा दीपं प्रकाश्य च॥ १६
यज्ञदत्तात्मजः सोऽथ शिवनेवेद्यमाद्रात्।
जग्राह सहसा प्रीत्या पक्वान्नं बहुशस्ततः ॥ १७
ततः पक्वान्नमादाय त्वरितं गच्छतो बहिः।
तस्य पादतलाघातात्प्रसुसः कोऽप्यबुध्यत॥ १८
कोऽयं कोऽयं त्वरापन्नो गृह्यतां गृह्मतामसो ।
इति चुक्रोश स जनो गिरा भयमहोच्चया॥ १९
यावद्भयात्समागत्य तावत्स पुररक्षकैः।
पलायमानो निहतः क्षणादंधत्वमागतः॥ २०
अभ्रक्षयच्च नेवेद्यं यज्ञदत्तात्मजो मुने।
शिवानुग्रहतो नूनं भाविपुण्यबलान्न सः॥ २१
मृतो बद्धः समागत्य पाशमुदूरपाणिभिः।
निनीषुभिः संयमनीं याम्यैः स विकटेर्भटैः॥ २२
तावत्पारिषदाः प्राप्ताः किंकिणीजालमालिनः।
दिव्यं व्रिमानमादाय तं नेतुं शूलपाणयः ॥
शिवगणा ऊचुः
मुञ्जतैनं द्विजं याम्या गणाः परमधार्मिकम्।
दण्डयोग्यो न विप्रोऽसौ दग्धः सर्वाघसंचयः॥ २४
इत्याकर्ण्यवचस्ते हि यमराजगणास्ततः।
महादेवगणानाहुर्बभूवुश्चकिता भृशम्॥ २५
शंभोर्गणानथालोक्य भीतेस्तैर्यमकिंकरैः।
अवादि प्रणतैरित्थं दुर्वृत्तोऽयं गणा द्विजः॥ २६
यमगणा ऊचुः
कुलाचारं प्रतीय्यैष पित्रोर्वाक्यपराङ्मुखः।
सत्यशौचपरिभ्रष्ट: सन्ध्यास्तानविवर्जितः ॥ २७
2223 Shivmahapuranam_ Part J_Section_lI_2_Front
[वहाँपर जल रहे] दीपकके प्रकाशको मन्द
देखकर पक्वान्नोंको देखनेके लिये अपने उत्तरीय
वस्त्रको [फाड़ करके] बत्ती बनाकर दीपकको
प्रकाशितकर यज्ञदत्तके उस पुत्रने आदरपूर्वक शिवके
लिये लगाये गये बहुतसे पक्वाननोंके नैवेद्यको एकाएक
सहर्ष उठा लिया॥ १६-१७॥
इसके बाद उस पक्वान्नको लेकर शीघ्र ही
बाहर जाते हुए उसके पैरके आघातसे कोई सोया
हुआ व्यक्ति जग उठा॥ १८॥
शीघ्रता करनेवाला यह कौन है ?, कौन है ? इसे
पकड़ो-इस प्रकार भययुक्त ऊँची वाणीमें वह व्यक्ति
चिल्लाने लगा॥ १९॥
भयवश वह ब्राह्मण जब भाग रहा था, उसी
समय वहाँ पुररक्षकोंने पहुँचकर उसे मारा, जिससे वह
अन्धा होकर तत्काल मर गया॥ २०॥
हे मुने! यज्ञदत्तके उस पुत्रने निश्चित शिवकी
ही कृपासे तैवेद्यको खा लिया था, न कि अपने भावी
पुण्यफलके प्रभावसे॥ २१॥
इसके पश्चात् उस मरे हुए ब्राह्मणको यमलोक
ले जानेके लिये पाश, मुद्गर हाथमें लिये हुए यमके
भयंकर दूत वहाँ आकर उसे बाँधने लगे॥ २२॥
इतनेमें छोटी-छोटी घण्टियोंसे युक्त आभूषण
धारण किये हुए और हाथमें त्रिशूलसे युक्त हो शिवके
पार्षद दिव्य विमान लेकर उसे ले जानेके लिये आ
गये॥ २३॥
शिवगण बोले-हे यमराजके गणो! इस परम
धार्मिक ब्राह्मणको छोड़ दो । यह ब्राह्मण दण्डके योग्य
नहीं है। इसके समस्त पाप भस्म हो चुके हैं ॥ २४॥
इसके अनन्तर शिवपार्षदोंके वचन सुनकर
यमराजके गण आश्चर्यचकित हो गये और महादेवजीके
गणोंसे कहने लगे। शम्भुके गणोंको देखकर डरे हुए
तथा प्रणाम करते हुए यमराजके दूतोंने इस प्रकार कहा
कि हे गणो! यह ब्राह्मण तो दुराचारी था॥ २५-२६॥
-यमगण बोले--कुलकी मर्यादाका उल्लंघन
करके यह माता-पिताकी आज्ञासे पराङ्मुख, सत्य-
शौचसे परिभ्रष्ट और सन्ध्या तथा स्नानसे रहित
था॥ २७॥
२९२
आस्तां दूरेऽस्य कर्माणि शिवनिर्माल्यलंघक: ।
प्रत्यक्षतो5त्र वीक्षध्वमस्पृश्यो5यं भवादृशाम्॥
शिवनिर्माल्यभोक्तारः शिवनिर्माल्यलंघकाः।
शिवनिर्माल्यदातारः स्पर्शस्तेषां ह्ापुण्यकृत्॥ २९
विषमालोक्य वा पेयं श्रेयो वा स्पर्शनं परम्।
सेवितव्यं शिवस्वं न प्राणैः कण्ठगतैरपि॥ ३०
यूयं प्रमाणं धर्मेषु यथा न च तथा वयम्।
अस्ति चेद्धर्मलेशोऽस्य गणास्तं शृणुमो वयम्॥ ३१
इत्थं तद्वाक्यमाकर्ण्य याम्यानां शिवकिंकराः ।
समृत्वा शिवपदाम्भोजं प्रोचुः पारिषदास्तु तान्॥ ३२
शिवकिंकरा ऊचुः
किंकराः शिवधर्मा ये सूक्ष्मास्ते तु भवादृशैः ।
स्थूललक्ष्यैः कथं लक्ष्या लक्ष्या ये सूक्ष्मदृष्टिभि: ॥ ३३
अनेनानेनसा कर्म यत्कृतं श्ृणुतेह ततू।
यज्ञदत्तात्मजेनाथ सावधानतया गणा:॥ ३४
पतन्ती लिंगशिरसि दीपच्छाया निवारिता |
ऽनेन दत्त्वा दीपदशां निशि॥ ३५
अपरोऽपि परो धर्मो जातस्तत्रास्य किंकरा:।
श्रृण्वतः शिवनामानि प्रसंगादपि गृह्यताम्॥ ३६
भक्तेन विधिना पूजा क्रियमाणा निरीक्षिता।
उपोषितेन भूतायामनेन स्थिरचेतसा॥ ३७
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १ oR
यदि इसके अन्य कर्मोको छोड़ भी दिया जाय
तो भी इसने शिवके निर्माल्य [चढ़ाये गये वेच]
का लंघन किया है अर्थात् चोरी की है। [इसके ङ्स
हेय कर्मको] आप सब स्वयं देख लें, आप-जैसे
लोगोंके लिये यह स्पर्शके योग्य भी नहीं है॥ २८॥
जो शिव-निर्माल्यको खानेवाले,
चोरी करनेवाले और शिवनिर्माल्यको देनेबाले डी
उनका स्पर्श अवश्य ही पापकारक होता है ॥ २९॥
विषको जान-बूझकर पी लेना श्रेयस्कर है और
अछूतका स्पर्श कर लेना भी अति उत्तम है, किंतु
कण्ठगत प्राण होनेपर भी शिवनिर्माल्यका सेवन
उचित नहीं है॥ ३०॥
धर्मके विषयमें आप सब जिस प्रकार प्रमाण हैं,
वैसे हमलोग नहीं हैं। हे शिवगण! सुनिये। यदि इसमें
धर्मका लेशमात्र भी हो, तो हम सब उसे सुनना
चाहते हैं॥३१॥
यमके दूतोंकी इस बातको सुनकर शिवके
पार्षद भगवान् शिवके चरणकमलका स्मरण करके
कहने लगे-॥३२॥
शिवके सेवक बोले--हे यमकिंकरो! जो
सूक्ष्म शिवधर्म हैं, जिन्हें सूक्ष्म दृष्टिवाले ही जान
सकते हैं, उन्हें आपसदृश स्थूल दृष्टिवाले कैसे जान
सकते हैं ॥ ३३॥
है यमदूतो! पापरहित इस यज्ञदत्तपुत्रने यहाँपर
जो पुण्य कर्म किया है, उसे सावधान होकर
सुनो-- ॥ ३४॥
इसने शिवलिंगके शिखरपर पड़ रही दीपककी
छायाको दूर किया और अपने उत्तरीय वस्त्रको
फाड़कर उससे दीपककी वर्तिका बनायी और फिर
उससे दीपकको पुनः जलाकर उस रात्रिमें शिवके
लिये प्रकाश किया॥ ३५॥
हे किंकरो! इसने [उस कर्मके अतिरिक्त]
अन्य भी पुण्यकर्म किया है । शिवपूजाके प्रसंगमें इसने
शिवके नामोंका श्रवण किया और स्वयं उनके नामोंकी
उच्चारण भी किया है। भक्तके द्वारा विधिवत् की जा
रही पूजाको इसने उपवास रखकर बड़े ही मनोयोगसे
देखा है॥ ३६-३७॥
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_] I2_Back
अ० १८]
शिवलोकमयं ह्यद्य गंतास्माभिः सहैव तु।
कंचित्कालं महाभोगान्करिष्यति शिवानुग:॥ ३८
'कलिंगराजो भविता ततो निर्धूतकल्मषः।
एष द्विजवरो नूनं शिवप्रियतरो यतः॥ ३९
अन्यत्किंचिन्न वक्तव्यं यूयं यात यथागतम्।
यमदूता: स्वलोकं तु सुप्रसन्नेन चेतसा॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तेषां यमदूता मुनीश्वर।
यथागतं ययुः सर्वे यमलोकं पराङ्मुखाः॥ ४१
सर्व॑ निवेदयामासुः शमनाय गणा मुने।
तद्वृत्तमादितः प्रोक्तं शंभुदूतेश्च धर्मतः ॥ ४२
धर्मराज उवाच
सर्वे शृणुत मद्वाक्यं सावधानतया गणाः।
तदेव प्रीत्या कुरुत मच्छासनपुरःसरम्॥
ये त्रिपुण्डुधरा लोके विभूत्या सितया गणाः।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन॥ ४४
उद्धूलनकरा ये हि विभूत्या सितया गणा: ।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन॥ ४५
शिववेशतया लोके येन केनापि हेतुना।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन॥ ४६
ये रुद्राक्षधरा लोके जटाधारिण एव ये।
ते सर्वे परिहर्तव्या जानेतव्याः कदाचन॥ ४७
उपजीवनहेतोश्च शिववेशधरा हि ये।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन। ४८
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२९३
[अतः इन पुण्योंके प्रभासे] यह आज ही
हमलोगोंके साथ शिबलोकको जायगा। वहाँ शिवका
अनुगामी बनकर यह कुछ समयतक उत्तम भोगोंका
उपभोग करेगा॥ ३८॥
तत्पश्चात् अपने पापरूपी मैलको धोकर यह
कलिंग देशका राजा बनेगा; क्योंकि यह श्रेष्ठ ब्राह्मण
निश्चित ही शिवका प्रिय हो गया है॥ ३९॥
हे यमदूतो! अब इसके विषयमें कुछ
'कहनेकी आवश्यकता नहीं है। तुमलोग जैसे आये
हो, वैसे ही अतिप्रसन्न मनसे अपने लोकको चले
जाओ॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! उनके वाक्यको
सुनकर पराङ्मुख हुए समस्त यमदूत अपने लोकको
लौट गये। हे मुने! गणोंने यमराजसे [गुणनिधिके
उस] सम्पूर्ण वत्तान्तका निबेदन किया और शिवदूतोंने
उनसे जो कहा था, वह समाचार आरम्भसे उन्हें सुना
दिया॥ ४१-४२॥
धर्मराज बोले-हे गणो! तुम सब सावधान
होकर मेरे इस वाक्यको सुनो। जैसा आदेश दे रहा
हूँ, वैसा ही प्रेमपूर्वक तुमलोग करो॥ ४३॥
हे गणो! इस संसारमें जो श्वेत भस्मसे त्रिपुण्ड
धारण करते हैं, उन सभीको छोड़ देना और यहाँपर
कभी मत लाना॥ ४४॥
हे गणो! जो श्वेत भस्मसे शरीरमें उद्धूलन
करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ
कभी मत लाना॥ ४५ ॥
इस संसारमें जिस किसी भी कारणसे जो
शिवका वेष धारण करनेवाले हैं, उन सभी लोगोंको
भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना॥ ४६॥
इस जगतूमें जो रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं या
सिरपर जटा धारण करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़
देना और यहाँ कभी मत लाना॥ ४७॥
जिन लोगोंने जीविकाके निमित्त ही शिवका वेष
धारण किया है, उन सबको भी छोड़ देना और यहाँ
कभी मत लाना॥ ४८॥
२९४
श्रीशिवमहापुराण
[ अठ १८
दम्भेनापि छलेनापि शिववेशधरा हि ये।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्या: कदाचन॥
एवमाज्ञापयामास स यमो निजकिंकरान्।
मत्वा तथेति ते सर्वे तूष्णीमासञ्छुचिस्मिताः ॥ ५०
ब्रह्मोवाच
पार्षदैर्यमदूतेभ्यो मोचितस्त्विति स द्विजः।
शिवलोकं जगामाशु तेर्गणैः शुचिमानस:॥ ५१
तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्संसेव्य च शिवाशिवौ।
अरिंदमस्य तनयः कलिंगाधिपतेरभूत्॥ ५२
दम इत्यभिधानोऽभूच्छिवसेवापरायणः।
बालोऽपि शिशुभिः साकं शिवभक्तिं चकार सः॥ ५३
क्रमाद्राज्यमवापाथ पितर्युपरते युवा।
प्रीत्या प्रवर्तयामास शिवधर्माश्च सर्वशः॥ ५४
जान्यं धर्म स जानाति दुर्दमो भूपतिर्दमः।
शिवालयेषु सर्वेषु दीपदानादृते द्विज॥ ५५
ग्रामाधीशान्समाहूय सर्वान्स विषयस्थितान्।
इत्थमाज्ञापयामास दीपा देयाः शिवालये॥ ५६
अन्यथा सत्यमेवेदं स मे दण्ड्यो भविष्यति।
दीपदानाच्छिवस्तुष्टो भवतीति श्रुतीरितम्॥ ५७
जिन्होंने दम्भ या छल-प्रपंचके कारण हौ
शिवका वेष धारण किया है, उन सबको भी तुमलोग
छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना॥ ४९॥
इस प्रकार उन यमराजने अपने सेवकोंको
दी, [जिसको सुनकर उन लोगोंने कहा कि जैसी
आपकी आज्ञा है] वैसा ही होगा--ऐसा कहकर वे
मन्द-मन्द हँसते हुए चुप हो गये॥ ५०॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार शिवपार्षदोंने यमदूतंसे
उस ब्राह्मणको छुड़ाया और वह पवित्र मनसे युक्त
होकर शीघ्र ही उन शिवगणोंके साथ शिवलोकको
चला गया॥५१॥
वहाँपर सभी सुखभोगोंका उपभोग करके तथा
भगवान् सदाशिव एवं पार्वतीकी सेवा करके वह
[दूसरे जन्ममें] कलिंगदेशके राजा अरिंदमका पुत्र
हुआ॥ ५२॥
उस शिवसेवापरायण बालकका नाम दम हुआ।
बालक होते हुए भी वह अन्य शिशुओंके साथ
शिवकी भक्ति करने लगा॥ ५३॥
क्रमशः उसने युवावस्था प्राप्त की और
पिताके परलोकगमनके पश्चात् उसे राज्य भी प्राप्त
हुआ। उसने प्रेमपूर्वक अनेक शिवधर्मोको प्रारम्भ
किया ॥ ५४॥
हे ब्रह्मन्! दुष्टोंका दमन करनेवाला वह राजा
दम शिवालयोंमें दीपदानके अतिरिक्त अन्य कोई धर्म
नहीं मानता था॥५५॥
उसने सभी ग्राम और जनपदःप्रमुखोंको बुला
करके यह आदेश दिया कि तुमलोगोंको शिवालयोंमें
दीपःप्रज्चालनकी व्यवस्था करनी है॥५६॥
यदि [किसीके क्षेत्रमें] ऐसा नहीं हुआ, तो
यह सत्य है कि [उस क्षेत्रका] वह प्रधान
निश्चित ही मेरे द्वारा दण्ड पायेगा। दीपदानसे
भगवान् शिव सन्तुष्ट होते है--ऐसा श्रुतिं
कहा गया है॥ ५७॥
अ० १८]
यस्य यस्याभितो ग्रामं यावन्तश्च शिवालया: ।
तत्र तत्र सदा दीपो द्योतनीयोऽविचारितम्॥ ५८
ममाज्ञाभंगदोषेण शिरश्छेत्स्याम्यसंशयम्।
इति तद्धयतो दीपा दीप्ता: प्रतिशिवालयम्॥ ५९
अनेनैव स धर्मेण यावज्जीवं दमो नृपः।
धर्मद्धि महतीं प्राप्य कालधर्मवशं गतः॥ ६०
स दीपवासनायोगाद् बहून्दीपान्प्रदीप्य वै।
अलकायाः पतिरभूद्रलदीपशिखाश्रयः॥ ६१
एवं फलति कालेन शिवेऽल्पमपि यत्कृतम्।
इति ज्ञात्वा शिवे कार्य भजनं सुसुखार्थिभिः॥ ६२
कव स दीक्षितदायादः सर्वधर्मारतिः सदा।
शिवालये दैवयोगाद्यातश्चोरयितुं वसु।
स्वार्थदीपदशोद्योतलिंगमौलितमोहरः ॥६
कलिंगविषये राज्यं प्राप्तो धर्मरतिं सदा।
शिवालये समुद्दीप्य दीपाऱ्ग्रागवासनोदयात्॥ ६४
क्वैषा दिक्यालपदवी मुनीश्वर विलोकय।
मनुष्यधर्मिणानेन सांप्रतं येह भुज्यते॥ ६५
इति प्रोक्तं गुणनिधेर्यज्ञदत्तात्मजस्य हि।
_ चरितं शिवसंतोषं शृण्वतां सर्वकामदम्॥ ६६
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२९५
जिसके-जिसके गाँवके चारों ओर जितने भी
शिवालय हों, वहाँ-वहाँ सदैव बिना कोई विचार किये
ही दीपक जलाना चाहिये ॥ ५८॥
अपनी आज्ञाके उल्लंघनके दोषपर मैं निश्चित
ही अपराधीका सिर काट लूँगा। इस प्रकार उस
राजाके भयसे प्रत्येक शिवमन्दिरमें दीपक जलाये
जाने लगे॥ ५९॥
इस प्रकार जीवनपर्यन्त इसी धर्माचरणके पालनसे
राजा दम धर्मकी महान् समृद्धि प्राप्त करके अन्तमें
कालधर्मकी गतिको प्राप्त हुआ॥ ६०॥
अपनी इस दीपवासनाके कारण शिवालयोंमें
बहुत-से दीपक प्रज्वलित करके वह राजा [दूसरे
जन्ममें] रत्नमय दीपकोंकी शिखाओंको आश्रय देनेवाली
अलकापुरीका राजा कुबेर हुआ॥ ६१॥
इस प्रकार भगवान् शंकरकें लिये अल्पमात्र भी
किया गया धार्मिक कृत्य समय आनेपर फल प्रदान
करता है। यह जानकर उत्तम सुख चाहनेवाले
लोगोंको शिवका भजन करना चाहिये॥ ६२॥
कहाँ सभी धर्मोसे सदा ही दूर रहनेवाला
दीक्षितका पुत्र और कहाँ दैवयोगसे धन चुरानेके
लिये शिवमन्दिरमें उसका प्रवेश एवं स्वार्थवश
'दीपककी वर्तिकाको जलाकर शिवलिंगके मस्तकपर
छाये हुए अन्धकारको दूर करनेके लिये किया
गया उसका पुण्य। [जिसके प्रभावसे] उसने
कलिंगदेशका राज्य प्राप्त किया और सदैव धर्में
अनुरक्त रहने लगा। पूर्वजन्मके संस्कारके उदय
होनेके कारण ही शिवालयमें सम्यक् रूपसे मात्र
दीपकको जलाकर उसने यह दिक्पाल कुबेरकी महान्
पदवी प्राप्त कर ली। हे मुनीश्वर! देखिये यह
मनुष्यधर्मा इस समय इस लोकमें रहकर इसका भोग
कर रहा है॥ ६३-६५॥
इस प्रकार यज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिके चरित्रका
बर्णन कर दिया, जो शिवको प्रसन्न करनेवाला है
और जिसको सुननेवालेकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो
जाती हैं॥ ६६॥
२९६ श्रीशिवमहापुराण [अ १९
सर्वदेवशिवेनासौ सखित्वं च यथेयिवान्। गुणनिधिने सर्वदेवमय भगवान् सदाशिवसे जिस
प्रकार मित्रता प्राप्त की, अब मैं उसका वर्णन आपसे
कर रहा हूँ। हे तात! एकाग्रचित्त होकर आप
तदप्येकमना भूत्वा श्ृणु तात ब्रवीमि ते॥ ६७ | सुनें॥ ६७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने कैलासगमनोपाख्याने
गुणनिधिसद्रतिवर्णनं नामाष्टादशोऽ ध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानके अन्तर्गत
कैलासगमन-उपाख्यानमें गुणनिधिसद्गतिवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥
— ७४
अधैकोनविंशोऽध्यायः
कुबेरका काशीपुरीमें आकर तप करना, तपस्यासे प्रसन्न उमासहित भगवान् विश्वनाथका
प्रकट हो उसे दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना, कुबेरद्वारा शिवमैत्री प्राप्त करना
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले-पहलेके पाझकल्पकी बात है,
'पादमे कल्पे मम पुरा ब्रह्मणो मानसात्सुतात्। मुझ ब्रह्माके मानसपुत्र पुलस्त्यसे विश्रवाका जन्म
पुलस्त्याद्विश्रवा जज्ञे तस्य वैश्रवणः सुतः॥ १ | हुआ और विश्रवाके पुत्र वैश्रवण कुबेर हुए॥ १॥
तेनेयमलका भुक्ता पुरी विश्वकृता कृता। क दला अका म वत तती रर
पक री महादेवकी आराधना करके विश्वकर्म|
ह पता पुरा २ बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया॥ २॥
व्यतीते तत्र कल्पे वै प्रवृत्ते मेघवाहने। उस कल्पके व्यतीत हो जानेपर मेघवाहनकल्प
याज्ञदत्तिरसौ श्रीमान्. तपस्तेपे सुदुःसहम्॥ ३ आरम्भ हुआ, उस समय वह यज्ञदत्तका पुत्र [कुबेरके
रूपमें] अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगा॥३॥
भक्तिप्रभावं विज्ञाय शंभोस्तहीपमात्रत: । दीपदानमात्रसे मिलनेवाली शिवभक्तिके प्रभावको
पुरा पुरारे: संप्राप्य काशिकां चित्प्रकाशिकाम्॥ ४ | जानकर शिवकी चित्प्रकाशिका काशिकापुरीमें जाकर
अपने चित्तरूपी रत्नमय दीपकोंसे ग्यारह रुद्रोंको
शिवैकादशमुद्रोध्य चित्तरलप्रदीपकै:। उद्बोधित करके अनन्य भक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो
अनन्यभक्तिस्नेहाढ्यस्तन्मयो ध्याननिश्चल:॥ ५ वह तन्मयतापूर्वक शिवके ध्यानमें मग्न होकर
निश्चलभावसे बैठ गया॥ ४-५ ॥
शिवैक्यं सुमहापात्रं तपोऽग्निपरिबृंहितम्। जो शिवसे एकताका महान् पात्र है, तपरूपी
कामक्रोधमहाविघ्नपतंगाघातवर्जितम् ॥ ६ | अग्निसे बढ़ा हुआ है, काम-क्रोधादि महाविध्नरूपी
पतंगोंके आघातसे शून्य है, प्राणनिरोधरूपी वायुशून्य
प्राणसंरोधनिर्वातं निर्मलं निर्मलेक्षणात्। Se 52088 ह
संस्थाप्य शांभवं लिंगं सद्धावकुसुमा्चितम्॥ ७ पूजित है--ऐसे शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करके वह तबतर्के
तपस्यामें लगा रहा, जबतक उसके शरीरमें केवल अस्थि
तावत्तताप स तपस्त्वगस्थिपरिशेषितम्। और चर्ममात्र ही अवशिष्ट नहीं रह गये। इस प्रकार
यावद् बभूव तद्वर्ष्म वर्षाणामयुतं शतम्॥ ८ | दस हजार वर्षोतक तपस्या की ॥ ६--८ |
अ० १९]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
ततः सह विशालाक्ष्या देवो विश्वेश्वरः स्वयम्।
अलकापतिमालोक्य प्रसन्नेनान्तरात्मना॥ ९
लिंगे मनः समाधाय स्थितं स्थाणुस्वरूपिणम्।
उवाच वरदोऽस्मीति तदाचक्ष्वालकापते॥ १०
उन्मील्य नयने यावत्स पश्यति तपोधन:।
तावदुद्यत्सहस्त्रांशुसहस्त्राधिकतेजसम् ॥११
पुरो ददर्श श्रीकंठं चन्द्रचूडमुमाधवम्।
तत्तेजःपरिभूताक्षितेजाः संमील्य लोचने॥ १२
उवाच देवदेवेशं मनोरथपदातिगम्।
निजाङ्घ्निदर्शने नाथ दृक्सामर्थ्य प्रयच्छ मे॥ १३
अयमेव वरो नाथ यत्त्वं साक्षान्निरीक्ष्यसे।
किमन्येन वरेणेश नमस्ते शशिशेखर॥ १४
इति तद्बचनं श्रुत्वा देवदेव उमापतिः।
ददौ दर्शनसामर्थ्य स्पृष्ट्वा पाणितलेन तम्॥ १५
प्रसार्य नयने पूर्वमुमामेव व्यलोकयत्।
ततोऽसौ याज्ञदत्तिस्तु तत्सामर्थ्यमवाप्य च॥
शंभोः समीपे का योषिदेषा सर्वागसुन्दरी।
अनया किं तपस्तप्तं ममापि तपसोऽधिकम्॥ १७
अहो रूपमहो प्रेम सौभाग्यं श्रीरहो भूशम्।
इत्यवादीदसौ पुत्रो मुहु्मुहुरतीव हि॥ १८
क्रूरदृग्वीक्षते यावत्पुनः पुनरिदं वदत्।
तावत्पुस्फोट तन्नेत्रं वामं 'वामाविलोकनात्॥ १९
अथ देव्यब्रबीहेव॑ किमसौ दुष्टतापसः।
असकृद्दीक्ष्य मां बक्ति वद त्वं मे तपःप्रभाम्॥ २०
२९७
तदनन्तर विशालाक्षी पार्वतीदेवीके साथ भगवान्
विश्वनाथ स्वयं प्रसन्नमनसे अलकापुरीके स्वामीको
देखकर, जो शिवलिंगमें मनको एकाग्र करके ठूँठे
वृक्षकी भाँति स्थिरभावसे बैठे थे, बोले-हें अलकापते!
मैं वर देनेके लिये उद्यत हूँ, तुम अपने मनकी बात
कहो--॥ ९-१०॥
उन तपोनिधिने जब अपने नेत्रोंको खोलकर
देखा, तो उन्हें उदित हो रहे हजार किरणोंवाले हजार
सूर्योसे भी अधिक तेजस्वी श्रीकण्ठ उमावल्लभ
भगवान् चन्द्रशेखर अपने सामने दिखायी दिये। उनके
तेजसे प्रतिहत हुए तेजवाले कुबेर चौंधिया गये और
अपनी आँखोंकों बन्द करके वे मनके लिये अगोचर
देवेश्वर भगवान् शंकरसे कहने लगे कि हे नाथ!
अपने चरणोंको देखनेके लिये मुझे दृष्टिसामर्थ्य प्रदान
करें। हे नाथ! यही वर चाहता हूँ कि मैं आपका साक्षात्
दर्शन प्राप्त कर सकूँ। हे ईश! अन्य वरसे क्या लाभ
है? हे शशिशेखर! आपको प्रणाम है॥ ११--१४॥
उनकी यह बात सुनकर देवाधिदेव उमापतिने
अपनी हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें अपने
दर्शनकी शक्ति प्रदान की॥ १५॥
देखनेकी शक्ति मिल जानेपर यज्ञदत्तके उस
पुत्रने आँखें खोलकर पहले उमाकी ओर ही देखना
आरम्भ किया॥ १६॥
वह मन-ही-मन सोचने लगा, भगवान् शंकरके
समीप यह सर्वांगसुन्दरी स्त्री कौन है ? इसने मेरे तपसे
भी अधिक कौन-सा तप किया है॥ १७॥
यह रूप, यह प्रेम, यह सौभाग्य और यह
असीम शोभा-सभी अद्भुत हैं, वह ब्राह्मणकुमार
बार-बार यही कहने लगा॥ १८॥
बार-बार यही कहता हुआ जब वह क्रूरदृष्टिसे
उनकी ओर देखने लगा, तब पार्वतीके अवलोकनसे
उसकी बाँयीं आँख फूट गयी॥ १९॥
तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेवजीसे कहा--
[हे प्रभो!] यह दुष्ट तपस्वी बार-बार मेरी ओर
देखकर क्या बोल रहा है? आप मेरी तपस्याके
तेजको प्रकट कीजिये॥ २०॥
ऱ्य ९८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १९
असकृद्दक्षिणेनाक्ष्णा पुनर्मामेव पश्यति।
असूयमानो मे रूपप्रेमसोभाग्यसंपद: ॥
इति देवीगिरं श्रुत्वा प्रहस्य प्राह तां प्रभु: ।
उमे त्वदीयः पुत्रोऽयं न च क्रूरेण चक्षुषा॥ २२
सम्पश्यति तपोलक्ष्मीं तव किं त्वधिवर्णयेत्।
इति देवीं समाभाष्य तमीशः पुनरब्रवीत्॥ २३
वरान्ददामि ते वत्स तपसानेन तोषितः।
निधीनामथ नाथस्त्वं गुह्यकानां भवेश्वरः॥ २४
यक्षाणां किन्नराणां च राज्ञां राजा च सुब्रत।
पतिः पुण्यजनानां च सर्वेषां धनदो भव॥ २५
मया सख्यं च ते नित्यं वत्स्यामि च तवान्तिके।
अलकां निकषा मित्र तव प्रीतिविवृद्धये॥ २६
आगच्छ पादयोरस्याः पत ते जननी त्वियम्।
याज्ञदत्ते महाभक्त सुप्रसनेन चेतसा॥ २७
ब्रह्मोवाच
इति दत्त्वा वरान्देवः पुनराह शिवां शिव: ।
प्रसादं कुरु देवेशि तपस्विन्यंगजेऽत्र वै॥ २८
इत्याकर्ण्यं वचः शंभोः पार्वती जगदम्बिका।
अब्रवीद्याज्ञदत्तिं तं सुप्रसन्नेन चेतसा॥ २९
देव्युवाच
वत्स ते निर्मला भक्तिर्भवे भवतु सर्वदा।
भवैकपिंगो नेत्रेण वामेन स्फुटितेन ह॥ ३०
देवेन दत्ता ये तुभ्यं वराः सन्तु तथैव ते।
कुबेरो भव नाम्ना त्वं मम रूपेर्ष्यया सुत॥ ३१
इति दत्त्वा वरान्देवो देव्या सह महेश्वर: ।
धनदायाविवेशाथ धाम वैश्वेशवराभिधम्॥ ३२
यह पुनः अपने दाहिने नेत्रसे बार-बार मुझे देख
रहा है, निश्चित ही यह मेरे रूप, प्रेम और सोन्दर्यकी
सम्पदासे ईर्ष्या करनेवाला है॥ २१॥
देवीकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते
हुए उनसे कहा-हे उमे! यह तुम्हारा पुत्र है, यह
तुम्हें क्रूरदृष्टिसे नहीं देख रहा है, अपितु तुम्हारी
तपःसम्पत्तिका वर्णन कर रहा है॥ २२॥
देवीसे ऐसा कहकर भगवान् शिव पुन: उस
[ब्राह्मणकुमार]-से बोले-हे वत्स! मैं तुम्हारी इस
तपस्यासे सन्तुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूँ । तुम निधियोंके
स्वामी और गुह्यकोंके राजा हो जाओ॥ २३-२४॥
हे सुव्रत! तुम यक्षों, किन्नरों और राजाओंके भी
राजा, पुण्यजनोंके पालक और सबके लिये धनके
दाता हो जाओ॥ २५॥
मेरे साथ सदा तुम्हारी मैत्री बनी रहेगी और
हे मित्र! तुम्हारी प्रीति बढ़ानेके लिये मैं अलकाके
पास ही रहूँगा। नित्य तुम्हारे निकट निवास करूँगा।
हे महाभक्त यज्ञदत्त-कुमार! आओ, इन उमादेवीके
चरणोंमें प्रसन्न मनसे प्रणाम करो, ये तुम्हारी
माता हैं ॥ २६-२७॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार वर
देकर भगवान् शिवने देवी पार्वतीसे पुनः कहा-हे
देवेश्वरि! तपस्विनि ! पुत्रपर कृपा करो। यह तुम्हारा
पुत्र है॥ २८॥
भगवान् शंकरका यह कथन सुनकर जगदम्बा
पार्वती अति प्रसन्नचित्तसे उस यज्ञदत्तकुमारसे कहने
लगीं-॥ २९॥
देवी बोलीं_हे वत्स! भगवान् शिवमें
तुम्हारी सदा निर्मल भक्ति बनी रहे। तुम्हारी बायीं
आँख तो फूट ही गयी। इसलिये एक ही पिंगल नेत्रसे
युक्त रहो। महादेवजीने तुम्हें जो वर दिये हैं, वे सब
उसी रूपमे तुम्हें सुलभ हों। हे पुत्र! मेरे रूपके प्रति
ईर्ष्या करनेके कारण तुम कुबेर नामसे प्रसिद्ध
होओ॥ ३०-३१॥
इस प्रकार कुबेरको वर देकर भगवान् महेश्वर
पार्वती-देवीके साथ अपने वैश्वेशवर नामक
चले गये॥ ३२॥
अ० २०]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
२९९
इत्थं सखित्वं श्रीशंभो: प्रापेष धनदः पुरम्।
इस तरह कुबेरने भगवान् शंकरकी मैत्री प्राप्त
की और अलकापुरीके पास जो कैलास पर्वत है, वह
अलकान्तिकषा चासीत्कैलासः शंकरालयः॥ ३३ | भगवान् शंकरका निवास हो गया॥ ३३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे कैलासगमनो पाख्याने
कुबेरस्य शिवमित्रत्ववर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार औशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें
कैलासगमनोपाख्यानमें कुबेरकी शिवमंत्रीका वर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा सृष्टिखण्डका उपसंहार
ब्रह्मोवाच
नारद त्वं शृणु मुने शिवागमनमुत्तमम्।
कैलासे पर्वतश्रेष्ठे कुबेरस्य तपोबलात्॥ १
निधिपत्ववरं दत्त्वा गत्वा स्वस्थानमुत्तमम्।
विचिन्त्य हृदि विश्वेशः कुबेरवरदायकः॥ २
विध्यङ्गजस्स्वरूपो मे पूर्णः प्रलयकार्यकृत्।
तद्रूपेण गमिष्यामि कैलासं गुह्यकालयम्॥ ३
रुद्रो हृदयजो मे हि पूर्णाशो ब्रह्म निष्कलः।
हरिब्रह्मादिभिः सेव्यो मदभिन्नो निरञ्जनः॥ ४
तत्स्वरूपेण तत्रैव सुहद्धृत्वा विलास्यहम्।
कुबेरस्य च वत्स्यामि करिष्यामि तपो महत्॥ ५
इति सञ्चिन्त्य रूद्रोऽसौ शिवेच्छां गन्तुमुत्सुकः ।
जनाद तत्र ढक्कां स्वां सुगतिं नादरूपिणीम्॥ ६
त्रैलोक्यामानशे तस्या ध्वनिरुत्साहकारकः।
आह्वानगतिसंयुक्तो विचित्रः सान्द्रशब्दकः॥ ७
तच्छुत्वा विष्णुब्रह्मद्याः सुराश्च मुनयस्तथा।
आगमा निगमा मूर्ताः सिद्धा जग्मुश्च तत्र वै॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! हे मुने! कुबेरके
तपोबलसे भगवान् शिवका जिस प्रकार पर्वतश्रेष्ठ
कैलासपर शुभागमन हुआ, वह प्रसंग सुनिये॥ १॥
कुबेरको वर देनेवाले विश्वेश्वर शिव जब उन्हे
निधिपति होनेका वर देकर अपने उत्तम स्थानको चले
गये, तब उन्होंने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया ॥ २॥
ब्रह्माजीके ललाटसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है
तथा जो प्रलयका कार्य सँभालते हैं, वे रुद्र मेरे पूर्ण
स्वरूप हैं। अतः उन्हींके रूपमें मैं गुह्यकोंके निवासस्थान
कैलास पर्वतपर जाऊँगा॥ ३॥
रद्र मेरे हृदयसे ही प्रकट हुए हैं। वे पूर्णावतार
निष्कल, निरंजन, ब्रह्म हैं और मुझसे अभिन्न हैं। हरि,
ब्रह्मा आदि देव उनकी सेवा किया करते हैं॥ ४॥
उन्हींके रूपमें मैं कुबेरका मित्र बनकर उसी
पर्वतपर विलासपूर्वक रहूँगा और महान् तपस्या
करूँगा॥ ५॥
शिवकी इस इच्छाका चिन्तन करके उन रुद्रदेवने
कैलास जानेके लिये उत्सुक हो उत्तम गति देनेवाले
नादस्वरूप अपने डमरूको नजाया॥ ६॥
उसकी उत्साहवर्धक ध्वनि तीनों लोकोंमें व्याप्त
हो गयी। उसका विचित्र एवं गम्भीर शब्द आह्यानकी
गतिसे युक्त था अर्थात्, सुननेवालोंको अपने पास
आनेके लिये प्रेरणा दे रहा था॥७॥
उस ध्वनिको सुनकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी
देवता, ऋषि, मूर्तिमान् आगम, निगम तथा सिद्ध वहाँ
आ पहुँचे॥ ८॥
जर ००
सुरासुराद्याः सकलास्तत्र जग्मुश्च सोत्सवा:।
सर्वेऽपि प्रमथा जग्मुर्यत्र कुत्रापि संस्थिता: ॥
गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः।
तेषां सङ्ख्यामहं वच्मि सावधानतया श्रृणु॥ १०
अभ्ययाच्छङ्ककर्णश्च गणकोट्या गणेशवरः।
दशभिः केकराक्षश्च विकृतोऽष्टाभिरेव च॥ ११
चतुःषष्ट्या विशाखश्च नवभिः पारियात्रकः।
षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान्दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च॥ १२
जालंको हि द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुंगबः ।
सप्तभिः समदः श्रीमाँस्तथैव विकृताननः॥ १३
पंचभिश्च कपाली हि षड्भिः सन्दारकः शुभः।
कोटिकोटिभिरेवेह कण्डुकः कुण्डकस्तथा॥ १४
विष्टंभोऽष्टाभिरगमदष्टभिश्चन्द्रतापनः ॥ १५
महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः॥ १६
कुण्डी द्वादशभिर्वाहस्तथा पर्वतकः शुभः।
कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै॥ १७
अग्निकः शतकोट्या वै कोट्याभिमुख एव च।
आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः ॥ १८
सन्नाहश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा।
अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमनत्रकः॥ १९
'काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः।
्रीशिवमहापुराण
[अ २०
देवता और असुर सब लोग बड़े उत्साहे
भरकर वहाँ आये। भगवान् शिवके समस्त
जहाँ-कहीं भी थे, वहाँसे उस स्थानपर पहुँचे॥ ९॥
सर्वलोकवन्दित महाभाग समस्त गणपाल भी
उस स्थानपर जानेके लिये उद्यत हो गये। उनकी मै
संख्या बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये॥ १०॥
शङ्ककर्ण नामका गणेश्वर एक करोड़ गणोंके
साथ, केकराक्ष दस करोड़ और विकृत आठ करोड़
गणोंके साथ जानेके लिये एकत्रित हुआ॥ ११॥
विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारियात्रक
नौ करोड़ गणोंके साथ, सर्वान्तक छः करोड़ गणोंके
साथ और श्रीमान् दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ
वहाँ चलनेके लिये तैयार हो गया॥ १२॥
गणश्रेष्ठ जालंक बारह करोड़ गणोंके साथ,
समद सात करोड़ गणोंके साथ और श्रीमान् विकृतानन
भी उतने गणोंके साथ जानेके लिये तैयार हुए॥ १३॥
कपाली पाँच करोड़ गणोंके साथ, मंगलकारी
सन्दार अपने छः करोड़ गणोंके साथ और कण्डुक
तथा कुण्डक नामके गणेश्वर भी एक-एक करोड़
गणोंके साथ गये॥ १४॥
विष्टम्भ और चन्द्रतापन नामक गणाध्यक्ष भी
अपने-अपने आठ-आठ करोड़ गणोंके साथ कैलास
चलनेके लिये वहाँपर आ गये॥ १५॥
एक हजार करोड़ गणोंसे घिरा हुआ महाकेश
नामक गणपति भी वहाँ आ पहुँचा॥ १६॥
कुण्डी बारह करोड़ गणोंके साथ और वाह, श्रीमान्
पर्वतक, काल, कालक एवं महाकाल नामके गणेश्वर
सौ करोड़ गणोंके साथ वहाँ पहुँचे ॥ १७॥
अग्निक सौ करोड़, अभिमुख एक करोड़
आदित्यमूर्धा तथा धनावह भी एक-एक करोड़
गणोंके साथ वहाँ आये॥ १८॥
सन्नाह तथा कुमुद सौ-सौ करोड़ गणोंके साथ
और अमोघ, कोकिल एवं सुमन्त्रक एक-एक करोड
गणोंके साथ आ गये॥ १९॥
काकपाद नामका एक दूसरा गण साठ करोड
और सन्तानक नामका गणेश्वर भी साठ करोड
गणोंको साथ लेकर चलनेके लिये वहाँ आया।
अ० २०]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
३०९
महाबलश्च नवभिर्मधुपिंगशश््च पिंगल:॥ २०
नीलो नवत्या देवेशं पूर्णभद्रस्तथैव च।
कोटीनां चैव सप्तानां चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥ २१
'कोटिकोटिसहस्त्राणां शतैर्विशतिभिर्वृतः।
तत्राजगाम सर्वेशः कैलासगमनाय वै॥ २२
काष्ठागूढश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा।
कोटिभिः सप्तभिश्चैत्रो नकुलीशस्स्वयं प्रभुः॥ २३
लोकान्तकश्च दीस्तात्मा तथा दैत्यान्तकः प्रभुः ।
देवो भृंगी रिटिः श्रीमान्देवदेवप्रियस्तथा॥ २४
अशनिर्भानुकश्चैव चतुःषष्ट्या सनातनः।
नन्दीश्वरो गणाधीशः शतकोट्या महाबलः॥ २५
एते चान्ये च गणपा असंख्याता महाबलाः।
सर्वे सहस्त्रहस्ताशच जटामुकुटधारिणः ॥ २६
सर्वे चन्द्रावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः।
हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलंकृताः ॥
ब्रहोन्द्वविष्णुसंकाशा अणिमादिगणेर्वृता:।
सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजम्मुर्गणेश्वराः ॥ २८
एते गणाधिपाश्चान्ये महात्मानोऽमलप्रभाः।
जगपुस्तत्र महाप्रीत्या शिवदर्शनलालसाः॥ २९
गत्वा तत्र शिवं दृष्ट्वा नत्वा चक्रुः परां नुतिम्।
सर्वे साञ्जलयो विष्णुप्रमुखा नतमस्तका:॥ ३०
महाबल, मधुपिंग तथा पिंगल नामक गणेश्वर नौ-नौ
करोड़ गणोंके सहित वहाँ उपस्थित हुए॥ २०॥
नील एवं पूर्णभद्र नामक गणेश्वर भी नब्बे-नब्बे
करोड़ गणोंके साथ वहाँ आये। महाशक्तिशाली
चतुर्वक्त्र नामका गणेश्वर सात करोड़ गणोंसे घिरा
हुआ कैलास जानेके लिये वहाँ आ पहुँचा॥ २१॥
एक सौ बीस हजार करोड़ गणोंसे आवृतं होकर
सर्वेश नामका गणेश्वर भी कैलास चलनेके लिये वहाँ
आया॥ २२॥
काष्ठागूढ, सुकेश तथा वृषभ नामक गणपति
चौंसठ करोड़, चैत्र और स्वामी नकुलीश स्वयं सात
करोड़ गणोंके साथ कैलासगमनके लिये आये॥ २३॥
लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक, प्रभु, देव,
भंगी, श्रीमान् देवदेवप्रिय, रिटि, अशनि, भानुक तथा
सनातन नामके गणपति चौंसठ-चौंसठ करोड़ गणोंके
साथ वहाँपर उपस्थित हुए। नन्दीश्वर नामके महाबलवान्
गणाधीश सौ करोड़ गणोंके सहित कैलास चलनेके
लिये वहाँ आ पहुँचे॥ २४-२५॥
इन गणाधिपोंके अतिरिक्त अन्य बहुत-से असंख्य
शक्तिशाली गणेश्वर वहाँ कैलास चलनेके लिये
आये। वे सब हजार भुजाओंवाले थे तथा जरा, मुकुट
धारण किये हुए थे॥ २६॥
सभी गण चन्द्रमाके आभूषणसे शोभायमान थे,
सभीके कण्ठ नीलवर्णके थे और वे तीन-तीन नेत्रोंसे
युक्त थे। सभी हार, कुण्डल, केयूर तथा मुकुट आदि
आभूषणोंसे अलंकृत थे॥ २७॥
ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णुके समान अणिमादि अष्ट
महासिद्धियोसे युक्त, करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान
सभी गणेश्वर बहाँपर आ गये॥ २८॥
इन गणाध्यक्षोंके अतिरिक्त निर्मल प्रभामण्डलसे
युक्त, महान् आत्मावाले तथा भगवान् शिवके दर्शनकी
लालसासे परिपूर्ण अन्य अनेक गणाधिप अत्यन्त
प्रसन्तताके साथ वहाँपर जा पहुँचे॥ २९॥
विष्णु आदि प्रमुख समस्त देवता वहाँ जाकर
भगवान् सदाशिवको देखकर हाथ जोड़कर नतमस्तक
होकर उनकी उत्तम स्तुति करने लगे॥ ३०॥
र ०२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २७
इति विष्णवादिभिः सार्ध महेशः परमेश्वर: ।
कैलासमगमत्प्रीत्या कुबेरस्य महात्मन: ॥
कुबेरोऽप्यागतं शंभुं पूजयामास सादरम्।
भक्त्या नानोपहारैश्र परिवारसमन्वितः॥ ३२
ततो विष्णवादिकान्देवानाणांश्चान्यानपि श्रुवम्।
शिवानुगान्समानर्च शिवतोषणहेतवे॥ ३३
अथ शम्भुः समालिंग्य कुबेरं प्रीतमानसः।
मूर्ध्नि चाघ्राय संतस्थावलकां निकषाखिलैः॥ ३४
शशास विश्वकर्माणं निर्माणार्थ गिरौ प्रभुः ।
नानाभक्तनिवासाय स्वपरेषां यथोचितम्॥ ३५
विश्वकर्मा ततो गत्वा तत्र नानाविधां मुने।
रचनां रचयामास द्रुतं शम्भोरनुज्ञया॥ ३६
अथ शम्भुः प्रमुदितो हरिप्रार्थनया तदा॥ ३७
कुबेरानुग्रहं कृत्वा ययौ कैलासपर्वतम्।
सुमुहूर्ते प्रविश्यासौ स्वस्थानं परमेश्वरः॥ ३८
अकरोदखिलाऱ्प्रीत्या सनाथान्भक्तवत्सलः।
अथ सर्वे प्रमुदिता विष्णुप्रभृतयः सुरा: ।
मुनयश्चापरे सिद्धा अभ्यषिञ्चन्मुदा शिवम्॥ ३९
समानर्चुः क्रमात्सवे नानोपायनपाणयः।
नीराजनं समाकार्षुरमहोत्सवपुरःसरम्॥ ४०
मुने।
सुप्रीता ननृतुस्तत्राप्सरसो गानतत्पराः॥ ४१
जयशब्दो नमः शब्दस्तत्रासीत्सर्वसंस्कृतः।
तदोत्साहो महानासीत्सर्वेषां सुखवर्धन: ॥ ४२
स्थित्वा सिंहासने शंभुर्विरराजाधिकं तदा।
सँ: संसेवितोऽभीक्षणं विष्णवाद्यश्च यथोचितम्॥ ४३
इस प्रकार विष्णु आदि देवताओंके साथ परमेश
भगवान् महेश महात्मा कुबेरके प्रेमसे वशीभूत हो
कैलासको चले गये॥ ३१॥
कुबेरने भी सपरिवार भक्तिपूर्वक नाना प्रकारके
उपहारोंसे वहाँ आये हुए भगवान् शम्भुकी सादर पूजा
की॥ ३२॥ j
तत्पश्चात् उसने शिवको सन्तुष्ट करनेके लिये
उनका अनुगमन करनेवाले विष्णु आदि देवताओं और
अन्यान्य गणेशवरोंका भी विधिवत् पूजन किया॥ ३३॥
[इसके बाद उसकी सेवाको देखकर] अति
प्रसन्नचित्त भगवान् शम्भु कुबेरका आलिंगनकर और
उसका सिर सूँघकर अलकापुरीके अति निकट ही
अपने समस्त अनुगामियोंके साथ ठहर गये ॥ ३४॥
तदनन्तर भगवान् शिवने विश्वकर्माको अपने तथा
दूसरे देवताओंके भक्तोंके लिये उस पर्वतपर निवासहेतु
यथोचित निर्माणकार्य करनेकी आज्ञा दी ॥ ३५॥
हे मुने! विश्वकर्मने शिवकी आज्ञासे वहाँ
जाकर यथाशीघ्र ही नाना प्रकारकी रचना की ॥ ३६॥
उस समय विष्णुको प्रार्थनासे शिव प्रसन्न हो
उठे और कुबेरपर अनुग्रह करके वे कैलासपर्वतपर
चले गये। शुभ मुहूर्तमें अपने निवासस्थानमें प्रवेशकर
भक्तवत्सल उन परमेश्वरने अपने प्रेमसे सबको सनाथ
कर दिया। सभी प्रमुदित विष्णु आदि देवता, मुनिगण
और अन्य सिद्धजनोंने मिलकर प्रेमपूर्वक सदाशिवका
अभिषेक किया ॥ ३७-३९ ॥
हाथोंमें नाना प्रकारके उपहार लेकर सबने
क्रमशः उनका पूजन किया और बहुत महोत्सवके
साथ [सामने खड़े होकर] उनकी आरती उतारी ॥ ४०॥
हे मुने! उस समय [आकाशसे] मंगलसूचर्क
पुष्पवृष्टि होने लगी और अत्यन्त प्रसन्न होकर गान
करती हुई अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ४१॥
सब ओर जय-जयकार और नमस्कारके सुसंस्कृत
शब्द गूँजने लगे। उस समय चारों ओर एक महा.
उत्साह व्याप्त था, जो सबके सुखको बढ़ा रहा था॥ ४२॥
उस समय सिंहासनपर बैठकर भगवान् सदाशिव
अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे और बिष्णु आदि सभी
लोग बार-बार उनकी यथोचित सेवा कर रहे थे॥ ४३॥
अ० २०]
रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड )
३०३
अथ सर्वे सुराद्याश्च तुष्टुवुस्तं पृथक्पृथक् ।
अर्थ्याभिर्वाग्भिरिष्टाभिः शंकरं लोकशंकरम् ॥ ४४
प्रसनात्मा स्तुतिं श्रुत्वा तेषां कामान्ददौ शिव: ।
मनोभिलषितान्प्रीत्या वरान्सर्वेश्वरः प्रभुः॥ ४५
शिवाज्ञयाथ ते सर्वे स्वं स्वं धाम ययुर्मुने।
प्राप्तकामाः प्रमुदिता अहं च विष्णुना सह॥ ४६
उपवेश्यासने विष्णुं मां च शम्भुरुवाच ह।
बहु सम्बोध्य सुप्रीत्यानुगृह्ण परमेश्वर: ॥ ४७
शिव उवाच
हे हरे हे विधे तातौ युवां प्रियतरौ मम।
सुरोत्तमौ त्रिजगतोऽवनसर्गकरौ सदा॥ ४८
गच्छतं निर्भयं नित्यं स्वस्थानं च मदाज्ञया।
सुखप्रदाताहं वै वां विशेषात्प्रक्षकः सदा॥ ४९
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोः सुप्रणम्य तदाञ्ञया।
अहं हरिश्च स्वं धामागमाव प्रीतमानसौ॥ ५०
तदानीमेव सुप्रीतः शंकरो निधिपं मुदा।
उपवेश्य गृहीत्वा तं कर आह शुभं वचः॥
तब प्रेम्णा वशीभूतो मित्रतामगमं सखे।
स्वस्थानं गच्छ विभयः सहायोऽहं सदानघ॥ ५२
इत्याकर्ण्य बच: शम्भोः कुबेरः प्रीतमानसः।
तदाज्ञया स्वकं धाम जगाम प्रमुदान्वितः॥ ५३
स उवास गिरौ शम्भुः कैलासे पर्वतोत्तमे।
सगणो योगनिरतः स्वच्छन्दो ध्यानतत्परः ॥ ५४
सभी देवताओंने पृथक्-पृथक् रूपमें अर्थभरी
वाणी और अभीष्ट वस्तुआँसे लोकमंगलकारी भगवान्
शंकरका स्तवन-वन्दन किया॥ ४४॥
प्रसन्नचित्त सर्वेश्वर स्वामी सदाशिवने उनकी
स्तुतिको सुनकर प्रेमपूर्वक उन्हें मनोवांछित वर
दिये॥ ४५॥
[हे मुने!] अभीष्ट कामनाओंसे परिपूर्ण,
प्रसन्नचित्त वे सभी [देव, मुनि और सिद्धजन]
भगवान् शिवकी आज्ञासे अपने-अपने धामको चले
गये। मैं भी विष्णुके साथ प्रसन्नतापूर्वक चलतेके
लिये उद्यत हुआ॥ ४६॥
तब श्रीविष्णु और मुझको आसनपर बैठाकर
परमेश्वर शम्भु बड़े प्रेमसे बहुत समझाकर अनुग्रह
करके कहने लगे ॥ ४७॥
शिवजी बोले-हे हरे! हे विधे! हे तात!
सदैव तीनों लोकोंका सृजन और संरक्षण करनेवाले हे
सुरश्रेष्ठ! आप दोनों मुझे अत्यन्त प्रिय हँ ॥ ४८॥
अब आप दोनों भी निर्भय होकर मेरी आज्ञासे
अपने-अपने स्थानको जायँ। मैं सदा आप दोनोंको
सुख प्रदान करनेवाला हूँ और विशेष रूपसे आप
दोनोंके सुख-दुःखको देखता ही रहता हूँ.॥४९॥
भगवान् सदाशिवके वचनको सुनकर मैं और
विष्णु दोनों प्रेमपूर्वक प्रणाम करके प्रसन्नचित्त होकर
उनकी आज्ञासे अपने-अपने धामको लौट आये॥ ५०॥
उसी समय प्रसन्नचित्त भगवान् शंकर निधिपति
कुबेरका भी हाथ पकड्कर उन्हें अपने पास बैठाकर
यह शुभ वाक्य कहने लगे- ॥५१॥
हे मित्र! तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर मैं
तुम्हारा मित्र बन गया हूँ। हे पुण्यात्मन्। भयरहित
होकर तुम अपने स्थानको जाओ; मैं सदा तुम्हारा
सहायक हूँ॥ ५२॥
भगवान् शम्भुके इस वचनको सुनकर प्रसन्नचित्त
कुबेर उनकी आज्ञासे प्रसलतापूर्वक अपने धामको
चले गये॥ ५३॥
-योगपरायण, सब प्रकारसे स्वच्छन्द तथा सदा
ध्यानमग्न रहनेवाले भगवान् शिव अपने गणोंके साथ
उस पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर निवास करने लगे ॥ ५४॥
हि °
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २०
क्वचिद्दध्यो स्वमात्मानं क्वचिद्योगरतोऽभवत्।
इतिहासं गणास्प्रीत्यावादीत्स्वच्छन्दमानसः ॥ ५५
क्वचित्कैलासकु धरसुस्थानेषु महेश्वर: ।
विजहार गणे: प्रीत्या विविधेषु विहारवित्॥ ५६
इत्थं रुद्रस्वरूपोऽसौ शंकरः परमेश्वरः।
अकाषीत्स्वगिरौ लीला नाना योगिवरोऽपि यः ॥ ५७
नीत्वा कालं कियन्तं सोऽपलीकः परमेश्वर: ।
पश्चादवाप स्वां पल्लीं दक्षपलीसमुद्भवाम्॥ ५८
विजहार तया सत्या दक्षपुत्र्या महेश्वर: ।
सुखी बभूब देवर्षे लोकाचारपरायणः॥ ५९
इत्थं रुद्रावतारस्ते वर्णितोऽयं मुनीश्वर।
कैलासागमनं चास्य सखित्वं निधिपस्य हि॥ ६०
तदन्तर्गतलीलापि वर्णिता ज्ञानवर्धिनी।
इहामुत्र च या नित्यं सर्वकामफलप्रदा ॥ ६१
इमां कथां पठेद्यस्तु शृणुयाद्वा समाहितः।
इह भुक्तिं समासाद्य लभेन्मुक्तिं परत्र सः॥ ६२
कभी वे अपने ही आत्मस्वरूप ब्रह्मका
करते थे। कभी योगमें तल्लीन रहते थे, कभी
स्वच्छन्द मनसे प्रेमपूर्वक अपने गणोंको इतिहास
सुनाते थे और कभी विहार करनेमें चतुर भगवान्
महेश्वर अपने गणोंके साथ कैलास पर्वतकी रेढो.
मेढी, ऊबड़-खाबड़ गुफाओं तथा कन्दराओमें और
अनेक सुरम्य स्थानोंपर प्रसन्नचित्त होकर विचरण
करते थे॥ ५५-५६॥
इस प्रकार रुद्र-स्वरूप परमेश्वर भगवान् शंकर
जो नाना प्रकारके योगियोंमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं, उन्होंने
अपने उस पर्वतपर अनेक लीलाएँ कीं ॥ ५७॥
इस प्रकार बिना पत्नीके रहते हुए परमेश्वर
सदाशिवने अपना कुछ समय व्यतीत करके बादमें
दक्षपत्लीसे उत्पन्न सतीको पत्नीके रूपमें प्राप्त
किया॥५८॥
तदनन्तर हे देवर्षे! वे महेश्वर उन दक्षपुत्री
सतीके साथ विहार करने लगे। इस प्रकार [सतीके
साथ पतिरूपमें] लोकाचारपरायण रहते हुए वे बहुत
ही सुखी थे॥५९॥
हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने आपको रुद्रके
अवतारका वर्णन कर दिया है। मैंने उनके कैलास-
आगमन और कुबेरके साथ उनकी मित्रताका प्रसंग
भी कह दिया है। कैलासके अन्तर्गत होनेवाली
उनकी ज्ञानवरधिनी लीलाका भी वर्णन कर दिया है,
जो इस लोक और परलोकमें सदैव सभी मनोवांछित
फलोंको प्रदान करनेवाली है ॥ ६०-६१॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस कथाको सम्यक्
रूपसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह इस लोकमें सुख
भोगकर परलोकमें मुक्ति प्राप्त करता है॥ ६२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने
कैलासोपाख्याने शिवस्य कैलासगमनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि-उपाख्यानके
कैलासोपाख्यानमें
नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥'
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॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां
प्रथमः सृष्टिखण्डः समाप्तः ॥
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम:॥
श्रीशिवमहापुराण >
द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीयः सतीखण्डः
अथ प्रथमोऽध्यायः
सतीचरित्रवर्णन, दक्षयज्ञविध्वंसका संक्षिप्त वृत्तान्त तथा
सतीका पार्वतीरूपमें हिमालयके यहाँ जन्म लेना
नारद उवाच
विधे सर्व विजानासि कृपया शङ्करस्य च।
त्वयाद्भुता हिं कथिताः कथा मे शिवयोः शुभाः ॥
त्वन्मुखाम्भोजसंवृत्तां श्रुत्वा शिवकथां पराम्।
अतृप्तो हि पुनस्तां वै श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
पूर्णाशः शङ्करस्यैव यो रुद्रो वर्णितः पुरा।
विधे त्वया महेशानः कैलासनिलयो वशी॥
स योगी सर्वविष्णवादिसुरसेव्यः सतां गतिः।
निर्न्द्रः क्रीडति सदा निर्विकारो महाप्रभुः ॥
सोऽभूत्पुनरगृंहस्थश्च विवाह्य परमां स्त्रियम्।
हरिप्रार्थनया प्रीत्या मङ्गलां सुतपस्विनीम्॥
प्रथमं दक्षपुत्री सा पश्चात्सा पर्वतात्मजा।
कथमेकशरीरेण द्रयोरप्यात्मजा मता॥
कथं सती पार्वती सा पुनः शिवमुपागता।
एतत्सर्वं तथान्यच्च ब्रह्मन् गदितुमर्हसि॥
सूत उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरषेः शंकरात्मनः।
प्रसन्नमानसो भूत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत्॥
नारदजी बोले-हे विधे! भगवान् शंकरकी
कृपासे आप सब कुछ जानते हैं। आपने शिव और
| बहुत ही अद्भुत तथा मंगलकारी कथाएँ
कही हैं ॥ १॥
आपके मुखारविन्दसे निकली हुई शम्भुकी श्रेष्ठ
कथाको सुनकर मैं अतृप्त ही हूँ, हे प्रभो! मैं उसे पुनः
सुनना चाहता हूँ॥ २॥
हे विधे। पहले आपने शंकरके पूर्णांश
महेशान, कैलासवासी तथा जितेन्द्रिय जिन रुद्रका
वर्णन किया, वे योगी जितेन्द्रिय विष्णु आदि
सभी देवताओंसे सेवाके योग्य, संतोंकी परम गति,
निर्विकार महाप्रभु निर्द्व होकर सदैव क्रीड़ा करते
रहते थे॥ ३-४॥
विष्णुकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर वे मंगलमयी
परमतपस्विनी तथा श्रेष्ठ स्त्रीसे विवाह करके गृहस्थ
बन गयें॥ ५॥
सर्वप्रथम वे [शिवा] दक्षपुत्री हुई और तत्पश्चात्
पर्वतराज हिमालयकी कन्या पार्वतीके रूपमें उन्होंने
जन्म लिया। एक ही शरीरसे वे दोनोंकी कन्या किस
प्रकारसे मानी गयीं ?॥ ६॥
वे सती पुनः पार्वती होकर शिवको कैसे प्राप्त
हुई? हे ब्रह्मन्! यह सब तथा अन्य बातोंको भी आप
कृपा करके बतायें॥ ७॥
सूतजी बोले-शिवभक्त देवर्षि नारदके इस
वचनको सुनकर मनसे [अत्यन्त] प्रसन्न होकर
ब्रह्माजी कहने लगे-॥८॥
च ०६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० १
ब्रह्मोवाच
श्रृणु तात मुनिश्रेष्ठ कथयामि कथां शुभाम्।
यां श्रुत्वा सफलं जन्म भविष्यति न संशयः॥
पुराहं स्वसुतां दृष्ट्वा सम्ध्याह्नां तनयैः सह।
अभवं विकृतस्तात कामबाणप्रपीडितः॥ १०
धर्मः स्मृतस्तदा रुद्रो महायोगी परः प्रभुः।
धिक्कृत्य मां सुतैस्तात स्वस्थानं गतवानयम्॥ १९
यन्मायामोहितश्चाहं वेदवक्ता च मूढधी: ।
तेनाकार्ष सहाकार्य परमेशेन शंभुना॥ १२
तदीर्षयाहमाकार्ष बहूपायान्सुतैः सह।
कर्तु तन्मोहनं मूढः शिवमायाविमोहितः॥ १३
अभवंस्तेऽथ वै सर्वे तस्मिन् शंभौ परप्रभौ।
उपाया निष्फलास्तेषां मम चापि मुनीश्वर॥ १४
तदास्मरं रमेशानं व्यर्थोपायः सुतैः सह।
अबोधयत्स आगत्य शिवभक्तिरतः सुधीः ॥ १५
प्रबोधितो रमेशेन शिवतत्त्वप्रदर्शिना।
तदीर्षामत्यजं सोऽहं तं हठं न विमोहितः ॥ १६
शक्तिं संसेव्य तत्प्रीत्योत्पादयामास तां तदा।
दक्षादसिक्ऱ्यां वीरिण्यां स्वपुत्राद्धरमोहने॥ १७
सोमा भूत्वा दक्षसुता तपः कृत्वा तु दुःसहम्।
रुद्रपल्यभवद्भक्त्या स्वभक्तहितकारिणी॥ १८
सोमो रुद्रो गृही भूत्वाकार्षील्लीलां परां प्रभुः।
मोहयित्वाथ मां तत्र स्वविवाहेऽविकारधी: ॥ १९
ब्रह्माजी बोले--हे तात! उ होव, | ` बहाजी योले--हे तात! हे मुनि! २
अब मैं शिवकी मंगलकारिणी कथा कह रहा ई
जिसको सुनकर जन्म सफल हो जाता है, इसमें संशय
नहीं है॥ ९॥
हे तात! पुराने समयकी बात है--अपनी सम्ध्या
नामक पुत्रीको देखकर पुत्रोंसहित मैं कामदेवके
बाणोंसे पीड़ित होकर विकारग्रस्त हो गया॥ १०॥
हे तात! उस समय धर्मके द्वारा स्मरण किये गये
महायोगी और महाप्रभु रुद्र पुत्रोंसहित मुझे धिवकारकर
अपने घर चले गये॥ ११॥
जिनकी मायासे मोहित हुआ मैं वेदवक्ता होनेपर
भी मूढ़ बुद्धिवाला हो गया, उन्हीं परमेश्वर शंकरके
साथ मैं अकरणीय कार्य करने लगा॥ १२॥
शिवकी मायासे मोहित हुआ मैं मूढ़ अपने
पुत्रोके सहित ईर्ष्यावश उन्हींको मोहित करनेके लिये
अनेक उपाय करने लगा॥ १३॥
हे मुनीश्वर! उन परमेश्वर शिवके ऊपर किये
गये मेरे तथा मेरे उन पुत्रोंके सभी उपाय निष्फल हो
गये॥ १४॥
तब अपने पुत्रोंसहित उपायोंको करनेमें विफल
हुए मैंने लक्ष्मीपति विष्णुका स्मरण किया।
शिवभक्तिपरायण तथा श्रेष्ठ बुद्धिवाले भगवान् विष्णुने
आकर मुझे समझाया॥ १५॥
शिवतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले भगवान्
रमापतिके द्वारा समझाये जानेपर भी विमोहित मैं
अपनी ईर्ष्या और हठको नहीं छोड़ सका॥ १६॥
तब मैंने शक्तिकी सेवाकर उन्हें प्रसन्न किंया।
उनकी ही कृपासे शिवको मोहित करनेके लिये अपने
पुत्र दक्षसे वीरणकी कन्या असिक्नीके गर्भसे कन्याको
उत्पन्न कराया ॥ १७॥
अपने भक्तोंका हित करनेवाली वही उमा
दक्षपुत्री नामसे प्रसिद्ध होकर दुःसह तप करके
दृढ्भक्तिसे रुद्रकी पत्नी हो गयीं॥ १८॥
विकाररहित बुद्धिवाले वे प्रभु रुद्र
विवाहकालमें मुझे मोहितकर उमाके साथ गृहस्थ
होकर उत्तम लीला करने लगे॥ १९॥
अ० १]
विवाह्य तां स आगत्य स्वगिरौ सूतिकृत्तया ।
रेमे बहुविमोहो हि स्वतंत्रः स्वात्तविग्रह: ॥ २०
तया विहरतस्तस्य व्यतीयाय महान् मुने।
कालः सुखकरः शंभोर्निर्विकारस्य सद्रतेः॥ २१
ततो रुद्रस्य दक्षेण स्पर्धा जाता निजेच्छया।
महामूढस्य तन्मायामोहितस्य सुगर्विणः॥ २२
तत्प्रभावाद्धरं दक्षो महागर्वी विमूढधीः।
महाशांतं निर्विकारं निनिन्द बहुमोहितः॥ २३
ततो दक्षः स्वयं यज्ञं कृतवानार्वितोऽहरम्।
सर्वानाहूय देवादीन् विष्णुं मां चाखिलाधिप: ॥ २४
जाजुहाव तथाभूतो रुद्रं रोषसमाकुलः।
तथा तत्र सतीं नाम्नीं स्वपुत्रीं विधिमोहितः॥ २५
यदा नाकारिता पित्रा मायामोहितचेतसा।
लीलां चकार सुज्ञाना महासाध्वी शिवा तदा॥ २६
अथागता सती तत्र शिवाज्ञामधिगम्य सा।
अनाहूतापि दक्षेण गर्विणा स्वपितुर्गृहम्॥ २७
विलोक्य रुद्रभागं नो प्राप्यावज्ञां च ताततः।
विनिन्द्य तत्र तान्सर्वान्देहत्यागमथाकरोत्॥ २८
तच्छुत्वा देवदेवेशः क्रोधं कृत्वा तु दुःसहम्।
जटामुत्कृत्य महतीं वीरभद्रमजीजनत्॥ २९
सगणं तं समुत्पाद्य किं कुर्यामिति 'वादिनम्।
सर्वापमानपूर्व हि यज्ञध्वंस दिदेश ह॥
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३०७
उमाके साथ विवाहकर सन्तान उत्पन्न करनेकी
इच्छासे अपने कैलास पर्वतपर आकर स्वेच्छासे शरीर
धारण करनेवाले तथा सदा स्वतन्त्र रहनेवाले सदाशिव
अत्यन्त विमोहित होकर उनके साथ रमण करने
लगे॥ २०॥
हे मुने! उनके साथ विहार करते हुए निर्विकार
शिवका वह सुखकारी बहुत-सा समय बीत गया । तदनन्तर
किसी निजी इच्छाके कारण रुद्रकी दक्षसे स्पर्धा हो
गयी। उस समय शिवकी मायासे दक्ष मोहसे ग्रस्त,
महामूढ़ और अहंकारसे युक्त हो गया॥ २१-२२॥
उनके ही प्रभावसे महान् अहंकारी, मूढ्बुद्धि
और अत्यन्त विमोहित हुआ वह दक्ष उन्हीं महाशान्त
तथा निर्विकार भगवान् हरकी निन्दा करने लगा॥ २३॥
तदनन्तर गर्वमें भरे हुए सर्वाधिप दक्षने मुझे,
विष्णुको तथा सभी देवताओंको बुलाकर, किंतु
शिवजीको बिना बुलाये ही स्वयं यज्ञ कर डाला॥ २४॥
[किसी कारणवश] रुद्रपर असन्तुष्ट, क्रोधसे
भरे हुए उस दक्ष प्रजापतिने उन्हें उस यज्ञमें नहीं
बुलाया और दुर्भाग्यवश न तो उसने अपनी पुत्रीको ही
उस यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आहूत किया॥ २५॥
जब मायासे मोहित चित्तवाले दक्ष प्रजापतिने
शिवाको [यज्ञमें] आमन्त्रित नहीँ किया, तो ज्ञानस्वरूपा
उन महासाध्वीने अपनी लीला प्रारम्भ की। वे
'शिवजीकी आज्ञा प्राप्तकर गर्वयुक्त दक्षके द्वारा
आमन्त्रित न होनेपर भी अपने पिता दक्षके घर पहुँच
गयीं॥ २६-२७॥
उन देवीने यज्ञमें रुद्रके भागको न देखकर और
अपने पितासे अपमानित होकर वहाँ [उपस्थित]
सभीकी निन्दा करके [योगाग्निसे] अपने शरीरको
त्याग दिया॥ २८॥
यह सुनकर देवदेवेश्वर रुद्रे दुःसह क्रोध करके
अपनी महान् जटा उखाड़कर वीरभद्रको उत्पन्न
किया॥ २९॥
गणोंसहित उसे उत्पन्न करके ' मैं क्या करूँ '--
ऐसा कहते हुए उस वीरभद्रको शिवजीने आज्ञा दी
कि [हे वीरभद्र! दक्षके यज्ञमें आये हुए] सभीका
अपमान करते हुए तुम यज्ञका विध्वंस करो ॥ ३०॥
उ. ०८
गणाधीशस्तदाज्ञां स प्राप्य बहुबलान्वितः।
गतोऽरं तत्र सहसा महाबलपराक्रमः ॥ ३१
महोपद्रवमाचेरुर्गणास्तत्र तदाज्ञया।
सर्वान्स दण्डयामास न कश्चिदवशेषितः॥ ३२
विष्णुं संजित्य यलेन सामरं गणसत्तमः।
चक्रे दक्षशिरश्छेदं तच्छिरोऽग्नौ जुहाव च॥ ३३
यज्ञध्वंसं चकाराशु महोपद्रवमाचरन्।
ततो जगाम स्वगिरिं प्रणनाम प्रभुं शिवम्॥ ३४
यज्ञध्वंसोऽभवच्चेत्थं देवलोके हि पश्यति।
रुद्रस्यानुचरैस्तत्र वीरभद्रादिभिः कृतः॥ ३५
मुने नीतिरियं ज्ञेया श्रुतिस्मृतिषु सम्मता।
रुद्रे रुष्टे कथं लोके सुखं भवति सुप्रभौ॥ ३६
ततो रुद्रः प्रसन्नोऽभूत्स्तुतिमाक्ण्य तां पराम्।
विज्ञप्तिं सफलां चक्रे स्वेषां दीनवत्सलः ॥ ३७
पूर्ववच्च कृतं तेन कृपालुत्वं महात्मना।
शंकरेण महेशेन नानालीलाविहारिणा॥ ३८
जीवितस्तेन दक्षो हि तत्र सर्वे हि सत्कृताः।
पुनः स कारितो यज्ञः शंकरेण कृपालुना॥ ३९
रुद्रश्च पूजितस्तत्र सर्वेर्देबर्विशेषतः।
यज्ञे विष्णवादिभिर्भकत्या सुप्रसननात्मभिर्मुने॥ ४०
सतीदेहसमुत्पन्ना ज्वाला लोकसुखाबहा।
पतिता पर्वते तत्र पूजिता सुखदायिनी ॥ ४१
ज्चालामुखीति विख्याता सर्वकामफलप्रदा।
बभूव परमा देवी दर्शनात्पापहारिणी॥ ४२
इदानीं पूज्यते लोके सर्वकामफलाप्तये।
संविधाभिरनेकाभिर्महोत्सवपुरःसरम् ॥ ४३
श्रीशिवमहापुराण [अ० १
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शिवजीकी इस आज्ञाको पाकर महाबलवान् तर्च
पराक्रमी वह गणेश्वर वीरभद्र अपनी बहुत-सी सेना
लेकर [यज्ञविध्वंसके लिये] वहाँ शीघ्र ही पहुँचा ॥ ३१॥
उसको आज्ञासे उन गणोंने वहाँ महान् उपद्रव
प्रारम्भ किया। उस वीरभद्रने सबको दण्डित किया,
[दण्ड पानेसे] कोई भी न बचा॥ ३२॥
वीरभद्रने देवताओंके साथ विष्णुको भी जीतकर
दक्षका सिर काट लिया और उस सिरको अगिनिमें हवन
कर दिया। इस प्रकार महान् उपद्रव करते हुए उसने
यज्ञको विनष्ट कर दिया। तत्पश्चात् वह कैलासपर
गया और उसने शिवको प्रणाम किया॥ ३३-३४॥
इस प्रकार यज्ञका विध्वंस हो गया, देवताओंके
देखते-देखते रुद्रके अनुचर वीरभद्र आदिने यज्ञको
विनष्ट कर दिया॥ ३५॥
हे मुने! श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे प्रतिपादित यह
नीति जान लेनी चाहिये कि श्रेष्ठ प्रभु रुद्रके रुष्ट हो
जानेपर लोकमें सुख कैसे हो सकता है!॥ ३६॥
[उसके बाद सभी देवताओंने यज्ञकी पूर्णताके
लिये भगवान् रुद्रकी स्तुति की] उस उत्तम स्तुतिको
सुनकर रुद्र प्रसन्न हो गये | उन दीनवत्सल [ भगवान्
रुद्र]-ने सबको प्रार्थनाको सफल बना दिया॥ ३७॥
अनेक प्रकारको लीला करनेवाले महात्मा
शंकर महेशने पूर्ववत् कृपालुता की। उन्होंने
दक्षप्रजापतिको जीवित कर दिया और सभी लोगोंका
सत्कार किया, तदुपरान्त कृपालु शंकरने [दक्षसे]
पुनः यज्ञ करवाया ॥ ३८-३९॥
हे मुने! उस यज्ञमें विष्णु आदि सभी देवताओंने
बड़े प्रसन्नमनसे भक्तिके साथ रुद्रका विशेष रूपसे
पूजन किया॥ ४० ||
सतीके शरीरसे उत्पन्न तथा सभी लोगोंको सुख
देनेवाली वह ज्वाला पर्वतपर गिरी, वह लोगोंके द्वार
पूजित होनेपर सुख प्रदान करती है॥ ४१॥
ज्वालामुखीके नामसे प्रसिद्ध वे परमा देवौ
'कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा दर्शनसे समर्स्त
विनष्ट करनेवाली हैं । सम्पूर्ण कामना
फलकी प्राप्तिहेतु लोग इस समय अनेकों विधि-विधानोंसे
महोत्सवपूर्वक उनकी पूजा करते हैं ॥ ४२-४३॥
अ० २]
ततश्च सा सती देवी ।
तस्याश्च पार्वती नाम प्रसिद्धमभवत्तदा॥ ४४
सा पुनश्च समाराध्य तपसा कठिनेन वै।
तमेव परमेशानं भर्तारं समुपाश्रिता॥ ४५
एतत्सर्व समाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वर
यच्छुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ ४६
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३०९
तदनन्तर वे सती देवी हिमालयको पुत्रीके रूपमे
उत्पन्न हुई। तब उनका पार्वती-यह नाम विख्यात
हुआ॥ ४४॥
उन देवीने पुनः कठिन तपस्याके द्वारा उन्हीं
परमेश्वर शिवकी आराधना करके उन्हें पतिरूपमें
प्राप्त किया ॥ ४५॥
हे मुनीश्वर! जो आपने मुझसे पूछा था, वह
सब मैंने कह दिया, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे
छुटकारा प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीसंक्षेपचरित्रवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सतीचरित्रवर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥
Ore fr
अथ द्वितीयोऽध्यायः
सदाशिवसे त्रिदेवोंकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीसे देवता आदिकी सृष्टिके
पश्चात् देवी सन्ध्या तथा कामदेवका प्राकट्य
सूत उवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य नैमिषारण्यवासिनः।
पप्रच्छ च मुनिश्रेष्ठः कथां पापप्रणाशिनीम्॥ ९
नारद उवाच
विधे विधे महाभाग कथां शंभोः शुभावहाम्।
शृण्वन् भवन्मुखांभोजान्न तृप्तोऽस्मि महाप्रभो ॥ २
अतः कथय तत्सर्वं शिवस्य चरितं शुभम्।
सतीकीर्त्यन्वितं दिव्यं श्रोतुमिच्छामि विश्वकृत् ३
सती हि कथमुत्पन्ना दक्षदारेषु शोभना।
कथं हरो मनश्नक्रे दाराहरणकर्मणि॥ ४
कथं वा दक्षकोपेन त्यक्तदेहा सती पुरा।
हिमवत्तनया जाता भूयो वाकाशमागता॥ ५
पार्वत्याश्च तपोऽत्युग्रं विवाहश्च कथं त्वभूत्।
कथमर्धशरीरस्था बभूव स्मरनाशिनः॥ ६
एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते।
नाऱ्योऽस्ति संशयच्छेत्ता त्वत्समो न भविष्यति ७
सूतजी बोले-हे नैमिषारण्यनिवासी मुनियो!
[ब्रह्माके] इस वचनको सुनकर नारदने पुनः पापोंको
नष्ट करनेवाली कथा पूछी-॥ १॥
नारदजी बोले-हे विधे! हे विधे! हे महाभाग! हे
महाप्रभो! आपके मुखकमलसे कही जानेवाली कल्याण-
कारिणी कथाको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ.॥ २॥
हे विश्वस्नष्टा ! सतीकी कीर्तिसे युक्त शिवजीके
कल्याणमय तथा दिव्य उस सम्पूर्ण चरित्रको कहिये,
मैं उसे सुनना चाहता हूँ । दक्षकी अनेक पत्लियोंमें से
शोभामयी सती किस प्रकार उत्पन्न हुई और हरने किस
प्रकार स्त्रीसें विवाह करनेका विचार किया ?॥ ३-४॥
पूर्वकालमें सतीने दक्षपर क्रोधसे किस प्रकार
अपने शरीरका त्याग किया? पुनः किस प्रकार
'हिमालयकी कन्या पार्वती हुई और किस प्रकारसे
प्रकाशमें आयीं ?॥ ५॥
पार्वतीका कठोर तप तथा उनका विवाह किस
प्रकार हुआ? फिर वे कामदेवका नाश करनेवाले
शिवकी अर्धांगिनी कैसे हुई ?॥ ६॥
हे महामते! इन सब बातोंको आप विस्तारके
साथ कहिये; आपके समान संशयोंको दूर करनेवाला
कोई दूसरा न तो है और न ही होगा॥ ७॥
हे. १०
ब्रह्मोवाच
शृणु त्वं च मुने सर्व सतीशिवयशः शुभम्।
पावनं परमं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतमं परम्॥ ८
एतच्छम्भुः पुरोवाच भक्तवर्याय विष्णवे।
पृष्टस्तेन महाभक्त्या परोपकृतये मुने॥ ९
ततः सोऽपि मया पृष्टो विष्णु: शैववरः सुधी: ।
प्रीत्या मह्यं समाचख्यौ विस्तरान्मुनिसत्तम॥ १०
अहं तत्कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम्।
शिवाशिवयशोयुक्तां सर्वकामफलप्रदाम्॥ ११
पुरा यदा शिवो देवो निर्गुणो निर्विकल्पकः।
अरूपः शक्तिरहितश्चिन्मात्रः सदसत्परः॥ १२
अभवत्सगुणः सोऽपि द्विरूपः शक्तिमान्प्रभुः।
सोमो दिव्याकृतिर्विप्र निर्विकारी परात्परः॥ १३
तस्य वामाङ्गजो विष्णुब्रह्माहं दक्षिणाङ्गजः।
रुद्रो हृदयतो जातोऽभवच्च मुनिसत्तम॥ १४
सृष्टिकर्ताभवं ब्रह्मा विष्णुः पालनकारकः।
'लयकर्ता स्वयं रुब्रस्त्रिधाभूतः सदाशिवः ॥ १५
तमेवाहं समाराध्य ब्रह्मा लोकपितामहः।
प्रजाः ससर्ज सर्वास्ताः सुरासुरनरादिकाः॥ १६
सृष्ट्वा प्रजापतीन् दक्षप्रमुखान्सुरसत्तमान्।
अमन्यं सुप्रसन्नोऽहं निजं सर्वमहोन्नतम्॥ १७
मरीचिमत्रिं पुलहं ुलस्त्याङ्गिरसौ क्रतुम्।
वसिष्ठं नारदं दक्षं भृगुं चेति महाप्रभून्॥ १८
ब्रह्माहं मानसाय्युत्रानसर्ज च यदा मुने।
तदा मन्मनसो जाता चारुरूपा वराङ्गना॥ १९
जाम्ना सम्ध्या दिवाक्षान्ता सायं संध्या जपन्तिका।
अतीव सुन्दरी सुभूर्मुनिचेतोविमोहिनी॥ २०
श्रीशिवमहापुराण
[अ २
— “+ - 557८ - ण ज्र र मालिश:
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! शिव तथा सतोके
परम-पावन, दिव्य एवं गुह्यसे गुह्मतम तथा परम
कल्याणकारी चरित्रको सुनिये। हे मुने! पूर्वकालमें
परोपकारके लिये विष्णुद्वारा महान् भक्तिसे
जानेपर शिवजीने भक्तवर विष्णुसे इसका वर्णन किया
था॥ ८-९॥
हे मुनिश्रेष्ठ! उसके बाद मैंने भी यह कथा
शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् विष्णुसे पूछी, तब उन्होंने
प्रीतिपूर्वक विस्तारसे मुझसे कहा था। मैं सभी
कामनाओंका फल प्रदान करनेवाली एवं शिवके यशसे
युक्त उस प्राचीन कथाको आपसे कहूँगा॥ १०-११॥
'पहले भगवान् शिव निर्गुण, निर्विकल्प, रूप-
हीन, शक्तिसे रहित, चिन्मात्र एवं सत्-असत्से परे थे;
फिर हे विप्र! वे प्रभु सगुण, द्विरूप, शक्तिमान्,
उमासहित, दिव्य आकृतिवाले, विकाररहित तथा
परात्पर हो गये॥ १२-१३॥
हे मुनिसत्तम! उनके वामांगसे विष्णु, दक्षिणांगसे
मैं ब्रह्मा तथा हृदयसे रुद्रकी उत्पत्ति हुई। मैं ब्रह्मा
सृष्टि करनेवाला और विष्णु पालन करनेवाले तथा
रुद्र स्वयं लय करनेवाले हुए। इस प्रकार सदाशिवके
तीन रूप हुए॥ १४-१५॥
लोकपितामह मुझ ब्रह्माने उन्हीं सदाशिवकी
आराधनाकर देव, दैत्य, मनुष्य आदि समस्त प्रजाओंकी
सृष्टि की। दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियोंकी तथा
देवश्रेष्ठोंको रचनाकर मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ तथा
अपनेको सबसे महान् समझने लगा॥ १६-१७॥
हे मुने! जिस समय मुझ ब्रह्माने मरीचि, अत्रि,
पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष एवं
भृगु--इन महान् प्रभुतासम्मन्न मानस पुत्रोंकी
की, उसी समय मेरे मनसे एक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ
युवती भी उत्पन्न हुई॥ १८-१९॥
वह सन्ध्याके नामसे प्रसिद्ध हुई, जो प्रातः”
सन्ध्या तथा सायं-सन्ध्याके रूपमें क्रमशः दिवाक्षाना
तथा जपन्तिका कही गयी। वह अत्यन्त |
सुन्दर भौंहोंवाली तथा मुनियोंके मनको मोहित
करनेवाली थी॥ २०॥
अ० २]
न तादृशी देवलोके न मर्त्ये न रसातले।
कालत्रयेऽपि वै नारी सम्पूर्णगुणशालिनी॥ २१
दृष्ट्वाहं तां समुत्थाय चिन्तयन् हृदि हृद्गताम्।
दक्षादयश्च स्त्रष्टारो मरीच्याद्याश्च मत्सुता: ॥ २२
एवं चिन्तयतो मे हि ब्रह्मणो मुनिसत्तम।
मानसः पुरुषो मञ्जुराविर्भूतो महाद्भुतः॥ २३
काञ्जनीकृतजाताभः पीनोरस्कः सुनासिकः।
सुवृत्तोरूकटीजंघो नीलवेलितकेसरः॥ २४
लग्नभ्रूयुगलो लोलः पूर्णचन्द्रनिभाननः।
'कपाटायतसद्वक्षो रोमराजीविराजितः॥ २५
अभ्रमातङ्गकाकारः पीनो नीलसुवासकः।
आरक्तपाणिनयनमुखपादकरोद्भवः ॥ २६
क्षीणमध्यश्चारुदन्तः प्रमत्तगजगन्धनः।
प्रफुल्लपद्यपत्राक्षः केसरघ्राणतर्पणः ॥ २७
कंबुग्रीवो मीनकेतुः
पञ्चपुष्पायुधो वेगी
प्राशुर्मकरवाहनः।
पुष्पकोदंडमंडित: ॥ २८
कान्तः कटाक्षपातेन भ्रामयन्नयनद्वयम्।
सुगन्थिमारुतो तात ृङ्काररससेवितः॥ २९
तं वीक्ष्य पुरुषं सर्वे दक्षाद्या मत्सुताश्च ते।
औत्सुक्यं परमं जम्ुर्विस्मयाविष्टमानसाः ॥ ३०
अभवद्विकृतं तेषां मत्सुतानां मनो द्रुतम्।
धैर्य नैवालभत्तात कामाकुलितचेतसाम्॥ ३१
मां सोऽपि वेधसं वीक्ष्य स्रष्टारं जगतां पतिम्।
प्रणम्य पुरुषः प्राह विनयानतकन्धरः॥
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३११
सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त वैसी स्त्री देवलोक, मृत्युलोक
और पाताललोकमें न उत्पन्न हुई, न है और न तो
होगी। वह सम्पूर्ण गुणोंसे परिपूर्ण थी ॥ २१॥
उस कन्याको देखते ही उठ करके उसे हृदयमें
धारण करनेके लिये मैं मनमें सोचने लगा। दक्ष तथा
मरीचि आदि लोकस्रष्टा मेरे पुत्र भी सोचने लगे। हे
मुनिसत्तम! मैं ब्रह्मा अभी इस प्रकार सोच ही रहा था
कि उसी समय एक अत्यन्त अद्भुत एवं मनोहर मानस
पुरुष उत्पन्न हुआ॥ २२-२३॥
हे तात! वह पुरुष तप्त सुवर्णके समान
कान्तिवाला, स्थूल वक्ष:स्थलवाला, सुन्दर नासिकावाला,
सुन्दर तथा गोल ऊरु-कमर-जंघावाला, काले तथा
घुँघराले बालॉवाला, आपसमें मिली हुई भौंहोंवाला,
पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाला, कपाटके समान
विस्तीर्ण छातीवाला, रोमराजिसे सुशोभित, बादलपर्यन्त
ऊँचे गजराजके समान आकृतिवाला, महास्थूल तथा
नीलवर्णका सुन्दर वस्त्र धारण किये, रक्तवर्णके हाथ,
नेत्र, मुख, पैर और अँगुलियोंबाला, पतली कमरवाला,
सुन्दर दाँतोंवाला, मतवाले हाथीकी-सी गन्धवाला,
खिले हुए कमलके पत्रसदृश नेत्रोंवाला, अंगोंपर लगे
हुए केसरसे नासिकाको तृप्त करनेवाला, शंखके
समान गरदनवाला, मछलीके चिहसे अंकित ध्वजावाला,
अत्यन्त ऊँचा, मकरके वाहनवाला, पुष्पोंके पाँच
बाणोंसे युक्त, वेगवान्, पुष्पधनुषसे सुशोभित,
कटाक्षपातसे अपने नेत्रोंको घुमाते हुए मनोहर प्रतीत
होनेवाला, सुगन्धित श्वाससे युक्त और शृंगाररससे
सेवित था॥ २४-२९॥
उस पुरुषको देखकर मेरे दक्ष आदि पुत्रोंका मन
आश्चर्यसे भर गया और वे उसे जाननेके लिये
अत्यन्त उत्सुक हो गये॥ ३०॥
वासनासे आकुल चित्तवाले मेरे उन्न पुत्रोंका मन
शीघ्र ही विकृत हो गया, हे तात! उन्हें थोड़ा भी धैर्य
नहीं प्राप्त हुआ॥ ३१॥
वह पुरुष स्रष्टा तथा जगत्पति मुझ ब्रह्माको
देखकर बिनयभावसे सिर झुकाकर प्रणाम करके
मुझसे कहने लगा-॥ ३२॥
दे श्र
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २
पुरुष उवाच
किं करिष्याम्यहं कर्म ब्रह्मंस्तत्र नियोजय।
मान्योऽद्य पुरुषो यस्मादुचितः शोभितो विधे॥ ३३
अभिमानं च योग्यं च स्थानं पली च या मम।
तन्मे वद त्रिलोकेश त्वं स्त्रष्टा जगतां पतिः॥ ३४
ब्रह्मोवाच
एवं तस्य वचः श्रुत्वा पुरुषस्य महात्मनः।
क्षणं न किंचित् प्रोवाच स स्त्रष्टा चातिविस्मितः ॥ ३५
अतो मनः सुसंयम्य सम्यगुत्सृज्य विस्मयम्।
अवोचत्पुरुषं ब्रह्मा तत्कामं च समावहन्॥ ३६
ब्रह्मोवाच
अनेन त्वं स्वरूपेण पुष्पबाणैश्च पञ्चभिः।
मोहयन् पुरुषान् स्त्रीश्च कुरू सृष्टिं सनातनीम्॥ ३७
अस्मिञ्जीवाश्च देवाद्यास्त्रेलोक्ये सचराचरे।
एते सर्वे भविष्यन्ति न क्षमास्तव लङ्घने॥ ३८
अहं वा वासुदेवो वा स्थाणुर्वा पुरुषोत्तम।
भविष्यामस्तव वशे किमन्ये प्राणधारकाः॥ ३९
प्रच्छन्नरूपो जन्तूनां प्रविशन् हृदयं सदा।
सुखहेतुः स्वयं भूत्वा सृष्टिं कुरु सनातनीम्॥ ४०
त्वत्पुष्पबाणस्य सदा सुखलक्ष्यं मनोऽद्भुतम्।
सर्वेषां प्राणिनां नित्यं सदा मदकरो भवान्॥ ४१
इति ते कर्म कथितं सृष्टिपरावर्तकं पुनः ।
नामान्येते वदिष्यन्ति सुता मे तव तत्त्वत: ॥ ४२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वाहं सुरश्रेष्ठ स्वसुतानां मुखानि च।
आलोक्य स्वासने पाडे प्रोपविष्टोऽभवं क्षणम्॥ ४३
पुरुष बोला--हे ब्रह्मन्! मैं कौन-सा काई
करूँ? [मुझे जो कर्म करणीय हो, ] उस कर्ममें
नियुक्त कौजिये। हे विधाता! आप मेरे मान्य पुरुष हैं
मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँ, यही उचित है तथा
इसीसे मेरी शोभा भी होगी॥ ३३॥
मेरे लिये जो अभिमानयोग्य स्थान हो तथा जो
मेरी पली हो, उसे मुझे बताइये। हे त्रिलोकेश! आप
जगतूके पति हैं॥ ३४॥
ब्रह्माजी बोले-उस महात्मा पुरुषके इस
वचनको सुनकर मैं ब्रह्मा अत्यन्त आश्चर्यचकित हो
गया और थोड़ी देरतक कुछ नहीं बोला, फिर मनको
नियन्त्रितकर और आश्चर्यका परित्याग करके उस
कामदेवको बताते हुए कहने लगा--॥ ३५-३६॥
ब्रह्माजी बोले--तुम अपने इस स्वरूपसे और
पुष्पोंके पाँच बाणोंसे सभी स्त्री तथा पुरुषोंको मोहित
करते हुए सनातन सृष्टिकी रचना करो। इस चराचर
त्रिलोकोमें जीव तथा देवता आदि कोई भी तुम्हारा
लंघन करनेमें समर्थ नहीं होंगे॥ ३७-३८॥
हे पुरुषोत्तम! मैं, वासुदेव अथवा शंकर भी तुम्हारे
वशमें रहेंगे, अन्य प्राणधारियोंकी तो बात ही क्या ?॥ ३९॥
तुम गुप्त रूपसे प्राणियोंके हृदयमें प्रवेश करते
हुए स्वयं सबके सुखके कारण बनकर सनातन सृष्टि
करो ॥ ४०॥
समस्त प्राणियोंका विचित्र मन तुम्हारे
पुष्पबाणोंका सुखपूर्वक भेदनेयोग्य लक्ष्य होगा; तुम
सभीको सदा उन्मत्त करनेवाले होगे॥ ४१॥
मैंने सृष्टिमें प्रवृत्त करनेवाला यह तुम्हारा कर्म
कह दिया। ये मेरे पुत्र तत्त्वपूर्वक तुम्हारे नामोंका
वर्णन करेंगे॥ ४२॥
ब्रह्माजी बोले--हे सुरश्रेष्ठ! ऐसा कहका
अपने पुत्रके मुखकी ओर देखकर क्षणभरके लिये गै
अपने पद्मासनपर बैठ गया ॥ ४३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
कामग्रादुर्भावो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
कामप्रादुर्भावका वर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
= RES
अ० ३]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
अथ तृतीयोऽध्यायः
कामदेवको विविध नामों एवं बरोंकी प्राप्ति, कामके प्रभावसे ब्रह्मा तथा ऋषिगणोंका
मुग्ध होना, धर्मद्वारा स्तुति करनेपर भगवान् शिवका प्राकट्य और ब्रह्मा तथा ऋषियोंको
समझाना, ब्रह्मा तथा ऋषियोंसे अग्निष्वात्त आदि पितृगणोंकी उत्पत्ति,
ब्रह्माद्वारा कामको शापकी प्राप्ति तथा निवारणका उपाय
ब्रह्मोवाच
ततस्ते मुनयः सर्वे मदभिप्रायवेदिनः।
चक्रुस्तदुचितं नाम मरीचिप्रमुखाः सुता:॥ १
मुखाबलोकनादेव ज्ञात्वा वृत्तान्तमन्यतः।
दक्षादयश्च स्रष्टारः स्थानं पत्नीं च ते ददुः॥ २
ततो निश्चित्य नामानि मरीचिप्रमुखा द्विजा:।
ऊचुः सङ्गतमेतस्मै पुरुषाय ममात्मजाः॥ ३
ऋषय ऊचुः
यस्मात्प्रमथसे तत्त्वं जातोऽस्माकं यथा विधेः ।
तस्मान्मन्मथनामा त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि॥ ४
जगत्सु कामरूपस्त्वं त्वत्समो न हि विद्यते।
अतस्त्वं कामनामापि ख्यातो भव मनोभव॥ ५
मदनान्मदनाख्यस्त्वं जातो दर्पात्सदर्पकः।
तस्मात्कन्दर्पनामापि लोके ख्यातो भविष्यसि॥ ६
त्वत्समं सर्वदेवानां यद्वीर्य न भविष्यति।
ततः स्थानानि सर्वाणि सर्वव्यापी भवांस्ततः॥ ७
दक्षोऽयं भवतः पलं स्वयं दास्यति कामिनीम्
आद्यः प्रजापतियों हि यथेष्टं पुरुषोत्तमः॥ ८
एषा च कन्यका चारुरूपा ब्रह्ममनोभवा।
सन्ध्या नाम्नेति विख्याता सर्वलोके भविष्यति॥ ९
ब्रह्मणो ध्यायतो यस्मात्सम्यगजाता वराडुना ।
अतः सशध्येति विख्याता क्रान्ताभा तुल्यमल्लिका॥ १०
ब्रह्माजी बोले--तब मेरे अभिप्रायको जाननेवाले
मेरे पुत्र मरीचि आदि मुनियोंने उसके उचित नाम
॥१॥
उन सृष्टिकर्ता दक्ष आदिने उसका मुख देखते
ही तथा [उसकी अन्य चेष्टाओंसे] उसके समस्त
चरित्रको जानकर उसे रहनेका स्थान दिया तथा पत्नी
भी दे दी॥ २॥
मेरे पुत्र मरीचि आदि ऋषियोंने एकत्रित होकर
नामोंका निश्चय करके उस पुरुषको नाम भी बता
दिये॥ ३॥
ऋषिगण बोले--तुमने ब्रह्माजीसे उत्पन्न होते
ही हमलोगोंके मनको मथ डाला है, इसलिये तुम
लोकमें “मन्मथ' नामसे प्रसिद्ध होओगे॥ ४॥
सभी लोकोंमें तुम सुन्दर रूपवाले हो, तुम्हारे
समान कोई भी सुन्दर नहीं है, इसलिये हे मनोभव!
*काम' नामसे भी तुम विख्यात होओगे॥ ५॥
तुम सभीको मदोन्मत्त करनेके कारण ' मदन ' कहे
जाओगे। अहंकारयुक्त होकर दर्पसे उत्पन्न हुए हो, इसलिये
तुम 'कन्दर्प' नामसे भी संसारमें प्रसिद्ध होओगे ॥ ६॥
तुम्हारे समान किसी भी देवताका पराक्रम नहीं
होगा, अतः तुम्हारे लिये सभी स्थान होंगे और तुम
सर्वव्यापी होओगे॥ ७॥
ये जो आदिप्रजापति पुरुषोत्तम दक्ष हैं, वे स्वयं
ही तुमको योग्य पल्लीके रूपमें सुन्दर स्त्री प्रदान
करेंगे॥ ८॥
ब्रह्माके मनसे उत्पन्न हुई यह सुन्दर रूपवाली
कन्या सन्ध्या नामसे सभी लोकोंमें विख्यात होगी ॥ ९॥
अच्छी प्रकारसे ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके
हृदयसे उत्पन्न होनेके कारण तेज आभावाली तथा
मल्लिकापुष्पके सदृश यह कन्या सन्ध्या-इस नामसे
विख्यात होगी॥ १०॥
नम १४
श्रीशिवमहापुराण
[अ ३
ब्रह्मोवाच
'कौसुमानि तथास्त्राणि पञ्चादाय मनोभवः।
प्रच्छन्नरूपी तत्रैव चिन्तयामास निश्चयम्॥ ११
हर्षणं रोचनाख्यं च मोहनं शोषणं तथा।
मारणं चेति प्रोक्तानि मुनेर्मोहकराण्यपि॥ १२
ब्रह्मणा मम यत्कर्म समुद्दिष्टं सनातनम्।
तदिहैव करिष्यामि मुनीनां सन्निधौ विधेः॥ १३
तिष्ठन्ति मुनयश्चात्र स्वयं चापि प्रजापतिः।
एतेषां साक्षिभूतं मे भविष्यत्यद्य निश्चयम्॥ १४
सन्ध्यापि ब्रह्मणा प्रोक्ता चेदानीं प्रेषयेद्ठच: ।
इह कर्म परीक्ष्यैव प्रयोगान्मोहयाम्यहम्॥ १५
ब्रह्मोवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा निश्चित्य च मनोभवः ।
पुष्पजं पुष्पजातेश्च योजयामास मार्गणे: ॥ १६
आलीढस्थानमासाद्य धनुराकृष्य यत्नतः।
चकार वलयाकारं कामो धन्विवरस्तदा॥ १७
संहिते तेन कोदण्डे मारुताश्च सुगन्धयः।
ववुस्तत्र मुनिश्रेष्ठ सम्यगाह्वादकारिणः॥ १८
ततस्तानपि धात्रादीन् सर्वानेव च मानसान्।
पृथक् पुष्पशरैस्तीक्ष्णेर्मोहयामास मोहनः॥ १९
ततस्ते मुनयः सर्वे मोहिताश्चाप्यहं मुने।
संहितो मनसा किंचिद्विकारं प्रापुरादितः॥ २०
सन्ध्यां सर्वे निरीक्षन्तः सविकारं मुहुर्मुहु:।
आसन् प्रवृद्धमदनाः स्त्री यस्मान्मदनेधिनी॥ २१
ततः सर्वान्स मदनो मोहयित्वा पुनः पुनः।
यथेन्द्रियविकारं ते प््रापुस्तानकरोत्तथा॥ २२
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कामदेव अपने
पाँच पुष्प-आयुधोंको लेकर वहींपर गुप्त रूपसे स्थित
होकर विचार करने लगा--॥ ११॥
हर्षण, रोचन, मोहन, शोषण तथा मारण नामक
ये [मेरे] पाँच अस्त्र मुनियोंको भी मोहित करनेवाले
कहे गये हैं॥ १२॥
ब्रह्माजीने मुझे जिस सनातन कर्मको करनेके
लिये आदेश दिया है, उसे मैं यहाँ मुनियों और
ब्रह्माजीके सन्निकट ही करूँगा॥ १३॥
यहाँ बहुत-से मुनिगण तथा स्वयं प्रजापति
ब्रह्माजी भी उपस्थित हैं। ये लोग साक्षीरूपसे विद्यमान
हैं, इसलिये मेरे कर्मकी सत्यताका आरम्भ भी हो
जायगा॥ १४॥
यह ब्रह्माजीके द्वारा सन्ध्या नामसे कही गयी
यह कन्या भी मेरे वचनका समर्थन करेगी। मैं इसी
स्थानपर अपने कर्मकी परीक्षा करके ही प्रयोगद्वारा
सबको मोहित करूँगा॥ १५॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार विचार करनेके
अनन्तर मनमें निश्चय करके वह अपने पुष्पके
धनुषपर पुष्पके बाणोंको चढ़ाने लगा । श्रेष्ठ धनुर्धारी
कामदेवने धनुष खीँचनेकी मुद्रामें स्थित होकर यलपूर्वक
धनुष चढ़ाकर उसे मण्डलाकार किया॥ १६-१७॥
हे मुनिश्रेष्ठ जब इस प्रकारके धनुषपर कामदेवे
अपना बाण चढ़ाया, तो उसी समय [मनको]
आह्वादित करनेवाली सुगन्धित वायु बहने लगी॥ १८॥
उस समय कामदेवने तीक्ष्ण पुष्पबाणोंसे मुझ ब्रह्माको
तथा सभी मानसपुत्रोंको मोहित कर लिया॥ १९॥
हे मुने! तत्पश्चात् सभी मुनिगण और मैं भौ
मोहित हो गया, सभीके मनमें कामविकार उत्पन हों
गया॥ २०॥
विकारसे युक्त होनेके कारण सभी लोग सर्ध्याकी
ओर बार-बार देखने लगे। सभीके मनमें कामका
उद्रेक हो गया; क्योंकि स्त्री कामको बढानेवाली होती
है॥ २१॥
उस कामदेवने सभीको बार-बार मोहित करें
जिस किसी भी तरहसे वे कामविकारको प्राप्त हौ,
वैसा उन सबको कर दिया॥ २२॥
अ० ३]
उदीरितेन्द्रियो धाता वीक्ष्याहं स यदा च त्ाम्।
तदैव चोनपञ्चाशद्भावा जाताः शरीरतः॥ २३
सापि तैर्वीक्ष्ममाणाथ कन्दर्पशरपातनात्।
चक्रे मुहु्मुहुर्भावान् कटाक्षावरणादिकान्॥ २४
निसर्गसुन्दरी सन्ध्या तान्भावान् मानसोद्भवान्।
कुर्वन्त्यतितरां रेजे स्वर्णदीव तनूर्मिभिः॥ २५
अथ भावयुतां सन्ध्यां वीक्ष्याकार्ष प्रजापति: ।
धर्माभिपूरिततनुरभिलाषमहं मुने॥ २६
ततस्ते मुनयः सर्वे मरीच्यत्रिमुखा अपि।
दक्षाद्याश्च द्विजश्रेष्ठ प्रापुर्वैकारिकेन्द्रियम्॥ २७
दृष्ट्वा तथाविधान् दक्षमरीचिप्रमुखांश्च माम्।
संध्यां च कर्मणि निजे श्रद्धे मदनस्तदा॥ २८
यदिदं ब्रह्मणा कर्म ममोहिष्ट मयापि तत्।
कर्तुं शक्यमिति ह्यद्धा भावितं स्वभुवा तदा॥ २९
इत्थं पापगतिं वीक्ष्य भ्रातृणां च पितुस्तथा।
धर्म: सस्मार शम्भुं वै तदा धर्मावनं प्रभुम्॥ ३०
संस्मरन्मनसा धर्मः शंकरं धर्मपालकम्
तुष्टाव विविधैर्वाक्यैदीनो भूत्वाजसंभवः॥ ३१
धर्म उवाच
देवदेव महादेव धर्मपाल नमोऽस्तु ते।
सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता शंभो त्वमेव हि॥ ३२
सृष्टौ ब्रह्मा स्थितौ विष्णुः प्रलये हररूपधृक्।
रजःसत्त्वतमोभिश्च त्रिगुणैरगुणः प्रभो॥ ३३
निस्त्रैगुण्यः शिवः साक्षात्तुर्यश्च प्रकृतेः परः।
निर्गुणो निर्विकारी त्वं नानालीलाविशारदः॥ ३४
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३१५
उस स्त्रीको देखकर जब मैं ब्रह्मा उन्मत्त
| हो गया, उस समय मेरे शरीरसे उनचास
भाव उत्पन्न हो गये॥ २३॥
'कामबाणके प्रहारसे उन सभीके द्वारा देखी
जाती हुई वह सन्ध्या भी अपने कटाक्षोंके आवरणसे
अनेक प्रकारके भाव प्रकट करने लगी॥ २४॥
स्वभावसे सुन्दरी वह सन्ध्या मनसे उत्पन्न उन
भावोंको प्रकट करती हुई छोटी-छोटी लहरोंसे युक्त
गंगाकी तरह शोभित होने लगी॥ २५॥
हे मुने! इस प्रकारके भावोंसे युक्त सन्ध्याको
देखकर कामसे परिपूर्ण शरीरवाला मैं ब्रह्मा उसकी
अभिलाषा करने लगा॥ २६॥
हे द्विजश्रेष्ठ! तब मरीचि, अत्रि आदि सभी मुनि
तथा दक्ष प्रजापति आदि विकृत इ्द्रियोंवाले हो गये।
दक्ष-मरीचि आदि ऋषियों तथा मुझे और सन्ध्याको
भी कामविकारसे युक्त देखकर कामदेवको अपने
कार्यपर विश्वास हो गया॥ २७-२८॥
अब कामदेवके मनमें यह विशवास हो गया कि
ब्रह्माने मुझे जिस कार्यके लिये आदेश दिया है, मैं वह
कार्य करनेमें पूर्ण रूपसे सक्षम हूँ॥ २९॥
[ब्रह्माजीके पुत्र] धर्मने अपने पिता तथा
भाइयोंकी ऐसी दशा देखकर धर्मकी रक्षा करनेवाले
भगवान् सदाशिवका स्मरण किया॥ ३०॥
धर्मने धर्मपालक शिवजीका मनसे स्मरणकर
दीनभावनासे युक्त होकर अनेक प्रकारके वाक्योंसे
उनकी इस प्रकार स्तुति की-॥ ३१॥
धर्म बोला--हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे
धर्मपाल! आपको नमस्कार है। हे शम्भो! सृष्टि,
पालन तथा विनाश करनेवाले आप ही हैं॥ ३२॥
हे प्रभो! आपने निर्गुण होकर भी रज, सत्त्व
तथा तमोगुणसे सृष्टिकार्यके लिये ब्रह्मा, पालनके
लिये विष्णु तथा प्रलयके लिये रुद्रस्वरूप धारण किया
है॥३३॥
[हे प्रभो] आप शिव तीनों गुणोंसे रहित,
प्रकृतिसे परे, तुरीयावस्थामें स्थित, निर्गुण, निर्विकार
तथा अनेक प्रकारकी लीलाओंमें प्रवीण हैं॥ ३४ ॥
क १६
श्रीशिवमहापुराण
[अण ३
रक्ष रक्ष महादेव पापान्मां दुस्तरादितः।
मत्पितायं तथा चेमे भ्रातरः पापबुद्धयः ॥ ३५
ब्रह्मोवाच
इति स्तुतो महेशानो धर्मेणैव परः प्रभुः।
तत्राजगाम शीघ्रं वै रक्षितुं धर्ममात्मभूः॥ ३६
जातो वियद्गतः शंभुर्विधिं दृष्ट्वा तथाविधम्।
मां दक्षाद्यांश्च मनसा जहासोपजहास च॥ ३७
स साधुवादं तान् सर्वान् विहस्य च पुनः पुनः।
उवाचेदं मुनिश्रेष्ठ लज्जयन् वृषभध्वजः ॥ ३८
शिव उवाच
अहो ब्रह्मंस्तव कथं कामभावः समुद्गतः।
दृष्ट्वा च तनयां नैव योग्यं वेदानुसारिणाम्॥ ३९
यथा माता च भगिनी भ्रातृपत्नी तथा सुता।
एताः कुदृष्ट्य़ा द्रष्टव्या न कदापि विपश्चिता ॥ ४०
एष वै वेदमार्गस्य निश्चयस्त्वन्मुखे स्थितः।
कथं तु काममात्रेण स ते विस्मारितो विधे॥ ४१
धैर्यं जागरितं चित्ते न कथं चतुरानन।
येन क्षुद्रेण कामेन रन्तुं विघटितं विधे॥ ४२
एकांतयोगिनस्तस्मात्सर्वदादित्यद्शिनः ।
कथं दक्षमरीच्याद्या लोलुपाः स्त्रीषु मानसाः ॥ ४३
कथं कामोऽपि मन्दात्मा प्राबल्यात्सोऽधुनेव हि।
विकृतान् कृतवान् बाणैरकालज्ञोऽल्पचेतनः ॥ ४४
धिक् तं श्रुतं सदा तस्य यस्य कान्ता मनोऽहरत्।
धैर्यादाकृष्य लोल्येषु मज्जयत्यपि मानसम्॥ ४५
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा लोके सोऽहं शिवस्य च।
ब्रीडया द्विगुणीभूत: स्वेदार््रस्त्वभवं क्षणात्॥ ४६
हे महादेव! इस भयंकर पापसे मेरी रक्षा
कीजिये, रक्षा कीजिये, इस समय मेरे पिता तथा मे
भाई पापबुद्धिवाले हो गये हैं॥ ३५॥
ब्रह्माजी बोले--धर्मके द्वारा परमात्मा प्रभुकी
जब इस प्रकार स्तुति कौ गयी, तब वे आत्मभू शिव
धर्मकी रक्षा करनेके लिये वहीं प्रकट हो गये॥ ३६॥
वे शम्भु आकाशमें स्थित होकर मुझ ब्रह्मा तथा
दक्ष आदिको इस प्रकारसे मोहित देखकर मन-ही-मन
हँसने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! उन सबको साधुवाद देकर
और बार-बार हँसकर मुझे लज्जित करते हुए वे
वृषभध्वज यह कहने लगे-॥ ३७-३८॥
शिवजी बोले-हे ब्रह्मन्! अपनी कन्याको
देखकर आपको कामभाव कैसे उत्पन्न हो गया?
वेदोंका अनुसरण करनेवालोंके लिये यह उचित नहीं
है॥ ३९॥
बुद्धिमान्को चाहिये कि माता, भगिनी, भ्रातृपली
तथा कन्याको समान भावसे देखे। इन्हें कदापि
कुदृष्टिसे न देखे॥ ४०॥
वेदमार्गका यह सिद्धान्त तो आपके मुखमें
स्थित है। हे विधे! आपने कामके उत्पन्न होते ही
उसे कैसे विस्मृत कर दिया!॥ ४१॥
हे चतुरानन! आपके मनमें धैर्य जागरूक रहना
चाहिये। आश्चर्य है कि आपने इस कामके वशीभूत
हो कन्यासे रमण करनेके लिये इस प्रकार अपने
धैर्यको नष्ट कर दिया॥ ४२॥
एकान्त-योगी तथा सर्वदा सूर्यका दर्शन करनेवाले
दक्ष, मरीचि आदि भी स्त्रीमें आसक्त चित्तवाले हो
गये ॥ ४३॥
देश-कालका ज्ञान न रखनेवाले, मन्दात्मा तथा अल्प
बुद्धिवाले कामदेवने भी अपनी प्रबलतासे कामबाणोंद्रार
आपलोगोंको विकारयुक्त कैसे बना दिया ?॥ ४४॥
उस पुरुषको तथा उसके वेद, शास्त्र आदिके ज्ञानकी
धिक्कार है, जिसके मनको स्त्री हर लेती है और
विचलित करके मनको लोलुपतामें डुबा देती है ॥ ४५
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार सदाशिवके
सुनकर मैं दुगुनी लज्जामें पड़ गया, उस समर्थ
शरीर पसीनेसे पानी-पानी हो उठा॥ ४६॥
अ० ३]
ततः कामविकारं हि निगृह्य चात्यजं मुने।
जिघुकषुरपि तद्धीत्या तां संध्यां कामरूपिणीम्॥ ४७
मच्छरीरात्तु घर्माभो यत्पपात द्विजोत्तम।
अग्निष्वात्ताः पितृगणा जाताः पितृगणास्ततः ॥ ४८
भिन्नाज्ञननिभा: सर्वे फुल्लराजीवलोचनाः।
नितान्तयतयः पुण्याः संसारविमुखाः परे॥ ४९
सहस्त्राणां चतुःषष्टिरग्निष्वात्ताः प्रकीर्तिताः ।
षडशीतिसहस्त्राणि तथा बर्हिषदो मुने॥ ५०
घर्माभः पतितं भूमौ तदा दक्षशरीरतः।
समस्तगुणसंपन्ना तस्माज्जाता वराङ्गना॥५१
तन्वङ्गी सममध्या च तनुरोमावली श्रुता।
मृद्रङ्ी चारुदशना नवकाञ्जनसुप्रभा॥ ५२
सर्वावयवरम्या च पूर्णचन्द्राननाम्बुजा।
नाम्ना रतिरिति ख्याता मुनीनामपि मोहिनी॥ ५३
मरीचिप्रमुखाः षड् वै निगृहीतेन्द्रियक्रिया:।
ऋते क्रतुं वसिष्ठं च पुलस्त्याङ्गिरसौ तथा॥ ५४
क्रत्वादीनां चतुर्णां च बीजं भूमौ पपात च।
तेभ्यः पितृगणा जाता अपरे मुनिसत्तम ५५
सोमपा आज्यपा जाम्ना तथैवान्ये सुकालिनः।
हविष्मन्तः सुताः सर्वे कव्यवाहाः प्रकीर्तिताः ॥ ५६
क्रतोस्तु सोमपाः पुत्रा बसिष्टात्कालिनस्तथा।
आज्यपाख्याः पुलस्त्यस्य हविष्मन्तोऽङ्गिरः सुता: ॥ ५७
जातेषु तेषु विप्रेक्न अग्निष्वात्तादिकेष्वथ।
लोकानां पितृवर्गेषु कव्यवाद् स समन्ततः ॥ ५८
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३१७
है मुने! तत्पश्चात् कामरूपिणी सन्ध्याको ग्रहण
करनेकी इच्छा करते हुए भी मैंने शिवजीके भयसे इन्द्रियोको
वशमें करके कामविकारको दूर कर दिया॥ ४७॥
हे द्विजश्रेष्ठ। उस समय मेरे शरीरसे [लज्जाके
कारण] जो पसीना गिरा, उसीसे अग्निष्वात्त तथा
बर्हिषद् नामक पितृगणोंकी उत्पत्ति हुई। अंजनके
समान कृष्णवर्णवाले और विकसित कमलके समान
नेत्रवाले वे पितर महायोगी, पुण्यशील तथा संसारसे
विमुख रहनेवाले हैं ॥ ४८-४९ ॥
हे मुने! चौंसठ हजार अग्निष्वात्त पितर और
छियासी हजार बर्हिषद् पितर कहे गये हैं ॥ ५०॥
उसी समय दक्षके शरीरसे भी स्वेद निकलकर
पृथ्वीपर गिरा, उससे समस्त गुणसम्पन्न परम मनोहर
एक स्त्रीकी उत्पत्ति हुई॥ ५१॥
उसका शरीर सूक्ष्म था, कटिप्रदेश सम था,
शरीरकी रोमावली अत्यन्त सूक्ष्म थी, उसके अंग
कोमल तथा दाँत परम सुन्दर थे और वह तपे हुए
सोनेके समान कान्तिसे देदीप्यमान हो रही थी ॥५२॥
वह अपने शरीरके समस्त अवयवोंसे बड़ी
मनोहर प्रतीत हो रही थी तथा उसका मुखकमल पूर्ण
चन्द्रमाके समान था। उसका नाम रति था, जो
मुनियोंके भी मनको मोहित करनेवाली थी॥ ५३॥
क्रतु, वसिष्ठ, पुलस्त्य तथा अंगिराको छोड़कर
मरीचि आदि छः ऋषियोंने अपनी इन्द्रियोंका निग्रह
कर लिया। हे मुनिश्रेष्ठ! इन क्रतु आदि चार
ऋषियोंका वीर्य पृथ्वीपर गिरा, उन्हींसे दूसरे पितृगणोंकी
उत्पत्ति हुई॥ ५४-५५॥
इन पितरोंमें सोमपा, आज्यपा, सुकालिन् तथा
हविष्मान् मुख्य हैं। ये सभी पुत्र कव्यको धारण
करनेवाले कहे गये हैं॥ ५६॥
क्रतुके पुत्र सोमपा नामक पितर, वसिष्ठके पुत्र
सुकालिन् नामक पितर, पुलस्त्यके पुत्र आज्यपा तथा
अंगिराके पुत्र हविष्मान् नामक पितरके रूपमें उत्पन्न
हुए॥ ५७॥
हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार अग्निष्वात्त आदि पितरोंके
उत्पन्न हो जानेपर पितरोंके मध्य वे सभी कव्यका
वहन करनेवाले कव्यवाट् हुए॥ ५८॥
के १८
श्रीशिवमहापुराण
[अण ३
सन्ध्या पितृप्रसूर्भूत्वा तदुदेशयुताभवत्।
निर्दोषा शम्भुसन्दृष्टा धर्मकर्मपरायणा॥ ५९
एतस्मिन्नन्तरे शम्भुरनुगृह्याखिलान्द्रिजान्।
धर्म संरक्ष्य विधिवदन्तर्धानं गतो द्रुतम्॥ ६०
अथ शंकरवाक्येन लञ्ितोऽहं पितामहः।
कंदर्पायाकोपिषं हि भ्रुकुटीकुटिलाननः॥ ६१
दृष्ट्वा मुखमभिप्रायं विदित्वा सोऽपि मन्मथः।
स्वबाणान्सञ्जहाराशु भीतः पशुपतेर्मुने॥ ६२
ततः कोपसमायुक्तः पड्ययोनिरहं मुने।
अज्वलं चातिबलवान् दिधक्षुरिव पावकः॥ ६३
भवनेत्राग्निनिर्दग्धः कंदपों दर्पमोहितः।
भविष्यति महादेवे कृत्वा कर्म सुदुष्करम्॥ ६४
इति वेधास्त्वहं काममक्षयं द्विजसत्तम।
समक्षं पितृसंघस्य मुनीनां च यतात्मनाम्॥ ६५
इति भीतो रतिपतिस्ततक्षणात्त्यक्तमार्गणः।
प्रादुर्बभूव प्रत्यक्षं शापं श्रुत्वातिदारुणम्॥ ६६
ब्रह्माणं मामुवाचेदं सदक्षादिसुतं मुने।
श्रृण्वतां पितृसंघानां संध्यायाश्च विगर्वधीः ॥ ६७
काम उवाच
किमर्थ भवता ब्रह्मन् शप्तोऽहमिति दारुणम्।
अनागास्तव लोकेश न्याय्यमार्गानुसारिणः ॥ ६८
त्वया चोक्तं नु मत्कर्म यत्तद् ब्रह्मन् कृतं मया।
तत्र योग्यो न शापो मे यतो नान्यत्कृतं मया॥ ६९
इस प्रकार सन्ध्या पितरोंको उत्पन्न करनेवाली
बनकर उनकी उद्देश्यसिद्भिमें लगी रहती थी। यह
शिवके द्वारा देख लिये जानेके कारण दोषोंसे रहित
तथा धर्म-कर्ममें परायण रहती थी॥ ५९॥
इसी बीच सदाशिव समस्त महर्षियोंपर
करके तथा विधिपूर्वक धर्मकी रक्षाकर शीघ्र ही
अन्तर्धान हो गये॥ ६०॥
उसके बाद शम्भु सदाशिवके वाक्योंसे मैं
पितामह लज्जित हुआ। मैंने अपनी भ्रुकुटि चढ़ा ली
और कामदेवपर बड़ा क्रुद्ध हुआ॥ ६१॥
हे मुने! मेरे मुखको देखकर और मेरा अभिप्राय
समझकर रुद्रसे भयभीत उस कामदेवने अपने बाणोंको
लौटा लिया॥६२॥
हे मुने! तब मैं पद्मयोनि ब्रह्मा कोपयुक्त होकर
इस प्रकार जलने लगा, जिस प्रकार भस्म करनेकी
इच्छावाली अति बलवान् अग्नि प्रज्वलित हो उठती
है॥ ६३ ॥
[मैंने क्रोधमें भरकर उसे यह शाप दे दिया]
अहंकारसे मोहित हुआ यह कन्दर्प शिवजीके प्रति दुष्कर
कर्म करके उनकी नेत्राग्निसे भस्म हो जायगा॥ ६४॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार मुझ ब्रह्माने पितृसमूहोंके
तथा जितेन्द्रिय मुनियोंके सामने इस कामको यह
अमित शाप दिया॥ ६५॥
मेरे शापको सुनकर भयभीत हुआ कामदेव उसी
क्षण अपने बाणोंको त्यागकर सबके सामने प्रकट हो
गया॥ ६६॥
हे मुने! उसका सारा गर्व नष्ट हो गया। तर्ब
वह दक्ष आदि मेरे पुत्रों, [अग््नष्वात्तादि] पितरो,
सन्ध्या एवं मुझ ब्रह्माके सामने ही सबको सुनाते हए
यह कहने लगा-- ॥ ६७॥
काम बोला- हे ब्रह्मन्! आप तो न्यायमार्गका
अनुसरण करनेवाले हैं, हे लोकेश! तब मुझ निरपरथकी
आपने इस प्रकार दारुण शाप क्यों दे दिया?॥ ६८॥
हे ब्रह्मन्! आपने मेरे लिये जो कहा था,
तो वही कार्य किया। आपको मुझे शाप देना ठीर्क
नहीं है; क्योंकि मैंने [आपकी आज्ञाके विरुद्ध]
अन्य कार्य नहीं किया है॥ ६९॥
आ० ४]
अहं विष्णुस्तथा शम्भुः सर्वे त्वच्छरगोचरा: ।
इति यद्भवता प्रोक्तं तन्मयापि परीक्षितम्॥ ७०
नापराधो ममाप्यत्र ब्रह्मन् मयि निरागसि।
दारुणः समयश्चैष शापो देव जगत्पते॥ ७९
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्माहं जगतां पति:।
प्रत्यवोचं यतात्मानं मदनं दमयन्मुहुः॥ ७२
ब्रह्मोवाच
आत्मजा मम संध्येयं यस्मादेतत्सकामतः।
लक्ष्यीकृतोऽहं भवता ततः शापो मया कृतः ॥ ७३
अधुना शान्तरोषोऽहं त्वां वदामि मनोभव।
शृणुष्व गतसन्देहः सुखी भव भयं त्यज॥ ७४
त्वं भस्म भूत्वा मदन भर्गलोचनवह्निना।
तथैवाशु समं पश्चाच्छरीरं प्रापयिष्यसि॥ ७५
यदा करिष्यति हरोऽञ्जसा दारपरिग्रहम्।
तदा स एव भवतः शरीरं प्रापयिष्यति॥ ७६
एवमुक्त्वाथ मदनमहं लोकपितामहः।
अन्तर्गतो मुनीन्द्राणां मानसानां प्रपश्यताम्॥ ७७
इत्येवं मे वचः श्रुत्वा मदनस्तेऽपि मानसाः।
सम्बभूवुः सुताः सर्वे सुखिनोऽरं गृहं गता: ॥ ७८
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३१९
[हे ब्रह्मन्!) मैं [ब्रह्मा], विष्णु तथा शिव--
ये सब भी तुम्हारे बाणोंके वशीभूत होकर रहेंगे-
ऐसा जो आपने कहा था, उसीके अनुसार ही मैंने
परीक्षा ली थी॥७०॥
अतः हे ब्रह्मन्! इसमें मेरा अपराध नहीं है। हे
देव! हे जगत्पते! यदि आपने मुझ निरपराधको यह
दारुण शाप दे ही दिया, तो इसका कोई समय भी
निश्चित कर दीजिये॥ ७१॥
ब्रह्माजी बोले--[ हे नारद!] तब मैं जगत्पति ब्रह्मा
उसकी यह बात सुनकर चित्तको वशमें करनेवाले कामको.
बार-बार डाँटता हुआ इस प्रकार बोला-- ॥ ७२॥
[हे काम!] यह सन्ध्या मेरी कन्या है, तुमने
इसकी ओर सकाम करनेके लिये मुझे [अपने कामका]
लक्ष्य बनाया | इसलिये मैंने तुम्हें शाप दिया॥ ७३॥
हे मनोभव! अब मेरा क्रोध शान्त हो गया है,
अतः मैं तुमसे कह रहा हूँ, उसे सुनो । तुम सन्देहरहित
होकर सुखी हो जाओ और भय छोड़ो॥ ७४॥
हे मदन! तुम महादेवजीकी नेत्राग्निसे भस्म होकर
बादमें शीघ्र ही इसीके समान शरीर प्राप्त करोगे ॥ ७५॥
जब शंकरजी विवाह करेंगे, तब वें अनायास ही
तुम्हें शरीर प्रदान करेंगे ॥\७६॥
[हे नारद!] कामसे इस प्रकार कहकर मैं
लोकपितामह उन मानसपुत्र मुनिवरोंके देखते-देखते
ही अन्तर्धान हो गया॥७७॥
इस प्रकार मेरे वचनको सुनकर कामदेव तथा
मेरे वे सभी मानसपुत्र प्रसन्न हो गये और शीघ्रतासे
अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ७८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितां द्वितीये सतीखण्डे कामशापानुग्रहो नाम तृतीयोऽध्याय: ॥ ३॥
॥ इस प्रकार ्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
कामशापानुग्रहवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥
2 टे व्य
अथ चतुर्थोऽध्यायः
'कामदेवके विवाहका वर्णन
नारद उवाच नारदजी बोले-हे विष्णुशिष्य ! हे महाप्राज्ञ! हे
विष्णुशिष्य महाप्राज्ञ विधे लोककर प्रभो। विधे! संसारकी रचना करनेवाले हे प्रभो! आपने शिवजीकी
अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता शिवलीलामृतान्विता॥ ९ | लीलारूपी अमृतसे युक्त यह अद्भुत कथा कही॥ १॥
र २०
श्रीशिवमहापुराण
[अण ¥
ततः किमभवत्तात चरितं तद् वदाधुना।
अहं श्रद्धान्वितः श्रोतुं यदि शम्भुकथाश्रयम्॥ २
ब्रह्मोवाच
शम्भौ गते निजस्थाने वेध्स्यन्तर्हिते मयि।
दक्षः प्राहाथ कंदर्प संस्मरन् मम तद्वचः॥ ३
दक्ष उवाच
महेहजेयं कंदर्प सत्रूपगुणसंयुता।
एनां गृह्णीष्व भार्यार्थं भवतः सदूशीं गुणैः॥ ४
एषा तव महातेजाः सर्वदा सहचारिणी।
भविष्यति यथाकामं धर्मतो वशवर्तिनी॥ ५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देहस्वेदाम्बुसम्भवाम्।
'कन्दर्पायाग्रतः कृत्वा नाम कृत्वा रतीति ताम्॥ ६
विवाह्य तां स्मरः सोऽपि मुमोदातीव नारद।
दक्षजां तनयां रम्यां मुनीनामपि मोहिनीम्॥ ७
अथ तां वीक्ष्य मदनो रत्याख्यां स्वस्त्रियं शुभाम्।
आत्मागुणेन विद्धोऽसौ मुमोह रतिरंजितः॥ ८
क्षणप्रदाभवत्कान्ता गौरी मृगदृशी मुदा।
लोलापांग्यथ तस्यैव भार्या च सदूशी रतो॥ ९
तस्या भ्रूयुगलं वीक्ष्य संशयं मदनोऽकरोत्।
उत्सादनं मत्कोदण्डं विधात्रास्यां निवेशितम्॥ १०
गतिं दृष्ट्वा कटाक्षाणामाशु तस्या द्विजोत्तम ।
आशु गन्तुं निजास्त्राणां श्रद्दधे न च चारुताम्॥ ११
तस्याः स्वभावसौरम्यं धीरशवासानिलं तथा।
आघ्राय मदनः श्रद्धां त्यक्तवान् मलयानिले ॥ १२
= = = == का रर 9 9 काकः आ
हे तात! इसके बाद कया हुआ? यदि ज
शम्भुकी कथापर आश्रित उनके चरित्रको सुननेमे
श्रद्धावान् होऊं, तो उसे कहिये॥ २॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार शिवजीके अफे
स्थानको चले जाने तथा मुझ ब्रह्माके अन्तर्धान हो
जानेपर दक्षप्रजापति मेरी बातका स्मरण करते हुए
कामदेवसे कहने लगे-- ॥ ३॥
दक्ष बोले-हे काम! सुन्दर रूप एवं गुणोंसे
युक्त यह कन्या मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई है, अतः तुम
अपनी पत्नी बनानेके लिये इसे ग्रहण करो, यह गुणोंमें
तुम्हारे ही समान है॥ ४॥
हे महातेजस्विन्! यह कन्या सदा तुम्हारे साथ
रहेगी और धर्मके अनुरूप तुम्हारी इच्छाके अनुसार
तुम्हारे वशमें रहेगी॥५॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] यह कहकर
दक्षने अपने स्वेदसे उत्पन्न हुई कन्याका नाम रति
रखकर और उसे अपने आगेकर कामदेवको दे
दिया॥६॥
हे नारद! वह कामदेव मुनियोंको भी मोहित
करनेवाली उस परम सुन्दर दक्षकन्यासे विवाह करके
बड़ा प्रसन्न हुआ॥ ७॥
प्रेमासक्त कामदेव भी परम कल्याणकारिणी रति
नामक अपनी स्त्रीको देखकर उसके गुणोंसे आकृष्ट
होकर उसपर अत्यन्त मोहित हो गया॥८॥
गौरवर्णवाली, हरिणाक्षी तथा चंचल नेत्रप्रान्तवाली
वह रति भी कामके सदृश होनेके कारण उसे परम
आहाद प्रदान करने लगी ॥ ९॥
उसकी चपल भौंहोंको देखकर कामदेव संशयम
पड़ जाता था कि विधाताने सबको वशमें करनेवाले
मेरे धनुषको इसके नेत्रोंमें सन्निविष्ट कर दिया है
क्या ?॥ १०॥
हे द्विजश्रेष्ठ! उस रतिके कटाक्षोंकी शीघ्र गति
तथा उसकी सुन्दरताको देखकर कामदेवको आपते
अस्त्रोंकी शीघ्र गतिपर विश्वास नहीं रह गया॥ १९
उसके स्वाभाविक रूपसे सुगन्धित तथा
श्वासवायुको सूँघकर कामदेवने मलय-पवनके रि
अपनी श्रद्धाका त्याग कर दिया॥ १२॥
अ० ४]
| वक्त्रं दृष्ट्वा लक्ष्मसुलक्षितम्।
न निश्चिकाय मदनो भेदं तन्मुखचन्द्रयोः॥ १३
सुवर्णपद्मकलिकातुल्यं तस्याः कुचद्वयम्।
रजे चूचुकयुग्मेन भ्रमरेणेव वेष्टितम्॥ १४
दृढपीनोन्नतं तस्याः स्तनमध्यं विलंबिनीम्।
आनाभिलम्बिनीं मालां तन्वीं चन्द्रायितां शुभाम्॥ १५
ज्यां पुष्पधनुषः कामः षट्पदावलिसंभ्रमाम्।
विसस्मार च यस्मात्तां विसृज्यैनां निरीक्षते॥ १६
गम्भीरनाभिरन्धान्तश्चतुः पार्श्वत्वगावृतम् ।
आननान्नेक्षणद्वंद्रमारक्तकमलं यथा॥ १७
क्षीणमध्येन वपुषा निसर्गाष्टापदप्रभा।
रुक्मवेदीव ददृशे कामेन रमणी हि सा॥ १८
रंभास्तंभायतं स्निग्धं यदूरुयुगलं मृदु।
निजशक्तिसमं कामो वीक्षाञ्जक्रे मनोहरम्॥ १९
आरक्तपार्ष्णिपादाग्रं प्रांतभागं पदद्वयम्।
अनुरागमिवानेन मित्रं तस्या मनोभवः॥ २०
तस्याः करयुगं रक्तं नखरैः किंशुकोपमैः।
वृत्ताभिरंगुलीभिश्च सूकष्माग्राभिर्मनोहरम्॥
तद् बाहुयुगलं कांतं मृणालयुगलायतम्।
मृदु स्निग्धं चिरं राजत्कांतिलोहप्रवालवत्॥ २२
नीलनीरदसंकाशः केशपाशो मनोहरः।
चमरीबालभरवद्विभाति स्म॒ स्मरप्रिया॥ २३
एतादृशीं रतिं नाम्नीं प्रालेयाद्रिसमुद्भवाम्।
गङ्गामिव महादेवो जग्राहोत्फुल्ललोचनः ॥ २४
2223 Shivmahapuranam_partLSection_I2_l_Front
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३२९
सुन्दर लक्षणोंसे युक्त तथा पूर्णिमाके चन्द्रमाके
समान उसके मुखमण्डलको देखकर कामदेव उसके
मुख और चन्द्रमाका भेद करनेमें असमर्थ हो गया॥ १३॥
सुवर्णकमलकी कलीके समान उसका
वक्षःस्थल भ्रमरसे वेष्टित कमलकी भाँति सुशोभित
हो रहा था॥ १४॥
उसका कठोर, स्थूल एवं उन्नत वक्षःस्थलका
मध्यभाग नाभिपर्यन्त लटकनेबाली, लम्बी, पतली
तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ माला धारण किये हुए
था। वह कामदेव भ्रमरकी पंक्तियोंसे घिरी अपने
पुष्पधनुषकी प्रत्यंचाको भी भूल गया और उसे देखना
छोड़कर बार-बार उसी रतिकी ओर एकटक देखने
लगा॥ १५-१६॥
चारों ओर त्वचासे परिवेष्टित उसकी नाभिका
रन्ध्र अत्यन्त गम्भीर था। उसके मुखकमलपर दोनों
नेत्र लाल कमलके समान प्रतीत हो रहे थे॥ १७॥
उस कामदेवने कृश कटिप्रदेशवाले शरीरसे
सुशोभित, स्वभावतः सुवर्णकी आभावाली उस
रमणीको सुवर्णवेदीके समान देखा॥ १८॥
कदलीस्तम्भके सदृश विस्तृत, स्निग्ध, कोमल
तथा मनोहर उसकी जंघाओंको कामदेवने अपनी
शक्तिके समान देखा॥ १९॥
लाल-लाल पादाग्र तथा प्रान्तभागवाले उसके
दोनों पैर रँगे हुए-से थे, इससे कामदेव अनुरक्त होकर
उसका मित्र बन गया। पलाशपुष्पके समान लाल
नखोंसे युक्त, सूक्ष्म अग्रभागवाले तथा गोलाकार
अँगुलियोंसे युक्त उसके दोनों हाथ अत्यन्त मनोहर
प्रतीत हो रहे थे। उसकी दोनों भुजाएँ. कान्तिमय,
मृणालके समान लम्बी, कोमल, स्तिग्ध और कान्तियुक्त
लाल मूँगेके समान शोभित हो रही थीं। उसका
मनोहर केशपाश काले-काले बादलोंके समान
शोभा पा रहा था, इससे वह कामप्रिया चमरीके
बालोंको धारण करनेवाले चँवरकी भाँति सुशोभित हो
रही थी। [सौन्दर्ययुक्त] ऐसी रतिको हर्षित नेत्रोंवाले
कामदेवने उसी प्रकार ग्रहण किया, जिस प्रकार
'हिमालयसे उत्पन्न गंगाको महादेवजीने ग्रहण किया
था॥ २०- २४॥
३२२
श्रीशिबमहापुराण
[ अ० डु
चक्रपद्यां चारुबाहुं मृणालशकलान्विताम्।
भ्रूयुग्मविभ्रमव्राततनूर्मिपरिराजिताम् ॥
कटाक्षपाततुङ्गौघां स्वीयनेत्रोत्पलान्विताम्।
तनुलोमांबुशैवालां मनोद्रुमविलासिनीम्॥ २६
निम्ननाभिहुदां क्षामां सर्वागरमणीयिकाम्।
सर्वलावण्यसदनां शोभमानां रमामिव॥ २७
द्वादशाभरणे युक्तां भृङ्गारैः षोडशेर्युताम्।
मोहिनीं सर्वलोकानां भासयन्तीं दिशो दश॥ २८
इति तां मदनो वीक्ष्य रतिं जग्राह सोत्सुकः।
रागादुपस्थितां लक्ष्मीं हृषीकेश इवोत्तमाम्॥ २९
नोवाच च तदा दक्षं कामो मोदभवात्तत:।
विस्मृत्य दारुणं शापं विधिदत्तं विमोहितः॥ ३०
तदा महोत्सवस्तात बभूव सुखवर्धनः।
दक्षः प्रीततरश्चासीन्मुमुदे तनया मम॥ ३१
कामोऽतीव सुखं प्राप्य सर्वदुःखक्षयं गतः।
दक्षजापि रतिः कामं प्राप्य चापि जहर्ष ह॥ ३२
रराज च तया सार्ध भिन्नश्चारुवचाः स्मर: ।
जीमूत इव सन्ध्यायां सौदामन्या मनोज्ञया॥ ३३
चक्र तथा पद्मके चिह्नोंसे युक्त, चक्रपदां चारुबाहं मृणालशकलान्विताम्॥ | चक्र तथा प्रे चिलतोंसे युक्त, मृणालख
समान मनोहर हाथोंसे युक्त वह रति गंगा नदीके
समान प्रतीत हो रही थी। उस रतिकी दोनों भौहोंको
चेष्टाएँ नदीकी सूक्ष्म लहरोंके समान प्रतीत हो
रही थीं॥ २५॥
उसके कटाक्षपात ही नदीकी वेगवती धारा थे
और विशाल नेत्र कमलके समान प्रतीत हो रहे थे।
उसकी सूक्ष्म रोमावली शैवाल थी और वह अपने
मनरूपी वृक्षोंसे विलास कर रही थी॥ २६॥
उसकी गम्भीर नाभि हृदके समान शोभा पा रही
थी। वह कृशगात्रा रति अपने सर्वांगकी रमणीयता
तथा लावण्यमयी शोभासे बारह आभूषणांसे युक्त
तथा सोलह श्रृंगारोंसे शोभायमान होकर सम्पूर्ण
लोकोंको मोहनेवाली और अपनी कान्तिसे दसों
दिशाओंको प्रज्वलित करती हुई महालक्ष्मी-जैसी
प्रतीत हो रही थी॥ २७-२८॥
इस प्रकार परम सुन्दरी रतिको देखकर कामदेवे
इसे बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण किया, जिस प्रकार कि
स्वयं रागसे उपस्थित हुई महालक्ष्मीको भगवान्
नारायणने ग्रहण किया था॥ २९॥
उस समय कामदेवने आनन्द होनेके कारण
विमोहित होकर ब्रह्माजीके द्वारा दिये गये दारुण
शापको भूलकर दक्षसे कुछ नहीं कहा॥ ३०॥
हे तात! उस समय [सबके] सुखको
बढ़ानेवाला महान् उत्सव हुआ। दक्ष प्रजापति
अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और कन्या रति भी परम प्रसन
हो गयी॥ ३१॥
अत्यधिक सुख पाकर कामका समस्त दुःख
विनष्ट हो गया और इधर दक्षतनया रति भी कामकी
पतिरूपमें प्राप्तकर परम हर्षित हुई॥ ३२॥
रतिसे मोहित हुआ गद्गद कण्ठवाला वह
मधुरभाषी काम सायंकालमें मनोहर बिजलीसे युर्ण
मेघके समान दक्षकन्या रतिके साथ शोभा
लगा॥ ३३॥
2223 Shivmahapuranam. Part I_Section_l 2B ह
आ० ५]
इति रतिपतिरुच्चेरमोहयुक्तो रतिं तां
हृदुपरि जगृहे वे योगदर्शीव विद्याम्।
रतिरपि पतिमग्रच्न प्राप्य सा चापि रेजे
रूद्रसंहिता (सतीखण्ड )
३२३
इस प्रकार रतिपति कामने अत्यन्त मोहित होकर
उस रतिको इस प्रकार अपने हृदयमें ग्रहण किया,
जिस प्रकार योगी ब्रह्मविद्याको ग्रहण करता है और
वह रति भी श्रेष्ठ कामको प्राप्तकर इस प्रकार प्रसन्न
हुई, जिस प्रकार पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली महालक्ष्मी
हरिमिव कमला वै पूर्णचन्द्रोपमास्या॥ ३४ | विष्णुको पतिरूपमें प्राप्तकर प्रसन्न हुई थीं ॥ ३४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे कामविवाहवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
कामविवाहवर्णन नामक चाँथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
ब्रह्माकी मानसपुत्री कुमारी सन्ध्याका आख्यान
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणो मुनिसत्तमः।
स मुदोवाच संस्मृत्य शंकरं प्रीतमानसः॥ १
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग विष्णुशिष्य महामते।
अद्भुता कथिता लीला त्वया च शशिमौलिनः॥ २
गृहीतदारे मदने हृष्टे हि स्वगृहं गते।
दक्षे च स्वगृहं याते तथा हि त्वयि कर्तरि॥ ३
मानसेषु च पुत्रेषु गतेषु स्वस्वधामसु।
सन्ध्या कुत्र गता सा च ब्रहमपुत्री पितृप्रसूः ४
किं चकार च केनैव पुरुषेण विवाहिता।
एतत्सर्वं विशेषेण संध्यायाश्चरितं वद॥ ५
सूत उवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य ब्रह्मपुत्रस्य धीमतः।
संस्मृत्य शंकरं भक्त्या ब्रहम प्रोवाच तत्त्ववित् ६
ब्रह्मोवाच
भृणु त्वं च मुने सर्व संध्यायाश्चरितं शुभम्।
यच्छुत्वा सर्वकामिन्यः साध्व्यः स्युः सर्वदा मुने॥ ७
सा च संध्या सुता मे हि मनोजाता पुराभवत्।
तपस्तप्त्वा तनुं त्यक्त्वा सैव जाता त्वरुन्धती॥ ८
2223 Shivmahapuranam._Part_Section_I2-2_Front
सूतजी बोले--हे महर्षियो! ब्रह्माजीके
| वचनको सुनकर मुनिश्रेष्ठ [नारद] प्रसन्नचित्त
होकर शंकरजीका स्मरण करके आनन्दपूर्वक कहने
लगे-॥१॥
नारदजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे विष्णुशिष्य!
हे महाभाग! हे महामते! आपने शिवजीकी अद्भुत
लीलाका वर्णन किया॥ २॥
जब कामदेव अपनी पत्नीको प्राप्तकर प्रसन्न
होकर अपने घर चला गया तथा प्रजापति दक्ष भी
अपने घर चले गये, सृष्टिकर्ता आप ब्रह्मा तथा आपके
मानसपुत्र भी अपने-अपने घर चले गये, तब पितरोंकी
जन्मदात्री वह ब्रह्मपुत्री सन्ध्या कहाँ गयी ?॥ ३-४॥
उसने क्या किया और उसका विवाह किस
पुरुषके साथ हुआ? इन सब बातोंको और सन्ध्याके
चरित्रको विशेष रूपसे कहिये॥ ५॥
सूतजी बोले--तत्त्ववेत्ता ब्रह्मदेव परम बुद्धिमान्
देवर्षि जारदके इस वचनको सुनकर भक्तिपूर्वक
शंकरजीका स्मरण करके कहने लगे-॥६॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! सन्ध्याका सम्पूर्ण
शुभ चरित्र सुनिये, जिसे सुनकर हे मुने! सभी स्त्रियाँ
पतिव्रता होती हैं॥ ७॥
बह सन्ध्या, जो पूर्वकालमें मेरे मनसे उत्पन्न
हुई थी, बही तपस्याकर शरीर छोड्नेके बाद अरुन्धती
हुई॥ ८॥
३२४ श्रीशिवमहापुराण य प
—
मेधातिथेः सुता भूत्वा मुनिश्रेष्ठस्य धीमती। उस बुद्धिमती तथा उत्तम ब्रत करनेवाली स्या
ब्रह्मविष्णुमहेशानवचनाच्चरितव्रता ॥ मुनिश्रेष्ठ मेधातिथिकी.कन्थाके रूपमें जन्म
वत्ने पतिं महात्मानं वसिष्ठं शंसितत्रतम्।
पतिब्रता च मुख्याभूद्रंद्या पूज्या त्वभीषणा॥ १०
नारद उवाच
कथं तया तपस्तप्तं किमर्थ कुत्र संध्यया।
कथं शरीरं सा त्यक्त्वाभवन्मेधातिथेः सुता॥ ११
कथं वा विहितं देवैब्रह्मविष्णुशिवैः पतिम्।
वसिष्ठं तु महात्मानं संवव्रे शंसितब्रतम्॥ १२
एतन्मे श्रोष्यमाणाय विस्तरेण पितामह।
कौतूहलमरुन्धत्याश्चरितं ब्रूहि तत्त्वतः॥ १३
ब्रह्मोवाच
अहं स्वतनयां संध्यां दृष्ट्या पूर्वमथात्मनः ।
'कामायाशु मनोऽकार्ष त्यक्ता शिवभयाच्च सा॥ १४
संध्यायाश्वलितं चित्तं कामबाणविलोडितम्।
ऋषीणामपि संरुद्धमानसानां महात्मनाम्॥ १५
भर्गस्य वचनं श्रुत्वा सोपहासं च मां प्रति।
आत्मनश्चलितत्वं वै ह्यमर्यादमृषीन्प्रति॥ १६
कामस्य तादृशं भावं मुनिमोहकरं मुहुः।
दृष्ट्वा सन्ध्या स्वयं तत्रोपयमायातिदु:खिता ॥ १७
ततस्तु ब्रह्मणा शप्ते मदने च मया मुने।
अन्तर्भूते मयि शिवे गते चापि निजास्पदे॥ १८
आमर्षवशमापन्ना सा संध्या मुनिसत्तम।
मम पुत्री विचार्यैवं तदा ध्यानपराभवत्॥ १९
ध्यायन्ती क्षणमेवाशु पूर्व वृत्तं मनस्विनी।
इदं विममृशे सन्ध्या तस्मिन्काले यथोचितम्॥ २०
सन्ध्योवाच
उत्पन्नमात्रां मां दृष्ट्वा युवतीं मदनेरित: ।
अकार्षीत्सानुरागोऽयमभिलाषं पिता मम॥ २१
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरके वचनोंसे महात्मा वसिष्ठका
अपने पतिरूपमें वरण किया। वह श्रेष्ठ
वन्दनीय, पूजनीय तथा दयाको प्रतिमूर्ति थी॥ ९.१५ |
नारदजी बोले--हे ब्रह्मन्! उस सम्ध्याने क्यों
कहाँ तथा किस उद्देश्यसे तप किया, किस प्रकार बह
अपना शरीर त्याग करके मेधातिथिकी कन्या हुई और
उसने किस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके द्वार
बताये गये उत्तम ब्रतवाले महात्मा वसिष्ठको अपना
प्रति स्वीकार किया ?॥ ११-१२॥
हे पितामह! इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता
है, अतः सुननेकी इच्छावाले मुझसे अरुन्धतीके
चरित्रका विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक वर्णन कीजिये॥ १३॥
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद !]पहले अपनी पुत्री
सन्ध्याको देखकर मेरा मन कामसे आकृष्ट हो गया,
किंतु बादमें शिवके भयसे मैंने उसे छोड़ दिया॥ १४॥
कामबाणसे घायल होकर उस सन्ध्याका तथा
मनको वशमें रखनेवाले महात्मा ऋषियोंका भी चित्त
चलायमान हो गया था॥ १५॥
उस समय मेरे प्रति कहे गये शिवजीके उपहासयुक्त
वचनको सुनकर और ऋषियोंके प्रति अपने चित्तको
मर्यादा छोड़कर चलायमान देखकर तथा बार-बार
मुनियोंको मोहित करनेवाले उस प्रकारके भावको
देखकर वह सन्ध्या विवाहके लिये स्वयं अत्यन्त
दुःखी हुई॥ १६-१७॥
हे मुने! कामदेवको शाप देकर जब मैं अन्तर्धान
हो गया एवं शिवजी अपने स्थान कैलासको चले गये, उस
समय हे मुनिसत्तम! वह मेरी पुत्री सन्ध्या क्षुब्ध होक
कुछ विचार करके ध्यानमग्न हो गयी ॥ १८-१९॥
वह मनस्विनी सन्स कुछ देरतक अपने पूर्व
वृत्तका स्मरण 'करती हुई उस समय यथोचित रूपये
'यह विचार करने लगी-- ॥ २०॥
सन्ध्या बोली--मेरे पिताने उत्पन्न होते ही मुर
युवतीको देखकर कामसे प्रेरित होकर अनुरागपूर्वरक
मुझे प्राप्त करनेकी अभिलाषा की॥ २१॥
2223 Shivmahapuranam_Part Section _I2-2-Bdk
अ० ५]
पश्यतां मानसानां च मुनीनां भावितात्मनाम्।
दृष्ट्वैव माममर्यादं ',सकाममभवन्मन:॥ २२
ममापि मथितं चित्तं मदनेन दुरात्मना।
येन दृष्ट्वा मुनीन्सर्वाश्चलितं मन्मनो भृशम्॥ २३
'फलमेतस्य पापस्य मदनः स्वयमाप्तवान्।
यस्तं शशाप कुपितः शम्भोरग्रे पितामहः॥ २४
प्राप्नुयां फलमेतस्य पापस्य स्वघकारिणी।
तच्छोधनफलमहमाशु चेच्छामि साधनम्॥ २५
यन्मां पिता भ्रातरश्च सकामामपरोक्षतः।
दृष्ट्वा चक्रः स्पृहां तस्मान्न मत्तः पापकृत्परा॥ २६
ममापि कामभावोऽभूदमर्यादं समीक्ष्य तान्।
पत्या इव स्वके ताते सर्वेषु सहजेष्वपि॥ २७
करिष्याम्यस्य पापस्य प्रायश्चित्तमहं स्वयम्।
आत्मानमग्नौ होष्यामि वेदमार्गानुसारतः॥ २८
किं त्वेकां स्थापयिष्यामि मर्यादामिह भूतले।
उत्पन्नमात्रा न यथा सकामाः स्युः शरीरिणः॥ २९
एतदर्थमहं कृत्वा तपः परमदारुणम्।
मर्यादां स्थापयिष्यामि पश्चत्त्यक्ष्यामि जीवितम्॥ ३०
यस्मिन् शरीरे पित्रा मे हभिलाषः स्वयं कृतः।
भ्रातृभिस्तेन कायेन किंचिन्नास्ति प्रयोजनम्॥ ३१
मया येन शरीरेण तातेषु सहजेषु च।
उद्भावितः कामभावो न तत्सुकृतसाधनम्॥
इति संचिन्त्य मनसा संध्या शैलवरं ततः।
जगाम चन्द्रभागाख्यं च््द्रभागापगा यतः॥ ३३
अथ तत्र गतां ज्ञात्वा संध्यां गिरिवरं प्रति।
तपसे नियतात्मानं ब्रह्मावोचमहं सुतम्॥ ३४
वसिष्ठं संयतात्मानं सर्वज्ञं ज्ञानयोगिनम्।
समीपे स्त्रे समासीनं वेदवेदाङ्गपारगम्॥ ३५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३२५
इसी प्रकार आत्मतत्त्वज्ञ ब्रह्मदेवके मानसपुत्रोंने
भी मुझे देखकर अपना मन मर्यादासे रहितकर
'कामाभिलाषसे युक्त कर लिया॥ २२॥
इस दुरात्मा कामदेवने मेरे भी चित्तको मथ
डाला, जिससे सभी मुनियोंको देखकर मेरा मन बहुत
चंचल हो गया॥ २३॥
इस पापका फल कामदेवने स्वयं पाया कि
शंकरजीके सामने कुपित होकर ब्रह्माजीने उसे शाप
दे दिया॥ २४॥
मैं पापिनी भी इस पापका फल पाऊँगी, अतः
उस पापसे शुद्ध होनेके लिये मैं भी कोई साधन करना
चाहती हूँ; क्योंकि मुझे देखकर मेरे पिता तथा सभी
भाई प्रत्यक्ष रूपसे कामभावपूर्वक मेरी अभिलाषा
करने लगे। अतः मुझसे बढ़कर कोई पापिनी नहीं
है॥ २५-२६॥
उन सबको देखकर मुझमें भी अमर्यादित रूपसे
कामभाव उत्पन्न हो गया और मैं भी अपने पिता तथा
सभी भाइयोंमें पतिके समान भावना करने लगी ॥ २७॥
अब मैं इस पापका प्रायश्चित्त करूँगी और वेदमार्गके
अनुसार अपने शरीरको अग्निमें हवन कर दूँगी । मैं इस
भूतलपर एक मर्यादा स्थापित करूँगी, जिससे कि शरीरधारी
उत्पन्न होते ही कामभावसे युक्त न हों ॥ २८-२९॥
इसके लिये मैं परम कठोर तप करके उस
मर्यादाको स्थापित करूँगी और बादमें अपना शरीर
छोडूंगी॥ ३०॥
* मेरे जिस शरीरें मेरे पिता एवं भाइयोंने कामाभिलाष
किया, उस शरीरसे अब कोई प्रयोजन नहीं है॥ ३१॥
मैंने भी जिस शरीरसे अपने पिता तथा भाइयोंमें
'कामभाव उत्पन्न किया, अब वह शरीर पुण्यकार्यका
साधन नहीं हो सकता॥ ३२॥
वह सन्ध्या अपने मनमें ऐसा विचारकर चन्द्रभाग
नामक श्रेष्ठ पर्वतपर गयी, जहाँसे चन्द्रभागा नदी
निकली हुई है॥ ३३॥
इसके बाद सन्ध्याको उस श्रेष्ठ पर्वतपर तपस्याके
लिये गयी हुई जानकर मैंने अपने पासमें बैठे हुए,
मनको वशमें रखनेवाले, सर्वज्ञ, ज्ञानयोग तथा वेदवेदांगके
पारगामी अपने पुत्र वसिष्ठसे कहा- ॥ ३४-३५॥
३२६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ ५
ब्रह्मोवाच
वसिष्ठ पुत्र गच्छ त्वं संध्यां जातां मनस्विनीम्।
तपसे धृतकामां च दीक्षस्वैनां यथाविधि॥
मंदाक्षमभवत्तस्याः पुरा दृष्ट्वैव कामुकान्।
युष्मान्मां च तथात्मानं सकामां मुनिसत्तम॥ ३७
अनुक्तमूर्तत तत्कर्म पूर्वमृत्युं विमृश्य सा।
युष्माकमात्मनश्चापि प्राणान्संत्यक्तुमिच्छति॥ ३८
अमर्यादेषु मर्यादां तपसा स्थापयिष्यति।
तपः कर्तु गता साध्वी चन्द्रभागाख्यभूधरे॥ ३९
न भावं तपसस्तात सानुजानाति कंचन।
तस्माद्यथोपदेशात्सा प्राप्नोत्तविष्टं तथा कुरु ॥ ४०
इदं रूपं परित्यज्य निजं रूपान्तरं मुने।
परिगृह्यांतिके तस्याः तपश्चर्या निदर्शय॥ ४१
इदं स्वरूपं भवतो दृष्ट्वा पूर्व यथात्र वाम्।
जाप्नुयात्साथ किंचिद्वै ततो रूपान्तरं कुरु॥ ४२
ब्रह्मोवाच
जारदेत्थं वसिष्ठो मे समाज्ञप्तो दयायुतः।
तथास्त्विति च मां प्रोच्य ययौ संध्यान्तिकं मुनिः ॥ ४३
तत्र देवसरः पूर्ण गुणैर्मानससंमितम्।
ददर्श स वसिष्ठोऽथ संध्यां तत्तीरगामपि॥ ४४
तीरस्थया तया रेजे तत्सरः कमलोज्ज्चलम्।
उद्यदिन्दुसुनक्षत्रं प्रदोषे गगनं यथा॥ ४५
मुनिदृंष्ट्वाथ तां तत्र सुसंभावां स कौतुकी ।
वीक्षाञ्चक्रे सरस्तत्र बृहल्लोहितसंज्ञकम्॥ ४६
चन्द्रभागा नदी तस्मात्प्राकाराद्दक्षिणाम्बुधिम्।
यान्ती सा चैव ददृशे तेन सानुगिरेर्महत्॥ ४७
ब्रह्माजी बोले--हे पुत्र वसिष्ठ!
विचार करके गयी हुई मनस्विनी पुत्री सन्ध्याके
जाओ और इसे विधिपूर्वक दीक्षा प्रदान करो॥ ३६॥
हे मुनिसत्तम! प्रथम यह तुमलोगोंको, मुझको
तथा अपनेको कामाभिलाषसे युक्त देख रही थी
परंतु अब इसके नेत्रोंकी चपलता दूर हो गयी
है॥ ३७॥
यह तुमलोगोंको तथा अपने अभूतपूर्व दुष्कर्मको
समझकर ' मृत्यु ही अच्छी है '--ऐसा विचारकर प्राण
छोड़नेकी इच्छा करती है॥ ३८ ॥
अब यह तपस्याके द्वारा अमर्यादित प्राणियोंमें
मर्यादा स्थापित करेगी, इसलिये तपस्या करनेके लिये
वह साध्वी चन्द्रभाग नामक पर्वतपर गयी है॥ ३९॥
हे तात! वह तपस्याकी किसी भी क्रियाको नहीं
जानती है, अत: जिस प्रकारके उपदेशसे वह अपने
अभीष्टको प्राप्त करे, वैसा करो॥ ४०॥
हे मुने! तुम अपने इस रूपको छोड़कर दूसरा
शरीर धारणकर उसके समीपमें स्थित होकर तपश्चर्याकी
क्रियाओंको प्रदर्शित करो ॥ ४१॥
उसने यहाँपर मेरे तथा तुम्हारे रूपको पहले देख
लिया है, इस रूपद्वारा वह कुछ भी शिक्षा ग्रहण नहीं
करेगी, इसलिये दूसरा रूप धारण करो॥ ४२॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! इस प्रकार दयालु
मुनि वसिष्ठजीने मुझसे आज्ञा प्राप्त की और
तथास्तु-ऐसा कहकर वे सन्ध्याके समीप गये॥ ४३॥
वसिष्ठजीने वहाँ मानससरोवरके समान गुणोंसे
परिपूर्ण देवसरको तथा उसके तटपर गयी हुई उस
सन्ध्याको भी देखा ॥ ४४॥
उज्ज्वल कमलोंसे युक्त वह देवसर तटपर स्थित
सन्ध्याद्वारा इस प्रकार शोभित हो रहा था, मागो
प्रदोषकालमें उदित चन्द्रमा तथा नक्षत्रोंसे युक्त आकाश
ात्रिमें सुशोभित हो रहा हो॥ ४५॥
कौतूहलयुक्त वसिष्ठजी सुन्दर भावोंवाली उस
सन्ध्याको देखकर बृहल्लोहित नामक उस तालाबकी
ओर देखने लगे॥ ४६॥
उन्होंने उसी चन्द्रभाग पर्वतके शिखरोंसे दकि
समुद्रकी ओर जानेबाली चन्द्रभागा नदीको देखा। व
अ० ५]
निर्गिद्य पश्चिमं सा तु चन्द्रभागस्य सा नदी।
यथा हिमवतो गङ्गा तथा गच्छति सागरम्॥ ४८
तस्मिन् गिरौ चन्द्रभागे बृहल्लोहिततीरगाम्।
संध्यां दृष्ट्वाथ पप्रच्छ वसिष्ठः सादरं तदा॥ ४९
वसिष्ठ उवाच
किमर्थमागता भत्रे निर्जनं त्वं महीधरम्।
कस्य वा तनया किं वा भवत्यापि चिकीर्षितम्॥ ५०
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं वद गुह्यं न चेद्धवेत्।
बदन पूर्णचन्द्राभं निष्चेष्टं वा कथं तव॥ ५१
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा वचनं तस्य वसिष्ठस्य महात्मन: ।
दृष्ट्वा च तं महात्मानं ज्वलन्तमिव पावकम्॥ ५२
शरीरधृरब्रह्मचर्यं विलसन्तं जटाधरम्।
सादरं प्रणिपत्याथ संध्योबाच तपोधनम्॥ ५३
संध्योवाच
यदर्थमागता शैलं सिद्धं तन्मे निबोध ह।
तब दर्शनमात्रेण यन्मे सेत्स्यति वे विभो॥ ५४
तपश्चर्तुमहं ब्रहान्निर्जनं शैलमागता।
ब्रह्मणोऽहं सुता जाता नाम्ना संध्येति विश्रुता॥ ५५
यदि ते युज्यते सह्यं मां त्वं समुपदेशय।
एतच्चिकीर्षितं गुह्यं नान्यं किंचन विद्यते॥ ५६
अज्ञात्वा तपसो भावं तपोवनमुपाश्रिता।
चिंतया परिशुष्येऽहं वेपते हि मनो मम॥ ५७
ब्रह्मोवाच
आकर्ण्य तस्या वचनं वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः।
स्वयं च सर्वकृत्यज्ञो नान्यत्किंचन पृष्टवान्॥
अथ तां नियतात्मानं तपसेति धृतोद्यमाम्।
प्रोवाच मनसा स्मृत्वा शंकरं भक्तवत्सलम्॥ ५९
वसिष्ठ उवाच
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः
परमः परमाराध्यः शम्भुर्मनसि धार्यताम्॥ ६०
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३२७
नदी चन्द्रभाग पर्वतके विशाल पश््चिमीभागको तोड़कर
समुद्रको ओर उसी प्रकार जा रही थी, जैसे हिमालयसे
गंगा समुद्रमें जाती है॥ ४७-४८॥
उस चन्द्रभाग पर्वतपर बुहल्लोहित सरोवरके
तटपर स्थित सन्ध्याको देखकर वसिष्ठजी आदरपूर्वक
उससे पूछने लगे-- ॥ ४९ ॥
'बसिष्ठजी बोले--हे भद्रे! इस निर्जन पर्वतपर
तुम किसलिये आयी हो, तुम किसकी कन्या हो और
यहाँ क्या करना चाहती हो ? पूर्ण चनद्रमाके समान तुम्हारा
मुख मलिन क्यों हो गया है ? यदि कोई गोपनीय बात
न हो, तो बताओ, मुझे सुनेकी इच्छा है ॥ ५०-५१॥
ब्रह्माजी बोले-उन महात्मा वसिष्ठकी बात
सुनकर उन्हें महात्मा, प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी,
ब्रह्मचारी तथा जटाधारी देखकर और आदरपूर्वक
प्रणामकर सन्ध्या उन तपोधन वसिष्ठसे कहने लगी--
॥ ५२-५३ ॥
सन्ध्या बोली--हे विभो! मैं जिस उद्देश्यसे
इस सिद्धपर्वतपर आयी हूँ, वह तो आपके दर्शनमात्रसे
ही पूर्ण हो जायगा॥ ५४॥
हे ब्रह्मन्! मैं तप करनेके लिये इस निर्जन
पर्वतपर आयी हूँ, मैं ब्रह्माकी पुत्री हूँ और सन्ध्या
नामसे प्रसिद्ध हूँ॥ ५५॥
यदि आपको उचित जान पड़े, तो मुझे उपदेश
कीजिये। मैं तपस्या करना चाहती हूँ, अन्य कुछ भी
गोपनीय नहीं है॥५६॥
में तपस्याकी कोई विधि बिना जाने ही तपोवनमें
आ गयी हूँ। इसी चिन्तासे मैं सूखती जा रही हूँ तथा
मेरा हृदय काँप रहा है ॥ ५७॥
ब्रह्माजी बोले--ब्रह्मज्ञानी वसिष्ठजीने उसकी
बात सुनकर पुनः सन्ध्यासे कुछ नहीं पूछा; क्योंकि
वे सभी बातें जानते थे। इसके बाद वे मनमें
भक्तवत्सल शंकरजीका स्मरणकर तपस्याके लिये
उद्यम करनेवाली तथा मनको वशमें रखनेवाली उस
सन्ध्यासे कहने लगे-- ॥ ५८-५९॥
बसिष्ठजी बोले-[हे देवि!] जो महान्.
तेजःस्वरूप, महान् तप तथा परम आराध्य हैं, उन
शम्भुका मनमें ध्यान करो॥ ६०॥
३२८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ह
धर्मार्थकाममोक्षाणां य एकस्त्वादिकारणम्।
तमेकं जगतामाद्यं भजस्व पुरुषोत्तमम्॥ ६१
मंत्रेणानेन देवेशं शम्भुं भज शुभानने।
तेन ते सकलावाप्तिर्भविष्यति न संशयः॥ ६२
ॐ नमः शंकरायेति ओमित्यन्तेन सन्ततम्।
मौनं तपः समारम्भं तन्मे निगदतः श्ृणु॥ ६३
स्नानं मौनेन कर्तव्यं मौनेन हरपूजनम्।
द्वयोः पूर्णजलाहारं प्रथमं षष्ठकालयोः॥ ६४
तृतीये षष्ठकाले तु ह्युपबासपरो भवेत्।
एवं तपःसमाप्तौ वा षष्ठे काले क्रिया भवेत्॥ ६५
एवं मोनतपस्याख्या ब्रह्मचर्यफलप्रदा।
सर्वाभीष्टप्रदा देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ६६
एवं चित्ते समुद्दिश्य कामं चिंतय शंकरम्।
स ते प्रसन्न इष्टार्थमचिरादेव दास्यति॥ ६७
ब्रह्मोवाच
उपविश्य वसिष्ठोऽथ संध्यायै तपसः क्रियाम्।
तमाभाष्य यथान्यायं तत्रैवान्तर्दधे मुनिः ॥ ६८
जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके
तथा अद्वैतस्वरूप हैं, उन्हीं संसारके एकमात्र आदिकारण
पुरुषोत्तमका भजन करो॥६१॥
हे शुभानने! तुम इस मन्त्रसे देवेश्वर शम्भुका
भजन करो, उससे तुम्हें समस्त पदार्थोकी प्राप्ति हो
जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ ६२॥
“ॐ नमः शंकराय ३' इस मन्त्रसे मौत
होकर इस प्रकार तपस्याका प्रारम्भ करो, [विशेष
विधि] तुमको बता रहा हूँ, सुनो॥ ६३॥
मौन होकर स्नान तथा मौन होकर सदाशिवकी
पूजा करनी चाहिये। प्रथम दोनों षष्ठकालोंमें जलका
आहारकर तीसरे षष्ठकालमें उपवास करे। इस प्रकार
षष्ठकालिक क्रिया तपस्याकी समाप्तिपर्यन्त करनी
चाहिये ॥ ६४-६५॥
हे देवि! इसका नाम मौन तपस्या है। इसे
करनेसे यह ब्रह्मचर्यका फल प्रदान करनेवाली तथा
सभी अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है, यह सत्य है,
सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ६६॥
इस प्रकार चित्तमें विचार करके सदाशिवका
गहन चिन्तन करो, [ऐसा करनेसे] वे तुम्हारे ऊपर
प्रसन्न होकर शीघ्र ही अभीष्ट फल प्रदान करेंगे॥ ६७॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार मुनि वसिष्ठ वहाँ
बैठकर सन्ध्याको तपस्याकी यथोचित विधि बताकर
अन्तर्धान हो गये॥ ६८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे संध्याचरित्रवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सन्थ्याचरित्रवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५ ॥
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अथ षष्ठोऽध्यायः
सनध्याद्वारा तपस्या करना, प्रसन्न हो भगवान् शिवका उसे दर्शन देना, सम्ध्याद्वारा
की गयी शिवस्तुति, सन्ध्याको अनेक बरोंकी प्राप्ति तथा महर्षि
मेधातिथिके यज्ञमें जानेका आदेश प्राप्त होना
ब्रह्मोवाच
सुतवर्य महाप्राज्ञ शृणु संध्यातपो महत्।
ब्रह्माजी बोले-हे पुत्रवर! हे महाप्राज!
अब सल्ध्याके द्वारा किये गये महान् तपको सुनिये!
जिसके सुननेसे पापसमूह उसी क्षण निश्चय
यच्छुत्वा नश्यते पापसमूहस्तत्क्षणाद् ध्रुवम्॥ १ | नष्ट हो जाता है॥ १॥
अ० ६]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३२९
SS Rs
उपदिश्य तपोभावं वसिष्ठे स्वगृहं गते।
संध्यापि तपसो भावं ज्ञात्वा मोदमवाप ह॥ २
ततः सानंदमनसो वेषं कृत्वा तु यादृशम्।
तपश्चर्त समारेभे बृहल्लोहिततीरगा॥ ३
यथोक्तं तु वसिष्ठेन मंत्रं तपसि साधनम्।
मंत्रेण तेन सद्भक्त्या पूजयामास शंकरम्॥ ४
एकान्तमनसस्तस्याः कुर्वन्त्याः सुमहत्तपः।
शंभौ विन्यस्तचित्ताया गतमेकं चतुर्युगम्॥ ५
प्रसन्नोऽभूत्तदा शंभुस्तपसा तेन तोषितः।
अंतर्बहिस्तथाकाशे दर्शयित्वा निजं वपुः॥ ६
यद्रूपं चिंतयंती सा तेन प्रत्यक्षतां गतः॥ ७
अथ सा पुरतो दृष्ट्या मनसा चिंतितं प्रभुम्।
प्रसन्नवदनं शांतं मुमोदातीव शंकरम्॥ ८
ससाध्वसमहं वक्ष्ये किं कथं स्तौमि वा हरम्।
इति चिंतापरा भूत्वा न्यमीलयत चक्षुषी॥ ९
निमीलिताश्ष्यास्तस्यास्तु प्रविश्य हृदयं हरः।
दिव्यं ज्ञानं ददौ तस्ये वाचं दिव्ये च चक्षुषी ॥ १०
दिव्यज्ञानं दिव्यचक्षुर्दिव्यां वाचमवाप सा।
प्रत्यक्षं वीक्ष्य दुगं तुष्टाव जगतां पतिम्॥ १
संध्योवाच
निराकारं ज्ञानगम्यं परं यः
नैव स्थूलं नापि सूक्ष्मं न चोच्चम्।
अंतश्चिन्त्यं योगिभिस्तस्य रूपं
तस्मै तुभ्यं लोककत्रें नमोऽस्तु॥ १२
सर्व शांतं निर्मलं निर्विकारं
ज्ञानागम्यं स्वप्रकाशेऽविकारम्।
खाध्वप्रख्य॑ ध्वांतमार्गात्परस्तादः
रूपं यस्य त्वां नमामि प्रसन्तम्॥ १३
तपस्याका उपदेशकर वसिष्ठजीके अपने घर
चले जानेपर सन्ध्या भी तपस्याकी विधिको जानकर
अत्यन्त हर्षित हो गयी॥ २॥
वह बृहल्लोहितसरके सन्निकट प्रसन्नचित्त होकर
अनुकूल वेष धारण करके तपस्या करने लगी॥ ३॥
बसिष्ठजीने तपस्याके साधनभूत जिस मन्त्रको
बताया था, उस मन्त्रसे वह शंकरजीका पूजन करने
लगी॥ ४॥
इस प्रकार सदाशिवमें चित्त लगाकर एकाग्र
मनसे घोर तपस्या करती हुई उस सन्ध्याका एक
चतुर्युग बीत गया॥५॥
उसके पश्चात् उस तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवजी
उसके ऊपर प्रसन्न हो गये और बाहर-भीतर
तथा आकाशमें उसे अपना विग्रह दिखाकर, वह
[शिवजीके] जिस रूपका ध्यान करती थी, उसी
रूपसे उसके समक्ष प्रकट हो गये॥ ६:७॥
सन्ध्या अपने मनमें चिन्तित, प्रसन्तमुख तथा
शान्तस्वरूप भगवान् शिवको सामने देखकर बहुत
प्रसन्न हुई॥ ८॥
मैं शिवजीसे क्या कहूँ तथा किस प्रकार इनको
स्तुति करूँ-इस प्रकार चिन्तित होकर सम्ध्याने
भयपूर्वक अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया। तब नेत्र बन्द
की हुई उस सन्ध्याके हृदयमें प्रविष्ट होकर शिवजीने
उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य वाणी और दिव्य चक्षु प्रदान
किये॥ ९-१० ॥
इस प्रकार उसने दिव्य ज्ञान, दिव्य चक्षु,
दिव्य वाणी प्राप्त की और जगत्पति दुर्गेशको प्रत्यक्ष
खड़ा देखकर वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने
लगी-॥ ११॥
सन्ध्या बोली--जिनका रूप निराकार, ज्ञानगम्य
तथा पर है; जो न स्थूल, न सूक्ष्म, न उच्च ही है तथा
जो योगियोंके द्वारा अन्तःकरणसे चिन्त्य है, ऐसे
रूपवाले लोककर्ता आपको नमस्कार है॥ १२॥
जिनका रूप सर्वस्वरूप, शान्त, निर्मल, निर्विकार,
ज्ञानसे परे, अपने प्रकाशमें स्थित, विकाररहित,
आकाशमार्गस्वरूप एवं अन्धकारमार्गसे परे तथा प्रसन्न
रहनेवाला है, ऐसे आपको नमस्कार है। जिनका रूप
३३०
श्रीशिवमहापुराण
[अ ६
एकं शुद्धं दीप्यमानं विनाजां
चिदानंदं सहजं चाविकारि।
नित्यानंदं सत्यभूतिप्रसन्नं
यस्य श्रीदं रूपमस्मै नमस्ते॥
विद्याकारोद्भावनीयं प्रभिन्नं
सत्त्वच्छंदं ध्येयमात्मस्वरूपम्।
सारं पारं पावनानां पवित्रं
तस्मै रूपं यस्य चैवं नमस्ते॥ १५
यत्त्वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञं
रत्नाकल्पं स्वच्छकर्पूरगौरम्।
इष्टाभीती शूलमुंडं दधानं
हस्तैर्नमो योगयुक्ताय तुभ्यम्॥ १६
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरिव च।
पुनः कालश्च रूपाणि यस्य तुभ्यं नमोऽस्तु ते॥ १७
प्रधानपुरुषौ यस्य कायत्वेन विनिर्गतौ।
तस्मादव्यक्तरूपाय शंकराय नमो नमः॥ १८
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णुः कुरुते स्थितिम्।
संहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः॥ १९
जमो
नमः कारणकारणाय
दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय ।
प्रकाशरूपाय परात्पराय॥ २०
यस्यापरं नो जगदुच्यते पदात्
क्षितिर्दिशः सूर्य इंदुर्मनोज:।
बहिर्मुख नाभितश्चान्तरिक्षं
तस्मै तुभ्यं शंभवे मे नमोऽस्तु॥ २१
त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हर: ।
सद्ब्रह्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः॥ २२
यस्य नादिर्न मध्यं च नान्तमस्ति जगद्यत: ।
कथं स्तोष्यामि तं देवं वाङ्मनोऽगोचरं हरम्॥ २३
एक (अद्वितीय), शुद्ध, देदीप्यमान, मायारहित,
सहज, विकाररहित, नित्यानन्दस्वरूप, सत्य और
युक्त, प्रसन्न रहनेवाला तथा समस्त श्रीको प्रदान करनेवाला
है, उन आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥
जिनका रूप महाविद्याके द्वारा ध्यान करनेयोग्य
सबसे सर्वथा भिन्न, परम सात्त्विक, ध्येयस्वरूप
आत्मस्वरूप, सारस्वरूप, संसारसागरसे पार करनेवाला
है और पवित्रको भी पवित्र करनेवाला है, उन आपको
नमस्कार है॥ १५॥
जिनका आकार शुद्धरूप, मनोज्ञ, रत्नके समान
स्वच्छ, कर्पूरके समान गौरवर्ण और हाथोंमें वर्
अभयमुद्रा, शूल-मुण्डको धारण करनेवाला है, उन
आप योगयुक्त [सदाशिव]-को नमस्कार है॥ १६॥
आकाश, पृथिवी, दिशाएँ, जल, ज्योति और काल
जिनके स्वरूप हैं, ऐसे आपको नमस्कार है ॥ १७॥
जिनके शरीरसे प्रधान एवं पुरुषकी उत्पत्ति
हुई है, उन अव्यक्तस्वरूप आप शंकरको बार-बार
नमस्कार है॥ १८॥
जो ब्रह्मारूप होकर [इस जगतूकी] सृष्टि करते
हैं, विष्णुरूप होकर पालन करते हैं तथा रुद्ररूप
होकर संहार करते हैं, उन आपको बार-बार नमस्कार
है॥ १९॥
कारणोंके कारण, दिव्य अमृतस्वरूप ज्ञानसम्पदा
देनेवाले, समस्त लोंकोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले,
प्रकाशस्वरूप तथा परात्पर [शंकर]-को बार-बार
नमस्कार है॥ २०॥
जिनके अतिरिक्त यह जगत् और कुछ नहीं है।
जिनके पैरसे पृथिवी, दिशाएँ सूर्य, चन्द्रमा, कामदेव
तथा बहिर्मुख (अन्य देवता) और नाभिसे अन्तरि
उत्पन्न हुआ है, उन आप शम्भुको मेरा नमस्कार हैं॥ २१॥
हे हर! आप सर्वश्रेष्ठ तथा परमात्मा हैं, आप
विविध विद्या हैं, सद्ब्रह्म, परब्रह्म तथा ज्ञानपरायरण
हैं॥ २२॥
जिनका न आदि है, न मध्य है तथा न अती
है और जिनसे यह समस्त संसार उत्पन्न हुआ €'
वाणी, तथा मनसे अगोचर उन सदाशिवकी
किस प्रकार करूँ?॥ २३॥
अ० ६]
यस्य ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च तपोधना: ।
न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीयः कथं स मे॥ २४
स्त्रिया मया ते किं ज्ञेया निर्गुणस्य गुणाः प्रभो।
नैव जानन्ति यद्रूपं सेन्द्रा अपि सुरासुराः ॥ २५
नमस्तुभ्यं महेशान नमस्तुभ्यं तपोमय।
प्रसीद शंभो देवेश भूयो भूयो नमोऽस्तु ते॥ २६
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः संस्तुतः परमेश्वरः ।
सुप्रसन्नतरश्चाभूच्छंकरो भक्तवत्सलः॥ २७
अथ तस्याः शरीरं तु वल्कलाजिनसंयुतम्।
परिच्छन्नं जटाब्रातैः पवित्रे मूर्ध्नि राजितैः ॥ २८
हिमानीतर्जिताम्भोजसदूशं वदनं तदा।
निरीक्ष्य कृपयाविष्टो हरः प्रोवाच तामिदम्॥ २९
महेश्वर उवाच
प्रीतोऽस्मि तपसा भद्रे भवत्याः परमेण वै।
स्तवेन च शुभप्राज्ञे वरं वरय सांप्रतम्॥ ३०
येन ते विद्यते कार्य वरेणास्मिन्मनोगतम्।
तत्करिष्ये च भद्रं ते प्रसन्नोऽहं तव व्रतेः॥ ३१
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा महेशस्य प्रसन्नमनसस्तदा।
संध्योवाच सुप्रसन्ना प्रणम्य च मुहुर्मुहुः॥ ३२
सन्ध्योवाच
यदि देयो वरः प्रीत्या वरयोग्यास्म्यहं यदि।
यदि शुद्धासम्यहं जाता तस्मात्पापान्महेश्वर॥ ३
यदि देव प्रसन्नोऽसि तपसा मम साम्मप्रतम्।
वृतस्तदायं प्रथमं वरो मम विधीयताम्॥ ३४
उत्पन्नमात्रा देवेश प्राणिनोऽस्मिन् भुवस्थले।
ज भवन्तु समेनैव सकामाः संभवन्तु वै॥ ३५
यद्धि वृत्ता हि लोकेषु त्रिष्वपि प्रथिता यथा।
भविष्यामि तथा जान्या बर एको वृतो मया॥ ३६
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३३९
ब्रह्मा आदि देवगण तथा तपोधन महर्षि भी
जिनके रूपोंका वर्णन नहीं कर पाते हैं, उनका वर्णन
मैं किस प्रकार कर सकती हूँ ?॥ २४॥
हे प्रभो! इन्द्रसहित समस्त देवगण तथा
सभी असुर भी जब आपके रूपको नहीं जानते, तो
आप-जैसे निर्गुणके गुणोंको मेरे-जैसी स्त्री किस
प्रकार जान सकती है॥ २५॥
हे महेशान! आपको नमस्कार है । हे तपोमय!
आपको नमस्कार है। हे शम्भो ! हे देवेश! आपको बार-
बार नमस्कार है, आप [मेरे ऊपर] प्रसन्न होइये ॥ २६॥
ब्रह्माजी बोले--सन्ध्याके द्वारा स्तुत भक्तवत्सल
परमेश्वर सदाशिव उसके वचनको सुनकर परम
प्रसन्न हो गये॥ २७॥
वे शिव वल्कल तथा कृष्णमृगचर्मयुक्त उसके
शरीरको, जटासे आच्छन्न एवं पवित्री धारण किये
हुए उसके सिरको तथा तुषारपातसे मुरझाये हुए
'कमलके समान उसके मुखको देखकर दयामय होकर
उससे इस प्रकार कहने लगे ॥ २८-२९॥
महेश्वर बोले--हे भद्रे! तुम्हारी इस उत्कृष्ट
तपस्यासे तथा तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
हे शुभम्राज्ञे! अब तुम वर माँगो॥ ३०॥
जो भी तुम्हारा अभीष्ट हो तथा जिससे तुम्हारा
कार्य पूर्ण हो, वह सब मैं करूँगा। हे भद्रे! तुम्हारी
इस तपस्यासे मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ॥ ३१॥
ब्रह्माजी बोले--महेश्वरका वचन सुनकर सन्ध्या
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें बार-बार प्रणामकर इस
प्रकार कहने लगी--॥ ३२॥
सन्ध्या बोली-हे महेश्वर! यदि आप
प्रसन्नतापूर्वक वर देना चाहते हैं, यदि मैं आपसे वर
ग्राप्त करनेयोग्य हूँ तथा यदि मैं उस पापसे सर्वथा
विशुद्ध हो गयी हूँ और हे देव! यदि आप इस समय
मेरे तपसे प्रसन्न हैं, तो पहले मैं यह वर माँगती हूँ,
उसे दीजिये। हे देवाधिदेव! इस आकाश तथा
पृथिवीमें उत्पन्न होते ही कोई भी प्राणी सद्यः
कामयुक्त न हो। हे प्रभो! मैं अपने आचरणसे तीनों
लोकोंमें इस प्रकार प्रसिद्ध होऊं, जैसी और कोई
दूसरी स्त्री न हो, एक और वर माँगती हूँ। मेरे द्वारा
३३२
श्रीशिवमहापुराण
[अठ \
सकामा मम सृष्टिस्तु कुत्रचिन्न पतिष्यति।
यो मे पतिर्भवेन्नाथ सोऽपि मेऽतिसुहृच्च वै॥ ३७
यो द्रक्ष्यति सकामो मां पुरुषस्तस्य पौरुषम्।
गमिष्यति तदा नाशं स च क्लीबो भविष्यति॥ ३८
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्याः शंकरो भक्तवत्सलः ।
उवाच सुप्रसन्नात्मा निष्पापायास्तयेरिते॥ ३९
महेश्वर उवाच
श्रृणु देवि च संध्ये त्वं त्वत्पापं भस्मतां गतम्।
त्वयि त्यक्तो मया क्रोधः शुद्धा जाता तप:करात्॥ ४०
यद्यद्वृतं त्वया भद्रे दत्तं तदखिलं मया।
सुप्रसन्नेन तपसा तव संध्ये वरेण हि॥ ४१
प्रथमं शैशवो भावः कोमाराख्यो द्वितीयकः।
तृतीयो यौवनो भावश्चतुर्थों वार्धकस्तथा॥ ४२
तृतीये त्वथ संप्राप्ते वयोभागे शरीरिणः।
सकामाः स्युद्वितीयान्ते भविष्यति क्वचित् क्वचित्॥ ४३
तपसा तव मयांदा जगति स्थापिता मया।
उत्पन्नमात्रा न यथा सकामाः स्यु: शरीरिणः ॥ ४४
त्वं च लोके सतीभावं तादृशं समवाप्नुहि।
त्रिषु लोकेषु नान्यस्या यादृशं संभविष्यति॥ ४५
यः पश्यति सकामस्त्वां पाणिग्राहमृते तव।
स सद्य: क्लीबतां प्राप्य दुर्बलत्वं गमिष्यति॥ ४६
पतिस्तव महाभागस्तपोरूपसमन्वितः ।
सप्तकल्पांतजीवी च भविष्यति सह त्वया ॥ ४७
इति ते ये वरा मत्त: प्रार्थितास्ते कृता मया।
अन्यच्च ते वदिष्यामि पूर्वजन्मनि संस्थितम् ॥ ४८
अग्नौ शरीरत्यागस्ते पूर्वमेव प्रतिश्रुतः।
तदुपायं वदामि त्वां तत्कुरुष्व न संशय: ॥ ४९
उत्पन्न की गयी कोई भी सन्तति सकाम होकर
न हो और हे नाथ! जो मेरा पति हो, वह भी मेर
अत्यन्त सुहृद् बना रहे। [मेरे पतिके अतिरिक्त] जे
कोई भी पुरुष मुझे सकाम दृष्टिसे देखे, उसका पौरुष
नष्ट हो जाय और वह नपुंसक हो जाय ॥ ३३-.. ३८॥
ब्रह्माजी बोले-निष्पाप समन्ध्याके डर
प्रकारके वचनोंको सुनकर तथा उससे प्रेरित होकर
भक्तवत्सल भूतभावन शंकर प्रसन्नचित्त होकर कहने
| लगे--॥ ३९॥
सुनो। तुम्हारा पाप
तुम्हारे ऊपर नहीं है 3
| चुकी हो। हे भद्रे! हे सन्ध्ये!
मैंने वह सब
अब ग्राणियोंका प्र
दूसरा कौमार भाव, तीसरा
वार्धक्य भाव होगा॥ ४२॥
बरी तीसरी अवस्था आनेपर स
कोई-कोई प्राणी दूसरीके सकाम
मैने तुम्हारी तपस्यासे संसारमें य
स्थापित कर दी कि शरीरधारी उत्पन्न होते ही
नहीं होंगे॥ ४४॥
तुम इस लोकमें ऐसा सतीभाव प्राप्त करोगी,
जैसा तीनों लोकोंमें किसी अन्य स्त्रीका नहीं होगा ॥ ४५॥
तुम्हारे पतिके अतिरिक्त जो तुमको सकाम
दृष्टिसे देखेगा, वह तत्काल नपुंसक होकर दुर्बल हो
जायगा॥ ४६॥
तुम्हारा पति महान् भाग्यशाली, तपस्वी तथा
रूपवान् होगा। वह तुम्हारे साथ सात कल्योतर्क
जीवित रहेगा ॥ ४७॥
इस प्रकार तुमने जो-जो वर मुझसे माँगा, 3
सभी वरोंको मैंने प्रदान किया। अब में
जन्मान्तरकी कुछ बातें कहूँगा॥ ४८॥
तुम अग्निमें अपने शरीरत्याग करनेकी प्रश
पहले ही कर चुकी हो, अत: उसका उपाय मैं तुमकी
बता रहा हूँ, उसे निश्चित रूपसे करो॥ ४९॥
अ०६]
स च मेधातिथेर्यज्ञे मुनेद्वादशवार्षिके।
कृत्सतप्रज्चलिते वह्लावचिरात् क्रियतां त्वया ॥ ५०
एतच्छैलोपत्यकायां चन्द्रभागानदीतटे।
मेधातिथिर्महायज्ं कुरुते तापसाश्रमे॥ ५१
तत्र गत्वा स्वयं छंदं मुनिभिनोपलक्षिता।
मत्प्रसादाद्वह्लिजाता तस्य पुत्री भविष्यति॥ ५२
यस्ते बरो वाञ्छनीयः स्वामी मनसि कश्चन।
तं निधाय निजस्वान्ते त्यज वह्यो वपुः स्वकम्॥ ५३
यदा त्वं दारुणं संध्ये तपश्चरसि पर्वते।
यावच्चतुर्युगं तस्य व्यतीते तु कृते युगे॥ ५४
त्रेतायाः प्रथमे भागे जाता दक्षस्य कन्यका: ।
यास्ताः शीलसमापन्ना यथायोग्यं विवाहिता: ॥ ५५
तन्मध्ये स ददौ कन्या विधवे सप्तविंशतिः।
चन्द्रोऽन्याः सम्परित्यज्य रोहिण्यां प्रीतिमानभूत्॥ ५६
त्द्धेतोर्हि यदा चन्द्रः शप्तो दक्षेण कोपिना।
तदा भवत्या निकटे सर्वे देवाः समागताः॥ ५७
न दृष्टाश्च त्वया संध्ये ते देवा ब्रह्मणा सह।
मयि विन्यस्तमनसा खं च दृष्ट्वा लभेत्पुन: ॥ ५८
चंद्रस्य शापमोक्षार्थ. जाता चंद्रनदी तदा।
सृष्टा धात्रा तदैवात्र मेधातिधिरुपस्थितः॥ ५९
तपसा तत्समो नास्ति न भूतो न भविष्यति।
येन यज्ञः समारब्धो ज्योतिष्टोमो महाविधिः ॥ ६
तत्र प्रज्वलितो वहिस्तस्मिन्त्यज वपुः स्वकम्।
इदानीं सुपवित्रा त्वं संपूर्णोऽस्तु पणस्तव॥ ६१
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३२३२
वह उपाय यही है कि तुम महर्षि मेधातिथिके
बारह वर्षतक चलनेवाले यञ्ञमें प्रचण्डरूपसे जलती
हुई अग्निमें शीघ्रतासे प्रवेश करो ॥ ५०॥
इस समय मेधातिथि इसी पर्वतकी तलहरीमें
चन्द्रभागा नदीके तटपर तपस्वियोंके आश्रममें महान्
यज्ञ कर रहे हैं॥५१॥
वहाँ तुम अपनी इच्छासे जाकर मेरे प्रसादसे
मुनियोंसे अलक्षित रहती हुई अग्निमें प्रवेश कर
जाओ, फिर तुम यज्ञाग्निसे प्रकट होकर मेधातिथिकी
पुत्री बनोगी ॥ ५२॥
तुम्हारे मनमें जो कोई भी श्रेष्ठ पतिके रूपमें
वांछनीय हो, उसे अपने अन्तःकरणमें रखकर अग्निमें
अपना शरीर छोड्ना॥ ५३॥
हे सन्ध्ये! तुम इस पर्वतपर चारयुगसे घोर
तपस्या कर रही हो, कृतयुगके बीत जानेपर और
त्रेताका प्रथम भाग आनेपर दक्षकी जो शीलसम्मन्न
कन्याएँ उत्पन्न हुई, वे यथायोग्य विवाहित हुई,
उनमेंसे उन्होंने सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको [विवाहः
विधिद्वारा] प्रदान कीं, किंतु चन्द्रमा उन सभीको
छोड़कर रोहिणीमें प्रीति करने लगा॥ ५४--५६॥
इस कारण जब दक्षने क्रोधसे चन्द्रमाको शाप
दे दिया, तब सभी देवता तुम्हारे पास आये थे॥ ५७॥
हे सन्ध्ये! उस समय तुम मेरा ध्यान कर रही
थी, इसलिये वे देवगण जो ब्रह्माजीके साथ आये हुए
थे, तुमने उनकी तरफ देखा नहीं; क्योंकि तुम
आकाशकी ओर देख रही थी, अब तुमने मेरा दर्शन
प्राप्त कर लिया है ॥ ५८॥
तब ब्रह्माजीने चन्द्रमाके शापको दूर करनेके
लिये इस चन्द्रभागा नदीका निर्माण किया है, उसी
समय यहाँ मेधातिथि उपस्थित हुए थे॥५९॥
तपस्यामें उनके समान न तो कोई है, न कोई
होनेवाला है और न कोई हुआ है। उन्होंने ही इस
चन्द्रभागा नदीके तटपर विधिपूर्वक ज्योतिष्टोम यज्ञका
आरम्भ किया है॥ ६०॥
वहाँ अग्नि प्रज्वलित हो रही है, उसीमें अपने
शरीरको छोड़ो। इस समय तुम अत्यन्त पवित्र हो,
तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो॥ ६१॥
३३४
्रीशिवमहापुराण [अ०७
'एतन्मया स्थापितं स्वकार्यार्थ भो तपस्विनि।
तत्कुरुष्व महाभागे याहि यज्ञे महामुनेः।
है तपस्विनि! अपने कार्यकी एतमा स्थापित स्वकार्यर्थ भो तपस्विनि। | है तपस्विनि! अपने कार्यकी सिङे ङ
यह विधि बतायी है। अत: हे महाभागे! तुम यहां
मुनिके यज्ञमें जाओ और इसे करो। इस प्रकार बे
कृत्वा हितं च देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ६२ | देवेश उसका हित करके वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ६२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसांहितायां द्वितीये सतीखण्डे संध्याचरित्रवर्णनं नाम षष्ठोऽध्याय; ॥६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सन्ध्याचरित्रवर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६ ॥
०00:
अथ सप्तमोऽध्यायः
महर्षि मेधातिथिकी यज्ञाग्निमें सन्ध्याद्वारा शरीरत्याग, पुनः अरुन्धतीके रूपमें
यज्ञाग्निसे उत्पत्ति एवं वसिष्ठमुनिके साथ उसका विवाह
ब्रह्मोवाच
वरं दत्त्वा मुने तस्मिन् शंभावन्तर्हिते तदा।
संध्याप्यगच्छत्तत्रैव यत्र मेधातिथिर्मुनिः॥
तत्र शंभोः प्रसादेन न केनाप्युपलक्षिता।
सस्मार वर्णिनं तं वे स्वोपदेशकरं तपः॥
वसिष्ठेन पुरा सा तु वर्णीभूत्वा महामुने।
उपदिष्टा तपश्चर्तु वचनात्परमेष्ठिनः॥
तमेव कृत्वा मनसा तपश्चर्योपदेशकम्।
पतित्वेन तदा संध्या ब्राह्मणं ब्रह्मचारिणम्॥
समिद्धेऽग्नौ महायज्ञे मुनिभिनोंपलक्षिता।
हृष्टा शंभूप्रसादेन सा विवेश विधेः सुता॥
तस्याः पुरोडाशमयं शरीरं तत्क्षणात्ततः।
दग्धं हव्यमयं गन्धं तस्तार यदलक्षितम्॥
वह्निस्तस्याः शरीरं तु दग्ध्वा सूर्यस्य मंडलम्।
शुद्धं प्रवेशयामास शंभोरेवाज्ञया पुनः॥
सूर्यो द्व्यर्धं विभज्याथ तच्छरीरं तदा रथे।
स्वके संस्थापयामास प्रीतये पितृदेवयोः॥
तदूर्ध्वभागस्तस्यास्तु शरीरस्य मुनीश्वर।
प्रातःसंध्याभवत्सा तु अहोरात्रादिमध्यगा॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार भगवान् सदाशिव
जब सन्ध्याको वर प्रदानकर अन्तर्धान हो गये, तब
सन्ध्या वहाँ गयी, जहाँ महर्षि मेधातिथि थे॥ १॥
वहाँपर भगवान् सदाशिवकी कृपासे उसे किसीने
नहीं देखा। उसने उस समय तपस्याके विषयमें
उपदेश करनेवाले उन ब्रह्मचारीका स्मरण किया॥ २॥
हे महामुने! वे ब्रह्मचारी वसिष्ठ मुनि ही थे, जो
ब्रह्माजीकी आज्ञासे ब्रह्मचारीका रूप धारणकर सन्ध्याको
तपस्याके सम्बन्धमें उपदेश करने आये थे॥ ३॥
तपश्चर्याका उपदेश करनेवाले उन्हीं ब्रह्मचारी
ब्राह्मण [वसिष्ठ]-का पतिरूपसे स्मरण करके वरह
ब्रहमपत्री सन्ध्या प्रसन्नमनसे सदाशिवकी कृपासे
मुनियांद्वारा अलक्षित हो उस महायज्ञकी प्रज्वलित
अग्निमें प्रवेश कर गयी ॥ ४-५ ॥
उसका समस्त शरीर पुरोडाशके समान तत्क्षण
ही जलकर राख हो गया, जिससे अलक्षित रूपसे
पुरोडाशका गन्ध चारों ओर फैल गया॥ ६॥
पुनः सदाशिवकी आज्ञासे अग्निने उसके शुड
शरीरको भस्मकर सूर्यमण्डल मे प्रविष्ट करा दिया॥७॥
तदनन्तर सूर्यने उसके शरीरको दो
विभक्तकर पितरों एवं देवताओंकी प्रसन्तताके
अपने रथमें स्थापित कर लिया॥ ८॥
हे मुनीश्वर! उसके शरीरका जो ऊपरी
भाग था, वही रात्रि तथा दिनके बीचमें
प्रातःसन्ध्या हुई॥ ९ ॥
अ० ७]
तच्छेषभागस्तस्यास्तु अहोरात्रान्तमध्यगा।
सा सायमभवत्संध्या पितृप्रीतिप्रदा सदा॥ १०
सूर्योदयात्तु प्रथमं यदा स्यादरुणोदयः।
प्रातःसंध्या तदोदेति देवानां प्रीतिकारिणी॥ १९
अस्तं गते ततः सूर्ये शोणपदानिभे सदा।
उदेति सायंसंध्यापि पितृणां मोदकारिणी॥ १२
तस्याः प्राणास्तु मनसा शंभुनाथ दयालुना।
दिव्येन तु शरीरेण चक्रिरे हि शरीरिणः॥ १३
मुनेर्यज्ञावसाने तु संप्राप्ते मुनिना तु सा।
प्राप्ता पुत्री वह्निमध्ये तप्तकाञ्चनसुप्रभा॥ १४
तां जग्राह तदा पुत्रीं मुनिरामोदसंयुतः।
यज्ञार्थ तां तु संस्नाप्य निजक्रोडे दधौ मुने॥ १५
अरुन्धतीति तस्यास्तु नाम चक्रे महामुनिः।
शिष्यैः परिवृतस्तत्र महामोदमवाप ह॥ १६
न रुणद्धि यतो धर्म सा कस्मादपि कारणात्।
अतस्त्रिलोके विदितं नाम संप्राप तत्स्वयम्॥ १७
यज्ञं समाप्य स मुनिः कृतकृत्यभाव-
मासाद्य सम्मदयुतस्तनयाप्रलंभात्।
तस्मिन्निजाश्रमपदे सह शिष्यवगै-
सतामेव संततमसौ दयते सुरर्षे॥ १८
अथ सा ववृधे देवी तस्मिन्मुनिवराश्रमे।
चन्द्रभागानदीतीरे तापसारण्यसंज्ञके॥ १९
संप्राप्ते पञ्जमे वर्षे चन्द्रभागां तदा गुणैः।
तापसारण्यमधि सा पवित्रमकरोत्सती॥ २
विवाहं कारयामासुस्तस्या ब्रह्मसुतेन वै।
वसिष्ठेन हारुन्धत्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ २९
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३३५
जो उसके शरीरका शेष भाग था, वही दिन
तथा रात्रिके बीचमें होनेवाली सायंसन्ध्या हुई, जो
सदैव ही पितरोंकी प्रसन्नताका कारण होती है ॥ १० ॥
सूर्योदयके पहले जब अरुणोदय होता है, तब
देवताओंको प्रसन्न करनेवाली प्रात:सन्ध्याका उदय
होता है॥ ११॥
जब लाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाता
है, तब पितरोंको प्रसन्न करनेवाली सायंसन्ध्याका
उदय होता है॥ १२॥
उसके मनसहित प्राणको परम दयालु शिवने
शरीरधारियोंके दिव्य शरीरसे निर्मित किया था॥ १३॥
जब मेधातिथिका यज्ञ समाप्त हो रहा था, तब
उन्हें देदीप्यमान सुवर्णके समान कान्तिवाली वह
कन्या यज्ञाग्निमें प्राप्त हुई॥ १४॥
हे मुने! महामुनि मेधातिथिने यज्ञसे प्राप्त हुई
उस कन्याको बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण किया और उसे
स्नान कराकर अपनी गोदमें निठाया॥ १५॥
उन्होंने उसका नाम अरुन्धती रखा। [उस
कन्याको प्राप्तकर] वे शिष्योंके साथ बड़े ही हर्षित
हुए॥ १६॥
उसने किसी भी कारणके उपस्थित होनेपर
अपने पातितब्रत्यधर्मका परित्याग नहीं किया, इसलिये
त्रिलोकीमें उसने स्वयं यह प्रसिद्ध [अरुन्धती] नाम
धारण किया॥ १७॥
[ब्रह्माजी बोले-] हे सुरर्षे! यज्ञ समाप्त
करनेके उपरान्त बे मुनि कन्यारूप सम्मत्तिसे युक्त हो
अपने शिष्योंसहित अत्यन्त कृतकृत्य होकर अपने उस
आश्रममें उसका लालन-पालन करने लगे॥ १८॥
उसके बाद वह कन्या चन्द्रभागा नदीके तटपर
श्रेष्ठ मुनिके तापसारण्य नामक आश्रममें बढ़ने
लगी॥ १९॥
वह सती पाँच वर्षकी अवस्थामें अपने
गुणोंसे चनद्रभागा नदी तथा तापसारण्यको पवित्र करने
लगी॥ २०॥
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशने ब्रह्मपुत्र वसिष्ठके
साथ उस अरुन्धतीका विवाह करवाया॥ २१॥
३३६
श्रीशिवमहापुराण
[3s III
तद्विवाहे महोत्साहो बभूव सुखवर्धनः।
सर्वे सुराश्च मुनयः सुखमापुः परं मुने॥ २२
ब्रह्मविष्णुमहेशानां करनिस्सृततोयतः।
सप्तनद्यः समुत्पन्नाः शिप्राद्याः सुपवित्रकाः ॥ २३
अरुन्धती महासाध्वी साध्वीनां प्रवरोत्तमा।
वसिष्ठं प्राप्य संरेजे मेधातिथिसुता मुने॥ २४
यस्याः पुत्राः समुत्पन्नः श्रेष्ठाः शक्त्यादयः शुभाः ।
बसिष्ठं प्राप्य तं कान्तं संरेजे मुनिसत्तम॥ २५
एवं संध्याचरित्रं ते कथितं मुनिसत्तम।
पवित्रं परमं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम्॥ २६
य इदं श्रृणुयान्नारी पुरुषो वा शुभव्रतः।
सर्वान्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २७
हे मुने! उसके विवाहमें सुखदायक महा
उत्सव हुआ, जिससे सभी देवता तथा मुनिगण
अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ २२॥
[उस विवाहमें] ब्रह्मा, विष्णु तथा
हाथसे गिरे हुए जलसे शिप्रा आदि सात पवित्र नदियाँ
उत्पन्न हुईं॥ २३॥
हे मुने! साध्वी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ महासाध्वी
वह॒मेधातिथिकी कन्या अरुन्धती वसिष्ठको
[पतिरूपमें] प्राप्तकर अत्यन्त शोभित हुई ॥ २४॥
हे मुनिश्रेष्ठ! उससे शक्ति आदि श्रेष्ठ तथा
सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार वसिष्ठको पतिरूपें
प्राप्तकर वह शोभा पाने लगी॥ २५॥
हे मुनिसत्तम! इस प्रकार मैंने सन्ध्याका चरित
कहा, जो अत्यन्त पवित्र, दिव्य तथा सम्पूर्ण कामनाओंका
फल देनेवाला है ॥ २६॥
जो शुभ ब्रतवाला पुरुष अथवा नारी इस
चरित्रको सुनता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते
हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ २७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां खसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे अरुन्धतीवसिव्ठविवाहवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें अरुन्धती तथा
वसिष्ठके विवाहका वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
'कामदेवके सहचर वसन्तके आविर्भावका वर्णन
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणो हि प्रजापतेः ।
प्रसन्नमानसो भूत्वा तं प्रोवाच स नारदः॥ १
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग विष्णुशिष्य महामते।
धन्यस्त्वं शिवभक्तो हि परतत्त्वप्रदर्शक:॥ २
श्राविता सुकथा दिव्या शिवभक्तिविवर्धिनी।
अरुन्धत्यास्तथा तस्याः स्वरूपायाः परे भवे॥ ३
इदानीं ब्रूहि धर्मज्ञ पवित्रं चरितं परम्।
शिवस्य परपापध्नं मङ्गलप्रदमुत्तमम्॥ ४
सूतजी बोले-प्रजापति ब्रह्माजीका यह
वचन सुनकर प्रसन्नचित्त हो नारदजी उनसे कहते
लगे-॥ १॥
नारदजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग!
हे विष्णुशिष्य। हे महामते! परतत्त्वके प्रकाशक तथा
शिवभक्त आप धन्य हैं॥ २॥ रजन
हे धर्मज्ञ! आपने अरुन्धतीकी तथा पूर्वजन्म
उसको स्वरूपभूता सम्ध्याकी बड़ी उत्तम दिल
कथा सुनायी, जो शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाली हैं।
अब आप शिवका परम चरित्र जो सम्पूर्ण पापोंका
विनाशक है तथा मंगलको प्रदान करनेवाला है,
सुनाइये॥ ३-४॥
अ० ८]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३३७
गृहीतदारे कामे च हष्टे तेषु गतेषु च।
संध्यायां किं तपस्तप्तुं गतायामभवत्ततः॥ ५
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ऋषेवै भावितात्मनः।
सुप्रसन्ततरो भूत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत्॥ ६
ब्रह्मोवाच
श्रुणु नारद विप्रेन्द्र तदेव चरितं शुभम्।
शिवलीलान्वितं भवत्या धन्यस्त्वं शिवसेवकः॥ ७
अहं विमोहितस्तात यदैवान्तर्हितः पुरा।
अचिन्तयं सदाहं तच्छंभुवाक्यविषार्दितः॥ ८
चिन्तयित्वा चिरं चित्ते शिवमायाविमोहितः।
शिवे चेर्ष्यामकार्ष हि तच्छुणुष्व वदामि ते॥ ९
अथाहमगमं तत्र यत्र दक्षादयः स्थिताः।
सरतिं मदनं दृष्ट्वा समदोऽहं हि किञ्जन॥ १०
दक्षमाभाष्य सुप्रीत्या परान्यत्रांश्च नारद।
अवोचं वचनं सोऽहं शिवमायाविमोहितः॥ ११
ब्रह्मोवाच
हे दक्ष हे मरीच्याद्या: सुताः श्रृणुत मद्वचः ।
्रुत्वोपायं विधेयं हि मम कष्टापनुत्तये॥ १२
कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्या शम्भुरगर्हयत्।
मां च युष्मान्महायोगी धिक्कारं कृतवान्बहु॥ १३
तेन दुः खाभितप्तोऽहं लभेऽहं शर्म न क्वचित्।
यथा गृह्णातु कांतां स स यल: कार्यं एव हि॥ १४
यथा गृह्णतु कांतां स सुखी स्या दुःखवर्जितः।
दुर्लभ: स तु कामो मे परं मन्ये विचारतः॥
कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्वा शंभुरगर्हयत्।
मुनीनां पुरतः कस्मात्स कांतां सङ्ग्रहीष्यति॥ १६
जब कामने प्रसन्न होकर रतिको प्राप्त कर लिया
और ब्रह्मा तथा उनके मानसपुत्र चले गये तथा सन्ध्या
तप करने चली गयी, उसके बाद कया हुआ ?॥ ५॥
सूतजी बोले--इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञ देवर्षि
नारदका वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो ब्रह्माजी यह
बात कहने लगे ॥ ६॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हे विप्रेन्द्र!
शिवलीलासे परिपूर्ण अब उस महान् कल्याणकारी
शिव-चरित्रको सुनें। आप धन्य हैं; क्योंकि आप
शिवजीके भक्त हैं ॥७॥
हे तात! पहले जब मैं शिवमायासे मोहित होकर
अन्तर्धान हो गया, तब शिवके वाक्यरूपी विषसे दुखी
हो [अपने मनमें] विचार करने लगा॥ ८॥
शिवमायासे मोहित हुआ मैं बहुत देरतक अपने
चित्तमें विचार करके उनसे जिस प्रकार ईर्ष्या करने
लगा, उसे आपसे बताता हूँ, सुनिये॥ ९॥
तत्पश्चात् मैं वहाँ पहुँचा, जहाँ दक्ष आदि स्थित
थे और वहाँ रतिसहित कामदेवको देखकर मैं कुछ
मदमत्त हो गया॥ १०॥
हे नारद! दक्ष तथा अपने अन्य मानसपुत्रोंसे
प्रीतिपूर्वक बातचीत करके शिवमायासे विमोहित मैं
इस प्रकार उनसे कहने लगा-॥ ११॥
ब्रह्माजी बोले-हे दक्ष! हे मरीचि आदि
पुत्रो! मेरी बात सुनो और उसे सुनकर मेरे कष्टको
दूर करनेका उपाय करो॥ १२॥
स्त्रीके प्रति मेरी अभिलाषा देखकर महायोगी.
शिवने मेरी निन्दा की और उन्होंने मुझे तथा
तुमलोगोंको बहुत फटकारा॥ १३॥
उसके कारण मैं दुःखसे सन्तप्त हूँ और कहीं
भी मुझे चैन नहीं मिलता, अतः जिस प्रकार वे भी
स्त्रीको ग्रहण करें, वह यत्न करो॥ १४॥
जब वे स्त्रीको स्वीकार करेंगे, तभी हमारा वह
दुःख दूर होगा, किंतु विचार करनेपर मैं समझता हूँ.
कि यह कार्य बड़ा ही कठिन है॥ १५॥
जब उन्होंने मुनियोंके समक्ष ही मेरे कान्ता-
परिग्रहकी अभिलाषामात्रसे मुझे धिक्कारा, तो वे
स्वयं किस प्रकार स्त्री ग्रहण करेंगे ?॥ १६॥
३३८
का वा नारी त्रिलोकेऽस्मिन् या भवेत्तन्मन:स्थिता ।
'योगमार्गमवज्ञाय तस्य मोहं करिष्यति॥
मन्मथोऽपि समर्थो नो भविष्यत्यस्य मोहने।
नितांतयोगी रामाणां नामापि सहते न स:॥ १८
परिग्रहं विना चैव हरेण कथयादिना।
मध्यमा च भवेत्सृष्टिस्तद्वाचा नान्यवारिता॥ १९
भुवि केचिद्भविष्यन्ति मम वध्या महासुराः ।
वध्याः केचिद्धरर्नूनं केचिच्छंभोरुपायतः॥ २०
संसारविमुखे शंभौ तथैकान्तविरागिणि।
अस्मादृते न कर्मान्यत् करिष्यति न संशयः ॥ २१
इत्युक्त्वा तनयांश्चाहं दक्षादीन् सुनिरीक्ष्य च।
सरतिं मदनं तत्र सानंदमगदं ततः॥ २२
ब्रह्मोवाच
मत्पुत्रवर काम त्वं सर्वथा सुखदायकः।
मद्वचः श्रृणु सुप्रीत्या स्वपल्या पितृवत्सल॥ २३
अनया सहचारिण्या राजसे त्वं मनोभव।
एषा च भवता पत्या युक्ता संशोभते भूशम्॥ २४
यथा स्त्रिया हषीकेशो हरिणा सा यथा रमा।
क्षणदा विधुना युक्ता तया युक्तो यथा विधुः ॥ २५
तथैव युवयोः शोभा दांपत्यं च पुरस्कृतम्।
अतस्त्वं जगतः केतुर्विश्वकेतुर्भविष्यसि॥ २६
जगद्धिताय वत्स त्वं मोहयस्व पिनाकिनम्।
यथाशु सुमनः शंभुः कुर्याददरप्रतिग्रहम्॥ २७
श्रीशिवमहापुराण
[अ Is
इस त्रिलोकमें कौन-सी ऐसी स्त्री है, जो उके
मनमें विराजमान होकर, उन्हें योगमार्गसे हरा
मोहमें डाल सकती है ?॥ १७॥
कामदेव भी इन्हें मोहित करनेमें समर्थ नहीं है.
क्योंकि वे परमयोगी हैं और स्त्रियोंके नामको भर
सहन नहीं कर सकते हैं॥ १८॥
जो प्रसंगके द्वारा भी स्त्रीका नाम कदापि नहीं
सहन कर सकता तो भला वह वाणीसे स्त्री
किस प्रकार सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त हो सकता है ?॥ १९)
इस पृथिवीमें बड़े-बड़े देवता भी मायाके
बन्धनमें पडे हुए हैं। जो बचे हुए हैं, वे विष्णुके
बन्धनमें बँधे हैं और कुछ देवगण शम्भुके उपायोंसे
आबद्ध हैं॥२०॥
संसारसे विमुख तथा एकान्तविरागी सदाशिवके
अतिरिक्त और कौन है, जो ऐसा दुष्कर कार्य कर
सकता है ?॥ २१॥
इस प्रकार दक्षादि पुत्रोंसे कहकर रतिसहित
कामदेवको वहाँ देखकर मैं आनन्दपूर्वक उनसे कहने
लगा-॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले--मेरे श्रेष्ठ पुत्र हे कामदेव!
तुम सभी प्रकारसे सबको सुख देनेवाले हो। हे
पितृवत्सल ! तुम अपनी पत्नीसहित प्रसन्नतापूर्वक मेरी
बात सुनो ॥ २३॥
हे मनोभव! तुम [अपनी] इस सहचारिणी
स्त्रीक साथ जिस प्रकार शोभा पा रहे हो और यह
भी [वैसे ही] तुम्हें पतिरूपमें प्राप्तकर अति शोभितं
हो रही है॥ २४॥
जिस प्रकार महालक्ष्मीसे भगवान् विष्णु तथा
विष्णुसे महालक्ष्मी एवं जिस प्रकार रात्रिसे चद्रमा
एवं चन्द्रमासे रात्रि सुशोभित होती है, उसी प्रकार तुम
दोनोंकी शोभा है और तुम्हारा दाम्पत्य भी अलंकृत
है। इसलिये तुम इस जगत्को जीतनेवाले विश्वके
होओगे॥ २५-२६॥
हे वत्स! तुम संसारके हितके लिये महादेवकी
मोहित करो, जिससे प्रसन्न मनवाले शंकर
विवाह करें॥ २७॥
आ० ८]
विजने स्तिग्धदेशे तु पर्वतेषु सरःसु च।
यत्र यत्र प्रयातीशस्तत्र तत्रानया सह॥ २८
मोहय त्वं यतात्मानं वनिताविमुखं हरम्।
त्वदृते विद्यते नान्यः कश्चिदस्य विमोहकः॥ २९
भूते हरे सानुरागे भवतोऽपि मनोभव।
शापोपशांतिर्भविता तस्मादात्महितं कुरु॥ ३०
सानुरागो वरारोहां यदीच्छति महेश्वरः।
तदा भवोऽपि योग्यार्यस्त्वां च संतारयिष्यति॥ ३१
तस्माज्जायाद्वितीयस्त्वं यतस्व हरमोहने।
विश्वस्य भव केतुस्त्वं मोहयित्वा महेश्वरम्॥ ३२
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचो मे हि जनकस्य जगत्प्रभोः।
उवाच मन्मथस्तथ्यं तदा मां जगतां पतिम्॥ ३३
मन्मथ उवाच
करिष्येऽहं तव विभो वचनाच्छंभुमोहनम्।
किं तु योषिन्ममास्त्रं मे तत्कान्तां भगवन् सृज॥ ३४
मया संमोहिते शंभौ यया तस्यानुमोहनम्।
कर्तव्यमधुना धातस्तत्रोपायं परं कुरु ॥ ३५
ब्रह्मोवाच
एवंवादिनि कंदर्पे धाताहं स प्रजापतिः।
कया संमोहिनीयोसाविति चिंतामयामहम्॥ ३६
चिन्ताविष्टस्य मे तस्य निःश्वासो यो विनिःसृतः ।
तस्माद्वसंतः सञ्जातः पुष्प्रातविभूषितः॥ ३७
शोणराजीवसंकाशः फुल्लतामरसेक्षणः।
संध्योदिताखंडशशिप्रतिमास्यः सुन्तासिकः॥
श्यामकुञ्जितमूर्धजः।
कुंडलद्वयमंडितः॥ ३९
'पीनायतदोरुन्ततांसकः।
शारङ्गवच्चरणावर्तः
संध्यांशुमालिसदूशः
प्रमत्तेभगतिः
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३३९
निर्जन स्थानमें, उत्तम प्रदेशमें, पर्वतपर अथवा
तालाबके तटपर--जहाँ भी शिवजी जाये, वहीं तुम
अपनी इस पत्नीके साथ जाकर इन जितेन्द्रिय तथा
स्त्रीरहित शंकरजीको मोहित करो। [इस संसारमें]
तुम्हारे अतिरिक्त और कोई दूसरा इनको मोहमें
डालनेवाला नहीं है॥ २८-२९॥
हे मनोभव! शंकरजीके अनुरागयुक्त हो जानेपर
तुम्हारे भी शापकी शान्ति हो जायगी, अत: तुम
अपना हित करो। यदि महेश्वर सानुराग होकर
स्त्रीकी अभिलाषा करेंगे, तो वे श्रेष्ठ शिव तुम्हारा भी
उद्धार कर देंगे॥ ३०-३१॥
इसलिये तुम अपनी स्त्रीको साथ लेकर शंकरजीको
मोहित करनेका प्रयत्न करो और महेश्वरको मोहित
करके विश्वके केतु हो जाओ॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले-संसारके प्रभु एवं अपने
पिता मुझ ब्रह्माकी बात सुनकर वह कामदेव मुझ
जगत्पतिसे कहने लगा- ॥ ३३॥
मन्मथ बोला-हे प्रभो! मैं आपके आज्ञानुसार
शिवजीको मोहित करूँगा, किंतु हे भगवन् स्त्री ही
मेरा मुख्य अस्त्र है। अतः शंकरजीके योग्य स्त्रीका
निर्माण कीजिये, जो मेरे द्वारा शिवजीको मोहित
करनेपर उनका पुन: मोहन कर सके। हे धाता!
इसका उत्तम उपाय अब कीजिये॥ ३४-३५॥
ब्रह्माजी बोले-कामदेवके इस प्रकार कहनेपर
मैं प्रजापति ब्रह्मा अपने मनमें विचार करने लगा कि
किस प्रकारकी स्त्रीसे शिवजीको मोहित किया
जाय ?॥ ३६॥
इस प्रकार चिन्तामें निमग्न हुए मुझसे जो श्वास
निकला, उसीसे पुष्पसमूहोसे विभूषित वसन्त उत्पन्न
हुआ। उसके शरीरकी कान्ति लालकमलके समान
थी, उसकी आँखें विकसित कमलके समान थीं,
उसका मुख सन्ध्याके समय उदय हुए पूर्ण चन्द्रमाके
समान मनोहर था, उसकी नासिका भी बहुत सुन्दर
थी। उसके चरणोंमें सांगके समान आवर्त थे, वह
काले तथा घुँघराले केशोंसे शोभायमान हो रहा था।
सन्ध्याकालीन सूर्यके सदृश दो कुण्डलोंसे वह सुशोभित
था, मतवाले हाथीके समान उसकी चाल थी, उसकी
३४०
कंबुग्रीव: सुविस्तीर्णहदयः पीनसन्मुख: ॥
सर्वागसुन्दर: श्यामः सम्पूर्ण: सर्वलक्षणैः।
दर्शनीयतमः सर्वमोहनः कामवर्धनः॥ ४१
एतादृशे समुत्पन्ने वसंते कुसुमाकरे।
वौ वायुः सुसुरभिः पादपा अपि पुष्पिताः ॥ ४२
पिका विनेदुः शतशः पञ्चमं मधुरस्वनाः।
प्रफुल्लपद्मा अभवन्सरस्यः स्वच्छपुष्करा: ॥ ४३
तमुत्पन्नमहं वीक्ष्य तदा तादृशमुत्तमम्।
हिरण्यगर्भो मदनमगदं मधुरं वचः॥ ४४
ब्रह्मोवाच
एवं स मन्मथनिभः सदा सहचरोऽभवत्।
आनुकूल्यं तव कृते सर्व देवः करिष्यति॥ ४५
यथाग्नेः पवनो मित्रं सर्वत्रोपकरिष्यति।
तथायं भवतो मित्रं सदा त्वामनुयास्यति॥ ४६
'वसतेरंतहेतुत्वाद्वसंताख्यो भवत्वयम्।
तवानुगमनं कर्म तथा लोकानुरञ्जनम्॥ ४७
असौ वसंतशृङ्गारो वासंतो मलयानिल:।
भवेत्तु सुहृदो भावः सदा त्वद्वशवर्तिनः॥ ४८
विव्वोकाद्यास्तथा हावाश्चतुष्पष्टिकलास्तथा।
रत्याः कुर्वतु सौहद्यं सुहृदस्ते यथा तव॥ ४९
एभिः सहचरैः काम वसंतप्रमुखैर्भवान्।
मोहयस्व महादेवं रत्या सह महोद्यमः ॥ ५०
अहं तां कामिनीं तात भावयिष्यामि यत्नत: ।
मनसा सुविचायैव या हरं मोहयिष्यति॥ ५१
श्रीशिवमहापुराण
[आ० ` ञान मा
भुजाएँ लम्बी तथा मोटी थीं, उसका कन्धा
ऊँचा था। उसकी ग्रीवा शंखके समान थी,
वक्षःस्थल बहुत चौड़ा था, मुखमण्डल स्थूल तथा
सुन्दर था, उसके सभी अंग सुन्दर थे, वह श्याम
वर्णका था, सभी लक्षणोंसे युक्त वह सबको मोहित
करनेवाला, कामको बढ़ानेवाला तथा अत्यन्त दर्शनीय
था॥ ३७-४१॥
इस प्रकार पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित हुए वसन्तके
उत्पन्न होते ही सुगन्थित वायु चलने लगी, वृक्ष भी
'फूलोंसे लद गये ॥ ४२॥
सैकड़ों कोयलें मधुर पंचम स्वरमें बोलने लगीं
और बावलियाँ विकसित तथा स्वच्छ कमलोंसे युक्त
हो गयीं। इस प्रकार उत्पन्न हुए उस श्रेष्ठ वसन्तको
देखकर मैं ब्रह्मा कामदेवसे मधुर शब्दोंमें कहने
लगा-- ॥ ४३-४४॥
ब्रह्माजी बोले--[हे पुत्र!] कामदेवतुल्य यह
वसन्त अब तुम्हारे लिये अनुकूल मित्र उत्पन्न हो गया
है। अब यह तुम्हारी सब प्रकारसे सहायता करेगा॥ ४५॥
जिस प्रकार पवन अग्निका मित्र बनकर सदा उसका
उपकार करता रहता है, उसी प्रकार यह वसन्त भी
तुम्हारा मित्र बनकर सदा तुम्हारे साथ रहेगा॥ ४६॥
रमणमें हेतु होनेके कारण यह तुम्हारे साथ
निवास करेगा, इसलिये इसका नाम वसन्त होगा।
लोकका अनुरंजन तथा तुम्हारा अनुगमन ही इसका
कार्य होगा॥ ४७॥
वसन्तकालीन यह मलयानिल इस वसन्तका
शृंगार बनकर इसके मित्ररूपसे बना रहेगा, जो सदा
तुम्हारे अधीन रहेगा॥ ४८ ॥
जिस प्रकार तुम्हारे मित्र रहते हैं, उसी प्रकार
ये बिब्बोक आदि हाव तथा चौंसठ कलाएँ रतिके
साथ सुहृद् होकर रहेंगी॥ ४९ ॥
असन
हे काम! तुम अपने इन वसन्त आर्दि
सहचरों तथा रतिके साथ उद्यत होकर
मोहित करो॥ ५०॥ `
हे तात! अब मैं यलपूर्वक अच्छी तरह मतम
सोच-विचारकर उस कामिनीको प्राप्त करूँगा,
भगवान् शंकरको मोहित कर लेगी ॥ ५१॥
|
|
ग
अ० ९]
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तो मया कामः सुरज्येष्ठेन हर्षित: ।
ननाम चरणौ मेऽपि स पलीसहितस्तदा॥ ५२
दक्षं प्रणम्य तान् सर्वान्मानसानभिवाद्य च।
चत्रात्मा गतवान् शंभुस्तत्स्थानं मन्मथो ययौ॥ ५३
रुद्र्संहिता ( सतीखण्ड ) ३४२
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार मुझ सुरश्रेष्ठ ब्रह्माके
कहनेपर उस कामदेवने पत्नीसहित मेरे चरणोंमें
प्रणाम किया। पुन: दक्ष एवं मेरे मानसपुत्रोंको
प्रणामकर कामदेव उस स्थानपर गया, जहाँ आत्मस्वरूप
शंकरजी गये थे॥ ५२-५३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां सतीचरित्रे द्वितीये सतीखण्डे वसंतस्वरूपवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
वसन्तस्वरूपवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः
'कामदेवद्वारा भगवान् शिवको विचलित न कर पाना, ब्रह्माजीद्वारा कामदेवके सहायक
मारगणोंकी उत्पत्ति; ब्रह्माजीका उन सबको शिवके पास भेजना, उनका वहाँ
विफल होना, गणोंसहित कामदेवका वापस अपने आश्रमको लौटना
ब्रह्मोवाच
तस्मिन् गते सानुचरे शिवस्थानं च मन्मथे।
चरित्रमभवच्चित्रं तच्छृणुष्व मुनीश्वर॥ १
गत्वा तत्र महावीरो मन्मथो मोहकारकः।
स्वप्रभावं ततानाशु मोहयामास प्राणिनः॥ २
वसंतोऽपि प्रभावं स्वं चकार हरमोहनम्।
सर्वे वृक्षा एकदैव प्रफुल्ला अभवन्मुने॥ ३
विविधान्कृतवान्यत्नान् रत्या सह मनोभवः।
जीवाः सर्वे वशं याताः सगणेशः शिवो न हि॥ ४
समधोर्मदनस्यासन्प्रयासा निष्फला मुने।
जगाम स निजस्थानं निवृत्य विमदस्तदा॥ ५
कृत्वा प्रणामं विधये मह्मं गदगदया गिरा।
उवाच मदनो मां चोदासीनो विमदो मुने॥ ६
काम उवाच
ब्रह्मन् शंभुर्मोहनीयो न वै योगपरायणः।
न शक्तिर्मम नान्यस्य तस्य शंभोर्हि मोहने॥ ७
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! अनुचरोंके साथ
| कामके शिवस्थानमें पहुंच जानेपर अद्भुत चरित्र
हुआ, उसे सुनिये॥ १॥
सभी लोगोंको मोहित करनेवाले उस महावीर
कामने वहाँ पहुँचकर अपना प्रभाव फैला दिया और
सभी प्राणियोंको मोहित कर लिया॥ २॥
हे मुने! वसन्तने भी महादेवजीको अपना मोहित
करनेवाला प्रभाव दिखाया, जिससे समस्त वृक्ष एक
साथ ही फूलोंसे लद गये। उस समय कामने रतिके
साथ [शिवको मोहित करनेके लिये] अनेक यत्न
किये, जिससे सभी जीव उसके वशीभूत हो गये, किंतु
गणोंसहित शिवजी उसके वशमें नहीं हुए॥ ३-४॥
हे मुने! [इस प्रकार चेष्टा करते हुए] जब
चसन्तसहित उस कामके समस्त प्रयत्न निष्फल हो
गये, तब वह अहंकाररहित हो गया और लौटकर
अपने स्थानपर चला गया। हे मुने! मुझ ब्रह्माको
प्रणामकर उदासीन तथा अभिमानरहित वह कामदेव
गद्गद वाणीसे मुझसे कहने लगा- ॥ ५-६॥
'काम बोला-हे ब्रह्मन्! शिवको मोहित नहीँ
किया जा सकता; क्योंकि वे योगपरायण हैं। उन
शिवको मोहित करनेकी शक्ति न मुझमें है और न
अन्य किसौमें है॥\७॥
३४२
श्रीशिवमहापुराण
[3s - ¬ === = ७ यया काक्या
समित्रेण मया ब्रह्मन्नुपाया विविधाः कृताः।
रत्या सहाखिलास्ते च निष्फला अभवन् शिवे॥
शृणु ब्रह्मन्यथास्माभिः कृता हि हरमोहने।
प्रयासान् विविधाँस्तात गदतस्तान्मुने मम॥ ९
यदा समाधिमाश्रित्य स्थितः शंभुर्नियंत्रितः।
तदा सुगंधिवातेन शीतलेनातिवेगिना॥ १०
उद्वेजयामि रुद्रं स्म नित्यं मोहनकारिणा।
प्रयत्नतो महादेवं समाधिस्थं त्रिलोचनम्॥ ११
स्वसायकांस्तथा पञ्च समादाय शरासनम्।
तस्याभितो भ्रमतस्तु मोहयंस्तद्गणानहम्॥ १२
मम प्रवेशमात्रेण सुवश्याः सर्वजंतवः।
अभवद्विकृतो नैव शंकरः सगणः प्रभुः॥ १३
यदा हिमवतः प्रस्थं स गतः प्रमथाधिपः।
तत्रागतस्तदैवाह॑ सरतिः समधुर्विधे॥ १४
यदा मेरुं गतो रुद्रो यदा वा नागकेशरम्।
कैलासं वा यदा यातस्तत्राहं गतवांस्तदा॥ १५
यदा त्यक्तसमाधिस्तु हरस्तस्थो कदाचन।
तदा तस्य पुरश्चक्रयुगं रचितवानहम्॥ १६
तच्च भ्रूयुगलं ब्रह्मन् हावभावयुतं मुहुः।
नानाभावानकार्षीच्य दांपत्यक्रममुत्तमम्॥ १७
जीलकंठं महादेवं सगणं तत्पुरःस्थिताः।
अकार्षुरमोहितं भावं मृगाश्च पक्षिणस्तथा॥ १८
मयूरमिथुनं तत्राकार्षीद्धाव॑ रसोत्सुकम्।
विविधां गतिमाश्रित्य पाश्वे तस्य पुरस्तथा॥ १९
जालभ्रद् विवरं तस्मिन् कदाचिदपि मच्छर: ।
सत्यं ब्रवीमि लोकेश मम शक्तिर्न मोहने॥ २०
मधुरप्यकरोत्कर्म युक्तं यत्तस्य मोहने।
तच्छृणुष्व महाभाग सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २१
हे ब्रह्मन्! मैंने मित्र बसन्त तथा
उन्हें मोहित करनेके अनेक उपाय किये,
वे सभी निष्फल हो गये। हे ब्रह्मन्!
शिवजीको मोहित करनेके लिये जिन
किया, उन विविध उपायोंको मैं बता रहा हूँ, हे मजे!
हे तात! आप सुनिये ॥ ८-९॥ र
जब शिवजी संयमित होकर समाधि लगाका
बैठे हुए थे, तब मैं मोहित करनेवाली वेगवान्
सुगन्धयुक्त तथा शीतल वायुसे त्रिनेत्र महादेव रुद्रको
विचलित करने लगा॥ १०-११॥
मैं अपने धनुष तथा पाँचों पुष्पबाणोंको लेकर
उनके चारों ओर छोड़ता हुआ उनके गणोंको मोहित
करने लगा। [उस प्रदेशमें] मेरे प्रवेश करते ही
समस्त प्राणी मोहित हो गये, किंतु गणोंसहित भगवान्
शिव विकारयुक्त नहीं हुए॥ १२-१३॥
हे विधे! जब वे प्रमथाधिपति शिव हिमालयके
शिखरपर गये, तब मैं भी वसन्त और रतिके साथ वहाँ
पहुँच गया॥ १४॥
जब वे मेरु पर्वतपर और नागकेसर पर्वतपर गये,
तो मैं वहाँ भी गया। जब वे कैलास पर्वतपर गये,
तब मैं भी बहाँपर गया॥ १५॥
जब वे किसी समय समाधिसे मुक्त हो गये, तो
मैंने उनके सामने दो चक्र रचे। वे दोनों चक्र स्त्रे
हाव-भावयुक्त दोनों कटाक्ष थे। मैंने दाम्मत्यभावका
अनुकरण करते हुए उन नीलकण्ठ महादेवके सामने
नाना प्रकारके भाव उत्पन्न किये॥ १६-१७॥
पशुओं तथा पक्षियोंने भी उनके सामने स्थित
होकर गणोंसहित शिवजीको मोहित करनेके लिये
मोहकारी भाव प्रदर्शित किये ॥ १८ ॥
रसोत्सुक हुए मयूरके जोड़ेने अनेक प्रकारकी
गतियोंका सहारा लेकर विविध प्रकारके भाव उनके आगे.
पीछे प्रदर्शित किये, कितु मेरे बाणोंको कभी भी अवकाश |
नहीं मिला, मैं यह सत्य कह रहा हूँ। हे लोकेश!
मोहित करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है॥ १९-२०॥
इस वसन्तने भी उन्हें मोहित करनेके लिये जौ
जो उचित उपाय किये हैं, हे महाभाग! उन्हें अ
सुनें, मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ॥ २१॥
रतिके साथ
उपायोंको <
आ० ९]
चंपकान्केशरान्बालान्कारणान्पाटलांस्तथा ।
नागकेशरपुन्नागान्किंशुकान्केतकान् बरान्॥ २२
मालतीमल्लिकापर्णभारान्कुरबकांस्तथा ।
उत्फुल्लयति तत्र स्म यत्र तिष्ठति बै हरः॥ २३
सरांस्युत्फुल्लपद्मानि वीजयन् मलयानिलैः।
यलात्सुगंधीन्यकरोदतीव गिरिशाश्रमे ॥ २४
लता: सर्वाः सुमनसो धत्तूराट्ुरसज्ञया: ।
वृक्षाङ्कं चिरभावेन वेष्टयन्ति स्म तत्र च॥ २५
तान्वृक्षांश्व सुपुष्पौघान् तैः सुगंधिसमीरणैः।
दृष्ट्वा कामवशं याता मुनयोऽपि परे किमु॥ २६
एवं सत्यपि शंभोर्न दृष्टं मोहस्य कारणम्।
भावमात्रमकार्षीऱ्नो कोपो मय्यपि शंकरः ॥ २७
इति सर्वमहं दृष्ट्वा ज्ञात्वा तस्य च भावनाम्।
विमुखोऽहं शंभुमोहान्नियतं ते वदाम्यहम्॥ २८
तस्य त्यक्तसमाधेस्तु क्षणं नो दृष्टिोचरे।
शक्नुयाम वयं स्थातुं तं रुद्रं को विमोहयेत्॥ २९
ज्वलद्ग्निप्रकाशाक्षं जटाराशिकरालिनम्।
श्रृद्धिणं वीक्ष्य कः स्थातुं ब्रह्मन् शक्नोति तत्पुरः ॥ ३०
ब्रह्मोवाच
मनोभववचश्चेत्थं श्रुत्वाहं चतुराननः।
विवक्षुरपि नावोचं चिंताविष्टोऽभवं तदा॥ ३१
मोहनेऽहं समर्थो न हरस्येति मनोभवः।
वचः श्रुत्वा महादुःखान्निरश्वसमहं मुने॥ ३२
निःश्वासमारुता मे हि नानारूपा महाबलाः।
जाता गणा लोलजिह्वा लोलाश्चातिभयंकराः ॥
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३४३
इस वसन्तने श्रेष्ठ चम्पक, केसर, बाल
[इलायची], कटहल, गुलाब, नागकेसर, पुन्नाग,
किंशुक, केतकी, मालती, मल्लिका, पर्णभार एवं
कुरबक आदि पुष्पोंको जहाँ भी शिवजी बैठते थे,
वहीं विकसित कर दिया॥ २२-२३॥
इस वसन्तने शिवजीके आश्रममें तालाबके सभी
फूले हुए कमलोंको मलय पवनोंसे यत्नपूर्वक अत्यन्त
सुगन्धित कर दिया॥ २४॥
सभी लताएँ फूलसे युक्त और अंकुर-समूहके
साथ सन्निकटके वृक्षोमें बड़े प्रेमसे लिपट गयीं ॥ २५ ॥
सुगन्धित पवनोंसे खिले हुए फूलोंसे युक्त उन
वृक्षोंको देखकर मुनि भी कामके वशीभूत हो गये,
फिर अन्यकी तो बात ही क्या!॥ २६॥
इतना होनेपर भी मैंने शंकरजीके मोहित होनेका
न कोई लक्षण देखा, न तो उनमें कोई कामका भाव
ही उत्पन्न हुआ। [इतना सब कुछ करनेपर भी]
शंकरने मेरे ऊपर रंचमात्र भी क्रोध नहीं किया॥ २७॥
इस प्रकार सब कुछ देखकर तथा उनकी
भावनाको जानकर मैं शिवजीको मोहित करनेके
प्रयाससे विरत हो गया, उसका कारण आपसे निवेदन
कर रहा हूँ॥ २८॥
समाधि छोड़ देनेपर हमलोग उनकी दृष्टिके
सामने क्षणमात्र भी टिक नहीं सकते, उन रुद्रको कौन
मोहित कर सकता है ?॥ २९॥
हे ब्रह्मन्! जलती हुई अग्निके समान प्रकाशित
नेत्रोंबाले तथा जटा धारण करनेसे महाविकराल उन
कैलासपर्वतनिवासी शिवजीको देखकर उनके सामने
कौन खड़ा रह सकता है ?॥ ३०॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कामके वचनको
सुनकर मैं चतुरानन ब्रह्मा चिन्तामग्न हो गया और
बोलनेकी इच्छा करते हुए भी कुछ बोल न सका ॥ ३१॥
मैं कामदेव शिवको मोहित करनेमें समर्थ नहीं
हूँ। हे मुने! उसका यह वचन सुनकर मैं बड़े दु:खके
साथ उष्ण श्वास लेने लगा॥ ३२॥
उस समय मेरे निःश्वास अनेक रूपोंवाले,
महाबलवान्, लपलपाती जीभवाले, चंचल तथा अत्यन्त
भयंकर गणोंके रूपमें परिणत हो गये॥ ३३॥
३४४
्रीशिवमहापुराण
[ अण वि डा. य र. >> ती
अवादयन्त ते सर्वे नानावाद्यानसंख्यकान्।
पटहादिगणास्तांस्तान् विकरालान्महारवान्॥
अथ ते मम निःश्राससंभवाश्च महागणाः।
मारयच्छेदयेत्यूचुर्त्ह्मणो मे पुरः स्थिताः॥ ३५
तेषां तु वदतां तत्र मारयच्छेदयेति माम्।
वचः श्रुत्वा विधिं कामः प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ ३६
मुनेऽथ मां समाभाष्य तान् दृष्ट्वा मदनो गणान्।
उवाच वारयन् ब्रह्मनाणानामग्रतः स्मरः॥ ३७
काम उवाच
हे ब्रह्मन् हे प्रजानाथ सर्वसृष्टप्रवर्तक।
उत्पन्नाः क इमे वीरा विकराला भयंकराः ॥ ३८
किं कमैते करिष्यंति कुत्र स्थास्यंति वा विधे।
किन्नामधेया एते तद्वद तत्र नियोजय॥ ३९
नियोज्य तान्निजे कृत्ये स्थानं दत्त्वा च नाम च।
मामाज्ञापय देवेश कृपां कृत्वा यथोचिताम्॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इति तद्वाक्यमाकर्ण्य मुनेऽहं लोककारकः।
तमवोचं ह मदनं तेषां कर्मादिकं दिशन्॥ ४१
एत उत्पन्नमात्रा हि मारयेत्यवदन् वचः।
मुहर्मुहुरतोऽमीषां नाम मारेति जायताम्॥ ४२
सदैव विघ्नं जंतूनां करिष्यन्ति गणा इमे।
विना निजार्चनं काम नानाकामरतात्मनाम्॥ ४३
तवानुगमनं कर्म मुख्यमेषां मनोभव।
सहायिनो भविष्यन्ति सदा तव न संशय: ॥ ४४
यत्र यत्र भवान् याता स्वकर्मार्थ यदा यदा।
गंतारस्तत्र तत्रैते सहायार्थं तदा तदा॥ ४५
चित्तभ्रांतिं करिष्यंति त्वदस्त्रवशवर्तिनाम्।
ज्ञानिनां ज्ञानमार्ग च विघ्नयिष्यंति सर्वथा॥ ४६
उन गणो भेरी, मृदंग आदि अनेक रे
असंख्य विकराल, महाभयंकर बाजे बजाना
किया। मेरे निःश्वाससे उत्पन्न वे महागण मुझ ब्रह्मे
सामने ही मारो, काटो--ऐसा बोलने लगे॥ ३४-३५ ;
मारो, काटो--ऐसा बोलनेवाले उन गणोंके शब्दो
सुनकर वह काम मुझ ब्रह्मासे कहने लगा॥ ३६॥
हे मुने! हे ब्रह्मन्! इस प्रकार उस कामने मेरी
आज्ञा लेकर उन सभी गणोंकी ओर देखकर ड
ऐसा करनेसे रोकते हुए गणोंके सामने ही मुझसे
कहना प्रारम्भ किया- ॥ ३७॥
काम बोला-हे ब्रह्मन्! हे प्रजानाथ! हे
सृष्टिके प्रवर्तक! ये कौन विकराल एवं भयंकर वीर
उत्पन्न हो गये ?॥ ३८॥
हे विधे! ये कौन-सा कार्य करेंगे तथा कहाँ
निवास करेंगे और इनका क्या नाम है? उन्हें आप
मुझे बताइये तथा इनको कार्यमें नियुक्त कीजिये॥ ३९॥
हे देवेश! इनको अपने कार्यमें नियुक्तकर और
इनके नाम रखकर तथा स्थानोंकी व्यवस्था करके
यथोचित कृपा करके मुझे आज्ञा दीजिये॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! उस कामकी बात
सुनकर उनके कार्य आदिका निर्देश करते हुए
लोककर्ता मैंने कामसे कहा- ॥ ४१॥
हे काम! उत्पन्न होते ही इन सबने बारंबार
मारय-मारय [मारो-मारो]-इस प्रकारका शब्द कहा
है, इसलिये इनका नाम 'मार' होना चाहिये॥ ४२॥
हे काम! अपनी पूजाके बिना ये गण अनेक
प्रकारकी कामनाओंमें रत मनवाले प्राणियोंके कार्यो
सर्वदा विघ्न किया करेंगे॥ ४३॥
हे कामदेव! तुम्हारे अनुकूल रहना ही एना हे
मुख्य कार्य होगा और ये तुम्हारी सहायतामे सर्ब
तत्पर रहेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ ४४॥
जब-जब और जहाँ-जहाँ तुम अपने कर्यै
लिये जाओगे, तब-तब वहाँ-वहाँ ये तुम्हारी सहायता
लिये जायेगे ॥ ४५ ॥ त
ये तुम्हारे अस्त्रोसे वशवर्ती प्राणियोंके चि
सदैव भ्रान्ति उत्पन्न करेंगे और ज्ञानियोंके ञाता
विघ्न डालेंगे॥ ४६ ॥
अ० ९]
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचो मे हि सरतिः स मनोभव:।
किंचित्प्रसन्नवदनो बभूव मुनिसत्तम॥ ४७
श्रुत्वा तेऽपि गणाः सर्वे मदनं मां च सर्वतः।
परिवार्यं यथाकामं तस्थुस्तत्र निजाकृतिम्॥ ४८
अथ ब्रह्मा स्मरं प्रीत्यागदं मे कुरु शासनम्।
एभिः सहैव गच्छ त्वं पुनश्च हरमोहने॥ ४९
मन आधाय यत्नानि कुरु मारगणैः सह।
मोहो भवेद्यथा शंभोर्दारग्रहणहेतवे॥ ५०
इत्याकर्ण्य वचः कामः प्रोवाच वचनं पुनः।
देवर्षे गौरवं मत्वा प्रणम्य विनयेन माम्॥ ५१
काम उवाच
मया सम्यक् कृतं कर्म मोहने तस्य यत्नत: ।
तन्मोहो नाभवत्तात न भविष्यति नाधुना॥ ५२
तव वाग्गौरवं मत्वा दृष्ट्वा मारगणानपि।
गमिष्यामि पुनस्तत्र सदारोऽहं त्वदाज्ञया॥ ५३
मनो निश्चितमेतद्धि तन्मोहो न भविष्यति।
भस्म कुर्यान्न मे देहमिति शंकास्ति मे विधे॥ ५४
इत्युक्त्वा समधुः कामः सरतिः सभयस्तदा।
ययौ मारगणैः सार्धं शिवस्थानं मुनीश्वर॥ ५५
पूर्ववत् स्वप्रभावं च चक्रे मनसिजस्तदा।
बहूपायं स हि मधुर्विविधां बुद्धिमावहन्॥ ५६
उपायं स चकाराति तत्र मारगणोऽपि च।
मोहोऽभवन्न वै शंभोरपि कश्चित्परात्मनः ॥ ५७
निवृत्य पुनरायातो मम स्थानं स्मरस्तदा।
आसीन्मारगणोऽगर्बोऽहर्षो मेऽपि पुरस्थितः॥ ५८
काम: प्रोवाच मां तात प्रणम्य च निरुत्सवः।
स्थित्वा मम पुरोऽगवों मारैश्च मधुना तदा॥ ५९
रूब्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३४५
ब्रह्माजी बोले हे मुनिसत्तम! मेरे इस वचनको
सुनकर रति और वसन्तसहित वह कामदेव कुछ
प्रसन्नमुख हो गया ॥ ४७॥
मेरी बातको सुनकर वे सभी गण अपने-अपने
स्वरूपसे मुझे तथा कामदेवको चारों ओरसे घेरकर बैठ
गये । इसके बाद मुझ ब्रह्माने कामसे प्रेमपूर्वक कहा--
[हे मदन !] मेरी बात मानो, तुम इन गणोंको साथ लेकर
शिवको मोहित करनेके लिये पुनः जाओ॥ ४८-४९ ॥
अब तुम इन मारगणोंके साथ मन लगाकर ऐसा
प्रयत्न करो, जिससे स्त्री ग्रहण करनेके लिये शिवजीको
मोह हो जाय। हे देवर्षे! मेरी बात सुनकर काम
गौरवका ध्यान रखते हुए मुझे प्रणाम करके विनयपूर्वक
मुझसे पुनः यह वचन कहने लगा- ॥ ५०-५१॥
काम बोला--हे तात! मैंने शिवको मोहित
करनेके लिये भली-भाँति यत्नपूर्वक उपाय किये, किंतु
उनको मोह नहीं हुआ, न आगे होगा और वर्तमानमें
भी वे मोहित नहीं हैं ॥ ५२॥
किंतु आपकी वाणीका गौरव मानकर इन
मारगणोंको देखकर आपकी आज्ञासे मैं पुनः वहाँ
पलीसहित जाऊँगा॥ ५३॥
हे ब्रह्मन्! मैंने मनमें यह निश्चय कर लिया है कि
उन्हें मोह नहीं होगा और हे विधे ! मुझे यह शंका है कि
[इस बार] कहीं वे मेरे शरीरको भस्म न कर दें ॥ ५४॥
हे मुनीश्वर! ऐसा कहकर वह कामदेव वसन्त,
रति तथा मारगणोंको साथ लेकर भयपूर्वक शिवजीके
स्थानपर गया॥ ५५॥
[वहाँ जाकर] कामदेवने पहलेके समान ही
अपना प्रभाव दिखाया तथा वसन्तने भी अनेक
प्रकारकी बुद्धिका प्रयोग करते हुए बहुत उपाय किये,
मारगणोंने भी वहाँ बहुत उपाय किये, किंतु परमात्मा
शंकरको कुछ भी मोह न हुआ॥ ५६-५७॥
तब वह कामदेव लौटकर पुनः मेरे पास आया।
समस्त मारगण भी अभिमानरहित तथा उदास होकर
मेरे सामने खड़े हो गये॥५८॥
हे तात! तब उदास और गर्वरहित कामदेवने
मारगणों तथा वसन्तके साथ मेरे सामने खड़े होकर
प्रणाम करके मुझसे कहा-॥५९॥
लि `
३४६
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १७
कृतं पूर्वादधिकतः कर्म तन्मोहने विधे।
नाभवत्तस्य मोहोऽपि कश्चिद्धयानरतात्मन: ॥ ६०
ज दग्धा मे तनुश्चैव तत्र तेन दयालुना।
कारणं पूर्वपुण्यं च निर्विकारः स वै प्रभुः॥ ६१
चेद्दरस्ते हरो भार्या गृह्णीयादिति पद्मज।
परोपायं कुरु तदा विगर्व इति मे मतिः॥ ६२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा सपरीवारो ययौ कामः स्वमाश्रमम्।
प्रणम्य मां स्मरन् शंभुं गर्वदं दीनवत्सलम्॥ ६३
हे विधे! मैंने शिवजीको मोहित कृतं पूर्वादधिकतः कर्म तन्मोहने विधे। | हे विधे! मैंने शिवजीको मोहित कस ह
पहलेसे भी अधिक प्रयत्न किया, किंतु
चित्तवाले उन शिवको कुछ भी मोह नहीं हुआ॥ ६५ .
उन दयालुने मेरे शरीरको भस्म नहीँ किया
इसमें मेरे पूर्वजन्मका पुण्य ही कारण है। बे प्रु
सर्वथा निर्विकार हैं । हे ब्रह्मन्! यदि आपकी ऐसी इच्छा
है कि महादेवजी दारपरिग्रह करें, तो मेरे विचारसे आप
गर्वरहित होकर दूसरा उपाय कीजिये ॥ ६१-६२॥
ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर कामदेव मुने
प्रणाम करके गर्वका खण्डन करनेवाले दीनवत्सल
शम्भुका स्मरण करता हुआ परिवारसहित अपने
आश्रमको चला गया॥६३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसांहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने
कामप्रभावमारगणोत्पत्तिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें कामप्रभाव
एवं मारगणोत्पत्तिवर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
— ore —
अथ दशमोऽध्यायः
ब्रह्मा और विष्णुके संवादमें शिवमाहात्म्यका वर्णन
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधी: ।
कथितं सुचरित्रं ते शंकरस्य परात्मनः॥ १
निजाश्रमे गते कामे सगणे सरतो ततः।
किमासीत्किमकार्षीसत्वं तच्चरित्रं वदाधुना॥ २
ब्रह्मोवाच
श्रृणु नारद सुप्रीत्या चरित्रं शशिमौलिनः।
यस्य॒ श्रवणमात्रेण निर्विकारो भवेन्नरः॥ ३
निजाश्रमं गते कामे परिवारसमन्विते।
यद् बभूव तदा जातं तच्चरित्रं निबोध मे॥ ४
नष्टोऽभून्नारद् मदो विस्मयोऽभूच्च मे हृदि।
निरानंदस्य च मुनेऽपूर्णे निजमनोरथे॥ ५
अशोचं बहुधा चित्ते गृह्णीयात्स कथं स्त्रियम्।
निर्विकारो जितात्मा स शंकरो योगतत्परः॥ ६
नारदजी बोले- हे ब्रह्मन्! हे विधे ! हे महाभाग!
आप धन्य हैं, जो आपकी बुद्धि शिवमें आसक्त है।
आपने परमात्मा शंकरजीके सुन्दर चरित्रका आख्यात
किया॥ १॥
मारगणों तथा [अपनी स्त्री] रतिके साथ जब
काम अपने स्थानपर चला गया, तब क्या हुआ और
आपने क्या किया? अब उस चरित्रको कहिये॥ २॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! आप अत्य
प्रसननतापूर्वक महादेवजीके चरित्रको सुनिये, जिसके
श्रवणमात्रसे मनुष्य विकारसे मुक्त हो जाता है॥३॥
कामके सपरिवार अपने आश्रममें चले जावे
उस समय जो हुआ, उस चरित्रको मुझसे सुनिये॥ ४॥
हे नारद! मेरा घमण्ड चूरःचूर हो गया
अपने मनोरथके अपूर्ण रहनेसे मुझ
हृदयमें विस्मय हुआ ॥ ५॥ व
मैंने मनमें अनेक प्रकारसे विचार किया कि |
निर्विकार, जितात्मा तथा योगपरायण शिव स्त्री
किस प्रकार ग्रहण कर सकते हैं ?॥ ६॥
आ० १०]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३४७
इत्थं विचार्य बहुधा तदाहं विमदो मुने।
हरिं तं सोऽस्मरं भक्त्या शिवात्मानं स्वदेहदम्॥ ७
अस्तवं च शुभस्तोत्रैदीनवाक्यसमन्वितैः।
तच्छुत्वा भगवानाशु बभूवाविर्हि मे पुरा॥ ८
चतुर्भुजोऽरविंदाक्षः
लसत्पीतपटः
शंखपद्ागदाधरः।
श्यामतनुर्भक्तप्रियो हरिः॥ ९
तं दृष्ट्वा तादृशमहं सुशरण्यं मुहुर्मुहु:
अस्तवं च पुनः प्रेम्णा बाष्पगद्गदया गिरा॥ १०
हरिराकर्ण्य तत्स्तोत्रं सुप्रसन्न उवाच माम्।
दुःखहा निजभक्तानां ब्रह्माणं शरणं गतम्॥ ११
हरिरुवाच
विधे ब्रह्मन् महाप्राज्ञ धन्यस्त्वं लोककारक।
किमर्थ स्मरणं मेऽद्य कृतं च क्रियते नुतिः॥ १२
किं जातं ते महहुःखं मदग्रे तद्ठदाधुना।
शमयिष्यामि तत्सर्व नात्र कार्या विचारणा॥ १३
ब्रह्मोवाच
इति विष्णोर्वचः श्रुत्वा किंचिदुच्छ्वसिताननः।
अवोचं वचनं विष्णुं प्रणम्य सुकृताञ्जलिः॥ १४
देवदेव रमानाथ मद्वार्ता श्रृणु मानद।
शरुत्वा च करुणां कृत्वा हर दुःखं कमावह॥ १५
रूद्रसंमोहनार्थं हि कामं प्रेषितवानहम्।
परिवारयुतं विष्णो समारमधुबांधवम्॥ १६
चक्रुस्ते विविधोपायान् निष्फला अभवंश्च ते।
जाभवत्तस्य संमोहो योगिनः समदर्शिनः ॥ १७
इत्याकर्ण्यं वचो मे स हरिर्मा प्राह विस्मित: ।
विज्ञाताखिलदो ज्ञानी शिवतत्त्वविशारदः॥ १८
हे मुने! इस प्रकार अनेक तरहसे विचार
करके अहंकाररहित मैंने उस समय अपने जन्मदाता
शिवस्वरूप उन विष्णुका भक्तिपूर्वक स्मरण किया
और दीनतापूर्ण वाक्योंसे युक्त कल्याणकारी स्तोत्रॉंसे
मैं उनकी स्तुति करने लगा। उसे सुनकर चतुर्भुज,
कमलनयन, शंख-पद्म-गदाधारी, पीताम्बरसे सुशोभित
तथा श्यामवर्णके शरीरवाले भक्तप्रिय भगवान् विष्णु
शीघ्र ही मेरे सम्मुख प्रकट हो गये॥ ७-९॥
उस प्रकारके रूपवाले शरणागतवत्सल उन
भगवानको देखकर मैंने पुनः प्रेमसे गद्गद वाणीमें
बार-बार उनकी स्तुति की॥ १०॥
अपने भक्तोंके दुःखको दूर करनेवाले भगवान्
विष्णु उस स्तोत्रको सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो मुझ
शरणागत ब्रह्मासे कहने लगे॥ ११॥
विष्णुजी बोले-हे विधे! हे ब्रह्मन्! हे
महाप्राज्ञ! आप धन्य हैं, हे लोककर्ता! आपने आज
किसलिये मेरा स्मरण किया और किसलिये आप मेरी
स्तुति कर रहे हैं ?॥ १२॥
आपको कौन-सा महान् दुःख हो गया है, उसे
अभी बताइये। उस सम्पूर्ण दुःखका मैं नाश करूँगा,
इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १३॥
ब्रह्माजी बोले-- हे नारद! विष्णुके इन वचनोंको
सुनकर मैंने दीर्घ श्वास लिया और हाथ जोड़कर
प्रणाम करके विष्णुसे यह वचन कहा-॥ १४॥
हे देवदेव! हे रमानाथ! मेरी बात सुनिये और
हे मानद! उसे सुनकर दया करके मेरा दुःख दूर
कीजिये तथा मुझे सुखी कीजिये ॥ १५॥
हे विष्णो! मैंने रुद्रके सम्मोहनके लिये
सपरिवार मारगण तथा बसन्तके साथ कामको भेजा
था॥ १६॥
उन्होंने शिवजीको मोहित करनेके लिये अनेक
प्रकारके उपाय किये, परंतु बे सब निष्फल हो गये।
उन समदर्शी योगीको मोह नहीं हुआ॥ १७॥
मेरा यह वचन सुनकर शिवतत्त्वके ज्ञाता,
विज्ञानी तथा सब कुछ देनेवाले बे विष्णु विस्मित
होकर मुझसे कहने लगे॥ १८॥
३४८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १०
विष्णुरुवाच
'कस्माद्धेतोरिति मतिस्तव जाता पितामह।
सर्व विचार्य सुधिया ब्रह्मन् सत्यं हि तद्वद् ॥ १
ब्रह्मोवाच
श्रृणु तात चरित्रं तत् तव माया विमोहिनी।
तदधीनं जगत्सर्वं सुखदुःखादितत्परम्॥ २०
ययैव प्रेषितश्चाहं पापं कर्तु समुद्यतः।
आसं तच्छुणु देवेश वदामि तव शासनात्॥ २१
सृष्टिप्रारंभसमये दश पुत्रा हि जज्ञिरे।
दक्षाद्यास्तनया चैका वाग्भवाप्यतिसुन्दरी॥ २२
धर्मो वक्षःस्थलात्कामो मनसोऽन्योऽपि देहतः ।
जातास्तत्र सुतां दृष्ट्वा मम मोहोऽभवद्धरे॥ २३
कुदृष्ट्या तां समद्राक्षं तव मायाविमोहितः।
तत्क्षणाद्धर आगत्य मामनिन्दत्सुतानपि॥ २४
धिक्कारं कृतवान् सर्वान् निजं मत्वा परं प्रभुम्।
ज्ञानिनं योगिनं नाथं भोगिनं विजितेन्द्रियम्॥ २५
पुत्रो भूत्वा मम हरेऽनिन्दन्मां च समक्षतः।
इति दुःखं महन्मे हि तदुक्तं तव सन्निधौ॥ २६
गृह्णीयाद्यदि पत्नीं स स्यां सुखी नष्टदुःखधी: ।
एतदर्थं समायातः शरणं तव केशव॥ २७
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचो मे हि ब्रह्मणो मधुसूदन: ।
विहस्य मां द्रुतं प्राह हर्षयन्भवकारकम्॥ २८
विष्णुरुवाच
विधे श्रृणु हि मद्वाक्यं सर्वं भ्रमनिवारणम्।
सर्वं वेदागमादीनां संमतं परमार्थतः॥ २९
महामूढमतिश्चाद्य सञ्जातोऽसि कथं विधे।
वेदवक्तापि निखिललोककर्ता हि दुर्मतिः॥ ३०
विष्णुजी बोले-हे पितामह! क्युब | विष्णुजी बोले--हे पितामह! आपको
प्रकारकी बुद्धि किस कारणसे हो गयी है? हे ब्रह्
अपनी सुबुद्धिसे सब विचारकर मुझसे सत्य-सत्य ञे
कहें॥ १९॥
ब्रह्माजी बोले-हे तात! अब उस चरित्रको
सुनिये। यह आपकी माया मोहनेवाली है, सुद.
दुःखमय यह सारा जगत् उसीके अधीन है॥ २०॥
उसी मायाके द्वारा प्रेरित होकर मैं [इस प्रकारका]
पाप करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। हे देवेश! आपकी
आज्ञासे मैं कह रहा हूँ। आप उसे सुनिये॥ २१॥
सृष्टिक प्रारम्भमें मेरे दक्ष आदि दस पुत्र उत्पन
हुए और मेरी वाणीसे एक परम सुन्दरी कन्या भी
उत्पन्न हुई॥ २२॥
जिसमें धर्म मेरे वक्षःस्थलसे, काम मनसे तथा
अन्य पुत्र मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए, हे हरे! कन्याको
देखकर मुझे मोह हो गया॥ २३॥
मैंने आपकी मायासे मोहित होकर जब उमे
कुदृष्टिसे देखा, तब उसी समय महादेवजीने आकर
मेरी तथा मेरे पुत्रोंकी निन्दा की ॥ २४॥
हे नाथ! उन्होंने स्वयंको श्रेष्ठ तथा प्रभु मानकर
ज्ञानी, योगी, जितेन्द्रिय, भोगरहित मुझ ब्रह्माको तथा
मेरे पुत्रोंको धिक्कारा ॥ २५॥
हे हरे! मेरे पुत्र होकर भी शिवने सबके सामने
ही मेरी निन्दा की। यही मुझे महान् दुःख है, इसे मै
आपके सामने कह दिया॥ २६॥
यदि वे पली ग्रहण कर लें, तो मैं सुखी हो
जाऊँगा और मेरे मनका कष्ट दूर हो जायगा। है
केशव! इसीलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ ९९॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] मुझ ब्रह्मका यह
वचन सुनकर विष्णु हँसकर मुझ सृष्टिकर्ता ब्रह्माकी
हर्षित करते हुए शीघ्र ही कहने लगे- ॥ २८ ॥
विष्णुजी बोले-हे विधे! सम्पूर्ण भ्रम
निवारण करनेवाले और वेद तथा आगमोंद्रारा
परमार्थयुक्त मेरे वचनको सुनें॥ २९॥ कं
हे विधे! वेदके वक्ता तथा समस्त लोकके
होकर भी आप इस प्रकार महामूर्ख तथा
किस प्रकार हो गये ?॥ ३०॥
अ० १०]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३४९
जडतां त्यज मन्दात्मन् कुरु त्वं नेदूशीं मतिम्।
किं ब्रुवन्त्यखिला वेदा: स्तुत्या तत्स्मर सळ्या ॥ ३१
रुद्रं जानासि दुर्बुद्धे स्वसुतं परमेश्वरम्।
बेदवक्तापि विज्ञानं विस्मृतं तेऽखिलं विधे॥ ३२
शंकरं सुरसामान्यं मत्वा द्रोहं करोषि हि।
सुबुद्धिर्विगता तेऽद्याविर्भूता कुमतिस्तथा॥ ३३
तत्त्वसिद्धान्तमाख्यातं शृणु सदबुद्धिमावह।
यथार्थ निगमाख्यातं निर्णीय भवकारकम्॥ ३४
शिवः सर्वस्वकर्ता हि भर्ता हर्ता परात्परः।
परब्रह्म परेशश्च निर्गुणो नित्य एवं च॥ ३५
अनिर्देश्यो निर्विकारः परमात्माद्वयोऽच्युतः।
अनन्तोऽन्तकरः स्वामी व्यापकः परमेश्वर: ॥ ३६
सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता त्रिगुणभाग्विभुः ।
ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यो रजः सत्त्वतमः परः॥ ३७
मायाभिन्नो निरीहश्च मायो मायाविशारदः।
सगुणोऽपि स्वतंत्रश्च निजानंदोऽविकल्पकः॥ ३८
आत्मारामो हि निद्ठन्द्दो भक्ताधीनः सुविग्रहः।
योगी योगरतो नित्यं योगमार्गप्रदर्शकः॥ ३९
गर्वापहारी लोकेशः सर्वदा दीनवत्सलः।
एतादूशो हि यः स्वामी स्वपुत्रं मन्यसे हि तम्॥ ४०
ईदृशं त्यज कुज्ञानं शरणां ब्रज तस्य वै।
भज सर्वात्मना शम्भुं सन्तुष्टः शं विधास्यति॥ ४१
गृह्णीयाच्छङ्करः पीं विचारो हृदि चेत्तव।
शिवामुददिश्य सुतपः कुरु ब्रह्मन् शिवं स्मरन्॥ ४२
कुरु ध्यानं शिवायास्त्वं काममुद्दिश्य तं हृदि।
सा चेत्प्रसन्ना देवेशी सर्व कार्य विधास्यति॥ ४३
हे मन्दात्मन्! आप अपनी जड्ताका त्याग करें
और इस प्रकारकी बुद्धि न करें। सम्पूर्ण वेद स्तुतिद्वारा
क्या कहते हैं, अच्छी बुद्धिसे उसका स्मरण करें॥ ३१॥
हे दुर्बुद्धे! आप उन परेश, रुद्रको अपना पुत्र
समझते हैं। हे विधे! आप वेदके वक्ता हैं, फिर भी
आपका समस्त ज्ञान विस्मृत हो गया है॥ ३२॥
[ऐसा ज्ञात होता है कि] इस समय आपकी.
सुबुद्धि नष्ट हो गयी है और आपमें कुमति उत्पन्न
हो गयी है, जो आप शंकरको सामान्य देवता
समझकर उनसे द्रोह कर रहे हैं॥ ३३॥
हे ब्रह्मन्! निर्णय करके वेदोंमें वर्णित किया
गया जो कल्याणकारक तत्त्वसिद्धान्त कहा गया हैं,
उसे आप सुनिये और सद्बुद्धि रखिये॥ ३४॥
शिवजी ही समस्त सृष्टिके कर्ता, भर्ता, हर्ता
परात्पर, परब्रह्म, परेश, निर्गुण, नित्य, अनिर्देश्य,
निर्विकार, परमात्मा, अद्वैत, अच्युत, अनन्त, सबका अन्त
करनेवाले, स्वामी, व्यापक, परमेश्वर, सृष्टि-पालन-
संहारको करनेवाले, सत्त्व-रज-तम--इन तीन गुणोंसे
युक्त, सर्वव्यापी, रज-सत्त्व-तमरूपसे ब्रह्मा, विष्णु तथा
महेश्वर नाम धारण करनेवाले, मायासे भिन्न, इच्छारहित,
मायास्वरूप, माया रचनेमें प्रवीण, सगुण, स्वतन्त्र,
अपनेमें आनन्दित रहनेवाले, निर्विकल्पक, अपनेमें ही
रमण करनेवाले, द्वन्द्रसे रहित, भक्तोंक अधीन रहनेवाले,
उत्तम शरीरवाले, योगी, सदा योगमें निरत रहनेवाले,
योगमार्ग दिखानेवाले, लोकेश्वर, गर्वको दूर करनेवाले
तथा सदैव दीनोंपर दया करनेवाले हैं। जो ऐसे स्वामी
हैं, उन्हें आप अपना पुत्र मानते हैं !॥ ३५--४०॥
हे ब्रह्मन्! [शिव हमारे पुत्र हैं-- ] इस प्रकारका
अज्ञान छोड़ दीजिये। उन्हींकी शरणमें जाइये और
सब प्रकारसे शिवजीका भजन कीजिये, वे प्रसन्न
होकर आपका कल्याण करेंगे ॥ ४१॥
यदि आपका यह विचार है कि शिवजी अवश्य
दारपरिग्रह करें, तो शिवजीका स्मरण करते हुए आप
शिवाको उद्देश्य करके कठोर तप कीजिये॥ ४२॥
आप अपनी इच्छाको हृदयमें धारणकर [भगवती]
शिवाका ध्यान कीजिये। यदि वे देवेश्वरी प्रसन्न हो
गयीं, तो आपका समस्त कार्य पूर्ण करेंगी ॥ ४३॥
३५०
श्रीशिवमहापुराण
[आ० १०
कृत्वावतारं सगुणा यदि स्यान्मानुषी शिवा।
'कस्यचित्तनया लोके सा तत्पती भवेद् श्रुवम् ॥
दक्षमाज्ञापय ब्रह्मन् तपः कुर्यात्प्रयत्नतः।
तामुत्पादयितुं पतीं शिवार्थं भक्तितः स्वतः॥ ४५
भक्ताधीनौ च तौ तात सुविज्ञेयौ शिवाशिवौ।
स्वेच्छया सगुणौ जातो परब्रह्मस्वरूपिणौ॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा तत्क्षणं मेश: शिवं सस्मार स्वप्रभुम्।
कृपया तस्य संप्राप्य ज्ञानमूचे च मां तत: ॥ ४७
विष्णुरुवाच
विधे स्मर पुरोक्तं यद्वचनं शंकरेण च।
प्रार्थितेन यदावाभ्यामुत्पन्नाभ्यां तदिच्छया॥ ४८
विस्मृतं तव तत्सर्वं धन्या या शांभवी परा।
तया संमोहितं सर्व दुर्विज्ञेया शिवं विना॥ ४९
'यदा हि सगुणो जातः स्वेच्छया निर्गुणः शिव: ।
मामुत्पाद्य ततस्त्वां च स्वशवत्या सुविहारकृत्॥ ५०
उपादिदेश त्वां शम्भुः सृष्टिकार्यं तदा प्रभुः ।
तत्पालनं च मां ब्रह्मन् सोमः सूतिकरोऽव्ययः॥ ५१
तदा वां वेशम संप्राप्तौ साञ्जली नतमस्तकौ।
भव त्वमसि सर्वेशोऽवतारी गुणरूपधृक् ॥ ५२
इत्युक्तः प्राह स स्वामी विहस्य करुणान्वितः ।
दिवमुद्वीक्ष्य सुप्रीत्या नानालीलाविशारदः ॥ ५३
मद्रूपं परमं विष्णो ईदृशं ह्यङ्गतो विधेः।
प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्र: प्रकीर्तितः ॥ ५४
पूर्णरूपः स मे पूज्यः सदा वां सर्वकामकृत्।
लयकर्ता गुणाध्यक्षो निर्विशेषः सुयोगकृत्॥ ५५
यदि वे शिवा सगुणरूपसे अवतार कृत्वावतार सगुणा यदि स्थान्मानुषी शिवा। | यदि घे शिवा सगुणलूपसे अवतार लेकर विर
मनुष्यकी कन्या बनें, तो निश्चय ही वे उन (शिव).
की पत्नी बन सकती हैं ॥ ४४॥
हे ब्रह्मन्! आप [इस कार्यके लिये] दक्षको आश
दीजिये कि वे स्वयं भक्तितत्पर होकर उन शिवपलीको
उत्पन्न करनेके लिये प्रयत्नपूर्वक तप करें ॥ ४५॥
हे तात! आप इसे भली प्रकार समझ लें कि वे
शिवा और शिव भक्तोंके अधीन हैं, परत्रह्मस्वरूप ये
दोनों स्वेच्छासे सगुणभाव धारण कर लेते हैं ॥ ४६॥
ब्रह्माजी बोले--लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने
इस प्रकार कहकर तत्क्षण अपने प्रभु शिवजीका
स्मरण किया और उसके बाद उनकी कृपासे ज्ञान
प्राप्तकर वे मुझसे कहने लगे-- ॥ ४७॥
विष्णुजी बोले--हे ब्रह्मन्! पूर्वकालमें
शिवजीकी इच्छासे उत्पन्न हुए हम दोनोंके द्वार
प्रार्थना करनेपर उन्होंने जो-जो वचन कहा था,
उसका स्मरण कीजिये ॥ ४८॥
आप वह सब भूल गये हैं। शिवजीकी जो
पराशक्ति है, वह धन्य है, उसीने इस समस्त जगत्को
मोहित कर रखा है। शिवके अतिरिक्त उसे कोई नहीं
जान सकता॥ ४९॥
हे ब्रह्मन्! जब निर्गुण शिवजीने अपनी इच्छासे
सगुणरूप धारण किया था, उस समय मुझे तथा
आपको उत्पन्न करके अपनी शक्तिके साथ उत्तम
विहार करनेवाले, सृष्टिकर्ता, अविनाशी, परमेश्वर उन
शम्भुने आपको सृष्टिकार्यके लिये तथा मुझे उसके
पालनके लिये आदेश दिया ॥ ५०-५१॥
उसके बाद हम दोनोंने हाथ जोड़कर विग्र
होकर निवेदन किया कि आप सर्वेश्वर होकर भी
सगुणरूप धारणकर अवतार लीजिये। ऐसा कहनेपर
करुणामय तथा अनेक प्रकारकी लीलाएँ करने
प्रवीण उन स्वामी शिवजीने आकाशकी ओर देखकीं
हँसते हुए प्रेमपूर्वक कहा--॥ ५२-५३॥
हे विष्णो ! मेरा ऐसा ही परम रूप ब्रह्माजीके
प्रकट होगा, जो लोकमें रुद्र नामसे प्रसिद्ध होगा। व
मेरा पूजनीय पूर्णरूप आप दोनोंके समस्त कार्यकी पूर
करनेवाला, जगतूका लयकर्ता, सभी गुणोंका
निर्विशेष तथा उत्तम योग करनेवाला होगा॥ ५४०५
आंग |
अ० ११]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३५१
त्रिदेवा अपि मे रूपं हरः पूर्णो विशेषत: ।
उमाया अपि रूपाणि भविष्यंति त्रिधा सुतौ॥ ५६
लक्ष्मीर्नाम हरेः पत्नी ब्रह्मपत्नी सरस्वती ।
पूर्णरूपा सती नाम रुद्रपत्नी भविष्यति॥ ५७
विष्णुरुवाच
इत्युवत्वान्तर्हितो जातः कृपां कृत्वा महेश्वरः ।
अभूतां सुखिनावावां स्वस्वकार्यपरायणौ॥ ५८
समयं प्राप्य सस्त्रीकावावां ब्रह्मन्न शंकर: ।
अवतीर्णः स्वयं रुद्रनामा कैलाससंश्रयः॥ ५९
अवतीर्णा शिवाभूत्सा सती नाम प्रजेशवर।
तदुत्पादनहेतोर्हि यतोऽतः कार्य एव वै॥ ६०
इत्युकत्वान्तर्दधे विष्णुः कृत्वा स करुणां पराम्।
प्राप्नुवंप्रमुदं चाथ ह्यधिकं गतमत्सरः॥ ६१
यद्यपि त्रिदेव मेरे स्वरूप हैं, किंतु “हर मेरे पूर्णरूप
होंगे। [इसी प्रकार] हे पुत्रो! उमाके भी तीन प्रकारके
रूप होंगे। लक्ष्मी विष्णुकी पत्नी, सरस्वती ब्रह्माकी
पली और पूर्णरूपा सती रुद्रकी पत्नी होंगी ॥ ५६-५७॥
विष्णुजी बोले [हे ब्रह्मन्!] भगवान् महेश्वर
ऐसा कहकर हमदोनोंपर कृपा करके अन्तर्धान हो
गये, उसके बाद हम दोनों सुखी होकर अपने-अपने
कार्योमें लग गये॥ ५८॥
हे ब्रह्मन्! समय पाकर हमदोनोंने स्त्री ग्रहण
कर ली, किंतु शंकरजीने नहीं । वे रुद्र नामसे अवतीर्ण
हुए हैं और कैलास पर्वतपर रहते हैं ॥ ५९॥
हे प्रजेश्वर! वे शिवा सती नामसे अवतीर्ण
होंगी। अतः उन्हें उत्पन्न होनेके लिये हमदोनोंको
यत्न करना चाहिये ॥ ६०॥
परम कृपा करके वे विष्णु ऐसा कहकर
अन्तर्धान हो गये। तब मैं [शिवजीके प्रति] ईर्ष्यारहित
होकर अत्यधिक प्रसन्न हो गया॥ ६१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे ब्रह्मविष्णुसंवादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें ब्रह्मा
और विष्णुका संवाद नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
— ee —
अथैकादशोऽध्यायः
ब्रह्माद्वारा जगदम्बिका शिवाकी स्तुति तथा वरको प्राप्ति
नारद उवाच
ब्रह्मन् तात महाप्राज्ञ बद नो वदतां वर।
गते विष्णौ किमभवदकार्षीत्किं विधे भवान्॥ १
ब्रह्मोवाच
विप्रनन्दनवर्यं त्वं सावधानतया शृणु।
विष्णौ गते भगवति यदकार्षमहं खलु॥ २
विद्याविद्यात्मिकां शुद्धां परब्रह्मस्वरूपिणीम्।
स्तौमि देवीं जगद्धात्रीं दुर्गा शम्भुप्रियां सदा॥ ३
सर्वत्र व्यापिनीं नित्यां निरालंबां निराकुलाम्।
त्रिदेवजननीं वंदे स्थूलस्थूलामरूपिणीम्॥ ४
त्वं चितिः परमानंदा परमात्मस्वरूपिणी।
नारदजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे महाप्राज्ञ! हे
तात! [आपसे] इस प्रकार कहकर विष्णुके अन्तर्धान
हो जानेपर क्या हुआ? हे विधे! आपने. क्या किया ?
हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप मुझसे कहिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले--हे श्रेष्ठ विप्रनन्दन! भगवान्
विष्णुके चले जानेपर मैंने जो कार्य किया, आप उसे
सावधानीपूर्वक सुनिये ॥ २॥
तब मैं विद्या-अविद्यास्वरूपा, शुद्ध, परब्रह्म-
स्वरूपिणी तथा जगत्को धारण करनेवाली शम्भुप्रिया
देवी दुर्गाकी स्तुति करने लगा॥ ३॥
सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली, नित्य, निराश्रय,
निराकुल, त्रिदेवोंको उत्पन्न करनेवाली, स्थूलसे भी
स्थूल रूप धारण करनेवाली तथा निराकार दुर्गाकी मैं
वन्दना करता हूँ। आप चित्स्वरूपा, परमानन्दस्वरूपिणी
३५२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १ _ = ॐ `` ` न न की
प्रसन्ना भव देवेशि मत्कार्य कुरु ते नमः॥
एवं संस्तूयमाना सा योगनिद्रा मया मुने।
आविर्बभूव प्रत्यक्षं देवर्षे चंडिका मम॥ ६
स्तिग्धाञ्जनद्युतिश्चारुरूपा दिव्यचतुर्भुजा।
सिंहस्था वरहस्ता च मुक्तामणिकचोत्कटा॥ ७
शरदिंद्वानना शुभ्रचन्द्रभाला त्रिलोचना।
सर्वावयवरम्या च कमलाङ्घ्रिनखद्युतिः॥ ८
समक्षं तामुमां वीक्ष्य मुने शक्तिं शिवस्य हि।
भक्त्या विनततुङ्गांशः प्रास्तवं सुप्रणम्य वै॥ ९
ब्रह्मोवाच
नमो नमस्ते जगतः प्रवृत्ति-
निवृत्तिरूपे स्थितिसर्गरूपे।
चराचराणां भवती सशक्तिः
सनातनी सर्वविमोहनीति॥ १०
या श्रीः सदा केशवमूर्तिमाला
विश्वंभरा या सकलं बिभर्ति।
या त्वं पुरा सृष्टिकरी महेशी
ह्री त्रिलोकस्य परा गुणेभ्यः॥ ११
या योगिनां वे महिता मनोज्ञा
सा त्वं नमस्ते परमाणुसारे।
यमादिपूते हृदि योगिनां या
या योगिनां ध्यानपथे प्रतीता॥ १२
प्रकाशशुद्धयादियुता विरागा
सा त्वं हि विद्या विविधावलंबा।
'कूटस्थमव्यक्तमनंतरूपं
त्वं बिभ्रती कालमयी जगंति॥ १३
तथा परमात्म-स्वरूपिणी हैं। हे देवेशि ! मेरे ऊ
आप प्रसन्न हों और मेरा कार्य करें। आपको नमस्का
है॥ ४-५॥
हे मुने! हे देवर्षे! मेरे द्वारा इस प्रकार
करनेपर वे योगनिद्रा भगवती चण्डिका मेरे साफ
प्रकट हो गयीं॥ ६॥
वे भगवती दुर्गा चिकने अंजनके समान शरीरकी
कान्तिसे युक्त थीं, वे सुन्दर रूपसे सम्पन्न थीं, उनकी
दिव्य चार भुजाएँ थीं, वे सिंहपर सवार थीं, वे हाथ
वरमुद्रा धारण किये हुए थीं, उनके केशोंमें मोती तथा
मणियाँ ग्रथित थीं, वे अत्यन्त उत्कट थीं, उनका मुख
शरत्कालीन पूर्णिमाके समान था, उनके मस्तकप
शुभ चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे युक्त
थीं, उनके समस्त शरीरके अवयव परम मनोहर थे
तथा वे चरणकमलके नखकी कान्तिसे प्रकाशित हो
रही थीं॥ ७-८॥
इस प्रकार अपने सामने शिवकी शक्ति उन भगवती
उमाको उपस्थित देखकर भक्तिसे सिर झुकाकर मैं उन्हें
प्रणाम करके [इस प्रकार] स्तुति करने लगा--॥९॥
ब्रह्माजी बोले--हे जगत्को प्रवृत्ति एवं निवृत्ति
स्वरूपे! हे सर्गस्थितिरूपे! आपको नमस्कार है। आप
समस्त चराचरकी शक्ति, सनातनी तथा सबको मोहित
करनेवाली हैं॥ १०॥
जो महालक्ष्मी भगवान् विष्णुको मालाकी भाँति
हृदयमें धारण करनेवाली, विश्वका भरण करनेवाली
तथा सभीका पोषण करनेवाली हैं, जो महेश्वरी पूवं
त्रिलोकीका सृजन करनेवाली हैं, उसका संहार
हैं तथा गुणोंसे सर्वथा परे हैं॥ ११॥
जो योगियोंके लिये पूज्य हैं, मनोहर हैं:
आप ही हैं। हे परमाणुओंकी सारस्वरूपे!
नमस्कार है | जो यम-नियमोंसे पवित्र हुए
हृदयमें निवास करनेवाली तथा योगियोंके दवारा धयत
हैं, वे प्रकाश एवं शुद्धि आदिसे युक्त, मोहसे र
एवं [इस जगत्को] अनेक प्रकारसे अवलम्ब १.
विद्यास्वरूपा आप ही हैं। आप कूटस्थ, अव्यर्फ की
अनन्तरूपा हैं। [हे भगवति!] आप
जगत्को धारण करती हैं॥ १२-१३ ॥
आ० ११]
विकारबीजं प्रकरोषि नित्यं
गुणान्विता स्वजनेषु नूनम्।
त्वं बै गुणानां च शिवे त्रयाणां
निदानभूता च ततः परासि॥ १४
सत्त्वं रजस्तामस इत्यमीषां
विकारहीना सभुवस्तुरीया।
सा त्वं गुणानां जगदेकहेतुं
ब्रह्मांतरारंभसि चात्सि पासि॥ १५
अशेषजगतां बीजे ज्ेयज्ञानस्वरूपिणि।
जगद्धिताय सततं शिवपत्नि नमोऽस्तु ते॥ १६
इत्याकर्ण्य वचः सा मे काली लोकविभाविनी।
प्रीत्या मां जगतामूचे स्त्रष्टारं जनशब्दवत्॥ १७
देव्युवाच
ब्रह्मन् किमर्थ भवता स्तुताहमवधारय।
उच्यतां यदि धृष्योऽसि तच्छीघ्रं पुरतो मम॥ १८
प्रत्यक्षमपि जातायां सिद्धि: कार्यस्य निश्चिता
तस्माच्चं वांछितं ब्रूहि या करिष्यामि भाविता॥ १९
ब्रह्मोवाच
शृणु देवि महेशानि कृपां कृत्वा ममोपरि।
मनोरथस्थं सर्वज्ञे प्रवदामि त्वदाज्ञया॥२०
'यः पतिस्तव देवेशि ललाटान्मेऽभवत्पुरा।
शिवो रुद्राख्यया योगी स वै कैलासमास्थित: ॥ २१
तपश्चरति भूतेश एक एवाविकल्पकः।
अपलीको निर्विकारो न द्वितीयां समीहते॥ २२
तं मोहय यथा चान्यां द्वितीयां सति वीक्षते।
त्वदृते तस्य नो काचिद्धविष्यति मनोहरा॥ २३
तस्मात्त्वमेव रूपेण भवस्य हरमोहिनी।
सुता भूत्वा च दक्षस्य रुद्रपली शिवे भव॥ २४
2223 Shivmahapuranam. Part LSection_I3_l_Front
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३५३
आप गुणोंसे युक्त होकर सभी प्राणियोंमें नित्य
विकाररूप बीज उत्पन्न करती हैं । हे शिवे! आप तीनों
गुणोंकी कारणरूपा हैं तथा इससे परे भी हैं ॥ १४॥
[हे देवि!] आप सत्त्व, रज तथा तम--इन
तीनों गुणोंके साथ ही पार्थिव विकारोंसे रहित तुरीय
रूप हैं। आप इस जगतूकी तथा गुणोंकी हेतुभूता हैं।
आप ही ब्रह्माण्डमें स्थित रहकर इस जगतूकी सृष्टि,
प्रलय तथा पालन करती हैं॥ १५॥
हे सम्पूर्ण जगतूकी बीजस्वरूपे! हे ज्ञान तथा
ज्ञेयस्वरूपिणि! आप सर्वदा जगतूके हितसाधनमें
तत्पर रहनेवाली हैं । अत: हे शिवपत्नि! आपको सदा
नमस्कार है॥ १६॥
[ब्रह्माजी बोले-] मेरी स्तुतिको सुनकर लोकका
कल्याण करनेवाली वे महाकाली, सामान्य मनुष्यकी
भाँति मुझ जगत्रष्टासे प्रेमपूर्वक कहने लगीं॥ १७॥
देवी बोलीं-हे ब्रह्मन्! आपने मेरी स्तुति
किसलिये की है, इसे आप ठीकसे समझ लें । आप मेरे
भक्त हैं, तो उसे शीघ्र ही मेरे सामने निवेदन करें॥ १८॥
मेरे प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हो जानेपर कार्य-
सिद्धि निश्चित है। अतः आप अपनी मनोभिलषित बात
कहें, मैं प्रसन्न होकर उसे निश्चित रूपसे करूँगी ॥ १९॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवि! हे महेश्वरि! मेरे
ऊपर कृपाकर मेरी बात सुनें। हे सर्वज्ञे! आपकी
आज्ञासे मैं अपने मनोरथकी बात कह रहा हूँ॥ २०॥
हे देवेशि ! पूर्वकालमें मेरे ललाट-प्रदेशसे उत्पन्न
हुए आपके पति जो रुद्रनामसे प्रसिद्ध हैं, वे इस समय
योगी होकर कैलासपर्वतपर निवास कर रहे हैं ॥ २१॥
चे भूतोंके स्वामी इस समय अकेले निर्विकल्पक
समाधिमें लीन होकर तप कर रहे हैं। वे निर्विकार
होनेके कारण पलीसे रहित हैं और [आत्मामें रमण
करनेके कारण] दूसरी पत्नीकी अपेक्षा नहीं करते॥ २२॥
हे सति! आप उन्हींको मोहित करें, जिससे वे
[आत्माभिरमणसे उपरत होकर] दूसरी स्त्री [आप]-
को देखें । आपके अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री उनके मनको
मोहित करनेवाली नहीं होगी। इसलिये आप ही दक्षकी
कन्या बनकर अपने रूपसे शिवजीको मोहित करनेवाली
हों। हे शिवे! आप शिवपत्नी बनें ॥ २३-२४॥
३५४
श्रीशिवमहापुराण
[अ १ क ० `
यथा धृतशरीरा त्वं लक्ष्मीरूपेण केशवम्।
आमोदयसि विश्वस्य हितायैतं तथा कुरु॥ २५
कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्वानिंदद् वृषध्वजः।
स कथं वनितां देवि स्वेच्छया सङ्गग्रहीष्यति॥ २६
हरे गृहीतकांते तु कथं सृष्टिः शुभावहा।
आद्यंतमध्ये चैतस्य हेतौ तस्मिन्विरागिणि॥ २७
इति चिंतापरो नाहं त्वदन्यं शरणं हितम्।
कृच्छूवांस्तेन विश्वस्य हितायैतत्कुरुष्व मे॥ २८
ज विष्णुस्तस्य मोहाय न लक्ष्मीर्न मनोभव:।
न चाप्यहं जगन्मातर्नान्यस्त्वां कोऽपि वै विना ॥ २९
तस्मात्त्वं दक्षजा भूत्वा दिव्यरूपा महे श्वरी ।
तत्पली भव मद्भक्त्या योगिनं मोहयेश्वरम्॥ ३०
दक्षस्तपति देवेशि क्षीरोदोत्तरतीरगः।
त्वामुद्दिश्य समाधाय मनस्त्वयि दृढव्रतः ॥ ३१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचः सा मे चिंतामाप शिवा तदा।
उवाच च स्वमनसि विस्मिता जगदम्बिका॥ ३२
देव्युवाच
अहो सुमहदाश्चर्यं वेदवक्ताऽपि विश्वकृत्।
महाज्ञानपरो भूत्वा विधाता किं वदत्ययम्॥ ३३
विधेश्चेतसि सञ्जातो महामोहोऽसुखावहः।
यद्वरं निर्विकारं तं संमोहयितुमिच्छति॥ ३४
हरमोहवरं मत्तः समिच्छति विधिस्त्वयम्।
को लाभोऽस्यत्र स विभुर्निमाहो निर्विकल्पकः ॥ ३५
परब्रह्माख्यो यः शंभुर्नि्गुणो निर्विकारवान्।
तस्याहं सर्वदा दासी तदाज्ञावशगा सदा॥ ३६
स॒ एव पूर्णरूपेण रुद्रनामाभवच्छिवः।
भक्तोद्धारणहेतोर्हि स्वतंत्रः परमेश्वरः ॥ ३७
जिस प्रकार आप लक्ष्मीका रूप
विष्णुको प्रसन्न करती हैं, उसी प्रकार संसारके हित
लिये आप इस कार्यको भी वैसे ही करें॥ २५॥
हे देवि! जब उन शिवने स्त्रीविषयक अभिलाष.
मात्रसे मेरी निन्दा की, तो भला वे स्वेच्छासे
प्रकार स्त्री ग्रहण कर सकते हैं ?॥ २६॥
यदि वे स्त्री ग्रहण कर भी लें, तो भी बे ते
सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें सदैव विरक्त रहे
हैं, अत: उनसे उत्तम सृष्टि किस प्रकार होगी ?॥ २७।
हे देवि! इस प्रकार चिन्तापरायण हुए मेरे लिये
आपके अतिरिक्त और कोई शरणप्रद नहीं है, इसलिये
विश्वकल्याणके निमित्त आप मेरे इस कार्यको करें॥ २८॥
शिवजीको मोहित करनेमें न विष्णु, न लक्ष्मी, न
काम और न तो मैं ही समर्थ हूँ। हे जगन्माता ! आपके
बिना कोई भी उन्हें मोहित करनेमें समर्थ नहीं है॥ २९॥
अत: आप दिव्यरूपा दक्षपुत्रीके रूपमें जस
लेकर मेरी भक्तिके आग्रहसे महायोगी शिवको मोहित
करें और उनकी पत्नी महेश्वरी बनें॥३०॥
हे देवेशि! इस समय दक्षप्रजापति क्षीरसमुद्रके
उत्तर तटपर आपको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे मनमें आपका
ध्यान करते हुए दूढ्व्रती होकर तपस्या कर रहे हैं॥ ३१॥
ब्रह्माजी बोले--मेंरे इस वचनको सुनकर वे
जगदम्बिका शिवा चिन्तित हो उठीं और विस्मित
होकर अपने मनमें कहने लगीं-॥ ३२॥
देवी बोलीं--वेदवक्ता और जगत्कर्ता ये विधात
महान् अज्ञानसे युक्त होकर कैसी बात कर रहे हैँ
अहो! यह महान् आश्चर्य है!॥ ३३॥
ब्रह्माके चित्तमें ऐसा यह दुःखदायी महान्
कैसे उत्पन्न हो गया कि वे निर्विकार परमात्माकी पी
मोहित करना चाहते हैं!॥ ३४॥ हृ
ये ब्रह्मा मुझसे शिवजीके मोहका वर चाहते
इनका कौन-सा लाभ है? वे प्रभु तो तिर्वि
निर्मोह हैं॥ ३५॥ आँ
वे शम्भु निर्विकार, निर्गुण तथा परब्रह्म हैं
मैं तो सदा उनकी आज्ञामें रहनेवाली दासी हूँ २
वे स्वतन्त्र परमेश्वर शिवभक्तोंके
अपने पूर्ण रूपसे रुद्र नामसे अवतीर्ण हुए हैं ।
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अ० ११]
हरेविंधेश्व स स्वामी शिवायूनो न कर्हिचित्।
योगादरों हामायस्थो मायेशः परत: पर:॥ ३८
मत्वा तमात्मजं ब्रह्मा ।
इच्छत्ययं मोहयितुमतोऽज्ञानविमोहितः॥ ३९
न दद्याच्चेद्वरं वेदनीतिर्भ्रष्टा भवेदिति।
किं कुर्या येन न विभुः क्रुद्ध: स्यान्मे महेश्वरः ॥ ४०
ब्रह्मोवाच
विचार्येत्थं महेशं तं सस्मार मनसा शिवा।
प्राप्यानुज्ञां शिवस्याथोवाच दुर्गा च मां तदा॥ ४१
दुर्गोवाच
यदुक्तं भवता ब्रह्मन् समस्तं सत्यमेव तत्।
मदृते मोहयित्रीह शंकरस्य न विद्यते॥ ४२
हरेऽगृहीतदारे तु सृष्टिनेषा सनातनी।
भविष्यतीति तत्सत्यं भवता प्रतिपादितम्॥ ४३
ममापि मोहने यन्नो विद्यतेऽस्य महाप्रभोः।
त्वद्वाक्याद् द्विगुणो मेऽद्य प्रयलोऽभूत्स निर्भरः ॥ ४४
अहं तथा यतिष्यामि यथा दारपरिग्रहम्।
हरः करिष्यति विधे स्वयमेव विमोहितः॥ ४५
सतीमूर्तिमहं धृत्वा तस्यैव वशवर्तिनी।
भविष्यामि महाभागा लक्ष्मीर्विष्णोर्यथा प्रिया ॥ ४६
यथा सोऽपि मयैवेह वशवर्ती सदा भवेत्।
तथा यत्नं करिष्यामि तस्यैव कृपया विधे॥ ४७
उत्पन्ना दक्षजायायां सतीरूपेण शंकरम्
अहं सभाजयिष्यामि लीलया तं पितामह ॥ ४८
यथान्यजंतुरवनो वर्तते वनितावशे।
मद्भक्त्या स हरो वामावशवरती भविष्यति॥ ४९
ब्रह्मोवाच
मह्यमित्थं समाभाष्य शिवा सा जगदम्बिका ।
मया तात तत्रैवांतर्दथे ततः॥ ५०
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रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३५५
वे रुद्र ब्रह्मा तथा विष्णुके भी स्वामी हैं और किसी
भी प्रकार शिवसे कम नहीं हैं। वे योगका आदर करनेवाले,
मायासे रहित, मायापति तथा परसे भी परे हैं ॥ ३८॥
अज्ञानसे मोहित ये ब्रह्मा उन्हें अपना आत्मज
तथा सामान्य देवता समझकर मोहित करना चाहते
हैं॥ ३९॥
यदि इन ब्रह्माको वरदान न दूँ, तो बेदकी नीति
भ्रष्ट होती है। अब में क्या करूँ, जिससे प्रभु महेश्वर
मेरे ऊपर क्रोधित न हों॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले--शिवाने इस प्रकार विचारकर
मनसे महादेवजीका स्मरण किया । तत्पश्चात् शिवकी
आज्ञा पाकर वे दुर्गा मुझसे कहने लगीं-॥ ४१॥
दुर्गा बोलीं हे ब्रह्मन्! आपने जो भी कहा है,
वह सब सत्य है, मुझे छोड़कर शंकरजीको मोहित
करनेवाली कोई दूसरी स्त्री संसारमें नहीं है ॥ ४२॥
आपने जो कहा कि जबतक शंकरजी दारपणिग्रह
नहीं करेंगे, तबतक सनातनी सृष्टि नहीं होगी, यह
बात भी सत्य है॥ ४३॥
मुझमें भी महाप्रभुको मोहित करनेकी सामर्थ्य
नहीं है, किंतु अब आपके कहनेसे दुगुने उत्साहसे
युक्त होकर मैं पूर्ण प्रयत्न करूँगी ॥ ४४॥
हे विधे! अब मैं वैसा उपाय करूँगी, जिससे
शंकरजी मोहित होकर स्वयं स्त्री ग्रहण करेंगे ॥ ४५॥
जिस प्रकार महाभागा लक्ष्मीजी विष्णुप्रिया हैं,
उसी प्रकार मैं भी सतीरूप धारणकर उनकी वशवर्तिनी
[प्रिया पत्नी] बनूँगी॥ ४६॥
वे भी जिस प्रकारसे मेरे वशवर्ती बने रहें, मैं भी
उन्हींकी कृपासे वैसा ही यत्न करूँगी॥ ४७॥
हे पितामह! में दक्षकी पत्नीके गर्भसे सतीरूपसे
जन्म लेकर अपनी लीलाके द्वारा शिवजीको प्राप्त
करूँगी॥ ४८॥
जिस प्रकार संसारमें अन्य प्राणी स्त्रीके बशमें
होते हैं, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे वे महादेवजी भी
स्त्रीके वशवर्ती बने रहेंगे॥ ४९॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! मुझसे इस प्रकार
कहकर वे जगदम्बा शिवा मेरे देखते-देखते वहाँ
अन्तर्धान हो गयीं ॥ ५०॥
३५६
तस्यामन्तर्हितायां तु सोऽहं लोकपितामहः।
श्रीशिवमहापुराण
[3s १ en
ब
उनके अन्तर्धान हो जानेपर मैं
ब्रह्मा वहाँ गया, जहाँ मेरे पुत्र थे और म
अगमं यत्र स्वसुतास्तेभ्यः सर्वमवर्णयम्॥ ५१ | कुछ वर्णन किया॥५१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
दु्गास्तुतिब्रह्मवरग्राप्तिवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
दर्गास्तुतिःब्रह्मवरग्राप्तिवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १९ ॥
— oe ee
अथ द्वादशोऽध्यायः
दक्षप्रजापतिका तपस्याके प्रभावसे शक्तिका दर्शन और उनसे रुद्रमोहनकी प्रार्थना करना
नारद उवाच
ब्रह्मन् शंभुवर प्राज्ञ सम्यगुक्तं त्वयानघ।
शिवाशिवचरित्रं च पावितं जन्म मे हितम्॥ १
इदानीं वद दक्षस्तु तपः कृत्वा दूढव्रतः।
ककं वरं प्राप देव्यास्तु कथं सा दक्षजाभवत्॥ २
ब्रह्मोवाच
शृणु नारद धन्यस्त्वं मुनिभिर्भक्तितोऽखिलैः ।
यथा तेपे तपो दक्षो वरं प्राप च सुव्रत: ॥ ३
मदाज्ञप्त: सुधीर्दक्षः समाधाय महाधिपः।
अयाद्यष्दुं च तां देवीं तत्कामो जगदंबिकाम्॥ ४
क्षीरोदोत्तरतीरस्थां तां कृत्वा हृदयस्थिताम्।
तपस्तप्तुं समारेभे द्रष्टुं ्रत्यक्षतोऽम्बिकाम्॥ ५
दिव्यवर्षेण दक्षस्तु सहस्राणां त्रयं समा: ।
तपश्चचार नियतः संयतात्मा दृढब्रतः॥ ६
मारुताशी निराहारो जलाहारी च पर्णभुक्।
एवं निनाय तं कालं चिन्तयन्तां जगन्मयीम्॥ ७
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! हे शिवभक्त! हे
प्राज्ञ! हे निष्पाप! आपने शिवा तथा शिवके कल्याणका
चरित्रका भलीभाँति वर्णन किया और मेरे जन्मको
पवित्र कर दिया॥ १॥
अब आप यह बताइये कि व्रतमें दृढ़ता
रखनेवाले दक्षने तप करके देवीसे कौन-सा वर प्राण
किया तथा वे शिवा किस प्रकार दक्षकन्याके रूपमे
उत्पन्न हुई ?॥ २॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! तुम इन मुनियोंके
साथ शिवमें भक्ति रखनेके कारण अत्यन्त धन्य हो!
उत्तम व्रतवाले दक्षने जिस प्रकार तपस्या की तथा व
प्राप्त किया, उसे सुनो ॥ ३॥
मेरी आज्ञा पाकर वे बुद्धिमान् महाराज दक्षप्रजापी
उस कार्यकी सिद्धिकी इच्छासे चित्तको समाहित
देवी जगदम्बाकी उपासनाके लिये गये और क्षीरसागे
उत्तरतटपर रहनेवाली उन जगदम्बिकाको हदये
धारण करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेहेतु तपसा
करने लगे ॥ ४-५ ॥
इन्द्रियोको अपने वशमें करके दृढवती >'
दक्षने देवताओके तीन हजार वर्षपर्यन्त नियमपूर्वी
तप किया॥ ६॥ की,
उन जगन्मयी शिवाका ध्यान करते हुए *
कुछ दिन पत्ते खाकर, कुछ दिन जल पीकर,
दिन निराहार रहकर तथा कुछ दिन वायु पीर्कर
समयको व्यतीत किया॥७॥
अ० १२]
दुर्गाध्यानसमासक्तश्चिरं कालं तपोरतः।
नियमैर्बहुभिर्देवीमाराधयति सुव्रतः॥ ८
ततो यमादियुक्तस्य दक्षस्य मुनिसत्तम।
जगदम्बां पूजयतः प्रत्यक्षमभवच्छिवा॥ ९
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा जगदम्बां जगन्मयीम्।
कृतकृत्यमथात्मानं मेने दक्षः प्रजापतिः॥ १०
सिंहस्थां कालिकां कृष्णां चारुवक्त्रांचतुर्भुजाम्।
वरदाभयनीलाब्जखड्गहस्तां मनोहराम्॥ ११
आरक्तनयनां चारुमुक्तकेशीं जगत्प्रसुम्।
तुष्टाव वाग्भिश्चित्राभिः सुप्रणम्याथ सुप्रभाम्॥ १२
दक्ष उवाच
जगदंब महामाये जगदीशे महेशवरि।
कृपां कृत्वा नमस्तेऽस्तु दर्शितं स्ववपुर्मम॥ १३
प्रसीद भगवत्याद्ये प्रसीद शिवरूपिणि।
प्रसीद भक्तवरदे जगन्माये नमोऽस्तु ते॥ १४
ब्रह्मोवाच
इति स्तुता महेशानी दक्षेण प्रयतात्मना।
उवाच दक्षं ज्ञात्वापि स्वयं तस्येष्सितं मुने॥ १५
देव्युवाच
तुष्टाहं दक्ष भवतः सद्भक्त्या ह्यनया भृशम्
वरं वृष्णीष्व स्वाभीष्टं नादेयं विद्यते तव॥ १६
ब्रह्मोवाच
जगदम्बावचः श्रुत्वा ततो दक्षः प्रजापतिः।
सुप्रहष्टतरः प्राह नामं नामं च तां शिवाम्॥ १७
दक्ष उवाच
जगदम्ब महामाये यदि त्वं वरदा मम।
मद्वचः श्रृणु सुप्रीत्या मम कामं प्रपूरय॥ १८
मम स्वामी शिवो यो हि स जातो ब्रह्मणः सुतः।
रुद्रनामा पूर्णरूपावतारः परमात्मनः॥ १९
तवावतारो नो जातः का तत्पली भवेद्तः।
तं मोहय महेशानमवतीर्य क्षितौ शिवे॥ २०
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३५७
इस प्रकार वे सुब्रत दुर्गाके ध्यानमें संलग्न होकर
बहुत समयतक तपस्या करते रहे और अनेक नियमोंसे
देवीकी आराधना करते रहे । तब हे मुनिश्रेष्ठ! अहिंसा,
ब्रह्मचर्य आदि यमोंसे युक्त होकर जगदम्बाकी पूजा
करते हुए उन दक्षके सामने जगदम्बा शिवा प्रत्यक्ष
हुई॥ ८-९॥
तब दक्ष प्रजापतिने उन जगन्मयी जगदम्बाको अपने
सामने प्रत्यक्ष देखकर अपनेको कृत्यकृत्य समझा ॥ १०॥
सिंहपर सवार, कृष्णवर्णवाली, सुन्दर मुखवाली,
चार भुजाओंवाली, हाथोंमें वर-अभय-नीलकमल तथा
खड्ग धारण की हुई, मनोहर, लाल नेत्रवाली, बिखरे
हुए सुन्दर बालोंसे युक्त, जगतूकी जन्मदात्री तथा सुन्दर
कान्तिवाली उन कालिकाको प्रणामकर दक्ष-प्रजापतिने
[अपनी] विचित्र वाणीसे उनकी स्तुति की ॥ ११-१२॥
दक्ष बोले-हे जगदम्बे! हे महामाये! हे
जगदीश्वरि! हे महेश्वरि! आपने कृपा करके मुझे अपने
रूपका दर्शन दिया है, आपको मेरा नमस्कार है ॥ १३॥
हे भगवति! हे आद्ये! मुझपर प्रसन्न हों, हे
शिवरूपिणि। प्रसन्न हों, हे भक्तवरदे! प्रसन्न हों, हे
जगन्माये। आपको नमस्कार है॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! संयत चित्तवाले दक्षने
इस प्रकार महेश्वरीकी स्तुति की, तब उनके मनोरथको
जानती हुई भी वे दक्षसे कहने लगीं--॥ १५॥
देवी बोलीं-हे दक्ष! मैं आपकी इस भक्तिसे
बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है,
अतः अपना अभीष्ट वर माँगिये॥ १६॥
ब्रह्माजी बोले-जगन्माताके इस वचनको
सुनकर दक्ष प्रजापति अत्यन्त प्रसन्न होकर शिवाको
बारंबार प्रणाम करते हुए कहने लगे-॥ १७॥
दक्ष बोले-हे जगदम्ब! हे महामाये! यदि
आप मुझे वर देना चाहती हैं, तो मेरे वचनोंको सुनिये
और प्रसन्नतासे मेरा मनोरथ पूर्ण कोजिये॥ १८॥
जो मेरे स्वामी शिव हैं, वे रुद्रनामसे ब्रह्मे पुत्ररूपमें
अवतरित हुए हैं, वे परमात्माके पूर्णावतार हैं, परंतु अभीतक
आपका अवतार नहीं हुआ है, [आपके अतिरिक्त]
उनकी पत्नी कौन हो सकती है ? अतः हे शिवे! आप
पृथ्वीपर अवतरित होकर उन्हें मोहित करें॥ १९-२०॥
३५८
श्रीशिवमहापुराण
[अ १ सियी > विनय
त्वदृते तस्य मोहाय न शक्तान्या कदाचन ।
तस्मान्मम सुता भूत्वा हरजाया भवाधुना॥
इत्थं कृत्वा सुलीलां च भव त्वं हरमोहिनी।
ममैवैष वरो देवि सत्यमुक्तं तवाग्रतः॥ २२
स्वार्थ न केवलं मेऽस्ति सर्वेषां जगतामपि।
ब्रह्मविष्णुशिवानां च ब्रह्मणा प्रेरितो ह्यहम्॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं प्रजेशस्य वचनं जगदम्बिका।
प्रत्युवाच विहस्येति स्मृत्वा तं मनसा शिवम्॥ २४
देव्युवाच
तात प्रजापते दक्ष श्रृणु मे परमं वचः।
सत्यं ब्रवीमि त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नाखिलप्रदा॥ २५
अहं तब सुता दक्ष त्वज्ञायायां महेश्वरी ।
भविष्यामि न संदेहस्त्वद्भक्तिवशवर्तिनी॥ २६
तथा यलं करिष्यामि तपः कृत्वा सुदुःसहम्।
हरजाया भविष्यामि तद्वरं प्राप्य चानघ॥ २७
जान्यथा कार्यसिद्धिर्हि निर्विकारी च स प्रभुः।
विधर्विष्णोश्च संसेव्यः पूर्ण एव सदाशिवः ॥ २८
अहं तस्य सदा दासी प्रिया जन्मनि जन्मनि।
मम स्वामी स बे शंभुर्नानारूपधरोऽपि ह॥ २९
वरप्रभावाद् भ्रुकुटेरवतीणों विधेः स च।
अहं तद्वरतोऽपीहाबतरिष्ये तदाज्ञया॥ ३०
गच्छ स्वभवनं तात मया ज्ञाता तु दूतिका।
हरजाया भविष्यामि भूत्वा ते तनयाचिरात्॥ ३१
इत्युक्त्वा सद्गबचो दक्षं शिवाज्ञां प्राप्य चेतसि।
पुनः प्रोवाच सा देवी स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्॥ ३२
[हे देवि!] आपके अतिरिक्त अन्य कोई भे
उन्हें मोहित नहीं कर सकती, इसलिये आप इस
मेरी कन्याके रूपमें जन्म लेकर शिवपत्नी बनें॥
इस प्रकार उत्तम लीला करके आप
मोहमें डालें, हे देवि! मेरा यही वर है, आपके साफ
मैंने सत्य कह दिया॥ २२॥
इसमें केवल मेरा ही स्वार्थ नहीं है, आणि
सम्पूर्ण लोकोंका और ब्रह्मा, विष्णु तथा
भी स्वार्थ है । इसीलिये ऐसा करनेके लिये ब्रह्माजी
मुझे प्रेरित किया है॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--दक्षके इस वचनको सुनक
जगदम्बा मनमें उन शिवजीका स्मरण करके हँसका
कहने लगीं- ॥ २४॥
देवी बोलीं--हे तात! हे प्रजापते! हे दक्ष!
मेरी सत्य बात सुनिये। मैं आपकी भक्तिसे अत्य
प्रसन्न होकर सब कुछ प्रदान करनेवाली हूँ। हे दक्ष!
मैं महेश्वरी आपकी पुत्री बनूँगी, इसमें सन्देह नहीं।
मैं आपकी भक्तिके वशमें हो गयी हँ ॥ २५-२६॥
हे अनघ! मैं अत्यन्त कठोर तप करके ऐसा
प्रयत्न करूँगी, जिससे शिवजीसे वरको प्राप्तकर
उनकी पत्नी बन जाऊँ॥ २७॥
वे प्रभु सदाशिव ब्रह्मा तथा विष्णुके सेव्य
विकाररहित तथा पूर्ण हैं। अतः बिना तपके इस
प्रकारकी कार्यसिद्धि नहीं हो सकती है॥ २८॥
मैं तो प्रत्येक जन्ममें उनकी प्रिय दासी हूँ और
अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले वे सदाशिव
स्वामी हैं॥ २९॥
वे चरके प्रभावसे ब्रह्माजीकी भूकुटिसे अवतीर्ण
हुए हें और मैं भी उन्हींकी आज्ञासे ब्रद्याजीके
वरदानसे इस लोकमें अवतार लूँगी॥३०॥
हे तात! अब आप अपने घर जाइये। मैते
दूतीको सारी बात बता दी है । मैं [कुछ ही
आपकी कन्या बनकर शीघ्र ही
बनूँगी॥ ३१॥
इस प्रकार दक्षप्रजापतिसे श्रेष्ठ वचन कहकर
मनमें शिवकी आज्ञा पाकर वे शिवजीके
ध्यान करके पुन: कहने लगीं-- ॥ ३२॥
२१॥
पली
और
आ० १३]
परन्तु प्रण आधेयो मनसा ते प्रजापते।
श्रावयिष्यामि ते तं वै सत्यं जानीहि नो मृषा॥ ३३
यदा भवान् मयि पुनर्भवेन्मंदादरस्तदा।
दहं त्यक्ष्ये निजं सत्यं स्वात्मन्यस्म्यथ वेतरम्॥ ३४
एष दत्तस्तव वरः प्रतिसर्ग प्रजापते।
अहं तव सुता भूत्वा भविष्यामि हरप्रिया॥ ३५
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा महेशानी दक्षं मुख्यप्रजापतिम्।
अंतर्दधे द्रुतं तत्र सम्यग् दक्षस्य पश्यतः॥ ३६
अंतर्हितायां दुर्गायां स दक्षोऽपि निजाश्रमम्।
जगाम च मुदं लेभे भविष्यति सुतेति सा॥ ३७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३५९
देवी बोलीं-हे प्रजापते! परंतु मेरी एक
प्रतिज्ञा अपने मनमें सदैव रखना। मैं उस प्रतिज्ञाको
तुम्हें सुना देती हूँ, उसे सत्य समझना, असत्य नहीं ॥ ३३॥
यदि आपने कभी मेरा अनादर किया तो मै
अपना शरीर त्याग दूँगी, यह सत्य है। मैं सर्वथा
स्वतन्त्र हूँ, अतः दूसरा शरीर धारण करूँगी॥ ३४॥
हे प्रजापते! मैं प्रत्येक सर्गमें आपकी कन्या
बनकर शिवजीकी पत्नी बनूँगी-मैंने यह वरदान
आपको दिया॥ ३५॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार दक्ष प्रजापतिसे
कहकर वे महेश्वरी उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान
हो गयीं ॥ ३६॥
देवीके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने घर चले
गये और यह विचारकर आनन्दित हो गये कि देवी
मेरी कन्या बनकर अवतार ग्रहण करेंगी ॥ ३७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दक्षवरप्राप्तिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
दक्षवरप्राप्तिवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
Se
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
ब्रह्माकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों तथा सबलाश्वोंको
निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाप्राज्ञ वद नो वदतां वर।
दक्षे गृहं गते प्रीत्या किमभूत्तदनंतरम्॥ १
ब्रह्मोवाच
दक्षः प्रजापतिर्गत्वा स्वाश्रमं हृष्टमानसः।
सर्ग चकार बहुधा मानसं मम चाज्ञया॥ २
तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्ग प्रजापतिः।
दक्षो निवेदयामास ब्रह्मणे जनकाय मे॥ ३
दक्ष उवाच
ब्रहमस्तात प्रजानाथ वर्धन्ते न प्रजाः प्रभो।
मया विरचिताः सर्वास्तावत्यो हि स्थिताः खलु॥ ४
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! हे विधे ! हे महाप्राज्ञ!
हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! दक्षप्रजापतिके घर चले जानेके
बाद फिर क्या हुआ? यह सब [वृत्तान्त] प्रीतिपूर्वक
कहिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] दक्षप्रजापतिने
अपने आश्रममें जाकर प्रसन्नचित्त हो मेरी आज्ञासे
बहुत-सी मानसी सृष्टि को, किंतु उस प्रजासृष्टिको
बढ़ता हुआ न देखकर दक्ष अपने पिता मुझ ब्रह्मासे
कहने लगे-॥ २-३॥
दक्ष बोले-हे तात! हे ब्रह्मन्! हे प्रजानाथ!
मेरे द्वारा बनायी गयी प्रजाएँ बढ़ नहीं रही हैं। मैने
भली प्रकारसे विचारकर देख लिया है कि मैंने जितनी
भी सृष्टि की है, वह उतनी ही है॥४॥
३६०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० RSs SS “त
किं करोमि प्रजानाथ वर्धेयुः कथमात्मना।
तदुपायं समाचक्ष्व प्रजाः कुर्या न संशयः॥
ब्रह्मोवाच
दक्ष प्रजापते तात श्रृणु मे परमं वचः।
तत्कुरुष्व सुरश्रेष्ठ शिवस्ते शं करिष्यति॥ ६
या च पञ्चजनस्याङ्गसुता रम्या प्रजापतेः।
असिक्नी नाम पलीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम्॥ ७
वामव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः।
तद्विधायां च कामिन्यां भूरिशो भावयिष्यसि॥ ८
ब्रह्मोवाच
तत: समुत्पादयितुं प्रजा मैथुनधर्मतः।
उपयेमे वीरणस्य निदेशान्मे सुतां ततः॥ ९
अथ तस्यां स्वपत्यां च वीरिण्यां स प्रजापतिः ।
हर्यश्वसंज्ञानयुतं दक्षः पुत्रानजीजनत्॥ १०
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्व आसन् सुता मुने।
पितृभक्तिरता नित्यं वेदमार्गपरायणाः॥ ११
पितृप्रोक्ताः प्रजासर्गकरणार्थं ययुर्दिशम्।
प्रतीचीं तपसे तात सर्वे दाक्षायणाः सुताः॥ १२
तत्र नारायणसरस्तीर्थं परमपावनम्।
सङ्गमो यत्र सञ्जातो दिव्यसिन्धुसमुद्रयोः॥ १३
तदुपस्पर्शनादेव प््रोत्पन्नमतयोऽभवन्।
धर्मे पारमहंसे च विनिर्धूतमलाशयाः ॥ १४
प्रजाविवृद्धये ते वै तेपिरे तत्र सत्तमाः।
दाक्षायणा दृढात्मानः पित्रादेशसुयंत्रिताः॥ १५
त्वं च तान् नारद ज्ञात्वा तपतः सृष्टिहेतवे।
अगमस्तत्र भूरीणि हार्दमाज्ञाय मापतेः॥ १६
अदृष्ट्वा तं भुवः सृष्टिं कथं कर्तृ समुद्यता:।
हर्यश्वा दक्षतनया इत्यवोचंस्तमादरात्॥ १७
हे प्रजानाथ! मैं क्या करूँ ? यह मेरी प्रजा
प्रकार बढ़ेगी ? आप कोई ऐसा उपाय बताइये, जि
प्रजाओंके सृष्टिक्रमका विस्तार करूँ ॥ ५॥
ब्रह्माजी बोले--हे दक्ष! हे प्रजापते! हे तात!
मेरी उत्तम बात सुनिये और उसे कीजिये। हे सुरे
भगवान् शंकर आपका कल्याण करेंगे॥६॥ |
हे प्रजेश! पंचजन प्रजापतिकी जो असिक्नी
नामक सुन्दर पुत्री है, उसे आप पत्नीरूपसे ग्रहण
कीजिये॥७॥
अभीतक आप पत्नीरहित होकर धर्माचरण करे
रहे हैं, किंतु इस प्रकारकी पत्नीमें मैथुनधर्मसे प्रवृत
होकर जब आप सृष्टि करेंगे, तब प्रजा बढेगी॥ ८॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] तब दक्षप्रजापतति
मैथुनधर्मसे प्रजासृष्टि करनेके लिये मेरी आज्ञसे
वीरणकी कन्याके साथ विवाह किया ॥ ९॥
प्रजापति दक्षने अपनी पत्नी उस वीरिणीके गर्भसे
हर्यश्व नामक दस हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ १०॥
हे मुने! वे सभी पुत्र समान धर्माचरण करनेवाले,
पिताकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले और सदा वेदमार्गका
अनुसरण करनेवाले थे॥ ११॥
हे तात! वे सभी दक्षपुत्र अपने पिताकी आश
पाकर सृष्टिके उद्देश्यसे तपस्याहेतु पश्चिम दिशाकी
ओर चले गये॥ १२॥
वहाँपर परम पवित्र नारायणसर नामक तीर्थ है
जहाँ दिव्य सिन्धु नदी तथा समुद्रका संगम हुआ है॥ १२॥
उस तीर्थके स्पर्शमात्रसे उनकी बुद्धि अलग
निर्मल हो गयी और पापके दूर होते ही वे सभी
परमहंसधर्ममें स्थित हो गये॥ १४॥
तत्पश्चात् दृढ्चित्तवाले तथा श्रेष्ठं वे
पिताकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण प्रजावृद्धिके
तप करने लगे॥ १५॥ है
हे नारद! सृष्टिसंवर्धनहेतु उन्हें घोर तप
हुए जानकर और विष्णुका मनोगत अभिर
समझकर आप उनके पास गये और |
आपने उनसे कहा-हे दक्षपुत्र हर्यश्वो! तुमत
पृथिवीका विस्तार न जानकर सृष्टिकर्ममें
प्रकार प्रवृत्त हुए हो ?॥ १६-१७॥
अ० १३]
ब्रह्मोवाच
तं निशम्याथ हर्यश्वास्ते त्वदुक्तमतंद्रिता: ।
औत्पत्तिकथियः सर्वे स्वयं विममृशुर्भृशम्॥ १८
सुशास्त्रजनकादेशं यो न वेद निवर्तकम्।
स कथं गुणविश्रंभी कर्तु सर्गमुपक्रमेत्॥ १९
इति निश्चित्य ते पुत्राः सुधियश्चैकचेतसः।
प्रणम्य तं परिक्रम्यायुर्मार्गमनिवर्तकम्॥ २०
नारद त्वं मनः शंभोर्लोकानन्यचरो मुने।
निर्विकारो महेशानमनोवृत्तिकरस्तदा॥ २१
काले गते बहुतरे मम पुत्रः प्रजापतिः।
नाशं निशम्य पुत्राणां नारदादन्वतप्यत॥ २२
मुहु्मुहुरुवाचेति सुप्रजस्त्वं शुचां पदम्।
शुशोच बहुशो दक्षः शिवमायाविमोहितः॥ २३
अहमागत्य सुप्रीत्या सांत्वयं दक्षमात्मजम्।
शांतिभावं प्रदश्यैव दैवं प्रबलमित्युत॥ २४
अथ दक्षः पञ्चजन्यां मया स परिसांत्वितः।
सबलाश्वाभिधान् पुत्रान् सहस्त्रं चाप्यजीजनत्॥ २५
तेऽपि जग्मुस्तत्र सुताः पित्रादिष्टा दृढब्रता:।
प्रजासर्गे यत्र सिद्धाः स्वपूर्वभ्रातरो ययुः॥ २६
तदुपस्पर्शनादेव नष्टाघा विमलाशयाः।
तेपुर्महत्तपस्तत्र जपन्तो ब्रह्म सुब्रता:॥ २७
प्रजासर्गोद्यतांस्तान् वै ज्ञात्वा गत्वेति नारद।
पूर्ववच्चागदो वाक्यं संस्मरन्नैश्वरीं गतिम्॥ २८
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३६१
ब्रह्माजी बोले--वे हर्यश्वगण आपकी कही
हुई बात सुनकर सृष्टिके विषयमें सावधान होकर
मनमें बहुत विचार करने लगे॥ १८॥
जो उत्तम शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक वचनोंको
नहीं जानता, वह मात्र गुणोंपर ही विश्वास रखनेवाली
सृष्टिका उपक्रम किस प्रकार कर सकता है ?॥ १९॥
वे परम बुद्धिमान् दक्षपुत्र एकाग्र बुद्धिसे ऐसा
विचारकर देवर्षि नारदकी परिक्रमा करके एवं उन्हें
प्रणामकर निवृत्तिमार्गमें परायण हो गये॥ २०॥
हे नारद! हे मुने! आप शिवके मन हैं और
लोकमें पर्यटन करते रहते हैं तथा निर्विकार रहकर
शिवकी चित्तवृत्तिके अनुसार रहते हैं॥ २१॥
बहुत काल बीतनेपर मेरे पुत्र दक्षप्रजापति
नारदजीके द्वारा अपने पुत्रोंके नाशको सुनकर बहुत
सन्तप्त हुए॥ २२॥
उस समय आपने शोक करते हुए, दक्षसे बार-
बार कहा कि आप अच्छी सन्तानवाले थे, [जो कि
आपके पुत्र श्रेष्ठ मार्गका अनुसरण करते हुए मुक्त हो
गये] किंतु वे दक्ष शिवकी मायासे मोहित हो बार-
बार शोक करते रहे॥ २३॥
तदनन्तर दक्षके पास आकर मैंने उन्हें शान्तिभावका
उपदेशकर सान्त्वना देते हुए कहा [शोक मत करो],
दैव बड़ा प्रबल होता है॥ २४॥
तब दक्षप्रजापतिने मेरे द्वारा धीरज बँधाये जानेपर
पुनः पंचजनकी कन्या [असिक्नी]-के गर्भसे सबलाश्व
नामक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ २५॥
दृढ़ व्रतवाले वे सबलाश्व भी पिताको आज्ञासे
सृष्टिसंवर्धनहेतु वहाँ गये, जहाँ उनसे पूर्व उनके भाई
गये थे और सिद्ध हो गये थे॥ २६॥
वे भी उस तीर्थके स्पर्शमात्रसे सर्वथा निष्पाप
तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले हो गये और उत्तम ब्रतमें
परायण होकर ब्रह्मका जप करते हुए कठिन तप करने
लगे॥ २७॥
हे नारद! आपने सृष्टि करनेके लिये उन्हें
तपस्यामें उद्यत देखकर उनके पास जाकर ईश्वरकी
गतिका स्मरण करते हुए वही उपदेश दिया, जो पूर्वमें
उनके भाइयोंको दिया था॥ २८॥
३६२ श्रीशिवमहापुराण [अ बा य त्व
भ्रातृपंथानमादिश्य त्वं मुनेऽमोघदर्शनः।
अयाश्चोर्ध्वगतिं तेऽपि भ्रातृमार्गं ययुः सुता: ॥ २
उत्पातान् बहुशोऽपश्यत्तदैव स प्रजापतिः।
विस्मितोऽभूत्स मे पुत्रो दक्षो मनसि दुःखितः ॥ ३०
पूर्ववत् त्वत्कृतं दक्षः शुश्राव चकितो भृशम्।
पुत्रनाशं शुशोचाति पुत्रशोकविमूच्छितः॥ ३१
चुक्रोध तुभ्यं दक्षोऽसौ दुष्टोऽयमिति चाब्रवीत्।
आगतस्तत्र दैवात् त्वमनुग्रहकरस्तदा॥ ३२
शोकाविष्टः स दक्षो हि रोषविस्फुरिताधरः।
उपलभ्य तमाहत्य धिग्धिक् प्रोच्य विगर्हयन्॥ ३३
दक्ष उवाच
किं कृतं तेऽधमश्रेष्ठ साधूनां साधुलिङ्गतः।
भिक्षोर्मार्गो$र्भकानां वै दर्शितोऽसाधुकारि न: ॥ ३४
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानां लोकयोरुभयोः कृतः।
विघातः श्रेयसोऽमीषां निर्दयेन शठेन ते॥ ३५
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य यो गृहात्परत्रजेत्पुमान्।
मातरं पितरं त्यक्त्वा मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥ ३६
निर्दयस्त्वं सुनिर्लज्जः शिशुधीभिद्यशोऽपहा।
हरेः पार्षदमध्ये हि वृथा चरसि मूढधीः ॥ ३७
मुहु्मृहरभद्रं त्वमचरो मेऽधमाध्म।
विभवेद् भ्रमतस्तेऽतः पदं लोकेषु न स्थिरम्॥ ३८
हे मुने! आपका दर्शन निष्फल नहीं
इसलिये आपने उनको भी पूर्वके भाइयोंके
उपदेश किया, जिससे वे भी अपने भाइयोंके मार्ग
अनुसरण करते हुए उसी मार्गपर चले गये॥ २९)
उसी समय दक्षप्रजापतिको अनेक उत्पात
पड़ने लगे। वे अपने पुत्रोंको आया न देखक
आश्चर्यचकित होकर मनमें दुखी हो गये॥ ३० |
उन्होंने आपके द्वारा प्रथम पुत्रोंक नाशके समा
ही इन पुत्रोंक भी नाशका जब समाचार सुना, तो वे
आश्चर्यमें भरकर पुत्रशोकसे मूर्च्छित हो अत्यत्त
सन्तप्त हो उठे॥ ३१॥
वे दक्ष आपपर कुपित हो गये और कहने लगे क्रि
यह नारद दुष्ट है। उसी समय दैवयोगसे उनके पुत्रोंप
अनुग्रह करनेवाले आप भी दक्षके पास आ गये॥ ३२॥
उस समय वे प्रजापति दक्ष क्रोधमें भरकर अपने
ओठोंको फड़फड़ाते हुए आपके पास आये और आपको
धिक्कारते हुए निन्दापूर्वक कहने लगे- ॥ ३३॥
दक्ष बोले-हे अधमोंमें श्रेष्ठ! तुमने साधुका
रूप धारणकर मेरे सत्पुत्रोंको यह कैसा उपदेश किया?
तुमने मेरे इन पुत्रोंको इस प्रकार भिक्षुमार्गका उपदेश
क्यों किया, जो उनके लिये कल्याणकारी नहीं था॥ ३४॥
तुम्हारे-जैसे निर्दयी शठने देव, ऋषि तथा पितृ
ऋणसे मुक्त हुए बिना ही मेरे पुत्रोंको ऐसा उपदेशकर
उनके इस लोक तथा परलोकके कल्याणको नष्ट क
दिया, क्योंकि जो बिना तीनों ऋणों*से मुक्त हुए ही
माता-पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छा करता हुआ
निवृत्तिमार्गका अनुसरण करता है, वह नरकगामी
होता है॥ ३५-३६॥ जाबो
तुम निर्दयी, अत्यन्त निर्लज्ज हो, बालकोंगी
बहकानेवाले तथा यशको नष्ट करनेवाले हो। है
मूर्ख! तुम हरिके पार्षदोंके बीचमें व्यर्थ ही विचर
करते हो॥ ३७॥
हे अधमाधम ! तुमने बार-बार मेरा अहित विर
है। इसलिये लोकमें भ्रमण करते हुए तुम्हारा पैर रि
न रहे॥ ३८॥
होत,
* ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे ऋषि-ऋण, यज्ञ और पूजा आदिसे देव-ऋण तथा पुत्रके उत्पाद
'पितृ-ऋणका निवारण होता है ।
आ० १४]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३६२
शशापेति शुचा दक्षस्त्वां तदा साधुसंमतम्।
इस प्रकार शिवजीकी मायासे मोहित हुए दक्षते
बुबोध नेश्वरेच्छां स शिवमायाविमोहितः॥ ३९ | ईश्वरकी इच्छाको नहीं समझा और सज्जनोंके मान्य
शापं प्रत्यग्रहीच्च त्वं स मुने निर्विकारधीः।
आपको शोकसन्तप्त होकर शाप दे दिया और हे मुने!
निर्मल बुद्धिवाले आपने भी दक्ष प्रजापतिके इस
शापको ग्रहण कर लिया, हे ब्रह्मसाधो! ऐसा साधु
स्वयं इस प्रकारके अपकारको सहन कर लेता
एष एव ब्रह्मसाधो सहते सोऽपि च स्व्रयम्॥ ४० | है॥ ३९-४०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दक्षसृष्टौ नारदशापो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षकी सृष्टि
[ उपाख्यान 7-में नारद-शापवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्षके यहाँ देवी शिवा ( सती )-का
प्राकट्य, सतीकी बाललीलाका वर्णन
ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे देवमुने लोकपितामहः।
तत्रागममहं प्रीत्या ज्ञात्वा तच्चरितं द्रुतम्॥ १
असान्त्वयमहं दक्षं पूर्ववत्सुविचक्षणः।
अकार्ष तेन सुस्नेहं तव सुप्रीतिमावहन्॥ २
स्वात्मजं मुनिवर्य त्वां सुप्रीत्या देववल्लभम्।
समाश्वास्य समादाय प्रत्यपद्ये स्वधाम ह॥ ३
ततः प्रजापतिर्दक्षोऽनुनीतो मे निजस्त्रियाम्।
जनयामास दुहितृः सुभगाः षष्टिसंमिताः॥ ४
तासां विवाहं कृतवान् धर्मादिभिरतंद्रितः।
तदेव श्रृणु सुप्रीत्या प्रवदामि मुनीश्वर ५
ददौ दश सुता दक्षो धर्माय विधिवन्मुने।
त्रयोदश कश्यपाय मुनये त्रिनवेन्दवे॥ ६
भूताङ्गिरःकृशाश्वाभ्यां द्वे द्वे पुत्र्यौ प्रदत्तवान्।
ताक्ष्याय चापराः कन्याः प्रसूतिप्रसवैर्यतः॥ ७
त्रिलोकाः पूरितास्तन्नो वण्यते व्यासतो भयात्॥ ८
केचिद्वदंति तां ज्येष्ठां मध्यमां चापरे शिवाम्।
सर्वानन्तरजां केचित्कल्पभेदात् त्रयं च सत्॥ ९
ब्रह्माजी बोले-हे देवमुने! इसी समय मैं
लोकपितामह ब्रह्मा भी इस चरित्रको जानकर
प्रीतिपूर्वक शीघ्रतासे वहाँ पहुँचा॥ १॥
मैने पूर्वकी भाँति दक्ष प्रजापतिको धैर्य धारण
कराया, जिससे वे प्रसन्न हो आपसे पूर्ववत् स्नेह
करने लगे॥ २॥
हे मुनिवर्य! मैं देवताओंके प्रिय अपने पुत्र
आपको प्रेमपूर्वक बहुत धीरज देकर अपने साथ लेकर
आश्रमको लौट आया॥ ३॥
तदनन्तर दक्षप्रजापतिने मेरी आज्ञासे अपनी
्त्रीमें साठ सौभाग्यवती कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ४॥
दक्षने आलस्यरहित होकर उन कन्याओंका विवाह
धर्मादिकोंके साथ जिस प्रकार किया, उसे प्रीतिपूर्वक
सुनिये। हे मुनीश्वर! उसको मैं कह रहा हूँ॥ ५॥
हे मुने! दक्षने दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यप
मुनिको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको विधिपूर्वक
दीं। दो-दो कन्याएँ अंगिरा तथा कृशाश्वको और
अन्य कन्याएँ ताक्ष्यको दीं। जिनकी प्रसूति-परम्परासे
यह समस्त जगत् व्याप्त है, विस्तारके भयसे मैं
उनका वर्णन नहीं कर रहा हूँ॥ ६--८॥
कुछ लोग शिवाको इन कन्याओंसे ज्येष्ठ कहते
हैं, कोई मध्यम कहते हैं और कोई सबसे छोरी मानते
हैं, किंतु कल्पभेदसे ये तीनों ही सही हैं॥ ९॥
३६४ श्रीशिवमहापुराण प
अनंतरं सुतोत्पत्तेः सपत्नीकः प्रजापतिः। कन्याकी उत्पत्तिके अनन्तर पत्नीसहित र
दक्षो दधौ सुप्रीत्या तां मनसा जगदम्बिकाम्॥ १०
अतः प्रेम्णा च तुष्टाव गिरा गद्गदया हि सः।
भूयो भूयो नमस्कृत्य साञ्जलिर्विनयान्वितः॥ ११
सन्तुष्टा सा तदा देवी विचारं मनसीति च।
चक्रेऽवतारं वीरिण्यां कुर्यां पणविपूर्तये॥ १२
अथ सोवास मनसि दक्षस्य जगदम्बिका।
विललास तदातीव स दक्षो मुनिसत्तम॥
सुमुहूर्तेन दक्षोऽपि स्वपत्या निदधे मुदा।
दक्षपल्यास्तदा चित्ते शिवोवास दयान्विता॥ १४
आविर्बभूव चिह्नानि दोहदस्याखिलानि वै॥ १५
विरेजे वीरिणी तात हृष्टचित्ताधिकं च सा।
शिवावासप्रभावात्तु महामङ्गलरूपिणी॥ १६
कुलस्य संप्रदायैश्च श्ररुतेश्चित्तसमुन्नतेः।
व्यधत्त सुक्रिया दक्षः प्रीत्या पुंसवनादिकाः ॥ १७
उत्सवो5तीव सञ्जातस्तदा तेषु च कर्मसु।
वित्तं ददौ द्विजातिभ्यो यथाकामं प्रजापतिः ॥ १८
अथ तस्मिन्नवसरे सर्वे हर्यादयः सुराः।
ज्ञात्वा गर्भगतां देवीं वीरिण्यां ते मुदं ययुः॥ १९
तत्रागत्य च सर्वे ते तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्।
लोकोपकारकरिणीं प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ॥ २०
कृत्वा ततस्ते बहुधा प्रशंसां हृष्टमानसाः।
दक्षप्रजापतेश्चैव वीरिण्या: स्वगृहं ययुः॥ २१
गतेषु नवमासेषु कारयित्वा च लौकिकीम्।
गतिं शिवा च पूर्णे सा दशमे मासि नारद्॥ २२
आविर्बभूव पुरतो मातुः सद्यस्तदा मुने।
मुहूर्ते सुखदे चन्द्रग्रहतारानुकूलके ॥ २३
तस्यां तु जातमात्रायां सुप्रीतोऽसौ प्रजापति: ।
शैवदेवीति तां मेने दृष्ट्वा तां तेजसोल्बणाम्॥ २४
प्रजापतिने अत्यन्त प्रेमसे अपने मनमें जगदग्वाकष
ध्यान किया॥ १०॥
उन्होंने गद्गद स्वरसे प्रेमपूर्वक विनययुक्त होक
हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करके उनकी स
की॥११॥
तब वे देवी सन्तुष्ट होकर मनमें विचार कहे
लगीं कि मुझे अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिवर
वीरिणीमें अवतार लेना चाहिये। इसके बाद ऊ
जगदम्बाने दक्षके मनमें निवास किया। हे मुनिसत्तप!
उस समय वे अत्यन्त शोभित होने लगे॥ १२-१३)
उन्होंने उत्तम शुभ मुहूर्तमें अपनी स्त्रीमें
गर्भाधान किया। तब वे दयामयी शिवा दक्षपलीके
हृदयमें निवास करने लगीं और दक्षकी स्त्रीमें गर्भके
समस्त लक्षण प्रकट होने लगे॥ १४-१५ ॥
हे तात! गर्भमें शिवाके निवासके प्रभावसे वे
दक्षपत्नी वीरिणी महामंगल-स्वरूपा और [पहलेक़ी
अपेक्षा] अधिक प्रसन्नचित्त हो गयीं ॥ १६॥
उस समय दक्षने अपने कुलके सम्प्रदायके अनुसार
वेदके अनुसार तथा अपने सम्मानके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक
पुंसवनादि सभी संस्कार किये। उन पुंसबनादि कर्मों
महान् उत्सव हुआ। दक्ष प्रजापतिने ब्राह्मणोंको उप
समय यथेष्ट धन प्रदान किया ॥ १७-१८॥
उस समय विष्णु आदि सभी देवगण देवीको वीरि
गर्भमें आयी हुई जानकर प्रसन्न हो गये और वहाँ आका
उन सबने लोकका उपकार करनेवाली उन जगदम्बाकी
बार-बार प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ १९-२०॥
इसके बाद प्रसन्नचित्त होकर वीरिणी तथा द
प्रजापतिकी बहुत ही प्रशंसाकर वे अपने-अपने *
चले गये॥ २१॥ व
हे नारद! हे मुने! इस प्रकार नौ मास पूर्ण
जानेपर समस्त लौकिक क्रिया कर लेनेके बाद
दसवाँ मास पूर्ण हो गया, तब वे शिवा म ग्र
तारा [आदि]-के अनुकूल होनेपर सुखद
ही माताके सामने प्रकट हो गयीं ॥ २२-२३॥ ह
उनके उत्पन्न होते ही प्रजापति दक्ष बड़े ड
हुए तथा उनके प्रकृष्ट तेजको देखकर उन्ह
वही शिवादेवी समझा॥ २४॥
अ० ९४]
तदाभूत्पुष्पसदवृष्टिमेंघाश्च ववृषुर्जलम्।
दिशः शांता द्रुतं तस्यां जातायां च मुनीएवर॥ २५
अवादयन्त त्रिदशाः शुभवाद्यानि खे गता: ।
जज्ज्वलुश्चाग्नयः शांताः सर्वमासीत्सुमङ्गलम्॥ २६
बीरिणीसंभवां दृष्ट्वा दक्षस्तां जगदम्बिकाम्।
नमस्कृत्य करौ बदध्वा बहु तुष्टाव भक्तितः॥ २७
दक्ष उवाच
महेशानि नमस्तुभ्यं जगदम्बे सनातनि।
कृपां कुरु महादेवि सत्ये सत्यस्वरूपिणि॥ २८
शिवा शांता महामाया योगनिद्रा जगन्मयी।
या प्रोच्यते वेदविद्धिर्नमामि त्वां हितावहाम्॥ २९
यया धाता जगत्सृष्टौ नियुक्तस्तां पुराकरोत्।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेशवरीम्॥ ३०
यया विष्णुर्जगत्स्थत्यै नियुक्तस्तां सदाकरोत्।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम्॥ ३१
यया रुद्रो जगन्नाशे नियुक्तस्तां सदाकरोत्।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम्॥ ३२
रजःसत्त्वतमोरूपां सर्वकार्यकरी सदा।
त्रिदेवजननीं देवीं त्वां नमामि च तां शिवाम्॥ ३३
यस्त्वां विचिंतयेद् देवि विद्याविद्यात्मिकां पराम्।
तस्य भुक्तिश्च मुक्तिश्च सदा करतले स्थिता॥ ३४
यस्त्वां प्रत्यक्षतो देवि शिवां पश्यति पावनीम्
तस्यावश्यं भवोनपुक्तिर्विद्याविद्याप्रकाशिका॥ ३५
ये स्तुवंति जगन्मातर्भवानीमंबिकेति च।
जगन्मयीति दुर्गेति सर्वं तेषां भविष्यति॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इति स्तुता जगन्माता शिवा दक्षेण धीमता।
तथोवाच तदा दक्षं यथा माता श्रृणोति न॥ ३७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३६५
हे मुनीश्वर ! उन देवीके उत्पन्न होते ही उस समय
आकाशसे पुष्पवृष्टि होने लगी, मेघोंने जलकी वर्षा
प्रारम्भ कर दी और सभी दिशाएँ शान्त हो गयीं । देवता
आकाशमें स्थित होकर उत्तम बाजे बजाने लगे और
शान्त अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठीं। इस प्रकार [सभी
दिशाओंमें] मंगल-ही-मंगल हो गया॥ २५-२६॥
बीरिणीमें उत्पन्न हुई उन जगदम्बाको देखकर
दक्ष भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार करके
स्तुति करने लगे॥ २७॥
दक्ष बोले-हे महेशानि! हे सनातनि! हे जगदम्बे!
आपको नमस्कार है, हे सत्ये! हे सत्यस्वरूपिणि!
हे महादेवि! [मेरे ऊपर] दया करें॥ २८॥
वेदके ज्ञाता जिन्हें शिवा, शान्ता, महामाया,
योगनिद्रा तथा जगन्मयी कहते हैं, उन आप हितकारिणी
देवीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २९॥
जिन्होंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीको उत्पन्नकर इस
जगतूकी सृष्टिके कार्यमें नियुक्त किया है, उन परमा
जगन्माता आप महेश्वरीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३०॥
जिन्होंने सदा संसारके पालनके लिये विष्णुको
नियुक्त किया हैं, उन परमा जगन्माता आप महेश्वरीको
मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने संसारके विनाशके
लिये रुद्रको नियुक्त किया है, उन परमा जगन्माता
आप महेश्वरीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३१-३२॥
सत्त्ठ-रज-तमरूपोंवाली, सर्वदा समस्त कार्योको
साधनेवाली तथा तीनों देवताओंको उत्पन्न करनेवाली
उन आप शिवादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३३ ॥
हे देवि! जो आपको विद्या-अविद्या--इन दोनों
रूपोंसे स्मरण करता है, उसके हाथमें भोग तथा मोक्ष
दोनों ही स्थित हो जाते हैं॥ ३४॥
हे देवि! जो परमपावनी शिवास्वरूपा आपका
प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसे विद्या तथा अविद्याको प्रकाशित
करनेवाली मुक्ति अपने-आप मिल जाती है ॥ ३५॥
हे जगदम्बे! जो अम्बिका, जगन्मयी एवं
दुर्गा-इन नामोंसे आप भवानीका स्तवन करते हैं,
उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं॥ ३६॥
ब्रह्मा बोले जब इस प्रकार जगन्माता शिवाकी
स्तुति दक्षप्रजापतिने की, तब वे दक्षसे इस प्रकारसे कहने
लगीं, जिससे कि माता वीरिणी न सुन सकें॥ ३७॥
३६६
श्रीशिवमहापुराण
[3s ey
सर्व सम्मोह्य तथ्यं च तथा दक्षः श्रृणोतु तत्।
जान्यस्तथा शिवा प्राह नानोतिः परमेश्वरी ॥ ३८
देव्युवाच
अहमाराधिता पूर्व सुतार्थं ते प्रजापते।
ईप्सितं तव सिद्धं तु तपो धारय संप्रति॥
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा तदा देवी दक्षं च निजमायया।
आस्थाय शैशवं भावं जनन्यंते रुरोद सा॥ ४०
अथ तद् रोदनं श्रुत्वा स्त्रियो वाक्यं ससंभ्रमाः।
आगतास्तत्र सुप्रीत्या दास्योऽपि च ससंभ्रमाः ॥ ४१
दृष्ट्वासिक्नीसुतारूपं ननन्दुः सर्वयोषितः ।
सर्वे पौरजनाश्चापि चक्रुर्जयरवं तदा॥ ४२
उत्सवश्च महानासीद् गानवाद्यपुरःसरम्।
दक्षोऽसिक्नी मुदं लेभे शुभं दृष्ट्वा सुताननम्॥ ४३
दक्षः श्रुतिकुलाचारं चक्रे च विधिवत्तदा।
दानं ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च द्रविणं तथा॥ ४४
बभूव सर्वतो गानं नर्तनं च यथोचितम्।
ेदुर्वाद्यानि बहुशः सुमङ्गलपुरःसरम्॥ ४५
अथ हर्यादयो देवाः सर्वे सानुचरास्तदा।
मुनिवृन्दैः समागत्योत्सवं चक्रुर्यथाविधि॥ ४६
दृष्ट्वा दक्षसुतामम्बां जगतः परमेश्वरीम्।
नेमुः सविनयाः सर्वे तुष्टुवुश्च शुभैः स्तवैः ॥ ४७
ऊचुः सर्वे प्रमुदिता गिरं जयजयात्मिकाम्।
प्रशशंसुर्मुदा दक्षं वीरिणी च विशेषत:॥ ४८
तदोमेति नाम चक्रे तस्या दक्षस्तदाज्ञया।
प्रशस्तायाः सर्वगुणैः सत्त्वादपि मुदान्वितः॥ ४९
नामान्यन्यानि तस्यास्तु पश्चाजातानि लोकत: ।
महामङ्गलदान्येव दुःखघ्नानि विशेषतः॥ ५०
नाना प्रकारके रूपोंको धारण करनेबाल्ली ह
परमेश्वरी शिवाने सबको मोहित करके इस पक
सत्य कहा कि उसे केवल दक्ष ही सुन सकें अथ
कोई नहीं ॥ ३८ ॥
देवी बोलीं--हे प्रजापते ! आपने मुझे पुत्रीरूफे
प्राप्त करनेहेतु पहले मेरी आराधना की थी, वह
अभीष्ट पूरा हुआ, अब आप पुन: तपस्या कीजिये॥ ३९)
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार दक्षसे कहकर
देवी अपनी मायासे शिशुका रूप धारणकर मात्र
पास रोने लगीं॥ ४०॥
उस रोदनको सुनकर और उसे स्त्री
शब्द जानकर स्त्रियाँ तथा समस्त दासियाँ भ
आश्चर्यचकित हो प्रीतिपूर्वक वहाँ गयीं । असिक्नी
सुताके रूपको देखकर सभी स्त्रियाँ परम प्रसन हुई
उस समय समस्त नगरवासियोंने भी जय-जयकार
किया॥ ४१-४२॥
नगरमे गाने-बजानेके साथ महान् उत्सव होने
लगा। पुत्रीका सुन्दर मुख देखकर असिक्नी तथा द$
परम प्रसन्न हुए | दक्षप्रजापतिने विधिपूर्वक वेदविहित
कुलाचार किया और ब्राह्मणोंको दान दिया तथा अय
लोगोंको भी बहुत-सा धन दिया ॥ ४३-४४॥
वहाँ सभी ओर मंगलाचारपूर्वक गायन तथा वृत्
होने लगा और अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे॥ ४५॥
[शिवाके जन्मके समय] विष्णु आदि सभी
देवगण अपने-अपने अनुचरो तथा मुनियोंके सार्थ
आकर यथाविधि अनेक उत्सव करने लगे॥ ४६॥
दक्षकन्याके रूपमें [अवतरित हुई] उन
जगदम्बाको देखकर देवताओंने विनयपूर्वक उर
प्रणाम किया और अनेक प्रकारके उत्तम
उनकी स्तुति की। सभी देवता प्रसन्न होकर ज
जयकार करने लगे और दक्ष तथा वीरिणीकी
रूपसे प्रशंसा करने लगे ॥ ४७-४८॥ दमी
दक्षने प्रसन्न होकर विष्णु आदि देवताओंकी
आज्ञासे सभी गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण उस
उमा-यह नाम रखा | उसके बाद त
उनके अन्य नाम भी पडे, जो मंगल करनेवाले
लोगोंके दुःख दूर करनेवाले थे॥ ४९-५० ॥
अ० १५]
दक्षस्तदा हरिं नत्वा मां सर्वानमरानपि।
मुनीनपि करौ बदध्वा स्तुत्वा चानर्च भक्तितः ॥ ५१
अथ विष्ण्वादयः सर्वे सुप्रशस्याजनंदनम्।
रीत्या ययुः स्वधामानि संस्मरन् सशिवं शिवम्॥ ५२
अतस्तां च सुतां माता सुसंस्कृत्य यथोचितम्।
शिशुपानेन विधिना तस्यै स्तन्यादिकं ददौ॥ ५३
पालिता साथ वीरिण्या दक्षेण च महात्मना।
ववृधे शुक्लपक्षस्य यथा शशिकलान्वहम्॥ ५४
तस्यां तु सदगुणाः सर्वे विविशुद्धिजसत्तम।
शैशवेऽपि यथा चन्द्रे कलाः सर्वा मनोहराः ॥ ५५
आचतरन्निजभावेन सखीमध्यगता यदा।
तदा लिलेख भर्गस्य प्रतिमामन्वहं मुहु: ॥ ५६
यदा जगौ सुगीतानि शिवा बाल्योचितानि सा।
तदा स्थाणुं हरं रुद्रं सस्मार स्मरशासनम्॥ ५७
ववृधेऽतीव दंपत्योः प्रत्यहं करुणातुला।
तस्या बाल्येऽपि भक्तायास्तयोर्नित्यं मुहुर्मुहुः ॥ ५८
सर्वबालगुणाक्रांतां सदा स्वालयकारिणीम्।
तोषयामास पितरौ नित्यं नित्यं मुहुर्मुहुः ॥ ५९
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३६७
उस समय दक्षप्रजापतिने हाथ जोड़कर विष्णु,
मुझ ब्रह्मा, सम्पूर्ण मुनियों तथा देवताओंकी स्तुति
करके भक्तिपूर्वक सभी लोगोंका पूजन किया॥ ५१॥
तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवगण दक्षकी
प्रशंसा करके शिवा तथा शिवका स्मरण करते हुए
अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ५२॥
उसके बाद माताने भी यथोचित रूपसे उस
कन्याका संस्कारकर बालकोंकी स्तनपानविधिसे उसे
अपना दूध पिलाया॥ ५३॥
महात्मा प्रजापति दक्ष तथा वीरिणीने [बड़ी
सावधानीके साथ] उस कन्याका लालन-पालन किया,
जिससे वह शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाके समान
प्रतिदिन बढ़ने लगी ॥ ५४॥
हे द्विजश्रेष्ठ! उस कन्यामें बाल्यकालमें ही
सभी सद्गुण प्रविष्ट हो गये; जैसे चन्द्रमामें सभी
मनोहर कलाएँ अपने-आप आ जाती हैं ॥ ५५॥
जब वह सखियोंके बीचमें जाकर अपने भावमें
मग्न होती थी, तब प्रतिदिन शंकरजीकी प्रतिमाका बार-
बार निर्माण करती थी । जन वह शिवा बालोचित गाने
गाती, तो वह कामपर शासन करनेवाले हर, रुद्र तथा
स्थाणुका [ गानेके बहाने] स्मरण करती थी ॥ ५६-५७॥
दक्ष प्रजापति तथा वीरिणीका स्नेह दिनः प्रतिदिन
उस कन्यापर बढ़ता ही गया । यद्यपि वह बालिका थी, फिर
भी वह अपने माता-पितामें बड़ी भक्ति रखती थी ॥ ५८॥
सभी बालोचित गुणोंसे परिपूर्ण बह उमा देवी
अपने घरके सभी कार्योको निपुणतासे सम्पन्नकर
प्रतिदिन अपने माता-पिताको सन्तुष्ट करने लगी ॥ ५९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीजत्मबाललीलावर्ण नाम चतुदशोऽ ध्याय: ॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीजन्म
एवं बाललीलाका वर्णन नामक चाँदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
सतीद्वारा नन्दा-ब्रतका अनुष्ठान तथा देवताओंद्वारा शिवस्तुति
ब्रह्मोवाच
अधैकदा पितुः पाश्वे तिष्ठन्तीं तां सतीमहम्।
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! एक समय आपके
साथ जाकर मैंने त्रिलोकीकी सर्वस्त्रभूता उन सतीको
त्वया सह मुनेडद्राक्षं सारभूतां त्रिलोकके॥ १ अपने पिताके पास बैठी हुई देखा॥ १॥
३६८ श्रीशिवमहापुराण [अ प
पित्रा नमस्कृतं वीक्ष्य सत्कृतं त्वां च मां सती। पिताके द्वार नमस्कृत तथा सत्कृत होते ह
प्रणनाम मुदा भक्त्या लोकलीलानुसारिणी ॥ हमदोनोंको देखकर लोकलीलाका अनुसरण कलेवल
उन सतीने प्रेमपूर्वक भक्तिके साथ आपको तथा पु
प्रणाम किया॥ २॥
प्रणामान्ते सतीं वीक्ष्य दक्षदत्तशुभासने।
स्थितोऽहं नारद त्वं च विनतामहमागदम्॥ ३
त्वामेव यः कामयते यं तु कामयसे सति।
तमाप्नुहि पतिं देवं सर्वज्ञं जगदीश्वरम्॥ ४
यो नान्यां जगृहे नापि गृह्णाति न ग्रहीष्यति।
जायां स ते पतिर्भूयादनन्यसदूशः शुभे॥ ५
इत्युक्त्वा सुचिरं तां वै स्थित्वा दक्षालये पुन: ।
विसृष्टौ तेन संयातौ स्वस्थानं तौ च नारद्॥ ६
दक्षोऽभवच्च सुप्रीतस्तदाकर्ण्यं गतज्चरः।
आददे तनयां स्वां तां मत्वा हि परमेश्वरीम्॥ ७
इत्थं विहारै रुचिरैः कोमारैर्भक्तवत्सला।
जहाववस्थां कौमारीं स्वेच्छाधृतनराकृतिः॥ ८
बाल्यं व्यतीत्य सा प्राप किञ्चिद्यौवनतां सती।
अतीव तपसाङ्गेन सर्वागेषु मनोहरा॥ ९
दक्षतां वीक्ष्य लोकेश: प्रोद्धिन्नान्तर्वयःस्थिताम्।
चिंतयामास भर्गाय कथं दास्य इमां सुताम्॥ १०
अथ सापि स्वयं भर्ग प्रप्तुमैच्छत्तदान्वहम्।
पितुर्मनोगतिं ज्ञात्वा मातुर्निकटमागता॥ ११
पप्रच्छाज्ञां तपोहेतोः शंकरस्य विशालधीः।
मातुः शिवाथ वीरिण्याः सा सती परमेश्वरी ॥ १२
ततः सती महेशानं पतिं प्राप्तुं दृढव्रता।
सा तमाराधयामास गृहे मातुरनुज्ञया॥ १३
हे नारद! प्रणाम करनेके पश्चात् दक्षके ठा
दिये गये आसनपर हम दोनों बैठ गये, इसके बा
विनम्र सतीको देखकर मैंने कहा-हे सति! जो तु
चाहता है तथा जिसे तुम चाहती हो, उन सक
जगदीश्वरको तुम पतिरूपमें प्राप्त करो। जिस
[तुम्हारे अतिरिक्त] दूसरी स्त्रीका पाणिग्रहण नही
किया है, जो वर्तमानमें भी न करते हैं, न करेंगे और
हे शुभे! जिनकी समता कोई और करनेवाला नहीं है
वे ही [इस समय] तुम्हारे पति हों॥ ३-५॥
हे नारद! ऐसा कहकर कुछ दिन दक्षके घर
निवासकर हमदोनों उनसे विदा लेकर अपने-अपने
स्थानपर चले गये॥ ६॥
मेरी बात सुनकर दक्ष परम प्रसन्न होक
चिन्तारहित हो गये और अपनी कन्याको परमेश्व
जानकर उनका बड़ा सत्कार करने लगे॥७॥
अपनी इच्छासे मनुष्यशरीर धारण करनेवाली,
भक्तवत्सला देवीने मनोहर कौमारोचित विहार करके
अपनी कौमार्यावस्था समाप्त की ॥ ८॥
अपनी तपस्याके प्रभावसे सर्वांगमनोहरा उ
सतीने धीरे-धीरे बाल्यावस्था समाप्तकर युवावस्थाको
प्राप्त किया॥ ९॥
लोकेश दक्षप्रजापति उस कन्याको युवावस्थाकी
प्राप्त हुई देखकर विचार करने लगे कि अपनी इ
पुत्रीको शिवके लिये किस प्रकार प्रदान करूँ॥ १०॥
इधर, वे सती भी प्रतिदिन शिवको श
करनेकी इच्छा करने लगीं। पिताके मनोभाव
जानकर वे माताके पास आयीं। विशाल बुडि
उन सती परमेश्वरीने शंकरको प्राप्त करनेकी त
तप करनेके लिये अपनी माता वीरिणीसे आज्ञा
तब दृढ़ व्रतवाली वे सती माताकी आज्ञासे देती |
पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये घरमें ही तपस्या
लगीं॥ ११--१३॥
अ० १५]
आश्वने मासि नन्दायां तिथावानर्च भक्तित: ।
गुडौदनैः सलवणौर्हरं नत्वा निनाय तम्॥ १४
कार्तिकस्य चतुर्दश्यामपूपैः पायसैरपि।
समाकीणैः समाराध्य सस्मार परमेश्वरम्॥ १५
मार्गशीर्षेऽसिताष्टम्यां सतिलैः सयवोदने: ।
पूजयित्वा हरं कीलैर्निनाय दिवसान् सती॥ १६
पौषे तु शुक्लसप्तम्यां कृत्वा जागरणं निशि।
अपूजयच्छिवं प्रातः कृशरान्नेन सा सती॥ १७
माघे तु पौर्णमास्यां सा कृत्वा जागरणं निशि।
आर्द्रेवस्त्रा नदीतीरेऽकरोच्छंकरपूजनम्॥ १८
तपस्यासितभूतायां कृत्वा जागरणं निशि।
विशेषतः समानर्चं शैलूषैः सर्वयामसु॥ १९
चैत्रे शुक्लचतुर्दश्यां पलाशेर्द॑मनैः शिवम्।
अपूजयद्दिवारात्रौ संस्मरन् सा निनाय तम्॥ २०
राधशुक्लतृतीयायां तिलाहारयवौदनैः।
पूजयित्वा सती रुद्रं गव्यैर्मासं निनाय तम्॥ २९
ज्येष्ठस्थ पूर्णिमायां वै रात्रौ संपूज्य शंकरम्।
वसनैबुहतीपुष्पैर्निराहरा निनाय तम्॥ २२
आषाढस्य चतुर्दश्यां शुक्लायां कृष्णवाससा।
बृहतीकुसुमैः पूजा रुद्रस्याकारि वै तथा॥ २३
श्रावणस्य सिताष्टम्यां चतुर्दश्यां च सा शिवम्।
यज्ञोपवीतैर्वासोभिः पपित्ररप्यपूजयत्॥
भाद्रे कृष्णत्रयोदश्यां पुष्पैर्नानाविधैः फलैः।
संपूज्य च चतुर्दश्यां चकार जलभोजनम्॥ २५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३६९
उन्होंने आश्विनमासकी प्रत्येक नन्दा तिथि
प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशीमें गुड़, भात तथा
लवणसे भक्तिपूर्वक हरका पूजन किया, इस प्रकार
उस मासको बिता दिया॥ १४॥
कार्तिकमासकी चतुर्दशीको खीर तथा अपूपसे
शिवजीकी आराधनाकर वे उनका स्मरण करने
लगाँ॥ १५॥
वे मार्गशीर्षके कृष्णपक्षकी अष्टमीको यव,
तिल एवं चावलसहित कीलोंसे शिवजीका पूजनकर
दिन बिताने लगीं ॥ १६॥
वे सती पौषमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको
रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल खिचड़ीसे शिवका
पूजन करने लगीं ॥ १७॥
माघकी पूर्णिमा तिथिको रात्रिमें जागरणकर
प्रातःकाल भीगे कपड़े पहनकर वें नदीके किनारे
शिवका पूजन करने लगीं ॥ १८॥
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको रात्रिमें जागरणकर
सब प्रहरोंमें बिल्वपत्र तथा बिल्वफलसे शिवकी
विशेष पूजा करने लगीं॥ १९॥
चैत्र शुक्ल चतुर्दशीको वे सती पलाशपुष्प तथा
दवनों [दौनों]-से शिवजीकी पूजा करती थीं और
दिन-रात उनका स्मरण करती हुई समय व्यतीत करती
थीं॥ २०॥
वैशाख शुक्ल तृतीयाको गव्य, तिलाहार, यव
एवं चावलोंसे शिवजीका पूजनकर उस मासको
व्यतीत करने लगीं ॥ २१॥
ज्येष्ठकी पूर्णिमाके दिन निराहार रहकर रात्रिमें
वस्त्र एवं भटकटैयाके पुष्पोसे शिवजीका पूजन करके
वे सती उस मासको व्यतीत करने लगीं॥ २२॥
वे आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशीको काले वस्त्र एवं
भटकटैयाके पुष्पोंसे शिवजीकी पूजा करने लगीं॥ २३॥
वे श्रावण शुक्ल अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथिको
पवित्र यज्ञोपवीत तथा वस्त्रोंसे शिवका पूजन करने
'लगीं॥ २४॥
भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशीको अनेक प्रकारके पुष्पों
तथा फलोंसे शिवका पूजन करके वे चतुर्दशी तिथिमें
केवल जलका आहार करती थीं॥ २५॥
३७०
श्रीशिवमहापुराण
[अ Oe ५
नानाविधै: फले: पुष्पैः सस्यैस्तत्कालसंभवै: ।
चक्रे सुनियताहारा जपन्मासे शिवार्चनम्॥
सर्वमासे सर्वदिने शिवार्चनरता सती ।
दृढव्रताभवद्देवी स्वेच्छाधृतनराकृति: ॥ २७
इत्थं नंदाब्रतं कृत्स्नं समाप्य सुसमाहिता।
दध्यौ शिवं सती प्रेम्णा निश्चलाभूदनन्यधीः ॥ २८
एतस्मिन्नन्तरे देवा मुनयश्चाखिला मुने।
विष्णुं मां च पुरस्कृत्य ययुर्द्रष्टु सतीतपः॥ २९
दृष्टागत्य सती देवैर्मूर्ता सिद्धिरिवापरा।
शिवध्यानमहामग्ना सिद्धावस्थां गता तदा॥ ३०
चक्रः सर्वे सुराः सत्यै मुदा साञ्जलयो नतिम्।
मुनयश्च नतस्कंधा विष्णवाद्याः प्रीतमानसाः ॥ ३१
अथ सर्वे सुप्रसन्नाः विष्णवाद्याश्च सुरर्षयः।
प्रशशंसुस्तपस्तस्याः सत्यास्तस्मात्सविस्मयाः ॥ ३२
ततः प्रणम्य तां देवीं पुनस्ते मुनयः सुराः।
जम्मुर्गिरिवरं सद्यः कैलासं शिववल्लभम्॥ ३३
सावित्रीसहितश्चाहं सह लक्ष्म्या मुदान्वित:।
वासुदेवोऽपि भगवाञ्जगामाथ हरान्तिकम्॥ ३४
रत्वा तत्र प्रभुं दृष्ट्वा सुप्रणम्य ससंभ्रमाः।
तुष्टुवुर्विविधे: स्तोत्रैः करौ बदध्वा विनप्रका: ॥ ३५
इस प्रकार वे परिमित आहार करके जप करते
हुई उन-उन कालोंमें उत्पन्न होनेवाले नाना
'फल,पुष्प तथा शस्योंद्वारा प्रत्येक महीने शिवार
करती थीं॥ २६॥
अपनी इच्छासे मानवरूप धारण करनेवाली बे
सती दृढ़ ब्रतसे युक्त होकर सभी महीनोंमें तथा सभी
दिनोंमें शिवपूजनमें तत्पर रहने लगीं ॥ २७॥
इस प्रकार नन्दाव्रतको पूर्णरूपसे समाण
करके भगवान् शिवमें अनन्य भाव रखनेवाली सती
एकाग्रचित्त होकर बड़े प्रेमसे भगवान् शिवका ध्यान
करने लगीं तथा उनके ध्यानमें ही निश्चलभावसे
स्थित हो गयीं॥ २८॥
हे मुने! इसी समय सब देवता और ऋषि
भगवान् विष्णुको और मुझको आगे करके सतीकी
तपस्या देखनेके लिये गये॥ २९॥ ग
वहाँ आकर देवताओंने देखा कि सती मूर्तिमती
दूसरी सिद्धिके समान जान पड़ती हैं । वे उस समय
भगवान् शिवके ध्यानमें निमग्न थीं और सिद्धावस्थामें
पहुँच गयी थीं॥ ३०॥
विष्णु आदि समस्त देवताओं तथा मुनियोंने
प्रसन्नचित्त होकर दोनों हाथ जोड़कर तथा सिर
झुकाकर प्रेमपूर्वक सतीको नमस्कार किया॥ ३१॥
इसके बाद अति प्रसन्न श्रीविष्णु आदि सब
देवता और मुनिगण आश्चर्यचकित होकर सती
देवीकी तपस्याकी [ भूरि-भूरि] प्रशंसा करने लगे॥ ३२॥
तदनन्तर वे सभी देवता और ऋषिगण सती
देवीको पुन: प्रणामकर भगवान् शिवजीके परमप्रिय
श्रेष्ठ कैलास पर्वतपर शीघ्र ही चले गये॥ ३३॥
लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु और सावित्री
सहित में भी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवके समीप
गया॥ ३४॥
वहाँ पहुँचकर आश्चर्यचकित होकर सभी लोगागे
प्रभुका दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाई
जोड़कर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे वे उनकी स्तुति
करने लगे॥ ३५॥
अ० १५]
देवा ऊचुः
नमो भगवते तुभ्यं यत एतच्चराचरम्।
पुरुषाय महेशाय परेशाय महात्मने॥ ३६
आदिबीजाय सर्वेषां चिद्रूपाय पराय च।
ब्रह्मणे निर्विकाराय प्रकृतेः पुरुषस्य च॥ ३७
य इदं प्रतिपच्येदं येनेदं विचकास्ति हि।
यस्मादिदं यतश्चेदं यस्येदं त्वं च यत्रतः॥ ३८
योऽस्मात्परस्माच्च परो निर्विकारी महाप्रभुः ।
ईक्षते यः स्वात्मनीदं तं नताः स्म स्वयंभुवम्॥ ३९
अविद्धदृक् परः साक्षी सर्वात्मानेकरूपधृक् ।
आत्मभूतः परब्रह्म तपन्तं शरणं गताः॥ ४०
न यस्य देवा ऋषयः सिद्धाश्च न विदुः पदम्
कः पुनर्जतुरपरो ज्ञातुमर्हति वेदितुम्॥ ४१
दिदृक्षवो यस्य पदं मुक्तसङ्गाः सुसाधवः।
चरन्ति सुगतिर्नस्त्वं सलोकत्रतमत्रणम् ॥ ४२
त्वजन्मादिविकारा नो विद्यन्ते केऽपि दुःखदाः ।
तथापि मायया त्वं हि गृह्णासि कृपया च तान्॥ ४३
तस्मै नमः परेशाय तुभ्यमाश्चर्यकर्मणे।
जमो गिरां विदूराय ब्रह्मणे परमात्मने॥ ४४
अरूपायोरुरूपाय परायानन्तशक्तये।
त्रिलोकपतये सर्वसाक्षिणे सर्वगाय च॥ ४५
जम आत्मप्रदीपाय निर्वाणसुखसंपदे।
ज्ञानात्मने नमस्तेऽस्तु व्यापकायेश्वराय च॥
नैष्कर्म्येण सुलभ्याय कैवल्यपतये नमः।
पुरुषाय परेशाय नमस्ते सर्वदाय च॥ ४७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३७९
देवता बोले--परम पुरुष, महेश्वर, परमेश्वर और
महान् आत्मावाले, सभी प्राणियोंके आदिबीज, चेतन-
स्वरूप, परात्पर, ब्रह्मस्वरूप, निर्विकार और प्रकृति
तथा पुरुषसे परे उन आप भगवान्को नमस्कार है,
जिनसे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है ॥ ३६-३७॥
जो प्रपंचरूपसे स्वयं सृष्टिस्वरूप हैं तथा
जिनकी सत्तासे समस्त संसार भासित हो रहा है,
जिनके द्वारा यह जगत् उत्पन्न हुआ है, जिनके अधीन
यह समस्त जगत् है, जिनका यह सब कुछ है॥ ३८॥
जो इस जगतूके बाहर तथा भीतर व्याप्त हैं, जो
निर्विकार और महाप्रभु हैं, जो अपनी आत्मामें ही इस
समस्त विश्वको देखते हैं, उन स्वयम्भू परमेश्वरको
हमलोग नमस्कार कर रहे हैं॥ ३९॥
जिनकी दृष्टि कही नहीं रुकती, जो परात्पर,
सभी प्राणियोंके साक्षी, सर्वात्मा, अनेक रूपोंको
धारण करनेवाले, आत्मस्वरूप, परब्रह्म तथा तप
करनेवाले हैं, हमलोग उनकी शरणमें आये हैं ॥४०॥
देवता, ऋषि तथा सिद्ध भी जिनके पदको नहीं
जानते हैं तो फिर अन्य प्राणी उनको किस प्रकार जान
सकते हैं? और किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं?
जिनको देखनेके लिये मुक्तसंग साधुजन ब्रह्मचर्यादि
ब्रतोंका आचरण करते हैं, वे आप हमारी उत्तम गति
हैं ॥ ४१-४२॥
हे प्रभो! दुःख देनेवाले जन्मादि कोई भी
विकार आपमें नहीं होते, फिर भी आप अपनी मायासे
कृपापूर्वक उन्हें ग्रहण करते हैं ॥ ४३॥
आश्चर्यमय कर्म करनेवाले उन आप परमात्माको
नमस्कार है। वाणीसे सर्वथा परे आप परत्रह्म परमात्माको
नमस्कार है॥ ४४॥
बिना रूपके होते हुए भी बहुत रूपोंवाले,
परात्पर, अनन्तशक्तिसे समन्वित, त्रिलोकपति, सर्वसाक्षी
तथा सर्वव्यापीको नमस्कार है। स्वयं प्रकाशमान,
निर्वाणसुख तथा सम्मत्तिस्वरूप, ज्ञानात्मा तथा व्यापक
आप ईश्वरको नमस्कार है॥ ४५-४६॥
निष्काम कर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले कैवल्यः
पतिको नमस्कार है। परम पुरुष, परमेश्वर तथा सब
कुछ देनेवाले आप प्रभुको नमस्कार है॥ ४७॥
३७२
श्रीशिवमहापुराण
[अ = ॐ ण 9 णल न्ग्श ५
क्षेत्रज्ञायात्मरूपाय सर्वप्रत्ययहेतवे॥
सर्वाध्यक्षाय महते मूलप्रकृतये नमः।
पुरुषाय परेशाय नमस्ते सर्वदाय च॥ ४९
्रिनत्रायेषुवक्त्राय सदाभासाय ते नमः।
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे निष्कारण नमोऽस्तु ते॥ ५०
त्रिलोककारणायाथापवर्गाय नमो नमः।
अपवर्गप्रदायाशु शरणागततारिणे॥ ५१
सर्वाप्मायागमानां चोदधये परमेष्ठिने।
परायणाय भक्तानां गुणानां च नमोऽस्तु ते॥ ५२
नमो गुणारणिच्छन्नचिदूष्माय महेशवर।
मूढदुष्प्रारूपाय ज्ञानिहट्वासिने सदा॥५३
पशुपाशविमोक्षाय भक्तसम्मुक्तिदाय च।
स्वप्रकाशाय नित्यायाव्ययायाजस्त्रसंविदे ॥ ५४
प्रत्यग्द्रष्टेडविकाराय परमेश्वर्यधारिणे।
यं भजन्ति चतुर्वर्ग कामयन्तीष्टसद्गतिम्।
सोऽभूदकरुणस्त्वं नः प्रसन्नो भव ते नमः॥ ५५
एकान्तिनः कञ्चनार्थं भक्ता वांछति यस्य न।
केवलं चरितं ते ते गायन्ति परमङ्गलम्॥ ५६
अक्षरं परमं ब्रह्म तमव्यक्ताकृतिं विभुम्।
अध्यात्मयोगगम्यं त्वां परिपूर्ण स्तुमो बयम्॥ ५७
अतीन्द्रियमनाधारं सर्वाधारमहेतुकम्।
अनन्तमाद्यं सूक्ष्म त्वां प्रणमामोऽखिलेश्वर। ५८
हर्यादयोऽखिला देवास्तथा लोकाश्वराचरा: ।
नामरूपविभेदेन फल्गव्या च कलया कृताः॥ ५९
क्षेत्रज्ञ, आत्मस्वरूप, सभी प्रत्ययोके तु
सबके पति, महान् तथा मूलप्रकृतिको नमस्कार है
पुरुष, परेश तथा सब कुछ प्रदान करनेवाले है
[परमात्मा ]-को नमस्कार है ॥ ४८-४९ |
हे कारणरहित! त्रिनेत्र, पाँच मुखवाले तथा
सर्वदा ज्योतिःस्वरूप! आपको नमस्कार है। सभी
इन्द्रियों और गुणोंकों देखनेवाले आप 'परमात्माको
नमस्कार है॥५०॥
तीनों लोकोंके कारण, मुक्तिस्वरूप, मोक्ष
प्रदान करनेवाले, शीघ्र ही शरणागतको तारनेवाले,
आम्नाय [वेद] तथा आगमशास्त्रके समुद्र, परमेष्ठी
तथा भक्तोंके आश्रयरूप आप प्रभुको नमस्कार है
॥५१-५२॥
हे महेश्वर! आप गुणरूपी अरणीसे
आच्छन्न, चित्स्वरूप, अग्निरूप, मूर्खोके द्वारा प्रात
न होनेवाले, ज्ञानियोंके हृदयमें सदा निवास करनेवाले,
संसारी जीवोंके बन्धनको कारनेवाले, उत्तम भक्तोंको
मुक्ति प्रदान करनेवाले, स्वप्रकाशस्वरूप, नित्य, अव्यय,
निरन्तर ज्ञानस्वरूप, प्रत्यक्ष द्रष्टा, अविकारी तथा
परम ऐश्वर्य धारण करनेवाले हैं, आप प्रभुको
नमस्कार है ॥ ५३-५४१/२॥
लोग धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके लिये जिनका भजन
करते हैं तथा जिनसे अपनी सद्गति चाहते हैं, ऐसे
[हे प्रभो!] आप हम सभीके लिये दयारहित कैसे हो
गये ? हमपर प्रसन्न हों, आपको नमस्कार है॥५५॥
आपके अनन्य भक्त आपसे किसी अन्य अर्थकी
अपेक्षा नहीं करते हैं, वे तो केवल आपके मंगलस्वरूप
चरित्रको ही गाया करते हैं ॥ ५६॥
अविनाशी, परब्रह्म, अव्यक्तस्वरूपवाले, व्यापक,
अध्यात्म तथा योगसे जाननेयोग्य तथा परिपूर्ण आप
प्रभुको हमलोग स्तुति करते हैं॥ ५७॥
हे अखिलेशवर! इन्द्रियोंसे परे, स्वयं आधाररहित,
सबके आश्रय, हेतुरहित, अनन्त, आद्य और सू
आप प्रभुको हम सभी प्रणाम करते हैं॥ ५८ ॥
आपने अपनी तुच्छ कलामात्रसे नामरूपके
विष्णु आदि सभी देवताओं तथा इस चराचर
[अलग-अलग] सृष्टि की है॥५९॥
आ० १५]
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्यान्ति निर्यान्ति वासकृत्।
गभस्तयस्तथायं वै प्रवाहो गौण उच्यते॥६०
नत्वं देवोऽसुरो मर्त्यो न तिर्यङ् न द्विज: प्रभो।
न स्त्री न षंढो न पुमान्सदसन्न च किंचन॥ ६१
निषेधशेषः सर्व त्वं विश्वकृद्विश्वपालक:।
विशवलयकृद्विश्वात्मा प्रणताः स्मः तमीश्वरम्॥ ६२
योगरंधितकर्माणो यं प्रपश्यन्ति योगिनः।
योगसंभाविते चित्ते योगेशं त्वां नता वयम्॥ ६३
नमोऽस्तु तेऽसह्मवेग शक्तित्रय त्रयीमय।
नमः प्रपन्नपालाय नमस्ते भूरिशक्तये॥ ६४
कदिंद्रियाणां दुर्गेशानवाप्य परवर्त्मने।
भक्तोद्धाररतायाथ नमस्ते गूढवर्चसे॥ ६५
यच्छक्त्याहंधियात्मानं हन्त वेद न मूढधीः।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं त्वां नताः स्मो महाप्रभुम्॥ ६६
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महादेवं सर्वे विष्णवादिकाः सुराः।
तूष्णीमासन्प्रभोरग्रे सद्धक्तिनतकंधरा: ॥ ६७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३७३
जैसे अग्निकी चिनगारियाँ तथा सूर्यकी किरणें
बार-बार निकलती हैं और फिर उन्हींमें लीन हो जाती
हैं, उसी प्रकार सृष्टिका यह प्रवाह त्रिगुणात्मक कहा
जाता है॥ ६०॥
हे प्रभो! आप न देवता हैं, न असुर हैं, न मनुष्य
हैं, न पक्षी हैं, न द्विज हैं, न स्त्री हैं, न पुरुष हैं,
न नपुंसक हैं; यहाँतक कि सत्-असत् कुछ भी
नहीं हैं। श्रुतियोंके निषेधसे जो शेष बचता है,
वही निषेध-स्वरूप आप हैं। आप विश्वकी उत्पत्ति
करनेवाले, विश्वके पालक, विश्वका लय करनेवाले
तथा विश्वात्मा हैं, उन ईश्वरको हम सभी प्रणाम
करतें हैं ॥ ६१-६२॥
योगसे दग्ध हुए कर्मवाले योगीलोग अपने
योगासक्त चित्तमें जिन्हें देखते हैं, ऐसे आप योगेश्वरको
हमलोग नमस्कार करते हैं॥ ६३॥
हे तीनों शक्तियोंसे सम्पन्न असह्य वेगवाले!
हे त्रयीमय! आपको नमस्कार है। अनन्त शक्तियोंसे
युक्त तथा शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले आपको
नमस्कार है॥ ६४॥
हे दुर्गेश! दूषित इन्द्रियवालोंके लिये आप
सर्वथा दुष्पराप्य हैं; क्योंकि आपको प्राप्त करनेका
मार्ग ही दूसरा है। सदा भक्तोंके उद्धारमें तत्पर
रहनेवाले तथा गुप्त शक्तिसे सम्पन्न आप प्रभुको
नमस्कार है । जिनकी मायाशक्तिके कारण अहंबुद्भिसे
युक्त मूर्ख अपने स्वरूपको नहीं जान पाता है, उन
दुरत्यय महिमावाले आप महाप्रभुको हम नमस्कार
करते हैं ॥ ६५-६६॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार
महादेवजीकी स्तुति करके मस्तक झुकाये हुए विष्णु
आदि सभी देवता उत्तम भक्तिसे युक्त हो प्रभु
शिवजीके आगे चुपचाप खड़े हो गये॥ ६७॥
इतिं श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्द्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
न॑दाव्रतविधानशिवस्तुतिवर्णतं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणे अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें नन्दाव्रतविधि
तथा शिवस्तुतिवर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥
— ore
३७४
श्रीशिवमहापुराण
[अ र नर
अथ षोडशोऽध्यायः
ब्रह्मा और विष्णुद्रारा शिवसे विवाहके लिये प्रार्थना करना तथा उनकी इसके लिये
ब्रह्मोवाच
इति स्तुतिं च हर्यादिकृतामाकर्ण्य शंकरः।
बभूवातिप्रसन्नो हि विजहास च सूतिकृत्॥
ब्रह्मविष्णू तु दृष्ट्वा तौ सस्त्रीकौ सङ्गतौ हरः।
यथोचितं समाभाष्य पप्रच्छागमनं तयो:॥ २
रुद्र उवाच
हे हरे हे विधे देवा मुनयश्चाद्य निर्भया: ।
निजागमनहेतुं हि कथयध्वं सुतत्त्वत: ॥ ३
किमर्थमागता यूयं किं कार्य चेह विद्यते।
तत्सर्व श्रोतुमिच्छामि भवत्स्तुत्या प्रसन्नधीः ॥ ४
ब्रह्मोवाच
इति पृष्टे हरेणाहं सर्वलोकपितामहः।
मुनेऽवोचं महादेवं विष्णुना परिचोदितः॥ ५
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
यदर्थमागतावावां तच्छृणु त्वं सुर्िभि:॥ ६
विशेषतस्तवैवार्थमागता वृषभध्वज।
सहार्थिनः सदा योग्यमन्यथा न जगद्भवेत्॥ ७
केचिद्भविष्यन्त्यसुरा मम वध्या महेश्वर।
हरेर्वध्यास्तथा केचिद्धवतश्चापि केचन॥ ८
केचित्तद्वीर्यजातस्य तनयस्य महाप्रभो।
मायावध्या: प्रभो केचिद्भविष्यन्त्यसुराः सदा ॥ ९
तवैव कृपया शंभोः सुराणां सुखमुत्तमम्।
नाशयित्वासुरान् घोराञ्जगतस्वास्थ्यं सदाभयम्॥ १०
ब्रह्माजी बोले--भगवान् विष्णु आहि
देवताओंद्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर सबकी
उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और
जोरसे हँसे॥ १॥
सपत्नीक ब्रह्माजी और भगवान् विष्णुको साथ
आया हुआ देखकर महादेवजीने हमलोगोंसे यथोचित
वार्तालाप करके हमारे आगमनका कारण पूछा॥ २॥
रुद्र बोले-हे हरे! हे विधे! हे देवताओ और
महर्षियो! आपलोग आज निर्भय होकर अपने आनेका
ठीक-ठीक कारण बताइये। आपलोगोंकी स्तुतिसे मैं
[बहुत ही] प्रसन्न हूँ। आपलोग किसलिये यहाँ आगे
हैं, कौन-सा कार्य आ पड़ा है, वह सब मैं सुनना
चाहता हूँ॥ ३-४॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! महादेवजीके इस
प्रकार पूछनेपर सभी लोकोंका पितामह मैं ब्रह्मा
भगवान् विष्णुकी आज्ञासे कहने लगा॥५॥
हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे करुणासागर! हे
प्रभो! हम दोनों इन देवताओं और मुनियोंके साथ
जिस डद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसे सुनिये॥ ६॥
हे वृषभध्वज! विशेष रूपसे आपके लिये ही
हमलोग यहाँ आये हैं; क्योंकि हम तीनों सहायार्थी
हैं, [सृष्टिचक्रके संचालनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके
लिये एकःदूसरेके सहायक हैं] सहार्थीको सदा
परस्पर यथायोग्य सहयोग करना चाहिये, अन्यथा यह
जगत् टिक नहीं सकता ॥ ७॥
हे महेश्वर! कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे, जौ
मेरे द्वारा मारे जायँगे, कुछ भगवान् विष्णुके द्वारा और
कुछ आपके द्वारा वध्य होंगे हे महाप्रभो ! कुछ आपके
वीर्यसे उत्पन्न पुत्रद्वारा मारे जायेगे और कुछ अर
आपकी मायाके द्वारा वधको प्राप्त होंगे ॥ ८-९ ॥ आग
आप भगवान् शंकरकी कृपासे ही देवता
सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा। घोर असुरोंका
करके आप जगतूको सदा स्वास्थ्य एवं अभय प्रा
करेंगे॥ १० ॥
अ० १६]
योगयुक्ते त्वयि सदा रागद्वेषविवर्जिते।
दयामात्रैकनिरते न वध्या हाथवा तव॥ ११
आराधितेषु तेष्वीश कथं सृष्टिस्तथा स्थिति: ।
अतश्च भविता युक्तं नित्यं नित्यं वृषध्वज ॥ १२
सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि न कार्याणि यदा तदा।
शरीरभेदमस्माकं मायायाश्च न युज्यते॥ १३
एकस्वरूपा हि वयं भिन्नाः कार्यस्य भेदत: ।
कार्यभेदो न सिद्धश्रेद्रूपभेदोऽप्रयोजनः॥ १४
एक एव त्रिधा भिन्नः परमात्मा महेश्वर: ।
मायायाः कारणादेव स्वतंत्रो लीलया प्रभुः॥ १५
वामाङ्गजो हरिस्तस्य दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम्।
शिवस्य हृदयाज्जातस्त्वं हि पूर्णतनुः शिवः ॥ १६
इत्थं वयं त्रिधा भूताः प्रभो भिन्नस्वरूपिणः।
शिवाशिवसुतास्तत्त्वं हृदा विद्धि सनातन॥ १७
अहं विष्णुश्च सस्त्रीको सञ्जातौ कार्यहेतुतः।
लोककार्यकरौ प्रीत्या तव शासनतः प्रभो॥ १८
तस्माद्विश्वहितार्थाय सुराणां सुखहेतवे।
परिगृह्णीष्व भार्यार्थे रामामेकां सुशोभनाम्॥ १९
अन्यच्छूणु महेशान पूर्ववृत्तं स्मृतं मया।
यन्नो पुरः पुरा प्रोक्तं त्वयैव शिबरूपिणा॥ २०
मद्रूपं परमं ज्रहमन्नीदृशं भवदङ्गतः।
प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्रः प्रकीर्तितः ॥ २१
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३७५
आप राग-द्रेषरहित, योगयुक्त एवं सर्वथा दयालु
हैं, इसलिये हो सकता है कि आप असुरोंका वध न
करें। हे ईश! जब ये आराधना करके वर प्राप्त कर
लेंगे, तब सृष्टिकी स्थिति किस प्रकार रहेंगी?
इसलिये हे वृषभध्वज! उचित यही है कि आप [इस
सृष्टिकी स्थितिके लिये] सदैव असुरोंका वध करते
रहें ॥ ११-१२॥
यदि सृष्टि, पालन तथा संहारकर्म न करने हों,
तब हमारा तथा मायाका भिन्न-भिन्न शरीर धारण
करना सार्थक नहीं रहेगा॥ १३॥
वास्तवमें हम तीनों एक ही स्वरूपवाले हैं, किंतु
कार्यके भेदसे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करके स्थित
हैं। यदि कार्यभेद न सिद्ध हो, तब तो हमारे
रूपभेदका कोई प्रयोजन नहीं है॥ १४॥
परमात्मा महेश्वर एक होते हुए भी अपनी
मायाके कारण ही तीन रूपॉंमें विभक्त हैं, वे प्रभु
अपनी लीलासे स्वतन्त्र हैं॥ १५॥
श्रीहरि उनके वामांगसे उत्पन्न हुए हैं, मैं ब्रह्मा
उनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ हूँ और आप उन
सदाशिवके हृदयसे उत्पन्न हैं, अतः आप ही शिवजीके
पूर्ण रूप हैं॥ १६॥
हे प्रभो! इस प्रकार भिन्न स्वरूपवाले हम तीन
रूपोंमें प्रकट हैं और जो [वस्तुतः] उन शिवाशिवके
पुत्र ही हैं। हे सनातन! इस यथार्थ तत्त्वको आप
हृदयसे अनुभव कीजिये॥ १७॥
हे प्रभो! मैं और भगवान् विष्णु आपके आदेशसे
प्रसन्ततापूर्वक लोककी सृष्टि और पालनका कार्य
कर रहे हैं तथा कार्यकारणवश सपत्नीक भी हो
गये हैं॥ १८॥
अतः आप भी विश्वहितके लिये तथा देवताओंके
सुखके लिये एक परम सुन्दरी स्त्रीको पत्नीके रूपमें
ग्रहण करें॥ १९॥
हे महेश्वर! एक और बात सुनिये। मुझे पहलेके
वृततान्तका स्मरण हो आया है, जिसे पूर्वकालमें आपने
ही शिवस्वरूपसे हमारे सामने कहा था॥ २०॥
हे ब्रह्मन्! मेरा ऐसा उत्तम रूप आपके अंगसे
प्रकट होगा, जो लोकमें रुद्र नामसे प्रसिद्ध होगा॥ २१॥
३७६
सृष्टिकर्ताभवद् ब्रह्मा हरिः पालनकारकः।
लयकारी भविष्यामि रुद्ररूपो गुणाकृति:॥ २
स्त्रियं विवाह्य लोकस्य करिष्ये कार्यमुत्तमम्।
इति संस्मृत्य स्वप्रोक्तं पूर्ण कुरु निजं पणम्॥ २३
निदेशस्तव च स्वामिन्नहं सृष्टिकरो हरिः।
पालको लयहेतुस्त्वमाविर्भूतः स्वयं शिवः॥ २४
त्वां विना न समौ हि आवां च स्वस्वकर्मणि।
लोककार्यरतां तस्मादेकां गृह्णीष्व कामिनीम्॥ २५
यथा पद्मालया विष्णोः सावित्री च यथा मम।
तथा सहचरीं शंभो कान्तां गृह्णीष्व संप्रति॥ २६
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचो मे हि ब्रह्मणः पुरतो हरेः।
स मां जगाद लोकेशः स्मेराननमुखो हरः॥ २७
ईश्वर उवाच
हे ब्रह्मन् हे हरे मे हि युवां प्रियतरौ सदा।
दृष्ट्वा वां च ममानंदो भवत्यतितरां खलु॥ २८
युवां सुरविशिष्टो हि त्रिभुवस्वामिनौ किल।
कथनं वां गरिष्ठेति भवकार्यरतात्मनोः॥ २९
उचितं न सुरश्रेष्ठौ विवाहकरणं मम।
तपोरतविरक्तस्य सदा विदितयोगिनः॥ ३०
यो निवृत्तिसुमार्गस्थः स्वात्मारामो निरंजन: ।
अवधूततनुरज्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः॥ ३१
अविकारी ह्यभ्रोगी च सदाशुचिरमङ्गलः।
तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं बदाधुना॥ ३२
केवलं योगलग्नस्य ममानंदः सदास्ति वै।
ज्ञानहीनस्तु पुरुषो मनुते बहु 'कामकम्॥ ३३
विवाहकरणं लोके विज्ञेयं परबंधनम्।
तस्मात्तस्य रुचिनों मे सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ ३४
श्रीशिवमहापुराण
[अर -य्ााा०ा०ा०२०२०२०ा२१0 २१२7०२? ा-ा-- "१ १
आप ब्रह्मा सृष्टिकर्ता होंगे, श्रीहरि
पालन करनेवाले होंगे तथा मैं सगुण रुद्ररूप होक
संहार करनेवाला होऊँगा॥ २२॥
मैं एक स्त्रीके साथ विवाह करके लोकका उपप
कार्य करूँगा, [हे स्वामिन्!] आप अपने द्वारा कहे गये
वचनको याद करके अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण कीजिये॥ २३॥
हे स्वामिन्! आपका आदेश है कि मैं सृष्टि कहै
श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहारके हतु बनकर
प्रकट हों, सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ताके रूप
प्रकट हुए हैं। आपके बिना हम दोनों अपना-अफ़ा
कार्य करनेमें समर्थ नहीं हैं। अतः आप लोकहितके
कार्यमें तत्पर एक कामिनीको स्वीकार करें ॥ २४-२५॥
हे शम्भो! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुकी और
सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इ
समय अपनी सहचरी कान्ताको ग्रहण करें॥ २६॥
ब्रह्माजी बोले--मेरी यह बात सुनकर मुसकानयुकत
मुखमण्डलवाले वे लोकेश हर श्रीहरिके सामने मुझसे
कहने लगे-॥ २७॥
ईश्वर बोले--हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! आप दोगें
मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हैं, आप दोनोंको देखकर
मुझे बड़ा आनन्द मिलता है॥ २८॥
आपलोग समस्त देवताओं में श्रेष्ठ और त्रिलोकीके
स्वामी हैं। लोकहितके कार्यमें मन लगाये रहनेवाले
आपदोनोंका वचन अत्यन्त गौरवपूर्ण है॥ २९॥
किंतु हे सुरश्रेष्ठगण ! सदा तपस्यामें संलग्न रहकर
संसारसे विरत रहनेवाले और योगीके रूपमे प्रसिद्ध मे
लिये विवाह करना उचित नहीं है; जो निवृत्तिके सुद
मार्गपर स्थित, अपनी आत्मामें ही रमण करनेवाला,
निरंजन, अवधूत देहवाला, ज्ञानी, आत्मदर्शी, कामना
शून्य, विकाररहित, अभोगी, सदा अपवित्र और अमं
वेशधारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है
यह इस समय मुझे बताइये ॥ ३०--३२ ॥ ह
मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर
आनन्द आता है, ज्ञानहीन पुरुष ही भोगको झा. |
महत्त्व देता है । संसारमें विवाह करना बहुत “*
बन्धन समझना चाहिये । इसलिये मैं सत्य-सत्य हट
हूँ कि उसमें मेरी अभिरुचि नहीं है। आत्मा ही अ
अ० १६]
नस्वार्थ मे प्रवृत्तिहिं सम्यक् स्वार्थविचिंतनात्।
तथापि तत्करिष्यामि भवदुक्तं जगद्धितम्॥ ३५
मत्वा वचो गरिष्ठं वा निजोक्तिपरिपूर्तये।
करिष्यामि विवाहं वै भक्तवश्यः सदा ह्यहम्॥ ३६
परंतु यादूशीं कांता ग्रहीष्यामि यथापणम्।
तच्छुणुष्व हरे ब्रह्मन् युक्तमेव वचो मम॥ ३७
या मे तेजः समर्था हि ग्रहीतुं स्याद्विभागशः।
तां निदेशय भार्यार्थे योगिनीं कामरूपिणीम्॥ ३८
योगयुक्ते मयि तथा योगिन्येव भविष्यति।
कामासक्ते मयि तथा कामिन्येव भविष्यति॥ ३९
यमक्षरं वेदविदो निगदन्ति मनीषिणः।
ज्योतीरूपं शिवं ते च चिंतयिष्ये सनातनम्॥ ४०
तच्चिन्तायां यदासक्तो ब्रह्मन् गच्छामि भाविनीम्।
तत्र या विघ्नजननी न भवित्री हतास्तु मे॥ ४१
त्वं वा विष्णुरहं वापि शिवस्य ब्रह्मरूपिणः।
अंशभूता महाभागा योग्यं तदनुचिंतनम्॥ ४२
तच्चिन्तया विनोद्वाहं स्थास्यामि कमलासन।
तस्माज्जायां प्रादिश त्वं मत्कर्मानुगतां सदा॥ ४३
तत्राप्येकं पणं मे त्वरं शृणु ब्रह्मच मां प्रति।
अविश्वासो मदुक्ते चेन्मया त्यक्ता भविष्यति॥ ४४
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वाहं स विष्णु्हरस्य च।
सस्मितं मोदितमनोऽवोचं चेति विनम्रकः॥ ४५
रुद्रसंहिता ( | )
३७७
अर्थ या स्वार्थ है, उसका भलीभाँति चिन्तन
करमेके कारण [लौकिक] स्वार्थमें मेरी प्रवृत्ति नहीं
होती है, तथापि आपने जगतूके हितके लिये हितकर
जो कुछ कहा है, उसे मैं करूंगा। आपके वचनको
गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बातको पूर्ण
करनेके लिये मैं विवाह अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं
सदा अपने भक्तोंके अधीन हूँ॥ ३३-३६॥
हे हरे! हे ब्रह्मन्! परंतु मैं जैसी नारीको प्रिय
पत्नीके रूपमें ग्रहण करूँगा और जिस शर्तके साथ
करूँगा, उसे सुनें। मेरा वचन सर्वथा उचित है। जो
नारी मेरे तेजको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें समर्थ हो,
उस योगिनी तथा कामरूपिणी स्त्रीको मेरी पत्नी
बनानेके लिये बतायें। जब मैं योगमें तत्पर रहूँ, तब
उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं
कामासक्त होऊँ, तब उसे भी कामिनीके रूपमें रहना
होगा॥ ३७-३९॥
वेदवेत्ता विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं,
उन ज्योतिःस्वरूप सनातन शिवतत्त्वका मैं सदा
चिन्तन करता हूँ। हे ब्रह्मन्! उन सदाशिवके चिन्तनमें
जब मैं न लगा होऊँ तब उस कामिनीके साथ मैं
समागम कर सकता हूँ। जो मेरे शिव-चिन्तनमें विघ्न
डालेगी, वह दुर्भगा स्त्री मेरी भार्या न बने॥ ४०-४१॥
आप ब्रह्मा, विष्णु और मैं तीनों ही महाभाग्यशाली
ब्रह्मस्वरूप शिवजीके अंशभूत हैं, अतः हमारे लिये
उनका नित्य चिन्तन करना उचित है ॥ ४२॥
हे कमलासन! उनके चिन्तनके लिये मैं बिना
'विवाहके भी रह लूँगा, किंतु उनका चिन्तन छोड़कर
विवाह नहीं करूँगा। अतः आपलोग मुझे इस
प्रकारकी पत्नी बताइये, जो सदा मेरे कर्मके अनुकूल
चल सके॥ ४३॥
हे ब्रह्मन्! उसमें भी मेरी एक शर्त है, उसे आप
सुनें। यदि उस स्त्रीका मुझपर और मेरे वचनोंपर
अविश्वास होगा, तो मैं उसे त्याग दूँगा ॥ ४४ ॥
ब्रह्माजी बोले--उन रुद्रकी बात सुनकर मैंने
और श्रीविष्णुने मन्द मुसकानके साथ मन-ही-मन
प्रसन्नताका अनुभव किया, फिर मैंने विनम्र होकर
यह कहा ॥ ४५॥
३७८
नाहला हेड, मे नाथ महेशान मार्गिता यादृशी त्वया।
निवेदयामि सुप्रीत्या तां स्त्रियं तादृशीं प्रभो ॥
उमा सा भिन्नरूपेण सञ्जाता कार्यसाधिनी।
सरस्वती तथा लक्ष्मीद्विधारूपा पुरा प्रभो॥ ४७
पद्मा कांताभवद्विष्णोस्तथा मम सरस्वती।
तृतीयरूपा सा नोऽभूल्लोककार्यहितेषिणी॥ ४८
दक्षस्य तनया याभूत्सती नाम्ना तु सा विभो।
सैवेदूशी भवेद्भार्या भवेद्धि हितकारिणी॥ ४९
सा तपस्यति देवेश त्वदर्थं हि दूढव्रता।
त्वां पतिं प्राप्तुकामा वै महातेजोबती सती॥ ५०
दातुं गच्छ वरं तस्यै कृपां कुरु महेश्वर।
तां विवाहय सुप्रीत्या वरं दत्त्वा च तादूशम्॥ ५१
हरेर्मम च देवानामियं वाज्छास्ति शंकर।
परिपूरय सद्दृष्ट्या पश्यामोत्सवमादरात्॥ ५२
मङ्गलं परमं भूयात् त्रिलोकेषु सुखावहम्।
सर्वज्चरो विनश्येद् वै सर्वेषां नात्र संशयः ॥ ५३
अथवास्मद्वचःशेषेऽवदत्तं मधुसूदन: ।
लीलाजाकृतिमीशानं भक्तवत्सलमच्युतः॥ ५४
विष्णुरुवाच
देवदेव महादेव करुणाकर शंकर।
यदुक्तं ब्रह्मणा सर्व मदुक्तं तन्न संशयः॥ ५५
तत्कुरुष्व महेशान कृपां कृत्वा ममोपरि।
सनाथं कुरु सददृष्ट्या त्रिलोकं सुविवाह्य ताम्॥ ५६
श्रीशिवमहापुराण [अ र
|
है आपने जिए
प्रकारकी स्त्रीका निर्देश किया है, वैसी ही स्त्री
विषयमें मैं आपको प्रसन्नतापूर्वक बता रहा हूँ॥ ७
वे उमा जगतूकी कार्यसिद्धिके लिये भिनन-भिन
रूपें प्रकट हुई हैं। हे प्रभो! सरस्वती और लक्षौ
ये दो रूप धारण करके वे पहले ही प्रकट हो चुकी
हैं ॥ ४७॥
महालक्ष्मी तो विष्णुकी कान्ता तथा सरस्वती
मेरी कान्ता हुई हैं। लोकहितका कार्य करनेकी
इच्छावाली वे अब हमारे लिये तीसरा रूप धाख
करके प्रकट हुई हैं ॥ ४८ ॥
हे प्रभो! वे शिवा “सती” नामसे दक्षपुत्रक
रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। वे ही आपकी ऐसी भार्या हो
सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी होंगी॥ ४९॥
हे देवेश! वे दृढ़ब्रतमें स्थित होकर आपके लिये
तप कर रही हैं। वे महातेजस्विनी सती आपको
पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छुक हैं ॥ ५०॥
हे महेश्वर! [उन सतीके ऊपर] कृपा कीजिये,
उन्हें वर प्रदान करनेके लिये जाइये और वैसा वर
देकर उनके साथ विवाह कीजिये॥ ५१॥
हे शंकर! भगवान् विष्णुकी, मेरी तथा सभी
देवताओंकी यही इच्छा है। आप अपनी शुभ दृष्टे
हमारी इच्छाको पूर्ण कीजिये, जिससे हम इस
उत्सवको आदरपूर्वक देख सकें॥ ५२॥
ऐसा होनेसे तीनों लोकोंमें सुख देनेवाला परम
मंगल होगा और सबकी समस्त चिन्ताएँ मिट जायँगी।
इसमें संशय नहीं है॥५३॥
मेरी बात पूरी होनेपर अच्युत मधुसूदन लीलाते
रूप धारण करनेवाले भक्तवत्सल ईशानसे
लगे-- ॥ ५४॥ |
विष्णुजी बोले--हे देवाधिदेव! हे महादेव!
हे करुणाकर! हे शम्भो! ब्रह्माजीने जो कुछ भी कही.
है, उसे मेरे द्वारा कहा गया ही समझिये, इसमें
प्रकारका सन्देह नहीं है॥५५॥
हे महेश्वर मेरे ऊपर कृपा करके उसे की्िग
उन सतीसे विवाहकर इस त्रिलोकीको अपनी की
दृष्टिसे सनाथ कौजिये॥ ५६॥
आ० १७]
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः तूष्णीमास मुने सुधी: ।
रुद्रसंहिता ( ठा ) ३७९
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! यह कहकर उत्तम
बुद्धिवाले भगवान् विष्णु चुप हो गये, तब भक्तवत्सल
तथास्त्विति विहस्याह स प्रभुर्भक्तवत्सलः॥ ५७ | भगवान् शिवजीने हँसकर “तथास्तु' कहा॥ ५७॥
ततस्त्वावां च संप्राप्य चाज्ञां स मुनिभिः सुरैः ।
तत्पश्चात् उनसे आज्ञा प्राप्तकर पत्नियोंसहित हम
दोनों मुनियों तथा देवताओंके साथ अपने-अपने अभीष्ट
अगच्छाव स्वेष्टदेशं सस्त्रीकौ परहर्षितौ॥ ५८ | स्थानको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ चले आये॥ ५८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
विष्णुब्रह्मकृतशिवप्रार्थनावर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें विष्णु और
ब्रह्मद्वारा शिवकी ग्रार्थनाका वर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
भगवान् शिवद्वारा सतीको वर-प्राप्ति और शिवका ब्रह्माजीको दक्ष प्रजापतिके पास भेजना
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सर्वदेवैश्च कृता शंभोर्नुतिः परा।
शिवाच्च सा वरं प्राप्ता शृणु ह्यादरतो मुने॥
अथो सती पुनः शुक्लपक्षेऽष्टम्यामुपोषिता।
आश्विने मासि सर्वेशं पूजयामास भक्तितः॥
इति नंदाब्रते पूर्णे नवम्यां दिनभागतः।
तस्यास्तु ध्यानमग्नायाः प्रत्यक्षमभवद् हरः॥
सर्वाङ्गसुन्दरो गौरः पञ्चवक्त्रस्त्रिलोचनः।
चंद्रभालः प्रसन्नात्मा शितिकंठश्चतुर्भुजः॥
त्रिशूलब्रह्मकवराभयधृगभस्मभास्वरः \
स्वर्धुन्या विलसच्छीर्ष: सकलाङ्गमनोहरः॥
महालावण्यधामा च कोटिचन्द्रसमानन: ।
कोटिस्मरसमा कांतिः सर्वथा स्त्रीप्रियाकृतिः ॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार मैंने सभी देवताओंके
द्वारा की गयी शिवजीकी उत्तम स्तुतिको आपसे कह
दिया। हे मुने! सतीने जिस प्रकार शिवजीसे वर प्राप्त
किया, उसे अब मुझसे सुनो॥ १॥
सतीने आशश््विनमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी
तिथिको उपवासकर भक्तिपूर्वक सर्वेश्वर शिवजीका
पूजन किया॥ २॥
इस प्रकार नन्दात्रतके पूर्ण हो जानेपर नवमी तिथिका
कुछ भाग शेष रह गया था, उस समय ध्यानमें निमग्न
उन सतीके सामने शिव प्रकट हो गये॥ ३॥
वे सर्वांगसुन्दर तथा गौरवर्णके थे, उनके पाँच
मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे।
भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पा रहा था, उनका चित्त
प्रसन्न था, उनका कण्ठ नीला था और उनकी चार
भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल-ब्रह्मकपाल-वर
तथा अभय मुद्राको धारण कर रखा था, भस्ममय
अंगरागसे उनका शरीर उद्धासित हो रहा था, उनके
मस्तकपर गंगाजी शोभा बढ़ा रही थीं तथा उनके
सभी अंग मनोहर थे, वे परम सौन्दर्यके धाम थे,
उनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान
था, उनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंके समान थी
और उनकी आकृति स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाली
थी॥ ४--६॥
३८०
ह क सरत सासि | लकारे अध महादेवज उ हरं वीक्ष्य सती सेदृग्विधं प्रभुम्।
ववन्दे चरणौ तस्य सुलज्जावनतानना॥
अथ प्राह महादेवः सतीं सदब्रतधारिणीम्।
तामिच्छन्नपि भार्यार्थं तपश्चर्याफलप्रदः॥ ८
महादेव उवाच
दक्षनंदिनि प्रीतोऽस्मि व्रतेनानेन सुब्रते।
खरं वरय संदास्ये यत्तवाभिमतं भवेत्॥ ९
ब्रह्मोवाच
जानन्नपीह तद्भावं महादेवो जगत्पतिः।
जगौ वरं वृणीष्वेति तद्वाक्यश्रवणेच्छया॥ १०
सापि त्रपावशा युक्ता वक्तुं नो हृदि यत्स्थितम्।
शशाक सा त्वभीष्टं यत्तल्लज्जाच्छादितं पुन: ॥ ११
प्रेममर्नाभवत्साति श्रुत्वा शिववचः प्रियम्।
तज्ज्ञात्वा सुप्रसन्नोऽभूच्छंकरो भक्तवत्सलः ॥ १२
वरं ब्रूहि वरं ब्रूहि प्राहेति स पुनर्द्रतम।
सतीभक्तिवशः शंभुरंतर्यामी स॒तां गतिः॥ १३
अथ त्रपां स्वां संधाय यदा प्राह हरं सती।
यथेष्टं देहि वरद् वरमित्यनिवारकम्॥ १४
तदा वाक्यस्यावसानमनवेक्ष्य वृषध्वज:।
भव त्वं मम भार्येति प्राह तां भक्तवत्सलः ॥ १५
एतच्छुत्वा वचस्तस्य साभीष्टफलभावनम्।
तूष्णीं तस्थौ प्रमुदिता वरं प्राप्य मनोगतम्॥ १६
सकामस्य हरस्याग्रे स्थिता सा चारुहासिनी।
अकरोन्निजभावांश्च हावान्कामविवर्धनान्॥ १७
ततो भावान्समादाय भृङ्गाराख्यो रसस्तदा।
तयोश्चित्ते विवेशाशु'कला हावा 'यथोदितम्॥ १८
तत्प्रवेशात्तु देवर्षे लोकलीलानुसारिणोः।
काप्यभिख्या तयोरासीच्चित्राचन्द्रमसोर्यंथा॥ १९
श्रीशिवमहापुराण
इस प्रकारके प्र हदवो द
[3s र
देखकर सतीने लज्जासे नीचेकी ओर मुख ना
उनके चरणोंमें प्रणाम किया। तपस्याका फल प्रदर
करनेवाले महादेवजी उत्तम व्रत धारण करनेवाली ”
सतीको पत्नीरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हुए
भी उनसे कहने लगे-- ॥ ७-८॥
महादेवजी बोले--हे दक्षनन्दिनि! मैं तुम्हारे
इस ब्रतसे प्रसन्न हूँ। हे सुत्रते! जो तुम्हारा अभी
चर हो, उसे माँगो, मैं उसे प्रदान करूँगा॥ ९॥
ब्रह्माजी बोले--[ मुने!] जगदीश्वर महादेवने
सतीकी भावनाको जानते हुए भी उनकी बात सुननेकी
इच्छासे 'वर माँगो'--ऐसा कहा॥ १०॥
वे लज्जाके वशमें हो गयीं और जो उनके मागें
था, उसे कह न सकीं। उनका जो अभीष्ट था, वह
लज्जासे आच्छादित हो गया था। शिवजीका प्रिय
वचन सुनकर वे प्रेममें विभोर हो गयीं। इसे जानकर
भक्तवत्सल शंकरजी अत्यन्त हर्षित हुए॥ ११-१२॥
सत्पुरुषोंके शरणस्वरूप तथा अन्तर्यामी वे
शिवजी सतीकी भक्तिके वशीभूत होकर वर मांगो, वर
माँगो-ऐसा शीघ्रतापूर्वक बार-बार कहने लगे॥ १३॥
उस समय सतीने अपनी लज्ाको रोककर
शिवजीसे कहा-हे वरद! आप कभी भी न टलनेवाला
यथेष्ट वर प्रदान करें॥ १४॥
शिवजीने अनुभव किया कि सती अपनी बात
पूरी नहीं कर पा रही हैं, एतदर्थ उन्होंने स्वयं ही
कहा-हे देवि! तुम मेरी पत्नी बनो॥ १५॥
अपने अभीष्ट फलको प्रकट करनेवाले शिवजीके
वचनको सुनकर और अपना मनोगत वर प्राप्त करके
सती प्रसन्न होकर चुपचाप खड़ी रहीं। वे सकाम शिवर्जीके
सामने मन्द-मन्द मुसकराती हुई कामनाको बढानेवाते
अपने हाव-भाव प्रकट करने लगीं ॥ १६-१७॥
सतीद्वारा अभिव्यक्त हाव-भावको स्वीकार
शृंगाररसने उन दोनोंके चित्तमें शौप्रतासे प्रवेश
किया॥ १८॥
हे देवर्षे! थृंगाररसके प्रवेश करते ही लोकलीत.
करनेवाले शिवजी तथा सतीकी चित्रासे युक्त च्म
समान विलक्षण कान्ति हो गयी ॥ १९॥
अ० १७]
शेजे सती हरं प्राप्य स्निग्धभिन्नाञ्जनप्रभा।
चन्द्राभ्याशेऽश्रलेखेव स्फटिकोज्ज्चलवर्ष्मण: ॥ २०
अथ सा तमुवाचेदं हरं दाक्षायणी मुहुः।
सुप्रसन्ना करौ बद्ध्वा नतका भक्तवत्सलम् ॥ २१
सत्युवाच
देवदेव महादेव विवाहविधिना प्रभो।
पितुर्मे गोचरीकृत्य मां गृहाण जगत्पते॥ २२
ब्रह्मोवाच
एवं सतीवचः श्रुत्वा महेशो भक्तवत्सल: ।
तथास्त्विति वचः प्राह निरीक्ष्य प्रेमतश्च ताम्॥ २३
दाक्षायण्यपि तं नत्वा शंभुं विज्ञाप्य भक्तितः।
प्राप्ताज्ञा मातुरभ्याशमगान्मोहमुदान्विता॥ २४
हरोऽपि हिमवत्प्रस्थं प्रविश्य च निजाश्रमम्।
दाक्षायणीवियोगाद्वै कृच्छं ध्यानपरोऽभवत्॥ २५
समाधाय मनः शंभुलौंकिकीं गतिमाश्रितः।
चिंतयामास देवर्षे मनसा मां वृषध्वज:॥ २६
ततः संचिन्त्यमानोऽहं महेशेन त्रिशूलिना।
पुरस्तात्प्राविशत्तूर्ण हरसिद्धिप्रचोदित: ॥ २७
यत्रासौ हिमवत्प्रस्थे तद्वियोगी हरः स्थित: ।
सरस्वतीयुतस्तात तत्रैव समुपस्थितः॥ २८
सरस्वतीयुतं मां च देवर्षे वीक्ष्य स प्रभुः।
उत्सुकः प्रेमबद्धश्च सत्या शंभुरुवाच ह॥ २९
शंभुरुवाच
अहं ब्रह्मन्स्वार्थपरः परिग्रहकृतौ च यत्।
तदा स्वत्वमिव स्वार्थे प्रतिभाति ममाधुना॥ ३०
अहमाराधितः सत्या दाक्षायण्याथ भक्तितः।
तस्यै वरो मया दत्तो नंदाब्रतप्रभावतः॥ ३१
रूद्रसंहिता ( ख )
३८१
काले तथा चिकने अंजनके समान कान्तिवाली
सती स्फटिकमणिके सदृश कान्तियुक्त उन शिवजीको
| इस प्रकार शोभित हुई, जिस प्रकार अभ्रलेखा
[मेघघटा] चन्द्रमाको प्राप्तकर शोभित होती है॥ २०॥
तदनन्तर दक्षकन्या सती अत्यन्त प्रसन्न होकर
दोनों हाथोंको जोड़कर भक्तवत्सल भगवान् शिवजीसे
विनम्रता-पूर्वक कहने लगीं-॥ २१॥
सती बोलीं हे देवदेव! हे महादेव! हे प्रभो!
हे जगत्पते! आप मेरे पिताके समक्ष वैवाहिक विधिसे
मुझे ग्रहण कीजिये॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार सतीकी
बात सुनकर भक्तवत्सल महादेवजीने प्रेमपूर्वक उनकी
ओर देखकर यह वचन कहा--ऐसा ही होगा॥ २३॥
तब दक्षकन्या सती भी उन शिवजीको प्रणाम
करके भक्तिपूर्वक विदा माँगकर और पुनः उनकी आज्ञा
प्राप्त करके मोह और आनन्दसे युक्त हो अपनी माताके
पास चली गयीं । शिवजी भी हिमालयके शिखरपर अपने
आश्रममें प्रवेश करके दक्षकन्या सतीके वियोगके कारण
बड़ी कठिनाईसे ध्यानमें तत्पर हो सके ॥ २४-२५॥
देवर्षे! मनको एकाग्र करके लौकिक गतिका
आश्रय लेकर वृषध्वज शंकरने मन-ही-मन मेरा
स्मरण किया ॥ २६॥
तब त्रिशूलधारी महेश्वरके स्मरण करनेपर उनकी.
सिद्धिसे प्रेरित होकर मैं शीघ्र ही उनके समीप पहुँच
गया और हे तात! हिमालयके शिखरपर जहाँ सतीके
वियोगजनित दुःखका अनुभव करनेवाले महादेवजी
विद्यमान थे, वहीं मैं सरस्वतीसहित उपस्थित हो
गया॥ २७-२८॥
हे देवर्षे! तदनन्तर सरस्वतीसहित मुझ ब्रह्माको
देखकर सतीके प्रेममें बॅधे हुए शिवजी उत्सुकतापूर्वक
कहने लगे-॥ २९॥
शम्भु बोले-हे ब्रह्मन्! मैं जबसे विवाहके
कार्यमें स्वार्थबुद्धि कर बैठा हूँ, तबसे अब मुझे इस
स्वार्थमें ही स्वत्व-सा प्रतीत हो रहा है॥ ३०॥
दक्षकन्या सतीने बड़े भक्तिभावसे मेरी
आराधना की है और मैंने नन्दाव्रतके प्रभावसे उसे
[अभीष्ट] वर दे दिया है॥३१॥
३८२
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० गा ण ण... ती
भर्ता भवेति च तया मत्तो ब्रह्मन् वरो वृत: ।
मम भार्या भवेत्युक्तं मया तुष्टेन सर्वथा॥ ३
अथावदत्तदा मां सा सती दाक्षायणी त्विति।
पितुर्मे गोचरीकृत्य मां गृहाण जगत्पते॥ ३३
तदप्यङ्गीकृतं ब्रह्मन्मया तद्भक्तितुष्टितः।
सा गता भवनं मातुरहमत्रागतो विधे॥ ३४
तस्मात्त्वं गच्छ भवनं दक्षस्य मम शासनात्।
तां दक्षोऽपि यथा कन्यां दद्यान्मेऽरं तथा वद॥ ३५
सतीवियोगभङ्गः स्याद्यथा मे त्वं तथा कुरु।
समाश्वासय तं दक्षं सर्वविद्याविशारदः॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इत्युदीर्य महादेवः सकाशे मे प्रजापतेः।
सरस्वतीं विलोक्याशु वियोगवशगोऽभवत्॥ ३७
तेनाहमपि चाज्ञप्त: कृतकृत्यो मुदान्वितः।
प्रावोचं चेति जगतां नाथं तं भक्तवत्सलम्॥ ३८
ब्रह्मोवाच
यदात्थ भगवन् शम्भो तद्विचार्य सुनिश्चितम्।
मुख्यः स्वार्थो हि देवानां ममापि वृषभध्वज॥ ३९
दक्षस्तुभ्यं सुतां स्वां च स्वयमेव प्रदास्यति।
अहं चापि वदिष्यामि त्वद्वाक्यं तत्समक्षतः॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्युदीर्य महादेवमहं सर्वेश्वरं प्रभुम्।
अगमं दक्षनिलयं स्यंदनेनातिवेगिना॥ ४१
नारद उवाच
विधे प्राज्ञ महाभाग वद नो वदतां वर।
सत्यै गृहागतायै स दक्षः किमकरोत्ततः ॥ ४२
हे ब्रह्मन्! उस सतीने मुझसे यह वर माँगा
आप मेरे पति हो जाइये। तब सर्वथा सन्तुष्ट हो
मैंने भी कह दिया कि तुम मेरी पत्नी हो जाओ॥ ३२॥
तदनन्तर उस सतीने मुझसे कहा-हे जगत्पते।
मेरे पिताकों सूचित करके [वैवाहिक विधिका पालम
करते हुए] मुझे ग्रहण कीजिये। हे ब्रह्मन्! उसकी
भक्तिसे सन्तुष्ट हुए मैंने उसे भी स्वीकार का्
लिया। हे विधे! [इस प्रकारका वर प्राप्तकर] सतत
अपनी माताके पास चली गयी और मैं यहाँ चला
आया॥ ३३-३४॥
इसलिये हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञासे दक्षके घा
जाइये और वे दक्षप्रजापति जिस प्रकार मुझे शौद्र
अपनी कन्या प्रदान करें, उस प्रकार उनसे कहिये॥ ३५॥
जिस प्रकार मेरा सतीवियोग भंग हो, वैसा
उपाय आप कीजिये। आप सभी प्रकारकी विद्याओमें
निपुण हैं, अतः [इस बातके लिये] दक्षप्रजापतिको
समझाइये ॥ ३६॥
ब्रह्माजी बोले--यह कहकर वे शिवजी मुद
ब्रह्मके समीप स्थित सरस्वतीको देखकर शीप्र ही
सतीके वियोगके वशीभूत हो गये ॥ ३७॥
उनको आज्ञा पाकर मैं कृतकृत्य और प्रसन हो
गया तथा उन भक्तवत्सल जगत्पतिसे यह कहते
लगा--॥ ३८॥
ब्रह्माजी बोले-भगवन्! हे शम्भो! आपने
जो कुछ कहा है, उसपर भलीभाँति विचार करके
हमलोगोंने [पहले ही] उसे सुनिश्चित कर दिया है।
हे वृषभध्वज! इसमें देवताओंका और मेरा भी मुख्य
स्वार्थ है । दक्ष प्रजापति स्वयं ही आपको अपनी पुत्री
प्रदान करेंगे और मैं भी उनके समक्ष आपका वर्वर
कह दूँगा॥ ३९-४० ॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] सर्वेश्वर पर
महादेवजीसे इस प्रकार कहकर मैं अत्यन्त
रथसे दक्षके घर जा पहुँचा॥ ४१॥
नारदजी बोले-_हे प्राज्ञ हे महाभाग! ह विषे है
हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! [तपस्याके पश्चात्] घर
आयी हुई सतीके लिये दक्षने क्या किया ?॥ ४२॥
\
अ० १७]
ब्रह्मोवाच
तपस्तप्त्वा वरं प्राप्य मनोऽभिलषितं सती।
गुहं गत्वा पितुर्मातुः प्रणाममकरोत्तदा॥ ४३
मात्रे पित्रेऽथ तत्सर्व समाचख्यौ महेश्वरात्।
बरप्राप्तिः स्वसख्या वै सत्यास्तुष्टात्तु भक्तितः ॥ ४४
माता पिता च वृत्तान्त सर्व श्रुत्वा सखीमुखात्।
आनन्दं परमं लेभे चक्रे च परमोत्सवम्॥ ४५
द्रव्यं ददौ द्विजातिभ्यो यथाभीष्टमुदारधीः।
अन्येभ्यश्चांधदीनेभ्यो वीरिणी च महामना: ॥ ४६
बीरिणी तां समालिंग्य स्वसुतां प्रीतिवर्द्धिनीम्।
ूर्ध्युपाघ्राय मुदिता प्रशशंशुर्मुहुर्मुहुः ॥ ४७
अथ दक्षः कियत्काले व्यतीते धर्मवित्तमः।
चिन्तयामास देयेयं स्वसुता शम्भवे कथम्॥ ४८
आगतोऽपि महादेवः प्रसन्नः स जगाम ह।
पुनरेव कथं सोऽपि सुतार्थेऽत्रागमिष्यति॥ ४९
प्रस्थाप्योऽथ मया कश्चिच्छंभोर्निकटमञ्जसा।
नैतद्योग्यं न गृह्ीयाद्यद्येवं विफलार्दना॥ ५०
अथवा पूजयिष्यामि तमेव वृषभध्वजम्
मदीयतनया भक्त्या स्वयमेव यथा भवेत्॥ ५१
तयैव पूजितः सोऽपि वाञ्छत्यार्यप्रयत्नतः।
शंभुर्भवतु मद्भ्ेत्येवं दत्तवरेण तत्॥५२
इति चिन्तयतस्तस्य दक्षस्य पुरतोऽन्वहम्।
उपस्थितोऽहं सहसा सरस्वत्यन्वितस्तदा॥ ५३
मां दृष्ट्वा पितरं दक्षः प्रणम्यावनतः स्थितः।
आसनं च ददौ मह्यं स्वभवाय यथोचितम्॥ ५४
रुद्रसंहिता ( | )
३८३
ब्रह्माजी बोले--तपस्या करके मनोऽभिलषित
प्राप्तकर तथा घर जाकर सतीने माता-पिताको
प्रणाम किया। तत्पश्चात् सतीने अपनी सखीके द्वारा
माता-पितासे वह सारा वृत्तान्त कहलवाया, जिस
प्रकार उनकी भक्तिसे प्रसन्न हुए महेश्वरसे उन्हें
चरको प्राप्ति हुई थी ॥ ४३-४४॥
सखीके मुँहसे सारा वृत्तान्त सुनकर माता-
पिताको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने महान् उत्सव
मनाया ॥ ४५॥
उदारचित्त दक्ष और महामनस्विनी वीरिणीने
ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दिया और
अन्धां, दीनों तथा अन्य लोगोंको भी धन बाटा ॥ ४६॥
प्रीति बढ़ानेवाली अपनी उस पुत्रीको हृदयसे
लगाकर उसका मस्तक सूँघकर और आनन्दविभोर
होकर वीरिंणीने बार-बार उसकी प्रशंसा की ॥ ४७॥
कुछ समय बीतनेपर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ दक्ष इस
चिन्तामें पड़ गये कि मैं अपनी इस पुत्रीको शंकरको
किस प्रकार प्रदान करूँ 2॥ ४८॥
महादेवजी प्रसन्न होकर मेरी पुत्रीको वर देनेके
लिये आये थे, किंतु वे तो चले गये, अब मेरी पुत्रीके
लिये वे पुनः कैसे आयेंगे ?॥ ४९॥
यदि मैं किसीको उनके पास शीघ्र भेजूँ, तो यह
भी उचित नहीं है; क्योंकि यदि वे पुत्रीको स्वीकार
न करें, तो मेरी याचना निष्फल हो जायगी ॥ ५०॥
अथवा मैं स्वयं उनका पूजन-अर्चन करूँ,
जिससे कि वे मेरी पुत्रीकी भक्तिसे प्रसन्न होकर स्वयं
इसे ग्रहणकर इसके पति बनें॥५१॥
उस सतीके द्वारा श्रेष्ठ प्रयत्नसे पूजित होकर वे
भी उसको पाना चाह रहे हैं; क्योंकि वे “मेरे पति
शिवजी हों'-सतीको यह वर दे चुके हैं॥ ५२॥
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए दक्ष
प्रजापतिके सामने मैं सररस्वतीके, साथ एकाएक
उपस्थित हुआ॥ ५३॥
मुझ अपने पिताको देखकर प्रणाम करके दक्ष
विनीत भावसे खड़े हुए और उन्होंने मुझ ब्रह्माको
यथोचित आसन दिया॥ ५४॥
३८४
्रीशिवमहापुराण
[ = ` य पणा“ नी १७
ततो मां सर्वलोकेशं तत्रागमनकारणम्।
दक्षः पप्रच्छ स क्षिप्रं चिंताविष्टो5पि हर्षित: ॥
दक्ष उवाच
तवात्रागमने हेतुः कः प्रवेशे स सृष्टिकृत्।
ममोपरि सुप्रसादं कृत्वाचक्ष्ष जगद्गुरो॥ ५६
पुत्रस्नेहात्कार्यवशादथवा लोककारक।
ममाश्रमं समायातो हृष्टस्य तव दर्शनात्॥ ५७
ब्रह्मोवाच
इति पृष्टः स्वपुत्रेण दक्षेण मुनिसत्तम।
विहसन्नब्रुवं वाक्यं मोदयंस्तं प्रजापतिम्॥ ५८
ब्रह्मोवाच
शृणु दक्ष यदर्थं॒॑त्वत्समीपमहमागतः।
त्वत्तो कस्य हितं मेऽपि भवतोऽपि तदीप्सितम् ॥ ५९
तव पुत्री समाराध्य महादेवं जगत्पतिम्।
यो वरः प्रार्थितस्तस्य समयोऽयमुपागतः ॥ ६०
शंभुना तव पुत्र्यर्थ त्वत्सकाशमहं धरुवम्।
प्रस्थापितोऽस्मि यत्कृत्यं श्रेयस्तदवधारय॥ ६१
वरं दत्त्वा गतो रुद्रस्तावत्प्रभृति शंकरः।
त्वत्सुताया वियोगेन न शर्म लभतेऽञ्जसा॥ ६२
अलब्धच्छिद्रमदनो जिगाय गिरिशं न यम्।
सवे: पुष्पमयैर्बाणैर्यत्नं कृत्वापि भूरिशः॥ ६३
स कामबाणविद्धोऽपि परित्यज्यात्मचिंतनम्।
सतीं विचिन्तयन्नासते व्याकुलः प्राकृतो यथा॥ ६४
विस्मृत्य प्रश्रुतां वाणीं गणाग्रे विप्रयोगतः।
कव सतीत्येवमभितो भाषते निकृतावपि॥ ६५
मया यद्वाञ्छितं पूर्व त्वया च मदनेन च।
सुत॥ ६६
तत्पश्चात् चिन्तासे युक्त होनेपर भी
वे दक्ष शीघ्र ही सर्वलोकेश्वर मुझ ब्रह्मासे आगा
कारण पूछने लगे-॥ ५५॥
दक्ष बोले-हे जगद्गुरो ! हे सृष्टिकर्ता। यौ
आपके आगमनका क्या कारण है, मेरे ऊपर महत
कृपा करके उसे कहिये॥ ५६॥
हे लोककारक! आप मुझ पुत्रके स्नेहवश
अथवा किसी कार्यवश मेरे आश्रममें पधारे हैं, आपे
दर्शनसे मुझे प्रसन्नता हो रही है ॥५७॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनिसत्तम! अपने पुत्र
दक्षद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर मैं उन प्रजापतिको
प्रसन्न करता हुआ हँसकर कहने लगा॥५८॥
ब्रह्माजी बोले--हे दक्ष! मैं जिस उद्देश्ये
यहाँ आपके पास आया हूँ, उसको सुनिये। जिसके
करनेसे तुम्हारा तथा मेरा दोनोंका अभीष्ट सिद्ध
होगा॥ ५९ ॥
आपको पुत्री सतीने जगत्पति महादेवजीकी
आराधना करके जो वर प्राप्त किया है, उसका समय
अब उपस्थित हो चुका है॥६०॥
शम्भुने आपकी पुत्रीको पत्नीरूपमें प्राप्त करनेके
लिये ही मुझे आपके पास भेजा है। अब [ आपके लिये]
जो कल्याणकारी कार्य है, उसे कर डालिये॥६१॥
जबसे रुद्र वर प्रदान करके गये हैं, तभीमे
आपको पुत्रीके वियोगके कारण उन शंकरको शाति
नहीं मिल रही है॥ ६२॥
कामदेव अपने समस्त पुष्पबाणोंके द्वारा अनेक
उपाय करके भी छिद्र न पा सकनेके कारण जिह
जीत न सका, वे ही शिवजी अब कामबाणसे वि
होकर अपना आत्मचिन्तन त्यागकर सतीकी चिता
करते हुए सामान्य प्राणीकी भाँति व्याकुल हो
हैं॥ ६३-६४॥
वे सुनी हुई वाणीको भी भूल जातै हैं त
सतीके वियोगवश अपने गणोंके समक्ष ही “सती
“इस प्रकारकी वाणी कहते हैं और किसी
प्रवृत्त नहीं होते हैं। हे सुत! मैंने, आपने, र
तथा मरीचि आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जो पूर्वमें चाहा '
वह इस समय सिद्ध हो चुका है॥ ६५-६६॥
अ० १८]
त्वत्पुत्र्याराधित: शंभुः सोऽपि तस्या विचिंतनात्।
अनुशोधयितुं प्ररपसुर्वर्तते हिमवद्गिरौ॥ ६७
यथा नानाविधेर्भावैः सत्त्वात्तेन व्रतेन च।
शंभुराराधितस्तेन तथैवाराध्यते सती॥ ६८
तस्मात्तु दक्ष तनयां शंभ्वर्थं परिकल्पिताम्।
तस्मै देह्यविलंबेन कृता ते कृतकृत्यता॥ ६९
अहं तमानयिष्यामि नारदेन त्वदालयम्।
तस्मै त्वमेनां संयच्छ तदर्थे परिकल्पिताम्॥ ७०
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा मम वचश्चेति स मे पुत्रोऽतिहर्षितः।
एवमेवेति मां दक्ष उवाच परहर्षितः॥ ७१
ततः सोऽहं मुने तत्रागममत्यन्तहर्षितः।
उत्सुको लोकनिरतो गिरिशो यत्र संस्थितः ॥ ७२
गते नारद दक्षोऽपि सदारतनयो हापि।
अभवत्पूर्णकामस्तु पीयूषेरिव पूरितः॥ ७३
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३८५
आपको पुत्रीने शम्भुकी आराधना की है, इससे वे
भी उसकी चिन्ता करते हुए उसको प्राप्त करनेकी इच्छासे
युक्त होकर हिमालय पर्वतपर स्थित हैं। जिस प्रकार
सतीने अनेक प्रकारके भावों और सात्त्विकतापूर्वक व्रतके
द्वारा शिवजीकी आराधना की थी, उसी प्रकार [इस
समय] वे भी सतीकी आराधना कर रहे हैं ॥ ६७-६८॥
इसलिये हे दक्ष! शिवके लिये ही रची गयी
अपनी पुत्रीको आप अविलम्ब उन्हें प्रदान कर
दीजिये, ऐसा करनेसे आप कृतकृत्य हो जायँगे॥ ६९ ॥
में नारदके साथ जाकर उन्हें आपके घर
लाऊँगा और उन्हींके लिये रची हुई इस सतीको उन्हें
अर्पित कर दीजिये॥ ७०॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! मेरी यह बात सुनकर
मेरे पुत्र दक्ष परम प्रसन्न हुए और उन्होंने अत्यन्त हर्षित
होकर मुझसे कहा-ठीक है, ऐसा ही होगा॥ ७१॥
उसके बाद हे मुने! मैं अत्यन्त हर्षित हो
वहाँपर गया, जहाँ लोककल्याणमें तत्पर रहनेवाले
शिवजी उत्सुक होकर बैठे थे ॥७२॥
हे नारद! मेरे चले आनेपर स्त्री और पुत्रीसहित
दक्ष भी अमृतसे परिपूर्ण हुएके समान पूर्णकाम [सफल
मनोरथवाले] हो गये ॥ ७३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
सतीवरलाभो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सती-वरलाभवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥
अथाष्टादशोऽध्यायः
देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना, दक्षद्वारा
सबका सत्कार एवं सती तथा शिवका विवाह
नारद उवाच नारदजी बोले-जब आप भगवान् रुद्रके पास
रुद्रपाएवे त्वयि गते किमरभूच्चरितं ततः। गये, तब क्या चरित्र हुआ, हे तात! कौन-सी बात हुई
का वार्ता ह्यभवत्तात किं चकार हरः स्वयम्॥ १ और शिवजीने स्वयं क्या किया ?॥ १॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! तदनन्तर मैं
ब्रह्मोवाच हिमालय पर्वतके कैलास शिखरपर रहनेवाले परमेश्वर
अथाहं शिवमानेतुं प्रसलः परमेश्वरम्। महादेव शिवजीको लानेके लिये प्रस्नतापूर्वक उनके
आसदं हि महादेवं हिमवदगिरिसंस्थितम्॥ २ समीप गया॥ २॥
2223 Shivmabapuranam_Part ISection_l4_]_Front
३८६
श्रीशिवमहापुराण
[ _ == ` ¬= कारक ` ६
मां वीक्ष्य लोकस्त्रष्टारमायान्तं वृषभध्वजः।
मनसा संशयं चक्रे सतीप्राप्तो मुहुर्मुहुः॥
अथ प्रीत्या हरो लोके गतिमाश्रित्य लीलया।
सत्या भक्त्या च मां क्षिप्रमुवाच प्राकृतो यथा॥ ४
ईश्वर उवाच
किमकार्षीत्सुरज्येष्ठ सत्यर्थे त्वत्सुतः स माम्।
कथयस्व यथा स्वान्तं न दीर्येन्मन्मथेन हि॥ ५
धावमानो विप्रयोगो मामेव च सतीं प्रति।
अभिहन्ति सुरज्येष्ठ त्यक्त्वाऱ्यां प्राणधारिणीम्॥ ६
सतीति सततं ब्रह्मन् वद कार्य करोम्यहम्।
अभेदान्मम सा प्राप्या तद्विधे क्रियतां तथा॥ ७
ब्रह्मोवाच
इति रुद्रोक्तवचनं लोकाचारसुगर्भितम्।
श्रुत्वाहं नारदमुने सान्त्वयन्नगदं शिवम्॥ ८
ब्रह्मोवाच
सत्यर्थ यन्मम सुतो वदति स्म वृषध्वज।
तच्छृणुष्व निजासाध्यं सिद्धमित्यवधारय॥ ९
देया तस्मै मया पुत्री तदर्थ परिकल्यिता।
ममाभीष्टमिदं कार्य त्वद्वाक्यादधिकं पुनः॥ १०
मत्पुत्र्याराधितः शंभुरेतदर्थ स्वयं पुनः।
सोऽप्यन्विष्यति मां यस्मात्तदा देया मया हरे॥ ११
शुभे लग्ने सुमुहूते समागच्छतु सोऽन्तिकम्।
तदा दास्यामि तनयां भिक्षार्थं शंभवे विधे॥ १२
वृषभध्वज शिवजी मुझ लोककर्ताको आते
देखकर अपने मनमें सतीकी प्राप्तिके विषयमे
बार संशय करने लगे॥ ३॥
तत्पश्चात् शिवजी प्रीतिपूर्वक अपनी लीला
और सतीकी भक्तिसे लोकगतिका आश्रय लेकर
मनुष्यके समान मुझसे शीघ्र कहने लगे--॥ ४॥
ईश्वर बोले--हे सुरश्रेष्ठ! आपके
दक्षप्रजापतिने सतीको मुझे प्रदान करनेके विषयमें क्या
किया, आप मुझसे कहिये, जिससे कामके कारण मर
हृदय विदीर्ण न हो जाय॥५॥
हे सुरश्रेष्ठ! किसी अन्य प्राणधारिणी कामिनीक्
छोड़कर केवल सतीकी ओर दौड़ता हुआ यह वियोग
मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है॥ ६॥
हे ब्रह्मन्! मैं सदा 'सती-सती' ऐसा कहत
हुआ कार्योको करता हूँ, उस सतीके पास जाकर आप
मेरी व्यथाको कहें। वह सती मुझसे अभिन है। हे
विधे! अत: उसकी प्राप्तिके लिये आप यत्न कीजिये
अथवा सतीकी प्राप्तिके निमित्त उपाय बताइये, जिसे
मैं शीघ्र ही करूँ॥ ७॥
ब्रह्माजी बोले हे नारद मुने ! रुद्रके द्वारा कहे
गये लोकाचारयुक्त वचनको सुनकर उन्हें सान्वत
देते हुए मैं कहने लगा॥८॥
ब्रह्माजी बोले-हे वृषभध्वज! सतीके लिये
मेरे पुत्र दक्षने जो बात कही है, उसे सुनिये और जिस
कार्यको आप अपने लिये असाध्य मान रहे हैं, उसे
सिद्ध हुआ समझिये॥ ९॥
[दक्षने मुझसे कहा कि हे ब्रह्मन्!] मैं अपनी
पुत्री भगवान् शिवके हाथोमे ही दूँगा; क्योंकि उन्हे
लिये यह उत्पन्न हुई है | यह कार्य मुझे स्वयं अभीष्ट
है, फिर आपके भी कहनेसे इसका महत्त्व और बई
गया है॥ १०॥
मेरी पुत्रीने स्वयं इसी उद्देश्यसे भगवान् शिव
पूजा की थी और इस समय शिवजी भी इसी
पूछ-ताछ कर रहे हैं। इसलिये मुझे अपनी की
शिवजीके हाथमें अवश्य देनी है॥ ११॥
हे विधे! वे शंकर शुभ लग्न और सुन्दर मु
मेरे यहाँ पधारें, जिससे मैं उन्हें भिक्षारूपमें
कन्या प्रदान करूँ॥ १२॥
अ० १८]
इत्युवाच स मां दक्षस्तस्मात्त्वं वृषभध्वज।
शुभे मुहूर्ते तद्वेश्म गच्छ तामानयस्व च॥ १३
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा मम वचो लौकिकीं गतिमाश्रितः।
उवाच विहसन् रुद्रो मुने मां भक्तवत्सलः ॥ १४
रुद्र उवाच
गमिष्ये भवता सार्ध नारदेन च तद्गृहम्
अहमेव जगगत्स््रष्टस्तस्मात्त्वं नारदं स्मर॥ १५
मरीच्यादीन् स्वपुत्रांश्च मानसानपि संस्मर।
तैः सार्धं दक्षनिलयं गमिष्ये सगणो विधे॥ १६
ब्रह्मोवाच
इत्याज्ञप्तोऽहमीशेन लोकाचारपरेण ह।
संस्मरं नारदं त्वां च मरीच्यादीन्सुतांस्तथा॥ १७
ततः समागताः सर्वे मानसास्तनयास्त्वया।
मम स्मरणमात्रेण हष्टास्ते ब्रुतमादरात्॥ १८
विष्णुः समागतस्तूर्ण स्मृतो रुद्रेण शैवराट्।
स स्वसैन्यैः कमलया गरुडारूढ एव च॥ १९
अथ चेत्रसिते पक्षे नक्षत्रे भगदैवते।
त्रयोदश्यां दिने भानौ निर्गच्छत्स महेश्वरः॥ २०
सवे: सुरगणैः सार्थं ब्रह्मविष्णुपुरःसरेः।
तथा तेर्मुनिभिर्गच्छन् स बभौ पथि शंकरः॥ २१
मार्गे समुत्सवो जातो देवादीनां च गच्छताम्
तथा हरगणानां च सानंदमनसामति॥ २२
गजगोव्याघ्रसर्पाश्च जटा चंद्रकला तथा।
जग्मुः सर्वे भूषणत्वं यथायोरयं शिवेच्छया॥
ततः क्षणेन बलिना बलीवर्देन वेगिना।
सविष्णुप्रमुखः प्रीत्या प्राप दक्षालयं हरः॥ २४
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रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३८७
हे वृषभध्वज! दक्षने मुझसे ऐसी बात कही है,
अतः आप शुभ मुहूर्तमें उनके घर चलिये और
सतीको ले आइये॥ १३॥
ब्रह्माजी बोले--हे मनने! मेरी यह बात सुनकर
भक्तवत्सल भगवान् रुद्र लौकिक गतिका आश्रय
लेकर हँसते हुए मुझसे कहने लगे-॥ १४॥
रुद्र बोले--जगतूकी रचना करनेवाले हे ब्रह्मन्!
मैं आपके और नारदके साथ ही दक्षके घर चलूँगा,
अतः आप नारदका स्मरण करें और अपने मरीचि आदि
मानसपुत्रोंका भी स्मरण करें, हे विधे! मैं अपने गणोंसहित
उन सबके साथ दक्षके घर चलूँगा ॥ १५-१६॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] लोकाचारके
निर्वाहमें लगे हुए भगवान् शिवजीके इस प्रकार आज्ञा
देनेपर मैंने आप नारदका और मरीचि आदि पुत्रोंका
स्मरण किया ॥ १७॥
तब मेरे स्मरण करते ही आपके साथ मेरे सभी
मानसपुत्र प्रसन्न होकर आदरपूर्वक शीघ्र ही वहाँ
उपस्थित हो गये॥ १८॥
भगवान् रुद्रके स्मरण करनेपर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ
वे विष्णु भी अपने सैनिकों तथा कमला लक्ष्मीके साथ
गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत ही वहाँ आ गये॥ १९॥
तदनन्तर चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशीमें रविवारको
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रमें उन महेश्वरने [विवाहके
लिये] यात्रा की ॥ २०॥
ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं और
ऋषियोंके साथ मार्गमें चलते हुए वे शिवजी बहुत
शोभा पा रहे थे॥ २१॥
वहाँ जाते हुए देवताओं, मुनियों तथा आनन्दमग्न
मनवाले प्रमथगणोंका मार्गमें महान् उत्सव हो रहा
था॥ २२॥
शिवजीकी इच्छासे गज, वृषभ, व्याघ्र, सर्प,
जटा और चन्रकला-ये सब उनके लिये यथायोग्य.
आभूषण बन गये॥ २३॥
तदनन्तर वेगसे चलनेवाले बलीवर्द (बैल) -पर
आरूढ़ हुए महादेवजी विष्णु आदिको साथ लिये
क्षणभरमें प्रसन्ततापूर्वक दक्षके घर जा पहुँचे ॥ २४॥
ह
श्रीशिवमहापुराण [अ क
रोमांचित अ. ळे
तब हर्षके कारण रोमांचित और विनीत चित्ताने
ततो दक्षो विनीतात्मा संप्रहष्टतनूरुहः।
प्रययौ सन्मुखं तस्य संयुक्तः सकलैर्निजैः॥
सर्वे सुरगणास्तत्र स्वयं दक्षेण सत्कृताः।
पार्श्व श्रेष्ठं च मुनिभिरुपविष्टा यथाक्रमम्॥ २६
परिवार्याखिलान्देवान्गणांश्च॒मुनिभिर्यथा।
दक्षः समानयामास गृहाभ्यंतरतः शिवम्॥ २७
अथ दक्षः प्रसन्नात्मा स्वयं सर्वेश्वरं हरम्।
समानर्च॑ विधानेन दत्त्वासनमनुत्तमम्॥ २८
ततो विष्णुं च मां विद्रानसुरान्सर्वानाणांस्तथा।
पूजयामास सद्भक्त्या यथोचितविधानतः॥ २९
कृत्वा यथोचितां पूजां तेषां पूज्यादिभिस्तथा।
चकार संविदं दक्षो मुनिभिर्मानसैः पुनः॥ ३०
ततो मां पितरं प्राह दक्षः प्रीत्या हिं मत्सुतः।
प्रणिपत्य त्वया कर्म कार्य वैवाहिकं विभो॥ ३१
वाढमित्यहमप्युक्त्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
समुत्थाय ततोऽकार्ष तत्कार्यमखिलं तथा॥ ३२
ततः शुभे मुहूर्त हि लग्ने ग्रहबलान्विते।
सतीं निजसुतां दक्षो ददौ हर्षेण शंभवे॥ ३३
उद्वाहविधिना सोऽपि पाणिं जग्राह हर्षित: ।
दाक्षायण्या वरतनोस्तदानी वृषभध्वजः ॥ ३४
अहं हरिस्त्वदाद्या वै मुनयश्च सुरा गणा:।
नेमुः सर्वे संस्तुतिभिः तोषयामासुरीश्वरम्॥ ३५
समुत्सवो
र शसरः।
आनन्दं परमं जग्मुः सर्वे मुनिगणाः
सुरा: ॥ ३६
दक्ष समस्त आत्मीय जनोंके साथ [
अगवानीके लिये] उनके सामने आये॥ २५॥
दक्षने वहाँ समस्त देवताओंका सत्कार किया।
वे सब लोग सुरश्रेष्ठ शिवजीको बिठाकर उनके
पार्श्वभागमें स्वयं भी मुनियोंके साथ यथाक्रम बैठ
गये॥ २६ ॥
इसके पश्चात् दक्ष मुनियोंसहित समस्त देवताओं
तथा गणोंको साथ लेकर भगवान् शिवको घरके
भीतर ले गये॥ २७॥
उस समय दक्षने प्रसन्नचित्त होकर उत्तम
आसन देकर स्वयं ही विधिपूर्वक सर्वेश्वर शिवजीका
पूजन किया। तत्पश्चात् उन्होंने विष्णुका, मेरा,
ब्राह्मणोंका, देवताओंका और समस्त शिवगणोंका भी
यथोचित विधिसे उत्तम भक्तिभावके साथ पूजन
किया॥ २८-२९ ॥
इस तरह पूजनीय पुरुषों तथा अन्य लोगोंसहित
उनका पूजन करके दक्षने मेरे मानसपुत्र [मरीचि
आदि] मुनियोंके साथ मन्त्रणा की॥३०॥
इसके बाद मेरे पुत्र दक्षने मुझ पिताको प्रणाम
करके प्रसन्नतापूर्वक कहा-विभो! आप ही वैवाहिक
कार्य करायें॥ ३१॥
तब मैं प्रसन्न मनसे “बहुत अच्छा'-ऐसा
कहकर उठ करके वह समस्त कार्य कराने लगा॥ ३२॥
तदनन्तर दक्षने ग्रहोंके बलसे युक्त शुभ लग
और मुहूर्तमें हर्षपूर्वक शिवजीको अपनी पुत्री सती
प्रदान कर दी॥ ३३॥
उन शिवजीने भी उस समय हर्षित होकर सुन्दर
शरीरवाली दक्षपुत्रीका वैवाहिक विधिसे पाणिग्रहण
किया॥ ३४॥
उस समय मैंने, श्रीहरि विष्णुने, आपने, अ
मुनियोने, देवताओंने और प्रमथगणोंने भगवो
i प्रणाम किया और [अनेक प्रकारकी।
उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ३५॥
उस समय जाच-गानेके साथ महान्
हुआ और समस्त देवता तथा मुनिगण परम आतर
हुए॥ ३६॥
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2223 Shivmahapuranam Part I_Section_4-2-B2 अ
अ० १९]
कयां दत्त्वा कृतार्थोऽभूत्तदा दक्षो हि मत्सुतः।
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३८९
इस प्रकार मेरे पुत्र दक्ष [शिवजीको] पुत्री
प्रदान करके कृतार्थ हो गये। शिवा और शिव प्रसन्न
शिवाशिवौ प्रसन्नौ च निखिलं मङ्गलालयम्॥ ३७ | हुए तथा सब कुछ मंगलमय हो गया॥ ३७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे कन्यादानवर्णनं नामाष्यदशोऽध्यायः ॥ १८॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
कन्यादानवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥
अधैकोनविंशोऽध्यायः
शिवका सतीके साथ विवाह, विवाहके समय शम्भुकी मायासे ब्रह्माका
मोहित होना और विष्णुद्दारा शिवतत्त्वका निरूपण
ब्रह्मोवाच
कृत्वा दक्षः सुतादानं यौतकं विविधं ददौ।
हराय सुप्रसन्नश्च द्विजेभ्यो विविधं धनम्॥
अथ शंभुमुपागत्य समुत्थाय कृताञ्जलिः।
सार्ध कमलया चेदमुवाच गरुडध्वजः॥
विष्णुरुवाच
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
त्वं पिता जगतां तात सती माताखिलस्य च॥
युवां लीलावतारौ वै सतां क्षेमाय सर्वदा।
खलानां निग्रहार्थाय श्रुतिरेषा सनातनी॥
स्निग्धनीलाञ्जनश्यामशोभया शोभसे हर।
दाक्षायण्या यथा चाहं प्रतिलोमेन पदाया ॥
देवानां वा नृणां रक्षां कुरु सत्यानया सताम्।
संसारसारिणां शम्भो मङ्गलं सर्वदा तथा॥
यएनां साभिलाषो वै दष्ट्वा श्रुत्वाथवा भवेत्।
तं हन्याः सर्वभूतेश विज्ञप्तिरिति मे प्रभो॥
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचो विष्णोर्विहस्य परमेश्वरः।
एवमस्त्विति सर्वज्ञः प्रोवाच मधुसूदनम्॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार
कन्यादानकर दक्षने भगवान् शंकरको अनेक प्रकारके
उपहार दिये और ब्राह्मणोंको भी बहुत-सा धन दिया ॥ १॥
उसके बाद लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु शम्भुके
पास जाकर हाथ जोड़कर खड़े होकर यह कहने
लगे-॥२॥
विष्णु बोले-हें देवदेव! हे महादेव! हे
करुणासागर! हे प्रभो! हे तात! आप सम्पूर्ण जगतूके
पिता हैं और ये सती अखिल संसारकी माता हैं ॥ ३॥
आप दोनों सत्पुरुषोंके कल्याण तथा दुष्टोंके
दमनके लिये सदा लीलापूर्वक अवतार ग्रहण करते
हैं-यह सनातन श्रुति है॥ ४॥
हे हर! आप चिकने नीले अंजनके समान
शोभावाली सतीके साथ उसी प्रकार शोभा पा रहे हैं,
जैसे मैं उसके विपरीत लक्ष्मीके साथ शोभा पा रहा
हूँ। सती नीलवर्णा और आप गौरवर्ण हैं, उसके
विपरीत मैं नीलवर्ण और लक्ष्मी गौरवर्ण हैं॥ ५॥
हे शम्भो! आप इन सतीके साथ रहकर
देवताओंकी और सज्जन मनुष्योंकी रक्षा कीजिये,
जिससे संसारी जनोंका सदा कल्याण होता रहे॥ ६॥
हे सर्वभूतेश! हे प्रभो! इन सतीको देखकर
अथवा [इनके विषयमें] सुनकर जो कामनायुक्त हो,
उसका आप वध कीजिये, यह मेरी प्रार्थना है ॥\७॥
ब्रह्माजी बोले-भगवान् विष्णुका यह वचन
सुनकर सर्वज्ञ परमेश्वरने मधुसूदनसे हँसकर कहा--
ऐसा ही होगा ॥८॥
३९०
श्रीशिवमहापुराण
[अ० १९
स्वस्थानं हरिरागत्य स्थित आसौन्मुनीश्वर।
उत्सवं कारयामास जुगोप चरितं च तत्॥
अहं देवीं समागत्य गृह्योक्तविधिनाखिलम्।
अग्निकार्य यथोद्दिष्टमकार्ष च सुविस्तरम्॥ १०
तत: शिवा शिवश्चैव यथाविधि प्रहृष्टवत्।
अग्नेः प्रदक्षिणं चक्रे मदाचार्यद्विजाज्ञया॥ ११
तदा महोत्सवस्तत्राद्भतोऽभूद् द्विजसत्तम।
सर्वेषां सुखदं वाद्यं गीतनृत्यपुरःसरम्॥ १२
तदानीमद्भुतं तत्र चरितं समभूदति।
सुविस्मयकरं तात तच्छृणु त्वं वदामि ते॥ १३
दुर्जेया शांभवी माया तया सम्मोहितं जगत्।
सचराचरमत्यन्तं सदेवासुरमानुषम् ॥ १४
योऽहं शंभुं मोहयितुं पुरैच्छं कपटेन ह।
मां च तं शंकरस्तात मोहयामास लीलया॥ १५
इच्छेत्परापकारं यः स तस्यैव भवेद् ध्रुवम्।
इति मत्वापकारं नो कुर्यादन्यस्य पूरुषः॥ १६
प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम्।
आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने॥ १७
मदनाविष्टचेताश्च भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम्।
अहं सत्या द्विजश्रेष्ठ शिवमायाविमोहितः॥ १८
यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्षमङ्गानि कौतुकात्।
सत्या बभूव संहृष्टः कामार्तो हि तथा तथा॥ १९
अहमेवं तथा दृष्ट्वा दक्षजां च पतिव्रताम्।
स्मराविष्टमना वक्त्र द्रष्टुकामो5भवं मुने॥ २०
हे मुनीश्वर! उसके बाद विष्णु अपने
आकर स्थित हो गये। उन्होंने उत्सव कराया और
उस चरित्रकों गुप्त ही रखा॥९॥
तत्पश्चात् मैं देवी सतीके पास आकर गहासूत्र
वर्णित विधिके अनुसार सारा अग्निकार्य विधानके
साथ विस्तारपूर्वक करने लगा॥ १०॥
इसके बाद शिवा और शिवने प्रसन्न होकर मुन्न
आचार्य और द्विजोंकी आज्ञासे विधिपूर्वक अग्निकी
प्रदक्षिणा कौ॥ ११॥
हे द्विजसत्तम! उस समय वहाँ बड़ा
उत्सव मनाया गया और गीत एवं नृत्यके साथ वाद्य
बजाया गया, जो सबके लिये सुखद था॥ १२॥
हे तात! उस समय [सबको] आश्चर्यचकित
करनेवाला एक अद्भुत चरित्र वहाँ हुआ, उसे आपसे
मैं कह रहा हूँ, आप सुनिये॥ १३॥
शिवजीकी माया दुय है, उसने देव, असुर
तथा मनुष्योंसहित इस चराचर जगतूको पूर्णरूपसे
मोहित कर रखा है॥ १४॥
हे तात! पूर्वकालमें मैंने जिन शिवको कपटपूर्वक
मोहमें डालना चाहा था, उन्हीं शिवने अपनी लीलासे
मुझे मोहित कर लिया॥ १५॥
जो दूसरेका अपकार करना चाहता है, निश्चय
ही पहले उसीका अपकार हो जाता है। ऐसा
समझकर कोई भी व्यक्ति किसी दूसरेका अपकार न
करे॥ १६॥
हे मुने! जिस समय सती अग्निकी प्रदक्षिणा कर
रही थीं, उस समय उनके दोनों चरण वस्त्रसे बाहर
निकल आये थे, मैंने उन्हें देख लिया॥ १७॥
हे द्विजश्रेष्ठ! शिवजीकी मायासे मोहित हुआ
मैं कामसे व्याप्त चित्तवाला होकर सतीके दूसरे
अंगोंको देखने लगा॥ १८॥
में जैसे-जैसे सतीके अंगोंको उत्सुकतापूर्वक
देख रहा था, वैसे-वैसे प्रसन्न हो कामार्त हो रहा
था॥ १९॥
हे मुने! इस प्रकार पतित्रता दक्षपुत्रीको देखकर
कामाविष्ट मनवाला मैं उनके मुखको देखनेकी
इच्छुक हो गया॥ २०॥
अ० १९]
न शंभोर्लज्जया ववत्रं प्रत्यक्षं च विलोकितम्।
न च सा लज्जयाविष्टा करोति प्रकटं मुखम्॥ २९
ततस्तददर्शनार्थाय सदुपायं विचारयन्।
धूम्रघोरेण कामार्तोऽकार्ष तच्च ततः परम्॥ २२
आर्दरेन्धनानि भूरीणि क्षिप्त्वा तत्र विभावसौ।
स्वल्पाज्याहुतिविन्यासादारदरव्योद्भवस्तथा ॥ २३
प्रादुर्भूतस्ततो धूमो भूयांस्तत्र समन्ततः।
तादृग् येन तमोभूतं वेदीभूमिविनिर्मितम्॥ २४
ततो धूमाकुले नेत्रे महेशः परमेश्वर: ।
हस्ताभ्यां छादयामास बहुलीलाकरः प्रभुः॥ २५
ततो वस्त्रं समुत्क्षिप्य सतीवक्त्रमहं मुने।
अवेक्षं किल कामार्तः प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ २६
मुहुर्मुहुरहं तात पश्यामि स्म सतीमुखम्।
अथेन्द्रियविकारं च प्राप्तवानस्मि सोऽवशः॥ २७
मम रेतः प्रचस्कंद ततस्तद्वीक्षणाद् ब्रुतम्।
चतुर्बिन्दुमितं भूमौ तुषारचयसंनिभम्॥ २८
ततोऽहं शंकितो मोनी तत्क्षणं विस्मितो मुने।
आच्छादये स्म तद्रेतो यथा कश्चिद् बुबोध न॥ २९
अथ तद्भगवान् शंभुर्ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा।
रेतोऽवस्कन्दनात्तस्य कोपादेतदुबाच ह॥ ३०
रुद्र उवाच
किमेतद्विहितं पाप त्वया कर्म विगर्हितम्।
विवाहे मम कान्ताया चकत्रं दृष्टं नु रागतः ॥ ३१
त्वं वेत्सि शंकरेणैतत्कर्म ज्ञातं न किंचन।
त्रैलोक्येऽपि ज मेउज्ञातं गूढं तस्मात्कथं विधे॥ ३२
यत्किंचित् त्रिषु लोकेषु जङ्गमं स्थावरं तथा।
तस्याहं मध्यगो मूढ तैलं यद्रत्तिलांतिगम्॥ ३३
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा प्रियविष्णु्मा तदा विष्णुवचः स्मरत्।
इयेष हन्तुं ब्रह्माणं शूलमुद्यम्य शंकरः॥ ३४
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३९१
किंतु शिवजीके सामने लज्जाके कारण मैं
सतीका मुख नहीं देख सका और वे भी
लजासे युक्त होनेके कारण अपना मुख प्रकट नहीं
कर रही थीं॥ २१॥
तब सतीका मुख देखनेके लिये एक अत्यन्त
सुन्दर उपाय सोचते हुए कामपीडित मैंने अग्निमें
बहुत-सी गीली लकड़ी डालकर घोर धुआँ उत्पन्न
कर दिया और उस धूमयुक्त अग्निमें घृतकी थोड़ी-
थोड़ी आहुति देने लगा। तब गीली लकड़ीके संयोगसे
चारों दिशाओंमें घोर धुआँ फैल गया। इस प्रकार
धूमाधिक्य होनेके फलस्वरूप वेदीके चारों ओर
अन्धकार ही अन्धकार हो गया॥ २२-२४॥
तब अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले प्रभु
महेश्वरके नेत्र भी धूमसे व्याकुल हो उठे और उन्होंने
दोनों हाथोंसे अपने नेत्रोको बन्द कर लिया॥ २५॥
तत्पश्चात् कामसे पीड़ित मैंने प्रसन्न मनसे वस्त्र
हटाकर सतीके मुखको देख लिया॥ २६॥
हे पुत्र! मैं सतीके मुखको बार-बार देखने लगा,
इस प्रकार अवश होकर मैं इन्द्रियविकारसे युक्त
हो गया। अपनेको असंयमित देख सशंकित हो मैं
आश््चर्यसे चकित होकर मौन हो गया | भगवान् शिव
अपनी दिव्य दृष्टिसे इसे जानकर क्रोधित होकर कहने
लगे--॥ २७-३०॥
रुद्र बोले--हे पाप! आपने ऐसा कुत्सित कर्म
क्यों किया, जो कि विवाहमें रागपूर्वक मेरी स्त्रीका
मुख देखा ?॥ ३१॥
आप समझते हैं कि शंकर इस कुत्सित कर्मको
नहीं जान सकेंगे। हे विधे! इस त्रिलोकीमें कोई भी
बात मुझसे अज्ञात नहीं रह सकती, तो यह बात कैसे
छिपी रहेगी ?॥ ३२॥
हे मूढ़! जिस प्रकार तिलके सभी अवयवोंमें
तेल रहता है, उसी प्रकार तीनों लोकोंमें जो कुछ भी
स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, उनमें मैं रहता हूँ॥ ३३॥
ब्रह्माजी बोले-तत्पश्चात् विष्णुके लिये प्रिय
शंकरजीने मुझसे यह कहकर [पूर्वमे कहे गये]
विष्णुके वचनका स्मरणकर शूल लेकर मुझ ब्रह्माको
मारना चाहा॥ ३४॥
३९२
श्रीशिवमहापुराण
[अठ १९
शंभुनोद्यमिते शूले मां च हन्तुं द्विजोत्तम।
मरीचिप्रमुखास्ते वै हाहाकारं च चक्रिरे॥
ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्चाखिलास्तथा।
तुष्टुवुः शंकरं तत्र प्रज्चलन्तं भयातुराः॥ ३६
देवा ऊचुः
देवदेव महादेव शरणागतवत्सल।
ब्रह्माणं रक्ष रक्षेश कृपां कुरु महेश्वर ॥ ३७
जगत्पिता महेश त्वं जगन्माता सती मता।
हरिब्रह्मादयः सर्वे तव दासाः सुरप्रभो॥ ३८
अद्धुताकृतिलीलस्त्वं तव मायाद्भुता प्रभो।
तया विमोहितं सर्व विना त्वद्भक्तिमीश्वर॥ ३९
ब्रह्मोवाच
इत्थं बहुतरं दीना निर्जरा मुनयश्च ते।
ुष्टुवुर्देवदेवेशं क्रोधाविष्टं महेश्वरम्॥ ४०
दक्षो मेवं मैवमिति पाणिमुद्यम्य शंकितः।
वारयामास भूतेशं क्षिप्रमेत्य पुरोगतः॥ ४१
अथाग्रे सङ्गतं वीक्ष्य तदा दक्षं महेश्वर: ।
प्रत्युवाचाप्रियमिदं संस्मरग्प्रार्था॑ हरेः॥ ४२
महेश्वर उवाच
विष्णुना मेऽतिभक्तेन यदिदानीमुदीरितम्।
मयाप्यङ्गीकृतं कर्तु तदिहैव प्रजापते॥ ४३
सतीं यः साभिलाषः सन् वीक्षेत वध तं प्रभो।
इति विष्णुवचः सत्यं विधिं हत्वा करोम्यहम्॥ ४४
साभिलाषः कथं ब्रह्मा सतीं समवलोकयत्।
अभवत् त्यक्तरेतास्तु ततो हन्मि कृतागसम् ॥ ४५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तवति देवेशे महेशे क्रोधसंकुले।
चकंपिरे जनाः सर्वे सदेवमुनिमानुषाः ॥ ४६
हे द्विजोत्तम! मुझे मारनेके शंभुनोद्यमिते शूले मां च हलु द्वजो्तम। | हे दिजोततम! मुझे मारनेके लिये शिक १
त्रिशूल उठाये जानेपर [वहाँ उपस्थित] मरीचि आदि
ऋषि हाहाकार करने लगे॥ ३५॥
उस समय सभी देवता तथा मुनि भयभीत
क्रोधसे जलते हुए शिवजीकी स्तुति करने लगे॥ ३६॥
देवगण बोले--हे देवदेव! हे महादेव! हे
शरणागतवत्सल ! हे ईश! आप ब्रह्माकी रक्षा कीजिये
हे महेश्वर! कृपा कीजिये॥ ३७॥
हे महेश! आप इस संसारके पिता हैं तथा देवी
सती जगतको माता कही गयी हैं। हे सुरप्रभो! विष्णु
ब्रह्मा आदि सभी [देवगण] आपके दास हैं॥३८॥
आपको आकृति तथा लीला अद्भुत है। हे प्रभो!
आपकी माया भी अद्भुत है । हे ईश्वर ! उसने आपकी
भक्तिसे रहित सभीको मोहित कर लिया है॥ ३९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार दुःखित देवता
तथा मुनि क्रोधमें भरे हुए देवाधिदेव महादेवकी स्तुति
करने लगे॥ ४०॥
दक्ष प्रजापतिने शंकित होकर वहाँ पहुँचकर
दोनों हाथ उठाकर ऐसा मत कीजिये, ऐसा मत
कोजिये-ऐसा कहते हुए शिवजीके आगे जाकर
उन्हें ऐसा करनेसे रोका॥ ४१॥
तब शिवजी अपने आगे दक्षको आया हुआ
देखकर भगवान् विष्णुकी प्रार्थनाका स्मरण करते हुए
इस प्रकारका अप्रिय वचन कहने लगे-॥ ४२॥
महेश्वर बोले--हे प्रजापते! मेरे महान् भक्त
विष्णुने उस समय जैसा कहा था, मैंने वही करना
स्वीकार भी किया था॥ ४३॥
[विष्णुने कहा था कि] हे प्रभो! जो वासनायुक्त
होकर सतीको देखे, उसका वध कीजिये। अब मैं
ब्रह्माका वध करके विष्णुके वचनको सत्य करता
हूँ ॥ ४४॥
ब्रह्मने कामनायुक्त होकर सतीको क्यों देखा?
इन्होंने अत्यन्त गर्हित कर्म किया है, इसलिये अपराधी
ब्रह्माका वध मैं अवश्य करूँगा ॥ ४५॥
ब्रह्माजी बोले--उस समय क्रोधाविष्ट देव
महेशके ऐसा कहनेपर देवता, मुनि तथा मनुष्योंसहित
सभी लोग काँपने लगे॥ ४६॥
अ० १९]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३९३
हाहाकारो महानासीदौदासीन्यं च सर्वशः।
अभूवं विकलोऽतीव तदाहं तद्विमोहितः॥ ४७
अथ विष्णुर्महेशातिप्रियः कार्यविचक्षणः।
तमेवंवादिनं रुद्रं तुष्टाव प्रणतः सुधीः॥ ४८
स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैः शंकरं भक्तवत्सलम्।
इदमूचे वारयंस्तं क्षिप्रं भूत्वा पुरःसरः ॥ ४९
विष्णुरुवाच
विधिं न जहि भूतेश स्पष्टारं जगतां प्रभुम्।
अयं शरणगस्तेऽद्य शरणागतवत्सलः ॥ ५०
अहं तेऽतिप्रियो भक्तो भक्तराज इतीरितः।
विज्ञप्तिं हृदि मे मत्वा कृपां कुरु ममोपरि॥ ५१
अन्यच्च शृणु मे नाथ वचनं हेतुगर्भितम्।
तन्मनुष्व महेशान कृपां कृत्वा ममोपरि॥ ५२
प्रजाः स्त्रष्टुमयं शंभो प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः।
अस्मिन् हते प्रजास्त्रष्टा नास्त्यन्यः प्राकृतोऽधुना॥ ५३
सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि करिष्यामः पुनः पुन: ।
त्रयो देवा वयं नाथ शिवरूप त्वदाज्ञया॥ ५४
एतस्मिन्निहते शम्भो कस्त्वत्कर्म करिष्यति।
तस्मान्न वध्यो भवता सृष्टिकृल्लयकृद्विभो॥ ५५
अनेनैव सती कन्या दक्षस्य च शिवा विभो।
सदुपायेन वै भार्या भवदर्थे प्रकल्पिता॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य महेशस्तु विज्ञप्तिं विष्णुना कृताम्।
प्रत्युवाचाखिलांस्तांश्च श्रावयंश्च दृढव्रतः ॥ ५७
महेश उवाच
देवदेव रमेशान विष्णो मत्प्राणवल्लभ।
ज निवारय मां तात वधादस्य खलस्त्वयम्॥ ५८
चारों दिशाओंमें हाहाकार मच गया और चारों
ओर उदासी छा गयी। उनके द्वारा विमोहित किया
गया मैं उस समय अत्यन्त व्याकुल हो उठा॥ ४७॥
तब महेशके अतिप्रिय, कार्य सिद्ध करनेमें
प्रवीण तथा बुद्धिमान् भगवान् विष्णुने ऐसा कहनेवाले
उन शिवजीकी स्तुति की॥ ४८॥
अनेक प्रकारके स्तोत्रॉसे भक्तवत्सल शिवजीकी
स्तुतिकर उन्हें [ब्रह्माका वध करनेसे] रोकते हुए
आगे जाकर उन्होंने इस प्रकार कहा- ॥ ४९॥
विष्णुजी बोले-हे भूतेश! आप जगत्को
उत्पन्न करनेवाले प्रभु इन ब्रह्माका वध न करें। ये
आपकी शरणमें आये हैं और आप शरणमें आये हुए
लोगोंसे स्नेह करनेवाले हैं ॥ ५०॥
मैं आपका परम प्रिय हूँ, इसीलिये मुझे भक्तराज
कहा गया है। मेरे इस निवेदनको हृदयमें स्वीकार
करके मेरे ऊपर कृपां कीजिये॥ ५१॥
[इसके अतिरिक्त] हे नाथ! हेतुयुक्त मेरी दूसरी
प्रार्थना भी सुनिये और हे महेश्वर! मेरे ऊपर कृपा
करके उसे मानिये॥ ५२॥
हे शम्भो! ये चतुरानन ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि
करनेके लिये उत्पन्न हुए हैं। इनके मारे जानेपर
प्रजाकी सृष्टि करनेवाला कोई दूसरा नहीं है ॥ ५३॥
हे नाथ! हे शिवस्वरूप! आपकी आज्ञासे ही
हम तीनों देवता सृष्टि, स्थिति और संहारका कार्य
बार-बार करेंगे॥ ५४॥
हे शम्भो! उनका वध कर देनेपर आपका कार्य
कौन सम्पन्न करेगा? इसलिये हे लयकर्ता विभो!
आप इन सृष्टिकर्ताका वध न करें॥ ५५॥
हे विभो! इन्होंने ही आपकी भार्या होनेके लिये
शिवाको दक्षकन्या सतीके रूपमें सत्प्रयलसे अवतरित
किया है॥५६॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद्!] विष्णुके द्वारा
की गयी इस प्रार्थनाको सुनकर दृढव्रत शंकरजी
[वहाँ उपस्थित] सभी लोगोंको सुनाते हुए [भगवान्
विष्णुसे] इस प्रकार कहने लगे--॥ ५७॥
महेश बोले-हे देवदेव! हे रमेश! हे विष्णो!
हे मेरे प्राणप्रिय! हे तात! मुझको इसका वध करनेसे
मत रोकिये; क्योकि यह दुष्ट है ॥ ५८॥
३९४
्रीशिवमहापुराण
[अ० १९
पूरयिष्यामि विज्ञप्ति पूर्वान्तिऽङ्गीकृतां मया ।
महापापकरं दुष्टं हन्म्येनं चतुराननम्॥
अहमेव प्रजाः स््रक्ष्ये सर्वाः स्थिरचरा अपि।
अन्यं स्त्रक्ष्ये सृष्टिकरमथवाहं स्वतेजसा॥ ६०
हत्वैनं विधिमेवाहं स्वपणं पूरयन् कृतम्।
स्त्रष्टारमेकं स्रक्ष्यामि न निवारय मेश माम्॥ ६१
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा गिरीशस्याह चाच्युतः ।
स्मितप्रभिन्नहदयः पुनमैंवमितीरयन्॥ ६२
अच्युत उवाच
परतिज्ञापूरणं योग्यं परस्मिन्युरुषेऽस्ति वै।
विचारयस्व वध्येश भवत्यात्मनि न प्रभो॥ ६३
त्रयो देवा वयं शंभो त्वदात्मानः परा नहि।
एकरूपा न भिन्नाश्च तत्त्वतः सुविचारय॥ ६४
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णोः स्वातिप्रियस्य स: ।
शंभुरूचे पुनस्तं वै ख्यापयन्नात्मनो गतिम्॥ ६५
शम्भुरुवाच
हे विष्णो सर्वभक्तेश कथमात्मा विधिर्मम।
लक्ष्यते भिन्न एवायं प्त्यक्षेणाग्रतः स्थित: ॥ ६६
ब्रह्मोवाच
इत्याजञप्तो महेशेन सर्वेषां पुरतस्तदा।
इदमूचे महादेवं तोषयन् गरुडध्वजः ॥ ६७
विष्णुरुवाच
ज ब्रह्मा भवतो भिन्नो न त्वं तस्मात्सदाशिव।
न वाहं भवतो भिन्नो न मत् त्वं परमेश्वर॥ ६८
सर्व जानासि सर्वज्ञ परमेश सदाशिव।
संश्रावयितुमिच्छसि॥ ६९
आपकी पूर्व प्रार्थनाको, जिसे मैंने
किया था, उसे पूर्ण करूँगा। इस महापापी तथा
चतुर्मुख ब्रह्माका वध मैं [अवश्य] करूँगा॥ ५९॥
मैं स्वयं ही सभी चराचर प्रजाओंकी सृष्टि
करूँगा। अथवा अपने तेजसे किसी दूसरे सृष्टिकर्ताको
उत्पन्न करूँगा। मैं अपनी की गयी प्रतिज्ञाको पूरा
करते हुए इस ब्रह्माका वध करके अन्य
उत्पन्न करूँगा, अतः हे लक्ष्मीपते! [इसका वध
करनेसे] मुझे मत रोकिये॥ ६०-६१॥
ब्रह्माजी बोले-शिवजीका यह वचन सुनकर
मन्द-मन्द मुसकराते हुए "ऐसा मत कीजिये!
इस प्रकार बोलते हुए भगवान् विष्णु पुन: कहने
लगे-॥६२॥
अच्युत बोले--हे प्रभो! प्रतिज्ञाकी पूर्ति तो
दूसरे पुरुषमें की जाती है। हे विनाशके ईश! आप
स्वयं विचार करें वह अपने ऊपर नहीं की जाती ॥ ६३॥
हे शम्भो! हम तीनों देवता आपकी ही आत्मा
हैं, दूसरे नहीं। हमलोग एकरूप हैं, भिन्न नहीं हैं, इस
बातको आप यथार्थ रूपसे विचार कीजिये॥ ६४॥
तब अपने अत्यन्त प्रिय विष्णुका वह वचन
सुनकर शिवजी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए उनसे
कहने लगे-- ॥ ६५॥
शम्भु बोले--हे विष्णो! हे सम्पूर्ण भक्तोंके
ईश! ब्रह्मा किस प्रकार मेरी आत्मा हो सकते हैं;
क्योंकि ये तो प्रत्यक्ष रूपसे आगे बैठे हुए मुझसे भिन
दिखायी दे रहे हैं ?॥ ६६॥
ब्रह्माजी बोले--जब सबके आगे महेश्वरे
ऐसा कहा, तब उन महादेवको सन्तुष्ट करते हुए
विष्णु कहने लगे ॥ ६७॥
विष्णु बोले-हे सदाशिव! न ब्रह्मा आपसे
भिन्न हैं और न तो आप ही उनसे भिन हैं। हे
परमेश्वर! न मैं ही आपसे भिन्न हूँ और न तो आप
ही मुझसे भिन्न हैं॥ ६८॥
हे सर्वज्ञ! हे परमेश! हे सदाशिव! आप संब
कुछ जानते हैं, किंतु आप मेरे मुखसे सारी बात सभी
लोगोंको सुनवाना चाहते हैं॥ ६९॥
आ० २०]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३९५
त्वदाज्ञया बदामीश शृण्वंतु निखिलाः सुरा: ।
मुनयश्चापरे शैवं तत्त्वं संधार्यं स्वं मन: ॥ ७०
प्रधानस्याप्रधानस्य भागाभागस्य रूपिणः ।
ज्योतिर्मयस्य भागास्ते वयं देवाः प्रभोस्त्रयः ॥ ७१
कस्त्वं कोऽहं च को ब्रह्मा तवैव परमात्मनः।
अंशत्रयमिदं भिन्नं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम्॥ ७२
चिन्तयस्वात्मनात्मानं स्वलीलाधृतविग्रहः।
एकस्त्वं ब्रह्म सगुणो ह्यंशभूता वयं त्रय: ॥ ७३
शिरोग्रीवादिभेदेन यथैकस्यैव वर्ष्मणः।
अङ्गानि ते तथेशस्य तस्य भागत्रयं हर॥ ७४
यज्ज्योतिरभ्रं स्वपुरं पुराणं
कूटस्थमव्यक्तमनन्तरूपम् ।
नित्यं च दीर्घादिविशेषणाद्यै-
हीनं शिवस्त्वं तत एव सर्वम्॥ ७५
ब्रह्मोवाच
एतच्छुत्वा वचस्तस्य महादेवो मुनीश्वर।
बभूव सुप्रसन्नश्च न जघान स मां ततः॥ ७६
हे ईश! मैं आपकी आज्ञासे शिवतत्त्वका वर्णन
कर रहा हुँ, समस्त देवता, मुनिगण तथा अन्य लोग
अपने मनको एकाग्र करके सुनें ॥ ७०॥
हम तीनों देवता प्रधान-अप्रधान तथा भाग-
अभागरूपवाले और ज्योतिर्मयस्वरूप आप परमेश्वरके
ही अंश हैं ॥७१॥
आप कौन हैं, मैं कौन हूँ और ब्रह्मा कौन
हैं । आप परमात्माके ही ये तीन अंश हैं, जो सृष्टि,
पालन और संहार करनेके कारण एक-दूसरेसे भिन्न
प्रतीत होते हैं॥ ७२॥
आप स्वयं अपने स्वरूपका चिन्तन कीजिये।
आपने अपनी लीलासे ही शरीर धारण किया है। आप
एक, सगुण ब्रह्म हैं और हम [ब्रह्मा, विष्णु तथा
रुद्र ]तीनों आपके अंश हैं ॥७३॥
हे हर! जैसे मस्तक, ग्रीवा आदिके भेदसे एक
ही शरीरके [भिन्न-भिन्न] अवयव होते हैं, उसी
प्रकार हम तीनों उन्हीं आप परमेश्वरके अंग हैं ॥ ७४॥
जो ज्योतिर्मय, आकाशस्वरूप, स्वयं ही अपना
धाम, पुराण, कूटस्थ, अव्यक्त, अनन्तरूपवाला, नित्य
तथा दीर्घ आदि विशेषणोंसे रहित ब्रह्म हैं, वह आप
शिव ही हैं | आपसे ही सब कुछ प्रकट हुआ है ॥ ७५॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! तत्पश्चात् उनको
यह बात सुनकर महादेवजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये
और उन्होंने मेरा वध नहीँ किया॥७६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रब्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
सतीविवाहशिवलीलावर्णतं नामैकोनविशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहाषुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीविवाह और
शिवलीलावर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
ब्रह्माजीका ` रुद्रशिर' नाम पड़नेका कारण, सती एवं शिवका विवाहोत्सव, विवाहके
अनन्तर शिव और सतीका वृषभारूढ़ हो कैलासके लिये प्रस्थान
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! हे विधे!
हे महाभाग! हे शिवभक्त! हे श्रेष्ठ प्रभो! हे विधे!
ब्रह्मन् विधे महाभाग शिवभक्त वरप्रभो। | आपने भगवान् शिवके परम मंगलदायक तथा अद्भुत
श्रावितं चरितं शंभोरद्भुतं मङ्गलायनम्॥ ९ चरित्रको सुनाया॥ १॥
नारद उवाच
३९६
ततः किमभवत्तात कथ्यतां शशिमौलिन:।
सत्याश्च चरितं दिव्यं सर्वाघोघविनाशनम्॥
ब्रह्मोवाच
निवृत्ते शंकरे चास्मद्वधाद्भक्तानुकम्पिनि।
अभवन्निर्भयाः सर्वे सुखिनः सुप्रसन्नकाः॥ ३
नतस्कंधाः साञ्जलयः प्रणेमुर्निखिलाश्च ते।
तुष्टुवुः शंकरं भक्त्या चक्रुर्जयरवं मुदा॥ ४
एतस्मिन्नेव कालेऽहं प्रसन्नो निर्भयो मुने।
अस्तवं शंकरं भक्त्या विविधैश्च शुभस्तवैः॥ ५
ततस्तुष्टमनाः शंभुर्बहुलीलाकरः प्रभुः।
मुने मां समुवाचेदं सवेषां शृण्वतां तदा ॥ ६
रुद्र उवाच
ब्रह्मन् तात प्रसन्नोऽहं निर्भयस्त्वं भवाधुना।
स्वशीर्ष स्पृश हस्तेन मदाज्ञां कुर्वसंशयम्॥ ७
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्बहुलीलाकृतः प्रभोः।
स्पृशन् स्वं कं तथा भूत्वा प्राणमं वृषभध्वजम्॥ ८
यावदेवमहं स्वं क॑ स्पृशामि निजपाणिना।
तावत्तत्र स्थितं सच्यस्तद्रपवृषवाहनम्॥ ९
ततो लज्जापरीताङ्गः स्थितश्चाहमधोमुखः।
इन्दाद्येरमरै: सर्वे: सुदृष्टः सर्वतः स्थितैः ॥ १०
अथाहं लज्जयाविष्टः प्रणिपत्य महेश्वरम्।
प्रावोचं संस्तुतिं कृत्वा क्षम्यतां क्षम्यतामिति॥ ११
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थ प्रायश्चित्तं वद प्रभो।
निग्रहं च तथा ज्यायं येन पापं प्रयातु मे॥ १२
इत्युक्तस्तु मया शंभुरुवाच प्रणतं हि माम्।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा सर्वेशो भक्तवत्सलः ॥ १३
श्रीशिवमहापुराण
[अ २०
हे तात! उसके बाद क्या हुआ,
सिरपर धारण करनेवाले शिवजी एवं सतीके
तथा सम्पूर्ण पापराशिका नाश करनेवाले चरित्रका
वर्णन कीजिये॥ २॥
ब्रह्माजी बोले--भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले
शिवजी जब मेरा वध करनेसे विरत हो गये, तब सभी
लोग निर्भय, सुखी और प्रसन्न हो गये॥३॥
सभी लोगोंने हाथ जोड़कर नतमस्तक हो
शंकरजीको प्रणाम किया, भक्तिपूर्वक स्तुति की और
प्रसन्नतापूर्वक जय-जयकार किया॥ ४॥
हे मुने! उसी समय मैंने प्रसन्न तथा निर्भय
होकर अनेक प्रकारके उत्तम स्तोत्रोंद्रार शंकरकी
स्तुति को॥ ५॥
हे मुने! तत्पश्चात् अनेक प्रकारकी लीला
करनेवाले भगवान् शिव प्रसन्नचित्त होकर सभीको
सुनाते हुए मुझसे इस प्रकार कहने “लगे--॥ ६॥
रुद्र बोले-हे ब्रह्मन्! हे तात! मैं प्रसन्न हूँ।
अब आप निर्भय हो जाइये। आप अपने हाथसे
सिरका स्पर्श करें और संशयरहित होकर मेरी
आज्ञाका पालन करें॥ ७॥
ब्रह्माजी बोले-अनेक लीलाएँ करनेवाले भगवान्
शिवजीकी इस बातको सुनकर मैंने अपने सिरका
स्पर्श करते हुए उन वृषध्वजको प्रणाम किया॥८॥
मैने जैसे ही अपने हाथसे अपने सिका स्पर्श
किया, उसी क्षण वहाँ उसीके रूपमें वृषवाहन स्थित
दिखायी पड़े। तब लज्जायुक्त शरीरवाला मैं नीचेकी
ओर मुख करके खड़ा रहा। उस समय वहाँ स्थित
इन्द्र आदि देवताओंने मुझे देखा॥ ९-१०॥
उसके पश्चात् लजासे युक्त होकर मैं शिवजीको
प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति करके क्षमा कीजिये:
क्षमा कौजिये-ऐसा कहने लगा॥ ११॥
हे प्रभो! इस पापकी शुद्धिके लिये कोई
प्रायश्चित्त और उचित दण्ड कीजिये, जिससे मेरा पाप
दूर हो जाय॥ १२॥
इस प्रकार मेरे कहनेपर भक्तवत्सल सर्वेश
शम्भु अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझ विनम्र ब्रह्मासे कहै
लगे॥ १३॥
अ० २०]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३९७
शंभुरुवाच
अनेनैव स्वरूपेण मदधिष्ठितकेन हि।
तपः कुरु प्रसन्नात्मा मदाराधनतत्परः॥ १४
ख्यातिं यास्यसि सर्वत्र नाम्ना रुद्रशिरः क्षितो।
साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजां द्विजन्मनाम्॥ १५
मनुष्याणामिदं कृत्यं यस्माद्वीर्य त्वयाधुना।
तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले॥ १६
स्त्वां चानेन रूपेण दृष्ट्वा को विचरिष्यति।
किमेतद् ब्रह्मणो मूर्घ्नि वदन्निति पुरान्तकः॥ १७
ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्छ्रोष्यतीति य: ।
परदारकृतात्त्यागान्मुक्तिं सद्यः स यास्यति॥ १८
यथा यथा जनश्नैतत्कृत्यं ते कीर्तयिष्यति।
तथा तथा विशुद्धिस्ते पापस्यास्य भविष्यति॥ १९
एतदेव हि ते ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं मयेरितम्।
जनहास्यकरं लोके तव गर्हाकरं परम्॥ २०
एतच्च तव वीर्य हि पतितं वेदिमध्यगम्।
कामार्तस्य मया दृष्टं नैतद्धार्य भविष्यति॥ २१
चतुर्बिन्दुमितं रेत: पतितं यत्क्षितौ तव।
तन्मितास्तोयदा व्योम्नि भवेयुः प्रलयंकरा: ॥ २२
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवर्षीणां पुरो द्रुतम्
तद्रेतसः समभवंस्तन्मिताशच बलाहकाः॥ २३
संवर्तकस्तथावर्त: पुष्करो द्रोण एव च।
एते चतुर्विधास्तात महामेघा लयंकराः॥ २४
गर्जन्तश्चाथ मुञ्जन्तस्तोयानीषच्छिवेच्छया
फेलुव्यांम्नि मुनिश्रेष्ठ तोयदास्ते कदारवा:॥ २५
तैस्तु संछादिते व्योम्नि सुगर्जद्भश्च शंकरः।
प्रशान् दाक्षायणी देवी भृशं शांतोऽभवद््रुतम्॥
अथ चाहं वीतभयः शंकरस्याज्ञया तदा।
शेषं वैवाहिकं कर्म समाप्तिमनयं मुने॥ २७
शम्भु बोले--[हे ब्रह्मन्!] मुझसे अधिष्ठित
इसी रूपसे आप प्रसन्नचित्त होकर आराधनामें संलग्न
रहते हुए तप करें॥ १४॥
इसीसे पृथ्वीपर सर्वत्र ' रुद्रशिर' नामसे आपको
प्रसिद्धि होगी और आप तेजस्वी ब्राह्मणोंके सभी
कार्योंको सिद्ध करनेवाले होंगे। आपने [कामके
वशीभूत होकर] जो वीर्यपात किया है, वह कृत्य
मनुष्योंका है, इसलिये आप मनुष्य होकर पृथ्वीपर
विचरण करें॥ १५-१६॥
जो तुम्हें इस रूपसे देखकर यह क्या! ब्रह्माके
सिरपर शिवजी कैसे हो गये--ऐसा कहता हुआ पृथ्वीपर
विचरण करेगा और फिर जो कौतुकवश आपके
सम्पूर्ण कृत्यको सुनेगा, वह परायी स्त्रीके निमित्त किये
गये त्यागसे शीघ्र ही मुक्त हो जायगा॥ १७-१८॥
लोग जैसे-जैसे आपके इस कुकृत्यका वर्णन
करेंगे, वैसे-वैसे आपके इस पापकी शुद्धि होती
जायगी॥ १९॥
हे ब्रह्मन्! संसारमें मनुष्योंके द्वारा आपका
उपहास करानेवाला तथा आपकी निन्दा करानेवाला
यह प्रायश्चित्त मैने आपसे कह दिया॥ २०॥
कामपीडित आपका जो तेज वेदीके मध्यमें गिरा
तथा जिसे मैंने देख लिया, वह किसीके भी धारण
करनेयोग्य नहीं होगा॥ २१॥
तुम्हारा जो तेज पृथ्वीपर गिरा, उससे आकाशमें
प्रलयंकर मेघ होंगे। उसी समय वहाँ देवर्षियोंके
सामने शीघ्र ही उस तेजसे हे तात! संवर्त, आवर्त,
पुष्कर तथा द्रोण-नामक ये चार प्रकारके प्रलयंकारी
महामेघ हो गये॥ २२-२४॥
हे मुनिश्रेष्ठ! ये मेघ शिवकी इच्छासे गरजते
हुए, जलकी थोड़ी-सी वर्षा करते हुए तथा भयानक
शब्द करते हुए आकाशमें फैल गये॥ २५॥
उस समय घोर गर्जन करते हुए उन मेघोंके
द्वारा आकाशके आच्छादित हो जानेपर शीघ्र ही
शंकरजी और सती देवी शान्त हो गये। हे मुने!
उसके बाद मैं निर्भय हो गया और शिवजीकी
आज्ञासे मैंने विवाहके शेष कृत्योंको यथाविधि पूर्ण
किया॥ २६-२७॥
३९८
पपात पुष्पवृष्टिश्च शिवाशिवशिरस्कयोः।
सर्वत्र च मुनिश्रेष्ठ मुदा देवगणोज्झिता॥
वाद्यमानेषु वाद्येषु गायमानेषु तेषु च।
पठत्सु विप्रवर्गेषु वेदान् भक्त्यान्वितेषु च॥ २९
रंभादिषु पुरंश्रीषु नृत्यमानासु सादरम्।
महोत्सवो महानासीद्देवपत्नीषु नारद॥ ३०
अथ कर्मवितानेशः प्रसन्नः परमेश्वर: ।
प्राह मां प्राञ्जलिं प्रीत्या लौकिकीं गतिमाश्रित: ॥ ३९
ईश्वर उवाच
हे ब्रह्मन् सुकृतं कर्म सर्व वैवाहिकं च यत्।
प्रसन्नोऽस्मि त्वमाचायों दद्यां ते दक्षिणां च काम्॥ ३२
याचस्व तां सुरज्येष्ठ यद्यपि स्यात्सुदुर्लभा।
ब्रूहि शीघ्रं महाभाग नादेयं विद्यते मम॥ ३३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचः सोऽहं शंकरस्य कृताञ्जलिः ।
मुनेऽवोचं विनीतात्मा प्रणम्येशं मुहु्मुहुः॥ ३४
यदि प्रसन्नो देवेश वरयोग्यो5स्म्यहं यदि।
तत्कुरु त्वं महेशान सुप्रीत्या यद्वदाम्यहम्॥ ३५
अनेनेव तु रूपेण वेद्यामस्यां महेश्वर।
त्वया स्थेयं सदैवात्र नृणां पापविशुद्धये॥ ३६
येनास्य संनिधौ कृत्वा स्वाश्रमं शशिशेखर।
तप: कुर्या विनाशाय स्वपापस्यास्य शंकर॥ ३७
चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां नक्षत्रे भगदैवते।
सूर्यवारे च यो भक्त्या वीक्षेत भुवि मानव: ॥ ३८
तदैव तस्य पापानि प्रयान्तु हर संक्षयम्।
वर्धते विपुलं पुण्यं रोगा नश्यन्तु सर्वशः॥ ३९
या नारी दुर्भगा वंध्या काणा रूपविवर्जिता।
सापि त्वद्दर्शनादेव निर्दोषा संभवेद् श्रुवम्॥ ४०
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० Fi
हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय देवताओंने
होकर शिवाशिवके मस्तकपर चारों ओरसे पुष्पोंकी
वर्षा की॥ २८ ॥
उस समय बाजे बजने लगे, गीत गाये जाने लगे।
ब्राह्मणणण भक्तिसे परिपूर्ण हो वेदपाठ करने लगे॥ २९॥
रम्भा आदि अप्सराएँ प्रेमपूर्वक नृत्य करने
लगीं--इस प्रकार हे नारद! देवताओंकी स्त्रियोंके
बीच महान् उत्सव हुआ॥ ३०॥
तदनन्तर यज्ञकर्मका फल देनेवाले भगवान् परमेश्वर
शिव प्रसन्न होकर लौकिक गतिका आश्रय ले हाथ
जोड़कर प्रेमपूर्वक मुझ ब्रह्मासे कहने लगे-- ॥ ३१॥
ईश्वर बोले-हे ब्रह्मन्! जो भी वैवाहिक
कार्य था, उसे आपने उत्तम रीतिसे सम्पन्न किया है,
अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ आप [इस वैवाहिक कृत्यके]
आचार्य हैं, मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ ?॥ ३२॥
हे सुरश्रेष्ठ! आप उसे माँगिये। वह दुर्लभ ही
क्यों न हो, उसको शीघ्र कहिये। हे महाभाग! आपके
लिये मेरे द्वारा कुछ भी अदेयं नहीं है॥ ३३॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! शंकरका यह वचन
सुनकर मैंने हाथ जोड़कर विनीत भावसे उन्हें बार-
बार प्रणामकर कहा- ॥ ३४॥
हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मैं वर
पराप्त करनेयोग्य हूँ, तो हे महेशान! जो मैं कह रहा
हूँ, उसे आप अत्यन्त प्रसन्नताके साथ कीजिये ॥ ३५॥
हे महेश्वर ! आप मनुष्योंके पापकी शुद्धिके लिये
इसी रूपमें इस वेदीपर सदा विराजमान रहिये॥ ३६॥
हे चद्रशेखर! हे शंकर! जिससे आपके सातिध्यमें
अपना आश्रम बनाकर अपने इस पापकी शुद्धिके
लिये मैं तपस्या करूं ॥ ३७॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें रविवारके दिन इस भूतलपर
जो मनुष्य आपका भक्तिपूर्वक दर्शन करेगा, हे हर!
उसके सारे पाप नष्ट हो जाये, विपुल पुण्यकी
हो और उसके समस्त रोगोंका सर्वथा नाश हो जाय!
जो स्त्री दुर्भगा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीन हो,
वह भी आपके दर्शनमात्रसे निश्चित रूपसे
हो जाय॥ ३८--४०॥
अ० २०]
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य बच्चो मे हि स्वात्मसर्वसुखावहम्।
तथास्त्विति शिवः प्राह सुप्रसन्नेन चेतसा॥ ४१
शिव उवाच
हिताय सर्वलोकस्य वेद्यां तस्यां व्यवस्थितः ।
स्थास्यामि सहितः पत्न्या सत्या त्वद्ठचनाद्विधे ॥ ४२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा भगवांस्तत्र सभार्यो वृषभध्वजः।
उवाच वेदिमध्यस्थो मूर्ति कृत्वांशरूपिणीम्॥ ४३
ततो दक्षं समामंत्र्य शंकरः परमेश्वर: ।
पत्या सत्या गन्तुमना अभूत्स्वजनवत्सलः॥ ४४
एतस्मिन्नन्तरे दक्षो विनयावनतः सुधीः।
साञ्जलिर्नतकः प्रीत्या तुष्टाव वृषभध्वजम् ॥ ४५
विष्णवादयः सुराः सर्वे मुनयश्च गणास्तदा।
नत्वा संस्तूय विविधं चक्रुर्जयरवं मुदा॥ ४६
आरोप्य वृषभे शंभुः सतीं दक्षाज्ञया मुदा।
जगाम हिमवत्प्रस्थं वृषभस्थः स्वयं प्रभुः॥ ४७
अथ सा शंकराभ्याशे सुदती चारुहासिनी।
विरेजे वृषभस्था वै चन्द्रान्ते कालिका यथा॥ ४८
विष्णवादयः सुराः सर्वे मरीच्याद्यास्तथर्षयः।
दक्षोऽपि मोहितश्चासीत्तथान्ये निश्चला जनाः ॥ ४९
केचिद्ाद्यान्वादयन्तो गायन्तः सुस्वरं परे।
शिबं शिवयशः शुद्धमनुजग्मुः शिवं मुदा॥ ५०
मध्यमार्गाद्विसृष्टो हि दक्षः प्रीत्याथ शम्भुना।
स्वधाम प्राप सगणः शम्भुः प्रेमसमाकुलः॥ ५१
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
३९९
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार अपने तथा सम्पूर्ण
लोगोंको सुख देनेवाले मुझ ब्रह्माका वचन सुनकर
मनसे भगवान् शंकरने “तथास्तु' कहा ॥ ४१॥
शिवजी बोले-हे ब्रह्मन्! आपके कथनानुसार
मैं सारे संसारके हितके लिये अपनी पत्नीसहित इस
वेदीपर सुस्थिरभावसे स्थित रहूँगा ॥ ४२॥
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर पत्नीसहित
भगवान् शिवजी अपनी अंशरूपिणी मूर्तिको प्रकटकर
वेदीके मध्यभागमें विराजमान हो गये। तत्पश्चात्
स्वजनोंपर स्नेह रखनेवाले भगवान् सदाशिव दक्षसे
विदा ले अपनी पली सतीके साथ [कैलास] जानेको
उद्यत हुए॥ ४३-४४॥
उस समय उत्तम बुद्धिवाले दक्षने विनयभावसे
मस्तक झुकाकर हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजकी
प्रेम-पूर्वक स्तुति की। तत्पश्चात् विष्णु आदि
समस्त देवताओं, मुनियों तथा गणोंने स्तुति और
नमस्कारकर प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारसे जय-
जयकार किया ॥ ४५-४६॥
उसके बाद दक्षकी आज्ञा प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक
सदाशिवने अपनी पत्नी सतीको वृषभपर बिठाकर
और स्वयं भी वृषभपर आरूढ़ हो हिमालयकें
शिखरकी ओर गमन किया॥ ४७॥
मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाली तथा सुन्दर
दाँतोंवाली सती शंकरजीके साथ वृषभपर बैठी हुई
चन्द्रमामें विद्यमान श्यामकान्तिकी तरह शोभायमान
हो रही थीं॥ ४८॥
उस समय विष्णु आदि सम्पूर्ण देवता, मरीचि
आदि समस्त ऋषि एवं दक्ष प्रजापति भी मोहित हो
गये तथा अन्य सभी लोग चित्रलिखित-से प्रतीत हो
रहे थे॥४९॥
कुछ लोग बाजे बजाते हुए तथा कुछ लोग
सुन्दर स्वरमें शुद्ध तथा कल्याणकारी शिवयशका
गान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक शिवजीका अनुगमन
करने लगे॥५०॥
[कुछ दूर चले जानेके पश्चात्] शिवजीने आधे
मार्गसे दक्षको प्रेमपूर्वक लौटा दिया, फिर सदाशिव गणों-
सहित प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले आये ॥ ५१॥
४००
विसृष्टा अपि विष्णवाद्या: शम्भुना पुनरेव ते।
अनुजग्मुः शिवं भक्त्या सुराः परमया मुदा ॥ ५
तैः सवैः सगणैः शंभुः सत्या च स्वस्त्रया युत: ।
प्राप स्वं धाम संहृष्टो हिमवद् गिरिशोभितम्॥ ५३
तत्र गत्वाखिलान्देवान्मुनीनपि परांस्तथा।
मुदा विसर्जयामास बहु सम्मान्य सादरम्॥ ५४
शंभुमाभाष्य ते सर्वे विष्णवाद्या मुदिताननाः।
स्व॑ स्वं धाम ययुर्नत्वा स्तुत्वा च मुनयः सुरा: ॥ ५५
शिवोऽपि मुदितोऽत्यर्थं स्वपत्या दक्षकन्यया।
हिमवत्प्रस्थसंस्थो हि विजहार भवानुगः॥ ५६
ततः स शंकरः सत्या सगणः सूतिकृन्मुने।
प्राप स्वं धाम संहृष्टः कैलासं पर्वतोत्तमम्॥ ५७
एतद् वः सर्वमाख्यातं यथा तस्य पुराभवत्।
विवाहो वृषयानस्य मनुस्वायंभुवान्तरे॥ ५८
विवाहसमये अज्ञे प्रारंभे वा श्रृणोति यः।
एतदाख्यानमव्यग्रः संपूज्य वृषभध्वजम्॥ ५९
तस्याविष्नं भवेत्सर्वं कर्म वैवाहिकं च यत्।
शुभाख्यमपरं कर्म निर्विभ्नं सर्वदा भवेत्॥ ६०
श्रीशिवमहापुराण [अण २७
5->-ऋछूऋछ- _ जरी काक
शिवजीने विष्णु आदि सभी देवताओंको विदा
भी कर दिया, फिर भी वे लोग परम भक्ति एवं प्रेमके
वशीभूत हो शिवजीके साथ-साथ कैलासपर पहुँच
गये॥ ५२॥
उन सभी देवताओं, गणों तथा अपनी स्त्र
सतीके साथ भगवान् शम्भु प्रसन्न होकर हिमालय
पर्वतपर सुशोभित अपने धाममें पहुँच गये॥ ५३॥
वहाँ जाकर सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों तथा
अन्य लोगोंका आदरपूर्वक बहुत सम्मान करके
प्रसन्नतापूर्वक शिवजीने उन्हें विदा किया॥ ५४॥
तदनन्तर शम्भुकी आज्ञासे विष्णु आदि सब
देवता तथा मुनिगण नमस्कार और स्तुति करके
प्रसनमुख होकर अपने-अपने धामको चले गये॥ ५५॥
लोकरीतिका अनुगमन करनेवाले शिवजी भी
अत्यन्त आनन्दित हो हिमालयके शिखरपर अपनी
पत्नी दक्षकन्याके साथ विहार करने लगे॥ ५६॥
हे मुने! इस प्रकार सृष्टि करनेवाले वे शंकर
सती तथा अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक पर्वतोंमें
उत्तम अपने स्थान कैलासपर चले गये॥ ५७॥
हे मुने! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान्
शिवजीका विवाह जिस प्रकार हुआ, उसका वर्णन
मैंने आपलोगोंसे किया॥ ५८॥
हे मुने! जो विवाहकालमें, यज्ञमें अथवा किसी
भी शुभकार्यके आरम्भमें भगवान् शंकरकी पूजा
करके शान्तचित्त होकर इस कथाको सुनता है,
उसका सारा वैवाहिक कर्म बिना किसी विघ्त-बाधाकें
पूर्ण हो जाता है तथा दूसरे शुभ कर्म भी सदा तिर्वि
पूर्ण होते हैं॥ ५९-६०॥
इस उत्तम कथाको प्रेमपूर्वक सुनकर कन्या
कन्या च सुखसौभाग्यशीलाचारगुणान्विता। | सुख, सौभाग्य, सुशीलता, आचार तथा गुणोंसे युक्त
साध्वी स्यात्पुत्रिणी प्रीत्या श्रुत्वाख्यानमिदं शुभम्॥ ६१ | हो पतित्रता तथा पुत्रवती होती है॥ ६१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्द्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
सतीविवाहवर्णतं नाम विंशो5 ध्याय: ॥ २०॥
॥ स प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
—— eee
अ० २९]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०१
अथैकविंशोऽध्यायः
कैलास पर्वतपर भगवान् शिव एवं सतीकी मधुर लीलाएँ
नारद उवाच
समीचीनं वचस्तात सर्वज्ञस्य तवानघ।
महाद्धुतं श्रुतं नो वै चरितं शिवयोः शुभम्॥ १
विवाहश्च श्रुतः सम्यक् सर्वमोहापहारकः।
परमज्ञानसंपन्नो मङ्कलालय उत्तमः॥ २
भूय एव विवित्सा मे चरितं शिवयोः शुभम्
तद्वर्णय महाप्राज्ञ कृपां कृत्वातुलामरम्॥ ३
ब्रह्मोवाच
सम्यक्कारुणिकस्यैव मुने ते विचिकित्सितम्।
यदहं नोदितः सौम्य शिवलीलानुवर्णने॥ ४
विवाह्य दक्षजां देवीं सतीं त्रैलोक्यमातरम्।
गत्वा स्वधाम सुप्रीत्या यदकार्षीन्निबोध मे॥ ५
ततो हरः स सगणः स्वस्थानं प्राप्य मोदनम्।
देवर्षे तत्र वृषभादवातरदतिप्रियात्॥ ६
यथायोग्यं निजस्थानं प्रविश्य स सतीसखः।
मुमुदेऽतीव देवर्षे भवाचारकरः शिवः॥ ७
ततो विरूपाक्ष इमां प्राप्य दाक्षायणी गणान्।
स्वीयान्निर्यापयामास नंद्यादीन् गिरिकंदरात्॥ ८
उवाच चेतांस्तान् सर्वाननंद्यादीनतिसूनृतम्।
लौकिकीं रीतिमाश्रित्य करुणासागरः प्रभुः ९
महेश उवाच
यदाहं च स्मराम्यत्र स्मरणादरमानसाः।
समागमिष्यथ तदा मत्पाश्व मे गणा द्रुतम्॥ १०
नारदजी बोले-हे तात! हे अनघ! आप
सर्वज्ञकी बात ठीक है। आपके द्वारा मैंने शिवाशिवके
अत्यन्त अद्भुत एवं कल्याणकारी चरित्रको सुना ॥ १॥
समस्त मोहोंको दूर करनेवाले, परम ज्ञानसम्पन्न,
मंगलायन तथा उत्तम विवाहकर्मका वर्णन भी अच्छी
प्रकारसे सुना ॥ २॥
हे महाप्राज्ञ! फिर भी शिवजी एवं सतीके
अत्यन्त मनोहर एवं उत्तम चरित्रको सुननेकी प्रबल
इच्छा है। अतः आप मुझपर दया करके पुनः उसका
वर्णन कीजिये॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! आपकी इच्छा परम
दयावान् शिवजीकी लीला सुननेमें लगी हुई है। यह
तो परम सौभाग्यकी बात है, हे सौम्य! जो आपने मुझे
शिवजीकी लीलाका वर्णन करनेके लिये बार-बार
प्रेरित किया है॥ ४॥
हे नारद! शिवजीने दक्ष प्रजापतिकी कन्या एवं
जगज्जननी देवी सतीके साथ विवाहकर उन्हें अपने
स्थानपर ले जाकर जो कुछ भी किया, उसे अब सुनें॥ ५॥
हे देवर्षे! दक्षसे विदा होनेके बाद महादेवजी
गणोंसहित अपने आनन्ददायक स्थानपर जाकर बड़ी
प्रसन्नताके साथ अपने परमप्रिय वाहन नन्दीशवरसे
उतरे॥ ६॥
हे देवर्षे! इस प्रकार सांसारिक लीला करनेमें
प्रवीण सतीपति सदाशिव यथायोग्य अपने स्थानमें
प्रवेशकर अत्यन्त हर्षित हुए॥ ७॥
इन महादेवजीने सतीको प्राप्त कर लेनेके
उपरान्त अपने नन्दी आदि समस्त गणोंको पर्वतकी
कन्दरासे बाहर भेज दिया॥ ८॥
विदा करते हुए उन नन्दीश्वर आदि समस्त
गणोंसे करुणासागर शिवजी लौकिक रीतिका अनुसरण
करते हुए मधुर वचनोंसे कहने लगे--॥ ९॥
महेश बोले-हे गणो! जिस समय मैं
आपलोगोंका स्मरण करूँ, तब आपलोग मेरे स्मरणका
आदर करते हुए शीघ्र मेरे पास चले आइये॥ १०॥
लटक"
४०२
इत्युक्ते वामदेवेन नंद्याद्या: स्वगणाश्च ते।
महावेगा महावीरा नानास्थानेषु संययुः॥ ११
ईश्वरोऽपि तया सार्थ तेषु यातेषु विभ्रमी।
दाक्षायण्या समं रेमे रहस्ये मुदितो भृशम्॥ १२
कदाचिद्ठन्यपुष्पाणि समाहृत्य मनोहराम्।
मालां विधाय सत्यास्तु हारस्थाने स योजयत्॥ १३
'कदाचिद्दर्पणे चैव वीक्षन्तीमात्मनः सतीम्।
अनुगम्य हरो वक्त्रं स्वीयमप्यवलोकयत्॥ १४
'कदाचित्कुंडलं तस्या उल्लास्योल्लास्य सङ्गतः ।
बध्नाति मोचयत्येव सा स्वयं मार्जयत्यपि॥ १५
सरागो चरणावस्याः यावकेनोज्ज्चलेन च।
निसर्गरक्तौ कुरुते पूर्णरागो वृषध्वजः॥ १६
उच्चैरपि यदाख्येयमन्येषां पुरतो बहु।
तत् कर्णे कथयत्यस्या हरो द्रष्टुं तदाननम्॥ १७
न दूरमपि गन्तासौ समागत्य प्रयत्नत: ।
अनुबध्नाति नामाक्षी पृष्ठदेशेऽन्यमानसाम्॥ १८
अन्तर्हितस्तु तत्रैव मायया वृषभध्वजः।
तामालिलिङ्ग भीत्या स्वं चकिता व्याकुलाभवत्॥ १९
सौवर्णपद्मकलिकातुल्ये तस्याः कुचद्रये।
चकार भ्रमराकारं मृगनाभिविशेषकम्॥ २०
हारमस्याः कुचयुगाद्वियोज्य सहसा हरः।
ज्ययोजयच्च तत्रैव स्वकरस्पर्शनं मुहुः॥ २१
अङ्गदान्वलयानूर्मान्विश्लेष्य च पुनः पुनः।
तत्स्थानात्पुनरेवासौ तत्स्थाने प्रत्ययोजयत्॥ २२
श्रीशिवमहापुराण
$
[अ २१
र र म) ककः
शिवजीके ऐसा कहनेपर महावेगवान् महावीर
नन्दी आदि वे सभी गण अपने-अपने स्थानको चले
गये॥ ११॥
उन गणोंके चले जानेके अनन्तर परम कौतुकी
शिवजी बड़ी प्रसन्नतापूर्वक एकान्तमें सतीके साथ
विहार करने लगे॥ १२॥
शिवजी कभी वनोंसे तोड़कर लाये हुए पुष्पोंकी
मनोहर माला बनाकर सतीके हार-स्थान अर्थात्
हृदयमें पहनाते थे॥ १३॥
कभी-कभी जब देवी सती अपना मुख दर्पणमें
देख रही होती थीं, उस समय शिवजी भी सतीके पीछे
जाकर अपना मुख देखने लगते थे॥ १४॥
वे कभी सतीके कुण्डलोंको बार-बार पकड़कर
हिलाने लगते थे, उन्हें सतीके कानोंमें पहनाते और
फिर निकालने लगते थे॥ १५॥
कभी वे भगवान् शंकर स्वभावत: लालवर्णवाले
सतीके चरणोंको देदीप्यमान लाक्षारससे रँगकर
अत्यधिक रागयुक्त कर देते थे॥ १६॥
सतीका मुखावलोकन करनेके उद्देश्यसे जो बात
दूसरोंके समक्ष भी कही जा सकती थी, उसे सतीके
कानोंमें कहते थे॥ १७॥
वे कभी घरसे दूर नहीं जाते थे, यदि दूर जाते
भी तो शीघ्रतासे वापस आ जाते थे और किसी
बातको सोचती हुई सतीके नेत्रोंको पीछेसे आकर
अपने हाथोंसे बन्द कर लेते थे॥ १८॥
कभी वे अपनी मायासे छिपकर वहीं जाकर
सतीका आलिंगन करते तो वे भयभीत होकर अत्यन्त
चकित होते हुए व्याकुल हो जाती थीं॥ १९॥
वे कभी सुवर्णमलकी कलीके समान
उनके वक्षःस्थलपर कस्तूरीसे भ्रमरके आकारकी
चित्रकारी करते थे और कभी उनका हार उतार
थे और फिर उसे वहीं स्थापित भी कर देते थे। कभी
सतीके अंगसे बाजूबंद, कंकण तथा अँगूठी बार बार
उसे पुन: उसी स्थानपर पहना दिया करते
थे॥ २०--२२॥
अ० २१]
कालिकेति समायाति सवर्णा ते सखी त्विमाम्।
यास्यत्वस्यास्तथेक्षन्त्या: प्रोत्तुड़ौ साहसं कुचौ॥ २३
कदाचिन्मदनोन्मादचेतन: प्रमथाधिपः।
चकार नर्म शर्माणि तथाकृत्प्रियया मुदा॥ २४
आहत्य पद्दापुष्पाणि रम्यपुष्पाणि शंकरः।
सर्वाङ्गेषु करोति स्म पुष्पाभरणमादरात्॥ २५
गिरिकुंजेषु रम्येषु सत्या सह महेश्वर: ।
विजहार समस्तेषु प्रियया भक्तवत्सलः ॥ २६
तया विना स्म नो याति नास्थितो न स्म चेष्टते ।
तया विना क्षणमपि शर्म लेभे न शंकरः॥ २७
विहृत्य सुचिरं कालं कैलासगिरिकुंजरे।
अगमद्धिमवत्प्रस्थं सस्मार स्वेच्छया स्मरम्॥ २८
तस्मिन्प्रविष्टे कामे तु वसंत: शंकरांतिके।
वितस्तार निजं भावं हार्द विज्ञाय यत्प्रभोः॥ २९
सर्वे च पुष्पिता वृक्षा लताश्चान्याश्च पुष्पिता: ।
अंभांसि फुल्लपद्मानि पद्मा: सभ्रमरास्तथा॥ ३०
प्रविष्ट सदूतौ तत्र ववौ स मलयो मरुत्।
सुगंधिगंधपुष्मेण मोदकश्च सुगंधियुक् ॥ ३१
संध्यार्धचन्द्रसंकाशाः पलाशाश्च विरेजिरे।
कामास्त्रवत्सुमनसः प््रमोदात्पादपाधरः॥ ३२
बभुः पंकजपुष्पाणि सरस्सु सकलाञ्जनान्।
संमोहयितुमुद्युक्ता सुमुखी वायुदेवता॥ ३३
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४०३
यह तुम्हारे ही समान स्वरूपवाली तुम्हारी
कालिका नामकी सखी आ रही है--शिवजीद्वारा इस
प्रकारके वचनोंको सुनकर जब सती उस सखीको
देखनेके लिये चलतां, तो शिवजी उनका स्पर्श करने
लगते॥ २३॥
कभी प्रमथाधिपति शिव कामके उन्मादसे व्यग्र
होकर अपनी प्रियाके साथ कामकेलि-परिहास करने
लगते थे॥ २४॥
कभी शंकरजी कमलपुष्पं तथा अन्य मनोहर
पुष्पोंको लाकर बड़े प्रेमसे उनका आभूषण बनाकर
सतीके अंगोंमें पहनाते थे॥ २५॥
इस प्रकार भक्तवत्सल महेश्वर समस्त रमणीय
वनकुंजोंमें सतीके साथ विहार करने लगे॥ २६॥
देवी सतीके बिना शिवजी कहीं भी नहीं जाते
थे, न बैठते थे और न ही किसी प्रकारकी चेष्टा ही
करते थे। सतीके बिना उन्हें क्षणमात्र भी चैन नहीं
पड़ता था॥ २७॥
इस प्रकार कैलासपर्वतके प्रत्येक वनकुंजमें
बहुत समयतक विहार करनेके पश्चात् वे पुनः
हिमालयके शिखरपर गये और उन्होंने अपनी इच्छासे
कामदेवका स्मरण किया॥ २८॥
जिस समय काम उनके आश्रममें प्रविष्ट हुआ,
उसके साथ ही बसन्तने भी शिवजीके अभिप्रायको
जानकर अपना प्रभाव प्रकट किया॥ २९॥
उस पर्वतके सभी वृक्ष तथा लताएँ पुष्पसे
आच्छादित हो उठीं और जल खिले कमलोंसे तथा
कमल भ्रमरोंसे युक्त हो गये॥ ३०॥
उस समय उत्तम ऋतु वसन्तके प्रविष्ट होते ही
सुगन्धित पुष्मोंकी गन्धसे समन्वित आनन्ददायक तथा
सुगन्धिसे युक्त मलय पवन बहने लगा॥ ३१॥
सन्ध्याकालीन अरुण चन्द्रमाके सदृश पलाश
शोभायमान होने लगे। सभी वृक्ष कामके अस्त्रके
समान सुन्दर पुष्पोंसे अलंकृत हो गये॥ ३२॥
तड़ागोंमें कमलपुष्प खिल उठे। अनुकूल वायु
संसारके मनुष्योंको मोहित करनेहेतु उद्यत दिखायी
पड़ने लगी॥ ३३॥.
४०ड
श्रीशिवमहापुराण
ग
[ अण २१
नागकेशरवृक्षाश्च स्वर्णवणैः प्रसूनकैः।
बभुर्मदनकेत्वाभा मनोज्ञाः शंकरान्तिके॥ ३४
लवङ्गवल्ली सुरभिगंधेनोद्वास्य मारुतम्।
मोहयामास चेतांसि भूशं कामिजने पुरा॥ ३५
चारुचर्चितभृङ्गोघाः सुस्वराश्चूतशालिनः।
बभुर्मदनबाणौघपर्यकमदनावृताः ॥ ३६
अंभांसि मलहीनानि रेजुः फुल्लकुशाशयाः।
मुनीनामिव चेतांसि प्रव्यक्तज्योतिरुद्गमम्॥ ३७
तुषाराः सूर्यरश्मीनां सङ्गमादगमन् बहिः।
प्रमत्वानीक्ष्यतेक्षाश्च सलिलीहृदयास्तदा॥ ३८
प्रसन्नाः सह चन्द्रेण निर्नीशारास्तदाऽभवन्।
विभावर्यः प्रियेणेवं कामिन्यः सुमनोहराः॥ ३९
तस्मिन्काले महादेवः सह सत्या धरोत्तमे।
रेमे स सुचिरं छन्दं निकुंजेषु नदीषु च॥ ४०
तथा तेन समं रेजे तदा दाक्षायणी मुने।
यथा हरः क्षणमपि शांतिमाप तया विना॥ ४१
संभोगविषये देवी सती तस्य मनःप्रिया।
विशतीव हरस्याङ्गे पाययन्निव तद्रसम्॥ ४२
तस्याः कुसुममालाभिर्भूषयन्सकलां तनुम्।
स्वहस्तरचिताभिस्तु नवशर्माकरोच्च सः॥ ४३
आलापेर्वीक्षितेहास्येस्त्था संभाषणै्हरः।
तस्यादिदेश गिरिजां शंसतीवात्मसंविदम्॥ ४४
तदवकत्रचंद्रपीयूषपानस्थिरतनुर्हरः ।
नानावैशेषिकीं तन्वीमवस्थां स कदाचन॥ ४५
तद्वक्त्राम्बुजवासेन तत्सौन्दय्यैश्च नर्मभिः।
गुणैरिव महादन्ती बद्धो नान्यविचेष्टितः॥ ४६
भगवान् शंकरके समीप नागकेसरके नकारा स्वर्णे; प्रसूनकैः। । भगवत् शकरके समीप नागकेसरके वृक्ष जरे
सुवर्णके समान पुष्पोंसे कामदेवकी ध्वजाके समान
मनोहर प्रतीत होने लगे॥ ३४॥
लवंगकी लता अपनी सुरभित गन्धस्े वायुको
सुवासित करके कामीजनोंके चित्तको मोहित करने
लगी॥ ३५॥
मँडरानेवाले तथा आम्रमंजरियोंमें गुंजार करनेवाले
भौरोंके सुन्दर समूह कामदेवके बाणोंके समान तथा
कामसे व्याप्त मदनके पर्यक जैसे प्रतीत हो रहे थे॥ ३६॥
ज्ञानरूपी प्रकाशको प्राप्तकर जिस प्रकार मुनियोंका
मन प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार खिले हुए
कमलपुष्पासे युक्त निर्मल जल शोभा पा रहे थे ॥ ३७॥
सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कके कारण बर्फ पिघलकर
बहने लगी। जल ही जिनका हृदय है, ऐसे कमल
जलके बीच स्मष्टरूपसे दृष्टिगोचर हो रहे थे॥ ३८॥
ात्रिवेलामें तुषाररहित रात्रियाँ चन्द्रमासे युक्त
होनेके कारण प्रियतमके साथ सुशोभित होनेवाली
स्त्रियों जैसी प्रतीत हो रही थीं ॥ ३९॥
ऐसे मनोहारी वसन्तकालमें महादेवजी सतीके साथ
पर्वतकुंजो एवं नदियोंमें बहुत कालतक स्वच्छन्दतासे
रमण करने लगे और हे मुने! उस समय दक्षकन्या
देवी सती भी महादेवजीके साथ शोभाको प्राप्त हुई।
शिवजीको सतीके बिना क्षणमात्र भी शान्ति नहीं
मिलती थी। शिवजीकी प्रिया सती भी उन्हें रसका
पान कराती हुई प्रतीत हो रही थीं ॥ ४०--४२॥
शंकरजी खिले हुए नवीन पुष्पोंकी अपने हाथसे
माला बनाकर सतीके अंगोंको सुशोभित करते हुए
नये-नये मंगल कर रहे थे॥ ४३॥
आलाप, अवलोकन, हास्य और परस्पर सम्भाषण
आदिके द्वारा वे शम्भु कभी उन गिरिजाको स्वयं
सौतके रूपमें भी दिखा देते थे॥ ४४॥
उन सतीके चन्द्रमुखका अमृतपान करनेमें सन्त
शरीरवाले शिव अपने शरीरकी अनेक अवस्थाएँ
कभी-कभी दिखाने लगते थे॥ ४५॥
वे शिवजी सतीके मुखकमलकी सुगन्धि,
मनोहारी सुन्दरता तथा प्रीतिपूर्ण चेष्टाओंमें इस प्रकार
बँध गये थे, जैसे कोई बंधा हुआ हाथी किसी भी
अकारकी चेष्टा करनेमें अपनेको असमर्थ पाता है॥ ४६॥
|
|
अ० २२]
इति हिमगिरिकुंजप्रस्थभागे दरीषु
प्रतिदिनमभिरेमे दक्षपुत्र्या महेश: ।
क्रतुभुजपरिमाणैः क्रीडतस्तस्य जाता
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०५
इस प्रकार वे महेश्वर हिमालयपर्वतके
कुंजों, शिखरोंपर और गुफाओंमें सतीके साथ प्रतिदिन
रमण करने लगे। हे सुरर्षे! इस प्रकार उनके विहार
करते हुए देवताओंके वर्षक अनुसार पचीस वर्ष
दश दश च सुरर्षे वत्सराः पञ्ज चान्ये॥ ४७ | व्यतीत हो गये॥ ४७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितां द्वितीये सतीखण्डे सतीशिवक्रीडावर्णतं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सतीशिवक्रीड़ावर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
सती और शिवका बिहार-वर्णन
ब्रह्मोवाच
कदाचिदथ दक्षस्य तनया जलदागमे।
कैलासक्ष्माभृतः प्राह प्रस्थस्थं वृषभध्वजम्॥ ९
सत्युवाच
देवदेव महादेव शंभो मत्प्राणवल्लभ।
शृणु मे वचनं नाथ श्रुत्वा तत्कुरु मानद॥ २
घनागमोऽयं संप्राप्तः कालः परमदुःसहः।
अनेकवर्णमेघौघाः सङ्गीतांबरदिक्चयाः॥ ३
विवान्ति वाता हृदयं हारयंतीति वेगिनः।
कदंबरजसा धौताः पाथोबिन्दुविकर्षणाः॥ ४
मेघानां गर्जितैरुच्चैर्धारासारं विमुञ्जताम्।
विद्युत्पताकिनां तीव्र: क्षुब्धं स्यात्कस्य नो मनः॥ ५
न सूर्यो दृश्यते नापि मेघच्छन्नो निशापतिः।
दिवापि रात्रिवद्भाति विरहिव्यसनाकरः॥ ६
मेघा नैकत्र तिष्ठन्तो ध्वनन्तः पवनेरिताः।
पतन्त इव लोकानां दृश्यन्ते मूर्ति शंकर॥ ७
ब्रह्माजी बोले--किसी समय वर्षाऋतुमें जब
श्रीमहादेवजी कैलासपर्वतके शिखरपर विराजमान थे,
उस समय सती शिवजीसे कहने लगीं--॥ १॥
सती बोलीं--हे देवदेव! हे महादेव! हे
शम्भो! हे मेरे प्राणवल्लभ! हे नाथ! मेरे वचनको
सुनिये और हे मानद! सुन करके उसे कीजिये ॥ २॥
हे नाथ! यह परम कष्टदायक वर्षाकाल आ
गया है तथा अनेक वर्णके मेघोंके गर्जनसे आकाश
तथा दिशाएँ व्याप्त हो गयी हैं॥ ३॥
कदम्बके परागसे समन्वित, जलबिन्दुओंको
लेकर बहनेवाली मनोहारिणी तथा तीब्रगतिवाली
वायु प्रवाहित हो रही है॥ ४॥
इस वर्षाकालमें जलसमूहकी धाराओंसे वृष्टि
करते हुए तथा चमकती हुई बिजलीकी पताकावाले
इन मेधोंकी गर्जनाके कारण किसका मन विक्षुब्ध
नहीं हो जाता॥ ५॥
विरहीजनोंको दुःखदायी कर देनेवाला यह
वर्षाकाल महाभयानक है। इस समय आकाशके
मेघाच्छन्न होनेके कारण दिनमें न तो सूर्यका दर्शन
हो पा रहा है और न तो रात्रिमें चन्द्रमा ही दिखायी
पड़ता है। [इस कालमें] दिन भी रात्रिके समान ही
प्रतीत हो रहा है॥ ६॥
प्रचण्ड वायुके झोंकोंक कारण मेघ शब्द करते
हुए आकाशमें कहीं भी स्थिर नहीं हो पा रहे हैं। हे
शंकर! ये मेघ ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, जैसे अभी
लोगोंके सिरपर गिर जायँगे | ७॥
ti
४०६
बाताहता महावृक्षा नर्तन्त इव चांबरे।
दृश्यन्ते हर भीरूणां त्रासदाः कामुकेष्सिताः॥ ८
स्निग्धनीलाञ्जनस्याशु सदिवोघस्य पृष्ठतः।
'बलाकराजीवात्युच्चैर्यमुनापृष्ठफेनवत् ॥ ९
क्षपायामीश वलयो दृश्यन्ते करभाश्रिताः।
अंबुधाविव संदीप्तपावको वडवामुखः॥ १०
प्रारोहंतीह सस्यानि मन्दरे प्राडुणेष्वपि।
किमन्यत्र विरूपाक्ष सस्योद्भूतिं वदाम्यहम्॥ ११
श्यामलै राजते रक्तैर्विशदोऽयं हिमाचलः।
मंदराश्रयमेघौघः पत्रैर्दुगधाम्बुधिर्यथा॥ १२
असमश्रीश्च कुटिलं भेजे यस्याथ किंशुकान्।
उच्चावचान् कलौ लक्ष्मीर्गन्ता संत्यज्य सजनानू॥ १३
मंदराचलमेघानां शब्देन हृषिता मुषुः।
केकायंते प्रतिवने सततं पृष्ठसूचकम्॥ १४
मेघोत्सुकानां मधुरश्चातकानां मनोहर: ।
धारासारशरैस्तापं पेतुः प्रतिपथोद्गतम्॥ १५
मेघानां पश्य मद्देहे दुर्नयं करकोत्करैः।
ये छादयन्त्यनुगते मयूरांश्चातकांस्तथा॥ १६
शिखिसारंगयो दृष्ट्वा मित्रादपि पराभवम्।
हर्ष गच्छन्ति गिरिश विदूरमपि मानसम्॥ १७
एतस्मिन्विषमे काले नीडं काकाश्चकोरकाः।
कुर्वन्ति त्वां विना गेहान् कथं शांतिमवाप्स्यसि॥ १८
्रीशिवमहापुराण
त
[अ २ HR i
हे शंकर! हवाके वेगसे ये बड़े-बड़े
आकाशमें नाचते हुए-से प्रतीत हो रहे हैं वी
कामीजनोंके लिये सुख देनेवाले तथा भीरुजनोंको
भयभीत करनेवाले हैं ॥ ८॥
काले तथा चिकने बादलोंवाले आकाशके ऊफ
उड़ती हुई बकपंक्ति यमुनानदीके ऊपर बहते हुए
फेन-जैसी प्रतीत हो रही है॥९॥
ईश! काली रात्रिमें बादलोंमें छिपा हुआ यह
चन्द्रमण्डल समुद्रमें प्रदीप्त हुई वडवाग्निके समान
प्रतीत हो रहा है॥१०॥
हे विरूपाक्ष! इस मन्दराचल पर्वतशिखरके
प्रांगणमें भी वर्षाकालीन घासें उग आयी हैं, फिर
अन्य स्थानोंकी चर्चा ही क्या करूँ ?॥ ११॥
मन्दराचलपर आश्रय ग्रहण करनेवाले इन
काले, श्वेत तथा रक्तवर्णके मेघोंसे यह विशाल
हिमालय इस प्रकार प्रतीत हो रहा है, जैसे पत्तोंसे पूर्ण
दुग्धका समुद्र हो॥ १२॥
श्री (शोभा) सभी वृक्षोंको त्यागकर केवल
विषमतासे किंशुक वृक्षोंको शोभित कर रही है, जिस
प्रकार महालक्ष्मी कलियुगमें सज्जनोंको त्यागकर सभी
ऊँचे-नीचे पुरुषोंको प्राप्त होती हैं ॥ १३॥
मन्दराचल पर्वतके शिखरपर वास करनेवाले
बादलोंके शब्दसे हर्षित होकर मोर वनमें अपनी पीठ
दिखाकर नृत्य कर रहे हैं॥ १४॥
मेघोंके लिये उत्सुक इन चातकोंकी मधुर धवति
इस वर्षाकालमें सुनायी पड़ रही है और पथिकगण तीव्र
जल-वर्षाके कारण रास्तेमें होनेवाली थकानको दूर कर
रहे हैं। हे शंकर! मेरी देहपर मेघोंद्वाए ओले गिराये
जानेसे उत्पन्न हुई इस दुर्नीतिको देखिये, जो अपने
अनुगामी मोर तथा चातकोंपर भी उपलकी वर्षकर
उन्हें ओलोंसे आच्छादित कर रहे हैं॥ १५-१६॥
हे गिरिश! मोर तथा सारंग भी अपने मिर
(बादल)-से पराभवको प्राप्तकर दूर होनेपर
हर्षपूर्वक मानसरोवरको चले जा रहे हैं॥ १७॥
[हे सदाशिव!] इस विषम परिस्थितिमें [केवल]
आपको छोड़कर कौआ और चकोर पक्षी भी अपनी
घोंसला बना रहे हैं। अब आप ही बताइये, परे
बिना आप किस प्रकार शान्ति प्राप्त करेंगे ?॥ १८॥
अ० २२]
महतीवाद्य नो भीतिर्मा मेघोत्था पिनाकधृक्।
यतस्व यस्माद्वासाय माचिरं वचनान्मम॥ १९
कैलासे वा हिमाद्रौ वा महाकोश्यामथ क्षितौ।
तत्रोपयोग्यं संवासं कुरु त्वं वृषभध्वज॥ २०
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तस्तया शंभुर्दाक्षायण्या तथासकृत्।
सञ्जहास च शीर्षस्थचन्द्ररश्मिस्मितालयम्॥ २१
अथोवाच सतीं देवीं स्मिताभिन्नोष्ठसंपुट: ।
महात्मा सर्वतत्त्वज्ञस्तोषयन्परमेश्वरः ॥ २२
ईश्वर उवाच
यत्र प्रीत्यै मया कार्यो वासस्तव मनोहरे।
मेघास्तत्र न गन्तारः कदाचिदपि मत्तप्रिये॥ २३
मेघा नितंबपर्यन्तं सञ्चरन्ति महीभृतः।
सदा प्रालेयसानोस्तु वर्षास्वपि मनोहरे॥ २४
कैलासस्य तथा देवि पादगाः प्रायशो घना: ।
सञ्चरन्ति न गच्छन्ति तत ऊर्ध्व कदाचन॥ २५
सुमेरोर्वा गिरेरूर्ध्व न गच्छन्ति बलाहकाः।
जम्बूमूलं समासाद्य पुष्करावर्तकादयः॥ २६
इत्युक्तेषु गिरीन्द्रेषु यस्योपरि भवेद्धि ते।
मनोरुचिर्निवासाय तमाचक्ष्व द्रुत॑ हि मे॥ २७
स्वेच्छाविहारैस्तव कौतुकानि
सुवर्णपक्षानिलवृन्दवृन्दैः ।
शब्दोत्तरंगैर्मधुरस्वनेस्ते-
मुंदोपगेयानि गिरौ हिंमोत्थे॥ २८
सिद्धाङ्गनास्ते रचितासना भुवं
काङ्क्षन्ति चैवोपहृतं सकौतुकम्।
सवेच्छाविहारे मणिकुट्टिमे गिरौ
कुर्वन्ति चेष्यन्ति फलादिदानकैः॥ २९
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०७
हे पिनाकधारिन्! मुझे इन मेघोंसे बहुत बड़ा
भय उत्पन्न हो गया है, इसलिये मेरे कहनेसे निवासके
लिये शीघ्र ही घर बनानेका प्रयत्न कीजिये॥ १९॥
हे वृषभध्वज! आप कैलासपर्वतपर,
हिमालयपर अथवा महाकोशीपर या पृथ्वीपर अपने
योग्य निवासस्थान बनाइये ॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] इस प्रकार दक्षकन्या
सतीके द्वारा बार-बार कहे जानेपर शिवजी अपने
सिरपर स्थित चन्द्रमाके प्रकाशपुंजके समान उज्ज्वल
मुखसे हँसने लगे॥ २१॥
तदनन्तर मुसकराहटके कारण खुले ओठोंचाले
वे सर्वतत्त्वज्ञाता महात्मा परमेश्वर महादेवजी सतीको
प्रसन्न करते हुए कहने लगे-॥ २२॥
ईश्वर बोले-हे मनोहरे! हे मेरी प्रिये!
तुम्हारी प्रीतिके लिये मैं तुम्हारे रहनेके योग्य
निवासस्थान उस जगहपर बना दूँगा, जहाँ मेघ कभी
भी नहीं जा सकेंगे॥ २३॥
हे मनोहरे ! वर्षाकालमें भी ये मेघ हिमालय पर्वत
(मध्य भाग)-के नीचे ही नीचे घूमते रहते हैं ॥ २४॥
उसी प्रकार हे देवि! ये मेघ इस कैलासपर्वतके
भी नीचे-ही-नीचे घूमते हैं, कैलास पर्वतके ऊपर नहीं
जाते हैं॥ २५॥
पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ भी जम्बूके
मूलभागतक ही रह जाते हैं। ये जम्बूके ऊपर
रहनेबाले सुमेरु पर्वतके शिखरपर नहीं जाते हैं॥ २६॥
हे प्रिये! इन वर्णित पर्वतोंमें जिस पर्वतपर
तुम्हारी निवास करनेकी इच्छा हो, उस पर्वतको शीघ्र
ही बताओ॥ २७॥
इस हिमालय पर्वतपर निवास करनेसे स्वच्छन्द
विहार करनेवाले सुवर्णके सदृश पंखवाले ये अनिल
नामक पक्षिसमूह ऊँचे-ऊँचे मधुर शब्दोंसे तुम्हारे
कौतुक (केलिक्रीडा)-का गान करेंगे॥ २८॥
सिद्धोंकी कमनीय स्त्रियाँ मणियोंके द्वारा
कूटकर बनायी गयी इस हिमालयको भूमिपर स्वेच्छा-
विहारकालमें कौतुकसे तुम्हारे बैठनेके लिये आसनका
निर्माणकर स्वच्छ पृथिवीको तुम्हारे लिये अर्पण
करेंगी और अनेक प्रकारके फल-मूल आदि लाकर
देनेकी इच्छा करेंगी॥ २९॥
हे
[अ० २२
४०८
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आ
फणीन्द्रकन्या गिरिकन्यकाश्च
या नागकन्याश्च तुरंगमुख्याः।
सर्वास्तु तास्ते सततं सहायतां
समाचरिष्यन्त्यनुमोदविभ्रमैः
रूपं तदेवमतुलं वदनं सुचारु
दृष्ट्वाङ्कना निजवपुर्निजकांतिसह्यम्।
हेला निजे वपुषि रूपगणेषु नित्यं
कर्तार इत्यनिमिषेक्षणचारुरूपाः॥ ३१
मेनका पर्वतराज जाया
रूपेर्गुणैः ख्यातवती त्रिलोके।
सा चापि ते तत्र मनोऽनुमोदं
॥ ३०
या
नित्यं करिष्यत्यनुनाथनाद्यैः ॥ ३२
पुरस्थवगैर्गिरिराजवंद्यः
प्रीतिं विचिन्वद्भिरुदाररूपाम्।
शिक्षा सदा ते खलु शोचितापि
कार्यान्वहं प्रीतियुता गुणाद्यैः॥ ३३
विचित्रैः कोकिलालापमोदैः कुंजगणावृतम्।
सदा वसंतप्रभवं गंतुमिच्छसि किं प्रिये॥ ३४
शीतसमावृतम्।
हिमालयम्॥ ३५
सर्वकामप्रदैर्वक्षैः शाद्वले: कल्पसंज्ञकैः।
सक्षणं पश्य कुसुमान्यथाश्वकरिगोव्रजम्॥ ३६
प्रशांतश्वापदगणं मुनिभिर्यतिभिर्वृतम्।
देवालये महामाये नानामृगगणेर्युतम्॥ ३७
नानाबहुजलापूर्णसरः
पद्मिनीशतशोयुक्तमचलेनद्रं
स्फाटिकैः स्वर्णवप्राद्यै राजतैश्च विराजितम्।
मानसादिसरोरंगैरभितः परिशोभितम्॥ ३८
हिरण्मयै रतनालैः पंकजैर्मुकुलैर्वृतम्।
शिशुमारैस्तथासंख्यैः कच्छपैर्मकरैः करैः॥ ३९
निषेवितं मञ्जुलैश्च तथा नीलोत्पलादिभिः।
देवेशि तस्मान्मुक्तैश्च सर्वगंधैश्च कुंकुमैः ॥ ४०
लसद्गन्धजलैः शुभ्रैरापूर्णैः स्वच्छकांतिभिः।
नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ एवं
किन्नरियाँ-ये सभी मनको मोहनेवाले आप
भावसे सदैव तुम्हारी सहायता करेंगी ॥ ३०॥
तुम्हारे इस अतुलनीय रूप तथा मनोहारी मुखको
देखकर वहाँकी स्त्रियाँ अपने पतिके लिये मनोहर
लगनेवाले शरीर, अपने रूप तथा गुणोंको धिक्कार
करेंगी तथा तुम्हारी ओर निरन्तर देखती रहेंगी॥ ३१॥
पर्वतराज हिमालयकी पत्नी मेनका, जो अपने
रूप तथा गुणसे त्रिलोकमें विख्यात हैं, वे भी तुम्हार
मनोऽनुकूल ऐश्वर्य, आशीर्वाद तथा प्रार्थनासे तुम्हे
प्रसन्न करना चाहेंगी॥ ३२॥
गिरिराजसे वन्दनाके योग्य समस्त पुरजन तुम्हे
प्रसन्न करनेका सदा प्रयत्न करेंगे और यदि अत्यन्त
उदाररूपा तुमको कभी शोक हुआ तो वे लोग तुम्हे
शिक्षा देंगे तथा अपने गुणोंसे प्रसन्न रखेंगे॥ ३३॥
हे प्रिये! कोकिलोंके विचित्र मधुर आलापोंसे परिपूर्ण
कुंजसमूहोंसे आवृत स्थानमें जहाँ वसन्तकी उत्पत्तिका
स्थान है, कया तुम उस स्थानमें जाना चाहती हो ?॥ ३४॥
जहाँ विविध प्रकारके अनेक तालाब सैकड़ों
कमलिनियोंसे समन्वित शीतल जलसे परिपूर्ण हैं, जहाँ
अश्व, हाथी तथा गौओंका निवास है, हे देवि!
वहाँ सभी प्रकारकी कामनाओंको प्रदान करनेवाले
कल्पसंज्क वृक्षो|ंसे घिरे हुए सुन्दर मनोहारी पुष्पोंको
तथा हरे-भरे नवीन घासके मैदानोंको प्रफुल्लित भेत्रे
देखना । हे महामाये ! इस प्रकारके उस हिमालयपर हिंसक
जन्तुगण भी शान्तिपूर्वक निवास करते हैं, वह अनेक |
प्रकारके मृगगणोंसे युक्त है, वहाँपर स्थित
मुनियों तथा यतियोंका निवास है ॥ ३५--३७॥
उस पर्वतके शिखर स्फटिक, सुवर्ण एवं चाँदीसे |
व्याप्त हैं, वह मानसादि सरोवरोंसे चारों ओरसे सुशोभित
है | वह सुवर्णसे बने हुए, रत्नोंके दण्डवाले अधखिले
कमलोंसे व्याप्त है । शिशुमार एवं असंख्य कच्छप एवं
मकरोंसे वह मानसरोवर परिव्याप्त है ॥ ३८-३९ ॥ ॥2८
वह मनोहर नीलकमलों और
शोभित है। हे देवेशि! वह [कमलपुष्पोंसे] गिरते ६
सुगन्धि कुंकुमोंसे व्याप्त है। गन्थोसे समन्वित स्व
जलोंसे वह मानसरोवर पूर्ण है। मानसरोवरका 7
अ० २२]
शाद्वलैस्तरुणेस्तुङ्ग्तीरस्थैरुपशोभितम् ॥ ४१
नृत्यद्भिरिव शाखोटै्वर्जयन्तं स्वसंभवम्।
कामदेवैः सारसैश्च मत्तचक्राङ्गशोभितैः॥ ४२
मधुराराविभिर्मोदकारिभिर्भरमरादिभिः ।
शब्दायमानं च मुदा कामोद्दीपनकारकम्॥ ४३
वासवस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च।
अग्नेः कोणपराजस्य मारुतस्य परस्य च॥ ४४
पुरीभिः शोभिशिखरं मेरोरुच्चैः सुरालयम्।
रंभाशचीमेनकादिरंभोरुगणसेवितम् ॥ ४५
किं त्वमिच्छसि सर्वेषां पर्वतानां हि भूभृताम्।
सारभूते महारम्ये संविहर्तु महागिरौ॥ ४६
तत्र देवी सखियुता साप्सरोगणमंडिता।
नित्यं करिष्यति शची तव योग्यां सहायताम्॥ ४७
अथवा मम कैलासे प्वतेन्द्रे सदाश्रये।
स्थानमिच्छसि वित्तेशपुरीपरिविराजिते॥ ४८
गङ्गाजलौघप्रयते पूर्णचन्द्रसमप्रभे।
दरीषु सानुषु सदा ब्रह्मकन्याभ्युदीरिते॥ ४९
जानामृगगणे युक्ते
सवेर्गुणैश्च
पद्माकरशतावृते।
सद्ठस्तुसुमेरोरपि सुंदरे॥ ५०
स्थानेष्वेतेषु यत्रापि तवान्तःकरणो स्पृहा।
तं द्रुतं मे समाचक्ष्व वासकर्तास्मि तत्र ते॥ ५१
ब्रह्मोवाच
इतीरिते शंकरेण तदा दाक्षायणी शनैः।
इदमाह महादेवं लक्षणं स्वप्रकाशनम्॥ ५२
सत्युवाच
हिमाद्रावेब चसितुमहमिच्छे त्वया सह।
जेचिरात्कुरु संवासं तस्मिन्नेव महागिरौ॥ ५३
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४०९
हरे-भरें, ऊँचे एवं नवीन घासवाले भूमिभागसे सुशोभित
है। यहाँके शाखोटके वृक्ष इस प्रकार प्रतीत हो रहे
हैं, जैसे अपनी शाखाको हिलाकर नृत्य कर रहे हों।
अपनी इच्छाके अनुसार अनेक प्रकारके रूप धारण
करनेवाले देवताओं, सारसों एवं मतवाले चक्रवाकोंसे
मानसरोवर सुशोभित हो रहा है॥ ४०--४२॥
परम आनन्दको प्रदान करनेवाले भौंरोंके
मधुर शब्दोंसे गुंजित वह मानसरोवर महान् उद्दीपन
करनेवाला है॥ ४३॥
मेरुपर्वतके ऊँचे शिखरपर इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण,
अग्नि, निर्क्रति, वायु तथा ईशानकी पुरियाँ हैं, जहाँ
देवताओंका निवासस्थान है। रम्भा, शची एवं मेनकादि
अप्सराओंसे वह मेरुशिखर सुशोभित है॥ ४४-४५॥
[हे देवि!] क्या तुम उन समस्त पर्वतोंके राजा
तथा पृथिवीके सारभूत महारम्य सुमेरु पर्वतपर विहार
करना चाहती हो ?॥ ४६॥
वहाँ [निवास करनेसे] सखियों एवं अप्सराओं-
सहित शची देवी तुम्हारी उचित सहायता करेंगी ॥ ४७॥
अथवा तुम मेरे आश्रयभूत केलासपर, जो पर्वतिद्रके
नामसे विख्यात है, उसपर निवास करना चाहती हो,
जहाँपर कुबेरकी अलकापुरी है। जहाँ गंगाकी जलधारा
बह रही है, जो स्वयं पूर्णचन्द्रके समान समुज्ज्चल है
और जिस कैलासकी कन्दराओं तथा शिखरोंपर
ब्रह्मकन्याएँ मनोहर गान करती हैं॥ ४८-४९ ॥
यह कैलास अनेक प्रकारके मृगगणोंके समूहोंसे
युक्त, सैकड़ों कमलोंसे परिपूर्ण एवं सुमेरुपर्वतकी
अपेक्षा समस्त गुणोंसे युक्त तथा सुन्दर है॥५०॥
[हे देवि!] इन स्थानोंमें जहाँ कहीं भी तुम्हारी
रहनेकी इच्छा हो, उस स्थानको शीघ्र मुझे बताओ।
में बहाँपर तुम्हारे निवासस्थानका निर्माण करूँगा ॥ ५१॥
ब्रह्माजी बोले-शंकरके इस प्रकार कहनेपर
सतीदेवी अपने निवासभूत स्थानका लक्षण इस प्रकार
कहने लगीं--॥ ५२॥
सती बोलीं--हे देव! मैं आपके साथ इस
पर्वतराज हिमालयपर ही निवास करना चाहती हूँ,
आप इसी पर्वतपर शीप्रतापूर्वक निवासस्थानका निर्माण
कीजिये॥ ५३॥
हे °
ब्रह्मोवाच
अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य हरः परममोहितः।
हिमाद्रिशिखरं तुङ्गं दाक्षायण्या समं ययौ॥ ५४
सिद्धाङ्गनागणयुतमगम्यं चैव पक्षिभिः।
अगमच्छिखरं रम्यं सरसीवनराजितम्॥ ५५
विचित्ररूपः कमलैः शिखरं रलकर्तुरम्।
बालार्कसदूशं शंभुराससाद सतीसखः॥ ५६
स्फटिकाभ्रमये तस्मिन् शाद्वलद्रुमराजिते।
विचित्रपुष्पावलिभिः सरसीभिश्च संयुते॥ ५७
प्रफुल्लतरुशाखाग्रं गुंजद् भ्रमरसेवितम्।
पङ्केरुहैः प्रफुल्लैश्च नीलोत्पलचयैस्तथा॥ ५८
शोभितं चक्रवाकाद्यैः कादंबैर्हससंकुलैः।
प्रमत्तसारसैः क्राँचैनीलस्कन्धैश्च शब्दितैः॥ ५९
पुंस्कोकिलानां निनदैर्मधुरैर्गणसेवितैः।
तुरंगबदनैः सिद्धैरप्सरोभिश्च गुह्याकैः॥ ६०
विद्याधरीभिर्देवीभिः किन्नरीभिर्विहारितम्।
पुरंश्रीभिः पार्वतीभिः कन्याभिरभिसङ्कतम्॥ ६१
विपञ्जीतांत्रिकामत्तमृदङ्गपटहस्वनैः ।
जृत्यद्भिरप्सरोभिश्च कौतुकोत्थैश्च शोभितम्॥ ६२
देविकाभिर्दीर्धिकाभिर्गधिभिः सुसमावृतम्।
प्रफुल्लकुसुमैर्नित्यं सुकुञ्जैरुपशोभितम्॥ ६३
शैलराजपुराभ्यणें शिखरे वृषभध्वजः।
सह सत्या चिरं रेमे एवंभूतेषु शोभनम्॥ ६४
तस्मिन् स्वर्गसमे स्थाने दिव्यमानेन शंकरः।
'दशवर्षसहस्त्राणि रेमे सत्या समं मुदा॥ ६५
स कदाचित्ततः स्थानादन्यद्याति स्थलं हर: ।
कदाचिन्मेरुशिखरं देवीदेववृतं सदा॥ ६६
श्रीशिबमहापुराण
[ अ० २२
ब्रह्माजी बोले--सतीद्वारा इस प्रकार कहे गण कक | हाजी बोले--सतीार इसप्रकार हेज
शंकरजी अत्यधिक मोहित हो गये और सतीको साथ
लेकर हिमालयपर्वतके ऊँचे शिखरपर चले गये॥ ५४॥
सिद्धांगनाओंसे युक्त, पक्षियोंसे सर्वथा
अगम्य, अनेक छोटी-छोटी बावलियोंसे युक्त, विचित्र
कमलोंसे चित्रित और प्रातःकालीन सूर्यके समान
सुशोभित उस शिखरपर शिवजी सती देवीके साथ
चले गये॥ ५५-५६॥
वह स्फटिकमणिके समान समुज्ज्चल, हरे-भरे
वृक्षोंसे तथा घासोंसे परिपूर्ण, विचित्र पुष्पोंवाली
बावलियोंसे युक्त था, उस शिखरके वृक्षोंकी शाखाओंका
अग्रभाग विकसित पुष्पोंसे शोभित था, भौरे गुंजार कर
रहे थे, वह नील एवं अनेक वर्णके कमलोंसे
परिव्याप्त था॥ ५७-५८॥
चक्रवाक, कदम्ब, हंस, शुक, सारस और
नीली गर्दनवाले क्रौंच पक्षियोंके शब्दोंसे वह शिखर
शब्दायमान हो रहा था॥५९॥
उस शिखरपर पुंस्कोकिल मनोहर शब्द कर रहे
थे, वह अनेक प्रकारके गणों, किन्नरियों, सिद्धं,
अप्सराओं तथा गुह्यकोंसे सेवित था॥ ६०॥
विद्याधरियाँ, देवियाँ तथा किन्नरियाँ वहाँ विहार
कर रही थीं तथा पर्वतीय स्त्रियों एवं कन्याओंसे वह
युक्त था॥६१॥
वीणा, सितार, मृदंग एवं पटहके वाद्ययन्त्रपर
जृत्य एवं कौतुक करती हुई अप्सराओंके समूहसे वह |
शिखर सुशोभित हो रहा था॥ ६२॥
देविकाओं, दीघिकाओं, खिले हुए तथा सुगन्थित
पुष्पों और निकुंजोंसे वह शोभायमान हो रहा था॥ ६३॥
इस प्रकारको शोभासे युक्त पर्वतराज
शिखरपर शंकरजी सती देवीके साथ बहुत कालतर्क
रमण करते रहे ॥ ६४॥
महादेवजी उस स्वर्गके समान दिव्य स्थानमें |
सतीके साथ देवताओंके वर्षके गणनानुसार दस हैर
वर्षतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करते रहे॥ ६५॥
वे कभी उस स्थानको छोड़कर सतीके सीर
किसी दूसरे स्थानपर चले जाते थे और कभी देवौ
देवताओंसे व्याप्त मेरु शिखरपर चले जाते थे॥ ६६॥
|
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अ० २३)
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४११
द्वीपानाना तथोद्यानवनानि वसुधातलम्।
गत्वा गत्वा पुनस्तत्राभ्येत्य रेमे सतीसुखम्॥ ६७
न यज्ञे स दिवारात्रौ न ब्रह्मणि तपस्समम्।
सत्यां हि मनसा शंभुः प्रीतिमेव चकार ह॥ ६८
एवं महादेवमुखं सत्यपश्यत्स्म सर्वदा।
महादेवोऽपि सर्वत्र सदाद्राक्षीत्सतीमुखम्॥ ६९
एवमन्योन्यसंसर्गादनुरागमहीरुहम् ।
वर्धयामासतु: कालीशिवो भावांबुसेचनै: ॥ ७०
इस पृथ्वीतलके अनेक प्रकारके द्वीपों, उद्यानों
एवं वनोंमें जाकर पुन: वहाँ आकर सतीके साथ रमण
करने लगते थे॥ ६७॥
शिवजीका मन यज्ञ, ब्रह्म तथा समाधिमें नहीं
लगता था, वे शम्भु दिन-रात मनसे सतीमें ही प्रीति
करते रहते थे॥ ६८॥
इसी प्रकार सती भी निरन्तर महादेवजीके
मुखका अवलोकन करती रहती थीं और शिवजी भी
सतीके मुखको देखते रहते थे॥ ६९॥
इस प्रकार वे शिव तथा सती परस्परके संयोगसे
स्नेहरूपी जलद्वारा अनुरागरूपी वृक्षको सिंचितकर
बढ़ाने लगे॥ ७०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र््रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे शिवाशिवविहारवर्णने नामद्राविंशोऽध्यायः ॥ २२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें शिवा-शिवविहारवर्णन
नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
सतीके पूछनेपर शिवद्वारा भक्तिकी महिमा तथा नवधा भक्तिका निरूपण
ब्रह्मोवाच
एवं कृत्वा विहारं वै शंकरेण च सा सती।
संतुष्टा साभवच्चाति विरागा समजायत॥ १
एकस्मिन्दिवसे देवी सती रहसि सङ्गता।
शिबंप्रणम्य सद्भवत्या न्यस्योच्चैः सुकृताञ्जलिः॥ २
सुप्रसन्नं प्रभुं नत्वा सा दक्षतनया सती।
उवाच साञ्जलिर्भक्त्या विनयावनता ततः॥ ३
सत्युवाच
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
दौनोद्धर महायोगिन् कृपां कुरु ममोपरि॥ ४
त्वं परः पुरुषः स्वामी रजःसत्त्वतमःपरः।
निर्गुण: सगुण: साक्षी निर्विकारी महाप्रभुः॥ ५
धैनयाहं ते प्रिया जाता कामिनी सुविहारिणी।
जातस्त्वं मे पतिः स्वामिन् भक्तवात्सल्यतो हर॥ ६
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! इस प्रकार शंकरजीके
साथ विहार करके वे सती कामसे सन्तुष्ट हो गयीं
और उनके मनमें वैराग्य उत्पन्न होने लगा॥ १॥
एक दिनकी बात है, देवी सती एकान्तमें
भगवान् शंकरसे मिलीं और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर
दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं। भगवान् शंकरको
प्रसन्नचित्त जानकर विनयभावसे दक्षकुमारी सती
कहने लगीं-॥ २-३॥
सती बोलीं-हे देवदेव! हे महादेव!
हे करुणासागर! हे प्रभो! हे दीनोद्धारपरायण।
हे महायोगिन्! मुझपर कृपा कीजिये॥४॥
आप परमपुरुष हैं, इस जगतूके स्वामी हैं,
रजोगुण-तमोगुण एवं सत्त्वगुणसे परे हैं, निर्गुण हैं,
सगुण भी हैं, सबके साक्षी हैं, निर्विकार हैं और
महाप्रभु हैं॥ ५॥
मैं धन्य हूँ, जो आपकी कामिनी और आपके
साथ सुन्दर विहार करनेवाली आपकी प्रिया हुई। हे
स्वामिन्! हे हर! आप अपनी भक्तवत्सलताके कारण
ही मेरे स्वामी हुए॥ ६॥
४१२
श्रीशिवमहापुराण
[अण २३
कृतो बहुसमा नाथ विहारः परमस्त्वया।
संतुष्टाहं महेशान निवृत्तं मे मनस्ततः॥ ७
ज्ञातुमिच्छामि देवेश परं तत्त्वं सुखावहम्।
येन संसारदुःखाद्वै तरेजीवोऽञ्जसा हर॥ ८
यत्कृत्वा विषयी जीवः स लभेत्परमं पदम्।
संसारी न भवेन्नाथ तत्त्वं वद कृपां कुरु॥ ९
ब्रह्मोवाच
इत्यपृच्छत्स्म सद्भक्त्या शंकरं सा सती मुने।
आदिशक्तिर्महेशानी जीवोद्धाराय केवलम्॥ १०
आकर्ण्य तच्छिवः स्वामी स्वेच्छयोपात्तविग्रहः।
अवोचत्परमप्रीतः सतीं योगविरक्तधीः॥ ११
शिव उवाच
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि दाक्षायणि महेश्वरि।
परं तत्त्वं तदेवानुशयी मुक्तो भवेद्यतः॥ १२
परतत्त्वं विजानीहि विज्ञानं परमेश्वरि।
द्वितीयं स्मरणं यत्र नाहं ब्रह्मेति शुद्धधीः॥ १३
तहुर्लभं त्रिलोकेऽस्मिस्तज्ज्ञाता विरलः प्रिये।
'यादृशो यः स दासोऽहं ब्रह्म साक्षात्परात्परः॥ १४
तन्माता मम भक्तिश्च भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।
सुलभा मत्प्रसादाद्धि नवधा सा प्रकीर्तिता॥ १५
भक्ती जञाने न भेदो हि तत्कतुं: सर्वदा सुखम्।
विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः॥ १६
हे नाथ! मैंने आपके साथ बहुत कतो बहसमा नाथ विहार. परमस्लया। | हे नाथ! गे आपके साथ बहुत दिनोतक वर
किया। हे महेशान! इससे मैं सन्तुष्ट हो गयी हूँ । अब
मेरा मन उधरसे हट गया है॥ ७॥
हे देवेश! अब मैं परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करा
चाहती हूँ, जो सुख प्रदान करनेवाला है तथा हे हर!
जिसको जान लेनेपर समस्त जीव |
अनायास ही उद्धार प्राप्त कर लेते हैं॥ ८॥
हे नाथ! जिस कर्मका अनुष्ठान करके विषयी
जीव भी परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा पुन:
संसारबन्धनमें नहीं पड़ता है, उस परमतत्त्वको आप
बताइये, मुझपर कृपा कीजिये॥ ९॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! इस प्रकार आदिशक्ति
महेश्वरी सतीने केवल जीवोंके उद्धारके लिये उत्तम
भक्तिभावसे भगवान् शंकरसे इस प्रकार पूछा॥ १०॥
तब इसे सुनकर स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले
तथा योगके द्वारा भोगसे विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवजी
अत्यन्त प्रसन्न होकर सतीसे कहने लगे-॥ ११॥
शिवजी बोले--हे देवि! हे दक्षनन्दिनि! हे
महेश्वरि! सुनो, मैं उस परमतत्त्वका वर्णन करता हूँ,
जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो जाता
है॥१२॥
हे सती! तुम विज्ञानको परमतत्त्व जानो । विज्ञान
वह है, जिसके उदय होनेपर “मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा दृढ
निश्चय हो जाता है। ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी
वस्तुका स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुषकी
बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है॥ १३॥
हे प्रिये! वह विज्ञान दुर्लभ है,
उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है। वह जो और
जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है। साक्षात् परात्पर
ब्रह्म है॥ १४॥
इस प्रकारके विज्ञानकी माता केवल मेरी भरि
है, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करती है | वर्ह ।
मेरी कृपासे सुलभ होती है। वह भक्ति नौ प्रकारकी
कही गयी है। हे सति! भक्ति और ज्ञानमें कोई भेद
नहीं है। भक्त और ज्ञानी दोनोंको ही सदा सुख परा
होता है। भक्तिके विरोधीको विज्ञानकी प्राप्ति गहै
होती ॥ १५-१६॥
अ० २३]
भक्ताधीः सदाहं वे तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि।
नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशय: ॥ १७
या भक्तिद्विविधा देवि सगुणा निर्गुणा मता।
वैधी स्वाभाविकी या या वरा सा त्ववरा स्मृता॥ १८
नैष्ठिक्यनैष्ठिकी भेदाद् द्विविधे द्विविधे हि ते।
षड्विधा नैष्ठिकी ज्ञेया द्वितीयैकविधा स्मृता॥ १९
विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुर्बुधाः।
तयोर्बहुविधत्वाच्य तत्त्वं त्वन्यत्र वर्णितम्॥ २०
ते नवाङ्गे उभे ज्ञेये वर्णिते मुनिभिः प्रिये।
वर्णयामि नवाङ्गानि प्रेमतः शृणु दक्षजे॥ २१
श्रवणं कीर्तनं चेव स्मरणं सेवनं तथा।
दास्यं तथार्चनं देवि वंदनं मम सर्वदा॥ २२
सख्यमात्मार्पणं चेति नवाङ्गानि विदुर्बुधा: ।
उपाङ्गानि शिवे तस्या बहूनि कथितानि वै॥ २३
श्ृणु देवि नवाङ्गानां लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
मम भक्तेर्मनो दत्त्वा भुक्तिमुक्तिप्रदानि हि॥ २४
कथादे्नित्यसम्मानं कुर्वन्देहादिभिर्मुदा।
स्थिरासनेन तत्पानं यत्तच्छूवणमुच्यते॥ २५
हदाकाशेन संपश्यन् जन्मकर्माणि वै मम।
्रत्योच्चोच्चारणं तेषामेतत्कीर्तनमुच्यते॥ २६
व्यापकं देवि मां दृष्ट्वा नित्यं सर्वत्र सर्वदा।
निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहतम्॥ २७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४१३
हे देवि! मैं सदा भक्तके अधीन रहता हूँ. और
भक्तिके प्रभावसे जातिहीन नीच मनुष्योंके घरोंमें भी
चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ १७॥
हे देवि! वह भक्ति दो प्रकारकी कही गयी है,
सगुण और निर्गुण। जो वैधी अर्थात् शास्त्रविधिसे
प्रेरित और स्वाभाविकी भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है
और इससे भिन्न जो कामनामूलक भक्ति है, वह
निम्नकोटिकी कही गयी है। सगुण और निर्गुण
भक्ति-ये दोनों प्रकारकी भक्तियाँ नैष्ठिकी और
अनैष्ठिकीके भेदसे दो प्रकारकी हो जाती हैं। नैष्ठिकी
भक्ति छः प्रकारवाली जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी
एक ही प्रकारकी कही गयी है॥ १८-१९॥
विद्वान् पुरुष विहिता और अविहिता आदि
भेदसे उसे अनेक प्रकारकी मानते हैं । इन द्विविध
भक्तियोंके बहुतसे भेदःप्रभेद होनेके कारण इनके
तत्वका अन्यत्र वर्णन किया गया है। हे प्रिये!
मुनियोंने सगुण और निर्गुण दोनों भक्तियोंके नौ अंग
बताये हैं। हे दक्षनन्दिनि! मैं उन नौ अंगोंका वर्णन
करता हूँ, तुम प्रेमसे सुनो॥ २०-२१॥
हे देवि! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य,
अर्चन, सदा मेरा वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण
विद्वानोंने भक्तिके ये नौ अंग माने हैं। हे शिवे! इसके
अतिरिक्त उस भक्तिके बहुत-से उपांग भी कहे गये
हैं॥ २२-२३॥
हे देवि! अब तुम मन लगाकर मेरी भक्तिके नौ
अंगोंके पृथक्-पृथक् लक्षण सुनो, जो भोग तथा मोक्ष
प्रदान करनेवाले हैं । जो स्थिर आसनपर बैठकर तन-
मन आदिसे मेरे कथा-कीर्तन आदिका नित्य सम्मान
करते हुए प्रसन्नतापूर्वक [अपने श्रवणपुटोंसे] उसका
पान किया जाता है, उसे श्रवण कहते हैं ॥ २४-२५॥
जो हृदयाकाशके द्वारा मेरे दिव्य जन्म एवं
कर्मोका चिन्तन करता हुआ प्रेमसे वाणीद्वारा उनका
उच्च स्वरसे उच्चारण करता है, उसके इस भजनसाधनको
कीर्तन कहा जाता है। हे देवि! मुझ नित्य महेश्वरको
सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर संसारमें निरन्तर
निर्भय रहनेको स्मरण कहा गया है [यह निर्गुण
स्मरण भक्ति है।] ॥ २६-२७॥
४१९४
श्रीशिवमहापुराण
[अ० २३
अरुणोदयमारभ्य सेवाकालेऽञ्रिता हृदा।
निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहतम्॥ २८
सदा सेव्यानुकूल्येन सेवनं तद्धि गोगणैः।
हृदयामृतभोगेन प्रियं दास्यमुदाहृतम्॥ २९
सदा भृत्यानुकूल्येन विधिना मे परात्मने।
अर्पणं षोडशानां वै पाद्यादीनां तदर्चनम्॥ ३०
मंत्रोच्चारणध्यानाभ्यां मनसा वचसा क्रमात्।
यदष्टाङ्गेन भूस्पर्श तद्वै वंदनमुच्यते॥ ३१
मङ्गलामङ्गलं यद्यत्करोतीतीश्वरो हि मे।
सर्व तन्मङ्गलायेति विश्वासः सख्यलक्षणम्॥ ३२
कृत्वा देहादिकं तस्य प्रीत्यै सर्वं तदर्पणम्।
निर्वाहाय च शान्यत्वं यत्तदात्मसमर्पणम्॥ ३३
नवाङ्गानीति मद्भक्त भुक्तिमुक्तिप्रदानि च।
मम प्रियाणि चातीव ज्ञानोत्पत्तिकराणि च॥ ३४
उपाङ्गानि च मद्भक्तेर्बहूनि कथितानि वै।
बिल्वादिसेवनादीनि समूह्यानि विचारतः॥ ३५
इत्थं साङ्गोपाङ्गभक्तिर्मम सर्वोत्तमा प्रिये।
ज्ञानवैराग्यजननी मुक्तिदासी विराजते॥ ३६
सर्वकर्मफलोत्पत्तिः सर्वदा त्वत्समप्रिया।
यच्चित्ते सा स्थिता नित्यं सर्वदा सोऽति मत्प्रिय: ॥ ३७
वाचाच १. ०
अरुणोदयकाले प्रारम्भकर शयनपर्यन्त तत्प.
चित्तसे निर्भय होकर भगवद्विग्रहकी सेवा करनेको स्मरण
कहा जाता है [यह सगुण स्मरण भक्ति है |] ॥ २८ {
हर समय सेव्यकी अनुकूलताका ध्यान रखते
हुए हृदय और इन्द्रियोंसे जो निरन्तर सेवा की जाती
है, वही सेवन नामक भक्ति है। अपनेको प्रभुका
किंकर समझकर हृदयामृतके भोगसे स्वामीका सदा
प्रिय-सम्पादन करना दास्य कहा गया है॥ २९॥
अपनेको सदा सेवक समझकर शास्त्रीय विधिसे
मुझ परमात्माको सदा पाद्य आदि सोलह उपचारोंका
जो समर्पण करना है, उसे अर्चन कहा जाता है ॥ ३०॥
वाणीसे मन्त्रका उच्चारण करते हुए तथा मनसे
ध्यान करते हुए आठों अंगोंसे भूमिका स्पर्श करते हुए
जो इष्टदेवको अष्टांग प्रणाम* किया जाता है, उसे
वन्दन कहा जाता है॥ ३१॥
ईश्वर मंगल-अमंगल जो कुछ भी करता है, वह
सब मेरे मंगलके लिये है-ऐसा दृढ़ विश्वास रखना
सख्य भक्तिका लक्षण है॥ ३२॥
देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जानेवाली
वस्तु है, वह सब भगवानूकी प्रसन्नताके लिये
उन्हींको समर्पित करके अपने निर्वाहके लिये कुछ भी
बचाकर न रखना अथवा निर्वाहकी चिन्तासे भी रहित
हो जाना, आत्मसमर्पण कहा जाता है॥ ३३॥
मेरी भक्तिके ये नौ अंग हैं, जो भोग तथा मोक्ष
प्रदान करनेवाले हैं। इनसे ज्ञान प्रकट हो जाता है तथा
ये साधन मुझे अत्यन्त प्रिय हैं मेरी भक्तिके अनेक
उपांग भी कहे गये हैं। जैसे बिल्व आदिका सेवन,
इनको विचारसे समझ लेना चाहिये॥ ३४-३५॥
हे प्रिये! इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति
सबसे उत्तम है | यह ज्ञान-वैराग्यकी जननी है
मुक्ति इसकी दासी है हे देवि! भक्ति सर्वदा सभी कमे
फलोंको देनेवाली है, यह भक्ति मुझे सदा तुम्हारे समा
ही प्रिय है। जिसके चित्तमें नित्यः निरन्तर यह
* दोनों चरणों, दोनों हाथों, दोनों जानुओं, वक्षःस्थल, सिर, मन, वाणी तथा भक्तिभाव (मतान्तरे दृष्टिसे) इस प्रकार आर्ट
अंगोंसे भूमिपर दण्डकी भाँति लेटकर जो प्रणाम किया जाता है, वह अष्टांग-प्रणाम कहलाता है--
दोभ्याँ पद्भ्यां च जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा। मनसा वचसा भक्त्या प्रणामोऽष्टाङ्ग ईरितः ॥
(आचारेन्दुमें नरसिंहपुराणका वच)
अ० २३]
त्रैलोक्ये भक्तिसदृश: पंथा नास्ति सुखावह: ।
चतुर्युगेषु देवेशि कलौ तु सुविशेषतः॥ ३८
कलौ तु ज्ञानवैराग्यौ वृद्धरूपौ निरुत्सवौ।
ग्राहकाभावतो देवि जातौ जर्जरतामति॥ ३९
कलौ प्रत्यक्षफलदा भक्तिः सर्वयुगेष्वपि।
तत्प्रभावादहं नित्यं तद्वशो नात्र संशयः॥ ४०
यो भक्तिमान्पुमाँल्लोके सदाहं तत्सहायकृत्।
विघ्नहर्ता रिपुस्तस्य दंड्यो नात्र च संशय: ॥ ४९
भक्तहेतोरहं देवि कालं क्रोधपरिप्लुतः।
अदहं वह्निना नेत्रभवेन निजरक्षकः॥ ४२
भक्तहेतोरहं देवि रव्युपर्यभवं किल।
अतिक्रोधान्वितः शूलं गृहीत्वान्वजयं पुरा॥ ४३
भक्तहेतोरहं देवि रावणं सगणं क्रुधा।
त्यजामि स्म कृतो नैव पक्षपातो हि तस्य वे॥ ४४
भक्तहेतोरहं देवि व्यासं हि कुमतितग्रहम्।
काश्या न्यसारयं क्रोधाइण्डयित्वा च नंदिना॥ ४५
किं बहूक्तेन देवेशि भक्ताधीनः सदा हाहम्।
तत्कर्तुः पुरुषस्यातिबशगो नात्र संशयः॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्थमाकर्ण्यं भक्तेस्तु महत्त्वं दक्षजा सती।
जहर्षातीव मनसि प्रणनाम शिवं मुदा॥ ४७
पुनः पप्रच्छ सद्भक्त्या तत्काण्डविषयं मुने।
शास्त्रं सुखकरं लोके जीवोद्धारपरायणम्॥ ४८
सयन्रमन्त्रशास्त्रं च तन्माहात्म्यं विशेषतः।
अन्यानि धर्मवस्तूनि जीवोद्धारकराणि हि॥ ४९
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४१५
हे देवेशि! तीनों लोकों और चारों युगोंमें
भक्तिके समान दूसरा कोई सुखदायक मार्ग नहीं हैं।
कलियुगमें तो यह विशेष सुखद एवं सुविधाजनक है;
क्योंकि कलियुगमें प्रायः ज्ञान और वैराग्य दोनों ही
ग्राहकके अभावके कारण वृद्ध, उत्साहशून्य और
जर्जर हो जाते हैं ॥ ३८-३९॥
परंतु भक्ति कलियुगमें तथा अन्य सभी युगोंमें
भी प्रत्यक्ष फल देनेवाली है। भक्तिके प्रभावसे मैं सदा
भक्तके वशमें रहता हूँ, इसमें सन्देह नहीँ है॥ ४०॥
संसारमें जो भक्तिमान् पुरुष है, उसकी मैं सदा
सहायता करता हूँ और उसके कष्टोंको दूर करता हूँ।
उस भक्तका जो शत्रु होता है, वह मेरे लिये दण्डनीय
है, इसमें संशय नहीं है॥ ४१॥
हे देवि! मैं अपने भक्तोंका रक्षक हूँ, भक्तकी
रक्षाके लिये ही मैंने कुपित होकर अपने नेत्रजनित
अग्निसे कालको भी भस्म कर डाला था॥४२॥
हे देवि! भक्तकी रक्षाके लिये मैं पूर्वकालमें
सूर्यपर भी अत्यन्त क्रोधित हो उठा था और मैंने
त्रिशूल लेकर सूर्यको भी जीत लिया था॥ ४३॥
हे देवि! मैंने भक्तके लिये सैन्यसहित रावणको
भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई
पक्षपात नहीं किया। हे देवि! भक्तोंके लिये ही मैंने
कुमतिसे ग्रस्त व्यासको नन्दीद्वारा दण्ड दिलाकर उन्हें
काशीके बाहर निकाल दिया॥ ४४-४५॥
हे देवेशि! बहुत कहनेसे क्या लाभ, मैं सदा ही
भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्ति करनेवाले पुरुषके
अत्यन्त वशमें हो जाता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४६॥
ब्रह्माजी बोले--[ नारद!] इस प्रकार भक्तिका
महत्त्व सुनकर दक्षकन्या सतीको बड़ा हर्ष हुआ और
उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवको मन-
ही-मन प्रणाम किया॥ ४७॥
हे मुने! देवी सतीने पुन: भक्तिविषयक शास्त्रके
विषयमे बड़े आदरपूर्वक पूछा, जो लोकमें सुखदायक
तथा जीवोंके उद्धारका साधन है॥४८॥
हे मुने! उन्होंने यन्त्र, मन्त्रशास्त्र, उनके माहात्म्य
तथा अन्य जीवोद्धारक धर्ममय साधनोंके विषयमें
विशेष रूपसे जाननेकी इच्छा प्रकट की॥ ४९॥
४१६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० २४
शंकरोऽपि तदाकर्ण्य सतीप्रश्नं प्रहृष्टधी:।
वर्णयामास सुप्रीत्या जीवोद्धाराय कृत्स्नश: ॥ ५०
तन्त्रशास्त्रं सयन्त्रं हि सपञ्चाङ्गं महेश्वर: ।
बभाषे महिमानं च तत्तदेववरस्य वै॥ ५१
सेतिहासकथां तेषां भक्तमाहात्म्यमेव च।
सवर्णाश्रमधर्माश्च॒ नृपधर्मान् मुनीश्वर ५२
सुतस्त्रीधर्ममाहात्म्यं वर्णाश्रममनश्वरम्।
बैद्याशास्त्रं तथा ज्योतिःशास्त्रं जीवसुखावहम्॥ ५३
सामुद्रिकं परं शास्त्रमन्यच्छास्त्राणि भूरिशः।
कृपां कृत्वा महेशानो वर्णयामास तत्त्वतः ॥ ५४
इत्थं त्रिलोकसुखदौ सर्वज्ञौ च सतीशिवो।
लोकोपकारकरणधृतसद्गुणविग्रहो ॥५५
चिक्रीडाते बहुविधं कैलासे हिमवद् गिरो।
अन्यस्थलेषु च तदा परब्रह्मस्वरूपिणौ॥ ५६
सतीके इस प्रश्नको सुनकर शंकरजीके मने
बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने जीवोंके उद्धारके लिये सब
शास्त्रोंका प्रेमपूर्वक वर्णन किया॥ ५०॥
महेश्वरने पाँचों अंगसहित तन्तरशास्त्र, यन्रशाज़
तथा भिन्न-भिन्न देवेश्वरोंकी महिमाका वर्णन
किया॥ ५१॥
है मुनीश्वर! महेश्वरने कृपा करके
इतिहास--कथासहित उन देवताओंके भक्तोंकी
महिमा, वर्णाश्रमधर्म, राजधर्म, पुत्र और स्त्रीके
धर्मकी महिमा, कभी नष्ट न होनेवाले वर्णाश्रम,
जीवोंको सुख देनेवाले वैद्यकशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र,
उत्तम सामुद्रिकशास्त्र तथा अन्य भी बहुतसे शास्त्रोंका
तत्त्वत: वर्णन किया॥ ५२--५४॥
इस प्रकार लोकोपकार करनेके लिये
सद्गुणसम्मन्न शरीर धारण करनेवाले, तीनों लोकोंको
सुख देनेवाले सर्वज्ञ परब्रह्मस्वरूप शिव और सतीने
'हिमालयपर्वतके कैलासशिखरपर तथा अन्यान्य
स्थानोंमें अनेक प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ ५५-५६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे भक्तिप्रभाववर्णतं नाम त्रयोविशोऽ ध्यायः ॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें भक्तिके
ग्रभावका वर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
iF
अथ चतुर्विशोऽध्यायः
दण्डकारण्यमें शिवको रामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका
मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा रामकी परीक्षा
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे प्रजानाथ महाप्राज्ञ कृपाकर।
श्रावितं शंकरयशः सतीशंकरयोः शुभम्॥ १
इदानीं ब्रूहि सत्प्रीत्या परं तद्यश उत्तमम्
किमकार्ष्टा हि तत्स्थो वे चरितं दंपती शिवो॥ २
ब्रह्मोवाच
सतीशिवचरित्रं च श्रृणु मे प्रेमतो मुने।
लौकिकीं गतिमाश्रित्य चिक्रीडाते सदान्वहम्॥ ३
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! हे विधे!
हे प्रजानाथ! हे महाप्राज्ञ! हे कृपाकर!
भगवान् शंकर तथा देवी सतीके मंगलकारी यशकी
श्रवण कराया है॥ १॥
अब इस समय पुनः प्रेमपूर्वक उनके उरत
चरित्रका वर्णन कीजिये। उन दम्पती शिवा-शिव
वहाँ रहकर कौन-कौन-सा चरित्र किया था?॥९॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! आप मुझसे सती और
शिवके चरित्रका प्रेमपूर्वक श्रवण कीजिये। वें दी
दम्पती वहाँ लौकिक गतिका आश्रय ले नित्य
क्रोडा करते थे॥ ३॥
अ० २४]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४९७
ततः सती महादेवी वियोगमलभन्मुने।
स्वपतः शंकरस्येति वदन्त्येके सुबुद्धयः॥ ४
वागर्थाविव संपृक्तौ शक्तीशौ सर्वदा चितौ।
क्रथं घटेत च तयोर्वियोगस्तत्त्वतो मुने॥ ५
लीलारुचित्वादथवा संघटेताखिलं च तत्।
कुरुते यद्यदीशौ च सतीशौ भवरीतिगो॥ ६
सा त्यक्ता दक्षजा दृष्ट्वा पतिना जनकाध्वरे।
शंभोरनादरात्तत्र देह तत्याज सङ्गता॥ ७
पुनर्हिमालये सैवाविर्भूता नामतः सती।
पार्वतीति शिवं प्राप तप्त्वा भूरि विवाहतः॥ ८
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारदः।
पप्रच्छ च विधातारं शिवाशिवमहद्यशः॥ ९
नारद उवाच
विष्णुशिष्य महाभाग विधे मे वद विस्तरात्।
शिवाशिवचरित्र तद्भवाचारपरानुगम्॥ १०
किमर्थ शंकरो जायां तत्याज प्राणतः प्रियाम्।
तस्मादाचक्ष्वव मे तात विचित्रमिति मन्महे॥ १९
कुतोऽध्वरेऽजः पुत्रस्यानादरोऽभूच्छिवस्य ते।
कथं तत्याज सा देहं गत्वा तत्र पितुः क्रतौ॥ १
ततः किमभवत्तत्र किमकार्षीन्महेश्वरः ।
तत्सर्वं मे समाचक्ष्व श्रद्धायुक् तच्छुतावहम्॥। १३
ब्रह्मोवाच
शृणु तात परप्रीत्या मुनिभिः सह नारद।
सुतवर्य महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः॥ १४
नमस्कृत्य महेशानं हयांदिसुरसेवितम्।
परब्रह्म प्रवक्ष्यामि तच्चरित्रं महाद्धुतम्॥ १५
2223 Shivmahapuranam. Part J-Section-l5_l-Front
हे मुने! तदनन्तर महादेवी सतीको अपने पति
शंकरका वियोग प्राप्त हुआ--ऐसा कुछ श्रेष्ठ बुद्धिवाले
विद्वानोंका कथन है॥ ४॥
परंतु हे मुने! वास्तवमें उन दोनों शक्ति और
शक्तिमान्का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है;
क्योंकि चिन्मय वे दोनों वाणी और अर्थके समान
एक-दूसरेसे सदा मिले-जुले हैं॥ ५॥
फिर भी सर्वसमर्थ सती एवं शिव लीलाप्रिय
होनेके कारण लोकः व्यवहारका अनुसरण करते हुए
जो कुछ भी करते हैं, वह सब समीचीन ही है ॥ ६॥
दक्षकन्या सतीने जब देखा कि मेरे पतिने मुझे
त्याग दिया है, तब वे अपने पिता दक्षके यज्ञमें गयीं
और वहाँ भगवान् शंकरका अनादर देखकर उन्होंने
अपना शरीर त्याग दिया॥७॥
वे ही सती पुनः हिमालयके घर पार्वतीके नामे
प्रकट हुई और कठोर तपस्या करके उन्होंने विवाहके
द्वारा पुनः भगवान् शिवको प्राप्त कर लिया॥ ८॥
सूतजी बोले [हे महर्षियो!] ब्रह्माजीकी इस
बातको सुनकर नारदजी ब्रह्माजीसे शिवा और शिवके
महान् यशके विषयमें इस प्रकार पूछने लगे-- ॥ ९॥
नारदजी बोले--हे विष्णुशिष्य। हे महाभाग! हे
विधे! आप मुझे शिवाशिवके लोक-आचारसे सम्बन्ध
रखनेवाले उनके चरित्रको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १० ॥
हे तात! भगवान् शंकरजीने प्राणोंसे भी प्यारी
अपनी धर्मपत्नी सतीका किसलिये त्याग किया ? यह
घटना बड़ी विचित्र जान पड़ती है, अतः इसे आप
अवश्य कहिये॥ ११॥
आपके पुत्र दक्ष प्रजापतिने यज्ञमें भगवान् शंकरका
अनादर क्यों किया और वहाँ अपने पिताके यज्ञमें जाकर
सतीने अपने शरीरका त्याग क्यों किया ?॥ १२॥
पुनः उसके बाद क्या हुआ? महेश्वरने क्या
किया? ये सब बातें मुझसे कहिये। मैं इस वृत्तान्तको
श्रद्धायुक्त होकर सुनना चाहता हूँ॥ १३॥
ब्रह्माजी बोले--मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ! हे
तात! हे नारद! आप महर्षियोंके साथ बड़े प्रेमसे भगवान्
चन्द्रमौलिका चरित्र सुनिये। श्रीविष्णु आदि देवताओंसे
सेवित परब्रह्म परमेश्वरको नमस्कार करके मैं उनके
महान् अद्भुत चरित्रका वर्णन करता हूँ॥ १४-१५॥
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४१८
श्रीशिवमहापुराण
[ 27 कता जी. २४
सर्वेयं शिवलीला हि बहुलीलाकरः प्रभुः।
स्वतंत्रो निर्विकारी च सती सापि हि तद्विधा ॥ दे
अन्यथा कः समर्थो हि तत्कर्मकरणे मुने।
परमात्मा परब्रह्म स एव परमेश्वर:॥ १७
यं सदा भजते श्रीशोऽहं चापि सकलाः सुराः।
मुनयश्च महात्मानः सिद्धाश्च सनकादयः॥ १८
शेषः सदा यशो यस्य मुदा गायति नित्यशः।
पारं न लभते तात स प्रभु: शंकरः शिव:॥ १९
तस्यैव लीलया सर्वोऽयमिति तत्त्वविभ्रमः।
तत्र दोषो न कस्यापि सर्वव्यापी स प्रेरक: ॥ २०
एकस्मिन्समये रुद्रः सत्या त्रिभवगो भव: ।
वृषमारुह्य पर्याटद्रसां लीलाविशारदः॥ २१
आगत्य दण्डकारण्यं पर्यटन् सागराम्बराम्।
दर्शयन् तत्रगां शोभां सत्यै सत्यपणः प्रभु:॥ २२
तत्र रामं ददर्शासौ लक्ष्मणेनान्वितं हर: ।
अन्विष्यन्तं प्रियां सीतां रावणेन हृतां छलात्॥ २३
हा सीतेति प्रोच्चरन्तं विरहाविष्टमानसम्।
यतस्ततश्च पश्यन्तं रुदन्तं हि मुहुर्मुहु:॥ २४
समिच्छन्तं च तत्प्राप्तिं पृच्छन्तं तद्गतिं हृदा।
कुजादिभ्यो नष्टधियमत्रपं शोकविह्ृलम्॥ २५
सूर्यवंशोद्धवं वीरं भूपं दशरथात्मजम्।
भरताग्रजमानंदरहितं विगतप्रभम्॥ २६
पूर्णकामो वराधीनं प्राणमत्स्म मुदा हरः।
रामं भ्रमन्तं विपिने सलक्ष्मणमुदारधीः ॥ २७
जयेत्युकत्चान्यतो ऽगच्छन्नदात्तस्मै स्वदर्शनम्।
रामाय विपिने तस्मिन् शंकरो भक्तवत्सलः ॥ २८
हे मुने! यह सब शिवकी लीला है। बेग
अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले, स्वतन्त्र
निर्विकार हैं। देवी सती भी वैसी ही हैं। हे मुने!
अन्यथा वैसा कर्म करनेमें कौन समर्थ हो सकता है।
परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं॥ १६- १७॥
जिनका भजन सदा श्रीपति विष्णु, मैं ब्रह्मा
समस्त देवतागण, महात्मा, मुनि, सिद्ध तथा सनकादि
सदैव करते रहते हैं। शेषजी प्रसन्नतापूर्वक जिनके
यशका निरन्तर गान करते रहते हैं, किंतु कभी भी
उनका पार नहीं पाते हैं, वे ही शंकर सबके प्रभु तथा
ईश्वर हैं ॥ १८-१९॥
यह सब तत्त्वविभ्रम उन्हींकी लीलासे हो रहा
है। इसमें किसीका दोष नहीं है; क्योंकि वे सर्वव्यापी
ही प्रेरक हैं। एक समयकी बात है तीनों लोकोंमें
विचरण करनेवाले, लीलाविशारद भगवान् रुद्र सतीके
साथ वृषभपर आरूढ़ हो पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे
थे॥ २०-२१॥
सागर और आकाशमें घूमते-घूमते दण्डकारण्यम
आकर सत्य प्रतिज्ञावाले वे प्रभु सतीको वहाँकी शोभा
दिखाने लगे। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित श्रीरामको
देखा, जो रावणद्वारा बलपूर्वक हरी गयी अपनी प्रिया
पत्नी सीताकी खोज कर रहे थे॥ २२-२३॥
वे "हा सीते!' इस प्रकार उच्च स्वरसे पुकार रहे
थे, जहाँ-तहाँ देख रहे थे और बार-बार रो रहे थे,
उनके मनमें विरहका आवेश छा गया था॥ २४॥
वे उनकी प्राप्तिकी इच्छा कर रहे थे, मनमें उनकी
दशाका विचार कर रहे थे, वृक्ष आदिसे उनके विषयमें
पूछ रहे थे, उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, वे लजासे
रहित हो गये थे और शोकसे विहल थे॥ २५॥
वे सूर्यवंशमें उत्पन्न, वीर, भूपाल, दशरथनन्दन,
भरताग्रज थे। आनन्दरहित होनेके कारण
कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय उदारचेता
पूर्णकाम भगवान् शंकरने लक्ष्मणके साथ वनमें
हुए माता कैकेयीके वरोंके अधीन उन रामको बड़ी
प्रसनताके साथ प्रणाम किया और जय-जयकार करे
वे दूसरी ओर चल दिये। उन भक्तवत्सल शंकरने उस
वनमें श्रीरामको पुन: दर्शन नहीं दिया॥ २६--२८॥
अ० २४] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४१९
सती दृष्ट्वा शिवलीलां विमोहनीम्। मोहमें डालनेवाली भगवान् शिवकी ऐसी लीलाको
सुविस्मिता शिवं प्राह शिवमायाविमोहिता॥ २९ सतीको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे उनकी मायासे
मोहित हो उनसे इस प्रकार कहने लगीं-- ॥ २९॥
ल्यवाच सती बोलीं--हे देवदेव! हे परब्रह्म! हे सर्वेश!
देवदेव परब्रह्म सर्वेश परमेश्वर। हे परमेश्वर ! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही
सेवन्ते त्वां सदा सर्वे हरिब्रह्मादयः सुराः॥ ३० | सेवा सदा करते रहते हैं। आप ही सबके द्वारा प्रणाम
त्व॑ प्रणम्यो हि सर्वेषां सेव्यो ध्येयश्च सर्वदा। करनेयोग्य हैं।सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान
बेदांतवेद्यो यत्नेन निर्विकारी परप्रभुः॥ ३१
काविमौ पुरुषौ नाथ विरहव्याकुलाकृती।
विचरन्तौ वने क्लिष्टौ दीनौ वीरौ धनुर्धरौ॥ ३२
तयोज्येष्ठं कञ्जश्यामं दृष्ट्वा वै केन हेतुना।
मुदितः सुप्रसन्नात्माभवो भक्त इवाधुना॥ ३३
इति मे संशयं स्वामिन् शंकर छेत्तुम्हसि।
सेव्यस्य सेवके नैव घटते प्रणतिः प्रभो॥ ३४
ब्रह्मोवाच
आदिशक्ति: सती देवी शिवा सा परमेश्वरी ।
शिवमायावशी भूत्वा पप्रच्छेत्थं शिवं प्रभुम्॥ ३५
तदाकर्ण्य वचः सत्याः शंकरः परमेश्वरः।
तदा विहस्य स प्राह सतीं लीलाविशारदः॥ ३६
परमेश्वर उवाच
शृणु देवि सति प्रीत्या यथार्थ वच्मि नच्छलम्।
वरदानप्रभावात्तु प्रणामं चैवमादरात्॥ ३७
रामलक्ष्मणनामानौ भ्रातरौ वीरसम्मतौ।
सूर्यवंशोद्भवौ देवि प्राज्ञौ दशरथात्मजौ॥ ३८
गौरवर्णो लघुर्बन्धुः शेषेशो लक्ष्मणाभिधः।
जयेष्ठो रामाभिधो विष्णुः पूर्णाशो निरुपद्रवः ॥ ३९
अवतीर्णः क्षितौ साधुरक्षणाय भवाय नः।
इत्युक्त्वा विररामासौ शंभुः सूतिकरः प्रभुः ॥ ४०
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करना चाहिये । वेदान्तशास्त्रके द्वारा यत्नपूर्वक जानने-
योग्य निर्विकार तथा परमप्रभु आप ही हैं ॥ ३०-३१॥
हे नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं, इनकी
आकृति विरह-व्यथासे व्याकुल दिखायी पड़ रही हैं।
ये दोनों धनुर्धर वीर बनमें विचरण करते हुए दुःखके
भागी और दीन हो रहे हैं। उन दोनोंमें नीलकमलके
समान ज्येष्ठ पुरुषको देखकर किस कारणसे आप
आनन्दविभोर हो उठे और भक्तकी भाँति अत्यन्त
प्रसन्नचित्त हो गये ?॥ ३२-३३॥
हे स्वामिन्! हे शंकर! आप मेरे संशयको दूर
कीजिये। हे प्रभो! सेव्य [स्वामी] अपने सेवकको
प्रणाम करे-यह उचित नहीं जान पड़ता॥ ३४॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] कल्याणमयी
परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवीने शिवकी मायाके
वशीभूत होकर जब भगवान् शिवसे इस प्रकार पूछा । तब
सतीकी यह बात सुनकर लीला करनेमें प्रवीण परमेश्वर
शंकरजी हँसकर सतीसे कहने लगे-॥ ३५-३६॥
परमेश्वर बोले--हे देवि! हे सति! सुनो, मैं
प्रसन्नतापूर्वक सत्य बात कह रहा हूँ। इसमें किसी
प्रकारका छल नहीं है । वरदानके प्रभावसे ही मैंने इन्हें
आदरपूर्वक प्रणाम किया है॥ ३७॥
हे देवि! ये दोनों भाई वीरोंद्रारा सम्मानित हैं,
इनके नाम श्रीराम और लक्ष्मण हैं, ये सूर्यवंशमें उत्पन्न
हुए हैं, परम बुद्धिमान् हैं और राजा दशरथके पुत्र हैं॥ ३८॥
इनमें जो गौरवर्णके छोटे भाई हैं, वे शेषके अंश
हैं, उनका नाम लक्ष्मण है। इनमें ज्येष्ठ भाईका नाम
श्रीराम है। ये भगवान् विष्णुके पूर्ण अंश तथा उपद्रवरहित
हैं। ये साधुपुरुषोंकी रक्षा और हमलोगोंके कल्याणके
लिये इस पृथिवीपर अवतरित हुए हैं। इतना कहकर
सृष्टि करनेवाले भगवान् शम्भु चुप हो गये॥ ३९-४०॥
| २०
श्रीशिवमहापुराण
[अ ii "रू
श्रुत्वापीत्थं वचः शम्भोर्न विशश्वास तन्मनः ।
शिवमाया बलवती सैव त्रैलोक्यमोहिनी ॥
अविश्वस्तं मनो ज्ञात्वा तस्याः शंभुः सनातनः।
अवोचद्वचनं चेति प्रभुलीलाविशारदः॥ ४२
शिव उवाच
शृणु मद्वचनं देवि न विश्वसिति चेन्मनः।
स्वयं रामपरीक्षां हि कुरु तत्र स्वया धिया॥ ४३
विनश्यति यथा मोहस्तत्कुरु त्वं सति प्रिये।
गत्वा तत्र स्थितस्तावद् वटे भव परीक्षिका॥ ४४
ब्रह्मोवाच
शिवाज्ञया सती तत्र गत्वाचिन्तयदीश्वरी।
कुर्या परीक्षां च कथं रामस्य वनचारिणः ॥ ४५
सीतारूपमहं धृत्वा गच्छेयं रामसन्निधौ।
यदि रामो हरिः सर्व विज्ञास्यति न चान्यथा॥ ४६
इत्थं विचार्य सीता सा भूत्वा रामसमीपत: ।
अगमत्तत्परीक्षार्थं सती मोहपरायणा॥ ४७
सीतारूपां सतीं दृष्ट्वा जपन्नाम शिवेति च।
विहस्य तत्प्रविज्ञाय नत्वावोचद् रघूद्वहः ॥ ४८
श्रीराम उवाच
प्रेमतस्त्वं सति ब्रूहि क्व शंभुस्ते नमो गत: ।
एकाकी विपिने कस्मादागता पतिना विना॥ ४९
त्यक्त्वा स्वरूपं कस्मात्ते धृतं रूपमिदं सति।
बरूहि तत्कारणं देवि कृपां कृत्वा ममोपरि॥ ५०
ब्रह्मोवाच
इति रामवचः श्रुत्वा चकितासीत्सती तदा।
समृत्वा शिवोक्तं मत्वा चावितथं लज्जिता भृशम्॥ ५१
रामं विज्ञाय विष्णुं तं स्वरूपं संविधाय च।
स्मृत्वा शिवपदं चित्ते सत्युवाच प्रसन्नधीः ॥ ५२
इस प्रकार शिवका वचन सुनकर भी उनके.
विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि शिवकी माया बलवती है
वही तीनों लोकोंको मोहित किये रहती है॥ ४१ | '
सतीके मनमें मेरी बातपर विश्वास नहीं हुआ है.
ऐसा जानकर लीलाविशारद सनातन प्रभु शम्भु यह
वचन कहने लगे ॥ ४२॥
शिवजी बोले--हे देवि! मेरी बात सुनो, यदि
तुम्हारे मनको [मेरे कथनपर] विश्वास नहीं होता है,
तो तुम वहाँ [जाकर] अपनी ही बुद्धिसे श्रीरामकी परीक्षा
स्वयं कर लो। हे सति! हे प्रिये ! जिस प्रकार तुम्हारा भ्रम
दूर हो, वैसा ही तुम करो | तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो,
तबतक मैं इस वटवृक्षके नीचे बैठा हूँ ॥ ४३-४४॥
ब्रह्माजी बोले-- [ हे नारद !] भगवान् शिवकी
आज्ञासे ईश्वरी सती वहाँ जाकर सोचने लगीं कि
मैं वनचारी रामकी कैसे परीक्षा करूँ। मैं सीताका रूप
धारण करके रामके पास चलूँ। यदि राम [साक्षात्]
विष्णु हैं, तो सब कुछ जान लेंगे, अन्यथा वे मुझे नहीं
पहचानेंगे ॥ ४५-४६ ॥
इस प्रकार विचार करके मोहमें पड़ी हुई वे सती
सीताका रूप धारणकर श्रीरामके पास उनकी परीक्षा लेनेके
लिये गयीं। सतीको सीताके रूपमें देखकर शिव-
नामका जप करते हुए रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम सब कुछ
जानकर उन्हें प्रणाम करके हँसकर कहने लगे-
॥ ४७-४८ ॥
श्रीराम बोले--हे सति! आपको नमस्कार है,
आप प्रेमपूर्वक बताइये कि शिवजी कहाँ गये हैं, आप
पतिके बिना अकेली ही इस वनमें क्यों आयी हैं ?॥ ४९॥
हे सति! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये
यह रूप धारण किया है? हे देवि! मुझपर कृपा
करके इसका कारण बताइये ?॥ ५०॥
ब्रह्माजी बोले--रामजीकी यह बात सुनकर
सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजीकी
कही हुई बातका स्मरण करके और उसे सत्य
समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीरामको साक्षात् विष्णु
जानकर अपना रूप धारण करके मन-ही-मन शिवके
चरणोंका चिन्तनकर प्रसन्नचित्त हुई सतीने उनसे इस
प्रकार कहा-॥५१-५२॥
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अ० २५]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४२९
शिवो मया गणैश्चैव पर्यटन् वसुधां प्रभु: ।
इहागच्छच्च विपिने स्वतंत्रः परमेश्वरः ॥ ५३
अपश्यदत्र स त्वां हि सीतान्वेषणतत्परम्।
सलक्ष्मणं विरहिणं सीतया क्लिष्टमानसम्॥ ५४
नत्वा त्वां स गतो मूले वटस्य स्थित एव हि।
प्रशंसन् महिमानं ते वैष्णवं परमं मुदा॥ ५५
चतुर्भुजं हरि त्वां नो दृष्ट्वैव मुदितोऽभवत्।
यथेदं रूपममलं पश्यन्नानंदमाप्तवान्॥ ५६
तच्छुत्वा वचनं शंभोर्भममानीय चेतसि।
तदाज्ञया परीक्षां ते कृतवत्यस्मि राघव॥ ५७
ज्ञातं मे राम विष्णुस्त्वं दृष्टा ते प्रभुताखिला।
निःसंशया तदापि तच्छृणु त्वं च महामते॥ ५८
कथं प्रणम्यस्त्वं तस्य सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः।
कुरु निःसंशयां त्वं मां शमलं प्राप्नुहि द्रुतम्॥ ५९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या रामश्चोत्फुल्ललोचनः।
अस्मरत्स्वं प्रभु शंभुं प्रेमाभूद् हृदि चाधिकम्॥ ६०
सत्या विनाज्ञया शंभुसमीपं नागमन्मुने।
संवर्ण्य महिमानं च प्रावोचद्राघवः सतीम्॥ ६१
[हे रघुनन्दन!] स्वतन्त्र परमेश्वर प्रभु शिव मेरे
| अपने पार्षदोंके साथ पृथिवीपर भ्रमण करते हुए
इस वनमें आये हुए हैं ॥ ५३॥
यहाँ उन्होंने सीताकी खोजमें लगे हुए, उनके
विरहसे युक्त और दुखी चित्तवाले आपको लक्ष्मणसहित
देखा। वे आपको प्रणाम करके चले गये और आपकी
वैष्णवी महिमाकी प्रशंसा करते हुए अत्यन्त आनन्दके
साथ वटवृक्षके नीचे बैठे हैं ॥ ५४-५५ ॥
वे आपके चतुर्भुज विष्णुरूपको देखे बिना ही
आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूपको देखते हुए
उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । शम्भुके वचनको सुनकर
मेरे मनमें भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी । अतः हे राघव ! मैंने
उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है ॥ ५६-५७॥
हे श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप
[साक्षात्] विष्णु हैं। मैंने आपकी सम्पूर्ण प्रभुता देख
ली है। अब मेरा संशय दूर हो गया है, तो भी
महामते! आप मेरी बात सुनें॥५८॥
मेरे सामने यह सच-सच बतायें कि आप उन
शिवके वन्दनीय कैसे हो गये ? आप मुझे संशयरहित
कीजिये और शीघ्र ही मुझे शान्ति प्रदान कीजिये॥५९॥
ब्रह्माजी बोले--[ हे नारद!] उनकी यह बात
सुनकर श्रीरामके नेत्र प्रफुल्लित हो उठे। उन्होने
अपने प्रभु शिवका स्मरण किया। इससे उनके हृदयमें
अत्यधिक प्रेम उत्पन्न हो गया। हे मुने! शिवकी
आज्ञाके बिना वे राघव सतीके साथ भगवान् शिवके
समीप नहीं गये तथा [मन-ही-मन] उनकी महिमाका
वर्णन करके सतीसे कहने लगे॥ ६०-६१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे रामपरीक्षावर्णतं नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
रामपरीक्षा-वर्णन नामक चाँबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक, श्रीरमद्वारा सतीके
मनका सन्देह दूर करना, शिवद्वारा सतीका मानसिक रूपसे परित्याग
श्रीराम उवाच
एकदा हि पुरा देवि शंभुः परमसूतिकृत्।
विश्वकर्माणमाहूय सवलोके परतः परे॥ १
श्रीराम बोले--देवि! प्राचीन कालमें एक
समय परम स्रष्टा भगवान् शम्भुने अपने परम धाममें
विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशालामें
४२२
तेन स्वधेनुशालायां कारयामास विस्तृतं।
रम्यं च भवनं सम्यक् तत्र सिंहासनं वरम्॥
तत्र च्छत्रं महादिव्यं सर्वदाद्भुतमुत्तमम्।
'कारयामास विघ्नार्थं शंकरो विशवकर्मणा॥ ३
शक्रादीनां जुहावाशु समस्तान् देवतागणान्।
सिद्धगंधर्वनागादीनुपदेवांश्च कृत्स्नशः॥ ४
वेदान् सर्वानागमांश्च विधिपुत्रान् मुनीनपि।
देवीः सर्वा अप्सरोभिर्नानावस्तुसमन्विताः॥ ५
देवानां च तथर्षीणां सिद्धानां फणिनामपि।
आनयन् मङ्गलकराः कन्याः षोडश षोडश॥ ६
वीणामृदङ्गप्रमुखवाद्यान्नानाविधान् मुने।
उत्सवं कारयामास वादयित्वा सुगायनेः॥ ७
राजाभिषेकयोग्यानि द्रव्याणि सकलौषधै:।
्रत्यक्षतीर्थपाथोभिः पञ्चकुंभांश्च पूरितान्॥ ८
तथान्याः संविधा दिव्या आनयत्स्वगणैस्तदा।
ब्रह्मघोषं महारावं कारयामास शंकरः॥ ९
अथो हरि समाहूय वैकुंठात्प्रीतमानसः।
तद्भक्त्या पूर्णया देवि मोदति स्म महेश्वरः ॥ १०
सुमुहूर्ते महादेवस्तत्र सिंहासने वरे।
उपवेश्य हरिं प्रीत्या भूषयामास सर्वशः॥ ११
आबद्धरम्यमुकुटं कृतकोतुकमङ्गलम्।
अभ्यषिञ्चन्महेशस्तु स्वयं ब्रह्मांडमंडपे॥ १२
दत्तवान्निखिलेश्वर्यं यन्नैजं नान्यगामि यत्।
ततस्तुष्टाव तं शंभुः स्वतन्त्रो भक्तवत्सलः ॥ १३
ब्रह्माणं लोककर्तारमवोचद्वचनं त्विदम्।
व्यापयन्स्वं वराधीनं स्वतन्त्रं भक्तवत्सलः ॥ १४
महेश उवाच
अतःप्रभृति लोकेश मन्निदेशादयं हरिः।
मम वंद्य: स्वयं विष्णुर्जातः सर्वः श्रृणोति हि॥ १५
श्रीशिवमहापुराण
[अ TS १ ७ ५
एक विस्तृत तथा रमणीय भवन बनवाया और उसमे
एक श्रेष्ठ सिंहासनका भी निर्माण कराया॥ १-२॥
उस सिंहासनपर भगवान् शंकरने विघ्ननिवारणाध
विश्वकर्माद्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही
सदाके लिये अद्भुत और परम उत्तम था॥३॥
उसके बाद उन्होंने इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धो
गन्धर्वो, नागों तथा सम्पूर्ण उपदेवोंको भी शीघ्र वहाँ
बुलवाया। समस्त वेदों, आगमों, ब्रह्माजीके पुत्रों
मुनियों तथा अप्सराओंसहित अनेक प्रकारकी वस्तुओंसे
युक्त समस्त देवियोंको भी आमन्त्रित किया॥४-५॥
[इनके अतिरिक्त] देवताओं, ऋषियों, सिद्धों
और नागोंकी मंगलकारिणी सोलह-सोलह कन्याओंको
भी बुलवाया। हे मुने! उन्होंने वीणा, मृदंग आदि नाना
प्रकारके वाद्योंको बजवाकर सुन्दर गीतोंद्वारा महान्
उत्सव कराया॥ ६-७॥
सम्पूर्ण औषधियोंके साथ राज्याभिषेकके योग्य
द्रव्य, प्रत्यक्ष तीर्थोके जलोंसे भरे हुए पाँच कलश
तथा बहुत-सी दिव्य सामग्रियोंको भगवान् शंकरने
अपने पार्षदोंद्वार मँगवाया और वहाँ उच्च स्वरसे
वेदमन्त्रोंका घोष करवाया॥ ८-९॥
हे देवि! भगवान् विष्णुकी पूर्ण भक्तिसे महेश्वरदेव
सदा प्रसन्न रहते हैं। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर
वैकुण्ठधामसे श्रीहरिको बुलाकर शुभ मुहूर्तमें उन्हे
रेष्ठ सिंहासनपर बैठाकर महादेवजीने स्वयं ही
प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित
किया॥ १०-११॥
उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट बाँधकर और
उत्सव-मंगलाचार करके महेश्वरने स्वयं ब्रह्माण्डमण्डपमें
श्रीहरिका अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा
ऐश्वर्य प्रदान किया, जो वे दूसरोंको नहीं देते थे।
तदनन्तर भक्तवत्सल स्वतन्त्र शम्भुने श्रीहरिका स्तवन
'किया। तत्पश्चात् अपनी पराधीनता (भक्तपरवशता)
को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए लोककर्ता ब्रह्मजीसे
कहा--॥ १२--१४॥
महेश्वर बोले--लोकेश! आजसे मेरी आज्ञाके
१
अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये, ईस
बातको सभी सुन लें । हे तात! आप सम्पूर्ण देवता
अ० २५]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४२३
सवैर्देवादिभिस्तात प्रणम त्वममुं हरिम्।
बर्णयन्तु हरिं वेदा ममैते मामिवाज्ञया॥ १६
श्रीराम उवाच
इत्युक्त्वाथ स्वयं रुद्रो$नमद्ठै गरुडध्वजम्।
विष्णुभक्तिप्रसन्नात्मा वरदो भक्तवत्सलः ॥ १७
ततो ब्रह्मादिभिदेवैः सर्वरूपसुरैस्तथा।
मुनिसिद्धादिभिश्चैव वंदितोऽभृद्धरिस्तदा॥ १८
ततो महेशो हरयेऽशंसद्दिविषदां पुरः।
महाबरान् सुप्रसन्नो दत्तवान् भक्तवत्सलः॥ १९
महेश उवाच
त्वं कर्ता सर्वलोकानां भर्ता हर्ता मदाज्ञया।
दाता धर्मार्थकामानां शास्ता दुर्णयकारिणाम्॥ २०
जगदीशो जगत्पूज्यो महाबलपराक्रमः।
अजेयस्त्वं रणे क्वापि ममापि हि भविष्यसि॥ २१
शक्तित्रयं गृहाण त्वमिच्छादि प्रापितं मया।
नानालीलाप्रभावत्वं स्वतन्त्रत्वं भवत्रये॥ २२
त्वदद्वेष्टारो हरे नूनं मया शास्याः प्रयत्नत: ।
त्वद्भक्तानां मया विष्णो देयं निर्वाणमुत्तमम् ॥ २३
मायां चापि गृहाणेमां दुःप्रणोद्यां सुरादिभिः ।
यया संमोहितं विश्वमचित्रूपं भविष्यति॥ २४
मम बाहुर्मदीयस्त्वं दक्षिणोऽसौ विधिहरे।
अस्यापि हि विधेः पाता जनितापि भविष्यसि॥
हृदयं मम यो रूद्रः स॒ एवाहं न संशयः।
पूज्यस्तव सदा सोऽपि ब्रह्मादीनामपि श्रुवम्॥ २६
अत्र स्थित्वा जगत्सर्व पालय त्वं विशेषतः।
जानावतारभेदैश्च सदा नानोतिकर्तृभिः ॥ २७
मम लोके तवेदं वै स्थानं च परमरद्धिमत्।
गोलोक इति विख्यातं भविष्यति महोज्ज्वलम्॥ २८
आदिके साथ इन श्रीहरिको प्रणाम कीजिये और ये
वेद मेरी आज्ञासे मेरी ही तरह इन श्रीहरिका वर्णन
करें॥ १५-१६॥
श्रीराम बोले--विष्णुकी भक्तिसे प्रसन्नचित्त
हुए बरदायक भक्तवत्सल रुद्रदेवने ऐसा कहकर स्वयं
ही गरुडध्वज श्रीहरिको प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा
आदि देवताओं, अन्य सभी देवों, मुनियों और सिद्धों
आदिने भी उस समय श्रीहरिकी वन्दना की ॥ १७-१८॥
इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल
महेश्वरने देवताओंके समक्ष श्रीहरिको महान् वर
प्रदान किये॥ १९॥
महेश्वर बोले--[हे हरे!] आप मेरी आज्ञासे
सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पालक, संहारक, धर्म अर्थ-कामके
दाता तथा अन्याय करनेवालोंको दण्ड देनेवाले होंगे।
आप महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, जगत्पूज्य, जगदीश्वर
होंगे और कहीं-कहीं मुझसे भी अजेय होंगे॥ २०-२१ ॥
आप मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकारकी ये
शक्तियाँ ग्रहण करें-इच्छा आदिकी सिद्धि, अनेक
प्रकारकी लीलाओंको प्रकट करनेकी शक्ति और तीनों
-लोकोंमें नित्य स्वतन्त्र रहनेकी शक्ति॥ २२॥
हे हरे! आपसे द्वेष करनेवाले निश्चय ही मेरे
द्वारा प्रयत्नपूर्वक दण्डनीय होंगे। हे विष्णो ! मैं आपके
भक्तोंको उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा॥ २३॥
आप इस मायाको भी ग्रहण करें, जिसका निवारण
करना देवता आदिके लिये भी कठिन हैं और जिससे
मोहित होनेपर यह विश्व जड़रूप हो जायगा॥ २४॥
हरे! आप मेरी बायीं भुजा हैं और विधाता
दाहिनी भुजा हैं। आप इन विधाताके भी उत्पादक
और पालक होंगे॥ २५॥
मेरे हृदयरूप जो रुद्र हैं, वही मै हूँ, इसमें संशय
नहीं है। वे रुद्र आपके और ब्रह्मा आदि देवताओंके
भी निश्चय ही पूज्य हैं। आप यहाँ रहकर अनेक
प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले अपने विभिन्न अवतारोंद्वारा
विशेषरूपसे सम्पूर्ण जगतका पालन करें ॥ २६-२७॥
मेरे लोकमें आपका यह परम वैभवशाली
और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान गोलोक नामसे विख्यात
होगा॥ २८॥
४२४
भविष्यंति हरे ये तेऽवतारा भुवि रक्षकाः।
मद्भक्तास्तान् ध्रुव द्रक्ष्ये प्रीतानथ निजाद् वरात्॥ २
श्रीराम उवाच
अखंडेशवर्यमासाद्य हरेरित्थं हरः स्वयम्।
कैलासे स्वगणैस्तस्मिन् स्वैरं क्रीडत्युमापतिः ॥ ३०
तदाप्रभृति लक्ष्मीशो गोपवेषोऽभवत्तथा।
अयासीत्तत्र सुप्रीत्या गोपगोपीगवां पतिः॥ ३१
सोऽपि विष्णुः प्रसन्नात्मा जुगोप निखिलं जगत्।
जानावतारसंधर्तावनकर्ता शिवाज्ञया॥ ३२
इदानी स चचतुर्द्धात्रावातरच्छंकराज्ञया।
रामोऽहं तत्र भरतो लक्ष्मणः शत्रुहेति च॥ ३३
अथ पित्राज्ञया देवि ससीतालक्ष्मणः सति।
आगतोऽहं वने चाद्य दुःखितो दैवतोऽभवम्॥ ३४
निशाचरेण मे जाया हृता सीतेति केनचित्।
अन्वेष्यामि प्रियां चात्र विरही बंधुना वने॥ ३५
दर्शनं ते यदि प्राप्तं सर्वथा कुशलं मम।
भविष्यति न संदेहो मातस्ते कृपया सति॥ ३६
सीताप्राप्तिवरं देवि भविष्यति न संशयः।
तं हत्वा दुःखदं पापं राक्षसं त्वदनुग्रहात्॥ ३७
महद्भाग्यं ममाद्यैव यद्यकार्ष्टां कृपां युवाम्।
यस्मिन् सकरुणौ स्यातां स धन्यः पुरुषो वरः॥ ३८
इत्थमाभाष्य बहुधा सुप्रणम्य सतीं शिवाम्।
तदाज्ञया वने तस्मिन् विचचार रघूद्वहः ॥ ३९
अथाकर्ण्य सती वाक्यं रामस्य प्रयतात्मनः।
हृष्टाभूत्सा प्रशंसन्तं शिवभक्तिरतं हृदि॥ ४०
समृत्वा स्वकर्म मनसाकाषीच्छोकं सुविस्तरम्।
प्रत्यागच्छदुदासीना विवर्णा शिवसन्निधौ ॥ ४१
श्रीशिवमहापुराण
[अ क २ ी”२.
हे हरे! भूतलपर जो आपके अवतार होंगे बे
सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका ८. दश
करूँगा। वे मेरे वरसे सदा प्रसन्न रहेंगे॥ २९॥
श्रीरामजी बोले--इस प्रकार श्रीहरिको अपना
अखण्ड ऐश्वर्य प्रदानकर उमापति भगवान् हर स्वयं
कैलासपर्वतपर रहते हुए अपने पार्षदोंके साथ
क्रीड़ा करने लगे । तभीसे भगवान् लक्ष्मीपतिने गोपवेश
धारण कर लिया और वे गोप-गोपी तथा गौओंके अधिपति
होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रहने लगे॥ ३०-३१॥
वे विष्णु भी प्रसन्नचित्त होकर समस्त जगतूकी
रक्षा करने लगे। वे शिवजीकी आज्ञासे नाना प्रकारके
अवतार धारण करके जगतूका पालन करने लगे॥ ३२॥
इस समय वे श्रीहरि भगवान् शंकरकी आज्ञासे
चार रूपोंमें अवतीर्ण हुए हैं। उनमें एक मैं राम हूँ
और भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं॥ ३३॥
हे देवि! हे सति! मैं पिताकी आज्ञासे सीता और
लक्ष्मणके साथ वनमें आया हूँ और भाग्यवश इस
समय मैं दुखी हूँ। यहाँ किसी निशाचरने मेरी पलीका
हरण कर लिया है और मैं विरही होकर भाईके साथ
वनमें अपनी प्रियाकी खोज कर रहा हूँ॥ ३४-३५॥
हे सति! हे मातः! जब आपका दर्शन प्राप्त हो
गया, तब आपकी कृपासे सर्वथा मेरा कुशल ही होगा,
इसमें सन्देह नहीं है। हे देवि! आपका दर्शन मेरे लिये
ससीता-प्राप्तिका वरस्वरूप होगा, आपकी कृपासे उस
दुःख देनेवाले पापी राक्षसको मारकर मैं सीताको प्राप्त
कर लूँगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३६-३७॥
आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो आप दोनोंने
मुझपर कृपा की। जिसपर आप दोनों दयार्द्र हो जायें,
वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है॥ ३८॥
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमय
सती देवीको प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम
उनकी आज्ञासे उस वनमें विचरने लगे । पवित्र हदयवाले
रामकी शिव-भक्तिपरायण तथा शिवप्रशंसापरक बात
सुनकर सती मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई॥ ३९-४०॥
[तदनन्तर] अपने कर्मको याद करके उनके
बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी
और वे उदास होकर शिवजीके पास लौट आयीं ॥ ४१॥
अ० २५]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२५
प्रथि साचिन्तयद देवी सञ्जलंती पुन: पुन: ।
नाड्रीकृतं शिवोक्तं मे रामं प्रति कुधीः कृता ॥ ४२
किमुत्तरमहं दास्ये गत्वा शंकरसन्निधौ।
इति संचिन्त्य बहुधा पश्चात्तापोऽभवत्तदा॥ ४३
गत्वा शंभुसमीपं च प्रणनाम शिवं हृदा।
विषण्णवदना शोकव्याकुला विगतप्रभा॥ ४४
अध तां दुःखितां दृष्ट्वा पप्रच्छ कुशलं हरः।
प्रोवाच वचनं प्रीत्या तत्परीक्षा कृता कथम्॥ ४५
श्रुत्वा शिववचो नाहं किमपि प्रणतानना।
सती शोकविषण्णा सा तस्थौ तत्र समीपतः॥ ४६
अथ ध्यात्वा महेशस्तु बुबोध चरितं हृदा।
दक्षजाया महायोगी नानालीलाविशारदः॥ ४७
सस्मार स्वपणं पूर्वं यत्कृतं हरिकोपतः।
तत्प्रा्थितोऽथ रूद्रोऽसौ मर्यादाप्रतिपालकः॥ ४८
विषादोऽभूत्प्रभोस्तत्र मनस्येवमुवाच ह।
धर्मवक्ता धर्मकर्ता धर्मावनकरः सदा॥ ४९
शिव उवाच
कुर्या चेहक्षजायां हि स्नेहं पूर्व यथा महान्।
नश्येन्मम पणः शुद्धो लोकलीलानुसारिणः॥
ब्रह्मोवाच
इत्थं विचार्य बहुधा हृदा 'तामत्यजत्सतीम्।
पणं न नाशयामास वेदधर्मप्रपालकः॥ ५९
ततो विहाय मनसा सतीं तां परमेश्वर: ।
जगाम स्वगिरिं भेदं जगावद्धा स हि प्रभुः ॥ ५२
चलन्तं पथ्चि तं व्योमवाण्युवाच महेश्वरम्।
सर्वान् संश्रावयंस्तत्र दक्षजां च विशेषतः॥ ५३
व्योमवाण्युवाच
धन्यस्त्वं परमेशान त्वत्समोऽद्य तथा पणः।
न कोऽप्यन्यस्त्रिलोके ऽस्मिन् महायोगी महाप्रभुः ॥ ५४
मार्गमें जाती हुई देवी सती बारम्बार चिन्ता करने
लगीं कि मैंने भगवान् शिवकी बात नहीं मानी और
श्रीरामके प्रति कुत्सित बुद्धि कर ली । अब शंकरजीके
पास जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगी, इस प्रकारके विचार
करनेपर उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ॥ ४२-४३॥
शिवजीके पास जाकर उन सतीने उन्हें हृदयसे
प्रणाम किया। उनके मुखपर विषाद छा गया। वे
शोकसे व्याकुल और निस्तेज हो गयी थीं ॥ ४४॥
सतीको दुखी देखकर भगवान् हरने उनका
कुशलःक्षेम पूछा और प्रेमपूर्वक कहा--तुमने किस प्रकार
उनकी परीक्षा ली? शिवजीकी यह बात सुनकर मैंने
कोई परीक्षा नहीं ली--ऐसा कहकर वे सती सिर झुकाये
शोकाकुल होकर उनके पास खड़ी हो गयीं ॥ ४५-४६॥
इसके बाद महायोगी तथा अनेकविध लीला
करनेमें प्रवीण भगवान् महेश्वरने मनमें ध्यान लगाकर
दक्षपुत्री सतीका सारा चरित्र जान लिया॥ ४७॥
उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया,
जिसे हरिके विशेष आग्रह करनेपर मर्यादाप्रतिपालक
उन रुद्रने विवाहके लिये देवताओंके द्वारा निवेदन
किये जानेपर पूर्वमें किया था। उन महाप्रभुके मनमें
विषाद उत्पन्न हो गया। तब धर्मवक्ता, धर्मकर्ता तथा
धर्मरक्षक प्रभुने अपने मनमें कहा- ॥ ४८-४९ ॥
शिवजी बोले-यदि मैं सतीसे अब पूर्ववत्
स्नेह करूँ, तो लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले मुझ
शिवकी महान् प्रतिज्ञा ही नष्ट हो जायगी॥ ५०॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार मनमें अनेक तरहसे
विचारकर वेद और धर्मके प्रतिपालक शंकरजीने
हदयसे सतीका त्याग कर दिया, किंतु अपनी प्रतिज्ञाको
नष्ट नहीं किया। तत्पश्चात् परमेश्वर शिवजी मनसे
सतीको त्यागकर अपने कैलासपर्वतकी ओर चल
दिये। उन प्रभुने अपने निश्चयकों किसीके सामने
प्रकट नहीं किया॥ ५१-५२॥
मार्गमें जाते हुए. महेश्वरको, अन्य सबको तथा
विशेषकर सतीको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई॥ ५३॥
आकाशवाणी बोली--हे परमेश्वर! आप
धन्य हैं, इस त्रिलोकीमें आपके समान कोई भी नहीं
है, जिसने आजतक ऐसी प्रतिज्ञा की हो, आप
महायोगी तथा महाप्रभु हैं ॥ ५४॥
४२६
श्रीशिवमहापुराण
॥ यण 0000000000----- ० २५
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा व्योमवचो देवी शिवं पप्रच्छ विप्रभा।
कं पणं कृतवान्नाथ ब्रूहि मे परमेश्वर॥
इति पृष्टोऽपि गिरिशः सत्या हितकरः प्रभुः।
नोद्वाहं स्वं पणं तस्यै यत् हर्यग्रेडकरोत्पुरा॥ ५६
तदा सती शिवं ध्यात्वा स्वपतिं प्राणवल्लभम्।
सर्व बुबोध हेतुं तं प्रियत्यागमयं मुने॥ ५७
ततोऽतीव शुशोचाशु बुध्वा सा त्यागमात्मन: ।
शंभुना दक्षजा तस्मान्निःश्वसंती मुहुर्मुहुः ॥ ५८
शिवस्तस्याः समाज्ञाय गुप्तं चक्रे मनोभवम्।
सत्यै पणं स्वकीयं हि कथा बह्वीर्वदन् प्रभुः ॥ ५९
सत्या प्राप स कैलासं कथयन् विविधाः कथा: ।
वरे स्थित्वा निजं रूपं दधौ योगी समाधिभृत् ॥ ६०
तत्र तस्थौ सती धाम्नि महाव्याकुलमानसा।
न बुबोध चरित्रं तत्कश्चिच्च शिवयोर्मुने॥ ६१
महान्कालो व्यतीयाय तयोरित्थं महामुने।
स्वोपात्तदेहयोः प्रभ्वोरलोकलीलानुसारिणोः ॥ ६२
ध्यानं तत्याज गिरिशस्ततः स परमोतिकृत्।
तज्ज्ञात्वा जगदंबा हि सती तत्राजगाम सा॥ ६३
ननामाथ शिवं देवी हृदयेन विदूयता।
आसनं दत्तवान् शंभुः स्वसम्मुख उदारधीः ॥ ६४
कथयामास सुप्रीत्या कथा बह्वीर्मनोरमाः।
निःशोकां कृतवान् सद्यो लीलां कत्वा च तादूशीम्। ।६५
पूर्ववत्सा सुखं लेभे तत्याज स्वपणं न सः।
नेत्याश्चर्य शिवे तात मन्तव्यं परमेश्वरे॥ ६६
_ इत्थं शिवाशिवकथां वदन्ति मुनयो मुने।
किल केचिदविद्वांसो वियोगश्च कथं तयोः॥ ६७
ब्रह्माजी बोले--यह आकाशवाणी सुनकर कान्ति
हीन देवी सतीने शिवसे पूछा-हे नाथ! आपने कौन.
सी प्रतिज्ञा की है ? हे परमेश्वर मुझे बताइये॥ पदा
सतीके इस प्रकार पूछनेपर भी सबका हित कलेबाले
प्रभुने पहले अपने विवाहके विषयमें भगवान् विष्णुके
सामने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे नहीं बताया ॥ ५६॥
हे मुने! उस समय सती अपने प्राणवल्लभ पतति
भगवान् शिवका ध्यान करके प्रियतमके द्वारा अपने
त्याग-सम्बन्धी समस्त कारणको जान गयीं॥ ५७॥
शम्भुने मेरा त्याग किया है--इस बातको जानकर
दक्षकन्या सती बार-बार श्वास भरती हुईं शीघ्र ही अत्यन्त
शोकमें डूब गर्यी, बारम्बार सिसकने लगीं ॥ ५८॥
सतीके मनोभावको जानकर प्रभु शिवने उनके
लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे गुप्त ही रखा और बे
दूसरी बहुत-सी कथाएँ कहने लगे॥५९॥
इस प्रकार नाना प्रकारकी कथाएँ कहते हुए वे
सतीके साथ कैलासपर जा पहुँचे और श्रेष्ठ
आसनपर स्थित हो समाधि लगाकर अपने स्वरूपका
ध्यान करने लगे। सती अत्यन्त व्याकुलचित्त होकर
अपने धाममें रहने लगीं। हे मुने! शिवा और शिवके
उस चरित्रको किसीने नहीं जाना। हे महामुने! इस
प्रकार स्वेच्छासे शरीर धारण करके लोकलीलाका
अनुसरण करनेवाले उन दोनों प्रभुओंका बहुत काल
व्यतीत हो गया॥ ६०-६२॥
तत्पश्चात् उत्तम लीला करनेवाले महादेवजीने
ध्यान तोड़ा--यह जानकर जगदम्बा सती वहाँ आयौं
और उन्होने व्यथित हृदयसे शिवको प्रणाम किया।
उदार चित्तवाले शम्भुने उन्हें अपने सामने [बैठनेके
लिये] आसन दिया और वे बडे प्रेमसे बहुत-सी मनोरम
कथाएं कहने लगे । उन्होंने वैसी ही लीला करके सतीकें
शोकको तत्काल दूर कर दिया॥ ६३--६५॥
वे पूर्ववत् सुखी हो गयीं, फिर भी शिवजीने
अपनी प्रतिज्ञाको नहीं तोड़ा हे तात ! परमेश्वर शिवजीकें
विषयमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझती
चाहिये हे मुने! मुनि लोग शिव और शिवाकी ऐसी ही
कथा कहते हैं कुछ मूर्ख लोग उन दोनोंमें वियोग मानते
हैं, परंतु उनमें वियोग कैसे सम्भव है!॥ ६६-६७॥
अ० २६]
शिवाशिवचरित्रं को जानाति परमार्थतः।
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२७
शिवा और शिवके वास्तविक चरित्रको कौन
स्वेच्छया क्रीडतस्तौ हि चरितं कुरुतः सदा॥ ६८ | जान सकता है ? वे दोनों सदा अपनी इच्छासे क्रीड़ा
ब्रागर्थाविव संपृक्तौ सदा खलु सतीशिवौ।
करते और [भाँति-भाँतिकी] लीलाएँ. करते हैं । सती
और शिव वाणी और अर्थकी भाँति एक-दूसरेसे नित्य
संयुक्त हैं । उन दोनोंमें वियोग होना असम्भव है, उनकी
तयोर्वियोगोऽसंभाव्यः संभवेदिच्छया तयोः॥ ६९ | इच्छासे ही लीलामें वियोग हो सकता है ॥ ६८-६९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीवियोगो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
सतीवियोगवर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
— Sr re
अथ षड्विंशोऽध्यायः
सतीके उपाख्यानमें शिवके साथ दक्षका विरोधवर्णन
ब्रह्मोवाच
पुराभवच्च सर्वेषामध्वरो विधिना महान्।
प्रयागे समवेतानां मुनीनां च महात्मनाम्॥
तत्र सिद्धाः समायाताः सनकाद्याः सुरर्षयः।
सप्रजापतयो देवा ज्ञानिनो ब्रह्मदर्शिनः॥
अहं समागतस्तत्र परिवारसमन्वितः।
निगमैरागमर्युक्तो मूर्तिमद्धिर्महाप्रभे: ॥
समाजो$भूद्विचित्रो हि तेषामुत्सवसंयुत: ।
ज्ञानबादोऽभवत्तत्र नानाशास्त्रसमुद्भवः॥
तस्मिन्नवसरे रूद्रः सभवानीगणः प्रभुः।
त्रिलोकहितकृत्स्वामी तत्रागात्सूतिकृन्मुने॥
दृष्ट्वा शिवं सुराः सर्वे सिद्धाश्च मुनयस्तथा।
अनमंस्तं प्रभुं भक्त्या तुष्टुवुश्च तथा ह्यहम्॥
तस्थुः शिवाज्ञया सर्वे यथास्थानं मुदान्विताः।
प्रभुदर्शनसंतुष्टाः वर्णयन्तो निजं विधिम्॥
तस्मिन्नवसरे दक्षः प्रजापतिपतिः प्रभुः।
आगमत्तत्र सुप्रीतः सुवर्चस्वी यदृच्छया ॥
मां प्रणम्य स दक्षो हि न्युष्टस्तत्र मदाज्ञया।
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! पूर्वकालमें प्रयागमें
एकत्रित हुए समस्त मुनियों तथा महात्माओंका विधि-
विधानसे एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ॥ १॥
उस यज्ञमें सिद्धाण, सनक आदि, देवर्षि,
प्रजापति, देवता तथा ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले
ज्ञानी आये॥ २॥
मैं भी मूर्तिमान् महातेजस्वी निगमों और आगमोंसे
युक्त हो सपरिवार वहाँ गया था॥३॥
अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ वहाँ उनका
विचित्र समाज जुटा था। वहाँ अनेक शास्त्रोंसे
सम्बन्धित ज्ञानचर्चा होने लगी॥ ४॥
हे मुने! उसी समय सती और पार्षदोंके साथ
त्रिलोकहितकारी, सृष्टिकर्ता एवं सबके स्वामी
भगवान् रुद्र भी वहाँ पहुँचे ॥ ५॥
शिवको देखकर सम्पूर्ण देवताओं, सिद्धों, मुनियों
और मैंने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और उनकी
स्तुति की ॥ ६॥
तत्पश्चात् शिवजीको आज्ञा पाकर सब लोग
प्रसन्नतापूर्वक यथास्थान बैठ गये। भगवानके दर्शनसे
सन्तुष्ट होकर सब लोग अपने भाग्यकी सराहना करने
लगे॥७॥
उसी समय प्रजापतियोंके स्वामी महातेजस्वी प्रभु
दक्षप्रजापति घूमते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ अकस्मात्
आये। वे मुझे प्रणामकर मेरी आज्ञासे वहाँ बैठ गये।
ड२८
अह्याणडाधिपतिमान्यो मानी तर्षबहिमुंख;॥ ९ | वे दक्ष हण्डे अधिपति और सके ए. ` मानी तत्त्वबहिर्मुखः॥
स्तुतिभिः प्रणिपातैश्च दक्षः सवैः सुरर्षिभिः।
पूजितो वरतेजस्वी करौ वध्वा विनम्रकैः॥ १०
नानाविहारकृन्नाथः स्वतंत्रः परमोतिकृत्।
जानमत्तं तदा दक्षं स्वासनस्थो महेश्वर: ॥ ११
दृष्ट्वानतं हरं तत्र स मे पुत्रोऽप्रसन्नधीः।
अकुप्यत्सहसा रुद्रे तदा दक्षः प्रजापतिः॥ १२
क्रूरदृष्ट्या महागर्वो दृष्ट्वा रुद्रं महाप्रभुम्।
सर्वान्सं ॥ १३
दक्ष उवाच
एते हि सर्वे च सुरासुरा भूशं
नमन्ति मां विप्रवरास्तथर्षयः।
ह्यसौ दुर्जनवन्महामना
त्वभूत्तु यः प्रेतपिशाचसंवृतः॥ १४
श्मशानवासी निरपत्रपो ह्वायं
कथं प्रणामं न करोति मेऽधुना।
कथं
लुप्तक्रियो भूतपिशाचसेवितो
मत्तोऽविधो नीतिविदूषकः सदा॥ १५
पाखंडिनो दुर्जनपापशीला
दृष्ट्या द्विजं प्रोद्धतनिंदकाश्च।
चध्वां सदासक्तरतिप्रवीण-
स्तस्मादमुं शप्तुमहं प्रवृत्त:॥ १६
ब्रह्मोवाच
इत्येवमुक्त्वा स॒ महाखलस्तदा
रुषान्वितो रुद्रमिदं ह्यवोचत्।
शृण्वन्त्वमी विप्रवरास्तथा सुरा
वध्यं हि मे चार्हथ कर्तुमेतम्॥ १७
दक्ष उवाच
रुद्रो ह्ययं यज्ञबहिष्कृतो मे
वर्णेष्वतीतोऽथ विवर्णरूपः ।
देवैर्न भागं लभतां सहैव
श्मशानवासी कुलजन्महीनः॥ १८
श्रीशिवमहापुराण
[अ २६
वे दक्ष ब्रह्माण्डके अधिपति और सबके मान्य थे पण
अहंकारी तथा तत्त्वज्ञानसे शून्य थे॥८-९॥ ' शु
उस समय समस्त देवर्षियोंने नतमस्तक +
स्तुति और प्रणामद्वारा दोनों हाथ जोड़कर उत्तम
तेजयुक्त दक्षका आदर-सत्कार किया॥ १०॥
किंतु नाना प्रकारके लीलाविहार करनेवाले
सबके स्वामी और परम रक्षक महेश्वरने उस समय
दक्षको प्रणाम नहीं किया। वे अपने आसनपर बैठे ही
रह गये॥ ११॥
महादेवजीको वहाँ मस्तक न झुकाते देख मेरे
पुत्र दक्ष मन-ही-मन अप्रसन्न हो गये। दक्ष प्रजापति
रुद्रपर कुपित हो गये॥ १२॥
ज्ञानशून्य तथा महान् अहंकारी दक्ष महाप्रभु
रुद्रको क्रूर दृष्टिसे देखकर सबको सुनाते हुए उच्च
स्वरमें कहने लगे-॥ १३॥
दक्ष बोले-ये सब देवता, असुर, श्रेष्ठ ब्राह्मण
तथा ऋषि मुझे विशेष रूपसे मस्तक झुकाते हैं, परंतु
वह जो प्रेतों और पिशाचोंसे घिरा हुआ महामनस्वी
है, वह दुष्ट मनुष्यके समान कैसे हो गया ?॥ १४॥
श्मशानमें निवास करनेवाला निर्लज्ज मुझे इस
समय प्रणाम क्यों नहीं करता ? इसके [वेदोक्त] कर्म
लुप्त हो गये हैं, यह भूतो और पिशाचोंसे सेवित हो
मतवाला बना रहता है, शास्त्रीय विधिसे रहित है तथा
नीतिमार्गको सदा कलंकित करता है॥ १५॥
इसके साथ रहनेवाले या इसका अनुसरण करनेवाले
लोग पाखण्डी, दुष्ट, पापाचारी तथा ब्राह्मणको देखकर
उदण्डतापूर्वक उसकी निन्दा करनेवाले होते हैं। यह
स्वयं ही स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला तथा रतिकर्ममें ही
दक्ष है। अत: मैं इसे शाप देनेके लिये उद्यत हूँ॥ १६॥
ब्रह्माजी बोले इस प्रकार कहकर वे महादुष्ट
दक्ष कुपित होकर रुद्रके प्रति कहने लगे। हे ब्राह्मणों
एवं देवताओ! यह रुद्र मेरे तथा आप सभीके द्वार
वध्य है॥ १७॥
दक्ष बोले--मैं इस रुद्रको यज्ञसे बहिष्कृत
करता हूँ। यह चारों वर्णोसे बाहर, श्मशानमें निवास
तथा उत्तम कुल और जन्मसे हीन हैं|
इसलिये यह देवताओंके साथ यज्ञमें भाग न पाये॥ १८॥
अ० २६]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४२९
डड आज.“ जम कक ण का जे या
ब्रह्मोवाच
इति दक्षोक्तमाक्ण्य भृग्वाद्या बहवो जनाः।
अगर्हयन् दुष्टसत्त्चं रुद्रं मत्वाऽमरैः समम्॥ १९
नन्दी निशम्य तद्वाक्यं लोलाक्षोऽतिरुषान्वितः ।
अब्रवीत् त्वरितं दक्षं शापं दातुमना गणः॥ २०
नन्दीश्वर उवाच
रे रे शठ महामूढ दक्ष दुष्टमते त्वया।
यज्ञबाह्यो हि मे स्वामी महेशो हि कृतः कथम्॥ २१
यस्य स्मरणमात्रेण भवन्ति सफला मखाः।
तीर्थानि च पवित्राणि सोऽयं शप्तो हरः कथम्॥ २२
वृथा ते ब्रह्मचापल्याच्छप्तोऽयं दक्ष दुर्मते।
वृथोपहसितश्चैवादुष्टो रुद्रो महाप्रभुः॥ २३
येनेदं पाल्यते विश्वं सृष्टमन्ते विनाशितम्।
शप्तोऽयं स कथं रूद्रो महेशो ब्राह्मणाधम॥ २४
एवं निर्भत्सितस्तेन नन्दिना हि प्रजापतिः।
नन्दिनं च शशापाथ दक्षो रोषसमन्वितः ॥ २५
दक्ष उवाच
यूयं सर्वे रुद्रगणा वेदबाह्या भवन्तु वै।
वेदमार्गपरित्यक्तास्तथा त्यक्ता महर्षिभिः॥ २६
पाखंडवादनिरताः शिष्टाचारबहिष्कृताः।
मदिरापाननिरता जटाभस्मास्थिधारिणः ॥ २७
ब्रह्मोवाच
इति शप्तास्तथा तेन दक्षेण शिवकिंकराः ।
तच्छुत्वातिरुषाविष्टोऽभवन्नन्दी शिवप्रियः ॥
प्रत्युवाच द्रुतं दक्षं गर्वितं तं महाखलम्।
शिलादतनयो नन्दी तेजस्वी शिववल्लभः॥ २९
नन्दीश्वर उवाच
रे दक्ष शठ दुर्बुद्धे वृथैव शिवकिंकराः।
शप्तास्ते ब्रह्मचापल्याच्छिवतत्त्वमजानता॥ २०
भृग्वाद्यैर्दुष्टचित्तेश्न मूढैः स उपहासितः।
महाप्रभुर्महेशानो ब्राह्मणत्वादहंमते ॥ ३१
येरुद्रविमुखाश्षात्र ब्राह्मणास्त्वादशाः खला:।
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! दक्षकी कही हुई यह
बात सुनकर भृगु आदि बहुतसे महर्षि रुद्रदेवको दुष्ट
मानकर देवताओंके साथ उनकी निन्दा करने लगे ॥ १९ ॥
दक्षकी बात सुनकर गणेश्वर नन्दीको बड़ा रोष
हुआ। उनके नेत्र चंचल हो उठे और वे दक्षको शाप
देनेके विचारसे तुरंत इस प्रकार कहने लगे-- ॥ २० ॥
नन्दीश्वर बोले--हे शठ! महामूढ़! हे दुष्टबुद्ध
दक्ष! तुमने मेरे स्वामी महेश्वरको यज्ञसे बहिष्कृत
क्यों कर दिया? जिनके स्मरणमात्रसे यज्ञ सफल और
तीर्थ पवित्र हो जाते हैं, उन्हीं महादेवजीको तुमने
शाप कैसे दे दिया ?॥ २१-२२॥
हे दुर्बुद्धि दक्ष तुमने ब्राह्मणजातिकी चपलतासे
प्रेरित हो इन निर्दोष महाप्रभु रुद्रदेवको व्यर्थ ही शाप दिया
और इनका उपहास किया है। हे ब्राह्मणाधम ! जिन्होंने
इस जगतूकी सृष्टि की है, जो इसका पालन करते हैं
और अन्तमें जिनके द्वारा इसका संहार होता है, उन्हीं
महेश्वर रुद्रको तूने शाप कैसे दे दिया ?॥ २३-२४॥
नन्दीके इस प्रकार फटकारनेपर प्रजापति दक्ष
रुष्ट हो गये और नन्दीको शाप दे दिया॥ २५॥
दक्ष बोले--हे रुद्रगणों! तुमलोग वेदसे बहिष्कृत
हो जाओ, वैदिक मार्गसे भ्रष्ट हो जाओ, महर्षियोंद्वारा
परित्यक्त हो जाओ, पाखण्डवादमें लग जाओ,
शिष्टाचारसे दूर रहो, सिरपर जटा और शरीरमें भस्म
एवं हड्डियोंके आभूषण धारण करो और मद्यपानमें
आसक्त रहो॥ २६-२७॥
ब्रह्माजी बोले--जब दक्षने शिवगणोंको इस
प्रकार शाप दे दिया, तब उस शापको सुनकर
शिवभक्त नन्दी अत्यन्त रोषमें भर गये॥ २८॥
शिलादके पुत्र, शिवप्रिय, तेजस्वी नन्दी गर्वसे
भरे हुए महादुष्ट दक्षको तत्काल इस प्रकार उत्तर देने
लगे--॥ २९॥
नन्दीश्वर बोले--हे शठ! हे दुर्बुद्धि दक्ष!
ब्रह्मचापल्यके कारण शिवतत्त्वको न जानते हुए तुमने
शिवके यार्षदोंको व्यर्थ ही शाप दिया है॥ ३०॥
हे अहंकारी दक्ष! दूषित चित्तवाले मूढ़ भृगु आदिने
भी ब्राह्मणत्वके अभिमानमें आकर महाप्रभु महेश्वरका
उपहास किया है । अत: यहाँ जो भगवान् रुद्रसे विमुख
४३०
श्रीशिवमहापुराण
[ 0 २६
रुद्रतेज:प्रभावत्वात्तेषां शापं ददाम्यहम्॥ ३
वेदवादरता यूयं वेदतत्त्वबहिमुखाः।
भवन्तु सततं विप्रा नान्यदस्तीति वादिनः॥ ३३
'कामात्मानः स्वर्गपराः क्रोधलोभमदान्विताः।
भवन्तु सततं विप्रा भिक्षुका निरपत्रपाः ॥ ३४
वेदमार्ग पुरस्कृत्य ब्राह्मणाः शूद्रयाजिनः।
दरिद्रा वै भविष्यन्ति प्रतिग्रहरताः सदा॥ ३५
असत्प्रतिग्रहाश्चैव सर्वे निरयगामिनः ।
भविष्यन्ति सदा दक्ष केचिद्वै ब्रह्मराक्षसाः ॥ ३६
यः शिवं सुरसामान्यमुद्दिश्य परमेश्वरम्।
द्रुह्मत्यजो दुष्टमतिः तत्त्वतां विमुखो भवेत्॥ ३७
कूटधर्मेषु गेहेषु सदा ग्राम्यसुखेच्छया।
कर्मतन्त्रं वितनुतां वेदवादं च शाश्वतम् ॥ ३८
विनष्टानंदकमुखो विस्मृतात्मगतिः पशु: ।
भ्रष्टकर्मानयरतो दक्षो बस्तमुखोऽचिरात्॥ ३९
शप्तास्ते कोपिना तत्र नंदिना ब्राह्मणा यदा।
हाहाकारो महानासीच्छप्तो दक्षेण चेश्वरः ॥ ४०
तदाकर्ण्याहमत्यन्तमनिन्दं तं मुहुर्मुहु:।
भृग्वादीनपि विप्रांश्च वेदसृट् शिवतत्त्ववित्॥ ४१
ईश्वरोऽपि वचः श्रुत्वा नंदिनः प्रहसन्निव ।
उवाच मधुरं वाक्यं बोधयंस्तं सदाशिवः॥ ४२
सदाशिव उवाच
शृणु नंदिन् महाप्राज्ञ न कर्तृ क्रोधमर्हसि।
वृथा शप्तं ब्रह्मकुलं मत्वा शप्तं च मां भ्रमात्॥ ४३
तुम-जैसे खल ब्राह्मण विद्यमान हैं, उनको मैं
प्रभावसे शाप दे रहा हूँ॥ ३१-३२॥
तुम-जैसे ब्राह्मण [कर्मफलके प्रशंसक] वेदबादमे
फँसकर वेदके तत्त्वज्ञानसे शून्य हो जाये, वे ब्राह्मण
सदा भोगोंमें तन्मय रहकर स्वर्गको ही सबसे बड़ा
पुरुषार्थ मानते हुए स्वर्गसे बढ़कर दूसरी कोई बतु
नहीं है--ऐसा कहते रहें तथा क्रोध, लोभ एवं मदे
युक्त, निर्लज्ज और भिक्षुक बने रहें ॥ ३३-३४॥
[कितने ही] ब्राह्मण वेदमार्गको सामने रखकर
शूद्रोका यज्ञ करानेवाले और दरिद्र होंगे। वे सदा दान
लेनेमें लगे रहेंगे। दूषित दान ग्रहण करनेके कारण वे
सबके सब नरकगामी होंगे। हे दक्ष! उनमेंसे कुछ
ब्राह्मण तो ब्रह्मराक्षस होंगे॥ ३५-३६॥
यह अजन्मा प्रजापति दक्ष, जो परमेश्वर शिवको
सामान्य देवता समझकर उनसे द्रोह करता है, यह
दुष्ट बुद्धिवाला तत्त्वज्ञानसे विमुख हो जायगा ॥ ३७॥
यह विषयसुखकी इच्छासे कामनारूपी कपटसे
युक्त धर्मवाले गृहस्थाश्रममें आसक्त रहकर कर्मकाण्डका
तथा कर्मफलकी प्रशंसा करनेवाले सनातन वेदवादका
ही विस्तार करता रहेगा। दक्षका आनन्ददायी मुख
नष्ट हो जाय, यह आत्मज्ञानको भूलकर पशुके समान
हो जाय और कर्मभ्रष्ट तथा अनीतिपरायण होकर
शीघ्र ही बकरेके मुखसे युक्त हो जाय। इस प्रकार
कुपित हुए नन्दीने जब ब्राह्मणोंको शाप दिया और
दक्षने महादेवजीको शाप दिया, तब वहाँ महान्
हाहाकार मच गया॥ ३८--४० ॥
[हे जारद!] दक्षका वह शाप सुनकर वेदोंके
प्रतिपादक तथा शिवतत्त्वको जाननेवाले मैंने उस
दक्षको तथा भूगु आदि ब्राह्मणोंकी बारंबार निन्दा
की ॥ ४१॥
सदाशिव महादेवजी भी नन्दीकी वह बात
सुनकर हँसते हुए और समझाते हुए मधुर वचन
कहने लगे-॥ ४२॥
सदाशिव बोले--हे नन्दिन्। [मेरी बात]
सुनो। हे महाप्रज्ञ! तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये!
तुमने भ्रमसे यह समझकर कि मुझे शाप दिया गया
है, व्यर्थमें ही ब्राह्मणकुलको शाप दे डाला॥४३॥
अ० २६]
बेदो मंत्राक्षरमय: साक्षात्सूक्तमयो भृशम्।
सूक्ते प्रतिष्ठितो ह्यात्मा सर्वेषामपि देहिनाम्॥ ४४
तस्मादात्मविदो नित्यं त्वं मा शप रुषान्वित: ।
शप्या न वेदाः केनापि दुर्द्धियाईपि कदाचन ॥ ४५
अहं शप्तो न चेदानीं तत्त्वतो बोद्धुमहसि।
शान्तो भव महाधीमन् सनकादिविबोधकः॥ ४६
यज्ञोऽहं यज्ञकर्माहं यज्ञाङ्गानि च सर्वशः।
यज्ञात्मा यज्ञनिरतो यज्ञबाह्योऽहमेव वै ॥ ४७
कोऽयं कस्त्वमिमे के हि सवो ऽहमपि तत्त्वतः।
इति बुद्धया हि विमृश वृथा शप्तास्त्वया द्विजाः ॥ ४८
तत्त्वज्ञानेन निर्हृत्य प्रपञ्चरचनां भव।
बुधः स्वस्थो महाबुद्धे नन्दिन् क्रोधादिवर्जितः ॥ ४९
ब्रह्मोवाच
एवं स प्रबोधितस्तेन शम्भुना नन्दिकेश्वरः।
विवेकपरमो भूत्वा शांतोऽभून्क्रोधवर्जितः॥ ५०
शिवोऽपि तं प्रबोध्याशु स्वगणं प्राणवल्लभम्।
सगणः स ययौ तस्मात्स्वस्थानं प्रमुदान्वितः॥ ५१
दक्षोऽपि स रुषाविष्टस्तैद्विजे: परिवारितः।
स्वस्थानं च ययौ चित्ते शिवद्रोहपरायणः॥ ५२
रुद्रं तदानी परिशप्यमानं
संस्मृत्य दक्षः परया रुषान्वितः।
श्रद्धां विहायैव स मूढबुद्धि-
निन्दापरोऽभूच्छिवपूजकानाम् ॥
इत्युक्तो दक्षदुर्बुद्धिः शंभुना परमात्मना।
परां दुर्धिषणां तस्य शृणु तात वदाम्यहम्॥ ५४
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४३१
वेद मन्त्राक्षमय और सूक्तमय हैं। [उसके
प्रत्येक] सूक्तमें समस्त देहधारियोंकी आत्मा प्रतिष्ठित
है। उन मन्त्रोके ज्ञाता नित्य आत्मवेत्ता हैं, इसलिये तुम
रोषवश उन्हें शाप न दो। किसी कुत्सित बुद्धिवालेको
भी कभी वेदोंको शाप नहीं देना चाहिये ॥ ४४-४५॥
इस समय मुझे शाप नहीं मिला है, इस बातको
तुम्हें ठीक-ठीक समझना चाहिये | हे महामते ! तुम तो
सनकादिको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेवाले हो, अत: शान्त
हो जाओ | मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञकर्म हूँ, यजञोंके अंग
भी मैं ही हूँ, यज्ञकी आत्मा मैं ही हूँ, यज्ञपरायण यजमान
मैं ही हूँ और यज्ञसे बहिष्कृत भी मैं ही हूँ॥ ४६-४७॥
यज्ञ कौन है, तुम कौन हो और ये कौन हैं ?
वास्तवमें सब मैं ही हूँ। तुम अपनी बुद्धिसे इस
बातका विचार करो। तुमने ब्राह्मणोंको व्यर्थ ही शाप
दिया है। हे महामते! हे नन्दिन्! तुम तत्त्वज्ञानके द्वारा
प्रपंच-रचनाको दूर करके विवेकपरायण, स्वस्थ तथा
क्रोध आदिसे रहित हो जाओ॥ ४८-४९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार भगवान् शिवद्वारा
समझाये जानेपर वे नन्दी परम ज्ञानसे युक्त और क्रोधरहित
होकर शान्त हो गये । वे भगवान् शिव भी अपने प्राणप्रिय
गण नन्दीको बोध प्रदान करके गणोंसहित वहाँसे
प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये॥ ५०-५१॥
इधर, रोषसे युक्त दक्ष भी चित्तमें शिवके प्रति
द्रोहयुक्त होकर ब्राह्मणोंके साथ अपने स्थानको लौट
गये॥५२॥
उस समय रुद्रको शाप दिये जानेकी घटनाका
स्मरण करके दक्ष सदा महान् रोषसे भरे रहते थे।
मूर्ख बुद्धिवाले वे शिवके प्रति श्रद्धाको त्यागकर
शिवपूजकोंकी निन्दां करने लगे। हे तात! इस प्रकार
परमात्मा शम्भुके साथ [दुर्व्यवहार करके] दक्षने
अपनी जिस दुष्ट बुद्धिका परिचय दिया था, वह मैंने
आपको बता दिया, अब उनकी और बड़ी दुर्बुद्धिके
विषयमें सुनिये, मैं बता रहा हूँ॥ ५३-५४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स््रसंहिवायाँ द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने शिवेन दक्षविरोधो नाम कड्विंशोऽध्यायः ॥ २६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीके उपाख्यानमें
शिवके साथ दक्षका विरोधवर्णन नामक छन्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
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४३२
श्रीशिवमहापुराण
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अथ सप्तविंशो$ध्याय:
दक्षप्रजापतिद्वारा महान् यज्ञका प्रारम्भ, यज्ञमें दक्षद्वारा शिवके न बुलाये जानेपर
दधीचिद्वारा दक्षकी भर्त्सना करना, दक्षके द्वारा शिव-निन्दा
'करनेपर दधीचिका वहाँसे प्रस्थान
ब्रह्मोवाच
एकदा तु मुने तेन यज्ञः प्रारंभितो महान्।
तत्राहूतास्तदा सर्वे दीक्षितेन सुरर्षयः॥
महर्षयोऽखिलास्तत्र निर्जराश्च समागताः।
यद्यज्ञकरणार्थ हि शिवमायाविमोहिताः॥ २
अगस्त्यः कश्यपोऽत्रिश्च वामदेवस्तथा भृगुः।
दधीचिर्भगवान् व्यासो भारद्वाजोऽथ गौतमः॥ ३
पैलः पराशरो गर्गो भार्गवः ककुभः सितः।
सुमंतुत्रिककंकाश्च वैशम्पायन एव च॥ ४
एते चान्ये च बहवो मुनयो हर्षिता ययुः।
मम पुत्रस्य दक्षस्य सदाराः ससुता मखम्॥ ५
तथा सर्वे सुरगणा लोकपाला महोदया: ।
तथोपनिर्जराः सर्वे स्वोपकारबलान्विताः॥ ६
सत्यलोकात्समानीतो नुतोऽहं विशवकारकः।
ससुतः सपरीवारो मूर्तवेदादिसंयुतः॥ ७
वैकुंठाच्च तथा विष्णुः संप्रार्थ्य विविधाद्रात्।
सपार्षदपरीवारः समानीतो मखं प्रति॥ ८
एवमन्ये समायाता दक्षयज्ञं विमोहिताः।
सत्कृतास्तेन दक्षेण सर्वे ते हि दुरात्मना॥ ९
भवनानि महार्हाणि सुप्रभाणि महांति च।
त्वष्टा कृतानि दिव्यानि तेभ्यो दत्तानि तेन वै॥ १०
तेषु स्वेषु धिष्ण्येषु यथायोग्यं च संस्थिता: ।
सन्मानिता अराजंस्ते सकला विष्णुना मया॥ १९
वर्तमाने महायज्ञे तीर्थे कनखले तदा।
ऋत्विजश्च कृतास्तेन भृग्वाद्याश्च तपोधनाः॥ १२
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! एक समय दक्षन
एक बड़े महान् यज्ञका प्रारम्भ किया और दीक्षप्राप़
उसने उस यज्ञमें सभी देवताओं तथा ऋषियोंको
बुलाया॥ १॥
शिवकी मायासे विमोहित होकर सभी महि
तथा देवता यज्ञको सम्पन्न करानेके लिये आये॥ २॥
अगस्त्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृगु, दधीचि,
भगवान् व्यास, भारद्वाज, गौतम, पैल, पराशर, गर्ग,
भार्गव, ककुभ, सित, सुमन्तु, त्रिक, कंक और
वैशम्पायन-ये सब तथा अन्य बहुतःसे मुनि अपने
स्त्री-पुत्रोंको साथ लेकर मेरे पुत्र दक्षके यज्ञमें
हर्षपूर्वक गये॥ ३--५॥
[इनके अतिरिक्त] समस्त देवगण, महान्
अभ्युदय-शाली लोकपालगण और सभी उपदेवता
अपनी उपकारक सैन्यशक्तिके साथ वहाँ आये थे।
दक्षने प्रार्थना करके पुत्र, परिवार और मूर्तिमान्
वेदोंसहित मुझ विशवस्रष्टा ब्रह्माको भी सत्यलोकसे
बुलवाया था॥ ६-७॥
इसी तरह भाँति-भाँतिसे सादर प्रार्थना करके
वैकुण्ठलोकसे पार्षदों और परिवारसहित भगवान्
विष्णु भी उस यजञमें बुलाये गये थे। इसी प्रकार अन्य
लोग भी विमोहित होकर दक्षके यज्ञमें आये और
दुरात्मा दक्षने उन सबका बड़ा सत्कार किंया।
विश्वकर्मके द्वारा बनाये गये अत्यन्त दीप्तिमान्
विशाल, बहुमूल्य तथा दिव्य भवन दक्षने उन्हें
[उहरनेके लिये] दिये थे॥ ८--१०॥
उन भवनोंमें मेरे तथा विष्णुके साथ वे सभी
[देव, महर्षिगण] दक्षसे यथायोग्य सम्मानित हो
अपने-अपने स्थानोंपर स्थिर होकर शोभित होने लगे।
उस समय कनखल नामक तीर्थमें आरम्भ हुए उस
महायजञमें दक्षने भृगु आदि तपोधनोंको क्रत्विज
'बनाया॥ ११-१२॥
अ० २७]
अधिष्ठाता स्वयं विष्णु: सह सर्वमरुदगणे; ।
अहं तत्राभवं ब्रह्मा त्रयीविधिनिदर्शक:॥ १३
तथैव सर्वे दिक्पाला द्वारपालाश्च रक्षका:।
सायुधाः सपरीवाराः कुतूहलकराः सदा॥ १४
उपतस्थे स्वयं यज्ञः सुरूपस्तस्य चाध्वरे।
सर्वे महामुनिश्रेष्ठाः स्वयं वेदधराभवन्॥ १५
तनूनपादपि निजं चक्रे रूपं सहस्त्रशः।
हविषां ग्रहणायाशु तस्मिन् यज्ञे महोत्सवे॥ १६
अष्टाशीतिसहस्त्राणि जुह्मति सह ऋत्विजः ।
उद्गातारश्चतुःषष्टिसहस्त्राणि सुरर्षयः॥ १७
अध्वर्यवोऽथ होतारस्तावन्तो नारदादयः।
सप्तर्षयः समा गाथाः कुर्वन्ति स्म पृथक्पृथक् ॥ १८
गंधर्वविद्याधरसिद्धसंघा-
नादित्यसंघान् सगणान् सयज्ञान्।
संख्यावतान्नागचरान् समस्तान्
वब्रे स दक्षो हि महाध्वरे स्वे॥ १९
द्विजर्षिराजर्षिसुरर्षिसंघा
नृपाः समित्रः सचिवाः ससेन्याः।
वसुप्रमुख्या गणदेवताश्च
सर्वे वृतास्तेन मखोपवेत्त्रा॥ २०
दीक्षायुक्तस्तदा दक्षः कृतकोतुकमङ्गलः।
भार्यया सहितो रेजे कृतस्वस्त्ययनो भूशम्॥ २१
तस्मिन् यज्ञे वृतः शंभुर्न दक्षेण दुरात्मना।
कपालीति विनिश्चित्य तस्य यज्ञाईता न हि॥ २२
कपालिभार्येति सती दयिता स्वसुतापि च।
जाहूता यज्ञविषये दक्षेणागुणदर्शिना॥ २३
एवं प्रवर्तमाने हि दक्षयज्ञे महोत्सवे।
स्वकार्यलग्नास्तत्रासन् सर्वे तेऽध्वरसंमताः॥ २४
एतस्मन्नन्तरेऽदृष्ट्वा तत्र वै शंकरं प्रभुम्।
परोह्विनमानसः शैवो दधीचो वाक्यमब्रवीत्॥ २५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४३३
सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ स्वयं भगवान् विष्णु
[उस यज्ञके] अधिष्ठाता बने और में वेदत्रमीकी विधिको
बतानेवाला ब्रह्मा बना था। इसी तरह सम्पूर्ण दिक्पाल
अपने आयुधों और परिवारोंके साथ द्वारपाल एवं रक्षक
बने थे, वे सदा कौतूहल पैदा करते थे॥ १३-१४॥
स्वयं यज्ञदेव सुन्दर रूप धारण करके उनके
यज्ञमें उस समय उपस्थित थे और बड़े-बड़े श्रेष्ठ
मुनिलोग स्वयं वेदोंको धारण किये हुए थे। अग्निने
भी उस यज्ञमहोत्सवमें शीघ्र ही हविष्य ग्रहण करनेके
लिये अपने हजारों रूप प्रकट किये थे॥ १५-१६॥
वहाँ अठासी हजार ऋत्विज एक साथ हवन करते
थे। चौसठ हजार देवर्षि उस यज्ञमें उद्गाता थे । अध्वर्यु
एवं होता भी उतने ही थे। नारद आदि देवर्षि और
सप्तर्षि पृथक्-पृथक् गाथा-गान कर रहे थे॥ १७-१८॥
दक्षने अपने उस महायज्ञमें गन्धर्वो, बिद्याधरों,
सिद्धो, सभी आदित्यों और उनके गणों, यज्ञों एवं
नागलोकमें विचरण करनेवाले समस्त नागोंका भी
बहुत बड़ी संख्यामें वरण किया था॥ १९॥
ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षियोंके समुदाय और अपने
मित्रों, मन्त्रियों तथा सेनाओंके साथ अनेक राजा भी
वहाँ आये हुए थे। यजमान दक्षने उस यज्ञमें वसु
आदि समस्त गण-देवताओंका भी वरण किया था।
कौतुक और मंगलाचार करके जब दक्षने यज्ञकी
दीक्षा ली तथा जब उनके लिये बारंबार स्वस्तिवाचन
किया जाने लगा, तब वे अपनी पत्नीके साथ बड़ी
शोभा पाने लगे॥ २०-२१॥
[इतना सब करनेपर भी] दुरात्मा दक्षने उस
यज्ञमें भगवान् शम्भुको नहीं बुलाया। उनकी दृष्टिमें
'कपालधारी होनेके कारण वे निश्चय ही यज्ञमें भाग
लेनेयोग्य नहीं थे। दोषदर्शी दक्षने कपालीकी पत्नी
होनेके कारण अपनी प्रिय पुत्री सतीको भी यज्ञमें नहीं
बुलाया॥ २२-२३॥
इस प्रकार दक्षके यज्ञ-महोत्सवके आरम्भ हो
जानेपर यज्ञमण्डपमें आये हुए सब ऋत्विज अपने-अपने
कार्यमें संलग्न हो गये । इसी बीच वहाँ भगवान् शंकरको
[उपस्थित] न देखकर शिवभक्त दधीचिका चित्त अत्यन्त
उद्विग्न हो उठा और वे कहने लगे ॥ २४-२५॥
४३४
श्रीशिवमहापुराण
[अ 0000000007 *
दधीच उवाच
सर्वे शृणुत मद्वाक्यं देवर्षिप्रमुखा मुदा।
कस्मान्नैवागतः शंभुरस्मिन् यज्ञे महोत्सवे॥ २६
एते सुरेशा मुनयो महत्तराः
सलोकपालाश्च समागता
तथापि यज्ञस्तु न शोभते भृशं
पिनाकिना तेन महात्मना विना॥ २७
सर्वाण्यपि मङ्गलानि
भवन्ति शंसन्ति महाविपश्चितः।
सोऽसौ न दृष्टोऽत्र पुमान् पुराणो
हि।
येनैव
वृषध्वजो नीलगलः परेशः॥ २८
अमङ्गलान्यवे च मङ्गलानि
भवन्ति येनाधिगतानि दक्ष।
त्रिपञ्चकेनाप्यथ मङ्कलानि
भवन्ति सद्यः परतः पराणि॥ २९
तस्मात्त्वयैव कतंव्यमाह्वानं परमेशितुः।
त्वरितं ब्रह्मणा वापि विष्णुना प्रभुविष्णुना॥ ३०
इन्द्रेण लोकपालैश्च द्विजैः सिद्धेः सहाधुना।
सर्वथानयनीयोऽसौ शंकरो ञ्ञपूर्तये॥ ३१
सकवैर्भवद्धिर्गन्तव्यं यत्र देवो महेश्वरः।
दाक्षायण्या समं शम्भुमानयध्वं त्वरान्विताः॥ ३२
तेन सर्व पवित्रं स्याच्छम्भुना परमात्मना।
अत्रागतेन देवेशाः साम्बेन परमात्मना॥ ३३
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या समग्रं सुकृतं भवेत्।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ह्यानेतव्यो वृषध्वजः ॥ ३४
समागते शंकरेऽत्र पावनो हि भवेन्मखः।
भविष्यत्यन्यथापूर्णः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ३५
ब्रह्मोवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दक्षो रोषसमन्वितः।
उवाच त्वरितं मूढः प्रहसन्निव दुष्टधी: ॥ ३६
मूलं विष्णुर्देवतानां यत्र धर्मः सनातनः।
समानीतो मया सम्यक् किमूनं यज्ञकर्मणि॥ ३७
दधीचि बोले--हे प्रमुख देवताओ तथा महर्षियो।
आप सब लोग प्रसन्नतापूर्वक मेरी बात सुनें। डम
यज्ञमहोत्सवमें भगवान् शंकर क्यों नहीं आये हैं ?॥ २६॥
यद्यपि ये देवेश्वर, बड़े-बड़े मुनि और लोकपाल
यहाँ आये हुए हैं, तथापि उन पिनाकधारी महात्मा शंकरके
बिना यह यज्ञ अधिक शोभा नहीं पा रहा है। बहे.
बड़े विद्वान् कहते हैं कि मंगलमय भगवान् शिवजीकी
कृपादृष्टिसे ही समस्त मंगलकार्य सम्पन्न हो जाते हैं।
जिनका ऐसा प्रभाव है, वे पुराणपुरुष, वृषभध्वज,
परमेश्वर श्रीनीलकण्ठ यहाँ क्यों नहीं दिखायी दे रहे
हैं ? हे दक्ष! जिनके सम्पर्कमें आनेपर अथवा जिनके
स्वीकार कर लेनेपर अमंगल भी मंगल हो जाते हैं
तथा जिनके पन्द्रह नेत्रोंसे देखे जानेपर बड़े-से-बड़े
मंगल तत्काल हो जाते हैं, उनका इस यज्ञमें पदार्पण
होना अत्यन्त आवश्यक है ॥ २७--२९॥
इसलिये तुम्हें स्वयं ही परमेश्वर शिवजीको यहाँ
बुलाना चाहिये अथवा ब्रह्मा, प्रभावशाली भगवान्
विष्णु इन्द्र, लोकपालों, ब्राह्मणों और सिद्धोंकी सहायतासे
सर्वथा प्रयत्न करके इस समय यज्ञकी पूर्तिके लिये उन
भगवान् शंकरको यहाँ ले आना चाहिये॥ ३०-३१॥
आप सब लोग उस स्थानपर जाय, जहाँ
महेश्वरदेव विराजमान हैं। बहाँसे दक्षनन्दिनी सतीके
साथ भगवान् शम्भुको यहाँ तुरंत ले आगें। हे
देवेश्वरो! जगदम्बासहित उन परमात्मा शिवके यहाँ
आ जानेसे सब कुछ पवित्र हो जायगा। जिनके
स्मरणसे तथा नाम लेनेसे सारा कार्य पुण्यमय बन
जाता है, अतः पूर्ण प्रयत्न करके उन भगवान्
वृषभध्वजको यहाँ ले आना चाहिये॥ ३२-३४॥
भगवान् शंकरके यहाँ आनेपर यह यज्ञ पवित्र
हो जायगा, अन्यथा यह अपूर्ण ही रह जायगा, यर्ह
मैं सत्य कह रहा हूँ॥ ३५॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] दधीचिका यह
वचन सुनकर दुष्ट बुद्धिवाले मूढ दक्ष हँसते हुए शी
ही रोषपूर्वक कहने लगे-॥ ३६॥
भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, जितमें
| प्रतिष्ठित है । जब इन्हें मैने सादर बुला लिया
है, तब इस यज्ञकर्ममें क्या कमी हो सकती है ?॥ २०॥
अ० २७]
यस्मिन् वेदाश्च यज्ञाश्च कर्माणि विविधानि च।
प्रतिष्ठितानि सर्वाणि सोऽसौ विष्णुरिहागतः॥ ३८
सत्यलोकात्समायातो ब्रह्मा लोकपितामह: ।
वेदैः सोपनिषदद्रिश्च विविधैरागमेः सह॥ ३९
तथा सुरगणैः साकमागतः सुरराट् स्वयम्।
तथा यूयं समायाता ऋषयो वीतकल्मषाः ॥ ४०
ये ये यज्ञोचिताः शान्ताः पात्रभूताः समागता: ।
वेदवेदार्थतत्त्वज्ञाः सर्वे यूयं दृढब्रताः॥ ४१
अत्रैव च किमस्माकं रुद्रेणापि प्रयोजनम्।
कन्या दत्ता मया विप्र ब्रह्मणा नोदितेन हि॥ ४२
हरोऽकुलीनोऽसौ विप्र पितृमातृविवर्जितः।
भूतप्रेतपिशाचानां पतिरेको दुरत्ययः ॥ ४३
आत्मसंभावितो मूढः स्तब्धो मौनी समत्सरः ।
कर्मण्यस्मिन्न योग्योऽसौ नानीतो हि मयाधुना ॥ ४४
तस्मात्त्वयेदूशं वाक्यं पुनर्वाच्यं न हि क्वचित्।
सर्वेर्भवद्धि: कर्तव्यो यज्ञो मे सफलो महान्॥ ४५
ब्रह्मोवाच
एतच्छुत्वा वचस्तस्य 'दधीचिर्वाक्यमब्रवीत्।
सर्वेषां श्रृण्वतां देवमुनीनां सारसंयुतम्॥ ४६
दधीच उवाच
अयज्ञोऽयं महाजातो विना तेन शिवेन हि।
विनाशोऽपि विशेषेण ह्यत्र ते हि भविष्यति॥ ४७
एवमुक्त्वा दधीचोऽसावेक एव विनिर्गतः।
यञ्ञवाटाच्च दक्षस्य त्वरितः स्वाश्रमं ययौ॥ ४८
ततोऽन्ये शांकरा ये च मुख्याः शिवमतानुगाः।
निर्ययुः स्वाश्रमान् सद्यः शापं दत्त्वा तथैव च ॥ ४९
मुनौ विनिर्गते तस्मिन् मखादन्येषु दुष्टधीः।
शिवड्रोही मुनीन् दक्षः प्रहसब्रिदमत्रवीत्॥५०
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४३५
जिनमें बेद, यज्ञ और नाना प्रकारके कर्म
प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् विष्णु तो यहाँ आ ही गये
हैं॥ ३८॥
लोकपितामह ब्रह्मा सत्यलोकसे वेदों, उपनिषदों
और विविध आगमोंके साथ यहाँ आये हुए हैं ॥ ३९॥
देवगणोंके साथ स्वयं देवराज इन्द्र भी आये हैं
तथा निष्पाप आप ऋषिगण भी यहाँ आ गये हैं। जो-
जो यञ्ञमें सम्मिलित होनेयोग्य शान्त, सुपात्र हैं, वेद
और वेदार्थके तत्त्वको जाननेवाले और दृढतापूर्वक
ब्रतका पालन करनेवाले हैं-वे आप सब यहाँ
पदार्पण कर चुके हैं, तब हमें यहाँ रुद्रसे क्या प्रयोजन
है! हे विप्र! मैने ब्रह्माजीके कहनेसे ही अपनी कन्या
रुद्रको दी थी॥४०--४२॥
हे विप्र! हर कुलीन नहीं है, उसके माता-पिता
नहीं हैं, वह भूतों-प्रेतोंपिशाचोंका स्वामी अकेला
रहता हैं और उसका अतिक्रमण करना दूसरोंके लिये
अत्यन्त कठिन है। वह आत्मप्रशंसक, मूढ़, जड़, मौनी
और ईर्ष्यालु है। वह इस यज्ञकर्मके योग्य नहीं है,
इसलिये मैंने उसको यहाँ नहीं बुलाया है ॥ ४३-४४॥
अतः [दधीचिजी!] आप ऐसा पुन: कभी न
कहें, आप सभी लोग मिलकर मेरे महान् यज्ञको
सफल बनायें॥ ४५॥
ब्रह्माजी बोले--दक्षकी यह बात सुनकर
दधीचि सभी देवताओं तथा मुनियोंको सुनाते हुए
सारयुक्त वचन कहने लगे--॥ ४६॥
दधीचि बोले--[ हे दक्ष !] उन भगवान् शिवके
बिना यह महान् यज्ञ भी अयज्ञ है। निश्चय ही इस
यज्ञसे तुम्हारा विनाश होगा। इस प्रकार कहकर
दधीचि दक्षकी यज्ञशालासे अकेले ही निकलकर
अपने आश्रमको चल दिये। तदनन्तर जो मुख्य-मुख्य
शिवभक्त थे तथा उनके मतका अनुसरण करनेवाले
थे, वे भी दक्षको शाप देकर तुरंत बहाँसे अपने
आश्रमोंको चले गये ॥ ४७--४९ ॥
मुनि दधीचि तथा दूसरे ऋषियोंके उस यज्ञमण्डपसे
निकल जानेपर दुष्टबुद्धि तथा शिवद्रोही दक्ष मुसकराते
हुए अन्य मुनियोंसे कहने लगे--॥ ५०॥
४३६
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० आ ैफपफि्कजज-४ ८
दक्ष उवाच
गतः शिवप्रियो विप्रो दधीचो नाम नामतः।
अन्ये तथाविधा ये च गतास्ते मम चाध्वरात्॥ ५१
एतच्छुभतरं जातं सम्मतं मे हि सर्वथा।
सत्यं ब्रवीमि देवेश सुराश्च मुनयस्तथा॥ ५२
विनष्टचित्ता मंदाश्च मिथ्यावाद्रताः खलाः।
वेदबाह्या दुराचाराः त्याज्यास्ते मखकर्मणि॥ ५३
वेदवादरता यूयं सर्वे विष्णुपुरोगमाः।
ज्ञं मे सफलं विप्राः सुराः कुर्वन्तु माचिरम्॥ ५४
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य शिवमायाविमोहिताः।
तन्मखे देवयजनं चक्रुः सर्वे सुरर्षयः॥ ५५
इति तन्मखशापो हि वर्णितो मे मुनीश्वर।
यज्ञविध्वंसयोगोऽपि प्रोच्यते श्रृणु सादरम्॥ ५६
दक्ष बोले-दधीचि नामक वे शिवप्रिय ब्राह्मण
चले गये और उन्हींके समान जो दूसरे थे, बे भी फे
यज्ञसे चले गये। यह तो बड़ा अच्छा हुआ। मुझे सदा
यही अभीष्ट है। हे देवेश! हे देवताओ और हे
मुनियो! मैं सत्य कह रहा हूँ॥ ५१-५२॥
जो नष्टबुद्धिवाले, मूर्ख, मिथ्या-भाषणमें रत, खल
वेदबहिष्कृत और दुराचारी हैं, उन लोगोंको यज्ञकर्म
त्याग देना चाहिये। आप सभी लोग वेदवादमें परायण
रहनेवाले हैं । अत: विष्णु आदि सब देवता और ब्राह्मण
मेरे इस यज्ञको शीघ्र सफल बनायें ॥ ५३-५४॥
ब्रह्माजी बोले--उसकी यह बात सुनकर
शिवको मायासे मोहित हुए समस्त देवता तथा ऋषि
उस यज्ञमें देवताओंका पूजन करने लगे॥ ५५॥
हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैंने उस यज्ञको दधीचिद्वाग
प्रदत्त शापका वर्णन कर दिया। अब यज्ञके विध्वंसकी
घटना भी बता रहा हूँ, आदरपूर्वक सुनिये ॥ ५६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे यज्ञप्रारम्भों नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
यज़का प्रारम्भ नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २७॥
अथाष्टविंशोऽध्यायः
दक्षयज्ञका समाचार पाकर एवं शिवकी आज्ञा प्राप्तकर देवी सतीका
शिवगणोंके साथ पिताके यज्ञमण्डपके लिये प्रस्थान
ब्रह्मोवाच
यदा ययुर्दक्षमखमुत्सवेन सुरर्षयः।
तस्मिन्नेवान्तरे देवी पर्वते गंधमादने॥ १
धारागृहे वितानेन सखीभिः परिवारिता।
दाक्षायणी महाक्रीडाश्रकार विविधा: सती॥ २
क्रीडासक्ता तदा देवी ददर्शाथ मुदा सती।
दक्षयज्ञे प्रयान्तीं तां रोहिण्यापृच्छ्य सत्वरम्॥ ३
दृष्ट्वा सीमंतया भूतां विजयां प्राह सा सती।
स्वसखीं प्रवरां प्राणप्रियां सा हि हितावहाम्॥ ४
सत्युवाच
हे सखीप्रवरे प्राणप्रिये त्वं विजये मम।
क्व गमिष्यति चन्द्रो5यं रोहिण्या पृच्छ सत्वरम्॥ ५
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! जब देवता तथा
ऋषिगण बड़े उत्साहके साथ दक्षके यज्ञमें जा रहे थे,
उसी समय दक्षकन्या देवी सती गन्धमादन पर्वतपर
चँदोवेसे युक्त धारागृहमें सखियोंसे घिरी हुई अनेक
प्रकारको क्रीडाएँ कर रही थीं॥ १-२॥
प्रसनतापूर्वक क्रीडामें लगी हुई देवी सतीने उस
समय चन्धमाके साथ दक्षयज्ञमें जाती हुई रोहिणीकी
देखा और शीघ्र ही उससे पुछवाया। उन्हें देखकर
सतीजी अपनी हितकारिणी प्राण-प्यारी
प्रिय तथा श्रेष्ठ सखी विजयासे बोलीं-॥ ३-४॥
सती बोलीं--हे सखियोंमें श्रेष्ठ! हे मेरी
प्राणप्रिये! हे विजये! जल्दी जाकर पूछो कि यै
चद्धदेव रोहिणीके साथ कहाँ जा रहे हैं ?॥५॥
अ० २८]
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४३७
ब्रह्मोवाच
तथोक्ता विजया सत्या गत्वा तत्सन्निधौ द्रुतम्।
कव गच्छसीति पप्रच्छ शशिनं तं यथोचितम् ॥ ६
विजयोक्तमथाकर्ण्य स्वयात्रां पूर्वमादरात्।
कथ्चितं तेन तत्सर्वं दक्षयज्ञोत्सवादिकम्॥ ७
तच्छुत्वा विजया देवीं त्वरिता जातसंभ्रमा।
कथयामास तत्सर्व यदुक्तं शशिना सतीम्॥ ८
तच्छुत्वा कालिका देवी विस्मिताभूत्सती तदा ।
विमृश्य कारणं तत्राज्ञात्वा चेतस्यचिन्तयत्॥ ९
दक्षः पिता मे माता च वीरिणी नौ कुतः सती।
आह्वानं न करोति स्म विस्मृता मां प्रियां सुताम्॥ १०
पृच्छेयं शंकरं तत्र कारणं सर्वमादरात्।
चिन्तयित्वेति सासीद्वे तत्र गंतुं सुनिश्चया॥ ११
अथ दाक्षायणी देवी विजयां प्रवरां सखीम्।
स्थापयित्वा द्रुतं तत्र समगच्छच्छिवांतिकम्॥ १२
ददर्श तं सभामध्ये संस्थितं बहुभिर्गणैः।
नंद्यादिभिर्महावीरैः प्रवरैर्यूथयूथपैः ॥ १३
दृष्ट्वा तं प्रभुमीशानं स्वपतिं साथ दक्षजा।
प्रष्टुं तत्कारणां शीघ्र प्राप शंकरसंनिधिम्॥ १४
शिवेन स्थापिता स्वाङ्के प्रीतियुक्तेन स्वप्रिया।
प्रमोदिता वचोभिः सा बहुमानपुरःसरम्॥ १५
अथ शंभुर्महालीलः सर्वेशः सुखदः सताम्।
सतीमुवाच त्वरितं गणमध्यस्थ आदरात्॥ १६
शंभुरुवाच
किमर्थमागतात्र त्वं सभामध्ये सविस्मया।
कारणं तस्य सुप्रीत्या शीघ्रं वद सुमध्यमे ॥ १७
ब्रह्मोवाच
एवमुक्ता तदा तेन महेशेन मुनीश्वर।
साञ्जलिः सुप्रणम्याशु सत्युवाच प्रभुं शिवा॥ १८
ब्रह्माजी बोले--सतीके इस प्रकार कहनेपर
विजयाने तुरंत उनके पास जाकर यथोचित रूपसे उन
चन्द्रमासे पूछा कि आप कहाँ जा रहे हैं ?॥ ६॥
विजयाकी बात सुनकर चनद्रदेवने अपनी यात्राका
उद्देश्य आदरपूर्वक बताया और उन्होंने दक्षके यहाँ
होनेवाले यज्ञमहोत्सवका सारा वृत्तान्त कहा॥ ७॥
वह सब सुनकर विजया बड़ी उतावलीके साथ
देवीजीके पास आयी और चन्द्रमाने जो कहा था, वह
सब सतीसे कह दिया। उसे सुनकर सती कालिका
देवीको बड़ा आश्चर्य हुआ। सोचने-विचारनेपर भी
[अपने यहाँ सूचना न मिलनेका] कारण न समझ
पानेपर वे मनमें सोचने लगीं ॥ ८-९॥
दक्ष मेरे पिता हैं, वीरिणी मेरी माता हैं और मैं
उनकी प्रिय कन्या हूँ, परंतु उन्होंने यज्ञमें मुझे नहीं
बुलाया। वे कैसे भूल गये और निमन्त्रण क्यों नहीं
भेजा? मैं इसका कारण आदरपूर्वक शंकरजीसे
पूछुँ--ऐसा विचारकर सतीने शंकरजीके पास जानेका
निश्चय किया॥ १०-११॥
इसके अनन्तर दक्षपुत्री देवी सती अपनी प्रिय
सखी विजयाको वहाँ बैठाकर शिवजीके पास शीघ्र
गयीं। उन्होंने शिवजीको सभाके मध्यमें अनेक गणों,
नन्दी आदि महावीरों तथा प्रमुख यूथपतियोंके साथ
बैठे हुए देखा। वे अपने पति सदाशिव ईशानकों
देखकर उस कारणको पूछनेके लिये शीघ्र उनके पास
पहुँच गयीं ॥ १२-१४॥
शिवजीने बड़े प्रेमसे प्रिया सतीको अपनी गोदमें
बैठाया और बड़े आदरके साथ उन्हें अपने वचनोंसे
प्रसन्न किया। इसके बाद महालीला करनेवाले तथा
सञ्जनोंको सुख देनेवाले सर्वेश्वर शंकर जो गणोंके
मध्यमें विराजमान थे, सतीसे शीघ्र कहने लगे
॥ १५-१६॥
शिवजी बोले-तुम इस सभाके मध्यमं आश्चर्य-
चकित होकर क्यों आयी हो ? हे सुन्दर कटिप्रदेशवाली !
तुम इसका कारण प्रेमपूर्वक शीघ्र बताओ॥ १७॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! शिवजीने जब
सतीसे इस प्रकार कहा, तो वे शिवा हाथ जोड़कर
प्रणाम करके प्रभुसे कहने लगीं--॥ १८॥
nm
ड३८
श्रीशिवमहापुराण
[अ क ४
सत्युवाच
पितुर्मम महान् यज्ञो भवतीति मया श्रुतम्।
तत्रोत्सवो महानस्ति समवेताः सुरर्षयः॥ १९
पितुर्मम महायज्ञे कस्मात्तव न रोचते।
गमनं देवदेवेश तत्सर्वं कथय प्रभो॥ २०
सुहृदामेष वै धर्मः सुहद्भिः सह सङ्गतिः।
कुर्वन्ति यन्महादेव सुहृदः प्रीतिवर्थिनीम्॥ २१
तस्मात्सर्वप्रयलेन मया गच्छ सह प्रभो।
यज्ञवाटं पितुर्मेऽद्य स्वामिन् प्रार्थनया मम॥ २२
ब्रह्मोवाच
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा सत्या देवो महेश्वर: ।
दक्षवागिषुहुद्विद्धो बभाषे सूनृतं वचः॥२३
महेश्वर उवाच
दक्षस्तव पिता देवि मम द्रोही विशेषतः॥ २४
यस्य ये मानिनः सर्वे ससुरर्षिमुखाः परे।
ते मूढा यजनं प्राप्ताः पितुस्ते ज्ञानवर्जिताः॥ २५
अनाहूताश्च ये देवि गच्छन्ति परमन्दिरम्।
अवमानं प्राप्नुवन्ति मरणादधिकं तथा॥ २६
परालयं गतोऽपीन्द्रो लघुर्भवति तद्विधः।
का कथा च परेषां वै रीढा यात्रा हि तद्विधा॥ २७
तस्मात्त्वया मया चापि दक्षस्य यजनं प्रति।
न गन्तव्यं विशेषेण सत्यमुक्तं मया प्रिये॥ २८
तथारिभिर्न व्यथते ह्यर्दितोऽपि शरैर्जनः।
स्वानां दुरुक्तिभिर्मर्मताडितः स यथा मतः॥ २९
विद्यादिभिर्गुणैः षड्भिरसदन्यैः सतां स्मृतौ।
हतायां भूयसां धाम न पश्यन्ति खलाः प्रिये ॥ ३०
ब्रह्मोवाच
एवमुक्ता सती तेन महेशेन महात्मना।
उवाच रोषसंयुक्ता शिवं वाक्यविदां वरम्॥ ३१
सती बोलीं [हे प्रभो!] मैने सुना है कि मे
पिताजीके यहाँ कोई बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है। उसमे
महान् उत्सव होगा और वहाँ देवता तथा ऋषि
एकत्रित हुए हैं। हे देवदेवेश्वर | पिताजीके उस
यज्ञमें जाना आपको अच्छा क्यों नहीं लगा, हे प्रभो
[जो भी कारण हो] वह सब बताइये॥ १९-२०॥
महादेव! सुहृदोंका यह धर्म है कि सुहदोंके
साथ अच्छी संगति करके रहें। मित्रलोग प्रेमको
बढानेवाली इस प्रकारकी संगतिको करते रहते हैं॥ २१॥
इसलिये हे प्रभो! हे स्वामिन्! आप मेरी
प्रार्थनासे मेरे साथ पिताजीके यज्ञमण्डपमें अवश्य
चलिये॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले-सतीके इस वचनको सुनकर
दक्षके वाग्बाणॉंसे बिंधे हुए हृदयवाले देव महेश्वर
मधुर वचन कहने लगे ॥ २३॥
महेश्वर बोले--हे देवि! तुम्हारे पिता दक्ष मेरे
विशेष द्रोही हो गये हैं । जो प्रमुख देवता, ऋषि तथा
अन्य लोग अभिमानी, मूढ़ और ज्ञानशून्य हैं, वे ही
तुम्हारे पिताके यज्ञमें गये हुए हैं ॥ २४-२५॥
हे देवि! जो लोग बिना बुलाये दूसरेके घर जाते
हैं, वे वहाँ अनादर ही पाते हैं, जो मृत्युसे भी बढ़कर
होता है। चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो, बिना बुलाये
दूसरेके घर जानेपर लघुता ही प्राप्त होगी और फिर
दूसरेकी बात ही क्या! ऐसी यात्रा अनर्थका कारण
बन जाती है॥ २६-२७॥
इसलिये तुमको और मुझको तो विशेष रूपसे
दक्षके यज्ञमें नहीं जाना चाहिये; हे प्रिये! यह मैंने सत्य
कहा है। मनुष्य अपने शत्रुओंके बाणसे घायल होकर
उतना व्यथित नहीं होता, जितना अपने सम्बन्धियोंके
निन्दायुक्त वचनोंसे दुखी होता है ॥ २८-२९॥
हे प्रिये! सजनोंमें रहनेवाले विद्या आदि &
गुण जब दुष्ट मनुष्योमें आ जाते हैं, तो उनकी स्मृति
नष्ट हो जाती है और वे मानी होकर
ओर नहीं देखते हैं॥ ३०॥
ब्रह्माजी बोले--महात्मा महेश्वरके इस प्रकार
कहनेपर सती वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान्
कहने लगीं--॥ ३१॥
अ० २८]
सत्युवाच
यज्ञः स्यात्सफलो येन स त्वं शंभोऽखिलेश्वर।
अनाहूतोऽसि तेनाद्य पित्रा मे दुष्टकारिणा॥ ३२
तत्सर्व ज्ञातुमिच्छामि भव भावं दुरात्मनः।
सुरर्षीणां च सर्वेषामागतानां दुरात्मनाम्॥ ३३
तस्माच्चाद्येव गच्छामि स्वपितुर्यजनं प्रभो।
अनुज्ञां देहि मे नाथ तत्र गन्तुं महेश्वर॥ ३४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तो भगवान् रुद्रस्तया देव्या शिव: स्वयम्।
विज्ञाताखिलदृक् द्रष्टा सतीं सूतिकरोऽब्रवीत्॥ ३५
शिव उवाच
यद्येवं ते रूचिर्देवि तत्र गन्तुमवश्यकम्।
सुव्रते वचनान्मे त्वं गच्छ शीघ्रं पितुर्मखम्॥ ३६
एतं नंदिनमारुह्ण वृषभं सज्जमादरात्।
महाराजोपचाराणि कृत्वा बहुगुणान्विता॥ ३७
भूषितं वृषमारोहेत्युक्ता रुद्रेण सा सती।
सुभूषिता सती युक्ता ह्वागमत्पितृमन्दिरम्॥ ३८
महाराजोपचाराणि दत्तानि परमात्मना।
सुच्छत्रचामरादीनि सद्स्त्राभरणानि च॥ ३९
गणाः षष्टिसहस्त्राणि रौद्रा जग्मुः शिवाज्ञया।
कुतूहलयुताः प्रीता महोत्सवसमन्विताः ॥ ४०
तदोत्सवो महानासीद्यजने तत्र सर्वतः।
सत्याः शिवप्रियायास्तु वामदेवगणैः कृतः॥ ४९
कुतूहलं गणाश्चक्रः शिवयोर्यश उज्जगुः।
बलात्ते पुप्लुवुः प्रीत्या महावीरा: शिवप्रियाः॥ ४२
सर्वथासीन्महाशोभा गमने जगदम्बिके।
सुखारावः संबभूव पूरितं भुवनत्रयम्॥ ४३
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४३९
सती बोलीं-हे शम्भो! हे अखिलेशवर!
जिनके जानेसे यज्ञ सफल होता है, उन्हीं आपको मेरे
दुष्ट पिताने आमन्त्रित नहीँ किया है॥ ३२॥
हे भव! उस दुरात्मा दक्षके तथा वहाँ आये हुए
सम्पूर्ण दुरात्मा देवताओं तथा ऋषियोंके मनोभावोंको
मैं जानना चाहती हूँ। अतः हे प्रभो! मैं आज ही अपने
पिताके यज्ञमें जा रही हूँ। हे नाथ! हे महेश्वर! आप
मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा प्रदान कीजिये ॥ ३३-३४॥
ब्रह्माजी बोले--उन देवीके इस प्रकार कहनेपर
सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, सृष्टिकर्ता एवं कल्याणस्वरूप साक्षात्
भगवान् रुद्र सतीसे कहने लगे-॥ ३५॥
शिवजी बोले-हे देवि! यदि इस प्रकार तुम्हारी
रुचि वहाँ अवश्य जानेकी है, तो हे सुत्रते ! मेरी आज्ञासे
तुम महाराजाओंके योग्य उपचार करके, बहुतसे गुणोंसे
सम्पन्न हो, इस सजे हुए नन्दी वृषभपर सवार होकर
शीघ्र अपने पिताके यज्ञमें जाओ॥ ३६-३७॥
तुम इस विभूषित वृषभपर आरूढ़ होओ। तब
रुद्रके इस प्रकार आदेश देनेपर सुन्दर आभूषणोंसे
अलंकृत तथा सब साधनोंसे युक्त हो देवी सती पिताके
घरकी ओर चलीं॥ ३८॥
परमात्मा शिवजीने उन्हें सुन्दर वस्त्र, आभूषण,
परम उज्ज्वल छत्र, चामर आदि महाराजोचित उपचार
दिये। भगवान् शिवजीको आज्ञासे साठ हजार रुद्रगण
भी बड़ी प्रसन्नता और महान् उत्साहके साथ कौतृहलपूर्वक
[सतीके साथ] गये॥ ३९-४०॥
उस समय वहाँ यज्ञमें सभी ओर महान् उत्सव हो
रहा था। वामदेवके गणोंने शिवप्रिया सतीका भी उत्सव
मनाया। महावीर तथा शिवप्रिय वे गण कौतूहलपूर्ण
कार्य करने तथा सती और शिवके यशको गाने लगे
और बलपूर्वक उछल-कूद करने लगे ॥ ४१-४२॥
जगदम्बाके यात्राकालमें सब प्रकारसे महान् शोभा
हो रही थी। उस समय जो सुखद [जय-जयकार आदि]
शब्द उत्पन्न हुआ, उससे तीनों लोक गूँज उठे ॥ ४३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्विवीयायां स््रसंहिताां द्वितीये सतीखण्डे सर्तायात्रावर्णनं नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीयात्रावर्णन
नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८ ॥
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श्रीशिवमहापुराण
[अ २९
अधथैकोनत्रिंशोऽध्यायः
यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर तथा दक्षद्वारा शिवनिन्दा सुनकर क्रुद्ध हो
सतीका दक्ष तथा देवताओंको फटकारना और प्राणत्यागका निश्चय
ब्रह्मोवाच
दाक्षायणी गता तत्र यत्र यज्ञो महाप्रभः।
सुरासुरमुनीन्द्रादिकुतूहलसमन्वितः ॥ ९
स्वपितुर्भवनं तत्र नानाश्चर्यसमन्वितम्।
ददर्श सुप्रभं चारु सुरर्षिगणसंयुतम्॥ २
द्वारि स्थिता तदा देवी ह्यवरुह्य निजासनात्।
नन्दिनोऽभ्यन्तरं शीघ्रमेकैवागच्छदध्वरम्॥ ३
आगतां च सतीं दृष्ट्वासिक्नी माता यशस्विनी ।
अकरोदादरं तस्या भगिन्यश्च यथोचितम्॥ ४
नाकरोदादरं दक्षो दृष्ट्वा तामपि किंचन।
नान्योऽपि तद्भयात्तत्र शिवमायाविमोहितः॥ ५
अथ सा मातरं देवी पितरं च सती मुने।
अनमद्विस्मितात्यन्तं सर्वलोकपराभवात्॥ ६
भागानपश्यद्देवानां हर्यादीनां तदध्वरे।
ज शंभुभागमकरोत् क्रोधं दुर्विषहं सती॥ ७
तदा दक्षं दहन्तीव रुषा पूर्णा सती भूशम्।
क्रूरदृष्ट्या विलोक्यैव सर्वानप्यपमानिता॥ ८
सत्युवाच
अनाहूतस्त्वया कस्माच्छंभुः परमशोभनः।
येन पूतमिदं विश्वं समग्रं सचराचरम्॥ ९
यज्ञो यज्ञविदां श्रेष्ठो यज्ञाङ्गो यज्ञदक्षिणः।
यज्ञकर्ता च यः शंभुस्तं विना च कथं मखः॥ १०
यस्य स्मरणमात्रेण सर्व पूतं भवत्यहो।
विना तेन कृतं सर्वमपवित्रं भविष्यति॥ ११
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] दक्षकन्या सती
उस स्थानपर गर्यी, जहाँ देवता, असुर और मुनीन्र आदिके
कौतूहलपूर्ण कार्यसे युक्त महान् यज्ञ हो रहा था॥१॥
सतीने वहाँ अपने पिताके भवनको देखा, जो
नाना प्रकारके आश्चर्यजनक भावोंसे युक्त,
मनोहर तथा देवताओं और ऋषियोंके समुदायसे भरा
हुआ था॥२॥
देवी सती भवनके द्वारपर जाकर खड़ी हुई और
अपने वाहन नन्दीसे उतरकर अकेली ही शीघ्रतापूर्वक
यज्ञस्थलके भीतर गयीं ॥ ३॥
सतीको आया देख उनकी यशस्विनी माता
असिक्नी (वीरिणी) और बहनोंने उनका यथोचित
सत्कार किया॥ ४॥
परंतु दक्षने उन्हें देखकर भी कुछ आदर नहीं
किया तथा उनके भयसे शिवकी मायासे मोहित हुए
अन्य लोगोंने भी उनका आदर नहीं किया॥५॥
हे मुने! सब लोगोंके द्वारा तिरस्कार प्राप्त
होनेपर भी सती देवीने अत्यन्त विस्मित हो माता-
पिताको प्रणाम किया॥ ६॥
उस यज्ञमें सतीने भगवान् विष्णु आदि देवताओके
भागको देखा, परंतु शिवजीका भाग कहीं भी दिखायी
नहीं दिया, तब उन्होंने असह्य क्रोध प्रकट किया!
अपमानित होकर भी रोषसे भरकर सब लोगोंकी ओर
क्रूर दृष्टिसे देखकर दक्षको भस्म करती हुई-सी वे
कहने लगीं॥ ७-८॥
सती बोलीं--आपने परम मंगलकारी शिवकी
[इस यञ्ञमें] क्यों नहीं बुलाया, जिनके द्वारा यह
सम्पूर्ण चराचर जगत् पवित्र होता है। जो यज्ञस्वरूप
यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, यज्ञके अंग, यज्ञकी दक्षिणा
यज्ञकर्ता हैं, उन शिवके बिना यह यज्ञ कैसे पूर्ण ही
सकता है ?॥ ९-१०॥
अहो! जिनके स्मरणमात्रसे सब कुछ पवित्र ही
जाता है, उनके बिना किया हुआ यह सारा रर
अपवित्र हो जायगा॥ ११॥
अ० २९]
द्रव्यमंत्रादिकं सर्वं हव्यं कव्यं च यन्मयम्।
शंभुना हि विना तेन कथं यज्ञ: प्रवर्तितः॥ १२
किं शिवं सुरसामान्यं मत्वाकार्षीरनादरम्'
भ्रष्टबुद्धिर्भवानद्य जातोऽसि जनकाधम॥ १३
विष्णुब्रह्मादयो देवा यं संसेव्य महेश्वरम्।
प्राप्ताः स्वपदवीं सर्वे तं न जानासि रे हरम्॥ १४
एते कथं समायाता विष्णुब्रह्मादयः सुराः।
तब यज्ञे विना शंभुं स्वप्रभुं मुनयस्तथा॥ १५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा परमेशानी विष्ण्वादीन्सकलान् प्रति।
पृथक्पृथगवोचत्सा भर्त्सयन्ती भवात्मिका॥ १६
सत्युवाच
हे विष्णो त्वं महादेवं किं न जानासि तत्त्वतः।
सगुणं निर्गुणं चापि श्रुतयो यं वदन्ति ह॥ १७
यद्यपि त्वां करं दत्त्वा बहुवारं महेश्वरः।
अशिक्षयत्पुरा शाल्वप्रमुखाकृतिभि्हरे॥ १८
तदपि ज्ञानमायातं न ते चेतसि दुर्मते।
भागार्थी दक्षयज्ञेऽस्मिन् शिवं स्वस्वामिनं विना॥ १९
पुरा पञ्चमुखो भूत्वा गर्वितोऽसि सदाशिवम्।
कृतश्चतुर्मुखस्तेन विस्मृतोऽसि तदद्भुतम्॥ २०
इन्र त्वं किं न जानासि महादेवस्य विक्रमम्।
भस्मीकृतः पविस्ते हि हरेण क्रूरकर्मणा॥ २१
हे सुरा: किन्न जानीथ महादेवस्य विक्रमम्।
अत्रे बसिष्ठ मुनयो युष्माभिः किं कृतं त्विह॥ २२
भिक्षाटनं च कृतवान् पुरा दारुवने विभुः।
शप्तो यद्भि्षुको रुद्रो भवद्धिर्मुनिभिस्तदा॥ २३
शतेनापि च रुद्रेण यत्कृतं विस्मृतं कथम्
तल्लिङ्गेनाखिलं दग्धं भुवनं सचराचरम्॥ २४
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४४१
द्रव्य, मन्त्र आदि, हव्य और कव्य-ये सब
जिनके स्वरूप हैं, उन शिवके बिना यज्ञका आरम्भ
कैसे किया गया ?॥ १२॥
कया आपने शिवजीको सामान्य देवता समझकर
उनका अनादर किया है ? हे अधम पिता! अवश्य ही
आपकी बुद्धि आज भ्रष्ट हो गयी है॥ १३॥
ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता महेश्वरकी सेवा
करके अपनी पदवीपर अधिष्ठित हैं। निश्चय ही आप
अभीतक उन शिवको नहीं जानते हैं॥ १४॥
ये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा मुनि अपने प्रभु
भगवान् शिवके बिना इस यज्ञमें केसे चले आये ?॥ १५॥
ब्रह्माजी बोले-एऐसा कहकर शिवस्वरूपिणी
परमेश्वरी विष्णु आदि सब देवताओंको अलग-अलग
'फटकारती हुई कहने लगीं--॥ १६॥
सती बोलीं-हे विष्णो! श्रुतियाँ जिन्हें सगुण
एवं निर्गुणरूपसे प्रतिपादित करती हैं, क्या आप उन
शिवजीको यथार्थ रूपसे नहीं जानते हैं ?॥ १७॥
[हे विष्णो!] यद्यपि पूर्वकालमें शिवजीने शाल्वादि
रूपोंके द्वारा आपके सिरपर हाथ रखकर कई बार शिक्षा
दी है, फिर भी हे दुर्बुद्धे! आपके हृदयमें ज्ञान उत्पन्न
नहीं हुआ और आपने अपने स्वामी शंकरके बिना ही
इस यज्ञमें भाग ग्रहण कर लिया! ॥ १८-१९ ॥
[हे ब्रह्मन्।] आप पूर्वकालमें जब पाँच मुखवाले
होकर सदाशिवके प्रति गर्वित हो गये थे, तब उन्होंने
आपको चार मुखवाला कर दिया था, आप उन्हें भूल
गये-यह तो आश्चर्य है!॥ २०॥
हे इन्द्र! क्या आप शंकरके पराक्रमको नहीं
जानते? कठिन कर्म करनेवाले शिवजीने ही आपके
वज्रको भस्म कर दिया था॥ २१॥
हे देवताओ! क्या आपलोग महादेवका पराक्रम
नहीं जानते। हे अत्रे! हे वसिष्ठ! हे मुनियो!
आपलोगोंने यह क्या कर डाला ?॥ २२॥
जब शिवजी दारुवनमें भिक्षाटन कर रहे थे और
आप सभी मुनियोंने उन भिक्षुक रुद्रको शाप दे दिया
था, तब शापित होकर उन्होंने जो किया था, उसे
आपलोग कैसे भूल गये ? उनके लिंगसे चराचरसहित
समस्त भुवन दग्ध होने लगा था॥ २३-२४॥
४४२
श्रीशिबमहापुराण
[ अ २ IN
सर्वे मूढाश्च सञ्जाता विष्णुब्रह्मादयः सुराः।
मुनयोऽन्ये विना शंभुमागता यदिहाध्वरे॥ २५
सर्वे वेदाश्च संभूता साङ्गाः शास्त्राणि वाग्यतः।
योऽसौ वेदांतगः शम्भुः कै श्चिज्जञातुं न न पार्यते ॥ २६
ब्रह्मोवाच
इत्यनेकविधा 'वाणीरगदज्जगदम्बिका ।
'कोपान्विता सती तत्र हृदयेन विदूयता॥ २७
विष्ण्वादयोऽखिला देवा मुनयो ये च तद्वचः ।
मौनीभूतास्तदाकर्ण्य भयव्याकुलमानसाः॥ २८
अथ दक्षः समाकर्ण्य स्वपुत्र्यास्तादृशं वच: ।
विलोक्य क्रूरदृष्ट्या तां सती क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ २९
दक्ष उवाच
तव किं बहुनोक्तेन कार्य नास्तीह सांप्रतम्।
गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे कस्मात्त्वं हि समागता॥ ३०
अमङ्गलस्तु ते भर्ता शिवोऽसौ गम्यते बुधैः ।
अकुलीनो वेदबाह्यो भूतप्रेतपिशाचराट्॥ ३१
तस्मान्नाह्वायितो रुद्रो यज्ञार्थ सुकुवेषभृत्।
देवर्षिसंसदि मया ज्ञात्वा पुत्रि विपश्चिता॥ ३२
विधिना प्रेरितेन त्वं दत्ता मंदेन पापिना।
रूद्रायाविदितार्थाय चोद्धताय दुरात्मने॥ ३३
तस्मात्कोपं परित्यज्य स्वस्था भव शुचिस्मिते।
यद्यागतासि यज्ञेऽस्मिन् दायं गृह्णीष्व चात्मना॥ ३४
ब्रह्मोवाच
दक्षेणोक्तेति सा पुत्री सती त्रैलोक्यपूजिता।
निंदायुक्तं स्वपितरं दृष्ट्वासीद् रुषिता भृशम्॥ ३५
अचिन्तयत्तदा सेति कथं यास्यामि शंकरम्।
शंकरं द्रष्टुकामाहं पृष्टा वक्ष्ये किमुत्तरम्॥ ३६
अथ प्रोवाच पितरं दक्षं तं दुष्टमानसम्।
निःश्वसन्ती रूषाविष्टा सा सती त्रिजगत्प्रसूः ॥ ३७
[ऐसा लग रहा है कि] ब्रह्मा, विष्णु आहि
समस्त देवता तथा अन्य मुनिगण मूर्ख हो गये हैं, जो
कि भगवान् शिवके बिना ही इस यज्ञमें आ गये॥ २५)
अंगोंसहित सभी वेद, शास्त्र एवं वाणी जिनसे
उत्पन्न हुए हैं, उन वेदान्तवेद्य भगवान् शंकरको
जाननेमें कोई पार नहीं पा सकता है॥ २६॥
ब्रह्माजी बोले-- [नारद !] इस प्रकार क्रोधसे
भरी हुई जगदम्बा सतीने वहाँ व्यथितहदयसे अनेक
प्रकारकी बातें कहीं ॥ २७॥
श्रीविष्णु आदि समस्त देवता और मुनि जो वहाँ
उपस्थित थे, उनकी बात सुनकर चुप रह गये और
भयसे व्याकुलचित्त हो गये॥ २८॥
तब दक्ष अपनी पुत्रीके उस प्रकारके वचनको
सुनकर उन सतीको क्रूर दृष्टिसे देखकर क्रोधित
होकर कहने लगे-॥ २९॥
दक्ष बोले--हे भद्रे! तुम्हारे बहुत कहनेसे क्या
लाभ ! इस समय यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है । तुम चली
जाओ या ठहरो, तुम यहाँ किसलिये आयी हो ?॥ ३०॥
सभी विद्वान् जानते हैं कि तुम्हारे पति शिव
मंगलरहित, अकुलीन तथा वेदसे बहिष्कृत हैं और
भूतों प्रेतोंके स्वामी हैं। इसलिये हे पुत्रि! मुझ बुद्धिमान्ने
ऐसा जानकर कुवेषधारी शिवको देवताओं और
ऋषियोंकी इस सभामें नहीं बुलाया॥ ३१-३२॥
मुझ पापी दुर्बुद्धिने ब्रह्माजीके द्वारा प्रेरित किये
जानेपर शास्त्रके अर्थको न जाननेवाले, उद्दण्ड तथा
दुरात्मा रुद्रको तुम्हें प्रदान कर दिया था॥३३॥
इसलिये हे शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़कर
शान्त हो जाओ और यदि इस यज्ञमें तुम आ ही गयी
हो तो अपना भाग ग्रहण करो॥ ३४॥
ब्रह्माजी बोले--दक्षके इस प्रकार कहनेपर
त्रिभुवनपूजिता दक्षपुत्री सती निन्दायुक्त अपने पिताकी
ओर देखकर अत्यन्त क्रोधित हो गयीं ॥ ३५॥
वे सोचने लगीं कि अब मैं शंकरजीके पास क.
य ? के शंकरको देखना चाहती हूँ, किंतु उ
पूछनेपर मैं क्या उत्तर दूँगी ?॥ ३६॥
तदनन्तर तीनों लोकोंकी जननी वे सती के
युक्त हो लम्बी श्वास लेती हुई दूषित मनवाले अ
पितासे कहने लगीं-- ॥ ३७॥
अ० २९]
सत्युवाच
यो निंदति महादेवं निंद्यमानं शृणोति वा।
ताबुभौ नरकं यातौ यावच्चन््रदिवाकरो॥ ३८
तस्मात्यक्ष्याम्यहं देहं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।
किं जीवितेन मे तात शृण्वन्त्यानादरं प्रभो:॥ ३९
यदि शक्तः स्वयं शंभोर्निन्दकस्य विशेषतः।
छिन्द्यात् प्रसह्य रसनां तदा शुद्धब्रेन्न संशय: ॥ ४०
यद्यशक्तो जनस्तत्र निरयात्सुपिधाय वै।
'कणौँ धीमान् ततः शुद्धयेद् वदन्तीदं बुधा वरा: ॥ ४१
ब्रह्मोवाच
इत्थमुक्त्वा धर्मनीतिं पश्चात्तापमवाप सा।
अस्मरच्छांकरं वाक्यं दूयमानेन चेतसा॥ ४२
ततः संक्रुद्धय सा दक्षं निःशंकं प्राह तानपि।
सर्वान्विष्णवादिकान्देवान्मुनीनपि सती ध्रुवम्॥ ४३
सत्युवाच
तात त्वं निन्दकः शंभोः पश्चात्तापं गमिष्यसि।
इह भुक्त्वा महादुःखमन्ते यास्यसि यातनाम्॥ ४४
यस्य लोकेऽप्रियो नास्ति प्रियश्चैव परात्मनः
तस्मिन्नवैर शर्वेऽस्मिन्त्वां विना कः प्रतीपकः ॥ ४५
महद्विनिन्दा नाश्चर्यं सर्वदासत्सु सेर्ष्यकम्।
महदङ्घ्निरजोध्वस्ततमःसु नैव शोभना॥ ४६
शिवेति ह्यक्षर यस्य नृणां नाम गिरेरितम्।
सकृत्प्रसद्ठात्सकलमघमाशु विहंति तत्| ४७
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४४३
सती बोलीं जो महादेवजीकी निन्दा करता
है अथवा जो उनकी हो रही निन्दाको सुनता है, वे
दोनों तबतक नरकमें पड़े रहते हैं, जबतक चन्द्रमा
और सूर्य विद्यमान हैं॥ ३८॥
अतः हे तात! मैं अग्निमें प्रवेश करूँगी और
[अपने] शरीरको त्याग दूँगी, अपने स्वामीका अनादर
सुनकर अब मुझे जीवनसे क्या प्रयोजन ?॥ ३९॥
[शिवनिन्दा सुननेवाला व्यक्ति] यदि समर्थ हो
तो वह स्वयं विशेष यत्न करके शम्भुकी निन्दा
करनेवालेकी जीभको बलपूर्वक काट डाले, तभी वह
[शिवनिन्दा-श्रवणके पापसे] शुद्ध हो सकता है,
इसमें संशय नहीं है। यदि मनुष्य [कुछ प्रतिकार कर
सकनेमें] असमर्थ हो, तो बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये
कि वह दोनों कान बंद करके वहाँसे चला जाय, तब
वह पापसे शुद्ध हो सकता है--ऐसा श्रेष्ठ विद्वान्
कहते हैं ॥ ४०-४१॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार धर्मनीति कहकर
वे सती पश्चात्ताप करने लगीं और उन्होंने व्यथितचित्तसे
भगवान् शंकरके वचनका स्मरण किया॥४२॥
तदनन्तर सतीने अत्यन्त कुपित हो दक्ष तथा उन
विष्णु आदि समस्त देवताओं और मुनियोंसे भी निडर
होकर कहा-॥ ४३॥
सती बोलीं-हे तात! आप शंकरके निन्दक
हैं, अतः आपको पश्चात्ताप करना पड़ेगा, इस लोकमें
महान् दुःख भोगकर अन्तमें आपको यातना भोगनी
पड़ेगी ॥ ४४॥
इस लोकमें जिन परमात्माका न कोई प्रिय है,
न अप्रिय है, उन द्वेषरहित शिवके साथ आपके
अतिरिक्त दूसरा कौन वैर कर सकता है ?॥ ४५॥
जो दुष्ट लोग हैं, वे सदा इरष्यापूर्वक यदि
महापुरुषोंकी निन्दा करें तो उनके लिये यह कोई
आश्चर्यकी बात नहीं है, परंतु जो महात्माओंके
चरणोंकी रजसे अपने अज्ञानान्धकारको दूर कर चुके
हैं, उन्हें महापुरुषोंकी निन्दा शोभा नहीं देती ॥ ४६॥
जिनका 'शिव' यह दो अक्षरोंका नाम कभी
'बातचीतके प्रसंगसे मनुष्योंकी वाणीद्वारा एक बार
उच्चरित हो जाय, तो वह सम्पूर्ण पापराशिको शीघ्र ही
3.3.
श्रीशिवमहापुराण
[ अ I SE
पवित्रकीर्तिममलं भवान् द्वेष्टि शिवेतरः।
अलङ्घ्यशासनं शंभुमहो सर्वेश्वरं खलः ॥ ४८
यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिसुनिषेवितम्।
सर्वार्थदं ब्रह्मरसैः सर्वार्थिभिरथादरात्॥ ४९
यदवर्षत्यर्थिनः शीघ्रं लोकस्य शिव आदरात्।
भवान् ड्रुह्यति मूर्खत्वात् तस्मै चाशेषबंधवे॥ ५०
किंवा शिवाख्यमशिवं त्वदन्ये न विदुर्बुधाः ।
ब्रह्मादयस्तं मुनयः सनकाद्यास्तथापरे॥ ५१
अवकीर्य जटा भूतैः शमशाने स कपालधृक् ।
तन्माल्यभस्म वा ज्ञात्वा प्रीत्यावसदुदारधी: ॥ ५२
ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणोत्सृष्टमादरात्।
निर्माल्यं मुनयो देवाः स शिवः परमेश्वरः॥ ५३
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म चोदितम्।
वेदे विविच्य वृत्तं च तद्विचार्य मनीषिभि:॥ ५४
विरोधियौगपद्यैककर्तृके च तथा द्वयम्।
परब्रह्मणि शंभौ तु कमंर्च्छन्ति न किंचन॥ ५५
मा व: पदव्यः स्म पितः या अस्मदास्थिताः सदा।
यज्ञशालासु वो धूम्रवर्त्मभुक्तोज्झिताः परम्॥ ५६
जोऽव्यक्तलिङ्गः सततमवधूतसुसेवितः ।
अभिमानमतो न त्वं कुरु तात कुबुद्धिधृक् ॥ ५७
नष्ट कर देता है, अहो, खलस्वरूप आप शिवसे
होकर उन पवित्र कीर्तिवाले, निर्मल, अलंघ्य शासनाने
सर्वेश्वर शिवसे विद्वेष करते हैं ॥ ४७-४८ ॥
महापुरुषोके मनरूपी मधुकर ब्रह्मानन्दमय
रसका पान करनेकी इच्छासे जिनके सर्वार्थदायक
चरणकमलोंका निरन्तर सेवन किया करते हैं और जे
शिव संसारके लोगोंपर शीघ्र ही आदरपूर्वक मनोरथोंकी
वर्षा करते हैं, सबके बन्धु उन्हीं महादेवसे आप
मूर्खतावश द्रोह करते हैं ॥ ४९-५० ॥
जिन शिवको आप अशिव बताते हैं, उन्हे क्या
आपके सिवा दूसरे विद्वान् नहीं जानते। ब्रह्मा आदि
देवता, सनक आदि मुनि तथा अन्य ज्ञानी क्या उनके
स्वरूपको नहीं समझते ॥ ५१॥
उदारबुद्धि भगवान् शिव जटा फैलाये, कपाल
धारण किये शमशानमें भूतोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक
रहते हैं तथा भस्म एवं नरमुण्डोंकी माला धारण
करते हैं॥ ५२॥
इस बातको जानकर भी जो मुनि और देवता उनके
चरणोंसे गिरे निर्माल्यको बड़े आदरके साथ अपने
मस्तकपर चढ़ाते हैं, इसका क्या कारण है ? यही कि
वे भगवान् शिव ही साक्षात् परमेश्वर हैं॥५३॥
वेदोमें प्रवृत्त तथा निवृत्तये दो प्रकारके कर्म
बताये गये हैं, जिनका विद्वानोंको विवेकपूर्वक विचार
करना चाहिये। ये दोनों ही कर्म परस्पर विरुद्ध
गतिवाले हैं, अतः एक कर्ताके द्वारा इनका साथ-साथ
अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। भगवान् शिव तो
साक्षात् परब्रह्म हैं, अतः उनमें इन दोनों ही कमॉकी
गति नहीं है। (अतः वे इन दोनों ही कमाँसे परतर
नहीं हैं) ॥ ५४-५५ ॥
हे पितः! जो योगैश्वर्य अर्थात् अणिमा आदि
सिद्धियाँ हमें सर्वदा प्राप्त हैं, वे आपको प्राप्त नहीं
हैं। आपकी यज्ञशालाओंमें आयोजित होनेवाले तरी
धूममार्गको प्रदान करनेवाले प्रवृत्तिमार्गीय कर्मोंका है
त्याग कर चुके हैं। हमारा ऐश्वर्य अव्यक्त है तथा
ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंके द्वारा निरन्तर सेवित है। हे तात.
आप विपरीत बुद्धिवाले हैं, अत: आपको अभिरम
नहीं करना चाहिये ॥ ५६-५७॥
आ० ३०]
किं बहूक्तेन वचसा दुष्टस्त्वं सर्वथा कुधी:।
त्वदुद्धवेन देहेन न मे किंचित्प्रयोजनम्॥ ५८
तज्जन्म धिग्यो महतां सर्वथावद्यकृत्खल: ।
परित्याज्यो विशेषेण तत्संबंधो विपश्चिता॥ ५९
गोत्रं त्वदीयं भगवान् यदाह वृषभध्वजः।
दाक्षायणीति सहसाहं भवामि सुदुर्मना॥ ६०
तस्मात्त्वदङ्गजं देहं कुणपं गर्हितं सदा।
व्युत्सृज्य नूनमधुना भविष्यामि सुखावहा॥ ६१
हे सुरा मुनयः सर्वे यूयं शृणुत मद्गच:।
सर्वथानुचितं कर्म युष्माकं दुष्टचेतसाम्॥ ६२
सर्वे यूयं विमूढा हि शिवनिंदा: कलिप्रियाः।
प्राप्स्यन्ति दण्डं नियतमखिलं च हराद् श्रुवम्॥ ६३
ब्रह्मोवाच
दक्षमुक्त्वाध्वरे तस्मिन् व्यरमत्सा सती तदा।
अनूद्य चेतसा शम्भुमस्मरत्प्राणवल्लभम्॥ ६४
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४४५
अधिक कहनेसे क्या लाभ? आप दुष्टहदय हैं
और आपकी बुद्धि सर्वथा दूषित हो चुकी है, अतः
आपसे उत्पन्न हुए इस शरीरसे भी मेरा कुछ भी
प्रयोजन नहीं रहा, उस दुष्ट व्यक्तिके जन्मको
धिक्कार है, जो महापुरुषोंके प्रति अपराध करनेवाला
है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ऐसे सम्बन्धका
विशेष रूपसे त्याग कर दे॥ ५८-५९॥
जिस समय भगवान् शिव आपके गोत्रका
उच्चारण करते हुए मुझे दाक्षायणी कहेंगे, उस समय
मेरा मन सहसा अत्यन्त दुखी हो जायगा॥ ६०॥
इसलिये आपके अंगसे उत्पन्न हुए शवतुल्य
घृणित इस शरीरको इस समय मैं अवश्य ही त्याग
दूँगी और ऐसा करके सुखी हो जाऊँगी॥ ६१॥
हे देवताओ और मुनियो! आप सब लोग मेरी
बात सुनें, दूषित मनवाले आपलोगोंका यह कर्म
सर्वथा अनुचित है। आप सब लोग मूढ़ हैं; क्योंकि
शिवजीकी निन्दा और कलह आपलोगोंको प्रिय है।
अत: भगवान् हरसे सभीको इस कुकर्मका निश्चय ही
पूरा-पूरा दण्ड मिलेगा॥ ६२-६३॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] उस यञ्ञमें दक्षसे
तथा देवताओंसे ऐसा कहकर सती देवी चुप हो गयीं
और मन-ही-मन अपने प्राणवल्लभ शम्भुका स्मरण
करने लगीं ॥ ६४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्ीवाक्यवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीका वाक्य-
वर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९॥
अथ त्रिंशोऽध्यायः
दक्षयज्ञमें सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, भृगुद्वारा
यज्ञकुण्डसे ऋभुओंको प्रकट करना, ऋभुओं और शंकरके
गणोंका युद्ध, भयभीत गणोंका पलायित होना
नारद उवाचं
मौनीभूता यदा सासीत्सती शंकरवल्लभा।
चरित्रं किमभूत्तत्र विधे तद्वद चादरात्॥ १
ब्रह्मोवाच
मौनीभूता सती देवी स्मृत्वा स्वपतिमादरात्।
कषितावुदीच्यां सहसा निषसाद प्रशान्तधीः॥ २
नारदजी बोले--हे विधे! जब [दक्षको सम्बोधित:
कर] शिवप्रिया सतीने मौन धारण कर लिया, तब वहाँ
क्या चरित्र हुआ, मुझसे उसे आदरपूर्वक कहिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मौन होकर सतीदेवी
अपने पतिका सादर स्मरण करके और शान्तचित्त
होकर सहसा उत्तर दिशामें भूमिपर बैठ गयीं॥ २॥
४४६
जलमाचम्य विधिवत् संवृता वाससा शुचि: ।
दुङ् निमील्य पतिं स्मृत्वा योगमार्ग समाविशत् ॥
कृत्वा समानावनिलौ प्राणापानौ सितानना।
उत्थाप्योदानमथ च यत्लात्सा नाभिचक्रतः ॥
हृदि स्थाप्योरसि थिया स्थितं कंठाद् भ्रुवोः सती।
अनिंदितानयन्मध्यं शंकरप्राणवल्लभा॥
एवं स्वदेह सहसा दक्षकोपाज्जिहासती।
दग्धे गात्रे वायुशुचिर्धारितं योगमार्गतः॥
ततः स्वभर्तुश्चरणां चिन्तयन्ती न चापरम्।
अपश्यत्सा सती तत्र योगमार्गनिविष्टधीः ॥
हृतकल्मषतद्देहः प्रापतच्च तदग्निना।
भस्मसादभवत्सद्यो मुनिश्रेष्ठ तदिच्छया ॥
तत्पश्यतां च खे भूमी वादोऽभृत्सुमहांस्तदा ।
हाहेति सोऽद्धुतश्चित्रः सुरादीनां भवावह: ॥
हन्त प्रिया परा शांभोर्देवी दैवतमस्य हि।
जहावसून् सती केन सुदुष्टेन प्रकोपिता॥ १०
अहो त्वनात्म्यं सुमहदस्य दक्षस्य पश्यत।
चराचरं प्रजा यस्य यत्युत्रस्य प्रजापतेः॥ ११
अहोऽद्य विमनाभूत्सा सती देवी मनस्विनी।
वृषध्वजप्रियाभीक्ष्णं मानयोग्या सतां सदा॥ १२
सोऽयं दुर्मर्षहृदयो ब्रह्मश्रुक् स प्रजापतिः।
महतीमपकीर्ति हि प्राप्स्यति त्वखिले भवे॥ १३
यत्सवाङ्गजां सुतां शंभुद्विद् न्यषेधत्समुद्यताम्।
'महानरकभोगी स मृतये नोऽपराधतः॥ १४
श्रीशिवमहापुराण
[आ० NS
उन्होंने विधिपूर्वक जलका आचमन करके
३ | ओढ़ लिया और पवित्रभावसे आँखें मूँदकर पतिका
चिन्तन करके वे योगमार्गमें प्रविष्ट हो गयीं [३
गौर मुखवाली शंकरकी प्राणप्रिया सती [प्राणायाम
४ | द्वारा] प्राण और अपान वायुको समान करके उदान
वायुको यलपूर्वक नाभिचक्रसे ऊपर उठाकर
| हृदयमें स्थापित करनेके पश्चात् उस हदयस्थित वायुको
कण्ठमार्गसे भ्रुकुटियोंके बीचमें ले गयीं ॥ ४-५ ॥
८ | गिरा और उनको इच्छाके अनुसार अग्निसे जलकर
उसी क्षण भस्म हो गया॥८॥
उस समव [वहाँ आये हुए] देवता आदिने जब
यह घटना देखी, तब वे बड़े जोरसे हाहाकार करने
लगे।उनका वह अद्भुत, विचित्र एवं भयंकर हाहाकार
आकाशमें और पृथिवीतलपर सर्वत्र व्याप्त हो गया॥ ९॥
[लोग कह रहे थे] हाय ! भगवान् शंकरको परमः
| ग्रेयसी तथा देवतास्वरूपिणी सतीदेवीने किस
दु्व्यवहारसे कुपित होकर अपने प्राण त्याग दिये !॥ १०॥
अहो! चराचर जिनकी प्रजा है और जो
ब्रह्माजीके पुत्र हैं, ऐसे इन दक्षकी बड़ी भारी दुष्टी
तो देखो!॥ ११॥
अहो, शिवप्रिया मनस्विनी सतीदेवी, जो
सदा ही सज्जनोंके लिये मानयोग्य थीं, आज इतनी
दुःखित हो गयीं॥ १२॥
वास्तवमें उन दक्षका हृदय बड़ा ही असर्हिर्ष
है। वे ब्राह्मणद्रोही है, इसलिये सारे संसारमें उ
महान् अपयश प्राप्त होगा॥ १३॥
इन शम्भुद्रोही दक्षने प्राणत्याग करनेको र्ध
अपनी पुत्रीको रोकातक नहीं । इस अपराधकें
इन्हें महान् नरक भोगना पडेगा॥ १४॥
>
आ० ३० ]
वदत्येवं जने सत्या दृष्ट्वासुत्यागमद्भुतम्।
ब्रुं तत्पार्षदा: क्रोधादुदतिष्ठन्नुदायुधाः ॥ १५
द्वारि स्थिता गणाः सर्वे रसायुतमिता रुषा।
शंकरस्य प्रभावात्तेऽक्रुध्यन्नतिमहाबलाः॥ १६
हाहाकारमकुर्वस्ते धिग् धिग् नो नेति वादिनः।
उच्चैः सर्वेऽसकृद्वीराः शंकरस्य गणाधिपाः ॥ १७
हाहाकारेण महता व्याप्तमासीददिगन्तरम्।
सर्वे प्रापन् भयं देवा मुनयोऽन्येऽपि ते स्थिताः ॥ १८
गणाः संमन्त्र्य ते सर्वेऽभूवन् क्रुद्धा उदायुधाः।
कुर्वन्तः प्रलयं वाद्योः शस्त्रेर्व्याप्तं दिगन्तरम्॥ १९
शस्तरैरध्नन्निजाङ्गानि केचित्तत्र शुचाकुलाः।
शिरोमुखानि देवर्षे सुतीक्ष्णैः प्राणनाशिभिः॥ २०
इत्थं ते विलयं प्राप्ता दाक्षायण्याः समं तदा।
गणायुते द्वे च तदा तदद्भुतमिवाभवत्॥ २१
गणा नाशावशिष्टा ये शंकरस्य महात्मन: ।
दक्षं तं क्रोधितं हन्तुमुदतिष्ठन्नुदायुधाः॥ २२
तेषामापततां वेगं निशम्य भगवान् भृगुः।
यज्ञघ्नघ्नेन यजुषा दक्षिणाग्नौ जुहोन्मुने॥ २३
हूयमाने च भृगुणा समुत्येतुर्महासुराः।
ऋभवो नाम प्रबला वीरास्तत्र सहस्त्रशः ॥ २४
तैरलातायुधैस्तत्र प्रमथानां मुनीश्वर
अभूय्युद्धं सुविकटं शृण्वतां रोमहर्षणम्॥ २५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४४७
सतीके प्राणत्यागको देखकर जिस समय लोग
ऐसा कह रहे थे, उसी समय शिवजीके पार्षद शीघ्र
ही क्रोधपूर्वक अस्त्र-शस्त्र लेकर उठ खड़े हुए॥ १५॥
[यज्ञमण्डपके] द्वारपर खडे हुए वे भगवान्
शंकरके समस्त साठ हजार महाबली पार्षद शंकरजीके
प्रभावसे कुपित हो उठे थे॥ १६॥
हमें धिक्कार है, धिक्कार है--ऐसा कहते हुए
शंकरके सभी वीर गणाधिप बारम्बार उच्च स्वरसे
हाहाकार करने लगे॥ १७॥
शिवगणोंके महान् हाहाकारसे सभी दिशाएँ
व्याप्त हो गयीं। सभी देवता, मुनिगण तथा जो भी
अन्य लोग वहाँ उपस्थित थे, वे भयभीत हो
गये॥ १८ ॥
क्रुद्ध हुए उन समस्त रुद्रगणोंने आपसमें विचार-
विमर्श करके वाद्योंसे प्रलय मचाते हुए [लड़नेके
लिये] शस्त्रास्त्र उठा लिये॥ १९॥
हे देवर्षे! कितने ही पार्षद तो वहाँ शोकसे ऐसे
व्याकुल हो गये कि वे अत्यन्त तीखे प्राणनाशक
शस्त्रोंद्रार अपने ही मस्तक और मुख आदि अंगोंपर
आघात करने लगे॥ २०॥
इस प्रकार बीस हजार पार्षद उस समय
दक्षकन्या सतीके साथ ही नष्ट हो गये, वह एक
अद्भुत-सी बात हुई॥ २१॥
महात्मा शंकरके जो गण नष्ट होनेसे बच गये,
वे क्रोधयुक्त होकर दक्षको मारनेके लिये हथियार
उठाकर खड़े हो गये॥ २२॥
हे मुने! आक्रमणकारी उन पार्षदोंका वेग
देखकर भगवान् भृगुने यज्ञमें विघ्न डालनेबालोंका
नाश करनेवाले [ अपहता असुरा रक्षाईसि वेदिषदः ]
इस यजुर्मनत्रसे दक्षिणाग्निमें आहुति दी॥ २३॥
भृगुके आहुति देते ही यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक
हजारों महान् देवता, जो बड़े प्रबल वीर थे, वहाँ
प्रकट हो गये॥ २४॥
हे मुनीश्वर! हाथमें जलती हुई लकड़ियोंको
आयुधके रूपमें धारण करनेवाले उन सभीके साथ
प्रमथगणोंका अत्यन्त विकट युद्ध हुआ, जो सुननेवालोंके
भी रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ २५॥
१४४८
श्रीशिवमहापुराण
[अ ३१
ऋभुभिस्तैर्महावीरैरहन्यमानाः समन्ततः ।
अयत्नयानाः प्रमथा उशद्धिब्रह्मयतेजसा॥ २६
एवं शिवगणास्ते वै हता विद्राविता द्रुतम्।
शिवेच्छया महाशक्त्या तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २७
तद् दृष्ट्वा ऋषयो देवाः शक्राद्याः समरुद्गणाः ।
विश्वेऽश्विनौ लोकपालास्तूष्णीं भूतास्तदाभवन्॥ २८
केचिद्विष्णुं प्रभुं तत्र प्रार्थयन्तः समन्ततः।
उद्विग्ना मन्त्रयन्तश्च विध्नाभावं मुहुर्मुहुः ॥ २९
सुविचार्योदर्कफलं महोद्विग्नाः सुबुद्धयः।
सुरविष्णवादयोऽभूवंस्तन्नाशाद्रावणान्मुहुः ॥ ३०
एवंभूतस्तदा यज्ञो विघ्नो जातो दुरात्मनः।
ब्रह्मबंधोश्च दक्षस्य शंकरद्रोहिणो मुने॥ ३१
उन ब्रह्मतेजसे सम्पन्न महावीर ऋभुओंके दा]
सभी ओरसे मारे जाते हुए प्रमथगण बिना अधिक
प्रयासके ही भाग खड़े हुए। इस प्रकार उन देवताओं
उन शिवगणोंको तुरंत मार भगाया। यह अद्धुत-सौ
घटना भगवान् शिवकी इच्छारूपी महाशक्तिसे हो हूर
थी॥ २६-२७॥
उसे देखकर ऋषि, इन्द्र आदि देवता, मरुद्गण
विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार और लोकपाल चुप ही
रहे॥ २८॥
कुछ लोग सन ओरसे वहाँ भगवान् विष्युसे
प्रार्थना करते थे और उद्विग्न हो बारम्बार विध्ननिवारणके
लिये आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ २९॥
प्रमथगणोंके नाश होने और भगाये जानेसे जो
परिणाम होनेवाला था, उसका भलीभाँति विचार
करके उत्तम बुद्धिवाले विष्णु आदि देवता अत्यन्त
उद्विग्न हो उठे॥ ३०॥
हे मुने! दुरात्मा, शंकरद्रोही तथा ब्रह्मबन्धु
(पतित ब्राह्मण) दक्षके यज्ञमें उस समय इस प्रकारका
विघ्न उपस्थित हो गया॥ ३१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने
सतीदेहत्यागोपद्रववर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीके उपाख्यानमें
सतीका देहत्याग और उपद्रववर्णन नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
यज्ञमण्डपमें आकाशवाणीद्वारा दक्षको फटकारना तथा देवताओंको सावधान करना ,
ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे तत्र नभोवाणी मुनीश्वर।
अवोचच्छृण्वतां दक्षसुरादीनां यथार्थतः॥ १
व्योमवाण्युवाच
रे रे दक्ष दुराचार दंभाचारपरायण।
किं कृतं ते महामूढ कर्म चानर्थकारकम्॥ २
ज कृतं शैवराजस्य दधीचेर्वचनस्य हि।
प्रमाणं तत्कृते मूढ सर्वानन्दकरं शुभम्॥ ३
निर्गतस्ते मखाद्विप्र: शापं दत्त्वा सुदुःसहम्।
'ततोऽपि बुद्धं किंचिन्नो त्वया मूढेन चेतसि॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इसी बीच वहीं
दक्ष तथा देवता आदिको सुनाते हुए
यथार्थ बात कही ॥ १॥
आकाशवाणी बोली--हे दुराचारी ती
दम्भवृत्तिमें तत्पर दक्ष! हे महामूढ़ ! तुमने यह कर
अनर्थकारी कर्म कर डाला!॥ २॥
हे मूढ़ तुमने शिवभक्तराज दधीचिके कथती
भी प्रमाण नहीं माना, जो तुम्हारे लिये सब प्रकास
आनन्ददायक और मंगलकारी था॥ ३॥ है
वे ब्राह्मण तुमको दुस्सह शाप देकर चले गये,
भी तुम मूढ़ने अपने मनमें कुछ भी नहीं समझा ।
अ० ३९]
ततः कृतः कथं नो वै स्वपुत्र्यास्त्वादरः पर: ।
समागतायाः सत्याश्च मङ्गलाया गृहं स्वत:॥ ५
सतीभवौ नार्चितो हि किमिदं ज्ञानदुर्बल।
ब्रह्मपुत्र इति वृथा गर्वितोऽसि विमोहित:॥ ६
सा सत्येव सदाराध्या सर्वपुण्यफलप्रदा ।
त्रिलोकमाता कल्याणी शंकरार्धाडुभागिनी॥ ७
सा सत्येवार्चिता नित्यं सर्वसौभाग्यदायिनी।
माहेश्वरी स्वभक्तानां सर्वमङ्गलदायिनी॥ ८
सा सत्येवार्चिता नित्यं संसारभयनाशिनी ।
मनोऽभीष्टप्रदा देवी सर्वोपद्रवहारिणी॥ ९
सा सत्येवार्चिता नित्यं कीर्तिसंपत्प्रदायिनी।
परमा परमेशानी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥ १०
सा सत्येव जगद्धात्री जगद्रक्षणकारिणी।
अनादिशक्तिः कल्पान्ते जगत्संहारकारिणी ॥ ११
सा सत्येव जगन्माता विष्णुमाता विलासिनी।
ब्रहोन्द्रचन्द्रवह्ल्यकदेवादिजननी स्मृता॥ १२
सा सत्येव तपोधर्मदानादिफलदायिनी।
शंभुशक्तिर्महादेवी दुष्टहन्त्री परात्परा॥ १३
ईदृग्विधा सती देवी यस्य पत्नी सदा प्रिया।
तस्मै भागो ज दत्तस्ते मूढेन कुविचारिणा॥ १४
शंभुर्हि परमेशानः सर्वस्वामी परात्परः।
विष्णुब्रह्मादिसंसेव्यः सर्वकल्याणकारकः ॥
तप्यते हि तपः सिद्धैरतदर्शनकांक्षिभिः।
युज्यते योगिभियांगैरेतदर्शनकांक्षिभिः ॥ १६
अनन्तधनधान्यानां यागादीनां तथैव च।
दर्शनं शंकरस्यैव महत्फलमुदाहृतम्॥ १७
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रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४४९
इसके अनन्तर तुमने अपने घरमें स्वतः आयी
हुई अपनी मंगलमयी पुत्री सतीका विशेष आदर क्यों
नहीं किया ?॥ ५॥
हे ज्ञानदुर्बल! तुमने सती और महादेवजीकी
पूजा नहीं की, यह तुमने क्या किया ? मैं ब्रह्माजीका
पुत्र हूँ--ऐसा समझकर विमोहमें पड़कर तुम व्यर्थ ही
घमण्डमें भरे हुए हो॥६॥
वे सती सदा आराधना करनेके योग्य, समस्त
पुण्योंका फल देनेवाली, तीनों लोकोंकी माता, कल्याण-
स्वरूपा और शंकरके आधे अंगमें निवास करनेवाली
हैं। वे माहेश्वरी सती देवी पूजित होनेपर सदा सम्पूर्ण
सौभाग्य प्रदान करनेवाली और अपने भक्तोंको सब
प्रकारके मंगल देनेवाली हैं। वे सती देवी ही पूजित
होनेपर सदा संसारका भय दूर करनेवाली, मनोवांछित
'फल देनेवाली हैं और समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेवाली
हैं॥ ७--९ ॥
वे परमा परमेश्वरी सती ही पूजित होनेपर सदा
कीर्ति, भोग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं। वे सती ही
इस जगत्को जन्म देनेवाली माता, जगत्की रक्षा
करनेवाली, अनादि शक्ति और कल्पके अन्तमें जगतूका
संहार करनेवाली हैं ॥ १०-११॥
वे सती ही जगत्की माता, भगवान् विष्णुको
माता, विलासिनी तथा ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र, अग्नि एवं
सूर्य आदिकी जननी मानी गयी हैं। वे सती ही
तपस्या, धर्म तथा दान आदिका फल देनेवाली,
शम्भुशक्ति, महादेवी, दुष्टोंका हनन करनेवाली और
परात्पर शक्ति हैं॥ १२-१३॥
ऐसी सती देवी जिनकी सदा प्रिय भार्या हैं, उन
शिवको दुष्ट विचारवाले मूढ़ तुमने यज्ञ-भाग नहीं
दिया। भगवान् शिव ही परमेश्वर, सबके स्वामी,
परात्पर, ब्रह्मा-विष्णु आदिके द्वारा सम्यक् सेव्य हैं
और सबका कल्याण करनेवाले हैं ॥ १४-१५॥
इन्हींके दर्शनकी इच्छावाले सिद्ध पुरुष तपस्या
करते हैं और इन्हींके दर्शनकी इच्छावाले योगीजन
योगसाधनामें प्रवृत्त होते हैं। अनन्त धनधान्य और
यज्ञ आदिका सबसे महान् फल शंकरका दर्शन ही
कहा गया है॥ १६-१७॥
४५०
श्रीशिवमहापुराण
[अ = ` जज ` १
शिव एव जगद्धाता सर्वविद्यापतिः प्रभुः।
आदिविद्यावरस्वामी सर्वमङ्गलमङ्गलः॥ १
तच्छक्तेर्न कृतो यस्मात्सत्कारोऽद्य त्वया खल।
अत एवाध्वरस्यास्य विनाशो हि भविष्यति॥ १९
अमङ्गलं भवत्येव पूजारहाणामपूजया।
पूज्यमाना च नासौ हि यतः पूज्यतमा शिवा॥ २०
सहस्रेणापि शिरसां शेषो यत्पादजं रजः।
वहत्यहरहः प्रीत्या तस्य शक्तिः शिवा सती॥ २१
यत्पादपदद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम्।
विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नस्तस्य शंभोः प्रिया सती॥ २२
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम्।
ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नस्तस्य शंभोः प्रिया सती॥ २३
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम्
इन्द्रादयो लोकपालाः प्रापुः स्वं स्वं परं पदम्॥ २४
जगत्पिता शिवः शक्तिर्जंगन्माता च सा सती।
सत्कृतौ न त्वया मूढ कथं श्रेयो भविष्यति॥ २५
दौर्भाग्यं त्वयि संक्रान्तं संक्रन्तास्त्वयि चापदः ।
यौ चानाराधितौ भक्त्या भवानीशंकरौ च तौ॥ २६
अनभ्यर्च्य शिवं शंभुं कल्याणं ग्राप्नुयामिति।
किमस्ति गर्वो दुर्वारः स गर्वोऽद्य विनश्यति॥ २७
सर्वेशविमुखो भूत्वा देवेष्वेतेषु कस्तव।
'करिष्यति सहायं तं न ते पश्यामि सर्वथा॥ २८
यदि देवाः करिष्यन्ति साहाय्यमधुना तव।
तदा नाशं समाप्स्यन्ति शलभा इव वह्विना॥ २९
ज्वलत्वद्य मुखं ते बै यज्ञध्वंसो भवत्विति।
सहायास्तव यावन्तस्ते ज्वलन्त्वद्य सत्वरम्॥ ३०
अमराणां च सर्वेषां शपथोऽमङ्गलाय ते।
करिष्यंत्यद्य साहाय्यं यदेतस्य दुरात्मनः॥ ३१
शिवजी ही जगतका धारण-पोषण करनेवाले, समझ
विद्याओंके पति, सब कुछ करनेमें समर्थ, आदि विया
श्रेष्ठ स्वामी और समस्त मंगलोंके मंगल हैं । हे खल!
तुमने उनकी शक्तिका आज सत्कार नहीं किया, इसलिये
अवश्य ही इस यज्ञका विनाश हो जायगा॥ १८. १९॥
पूजनीय व्यक्तियोंकी पूजा न करनेसे अमंगल
होता है । क्या परम पूजनीया वे शिवा तुम्हारी पूजाके
योग्य नहीं थीं? शेषनाग अपने हजार मस्तकोंसे
प्रतिदिन जिनकी चरणरजको प्रेमपूर्वक धारण करते
हैं, उन्हीं शिवकी शक्ति ये शिवा सती हैं ॥ २०-२ १॥
जिनके चरणकमलोंका आदरपूर्वक ध्यान और
पूजनकर विष्णु विष्णुत्वको प्राप्त हो गये, उन्हीं
शिवकी पत्नी सती हैं॥ २२॥
जिनके चरणकमलोंका ध्यान एवं पूजनकर
ब्रह्माजी ब्रह्मत्वको प्राप्त हो गये और जिनके चरण-
कमलोंका आदरपूर्वक निरन्तर ध्यान एवं पूजन करके
इन्द्र आदि लोकपालोंने अपने-अपने उत्तम पदको प्राप्त
किया है, उन्हीं शिवकी पत्नी सती हैं ॥ २३-२४॥
भगवान् शिव [सम्पूर्ण] जगतूके पिता हैं और
शक्तिरूपा देवी सती जगन्माता कही गयी हैं । हे मूढ़!
तुमने उनका सत्कार नहीं किया, तुम्हारा कल्याण कैसे
होगा ? तुम्हारे ऊपर दुर्भाग्यका आक्रमण हो गया है और
विपत्तियाँ टूट पड़ी हैं; क्योंकि तुमने भक्तिपूर्वक उन
भवानी और शंकरकी आराधना नहीं की ॥ २५-२६॥
कल्याणकारी शिवजीका पूजन-अर्चन न करके
मैं कल्याण प्राप्त कर लूँगा; यह कैसा गर्व है? वह
तुम्हारा दुर्वार गर्व आज विनष्ट हो जायगा॥ २७॥
इन देवताओंमें कौन ऐसा है, जो सर्वेश्वर शिवसे
विमुख होकर तुम्हारी सहायता करेगा, मुझे तो ऐसा
कोई दिखायी नहीं दे रहा है। यदि देवता इस समय
तुम्हारी सहायता करेंगे तो जलती हुई आगसे खेलगेवाले
पतिंगोंके समान वे नाशको ही प्राप्त होंगे ॥ २८-९९॥
आज तुम्हारा मुख जल जाय, तुम्हारे यज्ञका नाश
हो जाय और जितने तुम्हारे सहायक हैं, वे भी आज
शीघ्र ही भस्म हो जायेँ। जो आज इस दुरात्मा द
सहायता करेंगे; उन समस्त देवताओंके लिये शपथ हैं
उनका कर्म तुझ दक्षके अमंगलके लिये हो॥ ३०-३१
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आ० ३२]
निर्गच्छन्त्वमराः स्वोकमेतदध्वरमंडपात्।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥ ३२
निर्गच्छन्त्वपरे सर्वे मुनिनागादयो मखात्।
अन्यथा भवतां नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा॥ ३३
निर्गच्छ त्वं हरे शीघ्रमेतदध्वरमंडपात्।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा॥ ३४
निर्गच्छ त्वं विधे शीघ्रमेतदध्वरमंडपात्।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वधा॥ ३५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वाध्वरशालायामखिलायां सुसंस्थितान्।
व्यरमत्सा नभोवाणी सर्वकल्याणकारिणी॥ ३६
तच्छुत्वा व्योमवचनं सर्वे हर्यादयः सुरा: ।
अकार्षुर्विस्मयं तात मुनयश्च तथा परे॥ ३७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५१
समस्त देवता आज इस यज्ञमण्डपसे निकलकर
अपने-अपने स्थानको चले जायूँ, अन्यथा आपलोगोंका
सब प्रकारसे नाश हो जायगा। अन्य सब मुनि और
नाग आदि भी इस यज्ञसे निकल जायँ, अन्यथा आज
आपलोगोंका सर्वथा नाश हो जायगा॥ ३२-३३॥
हे विष्णु! आप इस यज्ञमण्डपसे शीघ्र निकल
जाये, अन्यथा आज आपका सर्वथा नाश हो जायगा।
हे विधाता! आप भी इस यज्ञमण्डपसे शीघ्र निकल
जाइये, अन्यथा आज आपका सर्वथा नाश हो
जायगा॥ ३४-३५॥
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद!] सम्पूर्ण यज्ञशालामें
बैठे हुए लोगों से ऐसा कहकर सबका कल्याण
करनेवाली आकाशवाणी मौन हो गयी। हे तात! इस
प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर विष्णु आदि सभी
देवता तथा अन्य मुनि आदि सभी लोग आश्चर्यचकित
हो गये॥ ३६-३७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने नभोवाणीवर्णतं नामैकत्रिंशोऽध्याय: ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सती-उपाख्यानमें
आकाशवाणीका वर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३१॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
सतीके दग्ध होनेका समाचार सुनकर कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और
महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ-विध्वंस करनेकी आज्ञा देना
नारद उवाच
श्रुत्वा व्योमगिरं दक्षः किमका्षीत्तदाबुधः।
अन्ये च कृतवन्तः किं ततश्च किमभूद् बद॥ १
पराजिताः शिवगणा भृगुमंत्रबलेन वै।
किमकार्षु: कुत्र गतास्तत्त्वं वद महामते॥ २
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा व्योमगिरं सर्वे विस्मिताश्च सुरादयः।
नावोचत्किंचिदपि ते तिष्ठन्तस्तु विमोहिताः॥ २
पलायमाना ये वीरा भूगुमंत्रबलेन ते।
अवशिष्टा: शिवगणाः शिवं शरणमाययुः ४
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नारदजी बोले-[हे ब्रह्मन्!] आकाशवाणीको
सुनकर अज्ञानी दक्षने क्या किया तथा अन्य उपस्थित
लोगोंने क्या किया और उसके बाद क्या हुआ? इसे
बताइये॥ १॥
हे महामते! भृगुजीके मन्त्रबलसे पराजित
होकर शिवजीके गणोंने क्या किया तथा वे कहाँ
गये-यह सब आप मुझसे कहिये॥ २॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] आकाशवाणी
सुनकर समस्त देवता आदि आश्चर्यचकित हो गये,
वे मोहित होकर [जहाँ-तहाँ] खडे हो गये और कुछ
भी न बोल सके। भृगुजीके मन्त्रबलसे जो वीर
"शिवगण बच गये थे, वे भागते हुए शिवकी शरणमें
गये॥ ३-४॥
ड५२
श्रीशिवमहापुराण
[अ TR ३
सर्व॑ निवेदयामासू रुद्रायामिततेजसे।
चरित्रं च तथाभूतं सुप्रणम्यादराच्य ते॥
गणा ऊचुः
देवदेव महादेव पाहि नः शरणागतान्।
संश्रृण्वादरतो नाथ सतीवार्ता च विस्तरात्॥ ६
गर्वितेन महेशान दक्षेण सुदुरात्मना।
अपमानः कृतः सत्यानादरो निर्जरैस्तथा॥
तुभ्यं भागमदाऱ्नो स देवेभ्यश्च प्रदत्तवान्।
दुर्वचांस्यवदत््रच्चे्दुष्टो दक्षः सुगर्वितः॥ ८
७
ततो दृष्ट्वा न ते भागं यज्ञेऽकुप्यत्सती प्रभो।
विनिंद्य बहुशस्तातमधाक्षीत्स्वतनुं तदा॥ ९
गणास्त्वयुतसंख्याका मृतास्तत्र विलज्जया।
स्वाङ्गान्याच्छिद्य शस्त्रेश्च क्रुध्याम ह्यपरे वयम्॥ १०
तद्यज्ञं ध्वंसितुं वेगात्सन्नद्धास्तु भयावहाः।
तिरस्कृता हि भृगुणा स्वप्रभावाद्विरोधिना॥ १९
ते वयं शरणं प्राप्तास्तव विश्वंभर प्रभो।
निर्भयान् कुरु नस्तस्माद् दयमान भवाद्भयात्॥ १२
अपमानं विशेषेण तस्मिन् यज्ञे महाप्रभो ।
दक्षाद्यास्तेऽखिला दुष्टा अकुर्वन् गर्विता अति॥ १३
इत्युक्तं निखिलं वृत्तं स्वेषां सत्याश्च शङ्कर।
तेषां च मूढबुद्धीनां यथेच्छसि तथा कुरु॥ १४
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य स्वगणानां वच: प्रभुः ।
सस्मार नारदं सर्व जञातुं तच्चरितं लघु॥ १५
आगतस्त्वं द्रुतं तत्र देवर्षे दिव्यदर्शनः।
'प्रणम्य शंकरं भक्त्या साञ्जलिस्तत्र तस्थिवान् ॥ १६
वे महातेजस्वी शिवजीको आदरपूर्वक प्रणाम
करके जो चरित्र हुआ था, वह सब बताने लगे॥५ ;
गण बोले-हे देवदेव! हे महादेव! शरणे
आये हुए हमलोगोंकी रक्षा कीजिये और हे नाथ।
आदरपूर्वक सतीजीका चरित्र विस्तारसे सुनिये। ६॥
हे महेश्वर! अभिमानसे युक्त दुरात्मा दक्षन तथा
देवताओंने सतीका अपमान तथा अनादर किया | ७ ॥
महाभिमानी दुष्ट दक्षने [अपने यज्ञमें] आपको
भाग नहीं दिया। देवताओंको भाग दिया, कितु
[आपके विषयमें] उच्च स्वरसे दुर्वचन भी कहा ॥ ८।
हे प्रभो! उसके बाद यज्ञमें आपका भाग न
देखकर सतीजी कुपित हो गयीं और उन्होंने अपने
पिताकी बार-बार निन्दा करके [योगमार्गका
अवलम्बनकर] अपने शरीरको भस्म कर लिया।
[यह देखकर] दस हजार गण लज्जावश शतस्त्रोसे
अपने अंगोंको काटकर वहीं मर गये, [बचे हुए
हमलोग दक्षपर कुपित हो उठे॥ ९-१०॥
हमलोग भयानक रूप धारणकर वेगपूर्वक यज्ञका
विध्वंस करनेको उद्यत हो गये, परंतु विरोधी भृगुने अपने
मन्त्रबलके प्रभावसे हमारा तिरस्कार कर दिया॥ ११॥
हे विश्वम्भर! हे प्रभो! अब हमलोग आपकी
शरणमें आये हुए हैं, आप [हमारे ऊपर] दया करते
हुए इस उत्पन्न भयसे हमलोगोंको निर्भय कीजिये ॥ १२।
हे महाप्रभो! दक्ष आदि सभी दुष्टोंने अत्यन्त
गर्वित होकर उस यज्ञमें आपका बहुत अपमान किया
है॥ १३॥
हे शंकर! इस प्रकार हमने अपना, सतीका और
उन मूर्खोका सारा वृत्तान्त आपसे कह दिया, अब
आप जैसा चाहते हों, वैसा कीजिये ॥ १४॥
. ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] अपने गणोंका
यह वचन सुनकर प्रभु शिवने उनका सम्पूर्ण चरित
जाननेके लिये शीघ्रतापूर्वक आप नारदका स्मरण
किया॥ १५॥
हे देवें! [ भगवानूके स्मरण करनेपर] दि
दर्शनवाले आप वहाँ शीघ्रतासे पहुँच गये और
भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर शिवजीको प्रणामकर वही
खड़े हो गये॥ १६॥
x
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अ० ३२ ]
रुद्रसंहिता (सतीखण्ड )
४५३
त्वां प्रशस्याथ स स्वामी सत्या वार्ता च पृष्टवान्।
दक्षयज्ञगताया बै परं च चरितं तथा॥ १७
पृष्टेन शंभुना तात त्वयाश्वेव शिवात्मना।
तत्सर्वं कथितं वृत्तं जातं दक्षाध्वरे हि यत्॥ १८
तदाकर्ण्येश्वरो वाक्यं मुने तत् त्वन्मुखोदितम्।
चुकोपातिद्रुतं रुद्रो महारोद्रपराक्रमः॥ १९
उत्पाट्यैकां जटां रूद्रो लोकसंहारकारकः।
आस्फालयामास रुषा पर्वतस्य तदोपरि॥ २०
तोदनाच्च द्विधा भूता सा जटा च मुने प्रभोः।
संबभूव महारावो महाप्रलयभीषणः॥ २१
तज्ञटायाः समुद्भूतो वीरभद्रो महाबलः।
पूर्वभागेन देवर्षे महाभीमो गणाग्रणीः॥ २२
स भूमिं विश्वतो वृत्य चात्यतिष्ठद्दशाङ्लम्।
प्रलयानलसंकाशः प्रोन्नतो दोःसहस्त्रवान्॥ २३
कोपनिःश्वासतस्तत्र महारुद्रस्य चेशितुः।
जातं ज्वराणां शतकं संनिपातास्त्रयोदश॥ २४
महाकाली समुत्पन्ना तज्जटापरभागत: ।
महाभयंकरा तात भूतकोटिभिरावृता॥ २५
सर्वे मूर्तिधराः क्रूराः ज्वरा लोकभयंकराः।
स्वतेजसा प्रज्चलंतो दहत इव सर्वतः॥ २६
अथ वीरो वीरभद्रः प्रणम्य परमेश्वरम्।
कृताञ्जलिपुटः प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २७
वीरभद्र उवाच
महारुद्र महारौद्र सोमसूर्याग्निलोचन।
किं कर्तव्यं मया कार्य शीघ्रमाज्ञापय प्रभो॥
शोषणीयाः किमीशान क्षणार्धेनैव सिंधवः।
पेषणीयाः किमीशान क्षणार्धेनैव पर्वताः॥ २९
क्षणेन भस्मसात्कुर्यां ब्रह्मांडमुत किं हर।
क्षणेन भस्मसात्कुर्यां सुरान्वा किं मुनीश्वरान्॥ ३०
व्याश्वास: सर्वलोकानां किमु कार्यों हि शंकर।
कर्तव्य किमुतेशान सर्वप्राणिविहिंसनम्॥ ३१
उसके बाद स्वामी शंकरजीने आपकी प्रशंसा करके
दक्षयज्ञमें गयी हुई सतीका समाचार एवं अन्य दूसरी
घटनाओंके सम्बन्धमें पूछा । हे नारद! शिवजीके पूछनेपर
शिवस्वरूप आपने शीघ्र ही जो कुछ भी दक्षयज्ञमें घटित
हुआ था, वह सब समाचार कह दिया॥ १७-१८ ॥
है मुने! आपके मुखसे कही हुई बातको सुनकर
महारौद्रपराक्रमी भगवान् शंकर शीघ्र ही अत्यन्त
क्रोधित हो उठे । लोकका संहार करनेवाले रुद्रने उसी
समय एक जटा उखाड़कर क्रोधसे उसे पर्वतके ऊपर
पटक दिया॥ १९-२०॥
हे मुने! भगवान् शंकरद्वारा जटा पटके जानेके
फलस्वरूप वह जटा दो टुकडोंमें विभक्त हो गयी और
उससे महान् प्रलयंकारी भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ ॥ २१॥
हे देवर्षे! उस जटाके पूर्वभागसे महाभयंकर,
महाबली सभी गणोंमें अग्रणी वीरभद्र उत्पन्न हुए ॥ २२॥
वे चारों ओरसे पृथिवीको घेरकर दस अंगुलपर्यन्त
पृथिबीसे ऊपर स्थित हो गये। वे प्रलयाग्निके समान
थे और एक हजार भुजाओंसे युक्त थे॥ २३॥
उन महारुद्र महेश्वरके क्रोधयुक्त निःश्वाससे सौ
प्रकारके ज्वर तथा तेरह सन्निपात उत्पन्न हुए॥ २४॥
हे तात! उस जटाके दूसरे भागसे महाकाली
उत्पन्न हुई, जो बड़ी भयंकर थीं और करोड़ों भूतोंसे
घिरी हुई थीं॥ २५॥
मूर्तिधारी वे सभी ज्वर क्रूर तथा संसारको
भयभीत करनेवाले थे और अपने तेजसे ऐसे प्रज्वलित
हो रहे थे, मानो सबको जला देंगे॥ २६॥
तदनन्तर वाक्यविशारद महावीर वीरभद्र हाथ
जोड़कर शिवजीको प्रणाम करके कहने लगे ॥ २७॥
वीरभद्र बोले--हे महारुद्र! हे महारौद्र! सूर्य,
सोम तथा अग्निरूप नेत्रवाले हे प्रभो! मैं कौन-सा
कार्य करूँ? शीघ्र ही आज्ञा प्रदान कीजिये॥ २८॥
हे ईशान! क्या मैं आधे ही क्षणमें समुद्रोंको सुखा
दूँ अथवा हे ईशान ! क्या आधे ही क्षणमें पर्वतोंको चूर-
चूर कर दूँ अथवा हे हर! कया मै क्षणभरमे सारे ब्रह्माण्डको
भस्म कर दूँ अथवा क्या मैं क्षणभरमें देवताओं एवं
मुनीश्वरोंको भस्म कर दूँ अथवा हे शंकर क्या मैं सभी
लोगोंका श्वास रोक दूँ अथवा हे ईशान ! कया मैं सम्पूर्ण
प्राणियोंका विनाश कर डालूँ?॥ २९-३१॥
४५४
श्रीशिवमहापुराण
[अ ल या मलवा २
ममाशक्यं न कुत्रापि त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
पराक्रमेण मत्तुल्यो न भूतो न भविष्यति॥
यत्र यत्कार्यमुद्दिश्य प्रेषयिष्यसि मां प्रभो।
तत्कार्यं साधयाम्येव सत्वरं त्वत्प्रसादतः ॥ ३३
्षद्रास्तरंति लोकाब्धिं शासनाच्छंकरस्य ते।
हरातोऽहं न किं तर्तु महापत्सागरं क्षमः ॥ ३४
त्वत्प्रेषिततृणेनापि महत्कार्यमयत्नतः।
क्षणेन शक्यते कर्तु शंकरात्र न संशयः॥ ३५
लीलामात्रेण ते शंभो कार्य यद्यपि सिध्यति।
तथाप्यहं प्रेषणीयो तवैवानुग्रहो ह्ययम्॥ ३६
शक्तिरेतादृशी शंभो ममापि त्वदनुग्रहात्।
विना शक्तिर्न कस्यापि शंकर त्वदनुग्रहात्॥ ३७
त्वदाज्ञया विना कोऽपि तृणादीनपि वस्तुतः ।
नैव चालयितुं शक्तः सत्यमेतन्न संशयः॥ ३८
शंभो नियम्याः सर्वेऽपि देवाद्यास्ते महेश्वर।
तथैवाहं नियम्यस्ते नियन्तुः सर्वदेहिनाम्॥ ३९
प्रणतोऽस्मि महादेव भूयोऽपि प्रणतोऽस्म्यहम्।
प्रेषय स्वेष्टसिद्भयर्थ मामद्य हर सत्वरम्॥ ४०
स्पंदोऽपि जायते शंभोऽसव्याङ्गानां मुहुर्मुहुः ।
भविष्यत्यद्य विजयो मामतः प्रेषय प्रभो॥ ४९
हर्षोत्साहविशेषोऽपि जायते मम कश्चन।
शंभो त्वत्पादकमले संसक्तश्च मनो मम॥ ४२
भविष्यति प्रतिपदं शुभसंतानसंततिः॥ ४३
तस्यैव विजयो नित्यं तस्यैव शुभमन्वहम्।
यस्य शंभो दूढा भक्तिस्त्वयि शोभनसं श्रये॥ ४४
हे महेश्वर! आपकी कृपासे कोई भी कार्य
नहीं है, जो मैं न कर सकूँ, पराक्रममें मेरे
तो कोई हुआ है और न तो होगा॥ ३२॥
हे प्रभो! आप मुझे जिस कार्यके लिये जहाँ भी
भेजेंगे, मैं आपकी कृपासे उस कार्यको शीघ्र ही सिद्ध
करूँगा॥ ३३ ॥
हे हर! आप शिवकी आज्ञासे क्षुद्रजन भी इस संसार
सागरको पार कर जाते है, तो क्या मैं इस महान् विपत्तिर्पी
समुद्रको पार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता ?॥ ३४॥
हे शंकर! आपके द्वारा भेजे गये तृणसे भी
क्षणमात्रमें ही बिना प्रयत्लके बहुत बड़ा कार्य किया
जा सकता है, इसमें संशय नहीं है॥ ३५॥
हे शम्भो! यद्यपि सारा कार्य आपके लीलामात्रसे
ही सिद्ध हो सकता है, फिर भी यदि आप मुझे भेज
दें, तो यह आपकी [बहुत बड़ी] कृपा होगी॥ ३६॥
हे शम्भो! हे शंकर! आपकी कृपासे मुझमें ऐसी
शक्ति है, जैसी कि आपकी कृपाके बिना अन्य
किसीमें भी नहीं हो सकती ॥ ३७॥
आपकी कृपाके बिना कोई एक तृण भी
हिलानेमें समर्थ नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह
नहीं है॥ ३८॥
हे शम्भो! हे महेश्वर! सभी देवता आपके
नियन्त्रणमें हैं, उसी प्रकार मैं भी समस्त प्राणियोंके
नियामक आपके नियन्त्रणमें ही हूँ॥ ३९॥
हे महादेव! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, मेँ
बारम्बार प्रणाम करता हूँ। हे हर! आज मुझे अपनी
इष्टसिद्धिके लिये आप शीघ्र ही भेजिये॥ ४०॥
हे शम्भो! मेरे दाहिने अंगोंमें बार-बार स्पन्दन
हो रहा है। हे प्रभो! आज मेरी विजय होगी। अतः
आप मुझे भेजिये॥ ४१ ॥
हे शम्भो! इस समय मुझे विशेष हर्ष तथा
उत्साह हो रहा है और मेरा मन आपके चरणकमलमें
लगा हुआ है। अत: पग-पगपर [मेरे लिये] शुभ
परिणामका विस्तार होगा॥ ४२:४३॥ क्त
हे शम्भो! उत्तम आश्रय-स्वरूप आप शिवम
जिसको सुदृढ़ भक्ति है, उसीकी सदा विजय होती है
और उसीका प्रतिदिन कल्याण होता है ॥ ४४॥
ऐस
अ० ३२]
ब्रह्मोवाच
त्युक्तं तद्वचः श्रुत्वा संतुष्टो मङ्गलापतिः।
वीरभद्र जयेति त्वं प्रोक्ताशीः प्राह तं पुनः ॥ ४५
महेश्वर उवाच
श्रृणु मद्ठचनं तात वीरभद्र सुचेतसा।
करणीयं प्रयत्नेन तद् द्रुतं मे प्रतोषकम्॥ ४६
यागं कर्तृ समुद्युक्तो दक्षो विधिसुतः खलः।
मद्विरोधी विशेषेण महागर्वोऽबुधोऽधुना॥ ४७
तन्मखं भस्मसात्कृत्वा सयागपरिवारकम्।
पुनरायाहि मत्स्थानं सत्वरं गणसत्तम॥ ४८
सुरा भवन्तु गंधर्वा यक्षा वान्ये च केचन।
तानप्यद्यैव सहसा भस्मसात्कुरु सत्वरम्॥ ४९
तत्रास्तु विष्णुर्ब्रह्मा वा शचीशो वा यमोऽपि वा।
अपि चाद्यैव तान्सर्वान्यातयस्व प्रयत्नतः ॥ ५०
सुरा भवन्तु गंधर्वा यक्षा वान्ये च केचन।
तानप्यद्यैव सहसा भस्मसात्कुरु सत्वरम्॥ ५१
दधीचिकृतमुल्लंघ्य शपथं मयि तत्र ये।
तिष्ठन्ति ते प्रयत्लेन ज्चालनीयास्त्वया श्रुवम्॥ ५२
प्रमथाश्चागमिष्यन्ति यदि विष्ण्वादयो भ्रमात्।
नानाकर्षणमंत्रेण ज्चालयानीय सत्वरम्॥ ५३
ये तत्रोल्लंघ्य शपथं मदीयं गर्विताः स्थिताः ।
ते हि मद्द्रोहिणोऽतस्तान्ज्चालयानलमालया॥
सपलीकान्ससारांश्च दक्षयागस्थलस्थितात्।
प्रज्वाल्य भस्मसात्कृत्वा पुनरायाहि सत्वरम्॥ ५५
तत्र त्वयि गते देवा विश्वाद्या अपि सादरम्।
स्तोष्यन्ति त्वां तदाप्याशु ज्वालया ज्चालयैव तान्॥ ५६
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५५
ब्रह्माजी बोले--[ हे नारद!] उनके द्वारा कहे
गये इस वचनको सुनकर मंगलापति [सदाशिव]
अत्यन्त प्रसन्न हो गये और हे वीरभद्र | तुम्हारी जय
हो, यह आशीर्वाद देकर उनसे पुनः कहने लगे--
॥४५॥
महेश्वर बोले--हे तात! हे वीरभद्र! शान्त
मनसे मेरी बात सुनो और शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक उस
कार्यको करो, जिससे मुझे प्रसन्नता हो ॥ ४६॥
इस समय ब्रह्माका पुत्र दक्ष यज्ञ करनेके लिये
तत्पर है। वह महाभिमानी, दुष्ट तथा अज्ञानी विशेष
रूपसे मेरा विरोध कर रहा है॥ ४७॥
हे गणश्रेष्ठ! तुम यज्ञको तथा यज्ञमें सम्मिलित
सभीको भस्म करके शीघ्र ही मेरे स्थानको पुनः लौट
आओ॥ ४८॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई भी
जो वहाँ हों, उन्हें आज ही शीघ्र सहसा भस्म कर
डालना ॥ ४९॥
वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम कोई भी हो, तुम
उन सबको प्रयत्नपूर्वक आज ही गिरा दो॥५०॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई भी जो
वहाँ हों, उन्हें आज ही शीघ्र सहसा भस्म कर
डालना ॥ ५१॥
'दधीचिकी दिलायी हुई मेरी शपथका उल्लंघन
करके जो भी वहाँ ठहरे हुए हैं, उन्हें निश्चय ही तुम
प्रयत्नपूर्वक जला देना॥ ५२॥
यदि भ्रमवश प्रमथगण और विष्णु आदि वहाँ
आ जायं तो शीघ्र ही अनेक आकर्षण मन्त्रोंसे
खींचकर उन्हें भस्म कर देना॥५३॥
जो मेरी शपथका उल्लंघन करके गर्वित हो
वहाँ ठहरे हुए हैं, वे मेरे द्रोही हैं, अतः उन्हें अग्निकी
लपटोंसे भस्म कर देना॥ ५४॥
दक्षके यज्ञस्थलमें स्थित लोगोंको उनकी पत्नियों
तथा सामग्रीसहित जलाकर भस्म करके शीकघ्रतासे
पुनः चले आओ॥ ५५॥
तुम्हारे वहाँ जानेपर विश्वेदेव आदि देवगण भी
यदि [सामने आकर] सादर स्तुति करें, तो भी तुम
उन्हें शीघ्र ही आगकी ज्वालासे जला डालना॥ ५६॥
४५६
श्रीशिवमहापुराण
[अ न्क्््क्क्त्क्त् शा रा ३
देवानपि कृतद्रोहान् ज्चालामालासमाकुलैः।
ज्वालय ज्वलने: शीघ्रं माध्यायाध्यायपालकम्॥ ५७
दक्षादीन्सकलांस्तत्र सपत्नीकान्सबांधवान्।
प्रज्वाल्य वीर दक्षं नु सलीलं सलिलं पिब॥ ५८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वेदमर्यादपालकः।
विरराम महावीरं कालारिः सकलेश्वरः ॥ ५९
इस प्रकार जो भी मुझसे द्रोह
देवतागण वहाँ उपस्थित हों, उन्हें शीघ्र ही
ज्वालामें जलाकर मेरे समीप लौट आना | मन््रपालक
समझकर उनकी उपेक्षा कदापि न करना॥ LC
हे वीर! पत्नियों तथा बन्धुओंसहित वहाँ उपस्थित
दक्ष आदि सभीको लीलापूर्वक भस्म करनेके बाद
तुम जल ग्रहण करना अर्थात् कार्य पूर्ण होनेके
अनन्तर ही पूर्ण विश्राम करना॥ ५८॥
ब्रह्माजी बोले--वेदमर्यादाका पालन करनेवाले
कालके भी शत्रु तथा सर्वेश्वर शिवजीने रोषसे आंखे
'लाल-लालकर महावीर [वीरभद्र ]-से इस प्रकार
कहकर मौन धारण कर लिया॥ ५९॥
इति श्रीशिवमहाएुराणे द्वितीयायां रदरसंहिवाया द्वितीये सतीखण्डे वीरभद्रोत्पत्तिशिवोपदेशवर्णन॑ नाम द्वात्रिंशोऽध्याय; ॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें वीरभद्रकी उत्पत्ति
और उन्हें शिवका उपदेशवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥
अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
गणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तं श्रीमहेशस्य श्रुत्वा वचनमाद्रात्।
वीरभद्रोऽतिसंतुष्टः प्रणनाम महेश्वरम्॥ १
शासनं शिरसा धृत्वा देवदेवस्य शूलिनः।
प्रचचाल ततः शीघ्रं वीरभद्रो मखं प्रति॥ २
शिवोऽथ प्रेषयामास शोभार्थ कोटिशो गणान्।
तेन सार्ध ॥ ३
अथ ते वीरभद्रस्य पुरतः प्रबला गणाः।
पश्चादपि ययुर्वीराः कुतूहलकरा गणाः॥ ४
वीरभद्रसमेता ये गणाः शतसहस्त्रश: ।
पार्षदाः कालकालस्य सर्वे रुद्र्स्वरूपिणः॥ ५
गणैः समेतः किल तेर्महात्मा
स वीरभद्रो हरवेषभूषणः।
सहस्त्रबाहुर्भुजगाधिपाढ्यो
ययौ रथस्थः प्रबलोऽतिभीकरः॥ ६
जल्वानां च सहस्त्रे द्वे प्रमाणं स्यन्दनस्य हि।
अयुतेनेव सिंहानां वाहनानां प्रयत्नतः॥ ७
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] महेश्वरके कहे
गये इस वचनको आदरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत
सन्तुष्ट हुए। उन्होंने महेश्वरकों प्रणाम किया॥ १॥
तत्पश्चात् त्रिशूलधारी उन देवाधिदेवकी आज्ञाको
शिरोधार्य करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके
यज्ञकी ओर चल पड़े। भगवान् शिवने प्रलयाग्निके
समान करोड़ों महावीर गणोंको [केवल] शोभाकें
लिये उनके साथ भेज दिया॥ २-३॥
वे बलशाली तथा वीर गण वीरभद्रके आगे
और पीछे भी चल रहे थे। कौतूहल करते हुए
वीरभद्रसहित जो लाखों गण थे, वे कालके भी काल
शिवके पार्षद थे, वे सब रुद्रके ही समान थे॥ ४५॥
महात्मा वीरभद्र शिवके समान ही वेशभूषा धारण
करके रथपर बैठकर उन गणोंके साथ चल पड़े | उनकी
एक हजार भुजाएँ थीं, उनके शरीरमें नागराज लिप्टे
हुए थे। वे प्रबल और भयंकर दिखायी पड़ रहे थे॥ ६॥
उनका रथ आठ लाख हाथ विस्तारवाला था!
उसमें दस हजार सिंह जुते हुए थे, जो
| खींच रहे थे॥ ७॥
अ० ३३]
तथैव प्रबलाः सिंहा बहवः पार्श्वरक्षकाः।
शार्दूला मकरा मत्स्या गजास्तत्र सहस्त्रश:॥ ८
वीरभद्रे प्रचलिते दक्षनाशाय सत्वरम्।
कल्पवृक्षसमुत्सृष्टा पुष्पवृष्टिरभूत्तदा॥ ९
तुष्टुवुश्च गणा वीरं शिपिविष्ट प्रचेष्टितम्।
चक्रुः कुतूहलं सर्वे तस्मिश्च गमनोत्सवे॥ १०
काली कात्यायनीशानी चामुंडा मुंडमर्दिनी।
भद्रकाली तथा भद्रा त्वरिता वैष्णवी तथा॥ ११
समन्विता।
ययौ दक्षविनाशाय सर्वभूतगणेः सह॥ १२
डाकिनी शाकिनी चैव भूतप्रमथगुह्यकाः।
कूष्मांडाः पर्पटाश्चेव चटका ब्रह्माराक्षसाः॥ १३
भैरवाः क्षेत्रपालाश्च दक्षयज्ञविनाशकाः।
निर्ययुस्त्वरितं वीराः शिवाज्ञाप्रतिपालकाः॥ १४
तथैव योगिनीचक्रं चतुःषष्टिगणान्वितम्।
निर्ययौ सहसा क्रुद्धं दक्षयज्ञं विनाशितुम्॥ १५
तेषां गणानां सर्वेषां संख्यानं श्रृणु नारद
महाबलवतां संघो मुख्यानां धैर्यशालिनाम्॥ १६
अभ्ययाच्छङ्कुकर्णश्च दशकोट्या गणेश्वरः
दशभिः केकराक्षश्च विकृतोऽष्टाभिरेव च॥ १७
चतुःषष्ट्या विशाखश्च नवभिः पारियात्रिकः।
षड्भिः सर्वाङ्कको वीरस्तथैव विकृताननः॥
ज्वालकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः।
सप्तभिः समदज्जीमान् दुद्रभोऽष्टाभिरेव च॥ १९
पञ्चभिश्च कपालीशः षङ्भिः संदारको गणः।
कोटिकोटिभिरेवेह कोटिकुण्डस्तथैव च॥ २०
विष्टम्भोऽषटाष्टभिर्वी रैः कोटिभिर्गणसत्तमः।
सहस्त्रकोटिभिस्तात सन्नादः पिप्पलस्तथा॥ २१
आवेशनस्तथाष्टाभिरष्टाभिश्चंद्रतापनः ।
महावेशः सहस्त्रेण कोटिना गणपो वृतः॥ २२
कुण्डी द्वादशकोटीभिस्तथा पर्वतको मुने।
विनाशितुं दक्षयज्ञं निर्ययौ गणसत्तमः॥ २३
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५७
उसी प्रकार बहुत-से प्रबल सिंह, शार्दूल, मगर,
मत्स्य और हजारों हाथी उनके पार्श्वरक्षक थे॥ ८॥
इस प्रकार जब दक्षके विनाशके लिये वीरभद्रने
प्रस्थान किया, उस समय कल्पवृक्षोंसे फूलोंकी वर्षा
होने लगी। सभी गणोंने शिवजीके कार्यके लिये चेष्टा
करनेवाले वीरभद्रकी स्तुति की और उस यात्राके
उत्सवमें कुतूहल करने लगे॥ ९-१०॥
उसी समय काली, कात्यायनी, ईशानी,
चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता
तथा वैष्णवी-इन नौ दुर्गाओं तथा समस्त भूतगणोंके
साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये चल
पड़ीं॥ ११-१२॥
शिवकी आज्ञाके पालक, डाकिनी, शाकिनी,
भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, पर्पट, चटक, ब्रह्मराक्षस,
भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि वीर दक्षके यज्ञका विनाश
करनेके लिये तुरंत चल दिये॥ १३-१४॥
उसी प्रकार चौसठ गणोंके साथ योगिनियोंका
मण्डल भी सहसा कुपित होकर दक्षयज्ञका विनाश
करनेके लिये निकल पड़ा॥ १५॥
हे नारद! उन सभी गणोंके धेर्यशाली तथा
महाबली मुख्य गणोंका जो समूह था, उसकी
संख्याको सुनिये॥ १६॥
शंकुकर्ण [नामक] गणेश्वर दस करोड़ गणोंके
साथ, केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ तथा विकृत
आठ करोड़ गणोंके साथ चल पड़े॥ १७॥
हे तात! हे मुने! विशाख चौंसठ करोड़,
पारियात्रिक नौ करोड़, सर्वांकक छः करोड़, वीर
विकृतानन भी छः करोड़, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालकेश
बारह करोड़, समदज्जीमान् सात करोड़, दुद्रभ आठ
करोड़, कपालीश पाँच करोड़, सन्दारक छ: करोड़,
कोटि और कुण्ड एक-एक करोड़, गणोंमें उत्तम
विष्टम्भ चौसठ करोड़ वीरोंके साथ, सन्नाद, पिप्पल
एक हजार करोड़, आवेशन तथा चन्द्रतापन आठ:
आठ करोड़, गणाधीश महावेश हजार करोड़ गणोंके
साथ, कुंडी बारह करोड़ और गणश्रेष्ठ पर्वतक भी
बारह करोड़ गणोंके साथ दक्षयज्ञका विध्वंस करनेके
लिये चल पड़े॥ १८-२३॥
४५८
म मकान न क भातडकातक र महाकाल प | कालकश्चैव महाकालस्तथैव च।
कोटीनां शतकेनैव दक्षयज्ञं ययौ प्रति॥
अग्निकृच्छतकोट्या च कोट्याग्निमुख एव च।
आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव घनावहः॥ २५
सन्नाहः शतकोट्या च कोट्या च कुमुदो गणः।
अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या गणाधिपः ॥ २६
काष्ठागूढश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा।
सुमन्त्रको गणाधीशस्तथा तात सुनिर्ययौ॥ २७
काकपादोद्रः षष्टिकोटिभिर्गणसत्तमः।
तथा सन्तानकः षष्टिकोटिभिर्गणपुङ्गवः ॥ २८
महाबलश्च नवभिः कोटिभिः पुङ्गवस्तथा॥ २९
मधुपिङ्गस्तथा तात गणाधीशो हि निर्ययौ।
जीलो नवत्या कोटीनां पूर्णभद्रस्तथैव च॥ ३०
निर्ययौ शतकोटीभिश्चतुर्वक्त्रो गणाधिपः ॥ ३१
विरूपाक्षश्च कोटीनां चतुःषष्ट्या गणेश्वरः।
तालकेतुः षडास्यश्च पञ्जास्यश्च गणाधिपः ॥ ३२
संवर्तकस्तथा चैव कुलीशश्च स्वयं प्रभुः।
लोकान्तकश्च दीसात्मा तथा दैत्यान्तको मुने॥ ३३
गणो भूङ्गीरिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा।
अशनिर्भालकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्त्रक:॥ ३४
कोटिकोटिसहस्त्राणां शतेर्विशतिभिर्वृतः।
वीरेशो ह्यभ्ययाद्वीरः वीरभद्रः शिवाज्ञया॥ ३५
भूतकोटिसहस्त्ैस्तु प्रययौ कोटिभिस्त्रिभिः ।
रोमजैः श्वगणैश्चैव तथा वीरो ययौ द्रुतम्॥ ३६
तदा भेरीमहानादः शंखाश्च विविधस्बनाः।
जटाहरो मुखाश्चैव शृङ्गाणि विविधानि च॥ ३७
ते तानि वितताऱ्येव बंधनानि सुखानि च।
वादित्राणि विनेदुश्च विविधानि महोत्सवे॥ ३८
वीरभद्रस्य यात्रायां सबलस्य महामुने।
शकुनान्यभवंस्तत्र भूरीणि सुखदानि च॥ ३९
श्रीशिवमहापुराण
[अ ३३
काल, कालक और महाकाल सौ-सौ
गणोंको साथ लेकर दक्षयज्ञकी ओर चल पडे| २४॥
हे तात! अग्निकृत् सौ करोड़,
करोड़, आदित्यमूर्धा तथा घनावह एक-एक
सन्नाह सौ करोड़, गण कुमुद एक करोड़, गणेश्वर
अमोघ तथा कोकिल एक-एक करोड़ और गणाधीश
काष्ठागूढ, सुकेशी, वृषभ तथा सुमन्त्रक चौंसठ-
चौंसठ करोड़ गणोंको साथ लेकर चले॥ २५-- रण
हे तात! गणोंमें श्रेष्ठ काकपादोदर साठ करोड,
गणश्रेष्ठ सन्तानक साठ करोड़, महाबल तथा पुंगव
नौ-नौ करोड़, गणाधीश मधुपिंग नौ करोड़ और नील
तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंको साथ लेकर चल
पडे । गणराज चतुर्वक्त्र सौ करोड़ गणोंको साथ लेकर
चला॥ २८-३१॥
हे मुने! गणेश्वर विरूपाक्ष, तालकेतु, षडास्य
तथा गणेश्वर पंचास्य चौंसठ करोड़, संवर्तक, स्वयं
प्रभु कुलीश, लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक एवं
शिवके परम प्रिय गण श्रीमान् भंगी, रिटि, अशनि,
भालक और सहस्रक चौंसठ करोड़ गणोंके साथ
चले॥ ३२-३४॥
महावीर तथा वीरेश्वर वीरभद्र भी शिवजीकी
आज्ञसे बीसों, सैकड़ों तथा हजारों करोड़ गणोंसे घिरे
हुए वहाँ पहुँचे॥ ३५॥
वीरभद्र हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़
रोमजनित श्वगणोंके साथ शीघ्र ही वहाँ पहुँच
गये॥ ३६॥
उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी।
शंख बजने लगे। जटाहर, मुखों तथा श्रृंगोंसे अनेक
प्रकारके शब्द होने लगे। उस महोत्सवमें
आकर्षित एवं सुखानुभूति उत्पन्न करनेवाले बाजोंके
शब्द चारों ओर व्याप्त हो गये॥ ३७-३८॥
हे महामुने! सेनासहित महाबली वीरभद्रकी उस
यात्रामें अनेक प्रकारके सुखदायक शकुन होने लगे॥ ३९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्रितीये सतीखण्डे वीरभदयात्रवर्णनं नाम त्रयस्त्रंशोऽध्यायः ॥ ३३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें वीरभद्रकी
यात्राका वर्णन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३३॥
७ ७-०-०..-----..
अ० ३४]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५९
रग अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
दक्ष तथा देवताओंका अनेक अपशकुनों एवं उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भयभीत होना
ब्रह्मोवाच
एवं प्रचलिते चास्मिन् वीरभद्रे गणान्तिते।
दुष्टचिह्णानि दक्षेण दृष्टानि विबुधैरपि॥ ९
उत्पाता विविधाश्वासन् वीरभद्रे गणान्विते।
त्रिविधा अपि देवर्षे यज्ञविध्वंससूचकाः॥ २
दक्षवामाक्षिबाहूरुविस्पंदः समजायत ।
जानाकष्टप्रदस्तात सर्वथाशुभसूचक :॥ ३
भूकंपः समभूत्तत्र दक्षयागस्थले तदा।
दक्षोऽपश्यच्च मध्याह्ने नक्षत्राण्यद्धुतानि च॥ ४
दिशश्चासन्सुमलिनाः
परिवेषसहस्त्रेण
कर्बुरोऽभूदिवाकरः।
संक्रांतश्च भयंकरः॥ ५
नक्षत्राणि पतन्ति स्म विद्युदग्निप्रभाणि च।
नक्षत्राणामभूदक़ा गतिश्चाधोमुखी तदा॥ ६
गृध्रा दक्षशिरः स्पृष्ट्वा समुद्भूताः सहस्त्रशः।
आसीद् गृश्नपक्षच्छायै: सच्छायो यागमंडपः॥ ७
ववाशिरे यागभूमौ क्रोष्टारो नेत्रकस्तदा।
उल्कावृष्टिरभूत्तत्र श्वेतवृश्चिकसंभवा॥ ८
खरा बाता ववुस्तत्र पांशुवृष्टिसमन्विताः।
शलभाश्च समुद्भूता विवर्तानिलकंपिताः॥ ९
नीतश्च पवनेख्थ्व॑ स॒ दक्षाध्वरमंडपः।
देवान्वितेन दक्षेण यः कृतो नूतनोऽद्भुतः ॥ १
वेमुर्दक्षादयः सर्वे तदा शोणितमद्धुतम्।
वेमुश्च मांसखण्डानि सशल्यानि मुहुर्मुहुः ॥ ११
सकम्पाश्च बभूवुस्ते दीपा वातहता इव।
दुःखिताश्चाभवन्सर्वे शस्त्रधाराहता इव॥ १२
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार गणोंसहित वीरभद्रके
प्रस्थान करनेपर दक्ष तथा देवताओंको अनेक प्रकारके
अशुभ लक्षण दिखायी पड़ने लगे॥ १॥
गणोंसहित वीरभद्रके चल देनेपर वहाँ अनेक
प्रकारके उत्पात होने लगे और हे देवर्षे! यज्ञविध्वंसकी
सूचना देनेवाले तीनों प्रकार (आध्यात्मिक, आधिदैविक
एवं आधिभौतिक) -के अपशकुन होने लगे॥ २॥
हे तात! दक्षकी बाँयीं आँख, बाँयीं भुजा और
बाँयी जाँघ फड़कने लगी, जो अनेक प्रकारके कष्ट
देनेवाली तथा सर्वथा अशुभकी सूचक थी॥ ३॥
उस समय दक्षके यज्ञस्थलमें भूकम्प उत्पन्न हो
गया। दक्षको दोपहरमें अनेक अद्भुत नक्षत्र दीखने
लगे। दिशाएँ मलिन हो गयीं, सूर्य चितकबरा हो
गया। सूर्यपर हजारों घेरे पड़ गये, जिससे बह भयंकर
दिखायी पड़ने लगा॥ ४-५॥
बिजली तथा अग्निके समान दीप्तिमान् तारे
टूटकर गिरने लगे। नक्षत्रोंकी गति टेढ़ी और नीचेकी
ओर हो गयी। हजारों गीध दक्षके सिरको छूकर उड़ने
लगे और उन गीधोंके पंखोंकी छायासे यज्ञमण्डप
ढँक गया॥ ६-७॥
यज्ञभूमिमें सियार तथा उल्लू शब्द करने लगे।
[आकाशमण्डलसे] श्वेत बिच्छुओंको उल्कावृष्टि
होने लगी। धूलिकी वर्षाके साथ तेज हवाएँ चलने
लगीं और विवर्त [घूमती हुई] वायुसे कम्पित होकर
टिड्डियाँ सब जगह उड़ने लगीं॥ ८-९॥
दक्षने देवताओंके साथ जिस नवीन तथा अद्भुत
यज्ञमण्डपका निर्माण किया था, उसे वायुने ऊपरकी
ओर उड़ा दिया। दक्ष आदि सभी लोग अद्भुत प्रकारसे
रक्तका वमन करने लगे और हड़ीसे समन्वित मांसखण्ड
बार-बार उगलने लगे॥ १०-११॥
वे सभी लोग वायुके झोंकेसे हिलते हुए
दीपकके समान काँपने लगे और शस्त्रोंसे आहत हुए
प्राणियोंके समान दुःखित हो गये। जिस प्रकार वनमें
४६०
तदा मय कसलपुयोण तपए 8 ७६ बाष्पवर्षाणि तत्क्षणे।
प्रातस्तुषारवर्षीणि पद्मानीव वनान्तरे॥
दक्षाद्यक्षीणि जातानि ह्यकस्माद्विशदान्यपि।
निशायां कमलाश्चैव कुमुदानीव सङ्गवे॥ १४
असृग्ववर्ष देवश्च तिमिरेणावृता दिशः।
दिग्दाहोऽभूद्विशेषेण त्रासयन् सकलाञ्जनान्॥ १५
एवंविधान्यरिष्टानि ददृशुर्विबुधादयः।
भयमापेदिरेऽत्यन्तं मुने विष्णवादिकास्तदा॥ १६
भुवि ते मूर्छिताः पेतुर्हा हताः स्म इतीरयन्।
तरवस्तीरसञ्जाता नदीवेगहता इव॥ १७
पतित्वा ते स्थिता भूमौ क्रूराः सर्पा हता इव।
कंदुका इव ते भूयः पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ १८
ततस्ते तापसंतप्ता रुरुदुः कुररी इव।
रोदनध्वनिसंक्रान्तोरुक्तिप्रत्युक्तिका इव॥ १९
सवैकुंठास्ततः सर्वे तदा कुंठितशक्तयः।
स्वस्वोपकंठमाकंठं लुलुठुः कमठा इव॥ २०
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सञ्जाता चाशरीरवाक्।
श्रावयत्यखिलान् देवान् दक्षं चैव विशेषतः॥ २१
आकाशवाण्युवाच
धिग् जन्म तब दक्षाद्य महामूढोऽसि पापधीः ।
भविष्यति महदुःखमनिवार्यं हरोद्भवम्॥ २२
सहायिनोऽत्र ये मूढास्तव देवादयः स्थिता: ।
तेषामपि महददुःखं भविष्यति न संशयः॥ २३
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वाकाशवचनं दृष्ट्वारिष्टानि तानि च।
दक्षः प्रापद्भयं चाति परे देवादयोऽपि ह॥ २४
'वेपमानस्तदा दक्षो विकलश्चाति चेतसि।
अगच्छच्छरणं विष्णोः स्वप्रभोरिन्दिरापतेः॥ २५
श्रीशिवमहापुराण
[3s ३४
प्रातःकालके समय कमलपुष्पोंपर तुषार है
(ओस)-ङ्ग
वर्षा हुई हो, उसी प्रकार शब्द करते हुए वाधक
वर्षा होने लगी॥ १२-१३॥
जिस प्रकार रात्रिमें कमल तथा दिनमें
बन्द हो जाते हैं, उसी प्रकार दक्ष आदिकी विशाल
आँखें भी अचानक बन्द हो गयीं॥ १४॥
आकाशसे रक्तकी वर्षा होने लगी, दिशा
अन्धकारसे ढँक गयीं तथा सभी प्राणियोंको सन्त्रस्त
करता हुआ दिग्दाह होने लगा॥ १५॥
हे मुने ! जब विष्णु आदि देवताओंने इस प्रकारक
उत्पात देखे, तब वे अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥ १ ६॥
हाय, अब हमलोग मारे गये-इस प्रकार कहते
हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर इस प्रकार गिर पडे,
जैसे नदीके वेगसे किनारेपर वृक्ष गिर जाते हैं ॥ १७॥
वे पृथिवीपर इस प्रकार गिरकर अचेत हो जाते
थे जैसे काटनेके बाद विषैला सर्प अचेत हो जाता
है और कभी गेंदके समान पृथिवीपर गिरकर पुन: उठ
जाते थे। तदनन्तर वे तापसे व्याकुल होकर कुररी
पक्षीकी भाँति विलाप करते थे एवं उक्ति तथा
प्रत्युक्तिका शब्द करते हुए रो रहे थे॥ १८-१९॥
उस समय विष्णुसहित सभी लोगोंकी शक्ति
कुण्ठित हो गयी और वे आपसमें एक-दूसरेके समीप
कण्ठपर्यन्त कछुएके समान लोटने लगे॥ २०॥
इसी बीच वहाँ समस्त देवताओं और विशेषकर
दक्षको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई॥ २१॥
आकाशवाणी बोली-हे दक्ष! तुम्हारे जन्मको
धिक्कार है। तुम महामूढ़ और पापात्मा हो। शिवजीकें
कारण आज तुम्हें महान् दुःख प्राप्त होगा, जिसका
निवारण नहीं हो सकता॥ २२॥
यहाँ जो तुम्हारे सहायक मूर्ख देवता उपस्थित है,
उन्हें भी महान् दु:ख होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले [हे मुने!] उस
सुनकर और उन उपद्रवोंको देखकर दक्ष तथा अरी
देवता आदि भी अत्यन्त भयभीत हो उठे॥ २४॥
उस समय दक्ष मन-ही-मन अत्यन्त
हो काँपने लगे और अपने प्रभु लक्ष्मीपति भगवँ
विष्णुकी शरणमें गये ॥ २५ ॥
अ० ३५]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६९
सुप्रणम्य भयाविष्टः संस्तूय च विचेतनः।
भयभीत तथा बेसुध वे दक्ष उन स्वजनवत्सल
देवाधिदेव विष्णुको प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति
अबोचद्देवदेवं तं विष्णुं स्वजनवत्सलम्॥ २६ | करके कहने लगे--॥ २६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दु:शकुनदर्शनं नाम चतुस्त्रिशोऽ ध्यायः ॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
अपशकुन-दर्शन नामक चाँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
दक्षद्वारा यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवानका शिवद्रोहजनित
संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको
समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन
दक्ष उवाच
देवदेव हरे विष्णो दीनबंधो कृपानिधे।
मम रक्षा विधातव्या भवता साध्वरस्य च॥ १
रक्षस्त्वं मखस्यैव मखकर्मा मखात्मकः।
कृपा विधेया यज्ञस्य भङ्गो भवतु न प्रभो॥ २
ब्रह्मोवाच
इत्थं बहुविधां दक्षः कृत्वा विज्ञप्तिमादरात्।
पपात पादयोस्तस्य भयव्याकुलमानसः॥ ३
उत्थाप्य तं ततो विष्णुर्दक्षं विक्लिन्नमानसम्।
श्रुत्वा च तस्य तद्वाक्यं कुमतेरस्मरच्छिवम्॥ ४
समृत्वा शिवं महेशानं स्वप्रभुं परमेश्वरम्
अवदच्छिवतत्त्वज्ञो दक्षं संबोधयन्हरिः॥ ५
हरिरुवाच
शृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि तत्त्वतः श्रृणु मे वच: ।
सर्वथा ते हितकरं महामंत्रसुखप्रदम्॥ ६
अवज्ञा हि कृता दक्ष त्वया तत्त्वमजानता।
सकलाधीश्वरस्यैव शंकरस्य परात्मनः॥ ७
ईश्वरावज्ञया सर्व कार्य भवति सर्वथा।
विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदे पदे॥ ८
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते।
तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम् ९
दक्ष बोले-हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो!
हे दीनबन्धो! हे कृपानिधे! आपको मेरी और मेरे
यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये। आप ही यज्ञके रक्षक,
यज्ञ करनेवाले और यज्ञस्वरूप हैं। हे प्रभो! आपको
ऐसी कृपा करनी चाहिये, जिससे यज्ञका विनाश न
हो॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इस प्रकार
आदरपूर्वक प्रार्थना करके भयसे व्याकुल चित्तबाले
दक्ष उनके चरणोंमें गिर पड़े। तब दुखी मनवाले
दक्षको उठाकर और उन दुर्बुद्धिकी बातको सुनकर
विष्णुने शिवका स्मरण किया॥ ३-४॥
अपने प्रभु एवं महान् ऐश्वर्यसे युक्त परमेश्वर
शिवका स्मरण करके शिवतत्त्वके ज्ञाता श्रीहरि
दक्षको सम्बोधित करते हुए कहने लगे-॥५॥
हरि बोले--हे दक्ष! मैं आपको यथार्थ बात
बता रहा हूँ, मेरी बात सुनिये, यह आपके लिये सर्वथा
हितकर तथा महामन्त्रकी तरह सुखदायक -है॥६॥
हे दक्ष! शिवतत्त्वको न जानमेके कारण आपने
सबके अधिपति परमात्मा शंकरकी अवहेलना की
है॥७॥
ईशवरकी अवहेलनासे सारा कार्य न केवल
सर्वथा निष्फल हो जाता है, अपितु पग-पगपर विपत्ति
भी आती है। जहाँ अपूज्य लोगोंकी पूजा होती है
और पूजनीयकी पूजा नहीं होती, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु
एवं भय-ये तीन अवश्य होंगे॥ ८-९॥
४६२
तस्मात्सर्वप्रयलेन माननीयो वृषध्व्रजः।
अमानितान्महेशाच्च महद्भयमुपस्थितम्॥ १
अद्यापि न वयं सर्वे प्रभवः प्रभवामहे।
- भवतो दुर्नयेनैव मया सत्यमुदीर्यते॥ १९
ब्रह्मोवाच
विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा दक्षश्चिन्तापरोऽभवत्।
विवर्णवदनो भूत्वा तूष्णीमासीद्धवि स्थितः॥ १२
एतस्मिन्नन्तरे वीरभद्रः सैन्यसमन्वितः।
अगच्छदध्वरं रुद्रप्रेरितो गणनायकः॥ १३
पृष्ठे केचित्समायाता गगने केचिदागताः।
दिशश्च विदिशः सर्वे समावृत्य तथापरे॥ १४
शर्वाज्ञया गणाः शूरा निर्भया रुद्रविक्रमाः।
असंख्याः सिंहनादान्वै कुर्वतो वीरसत्तमाः॥ १५
तेन नादेन महता नादितं भुवनत्रयम्।
रजसा चावृतं व्योम तमसा चावृता दिशः॥ १६
सप्तद्वीपान्विता पृथ्वी चचालाति भयाकुला।
सशैलकानना तत्र चुक्षुभुः सकलाब्धयः॥ १७
एवंभूतं च तत्सैन्यं लोकक्षयकरं महत्।
दृष्ट्वा च विस्मिताः सर्वे बभूवुरमरादयः॥ १८
सैन्योद्योगमथालोक्य दक्षश्चासृङ्मुखाकुलः।
दंडवत्पतितो विष्णुं सकलत्रोऽभ्यभाषत॥ १९
दक्ष उवाच
भवद्बलेनैव मया यज्ञः प्रारंभितो महान्।
सत्कर्मसिद्धये विष्णो प्रमाणं त्वं महाप्रभो॥ २०
विष्णो त्वं कर्मणां साक्षी यज्ञानां प्रतिपालकः।
धर्मस्य वेदगर्भस्य ब्रह्मणस्त्वं महाप्रभो॥ २१
ततस्माद्रक्षा विधातव्या यज्ञस्यास्य मम प्रभो।
त्वदन्यः कः समर्थोऽस्ति यतस्त्वं सकलप्रभुः॥ २२
श्रीशिवमहापुराण
mee ST ञे
[अ०
वृषभध्वजका सम्मान करना चाहिये।
अपमान करनेसे ही [आपके ऊपर] महान् भ
उपस्थित हुआ है॥ १०॥
हम सब लोग प्रभु होते हुए भी आज आपको
दुर्नीतिके कारण कुछ भी करनेमें समर्थ नही हैं मै
सत्य कह रहा हूँ॥ ११॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] विष्णुका यह
वचन सुनकर दक्ष चिन्तामें पड़ गये । उनका मुख तथा
उनके चेहरेका रंग फीका पड़ गया और वे चुप होकर
पृथिवीपर खड़े रह गये॥ १२॥
इसी समय रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र
अपनी सेनाके साथ यज्ञस्थलमें जा पहुँचे॥१३॥
कुछ गण भूपृष्ठपर आ गये, कुछ आकाशमें स्थित
हो गये और कुछ गण दिशाओं तथा विदिशाओंको
व्याप्त करके खड़े हो गये। शिवकी आज्ञासे वे रुद्रके
समान पराक्रमवाले, शूर, निर्भीक तथा वीरोंमें श्रेष्ठ असंख्य
गण सिंहनाद करते हुए वहाँ पहुँच गये॥ १४-१५॥
उस घोर नादसे तीनों लोक गूँज उठे। आकाश
धूलसे भर गया और दिशाएँ अन्धकारसे आवृत हो
गयीं। सातों द्वीपोंसे युक्त पृथिवी भयसे अत्यन्त
व्याकुल होकर पर्वत और वनोंसहित काँपने लगी तथा
सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे॥ १६-१७॥
समस्त लोकोंका विनाश करनेवाले इस प्रकारे
उस विशाल सैन्यदलको देखकर समस्त देवता आदि
चकित रह गये॥ १८॥
इस सैन्य-उद्योगको देखकर मुखसे रक्तका वमन
करते हुए वे दक्ष पत्नीसहित विष्णुके चरणोंमें दण्डकी
भाँति गिर पडे और इस प्रकार कहने लगे=॥ १९॥
दक्ष बोले- हे विष्णो। हे महाप्रभो! आपके बलसे
ही मैने इस महान् यज्ञको आरम्भ किया है, सत्कर्मकी
सिद्धिके लिये आप ही प्रमाण माने गये हैं॥ २०॥ ल.
हे विष्णो! आप कर्मोके साक्षी तथा य
प्रतिपालक हैं। हे महाप्रभो! आप वेदसारसर्वस्व,
और ब्रह्माके रक्षक हैं। अत: हे प्रभो! आपको मेरे ईस
यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये। आपके अतिरिक्त दू
कौन समर्थ है; क्योंकि आप सबके प्रभु हैं ॥ २१-१२
आ० ३५]
ब्रह्मोवाच
वचनं श्रुत्वा विष्णुर्दीनतरं तदा।
अवोचद् बोधयंस्तं वै शिवतत्त्वपराङ्मुखम्॥ २३
विष्णुरुवाच
मया रक्षा विधातव्या तव यज्ञस्य दक्ष वै।
ख्यातो मम पणः सत्यो धर्मस्य परिपालनम्॥ २४
तत्सत्यं तु त्वयोक्तं हि किं तत्तस्य व्यतिक्रमः।
श्रृणु त्वं वच्म्यहं दक्ष क्रूरबुद्धिं त्यजाधुना॥ २५
नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे यज्जातं वृत्तमद्धुतम्।
तत् किं न स्मर्यते दक्ष विस्मृतं किं कुबुद्धिना॥ २६
रुद्रकोपाच्य को ह्यत्र समथों रक्षणे तव।
न यस्याभिमतं दक्ष यस्त्वां रक्षति दुर्मतिः ॥ २७
किं कर्म किमकर्मेति तन्न पश्यसि दुर्मते।
समर्थ केवलं कर्म न भविष्यति सर्वदा॥ २८
स्वकर्म विद््रि तद्येन समर्थत्वेन जायते।
न त्वन्यः कर्मणो दाता शं भवेदीश्वरं विना॥ २९
ईश्वरस्य च यो भक्त्या शांतस्तदगतमानसः।
कर्मणो हि फलं तस्य प्रयच्छति तदा शिवः॥ ३०
केवलं ज्ञानमाश्रित्य निरीश्वरपरा नराः।
निरयं ते च गच्छन्ति कल्पकोटिशतानि च॥ ३१
पुनः कर्ममयैः पाशैर्बद्धा जन्मनि जन्मनि।
निरयेषु प्रपच्यन्ते केवलं कर्मरूपिणः॥
अयं रुद्र्गणाधीशो वीरभन्रोऽरिमर्दनः।
रुड्रकोपारिनिसंभूतः समायातोऽध्वराङ्गणे॥ ३३
अयमस्मद्विनाशार्थमागतोऽस्ति न संशयः।
अशक्यमस्य नास्त्येव किमप्यस्तु तु वस्तुतः ॥ ३४
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६३
ब्रह्माजी बोले--तब दक्षकी अत्यन्त दीनतापूर्ण
बात सुनकर भगवान् विष्णु शिवतत्त्वसे विमुख उन
दक्षको बोध प्रदान करते हुए कहने लगे--॥ २३॥
विष्णु बोले--हे दक्ष! मुझे आपके यज्ञकी रक्षा
अवश्य करनी चाहिये; धर्मके परिपालनविषयक जो
मेरी सत्य प्रतिज्ञा है, वह [सर्वत्र] विख्यात है ॥ २४॥
आपने जो कहा है, वह सत्य है, उसका
व्यतिक्रम कैसे हो सकता है। परंतु दक्ष ! मैं जो कहता
हूँ, उसे आप सुनिये। आप इस समय क्रूरतापूर्ण
बुद्धिको त्याग दीजिये॥ २५॥
हे दक्ष ! देवताओंके क्षेत्र नैमिषारण्यमें जो अद्भुत
घटना घटित हुई थी, क्या उसका स्मरण आपको नहीं
हो रहा है ? आप कुबुद्धिक कारण उसे भूल गये ?॥ २६॥
रुद्रके कोपसे आपकी रक्षा करनेमें यहाँ कौन
समर्थ है? हे दक्ष! आपकी रक्षा किसको अभिमत
नहीं है? परंतु जो आपकी रक्षा करनेको उद्यत होता
है, वह दुर्बुद्धि है॥ २७॥
हे दुर्मते! क्या कर्म है और क्या अकर्म है, इसे
आप नहीं समझ पा रहे हैं। केवल कर्म ही [सब कुछ
करनेमें] सर्वदा समर्थ नहीं हो सकता॥ २८॥
जिसके सहयोगसे कर्ममें कुछ करनेका सामर्थ्य
आता है, उसीको आप स्वकर्म समझिये। भगवान्
शिवके बिना दूसरा कोई कर्ममें कल्याण करनेकी
शक्ति देनेवाला नहीं है। जो शान्त होकर ईश्वरमें मन
लगाकर भक्तिपूर्वक कार्य करता है, उसीको भगवान्
शिव उस कर्मका फल देते हैं ॥ २९-३०॥
जो मनुष्य केवल ज्ञानका सहारा लेकर
अनीश्वरवादी हो जाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंतक
नरकमें ही पड़े रहते हैं। केवल कर्मपरायण रहनेवाले.
लोग प्रत्येक जन्ममें कर्ममय पाशोंसे बँधते हैं और
नरकोंकी यातना भोगते हैं॥ ३१-३२॥
ये रुद्रगणोंके स्वामी, शत्रुमर्दन तथा रुद्रकी
क्रोधाग्निसे उत्पन्न वीरभद्र यज्ञभूमिमें आ गये हैं॥ ३३॥
ये हमलोगोंके विनाशके लिये आये हैं, इसमें
संशय नहीं है। चाहे कुछ भी हो, वास्तवमें इनके
लिये कुछ भी अशक्य नहीं है॥ ३४॥
४६४
श्रीशिवमहापुराण
[अ आ "क
प्रज्वाल्यास्मानयं सर्वान् ध्रुवमेव महाप्रभुः ।
ततः प्रशांतहृदयो भविष्यति न संशयः॥
श्रीमहादेवशपथं समुल्लंघ्य भ्रमान्मया।
यत: स्थितं तत: प्राप्यं मया दुःखं त्वया सह॥ ३६
शक्तिर्मम तु नास्त्येव दक्षाद्यैतन्निवारणे।
शपथोल्लंघनादेव शिवद्रोही यतोऽस्म्यहम्॥ ३७
कालत्रयेऽपि न यतो महेशद्रोहिणां सुखम्।
ततोऽवश्यं मया प्राप्तं दुःखमद्य त्वया सह॥ ३८
सुदर्शनाभिधं चक्रमेतस्मिन्न लगिष्यति।
शैवचक्रमिदं यस्मादशैवलयकारणम्॥ ३९
विनापि वीरभद्रेण नामैतच्चक्रमैश्वरम्।
हत्वा गमिष्यत्यधुना सत्वरं हरसन्निधौ॥ ४०
शैवं शपथमुल्लंघ्य स्थितं मां चक्रमीदृशम्।
असंहत्यैव सहसा कृपयैव स्थिरं परम्॥ ४९
अतः परमिदं चक्रमपि न स्थास्यति ध्रुवम्।
गमिष्यत्यधुना शीघ्रं ज्चालामालासमाकुलम्॥ ४२
वीरभद्रः पूजितोऽपि शीघ्रमस्माभिराद्रात्।
महाक्रोधसमाक्रांतो नास्मान् संरक्षयिष्यति॥ ४३
अकांडप्रलयोऽस्माकमागतोऽद्य हि हा हहा।
हा हा बत तवेदानीं नाशोऽस्माकमुपस्थितः ॥ ४४
शरण्योऽस्माकमधुना नास्त्येव हि जगत्रये।
शंकरद्रोहिणो लोके कः शरण्यो भविष्यति॥ ४५
तनुनाशेऽपि संग्राप्यास्तैश्चापि यमयातनाः।
ता नैव शक्यते सोढुं बहुदुःखप्रदायिनीः॥ ४६
शिवद्रोहिणमालोक्य दष्टदन्तो यमः स्वयम्।
तप्ततैलकटाहेषु पातयत्येव नान्यथा॥ ४७
गन्तुमेवाहमुद्युक्तः सर्वथा शपशोत्तरम्।
तथापि न गतः शीघ्रं दुष्टसंसर्गपापतः॥ ४८
महान् सामर्थ्यशाली ये हम सबको
जलाकर ही शान्तचित्त होंगे, इसमें संशय नहीं है॥ ३५॥
मैं भ्रमसे महादेवजीकी शपथका उल्लंघन करके
जो यहाँ रुक गया, उसके कारण आपके साथ प
भी दुःख सहना पड़ेगा। हे दक्ष! आज मुझमें इनको
रोक सकनेकी शक्ति नहीं है; क्योंकि शपथका
उल्लंघन करनेसे मैं शिवद्रोही हो गया हूँ ॥ ३६-३७
भगवान् शिवसे द्रोह करनेवालेको त्रिकालमें भी
सुख नहीं मिलता है, अत: आज आपके साथ मुझे भी
अवश्य दुःख प्राप्त हुआ है। मेरा सुदर्शन नामक चक्र
भी इनपर प्रभाव नहीं डाल पायेगा; क्योंकि यह शैवचक्र
[केवल] अशैवोंका लय करनेवाला है ॥ ३८-३९॥
वीरभद्रपर इस चक्रसे प्रहार करते ही बिना
उनका वध किये ही यह शैवचक्र शीघ्र ही शिवजीके
पास चला जायगा। यह शैवचक्र शिवकी शपथका
उल्लंघन करनेवाले मेरे पास मुझपर सहसा बिना
प्रहार किये हुए ही अबतक स्थित है, यही उनकी
महान् कृपा है ॥ ४०-४१॥
अब यह चक्र निश्चित रूपसे मेरे पास नहीं
रहेगा और अग्निकी लपटोंसे व्याप्त होकर इस समय
शीघ्र ही चला जायगा। हमलोगोंके द्वारा शीघ्रतासे
आदरपूर्वक पूजा किये जानेपर भी महान् क्रोधसे भरे
हुए ये वीरभद्र हमारी रक्षा नहीं करेंगे॥ ४२-४३॥
हाय! यह बड़े दु:खकी बात है कि असमयमें ही
हमलोगोंके लिये प्रलय आ गया है । इस समय आपका
और हमारा विनाश उपस्थित हो गया है॥ ४४॥
इस समय त्रिलोकीमें हमारी रक्षा करनेवाला
कोई नहीं है, भला शंकरके द्रोहीकों शरण देनेवाला
संसारमें कौन होगा? शरीरका नाश हो जानेपर भी
[शिवद्रोहके कारण] उन्हें यमकी यातनाएँ प्राप्त
होती हैं। बहुत दु:ख देनेवाली उन यातनाओंको सही
नहीं जा सकता॥ ४५-४६॥ |
शिवदरोहीको देखकर यमराज स्वयं दाँत पीस
हुए सन्तप्त तैलपूर्ण कड़ाहोंमें डाल देते हैं, इसमें
सन्देह नहीं है। शपथके बाद मैं शीघ्र ही जातेंकी
उद्यत था, किंतु दुष्टके संसर्गरूपी पापके कारण
नहीं गया॥ ४७-४८ ॥
अ० ३६]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४६५
यदद्य क्रियतेऽस्माभिः पलायनमितस्तदा।
शार्वो नाकर्षकः शस्त्रेरस्मानाकर्षयिष्यति॥ ४९
स्वर्गे वा भुवि पाताले यत्र कुत्रापि वा यत: ।
श्रीवीरभ्रद्रशस्त्राणां गमनं न हि दुर्लभम्॥ ५०
यावन्तश्च गणाः सन्ति श्रीरुद्रस्य त्रिशूलिनः ।
तावतामपि सर्वेषां शक्तिरेतादूशी श्रुवम्॥ ५१
श्रीकालभैरवः काश्यां नखाग्रेणेब लीलया।
पुरा शिरश्च चिच्छेद पञ्चमं ब्रह्मणो श्रुवम्॥ ५२
एतदुक्त्वा स्थितो विष्णुरतित्रस्तमुखाम्बुजः।
बीरभद्रोऽपि संप्राप तदैवाध्वरमंडपम्॥ ५३
एवं ब्रुवति गोविन्द आगतं सैन्यसागरम्।
वीरभद्रेण सहितं ददृशुश्च सुरादयः॥ ५४
यदि इस समय हमलोग भागनेका प्रयास भी
करें, तो कर्षण करनेवाले शिवभक्त वीरभद्र अपने
शस्त्रोंसे हमें खींच लेंगे; क्योंकि स्वर्ग, पृथिवी,
पातालमें जहाँ कहीं भी वीरभद्रके शस्त्रोंका जाना
असम्भव नहीं है॥ ४९-५०॥
त्रिशूलधारी श्रीरुद्रके जितने भी गण यहाँ हैं,
उन सबकी ऐसी ही शक्ति है। पूर्व समयमें काशीमें
कालभैरवने अपने नखके अग्रभागसे लीलापूर्वक
ब्रह्माजीके पाँचवें सिरको काट दिया था॥५१-५२॥
ऐसा कहकर अत्यन्त व्याकुल मुखकमलवाले
विष्णु चुपचाप बैठ गये, उसी समय वीरभद्र भी
यज्ञमण्डपमें आ पहुँचे। विष्णु ऐसा कह ही रहे थे
कि वीरभद्रके साथ [विशाल] सैन्यसमूह भी आ
गया, जिसे देवता आदिने देखा॥ ५३-५४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने
विष्णुवाक्यवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सती-उपाख्यानमें
विष्णुका वचनवर्णन नामक पँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
अथ घट्त्रिंशोऽध्यायः
युद्धमें शिवगणोंसे पराजित हो देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका
रूद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये
'ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत
ब्रह्मोवाच
इन्द्रोऽपि प्रहसन् विष्णुमात्मवादरतं तदा।
वज्रपाणिः सुरैः सार्धं योद्धुकामोऽभवत्तदा॥ १
तदेन्रो गजमारूढो बस्तारूढोऽनलस्तथा।
यमो महिषमारूढो निर्क्रतिः प्रेतमेव च॥ २
पाशी च मकरारूढो मृगारूढः सदागतिः।
कुबेरः पुष्पकारूढः संनद्धोऽभूदतन्द्रिः॥ ३
तथान्ये सुरसंघाश्च यक्षचारणगुह्यकाः।
आरुह्य वाहनान्येव स्वानि स्वानि प्रतापिन: ॥ ४
ब्रह्माजी बोले-उस समय [शिवतत्त्वरूपी]
आत्मवादमें रत विष्णुपर हँसते हुए इन्द्र हाथमें गदा
धारणकर देवताओंको साथ लेकर [वीरभद्रसे] युद्ध
करनेके लिये तत्पर हो गये॥ १॥
उस समय इन्द्र हाथीपर सवार हो गये, अग्नि
भेंडुपर सवार हो गये, यम भैंसेपर चढ़ गये और
निर्क्रति प्रेतपर सवार हो गये॥ २॥
वरुण मकरपर, वायु मृगपर और कुबेर पुष्पक
विमानपर आरूढ़ हो आलस्यरहित होकर [युद्धके
लिये] तैयार हो गये। इसी प्रकार प्रतापी अन्य
देवसमूह, यक्ष, चारण तथा गुह्यक भी अपने-अपने
वाहनोंपर आरूढ़ होकर तैयार हो गये॥ ३-४॥
४६६
श्रीशिवमहापुराण
[अ ३ TT से
तेषामुद्योगमालोक्य दक्षश्चासृङ्मुखस्तथा।
तदन्तिकं समागत्य सकलत्रोऽभ्यभाषत॥
दक्ष उवाच
युष्मदबलेनैव मया यज्ञ: प्रारंभितो महान्।
सत्कर्मसिद्धये यूयं प्रमाणाः स्युर्महाप्रभाः॥ ६
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा दक्षवचनं सर्वे देवाः सवासवाः।
निर्ययुस्त्वरितं तत्र युद्धं कर्त समुद्यताः॥ ७
अथ देवगणाः सर्वे युयुधुस्ते बलान्विता:।
शक्रादयो लोकपाला मोहिताः शिवमायया॥ ८
देवानां च गणानां च तदासीत्समरो महान्।
तीक्ष्णतोमरनाराचेर्युयुधुस्ते परस्परम्॥ ९
नेदुः शंखाश्च भेर्यश्च तस्मिन् रणमहोत्सवे।
महादुन्दुभयो नेदुः पटहा डिण्डिमादयः॥ १०
तेन शब्देन महता श्लाघ्यमानास्तदा सुराः।
लोकपालैश्च सहिता जघ्नुस्तान् शिवकिंकरान्॥ ११
इन्द्राद्यैलोंकपालैश्च गणा: शंभोः पराङ्मुखाः ।
कृताश्च मुनिशार्दूल भूगोर्मन्त्रबलेन च॥ १२
उच्चाटनं कृतं तेषां भृगुणा यज्चना तदा।
'यजनार्थं च देवानां तुष्ट्यर्थं दीक्षितस्य च॥ १३
पराजितान् स्वकान् दृष्ट्वा वीरभद्रो रुषान्वितः ।
भूतप्रेतपिशाचांश्च कृत्वा तानेव पृष्ठतः॥ १४
वृषभस्थान् पुरस्कृत्य स्वयं चैव महाबलः।
'महात्रिशूलमादाय पातयामास निर्जरान्॥ १५
देवान् यक्षान् साध्यगणान् गुह्यकान् चारणानपि।
शूलघातैश्च ते सर्वे गणा वेगात् प्रजध्निरि॥ १६
केचिद् द्विधा कृताः खड्गै्मुदगरैश्च विपोथिताः।
अन्यैः शस्त्रैरपि सुरा गणैर्भिन्नास्तदाभवन्॥ १७
उन देवताओंके उद्योगको देखकर रक्तसे सने
हुए मुखवाले वे दक्ष अपनी पत्नीके साथ उनके पास
जाकर कहने लगे-॥५॥
दक्ष बोले--[हे देवगणो!] मैंने आपलोगोंके
ही बलसे इस यज्ञको प्रारम्भ किया है; क्योंकि
महातेजस्वी आपलोग ही सत्कर्मकी सिद्धिके लिये
प्रमाण हैं॥ ६॥
ब्रह्माजी बोले--दक्षके उस वचनको सुनकर
इन्द्र आदि सभी देवगण युद्ध करनेके लिये तैयार हो
निकल पडे । तदनन्तर समस्त देवगण तथा इन्द्र आदि
लोकपाल शिवजीकी मायासे मोहित होकर अपनी-
अपनी सेनाओंको साथ लेकर युद्ध करने लगे ॥ ७-८॥
उस समय देवताओं तथा शिवगणोंमें महान् युद्ध
होने लगा। वे तीखे तोमर तथा बाणोंसे परस्मर युद्ध
करने लगे। उस युद्धमहोत्सवमें शंख तथा भेरियाँ
बजने लगीं और बड़ी-बड़ी दुन्दुभियाँ, नगाड़े तथा
डिण्डिम आदि बजने लगे॥ ९-१०॥
उस महान् शब्दसे उत्साहमें भरे हुए समस्त
देवगण लोकपालोंको साथ लेकर उन शिवगणोंको
मारने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओं एवं
लोकपालोंने भूगुके मन्त्रबलके प्रभावसे शिवजीके
गणोंको पराङ्मुख कर दिया॥ ११-१२॥
उस समय याज्ञिक भृगुजीने दीक्षा ग्रहण किये
हुए दक्षके तथा देवताओंके सन्तोषहेतु और यज्ञकी
निर्विघ्न समाप्तिके लिये उन शिवगणोंका उच्चाटन
कर दिया॥ १३॥
इस प्रकार अपने गणोंको पराजित देखकर
वीरभद्र ्रोधमें भर उठे और भूत, प्रेत तथा पिशाचोंकी
पीछे करके वे महाबली वीरभद्र बैलपर सवार सभी
शिवाणोंको आगे करके स्वयं त्रिशूल लेकर देवताओंकी
गिराने लगे॥ १४-१५॥
सभी शिवगणोनि भी त्रिशूलके प्रहारोंसे शीप्रतापूर्वक
देवताओं, यक्ष, साध्यगणों, गुह्यकों तथा चारणोंको
मार डाला। गणोंने तलवारोंसे कुछ देवताओंके
टुकड़े कर दिये, कुछको मुद्गरोंसे पीट डाला
कुछको घायल कर दिया॥ १६-१७॥
अ० ३६]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ६७
एवं पराजिताः सर्वे पलायनपरायणाः।
परस्परं परित्यज्य गता देवास्त्रिविष्टपम्॥ १८
केवलं लोकपालास्ते शक्राद्यास्तस्थुरुत्सुकाः ।
सङ्ग्रामे दारुणे तस्मिन् धृत्वा धैर्य महाबलाः ॥ १९
सर्वे मिलित्वा शक्राद्या देवास्तत्र रणाजिरे।
बृहस्पतिं च पप्रच्छुर्विनयावनतास्तदा॥ २०
लोकपाला ऊचुः
गुरो बृहस्पते तात महाप्राज्ञ दयानिधे।
शीघ्रं बद पृच्छतो नः कुतोऽस्माकं जयो भवेत्॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां स्मृत्वा शंभु प्रयत्नवान्।
बृहस्पतिरुवाचेदं महेन्द्रं ज्ञानदुर्बलम्॥ २२
बृहस्पतिरुवाच
यदुक्तं विष्णुना पूर्व तत्सर्वं जातमद्य वै।
तदेव विवृणोमीन्द्र सावधानतया श्रृणु॥ २३
अस्ति यश्चेश्वरः कश्चित् फलदः सर्वकर्मणाम्।
कर्तारं भजते सोऽपि न स्वकर्तुः प्रभुर्हि सः॥ २४
न मंत्रौषधयः सर्वे नाभिचारा न लौकिकाः।
न कर्माणि न वेदाश्च न मीमांसाद्वयं तथा॥ २५
अन्यान्यपि च शास्त्राणि नानावेदयुतानि च।
जञातुं नेशं संभवन्ति वदन्त्येवं पुरातनाः॥ २६
ज स्वज्ञेयो महेशानः सर्ववेदायुतेन सः।
भक्तैरनन्यशरणैर्नान्यथेति महाश्रुतिः॥ २७
शान्त्या च परया दृष्ट्या सर्वथा निर्विकारया।
तदनुग्रहतो नूनं ज्ञातव्यो हि सदाशिवः॥ २८
परं तु संवदिष्यामि कार्याकार्यविवक्षितौ।
सिद्धथंशं च सुरेशान तं शृणु त्वं हिताय वै॥ २९
त्वमिन्द्र बालिशो भूत्वा लोकपालैः सहाद्य वै।
आगतो दक्षयज्ञं हि किं करिष्यसि विक्रमम्॥ ३०
इस प्रकार सभी देवता पराजित होकर भाग चले
और एकःदूसरेको रणभूमिमें छोड़कर देवलोकको
चले गये। उस अत्यन्त भयानक युद्धमें महाबली इन्द्र
आदि लोकपाल ही धैर्य धारण करके उत्साहित
होकर खड़े रहे ॥ १८-१९॥
उस समय इन्द्र आदि समस्त देवता
एकत्र होकर विनयभावसे युक्त हो उस युद्धस्थलमें
बृहस्पतिजीसे पूछने लगे- ॥ २०॥
लोकपाल बोले-हे गुरो! हे बृहस्पते! हे
तात! हे महाप्राज्ञ! हे दयानिधे! शीघ्र बताइये,
हमलोग यह पूछते हैं कि हमारी विजय किस प्रकार
होगी 2॥ २१॥
ब्रह्माजी बोले-उनकी यह बात सुनकर
उपायोंको जाननेवाले बृहस्पति शम्भुका स्मरण करके
ज्ञानदुर्बल महेन्द्रसे कहने लगे-॥ २२॥
बृहस्पति बोले-हे इन्द्र! भगवान् विष्णुने
पहले जो कहा था, वह सब आज घटित हो गया, मैं
उसी बातको कह रहा हूँ, सावधानीपूर्वक सुनिये॥ २३॥
समस्त कर्मोंका फल देनेवाले जो कोई ईश्वर हैं,
वे भी अपने कर्ता शिवका भजन करते हैं। वे अपने
कर्ताके प्रभु नहीं हैं॥ २४॥
न मन्त्र, न औषधियाँ, न समस्त आभिचारिक
कर्म, न लौकिक पुरुष, न कर्म, न वेद, न पूर्वमीमांसा,
न उत्तस्मीमांसा तथा न अनेक वेदोंसे युक्त अन्यान्य
शास्त्र ही ईश्वरको जाननेमें समर्थ होते हैं, ऐसा
प्राचीन विद्वान् कहते हैं ॥ २५-२६॥
अनन्यशरण भक्तोंको छोड़कर दूसरे लोग सम्पूर्ण
वेदोंका दस हजार बार स्वाध्याय करके भी महेश्वरको
भलीभाँति नहीं जान सकते--यह महाश्रुति है। भगवान्
'सदाशिवके अनुग्रहसे ही सर्वथा शान्त, निर्विकार एवं
उत्तम दृष्टिसे उनको जाना जा सकता है॥ २७-२८॥
तब भी हे सुरेश्वर! उचित-अनुचित कार्यके
निर्णयमें सबके कल्याणके लिये सिद्धिके उत्तम
अंशका प्रतिपादन करूँगा, आप उसे सुनिये। हे इन्द्र!
आप लोकपालोंके साथ नादान बनकर इस समय
दक्षयज्ञमें आ गये, किंतु आप कौन-सा पराक्रम
करेंगे? ॥ २९-३०॥
अक.
४६८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ० I
एते रूद्र्सहायाश्च गणाः परमकोपनाः।
आगता यज्ञविघ्नार्थं तं करिष्यन्त्यसंशयम्॥
सर्वथा न ह्युपायोऽत्र केषांचिदपि तत्त्वतः।
यज्ञविघ्नविनाशार्थं सत्यं सत्यं ब्रवीम्यहम्॥ ३२
ब्रह्मोवाच
एवं बृहस्पतेर्वाक्यं श्रुत्वा ते हि दिवोकस:।
चिंतामापेदिरे सर्वे लोकपालाः सवासवाः ॥ ३३
ततोऽब्रवीद् वीरभद्रो महावीरगणेर्वृत: ।
इन्द्रादीन् लोकपालांस्तान् स्मृत्वा मनसि शंकरम्॥ ३४
वीरभद्र उवाच
सर्वे यूयं बालिशत्वादवदानार्थमागताः।
अवदानं प्रयच्छामि आगच्छत ममान्तिकम्॥ ३५
हे शक्र हे शुचे भानो हे शशिन् हे धनाधिप।
हे पाशपाणे हे वायो निरते यम शेष हे॥ ३६
हे सुरासुरसंघा हीहैत यूयं विचक्षणाः।
अवदानानि दास्यामि आतृप्त्याद्यासतां वरान्॥ ३७
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा सितैर्बाणैर्जघानाथ रुषान्वितः।
निखिलांस्तान् सुरान् सद्यो वीरभद्रो गणाग्रणीः ।
तैर्बाणेर्निहताः सर्वे वासवाद्याः सुरेश्वराः ॥ ३८
पलायनपरा भूत्वा जग्मुस्ते च दिशो दश।
गतेषु लोकपालेषु विद्रुतेषु सुरेषु च।
यज्ञवाटोपकंठे हि वीरभड्रोऽगमद् गणैः॥ ३९
तदा ते ऋषयः सर्वे सुभीता हि रमेश्वरम्।
विज्ञप्तुकामाः सहसा शीघ्रमूचुर्नता भृशम्॥ ४०
ऋषय ऊचुः
देवदेव रमानाथ सर्वेश्वर महाप्रभो।
रक्ष यज्ञं हि दक्षस्य यज्ञोऽसि त्वं न संशयः॥ ४१
यज्ञकर्मा यज्ञरूपो यज्ञाङ्गो यज्ञरक्षकः।
रक्ष यज्ञमतो रक्ष त्वत्तोऽन्यो न हि रक्षकः॥ ४२
भगवान् रुद्रके सहायक ये गण अत्यन्त कण
होकर यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हैं, ये अवश्य
ही उसे करेंगे॥३१॥
मैं यह सत्य-सत्य कह रहा हूँ कि इस झे
विघ्ननिवारणके लिये वस्तुत: किसीके भी पास सर्वधा
कोई उपाय नहीं है॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले बृहस्पतिकी इस बातको सुनकर
स्वर्गमें रहनेवाले इनद्रसहित वे समस्त लोकपाल चित्ता
पड़ गये। तब महावीर गणोंसे घिरे हुए वीरभद्र मन-
ही-मन भगवान् शंकरका स्मरण करके उन इन्द्र आदि
लोकपालोंसे कहने लगे ॥ ३३-३४॥
वीरभद्र बोले-आपलोग मूर्खताके कारण ही
[इस यज्ञमें] अपना-अपना भाग लेनेके लिये आये
हैं। अतः मेरे समीप आइये, मैं आपलोगोंको यज्ञका
फल देता हूँ॥ ३५॥
हे शक्र! हे अग्ने! हे सूर्य! हे चन्द्र हे कुबेर!
हे यम! हे वरुण! हे वायो! हे निर्क्रते! हे शेष! हे
बुद्धिमान् देव तथा राक्षसगण ! आपलोग इधर आइये,
मैं आपलोगोंको तृप्त करनेके लिये इसका फल प्रदान
करूँगा॥ ३६-३७॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर गणोंमें
श्रेष्ठ वीरभद्रने क्रोधमें भरकर तीक्ष्ण बाणोंसे उन सभी
देवताओंको शीघ्र ही घायल कर दिया। उन बाणोंसे
घायल होकर इन्द्र आदि वे समस्त सुरेश्वर भागकर
दसों दिशाओंमें चले गये। लोकपालोंके चले जानेपर
और देवताओंके भाग जानेपर वीरभद्र गणोंके साथ
यञ्ञशालाके समीप पहुँचे ॥ ३८-३९॥
उस समय वहाँ उपस्थित समस्त ऋषिं
अत्यन्त भयभीत होकर रमापति श्रीहरिसे [रक्षाकी)
प्रार्थना करनेके लिये सहसा विनम्र हो शीघ्र कहते
लगे-॥ ४०॥
ऋषिगण बोले-हे देवदेव! हे रमानाथ! है
सर्वेश्वर! हे महाप्रभो। दक्षके यज्ञकी रक्षा कीजिये
आप यज्ञस्वरूप हैं, इसमें संशय नहीं है। आप ही य
करनेवाले, यज्ञरूप, यज्ञके अंग और यज्ञके रक्षक हैं
अतः यज्ञकी रक्षा कीजियेःरक्षा कीजिये,
अतिरिक्त कोई दूसरा रक्षक नहीं है॥ ४१-४२॥
अ० ३६]
ब्रह्मोवाच
वचस्तेषामृषीणां वचनं हरिः।
योद्धुकामो5भवद्विष्णुर्वीरभद्रेण तेन वै॥४३
चतुर्भुजः सुसंनद्धो चक्रायुधधरः करेः।
महाबलोऽमरगणैर्यज्ञवाटात्स निर्ययौ॥ ४४
वीरभद्रः शूलपाणिर्नानागणसमन्वित:।
ददर्श विष्णुं संनद्धं योद्धुकामं महाप्रभुम्॥ ४५
तं दृष्ट्वा वीरभद्रोऽभूद् भ्रुकुटीकुटिलाननः।
कृतान्त इव पापिष्ठं मृगेन्द्र इव वारणम्॥ ४६
तथाविधं हरि दृष्ट्वा वीरभद्रोऽरिमर्दनः।
अवदत्त्वरितः क्रुद्धो गणेर्वीरैः समावृतः॥ ४७
वीरभद्र उवाच
रे रे हरे महादेवशपथोल्लंघनं त्वया।
कथमद्य कृतं चित्ते गर्वः किमभवत्तव॥ ४८
तव श्रीरूद्रशपथोल्लंघने शक्तिरस्ति किम्।
को वा त्वमसि को वा ते रक्षकोऽस्ति जगत्रये॥ ४९
अत्र त्वमागतः कस्माद्वयं तन्नैव विदाहे।
दक्षस्य यज्ञपाता त्वं कथं जातोऽसि तद्गद॥ ५०
दाक्षायण्या कृतं यच्च तन्न दृष्टं किमु त्वया।
प्रोक्तं यच्च दधीचेन श्रुतं तन्न किमु त्वया॥ ५१
त्वं चापि दक्षयज्ञेऽस्मिन् अवदानार्थमागतः।
अवदानं प्रयच्छामि तव चापि महाभुज॥ ५२
वक्षो विदारयिष्यामि त्रिशूलेन हरे तव।
'कस्तवास्ति समायातो रक्षकोऽद्य ममान्तिकम्॥ ५३
पातयिष्यामि भूपृष्ठे ज्वालयिष्यामि वह्निना।
दग्धं भवन्तमधुना पेषयिष्यामि सत्वरम्॥ ५४
रे रे हरे दुराचार महेशविमुखाधम।
श्रीमहारुद्रमाहात्म्यं किन्न जानासि पावनम्॥ ५५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६९
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] उन ऋषियोंके
वचनको सुनकर भगवान् विष्णु वीरभद्रके साथ
युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये॥ ४३॥
महाबली चतुर्भुज भगवान् विष्णु हाथोंमें चक्र
आदि आयुध धारणकर सम्यक् सावधान होकर
देवताओंके साथ यज्ञमण्डपसे बाहर निकले। अनेक
गणोंसे समन्वित तथा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए
वीरभद्रने महाप्रभु विष्णुको युद्धके लिये तैयार
देखा॥ ४४-४५॥
उन्हें देखते ही वीरभद्र टेढ़ी भौंहोंसे युक्त
मुखमण्डलवाले हो गये, जैसे पापीको देखकर यमराज
और हाथीको देखकर सिंह हो जाता है॥ ४६॥
उस प्रकार श्रीहरिको [युद्धके लिये उद्यत]
देखकर वीरगणोंसे घिरे हुए शत्रुनाशक वीरभद्र कुपित
होकर शीघ्रतासे कहने लगे ॥ ४७॥
वीरभद्र बोले-हे हरे! आपने आज शिवजीके
शपथकी अवहेलना क्यों की? और आपके मनमें
घमण्ड क्यों हो गया है? क्या आपमें शिवजीके
शपथका उल्लंघन करनेकी शक्ति है ? आप कौन हैं ?
तीनों लोकोंमें आपका रक्षक कौन है ?॥ ४८-४९॥
यहाँ किसलिये आये हैं, इसे हम नहीं जान पा
रहे हैं। आप दक्षके यज्ञरक्षक क्यों बन गये हैं, इसे
बताइये । [इस यज्ञमें] सतीने जो किया, उसे क्या
आपने नहीं देखा और दधीचिने जो कहा, उसे क्या
आपने नहीं सुना ?॥ ५०-५१॥
आप दक्षके इस यज्ञमें अवदान (यज्ञभाग)
प्राप्त करनेके लिये आये हुए हैं। हे महाबाहो! मैं
[शीघ्र ही] आपको अवदान देता हूँ। हे हरे! मैं
त्रिशूलसे आपका वक्षःस्थल विदीर्ण करूँगा। आपका
कौन रक्षक है, वह मेरे समक्ष आये॥ ५२-५३॥
में आपको पृथिवीपर धराशायी करूँगा,
अग्निसे जला दूँगा और पुनः दग्ध हुए आपको पीस
डालूँगा ॥ ५४॥
हे हरे! हे दुराचारी! हे महेशविमुख! हे
अधम! क्या आप शिवजीके पावन साहात्म्यको नहीं
जानते ?॥ ५५॥
१
5
ड७०
श्रीशिवमहापुराण
[अ TN
अथापि त्वं महाबाहो योद्धुकामोऽग्रतः स्थित: ।
नेष्यामि पुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेस्त्वमात्मना॥
ब्रह्मोवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वीरभन्रस्य बुद्धिमान्।
उवाच विहसन् प्रीत्या विष्णुस्तत्र सुरेशवरः॥ ५७
विष्णुरुवाच
शृणु त्वं वीरभद्राद्य प्रवक्ष्यामि त्वदग्रतः।
न रूद्रविमुखं मां त्वं वद शंकरसेवकम्॥ ५८
अनेन प्रार्थितः पूर्व यज्ञार्थं च पुनः पुनः।
दक्षेणाविदितार्थेन कर्मनिष्ठेन मौढ्यतः॥ ५९
अहं भक्तपराधीनस्तथा सोऽपि महेश्वर:।
दक्षो भक्तो हि मे तात तस्मादत्रागतो मखे॥ ६०
शृणु प्रतिज्ञां मे वीर रुद्रकोपसमुद्धव।
रुद्र्तेजःस्वरूपो हि सुप्रतापालय प्रभो॥ ६९
अहं निवारयामि त्वां त्वं च मां विनिवारय।
तद्भविष्यति यद्भावि करिष्येऽहं पराक्रमम्॥ ६२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तवति गोविन्दे प्रहस्य स महाभुजः।
अवदत्सुप्रसन्नोऽस्म त्वं ज्ञात्वास्मत््रभोः प्रियम्॥ ६३
ततो विहस्य सुप्रीतो वीरभद्रो गणाग्रणीः ।
प्रश्रयावनतोऽवादीद्विष्णुं देवं हि तत्त्वत: ॥ ६४
वीरभद्र उवाच
तव भावपरीक्षार्थमित्युक्तं मे महाप्रभो।
इदानीं तत्त्वतो वच्मि श्रृणु त्वं सावधानतः॥ ६५
यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा त्वं च तथा शिव: ।
इति वेदा वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे॥ ६६
फिर भी हे महाबाहो! आप युद्धकी कामनासे
आगे स्थित हैं। यदि आप [इस युद्धभूमिमें] खडे रह
गये तो मैं आपको उस स्थानपर भेज दूँगा, जहाँ
पुनः लौटना सम्भव नहीं है॥ ५६॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] उन वीरभद्रकी
इस बातको सुनकर बुद्धिमान् सुरेश्वर वि
प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहने लगे- ॥ ५७॥
विष्णु बोले-हे वीरभद्र! आज आपके सामने
मैं जो कह रहा हूँ, उसको सुनिये । आप मुझ शंकरके
सेवकको रुद्रविमुख मत कहिये॥ ५८॥
कर्ममें निष्ठा रखनेवाले अज्ञानी इन दक्षे
मूर्खतावश पहले मुझसे यज्ञके लिये बार-बार प्रार्थना
की थी॥५९॥
मैं भक्तके अधीन हूँ और वे भगवान् महेश्वर
भी भक्तके अधीन हैं। हे तात! दक्ष मेरे भक्त हैं,
इसलिये मैं यज्ञमें आया हूँ॥ ६०॥
रुद्रके कोपसे उत्पन्न होनेवाले हे वीर! हे महान्
प्रतापके आलय! हे प्रभो! आप रुद्रतेजस्वरूप हैं,
आप मेरी प्रतिज्ञा सुनिये ॥ ६१॥
मैं [यज्ञकी रक्षाके लिये] आपसे युद्ध करूँगा
और आप भी [इस यज्ञके विध्वंसके लिये] मुझसे
युद्ध कीजिये। जो होनहार होगा, वह होगा, मैं
अवश्य ही पराक्रम प्रकट करूँगा॥ ६२॥
ब्रह्माजी बोले_विष्णुके इस प्रकार कहनेपर
महाबाहु वीरभब्रने हँसते हुए कहा--[हे विष्णो] मैं
आपको अपने प्रभु शिवका प्रिय जानकर अत्यन्त
प्रसन्न हूँ। तदनन्तर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने प्रसन्नतापूर्वक
हँसते हुए बड़े विनयसे भगवान् विष्णुसे कहार
॥ ६३-६४ ॥
वीरभद्र बोले-हे महाप्रभो! मैंने आपके
भावको परीक्षाके लिये ही ऐसा वचन कहा था, अ
मैं यथार्थ बात कह रहा हँ. उसको आप
सुनिये॥ ६५॥
हे हरे! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं और जैसे
आप हैं, वैसे शिव हैं। शिवके आदेशसे वेद ऐसा है
कहते हैं॥ ६६॥
अ० ३७]
शिवाज्ञया वयं सर्वे सेवकाः शंकरस्य वै।
तथापि च रमानाथ प्रवादोचितमादरात्॥ ६७
ब्रह्मोवाच
वचनं तस्य वीरभद्रस्य सोऽच्युतः ।
प्रहस्य चेदं प्रोवाच वीरभद्रहितं वचः ॥ ६८
विष्णुरुवाच
युद्धं कुरु महावीर मया सार्धमशङ्कितः।
तवास्त्रः पूर्यमाणोऽहं गमिष्यामि स्वमाश्रमम्॥ ६९
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा हि विरम्यासौ सन्नद्घोऽभूद् रणाय च।
स्वगणैर्वीरभद्रोऽपि सन्नद्धोऽभून्महाबलः ॥ ७०
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४७९
हे रमानाथ! भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार
हम सब लोग उनके सेवक ही हैं, तथापि मैंने जो बात
कही है, वह इस वाद-विवादके अवसरके अनुकूल ही
है। आप प्रत्येक बातको आदरपूर्वक ही समझें ॥ ६७॥
ब्रह्माजी बोले--उन वीरभद्रका यह वचन
सुनकर भगवान् विष्णु हँसकर और उनके लिये
हितकर यह वचन कहने लगे ॥ ६८॥
विष्णु बोले-हे महाबीर! आप निःशंक होकर
मेरे साथ युद्ध कीजिये, आपके अस्त्रोंसे शरीरके भर
जानेपर ही मैं अपने आश्रमको जाऊँगा॥ ६९॥
ब्रह्माजी बोले ऐसा कहकर वे विष्णु चुप होकर
युद्धके लिये तैयार हो गये और महाबली वीरभद्र भी
अपने गणोंके साथ युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥ ७० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे विष्णुवीरभद्रसंवादो नाम पट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
विष्णुवीरभद्रसंवाद-वर्णन नामक छततीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥
— ore
अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः
गणोंसहित वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षवध, वीरभद्रका वापस कैलास पर्वतपर
जाना, प्रसन्न भगवान् शिवद्वारा उसे गणाध्यक्ष पद प्रदान करना
ब्रह्मोवाच
वीरभद्रोऽथ युद्धे वै विष्णुना स महाबलः।
संस्मृत्य शंकरं चित्ते सर्वापद्विनिवारणम्॥
आरुह्य स्यन्दनं दिव्यं सर्ववैरिविमर्दनः।
गृहीत्वा परमास्त्राणि सिंहनादं जगर्ज ह॥ २
विष्णुश्चापि महाघोषं पाञ्चजन्याभिधं निजम्।
दध्मौ बली महाशंखं स्वकीयान् हर्षयन्निव ३
तच्छुत्वा शंखनिह्णादं देवा ये च पलायिताः
रणं हित्वा गताः पूर्व ते द्रुतं पुनराययुः॥ ४
वीरभद्रगणैस्ते तु लोकपालाः सवासवाः।
सद्धं चक्रुस्तथा सिंहनादं कृत्वा बलान्विताः॥ ५
गणानां लोकपालानां दृन्धयुद्धं भयावहम्
अभवत्तत्र तुमुलं गर्जतां सिंहनादतः॥ ६
~
ब्रह्माजी बोले--सभी शत्रुओंके विनाशक,
महाबलवान् वीरभद्र भगवान् विष्णुके साथ युद्धमें
सभी प्रकारके दुःखोंको दूर करनेवाले भगवान्
शंकरका अपने हदयमें ध्यान करके दिव्य रथपर
आरूढ़ होकर बड़े महान् अस्त्रोंको लेकर सिंहके
समान गर्जन करने लगे॥ १-२॥
बलशाली विष्णु भी अपने योद्धाओंको उत्साहित
करते हुए महान् शब्द करनेवाले अपने पांचजन्य
नामक शंखको नजाने लगे॥ ३॥
उस शंखकी ध्वनिको सुनकर जो देवता पहले
युद्धभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए थे, वे तत्क्षण
लौटकर आ गये॥ ४॥
तब सेनासहित समस्त इन्द्र आदि लोकपाल
सिंहगर्जना करके वीरभद्रके गणोंके साथ युद्ध करने
लगे॥५॥
उस समय सिंहनाद करते हुए गणों एवं लोक-
पालोंके बीच भयंकर घनघोर द्वन्द्रयुद्ध छिड गया ॥ ६॥
४७२
श्रीशिवमहापुराण
[अ० ३७
नन्दिना युयुधे शक्रोऽनलो वै चाश्मना तथा ।
कुबेरोऽपि हि कूष्माण्डपतिना युयुधे बली ॥
तदेन्द्रेण हतो नन्दी वञ्रेण शतपर्वणा॥ ८
नन्दिना च हतः शक्रस्त्रिशूलेन स्तनान्तरे॥ ९
बलिनौ द्वावपि प्रीत्या युयुधाते परस्परम्।
नानाघातांश्च कुर्वन्तो नन्दिशक्रौ जिगीषया॥ १०
शक्त्या जघान चाश्मानं शुचिः परमकोपनः।
सोऽपि शूलेन तं वेगाच्छितधारेण पावकम्॥ ११
यमेन सह सङ्ग्रामं महालोको गणाग्रणीः ।
चकार तुमुलं वीरो महादेवं स्मरन्मुदा॥ १२
नैतेन समागम्य चंडश्च बलवत्तर: ।
युयुधे परमास्त्रैश्च नै्ऋतिं निविडम्बयन्॥ १३
वरुणेन समं वीरो मुंडश्चैव महाबलः।
युयुधे परया शक्त्या त्रिलोकीं विस्मयन्निव॥ १४
वायुना च हतो भृङ्गी स्वास्त्रेण परमौजसा।
भृङ्गिणा च हतो वायुस्त्रिशूलेन प्रतापिना॥ १५
कुबेरेणैव सङ्गम्य कूष्मांडपतिरादरात्।
युयुधे बलवान् वीरो ध्यात्वा हृदि महेश्वरम्॥ १६
योगिनीचक्रसंयुक्तो भैरवीनायको महान्।
विदार्य देवानखिलान् पपौ शोणितमद्भुतम्॥ १७
षेत्रपालास्तथा तत्र बुभुक्षुः सुरपुङ्गवान्।
काली चापि विदायेंव तान्पपौ रुधिरं बहु॥ १८
अथ विष्णुर्महातेजा युयुधे तैश्च शत्रुहा।
चक्रं चिक्षेप वेगेन दहन्निव दिशो दश॥ १९
. क्षेत्रपाल: समायान्तं चक्रमालोक्य वेगतः।
तत्रागत्यागतो वीरश्चाग्रसत्सहसा बली॥ २०
इन्द्र नन्दीके साथ युद्ध करने लगे, अभि
अश्माके साथ और बलशाली कुबेर कृष्माण्डपत्िके
साथ युद्ध करने लगे। तब इन्द्रने सौ पर्ववाले जसे
नन्दीपर प्रहार किया। नन्दीने भी त्रिशूलसे इन्र
छातीमें प्रहार किया ॥ ७-९ ॥
बलवान् इन्द्र और नन्दी दोनों एक-दूसरेको
जीतनेकी इच्छासे अनेक प्रकारके प्रहार करते हुए
परस्पर प्रीतिपूर्वक लड़ने लगे॥ १०॥
अत्यन्त क्रोधयुक्त अग्निने अपनी शक्तिसे अश्माफ्
प्रहार किया तथा उसने भी अग्निपर बड़े वेगसे तीक्ष्ण
धारवाले त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ११॥
गणोंमें श्रेष्ठ यूथपति महालोक प्रीतिपूर्वक
शिवजीका ध्यान करते हुए यमराजके साथ घनघोर
युद्ध करने लगे॥ १२॥
महान् बलशाली चण्ड आ करके निर्क्रतिको
तिरस्कृत करते हुए बड़े-बड़े अस्त्रोंसे उनके साथ युद्ध
करने लगे॥ १३॥
महाबलवान् मुण्ड भी त्रिलोकीको विस्मित
करते हुए अपनी उत्तम शक्तिसे वरुणके साथ युद्ध
करने लगे॥ १४॥
वायुने अपने परम तेजस्वी अस्त्रसे भृंगीको
आहत कर दिया और प्रतापी भृंगीने भी त्रिशूलमे
वायुपर प्रहार किया ॥ १५॥
वीर कूष्माण्डपतिने पहुँचकर हृदयमें आदरपूर्वक
शिवजीका ध्यान करके कुबेरके साथ युद्ध करना
प्रारम्भ किया ॥ १६॥
महान् भैरवीपति योगिनियोंके समूहको साथ
लेकर समस्त देवताओंको विदीर्ण करके विचित्र
रूपसे उनका रक्त पीने लगे॥ १७॥
क्षेत्रपाल श्रेष्ठ देवताओंका भक्षण करने लगे
और काली भी उन देवताओंको विदीर्णकर रक्त पीने
लगीं॥ १८॥
तब शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् वि
उनके साथ युद्ध करने लगे और उन्होंने दसों दिशाओंकी
दग्ध करते हुए वेगपूर्वक [ अपना] चक्र फेंका॥ १९॥
चक्रको वेगपूर्वक आते हुए देखकर
क्षेत्रपालने सहसा वहाँ पहुँचकर उस
कर लिया॥ २०॥
आ० ३७]
चक्रं ग्रसितमालोक्य विष्णुः परपुरक्षय:।
मुखं तस्य परामृज्य तमुद्गालितवानरिम्॥ २१
स्वचक्रमादाय महानुभावः
चुकोप चातीव भवैकभर्ता।
महाबली तैर्युयुधे प्रवीरैः
सङ्क्रद्धनानायुधधारकोऽस्त्रेः ॥२२
चक्रे महारणं विष्णुः तैः सार्थ युयुधे मुदा।
नानायुधानि संक्षिप्य तुमुलं भीमविक्रमम्॥ २३
अथ ते भेरवाद्याश्च युयुधुस्तेन भूरिशः।
नानास्त्राणि विमुञ्चन्तः संक्रुद्धाः परमौजसा॥ २४
इत्थं तेषां रणं दृष्ट्वा हरिणातुलतेजसा।
विनिवृत्य समागम्य तान्स्वयं युयुधे बली॥ २५
अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूच्छित: ।
युयुधे भगवांस्तेन वीरभद्रेण माधवः॥ २६
तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।
महावीराब्धिपत्योस्तु नानास्त्रधरयोर्मुने॥ २७
विष्णोयोगबलात्तस्य देहादेव सुदारुणाः।
शङ्खचक्रगदाहस्ता असंख्याताश्च जज्ञिरे॥ २८
ते चापि युयुधुस्तेन वीरभद्रेण भाषता।
विष्णुवत् बलवन्तो हि नानायुधधरा गणा: ॥ २९
तान्सर्वानपि वीरोऽसौ नारायणसमप्रभान्।
भस्मीचकार शूलेन हत्वा स्मृत्वा शिवं प्रभुम्॥ ३०
ततश्चोरसि तं विष्णु लीलयैव रणाजिरे।
जघान वीरभड्रो हि त्रिशूलेन महाबली॥ ३१
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४७३
शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले भगवान् विष्णुने अपने
चक्रको ग्रसित हुआ देखकर उसके मुखको मसलकर
उस शत्रुके मुखसे चक्रको उगलवा लिया॥ २१॥
तब संसारके एकमात्र स्वामी, महानुभाव तथा
महाबलवान् भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो उठे।
वे क्रोधित होकर अपने चक्र तथा अनेक प्रकारके
अस्त्रोंको लेकर उन अस्त्रोंसे उन महावीर गणोंके
साथ युद्ध करने लगे॥ २२॥
विष्णुने प्रचण्ड पराक्रमके साथ भयंकर महायुद्ध
किया। वे अनेक प्रकारके अस्त्र चलाकर प्रसन्नतापूर्वक
उनके साथ युद्ध कर रहे थे॥ २३॥
वे भैरव आदि गण भी अत्यधिक क्रोधमें भरकर
महान् ओजसे अनेक प्रकारके अस्त्रोंको छोड़ते हुए
उनके साथ युद्ध करने लगे॥ २४॥
इस प्रकार अतुलनीय तेजवाले विष्णुके साथ
होते हुए उनके युद्धको देखकर बलवान् वीरभद्र
लौटकर उनके पास पहुँचकर विष्णुके साथ स्वयं युद्ध
करने लगे॥ २५॥
उसके बाद महातेजस्वी माधव भगवान् विष्णु
अपने चक्रको लेकर कुपित हो उन वीरभद्रके साथ
युद्ध करने लगे॥ २६॥
हे मुने! [उस समय] अनेक प्रकारके अस्त्र
धारण करनेवाले महावीर वीरभद्र तथा सागरपति
विष्णु-उन दोनोंका रोमांचकारी घनघोर युद्ध होने
लगा॥ २७॥
विष्णुके योगबलसे उनके शरीरसे शंख, चक्र
और गदा हाथोंमें धारण किये हुए असंख्य वीरगण
प्रकट हो गये॥ २८॥
विष्णुके समान ही बलशाली तथा जाना प्रकारके
अस्त्रोंको धारण किये हुए वे वीरगण वार्तालाप करते
हुए वीरभद्रके साथ युद्ध करने लगे॥ २९॥
वीरभद्रने भगवान् शंकरका स्मरण करके विष्णुके
समान तेजस्वी उन सभीको अपने त्रिशूलसे मारकर
भस्म कर दिया॥ ३०॥
तत्पश्चात् उन महाबली वीरभद्रने युद्धभूमिमें
ही लीलापूर्वक विष्णुकी छातीपर त्रिशूलसे प्रहार
किया॥ ३१॥
४ड७ड
तेन घातेन सहसा विहतः पुरुषोत्तम: ।
पपात च तदा भूमौ विसंज्ञोऽभून्मुने हरिः॥ ३
ततो जज्ञेऽद्लुतं तेजः प्रलयानलसन्निभम्।
त्रैलोक्यदाहकं तीव्रं वीराणामपि भीकरम्॥ ३३
क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमान् पुनरुत्थाय स प्रभुः।
प्रहरतु चक्रमुद्यम्य ह्यातिष्ठत्पुरुषर्षभः॥ ३४
तस्य चक्रं महारोंद्रं कालादित्यसमप्रभम्।
व्यष्टम्भयददीनात्मा वीरभद्रः शिवः प्रभुः॥ ३५
मुने शंभोः प्रभावात्तु मायेशस्य महाप्रभोः ।
न चचाल हरेश्चक्रं करस्थं स्तंभित श्रुवम्॥ ३६
अथ विष्णुर्गणेशेन वीरभद्रेण भाषता।
अतिष्ठत् स्तंभितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः ॥ ३७
ततो विष्णुः स्तंभितो हि वीरभद्रेण नारद।
यज्चोपमन्त्रणमनुं निःस्तंभनकरं जपन्॥ ३८
ततः स्तंभननिर्मुक्तः शाङ्गधन्वा रमेश्वरः।
शाङ्ग जग्राह स क्रुद्धः स्वधनुः सशरं मुने॥ ३९
त्रिभिश्च धर्षितं बाणैस्तेन शार्ड्रधनुहरे:।
वीरभद्रेण तत्तात त्रिधाभूत्तत्क्षणान्मुने॥ ४०
अथ विष्णुर्महावाण्या बोधितस्तं महागणम्।
असह्यवर्चसं ज्ञात्वा हान्तर्धातुं मनो दधे॥ ४१
ज्ञात्वा च तत्सर्वमिदं भविष्यं
सतीकृतं दुष्प्रसहं
गताः स्वलोकं स्वगणान्वितास्तु
स्मृत्वा शिवं सर्वपतिं स्वतन्त्रम्॥ ४२
परेषाम्।
सत्यलोकगतश्चाहं पुत्रशोकेन पीडित:।
अचिन्तयं सुदुःखार्तो मया किं कार्यमद्य वै॥ ४३
श्रीशिवमहापुराण
[अ मा
हे मुने! पुरुषोत्तम श्रीहरि प्रहार
घायल होकर सहसा भूमिपर गिर पड़े और अच्च
हो गये॥ ३२॥
तब प्रलयाग्निके समान तीनों लोकोंको जला
देनेवाला और वीरोंको भयभीत करनेवाला अद्भुत तेज
उत्पन्न हुआ॥ ३३॥
पुरुषश्रेष्ठ श्रीमान् भगवान् विष्णु पुनः उठकर
क्रोधसे नेत्रोंको लाल किये हुए अपने चक्रको उठाका
[वीरभद्रको] मारनेके लिये खडे हो गये॥ ३४॥
तब दीनतारहित चित्तवाले शिवस्वरूप वीरभद्र
प्रलयकालीन आदित्यके समान महातेजस्वी उस चक्रक
स्तम्भित कर दिया॥ ३५॥
हे मुने! मायापति महाप्रभु शंकरके प्रभावसे
विष्णुके हाथमें स्थित चक्र चल नहीं पाया, वह
निश््चितरूपसे स्तम्भित हो गया था॥ ३६॥
तब भाषण करते हुए उन गणेश्वर वीरभद्रने
विष्णुको भी स्तम्भित कर दिया और वे शिखरयुक्
पर्वतके समान खड़े रह गये ॥ ३७॥
हे नारद! वीरभद्रने जब भगवान् विष्णुको
स्तम्भित कर दिया, तब यह देखकर याज्ञिको
स्तम्भनसे मुक्त करानेवाले मन्त्रका जप करके उन्हें
स्तम्भनसे मुक्त कर दिया॥ ३८॥
हे मुने! तदनन्तर स्तम्भनसे मुक्त होनेपर शाई
नामक धनुष धारण करनेवाले रमापतिने कुपित होकर
बाणसहित अपने धनुषको उठा लिया॥ ३९॥
हे तात! हे मुने! उन वीरभद्रने तीन बाणोंसे
विष्णुके शार्ङ्ग धनुषपर प्रहार किया और वह उसी
क्षण तीन टुकड़ोमें विभक्त हो गया ॥ ४०॥
तब महावाणीद्वारा बोधित हुए विष्णुने उन
महागण वीरभद्रको असह्य तेजसे सम्पन्न जानकर
अन्तर्धान होनेका मनमें विचार किया॥ ४१॥
सतीके द्वारा किये गये आत्मदाहके समरी
परिणामको, जो शत्रुओंके लिये असह्य था, जानकर सभी
लोग सबके स्वामी स्वतन्त्र शिवजीका स्मरण कर
अपने गणोके साथ अपने-अपने लोकको चले गये॥ ४१
मैं भी पुत्रके शोकसे पीड़ित हो सत्यलोक च
आया और अत्यन्त दुःखसे व्याकुल होकर |
करने लगा कि मुझे अब क्या करना चाहिये॥ ४
अ० ३७]
विष्णौ मयि गते चैव देवाश्च मुनिभिः सह।
विनिर्जिता गणैः सर्वे ये ते यज्ञोपजीविनः॥ ४४
क्ष्य विध्वस्तं च महामखम्।
मृगस्वरूपो यज्ञो हि महाभीतोऽपि दुद्रुवे ॥ ४५
तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति।
वीरभद्रः समादाय विशिरस्कमथाकरोत्॥ ४६
ततः प्रजापतिं धर्म कश्यपं च प्रगृह्य सः।
अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम्॥ ४७
मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महागणः।
जघान मूर्ध्नि पादेन दत्तं च मुनिपुङ्गवम्॥ ४८
सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च।
चिच्छेद करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान्॥ ४९
ततोऽन्यानपि देवादीन् विदार्य पृथिवीतले।
पातयामास सोऽयं वै क्रोधाक्रांतातिलोचनः॥ ५०
वीरभद्रो विदार्यापि देवान्मुख्यान्मुनीनपि।
नाभूच्छांतो द्रुतक्रोधः फणिराडिव मंडितः॥ ५१
वीरभन्रोदध्ृतारातिः केसरीव वनद्विपान्।
दिशो विलोकयामास कः कुत्रास्तीत्यनुक्षणम्॥ ५२
व्यपोथयद् भृगुं यावन्मणिभद्रः प्रतापवान्।
पदाक्रम्योरसि तदाकार्षीत्तच्छ्मश्रुलुञ्जनम्॥ ५३
चंडश्चोत्पाटयामास पूष्णो दंतान् प्रवेगतः।
शप्यमाने हरे पूर्व योऽहसदर्शयन्दतः॥ ५४
नन्दी भगस्य जेत्रे हि पातितस्य रुषा भुवि।
उजहार दक्षमक्ष्णा यः शपन्तमसूसुचत्॥ ५५
विडंबिता स्वधा तत्र सा स्वाहा दक्षिणा तथा।
मंत्रास्तंत्रास्तथा चान्ये तत्रस्था गणनायकैः ॥ ५६
ववृषुस्ते पुरीषाणि व्ितानाग्नौ रुषा गणाः।
अनिर्वाच्यं तदा चक्रुर्गणा वीरास्तमध्वरम्॥ ५७
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
ड७५
मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जानेपर जो भी
यज्ञोपजीबी देवता थे, मुनियोंसहित उन सबको
शिवगणोंने जीत लिया। उस उपद्रवको और महायज्ञको
विध्वस्त हुआ देखकर यज्ञदेव अत्यन्त भयभीत हो
मृगका रूप धारण करके भागने लगे॥ ४४-४५ ॥
मृगरूपमें आकाशकी ओर भागते हुए उन
यज्ञको वीरभद्रने पकड़कर सिरविहीन कर दिया ॥ ४६॥
उसके बाद महागण वीरभद्रने प्रजापति, धर्म,
कश्यप, अनेक पुत्रोंवाले मुनीश्वर अरिष्टनेमि, मुनि
अंगिरा, कृशाश्व तथा महामुनि दत्तके सिरपर पैरसे
प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥
प्रतापी वीरभद्रने सरस्वती तथा देवमाता अदितिकी
नासिकाके अग्रभागको अपने नखाग्रसे विदीर्ण कर
दिया । तत्पश्चात् क्रोधके कारण चढ़ी हुई आँखोंवाले
उन वीरभद्रने अन्यान्य देवताओंको भी विदीर्णकर
उन्हें पृथिबीपर गिरा दिया॥ ४९-५० ॥
मुख्य-मुख्य देवताओं और मुनियोंको विदीर्ण
कर देनेपर भी वे शान्त नहीं हुए। महान् क्रोधसे भरे
हुए वे नागराजकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥५१॥
जैसे सिंह वनके हाथियोंकी ओर देखता है,
उसी प्रकार शत्रुओंको मारकर भी वे वीरभद्र सभी
दिशाओंमें देखने लगे, कौन शत्रु कहाँ है॥५२॥
उसी समय प्रतापी मणिभद्रने भुगुको पटक दिया
और उनकी छातीपर पैरसे प्रहार करके उनकी दाढ़ी
नोंच ली॥ ५३॥
चण्डने बड़े वेगसे पूषाके दाँत उखाड़ लिये; जो
पूर्वकालमें महादेवजीको [दक्षद्वारा] शाप दिये जानेपर
दाँत दिखाकर हँस रहे थे॥ ५४॥
नन्दीने भगको रोषपूर्वक पृथ्वीपर गिरा दिया और
उनकी दोनों आँखें निकाल लीं; जिन्होंने [शिवको]
शाप देते हुए दक्षकी ओर नेत्रसे संकेत किया था॥ ५५॥
गणेश्वरोंने स्वधा, स्वाहा, दक्षिणा, मन्त्र, तन्त्र
तथा अन्य जो भी वहाँ उपस्थित थे, सबको तहस-
नहस कर दिया॥ ५६॥
उन गणोंने क्रोधित होकर वितानाग्निमें विष्ठाकी
वर्षा कर दी | इस प्रकार वीर गणोंने यज्ञकी ऐसी दुर्गति
कर दी, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५७॥
४७६
अन्तर्वेद्यन्तरगतं निलीनं तद्भयाद् बलात्।
आनिनाय समाज्ञाय वीरभद्रः स्वभूःसुतम्॥ ५८
'कपोलेऽस्य गृहीत्वा तं खड्गेनोपहतं शिर: ।
अभेद्यमभवत्तस्य तच्च योगप्रभावतः॥ ५९
अभेद्यं तच्छिरो मत्वा शस्त्रास्त्रैश्व तु सर्वशः।
करेण त्रोटयामास पद्भयामाक्रम्य चोरसि॥ ६०
तच्छिरस्तस्य दुष्टस्य दक्षस्य हरवैरिणः।
अग्निकुंडे प्रचिक्षेप वीरभद्रो गणाग्रणी:॥ ६१
रेजे तदा वीरभब्रस्त्रिशूलं भ्रामयन्करे।
क्रुद्धा रणाक्षसंवर्ताः प्रज्वाल्य पर्वतोपमाः॥ ६२
अनायासेन हत्वैतान् वीरभद्रस्ततोऽग्निना।
ज्वालयामास सक्रोधो दीप्ताग्निः शलभानिव ॥ ६३
'वीरभद्रस्ततो दग्धान् दृष्ट्वा दक्षपुरोगमान्।
अडट्टाइहासमकरोत् पूरयंश्च जगत्त्रयम्॥ ६४
वीरश्रिया वृतस्तत्र ततो नन्दनसंभवा।
पुष्पवृष्टिभूद्दिव्या वीरभद्रे गणान्विते॥ ६५
ववुर्गंधवहा: शीताः सुगन्धाः सुखदाः शनैः।
देवदुंदुभयो नेदुः सममेव ततः परम्॥ ६६
कैलासं स ययौ वीरः कृतकार्यस्ततः परम्।
विनाशितदूढध्ांतो भानुमानिव सत्वरम्॥ ६७
कृतकार्यं वीरभद्रं दृष्ट्वा संतुष्टमानसः।
शंभुर्वीरगणाध्यक्षं चकार परमेश्वर: ॥ ६८
श्रीशिवमहापुराण
[अ IIIT
ब्रह्मपुत्र दक्ष उनके भयके मारे अन्तर्वेदीके भीत
छिप गये थे, वीरभद्र पता लगाकर बलपूर्वक उडे
खींच लाये॥ ५८॥
उनका गाल पकड़कर उन्होंने उनके मस्तक
तलवारसे आघात किया, परंतु योगके प्रभावसे उनका
सिर फटा नहीं, अभेद्य ही रह गया॥५९॥
तब उनके सिरको अस्त्र-शस्त्रोंसे अभेद्य
उन्होने पैरॉसे दक्षकी छातीको दबाकर हाथसे सिरको
तोड़ दिया॥ ६०॥
तदनन्तर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने उन शिवद्रोही
दुष्ट दक्षके उस सिरको अग्निकुण्डमें डाल दिया ॥ ६१॥
उस समय वीरभद्र अपने हाथमे त्रिशूल घुमाते
हुए इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो युद्धभूमिमें
संवर्ताग्नि सबको जलाकर क्रोधमें भरी हुई पर्वतके
समान स्थित हो॥ ६२॥
जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि पतिंगोंको जला
डालती है, उसी प्रकार वीरभद्रने क्रोधित होकर बिना
परिश्रम किये ही इन सबको मारकर अग्निसे जला
डाला॥६३॥
तत्पश्चात् दक्ष आदिको जलाकर वीरोंकी
शोभासे युक्त, त्रिलोकीको गुंजित करते हुए वीरभद्रने
भयानक अट्टहास किया। तदनन्तर वहाँ गणोंसहित
वीरभद्रके ऊपर नन्दनवनकी दिव्य पुष्पवृष्टि होने
लगी ॥ ६४-६५ ॥
शीतल, सुगन्धित तथा सुखदायक हवाएँ धीरे
धीरे बहने लगीं और उसीके साथ देवताओंकी
दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ६६॥
तदनन्तर घोर अन्धकारका नाश करनेवाले सूर्यकी
भाँति वे वीरभद्र दक्ष और उनके यज्ञका विनाश करके
कृतकार्यं हो तुरंत कैलासपर्वतपर चले गये ॥ ६७॥ |
कार्यको पूर्ण किये हुए वीरभद्रको देखर्क |
| शिवजी मन-ही-मन प्रसन्न हुए और उन्हात
बीरभद्रको गणोंका अध्यक्ष बना दिया॥६८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्रितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे यज्ञविध्वंसवर्णने नाम सप्तत्रिशोऽ ध्यायः ॥ १४
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें
यज्ञविध्वंसवर्णन नामक सँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
Tee
अ० ३८]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) Co
अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः
दधीचि मुनि और राजा ्षुवके विवादका इतिहास, शुक्राचार्यद्वारा दधीचिको
महामृत्युंजयमन्त्रका उपदेश, मृत्युंजयमन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिको अवध्यताकी प्राप्ति
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विधेरमितधीमतः।
पप्रच्छ नारदः प्रीत्या विस्मितस्तं द्विजोत्तमः ॥
नारद उवाच
शिवं विहाय दक्षस्य सुरेर्यज्ञ॑ हरिर्गतः।
हेतुना केन तद् ब्रूहि यत्रावज्ञाभवत्ततः॥ २
जानाति किं स शंभुं नो हरिः प्रलयविक्रमम्।
रणं कथं च कृतवान् तद्गणेरबुधो यथा॥ ३
एष मे संशयो भूयांस्तं छिंधि करुणानिध्षे।
चरितं ब्रूहि शंभोस्तु चित्तोत्साहकरं प्रभो॥ ४
ब्रह्मोवाच
द्विजवर्य शृणु प्रीत्या चरितं शशिमौलिनः।
यत्पृच्छते कुर्वतश्च सर्वसंशयहारकम्॥ ५
दधीचस्य मुनेः शापाद् भ्रष्टज्ञानो हरिः पुरा।
सामरो दक्षयज्ञं वै गतः क्षुवसहायकृत्॥ ६
~
नारद उवाच
किमर्थ शप्तवान्विष्णुं दधीचो मुनिसत्तमः।
'कोऽपकारः कृतस्तस्य हरिणा तत्सहायिना॥ ७
ब्रह्मोवाच
समुत्पन्नो महातेजा राजा क्षुव इति स्मृतः।
अभून्मित्रं दधीचस्य मुनीन्द्रस्य महाप्रभोः॥ ८
चिरात्तप:प्रसड़ादै वादः क्षुवदधीचयोः।
महानर्थकरः ख्यातस्त्रिलोकेष्वभवत्पुरा॥ ९
तत्र त्रिवर्णतः श्रेष्ठो विप्र एव न संशयः।
इति प्राह दधीचो हि शिवभक्तस्तु वेदवित्॥ १०
तच्छुत्वा वचनं तस्य दधीचस्य म्रहामुनेः।
क्षुवः प्राहेति नृपतिः श्रीमदेन विमोहितः॥ ११
सूतजी बोले--अत्यन्त बुद्धिमान् ब्रह्माका यह
वचन सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद विस्मित होकर
प्रसन्नतापूर्वक उनसे पूछने लगे॥ १॥
नारदजी बोले [हे ब्रह्मन्!] भगवान् विष्णु
शिवजीको छोड़कर [अन्य] देवताओंके साथ दक्षके
यज्ञमें किस कारणसे गये, जहाँ उनका तिरस्कार ही
हुआ, इसे बताइये। क्या वे प्रलयकारी पराक्रमवाले
शंकरको नहीं जानते थे, उन्होंने अज्ञानीकी भाँति
शिवगणोंके साथ युद्ध क्यों किया ?॥ २-३॥
हे करुणानिधे! यह मुझे बहुत बड़ा सन्देह है,
आप उसे दूर कीजिये और प्रभो! मनमें उत्साह पैदा
करनेवाले शिवचरित्रको भी कहिये॥ ४॥
ब्रह्माजी बोले-हे द्विजवर्य! आप प्रेमपूर्वक
शिवचरित्रका श्रवण कीजिये, जो पूछनेवालों तथा
कहनेवालोंके सभी सन्देहोंको दूर करता है॥५॥
पूर्वकालमें दधीचि मुनिने राजा क्षुवकी
सहायता करनेवाले श्रीहरिको शाप दे दिया था,
इसलिये भ्रष्ट ज्ञानवाले बे विष्णु देवताओंके साथ
दक्षके यज्ञमें चले गये॥ ६॥
नारदजी बोले [हे ब्रह्मन्!] मुनियोंमें श्रेष्ठ
दधीचिने भगवान् विष्णुको शाप क्यों दिया ? क्षुवकी
सहायता करनेवाले विष्णुने उनका कौन-सा अपकार
किया था॥ ७॥
ब्रह्माजी बोले--क्षुव नामसे प्रसिद्ध एक महा-
तेजस्वी राजा उत्पन्न हुए थे। वे महाप्रभावशाली
मुनीश्वर दधीचिके मित्र थे। पूर्वकालमें लम्बे समयसे
तपके प्रसंगको लेकर क्षुव और दधीचिमें महान्
अनर्थकारी विवाद आरम्भ हो गया, जो तीनों लोकोंमें
विख्यात हो गया॥ ८-९॥
उस विवादमें वेदविद् शिवभक्त दधीचिने कहा
कि तीनों वर्णोमें ब्राह्मण ही श्रेष्ठ हैं, इसमें सन्देह
नहीं ॥ १० ॥
महामुनि दधीचिकी यह बात सुनकर धनके मदसे
विमोहित राजा क्षुवने इस प्रकार प्रतिवाद किया॥ ११॥
ड७८
श्रीशिवमहापुराण
[ अ SS VR णा १ ९
श्ुव उवाच
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृप: ।
तस्मान्नृपो वरिष्ठो हि वर्णाश्रमपतिः प्रभुः ॥ १२
सर्वदेवमयो राजा श्रुतिः प्राहेति तत्परा।
महती देवता या सा सोऽहमेव ततो मुने॥ १३
तस्माद्विप्राद्दरो राजा च्यावनेय विचार्यताम्।
नावमन्तव्य एवातः पूज्योऽहं सर्वथा त्वया॥ १४
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुवस्य मुनिसत्तमः।
भरुतिस्मृतिविरूद्धं तं चुकोपातीव भार्गवः॥ १५
अथ क्रुद्धो महातेजा गोरवाच्चात्मनो मुने।
अताडयत्क्षुवं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टितः॥ १६
वज्रेण तं च चिच्छेद दधीचं ताडितः क्षुवः।
जगर्जातीव संक्रुद्धो ब्रह्मांडाधिपतिः कुधी: ॥ १७
पपात भूमौ निहतो तेन वज्रेण भार्गव: ।
शुक्र सस्मार क्षुवकृद्धार्गवस्य कुलंधरः॥ १८
शुक्रोऽथ संधयामास ताडितं च क्षुवेन तु।
योगी दधीचस्य तदा देहमागत्य स द्रुतम्॥ १९
संधाय पूर्ववद्दे दधीचस्याह भार्गव: ।
शिवभक्ताग्रणीर्मृत्युञ्जयविद्याप्रवर्तकः ॥२०
शुक्र उवाच
दधीच तात संपूज्य शिवं सर्वेश्वरं प्रभुम्।
महामृत्युञ्जयं मन्त्रं श्रौतमग्रथं वदामि ते॥ २१
त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम्।
त्रिमंडलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेशवरम्॥ २२
क्षुव बोले-राजा [इन्द्र आदि]
लोकपालोंके स्वरूपको धारण करता है तथा
वर्णों और आश्रमोंका स्वामी एवं प्रभु है, इसलिये
राजा ही सबसे श्रेष्ठ है। राजाकी श्रेष्ठता
करनेवाली श्रुति भी कहती है कि राजा सर्वदेवमय है।
इसलिये हे मुने! जो सबसे बड़ा देवता है, वह मैं हौ
हूँ॥ १२-१३॥
अतः हे च्यवनपुत्र! राजा ब्राह्मणसे श्रेष्ठ होता
है, आप [इस सम्बन्धमें] विचार करें और मेर
अनादर न करें, मैं आपके लिये सर्वथा पूजनीय
हूँ॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले-उन क्षुवका श्रुतियों और
स्मृतियोंके विरुद्ध यह मत सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि
अत्यन्त कुपित हो उठे॥ १५॥
तब हे मुने! आत्मगौरवके कारण कुपित हुए
महातेजस्वी दधीचिने क्षुवके मस्तकपर [अपनी]
बायीं मुट्ठीसे प्रहार किया॥ १६॥
तत्पश्चात् [दधीचिके द्वारा] ताड़ित किये गये
ब्रह्माण्डाधिपति दुष्ट क्षुव अत्यन्त कुपित हो गरज उठे
और उन्होंने वज़से दधीचिका सिर काट डाला॥ १७॥
उस वज़रसे आहत हो दधीचि पृथिवीपर गिर
पड़े। क्षुवके द्वारा काटे गये भार्गववंशधर दधीचिमे
[गिरते समय] शुक्राचार्यका स्मरण किया॥ १८॥
तब योगी शुक्राचार्यने आकर क्षुवके द्वा
दधीचिके काटे गये शरीरको तुरंत जोड़ दिया॥ १९॥
दधीचिकी देहको पूर्वकी भाँति ठीक करके
शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजयविद्याके प्रवर्तक
शुक्राचार्य उनसे कहने लगे ॥ २०॥
शुक्र बोले-हे तात! दधीचि! मैं स
| पूजन करके श्रेष्ठ वैदिक महामृत्युंजत
मन्त्र*्का आपको उपदेश देता हूँ॥ २१॥
['त्र्यम्बकं यजामहे'] हम त्रिलोकीके पि
तीन नेत्रवाले, तीनों मण्डलों (सूर्य, सोम तथा अग) |
के पिता तथा तीनों गुणों (सत्त्व, रज तथा तम)”
स्वामी महेश्वरका पूजन करते हैं॥ २२॥
* त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्थनान्मृत्योरमुक्षीय मामृतात्॥ (यजुर्वेद ३।६०)
अ० ३८]
त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।
त्रिदिवस्य त्रिबाहोश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः॥ २३
ब्रिदेवस्य महादेवः सुगन्थि पुष्टिवर््धनम्।
सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणेषु कृतौ यथा॥ २४
इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च।
पुष्पे सुगंधिवत्सूरः सुगंधिरमरेश्वरः॥ २५
पुष्टिश्च प्रकृतेर्यस्मात्पुरुषाद् वै द्विजोत्तम।
महदादिविशेषान्तविकल्पश्चापि सुव्रत॥ २६
विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने।
इन्द्रियाणां च देवानां तस्माद् वै पुष्टिवर्धनः ॥ २७
तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसापि वा।
स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च प्रजायते॥ २८
सत्येनान्येन सूक्ष्माग्रान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्।
बंधमोक्षकरो सस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः॥ २९
मृतसञ्जीवनीमन्त्रो मम सर्वोत्तमः स्मृतः।
एवं जपपरः प्रीत्या नियमेन शिवं स्मरन्॥ ३०
जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्रयैवं जलं पिब दिवानिशम्
शिवस्य सन्निधो ध्यात्वा जास्ति मृत्युभयं क्वचित् ॥ ३१
कृतवा न्यासादिकं सर्व संपूज्य विधिवच्छिवम्।
संविधायेदं निर्व्यग्रः शंकरं भक्तवत्सलम्॥ ३२
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४७९
जो त्रितत्त्व ( आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व),
त्रिवहि (आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि) तथा
पृथिवी, जल, तेज-इन तीनों भूतोंके एवं जो त्रिदिव
(स्वर्ग), त्रिबाहु तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन
तीनों देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी हैं । ' सुगन्धिं
पुष्टिवर्धनम् [ महामृत्युंजयमन्त्रका यह द्वितीय चरण
है] जैसे फूलोंमें उत्तम गन्ध होती है, उसी प्रकार वे
भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त कृत्योंमें,
इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देवोंमें और गणोंमें उनके प्रकाशक
सारभूत आत्माके रूपमें व्याप्त हैं । अतएव सुगन्धयुक्त
एवं सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर हैं॥ २३-२५ ॥
हे द्विजोत्तम! जिन महापुरुषसे प्रकृतिकी
पुष्टि होती है। हे सुव्रत! महत् तत्त्वसे लेकर
विशेषपर्यन्त विकल्पके जो स्वरूप हैं। हे महामुने!
जो विष्णु, पितामह, मुनिगणों एवं इन्द्रियोंसहित
समस्त देवताओंकी पुष्टिका वर्धन करते हैं, इसलिये
बे पुष्टिवर्धन हैं ॥ २६-२७॥
वे देव रुद्र अमृतस्वरूप हैं। जो पुण्यकर्मसे,
तपस्यासे, स्वाध्यायसे, योगसे अथवा ध्यानसे उनकी
आराधना करता है, उसे वे प्राप्त हो जाते हैं ॥ २८॥
जिस प्रकार ककड़ीका पौधा अपने फलसे स्वयं
ही लताको बन्धनमें बाँधे रखता है और पक जानेपर
स्वयं ही उसे बन्धनसे मुक्त कर देता है, ठीक उसी
प्रकार बन्धमोक्षकारी प्रभु सदाशिव अपने सत्यसे
जगतूके समस्त प्राणियोंको मृत्युके पाशरूप सूक्ष्म
बन्धनसे छुड़ा देते हैं॥ २९॥
यह मृतसंजीवनी मन्त्र है, जो मेरे मतसे सर्वोत्तम
है। हे दधीचि! आप मेरे द्वारा दिये गये इस मन्त्रका
'शिवध्यानपरायण होकर नियमसे जप कीजिये ॥ ३०॥
जप और हवन भी इसी मन्त्रसे करें और इसी
मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर दिन और रातमें जल भी
पीजिये तथा शिव-विग्रहके पास स्थित हो उन्हींका
ध्यान करते रहिये, इससे कभी भी मृत्युका भय नहीँ
रहता॥ ३१॥
सब न्यास आदि करके विधिवत् शिवकी
पूजा करके व्यग्रतारहित हो भक्तवत्सल सदाशिवका
ध्यान करें॥ ३२॥
४८०
श्रीशिवमहापुराण
[आ III ८
ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि यथा ध्यात्वा जपेन्मनुम्।
सिद्धमन्त्रो भवेद्धीमान् यावच्छंभुप्रभावतः॥ ३
हस्तांभोजयुगस्थकुं भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ।
अक्षस्त्रङ्मृगहस्तमंबुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्त्रवत्-
पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम्॥ ३४
ब्रह्मोवाच
उपदिश्येति शुक्रः तं दधीचिं मुनिसत्तमम्
स्वस्थानमगमत्तात संस्मरन् शंकरं प्रभुम्॥ ३५
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दधीचो हि महामुनिः।
वनं जगाम तपसे महाप्रीत्या शिवं स्मरन्॥ ३६
तत्र गत्वा विधानेन महामृत्युञ्जयाभिधम्।
तं मनुं प्रजपन् प्रीत्या तपस्तेपे शिवं स्मरन्॥ ३७
तन्मनुं सुचिरं जप्त्वा तपसाराध्य शंकरम्।
शिवं संतोषयामास महामृत्युञ्जयं हि सः॥ ३८
अथ शंभुः प्रसन्नात्मा तज्पाद्भक्तवत्सलः।
आविर्बभूव पुरतस्तस्य प्रीत्या महामुने॥ ३९
तं दृष्ट्वा स्वप्रभुं शंभुं स मुमोद मुनीश्वरः।
प्रणम्य विधिवद्भक्त्या तुष्टाव सुकृताञ्जलिः ॥ ४०
अथ प्रीत्या शिवस्तात प्रसन्नशच्यावनिं मुने।
वरं ब्रूहीति स प्राह सुप्रसन्नेन चेतसा॥ ४१
अब मैं सदाशिवके ध्यानको बता रहाई
जिसके अनुसार उनका ध्यान करके मन्त्रजप
चाहिये। इस प्रकार [जप करनेसे] बुद्धिमान् पुरुष
भगवान् शिवके प्रभावसे उस मन्त्रको सिद्ध कर लेत
है॥ ३३॥
[ध्यानमन्त्रका अर्थ इस प्रकार है] अपने रे
करकमलोंमें स्थित दोनों कुम्भोंसे जलको निकालकर
ऊपरवाले दोनों हाथोंसे सिरपर अभिषेक करते
हुए, कुम्भसहित अपने अन्य दोनों हाथोंको अपने
गोदमें धारण करते हुए, शेष दो हाथोंसे अक्षमाला
तथा मृगमुद्रा धारण करनेवाले, कमलके आसनफ़्
विराजमान, सिरपर स्थित चन्द्रमासे टपकतते
हुए अमृतकणसे भीगे हुए शरीरवाले तथा तीन
नेत्रवाले पार्वतीसहित महामृत्युंजय भगवान्का मैं
ध्यान करता हूँ॥ ३४॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! मुनिश्रेष्ठ दधीचिको
इस प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान् शंकरका
स्मरण करते हुए अपने स्थानको चले गये॥ ३५॥
उनको बात सुनकर महामुनि दधीचि बड़े प्रेमसे
शिवजीका स्मरण करते हुए तपस्याके लिये वनमें
गये॥ ३६॥
वहाँ जाकर वे विधिपूर्वक महामृत्युंजय नामक
उस मन्त्रका जप करते हुए और प्रेमपूर्वक शिवका
चिन्तन करते हुए तपस्या करने लगे॥ ३७॥
दीर्घकालतक उस महामृत्युंजय मन्त्रका जप
करके तपस्याद्वारा शंकरकी आराधना करके उन्हाने
शिवको प्रसन्न कर लिया॥ ३८॥
हे महामुने! तब उस जपसे प्रसन्नचित्त हु
भक्तवत्सल शिव उनके सामने प्रेमपूर्वक प्रकट
गये॥ ३९॥
अपने प्रभु शम्भुका [साक्षात्] दर्शन करके वे
मुनीश्वर आनन्दित हो गये और उन्हें विधिपूर्वर्क |
प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे स्तर्व* |
करने लगे॥ ४०॥ मु
हे तात! हे मुने! उसके बाद मुत” |
प्रेमसे आनन्दित उन शिवने अत्यन्त वचत
दधीचिसे कहा--वर माँगो। शिवका वह १
अ० ३८]
तच्छ्रत्वा शंभुवचनं दधीचो भक्तसत्तमः।
साञ्जलिर्नतकः प्राह शंकरं भक्तवत्सलम्॥ ४२
दधीच उवाच
देवदेव महादेव मह्यं देहि वरत्रयम्।
बज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं हि सर्वतः॥ ४३
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा प्रसन्नः परमेश्वरः।
बरत्रयं ददौ तस्मै दधीचाय तथास्त्विति॥ ४४
बरत्रयं शिवात्प्राप्य सानंदश्च महामुनिः।
क्षुवस्थानं जगामाशु वेदमार्गे प्रतिष्ठितः ॥ ४५
प्राप्यावध्यत्वमुग्रात्स वज्रास्थित्वमदीनताम्।
अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि॥ ४६
क्षुवो दधीचं वज्रेण जघानोरस्यथो नृपः।
क्रोधं कृत्वा विशेषेण विष्णुगौरवगर्वितः॥ ४७
नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मन: ।
प्रभावात्परमेशस्य धातृपुत्रो विसिस्मिये॥ ४८
दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च
वज्रस्य चात्यन्तपरप्रभावम्।
क्षुवो दधीचस्य मुनीश्वरस्य
विसिस्मिये चेतसि धातृपुत्रः॥ ४९
आराधयामास हरिं मुकुन्द
मिन्द्रानुजं काननमाशु
प्रपनपालश्च पराजितो हि
दधीचमृत्युञ्जयसेवकेन ॥ ५०
पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् मधुसूदन: ।
प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वज:॥ ५१
दशनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम्
तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम्॥
सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराष्यैः
स्तुत्वा स्तुतं
विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या
जनार्दनाय प्रणिपत्य
गत्वा।
मूर्ध्ना॥ ५३
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रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४८१
सुनकर भक्तश्रेष्ठ दधीचि दोनों हाथ जोड़कर
नतमस्तक हो भक्तवत्सल शंकरसे कहने लगे--
॥ ४१-४२॥
दधीचि बोले-हे देवदेव! हे महादेव!
मुझे तीन वर दीजिये, मेरी हड्डी वज्र हो जाय, कोई
भी मेरा वध न कर सके और मैं सर्वथा अदीन
रहूँ॥ ४३॥
ब्रह्माजी बोले--उनके कहे हुए वचनको सुनकर
प्रसन्न हुए परमेश्वरने "तथास्तु' कहा और उन
दधीचिको तीनों वर दे दिये। शिवजीसे तीन वर पाकर
वेदमार्गमें प्रतिष्ठित महामुनि आनन्दमग्न हो गये और
शीघ्र ही राजा क्षुवके स्थानपर गये ॥ ४४-४५ ॥
उग्र स्वभाववाले महादेवजीसे अवध्यता,
अस्थिके वज्रमय होने और अदीनताका वर पाकर
दधीचिने राजेनद्र क्षुबके मस्तकपर पादमूलसे प्रहार
किया॥ ४६॥
तब विष्णुकी महिमासे गर्वित राजा क्षुवने भी
क्रोधित होकर दधीचिकी छातीपर वज़से प्रहार
'किया॥ ४७॥
वह वज्र परमेश्वर शिवके प्रभावसे
महात्मा दधीचिका [कुछ भी] अनिष्ट न कर
सका, इससे ब्रह्मपुत्र क्षुवको आश्चर्य हुआ। मुनीश्वर
दधीचिकी अवध्यता, अदीनता तथा वञ्रसे बढ़कर
प्रभाव देखकर ब्रह्मकुमार क्षुवके मनमें बड़ा विस्मय
हुआ॥ ४८-४९ ॥
वे शरणागतपालक नरेश मृत्युंजयके सेवक
दधीचिसे पराजित होकर शीघ्र ही वनमें जाकर इन्द्रके
छोटे भाई मुकुन्द हरिकी आराधना करने लगे॥ ५०॥
उनकी पूजासे सन्तुष्ट होकर गरुडध्वज भगवान्
मधुसूदनने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की ॥ ५१॥
उस दिव्य दृष्टिसे गरुडध्वज जनार्दन देवका
दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके क्षुवने प्रिय
वचनोंके द्वारा उनकी स्तुति की॥५२॥
इस प्रकार इन्द्र आदिसे स्तुत उन अजेय ईश्वर
देवका पूजन और स्तवन करके वे [राजा क्षुव]
भक्तिभावसे उनकी ओर देखकर मस्तक झुकाकर
प्रणाम करके उन जनार्दनसे कहने लगे--॥ ५३॥
ड
भगवन् ब्राह्मणः कश्चिहरधीच इति विश्रुतः ।
धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुराभवत्॥
अवध्यः सर्वदा सवैः शंकरस्य प्रभावतः।
तमाराध्य महादेवं मृत्युञ्जयमनामयम्॥ ५५
सावज्ञं वामपादेन मम मूर्ध्नि सदस्यपि।
ताडयामास वेगेन स दधीचो महातपाः॥ ५६
उवाच मां च गर्वेण न बिभेमीति सर्वतः।
मृत्युञ्जयाप्तसुवरो गर्वितो ह्यातुलं हरे॥ ५७
ब्रह्मोवाच
अथ ज्ञात्वा दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः ।
सस्मारास्य महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः॥ ५८
एवं स्मृत्वा हरिः प्राह क्षुं विधिसुतं द्रुतम्।
विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमण्वपि कुत्रचित्॥ ५९
विशेषाद् रुद्रभक्तानां भयं नास्ति च भूपते।
दुःखं करोति विप्रस्य शापार्थं स सुरस्य मे॥ ६०
भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरेश्वरात्।
विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च॥ ६१
तस्मात्समेत्य राजेन्द्र सर्वयज्ञो न भूयते।
करोमि यत्नं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते॥ ६२
श्रत्वा वाक्यं क्षुवः प्राह तथास्त्विति हरेनृप:।
तस्थौ तत्रैव तत््रीत्या तत्कामोत्सुकमानसः॥ ६३
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय
श्रीशिवमहापुराण
राजा बोले-हे भगवन उपाय
[अ० ३८
प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हैं, जो धर्मके ज्ञाता तथा श
स्वभाववाले हैं, वे पहले मेरे मित्र थे॥५४॥
वे निर्विकार मृत्युंजय महादेवकी आरा
करके उन्हीं शिवजीके प्रभावसे सबके द्वारा
लिये अवध्य हो गये हैं ॥ ५५॥
[एक दिन] उन महातपस्वी दधीचिने भ
सभामें अपने बायें पैरसे मेरे मस्तकपर बड़े वेगे
अवहेलनापूर्वक प्रहार किया और बड़े गर्वसे मुझसे
कहा--मैं किसीसे नहीं डरता। हे हरे! वे मृत्युंजय
उत्तम वर पाकर अनुपम गर्वसे भर गये हैं॥ ५६-५७
ब्रह्माजी बोले-- [ हे नारद!] महात्मा दधीचिकी
अवध्यताको जानकर श्रीहरिने महेश्वरके अतुलित
प्रभावका स्मरण किया। इस प्रकार स्मरण करके
विष्णु ब्रह्मपुत्र क्षुवसे शीघ्र बोले--राजेन्द्र ! ब्राह्मणोंको
कहीं भी थोड़ा-सा भी भय नहीं है॥ ५८-५९॥
हे भूपते! विशेष रूपसे रुद्रभक्तोंके लिये तो भव
है ही नहीं। यदि मैं आपकी ओरसे कुछ करूँ तो
ब्राह्मण दधीचिको दु:ख होगा और वह मुझ-जैसे
देवताके लिये भी शापका कारण बन जायगा॥ ६०॥
हे राजेन्द्र! दधीचिके शापसे दक्षके यजमें
सुरेश्वर शिवके द्वारा मेरा विनाश होगा और फिर
उत्थान भी होगा॥ ६१॥
हे राजेनद्र! दधीचिके शापके कारण ही सभी
देवताओं, मेरे तथा ब्रह्माके उपस्थित रहनेपर भी
दक्षका यज्ञ सफल नहीं होगा। हे महाराज! मैं आपके
लिये दधीचिको जीतनेका प्रयास करूँगा॥ ६२॥
विष्णुका यह वचन सुनकर राजा
कहा-ऐसा ही हो। इस प्रकार कहकर वे उस
कार्यके लिये मन-ही-मन उत्सुक हो प्रसननतापूर्वरक
वहीं ठहर गये॥ ६३॥
तीखण्डे क्षुवदधीचवादवर्णनं नामा्टत्िशोऽ ध्यायः ॥ ३८॥
तीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें क्षुव और
धेना
सदाके
दधीचिके विवादका वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
—— ree
2223 Shivmahapuranam_Part Secon Be हा
अ० ३९]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४८३
अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिद्रारा देवताओंको शाप
देना तथा राजा क्षुवपर अनुग्रह करना
ब्रह्मोवाच
क्षुवस्य हितकृत्येन दधीचस्याश्रमं ययौ।
विप्ररूपमथास्थाय भगवान् भक्तवत्सलः॥ १
दधीचं प्राह विप्रर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः।
क्षुवकार्यार्थमुद्युक्तः शैवेन्द्रं छलमाश्रितः॥ २
विष्णुरुवाच
भो भो दधीच विप्रर्ष भवार्चनरताव्यय।
बरमेकं वृणे त्वत्तस्तद्भवान् दातुमहति॥ ३
ब्रह्मोवाच
याचितो देवदेवेन दधीचः शेवसत्तमः।
्षुवकार्यार्थिना शीघ्रं जगाद वचनं हरिम्॥ ४
दधीच उवाच
ज्ञातं तवेप्सितं विप्र क्षुवकार्यार्थमागतः।
भगवान् विप्ररूपेण मायी त्वमसि बै हरिः॥ ५
भूतं भविष्यं देवेश वतमानं जनार्दन।
ज्ञनं प्रसादाद् रुद्रस्य सदा त्रैकालिकं मम॥ ६
त्वां जानेऽहं हरि विष्णुं द्विजत्वं त्यज सुव्रत।
आराधितोऽसि भूपेन क्षुवेण खलबुद्धिना॥ ७
जाने तवैव भगवन् भक्तवत्सलतां हरे।
छलं त्यज स्वरूपं हि स्वीकुरु स्मर शंकरम्॥ ८
अस्ति चेत्कस्यचिद्धीतिर्भवार्चनरतस्य मे।
वक्तुमर्हसि यलेन सत्यधारणपूर्वकम्॥ ९
वदामि न मृषा क्वापि शिवस्मरणसक्तधीः।
न बिभेमि जगत्यस्मिनदेवदैत्यादिकादपि॥ १०
रा विष्णुरुवाच
भयं दधीच सर्वत्र जष्टं च तव सुव्रत
भवार्चनरतो यस्माद्धवान्सर्वज्ञ एव च॥
2223 Shivmahapuranam. Part L_Section-I7-2-Ftont
ब्रह्माजी बोले [नारद !] भक्तवत्सल भगवान्
विष्णु राजा क्षुवके हितसाधनके लिये ब्राह्मणका
रूप धारणकर दधीचिके आश्रममें गये॥ १॥
कपररूप धारण करके जगदगुरु श्रीहरि शिवभक्तोमें
श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि दधीचिको प्रणाम करके क्षुवके कार्यकी
सिद्धिके लिये तत्पर हो उनसे कहने लगे-॥ २॥
विष्णु बोले-हे दधीचि! शिवकी आराधनामें
तत्पर रहनेवाले हे विप्रर्षे! हे अव्यय! मैं आपसे एक
वर माँगता हूँ, कृपा करके उसे आप मुझे दीजिये॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले--क्षुवकी कार्यसिद्धि चाहनेवाले
देवदेव विष्णुके द्वारा याचित परम शिवभक्त दधीचि
विष्णुसे शीघ्र यह वचन कहने लगे-॥ ४॥
दधीचि बोले-हे विप्र! मैने आपका अभीष्ट
जान लिया है, आप भगवान् श्रीहरि क्षुवके कार्यके
लिये ही यहाँ ब्राह्मणका रूप धारणकर आये हैं, आप
तो मायावी हैं। हे देवेश! हे जनार्दन! शिवजीकी
कृपासे मुझे भूत-भविष्य और वर्तमान-इन तीनों
कालोंका ज्ञान सदा रहता है॥५-६॥
मैं आप श्रीहरि विष्णुको जानता हूँ। हे
सुव्रत! इस ब्राह्मणवेशको छोड़िये। दुष्टबुद्धिवाले
क्षुने आपकी आराधना की है। हे भगवन्! हे हरे!
मैं आपकी भक्तवत्सलताको जानता हूँ, यह छल
छोड़िये, अपने रूपको ग्रहण कीजिये और भगवान्
शंकरका स्मरण कीजिये ॥ ७-८॥
शंकरकी आराधनामें लगे रहनेवाले मुझसे यदि
किसीको भय हो, तो आप उसे यलपूर्वक सत्यकी
शपथके साथ कहिये। शिवके स्मरणमें आसक्त
बुद्धिवाला मैं कभी झूठ नहीं बोलता। मैं इस संसारमें
किसी देवता या दैत्यसे भी नहीं डरता ॥९-१०॥
विष्णु बोले-उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
हे दधीचि! आपका भय तो सर्वथा नष्ट ही है;
क्योंकि आप शिवकी आराधनामें तत्पर रहते हैं और
सर्वज्ञ हैं॥ ११॥
डे डे
श्रीशिवमहापुराण
[अ
बिभेमीति सकृद्कतुमहीस त्वं नमस्तव। | आपको नमस्कार है। आप मेरे कह ` सकृद्वक्तुमर्हसि त्वं नमस्तव।
नियोगान्मम राजेन्द्र क्षुवात् प्रतिसहादहम्॥ १
ब्रह्मोवाच
एवं श्रुत्वापि तद्वाक्यं विष्णोः स तु महामुनिः।
विहस्य निर्भयः प्राह दधीचः शैवसत्तमः॥ १३
दधीच उवाच
न बिभेमि सदा क्वापि कुतश्चिदपि किंचन।
प्रभावाहदेवदेवस्य शंभोः साक्षात्पिनाकिनः॥ १४
ब्रह्मोवाच
ततस्तस्य मुनेः श्रुत्वा वचनं कुपितो हरिः।
चक्रमुद्यम्य संतस्थौ दिधक्षुर्मुनिसत्तमम्॥ १५
अभवत्कुंठितं तत्र विप्रे चक्रं सुदारुणम्।
प्रभावाच्च तदीशस्य नृपतेः सन्निधावपि॥ १६
दृष्ट्वा तं कुंठितास्यं तच्चक्रं विष्णुं जगाद ह।
दधीचः सस्मितं साक्षात्सदसद्व्यक्तिकारणम्॥ १७
दधीच उवाच
भगवन् भवता लब्धं पुरातीव सुदारुणम्।
सुदर्शनमिति ख्यातं चक्रं विष्णोः प्रयत्नत: ।
भवस्य तच्छुभं चक्रं न जिघांसति मामिह॥ १८
भगवानथ क्रुद्धो ऽस्मे सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः ।
ब्रह्मास्त्राद्ये: शरैश्षास्त्रे: प्रयलं कर्तुमर्हसि॥ १९
ब्रह्मोवाच
स तस्य वचनं श्रुत्वा दृष्ट्वा निवीर्यमानुषम्।
ससर्जाथ क्रुधा तस्मै सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः ॥ २०
चक्रर्देवास्ततस्तस्य विष्णोः साहाय्यमादरात्।
द्विजेनैकेन संयोद्धु प्रसृतस्य विबुद्धयः॥ २१
चिक्षिपुः स्वानि स्वान्याशु शस्त्राण्यस्त्राणि सर्वतः ।
'दधीचोपरि वेगेन शक्राद्या हरिपाक्षिकाः॥ २२
कुशमुष्टिमथादाय दधीचः संस्मरन् शिवम्।
ससर्ज सर्वदेवेभ्यो वज्रास्थिः सर्वतो वशी॥२३
य
आपको नमस्कार है। आप मेरे कहनेसे
बार अपने प्रतिद्वन्द्वी राजा क्षुवसे यह कह दीजिये.
हे राजेन्द्र! मैं आपसे डरता हूँ॥ १२॥
ब्रह्माजी बोले--विष्णुका यह वचन सुनका
भी शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ महामुनि दधीचि हँसकर निर्भव
हो कहने लगे--॥ १३॥
दधीचि बोले--मैं पिनाकधारी देवाधिरेग
शम्भुके प्रभावसे कहीं भी किसीसे किंचिन्मात्र भै
नहीं डरता हूँ॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले--उन मुनिका यह वचन सुनकर
भगवान् विष्णु क्रोधित हो उठे और वे मुनिश्रे्ठ
दधीचिको जलानेकी इच्छासे अपने चक्रको ऊप
उठाकर खड़े हो गये। राजा क्षुवके सामने ही
ब्राह्मणपर चलाया जानेवाला उनका भयंकर चक्र
शिवजीके प्रभावसे वहींपर कुण्ठित हो गया। इस
प्रकार उस चक्रको कुण्ठित हुआ देखकर दधीचि
हँसते हुए सत् एवं असत्की अभिव्यक्तिके कारणभूत
भगवान् विष्णुसे कहने लगे-॥ १५-१७॥
दधीचि बोले--हे भगवन्! आपने पूर्व समयमे
[तपस्याके] प्रयलसे शिवजीसे सुदर्शन नामक अत्यन्त
दारुण जिस चक्रको प्राप्त किया है, शिवजीका वह
शुभ चक्र मुझे नहीं मारना चाहता है। तब भगवान्
श्रीहरिने क्रुद्ध होकर क्रमसे सभी अस्त्रोंको उतपर
चलाया। [इसपर दधीचिने कहा-] अब आप
ब्रह्मास्त्र आदि बाणोंसे तथा अन्य प्रकारके अस्त्रै
प्रयत्न कोजिये॥ १८-१९॥
ब्रह्माजी बोले--दधीचिके वचनको सुनकर
भगवान् विष्णु उन्हें अपने सामने अत्यन्त तुच्छ मपु
समझकर क्रोधित हो अन्य प्रकारके अस्त्रोंका उत
प्रयोग करने लगे। उस समय एकमात्र उस राह्मण
युद्ध करेके लिये मूर्ख देवता भी आदरपूर्वक विष्णुवी
सहायता करने लगे॥ २०-२१॥
विष्णुपक्षीय इन्द्र आदि देवगण भी दधीचिं
ऊपर बड़े वेगसे अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र शीघ्र
लगे। तब वज्र हुई अस्थियोंवाले जितेन्द्रिय दधीचि
शिवजीका स्मरण करते हुए मुट्टीभर कुशा लेकर ji
देवताओंपर प्रयोग किया॥ २२-२३॥
र
2223 आज़ाधाकरणकाशा। भा $न्यांगा_!7-2-
a
अ० ३९]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४८५
शंकरस्थ प्रभावात्तु कुशमुष्टि्मुनेर्हि सा।
दिव्यं त्रिशूलमभवत् कालाग्निसदृशं मुने॥ २४
दधु देवान् मतिं चक्रे सायुधान् सशिखं च तत्।
प्रजवलत्सर्वतः शैवं युगांताग्न्यधिकप्रभम्॥ २५
नारायणेन्द्रमुख्यैस्तु देवैः क्षिप्तानि यानि च।
आयुधानि समस्तानि प्रणेमुस्त्रिशिखं च तत्॥ २६
देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे ध्वस्तवीर्या दिवौकसः।
तस्थौ तत्र हरिर्भीतः केवलं मायिनां वरः॥ २७
ससर्ज भगवान् विष्णुः स्वदेहात्पुरुषोत्तमः।
आत्मनः सदृशान् दिव्यान् लक्षलक्षायुतान् गणान्॥ २८
ते चापि युयुधुस्तत्र वीरा विष्णुगणास्ततः।
मुनिनेकेन देवर्षे दधीचेन शिवात्मना॥ २९
ततो विष्णुगणांस्तान्वै नियुध्य बहुशो रणे।
ददाह सहसा सर्वान् दधीचः शैवसत्तमः॥ ३०
ततस्तद्विस्मयार्थाय दधीचस्य मुने्हरिः।
विश्वमूर्तिरभूच्छीप्रं महामायाविशारदः॥ ३१
तस्य देहे हरेः साक्षादपश्यद् द्विजसत्तमः।
दधीचो देवतादीनां जीवानां च सहस्त्रकम्॥ ३२
भूतानां कोटयश्चैव गणानां कोटयस्तथा।
अंडानां कोटयश्चैव विश्वमूर्तेस्तनौ तदा॥ ३३
दृष्ट्वैतदखिलं तत्र च्यावनिः सततं तदा।
विष्णुमाह जगन्नाथं जगत्स्तवमजं विभुम्॥ ३४
दधीच उवाच
मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासो विचारतः।
सहस्त्राणि दुर्विज्ञेयानि माधव॥
मयि पश्य जगत्सर्व त्वया युक्तमतन्द्रितः।
ब्रह्मणं च तथा रुद्रं दिव्यां दृष्टिं ददामि ते॥ ३६
हे मुने! शंकरजीके प्रभावसे [मुनीश्वर
दधीचिके द्वारा प्रयुक्त] वह मुट्टीभर कुशा कालाग्निके
समान दिव्य त्रिशूल बन गया॥ २४॥
चारों ओरसे जलता हुआ, प्रलयाग्निसे भी
अधिक तेजवाला तथा ज्वालाओंसे युक्त वह शैव
अस्त्र आयुधोंसहित समस्त देवताओंको भस्म करनेका
विचार करने लगा॥ २५॥
उस समय विष्णु, इन्द्र आदि मुख्य देवताओंके
द्वारा जो अस्त्र छोड़े गये थे, वे सभी उस त्रिशूलको
प्रणाम करने लगे । तब नष्टपराक्रमवाले सभी स्वर्गवासी
देवगण [इधर-उधर] भागने लगे। मायावियोंमें श्रेष्ठ
स्वामी विष्णु ही एकमात्र भयभीत हो वहाँ स्थित
रहे॥ २६-२७॥
तब पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपने
शरीरसे अपने ही समान हजारों एवं लाखों दिव्य
गणोंको उत्पन्न किया। हे देवर्षे! तदनन्तर विष्णुके
बीरगण अकेले शिवस्वरूप दधीचिसे युद्ध करने
लगे॥ २८-२९॥
तदनन्तर शिवभक्तोमें श्रेष्ठ महर्षि दधीचिने
रणमें उन गणोंके साथ वहाँ बहुत युद्धकर सहसा उन
सबको जला दिया॥३०॥
तब मायाविशारद भगवान् विष्णु महर्षि
दधीचिको विस्मित करनेके लिये शीघ्र ही
विश्वमूर्ति हो गये॥३१॥
ब्राह्मणश्रेष्ठ दधीचिने [उस समय] उन विष्णुके
शरीरमें हजारों देवता आदिको और अन्य जीवोंको देखा।
उस समय विश्वमूर्तिके शरीरमें करोड़ों भूत, करोड़ों
गण तथा करोड़ों ब्रह्माण्ड विद्यमान थे॥ ३२-३३॥
इन सभीको देखकर दधीचि मुनि जगत्पति,
जगत्स्तुत्य, अजन्मा तथा अविनाशी उन भगवान्
विष्णुसे कहने लगे--॥ ३४॥
दधीचि बोले-हे महाबाहो! आप मायाको
त्याग दीजिये। विचार करनेसे सब प्रतिभासमात्र प्रतीत
होता है। हे माधव! मैंने भी हजारों दुर्विज्ञेय वस्तुओंको
जान लिया है। अब आप निरालस्य होकर मुझमें
अपने सहित ब्रह्मा, रुद्र तथा सम्पूर्ण जगत्को देखिये,
मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ॥ ३५-३६॥
श्रीशिवमहापुराण
कर [ PE हज ३
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर भाक
इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वतनौ निखिलं मुनि: । शिवके तेजसे पूर्ण शरीरवाले दधीचि मुनिने अछ
ब्रह्माण्डं च्यावनिः शंभुतेजसा पूर्णदेहकः॥
तदाह विष्णुं देवेशं दधीचः शेवसत्तमः।
संस्मरन् शंकरं चित्ते विहसन् विभयः सुधीः॥ ३८
दधीच उवाच
मायया त्वनया किं वा मंत्रशक्त्याथ वा हरे।
सत्कामनामिमां कृत्वा योद्धुमर्हसि यत्नतः॥ ३९
ब्रह्मोवाच
एतच्छुत्वा मुनेस्तस्य वचनं निर्भयस्तदा।
शंभुतेजोमयं विष्णुः चुकोपातीव तं मुनिम्॥ ४०
देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम्।
योद्धुकामाश्च मुनिना दधीचेन प्रतापिना ॥ ४१
एतस्मिन्नन्तरे तत्रागमन्मत्सङ्गतः क्षुवः।
अवारयन्तं निश्चेष्टं पद्मयोनिं हरिं सुरान्॥ ४२
निशम्य वचनं मे हि ब्राह्मणो न विनिर्जित:।
जगाम निकटं तस्य प्रणनाम मुनिं हरिः॥ ४३
क्षुवो दीनतरो भूत्वा गत्वा तत्र मुनीश्वरम्।
दधीचमभिवाद्यैव प्रार्थयामास विक्लवः॥ ४४
क्षुव उवाच
प्रसीद मुनिशादूंल शिवभक्तशिरोमणे।
प्रसीद परमेशान दुर्लक्ष्यो दुर्जनैः सदा॥ ४५
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य राज्ञः सुरगणस्य हि।
अनुजग्राह तं विप्रो दधीचस्तपसां निधिः॥ ४६
अथ दृष्ट्वा रमेशादीन् क्रोधविह्नलितो मुनि: ।
हदि स्मृत्वा शिवं विष्णुं शशाप च सुरानपि॥ ४७
दधीच उवाच
रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनी श्वराः।
ध्वस्ता भवंतु देवेन विष्णुना च समं गणैः ॥ ४८
शरीरमें समस्त ब्रह्माण्डको दिखाया। ततश
शिवभक्तोंमे श्रेष्ठ बुद्धिमान् दधीचि मनमें शंकर
स्मरण करते हुए निर्भय होकर देवेश भगवान् विधु
कहने लगे॥ ३७-३८॥
दधीचि बोले-हे हरे! आपकी इस मायापे
अथवा मन्त्रशक्तिसे क्या हो सकता है? आप रेष
कामना करके यत्मपूर्वक मुझसे युद्ध कीजिये॥ ३९॥
ब्रह्माजी बोले--तब उन मुनिका यह वक्ता
सुनकर विष्णु शिवजीके तेजसे निर्भय होकर उन
मुनिपर अत्यन्त कुपित हो उठे॥ ४०॥
उस समय जो देवता भाग गये थे, वे भी प्रतापी
दधीचिसे युद्ध करनेकी इच्छासे उन नारायणदेवके
पास आ गये॥ ४१॥
इसी बीच मुझे साथ लेकर राजा क्षुव कहाँ
आ गये। मैंने देवताओं तथा विष्णुको युद्ध करसे
मना किया और कहा कि यह ब्राह्मण [किसौसे]
जीता नहीं जा सकता है। मेरी इस बातको सुनकर
भगवान् विष्णुने मुनिके निकट जाकर उन्हें प्रणाम
किया॥ ४२-४३॥
उसके बाद वे क्षुव भी अत्यन्त दीन होकर वहाँ
मुनीश्वर दधीचिके पास जाकर व्याकुल हो प्रणाम
करके प्रार्थना करने लगे ॥ ४४॥
क्षुव बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! प्रसन्न होइये। हैं
शिवभक्तशिरोमणे! प्रसन्न होइये। हे परमेशान! आप
दुर्जनोंके द्वारा सदा दुर्लक्ष्य हैं ॥ ४५॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] उन राजा क्षुवकी
तथा देवताओंकी यह बात सुनकर तपस्वातिि
ब्राह्मण दधीचिने उनपर अनुग्रह किया॥ ४६॥
तदनन्तर विष्णु आदिको देखकर मुनिने क्री
व्याकुल होकर मनसे शिवजीका स्मरण करके वि
तथा देवताओंको शाप दे दिया॥ ४७॥
दधीचि बोले--देवराज इन्द्रसहित सभी
और मुनीश्वर तथा गणोंके साथ विष्णुदेव
क्रोधाग्निसे ध्वस्त हो जायूँ॥ ४८॥
अ० ४०]
ब्रह्मोवाच
एवं शप्त्वा सुरान् प्रेक्ष्य क्षुषमाह ततो मुनि: ।
देवैश्च पूज्यो राजेन्द्र नृपैश्चैव द्विजोत्तमः॥ ४९
ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः।
इत्युक्त्वा स स्फुटं विप्र: प्रविवेश निजाश्रमम्॥ ५०
दधीचमभिवंद्यैव क्षुवो निजगृहं गतः।
विष्णुर्जगाम स्वं लोकं सुरैः सह यथागतम्॥ ५१
तदेवं तीर्थमभवत् स्थानेश्वर इति स्मृतम्।
स्थानेशवरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ५२
कथितस्तव संक्षेपाद्वादः क्षुवदधीचयोः।
नृपाप्तशापयोस्तात ब्रह्मविष्णवोः शिवं विना॥ ५३
य इदं कीर्तयेन्नित्यं वादं क्षुवदधीचयोः।
जित्वापपृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः॥ ५४
रणे यः कीर्तयित्वेदं प्रविशेत्तस्य सर्वदा।
मृत्युभीतिर्भवेनैव विजयी च भविष्यति॥ ५५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८७
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार देवताओंको शाप
देकर पुन: क्षुवकी ओर देखकर मुनिने क्षुवसे कहा--
हे राजेन्द्र ! श्रेष्ठ द्विज देवताओं और राजाओंसे भी
अधिक पूज्य होता है । हे राजेन्द्र | ब्राह्मण ही बली और
प्रभावशाली होते हैं--ऐसा स्पष्टरूपसे कहकर वे ब्राह्मण
दधीचि अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये ॥ ४९-५० ॥
तत्पश्चात् दधीचिको नमस्कार करके क्षुव अपने
घर चले गये और भगवान् विष्णु भी जैसे आये थे,
उसी तरह देवताओंके साथ अपने वैकुण्ठलोकको
लौट गये॥ ५१॥
[इस प्रकार] वह स्थान स्थानेश्वर नामक तीर्थके
रूपमें प्रसिद्ध हो गया | स्थानेश्वरमें पहुँचकर मनुष्य
शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है । हे तात! इस प्रकार
मैंने आपसे संक्षेपमें क्षुब और दधीचिका विवाद कह
दिया और शंकरको छोड़कर ब्रह्मा और विष्णुको जो
शाप प्राप्त हुआ, उसका भी वर्णन किया॥ ५२-५३॥
जो [व्यक्ति] क्षुव और दधीचिके इस विवाद-
सम्बन्धी प्रसंगका नित्य पाठ करता है, वह अपमृत्युको
जीतकर शरीरत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकको जाता
है॥ ५४॥
जो इसका पाठ करके रणभूमिमें प्रवेश
करेगा, उसे सर्वदा मृत्युका भय नहीं रहेगा तथा वह
विजयी होगा॥ ५५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
विष्णुदधीचवुद्धवर्णतं नामैकोतचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें विष्णु और
दधीचिके युद्धका वर्णन नामक उनतालीसबाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
— oe
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, उन
सभीको लेकर विष्णुका कैलासगमन तथा भगवान् शिवसे मिलना
नारद उवाच
विधे विधे महाप्राज्ञ शैवतत्त्वप्रदर्शक।
आविता रमणीप्राया शिवलीला महाद्धुता॥ ९
वीरेण वीरभद्रेण दक्षयज्ञं विनाश्य वै।
कैलासाद्रौ गते तात किमभूततद्वदाधुना॥ २
जारदजी बोले--हे विधे! हे महाप्राज्ञ! हे
शिवतत्त्वके प्रदर्शक! आपने अत्यन्त अद्भुत एवं रमणीय
'शिवलीला सुनायी है। हे तात! पराक्रमी वीरभद्र जब
दक्षके यज्ञका विनाश करके कैलास पर्वतपर चले
गये, तब क्या हुआ? अब उसे बताइये॥ १-२॥
४८८
श्रीशिवमहापुराण
[अ कका वयाची
ब्रह्मोवाच
अथ देवगणाः सर्वे मुनयश्च पराजिताः।
रुद्रानीकैर्विभिन्नाङ्गा मम लोकं ययुस्तदा॥
स्वयंभुवे नमस्कृत्य महां संस्तूय भूरिशः।
तत्स्वक्लेशं विषेशेण कार्त्स्येनैव न्यवेदयन्॥ ४
तदाकर्ण्य ततोऽहं वै पुत्रशोकेन पीडितः।
अचिन्तयमतिव्यग्रो दूयमानेन चेतसा॥ ५
किं कार्य कार्यमद्याशु मया देवसुखाबहम्।
येन जीवतु दक्षोऽसौ मखः पूर्णो भवेत्सुरः॥ ६
एवं विचार्य बहुधा नालभं शमहं मुने।
विष्णुं तदा स्मरन् भक्त्या ज्ञानमाप तदोचितम्॥ ७
अथ देवेश्च मुनिभिर्विष्णोरलोकमहं गतः।
जत्वा नुत्वा च विविधैः स्तवै्दुःखं न्यवदेयम्॥ ८
यथाध्वरः प्रपूर्णः स्याहेव यज्ञकरश्च सः।
सुखिनः स्युः सुराः सवे मुनयश्च तथा कुरु॥ ९
देवदेव रमानाथ विष्णो देवसुखाबह।
वयं त्वच्छरणं प्राप्ताः सदेवमुनयो ध्रुवम्॥ १०
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचो मे हि ब्रह्मणः स रमेश्वरः।
प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा शिवात्मा दीनमानसः ॥ ११
विष्णुरुवाच
तेजीयसि न सा भूता कृतागसि बुभूषताम्।
तत्र क्षेमाय बहुधा बुभूषा हि कृतागसाम्॥ १२
कृतपापाः सुराः सर्वे शिवे हि परमेश्वरे।
पराददुर्यज्ञभागं तस्य शंभोर्विधे यतः॥ १३
प्रसादयध्वं सर्वे हि यूयं शुद्धेन चेतसा।
अथापरप्रसादं तं गृहीताङ्घ्रियुगं शिवम्॥ १४
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] समस्त
और मुनि रुद्रके सैनिकोंसे पराजित तथा छिल-भिन
अंगोंवाले होकर मेरे लोकको चले गये। वहाँ
स्वयम्भूको नमस्कार करके और बार-बार मेरा स्तव
करके उन्होंने अपने विशेष क्लेशको पूर्णरूपते
बताया ॥ ३-४॥
तब उसे सुनकर मैं पुत्रशोकसे पीड़ित हो
गया और अत्यन्त व्यग्र हो व्यथितचित्तसे विचार
करने लगा॥५॥
इस समय मैं कौन-सा कार्य करूँ, जो देवताओंके
लिये सुखकारी हो और जिससे देव दक्ष जीवित हो
जायँ तथा यज्ञ भी पूरा हो जाय॥६॥
हे मुने! इस प्रकार बहुत विचार करनेपर जब
मुझे शान्ति नहीं मिली, तब भक्तिपूर्वक विष्णुका
स्मरण करते हुए मैंने उचित ज्ञान प्राप्त कर लिया॥ ७॥
तदनन्तर देवताओं और मुनियोंके साथ मैं
विष्णुलोकमें गया और उन्हें नमस्कार करके तथा
अनेक प्रकारके स्तोत्रॉंसे उनकी स्तुति करके अपना
दुःख उनसे कहने लगा-हे देव! जिस तरह भी यज्ञ
पूर्ण हो, यज्ञकर्ता [दक्ष] जीवित हों और समस्त
देवता तथा मुनि सुखी हो जायँ, आप वैसा कीजिये।
हे देवदेव! हे रमानाथ! हे देवसुखदायक विष्णो ! हम
देवता और मुनिलोग निश्चय ही आपकी शरणमें आये
हैं॥ ८-१०॥
ब्रह्माजी बोले--मुझ ब्रह्माकी यह बात
सुनकर शिवस्वरूप लक्ष्मीपति विष्णु शिवजीका
स्मरण करके दुखीचित्त होकर इस प्रकार कहते
लगे-॥ ११॥
विष्णु बोले--हे देवताओ! परम समर्थ तेजस्वी
पुरुषसे कोई अपराध बन जाय, तो भी उसके बदले
अपराध करनेवाले मनुष्योंके लिये उनका वह अपरा
मंगलकारी नहीं हो सकता। हे विधे! समस्त देवता
परमेश्वर शिवके अपराधी हैं; क्योंकि इन्होंने र
शम्भुको यज्ञका भाग नहीं दिया॥ १२-१३॥ हौ
अब आप सभी लोग शुद्ध हृदयसे
प्रसन्न होनेवाले भगवान् शिवके पैर पकड़कर
प्रसन्न कीजिये॥ १४॥
अं० ४० ]
द्रस्मिन् प्रकुपिते देवे विनश्यत्यखिलं जगत्।
सलोकपालयज्ञस्य शासनाज्जीवितं द्रुतम्॥ १५
तमाशु प्रियया देवं विहीनं च दुरुक्तिभिः।
क्षमापयध्वं हद्विद्धं दक्षेण सुदुरात्मना॥ १६
अयमेव महोपायस्तच्छान्त्यै केवलं विधे।
शंभोः संतुष्टये मन्ये सत्यमेवोदितं मया॥ १७
नाहं न त्वं सुराश्चान्ये मुनयोऽपि तनुभृतः।
यस्य तत्त्वं प्रमाणं च न विदुर्बलवीर्ययोः॥ १८
आत्मतन्त्रस्य तस्यापि परस्य परमात्मनः।
क उपायं विधित्सेद्वे पर मूढं विरोधिनम्॥ १९
चलिष्येऽहमपि ब्रह्मन् सवैः सार्ध शिवालयम्।
क्षमापयामि गिरिशं कृतागश्च शिवे श्रुवम्॥ २०
ब्रह्मोवाच
इत्थमादिश्य विष्णुर्मा ब्रह्माणं सामरादिकम्।
सार्ध देवैर्मतिं चक्रे तद्गिरौ गमनाय सः॥ २१
ययौ स्वधिष्ण्यनिलयं शिवस्याद्रिवरं शुभम्।
कैलासं सामरमुनिप्रजेशादिमयो हरिः॥
अतिप्रियं प्रभोर्नित्यं सुजुष्टं किन्नरादिभिः।
नरेतरैरप्सरोभिरयोगसिद्धैर्महोन्नतम् ॥ २३
जानामणिमयैः शृङ्गैः शोभमानं समन्ततः।
नानाधातुविचित्रं बै नानाद्रुमलताकुलम्॥ २४
नानामृगगणाकीर्णं नानापक्षिसमन्वितम्।
जानाजलप्रसत्रवणैरमरैः सिद्धयोषिताम्॥ २५
रमणेर्विहरन्तीनां नानाकन्दरसानुभिः।
ब्रुमजातिभिरन्याभी राजितं राजतप्रभम्॥ २६
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) 272
जिन भगवान्के कुपित होनेपर यह सारा जगत्,
नष्ट हो जाता है तथा जिनके शासनसे लोकपालोंसहित
यज्ञका जीवन शीघ्र ही समाप्त जाता है, उन
प्रियाविहीन तथा अत्यन्त दुरात्मा दक्षके दुर्वचनोंसे
बिंधे हुए हदयवाले देव शंकरसे आपलोग शीघ्र ही
क्षमा माँगिये ॥ १५-१६॥
हे विधे! उन शम्भुकी शान्ति तथा सन्तुष्टिके
लिये केवल यही महान् उपाय है--ऐसा मैं समझता
हूँ। यह मैंने सच्ची बात कही है ॥ १७॥
हे विधे! न मैं, न तुम, न अन्य देवता, न
मुनिगण और न दूसरे शरीरधारी हीं जिनके बल तथा
पराक्रमके तत्त्व तथा प्रमाणोंको जान पाते हैं, उन
स्वतन्त्र परमात्मा परमेश्वरको विरुद्धकर प्रसन्न करनेका
[प्रणिपात करनेके अतिरिक्त] कोई दूसरा उपाय नहीं
हो सकता॥ १८-१९॥
हे ब्रह्मन्! आपलोगोंके साथ मैं भी शिवालय
चलूँगा और शिवके प्रति स्वयं अपराधी होनेपर भी
उनसे क्षमा करवाऊँगा॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले--देवता आदिके साथ मुझ ब्रह्माको
इस प्रकार आदेश देकर भगवान् विष्णुने देवताओंके
साथ कैलासपर्वतपर जानेका विचार किया॥ २१॥
देवता, मुनि, प्रजापति आदिको साथ लेकर वे
विष्णु शिवजीके स्वप्रकाशस्वरूप शुभ तथा श्रेष्ठ
कैलास पर्वतपर पहुँच गये॥ २२॥
कैलास भगवान् शिवको सदा ही प्रिय है, वह
मनुष्योंके अतिरिक्त किन्नरों, अप्सराओं तथा योगसिद्ध
'महात्माओंसे सेवित था और बहुत ऊँचा था॥ २३॥
वह चारों ओरसे अनेक मणिमय शिखरोंसे
सुशोभित था, अनेक धातुआंसे विचित्र जान पड़ता था
और अनेक प्रकारके वृक्ष तथा लताओंसे भरा हुआ
था॥ २४॥
अनेक प्रकारके पशुओं-पक्षियों तथा अनेक
प्रकारके झरनोंसे वह परिव्याप्त था। उसके शिखरपर
'सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियोंके साथ विहार करती थीं।
वह अनेक प्रकारकी कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक
प्रकारके वृक्षोंकी जातियोंसे सुशोभित था। उसको
कान्ति चाँदीके समान श्वेतवर्णकी थी॥ २५-२६॥
४९०
श्रीशिवमहापुराण
[ ल आजला >>>. तही ४७
व्याप्रादिभिर्महासत्त्वैर्निर्धुष्टं क्रूरतोज्झितम्।
सर्वशोभान्वितं दिव्यं महाविस्मयकारकम्॥
पर्यस्तं गङ्गया सत्या स्थानपुण्यतरोदया।
सर्वपावनसंकत्र्या विष्णुपद्या सुनिर्मलम्॥ २८
एवंविधं गिरि दृष्ट्वा कैलासाख्यं शिवप्रियम्।
ययुस्ते विस्मयं देवा विष्णवाद्याः मुनीश्वराः ॥ २९
तत्समीपेऽलकां रम्यां ददृशुर्नाम ते पुरीम्।
कुबेरस्य महादिव्यां रुद्रमित्रस्य निर्जराः॥ ३०
वनं सौगन्धिकं चापि ददृशुस्तत्समीपतः।
सर्वद्रुमान्वितं दिव्यं यत्र तऱ्नादमद्भुतम्॥ ३९
तद्बाह्यतस्तस्य दिव्ये सरितावतिपावने।
नंदा चालकनंदा च दर्शनात्पापहारिके॥ ३२
पपुः सुरस्त्रियो नित्यमवगूह्य स्वलोकतः।
विगाह्य पुंभिस्तास्तत्र क्रीडंति रतिकर्शिताः॥ ३३
हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगंधिकं च यत्।
गच्छन्तस्ते सुरा आराहददृशुः शांकरं वटम्॥ ३४
पर्यक्कृताचलच्छायं पादोनविटपायतम्।
शतयोजनकोत्सेधं निनीडं तापवर्जितम्॥ ३५
महापुण्यवतां दृश्यं सुरम्यं चातिपावनम्।
शंभुयोगस्थलं दिव्यं योगिसेव्यं महोत्तमम्॥ ३६
मुमुक्षुशरणे तस्मिन् महायोगमये वटे।
आसीनं ददृशुः सर्वे शिवं विष्णवादय: सुराः ॥ ३७
विधिपुत्रैर्महासिद्धैः शिवभक्तिरतैः सदा।
उपास्यमानं समुदा शांतैः संशांतविग्रहैः॥ ३८
वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि ऑंसे
भयानकतासे रहित, सम्पूर्ण शोभासे सम्पन, र
तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला था। रण
वह सभीको पवित्र कर देनेवाली तथा अनेक
तीर्थोका निर्माण करनेवाली विष्णुपदी सती श्रीगंगाजीप
घिरा हुआ तथा अत्यन्त निर्मल था॥ २८॥
शिवजीके परम प्रिय कैलास नामक इस प्रकारके
पर्वतको देखकर मुनीश्वरोंसहित विष्णु आदि देवता
आश्चर्यचकित हो गये॥ २९॥
उन देवताओंने उस कैलासके सन्निकट शिवकर
मित्र कुबेरको अलका नामक परम दिव्य तथा रम्य
पुरीको देखा॥ ३०॥
उन्होंने उसके पास ही सौगन्धिक नामक दिव्य का
भी देखा, जो अनेक प्रकारके दिव्य वृक्षासे शोभित था
और जहाँ [पक्षियोंकी] अद्भुत ध्वनि हो रही थी॥ ३१॥
उससे बाहर नन्दा एवं अलकनन्दा नामक दिव्य
तथा परम पावन सरिताएँ बह रही थीं, जो दर्शनमात्रसे
ही [मनुष्योंके] पापोंका विनाश कर देती हैं॥ ३२॥
देवस्त्रयाँ प्रतिदिन अपने लोकसे आकर उनका
जल पीती और स्नान करके रतिसे आकृष्ट होकर
पुरुषोंके साथ विहार करती हैं॥ ३३॥
उसके बाद उस अलकापुरी तथा सौगन्धिक
वनको छोड़कर आगेकी ओर जाते हुए उन देवताओं
समीपमें ही शंकरजीके वटवृक्षको देखा॥ ३४॥
वह [वटवृक्ष] उस पर्वतके चारों ओर छाया
फैलाये हुए था, उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली ह
थीं, उसका घेरा सौ योजन ऊँचा था, वह घोंसलोंसे
विहीन था और तापसे रहित था । उसका दर्शत [केवल]
पुण्यात्माओंको ही होता है। वह अत्यन्त रमणीय,
परम पावन, शिवजीका योगस्थल, दिव्य योगियोंके
निवासके योग्य तथा अत्युत्तम था॥ ३५-३६॥
विष्णु आदि सभी देवताओंने महायोगमय तथा
मुमुक्षुओंको शरण प्रदान करनेवाले उस वटवृक्ष
जीचे बैठे हुए शिवजीको देखा॥ ३७॥
शान्त स्वभाववाले, अत्यन्त शान्त विग्रहवाले,
शिवभक्तिमें तत्पर तथा महासिद्ध [सनक आदि]
प्रसन्नताके साथ उनकी उपासना कर रहे थे॥ ३८॥
आ० ४१]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४९१
तथा सख्या कुबेरेण भर्त्रां गुहाकरक्षसाम्।
सेव्यमानं विशेषेण स्वगणेज्ञातिभिः सदा॥ ३९
तापसाभीष्टसद्रूपं बिभ्रतं परमेश्वरम्।
बरात्सल्याद्विश्वसुहृदं भस्मादिसुविराजितम्॥ ४०
मुने तुभ्यं प्रवोचन्तं पृच्छते ज्ञानमुत्तमम्।
कुशासने सूपविष्टं सर्वेषां श्रृण्वतां सताम्॥ ४१
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं चरणं चैव जानुनि।
बाहुप्रकोष्ठाक्षमालं स्थितं सत्तर्कमुद्रया॥ ४२
एवंविध॑ शिवं दृष्ट्या तदा विष्णवादयः सुरा: ।
प्रणेमुस्त्वरितं सर्वे करौ बध्वा विनम्रकाः॥ ४३
उपलभ्यागतं रुद्रो मया विष्णुं सतां गतिः।
उत्थाय चक्रे शिरसाभिवंदनमपि प्रभुः॥ ४४
वंदिताङ् घ्रिस्तदा सवैर्दिव्येर्बिष्णवादिभिः शिवः।
जनामाथ यथा विष्णु: कश्यपं लोकसद्गतिः ॥ ४५
सुरसिद्धगणाधीशमहर्षिसुनमस्कृतम् ।
समुवाच सुरैर्विष्णुं कृतसन्नतिमादरात्॥ ४६
गुह्यकों एवं राक्षसोंके पति उनके मित्र कुबेर
अपने गणों तथा कुटुम्बीजनोंके साथ विशेषरूपे
| सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वीजनोंको
प्रिय लगनेवाले सुन्दर रूपको धारण किये हुए थे,
वात्सल्यके कारण वे सम्पूर्ण विश्वके मित्ररूप प्रतीत
हो रहे थे और भस्म आदिसे उनके अंगोंकी बड़ी
शोभा हो रही थी॥ ३९-४०॥
हे मुने! आपके पूछनेपर कुशासनपर बैठे हुए वे
शिव सभी सज्जनोंको सुनाते हुए आपको ज्ञानका
उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दायीं
जाँघपर और बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे कलाईमें
रुद्राक्षकी माला डाले सुन्दर तर्कमुद्रामें विराजमान
थे॥ ४१-४२॥
इस प्रकारके स्वरूपवाले शिवको देखकर
उस समय विष्णु आदि सभी देवताओंने शीघ्नतासे
जम्रतापूर्वक दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया।
तब सज्जनोंके शरणदाता प्रभु रुद्रने मेरे साथ आये हुए
विष्णुको देखकर उठ करके सिर झुकाकर उन्हे
प्रणाम किया॥ ४३-४४॥
विष्णु आदि देवताओंने जब भगवान् शिवजीके
चरणोंमें प्रणाम किया, तब उन्होंने भी उसी प्रकार मुझे
नमस्कार किया, जिस प्रकार लोकोंको सद्गति प्रदान
करनेवाले भगवान् विष्णु कश्यपको प्रणाम करते हैं॥ ४५ ॥
तब शिवजीने देवताओं, सिद्धों, गणाधीशों और
महर्षियोंसे नमस्कृत तथा वन्दित विष्णुसे आदरपूर्वक
वार्तालाप किया॥४६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
शिवदर्शनवर्णनं नाम चत्वारिशोऽ ध्याय; ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें शिवके
दर्शनका वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
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अधैकचत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवान् शिवकरी स्तुति
विष्ण्वादय ऊचुः
देवदेव महादेव लौकिकाचारकृत्प्रभो।
विष्णु आदि बोले-हे देवदेव। हे महादेव!
लोकाचारका प्रदर्शन करनेवाले हे प्रभो! आपकी
कृपासे हमलोग आप परमेश्वर शम्भुको परम ब्रह्म
ब्रह्म त्वामीश्वरं शंभुं जानीमः कृपया तव॥ १ मानते हैं॥ १॥
४९२
दुर्जेयया सदा पुंसां मोहिन्या परमेश्वर ॥
प्रकृतेः पुरुषस्यापि जगतो योनिबीजयोः।
परब्रह्म परस्त्वं च मनोवाचामगोचरः॥ ३
त्वमेव विश्वं सृजसि पास्यत्सि निजतन्त्रत: ।
स्वरूपां शिवशक्ति हि क्रीडन्नूर्णपटो यथा॥ ४
त्वमेव क्रतुमीशान ससर्जिथ दयापरः।
दक्षेण सूत्रेण विभो सदा त्रय्यभिपत्तये॥ ५
त्वयैव लोकेऽवसिताः सेतवो यान् धृतव्रताः ।
शुद्धान् श्रद्धधते विप्रा वेदमार्गविचक्षणाः॥ ६
कर्तुसत्वं मङ्गलानां हि स्वपरं तु सुखे विभो।
अमङ्गलानां च हितं मिश्रं वाथ विपर्ययम्॥ ७
सर्वकर्मफलानां हि सदा दाता त्वमेव हि।
सर्वे हि प्रोक्ताः पशवस्तत्पतिस्त्वं श्रुतिश्रुत: ॥ ८
पृथग्धियः कर्मदृशोऽरुतुदाश्च दुराशयाः।
वितुदंति परान् मूढा दुरुक्तैर्मत्सरान्विताः॥ ९
तेषां दैववधानां भो भूयात्त्वच्य वधो विभो।
भगवन्परमेशान कृपां कुरु परप्रभो॥ १०
जमो रूद्राय शांताय ब्रह्मणे परमात्मने।
कपर्दिने महेशाय ज्योत्स्ताय महते नमः॥ ११
त्वं हि विश्वसृजां स्रष्टा धाता त्तं प्रपितामहः ।
त्रिगुणात्मा निर्गुणश्च प्रकृतेः पुरुषात्परः॥ १२
श्रीशिवमहापुराण [
_ _ = तक काकः ` श्
किं मोहयसि नस्तात मायया परया तव। है परमेश्वर! हे तात! आप सम्पूर्ण सं
मोहनेवाली अपनी उत्कृष्ट तथा
क्यों मोहित कर रहे हैं ?॥ २॥
आप संसारके योनि एवं बीजभूत
पुरुषसे भी परे हैं। आप परब्रह्म हैं एवं मन तथा
वाणीके विषयसे परे हैं ॥ ३॥
आप ही अपनी इच्छासे इस विश्वका सुजन
करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार भी करते हैं। जैसे
मकड़ी अपने मुँहसे जाला बनाती है तथा उसको पुः
समेट लेती है, उसी प्रकार आप भी अपनी शक्तिके
द्वारा अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते रहते हैं॥ ४ ॥
है ईशान! हे विभो! आपने ही दयालु होकर
वेदत्रयीकी रक्षाके लिये दक्षरूपी सूत्रके दवारा यज्ञी
रचना की है॥५॥
आपने ही संसारमें उन [वैदिक] मर्यादाओंकी
स्थापना की है, जिनपर वेदमार्गपरायण तथा दृढ़-ब्रतका
पालन करनेवाले ब्राह्मण लोग श्रद्धा करते हैं ॥ ६॥
हे विभो! आप ही मंगलोंके कर्ता हैं, आप हौ
अपनों और दूसरोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं और
आप ही अमंगलोंका भी हितकारी अथवा अहितकारी
या मिश्रित फल देनेवाले हैं ॥ ७॥
हे प्रभो! आप ही सदा सब कर्मोंका फल प्रदान
करनेवाले हैं। जगतूके समस्त प्राणी पशु कहे गये हैं,
उनकी रक्षाके कारण ही आपका नाम पशुपति है
ऐसा वेदोंमें कहा गया है॥ ८॥
आपसे भिन्न बुद्धि होनेके कारण ही कर्म
विश्वास करनेवाले, मर्मभेदी वचन बोलनेवाले, दुर्म
दुर्बुद्धि लोग ही ईर्ष्यावश कटुवाक्योंसे दूसरोंको कष्ट
पहुँचाते हैं ॥ ९॥
हे विभो! दुर्दैवद्वारा मारे गये उन लोगोंका ह
क्या आपके द्वारा होना चाहिये, हे भगवन्! हे परमेशारग
हे परप्रभो! आप कृपा कीजिये॥ १०॥
परम शान्त, रुद्र ब्रह्मो नमस्कार है!
परमात्मा, जटाधारी, स्वयंप्रकाश महान् महेशी
हमारा नमस्कार है॥ ११॥
आप ही प्रजापतियोंके स्रष्टा, धाता, प्रपिताम&
त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम)-स्वरूप, निर्गुण एवं
तथा पुरुषसे परे हैं ॥ १२॥
दुर्जेय ह हे
प्रकृति तेथ
अ० ४९ ]
नमस्ते नीलकंठाय वेधसे परमात्मने।
विश््वाय विश्वबीजाय जगदानंदहेतवे॥ १३
ऑंकारस्त्वं वषट्कारः सर्वारंभप्रवर्तक: ।
इंतकारः स्वधाकारो हव्यकव्यान्नभुक् सदा॥ १४
कृतः कथं यज्ञभङ्गस्त्वया धर्मपरायण।
बरहमण्यस्त्वं महादेव कथं यज्ञहनो विभो॥ १५
ब्राह्मणानां गवां चैव धर्मस्य प्रतिपालकः।
शरण्योऽसि सदानन्त्यः सर्वेषां प्राणिनां प्रभो॥ १६
नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे।
नमो भवाय देवाय रसायांबुमयाय ते॥ १७
शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः।
रुद्रायाग्निस्वरूपाय॒महातेजस्विने नमः॥ १८
ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः।
पशूनां पतये तुभ्यं यजमानाय वेधसे॥ १९
भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः।
महादेवाय सोमाय प्रवृत्ताय नमोऽस्तु ते॥ २०
उग्राय सूर्यरूपाय नमस्ते कर्मयोगिने।
नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्रमन्यवे॥ २९
नमः शिवाय भीमाय शंकराय शिवाय ते।
उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियंता यच्छिवोऽसि नः ॥ २२
मयस्कराय विश्वाय ब्रह्मणे ह्यार्तिनाशिने।
अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥
शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय परात्मने।
सदसद्ग्क्तिहीनाय महतः कारणाय ते॥ २४
जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः।
नीलरुद्राय कढ्रुद्राय प्रचेतसे॥ २५
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
४९३
नीलकण्ठ, विधाता, परमात्मा, विश्व, विश्वके बीज
और जगत्के आनन्दभूत आपको नमस्कार है॥ १३॥
[हे प्रभो] आप ही ३#कार, वषट्कार,
सभीके आदिट्रवर्तक, हन्तकार, स्वधाकार एवं हव्य-
कव्यके सदा भोक्ता हैं॥ १४॥
हे धर्मपरायण! आपने इस यज्ञका विध्वंस क्यों
किया ? हे महादेव ! आप तो ब्राह्मणोंके रक्षक हैं, तब हे
विभो! आप इस यज्ञके विनाशक कैसे बन गये ?॥ १५॥
हे प्रभो! आप ब्राह्मण, गौ तथा धर्मकी रक्षा
करनेवाले एवं सभी प्राणियोंको शरण प्रदान करनेवाले
तथा अनन्त हैं॥ १६॥
हे भगवन्! हे रुद्र! हे सूर्यके समान अमित
तेजवाले! आपको प्रणाम है। रसरूप, जलरूप,
जगन्मय-स्वरूप आप भव देवताको नमस्कार है॥ १७॥
सुगन्धवाले पृथ्वीस्वरूप आप शर्वको नमस्कार
है। अग्निस्वरूप महातेजस्वी आप रुद्रको नमस्कार
है॥ १८॥
आप वायुरूप, स्पर्शरूप ईश्वरको नमस्कार
है, आप पशुओंके पति, यजमान एवं विधाताको
नमस्कार है॥ १९॥
आकाशस्वरूप शब्दवाले आप भीमको नमस्कार
है! सोमस्वरूपसे कर्ममें प्रवृत्त करनेवाले आप महादेवको
नमस्कार है॥ २०॥
आप उम्र, सूर्यरूप कर्मयोगीको नमस्कार है। हे
रुद्र! कालोंके भी काल एवं क्रोधस्वरूप आपके लिये
नमस्कार है॥ २१॥
शिव, भीम एवं कल्याण करनेवाले आप शिव-
शंकरको नमस्कार है। [हे प्रभो !] आप उग्र हैं, सभी
प्राणियोंके नियन्ता हैं एवं हमारा कल्याण करनेवाले
हैं॥ २२॥
आप मयस्कर [सुख प्रदान करनेवाले], विश्वरूप,
ब्रह्म, दुःखोंका नाश करनेवाले, अम्बिकापति तथा
उमापति हैं, आपको नमस्कार है॥ २३॥
शर्व, सर्वरूप, पुरुषरूप, परात्मा, सत् एवं असतूकी
अभिव्यक्तिसे हीन, महत्तत्त्वके कारण, संसारमें अनेक
प्रकारसे उत्पन होनेवाले,प्रभूतस्वरूप, नीलस्वरूप, नीलस्द्र,
कद्रुद्र एवं प्रचेताको बार-बार नमस्कार है॥ २४-२५॥
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श्रीशिवमहापुराण
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मीढुष्टमाय देवाय शिपिविष्टाय ते नम: ।
महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा॥
ताराय च सुताराय तरुणाय सुतेजसे।
हरिकेशाय देवाय महेशाय नमो नमः॥ २७
देवानां शंभवे तुभ्यं विभवे परमात्मने।
परमाय नमस्तुभ्यं कालकंठाय ते नमः॥ २८
हिरण्याय परेशाय हिरण्यवपुषे नमः।
भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय च॥ २९
भस्मदिग्धशरीराय रुद्राक्षाभणाय च।
नमो हृस्वाय दीर्घाय वामनाय नमोऽस्तु ते॥ ३०
दूरेवधाय ते देवाग्रेवधाय नमो नमः।
धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः॥ ३१
नानायुधधरायैव दैत्यदानवनाशिने।
सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय वै नमः॥ ३२
वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः।
अघोराय परेशाय विकटाय नमो नम:॥ ३३
तत्पुरुषाय नाथाय पुराणपुरुषाय च।
पुरुषार्थप्रदानाय व्रतिने परमेष्ठिने॥ ३४
ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः।
ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षात्परात्मने॥ ३५
उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियंतासि शिवोऽसि न: ।
'कालकूटाशिने तुभ्यं देवाद्यवनकारिणे॥ ३६
वीराय वीरभद्राय रक्षद्वीराय शूलिने।
महादेवाय महते पशूनां पतये नमः॥ ३७
वीरात्मने सुविद्याय श्रीकंठाय पिनाकिने।
नमोऽनंताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे॥ ३८
पराय परमेशाय परात्परतराय ते।
परात्पराय विभवे नमस्ते विश्वमूर्तये॥ ३९
आप मीढुष्टम, देव तथा शिपिविष्टो नमस्कार
है। देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले तथा सर्वश्रेछको
नमस्कार है॥ २६॥
तारकमन्त्रस्वरूप, सबका उद्धार करनेवाले
तरुणरूप, परमतेजस्वी, हरिकेश, देव महेश्वरको बार
बार नमस्कार है ॥ २७॥
देवताओंका कल्याण करनेवाले, सभी ऐशवर्योते
युक्त, परमात्मा तथा परम आपको नमस्कार है । आप
कालकण्ठको नमस्कार है। सुवर्णस्वरूप, परमेश
सुवर्णमय शरीरवाले, भीम, भीमरूप एवं भीमकर्ममे
रत रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ २८-२९॥
भस्मसे लिप्त शरीरवाले, रुद्राक्षका आभूषण
धारण करनेवाले तथा हस्व-दीर्घ-वामनस्वरूपवाले
आपको बार-बार नमस्कार है॥ ३०॥
हे देव! दूर रहनेवालों तथा आगे रहनेवालोंका
वध करनेवाले आपको नमस्कार है । धनुष, शूल, गदा
तथा हल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है।
अनेक आयुधोंको धारण करनेवाले, दैत्य-दानवोंका
विनाश करनेवाले, सद्य, सद्यरूप तथा सद्योजात
आपको नमस्कार है। वाम, वामरूप तथा वामनेतर
आपको नमस्कार है। अघोर, परेश एवं विकटको
बार-बार नमस्कार है॥ ३१-३३॥
तत्पुरुष, नाथ, पुराणपुरुष, पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले,
ब्रतधारी परमेष्ठीको नमस्कार है। ईशान, ईशस्वरूप
आपको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्म, ब्रह्मस्वरूप एवं
साक्षात् परमात्मस्वरूपको नमस्कार है॥ ३४-३५॥ `
आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंका नियन्त्रण एवं
हम देवताओंका कल्याण करनेवाले हैं। कालकूट
विषका पान करनेवाले, देवताओं आदिकी खीं
करनेवाले, वीर, वीरभद्र, वीरोंकी रक्षा करनेवाले,
त्रिशूलधारी, पशुपति, महादेव, महान् आपको नमस्व
है॥ ३६-३७॥
वीरात्मा, श्रेष्ठ विद्यावाले, श्रीकण्ठ, पिनाक,
अनन्त, सूक्ष्म, मृत्यु तथा क्रोधस्वरूपवाले
बार-बार नमस्कार है। पर, परमेश, परसे भी ४९
परात्पर, सर्वैश्वर्य-सम्मन्न तथा विश्वमूर्ति
नमस्कार है॥ ३८-३९॥
आ० ४९१९]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४९५
020202 0 >> _ “न: पा:
नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे।
भैरवाय शरण्याय त्र्यंबकाय विहारिणे॥ ४०
मृत्युञ्जयाय शोकाय त्रिगुणाय गुणात्मने।
चत्रसूर्याग्निनेत्राय सर्वकारणसेतवे॥ ४१
भ्रबता हि जगत्सर्वं व्याप्तं स्वेनैव तेजसा।
परब्रह्म निर्विकारी चिदानंदः प्रकाशवान्॥ ४२
ब्रह्मविष्णिवन्द्रचन्द्रादिप्रमुखाः सकलाः सुरा: ।
मुनयश्चापरे त्वत्तः संप्रसूता महेश्वर॥ ४३
यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा।
अष्टमूर्तिरितीशश्च त्वमाद्यः करुणामयः॥ ४४
त्वद्भयाद्वाति वातोऽयं दहत्यग्निर्भयात्तव।
सूर्यस्तपति ते भीत्या मृत्युर्धावति सर्वतः॥ ४५
दयासिन्धो महेशान प्रसीद परमेश्वर।
रक्ष रक्ष सदैवास्मान् यस्मान्नष्टान् विचेतसः ॥ ४६
रक्षिताः सततं नाथ त्वयैव करुणानिधे।
नानापद्भयो वयं शंभो तथैवाद्य प्रपाहि नः ॥ ४७
यज्ञस्योद्धरणं नाथ कुरू शीघ्र प्रसादकृत्।
असमाप्तस्य दुर्गेश दक्षस्य च प्रजापतेः॥ ४८
भगोऽक्षिणी प्रपद्येत यजमानश्च जीवतु
पूष्णो दन्ताश्च रोहन्तु भृगोः श्मश्रूणि पूर्ववत्॥
भवतानुगृहीतानां देवादीनां च सर्वशः।
आरोग्यं भग्नगात्राणां शंकर त्वायुधाश्मभिः ॥ ५०
पूर्णभागोऽस्तु ते नाथाबशिष्टेऽध्वरकर्मणि।
रुद्रभागेन यज्ञस्ते कल्पितो नान्यथा क्वचित्॥ ५१
विष्णुको अपना मित्र माननेवाले, विष्णुको अपना
कुटुम्ब माननेवाले, भानुरूप, भैरव, सबको शरण
देनेवाले, त्रिलोचन एवं [सर्वत्र] विहार करनेवाले
[शिवजी]-को प्रणाम है ॥ ४०॥
मृत्युंजय, शोकस्वरूप, त्रिगुण, गुणरूप,
सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप नेत्रवाले तथा समस्त कारणोंके
सेतुस्वरूप आपको नमस्कार है। आपने ही अपने
तेजसे सारे जगतूको व्याप्त किया है। आप परब्रह्म,
विकाररहित, चिदानन्द एवं प्रकाशवान् हैं ॥ ४१-४२॥
हे महेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्र आदि
समस्त देव तथा अन्य मुनिगण आपसे ही उत्पन्न
हुए हैं॥ ४३॥
आप ही आठ प्रकारसे अपने शरीरको विभक्तकर
जगत्की रक्षा करते हैं, इस कारण आप अष्टमूर्ति
हैं। आप ही ईश्वर, जगतूके आदिकारण तथा करुणामय
हैं॥ ४४॥
आपके भयसे वायु सर्वदा बहता रहता है,
आपके भयसे अग्नि जलती है, आपके भयसे सूर्य
तपता है तथा आपके ही भयसे मृत्यु सर्वत्र दौड़ती
रहती है॥ ४५॥
हे दयासिन्धो! हे महेशान! हे परमेश्वर! आप
प्रसन्न होइये। हमलोग नष्ट और कर्तव्यशूऱ्य हो गये
हैं, अतः हमलोगोंकी रक्षा कीजिये॥ ४६॥
हे करुणानिधान! हे नाथ! आपने सदैव ही
आपत्तियोंमें हमलोगोंकी रक्षा की है। हे शम्भो! उसी
प्रकार आज भी हमलोगोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४७॥
हे नाथ! हे दुर्गेश! हे कृपा करनेवाले! आप
प्रजापति दक्षके अपूर्ण यज्ञका उद्धार कीजिये॥ ४८॥
भग देवता पूर्ववत् नेत्र प्राप्त कर लें, यजमान
दक्ष जीवित हो जायं, पूषा अपने दाँतोंको पूर्ववत् प्राप्त
कर लें तथा महर्षि भृगुकी दाढ़ी पूर्ववत् हो जाय॥ ४९॥
हे शंकर! शस्त्रोंसे तथा पत्थरोंसे छिन्न-भिन्न
शरीरवाले तथा आपके द्वारा अनुगृहीत देवता आदिको
आरोग्य प्राप्त हो जाय॥५०॥
हे जाथ! इस शेष यज्ञकर्ममें आपका ही पूर्ण
भाग हो। आपके उसी रुद्रभागसे ही यज्ञकी पूर्ति
होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥५१॥
४९६ श्रीशिवमहापुराण [ eg प
इत्युक्त्वा सप्रजेशश्व रमेशश्च कृताञ्जलिः।
यह कहकर ब्रह्मासहित विष्णुदेव
जोड़कर क्षमा करानेके लिये उद्यत हो ह
दंडवत्पतितो भूमौ क्षमापयितुमुद्यतः॥ ५२ | समान पृथिवीपर लेट गये॥ ५२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे देवस्तुतिवर्णनं नामैकचत्वारिंशो5ध्याय: ॥ शा
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें देवताओंद्वारा
स्तुति-वर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४९ ॥
——— ooo
अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शिवका देवता आदिपर अनुग्रह, दक्षयज्ञ-मण्डपमें पधारकर दक्षको
जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिद्वारा शिवकी स्तुति
ब्रह्मोवाच
्रीब्रह्मेशप्रजेशेन सदैव मुनिना च वे।
अनुनीतः शंभुरासीत्प्रसन्नः परमेश्वर: ॥
आश्वास्य देवान् विष्ण्वादीन् विहस्य करुणानिधिः ।
उवाच परमेशानः कुर्वन् परमनुग्रहम्॥
श्रीमहादेव उवाच
श्रृणुतं सावधानेन मम वाक्यं सुरोत्तमौ।
यथार्थं वच्मि वां तात वां क्रोधं सर्वदासहम्॥
नाघं तनौ तु बालानां वर्णये नानुचिन्तये।
मम मायाभिभूतानां दंडस्तत्र धृतो मया॥
दक्षस्य यज्ञभङ्गोऽयं न कृतश्च मया क्वचित्।
परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति॥
परेषां क्लेदनं कर्म न कार्य तत् कदाचन।
परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति॥
दक्षस्य यज्ञशीष्णों हि भवत्वजमुखं शिरः।
मित्रनेत्रेण संपश्येद्यज्ञभागं भगः सुरः॥
पूषाभिधः सुरस्तात दद्धिर्जक्षतु पिष्टभुक् ।
याजमानैर्भग्नदन्तः सत्यमेतन्मयोदितम्॥
बस्तशपर्रुर्भवेदेव भृगुर्मम विरोधकृत्
२
रे
है.
_
६
७
८
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] मुझ ब्रह्मा
लोकपाल, प्रजापति तथा मुनियोंसहित विष्णुके अनुनय-
विनय करनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये | विष्णु
आदि देवताओंको आश्वासन देकर उनपर परम
अनुग्रह करते हुए करुणानिधान परमेश्वर शिवजी
हँसकर कहने लगे-॥ १-२॥
श्रीमहादेवजी बोले-हे श्रेष्ठ देवताओ! आप
दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कह
रहा हूँ, हे तात! मैं आप दोनोंका क्रोध सर्वदा सहता
रहता हूँ। बालकों अर्थात् अज्ञानियोके द्वारा किये गये
अपराधका मैं न तो वर्णन करता हूँ और न चिन्तन ही
करता हूँ। इसपर भी मेरी मायासे रन्त प्राणियोके
शिक्षणार्थं ही मैं दण्ड धारण करता हुँ॥ ३-४॥
दक्षके यज्ञका विध्वंस मैंने कभी नहीं किया है।
दक्ष स्वयं ही दूसरोंसे द्वेष करते हैं। दूसरोंके प्रति जैसा
व्यवहार किया जायगा, वह अपने लिये ही फलित
होगा। अतः दूसरोंको कष्ट देनेवाला कार्य कभी नहीं
करना चाहिये, जो दूसरोंसे द्वेष करता है, वह ष
अपने लिये ही होता है॥ ५-६॥
दक्षका मस्तक जल गया है, इसलिये इतके
सिरके स्थानमें बकरेका सिर जोड़ दिया जाय! 5)
देवता मित्रकी आँखसे यज्ञका भाग देखें। हे ता
पूषा नामक देवता, जिनके दाँत टूट गये हैं, क
दाँतोंसे भलीभाँति पिसे हुए अन्नका भक्षण करें। पर
मैंने सच्ची बात बतायी है। मेरा विरोध |
भृगुकी दाढ़ीके स्थानमें बकरेकी दाढ़ी लगा दी जा
शेष सभी देवताओंके, जिन्होंने मुझे यज्ञका उर्च्£
अ० ४२]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ९७
देवा: प्रकृतिसर्वांगा ये म उच्छेषणं ददु:॥ ९
बाहुभ्यामश््विनो पूष्णो हस्ताभ्यां कृतवाहक: ।
भरवन्त्वध्वर्यवश्चान्ये भवत्प्रीत्या मयोदितम्॥ १०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा परमेशानो विरराम दयान्वितः।
चराचरपतिर्देबः सम्राट् वेदानुसारकृत्॥ ११
तदा सर्वे सुराद्यास्ते श्रुत्वा शंकरभाषितम्।
साधु साध्विति संप्रोचुः परितुष्टाः सविष्णवजाः॥ १२
ततः शंभुं समामन्त्र्य मया विष्णुः सुरर्षिभिः ।
भूयस्तद्देवयजनं ययौ च परया मुदा॥ १३
एवं तेषां प्रार्थनया विष्णुप्रभृतिभिः सुरैः।
ययौ कनखलं शंभुर्यज्ञवाटं प्रजापतेः॥ १४
रुद्रस्तदा ददर्शाथ वीरभद्रेण यत्कृतम्
प्रध्वंसं तं क्रतोस्तत्र देवर्षीणां विशेषतः॥ १५
स्वहा स्वधा तथा पूषा तुष्टिर्धृतिः सरस्वती।
तथान्ये ऋषयः सर्वे पितरश्चाग्नयस्तथा॥ १६
येऽन्ये च बहवस्तत्र यक्षगंधर्वराक्षसाः।
तरोटिता लुंचिताश्चैव मृताः केचिद्रणाजिरे॥ १७
यज्ञं तथाविधं दृष्ट्वा समाहूय गणाधिपम्
वीरभद्रं महावीर्यमुवाच प्रहसन् प्रभुः ॥ १८
वीरभद्र महाबाहो किं कृतं कर्म ते त्विदम्
महान् दंडो धृतस्तात देवर्ष्यादिषु सत्वरम्॥ १९
दक्षमानय शीघ्रं त्वं येनेदं कृतमीदृशम्।
यज्ञो विलक्षणस्तात यस्येदं फलमीदूशम्॥ २०
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तः शंकरेण वीरभन्रस्त्वरान्वितः।
कबंधमानयित्वाग्रे तस्य शंभोरथाक्षिपत्॥
भाग दिया, सारे अंग पहलेकी भाँति ठीक हो जायँ।
याज्ञिकोंमेंसे जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे
अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट
हो गये हैं, बे पूषाके हाथोंसे अपना काम चलायें।
यह मैंने आपलोगोंके प्रेमवश कहा है॥ ७-१०॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] इस प्रकार कहकर
वेदका अनुसरण करनेवाले सुरसम्राट् चराचरपति
दयालु परमेश्वर महादेवजी चुप हो गये। भगवान्
शंकरका वह वचन सुनकर श्रीविष्णु और ब्रह्मासहित
सम्पूर्ण देवता सन्तुष्ट हों गये। वे तत्काल साधुवाद
देने लगे। तदनन्तर भगवान् शम्भुको आमन्त्रित करके
मुझ ब्रह्मा और देवर्षियोंके साथ भगवान् विष्णु
अत्यन्त हर्षित हो पुनः दक्षकी यज्ञशालाकी ओर
चले॥ ११-१३॥
इस प्रकार उनकी प्रार्थनासे भगवान् शम्भु विष्णु
आदि देवताओंके साथ कनखलमें स्थित प्रजापति
दक्षकी यज्ञशालामें गये। उस समय रुद्रदेवने वहाँ
यज्ञका और विशेषतः देवताओं तथा ऋहषियोंका
विध्वंस, जो वीरभद्रके द्वारा किया गया था, उसे
देखा॥ १४-१५॥
स्वाहा, स्वधा, पूषा, तुष्टि, धृति, सरस्वती,
अन्य समस्त ऋषि, पितर, अग्नि तथा अन्यान्य बहुत-
से यक्ष, गन्धर्व और राक्षस वहाँ पड़े थे। उनमेंसे कुछ
लोगोंके अंग तोड़ डाले गये थे। कुछ लोगोंके बाल
नोंच लिये गये थे और कितने ही उस समरांगणमें मरे
पड़े थे॥ १६-१७॥
उस यज्ञकी वैसी दुरवस्था देखकर भगवान्.
शंकरने अपने गणनायक पराक्रमी वीरभद्रको बुलाकर
हँसते हुए कहा-हे महाबाहु वीरभद्र! यह तुमने
कैसा काम किया? हे तात! थोड़ी ही देरमें देवता
तथा ऋषि आदिको बड़ा भारी दण्ड दे दिया! हे तात!
जिसने ऐसा [द्रोहपूर्ण] कार्य किया तथा इस विलक्षण
यज्ञका आयोजन किया और जिसे ऐसा फल मिला,
उस दक्षको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ॥ १८-२०॥
ब्रह्माजी बोले-- भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर
वीरभद्रने शीघ्रतापूर्वक दक्षका धड़ लाकर उन शम्भुके
समक्ष डाल दिया॥ २१॥
४९८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० व क
विशिरस्कं च तं दृष्ट्वा शंकरो लोकशंकरः ।
'वीरभद्रमुवाचाग्रे विहसन् मुनिसत्तम॥
शिरः कुत्रेति तेनोक्तं वीरभत्रोऽब्रवीत्प्रभुः।
मया शिरो हुतं चाग्नौ तदानीमेव शंकर॥ २३
इति श्रुत्वा वचस्तस्य वीरभद्रस्य शंकरः।
देवान् तथाज्ञपत्प्रीत्या यदुक्तं तत्पुरा प्रभुः॥ २४
विधाय कार्त्स्येन च तद्यदाह भगवान् भव: ।
मया विष्णवादयः सर्वे भृग्वादीनथ सत्वरम्॥ २५
अथ प्रजापतेस्तस्य सवनीयपशोः शिरः।
बस्तस्य संदधुः शंभोः कायेनारं सुशासनात्॥ २६
संधीयमाने शिरसि शंभुसददृष्टिवीक्षितः।
सद्य: सुप्त इवोत्तस्थौ लब्धप्राणः प्रजापतिः ॥ २७
उत्थितश्चाग्रतः शंभुं ददर्श करुणानिधिम्।
दक्षः प्रीतमतिः प्रीत्या संस्थितः सुप्रसन्नधीः ॥ २८
पुरा हरमहाद्रेषकलिलात्माभवद्धि सः।
शिवावलोकनात् सद्यः शरच्न्द्र इवामलः ॥ २९
भवं स्तोतुमनाः सोऽथ नाशक्नोदनुरागतः।
उत्कण्ठाविकलत्वाच्च संपरेतां सुतां स्मरन्॥ ३०
अथ दक्षः प्रसन्नात्मा शिवं लजासमन्वितः।
तुष्टाव प्रणतो भूत्वा शंकरं लोकशंकरम्॥ ३१
दक्ष उवाच
नमामि देवं वरदं वरेण्यं
महेश्वरं ज्ञाननिधिं सनातनम्।
नमामि देवाधिपतीशवरं हरं
सदा सुखाढ्यं जगदेकबांधवम्॥ ३२
नमामि विश्वेश्वर विश्वरूपं
पुरातनं ब्रह्मनिजात्मरूपम्।
नमामि शर्व भवभावभावं
परात्परं शंकरमानतोऽस्मि॥ ३३
हे मुनिश्रेष्ठ! उसे सिररहित देख लोककल्याण
भगवान् शंकरने आगे खड़े हुए वीरभद्रसे म
पूछा-दक्षका सिर कहाँ है ? तब प्रभावशाली वीशन
कहा-हे शंकर! मैंने तो उसी समय दक्षके £
आगमें होम कर दिया था॥ २२-२३॥
वीरभद्रकी यह बात सुनकर शंकते
देवताओंको प्रसन्नतापूर्वक वैसी ही आज्ञा दी, जो पहले
दे रखी थी। भगवान् भवने उस समय जो कुछ कहा
उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि सब देवता
भृगु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया ॥ २४-२५॥
तदनन्तर शम्भुके आदेशसे प्रजापति दक्षके धडे
साथ सवनीय पशु--बकरेका सिर जोड़ दिया गया
उस सिरके जोड़े जाते ही शम्भुकी कृपादृष्टि पडनेसे
प्रजापति दक्ष प्राण प्राप्त करके तत्क्षण सोकर जगे हुए
पुरुषकी भाँति उठकर खड़े हो गये॥ २६-२७॥
उठते ही दक्षने प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्वक
अपने सामने करुणानिधि भगवान् शंकरको देखा।
पहले महादेवजीसे द्वेष करनेके कारण उनका अन्त:कण
मलिन हो गया था, परंतु उस समय शिवजीके दर्शनसे
वे तत्काल शरदू ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति निर्मल हो
गये॥ २८-२९॥
यद्यपि वे [प्रेमके वशीभूत होकर] मम्मे
शिवजीकी स्तुति करनेकी इच्छा कर रहे थे, किंतु उरं
उसी समय सतीके ब्रह्माजी बोले-शरीरत्यागका स्मरण
हो गया, इसलिये वे उत्कण्ठासे व्याकुल होनेके कारण
स्तुति नहीं कर सके ॥ ३०॥
तदनन्तर लज्जित होकर दक्ष प्रजापति प्रसलचिए
हो विनम्रतापूर्वक लोकका कल्याण करनेवाले शंकरी
स्तुति करने लगे॥ ३१॥
दक्ष बोले--वरदानी, श्रेष्ठ, महेश्वर, ज्ञान
सनातन देवको नमस्कार करता हूँ। देवाधि
ईश्वर, सुखरूप एवं संसारके एकमात्र बन्धु
शंकरजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३२॥
हे विश्वेश्वर! [आप] विश्वरूप, पुरातन, बरी
तथा आत्मस्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं
नमस्कार करता हूँ। मैं संसारके भावोंका |
करनेवाले परात्पर शंकरको नमस्कार करता हूँ॥ २९
अ० ४२]
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४९९
देवदेव महादेव कृपां कुरु नमोऽस्तु ते।
अपराधं क्षमस्वाद्य मम शंभो कृपानिधे॥ ३४
अनुग्रहः कृतस्ते हि दंडव्याजेन शंकर।
खलोऽहं मूढधीर्देव ज्ञातं तत्त्वं मया न ते॥ ३५
अद्य ज्ञातं मया तत्त्वं सर्वोपरि भवान्मतः।
विष्णुब्रह्मादिभिः सेव्यो वेदवेद्यो महेश्वरः ॥ ३६
साधूनां कल्पवृक्षस्त्वं दुष्टानां दंडधृक् सदा।
स्वतन्त्रः परमात्मा हि भक्ताभीष्टवरप्रदः॥ ३७
विद्यातपोब्रतधरानसृजः प्रथमं द्विजान्
आत्मतत्त्वं समावेत्तुं मुखतः परमेश्वर: ॥ ३८
सर्वापद्भ्यः पालयिता गोपतिस्तु पशूनिव।
गृहीतदंडो दुष्टांस्तान् मर्यादापरिपालकः॥ ३९
मया दुरुक्तविशिखैः प्रविद्धः परमेश्वरः।
अमरानतिदीनाशान् मदनुग्रहकारकः॥ ४०
स भवान् भगवान् शंभो दीनबंधो परात्पर: ।
स्वकृतेन महाहेण संतुष्टो भक्तवत्सल॥ ४१
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महेशानं शंकरं लोकशंकरम्।
प्रजापतिर्विनीतात्मा विरराम महाप्रभुम्॥ ४२
अथ विष्णुः प्रसन्नात्मा तुष्टाव वृषभध्वजम्
बाष्पगद्गदया वाण्या सुप्रणम्य कृताञ्जलिः ॥ ४३
विष्णुरुवाच
महादेव महेशान लोकानुग्रहकारक।
परब्रह्म परात्मा त्वं दीनबंधो दयानिधे॥ ४४
सर्वव्यापी स्वैरवर्ती वेदवेद्ययशाः प्रभो।
अनुग्रहः कृतस्तेन कृताश्चासुकृता वयम्॥ ४५
दक्षोऽयं मम भक्तस्त्वां यन्निनिंद खलः पुरा।
तत् क्षन्तव्यं महेशाद्य निर्विकारो यतो भवान्॥ ४६
हे देवदेव ! हे महादेव ! आपको नमस्कार है, मुझपर
कृपा कीजिये। हे कृपानिधे ! हे शम्भो ! आज मेरे अपराधको
क्षमा कीजिये । हे शंकर! आपने दण्डके बहाने ही मुझपर
अनुग्रह किया है। मैं खल और मूर्ख हूँ; हे देव! मुझे
आपके तत्त्वका ज्ञान नहीं था॥ ३४-३५॥
हे प्रभो! आप विष्णु एवं ब्रह्मादि देवोंके भी
सेव्य, वेदोंसे जाननेयोग्य तथा महेश्वर हैं । आज मुझे
आपके तात्त्विक स्वरूपका ज्ञान हुआ है, आप सभी
लोगोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। आप सत्पुरुषोंके लिये
कल्पवृक्ष हैं और दुष्टोंको सदा दण्ड प्रदान करनेवाले
हैं। आप सर्वथा स्वतन्त्र परमात्मा हैं एबं भक्तोंको
अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं ॥ ३६-३७॥
आप परमेश्वरने ही अपने मुखसे विद्या, तप
तथा ब्रत धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंको तत्त्वका
साक्षात्कार करनेके लिये उत्पन्न किया है॥ ३८॥
समस्त गोरूप पशुओंकी रक्षा जिस प्रकार
गोपतिद्वारा की जाती हैं, उसी प्रकार आप सभी विपत्तियोंसे
रक्षा करते हैं । आप मर्यादाके परिपालक तथा दुर्जनोंके
लिये दण्ड धारण करते हैं। हे भगवन्! मैंने अनेक
प्रकारके कटु वचनरूपी बाणोंसे आप परमेश्वरको बाँध
डाला था, फिर भी अत्यन्त क्षीण आशावाले इन देवताओं-
सहित मुझपर आपने दया ही की है॥ ३९-४०॥
इसलिये हे शम्भो! हे दीनबन्धो! हे भक्तवत्सल!
आप परात्पर भगवान् मेरे द्वारा की गयी पूजासे सन्तुष्ट
हो जाइये ॥ ४१॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार लोकका कल्याण
करनेवाले महाप्रभु महेश्वरकी विनम्रतापूर्वक स्तुतिकर
प्रजापति मौन हो गये । उसके बाद भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त
होकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके गद्गद वाणीसे
वृषभध्वज शिवकी स्तुति करने लगे-- ॥ ४२-४३ ॥
विष्णु बोले-हे महादेव! हे महेशान! लोकपर
अनुग्रह करनेवाले हे दीनबन्धो ! हे दयानिधे ! आप परब्रह्म
परमात्मा हैं। हे प्रभो! आप सर्वव्यापी स्वतन्त्र हैं,
आपका यश वेदोंसे ही जाना जा सकता है। आपने
हमलोगोंपर कृपा की है, उससे हमलोग कृतकृत्य हो
गये॥ ४४-४५॥
हे महेश्वर! इस मेरे भक्त दुष्ट दक्षने पूर्वमें
आपकी जो निन्दा की है, उसे आप आज क्षमा कीजिये;
५००
श्रीशिवमहापुराण
[अ ` ¬= === - पच काक ` `
कृतो मयापराधोऽपि तव शंकर मौढ्यतः।
त्वद्गणेन कृतं युद्धं वीरभद्रेण पक्षतः॥ ४७
त्वं मे स्वामी परब्रह्म दासोऽहं ते सदाशिव ।
पोष्यश्चापि सदा ते हि सर्वेषां त्वं पिता यतः॥ ४८
ब्रह्मोवाच
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
स्वतन्त्रः परमात्मा त्वं परमेशोऽद्टयोऽव्ययः॥ ४९
मम पुत्रोपरि कृतो देवानुग्रह ईश्चर।
स्वापमानमगणयन् दक्षयज्ञं समुद्धर॥ ५०
प्रसन्नो भव देवेश सर्वशापान्निराकुरु।
सबोधः प्रेरकस्त्वं मे त्वमेव विनिवारकः॥ ५१
इति स्तुत्वा महेशानं परमं च महामुने।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनम्रीकृतमस्तकः॥ ५२
अथ शक्रादयो देवा लोकपालाः सुचेतसः।
तुष्टुवुः शंकरं देवं प्रसन्नमुखपंकजम्॥ ५३
ततः प्रसन्नमनसः सर्वे देवास्तथा परे।
सिद्धर्षयः प्रजेशाश्च तुष्टुवुः शंकरं मुदा॥ ५४
तथोपदेवनागाश्च सदस्या ब्राह्मणास्तथा।
प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टुवुश्च पृथक् पृथक् ॥ ५५
क्योंकि आप निर्विकार हैं। हे शंकर! मैंने भी
आपका अपराध किया है, जो दक्षके पक्षसे आपके
गण वीरभद्रके साथ युद्ध किया॥ ४६-४७ ॥
हे सदाशिव! आप मेरे स्वामी हे, आप
हैं, मैं आपका दास हूँ, आप सभीके पिता हैं। इसलिये
आपको हम सबका पालन करना चाहिये॥४८॥
ब्रह्माजी बोले--हे देवदेव! हे महादेव! हे
करुणासागर! हे प्रभो! आप स्वतन्त्र, परमात्मा
परमेश्वर, अद्वय तथा अविनाशी हैं ॥ ४९॥ '
हे ईश्वर हे देव! आपने मेरे इस पुत्रपर अनुग्रह
किया है, अब आप अपना अपमान भूलकर दक्षके
यज्ञका उद्धार कीजिये। हे देवेश! अब आप प्रसन्न
हो जाइये और अपने सभी प्रकारके शापोंसे इसका
उद्धार कीजिये; आप ज्ञानवान् ही मुझे प्रेरणा देनेवाले
हैं और आप ही निवारण करनेवाले हैं॥ ५०-५१॥
हे महामुने! इस प्रकार परमात्मा महेश्वरकी
स्तुति करके दोनों हाथ जोड़कर मैंने अपने मस्तकको
झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर इन्द्र आदि
देवतागण एवं लोकपाल सावधान होकर प्रसन्न मुखः
कमलवाले शंकरजीकी स्तुति करने लगे॥ ५२-५३॥
उसके बाद अन्य सभी देवता, सिद्ध, ऋषि एवं
प्रजापतिगण भी प्रसन्नताके साथ शिवजीकी स्तुति
करने लगे। तत्पश्चात् उपदेवता, नाग, सदस्य तथा
ब्राह्मणलोग भी सद्रक्तिसे प्रणामकर अलग-अला
स्तुति करने लगे॥ ५४-५५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
दक्षदुःखनिराकरणवर्णनं नाम द्विचत्वारिशोऽध्यायः॥ ४२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षके
दुःखनिराकरणका वर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों
देवोंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, देवताओंका अपने-अपने
लोकोंको प्रस्थान तथा सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले--हे नारद! इस प्रकार राप
इति स्तुतो रमेशेन मया चैव सुरर्षिभिः। | विष्णु, मेरे, देवताओं, ऋषियों तथा अन्य लोगॉके
तथान्यैश्च महादेवः प्रसन्नः संबभूव ह॥ १ | स्तुति करनेपर महादेवजी बड़े प्रसन्न हो गये॥ १॥
अ० ४३]
अथ शंभुः कृपादृष्ट्या सर्वान् क्रषिसुरादिकान्।
ब्रह्मविष्णू समाधाय दक्षमेतदुवाच ह॥ २
महादेव उवाच
श्रृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि प्रसन्नोऽस्मि प्रजापते।
भरक्ताधीनः सदाहं वै स्वतन्त्रोऽप्यखिलेशवरः॥ ३
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठास्तेषां दक्ष प्रजापते॥ ४
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चैव चतुर्थकः।
पूर्वे त्रयश्च सामान्याश्चतुर्थो हि विशिष्यते॥ ५
तत्र ज्ञानी प्रियतरो मम रूपं च स स्मृतः।
तस्मात्प्रियतरो नान्यः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ ६
ज्ञानगम्योऽहमात्मज्ञो वेदान्तश्रुतिपारगैः।
विना ज्ञानेन मां प्राप्तुं यतन्ते चाल्पबुद्धयः॥ ७
न वेदैश्च न यज्ञेश्च न दानैस्तपसा क्वचित्।
न शक्नुवन्ति मां प्राप्तुं मूढाः कर्मवशा नराः॥ ८
केवलं कर्मणा त्वं स्म संसारं तर्तुमिच्छसि।
अत एवाभवं रुष्टो यज्ञविध्वंसकारकः॥ ९
इतः प्रभृति भो दक्ष मत्वा मां परमेश्वरम्
बुद्धया ज्ञानपरो भूत्वा कुरु कर्म समाहितः॥ १०
अन्यच्च शृणु सद्बुद्धया वचनं मे प्रजापते।
वच्मि गुह्यं धर्महेतोः सगुणत्वेऽप्यहं तव॥ ११
अहं ब्रह्मा च विष्णुश्च जगतः कारणं परम्।
आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयंदृगविशेषणः॥ १२
आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं मुने।
सृजन् रक्षन्हरन्विश्वं दधे संज्ञाः क्रियोचिताः॥ १३
रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
५०१
तब वे शम्भु कृपादृष्टिसे सभी ऋषियों एवं
देवताओंको देखकर तथा मुझ ब्रह्मा और श्रीविष्णुका
समाधान करके दक्षसे इस प्रकार कहने लगे-॥ २॥
महादेव बोले-हें प्रजापते! हे दक्ष! मैं [जो
कुछ] कह रहा हूँ, सुनिये, मैं प्रसन्न हूँ। यद्यपि मैं
सबका ईश्वर हूँ और स्वतन्त्र हूँ, फिर भी सदा
भक्तोंके अधीन रहता हूँ॥ ३॥
चार प्रकारके पुण्यात्मा मेरा भजन करते हैं। हे
दक्ष! हे प्रजापते! उनमें पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ
हैं॥४॥
उनमें आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और चौथा ज्ञानी
है। पहलेके तीन तो सामान्य [भक्त] हैं और चौथा
विशिष्ट महत्त्वका है॥५॥
उनमें चौथा ज्ञानी ही मुझे अधिक प्रिय है और
वह मेरा रूप माना गया है। उससे बढ़कर दूसरा कोई
मुझे प्रिय नहीं है, मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ॥ ६॥
वेद-वेदान्तके पारगामी विद्वान् ही मुझ आत्मज्ञानीको
ज्ञानके द्वारा जान सकते हैं, अल्प बुद्धिवाले ही
ज्ञानके बिना मुझे प्राप्त करनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ७॥
कर्मके वशीभूत मूढ़ मानव न वेदोंसे, न यज्ञोंसे,
न दानोंसे और न तपस्यासे ही मुझे पा सकते हें ॥ ८ ॥
आप केवल कर्मके द्वारा ही इस संसारको पार
करना चाहते थे, इसीलिये रुष्ट होकर मैंने इस यज्ञका
विनाश किया है। अतः हे दक्ष! आजसे आप बुद्धिके
द्वारा मुझे परमेश्वर मानकर ज्ञानका आश्रय लेते हुए
सावधान होकर कर्म कीजिये॥ ९-१०॥
प्रजापते! आप उत्तम बुद्धिके द्वारा मेरी दूसरी
बात भी सुनिये, मैं अपने सगुण स्वरूपके विषयमें भी
धर्मकी दृष्टिसे गोपनीय बात आपसे कहता हूँ॥ ११॥
जगतूका परम कारणरूप मैं ही ब्रह्मा और विष्णु
हूँ। मैं सबका आत्मा, ईश्वर, साक्षी, स्वयंप्रकाश तथा
निर्विशेष हूँ॥ १२॥
हे मुने! अपनी [त्रिगुणात्मिका] मायामें प्रवेश
करके मैं ही जगतका सूजन, पालन और संहार करता
हुआ क्रियाओंके अनुरूप [ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र]
जामोंको धारण करता हूँ.॥ १३॥
५०२
श्रीशिवमहापुराण
[अण I १ 0 शशागा--- "१
अद्वितीये परे तस्मिन् ब्रह्मण्यात्मनि केवले।
अज्ञः पश्यति भेदेन भूतानि ब्रह्म चेश्वरम्॥ १४
शिरःकरादिस्वाङ्केषु कुरुते न यथा पुमान्।
पारक्यशेमुषीं क्वापि भूतेष्वेव॑ हि मत्परः॥ १५
सर्वभूतात्मनामेकभावानां यो न पश्यति।
त्रिसुराणां भिदां दक्ष स शांतिमधिगच्छति॥ १६
यः करोति त्रिदेवेषु भेदबुद्धिं नराधमः।
नरके स वसेन्नूनं यावदाचन्द्रतारकम्॥ १७
मत्परः पूजयेद्देवान् सर्वानपि विचक्षणः।
स ज्ञानं लभते येन मुक्तिर्भवति शाश्वती॥ १८
विधिभक्तिं विना नैव भक्तिर्भवति वैष्णवी।
विष्णुभक्तिं विना मे न भक्तिः क्वापि प्रजायते ॥ १९
इत्युक्त्वा शंकरः स्वामी सर्वेषां परमेश्वर: ।
सर्वेषां श्रृण्वतां तत्रोवाच वाणीं कृपाकरः॥ २०
हरिभक्तो हि मां निन्देत्तथा शैवो भवेद्यदि।
तयोः शापा भवेयुस्ते ततत्वप्राप्तिर्भवेन्न हि॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं महेशस्य वचनं सुखकारकम्।
जहर्षुः सकलास्तत्र सुरमुन्यादयो मुने॥ २२
'दक्षोऽभवन्महाप्रीत्या शिवभक्तिरतस्तदा।
सकुटुम्बः सुराद्यास्ते शिवं मत्वाखिलेश्वरम्॥ २३
यथा येन कृता शंभोः संस्तुतिः परमात्मनः।
तथा तस्मै वरो दत्तः शंभुना तुष्टचेतसा॥ २४
उस अद्वितीय ( भेदरहित), केवल ( विशुद्ध)
परब्रह्म परमात्मामें अज्ञानी पुरुष ही ब्रह्म, ईश्वर ha
अन्य समस्त जीवोंको भिन्न रूपसे देखता है॥ १४॥
जैसे मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगों ये
मुझसे भिन्न हैं, ऐसी] परकीय बुद्धि कभी
करता, उसी तरह मेरा भक्त सभी प्राणियोंमें भेदबुद्ि
नहीं रखता॥ १५ ॥
हे दक्ष! सभी भूतोंके आत्मास्वरूप तथा एक हौ
भाववाले [ ब्रह्मा, विष्णु और मुझ शिव] इन तीनो
देवताओंमें जो भेद नहीं देखता, वही शान्ति प्रा
करता है॥ १६॥
जो नराधम तीनों देवताओंमें भेदबुद्धि रखता है,
वह निश्चय ही जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं,
तबतक नरकमें निवास करता है॥ १७॥
मुझमें परायण होकर जो बुद्धिमान् मनुष्य सभी
देवताओंकी पूजा करता है, उसे इस प्रकारका ज्ञान
हो जाता है, जिससे उसकी शाश्वती मुक्ति हो जाती
है॥ १८॥
विधाताकी भक्तिके बिना विष्णुकी भक्ति नहीं
हो सकती और विष्णुकी भक्तिके बिना मेरी भक्ति
कभी नहीं हो सकती है॥ १९॥
ऐसा कहकर कृपालु, सबके स्वामी परमेश्वर
शिव सबको सुनाते हुए फिर यह वचन बोले-
॥२०॥
यदि कोई विष्णुभक्त मेरी निन्दा करेगा और मेश
भक्त विष्णुकी निन्दा करेगा, तो आपको दिये हुए
समस्त शाप उन्हीं दोनोंको प्राप्त होंगे और निश्चय
ही उन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती॥ २१॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! भगवान् महेश्वर
इस सुखकर वचनको सुनकर वहाँ [उपस्थित] सभी
देवता, मुनि आदि अत्यन्त हर्षित हुए॥ २२॥
शिवको अखिलेशवर मानकर दक्ष कुटुम्ब
प्रसनतापूर्वक शिवभक्तिमें तत्पर हो गये और वे देंगी
आदि भी शिवभक्तिपरायण हो गये॥ २३॥
जिसने जिस प्रकारसे परमात्मा शम्धुकी ख
को थी, उसे उसी प्रकार सनतुष्टचित्त हुए शम्भु
दिया॥ २४॥
अ० ४३]
प्तः शिवेनाशु दक्षः शिवभक्तः प्रसन्नधीः।
यज्ञं चकार संपूर्ण शिवानुग्रहतो मुने॥ २५
ददौ भागान्सुरेभ्यो हि पूर्णभागं शिवाय स: ।
दानं ददौ द्विजेभ्यश्च प्राप्तः शंभोरनुग्रहः॥ २६
अथ देवस्य सुमहत्तत्कर्म विधिपूर्वकम्।
दक्षः समाप्य विधिवत्सहत्विग्भि: प्रजापतिः ॥ २७
एवं दक्षमखः पूर्णोऽभवत्तत्र मुनीश्वर।
शंकरस्य प्रसादेन परकब्रह्मस्वरूपिण:॥ २८
अथ देवर्षयः सर्वे शंसन्तः शांकरं यशः।
स्वधामानि ययुस्तुष्टाः परेऽपि सुखतस्तदा॥ २९
अहं विष्णुश्च सुप्रीतावपि स्वं स्वं परं मुदा।
गायन्तौ सुयशः शंभोः सर्वमङ्गलदं सदा॥ ३०
दक्षसम्मानितः प्रीत्या महादेवोऽपि सद्गतिः ।
कैलासं स ययौ शैलं सुप्रीतः सगणो निजम्॥ ३१
आगत्य स्वगिरि शंभुः सस्मार स्वप्रियां सतीम्।
गणेभ्यः कथयामास प्रधानेभ्यश्च तत्कथाम्॥ ३२
कालं निनाय विज्ञानी बहु तच्चरितं वदन्
लौकिकीं गतिमाश्रित्य दर्शयन् कामितां प्रभुः॥ ३३
जानीतिकारकः स्वामी परब्रह्म सतां गतिः।
तस्य मोहः क्व वा शोकः क्व विकारः परो मुने॥ ३४
अहं विष्णुश्च जानीवस्तद्धेदं न कदाचन।
के परे मुनयो देवा मानुषाद्याश्ज योगिनः ॥ ३५
महिमा शांकरो5नन्तो दुर्ज्ञेयो मनीषिभिः।
भक्तज्ञातश्व सद्भक्त्या तत्प्रसादाद्विना श्रमम्॥ ३६
रूद्रसंहिता ( सतीखण्ड )
५०३
हे मुने! उसके बाद भगवान् शिवकी आज्ञा
पाकर प्रसन्नचित्त हुए शिवभक्त दक्षने शिवजीकी
कृपासे यज्ञ पूरा किया॥ २५॥
उन्होंने देवताऑको यज्ञभाग दिया और शिवजीको
पूर्ण भाग दिया। साथ ही उन्होंने ब्राह्मणोंको दान भी
दिया। इस तरह उन्हें शम्भुका अनुग्रह प्राप्त हुआ॥ २६॥
इस प्रकार महादेवजीके उस महान् कर्मका विधि-
पूर्वक वर्णन किया गया। प्रजापति दक्षने ऋत्विजोंके
सहयोगसे उस यज्ञकर्मको विधिवत् समाप्त किया॥ २७॥
हे मुनीश्वर! इस प्रकार परब्रह्मस्वरूप शंकरकी
कृपासे दक्षका यज्ञ पूरा हुआ॥ २८॥
तदनन्तर सब देवता और ऋषि सन्तुष्ट होकर
भगवान् शिवके यशका वर्णन करते हुए अपने-अपने
स्थानको चले गये। दूसरे लोग भी उस समय वहाँसे
सुखपूर्वक चले गये॥ २९॥
मैं और भगवान् विष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न हो भगवान्
शिवके सदा सर्वमंगलदायक सुयशका निरन्तर गान करते
हुए अपने-अपने स्थानको सानन्द चल दिये॥ ३०॥
सत्पुरुषोंको आश्रय देनेवाले महादेवजी भी दक्षसे
प्रीतिपूर्वक सम्मानित हो प्रसन्नताके साथ गणोंसहित
अपने निवासस्थान कैलास पर्वतपर चले गये॥ ३१॥
अपने पर्वतपर आकर शम्भुने अपनी प्रिया सतीका
स्मरण किया और प्रधान गणोंसे वह कथा कही ॥ ३२॥
विज्ञानमय भगवान् शंकरने लौकिक गतिका
अवलम्बनकर अपने सकामभावको प्रकट करते हुए
तथा सतीचरित्र वर्णन करते हुए बहुत समय व्यतीत
'किया॥ ३३॥
हे मुने! वे सज्जनोंके शरणदाता, सबके स्वामी,
अनीति न करनेवाले तथा परब्रह्म हैं, उन्हें मोह, शोक
अथवा अन्य विकार कहाँसे हो सकता है !॥ ३४॥
जब मैं और विष्णु भी उनके भेदको कभी नहीं
जान पाये, तो अन्य देवता, मुनि, मनुष्य आदि तथा
योगिजनकी बात ही क्या है।॥ ३५॥
भगवान् शंकरकी महिमा अनन्त है, जिसे बड़े-
बडे विद्वान् भी जाननेमें असमर्थ हैं, किंतु भक्तलोग
उनकी कृपासे बिना श्रमके ही उत्तम भक्तिके द्वारा उसे
जान लेते हैं॥ ३६॥
५०४
श्रीशिवमहापुराण
[30 IOI IOI
एकोऽपि न विकारो हि शिवस्य परमात्मनः।
संदर्शयति लोकेभ्यः कृत्वा तां तादृशीं गतिम्॥ ३७
यत्पठित्वा च संश्रुत्य सर्वलोकसुधीर्मुने।
लभते सद्गतिं दिव्यामिहापि सुखमुत्तमम्॥ ३८
इत्थं दाक्षायणी हित्वा निजदेहं सती पुनः।
जज्ञे हिमवतः पत्यां मेनायामिति विश्रुतम्॥ ३९
पुनः कृत्वा तपस्तत्र शिवं वव्रे पतिं च सा।
गौरी भूत्वार्धवामाड़ी लीलाश्चक्रेऽद्भुताः शिवा ॥ ४०
इत्थं सतीचरित्रं ते वर्णितं परमाद्भुतम्।
भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं सर्वकामप्रदायकम्॥ ४१
इदमाख्यानमनघं पवित्रं परपावनम्।
स्वर्ग्य॑ यशस्यमायुष्यं पुत्रपौत्रफलप्रदम्॥ ४२
य इदं शृणुयाद् भक्त्या श्रावयेद्भक्तिमान्नरान्।
सर्वकर्मा लभेत्तात परत्र परमां गतिम्॥ ४३
यः पठेत्पाठयेद्वापि समाख्यानमिदं शुभम्।
सोऽपि भुकत्वाखिलान् भोगानन्ते मोक्षमवाप्नुयात्॥ ४४
परमात्मा शिवमें एक भी विकार नहीं है कि
लोकपरायण वे सगुणरूप धारणकर अपना चह
लोगोंको दिखाते हैं। हे मुने! जिसे पढ़कर भै
सुनकर सभी लोगोंमें बुद्धिमान् वह व्यक्ति इस लोक
उत्तम सुख एवं [अन्तमें] दिव्य सद्गति प्राप्त का
लेता है॥ ३७-३८॥
इस प्रकार दक्षकन्या सती [यज्ञमें] अपने
शरीरको त्यागकर फिर हिमालयकी पत्नी मेने
गर्भसे उत्पन्न हुई, यह बात प्रसिद्ध ही है॥३९॥
तत्पश्चात् वहाँ तपस्या करके गौरी शिवाने
भगवान् शिवका पतिरूपमें वरण किया। वे उनकी
वाम-अर्धांगिनी होकर अद्भुत लीलाएँ करने लगीं॥ ४०॥
[हे नारद!] इस प्रकार मैंने आपसे सतीके प
अद्भुत चरित्रका वर्णन किया, जो भोग-मोक्षको
देनेवाला, दिव्य तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला
है॥ ४१॥
यह आख्यान कालुष्यरहित, पवित्र, दूसरोंको
पवित्र करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और
पुत्र-पौत्ररूप फल प्रदान करनेवाला है ॥ ४२॥
हे तात! जो भक्तिमान् पुरुष भक्तिभावसे इसे
सुनता है और अन्य मनुष्योंको सुनाता है। वह [इस
लोकमें] सम्पूर्ण कमाँका फल पाकर परलोकमे
परमगति प्राप्त करता है॥ ४३॥
जो इस शुभ आख्यानको पढ़ता है अथवा
पढ़ाता है, वह भी समस्त सुखोंका उपभोग करे
अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ४४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे
दक्षयज्ञानुसंधानवर्णन॑ नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षयज्ञके
अनुसन्धानका वर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
॥इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्र्संहितायां
द्वितीयः सतीखण्डः समाप्तः ॥
॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम: ॥
श्रीशिवमहापुराण ८
द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीय: पार्वतीखण्डः
अथ प्रथमोऽध्यायः
पितरोंकी कन्या मेनाके साथ हिमालयके विवाहका वर्णन
नारद उवाच
दाक्षायणी सती देवी त्यक्तदेहा पितुर्मखे।
कथं गिरिसुता ब्रह्मन् बभूव जगदम्बिका॥ ९
कथं कृत्वा तपोऽत्युग्रं पतिमाप शिवं च सा।
एतन्मे पृच्छते सम्यक् कथय त्वं विशेषतः॥ २
ब्रह्मोवाच
श्रृणु त्वं मुनिशार्दूल शिवाचरितमुत्तमम्।
पावनं परमं दिव्यं सर्वपापहरं शुभम्॥ ३
यदा दाक्षायणी देवी हरेण सहिता मुदा।
हिमाचले सुचिक्रीडे लीलया परमेश्वरी॥ ४
मत्सुतेयमिति ज्ञात्वा सिषेवे मातृवर्चसा।
हिमाचलप्रिया मेना सर्वद्विभिरनिर्भरा॥ ५
यदा दाक्षायणी रूष्टा नादृता स्वतनुं जहौ।
पित्रा दक्षेण तद्यज्ञे सङ्गता परमेश्वरी॥ ६
तदैव मेनका तां सा हिमाचलप्रिया मुने।
शिवलोकस्थितां देवीमारिराधयिषुस्तदा॥ ७
तस्यामहं सुता स्यामित्यवधार्य सती हृदा।
त्यक्तदेहा मनो दध्रे भवितुं हिमवत्सुता॥ ८
समयं प्राप्य सा देवी सर्वदेवस्तुता पुनः।
सती त्यक्ततनुः प्रीत्या मेनकातनयाभवत्॥ ९
नाम्ना सा पार्वती देवी तपः कृत्वा सुदुस्सहम्।
नारदस्योपदेशाह्वै पतिं प्राप शिवं पुनः ॥ १०
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! अपने पिताके
यज्ञमें शरीरका त्यागकर दक्षकन्या सती देवी जगदम्बा
किस प्रकार हिमालयकी पुत्री बनीं और किस तरह
अत्यन्त उग्र तपस्या करके उन्होंने शिवजीको पतिरूपमें
प्राप्त किया मैं यह आपसे पूछ रहा हूँ, आप विशेष
रूपसे बताइये ॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! आप शिवाके
परम पावन, दिव्य, सभी पापोंको दूर करनेवाले,
कल्याणकारी तथा उत्तम चरित्रको सुनिये ॥ ३॥
दक्षकन्या सती देवी जब प्रसन्नचित्त होकर
शिवजीके साथ हिमालय पर्वतपर लीलापूर्वक क्रीड़ा
करती थीं, उस समय मातृप्रेमसे भरी हुई हिमालयकी
प्रिया मेना ' सम्पूर्ण सिद्धियोंसे युक्त यह मेरी पुत्री है '--
ऐसा समझकर उनकी सेवामें संलग्न रहती थीं ॥ ४-५ ॥
हे मुने! दक्षकन्या सती देवीने जब पिता
दक्षके द्वारा अपमानित होकर क्रोधित हो यज्ञमें अपना
शरीर त्याग दिया, उस समय हिमालयप्रिया मेना
शिवलोकमें स्थित उन भगवती सतीको आराधना
करना चाह रही थीं॥ ६-७॥
उन्हींके गर्भसे मैं पुत्रीके रूपमें उत्पन्न
होऊँ--ऐसा हृदयमें विचार करके शरीरका त्याग
करनेवाली सतीने हिमालयकी पुत्री होनेके लिये
मनमें निश्चय किया॥ ८ ॥
देहत्यागके अनन्तर समय आनेपर सभी देवताओंके
द्वारा स्तुत वे भगवती सती प्रसन्नतापूर्वक मेनका
(मेना)-की पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई॥ ९॥
उन देवीका नाम पार्वती हुआ। उन्होंने नारदके
उपदेशसे अत्यन्त कठोर तपस्याकर पुनः शिवजीको
'पतिरूपमें प्राप्त कियां॥ १०॥
५०६
श्रीशिवमहापुराण
[अ III
नारद उवाच.
ब्रह्मन् विधे महाप्राज्ञ बद् मे वदतां वर।
मेनकायाः समुत्पत्तिं विवाहचरितं तथा॥ ११
धन्या हि मेनका देवी यस्यां जाता सुता सती।
अतो मान्या च धन्या च सर्वेषां सा पतिब्रता॥ १२
ब्रह्मोवाच
श्रृणु त्वं नारद मुने पार्वतीमातुरुद्भवम्।
विवाहं चरितं चैव पावनं भक्तिवर्धनम्॥ १३
अन्त्युत्तरस्यां दिशि वै गिरीशो हिमवान्महान्।
पर्वतो हि मुनिश्रेष्ठ महातेजाः समृद्धिभाक् ॥ १४
वैरूप्यं तस्य विख्यातं जङ्गमस्थिरभेदतः।
वर्णयामि समासेन तस्य सूक्ष्मस्वरूपकम्॥ १५
पूर्वापरौ तोयनिधी सुविगाह्य स्थितो हि यः।
जानारलाकरो रम्यो मानदण्ड इव क्षितेः॥ १६
जानावृक्षसमाकीर्णो नानाभृङ्गसुचित्रितः।
सिंहव्याघ्रादिपशुभिः सेवितः सुखिभिः सदा ॥ १७
तुषारनिधिरत्युग्रो नानाश्चर्यविचित्रितः।
देवर्षिसिद्धमुनिभिः संश्रितः शिवसंप्रियः॥ १८
तपःस्थानोऽतिपूतात्मा पावनश्च महात्मनाम्।
तपस्सिददरिप्रदोऽत्यन्तं नानाधात्वाकरः शुभः॥ १९
स एव दिव्यरूपो हि रम्यः सर्वाङ्गसुन्दरः ।
विष्णवंशोऽविकृतः शैलराजराजः सतां प्रियः ॥ २०
कुलस्थित्यै च स गिरिर्धर्मवर्धनहेतवे।
स्वविवाहं कर्तुमैच्छत्पितृदेवहितेच्छया॥ २१
तस्मिन्नवसरे देवाः स्वार्थमाचिन्त्य कृत्स्नश: ।
ऊचुः पितृन्समागत्य दिव्यान्प्रीत्या मुनीश्वर॥ २२
नारदजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महार
हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप मुझसे मेनकाकी ता
उनके विवाह तथा चरित्रका वर्णन कीजिये॥ ११
जिनसे भगवती सतीने पुत्रीके रूपमें जन्म लिया
वे मेनका देवी धन्य हैं। इसीलिये वे पतित्रता मे
सभी लोगोंकी मान्य और धन्य हैं॥ १२॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! हे मुने! आप
पार्वतीकी माताके जन्म, विवाह एवं अन्य भक्तिवर्धक
पावन चरित्रको सुनिये। हे मुनिश्रेष्ठ! उत्तर दिशा
पर्वतोंका राजा हिमालय नामक महान् पर्वत है। जे
महातेजस्वी और समृद्धिशाली है॥ १३-१४॥
जंगम तथा स्थावरभेदसे उसके दो रूप प्रसिद्ध
हैं, मैं उसके सूक्ष्म स्वरूपका संक्षेपमें वर्णन कर रहा
हूँ। वह पर्वत रमणीय एवं अनेक प्रकारके रलोंका
आकर (खान) है, जो पूर्व तथा पश्चिम समुद्रके
भीतर प्रवेश करके पृथ्वीके मानदण्डकी भाँति स्थित
है॥ १५-१६॥
वह नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है, अनेक शिखरेंके
कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न है और सुखी सिंह,
व्याघ्र आदि पशुओंसे सदा सेवित रहता है ॥ १७॥
वह हिमका भण्डार है, अत्यन्त उग्र है, अनेक
आश्चर्यजनक दृश्योंके कारण विचित्र है; देवता,
ऋषि, सिद्ध और मुनि उसपर रहते हैं तथा वह
भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है॥ १८॥
वह तप करनेका स्थान है, अत्यन्त पावन है,
महात्माओंको भी पवित्र करनेवाला है, तपस्ये
अत्यन्त शीघ्र सिद्धि प्रदान करता है, अनेक प्रकाखी
धातुओंकी खान है और शुभ है। वह दिव्य रूपवार्ल
है, सर्वागसुन्दर है, रमणीय है, शैलराजोंका भी राज
है, विष्णुका अंश है, विकाररहित एवं सज्जन
प्रिय है॥ १९-२० ॥
उस पर्वतने अपनी कुलपरम्पराकी
लिये, धर्मकी अभिवृद्धिक लिये और
पितरोंका हित करनेकी अभिलाषासे अपना
करनेकी इच्छा की। हे मुनीश्वर! उसी समय न
अपने पूर्ण स्वार्थका विचार करके दिव्य पितरॉके / |
आकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे--॥ २१४
स्थिति
देवताओं तथ
अ० १]
देवा ऊचुः
सर्वे श्रृणुत नो वाक्यं पितरः प्रीतमानसाः।
कर्तव्यं तत्तथैवाशु देवकार्येप्सवो यदि॥ २३
मेना नाम सुता या वो ज्येष्ठा मङ्कलरूपिणी।
तां विवाह्य च सुप्रीत्या हिमाख्येन महीभृता ॥ २४
एवं सर्वमहालाभः सर्वेषां च भविष्यति।
युष्माकममराणां च दुःखहानिः पदे पदे॥ २५
ब्रह्मोवाच
इत्याकण्यामरवचः पितरस्ते विमृश्य च।
स्मृत्वा शापं सुतानां च प्रोचुरोमिति तद्वचः॥ २६
ददुर्मेनां सुविधिना हिमागाय निजात्मजाम्।
समुत्सवो महानासीत्तद्विवाहे सुमङ्गले॥ २७
हर्यादयोऽपि ते देवा मुनयश्चापरेऽखिलाः।
आजग्मुस्तत्र संस्मृत्य वामदेवं भवं धिया॥ २८
उत्सवं कारयामासुर्दत््ता दानान्यनेकशः।
सुप्रशस्य पितृन्दिव्यान्प्रशशंसुर्हिमाचलम्॥ २९
महामोदान्विता देवास्ते सर्वे समुनीश्वराः।
संजग्मुः स्वस्वधामानि संस्मरन्तः शिवाशिवा॥ ३०
योतुकं बहु सम्प्राप्य सुविवाह्य प्रियां च ताम्।
आजगाम स्वभवनं मुदमाप गिरीश्वरः॥ ३१॥
ब्रह्मोवाच
मेनया हि हिमागस्य सुविवाहो मुनीश्वर।
प्रोक्तो मे सुखद: प्रत्या किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३२॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५०७
देवता बोले--हे पितरो! आप सभी प्रसन्नचित्त
होकर हमारी बात सुनें और यदि आपलोगोंको
देवताओंका कार्य करना अभीष्ट हो, तो शीघ्र वैसा
ही करें॥ २३॥
आपलोगोंकी मेना नामक जो ज्येष्ठ पुत्री प्रसिद्ध
है, वह मंगलरूपिणी है, उसका विवाह आपलोग
अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक हिमालय नामक पर्वतसे कर
दीजिये। ऐसा करनेपर सभी लोगोंका महान् लाभ
होगा और आपलोगोंके तथा देवताओंके दुःखोंका
निवारण भी पग-पगपर होता रहेगा॥ २४-२५॥
ब्रह्माजी बोले-देवताओंकी यह बात सुनकर
पितरोंने परस्पर विचार करके कन्याओंके शापका
स्मरण करके इस बातको स्वीकार कर लिया॥ २६॥
उन लोगोंने अपनी कन्या मेनाका विवाह
विधिपूर्वक हिमालयके साथ कर दिया; उस मंगलमय
विवाहमें महान् उत्सव हुआ॥ २७॥
वामदेव शंकरका स्मरणकर विष्णु आदि देवता
तथा समस्त मुनिगण उस विवाहमें आये॥ २८॥
उन लोगोंने अनेक प्रकारके दान देकर उत्सव
करवाया, तदनन्तर वे दिव्य पितरोंकी प्रशंसा करके
हिमालयकी प्रशंसा करने लगे॥ २९॥
इसके बाद परम आनन्दसे युक्त वे सभी देवता
तथा मुनीश्वर शिवा एवं शिवका स्मरण करते हुए
अपने-अपने निवासस्थानको चले गये॥ ३०॥
उधर, पर्वतराज हिमालय भी अनेक प्रकारके
उपहार प्राप्तकर उस प्रिया मेनाके साथ विवाह करके
अपने घर आये और परम प्रसन्न हुए॥ ३१॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! मैंने मेनाके साथ
'हिमालयके सुखद पवित्र विवाहका वर्णन कर दिया।
अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?॥ ३२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
हिमाचलविवाहवर्णतं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
हिमाचलविवाह-वर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥
— oe
श्रीशिवमहापुराण
[3s ल्ला मी
अथ द्वितीयो5ध्याय:
पितरोंकी तीन मानसी कन्याओं--मेना, धन्या और कलावतीके पूर्वजन्मका
वृत्तान्त तथा सनकादिद्वारा प्राप्त शाप एवं वरदानका वर्णन
नारद उवाच
विधे प्राज्ञ वदेदानीं मेनोत्पत्तिं समादरात्।
अपि शापं समाचक्ष्व कुरु सन्देहभञ्जनम्॥ १
ब्रह्मोवाच
श्रृणु नारद सुप्रीत्या मेनोत्पत्तिं विवेकतः।
मुनिभिः सह वक्ष्येऽहं सुतवर्यं महाबुध॥ २
दक्षनामा मम सुतो यः पुरा कथितो मुने।
तस्य जाताः सुताः षष्टिप्रमिताः सृष्टिकारणाः॥ ३
तासां विवाहमकरोत्स वरैः कश्यपादिभिः।
विदितं ते समस्तं तत्प्रस्तुतं श्रृणु नारद्॥ ४
तासां मध्ये स्वधानाम्नीं पितृभ्यो दत्तवान्सुताम्।
तिस्त्रोऽभवन्सुतास्तस्याः सुभगा धर्ममूर्तयः॥ ५
तासां नामानि श्रृणु मे पावनानि मुनीश्वर।
सदा विध्नहराण्येव महामङ्कलदानि च॥ ६
मेनानाम्नी सुता ज्येष्ठा मध्या धन्या कलावती।
अत्या एताः सुताः सर्वाः पितृणां मानसोद्धवा: ॥ ७
अयोनिजाः स्वधायाश्च लोकतस्तत्सुता मता: ।
आसां प्रोच्य सुनामानि सर्वान्कामान् जनो ल भेत्॥ ८
जगद्वन्द्या: सदा लोकमातरः परमोददाः।
योगिन्यः परमा ज्ञाननिधानास्तास्त्रिलोकगा:॥ ९
'एकस्मिन्समये तिस्त्रो भगिन्यस्ता मुनीश्वर।
श्वेतद्वीपं विष्णुलोकं जम्मुर्दर्शनहेतवे॥ १०
कृत्वा प्रणामं विष्णोश्च संस्तुतिं भक्तिसंयुता;।
तस्थुस्तदाज्ञया तत्र सुसमाजो महानभूत्॥ ११
नारदजी बोले-हे महाप्राज्ञ! हे विधे! अब
आदरपूर्वक मेनाकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये और
शापके भी विषयमें बताइये, इस प्रकार मेरे सन्देहको
दूर कीजिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हे सुतवर्य! हे
महाबुध! आप इन मुनिगणोंके साथ
मेनाकी उत्पत्तिके वृत्तान्तको अत्यन्त प्रेमपूर्वक सुनिये,
मैं कह रहा हूँ॥ २॥
हे मुने! मैंने अपने दक्ष नामक जिन पुत्रकी चर्चा
पहले की थी; उनके यहाँ सृष्टिकी कारणभूता साठ
कन्याएँ उत्पन्न हुई॥ ३॥
उन्होंने उन कन्याओंका विवाह श्रेष्ठ कश्यप आदिके
साथ किया। हे नारद! यह सारा वृत्तान्त आपको विदित
ही है, अब प्रस्तुत कथाका श्रवण कीजिये ॥ ४॥
उन्होंने उनमेंसे स्वधा नामकी कन्या पितरोंको
दी। उस स्वधासे धर्ममूर्तिरूपा सौभाग्यवती तीन
कन्याएँ उत्पन्न हुई। हे मुनीश्वर! उन कन्याओके
पवित्र, सदा विध्नोंका हरण करनेवाले तथा महामंगल
प्रदान करनेवाले नामोंको मुझसे सुनिये ॥ ५-६॥
सबसे बड़ी कन्याका नाम मेना, मझली कन्याका
नाम धन्या तथा अन्तिम कन्याका नाम कलावती था
ये सभी कन्याएँ पितरोंके मनसे प्रादुर्भूत हुई थीं ॥७॥
ये अयोनिजा कन्याएँ लोकाचारके अनुसार
स्वधाकी पुत्रियाँ कही गयी हैं । इनके पवित्र नामोंका
उच्चारण करके मनुष्य समस्त कामनाओंको प्राप्त के
लेता है॥ ८॥
वे जगतूकी वन्दनीया, लोकमाता, परमानन्दकी
देनेवाली, योगिनीस्वरूपा, उत्कृष्ट, ज्ञानकी निधि री
तीनों लोकोंमें विचरण करनेवाली हुई॥ ९॥
हे मुनीश्वर! एक समयकी बात है--वे तीतो बह
भगवान् विष्णुके निवासस्थान श्वेतद्वीपमें उनके दर्शन की
लिये गयीं। भक्तिपूर्वक विष्णुको प्रणाम तथा उ
स्तुति करके वे उनकी आज्ञासे वहीं रुक गयी!
समय बहुत बड़ा समाज एकत्रित था॥ १०११
आ० २]
तदैव सनकाद्यास्तु सिद्धा ब्रह्मसुता मुने।
गतास्तत्र हरिं नत्वा स्तुत्वा तस्थुस्तदाज्ञया॥ १२
सनकाद्यान्मुनीन् दृष्ट्वोत्तस्थुस्ते सकला ्रुतम्।
तत्रस्थान्संस्थितान्नत्वा देवाद्याँल्लोकवन्दितान्॥ १३
तिस्रो भगिन्यस्तास्तत्र नोत्तस्थुमोंहिता मुने।
मायया देवविवशाः शङ्करस्य परात्मनः॥ १४
मोहिनी सर्वलोकानां शिवमाया गरीयसी।
तदधीनं जगत्सर्वं शिवेच्छा सा प्रकीर्त्यते॥ १५
प्रारब्धं प्रोच्यते सैव तन्नामानि हानेकशः।
शिवेच्छया भवत्येव नात्र कार्या विचारणा॥ १६
भूत्वा तद्वशगास्ता वै न चक्रुरपि तन्नतिम्।
विस्मिताः सम्प्रदृश्यैव संस्थितास्तत्र केवलम्॥ १७
तादृशीं तद्गतिं दृष्ट्वा सनकाद्या मुनीश्वराः।
ज्ञानिनोऽपि परं चक्रुः क्रोधं दुर्विषहं च ते॥ १८
शिवेच्छामोहितस्तत्र सक्रोधस्ता उवाच ह।
सनत्कुमारो योगीशः शापं दण्डकरं ददत्॥ १९
सनत्कुमार उवाच
यूयं तिस्त्रो भगिन्यश्च मूढाः सद्वयुनोज्झिताः।
अज्ञातश्रुतितत्त्वा हि पितृकन्या अपि ध्रुवम्॥ २०
अभ्युत्थानं कृतं नो यो नमस्कारोऽपि गर्विताः।
मोहिता नरभावत्वात्स्वर्गाद दूरा भवन्तु हि॥ २१
नरस्त्रिय: सम्भवन्तु तिस््रऽप्यज्ञानमोहिताः।
स्वकर्मणः प्रभावेण लभध्वं फलमीदृशम्॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्याकणर्य च साध्व्यस्तास्तिस्रोऽपि चकिता भूशम्।
पतित्वा पादयोस्तस्य समूनुर्नतमस्तकाः ॥ २३
पितृतनया ऊचुः
मुनिवर्य दयासिन्धो प्रसन्नो भव चाधुना।
'चत्रणामं वयं मूढाः कुर्महे स्म न भावतः॥ २४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५०९
हे मुने! उसी अवसरपर [मुझ] ब्रह्माके पुत्र
सनकादि सिद्धगण भी वहाँ गये और श्रीहरिको प्रणामकर
वहीं उनकी आज्ञासे बैठ गये। तब सभी लोग सनकादि
मुनियोंको देखकर वहाँ बैठे हुए लोकवन्दित देवता
आदिको प्रणाम करके शीघ्र उठ खडे हुए॥ १२-१३॥
किंतु हे मुने! वे तीनों बहनें परात्पर शंकरकी
मायासे मोहित होनेके कारण प्रारब्धसे विवश हो
नहीं उठीं॥ १४॥
शिवजीकी माया अत्यन्त प्रबल है, जो सब
लोकोंको मोहित करनेवाली है । समस्त संसार उसीके
अधीन है, वह शिवकी इच्छा कही जाती है॥ १५॥
उसीको प्रारब्ध भी कहा जाता है, उसके अनेक
नाम हैं। वह शिवकी इच्छासे ही प्रवृत्त होती है, इसमें
सन्देह नहीं है। उसी [शिवमाया]-के अधीन होकर उन
कन्याओंने सनक आदिको प्रणाम नहीं किया | वे केवल
उन्हें देखकर विस्मित हो बैठी रह गयीं॥ १६-१७॥
ज्ञानी होते हुए भी सनकादि मुनीश्वरोंने उनके
उस प्रकारके व्यवहारको देखकर अत्यधिक असह्य
क्रोध किया। तब शिवजीकी इच्छासे मोहित हुए
योगीश्वर सनत्कुमार क्रोधित होकर दण्डित करनेवाला
शाप देते हुए उनसे कहने लगे--॥ १८-१९॥
सनत्कुमार बोले--तुम तीनों बहनें पितरोंकी
कन्या हो, तथापि मूर्ख, सदज्ञानसे रहित और वेदतत्त्वके
ज्ञानसे शून्य हो ॥२०॥
अभिमानमें भरी हुई तुमलोगोंने न तो हमारा
अभ्युत्थान किया और न ही अभिवादन किया,
तुमलोग नरभावसे मोहित हो गयी हो, अतः इस
स्वर्गसे दूर चली जाओ और अज्ञानसे मोहित होनेके
कारण तुम तीनों ही मनुष्योंकी स्त्रियाँ बनो। इस
प्रकार तुमलोग अपने कर्मके प्रभावसे इस प्रकारका
फल प्राप्त करो॥ २१-२२॥
ब्रह्माजी बोले--यह सुनकर वे साध्वी कन्याएँ
आश्चर्यचकित हो गयीं और उनके चरणोंमें गिरकर
'विनम्रतासे सिर झुकाकर कहने लगीं॥ २३॥
पितृकन्याएँ बोलीं--हे मुनिवर्य! हे दयासागर!
अब हमलोगोंपर प्रसन्न हो जाइये, हमलोगोंनें मूढ़
होनेके कारण आपको श्रद्धासे प्रणाम नहीं किया॥ २४॥
५१०
प्राप्तं च तत्फलं विप्र न ते दोषो महामुने।
अनुग्रहं कुरुष्वात्र लभेम स्वर्गतिं पुनः॥ २५
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा तद्वचनं तात प्रोवाच स मुनिस्तदा।
शापोद्धारं प्रसन्नात्मा प्रेरितः शिवमायया॥ २६
सनत्कुमार उवाच
पितृणां तनयास्तिस्त्र: श्रृणुत प्रीतमानसाः।
वचनं मम शोकष्नं सुखदं सर्वदैव वः॥ २७
विष्णोरंशस्य शैलस्य हिमाधारस्य कामिनी।
ज्येष्ठा भवतु तत्कन्या भविष्यत्येव पार्वती॥ २८
धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च।
तस्याः कन्या महालक्ष्मीर्नाम्ना सीता भविष्यति॥ २९
वृषभानस्य वैश्यस्य कनिष्ठा च कलावती।
भविष्यति प्रिया राधा तत्सुता द्वापरान्ततः॥ ३०
मेनका योगिनी पत्या पार्वत्याश्च वरेण च।
तेन देहेन कैलासं गमिष्यति परं पदम्॥ ३१
धन्या च सीतया सीरध्वजो जनकवंशजः।
जीवन्मुक्तो महायोगी वैकुण्ठं च गमिष्यति॥ ३२
कलावती वृषभानस्य कौतुकात्कन्यया सह।
जीवन्मुक्ता च गोलोकं गमिष्यति न संशय: ॥ ३३
विना विपत्तिं महिमा केषां कुत्र भविष्यति।
सुकर्मिणां गते दुःखे प्रभवेद् दुर्लभं सुखम्॥ ३४
पितृणां तनयाः यूयं सर्वाः स्वर्गविलासिकाः।
कर्मक्षयश्च युष्पाकमभवह्विष्णुदर्शनात्॥ ३५
इत्युक्त्वा पुनरप्याह गतक्रोधो मुनीश्वर:।
शिवं संस्मृत्य मनसा ज्ञानदं भुक्तिमुक्तिदम्॥ ३६
अपरं श्रृणुत प्रीत्या मद्वचः सुखदं सदा।
धन्या यूयं शिवप्रीता मान्या पूज्या ह्यभीक्ष्णशः ॥ ३७
श्रीशिवमहापुराण
ज
[अ २
हे महामुने! इसमें आपका दोष नहीं है। है.
हमलोगोंपर दया कीजिये, जिससे हमलोगोंको पुन
स्वर्गलोककी प्राप्ति हो॥ २५॥ |
ब्रह्माजी बोले--हे तात! तब उनकी यह बा
सुनकर प्रसन्नचित्त वे मुनि शिवजीकी मायासे प्रेरित
हो शापसे उद्धारका उपाय कहने लगे॥ २६॥
सनत्कुमार बोले-हे पितरोंकी तीनों कन्याओ।
तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनो, यह तुम्हों
शोकका नाश करनेवाली और सदा ही तुम्हें सुब
प्रदान करनेवाली है ॥ २७॥
तुममेंसे जो ज्येष्ठ है, वह विष्णुके अंशभूत हिमालय.
गिरिकी पली होगी और पार्वती उसकी पुत्री होंगी ॥ २८॥
योगिनीस्वरूपा धन्या नामक दूसरी कन्या राजा
जनकको पत्नी होगी, उसकी कन्या महालक्ष्मी होंगी,
जिनका नाम सीता होगा। सबसे छोटी कन्या कलावती
वैश्य वृषभानकी पत्नी होगी, जिसकी पुत्रीके रूपमे
द्वापरके अन्तमें राधाजी प्रकट होंगी ॥ २९-३०॥
योगिनी मेनका पार्वतीके वरदानसे अपने पतिके
साथ उसी शरीरसे परम पद कैलासको जायगी तथा
यह धन्या जनकवंशमें उत्पन्न जीवन्मुक्त तथा महायोगी
सीरध्वजको पतिरूपमें प्राप्तकर सीताको जम्म देगी
तथा वैकुण्ठधामको जायगी॥ ३१-३२॥
वृषभानके साथ विवाह होनेके कारण जीवत्मुर्
कलावती भी अपनी कन्याके साथ गोलोक जायगी,
इसमें संशय नहीं है॥ ३३॥
[इस संसारमें] बिना विपत्तिके किसको कही
महत्त्व प्राप्त होगा उत्तम कर्म करनेवालोंके दुःख द
हो जानेपर उन्हें दुर्लभ सुख प्राप्त होता है॥ ३४)
तुमलोग पितरोंकी कन्याएँ हो और
विलास करनेवाली हो। अब विष्णुका दर्शन
जानेसे तुमलोगोंके कर्मका क्षय हो गया है॥ ३५॥
यह कहकर क्रोधरहित हुए मुनीश्वरने ज्ञान,
तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले शिवजीका स्मरण
पुनः कहा-[हे पितृकन्याओ!] तुमलोग है|
मेरी दूसरी बात भी सुनो, जो अत्यन्त सुखा
शिवजीमें भक्ति रखनेवाली तुमलोग सदा धन्य,
और बार-बार पूजनीय हो ॥ ३६-३७॥
आ० ३]
मेनायास्तनया देवी पार्वती जगदम्बिका।
भविष्यति प्रिया शम्भोस्तप: कृत्वा सुदुस्सहम्॥ ३८
धन्यासुता स्मृता सीता रामपत्नी भविष्यति।
लौकिकाचारमाश्रित्य रामेण विहरिष्यति॥ ३९
कलावतीसुता राधा साक्षाद् गोलोकवासिनी।
गुप्तस्तेहनिबद्धा सा कृष्णपत्ली भविष्यति॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्थमाभाष्य स मुनिर्भ्रातृभिः सह संस्तुतः ॥
सनत्कुमारो भगरवाँस्तत्रैवान्तर्हितोऽभवत्॥ ४१
तिस्त्रो भगिन्यस्तास्तात पितृणां मानसी: सुता: ।
गतपापाः सुखं प्राप्य स्वधाम प्रययुर्द्तम्॥ ४२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५११
मेनाकी कन्या जगदम्बिका पार्वती देवी परम कठोर
तपकर शिवजीकी पली होंगी, धन्याकी पुत्री कही गयी
सीता [भगवान्] रामकी पत्नी होंगी, जो लौकिक
आचारका आश्रय लेकर उनके साथ विहार करेंगी और
साक्षात् गोलोकवासिनी कलावतीपुत्री राधा अपने गुप्त
स्नेहसे बँधी हुई श्रीकृष्णकी पत्नी होंगी ॥ ३८--४०॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर सबके
द्वारा स्तुत वे भगवान् सनत्कुमार मुनि अपने भाइयोंसहित
वहीं अन्तर्हित हो गये॥ ४१॥
हे तात! पितरोंकी मानसी कन्याएँ वे तीनों बहनें
पापरहित हो सुख पाकर तुरंत अपने धामको चली
गयीं ॥ ४२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पूर्वतिवर्णतं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
पूर्वगतिवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
अ _'
अथ तृतीयोऽध्यायः
विष्णु आदि देवताओंका हिमालयके पास जाना, उन्हें उमाराधनकी
विधि बता स्वयं भी देवी जगदम्बाकी स्तुति करना
नारद उवाच
विधे प्राज्ञ महाधीमन्वद मे वदतां वर।
ततः परं किमभवच्चरितं विष्णुसदुरोः॥ १
अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता मेनापूर्वगतिः शुभा।
विवाहश्च श्रुतः सम्यक् परमं चरितं वद॥ २
मेनां विवाह्य स गिरिः कृतवान् किं ततः परम्।
पार्वती कथमुत्पन्ना तस्यां वै जगदम्बिका॥ ३
तपः सुदुस्सहं कृत्वा कथं प्राप पतिं हरम्।
एतत्सर्व समाचक्ष्व विस्तराच्छाङ्करं यशः॥ ४
ब्रह्मोवाच
मुने त्वं शृणु सुप्रीत्या शांकरं सुयशः शुभम्।
चच्छुत्वा ब्रह्महा शुद्धेत्सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ ५
यदा मेनाविवाहं तु कृत्वागच्छदिरिर्गृहम्।
तदा समुत्सबो जातस्त्रिषु लोकेषु नारद॥ ६
नारदजी बोले--हे विधे!हे प्राज्ञ ! हे महाबुद्धिमान्!
हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! इसके बाद विष्णुके सद्गुरु शिवका
क्या चरित्र हुआ, उसको आप मुझसे कहिये॥ १॥
आपने मेनाके पूर्वजन्मकी शुभ एवं अद्भुत कथा
कही । उनके विवाहप्रसंगको भी मैंने भलीभाँति सुन
लिया, अब उनके उत्तम चरित्रको कहिये॥ २॥
हिमालयने मेनाके साथ विवाह करनेके बाद क्या
किया ? जगदम्बा पार्वतीने उनसे किस प्रकार जन्म लिया
और कठोर तपकर किस प्रकार शिवजीको पतिरूपमें
प्राप्त किया ? यह सब बताइये और हे ब्रह्मन्! शंकरके
यशका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ३-४॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! आप शंकरके
कल्याणकारी उत्तम यशको सुनिये, जिसे सुनकर
ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है और सभी मनोर्थोंको
प्राप्त कर लेता है॥ ५॥
हे नारद! जब मेनाके साथ विवाह करके
हिमवान् घर गये, तब तीनों लोकोंमें बड़ा भारी उत्सव
हुआ॥६॥
५१२
हिमाचलोऽपि सुप्रीतश्वकार परमोत्सवम्।
भूसुरान् बंधुवर्गाश्च परानानर्च सद्धिया॥ ७
सर्वे द्विजाश्च सन्तुष्टा दत्त्वाशीर्वचनं वरम्।
ययुस्तस्मै स्वस्वधाम बंधुवर्गास्तथापरे॥ ८
हिमाचलोऽपि सुप्रीतो मेनया सुखदे गृहे।
रेमेऽन्यत्र च सुस्थाने नन्दनादिवनेष्वपि॥ ९
तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्ण्वादयो5खिला: ।
मुनयश्च महात्मानः प्रजम्मुर्भधरान्तिके॥ १०
दृष्ट्वा तानारतान्देवान्प्रणनाम मुदा गिरिः।
सम्मानं कृतवान् भवत्या प्रशंसन् स्वविधिं महान्॥ ११
साञ्जलिर्नतशीर्षो हि स तुष्टाव सुभक्तितः।
रोमोद्रमो महानासी द्रिरेः प्रेमाश्रबोऽपतन्॥ १२
'ततः प्रणम्य सुप्रीतो हिमशेलः प्रसन्नधीः।
उवाच प्रणतो भूत्वा मुने विष्णवादिकान्सुरान्॥ १३
हिमाचल उवाच
अद्य मे सफलं जन्म सफलं सुमहत्तपः।
अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलाः क्रियाः॥ १४
धन्योऽहमद्य संजातो धन्या मे सकला क्षितिः ।
धन्यं कुलं तथा दाराः सर्वं धन्यं न संशयः॥ १५
यतः समागता यूयं मिलित्वा सर्व एकदा।
मां निदेशयत प्रीत्योचितं मत्वा स्वसेवकम्॥ १६
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा महीध्रस्य वचनं ते सुरास्तदा।
ऊचुर्र्यादयः प्रीताः सिद्धि मत्वा स्वकार्यतः ॥ १७
देवा ऊचुः
हिमाचल महाप्राज्ञ शृण्वस्मद्वचनं हितम्।
'यदर्थमाराताः सर्वे तद् ब्रूमः प्रीतितो वयम्॥ १८
श्रीशिवमहापुराण
[अ हा सा यी
हिमालयने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर
मनाया और सदबुद्धिसे ब्राह्मणों, बन्धुजनों
श्रेष्ठ लोगोंका अर्चन किया॥ ७॥
तत्पश्चात् सभी सन्तुष्ट ब्राह्मण,
अन्यलोग उन्हें उत्तम आशीर्वाद देका म य
निवासस्थानको चले गये। हिमालय भी अत्य
प्रसन्न होकर अपने सुखदायक घरमें, अन्य स्थ
स्थानमें तथा नन्दन आदि वनोंमें भी मेनाके साथ रमण
करने लगे॥ ८-९॥
हे मुने! उसी समय विष्णु आदि समस्त देवता
और महात्मा मुनि गिरिराजके पास गये॥ १०॥
गिरिराजने उन देवताओंको आया हुआ देखकर
प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अपने भाग्यकी
सराहना करते हुए भक्तिभावसे उनका सत्का
किया॥ ११॥
हाथ जोड़कर मस्तक झुकाये हुए उन्होंने उत्तम
भक्तिसे स्तुति की। हिमालयके शरीरमें महान् रोमांच
हो आया और उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहने लगे॥ १२॥
हे मुने! तब हिमालय प्रसन्न मनसे अत्य
प्रेमपूर्वक प्रणाम करके और विनीतभावसे खड़े हो
विष्णु आदि देवताओंसे कहने लगे-॥ १३॥
हिमाचल बोले-आज मेरा जन्म सफल
हो गया, आज मेरी महान् तपस्या सफल हुई, आज
मेरा ज्ञान सफल हुआ और आज मेरी क्रियाएँ सफलं
हो गयीं॥ १४॥
आज मैं धन्य हो गया, मेरी समस्त भूमि धन्य ह
गयी, मेरा कुल धन्स हो गया, मेरी स्त्री तथा मेरा सब
कुछ धन्य हो गया, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि आ!
सभी लोग एक साथ मिलकर एक ही समय यह
पधारे हैं। मुझे अपना सेवक समझकर आपलो
प्रसन्नतापूर्वक उचित कार्यके लिये आज्ञ दें ॥ १५ १६
ब्रह्माजी बोले-तब हिमालयके इस सद्ध
सुनकर विष्णु आदि वे देवता अपने कार्यकी सिं
मानकर प्रसन्न होकर कहने लगे-- ॥ १७॥
देवता बोले--हे महाप्राज्ञ हिमालय
हितकारक वचन सुनिये, हम सब लोग जिस i
लिये यहाँ आये हैं, उसे प्रसन्नतापूर्वक बता रहे हं॥ *
एवं अ
अ० ३]
य़ा पुरा जगदम्बोमा दक्षकन्याभवद्रि।
रुद्रपली हि सा भूत्वा चिक्रीडे सुचिरं भुवि॥ १९
पितृतोऽनादरं प्राप्य संस्मृत्य स्वपणं सती ।
जगाम स्वपदं त्यक्त्वा तच्छरीरं तदाम्बिका॥ २०
सा कथा विदिता लोके तवापि हिमभूधर।
एवं सति महालाभो भवेद्देबगणस्य हि॥ २१
सर्वस्य भवतश्चापि स्युः सर्वे ते वशाः सुरा: ॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तेषां हर्यादीनां गिरीश्वरः।
तथास्त्विति प्रसन्नात्मा प्रोवाच न च आदरात्॥ २३
अथ ते च समादिश्य तद्विधिं परमादरात्
स्वयं जग्मुश्च शरणमुमायाः शंकरस्त्रियः॥ २४
सुस्थले मनसा स्थित्वा सस्मरुूर्जगदम्बिकाम्।
प्रणम्य बहुशस्तत्र तुष्टुवुः श्रद्धया सुराः॥ २५
देवा ऊचुः
देव्युमे जगतामम्ब शिवलोकनिवासिनि।
सदाशिवप्रिये दुगे त्वां नमामो महेश्वरि॥ २६
श्रीशक्ति पावनां शान्तां पुष्टिं परमपावनीम्।
वयं नमामहे भक्त्या महदव्यक्तरूपिणीम्॥
शिवां शिवकरां शुद्धां स्थूलां सूक्ष्मां पायणाम्।
अत्तविंद्यासुविद्याभ्यां सुप्रीतां त्वां नमामहे॥ २८
लें श्रद्धा त्वं धृतिस्त्वं श्रीस्त्वमेव सर्वगोचरा।
त्वं दीधितिस्सूर्यगता स्वप्रपञ्जप्रकाशिनी॥ २९
या च ब्रह्माण्डसंस्थाने जगज्जीवेषु या जगत्।
आप्याययति ब्रह्मादितृणान्तं तां नमामहे॥ ३०
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रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५१३
हे गिरे! पहले जो जगदम्बा उमा दक्षकन्या
सतीके रूपमें उत्पन्न हुई थीं और रुद्रपली होकर
चिरकालतक इस भूतलपर क्रीड़ा करती रहीं, वे ही
जगदम्बा अपने पितासे अनादर पाकर अपनी प्रतिज्ञाका
स्मरण करके [यज्ञमें] शरीरका त्यागकर अपने परम
धामको चली गयीं ॥ १९-२०॥
हे हिमगिरे! यह कथा लोकमें विख्यात है और
आपको भी विदित है। अब ऐसा होनेपर (आपके
यहाँ उनके उत्पन्न होनेपर) सभी देवगणोँका तथा
आपका भी बहुत लाभ होगा और बे सभी देवतागण
भी आपके वशमें हो जायँगे॥ २१-२२॥
ब्रह्माजी बोले--उन विष्णु आदि देवताओंकी
यह बात सुनकर गिरिराजने उनको आदर देनेके
लिये नहीं, अपितु स्वयं प्रसन्नचित्त होकर ' तथास्तु '--
ऐसा कहा॥ २३॥
तत्पश्चात् वे देवता [उमाको प्रसन्न करनेकी]
उस विधिको हिमालयसे आदरपूर्वक कहकर स्वयं
शंकरप्रिया उमाकी शरणमें गये॥ २४॥
चे देवता उत्तम स्थानपर स्थित होकर मनसे
जगदम्बाका स्मरण करने लगे और अनेक बार उन्हें
प्रणामकर श्रद्धाके साथ उनकी स्तुति करने लगे॥ २५॥
देवता बोले—हे देवि! हे उमे! हे जगन्मातः !
शिवलोकमें निवास करनेवाली हे सदाशिवप्रिये! हे
दुर्गे! हे महेश्वरि! हम आपको प्रणाम करते हैं ॥ २६॥
हमलोग श्रीशक्ति, पावन, शान्त, पुष्टिूपिणी,
परम तथा महत् और अव्यक्तरूपिणी [आपको]
भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं॥ २७॥
'कल्याणरूपिणी, कल्याण करनेवाली, शुद्ध, स्थूल,
सूक्ष्म, सबका परम आश्रय और अन्तर्विद्या तथा सुविद्यासे
प्रसन्न होनेवाली आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ २८॥
आप हो श्रद्धा हैं, आप ही धृति हैं, आप ही
श्री हैं, आप ही सर्वगोचर हैं, सूर्यमें रहनेवाली प्रकाशरूपा
आप ही हैं तथा आप अपने प्रपंचको प्रकाशित
करनेवाली हैं॥ २९॥
जो ब्रह्माण्डमें तथा समस्त जीवोंमें रहनेवाली हैं
और जो ब्रह्मासे लेकर समस्त तृणपर्यन्त संसारको
तृप्त करती हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं ॥ ३०॥
५१४
्रीशिवमहापुराण
[3s म्या ण नभी
गायत्री त्वं वेदमाता त्वं सावित्री सरस्वती ।
त्वं वार्ता सर्वजगतां त्वं त्रयी धर्मरूपिणी॥ ३१
निद्रा त्वं सर्वभूतेषु क्षुधा तृप्तिस्त्वमेव हि।
तृष्णा कान्तिश्छविस्तुष्टिः सर्वानन्दकरी सदा॥ ३२
त्वं लक्ष्मीः पुण्यकर्तृणां त्वं ज्येष्ठा पापिनां सदा।
तत्वं शान्तिः सर्वजगतां त्वं धात्री प्राणपोषिणी॥ ३३
त्वं तत्त्वरूपा भूतानां पञ्चानामपि सारकृत्। |
त्वं हि नीतिभृतां नीतिर्व्यवसायस्वरूपिणी॥ ३४
गीतिस्त्वं सामवेदस्य ग्रन्थिस्त्वं यजुषां हुतिः।
ऋग्वेदस्य तथा मात्राथर्वणस्य परा गतिः॥ ३५
समस्तगीर्वाणगणस्य शक्ति-
स्तमोमयी धातृगुणैकदृश्या।
रजःप्रपञ्चात्तु भवैकरूपा
या नः श्रुता भव्यकरी स्तुतेह। ३६
संसारसागरकराल भवाङ्गदुःख-
निस्तारकारितरणि च निवीतहीनाम्।
अष्टाङ्गयोगपरिपालनकेलिदक्षां
विन्थ्यागवासनिरतां प्रणमाम तां वै॥ ३७
नासाक्षिवक्त्रभुजवक्षसि मानसे च
धृत्या सुखानि वितनोति सदैव जन्तोः।
निद्रेति याति सुभगा जगती भवानां
सा नः प्रसीदतु भवस्थितिपालनाय॥ ३८
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महेशानीं जगदम्बामुमां सतीम्।
सुप्रेममनसः सर्वे तस्थुस्ते दर्शनेप्सवः॥ ३९
आप ही गायत्री हैं, आप ही वेदमाता सिन
एवं सरस्वती हैं, आप ही समस्त वाता है
आप ही वेदत्रयी एवं धर्मस्वरूपा हैं॥ ३१॥ ७
आप ही समस्त प्राणियोंमें निद्रा, क्षुधा,
तृष्णा, कान्ति, छवि तथा तुष्टिरूपसे विराजमान हैं
आप सदा सबको आनन्द देनेवाली हैं ॥ ३२॥
पुण्यकर्ताओंमें आप लक्ष्मीरूपा हैं, पापियोंको दण्ड
देनेके लिये आप ज्येष्ठा (अलक्ष्मी) हैं। आप सम्पूर
जगतूकी शान्ति, धात्री तथा प्राणपोषिणी माता हैं॥ ३३॥
आप पाँचों भूतोंके सारतत्त्वको प्रकट करनेवाली
तत्त्वस्वरूपा हैं। आप ही नीतिज्ञोंकी नीति तथा
व्यवसायरूपिणी हैं ॥ ३४ ॥
आप ही सामवेदकी गीतिस्वरूपा हैं, आप ही
यजुर्वेदकी ग्रन्थि हैं, आप ही ऋग्वेदकी ऋचारूप
स्तुति तथा अथर्ववेदकी मात्रा हैं और आप हो
मोक्षस्वरूपा हैं ॥ ३५॥
जो सभी देवगणोंकी शक्ति हैं, तमोमयी हैं, एकमात्र
धारण-पोषण गुणोंसे देखनेमें आती हैं, रजोगुणके प्रपंचसे
केवल सृष्टिरूपा हैं तथा जिन्हें हमने कल्याणकारिणी
सुना है, उनकी हम स्तुति करते हैं ॥ ३६॥
कराल संसारसागरके महान् दुःखोंसे पार
करानेवाली पालरहित नौकारूपिणी, अष्टांगयोगकें
पालनरूपी क्रीडामें दक्ष और विन्ध्यपर्वतपर निवास
करनेवाली उन भगवतीको हम प्रणाम करते हैं॥ ३७॥
जो प्राणियोंके नासिका, नेत्र, मुख, भुजा,
वक्षःस्थल एवं मनमें प्रतिष्ठित होकर सदा धैर्यपूर्वक
सुख प्रदान करती हैं, जो संसारके कल्याणके लिये
सुखकारी निद्रारूपमें प्रवृत्त होती हैं, वे संसाखी
स्थिति तथा पालनके लिये हमारे ऊपर प्रसन्न हों॥ २८॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार हि
महेश्वरी उमा सतीकी स्तुति करके [अपने] हद
विशुद्ध प्रेमलिये वे सब देवता उनके दर्शनकी इछ
वहाँ खड़े रहे ॥ ३९ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ठुतीये पार्वगीखण्डे देवस्तुतिर्नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
देवस्तुतिवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३ ॥
ह 89
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अ० ४]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५१५
RR टला न नि 7
दकया अथ चतुर्थोऽध्यायः
उमादेवीका दिव्यरूपमें देवताओंको दर्शन देना और अवतार ग्रहण करनेका आश्वासन देना
ब्रह्मोवाच
इत्थं देवैः स्तुता देवी दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी।
आविर्बभूव देवानां पुरतो जगदम्बिका॥ १
रथे रत्तमये दिव्ये संस्थिता परमाद्भुते।
किंकिणीजालसंयुक्ते मृदुसंस्तरणे वरे॥ २
कोटिसूर्याधिकाभासरम्यावयवभासिनी ।
स्वतेजोराशिमध्यस्था वररूपासमच्छविः॥ ३
अनूपमा महामाया सदाशिवविलासिनी।
त्रिगुणा निर्गुणा नित्या शिवलोकनिवासिनी॥ ४
त्रिदेवजननी चण्डी शिवा सर्वार्तिनाशिनी।
सर्वमाता महानिद्रा सर्वस्वजनतारिणी॥ ५
तेजोराशेः प्रभावात्तु सा तु दृष्टा सुरैश्शिवा।
तुष्टुवुस्तां पुनस्ते वै सुरा दर्शनकांक्षिणः॥ ६
अथ देवगणाः सर्वे विष्णवाद्या दर्शनेप्सवः।
ददृशुर्जगदम्बां तां तत्कृपां प्राप्य तत्र हि॥ ७
बभूवानन्दसन्दोहः सर्वेषां त्रिदिवोकसाम्।
पुनः पुनः प्रणेमुस्तं तुष्टुवुश्च विशेषतः॥ ८
देवा ऊचुः
शिवे शर्वाणि कल्याणि जगदम्ब महेश्वरि।
त्वां नताः सर्वथा देवा वयं सर्वार्तिनाशिनीम्॥ ९
न हि जानन्ति देवेशि वेदाः शास्त्राणि कृत्स्नश: ।
अतीतो महिमा ध्यानं तव वाङ्मनसोः शिवे॥ १
अतद्वयावृत्तितस्त्वां बै चकितं चकितं सदा
अभिधत्ते श्रुतिरपि परेषां का कथा मता॥ ११
जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः।
शरणागतभक्तानां न कुत्रापि भयादिकम्॥ १२
2223 Shivmahapuranam._Part 9९०0] 8_2_Front
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार
देवताओंके द्वारा स्तुति किये जानेपर दुर्ग नामक
राक्षसके द्वारा उत्पन्न संकटका नाश करनेवाली
जगन्माता देवी दुर्गा देबताओंके समक्ष प्रकट हुई॥ १॥
वे रत्नोंसे जटित, दिव्य, परम अद्भुत,
किंकिणीजालसे युक्त, कोमल बिछौनेवाले तथा श्रेष्ठ
रथपर विराजमान थीं॥ २॥
करोड़ों सूयाँसे भी अधिक प्रभायुक्त, रम्य
अंगोंसे भासित, अपनी तेजोराशिके बीच विराजमान,
सुन्दर रूपवाली, अनुपम छविसे सम्पन्न, अतुलनीय,
महामाया, सदाशिवके साथ विलास करनेवाली,
त्रिगुणात्मिका, गुणोंसे रहित, नित्या, शिवलोकमें
निवास करनेवाली, त्रिदेबजननी, चण्डी, शिवा, सभी
कष्टोंका नाश करनेवाली, सबकी माता, महानिद्रा,
सभी स्वजनों (भक्तों)-को मोक्ष प्रदान करनेवाली उन
भगवती शिवाको तेजोराशिकी प्रभाके रूपमें देवताओंने
देखा, किंतु उनके प्रत्यक्ष दर्शनको अभिलाषाःवाले
देवताओंने पुनः उनकी स्तुति को॥ ३--६॥
इसके बाद [भगवतीके] दर्शनके अभिलाषी
देवगण उन जगदम्बाकी कृपा प्राप्त करके ही उनका
प्रत्यक्ष दर्शन कर सके। [देवीके दर्शनसे] सभी
देवगणोंको महान्. आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने बार-
बार उनको प्रणाम किया और वे विशेष रूपसे उनकी
स्तुति करने लगे- ॥\७:८॥
देवता बोले--हे शिवे! हे शर्वाणि! हे कल्याणि!
हे जगदम्ब! हे महेश्वरि! हम सभी देवता सबके दुःखोंका
नाश करनेवाली आपको सदा प्रणाम करते हैं ॥ ९॥
हे देवेशि! वेद एवं शास्त्र भी आपको पूर्णरूपसे
नहीं जानते हैं हे शिवे ! आपका ध्यान एवं महिमा वाणी
एवं मनसे अगोचर है । श्रुति भी चकित होकर सदा अतदू-
व्यावृत्तिसे (नेति-नेति कहते हुए) आपका वर्णन करती
है, तो फिर दूसरोंकी बात ही क्या है!॥ १०-११॥
[हे शिवे!] भक्तिसे आपकी कृपा प्राप्त करके
बहुत-से भक्त आपकी महिमाको जानते हैं। आपके
शरणागत भक्तोंको कहीं भी भय आदि नहीं होता॥ १२॥
५१६
श्रीशिबमहापुराण
[अ TIT
विज्ञप्तिं शृणु सुप्रीता यस्या दासाः सदाम्बिके ।
तव देवि महादेवि हीनतो वर्णयामहे॥ १३
पुरा दक्षसुता भूत्वा संजाता हरवल्लभा।
ब्रह्मणश्च परेषां वानाशयत्त्वमकं महत्॥ १४
'पितृतोऽनादरं प्राप्यात्यजः पणवशात्तनुम्।
स्वलोकमगमस्त्वं वालभहुखं हरोऽपि हि॥ १५
न हि जातं प्रपूर्णं तद्देवकार्यं महेश्वरि।
व्याकुला मुनयो देवाः शरणा त्वां गता वयम्॥ १६
पूर्ण कुरु महेशानि निर्जराणां मनोरथम्।
सनत्कुमारवचनं सफलं स्याद्यथा शिवे॥ १७
अवतीर्य क्षितौ देवि रुद्रपत्नी पुनर्भव।
लीलां कुरु यथायोग्यं प्रापनुयु्निर्जराः सुखम्॥ १८
सुखी स्याद्देवि रुद्रोऽपि कैलासाचलसंस्थितः।
सर्वे भवन्तु सुखिनो दुःखं नश्यतु कृत्स्नशः ॥ १९
ब्रह्मोवाच
इति प्रोच्यामरा: सर्वे विष्णवाद्याः प्रेमसंकुलाः।
मौनमास्थाय संतस्थुर्भक्तिनम्रात्ममूर्तय: ॥ २०
शिवापि सुप्रसन्नाभूदाकण्यामरसंस्तुतिम्।
आकलव्याथ तद्धेतुं संस्मृत्य स्वप्रभुं शिवम्॥ २१
उवाचोमा तदा देवी सम्बोध्य विबुधांश्च तान्।
विहस्य मापतिमुखान् सदया भक्तवत्सला ॥ २२
उमोवाच
हे हरे हे विधे देवा मुनयश्च गतव्यथा:।
सर्वे शृणुत मद्वाक्यं प्रसन्नाहं न संशय: ॥ २३
चरितं मम सर्वत्र त्रैलोक्यस्य सुखावहम्।
कृतं मयेव सकलं दक्षमोहादिकं च तत्॥ २४
हे अम्बिके! हम सब आपके दास हैं
अब आप प्रेमयुक्त होकर हमारी प्रार्थना सन
देवि! हमलोग आपकी महिमाका थोड़ा-सा क
करते हैं॥ १३॥
आप पहले दक्षकी पुत्री होकर शिवजीकी प्रिय
बनी थीं, आपने [उस समय] ब्रह्मा तथा अय
लोगोंके महान् दुःखको दूर किया था॥ १४॥
आपने अपने पितासे अनादर प्राप्तकर अपनी
प्रतिज्ञाके अनुसार अपने शरीरका त्याग किया और
आप अपने धामको चली गयी थीं, जिसके कारण
महादेवजीने दुःख पाया था। किंतु हे महेश्वरि।
देवताओंका वह कार्य पूरा नहीं हुआ। इसीलिये हम
समस्त देवता एवं मुनिगण आपकी शरणमें आये हुए
हैं॥ १५-१६॥
हे महेशानि! आप देवताओंके मनोरथको पूर्ण
कीजिये, जिससे हे शिवे! सनत्कुमारका [कहा
हुआ] वचन सफल हो॥ १७॥
हे देवि! आप पृथ्वीपर अवतरित होकर
पुनः शिवजीकी पत्नी बनें और यथायोग्य लीला कों,
जिससे देवगण सुखी हो जाय, हे देवि! कैलासपर्वतपर
स्थित भगवान् शिवजी भी सुखी हो जायँ, सभी लोग
सुखी हो जायँ और पूर्णरूपसे दुःखका विनाश हो
जाय॥ १८-१९॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] विष्णु आदि सब
देवता यह कहकर प्रेमसे मग्न हो गये और वे भक्तिपूर्वक
विनम्रतासे सिर झुकाये मौन खड़े हो गये ॥ २०॥
शिवा भौ देवताओंकी स्तुति सुनकर प्रसल हो
गयीं। अपनी स्तुतिके कारणका विचारकर परथ
प्रभु शिवजीका स्मरणकर भक्तवत्सला तथा दयामयी
उमादेवी विष्णु आदि उन देवताओंको सम्बोर्धि |
करके हँसकर कहने लगी ॥ २१-२२॥
उमा बोलीं हे हरे! हे विधे! हे देवताओं!
मुनिगण! अब आप सभी लोग दुःखरहित हो जाडी
और मेरी बात सुनिये। मैं [आपलोगोंपर] प्रसरत
| सन्देह नहीं है मेरा चरित्र तरैलोक्यको सर्वी स
प्रदान करनेवाला है। दक्ष आदिको जो मोह 5 ,
हुआ, वह सब मेरे द्वारा ही किया गया था॥ २३२४
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अ० ४]
अबतारं करिष्यामि क्षितौ पूर्ण न संशय: ।
बहवो हेतवोऽप्यत्र तद्वदामि महादरात्॥ २५
पुरा हिमाचलो देवा मेना चातिसुभक्तित:।
सेवां मे अक्रतुस्तातजननीवत्सतीतनो: ॥ २६
इदानीं कुरुतः सेवां सुभक्त्या मम नित्यशः।
मेना विशेषतस्तत्र सुतात्वे नात्र संशय:॥ २७
रुद्रो गच्छतु यूयं चावतारं हिमवदगृहे।
अतश्चावतरिष्यामि दुःखनाशो भविष्यति॥ २८
सर्वे गच्छत धाम स्वं स्वं सुखं लभतां चिरम्।
अवतीर्य सुता भूत्वा मेनाया दास्य उत्सुखम्॥ २९
हरपली भविष्यामि सुगुप्तं मतमात्मनः।
अद्भुता शिवलीला हि ज्ञानिनामपि मोहिनी॥ ३०
यावत्प्रभृति मे त्यक्ता स्वतनुर्दक्षजा सुराः।
पितृतोऽनादरं दृष्ट्वा स्वामिनस्तत्क्रतौ गता॥ ३१
तदाप्रभृति स स्वामी रुद्रः कालाग्निसंज्ञकः।
दिगम्बरो बभूवाशु मच्चिन्तनपरायणः॥ ३२
मम रोषं क्रतौ दृष्ट्वा पितुस्तत्र गता सती।
अत्यजत्स्वतनुं प्रीत्या धर्मज्ञेति विचारतः॥ ३३
योग्यभूत्सदनं त्यक्त्वा कृत्वा वेषमलौकिकम्।
ज सेहे विरहं सत्या मद्रूपाया महेश्वरः ॥ ३४
मम हेतोर्महादु:खी स बभूव कुवेषभृत्।
अत्यजत्स तदारभ्य कामजं सुखमुत्तमम्॥ ३५
अन्यच्छृणुत हे विष्णो हे विधे मुनयः सुराः।
महाप्रभोर्महेशस्य लीलां भुवनपालिनीम्॥ ३६
विधाय मालां सुप्रीत्या ममास्श्नां विरहाकुलः।
भे शान्ति प्राप कुत्रापि प्रबुद्धोऽप्येक एव सः॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५१७
मैं पृथिवीपर पूर्ण अवतार ग्रहण करूँगी, इसमें
सन्देह नहीं है । इसमें बहुत से हेतु हैं, उन्हें मैं आदरपूर्वक
कह रही हूँ। हे देवताओ ! पूर्व समयमें हिमाचल और
मेनाने बड़े भक्तिभावसे मुझ सतीशरीरधारिणीकी
माता-पिताके समान सेवा की थी॥ २५-२६॥
इस समय भी वे नित्यप्रति मेरी भक्तिपूर्वक सेवा
कर रहे हैं और मेना विशेषकर अपनी पुत्रीरूपमें सेवा
करती हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ २७॥
अत: रुद्र तथा आपलोग [ अपने-अपने धामको]
जाय, मैं हिमालयके घर अवतार लूँगी, इससे सभी
लोगोंका दुःख दूर हो जायगा॥ २८॥
आप सब लोग अपने-अपने घर जायँ और
चिरकालतक सुखी रहें। मैं मेनाकी पुत्रीके रूपमें
अवतार लेकर सभीको सुख प्रदान करूँगी॥ २९॥
यह मेरा अत्यन्त गुप्त मत है कि मैं शिवजीकी
पत्नी बनूँगी। भगवान् शिवकी लीला अद्भुत है, वह
ज्ञानियोंको भी मोहमें डालनेवाली है ॥ ३०॥
हे देवगणो! जबसे मैंने दक्षके यज्ञमें जाकर
पिताद्वारा अपने स्वामीका अनादर देखकर दक्षोत्पन्न
अपने शरीरको त्याग दिया है, उसी समयसे वे
कालाग्निसंज्ञक स्वामी रुद्रदेव दिगम्बर होकर मेरी
चिन्तामें संलग्न हैं॥ ३१-३२॥
मेरे रोषको देखकर अपने पिताके यज्ञमें गयी
हुई धर्मज्ञ सतीने [मेरी] प्रीतिके कारण अपना शरीर
त्याग दिया। यही सोच करके वे घर छोड़कर
अलौकिक वेष धारणकर योगी हो भटक गये। वे
महेश्वर मेरे सतीरूपका वियोग सहन नहीं कर पा रहे
हैं ॥ ३३-३४॥
उन्होंने उसी समयसे कामजन्य उत्तम सुखका
परित्याग कर दिया है और मेरे निमित्त कुवेष
धारणकर वे अत्यन्त दुखी हो गये हैं॥ ३५॥
हे विष्णो! हे विधे! हे देवगणो! हे मुनिगणो।
आपलोग महाप्रभु महेश्वरकी भुवनपालिनी अन्य
लीला भी सुनें। ज्ञानी होते हुए भी विरहमें व्याकुल
वे मेरी अस्थियोंकी माला बनाकर धारण किये रहते
हैं, फिर भी उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिलती
है॥ ३६-३७॥
५१८
श्रीशिवमहापुराण
[अ "ताया `
इतस्ततो रुरोदोच्चेरनीश इव स प्रभु:।
योग्यायोग्यं न बुबुधे भ्रमन्सर्वत्र सर्वदा ॥
इत्थं लीलां हरोऽकार्षीददर्शयन्कामिनां प्रभुः।
ऊचे कामुकवद्वाणीं विरहव्याकुलामिव॥ ३९
वस्तुतोऽविकृतोऽदीनोऽस्त्यजितः परमेश्वर: ।
परिपूर्ण: शिव: स्वामी मायाधीशोऽखिलेश्वरः ॥ ४०
अन्यथा मोहतस्तस्य किं कामाच्च प्रयोजनम्।
विकारेणापि केनाशु मायालिप्तो न स प्रभुः॥ ४१
रूङ्रोऽतीवेच्छति विभुः स मे कर्तु करग्रहम्।
अवतारं क्षितौ मेनाहिमाचलगृहे सुराः॥ ४२
अतश्चावतरिष्यामि रुद्रसन्तोषहेतवे।
हिमागपल्यां मेनायां लौकिकीं गतिमाश्रिता॥ ४३
भक्ता रुद्रप्रिया भूत्वा तपः कृत्वा सुदुस्सहम्।
देवकार्य करिष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ४४
गच्छत स्वगृहं सर्वे भवं भजत नित्यशः।
तत्कृपातोऽखिलं दुःखं विनश्यति न संशयः ॥ ४५
भविष्यति कृपालोस्तु कृपया मङ्गलं सदा।
वन्द्या पूज्या त्रिलोकेऽहं तज्ञायेति च हेतुतः ॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा जगदम्बा सा देवानां पश्यतां तदा।
अन्तर्दधे शिवा तात स्वं लोकं प्राप वै द्रुतम्॥ ४७
विष्णवादयः सुराः सर्वे मुनयश्च मुदान्विताः।
कृत्वा तद्दिशि सनामं स्वस्वधामानि संययुः ॥ ४८
इत्थं दुर्गासुचरितं वर्णितं ते मुनीश्वर।
सर्वदा सुखदं नृणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥ ४९
वे प्रभु अनाथके समान इधर-उधर घूमते
ऊँचे स्वरमें रोते रहते हैं, उन्हें उचित तथा अनाज ह
ज्ञान भी नहीं है। इस प्रकार वे परभु
कामियोंकी गति दिखाते हुए लीला करते फिलतेई
और कामुककी भाँति विरहाकुल वाणी बोलते रहो
हैं ॥ ३८-३९॥
बे शिव वस्तुतः निर्विकार तथा दीनतासे रहित
अजित, परमेश्वर, परिपूर्ण, स्वामी, मायाधीश तक्ष
सबके अधिपति हैं ॥ ४० ॥
वे तो लोकानुसरणकर ही लीला करते हैं;
अन्यथा उन्हें मोह तथा कामसे प्रयोजन ही क्या है,
वे प्रभु न तो किसी विकारसे अथवा मायासे ही लिप
रहनेवाले हैं ॥ ४१॥
वे सर्वव्यापी रुद्र मेरे साथ विवाह करमेकी
प्रबल इच्छा रखते हैं। अत: हे देवगणो ! मैं पृथ्वीपर
मेना-हिमाचलके घरमें अवतार ग्रहण करूँगी ॥ ४२॥
मैं रुद्रके सन्तोषके लिये लौकिक गतिका
आश्रय लेकर हिमालयपत्नी मेनामें अवतार ग्रहण
करूँगी॥ ४३॥
कठोर तपस्या करके रुद्रकी भक्त तथा प्रिया
होकर मैं देवताओंका कार्य करूँगी, यह सत्य है, सत्य
है-इसमें सन्देह नहीं है। आप सभी लोग अपने घ
जाइये और रुद्रका भजन कीजिये, उन्हींकी कृपामे
समस्त दुःख दूर हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं
है॥ ४४-४५ ॥
उन कृपालुकी कृपासे सर्वदा मंगल ही होगा
और मैं उनकी प्रिया होनेके कारण त्रिलोकमें वन्दी
तथा पूजनीय हो जाऊँगी॥ ४६॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! इस प्रकार कही
वे जगदम्बा देवताओंके देखते-देखते अन्तर्धा
गयीं और शीघ्रतासे अपने लोकको चली गयीं | ४४
[तदनन्तर] विष्णु आदि समस्त देवता
मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर उस दिशामें
अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ४८ ॥
हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने ढि
उत्तम चरित्रका आपसे वर्णन किया, जो के
मनुष्योंको सुख, भोग तथा मोक्ष देनेवाला
4
अ० ५ ]
इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः।
पठेद्वा पाठयेद्वापि सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ ५०
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५१९
जो एकाग्र होकर इस चरित्रको नित्य सुनता अथवा
सुनाता है, पढ़ता अथवा पढ़ाता है, वह सभी
'कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ४९-५०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदरसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे देवसान्त्वनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणे अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमे
देवसान्त्वनवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
मेनाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर देवीका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर
वरदान देना, मेनासे मैनाकका जन्म
नारद उवाच
अन्तर्हितायां देव्यां तु दुर्गाया स्वगृहेषु च।
गतेष्वमरवृन्देषु किमभूत्तदनन्तरम्॥ १
कथं मेनागिरीशौ च तेपाते परमं तपः।
कथं सुताभवत्तस्य मेनायां तात तद्गद॥ २
ब्रह्मोवाच
विप्रवर्य सुतश्रेष्ठ शृणु तच्चरितं महत्।
प्रणम्य शङ्करे भक्त्या वच्मि भक्तिविवर्धनम्॥ ३
उपदिश्य गते तात सुरवृन्दे गिरीश्वरः।
ह्यादौ मेनका चापि तेपाते परमं तपः॥ ४
अहर्निशं शिवां शम्भुं चिन्तयन्तौ च दम्पती।
सम्यगारेधतुर्नित्य॑ भक्तियुक्तेन चेतसा॥ ५
गिरिप्रियातीव मुदानर्चं देवीं शिवेन सा।
दानं ददौ द्विजेभ्यश्च सदा तत्तोषहेतवे॥ ६
चैत्रमासं समारभ्य सप्तविंशतिवत्सरान्।
शिवां सम्पूजयामासापत्यार्थन्यन्वहं रता॥ ७
ष्टम्यामुपबासं तु कृत्वादान्तवमीतिथो।
मोदकेबंलिपिष्टेश्च पायसेर्गन्धपुष्पकेः॥ ८
रङ्गायामोषशधिप्रस्थे कृत्वा मूर्ति महीमयीम्।
उमायाः पूजयामास प १
कदाचित्सा निराहारा कदाचित्सा धृतत्रता।
कदाचित्पवनाहारा कदाचिजलभुग्हाभूत्॥ १०
नारदजी बोले--हे तात! जब देवी दुर्गा
अन्तर्धान हो गयीं और देवगण अपने-अपने धामको
चले गये, उसके बाद क्या हुआ?॥ १॥
हे तात! मेना तथा हिमाचलने किस प्रकार कठोर
तप किया और भगवती किस प्रकार मेनाके गर्भसे उत्पन्न
होकर उन हिमाचलकी कन्या हुई, उसे कहिये॥ २॥
ब्रह्माजी बोले-हे विप्रवर्य! हे सुतश्रेष्ठ! मैं
शिवजीको भक्तिपूर्वक प्रणामकर उनके भक्तिवर्धक
महान् चरित्रको कह रहा हँ॥ ३॥
उपदेश देकर विष्णु आदि देवसमुदायके चले
जानेपर पर्वतराज हिमाचल तथा मेनका कठोर तप
करने लगे॥ ४॥
चे पति-पत्नी भक्तियुक्त चित्तसे दिन-रात शम्भु
और शिवाका चिन्तन करते हुए उनकी सम्यक् रीतिसे
नित्य आराधना करने लगे । गिरिप्रिया वे मेना प्रसन्नतापूर्वक
शिवजीके साथ देवीका पूजन करती थीं और उन्हें प्रसन्न
करनेके लिये नित्य ब्राह्मणोंको दान देती थीं॥ ५-६॥
सन्तानकी कामनासे मेनाने चैत्रमाससे आरम्भ
करके सत्ताईस वर्षांतक प्रतिदिन तत्परतापूर्वक शिवाकी
पूजा की ॥ ७॥
बे अष्टमीको उपवास करके नवमी तिथिको
लडू पीठी, खीर, गन्ध, पुष्प आदि अर्पण करती थी ॥ ८॥
वे गंगाके औषधिप्रस्थमें उमादेवीकी मिट्टीकी
प्रतिमा बनाकर अनेक प्रकारकी वस्तुएँ समर्पितकर उनकी
पूजा किया करती थीं। वे कभी निराहार रहती थीं,
कभी व्रत धारण करती थीं, कभी जल पीकर ही रहतीं
थीं और कभी हवा पीकर ही रह जाती थीं ॥ ९-१०॥
५२०
श्रीशिवमहापुराण
[ त क्स ण णा विंग ५
शिवाविन्यस्तचेतस्का सम्रविंशतिवत्सरान्।
निनाय मेनका प्रीत्या परं सा मृष्टवर्चसा॥ 4
सप्तविंशतिवर्षान्ते जगन्माता जगन्मयी।
सुप्रीताभवदत्यर्थमुमा शंकरकामिनी॥ १२
अनुग्रहाय मेनायाः पुरतः परमेश्वरी
आविर्बभूव सा देवी सन्तुष्टा तत्सुभक्तितः॥ १३
दिव्यावयवसंयुक्ता तेजोमण्डलमध्यगा।
उवाच विहसन्ती सा मेनां प्रत्यक्षतां गता॥ १४
देव्युवाच
वरं ब्रूहि महासाध्वि यत्ते मनसि वर्तते।
सुप्रसन्ना च तपसा तवाहं गिरिकामिनि॥ १५
यत्प्रार्थितं त्वया मेने तपोब्रतसमाधिना।
दास्ये तेऽहं च तत्सर्वं वाञ्छितं यद्यदा भवेत्॥ १६
ततः सा मेनका देवीं प्रत्यक्षां कालिकां तदा।
दृष्ट्वा च प्रणनामाथ वचनं चेदमब्रवीत्॥ ९७
मेनोवाच
देवि प्रत्यक्षतो रूपं दृष्टं तव मयाधुना।
त्वामहं स्तोतुमिच्छामि प्रसन्ना भव कालिके ॥ १८
ब्रह्मोवाच
अथ सा मेनवेत्युक्ता कालिका सर्वमोहिनी।
बाहुभ्यां सुप्रसन्नात्मा मेनकां परिषस्वजे॥ १९
ततः प्राप्तमहाज्ञाना मेनका कालिकां शिवाम्।
तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्भक्त्या प्रत्यक्षतां 'गताम्॥ २०
मेनोवाच
महामायां जगद्धात्री चण्डिकां लोकधारिणीम्।
प्रणमामि महादेवीं सर्वकामार्थदायिनीम्॥ २१
नित्यानन्दकरी मायां योगनिद्रा जगत्प्रसूम्।
प्रणमामि सदा सिद्धां शुभसारसमालिनीम्॥ २२
इस प्रकार विशुद्ध तेजसे दीप्तिमती मग
प्रेमपूर्वक शिवामें चित्त लगाते हुए सत्ताईस व
व्यतीत किये॥ ११॥
सत्ताईसवें वर्षकी समाप्तिपर जगन्मयी
शंकरकामिनी उमा अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं॥ १२।
मेनाकी उत्तम भक्तिसे सन्तुष्ट होकर परमेश्व
देवी उनपर अनुग्रह करनेके लिये उनके सामने प्रकर
हुई॥ १३॥
तेजोराशिके बीचमें विराजमान तथा दिगि
अवयबोंसे संयुक्त उमादेवी प्रत्यक्ष होकर मेना
हँसती हुई कहने लगीं-॥ १४॥
देवी बोलीं--हे महासाध्वि! जो तुम्हारे मनमे
हो, वह वर माँगो। हे गिरिकामिनि! मैं तुम्हारी
तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ॥ १५॥
हे मेने! तुमने तपस्या, व्रत और समाधिके द्वा
जो प्रार्थना की है, वह सब मैं तुम्हें प्रदान करूँगी और
जब भी तुम्हारी जो इच्छा होगी, वह भी दूँगी॥ १६॥
तब उन मेनाने प्रत्यक्ष प्रकट हुई
कालिका देवीको देखकर प्रणाम किया और यह
वचन कहा--॥ १७॥
मेना बोलीं--हे देवि! इस समय मुझे आपके
रूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, अत: मैं आपकी स्तुति
करना चाहती हूँ। हे कालिके ! आप प्रसन्न हों॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले--[ नारद !] मेनाके ऐसा कहे
सर्वमोहिनी कालिकाने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर
अपनी दोनों बाँहोंसे मेनाका आलिंगन किया॥ १९॥
तत्पश्चात् मेनकाको महाज्ञानकी प्राप्ति ही
गयी और वे प्रिय वचनोंद्वारा भक्तिभावसे प्रत्यक्ष हर
शिवा कालिकाकी स्तुति करने लगीं--॥ २०॥
मेना बोलीं--मैं महामाया, जगतूका पार्त |
करनेवाली, चण्डिका, लोकको धारण करनेवाली तथा
सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थांको देनेवाली
प्रणाम करती हूँ॥ २१.॥
नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली, माया, योगर!
जगज्जननी, सिद्धस्वरूपिणी तथा सुन्दर कती
माला धारण करनेवाली देवीको सदा प्रणाम
हुँ॥ २२॥
अ० ५ ]
मातामहीं सदानन्दां भक्तशोकविनाशिनीम्।
आकल्पं वनितानां च प्राणिनां बुद्धिरूपिणीम्॥ २३
त्वं बंधच्छेदहेतुर्यतीनां
कस्ते गेयो मादूशीभिः प्रभावः।
हिंसां या वाथर्ववेदस्य सा त्वं
नित्यं कामं त्वं ममेष्टं विधेहि॥ २४
नित्यानित्यैर्भावहीनैः परास्तै-
स्तत्तन्मात्रेयोज्यते भूतवर्गः।
तेषां शक्तिस्त्वं सदा नित्यरूपा
काले योषा योगयुक्ता समर्था ॥ २५
सा
योनिर्धरित्री जगतां त्वमेव
त्वमेव नित्या प्रकृतिः परस्तात्।
यया वशं क्रियते ब्रह्मरूपं
सा त्वं नित्या मे प्रसीदाद्य मातः॥ २६
त्वं जातवेदोगतशक्तिरुग्रा
त्वं दाहिका सूर्यकरस्य शक्ति:।
आहादिका त्वं बहुचन्द्रिका या
तां त्वामहं स्तौमि नमामि चण्डीम्॥ २७
योषाणां सत्प्रिया च त्तं नित्या त्वं चोध्वरेतसाम्।
वाज्छा त्वं सर्वजगतां माया च त्वं यथा हरेः॥ २८
या चेष्टरूपाणि विधाय देवी
ृष्ट्रिस्थितिर्नाशमयी च कर्त्री।
ब्रह्मच्युतस्थाणुशरीरहेतुः
सा त्तं प्रसीदाद्य पुनर्नमस्ते॥ २९
ब्रह्मोवाच
तत इत्थं स्तुता दुर्गा कालिका पुनरेव हि।
उवाच मेनकां देवीं वांछितं वरयेत्युत॥
उमोवाच
प्राणप्रिया मम त्व॑ हि हिमाचलविलासिनि।
रुवं दास्ये नादेयं विद्यते मम॥ ३१
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५२१
मातामही, नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली, भक्तोंके
शोकको सर्वदा विनष्ट करनेवाली तथा नारियों एवं
प्राणियोंकी बुद्धिस्वरूपिणी देवीको मैं प्रणाम करती
हू ॥ २३॥
आप यतियोंके बन्थनके नाशकी हेतुभूत
[ब्रह्मविद्या] हैं, तो मुझ-जैसी नारियाँ आपके प्रभावका
क्या वर्णन कर सकती हैं। अथर्ववेदकी जो हिंसा है,
वह आप ही हैं। [हे देवि!] आप मेरे अभीष्ट
'फलको सदा प्रदान कीजिये॥ २४ ॥
भावहीन तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओसे
आप ही पंचभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं।
आप उनकी शक्ति हैं और सदा नित्यरूपा हैं। आप
समय-समयपर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें
प्रकट होती हैं॥ २५॥
आप ही जगतूकी उत्पादिका और आधारशक्ति हैं,
आप ही सबसे परे नित्या प्रकृति हैं । जिसके द्वारा ब्रह्मके
स्वरूपको वशमें किया जाता है, वह नित्या [विद्या]
आप ही हैं। हे मात: ! आज मुझपर प्रसन्न होइये॥ २६॥
आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उग्र शक्ति हैं।
आप ही सूर्यकिरणोंकी प्रकाशिका शक्ति हैं । चन्द्रमामें
जो आह्लादिका शक्ति है, वह भी आप ही हैं, उन आप
चण्डी देवीका मैं स्तवन और वन्दन करती हँ ॥ २७॥
आप स्त्रियोंको बहुत प्रिय हैं। ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियोंकी
नित्या ब्रह्मशक्ति भी आप ही हैं। आप सम्पूर्ण जगतूकी
वांछा हैं तथा श्रीहरिकी माया भी आप ही हैं॥ २८॥
जो देवी इच्छानुसार रूप धारण करके सृष्टि,
स्थिति, पालन तथा संहारमयीं होकर उन कार्योका
सम्पादन करती हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके
शरीरकी भी हेतुभूता हैं, वे आप ही हैं। आप मुझपर
प्रसन्न हों। आपको पुनः मेरा नमस्कार है ॥ २९॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] मेनाके इस
प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गा कालिकाने पुन: मेना देवीसे
कहा--तुम अपना मनोवांछित वर माँग लो॥ ३०॥
उमा बोलीं-हे हिमाचलप्रिये! तुम मुझे प्राणोंसे
अधिक प्रिय हो, तुम जो भी चाहती हो, उसे मैं
निश्चय ही दूँगी, तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय
नहीं हैं॥ ३१॥
५२२
श्रीशिवमहापुराण
[अ कल 75]
इति श्रुत्वा महेशान्याः पीयूषसदृशं वचः।
उवाच परितुष्टा सा मेनका गिरिकामिनी॥ ३
मेनोवाच
शिवे जय जय प्राज्ञे महेश्वरि भवाम्बिके ।
वरयोग्यास्म्यहं चेत्ते वृणे भूयो वरं वरम्॥ ३३
प्रथमं शतपुत्रा मे भवन्तु जगदम्बिके।
बह्वायुषो वीर्यवन्त ऋद्धिसिद्धिसमन्विताः॥ ३४
पश्चात्तथैका तनया स्वरूपगुणशालिनी।
कुलद्वयानंदकरी भुवनत्रयपूजिता॥ ३५
सुता भव मम शिवे देवकार्यार्थमेव हि।
रूद्रपली भव तथा लीलां कुरु भवाम्बिके॥ ३६
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा मेनकोक्तं हि प्राह देवी प्रसन्नरधीः।
स्मितपूर्वं वचस्तस्याः पूरयन्ती मनोरथम्॥ ३७
देव्युवाच
शतपुत्राः सम्भवन्तु भवत्या वीर्यसंयुताः।
तत्रैको बलवान्मुख्यः प्रथमं सम्भविष्यति॥ ३८
सुताहं सम्भविष्यामि सन्तुष्टा तव भक्तितः।
देवकार्य करिष्यामि सेविता निखिलैः सुरैः॥ ३९
ब्रह्मोवाच
एवमुक्चा जगद्धात्री कालिका परमेश्वरी।
पश्यन्त्या मेनकायास्तु तत्रैवान्तर्दधे शिवा॥ ४०
मेनकापि वरं लब्ध्वा महेशान्या अभीप्सितम्
मुदं प्रापामितां तात तपःक्लेशोऽप्यनश्यत॥ ४१
दिशि तस्यां नमस्कृत्य सुप्रहष्टमना: सती।
जयशब्दं प्रोच्चर्ती स्वस्थानं प्रविवेश ह॥ ४२
अथ तस्मै स्वपतये शशंस सुवरं च तम्।
स्वचिह्वबुद्धमिव वै सुवाचा पुनरुक्तया॥ ४३
महेश्वरीका अमृतके समान यह मधुर कग
सुनकर हिमगिरिकामिनी मेना अत्यधिक सत्तु हे
कहने लगीं-॥ ३२॥
मेना बोलीं-हे शिवे! आपकी जय हो, ज
हो, हे प्राज्ञे! हे महेश्वरि! हे भवाम्बिके ! यदि मै क
पानेके योग्य हूँ, तो आपसे पुन: श्रेष्ठ वर माँगती हूँ॥ ३३॥
हे जगदम्बिके! पहले तो मुझे सौ पुत्र हों, वे
दीर्घ आयुवाले, पराक्रमसे युक्त तथा ऋद्धि-सिद्धिपे
सम्पन्न हों॥ ३४॥
उन पुत्रोंके पश्चात् मेरी एक पुत्री हो, जे
स्वरूप और गुणोंसे युक्त, दोनों कुलोंको आननद
देनेवाली तथा तीनों लोकोंमें पूजित हो॥ ३५॥
हे शिवे! आप ही देवताओंका कार्य सिद्ध
करनेके लिये मेरी पुत्री हों। हे भवाम्बिके! आप
रुद्रदेवकी पत्नी हों और लीला करें॥ ३६॥
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद !] मेनकाकी वह बात
सुनकर प्रसन्नहृदया देवी उमा उनके मनोरथको पूर्ण
करती हुई मुसकराकर यह वचन कहने लगीं-- ॥ ३७॥
देवी बोलीं--तुम्हें सौ बलवान् पुत्र होगे
उनमें एक बलवान् और प्रधान होगा, जो सबसे पहले
उत्पन्न होगा॥ ३८ ॥
तुम्हारी भक्तिसे सन्तुष्ट मैं [स्वयं] पुत्रके
रूपमें अवतीर्ण होऊँगी और समस्त देवताओंसे
सेवित होकर उनका कार्य सिद्ध करूँगी॥ ३९॥ बे
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर जाडी
परमेश्वरी कालिका शिवा मेनकाके देखते-देखते वरही
अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४०॥
हे तात! महेश्वरीसे अभीष्ट वर पाकर मेनकाकी
भी अपार हर्ष हुआ और उनका तपस्याजतितं
नष्ट हो गया॥४१॥
अत्यन्त प्रसन्नचित्त साध्वी मेना उस 3. |
नमस्कारकर जय शब्दका उच्चारण करती हुई अ |
स्थानको चली गयां ॥ ४२॥ हौ |
ऐसे तो मेनाके प्रसन्न मुखमण्डलसे |
हिमवान्को सारी बातोंकी जानकारी हो गयी, फिर
मेनाने अपने मुखसे वरदानकी सारी बात पुनर
वचनोंके समान हिमालयसे पुनः कह दीँ ॥ ४२॥
अ० ६ ]
श्रुत्वा शैलपतिरष्टोऽभवन्मेनावचो हि तत्।
प्रशशंस प्रियं प्रीत्या शिवाभक्तिरतां च ताम्॥ ४४
कालक्रमेणाथ तयोः प्रवृत्ते सुरते मुने।
गर्भो बभूव मेनाया ववृधे प्रत्यहं च सः॥ ४५
असूत सा नागवधूपभोग्यं सुतमुत्तमम्।
ममुदरबद्धसत्सख्यं मैनाकाभिधमद्भुतम्॥ ४६
वृत्रशत्रावषि क्रुद्धे वेदनाज्ञं सपक्षकम्।
पविक्षतानां देवर्षे पक्षच्छिदि वराङ्गकम्॥ ४७
प्रवरं शतपुत्राणां महाबलपराक्रमम्।
स्वोद्भवानां महीध्चाणां पर्वतेनद्रैकथिष्ठितम्॥ ४८
आमसौन्महोत्सवस्तत्र हिमाचलपुरेऽद्भुतः।
दम्पत्योः प्रमुदाधिक्यं बभूव क्लेशसंक्षयः॥ ४९
दानं ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च प्रददौ धनम्।
शिवाशिवपदद्वनद्रे स्नेहोऽभूदधिकस्तयोः॥ ५०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५२३
मेनाका वचन सुनकर पर्वतराज [हिमालय]
प्रसन्न हुए और उन्होंने शिवामें भक्ति रखनेवाली
[अपनी] उन प्रियाकी प्रेमपूर्वक प्रशंसा की ॥ ४४॥
हे मुने! तत्पश्चात् कालक्रमसे उन दोनोंके
सहवासमें प्रवृत्त होनेपर मेनाको गर्भ रह गया और
वह प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ ४५॥
समयानुसार उन्होंने एक उत्तम पुत्रको जन्म
दिया, जिसका नाम मैनाक था। उसने समुद्रके साथ
उत्तम मैत्री की। वह अद्भुत पर्वत नागवधुओंके
विहारका स्थल है॥ ४६॥
हे देवषें! जिस समय इन्द्रने पर्वतोंपर क्रोधित होकर
उनके पंख काटना प्रारम्भ किया, उस समय वज्रद्वारा
कटे हुए पर्वतोंके पंखोंको देखकर वह मैनाक वेदनासे
अनभिज्ञ ही रहा और पंखयुक्त ही रहा॥ ४७॥
हिमालयके सौ पुत्रॉमें मैनाक सबसे श्रेष्ठ और
महाबल तथा पराक्रमसे युक्त था। अपने आप प्रकट
हुए समस्त पर्वतोंमें एकमात्र मैनाक ही पर्वतराजके
'पदपर अधिष्ठित हुआ॥ ४८॥
उस समय हिमालयके नगरमें महान् उत्सव
हुआ। दोनों पति-पत्नी अत्यधिक प्रसन्नताको प्राप्त
हुए और उनका क्लेश नष्ट हो गया ॥ ४९ ॥
उन्होंने ब्राह्मणोंको दान दिया तथा अन्य लोगोंको
भी धन प्रदान किया। शिवाशिवके चरणयुगलमें उन
दोनोंका अत्यधिक स्नेह हो गया॥५०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये गार्वतीखण्डे मेनावरलाभवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
मेनाकी वरप्राप्तिका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
देवी उमाका हिमवानुके हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा
स्तवन, देवीका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे वार्तालाप तथा पुनः
नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना
ब्रह्मोवाच
अथ ससमरतुर्भक्त्या दम्पती तौ भवाम्बिकाम्।
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] कुछ समय
बीतनेके पश्चात् उन पति-पत्नी दोनोंने देवताओंके
कार्यके लिये जन्महेतु भक्तिपूर्वक जगदम्बाका
प्रसूतिहितवे तत्र देवकारयार्थमादरात्॥ ९ | स्मरण किया॥ १॥
५२४
श्रीशिवमहापुराण
[अ ऱच्च्च्छछच्च्तच्ल्ा पजज>“>ौ“ौ्77777 सन
ततः सा चण्डिका योगात्त्यक्तदेहा पुरा पितुः ।
ईहया भवितुं भूयः समैच्छद् गिरिंदारतः॥ २
सत्यं विधातुं स्ववचः प्रसनाखिलकामदा।
पूर्णाशाच्छैलचित्ते सा विवेशाथ महेश्वरी॥ ३
विरराज ततः सोऽति प्रमदोऽपूर्वसुद्युतिः।
हुताशन इवाधृष्यस्तेजोराशिर्महामना:॥ ४
ततो गिरिः स्वप्रियायां परिपूर्ण शिवांशकम्।
समाधिमत्वात्समये समधत्त सुशंकरे॥ ५
समधत्त गिरेः पली गर्भ देव्याः प्रसादतः।
चित्ते स्थितायाः करुणाकरायाः सुखदं गिरेः॥ ६
गिरिप्रिया सर्वजगन्निवासासंश्रयाधिकम्।
विरेजे सुतरां मेना तेजोमण्डलगा सदा॥ ७
सुखोदयं स्वभर्तुएच मेना दोहदलक्षणम्।
दधौ निदानं देवानामानन्दस्येप्सितं शुभम्॥ ८
देहसादादसंपूर्णभूषणा लोध्रसंमुखा।
स्वल्पभेन्दुक्षयेकासौ विचेष्यरक्षा विभावरी॥ ९
तदाननं मृत्सुरभि नायं तृप्ति गिरीश्वरः।
मुने रहस्युपाघ्राय प्रेमाधिक्यं बभूव तत्॥ १०
मेना स्पृहावती केषु न मे शंसति वस्तुषु।
किंचिदिष्टं हियापृच्छदनुवेलं सखीर्मिरिः॥ ११
उपेत्य दौईदं शैल्यं यद्वव्रेऽपश्यदाशु तत्।
आनीते नेष्टमस्याद्धा नासाध्यं त्रिदिवेऽपि हि॥ १२
इधर, अपने पिताके यज्ञमें योगद्वारा शरीर
करने-वाली भगवती चण्डिकाने हिमालयपत्नी मेने
गर्भसे जन्म लेनेका विचार किया। प्रसन्न होनेफ
सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली वे महेश्वरी अपने
वचनको सत्य करनेके लिये पूर्ण अंशसे हिमवान
चित्तमें प्रविष्ट हुई ॥ २-३॥
उस समय महामनस्वी वे हिमालय प्रसन्नताऐे
अपूर्व कान्तिसम्पन्न होकर अग्निके समान अधृष
तथा तेजसमूहसे युक्त हो गये॥ ४॥
तत्पश्चात् समाधिसम्पन्न होनेसे गिरिराज
हिमालयने सुन्दर कल्याणकारी समयमें अपनी प्रिया
मेनाके उदरमें शिवाके उस परिपूर्ण अंशका ध्या
किया॥५॥
इस तरह .हिमालयको पत्नीने हिमवानके
हृदयमें विराजमान करुणा करनेवाली देवीकी कृपासे
सुखदायक गर्भ धारण किया। सम्पूर्ण जगतूको
आश्रय देनेवाली उन देवीके गर्भमें आनेसे गिरिप्रिय
मेना सदा तेजोमण्डलके बीचमें स्थित होकर अधिक
शोभा पाने लगी॥ ६-७॥
मेनाने अपने पतिको सुख देनेवाले तथा देवताओंके
आनन्दके कारणभूत शुभ अभीष्ट गर्भलक्षणको धारण
किया। शरीरके अधिक दुर्बल होनेके कारण उन्हा
सभी आभूषणोंको उतार दिया, उनका मुखमण्डलं
लोधके समान [श्वेत वर्ण] हो गया और वे प्रभात
कालीन चन्दरमाके प्रकाशके क्षीण हो जानेसे अल
तारागणोंवाली रात्रिके समान दीखने लगीं ॥८-९॥
गिरिराज मिट्टीके समान सुगन्धित उके
मुखमण्डलको एकान्तं सूँघकर तृप्त नहीं होते धे
और [गर्भवती होनेके कारण दिनानुदिन] मेते |
उनका प्रेमाधिक्य होने लगा। वे हिमालय मेनावी |
सखियोंसे सदा यह पूछते रहते थे कि मेनाको कि
वस्तुओंकी इच्छा है। वह लजाके कारण अपता
भी इष्ट मुझसे नहीं बताती है॥ १०-११॥
कष्टप्रद गर्भलक्षणके प्राप्त कर लेनेपर वे मेता र |
वस्तुके लिये कहती थीं, उसे अपने सामने गिरिर
द्वारा उपस्थित हुआ देखती थीं; क्योंकि उनकी इर
कोई भी वस्तु तीनों लोकोंमें दुर्लभ नहीं थी॥१९॥
च्य ६]
प्रचीयमानावयवा निस्तीर्य दोईदव्यथाम्।
शेजे मेना बाललता नद्धपत्राधिका यथा॥ १३
गिरिः सगर्भा महिषीममंस्त धरणीमिव।
निधानगर्भामभ्यन्तलीनवह्विशमीमिव ॥१४
प्रियाप्रीतेश्य मनसः स्वार्जितद्रविणस्य च।
समुन्नतेः श्रुतेः प्राज्ञ: क्रियाश्चक्रे यथोचिताः ॥ १५
ददर्श काले मेनां स प्रतीतः प्रसवोन्मुखीम्।
अभ्रितां च दिवं गर्भगृहे भिषगधिष्टिते॥ १६
दृष्टवा प्रियां शुभाङ्गीं वै मुमोदाति गिरीश्वरः ।
गर्भस्थजगदम्बां हि महातेजोतीं तदा॥ १७
तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्णवादयस्तथा।
मुनयश्च समागम्य गर्भस्थां तुष्टुवुः शिवाम्॥ १८
देवा ऊचुः
दुर्गे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब महेश्वरि।
सत्यव्रते सत्यपरे त्रिसत्ये सत्यरूपिणि॥ १९
सत्यस्थे सत्यसुप्रीते सत्ययोने च सत्यतः।
सत्यवक्त्रे सत्यनेत्रे प्रपन्नाः शरणं च ते॥ २०
शिवप्रिये महेशानि देवदुःखक्षयङ्करि।
त्रैलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तवत्सला ॥ २१
आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्य कुरुष्व ह।
सनाथाः कृपया ते हि वयं सर्वे महेश्वरि॥ २२
त्तः सर्वे च सुखिनो लभन्ते सुखमुत्तमम्।
त्वा विना न हि किंचिद्वै शोभते त्रिभवेष्वपि॥ २३
त्थ ब्रह्मोवाच
इतथं कृत्वा महेशान्या गर्भस्थाया बहुस्तुतिम्।
प्रसनमनसो देवाः स्वं स्वं धाम ययुस्तदा॥
व्यतीते नवमे मासे दशमे मासि पूर्णतः
सा गतिं दश्ने कालिका जगदम्बिका॥ २५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५२५
धीरे-धीरे गर्भजन्य व्यथाको पारकर पुष्ट अंगोंवाली
वह मेना पत्तोंसे समन्वित बाललताके समान शोभित
होने लगी। हिमालयने अपनी सगर्भा पत्नीको
रत्नभण्डारको अपने भीतर छिपाये रखनेवाली पृथ्वी
और अग्निको अपने भीतर छिपाये रखनेबाले शमी
वृक्षके समान समझा॥ १३-१४॥
महाबुद्धिमान् हिमालयने अपनी प्रियाके प्रीतियोग्य,
अपने द्वारा अर्जित द्रव्योंके अनुसार, राजसी प्रवृत्तिं एवं
अपने शास्त्रज्ञानके अनुरूप संस्कार किये॥ १५॥
उन्होंने प्रसवोन्मुखी अपनी प्रियाको वैद्योके द्वारा
निर्दिष्ट गर्भगृहमें मेघमण्डलसे आच्छादित आकाशके
समान देखा। शुभ लक्षणोंवाली, गर्भमें जगदम्बाको
धारण करनेवाली, महातेजयुक्त तथा सुन्दर अंगोंवाली
प्रिया मेनाको देखकर गिरिराज हिमवान् बड़ी प्रसन्नताका
अनुभव करने लगे ॥ १६-१७॥
हे मुने! उस समय विष्णु आदि देवता तथा मुनिगण
आकर गर्भमें स्थित शिवाकी स्तुति करने लगे॥ १८॥
देवगण बोले-हे दुर्गे! हे प्राज्ञे! हे जगदम्बे !
हे महेश्वरि! हे सत्यत्रते! हे सत्यपरे! हे त्रिसत्ये!
हे सत्य-स्वरूपिणि! आपकी जय हो, आपकी जय
हो। हे सत्यस्थे! हे सत्यसुप्रीते! हे सत्ययोने !
हे सत्यवक्त्रे! हे सत्यनेत्रे! हम सभी आपकी
शरणमे प्राप्त हुए हैं॥ १९-२०॥
हे शिवप्रिये ! हे महेश्वरि! देवताओंके दुःखको
दूर करनेवाली! आप तीनों लोकोंकी माता, शर्वाणी,
सर्वव्यापिनी तथा भक्तोसे स्नेह रखनेवाली हैं। हे
त्रिलोकेशि! आप प्रकट होकर देवगणोंके कार्यको
पूर्ण करें। हे महेश्वरि! हम सभी देवगण आपकी
कृपासे सनाथ हो जायँगे॥ २१-२२॥
इस संसारके सभी सुखी मनुष्य आपके द्वारा ही
उत्तम सुख प्राप्त करते हैं, आपके बिना इस त्रिलोकमें
कुछ भी शोभा नहीं देता॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार सभी देवगण प्रसन्न-
चित्त होकर गर्भस्थित महेश्वरीकी बहुत स्तुति करके
अपने-अपने धामको चले गये | जब नौवाँ महीना बीत
गया और दसवाँ भी पूरा हो चला, तब गर्भस्थित जगदम्बा
महाकालीने गर्भसे बाहर आनेकी इच्छा की ॥ २४-२५॥
|
|
५२६ श्रीशिवमहापुराण
तदा सुसमयश्चासीच्छान्तभग्रहतारकः। वह समय बड़ा सुहावना हो गया, नक्षत्र, तारे त्था
नभः प्रसन्नतां यातं प्रकाशः सर्वदिक्षु हि॥ २६ | ग्रह शान्त हो गये, आकाश निर्मल हो गया और स
दिशाओंमें प्रकाश फैल गया। वन, ग्राम तथा
मही मङ्गलभूयिष्ठा सवनग्रामसागरा।
सरःस्त्रबन्तीवापीषु पुफुल्लुः पंकजानि वै॥ २७
ववुश्च विविधा वाताः सुखस्पर्शा मुनीएवर।
मुमुदुः साधवः सर्वेऽसतां दुःखमभूद् द्रुतम् ॥ २८
दुन्दुभीन्वादयामासुर्नभस्यागत्य निर्जराः।
पुष्पवृष्टिरभूत्तत्र जगुर्गन्धर्वसत्तमाः॥ २९
विद्याधरस्त्रियो व्योम्नि ननृतुश्चाप्सरास्तथा ।
तदोत्सवोी महानासीद्देवादीनां नभःस्थले॥ ३०
तस्मिन्नवसरे देवी पूर्वशक्तिः शिवा सती।
आविर्बभूव पुरतो मेनाया निजरूपतः॥ ३१
वसन्ततो मधौ मासे नवम्यां मृगधिष्णयके।
अर्धरात्रे समुत्पन्ना गङ्गेव शशिमण्डलात्॥ ३२
समये तत्स्वरूपेण मेनकाजठराच्छिवा।
समुद्धूय समुत्पन्ना सा लक्ष्मीरिव सागरात्॥ ३३
ततस्तस्यां तु जातायां प्रसन्नोऽभूत्तदा भवः।
अनुकूलो ववौ वायुर्गम्भीरो गंधयुक् शुभः॥ ३४
बभूव पुष्पवृष्टिश्च तोयवृष्टिपुरस्सरम्।
जज्चलुश्चारनयः शान्ता जगर्जुश्च तदा घनाः ॥ ३५
तस्यां तु जायमानायां सर्वस्वं समपद्यत।
हिमवन्नगरे तत्र सर्व दुःखं क्षयं गतम्॥ ३६
'तस्मिन्नवसरे तत्र विष्ण्वाद्याः सकलाः सुराः।
आजग्मुः सुखिनः प्रीत्या ददृशुर्जगदम्बिकाम्॥ ३७
तुष्टुवुस्तां शिवामम्बां कालिकां शिवकामिनीम्।
दिव्यरूपां महामायां शिवलोकनिवासिनीम्॥ ३८
देवा ऊचुः
जगदम्ब महादेवि सर्वसिद्धिविधायिनि।
'देवकार्यकरी त्वं हि सदातस्त्वां नमामहे॥ ३९
सहित पृथ्वीपर नाना प्रकारके मंगल होने लगे |
नदियों एवं बावलियोंमें कमल खिल उठे ॥ २६-२७॥
हे मुनीश्वर! अनेक प्रकारकी सुखस्पर्शी
बहने लगी, सभी साधुजन आनन्दित हो गये त्था
दुर्जन शीघ्र ही दुखी हो गये॥ २८॥
देवता आकाशमें आकर दुन्दुभियाँ बजाने लो, |
वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी तथा श्रेष्ठ गन्धर्व गान
करने लगे । अप्सराएँ और विद्याधरोंकी स्त्रियाँ आकां |
नाचने लगीं, इस प्रकार आकाशमण्डलमें देवताओं |
आदिका महान् उत्सव होने लगा॥ २९-३०॥
उसी अवसरपर आद्याशक्ति सती शिवा देवी
मेनाके सामने अपने रूपमें प्रकट हुई॥ ३१॥
वे वसन्त ऋतुके चैत्रमासमें नवमी तिथिको
मृगशिरा नक्षत्रमें आधी रातके समय चन्द्रमण्डलमे
गंगाको भाँति प्रकट हुई। वे शिवा मेनाके गर्भसे अपने
स्वरूपसे इस प्रकार प्रकट हुई, जैसे समुद्रसे महालक्ष्मीका
आविर्भाव हुआ था॥ ३२-३३॥
उस समय भगवतीके प्रकट होनेपर शंकरजी
प्रसन्न हो गये और अनुकूल, गम्भीर, सुगन्धित तथा
शुभ वायु बहने लगी। उस समय जलकी वर्षकिं
साथ पुष्पवृष्टि होने लगी, [ अग्निहोत्रकी] शान्त अगि
प्रज्वलित हो उठी और बादल गरजने लगे॥ ३४-३५॥
उनके प्रकट होते ही हिमालयके नगरमें समस्त
सम्पत्ति स्वतः आ गयी तथा [लोगोंका] सारा दुःख |
दूर हो गया॥ ३६॥
उस अवसरपर विष्णु आदि समस्त देव
सुखी होकर वहाँ आ गये और प्रेमसे जगदम्बाका
दर्शन करने लगे। वे शिवलोकमें निवास केवाली
शिवप्रिया महाकाली दिव्यरूपधारिणी उन महाम
जगदम्नाकी स्तुति करने लगे॥ ३७-३८॥
देवता बोले--हे जगदम्ब! हे महादेंविं'
है सर्वसिद्धिविधायिनि! आप देवताओंका
पूर्ण करनेवाली हैं, इसलिये हम सभी आपकी
सदा प्रणाम करते हैं॥ ३९॥
जय ६]
सर्वथा कुरु कल्याणं देवानां भक्तवत्सले।
मेनामनोरथः पूर्णः कृतः कुरु हरस्य च॥ ४०
ब्रह्मोवाच
यं स्तुत्वा शिवां देवा विषादयः सुप्रणम्य ताम्।
स्व॑ स्वं धाम ययुः प्रीताः शंसन्तस्तदरतिं पराम्॥ ४१
तां तु दृष्ट्वा तथा जातां नीलोत्पलदलप्रभाम्।
श्यामां सा मेनका देवीं मुदमायाति नारद॥ ४२
दिव्यरूपं विलोक्यानु ज्ञानमाप गिरिप्रिया।
विज्ञाय परमेशानीं तुष्टावातिप्रहर्षिता॥ ४३
मेनोवाच
जगदम्ब महेशानि कृतातिकरुणा त्वया।
आविर्भूता मम पुरो विलसन्ती यदम्बिके ॥ ४४
त्वमाद्या सर्वशक्तीनां त्रिलोकजननी शिवे।
शिवप्रिया सदा देवी सर्वदेवस्तुता परा ॥ ४५
कृपां कुरु महेशानि मम ध्यानस्थिता भव।
एतत्रूपेण प्रत्यक्षं रूपं धेहि सुतासमम्॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्या मेनाया भूधरस्त्रियाः।
प्रत्युवाच शिवा देवी सुप्रसन्ना गिरिप्रियाम्॥ ४७
देव्युवाच
है मेने त्वं पुरा मां च सुसेवितवती रता।
त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नाहं वरं दातुं गतान्तिकम्॥ ४८
वरे ब्रूहीति मद्वाणी श्रुत्वा ते तद्वरो वृतः।
सुता भव महादेवि सा मे देवहितं कुरु॥ ४९
ग चरं तेऽहं गता स्वं पदमादरात्।
समयं प्राप्य तनयाभवं ते गिरिकामिनि॥५०
दिव्यरूपं धृतं मेऽद्य यत्ते मत्स्मरणं भवेत्!
मर्त्यभाबेन तवाज्ञानं भवेन्मयि॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५२७
हे भक्तवत्सले! आप हर प्रकारसे देवताओंका
कल्याण करें। आपने मेनाका मनोरथ पूर्ण किया है,
अब शिवका भी मनोरथ पूर्ण करें॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार विष्णु आदि देवता
शिवाकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करके उनकी परम गतिकी
प्रशंसा करते हुए अपने-अपने धामको चले गये ॥ ४१॥
हे नारद! नीलकमलके दलके समान कान्तिमयी
उन श्यामा भगवतीको उत्पन्न हुआ देखकर मेना
परम प्रसन्न हो गयीं। उस दिव्य रूपको देखकर
गिरिप्रिया मेनाको ज्ञान प्राप्त हो गया। वे उन्हें
परमेश्वरी जानकर अत्यन्त हर्षित होकर उनकी स्तुति
करने लगीं ॥ ४२-४३॥
मेना बोलीं-हे जगदम्बे! हे महेश्वरि! हे
अम्बिके! आपने बड़ी कृपा की, जो सुशोभित होती
हुई मेरे सामने प्रकट हुई। हे शिवे! आप सम्पूर्ण
शक्तियोंमें आद्याशक्ति तथा तीनों लोकोंकी जननी हैं।
हे देवि! आप भगवान् शिवको सदा ही प्रिय हैं तथा
सम्पूर्ण देवताओंसे स्तुत पराशक्ति हैं। हे महेश्वरि!
आप कृपा करें और इसी रूपसे मेरे ध्यानमें स्थित हो
जायँ और अब मेरी पुत्रीके समान प्रत्यक्ष रूप धारण
करें॥ ४४-०४६॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] पर्वतपत्नी उन
मेनाकी यह बात सुनकर शिवा देवी अत्यन्त प्रसन्न
होकर उन गिरिप्रियासे कहने लगीं ॥ ४७॥
देवी बोलीं-हे मेने! आपने पहले तत्पर
होकर मेरी बड़ी सेवा की थी, [उस समय] आपकी
भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न होकर वर देनेके लिये मैं
आपके पास गयी थी। वर माँगिये-मेरी इस वाणीको
सुनकर आपने वह वर माँगा था-हे महादेवि! आप
मेरी पुत्री हो जायँ और देवताओंका हित साधन करें।
तब मैं आपको आदरपूर्वक वह वर देकर अपने
धामको चली गयी। हे गिरिकामिनि! अब समय
पाकर मैं आपकी पुत्री हुई हूँ॥ ४८--५०॥
आज मैंने जो दिव्य रूप धारण किया है, वह
इसलिये कि आपको मेरा स्मरण हो जाय, अन्यथा
मनुष्यरूपमें प्रकट होनेपर मेरे विषयमें आप अनजान
ही बनी रहतीं॥ ५१॥
५२८
श्रीशिवमहापुराण
[ PENS 7 सल णा अ ७ |
युवां मां पुत्रिभावेन दिव्यभावेन वासकृत्।
चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यातास्थो मद्गतिं पराम्॥ ५२
देवकार्य करिष्यामि लीलां कृत्वाद्भुतां क्षितौ ।
शम्भुपत्नी भविष्यामि तारयिष्यामि सञ्जनान्॥ ५३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वासीच्छिवा तृष्णीमम्बिका स्वात्ममायया।
पश्यन्त्यां मातरि प्रीत्या सद्योऽभूत्तनयातनुः॥ ५४
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीजन्मवर्णनं नाम बष्ठोऽध्यावः॥६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत
पार्वतीके जन्मका वर्णन नामक
अब आप दोनों पुत्रीभावसे अथवा दिव्य भाक
स्नेहपूर्वक मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरे पप
पदको प्राप्त होओगे । मैं पृथ्वीपर अद्भुत लीला के
देवताओंका कार्य सिद्ध करूँगी, भगवान् शु
पत्नी होऊँगी और सज्नोंका उद्धार करूँगी ॥ ५
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर अम्बिका शिव
मौन हो गयीं और उसी क्षण माताके देखते-देखे |
अपनी मायासे प्रसन्नतापूर्वक [नवजात] पुत्रीरूपमें ते
गयीं ॥ ५४॥
द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें |
छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
eee
अथ सप्तमोऽध्यायः
पार्वतीका नामकरण तथा उनकी बाललीलाएँ एवं विद्याध्ययन
ब्रह्मोवाच
ततो मेनापुरः सा वै सुता भूत्वा महाद्युतिः।
चकार रोदनं तत्र लौकिकीं गतिमाश्रिता॥ १
अरिष्टशय्यां परितः सद्विसारिसुतेजसा।
निशीथदीपा विहतत्विष आसन्नरं मुने॥
शरुत्वा तद् रोदनं रम्यं गृहस्थाः सर्वयोषितः।
२
जहषुः सम्भ्रमात्तत्रागताः प्रीतिपुरस्सराः॥ ३
तच्छुद्धान्तचरः शीघ्रं शशंस भूभृते तदा।
पार्वतीजन्म सुखदं देवकार्यकरं शुभम्॥ ४
तच्छुद्धान्तःचरायाशु पुत्रीजन्म सुशंसते।
सितातपत्रं नादेयमासीत्तस्य महीभृतः॥ ५
गतस्तत्र गिरिः प्रीत्या सपुरोहितसद्विजः।
ददर्श तनयां तां तु शोभमानां सुभाससा॥ ६
जीलोत्पलदलश्यामां सुद्युतिं सुमनोरमाम्।
दृष्ट्वा च तादृशीं कन्यां मुमोदाति गिरीएवर:॥ ७
सर्वे च मुमुदुस्तत्र पौराश्च पुरुषाः स्त्रियः।
'तदोत्सवो महानासीन्नेदुर्वाद्यानि भूरिशः॥
ब्रह्माजी बोले--[ हे नारद !] तदनन्तर मेनाके
सामने महातेजस्वी कन्या होकर वे लौकिक गतिका
आश्रय लेकर रोने लगीं। हे मुने! उस समय प्रसूतिः
गृहकी शय्याके चारों ओर फैले हुए उनके महान् तेजसे
रात्रिके दीपक शीघ्र ही कान्तिहीन हो गये॥ १-२॥ ]
उनका मनोहर रुदन सुनकर घरकी सब स्त्रियों
प्रसन्न हो गयीं और शीघ्र ही प्रेमपूर्वक वहाँ चली
आयीं॥ ३॥
तब अन्त:पुरके दूतने देवकार्य सम्पन्न करनेवाले,
कल्याणकारक तथा सुख देनेवाले पार्वतीजन्मको
शीघ्र ही पर्वतराजको बताया। पुत्रीजन्मका समाचार
सुनानेवाले अन्तःपुरके दूतको [ न्योछावररूपमें ] देते
उन पर्वतराजके लिये श्वेतछत्रतक अदेय नहीं रहा!
तत्पश्चात् पुरोहित और ब्राह्मणोंके साथ गिरिर“
वहाँ गये और उन्होंने अपूर्व कान्तिसे सुशोभित ह
उस कन्याको देखा ॥ ४-६॥
समान श्यामवर्ण, सुन्दर कालिते
युक्त तथा अत्यन्त मनोरम उस कन्याको देखकर
गिरिराज अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ७॥
नगरमें रहनेवाले समस्त स्त्री एवं पुरुष क
प्रसन्न हुए। इस समय नगरमें अनेक प्रकारके बॉ. |
बजने लगे और बहुत बड़ा उत्सव होने
च ७]
बभूव मङ्गलं गानं ननुतुर्वारयोषितः।
दानं ददौ द्विजातिभ्यो जातकर्म विधाय च॥ ९
अथ द्वारं समागत्य चकार सुमहोत्सवम्।
हिमाचलः प्रसन्नात्मा भिक्षुभ्यो द्रविणं ददौ ॥ १०
अथो शुभमुहूर्तेऽस्मिन् हिमवान्मुनिभिः सह।
जामाकरोत्सुतायास्तु कालीत्यादि सुखप्रदम्॥ ११
दानं ददौ तदा प्रीत्या द्विजेभ्यो बहु सादरम्।
उत्सबं कारयामास विविधं गानपूर्वकम्॥ १२
इत्थं कृत्वोत्सवं भूरि कालीं पश्यन्मुहुर्मुहुः ।
लेभे मुदं सपत्नीको बहुपुत्रोऽपि भूधरः॥ १३
तत्र सा ववृधे देवी गिरिराजगृहे शिवा।
गङ्गेव वर्षासमये शरदीवाथ चन्द्रिका॥ १४
एवं सा कालिका देवी चार्वङ्गी चारुदर्शना।
दभ्रे चानुदिनं रम्यां चन्द्रबिम्बकलामिव॥ १५
कुलोचितेन नाम्ना तां पार्वतीत्याजुहाव ह।
बन्धुप्रियां बन्धुजनः सौशील्यगुणसंयुताम्॥ १६
उमेति मात्रा तपसे निषिद्धा कालिका च सा।
पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम भुवने मुने॥ १७
दृष्टि: पुत्रवतो$प्यद्रेस्तस्मिस्तृप्तिं जगाम न।
अपत्ये पार्वतीत्याख्ये सर्वसौभाग्यसंयुते॥ १८
परधोरनन्तपुष्पस्य चूते हि भ्रमरावलिः।
विशेषसङ्गा भवति सहकारे मुनीश्वर १९
पूतो विभूषितश्चापि स बभूव तया गिरिः।
सस्कारवत्यैव गिरा मनीषीव हिंमालयः॥ २०
प्रभामहत्या शिखयेव दीपो भवनस्य च।
सममार्गस्तद्वद् गिरिजया गिरिः॥ २९
रद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५२९
मंगलगान होने लगा और वारांगनाएँ नृत्य करने
लगीं। गिरिराजने [कन्याका] जातकर्म संस्कारकर
द्विजातियोंको दान दिया॥ ८-९॥
उसके बाद दरवाजेपर आकर हिमाचलने महान्
उत्सव मनाया और प्रसन्नचित्त होकर भिक्षुकोंको
बहुत-सा धन दिया॥ १०॥
तदनन्तर हिमवानूने शुभ मुहूर्तमें मुनियोंक साथ
उस कन्याके काली आदि सुखदायक नाम रखे॥ ११॥
उन्होंने उस समय ब्राह्मणोंको प्रेम तथा आदरपूर्वक
बहुत-सा धन प्रदान किया और गानपूर्वक अनेक प्रकारका
उत्सव कराया। इस प्रकार उत्सव मनाकर बार-बार
कालीको देखते हुए सपत्नीक हिमालय अनेक पुत्रोंवाले
होनेपर भी बहुत आनन्दित हुए॥ १२-१३॥
देवी शिवा गिरिराजके घरमें वर्षाके समय
गंगाके समान तथा शरद् ऋतुकी चाँदनीके समान
बढ़ने लगीं। इस प्रकार परम सुन्दरी तथा दिव्य
दर्शनवाली कालिका देवी प्रतिदिन चन्द्रकलाके समान
शोभायुक्त हो बढ़ने लगीं ॥ १४-१५॥
सुशीलता आदि गुणोंसे संयुक्त तथा बन्धुजनोंकी
प्रिय उस कन्याको कुटुम्बके लोग अपनी कुलपरम्पराके
अनुसार ' पार्वती' इस नामसे पुकारने लगे॥ १६॥
हे मुने! माताने उन कालिकाको “उमा' कहकर
तपस्या करनेसे मना किया था, अत: बादमें वे सुमुखी
लोकमें उमा नामसे विख्यात हुई॥ १७॥
पुत्रवान् होते हुए भी पर्वतराज हिमालय
सर्वसौभाग्ययुक्त उस पार्वती नामक अपनी सन्तानको
देखते हुए तृप्त नहीं होते थे, क्योंकि हे मुनीश्वर!
वसन्त ऋतुमें नाना प्रकारके पुष्पोंमें रस होनेपर भी
भ्रमरावली आमके बौरपर ही विशेष रूपसे आसक्त
होती है॥ १८-१९॥
वे पर्वतराज हिमालय उस पार्वतीसे उसी प्रकार
पवित्र तथा विभूषित हुए, जिस प्रकार संस्कारसे युक्त
वाणीसे विद्वान् पवित्र तथा विभूषित होता है॥ २०॥
जिस प्रकार महान् प्रभावशाली शिखासे
भवनका दीपक एवं त्रिमार्गगामिनी गंगासे सन्मार्ग
शोभित होता है, उसी प्रकार पार्वतीद्ठारा पर्वतराज
सुशोभित हुए॥ २१॥
५३०
कन्दुकैः कृत्रिमैः पुत्रैः सखीमध्यगता च सा।
गङ्गासैकतवेदीभिर्बाल्ये रेमे मुहु्मुहुः॥ २२
अथ देवी शिवा सा चोपदेशसमये मुने।
पपाठ विद्याः सुप्रीत्या यतचित्ता च सद्गुरोः॥ २३
प्राक्तना जन्मविद्यास्तां शरदीव प्रपेदिरे।
हंसालिः स्वर्णदी नक्तमात्मभासो महौषधिम्॥ २४
इत्थं सुवर्णिता लीला शिवायाः काचिदेव हि।
अन्यलीलां प्रवक्ष्येऽहं शृणु त्वं प्रेमतो मुने॥ २५
श्रीशिवमहापुराण
[अ 0
वे पार्वती बचपनमें अपनी सहेलियोंके साथ
(गेंद), कृत्रिम पुत्रों [पुतला] तथा गंगाकी
बनायी गयी वेदियोंद्वारा क्रीडा करती थीं ॥ २२॥
उसके अनन्तर हे मुने! वे शिवा देवी उपदेशक
समय एकाग्रचित्त होकर सद्गुरुसे अत्यन्त
सभी विद्याएँ पढ़ने लगीं। जिस प्रकार शरद् ऋतु
हंसपंक्ति गंगाको तथा रात्रिमें अमृतमयी चन्र किरणे
औषधियोंको प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार उन पार्वतीको
पूर्वजन्मकी विद्यार स्वयं प्राप्त हो गयीं । हे मुने। इस
प्रकार मैंने शिवाकी कुछ लीलाका ही आपसे वर्णन
किया, अब अन्य लीलाका भी वर्णन करूँगा, आप
प्रेमपूर्वक सुनें॥ २३-२५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीबाल्यलीलावर्षनं नाम ससतमोऽ ध्यायः ॥७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीकी
बाल्यलीलाका वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
नारद मुनिका हिमालयके समीप गमन, वहाँ पार्वतीका हाथ देखकर भावी
लक्षणोंको बताना, चिन्तित हिमवानको शिवमहिमा बताना तथा
शिवसे विवाह करनेका परामर्श देना
ब्रह्मोवाच
एकदा त्वं शिवज्ञानी शिवलीलाविदां वरः।
हिमाचलगृहं प्रीत्यागमस्त्वं शिवप्रेरितः॥ १
दुष्ट्वा मुने गिरीशस्त्वां नत्वानर्च स नारद।
आहूय च स्वतनयां त्वदङ्घ्रथोस्तामपातयत्॥
पुनर्नत्वा मुनीश त्वामुवाच हिमभूधरः।
साञ्जलिः स्वविधिं मत्वा बहुसन्नतमस्तकः॥
हिमालय उवाच
हे मुने नारद ज्ञानिन् ब्रह्मपुत्रवर प्रभो।
सर्वज्ञस्त्वं सकरुणः परोपकरणे रतः॥
मत्सुताजातकं ब्रूहि गुणदोषसमुद्भवम्।
'कस्य प्रिया भाग्यवती भविष्यति सुता मम॥ ५
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! एक समयको
बात है, आप शिवजीसे प्रेरित होकर प्रसन्नतापूर्वक
हिमालयके घर गये। आप शिवतत्त्वके ज्ञाता और
शिवकी लीलाके जानकारोंमें श्रेष्ठ हैं। हे मुने!
गिरिराज हिमालयने आपको देखकर प्रणाम करें
आपकी पूजा की और अपनी पुत्रीको बुलाकर उनसे
आपके चरणोंमें प्रणाम करवाया॥ १-२॥
हे मुनीश्वर तत्पश्चात् स्वयं नमस्कार करें
हिमाचल अपने सौभाग्यकी सराहना करके मसर
झुकाकर हाथ जोड़कर आपसे कहने लगे--॥ *
हिमालय बोले--हे मुने! हे नारद! हे शनि!
हे ब्रह्मे पुत्रम श्रेष्ठ! हे प्रभो! आप सर्व है
दयामय हैं और दूसरोंके उपकारमें लगे
हैं। गुण-दोषको प्रकट करनेवाले आप मेरी री
जन्मफलका वर्णन कीजिये, मेरी सौभाग्यवती
किसकी पत्नी होगी ?॥ ४-५॥
न| ८]
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तो मुनिवर्य त्वं गिरीशेन हिमाद्रिणा।
बिलोक्य कालिकाहस्ं सर्वाङ्गं च विशेषतः॥ ६
अवोचस्त्वं गिरि तात कौतुकी वाग्विशारद:।
ज्ञानी विदितवृत्तान्तो नारदः प्रीतमानसः॥ ७
नारद उवाच
एषा ते तनया मेने सुधांशोरिव वर्धिता।
आद्या कला शैलराज सर्वलक्षणशालिनी॥ ८
स्वपतेः सुखदात्यन्तं पित्रोः कीर्तिविवर्थिनी।
महासाध्वी च सर्वासु महानन्दकरी सदा॥ ९
सुलक्षणानि सर्वाणि त्वत्सुतायाः करे गिरे।
एका विलक्षणा रेखा तत्फलं शृणु तत्त्वत: ॥ १०
योगी नग्नोऽगुणोऽकामी मातृतातविवर्जितः।
अमानोऽशिववेषश्च पतिरस्याः किलेदृशः॥ ११
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्ते हि सत्यं मत्वा च दम्पती।
मेना हिमाचलश्चापि दुःखितौ तौ बभूवतु:॥ १२
शिवाकर्ण्यवचस्ते हि तादूशं जगदम्बिका।
लक्षणैस्तं शिवं मत्वा जहर्षाति मुने हृदि॥ १३
ने मृषा नारदवचस्त्विति संचिन्त्य सा शिवा।
स्नेहं शिवपदद्वनद्रे चकाराति हृदा तदा॥ १४
उवाच दुखित: शैलस्त्वां तदा हृदि नारद।
कमुपायं मुने कुर्यामतिदुःखमभूदिति॥ १५
तच्छुत्वा त्वं मुने प्रात्थ महाकौतुककारकः।
हिमाचलं शुभैर्वाक्यैहर्षयन्वाग्विशारदः॥ १६
नारद उवाच
लेहाच्छृणु गिरे वाकयं मम सत्यं मृषा न हि।
ब्रह्मलिपिर्न मृषा भवति श्रुवम्॥ १७
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३१
ब्रह्माजी बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! हे तात! गिरिराज
हिमालयके ऐसा कहनेपर कालिकाके हाथ और
विशेष रूपसे उसके सम्पूर्ण अंगोंको देखकर कौतुकी,
बोलनेमें चतुर, ज्ञानी और सभी वृत्तान्तोंको जाननेवाले
आप नारद प्रसन्नचित्त होकर पर्वतराजसे कहने
लगे-॥ ६-७॥
नारद बोले-हे शैलराज! हे मेने! आपकी
यह पुत्री चन्द्रमाकी आदि कलाके समान बढ़ रही है,
यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है॥ ८॥
यह अपने पतिके लिये अत्यन्त सुखदायिनी,
माता-पिताकी कीर्तिको बढानेवाली, समस्त नारियोंमें
परम साध्वी और [स्वजनोंको] सदा महान् आनन्द
देनेवाली होगी ॥ ९॥
हे गिरे! आपकी पुत्रीके हाथमें उत्तम लक्षण
विद्यमान हैं, केवल एक रेखा विलक्षण है, उसका
फल यथार्थरूपसे सुनिये। इसे ऐसा पति प्राप्त होगा,
जो योगी, नग्न, निर्गुण, निष्काम, माता-पितासे रहित,
मानविहीन और अमंगल वेषवाला होगा॥ १०-११॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] आपकी इस
'बातको सुनकर और सत्य मानकर वे मेना तथा
हिमालय-दोनों पति-पत्नी बहुत दुखी हुए॥ १२॥
परंतु हे मुने! जगदम्बा शिवा आपके उस प्रकारके
वचनको सुनकर और इन लक्षणोंसे युक्त उन शिवको
मानकर मन-ही-मन अत्यन्त हर्षित हुई॥ १३॥
नारदजीकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती--
यह सोचकर वे शिवा शिवके युगलचरणोंमें सम्पूर्ण
हृदयसे अत्यन्त स्नेह करने लगीं॥ १४॥
हे नारद! उस समय मन-ही-मन दुखी हो हिमवानने
आपसे कहा-मुने! [उस रेखाका फल सुनकर] मुझे
बड़ा दुःख हुआ है, मैं क्या उपाय करूँ ?॥ १५॥
हे मुने! यह सुनकर महान् कौतुक करनेवाले
और वार्तालापविशारद आप मंगलकारी वचनोंद्वारा
हिमाचलको हर्षित करते हुए कहने लगे¬॥ १६॥
जारदजी बोले-हे गिरिराज! आप स्नेहपूर्वक
सुनिये। मेरी. बात सच्ची है, वह झूठ नहीं होगी।
हाथकी रेखा ब्रह्माजीकी लिपि है। निश्चय ही वह
मिथ्या नहीं होती है॥ १७॥
५३२
श्रीशिवमहापुराण
[अ वि लत जन जरणल आज कक 7.
तादृशो$स्या: पतिः शैल भविष्यति न संशय: ।
तत्रोपायं शृणु प्रीत्या यं कृत्वा लप्स्यसे सुखम्॥ १८
तादूशोऽस्ति वरः शम्भुः 'लीलारूपधरः प्रभुः।
कुलक्षणानि सर्वाणि तत्र तुल्यानि सदुणे:॥ १९
प्रभौ दोषो न दुःखाय दुःखदोऽत्यप्रभौ हि सः।
रविपावकगड़ानां तत्र ज्ञेया निदर्शना॥ २०
तस्माच्छिवाय कन्यां स्वां शिवां देहि विवेकतः।
शिवः सर्वेश्वरः सेव्योऽविकारी प्रभुरव्ययः॥ २१
शीघ्रप्रसादः स शिवः तां ग्रहीष्यत्यसंशयम्।
तपःसाध्यो विशेषेण यदि कुर्याच्छिवा तपः॥ २२
सर्वथा सुसमर्थो हि स शिवः सकलेश्वरः।
कुलिशस्यापि विध्बंसी ब्रह्माधीनः सुखप्रदः ॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा त्वं पुनस्तात कौतुकी ब्रह्मविन्मुने।
शैलराजमवोचो हि हर्षयन्वचनैः शुभैः॥ २४
भाविनी दयिता शम्भोः सानुकूला सदा हरे।
महासाध्वी सुव्रता च पित्रोः सुखविवर्धिनी। २५
शम्भोश्चित्तं वशे चैषा करिष्यति तपस्विनी।
स चाप्येनामृते योषां न हान्यामुद्रहिष्यति॥ २६
एतयोः सदृशं प्रेम न कस्याप्येव तादूशम्।
भूतं वा भविता वापि नाधुना च प्ररवर्तते॥ २७
अनयोः सुरकार्याणि कर्तव्यानि मृतानि च।
यानि यानि नगश्रेष्ठ जीवितानि पुनः पुनः॥ २८
अनया कन्यया तेऽद्रे अर्धनारीश्वरो हरः।
भविष्यति तथा हर्षदिनयोर्मिलितं पुनः॥ २९
शरीरार्धं हरस्यैषा हरिष्यति सुता तव।
तपःप्रभावात्संतोष्य महेशं सकलेश्वरम्॥ ३०
Ee हे शैल ! इसका पति वैसा ही होगा, इसमें संशय
नहीं है, परंतु आप इसके उपायको सुनि
जिसे करके आप सुख प्राप्त करेंगे॥ १८॥
उस प्रकारके वर तो लीलारूपधारी प्रभु शिव
हैं, उनमें समस्त कुलक्षण सद्गुणोंके समान ही हैं॥ ११)
समर्थ पुरुषमें दोष दुःखका कारण नहीं होता
असमर्थमें ही वह दुःखदायक होता है। इस विषया
सूर्य, अग्नि और गंगाका दृष्टान्त जानना चाहिये॥ २०॥
इसलिये आप विवेकपूर्वक अपनी कन्या शिवाक्षे
शिवको अर्पण कोजिये। भगवान् शिव सर्वेश्वा
सबके सेव्य, निर्विकार, सामर्थ्यशाली और अविनाश
हैं। विशेषतः वे तपस्यासे वशमें हो जाते हैं। अत:
यदि शिवा तप करे, तो शीघ्र ही प्रसन्न होनेवाले बे
शिव उसे अवश्य ग्रहण कर लेंगे॥ २१-२२॥
सर्वेश्वर शिव सब प्रकारसे समर्थ तथा बड़
[-लेख]-का भी विनाश करनेवाले हैं । ब्रह्माजी उनके
अधीन हैं तथा वे सबको सुख देनेवाले हँ ॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! हे ब्रह्मवित्! हे मुने!
ऐसा कहकर कौतुक करनेवाले आपने शुभ वचनोंसे
गिरिराजको हर्षित करते हुए पुनः कहा- ॥ २४॥
पार्वती भगवान् शंकरकी पत्नी होगी और वह
सदा रद्रदेवके अनुकूल रहेगी; क्योंकि यह महासाध्वी
और उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली है तथा मात
पिताके सुखको बढ़ानेवाली है॥ २५॥
यह तपस्विनी भगवान् शिवके मनको आप
वशमें कर लेगी और वे भी इसके सिवा किसी दुसरी
्त्रीसे विवाह नहीं करेंगे॥ २६॥ |
इन दोनोंका जैसा प्रेम है, वैसा प्रेम न तो किसीकी |
हुआ है, न इस समय है और न आगे होगा॥ २७|| |
हे गिरिश्रेष्ठ ! इन्हें देवताओंके कार्य करे हैं, |
उनके जो-जो कार्य नष्टप्राय हो गये हैं, उन सर्ब
इनके द्वारा पुन: उद्धार होगा॥ २८॥
हे गिरे! आपकी इस कन्यासे भगवान्
अर्धनारीश्वर होंगे, इन दोनोंका पुनः हर्षपूर्वक मिली
होगा॥२९॥
आपकी यह पुत्री तपस्याके प्रभावसे र |
महेश्वरकों सनुष्ट करके उनके शरीरके आधे
अपने अधिकारमें कर लेगी ॥ ३०॥
ड ८]
स्वर्णगौरी सुवर्णाभा तपसा तोष्य तं हरम्।
विद्युद्रौरतमा चेयं तव पुत्री भविष्यति॥ ३१
गौरीति नाम्ना कन्या तु ख्यातिमेषा गमिष्यति।
सर्वदेवगणैः पूज्या हरिब्रह्मादिभिस्तथा॥ ३२
नान्यस्मै त्वमिमां दातुमिहार्हसि नगोत्तम।
इदं चोपांशु देवानां न प्रकाश्यं कदाचन॥ ३३
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवर्षे तव नारद्।
उवाच हिमवान्वाक्यं मुने त्वां वाग्विशारद: ॥ ३४
हिमालय उवाच
हे मुने नारद प्राज्ञ विज्ञप्तिं कांचिदेव हि।
करोमि तां शृणु प्रीत्यातस्त्वं प्रमुदमावह॥ ३५
श्रूयते त्यक्तसङ्गः स महादेवो यतात्मवान्।
तपश्चरति सन्नित्यं देवानामप्यगोचरः॥ ३६
स कथं ध्यानमार्गस्थः परब्रह्मार्पितं मन: ।
भ्रंशयिष्यति देवर्षे तत्र मे संशयो महान्॥ ३७
अक्षरं परमं ब्रह्म प्रदीपकलिकोपमम्।
सदाशिवाख्यं स्वं रूपं निर्विकारमजात्परम्॥ ३८
निर्गुण सगुणं तच्च निर्विशेषं निरीहकम्।
अतः पश्यति सर्वत्र न तु बाह्यं निरीक्षते॥ ३९
इति स श्रूयते नित्यं किन्नराणां मुखान्मने।
३हागतानां सुप्रीत्या किं तन्मिथ्यावचो श्रुवम्॥ ४०
विशेषतः श्रूयते स साक्षान्नाम्ना तथा हरः।
समयं कृतवान्पूर्वं तन्मया गदितं श्ृणु॥४१
ने त्वामृतेःन्यां बरये दाक्षायणि सति प्रिये।
ज ग्रहीष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ४२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५३३
यह आपकी कन्या अपनी तपस्यासे उन शिवको.
सन्तुष्टकर विद्युत् तथा सुवर्णके समान गौरवर्णकी
होगी॥ ३१॥
इसीलिये यह कन्या गौरी नामसे विख्यात
होगी और ब्रह्मा, विष्णु तथा समस्त देवगण इसका
पूजन करेंगे॥ ३२॥
हे गिरिश्रेष्ठ! आप इस कन्याको किसी दूसरेके
लिये नहीं देना और इस रहस्यको देवताओंसे कभी
प्रकट नहीं करना ॥ ३३॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवर्षे! हे नारद! हे मुने!
आपका यह वचन सुनकर वाक्यविशारद हिमालय
आपसे यह वाक्य कहने लगे ॥ ३४॥
हिमालय बोले--हे मुने! हे नारद! हे प्राज्ञ ! मैं
आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ, आप उसे प्रेमपूर्वक
सुनिये और आनन्दका अनुभव कीजिये॥ ३५॥
सुना जाता है कि वे महादेवजी आसक्तियोंका
त्याग करके अपने मनको संयममें रखते हुए नित्य तपस्या
करते हैं और देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते॥ ३६॥
हे देवर्षे! ध्यानमार्गमें स्थित हुए वे [ भगवान्
शंकर] परब्रह्ममें लगाये हुए अपने मनको किस प्रकार
विचलित करेंगे, इस विषयमें मुझे महान् संशय
है॥ ३७॥
'दीपककी लौके समान प्रकाशमान, अविनाशी,
प्रकृतिसे परे, निर्विकार, निर्गुण, सगुण, निर्विशेष और
निरीह जो परब्रह्म है, वही उनका अपना सदाशिव नामक
स्वरूप है, अत: वे उसीका सर्वत्र साक्षात्कार करते हैं ।
किसी बाह्य वस्तुपर दृष्टिपात नहीं करते॥ ३८-३९ ॥
हे मुने! यहाँ आये हुए किन्नरोंके मुखसे उनके
विषयमें नित्य ऐसा सुना जाता है, क्या यह बात
मिथ्या ही है॥ ४०॥
विशेषतः यह बात भी सुननेमें आती है कि उन
भगवान् हरे पूर्व समयमें [सतीके समक्ष] प्रतिज्ञा की
थी, उसे मैं कहता हूँ, आप सुनें ॥ ४१॥
[उन्होंने कहा था--] हे दाक्षायणि! हे सति!
हे प्रिये! मैं तुम्हारे अतिरिक्त दूसरी स्त्रीका न तो वरण
करूँगा और न तो उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करूँगा, यह
मैं तुमसे सत्य कहता हूँ॥ ४२॥
५३४
श्रीशिवमहापुराण
[अ ल 5"
इति सत्या समं तेन पुरैव समयः कृतः।
तस्यां मृतायां स कथं स्वयमन्यां ग्रहीष्यति॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा स गिरिस्तूष्णीमास तस्य पुरस्तव।
तदाकर्ण्याथ देवर्षे त्वं प्रावोचः सुतत्त्वतः॥ ४४
नारद उवाच
न बे कार्या त्वया चिंता गिरिराज महामते।
एषा तव सुता काली दक्षजा ह्यभवत्पुरा॥ ४५
सतीनामाभवत्तस्याः सर्वमङ्गलदं सदा।
सती सा वै दक्षकन्या भूत्वा रुद्रप्रियाभवत्॥ ४६
पितुर्यज्ञे तथा प्राप्यानादरं शंकरस्य च।
तं दृष्ट्या कोपमाधायात्याक्षीददेहं च सा सती ॥ ४७
पुनः सैव समुत्पन्ना तव गेहेऽम्बिका शिवा।
पार्वती हरपलीयं भविष्यति न संशयः॥ ४८
एतत्सर्व विस्तरात्त्वं प्रोक्तवान्भूभृते मुने।
पूर्वरूपं चरित्रं च पार्वत्याः प्रीतिवर्धनम्॥ ४९
तं सर्व पूर्ववृत्तान्तं काल्या मुनिमुखाद्विरिः।
श्रुत्वा सपुत्रदारः स तदा निःसंशयोऽभवत्॥ ५०
ततः काली कथां श्रुत्वा नारदस्य मुखात्तदा।
लज्जयाधोमुखी भूत्वा स्मितविस्तारितानना॥ ५१
करेण तां तु संस्पृश्य श्रुत्वा तच्चरितं गिरिः।
मूर्धनि शश्वत्तथाघ्राय स्वासनान्ते न्यवेशयत्॥ ५२
ततस्त्वं तां पुनर्दृष्ट्वावोचस्तत्र स्थितां मुने।
हर्षयन् गिरिराजं च मेनकां तनयैः सह॥ ५३
सिंहासनं तु किन्त्वस्याः शैलराज भवेदतः।
शम्भोरूरी सदैतस्या आसनं तु भविष्यति॥ ५४
हरेरूरवांसनं प्राप्य तनया तव सन्ततम्।
न यत्र कस्यचिद् दृष्टिर्मानसं वा गमिष्यति॥ ५५
इस प्रकार सतीके साथ उन्होंने पहले हौ
कर ली है। अब सतीके मर जानेपर वे स्वयं दो
स्त्रीको कैसे ग्रहण करेंगे ?॥ ४३॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवर्षे! यह कहकर ञ्ञ
गिरिने आपके सामने मौन धारण कर लिया, तब झे
सुनकर आप तत्त्वपूर्वक यह बात कहने लगे-- ॥ ४४
नारदजी बोले-हे गिरिराज! हे महामे।
आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, आपकी यह
कन्या काली पूर्व समयमें दक्षकी पुत्री थी॥४५॥
उस समय उसका नाम सती था, जो सदा मंगल
प्रदान करनेवाला है । वह सती दक्षकन्या होकर रुद्रकी
प्रिया बनी थी॥ ४६॥
उस सतीने अपने पिताके यज्ञमें अनादर पाक
तथा भगवान् शंकरका भी अपमान हुआ देखकर कोप
करके अपने शरीरको त्याग दिया था॥ ४७॥
बे ही अम्बिका शिवा आपके घरमें उत्पन हुई
हैं। यह पार्वती भगवान् शंकरकी पली होगी, इसमें
सन्देह नहीं है॥ ४८॥
[ब्रह्माजीने कहा-- ] हे मुने! उस समय आपने
पार्वतीका यह सब प्रीतिवर्धक पूर्वजन्म तथा चसि
विस्तारपूर्वक गिरिराजसे कहा था॥ ४९॥
मुनिके मुखसे कालीके सम्पूर्ण पूर्व वृत्तातको
सुनकर पुत्र-स्त्रीसहित वे गिरि सन्देहरहित हो गये॥५०॥
तत्पश्चात् कालीने नारदजीके मुखसे उस कथाकी
सुनकर लजासे मुख नीचे कर लिया और उनके
मुखपर मुसकान छा गयी॥ ५१॥
उसके चरित्रको सुनकर, हाथसे उसका स |
करके और बार-बार उसका मस्तक सूँघकर हिमालयो ।
उसे अपने आसनके पास बैठाया॥५२॥
तब हे मुने! आप वहाँ बैठी हुई उस कातीकी
देखकर पुत्रोंसहित गिरिराज एवं मेनाको प्रसल क्र
इए कहने लगे-हे शैलराज! इस पार्वतीकें
लिये यह सिंहासन क्या है? इसका आसन तौ ९ |
शम्भुका ऊरुदेश होगा। यह तुम्हारी तनयां शिव्जी्न |
ऊरुका आसन प्राप्त करेगी, जहाँ किसीकी
अथवा मनतक नहीं जा सकेगा॥ ५३--५५॥
कु ९]
ब्रह्मोवाच
इति वचनमुदारं नारद त्वं गिरीशं
ब्रिदिवमगम उक्त्वा तत्क्षणादेव प्रीत्या।
गिरिपतिरपि चित्ते चारुसंमोदयुक्तः
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३५
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार
आप गिरिराजसे उदार वचन कहकर वहाँसे
स्वर्ग चले गये और वे गिरिराज भी चित्तमें प्रसन्न
होकर सम्पूर्ण समृद्धियोंसे युक्त अपने घर चले
स्वगृहमगमदेवं सर्वसम्पत्समृद्धम्॥ ५६ | गये ॥ ५६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रदसंहितायां तृतीये पार्वती खण्डे नारदहिमालयसंवादवर्णन नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणे अन्तरगत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
नारदहिमालयसंवादवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
पार्वतीके विवाहके सम्बन्धमें मेना और हिमालयका वार्तालाप, पार्वती और
हिमालयद्वारा देखे गये अपने स्वप्नका वर्णन
नारद उवाच
विधे तात त्वया शैववर प्राज्ञाद्धता कथा।
वर्णिता करुणां कृत्वा प्रीतिर्मे वर्थिताधिका॥
विधे गते स्वकं धाम मयि वै दिव्यदर्शने।
ततः किमभवत्तात कृपया तद्वदाधुना॥
ब्रह्मोवाच
गते त्वयि मुने स्वर्गे कियत्काले गते सति।
मेना प्राप्यैकदा शैलनिकटं प्रणनाम सा॥
स्थित्वा सविनयं प्राह स्वनाथं गिरिकामिनी।
तत्र शैलाधिनाथं सा प्राणप्रियसुता सती॥
मेनोवाच
मुनिवाक्यं न बुद्धं मे सम्यङ् नारीस्वभावतः।
विवाहं कुरु कन्यायाः सुन्दरेण वरेण ह॥
सर्वथा हि भवेत्तरद्वाहोऽपूर्वसुखावहः।
वरश्च गिरिजायास्तु सुलक्षणकुलोद्धवः॥
प्रणप्रिया सुता मे हि सुखिता स्याद्यथा प्रिया।
अदर प्रप्य सुप्रीता तथा कुरु नमोऽस्तु ते॥
ब्रह्मोवाच
श्युक्वाश्रुमुखी मेना पत्यड्प्रदयोः पतिता तदा।
तमुत्थाप्य गिरिः प्राह यथावत्पराज्ञसत्तमः॥
नारदजी बोले-हे विधे! हे तात! हे शिवभक्तोंमें
श्रेष्ठ! हे प्राज्ञ! आपने करुणा करके [भगवान्
शिवकी] यह अद्भुत कथा कही, उससे [मेरे मनमें]
बहुत प्रीति बढ़ी है। हे विधे! जब दिव्य दृष्टिवाला
मैं अपने स्थानको चला गया, तब हे तात! क्या
हुआ? अब कृपाकर उसे मुझे बतलाइये॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! आपके स्वर्ग चले जानेपर
कुछ समय बीतनेपर मेनाने हिमालयके पास आकर उन्हें
प्रणाम किया। तत्पश्चात् पुत्रीको प्राणोंसे भी अधिक
चाहनेवाली साध्वी गिरिप्रिया मेना वहाँ बैठकर अपने
पति गिरिराजसे विनयपूर्वक कहने लगीं॥ ३-४॥
मेना बोलीं-्त्री-स्वभावके कारण मुनिकी
बातको मैंने अच्छी तरह नहीं समझा, [मेरी तो यह
प्रार्थना है कि] आप कन्याका विवाह किसी सुन्दर
वरके साथ कर दीजिये। यह विवाह सर्वथा अपूर्व
सुख देनेवाला होना चाहिये। गिरिजाका वर शुभ
लक्षणाँसे सम्पन्न और कुलीन होना चाहिये। मेरी पुत्री
मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। वह प्रिया उत्तम वर
पाकर जिस प्रकार भी प्रसन्न और सुखी हो सके,
वैसा कीजिये, आपको मेरा नमस्कार है॥ ५--७॥
ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर अश्रुयुक्त
मुखवाली मेना पतिके चरणोंमें गिर पड़ी, तब
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हिमवान् उन्हें उठाकर यथोचित
बात कहने लगे-॥ ८॥
५३६ श्रीशिवमहापुराण [ड CO
हिमालय उवाच हिमालय बोले--हे देवि! हे मेनके! मैं यो
श्रृणु त्वं मेनके देवि यथार्थ वच्मि तत्त्वत: । और तत्त्वकी बात बताता हूँ, सुनिये । आप भ्रम छोडे
भ्रमं त्यज मुनेर्वाक्यं वितथं न कदाचन॥ ९
यदि स्नेहः सुतायास्ते सुतां शिक्षय सादरम्।
तपः कुर्याच्छंकरस्य सा भवत्या स्थिरचेतसा॥ १०
चेत्प्रसन्नः शिवः काल्याः पाणि गृह्णाति मेनके।
सर्व भूयाच्छुभं नश्येन्नारदोक्तममङ्गलम्॥ ११
अमङ्कलानि सर्वाणि मङ्गलानि सदा शिवे।
तस्मात्सुतां शिवप्राप्त्यै तपसे शिक्षय ह्रुतम्॥ १२
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य गिरेर्वाक्यं मेना प्रीततराभवत्।
सुतोपकंठमगमदुपदेष्टुं तपोरुचिम्॥ १३
सुताङ्गं सुकुमारं हि दृष्ट्बातीवाथ मेनका।
विव्यथे नेत्रयुग्मे चाश्रुपूणेऽभवतां द्रुतम्॥ १४
सुतां समुपदेष्टुं तनन शशाक गिरिप्रिया।
बुबुधे पार्वती तद्वै जननीङ्गितमाशु सा॥ १५
अथ सा कालिका देवी सर्वज्ञा परमेश्वरी।
उवाच जननीं सद्यः समाश्वास्य पुनः पुनः॥ १६
पार्वत्युवाच
मातः श्रृणु महाप्राज्ञेऽद्यतनेऽजमुहूर्तके ।
रात्रौ दृष्टो मया स्वप्नस्तं वदामि कृपां कुरु॥ १७
विप्रश्चेव तपस्वी मां सदयः प्रीतिपूर्वकम्।
उपादिदेश सुतपः कर्तु मातः शिवस्य वै॥ १८
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा मेनका शीघ्र पतिमाहूय तत्र च।
तत्स्वप्नं कथयामास सुतादृष्टमशेषतः॥ १९
ससुतास्वप्नमथाकर्ण्य मेनकातो गिरीश्वरः।
उवाच परमप्रीतः प्रियां सम्बोधयनिरा॥ २०
गिरीश्वर उवाच
हे प्रियेऽपररात्रान्ते स्वप्नो दृष्टो मयापि हि।
तं श्रृणु त्वं महाप्रीत्या वच्म्यहं ते समादरात्॥ २१
एकस्तपस्वी परमो नारदोक्तवराङ्गधृक्।
पुरोपकंठं सुप्रीत्या तपः कर्तु समागतः॥ २२
मुनिकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती। यदि आपके
त्रके प्रति स्नेह है, तो उसे सादर शिक्षा दीजिये
बह भक्तिपूर्वक सुस्थिर चित्तसे शंकरके लिये तप को।
हे मेनके ! यदि शिव प्रसन्न होकर कालीका
कर लेते हैं, तो सब शुभ ही होगा और नारदजीन्
बताया हुआ अमंगल नष्ट हो जायगा। शिवके समीए
सारे अमंगल सदा मंगलरूप हो जाते हैं, इसलिये आपको
शिवकी प्राप्तिके लिये पुत्रीको तपस्या करनेकी षन
शिक्षा देनी चाहिये॥ ९-१२॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] हिमवानूकी यह
बात सुनकर मेना परम प्रसन्न हुईं । वे तपस्यामें रुचिका
उपदेश देनेके लिये पुत्रीके पास गयीं । पुत्रीके सुकुमार
शरीरपर दृष्टिपात करके मेनाको बड़ी व्यथा हुई और
उनके दोनों नेत्रोंमें शीघ्र ही आँसू भर आये ॥ १३-१४॥
तब गिरिप्रिया मेना पुत्रीको उपदेश न दे सकी,
किंतु माताकी उस चेष्टाको वे पार्वती शीघ्र ही समद्र
गयीं । तदनन्तर वे सर्वज्ञ परमेश्वरी कालिका देवी माताको
बार-बार आश्वासन देकर शीघ्र कहने लगीं ॥ १५-१६॥
पार्वती बोलीं-हे मातः! हे महागरे!
सुनिये, आजकी रात्रिके ब्राह्ममुहूर्तमें मैंने एक स्वण
देखा है, उसे बताती हूँ, आप कृपा करें। हे मातः!
एक दयालु एवं तपस्वी ब्राह्मणने मुझे शिवके निमित
उत्तम तपस्या करनेका प्रसन्नतापूर्वक उपदेश दि
है॥ १७-१८॥
, ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] यह सुनकर मनक
वहाँ शीघ्र अपने पतिको बुलाकर पुत्रके देखे हुए 3
स्वप्को पूर्णरूपसे बताया तब मेनकासे पुत्रके स्व |
सुनकर गिरिराज बडे प्रसन्न हुए और वाणीसे |
समझाते हुए कहने लगे-- ॥ १९-२०॥
गिरिराज बोले-हे प्रिये! मैंने भी ठ
अन्तिम प्रहरमें एक स्वप्न देखा है, मैं आदरा १
बताता हूँ, आप प्रेमपूर्वक सुनें | नारदजीके दवार ^ |
गये वरके अंगों [लक्षणों]-को धारण करनेवाले
परम तपस्वी प्रसन्नताके साथ तपस्या हॅक
मेरे नगरके निकट आये । तब मैं भी आति प्रस रै
ड ९]
गृहीत्वा स्वसुतां तत्रागमं प्रीततरोऽप्यहम्।
मया ज्ञातः स वै शम्भुर्नारदोक्तवरः प्रभुः॥ २३
सेवार्थ तस्थ तनयामुपदिश्य तपस्विनः ।
तं वै प्रार्थितवांस्तस्यां न तदाङ्ीचकार सः॥ २४
अभूद्विवादः सुमहान्सांख्यवेदान्तसंमतः ।
ततस्तदाज्ञया तत्र संस्थितासीत्सुता मम॥ २५
निधाय हृदि तं कामं सिषेवे भक्तितश्च सा।
इति दृष्टं मया स्वप्नं प्रोक्तवांस्ते वरानने॥ २६
ततो मेने कियत्कालं परीक्ष्यं तत्फलं प्रिये।
योग्यमस्तीदमेवेह बुध्यस्व त्वं मम भ्रुवम् ॥ २७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा गिरिराजश्च मेनका वै मुनीश्वर।
सन्तस्थतुः परीक्षन्तौ तत्फलं शुद्धचेतसौ॥ २८
इत्थं व्यतीतेऽल्पदिने परमेशः सतां गतिः।
सतीविरहसुव्यग्रो भ्रमन्सर्वत्र सूतिकृत्॥ २९
तत्राजगाम सुप्रीत्या कियद् गणयुतः प्रभुः
तपः कर्तु सतीप्रेमविरहाकुलमानसः॥ ३०
तपश्चकार स्वं तत्र पार्वती सेवने रता।
सखीभ्यां सहिता नित्यं प्रसन्नार्थमभूत्तदा॥ ३१
विद्धो$पि मार्गणैः शम्भुर्विकृतिं नाप स प्रभुः ।
सुरैः स्वात्ममोहनार्थं स्मरेण वै॥ ३२
देवा स्मरं च तत्रैव स्ववहिनयनेन सः।
भृत्वा मम वचः क्रुद्धो महयामन्तर्दधे ततः॥ ३३
पतः कालेन कियता विनाश्य गिरिजामदम्।
सुतपसा प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः॥ ३४
लौकिकाचारमाश्रित्य रुद्रो विष्णुप्रसादितः।
कालीं विवाहयामास ततो5भूद् बहुमङ्गलम्॥ ३५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३७
अपनी पुत्रीको साथ लेकर वहाँ गया। [उस समय]
मुझे ज्ञात हुआ कि नारदजीके द्वारा बताये हुए वर
भगवान् शम्भु ये ही हैं। मैंने उन तपस्वीकी सेवाके
लिये अपनी पुत्रीको उपदेश देकर उनसे भी प्रार्थना
की कि वे इसकी सेवा स्वीकार करें, परंतु उस समय
उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। इतनेमें वहाँ सांख्य
और वेदान्तके अनुसार बहुत बड़ा विवाद छिड गया।
तदनन्तर उनकी आज्ञासे मेरी पुत्री वहीं रह गयी और
अपने हदयमें उन्हींकी कामना रखकर भक्तिपूर्वक उनकी
सेवा करने लगी। हे सुमुखि! मैंने यही स्वप्न देखा
था, जिसे तुम्हें बता दिया। अतः हे मेने! हे प्रिये!
कुछ समयतक इस स्वप्नके फलकी परीक्षा करनी
चाहिये, इस समय यही उचित जान पड़ता है, अब
आप इसीको मेरा निश्चित मत समझिये ॥ २१--२७॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! यह कहकर वे
गिरिराज तथा मेना शुद्धचित्त हो [कुछ कालपर्यन्त]
स्वप्नफलकी प्रतीक्षा करने लगे॥ २८॥
इसके अनन्तर अभी कुछ ही काल बीता था कि
सृष्टिकर्ता तथा सञ्जनोंको गति देनेवाले परमेश्वर
शिवजी सतीके विरहसे अत्यन्त व्याकुल होकर सर्वत्र
घूमते हुए गणोंके साथ तप करनेके लिये प्रेमपूर्वक
वहाँ आये। सतीके प्रेमविरहमें व्याकुल चित्तबाले वे
वहीं अपना तप करने लगे। उस समय पार्वती अपनी
दो सखियोंके साथ उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनकी
सेवामें लगी रहती थीं॥ २९-३१॥
[उस समय] उन आत्मस्वरूप शिवको
मोहित करनेके लिये देवताओंके द्वारा भेजे गये
कामदेवके बाणोंसे विद्ध होकर भी भगवान् शम्भु
विचलित नहीं हुए॥३२॥
अपनी नेत्राग्निसे कामदेवको जलाकर मेरे
वचनका स्मरणकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ३३॥
तत्पश्चात् कुछ समय बीतनेके बाद गिरिजाके
अभिमानका नाश करके पुनः उनको कठोर तपस्यासे
प्रसन्न किये गये महेश्वर प्रसन्न हुए॥ ३४॥
उसके बाद विष्णुके द्वारा प्रसन्न किये गये रुद्रने
लोकाचारका आश्रय लेकर पार्वतीके साथ विवाहः
किया। उस अवसरपर बहुत मंगल हुआ॥ ३५॥
५३८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० III हे
इत्येतत्कथितं तात समासाच्चरितं विभो:।
शंकरस्य परं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ३६ | कहा, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ३
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे स्वनवर्णनपूर्वक॑
पुनः ब्रह्माजी बोले-हे तात! इस प्रकार कै
संक्षेपमें विभु शंकरका अत्यन्त दिव्य चरित्र [ णि
||
संक्षेपशिवचरितवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
संक्षेपर्में शिवचारित-वर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
शिवजीके ललाटसे भौमोत्पत्ति
नारद उवाच
विष्णुशिष्य महाभाग विधे शैववर प्रभो।
शिवलीलामिमां व्यासात्प्रीत्या मे वक्तुमहसि॥ १
सतीविरहयुक् शम्भुः किं चक्रे चरितं तथा।
तप: कर्तु कदायातो हिमवत्प्रस्थमुत्तमम्॥ २
शिवाशिवविवादोऽभूत्क्रथं कामक्षयश्च वै।
तपः कृत्वा कथं प्राप शिवं शम्भुं च पार्वती॥ ३
तत्सर्वमपरं चापि शिवसच्चरितं परम्।
वक्तुमर्हसि मे ब्रह्मन्महानन्दकरं शुभम्॥ ४
सूत उवाच
इति श्रुत्वा नारदस्य प्रश्नं लोकाधिपोत्तमः।
विधिः प्रोवाच सुप्रीत्या स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्॥ ५
ब्रह्मोवाच
देवर्षे शैववर्याद्य तद्यशः शृणु चादरात्।
पावनं मङ्गलकरं
आगत्य स्वगिरि शम्भुः प्रियाविरहकातरः।
सस्मार स्वप्रियां देवीं सतीं प्राणाधिकां हृदा॥ ७
गणानाभाष्य शोचंस्तां तद्गुणान्प्रेमवर्धनान्।
'वर्णयामास सुप्रीत्या दर्शयँल्लौकिकीं गतिम्॥ ८
भक्तिवर्धनमुत्तमम्॥ ६
नारदजी बोले--हे विष्णुशिष्य! हे महाभा!
हे विधे! हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! हे प्रभो! आप
शिवजीकी इस लीलाको प्रीतिपूर्वक विस्तारसे मुने
कहिये॥ १॥
सतीके विरहसे युक्त होकर शिवजीने कौन-स
चरित्र किया और वे उत्तम हिमालय पर्वतपर तप
करनेके लिये कब आये?॥ २॥
शिवा और शिवजीका विवाद और कामदेवका
विनाश किस प्रकार हुआ? पार्वतीने तपस्या कफे
किस प्रकार कल्याणकारी शम्भुको प्राप्त किया ?॥|३॥
हे ब्रह्मन्! इन सब बातोंको तथा महान् आद
देनेवाले अन्य सुन्दर शिवचरि्रोको मुझसे कहिये॥४॥
सूतजी बोले--नारदजीके इस प्रमी
सुनकर लोकाधिपतियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी शिवजी
चरणकमलका ध्यान करके अति प्रसन्नतापूर्वक कहीं
लगे-॥५॥ |
ब्रह्माजी बोले--हे देवर्षे! हे शैववर्य! मं
करनेवाले, उत्तम भक्तिको बढ़ानेवाले पावन शि
चरित्रको आदरपूर्वक सुनिये॥ ६॥ |
अपने पर्वतपर आकर प्रियाके विरहसे द
शम्धुने प्राणोसे भी बढ़कर अपनी प्रिया सती देंगी |
हृदयसे स्मरण किया॥ ७॥ ति
वे [अपने] गणोंको बुलाकर उन सती ह |
शोक प्रकट करते हुए, लौकिक गति दिखाती द
उनके प्रेमवर्धक गुणोंका अत्यन्त प्रेमपूर्वक ' |
करने लगे॥ ८॥
|
क्न १०]
दिगम्बरो बभूवाथ त्यक्त्वा
पुनर्बश्राम लोकान्वै सर्वान् लीलाविशारदः॥ ९
न प्राप दर्शनं क्वापि सतीविरहदुःसितः।
पुनश्च गिरिमायातः शंकरो भक्तशंकरः॥ १०
समाधाय मनो यत्नात् समाधिं दुःखनाशनम्।
चकार च ददर्शासौ स्वरूपं निजमव्ययम्॥ १९
इत्थं चिरतरं स्थाणुस्तस्थौ ध्वस्तगुणत्रयः।
निर्विकारी परं ब्रह्म मायाधीशः स्वयं प्रभुः ॥ १२
ततः समाधिं तत्याज व्यतीयुरह्ममिताः समा: ।
यदा तदा बभूवाशु चरितं तद्वदामि वः॥ १३
प्रभोर्ललाटदेशात्तु यत्पृषच्छ्मसंभवम्।
पपात धरणौ तत्र स बभूव शिशुदुतम्॥ १४
चतुर्भुजोऽरुणाकारो रमणीयाकृतिर्मुने।
अलौकिकद्युतिः श्रीमाँस्तेजस्वी परदुस्सहः॥ १५
रुरोद स शिशुस्तस्य पुरो हि परमेशितुः।
प्राकृतात्मजवत्तत्र भवाचाररतस्य हि॥ १६
तदा विचार्य सुधिया धृत्वा सुस्त्रीतनु क्षितिः ।
आविर्बभूव तत्रैव भयमानीय शंकरात्॥ १७
तं बालं दरुतमुत्थाप्य क्रोडायां निदधे वरम्।
स्तन्यं सापाययत्प्रीत्या दुग्धं चोपरिसम्भवम्॥ १८
सुचुम्ब तन्मुखं स्नेहात्स्मित्वा क्रीडयदात्मजम्।
सेत्यभावात्स्वयं माता परमेशहितावहा॥ १९
द दृष्ट्वा चरितं शम्भुः कौतुकी सूतिकृत्कृती
विहस्याथोवाच ज्ञात्वा रसां हरः॥ २०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५३९
लीलाविशारद वे शिवजी गृहस्थोचित उत्तम
आचरणको छोड़कर दिगम्बर हो गये और पुन: सभी
लोकोंमें भ्रमण करने लगे॥९॥
सतीके विरहसे दुखी हुए भगवान् शंकरको
कहीं भी सतीका दर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तब भक्तोंका
कल्याण करनेवाले शिवजी पुनः [कैलास] पर्वतपर
आ गये॥ १०॥
उसके बाद उन्होंने यत्नपूर्वक मनको एकाग्रकर
दुःख दूर करनेवाली समाधि लगायी और अपने
अविनाशी स्वरूपका दर्शन किया॥ ११॥
इस प्रकार मायाधीश, त्रिगुणातीत, विकाररहित
परब्रह्म स्वयंप्रभु सदाशिव स्थायी होकर समाधिमें
बहुत दिनोंतक लीन रहे॥ १२॥
जब [समाधि लगाये हुए उनको] बहुत वर्ष
बीत गये, तब उन्होंने अपनी समाधिका त्याग
किया।उस समय जो चरित्र हुआ, उसे मैं आपसे
शीघ्र कह रहा हूँ॥ १३॥
प्रभुके ललाटस्थलसे जो पसीनेकी बूँदें पृथ्वीपर
गिरी, उनसे शीघ्र ही एक बालक उत्पन्न हुआ॥ १४॥
हे मुने! वह चार भुजाओंसे युक्त, अरुण-
वर्णवाला, अत्यन्त मनोहर रूपवाला, अलौकिक तेजसे
सम्पन्न, श्रीमान्, तेजस्वी तथा शत्रुओंके लिये दुःसह
था॥ १५॥
वह बालक उन लोकाचाररत परमेश्वर शिवके
सामने समीप जाकर साधारण पुत्रको भाँति रोने
लगा॥ १६॥
उसी समय भगवान् शंकरसे भयभीत हुई पृथ्वी
बुद्धिसे विचारकर अत्यन्त सुन्दर स्त्रीका शरीर धारण
करके प्रकट हो गयी। उसने शीघ्रतासे उस सुन्दर
बालकको अपनी गोदमें उठाकर रख लिया और प्रेमसे
उसे अपना दूध पिलाने लगी॥ १७-१८॥
इस प्रकार वह परमेश्वरके हित-साधनके लिये
सत्यभावसे बालककी माता बनी और प्रेमपूर्वक हँसते
हुए बालकका मुख चूमने लगी॥ १९॥
तब कौतुकी, सृष्टिकर्ता तथा अन्तर्यामी शम्भु
इस चरित्रको देखकर उसे पृथ्वी जानकर हँस करके
उससे बोले ॥ २०॥
७५४०
श्रीशिवमहापुराण
धन्या त्वं धरणि प्रीत्या पालयेतं सुतं मम।
त्वस्युद्भूतं श्रमजलान्महातेजस्विनो वरम्॥ २१
मम श्रमकभूर्बालो यद्यपि प्रियकृतिक्षिते।
त्वन्नाप्ना स्याद्भवेत्ख्यातस्त्रितापरहितः सदा॥ २२
असौ बालः कुदाता हि भविष्यति गुणी तव।
ममापि सुखदाता हि गृहाणैनं यथारुचि॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तवा विररामाथ किंचिद्ठिरहमुक्तधीः।
लोकाचारकरो रुद्रो निर्विकारी सतां प्रियः॥ २४
अपि क्षितिर्जगामाशु शिवाज्ञामधिगम्य सा।
स्वस्थानं ससुता प्राप सुखमात्यंतिकं च वै॥ २५
स बालो भौम इत्याख्यां प्राप्य भूत्वा युवा दरुतम्।
तस्यां काश्यां चिरं कालं सिषेवे शंकरं प्रभुम्॥ २६
विश्वेश्वरप्रसादेन ग्रहत्वं प्राप्य भूमिजः।
दिव्यं लोकं जगामाशु शुक्रलोकात्परं वरम्॥ २७
इत्युक्तं शम्भुचरितं सतीविरहसंयुतम्।
'तपस्याचरणं शम्भोः श्रृणु चाद्रतो मुने॥ २८
[अ १ III
हे धरणि! तुम धन्य हो, तुम मेरे पुत्रका प्रेमे
पालन करो। यह श्रेष्ठ [बालक] मेरे महातेजसे
पसीनेसे तुममें उत्पन्न हुआ है॥ २१॥
हे क्षिते! यद्यपि मेरे श्रमजल (पसीने)-से उत्पन
हुआ यह बालक मुझे बड़ा प्रिय है, फिर भी यह तुम्ह
नामसे विख्यात होगा और सदा तीनों तापोंसे रहित होग ;
यह बालक भूमिदान करनेवाला, गुणोंसे सम्पन्न और
तुम्हें तथा मुझको भी सुख प्रदान करनेवाला होगा
अतः तुम इसे रुचिके अनुसार ग्रहण करो ॥ २२- २३ ॥
ब्रह्माजी बोले--विरहवेदनासे थोड़ा-सा मुक
हुए भगवान् शिव इस प्रकार कहकर चुप हो गये।
[वस्तुतः] निर्विकारी तथा सज्जनोंके प्रिय वे प्रभु
शिवजी लोकाचारका अनुसरण करते हैं ॥ २४॥
तब शिवजीसे आज्ञा लेकर पृथ्वी शीघ्र पुत्रसहित
अपने स्थानपर चली गयी और उसे अत्यन्त सुख
प्राप्त हुआ॥ २५॥
वह बालक भौम नाम प्राप्त करके शीघ्र ही युवा
हो उस काशीमें बहुत कालतक शिवजीकी सेवा
करता रहा। इस प्रकार वह भूमिपुत्र विश्वेश्वरकी
कृपासे ग्रहपद प्राप्तकर शुक्रलोकसे भी आगे दिल
लोकमें चला गया॥ २६-२७॥
हे मुने! मैंने सतीके विरहयुक्त शिव-चरित्रको
कहा, अब आप शिवजीकी तपस्याके आचरणकों
आदरके साथ सुनिये॥ २८ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे भौमोत्पत्तिशिवलीलावर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१९॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहामुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुब्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें भौमकी उत्पत्ति तथ
शिवलीलाका वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
—— ree
अथैकादशोऽध्यायः
भगवान् शिवका तपस्याके लिये हिमालयपर आगमन, वहाँ पर्वतराज हिमालयसे वार्ताली |
ब्रह्मोवाच
'वर्धमाना गिरेः पुत्री सा शक्तिर्लोकपूजिता।
ब्रह्माजी बोले--हिमालयकी वह मध्या
पुत्री पार्वती उनके घरमें बढ़ती हुई जब आठ
अष्टवर्षा यदा जाता हिमालयगृहे सती॥ १॥ | हो गयी, तब हे नारद! उसका जन्म [हिमा
तज्जन्म गिरिशो ज्ञात्वा सतीविरहकातरः।
कृत्वा तामद्भुतामन्तर्मुमोदातीव नारद॥ २॥
घरमें] जानकर सतीके विरहसे दुखी हुए बर
सतीकी इस अद्भुत लीलासे मनःही-मत र
प्रसन्न हो उठे॥ १-२॥
डं ११]
तस्मिनेवान्तरे शम्भुलौकिकीं गतिमाश्रित: ।
समाधातुं मनः सम्यक् तपः कर्तु समैच्छत॥ ३
कांश्रिद्रणवरान् शान्तान् नंद्यादीनवगृह्य च।
गङ्घावतारमगमद्धिमवत्प्रस्थमुत्तमम् ॥ ४
यत्र गड्ढा निपतिता पुरा ब्रह्मपुरात्स्त्रुता ।
सर्वाघोधविनाशाय पावनी परमा मुने॥ ५
तपःप्रारम्भमकरोत्स्थित्वा तत्र वशी हरः।
एकाग्रं चिंतयामास स्वमात्मानमतन्द्रितः॥ ६
चेतो ज्ञानभवं नित्यं ज्योतीरूपं निरामयम्।
जगन्मयं चिदानन्दं द्वैतहीनं निराश्रयम्॥ ७
हरे ध्यानपरे तस्मिन्प्रमथा ध्यानतत्पराः।
अभवन्केचिदपरे नन्दिभृंग्यादयो गणाः॥ ८
सेवां चक्रुस्तदा केचिदूणाः शम्भोः परात्मनः।
नैवाकूजंस्तु मौना हि द्वारपाः केचनाभवन्॥ ९
एतस्मिन्नन्तरे तत्र जगाम हिमभूधरः।
शङ्करस्यौषधिप्रस्थे श्रुत्वागमनमादरात्॥ १०
प्रणनाम प्रभुं रुद्रं सगणो भूधरेश्वर:।
समानर्च च सुप्रीतस्तुष्टाव स कृताञ्जलिः ॥ ११
हिमालय उवाच
देवदेव महादेव कपर्दिन् शंकर प्रभो।
लयैव लोकनाथेन पालितं भुवनत्रयम्॥ १२
नमस्ते देवदेवेश योगिरूपधराय च।
निगुंणाय नमस्तुभ्यं सगुणाय विहारिणे॥ १३
कैलासवासिने शम्भो सर्वलोकाटनाय च।
मस्ते परमेशाय लीलाकाराय शूलिने ॥ १४
तेंक छा
गेमो5नीहाय 'बीहाय धीराय परमात्मने॥ १५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५४१
उसी समय लौकिक गतिका आश्रय लेकर
शम्भुने अपने मनको एकाग्र करनेके लिये तप करनेका
विचार किया॥ ३॥
नन्दी आदि कुछ शान्त, श्रेष्ठ पार्षदोंको साथ
लेकर वे हिमालयके गंगावतार नामक उत्तम शिंखरपर
गये, हे मुने! जहाँ पूर्वकालमें ब्रह्मधामसे प्रवाहित
होकर समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये परम
पावनी गंगा गिरी थीं ॥ ४-५॥
जितेन्द्रिय हरने वहीँ रहकर तपस्या आरम्भ की,
वे आलस्यका त्यागकर चेतन, ज्ञानस्वरूप, नित्य,
ज्योतिर्मय, निरामय, जगन्मय, चिदानन्दस्वरूप, द्वैतहीन
तथा आश्रयरहित अपने आत्मभूत परमात्माका
एकाग्रभावसे चिन्तन करने लगे॥ ६-७॥
भगवान् हरके ध्यानपरायण होनेपर नन्दी, भृंगी
आदि कुछ अन्य पार्षदगण भी ध्यानमें तत्पर
हो गये॥ ८॥
उस समय कुछ गण परमात्मा शम्भुकी सेवा
करते थे और कुछ द्वारपाल हो गये। वे सब-के-सब
मौन रहते थे और कुछ नहीं बोलते थे॥ ९॥
इसी समय गिरिराज हिमालय उस औषधि-
शिखरपर भगवान् शंकरका आगमन सुनकर आदरपूर्वक
वहाँ गये॥ १०॥
अपने गणोंसहित गिरिराजने प्रभु रुद्रको प्रणाम
किया, उनकी पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ
जोड़कर [वे शिवजीकी] स्तुति करने लगे॥ ११॥
हिमालय बोले-हे देवदेव! हे महादेव! हे
कपर्दिन्! हे प्रभो! हे शंकर! आप लोकनाथने ही
तीनों लोकोंका पालन किया है॥ १२॥
योगीरूप धारण करनेवाले हे देवदेवेश! आपको
नमस्कार है, निर्गुण, सगुण तथा विहार करनेवाले
आपको नमस्कार है। हे शम्भो! आप कैलासवासी,
सभी लोकोंमें विचरण करनेवाले, लीला करनेवाले,
त्रिशूलधारी परमेश्वरको नमस्कार है। [सभी प्रकारसे]
परिपूर्ण गुणोंके आकर, विकाररहित, सर्वथा इच्छारहित
होते हुए भी इच्छावाले तथा धैर्यवान् आप परमात्माको
नमस्कार है॥ १३--१५॥
८५४२
श्रीशिवमहापुराण
[अ १ -_-य ईप पपप 0-१
अबहिर्भोगकाराय जनवत्सल ते नमः।
त्रिगुणाधीश मायेश ब्रह्मणे परमात्मने॥ १६
विष्णुब्रह्मादिसेव्याय विष्णुब्रह्मस्वरूपिणे ।
विष्णुब्रह्मकदात्रे ते भक्तप्रिय नमोऽस्तु ते॥ १७
तपोरत तपःस्थान सुतपःफलदायिने।
तपःप्रियाय शान्ताय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे॥ १८
व्यबहारकरायैब लोकाचारकराय ते।
सगुणाय परेशाय नमोऽस्तु परमात्मने॥ १९
लीला तव महेशानावेद्या साधुसुखप्रदा।
भक्ताधीनस्वरूपोऽसि भक्तवश्यो हि कर्मकृत्॥ २०
मम भाग्योदयादत्र त्वमागत इह प्रभो।
सनाथं कृतवान्मां त्वं वर्णितो दीनवत्सलः॥ २१
अद्य मे सफलं जन्म सफलं जीवनं मम।
अद्य मे सफलं सर्व यदत्र त्वं समागतः॥ २२
ज्ञात्वा मां दासमव्यग्रमाज्ञां देहि महेश्वर।
त्वत्सेवां च महाप्रीत्या कुर्यामहमनन्यधीः॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य गिरीशस्य महेश्वरः।
किंचिदुन्मील्य नेत्रे च ददर्श सगणं गिरिम्॥ २४
सगणं तं तथा दृष्ट्वा गिरिराजं वृषध्वजः।
उवाच ध्यानयोगस्थः स्मयन्निव जगत्पतिः॥ २५
महेश्वर उवाच
तव॒ पृष्ठे तपस्तप्तुं रहस्यमहमागतः।
यथा न कोऽपि निकटं समायातु तथा कुरु ॥ २६
त्वं महात्मा तपोधामा मुनीनां च सदाश्रयः।
देवानां राक्षसानां च परेषां च महात्मनाम्॥ २७
हे जनवत्सल! हे त्रिगुणाधीश! हे मायाफे।
बाहरी भोगोंको ग्रहण न करनेवाले आप द्वन.
परमात्माको नमस्कार है। हे भक्तप्रिय! आप रदा
विष्णु आदिके द्वारा सेव्य, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप
विष्णु-ब्रह्माको सुख प्रदान करनेवाले हैं आपके
नमस्कार है॥ १६-१७॥
हे तपोरत! हे तप:स्थान ! आप उत्तम तपस्या
फल प्रदान करनेवाले, तपस्यासे प्रेम करनेवाले, शान
तथा ब्रह्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥१८॥
व्यवहार तथा लोकाचार करनेवाले आप सगुण,
परेश परमात्माको नमस्कार है॥ १९॥
हे महेश्वर! आपकी लीलाको कोई जान नहं
सकता और यह साधुओंको सुख देनेवाली है। आ
भक्तोंके अधीन स्वरूपवाले तथा भक्तोंके वशमें होक
कर्म करनेवाले हैं ॥ २०॥
हे प्रभो! मेरे भाग्यके उदय होनेसे ही आए
यहाँ आये हैं। आपने मुझे सनाथ कर दिया, इसीलिवे
आप दीनवत्सल कहे गये हैं। आज मेरा जम
सफल हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया,
आज मेरा सब कुछ सफल हो गया, जो आप यहाँ
पधारे हैं ॥ २१-२२॥
हे महेश्वर! मुझे अपना दास समझकर नि:संकीब
आज्ञा दीजिये, मैं अनन्य बुद्धि होकर बड़े पेग
आपकी सेवा करूँगा॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] गिरिराज
यह वचन सुनकर महेश्वरने थोड़ी-सी Re
खोलकर सेवकोसहित हिमालयको देखा। सेवको
गिरिराजको [उपस्थित] देखकर ध्यानयोगमें हि
हुए जगदीश्वर वृषभध्वज मुसकराते हुए कही
लगे--॥ २४-२५॥ |
महेश्वर बोले_[हे शैलराज!] मैं आए
शिखरपर एकान्तम तपस्या करनेके लिये आबा ६
आप ऐसा प्रबन्ध कीजिये, जिससे कोई भी मेरे ति
न आ सके॥ २६॥ हि |
आप महात्मा, तपस्याके धाम तथा | |
देवताओं, राक्षसों और अन्य महात्माओंकी
आश्रय देनेवाले हैं॥ २७॥
उ ११]
सदावासो द्विजादीनां गङ्गापूतश्च नित्यदा।
परोपकारी सर्वेषां गिरीणामधिपः प्रभुः ॥ २८
अहं तपश्चराम्यत्र गङ्गावतरणे स्थले।
आश्रितस्तव सुप्रीतो गिरिराज यतात्मवान् ॥ २९
निर्विघ्नं मे तपश्चात्र हेतुना येन शैलप।
सर्वथा हि गिरिश्रेष्ठ सुयत्नं कुरु साम्प्रतम्॥ ३०
ममेदमेव परमं सेवनं पर्वतोत्तम।
स्वगृहं गच्छ सत्त्रीत्या तत्संपादय यत्नतः॥ ३१
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा जगतां नाथस्तूष्णीमास स सूतिकृत्।
गिरिराजस्तदा शम्भुं प्रणयादिदमन्रवीत्॥ ३२
हिमालय उवाच
पूजितोऽसि जगन्नाथ मया त्वं परमेश्वर।
स्वागतेनाद्य विषये स्थितं त्वां प्रार्थयामि किम्॥ ३३
महता तपसा त्वं हि देवैर्यत्नपराश्चितैः।
न प्राप्यसे महेशान स त्वं स्वयमुपस्थितः॥ ३४
मत्तोःप्यन्यतमो नास्ति न मत्तोऽन्योऽस्त पुण्यवान्।
भवानिति च मत्पृष्ठे तपसे समुपस्थितः ॥ ३५
देवेद्रादधिकं मन्ये स्वात्मानं परमेश्वर।
सगणेन त्वयागत्य कृतोऽनुग्रहभागहम्॥ ३६
निघ्नं कुरु देवेश स्वतन्त्रः परमं तपः।
करिष्येऽहं तथा सेवां दासोऽहं ते सदा प्रभो॥ ३७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा गिरिराजोऽसौ स्व॑ वेशम दरुतमागतः।
वृत्तां तं समाचख्यो प्रियायै च समादरात्॥ ३८
तीयमानान् परीवारान् स्वगणानपि नारद।
“पाहूयाखिलान् शेलपतिः प्रोवाच तत्त्वतः॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५४३
आप द्विज आदिके सदा निवासस्थान,
गंगासे सर्वदा पवित्र, दूसरोंका उपकार करनेवाले तथा
सम्पूर्ण पर्वतोंके सामर्थ्यशाली राजा हैं। हे गिरिराज!
मैं चित्तको नियममें रखकर यहाँ गंगावतरणस्थलमें
आपके आश्रित होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ तपस्या
करूँगा॥ २८-२९॥
हे शैलराज! हे गिरिश्रेष्ठ! जिस साधनसे यहाँ
मेरी तपस्या बिना किसी विध्नके हो सके, उसे इस
समय आप सर्वथा यलपूर्वक कीजिये॥ ३०॥
हे पर्वतप्रवर! मेरी यही सबसे बड़ी सेवा है,
आप अपने घर जाइये और उसका उत्तम प्रीतिसे
यल्पूर्वक प्रबन्ध कीजिये॥ ३१॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] ऐसा कहकर
सृष्टिकर्ता वे जगदीश्वर चुप हो गये, तब गिरिराजने
शम्भुसे प्रेमपूर्वक यह बात कही- ॥ ३२॥
हिमालय बोले-हे जगन्नाथ! हे परमेश्वर!
आज मैंने आपका स्वागतपूर्वक पूजन किया है, [यही
मेरे लिये महान् सौभाग्यकी बात है।] अब मैं अपने
देशमें उपस्थित आपसे क्या प्रार्थना करूँ ?॥ ३३॥
हे महेश्वर! बड़े-बड़े यका आश्रय ले लेनेवाले
देवतालोग महान् तपके द्वारा भी आपको नहीं पाते,
वे आप स्वयं उपस्थित हो गये हैं॥ ३४॥
मुझसे बढ़कर कोई सौभाग्यशाली नहीं है और
मुझसे बढ़कर कोई पुण्यात्मा नहीँ है; जो आप मेरे
पृष्ठभागपर तपस्याके लिये उपस्थित हुए हैं ॥ ३५॥
हे परमेश्वर! मैं अपनेको देवराज इन्द्रसे भी
बढ़कर समझता हूँ; क्योंकि गणोंसहित आपने [यहाँ]
आकर मुझे अनुग्रहका भागी बना दिया॥ ३६॥
हे देवेश! आप स्वतन्त्र होकर बिना किसी
विघ्नके उत्तम तपस्या कोजिये हे प्रभो! में आपका
दास हूँ, अतः सदा आपकी सेवा करूँगा॥ ३७॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] ऐसा कहकर वे
गिरिराज तुरंत अपने घर आ गये और उन्होंने अपनी
प्रियाको बड़े आदरसे वह सारा वृत्तान्त सुनाया॥ ३८॥
तत्पश्चात् शैलराज साथ जानेवाले परिंजनोंको
तथा अपने समस्त गणोंको बुलाकर उनसे भलीभाँति
कहने लगे-॥ ३९॥
पड
श्रीशिवमहापुराण
[अ RS जलता १
हिमालय उवाच
अद्यप्रभृति नो यातु कोऽपि गङ्गावतारणम्।
मच्छासनेन मत्प्रस्थं सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ४०
गमिष्यति जनः कश्चित्तत्र चेत्तं महाखलम्।
'दण्डयिष्ये विशेषेण सत्यमेतन्मयोदितम्॥ ४१
इति तान्स नियम्याशु स्वगणान्निखिलान्मुने।
सुयत्लं कृतवान् शैलस्तं श्रृणु त्वं वदामि ते॥ ४२
हिमालय बोले--मेरी आज्ञासे आजे को
भी गंगाबतरण नामक मेरे शिखरपर न जाय «७.
सत्य कह रहा हूँ। यदि कोई व्यक्ति वहाँ जायगा
मैं उस महादुष्टको विशेष रूपसे दण्ड दूँगा, यह रे
सत्य कहा है॥ ४०-४१॥
हे मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणोंको शग
ही नियन्त्रित करके हिमवानने [ विघ्ननिवारणके लिये
जो सुन्दर प्रयत्त किया, उसे आपको बता रहा हु
आप सुनिये॥ ४२॥ 9
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवशैलसमागमवर्णन॑ नामैकादशोऽ ध्याय; ॥ ११॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
शिवशैलसमागमवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥
Sr
अथ द्वादशोऽध्यायः
हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना,
शिवह्वारा कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना
ब्रह्मोवाच
अथ शैलपतिर्हष्टः सत्पुष्पफलसंचयम्।
समादाय स्वतनयासहितोऽगाद्धरान्तिकम्॥ १
स गत्वा त्रिजगन्नाथं प्रणम्य ध्यानतत्परम्।
अर्पयामास तनयां कालीं तस्मै हृदाद्भुताम्॥ २
'फलपुष्पादिकं सर्व तत्तदग्रे निधाय सः।
अग्रे कृत्वा सुतां शम्भुमिदमाह च शैलराट्॥ ३
हिमगिरिरुवाच
भगवंस्तनया मे त्वां सेवितुं चन्द्रशेखरम्
समुत्सुका समानीता त्वदाराधनकांक्षया॥ ४
सखीभ्यां सह नित्यं त्वां सेवतामेव शंकरम्।
अनुजानीहि तां नाथ मयि ते यब्यनुग्रहः॥ ५
ब्रह्मोवाच
अथ तां शंकरोऽपश्यत्प्रथमारूढयौवनाम्।
फुल्लेन्दीवरपत्राभां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥ ६
'समस्तलीलासंस्थानशुभवेषविजृम्भिकाम् ।
कम्बुग्रीवां विशालाक्षीं चारुकर्णयुगोज्ज्चलाम्। । ७
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] तदनन्तर शैलराज
हर्षित होकर उत्तम फल-फूलका समूह लेका
अपनी पुत्रीके साथ भगवान् हरके समीप गये। व्हा
जाकर उन्होंने ध्यानपरायण त्रिलोकीनाथको प्रणम
करके अपनी अद्भुत कन्या कालीको हृदयसे उ
अर्पित कर दिया॥ १-२॥
सब फल-फूल आदि उनके सामने रखकर और
पुत्रीको आगे करके वे शैलराज शम्भुसे यह कही
लगे-॥३॥
हिमगिरि बोले--हे भगवन्! मेरी पुत्री अ
चद्रशेखरकी सेवा करनेके लिये बड़ी उत्सुक है, अभ
आपकी आराधनाकी इच्छासे मैं इसको लाया हँ॥ ४१
यह अपनी दो सखियोंके साथ सर्दी
शंकरको ही सेवा करेगी | हे नाथ! यदि आपका बु
अनुग्रह है, तो इसे [सेवाके लिये] आज्ञा दीजिये॥ ५.
ब्रह्माजी बोले--तब शंकरने
प्रथमावस्थामें वर्तमान, पूर्ण चद्धमाके समान मुखवाती
विकसित नीलकमलके पत्रके समान आभे
समस्त लीलाओंकी स्थानरूप, सुन्दर वेषसे सुर दद
शंखके समान ग्रीवावाली, विशाल नेत्रोंवाली, * ५
कर्णयुगलसे शोभित, मृणालके समान चिकनी
हरी
अ० १२]
मृणालायतपर्यन्तबाहुयुग्ममनोहराम् ।
राजीवकुड्मलप्रख्यौं घनपीनो दृढौ स्तनौ॥ ८
बिभ्रतीं क्षीणमध्यां च त्रिवलीमध्यराजिताम्।
स्थलपदाप्रतीकाशपादयुग्मविराजिताम् ॥ ९
ध्यानपंजरनिर्बद्धमुनिमानसमप्यलम् ।
दर्शनाद्. भ्रंशने शक्तां योषिद्रणशिरोमणिम्॥ १०
दृष्ट्वा तां तादृशीं तात ध्यानिनां च मनोहराम्।
विग्रहे तन्त्रमन्त्राणां वर्धिनी कामरूपिणीम्॥ ११
ज्यमीलयद् दूशौ शीघ्रं दध्यौ स्वं रूपमुत्तमम्
परतत्त्वं महायोगी त्रिगुणात्परमव्ययम्॥ १२
दृष्ट्या तदानीं सकलेश्वरं विभुं
तपो जुषाणं विनिमीलितेक्षणम्।
कपर्दिनं चन्द्रकलाविभूषणं
वेदान्तवेद्यं परमासने स्थितम्॥ १३
ववन्द शीर्ष्णा च पुनर्हिमाचलः
स संशयं प्रापददीनसत्त्वः।
वाक्यं जगदेकबन्धुं
गिरीशवरो वाक्यविदां
हिमाचल उवाच
देवदेव महादेव करुणाकर शंकर।
पश्य मां शरणं प्राप्तमुन्मील्य नयने विभो॥ १५
शिव शर्व महेशान जगदानन्दकृत्प्रभो।
त्वां नतोऽहं महादेव सर्वापद्विनिवर्तकम्॥ १६
उवाच
वरिष्ठ: ॥ १४
नत्वां जानन्ति देवेश वेदाः शास्त्राणि कृत्स्तशः।
अतीतो महिमाध्वानं तव वाङ्मनसोः सदा॥ १७
अतह्यावृत्तितस्त्वां वै चकितं चकितं सदा।
अभिधत्ते श्रुतिः सर्वा परेषां का कथा मता॥ १८
जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः।
शरणागतभक्तानां न कुत्रापि भ्रमादिकम्॥ १९
2223 Shivmahapuranam_part ]_Section_l9_l-Front
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५४५
दो भुजाओंसे मनोहर प्रतीत होनेवाली, कमलकलीके
समान घने, मोटे तथा दृढ़ स्तनोंको धारण करनेवाली,
पतले कटिप्रदेशवाली, त्रिवलीयुक्त मध्यभागवाली,
स्थलपद्मके समान चरणयुगलसे सुशोभित, अपने
दर्शनसे ध्यानरूपी पिंजड़ेमें बन्द मुनियोंके मनको भी
विचलित करनेमें समर्थ और स्त्रियोमें सर्वश्रेष्ठ उस
[कन्या]-को देखा॥ ६--१०॥
ध्यानियोंके भी मनका हरण करनेवाली,
विग्रहसे तन्त्र-मन्त्रोंको बढानेवाली तथा कामरूपिणी
वैसी उस कन्याको देखकर उन महायोगीने शीघ्र दोनों
नेत्र बन्द कर लिये और वे अपने उत्तम, परमतत्त्वमय,
तीनों गुणोंसे परे तथा अविनाशी स्वरूपका ध्यान करने
लगे॥ ११-१२॥
उस समय सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, तप करते हुए,
बन्द नेत्रोंवाले, चन्द्रकलारूप आभूषणवाले, जटा
धारण करनेवाले, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य तथा
उत्तम आसनमें स्थित शिवको देखकर महात्मा हिमालयने
उन्हें प्रणाम किया, वे पुन: संशयमें पड़ गये। इसके
बाद वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गिरीश्वर जगत्के एकमात्र
बन्धु शंकरसे यह वचन कहने लगे--॥ १३-१४॥
हिमालय बोले-हे देवदेव! हे महादेव! हे
करुणाकर! हे शंकर! हे विभो! आँखें खोलकर मुझ
शरणागतको देखिये॥ १५॥
हे शिव! हे शर्व! हे महेशान! हे जगत्को
आनन्द प्रदान करनेवाले प्रभो! हे महादेव ! मैं सम्पूर्ण
आपत्तियोंको दूर करनेवाले आपको प्रणाम करता हूँ।
हे देवेश! वेद और शास्त्र भी आपको पूर्णरूपसे नहीं
जानते हैं; क्योंकि आपकी महिमा वाणी तथा मनके
मार्गसे भी सर्वथा परे है॥ १६-१७॥
सभी श्रृतियाँ भी आपकी महिमाका पार न
पा सकनेके कारण चकित होकर नेति-नेति कहते हुए
सदा आपका वर्णन करती हैं, फिर दूसरोंकी क्या बात
कही जाय!॥ १८॥
बहुत-से भक्त ही भक्तिके द्वारा आपकी कृपा
प्राप्त करके उसे जान सकते हैं; क्योंकि [आपकी]
शरणमें आये हुए भक्तोंको कहीं भी भ्रम आदि नहीं
होता॥ १९॥
ह ४६
श्रीशिवमहापुराण
[ MS ताल पान १
विज्ञप्ति श्रृणु मत्प्रीत्या स्वदासस्य ममाधुना।
तव देवाज्ञया तात दीनत्वाद्वर्णयामि हि॥ २०
सभाग्योऽहं महादेव प्रसादात्तव शंकर।
मत्वा स्वदासं मां नाथ कृपां कुरु नमोऽस्तु ते॥ २१
प्रत्यहं चागमिष्यामि दर्शनार्थं तव प्रभो।
अनया सुतया स्वामिन्निदेशं दातुमर्हसि॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्योन्मील्य नेत्रे महेश्वरः।
त्यक्तध्यानः परामृश्य देवदेवोऽब्रवीद्चः॥ २३
महेश्वर उवाच
आगन्तव्यं त्वया नित्यं दर्शनार्थं ममाचल।
कुमारीं सदने स्थाप्य नान्यथा मम दर्शनम्॥ २४
ब्रह्मोवाच
महेशवचनं श्रुत्वा शिवातातस्तथाविधम्।
अचलः प्रत्युवाचेदं गिरिशं नतकंधरः॥ २५
हिमाचल उवाच
कस्मान्मयानया सार्ध नागन्तव्यं तदुच्यताम्।
सेवने किमयोग्येयं नाहं वेद्म्यत्र कारणम्॥ २६
ब्रह्मोवाच
ततोऽब्रवीद़िरिं शंभुः प्रहसन्वृषभध्वजः।
लोकाचारं विशेषेण दुर्शयन्हि कुयोगिनाम्॥ २७
शंभुरुवाच
इयं कुमारी सुश्रोणी तन्वी चन्द्रानना शुभा।
जानेतव्या मत्समीपे वारयामि पुनः पुन:॥ २८
मायारूपा स्मृता नारी विद्वद्धिरवेदपारगै:।
युवती तु विशेषेण विघ्नकत्री तपस्विनाम्॥ २९
अहं तपस्वी योगी च निर्लिप्तो मायया सदा।
प्रयोजनं युवत्या वै स्त्रिया किं मेऽस्ति भूधर॥ ३०
एवं पुनर्न वक्तव्यं तपस्विवरसंश्चित।
वेदधर्मप्रवीणस्त्वं यतो ज्ञानिवरो बुधः॥ ३१
अब आप दया करके इस समय पे
दासका निवेदन सुनें। हे देव! हे तात! को हि
आज्ञासे दीन होकर उसका वर्णन कर रहा हूँ॥ २ न्न
हे महादेव ! हे शंकर ! मैं आपकी कृपासे भाग्यात
हो गया हूँ | हे नाथ! मुझे अपना दास समझकर प
कृपा करें, आपको नमस्कार है। हे प्रभो। मै आड़े
दर्शनके लिये प्रतिदिन इस कन्याके साथ आया करुग।
हे स्वामिन्! मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये॥ २१-२२)
ब्रह्माजी बोले--उनका यह वचन सुनकर आपे
नेत्र खोलकर ध्यान त्यागकर और कुछ सोच-विचारक
देवदेब महादेव यह वचन कहने लगे-- ॥ २३॥
महेश्वर बोले--हे भक्त! [अपनी] कन्यक्ने
घरपर ही छोड़कर नित्य मेरे दर्शनके लिये आप आ
सकते हैं। अन्यथा मेरा दर्शन नहीं होगा॥२४॥
ब्रह्माजी बोले--महेशके इस प्रकारके वचनको
सुनकर पार्वतीके पिता हिमालय सिर झुकाकर शिवजीसे
यह कहने लगे--॥ २५॥
हिमाचल बोले-- [हे प्रभो!] इस कन्याके
साथ [आपके दर्शनके लिये] किस कारणसे मुद
नहीं आना चाहिये, इसे बताइये। क्या यह आपकी
सेवा करनेमें अयोग्य है ? मैं इसका कारण नहीं समद
पा रहा हूँ॥ २६॥ तु
ब्रह्माजी बोले--तत्पश्चात् वृषभध्वज शंका
विशेषत: कुयोगियोंका लोकाचार दिखाते हुए हँसका
हिमालयसे कहने लगे-- ॥ २७॥
शम्भु बोले-[हे शैलराज!] मतोह
नितम्बवाली, तन्वी, चद्धमुखी तथा सुन्दरी इस कयी
मेरे सन्निकट मत लाइयेगा, इसके लिये मैं बार्बी
मना करता हूँ॥ २८॥
वेदोंके पारगामी विद्वानोंने स्त्रीको »
कहा है, उसमें भी विशेष रूपसे युवती स्त्री
तपस्वियोंके लिये विघ्नकारिणी होती है ॥ २९॥
हे भूधर! मैं तपस्वी, योगी तथा सदा
निर्लिप्त रहनेवाला हूँ। अतः मुझे युवती स्त्रीसे
प्रयोजन है? हे तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय! आपकी
पुनः ऐसा नहीं कहना चाहिये; क्योंकि आप |
प्रवीण, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा विद्वान् हैं ॥ ३० २
B
2223 Shivmabapuranam_ Part I_Section_l श्र
अ० १३ ]
तत्सङ्गाद्विषयोत्पत्तिराशु वै।
विनश्यति च वैराग्यं ततो भ्रश्यति सत्तपः॥ ३२
अतस्तपस्विना शैल न कार्या स्त्रीषु सङ्गतिः।
महाविषयमूल सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी॥ ३३
ब्रह्मोवाच
इत्याद्युकत्वा बहुतरं महायोगी महेश्वर: ।
विरराम गिरीशं तं महायोगिवर: प्रभु:॥ ३४
वचनं तस्य शंभो-
निरामयं निःस्पृहं निष्ठुरं च।
कालीतातश्चकितोऽभूत्सुरर्षे
तद्दत्किंचिद्व्याकुलश्चास तूष्णीम्॥ ३५
तपस्विनोक्तं वचनं निशम्य
तथा गिरीशं चकितं विचार्य।
अतः प्रणम्यैव शिवं भवानी
जगाद वाक्यं विशदं तदानीम्॥ ३६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५४७
हे पर्वत! उनके संगसे शीघ्र ही विषयवासना
उत्पन्न हो जाती है, वैराग्य नष्ट हो जाता है और
उससे श्रेष्ठ तपस्या नष्ट हो जाती है । अतः हे शैल!
तपस्वियोंको स्त्रियोंका संग नहीं करना चाहिये; वह
[स्त्री] महाविषयका मूल तथा ज्ञान-वैराग्यका नाश
करनेवाली होती है॥ ३२-३३॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! इस प्रकारकी बहुत-
सी बातें उन गिरिराजसे कहकर महान् योगियोंमें श्रेष्ठ
महायोगी प्रभु महेश्वर चुप हो गये॥ ३४॥
हे देवर्षे! उन शम्भुका यह स्मृहारहित,
निरामय तथा निष्ठुर वचन सुनकर कालीके पिता
[हिमालय] विस्मयमें पड़ गये और वे कुछ-कुछ
व्याकुल-से होकर चुप हो गये। उस समय
तपस्वीके द्वारा कही गयी बातको सुनकर और
गिरिराजको आश्चर्यमें पड़ा हुआ विचार करके
शिवजीको प्रणामकर भवानी उनसे विशद वचन
कहने लगीं॥ ३५-३६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवहिमाचलसंवादवर्णतं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तरगत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्बतीखण्डमें शिवः हिमाचलः
संवादवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
पार्वती और परमेश्वरका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके
लिये आज्ञा देना, पार्वतीका महेश्वरकी सेवामें तत्पर रहना
भवान्युवाच
किमुक्तं गिरिराजाय त्वया योगिंस्तपस्विना।
तदुत्तर शृणु विभो मत्तो ज्ञानविशारद॥ १
तपःशक्त्यान्वितः शम्भो करोषि विपुलं तपः।
तव बुद्धिरियं जाता तपस्तसुं महात्मनः २
सा शक्ति: प्रकृतित्चेया सर्वेषामपि कर्मणाम्।
तेया विरच्यते सर्व पाल्यते च विनाश्यते॥ ३
कस्तं का प्रकृतिः सक्षमा भगवंस्तद्विमृश्यताम्।
प्रकृत्या च कथं लिङ्गरूपी महेश्वरः॥ ४
2; त
223 Shivmabapuranam_partI_Section_I9-2-Front
भवानी बोलीं--हे योगिन्! आपने तपस्वी
होकर भी मेरे मितासे क्या कह दिया। हे ज्ञानविशारद!
उसका उत्तर मुझसे सुनिये। हे शम्भो! आप तपकी
शक्तिसे सम्पन्न होकर ही महातपस्या कर रहे हैं और
[उसी महाशक्तिकी ही प्रेरणासे] तपस्या करनेके
लिये आप महात्माको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है। सभी
कर्माको करनेवाली उस शक्तिको ही प्रकृति जानना
चाहिये, उसीके द्वारा सबकी सृष्टि, पालन और संहार
होता है॥ १-३॥
अतः हे भगवन्! आप कौन हैं और सूक्ष्म
प्रकृति क्या है, इसका आप विचार करें। प्रकृतिके
बिना लिंगरूपी महेश्वर किस प्रकार रह सकते
हैं 2॥ ४॥
डे ४८
प्रकृत्या च विचार्येति हदा सर्व तदुच्यताम्॥
ब्रह्मोवाच
पार्वत्यास्तद्वचः श्रुत्वा महोतिकरणे रतः।
सुविहस्य प्रसन्नात्मा महेशो वाक्यमब्रवीत्॥ ६
महेश्वर उवाच
तपसा परमेणैव प्रकृतिं नाशयाम्यहम्।
प्रकृत्या रहितः शम्भुरहं तिष्ठामि तत्त्वत: ॥ ७
तस्माच्च प्रकृतेः सद्धिन॑ कार्यः सङ्ग्रहः क्वचित्।
स्थातव्यं निर्विकारश्च लोकाचारविवर्जितेः॥ ८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता शम्भुना तात लौकिकव्यवहारत:।
सुविहस्य हृदा काली जगाद मधुरं वचः॥ ९
काल्युवाच
यदुक्तं भवता योगिन्वचनं शंकर प्रभो।
सा च किं प्रकृतिर्न स्यादतीतस्तां भवान्कथम्॥ १०
एतद्विचार्य वक्तव्यं तत्त्वतो हि यथातथम्।
प्रकृत्या सर्वमेतच्च बद्धमस्ति निरंतरम्॥ ११
तस्मात्त्वया न वक्तव्यं न कार्य किंचिदेव हि।
वचनं रचनं सर्वं प्राकृतं विद्धि चेतसा॥ १२
यच्छृणोषि यदश्नासि यत्पश्यसि करोषि यत्।
तत्स्व प्रकृतेः कार्यं मिथ्यावादो निरर्थकः ॥ १३
प्रकृतेः परमश्चेत््ं किमर्थं तप्यसे तपः।
त्वया शंभोऽधुना ह्यस्मिन्गिरौ हिमवति प्रभो ॥ १४
प्रकृत्या गिलितोऽसि त्वं न जानासि निजं हर।
निजं जानासि चेदीश किमर्थ तप्यसे तप: ॥ १५
वाग्वादेन च किं कार्य मम योगिंस्त्वया सह।
प्रत्यक्षे ह्यनुमानस्य न प्रमाणं विदुर्बुंधाः॥ १६
इंद्रियाणां गोचरत्वं यावद्भवति देहिनाम्
तावत्सर्वं विमन्तव्यं प्राकृतं ज्ञानिभिर्थिया॥ १७
किं बहूक्तेन योगीश शृणु मद्ठचनं परम्।
सा चाहं पुरुषोऽसि त्वं सत्यं सत्यं न संशयः ॥ १८
श्रीशिवमहापुराण [
अर्चनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैं [इस ला
हृदयसे विचारकर ही आप वह सब कहिये | ५ |
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद !] पार्वतीजीके -
वचनको सुनकर महती लीला करनेमें रत रहनेवाते
प्रसनचित्त महेश्वर हँसकर कहने लगे--॥६ ॥
महेश्वर बोले--मैं उत्तम तपस्याद्वारा ही प्रकृति
नाश करता हूँ और वस्तुत: प्रकृतिसे रहित होकर है
शम्भुके रूपमें स्थित रहता हूँ। अत: सत्पुरुषोंको कभी
भी प्रकृतिका संग्रह नहीं करना चाहिये और लोकाचा
दूर तथा विकाररहित रहना चाहिये ॥ ७-८॥
ब्रह्माजी बोले-हे तात! जब शम्भुने लौकिक
व्यवहारके अनुसार यह बात कही, तब काली मनः
ही-मन हँसकर यह मधुर वचन कहने लगीं--॥९॥
काली बोलीं-हे योगिन्! हे शंकर! हे प्रभो!
आपने जो बात कही है, क्या वह प्रकृति नहीं है, आप
उससे परे कैसे हैं ? इन सबका तात्त्विक दृष्टिसे ठीक-
ठीक विचार करके ही आपको बोलना चाहिये। यह
सब कुछ सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है । इसीलिये आपको
ज तो बोलना चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये;
क्योंकि कहना और करना सब व्यवहार प्रकृति ही है-
ऐसा अपनी बुद्धिसे समझिये॥ १०--१२॥
आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते और करते है,
वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। इसे मिथ्या कह देगा
निरर्थक है । हे प्रभो! शम्भो |! यदि आप प्रकृतिसे पै
तो इस समय इस हिमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये
कर रहे हैं। हे हर! प्रकृतिने आपको निगल लिया है
अतः आप अपनेको नहीं जानते । हे ईश ! यदि. आप
जानते हैं, तो किसलिये तप करते हैं ॥ १३--१५॥
हे योगिन्! मुझे आपके साथ वाद-विवाद उ
क्या आवश्यकता है । विद्वान् पुरुष प्रत्यक्ष प्रमाण उपर
होनेपर अनुमान प्रमाणको नहीं मानते॥ १६॥ र
जो कुछ प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता हैं गी
सब ज्ञानी पुरुषोंको बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही री
चाहिये। हे योगीश! बहुत कहनेसे क्या लाभ! ह
उत्तम बात सुनिये । मैं वह प्रकृति हूँ और आप Ed |
यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ १७१
न छा
2223 Shivmahapuranam_Part [_$९०४०ा..9-2-
अ० १३]
¥{ हि सगुणो रूपवान्मतः।
मां विना त्वं निरीहोऽसि न किंचित्कर्तुमर्हसि॥ १९
पराधीनः सदा त्वं हि जानाकर्मकरो वशी।
निर्विकारी कथं त्वं हि न लि्तश्च मया कथम्॥ २०
प्रकृतेः परमोऽसि त्वं यदि सत्यं वचस्तव।
तर्हि त्वया न भेतव्यं समीपे मम शंकर॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्याः सांख्यशास्त्रोदितं शिव: ।
वेदान्तमतसंस्थो हि वाक्यमूचे शिवां प्रति॥ २२
श्रीशिव उवाच
इत्येवं त्वं यदि ब्रूषे गिरिजे सांख्यधारिणी।
प्रत्यहं कुरु मे सेवामनिषिद्धां सुभाषिणि॥ २३
यद्यहं ब्रह्म निर्लिप्तो मायया परमेश्चरः।
वेदांतवेद्यो मायेशस्त्वं करिष्यसि किं तदा॥ २४
ब्रह्मोवाच
इत्येवमुक्त्वा गिरिजां वाक्यमूचे गिरिं प्रभुः।
भक्तानुरंजनकरो भक्तानुग्रहकारकः॥ २५
श्रीशिव उवाच
अत्रैव सोऽहं तपसा परेण
गिरे तव प्रस्थवरेऽतिरम्ये।
चरामि भूमो परमार्थभाव-
स्वरूपमानंदमयं सुलोचयन्॥ २६
तपस्तपुमनुज्ञा मे दातव्या पर्वताधिप।
अनुज्ञया विना किंचित्तपः कर्तु न शक्यते॥ २७
ब्रह्मोवाच
एतच्छुत्वा वचस्तस्य देवदेवस्य शूलिनः।
प्रणम्य हिमवान् शंभुमिदं वचनमब्रवीत्॥ २८
हिमवानुवाच
वीयं हि जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्।
किमप्यहं महादेव तुच्छो भूत्वा वदामि ते॥ २९
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तो हिमवता शंकरो लोकशंकरः।
गिरिराजं तं प्राह याहीति सादरम्॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५४९
मेरे अनुग्रहसे ही आप सगुण और साकार माने
गये हैं। मेरे बिना आप निरीह हैं और कुछ भी करनेमें
समर्थ नहीं हैं। आप जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके
अधीन हो नाना प्रकारके कर्म करते हैं, तब आप फिर
निर्विकार कैसे हैं और मुझसे लिप्त कैसे नहीं हैं ? हे
शंकर! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और यदि आपका
वचन सत्य है, तो मेरे समीप रहनेपर भी आपको
डरना नहीं चाहिये॥ १९-२१॥
ब्रह्माजी बोले-पार्वतीका सांख्यशास्त्रके
अनुसार कहा हुआ वचन सुनकर भगवान् शिव
वेदान्तमतमें स्थित हो शिवासे यह वचन कहने
लगे-॥ २२॥
श्रीशिव बोले-सुन्दर भाषण करनेवाली हे
गिरिजे! यदि आप सांख्यमतको धारण करके
ऐसा कहती हैं, तो प्रतिदिन मेरी अनिषिद्ध सेवा
कीजिये, यदि मैं ब्रह्म, मायासे निर्लिप्त, परमेश्वर,
वेदान्तसे जाननेयोग्य तथा मायापति हूँ, तब आप कया
करेंगी 2॥ २३-२४॥
ब्रह्माजी बोले-गिरिंजासे इस प्रकार कहकर
भक्तोंको प्रसन्न करनेवाले तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले
भगवान् शिव हिमवानूसे कहने लगे-- ॥ २५॥
शिवजी बोले-हे गिरे! मैं यहीं आपके
अत्यन्त रमणीय श्रेष्ठ शिखरकी भूमिपर उत्तम तपस्याके
द्वारा आनन्दमय परमार्थ स्वरूपका विचार करता हुआ
विचरण करूँगा। पर्वतराज! आप मुझे यहाँ तपस्या
करनेकी अनुमति दें, आपकी आज्ञाके बिना कोई तप
नहीं किया जा सकता है ॥ २६-२७॥
ब्रह्माजी बोले-देवाधिदेव शूलधारी शिवको
यह बात सुनकर हिमवानने शम्भुको प्रणाम करके यह
वचन कहा-॥ २८॥
हिमवान्. बोले-हे महादेव! देवता, असुर
और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् तो आपका ही है, मैं
तुच्छ होकर आपसे क्या कहूँ॥ २९॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] हिमवानूके इस
प्रकार कहनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने
हँसकर आदरपूर्वक उन गिरिराजसे कहा-अब आप
जाइये ॥ ३०॥
ठे ५०
श्रीशिवमहापुराण
[अ व न जन जयाहसानाय बाइक. ३
शंकरेणाभ्यनुज्ञात: स्वगृहं हिमवान्ययौ।
सार्धे गिरिजया वै स प्रत्यहं दर्शने स्थितः ॥ ३१
पित्रा विनापिं सा काली सखीभ्यां सह नित्यशः ।
जगाम शंकराभ्याशं सेवायै भक्तितत्परा॥ ३२
निषिषेध न तां कोऽपि गणो नंदीश्वरादिकः।
महेशशासनात्तात तच्छासनकरः शुचिः॥ ३३
सांख्यवेदांतमतयोः शिवयोः शिवदः सदा।
संवादः सुखकृच्चोक्तोऽभिन्नयोः सुविचारतः॥ ३४
गिरिराजस्य वचनात्तनयां तस्य शंकरः।
पावे समीपे जग्राह गौरवादपि गोपरः॥ ३५
उवाचेदं वचः कालीं सखीभ्यां सह गोपतिः।
नित्यं मां सेवतां यातु निर्भीता ह्यत्र तिष्ठतु॥ ३६
एवमुक्त्वा तु तां देवीं सेवायै जगृहे हर: ।
निर्विकारो महायोगी नानालीलाकरः प्रभुः॥ ३७
इदमेव महद्धैर्यं धीराणां सुतपस्विनाम्।
विघ्नवन्त्यपि संप्राप्य यद्विघ्नैन विहन्यते॥ ३८
ततः स्वपुरमायातो गिरिराट् परिचारकैः।
मुमोदातीव मनसि सप्रियः स मुनीशवर॥ ३९
हरश्च॒ ध्यानयोगेन परमात्मानमादरात्।
निर्विघ्नेन स्वमनसा त्वासीच्चिन्तयितुं स्थितः ॥ ४०
काली सखीभ्यां सहिता प्रत्यहं चंद्रशेखरम्।
सेवमाना महादेवं गमनागमने स्थिता॥ ४१
प्रक्षाल्य चरणौ शंभोः पपौ तच्चरणोदकम्।
'वहिशोचेन वस्त्रेण चक्रे तद्गात्रमार्जनम्॥ ४२
षोडशेनोपचारेण संपूज्य विधिवद्धरम्।
पुन: पुनः सुप्रणम्य ययौ नित्यं पितुर्गृहम्॥ ४३
एवं संसेवमानायाः शंकरं ध्यानतत्परम्।
व्यतीयाय महान्कालः शिवाया मुनिसत्तम॥ ४४
कदाचित्सहिता काली सखीभ्यां शंकराश्रमे ।
वितेने सुंदर गानं सुतालं स्मरवर्धनम्॥ ४५
शंकरजीकी आज्ञा पाकर हिमवान् साध
अपने घर लौट गये । तबसे वे गिरिजाके साथ तलि
उनका दर्शन करने लगे | काली अपने पिताके बिना भे
दोनों सहेलियोंके साथ नित्य भक्तिपरायण ज्ञ |
सेवाके लिये शंकरके पास जाती थीं । हे तात!
आदेशसे उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले पवित्र नन्दीशः
आदि कोई भी गण उन्हें रोकते नहीं थे॥ ३१-३ ३
विशेष विचार करनेपर परस्पर अभिन्न होते
भी सांख्य और वेदान्तमतवाले शिवा तथा शिवका संवाद
[सभीके लिये] सदा कल्याणदायक तथा सुखकर कहा
गया है | इन्द्रियातीत भगवान् शंकरने गिरिराजके कहे
उनका गौरव मानकर उनकी पुत्रीको अपने पास रहका
सेवा करनेके लिये स्वीकार कर लिया ॥ ३४-३५॥
भगवान् शंकरने सखियोंसहित पार्वतीसे कहा
कि तुम नित्य मेरी सेवा करो तथा चली जाओ अथवा
निर्भय होकर यहाँ रहो। इस प्रकार कहकर निर्विकार,
महायोगी तथा अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले
भगवान् शंकरने अपनी सेवाके लिये उन देवीको र
लिया। धैर्यशाली तथा परम तपस्वियोंका यह महान्
धैर्य हौ है, जो विघ्नकारक वस्तुओंको ग्रहणकर भी
विघ्नोंसे विनष्ट नहीं होता है॥ ३६-३८॥
हे मुनीश्वर! तत्पश्चात् गिरिराज अपने सेवकॉके
साथ अपने स्थानको चले आये और अपनी प्रियाके
साथ मनमें परम आनन्दित हुए॥ ३९॥
भगवान् शंकर भी आदरपूर्वक ध्यानः
हारा निर्विघ्न मनसे परमात्माका चिन्तन करने लगे॥ ४०॥
काली भी प्रतिदिन सखियोंसहित चद्रशेख
महादेवकी सेवा करती हुई वहाँ जाने-आने लगीं॥ ४१॥
वे भगवान् शंकरके चरणोंको धोकर उत
चरणोदकका पान करती थीं और आगसे [ तपाकर शुई
किये हुए वस्त्रसे उनके शरीरको पोंछा करती थीं ॥ ४९
वे नित्यप्रति षोडशोपचारसे विधिवत् भावी
हरकी पूजाकर बारंबार उन्हें प्रणामकर अपने च्य
घर चली जाती थीं । हे मुनिसत्तम! इस प्रकार
तत्पर भगवान् शंकरकी सेवा करती हुई उत शिवा
बहुत समय व्यतीत हो गया। वे कभी अपनी
साथ भगवान् शंकरके आश्रमे तालसे सर्र
प्रेमवर्धक सुन्दर गान करती थीं॥ ४३-४५ ॥
अ० १३]
समिधं नयति स्वयम्।
सखीभ्यां स्थानसंस्कारं कुर्वती न्यवसत्तदा॥ ४६
कदाचित्रियता गेहे स्थिता चन्द्रभृतो भृशम्।
रक्ष॑ती विस्मयामास सकामा चन्द्रशेखरम्॥ ४७
ततस्तेन भूतेशस्तां निस्सङ्गां परिस्थिताम्।
सोऽचिंतयत्तदा वीक्ष्य भूतदेहे स्थितेति च॥ ४८
नाग्रहीद्रिरिशः कालीं भार्यार्थे निकटे स्थिताम्।
म्हालावण्यनिचयां मुनीनामपि मोहिनीम्॥ ४९
महादेव: पुनर्दृष्ट्वा तथा तां संयतेन्द्रियाम्।
स्वसेवने रतां नित्यं सदयः समचिन्तयत्॥ ५०
यदैवैषा तपश्रर्याब्रतं काली करिष्यति।
तदा च तां ग्रहीष्यामि गर्वबीजविवर्जिताम्॥ ५१
ब्रह्मोवाच
इति संचिन्त्य भूतेशो द्रुतं ध्यानसमाश्रितः।
महायोगीश्वरोऽभूद्वै महालीलाकरः प्रभुः॥ ५२
ध्यानसक्तस्य तस्याथ शिवस्य परमात्मनः।
हदि नासीन्मुने काचिदन्या चिंता व्यवस्थिता॥ ५३
काली त्वनुदिनं शंभुं सद्भक्त्या समसेवत।
विचिंतयन्ती सततं तस्य रूपं महात्मनः॥ ५४
हरो ध्यानपरः कालीं नित्यं प्रैक्षत सुस्थिताम्।
विस्मृत्य पूर्वंचितां तां पश्यन्नपि न पश्यति॥ ५५
एतस्मिन्नन्तरे देवाः शक्राद्या मुनयश्च ते।
ब्रह्माज्ञया स्मरं तत्र प्रेषयामासुरादरात्॥ ५६
तेन कारयितुं योगं काल्या रुद्रेण कामतः।
महावीयेणासुरेण तारकेण प्रपीडिताः ५७
गत्वा तत्र स्मरः सर्वमुपायमकरोन्निजम्।
चुक्षुभे न हरः किञ्चित्तं च भस्मीचकार ह॥ ५८
ार्वत्यपि विगर्वाभून्मुने तस्य निदेशतः।
महत्कृत्वा शिवं प्राप पतिं सती॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५५१
वे कभी कुशा, पुष्प तथा समिधाएँ स्वयं लाती थीं
और सखियोंके साथ आश्रमका सम्मार्जन करती थीं ॥४६॥
वे कभी नियमपूर्वक शंकरजीके आश्रममें
रहकर सकाम भावसे शंकरजीको देखती हुई उन्हें
आश्चर्यचकित कर दिया करती थीं ॥ ४७॥
भगवान् शिवने अपनी तपस्याके बलसे निःसंग
रहनेवाली उस कालीको देखकर पंचतत्त्वके शरीरमें
रहनेवाली अपनी पूर्वजन्मकी भार्या समझ लिया ॥ ४८ ॥
फिर भी शिवजीने मुनियोंको भी मोहित कर
देनेवाली तथा महासौन्दर्यकी राशिस्वरूप उन कालीको
अपनी पलीके रूपमें ग्रहण नहीं किया॥ ४९॥
महादेवजी भगवतीको इस प्रकार जितेन्द्रिय
होकर नित्यप्रति अपनी सेवामें संलग्न देखकर
दयापूर्वक विचार करने लगे कि जब यह तपस्याका
ब्रत करेगी, तब अभिमान-बीजसे रहित इस कालीको
ग्रहण करूँगा॥ ५०-५१॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार विचार करके
बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले महायोगीश्वर भूतेश्वर
भगवान् शिव शीघ्र ही ध्यानमें तत्पर हो गये॥ ५२॥
हे मुने! ध्यानमें मग्न उन परमात्मा शंकरके
मनमें किसी अन्य चिन्ताका उदय नहीं हुआ॥ ५३॥
काली भी उन्हीं परमात्मा शंकरके स्वरूपका
चिन्तन करती हुई भक्तिपूर्वक निरन्तर उनकी सेवा
करने लगीं ॥ ५४॥
भगवान् शिव ध्यानमें स्थित हो पूर्व चिन्ताओंको
भूलकर सुस्थित कालीको देखा करते थे, वस्तुतः वे
उन्हें देखते हुए भी नहीं देखते थे॥५५॥
इसी समय महापराक्रमी तारकासुरसे अत्यन्त
पीड़ित इन्द्र आदि देवताओं तथा मुनियोंने उन रुद्रके साथ
कालीका कामभावसे योग करानेके लिये ब्रह्माजीकी
आज्ञासे कामदेवको आदरपूर्वक वहाँ भेजा ॥ ५६-५७॥
कामदेवने वहाँ जाकर अपना समस्त उपाय
लगाया, परंतु शिव कुछ भी विक्षुब्ध नहीं हुए और
उन्होंने उसे भस्म कर दिया॥५८॥
हे मुने! पार्वतीका भी अभिमान नष्ट हो गया
और तत्पश्चात् नारदजीके उपदेशानुसार घोर तपस्या
करके उन सतीने शिवको पतिरूपमें प्राप्त किया ॥ ५९ ॥
नर २ श्रीशिवमहापुराण
[ पा जल्ला ` ०७ का `
बभूवतुस्तो सुप्रीतौ पाार्वतीपरमेश्वरो।
चक्रतुर्देवकार्य॑ हि परोपकरणे
५
इस प्रकार परमेश्वर एवं पार्वती परम
हो गये और परोपकारमें परायण होकर दा
रतौ॥ ६० | पूर्ण करने लगे॥ ६०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीपरमेश्वरसंवादवर्णनं नाम त्रयोदशो5ध्याय: ॥ है
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वती और' परमेश्कका ५५
संवादवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३ ॥
— Sr
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
तारकासुरकी उत्पत्तिके प्रसंगमें दितिपुत्र वज्रांगकी कथा,
उसकी तपस्या तथा वरप्राप्तिका वर्णन
नारद उवाच
विष्णुशिष्य महाशेव सम्यगुक्तं त्वया विधे।
चरितं परमं ह्मोतच्छिवायाशच शिवस्य च॥
'कस्तारकासुरो ब्रह्मन्येन देवाः प्रपीडिताः ।
कस्य पुत्रस्य वै ब्रूहि तत्कथां च शिवाश्रयाम्॥
भस्मीचकार स कथं शंकरश्च स्मरं वशी।
तदपि ब्रूहि सुप्रीत्याद्भुतं तच्चरितं विभोः॥
कथं शिवा तपोऽत्युग्रं चकार सुखहेतवे।
कथं प्राप पतिं शंभुमादिशक्तिर्जगत्परा॥
एतत्सर्वमशेषेण विशेषेण महाबुध।
ब्रूहि मे श्रद्दधानाय स्वपुत्राय शिवात्मने॥
ब्रह्मोवाच
पुत्रवर्यं॑ महाप्राज्ञ सुरषे शंसितब्रत।
'वच्म्यहं शंकरं स्मृत्वा सर्व तच्चरितं श्रृणु॥
प्रथमं तारकस्यैव भवं संश्रृणु नारद।
यद्वधार्थं महायल: कृतो देवैः शिवाश्रयैः॥
मम पुत्रो मरीचिर्यः कश्यपस्तस्य चात्मजः।
त्रयोद्शमितास्तस्य स्त्रियो दक्षसुताश्च या: ॥
दितिर््यष्ठा च तत्स्त्री हि सुषुवे सा सुतद्वयम्।
हिरण्यकशिपुर््येष्ठो हिरण्याक्षोऽनुजस्ततः॥
नारदजी बोले--हे विष्णुशिष्य ! हे महाशैव|
हे विधे! आपने यह शिवा एवं शिवजीके परम पक
चरित्रका अच्छी तरहसे वर्णन किया॥ १॥
हे ब्रह्मन्! तारकासुर कौन था, जिसे
देवताओंको दुःखित किया, वह किसका पुत्र ध
शिवजीसे सम्बन्धित उस कथाको [आप मुझसे]
कहिये। जितेन्द्रिय शंकरने किस प्रकार कामदेवो
भस्म किया? भगवान् शंकरके इस अद्भुत चरित्रका
भी प्रसन्नतापूर्वक वर्णन कीजिये ॥ २-३॥
जगतूसे परे आदिशक्ति पार्वतीने किस प्रकार
अत्यन्त कठोर तप किया और अपने सुखके लिये उती
शंकरको किस प्रकार पतिरूपमें प्राप्त किया?॥४॥
हे महाज्ञानी! आप मुझ श्रद्धावान् तथ
शिवभक्त अपने पुत्रसे यह सम्पूर्ण चरित्र विशेष रुपे
कहिये ॥ ५ ॥
ब्रह्माजी बोले--हे पुत्रवर्य! हे महाप्राश!
है सुरषे! हे प्रशंसनीय त्रतवाले! मैं शंकरका स्मरणक
घ्य सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन कर रहा हूँ
सुनें॥६॥
हे नारद! सबसे पहले आप तारकासु
उत्पत्तिको सुने, जिसके वधके लिये देवताओंने शिव
आश्रय लेकर बड़ा यत्न किया था॥७॥
मेरे पुत्र जो मरीचि थे, उनके पुत्र कश्यप ;
उनकी तेरह स्त्रियाँ थीं, जो दक्षकी कन्याएँ थीं। ८
उनकी सबसे बड़ी पत्नी दिति थी, उसै
अत्र हुए। उनमें हिरण्यकशिपु ज्येष्ठ तथा
छोटा था॥९॥
अ० १४]
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५५३
तौ हतौ विष्णुना दैत्यौ नृसिंहक्रोडरूपतः।
मुदुःखदौ ततो देवाः सुखमापुश्च निर्भयाः ॥ १०
दितिश्च दुःखितासीत्सा कश्यपं शरणं गता।
पुनः संसेव्य तं भक्त्या गर्भमाधत्त सुब्रता॥ १९
विज्ञाय महेन्द्रोऽपि लब्धच्छिद्रो महोद्यमी।
तदगर्भ व्यच्छिनत्तत्र प्रविश्य पविना मुहुः॥ १२
तदत्रतस्य प्रभावेण न तदूभों ममार ह।
स्वपन्त्या दैवयोगेन सप्त सप्ताभवन्सुताः॥ १३
देवा आसन्सुतास्ते च नामतो मरुतोऽखिलाः।
स्वर्ग ययुस्तदेन््रेण देवराजात्मसात्कृताः॥ १४
पुनर्दितिः पतिं भेजेऽनुत्ता निजकर्मतः।
चकार सुप्रसन्नं तं मुनिं परमसेवया॥ १५
कश्यप उवाच
तपः कुरु शुचिर्भूत्वा ब्रह्मणश्चायुतं समाः।
चेद्भविष्यति तत्पूर्वं भविता ते सुतस्तदा॥ १६
तथा दित्या कृतं पूर्ण तत्तपः श्रद्धया मुने।
ततः पत्युः प्राप्य गर्भ सुषुवे तादृशं सुतम्॥ १७
वञ्राङ्गनामा सोऽभूङ्वै दितिपुत्रोऽमरोपमः।
नामतुल्यतनुर्वीरः सुप्रताप्युद्धवाद् बली ॥ १८
जननीशासनात्सद्यः स सुतो निर्जराधिपम्।
बलाद्धृत्वा ददौ दण्डं विविधं निर्जरानपि॥ १९
दितिः सुखमतीवाप दृष्ट्वा शक्रादिदुर्दशाम्।
अमरा अपि शक्राद्या जम्मुर्दु:खं स्वकर्मतः ॥ २०
तदाहं कश्यपेनाशु तत्रागत्य सुसामगीः।
देवानत्याजयं्तस्मात्सदा देवहिते रतः॥ २१
देवानमुक्त्वा स वज्राडठस्ततः प्रोवाच सादरम्।
शिवभक्तोऽतिशुद्धत्म निर्विकारः प्रसन्नधीः ॥ २
भगवान् विष्णुने नृसिंह तथा वराहरूप धारणकर
अत्यन्त दुःख देनेवाले उन दोनोंका वध किया।
तत्पश्चात् देवगण निर्भय और सुखी रहने लगे ॥ १०॥
इससे दिति दुखी हुई और वह कश्यपकी
शरणमें गयी । उस पतित्रताने उनकी सेवाकर भक्तिपूर्वक
पुनः गर्भ धारण किया। यह जानकर महान् परिश्रमी
देवराज इन्द्रने अवसर पाकर उसके गर्भमें प्रविष्ट
होकर वज्रसे उसके गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर दिये।
किंतु उसके व्रतके प्रभावसे उसका गर्भ नहीं मरा और
दैवयोगसे सोती हुई उसके गर्भसे उनचास पुत्र उत्पन्न
हुए॥ ११-१३॥
वे सभी पुत्र मरुत् नामके देवता हुए और
स्वर्गको चले गये। देवराजने उन्हें अपना लिया। तब
दिति अपने कर्मसे अनुतप्त हो पुनः उनकी सेवा करने
लगी और उसने महान् सेवासे उन मुनिको प्रसन्न कर
लिया॥ १४-१५॥
कश्यप बोले--हे भद्रे! यदि तुम पवित्र होकर
ब्रह्माके दस हजार वर्षपर्यन्त तपस्या करो, तो तुम्हारे
गर्भसे पुनः महापराक्रमी पुत्रका जन्म हो सकता है॥ १६॥
हे मुने! दितिने श्रद्धाके साथ जब तपस्या पूरी
की, तब अपने पतिसे गर्भ धारणकर वैसा ही पुत्र
उत्पन्न किया ॥ १७॥
दितिका वह पुत्र देवताओंके समान था, वह
चज्रांग नामसे विख्यात हुआ। उसका शरीर नामके
अनुसार ही [वज्रके समान] था। वह जन्मसे
महाप्रतापी और बलवान् था॥ १८॥
उस पुत्रने अपनी माताकी आज्ञासे बलपूर्वक देवराज
इन्द्र तथा देवताओंको भी पकड़कर अनेक प्रकारका
दण्ड दिया। इस प्रकार इन्द्र आदिकी दुर्दशा देखकर
दिति बहुत प्रसन्न हुई तथा इन्द्र आदि देवता अपने-
अपने कर्मफलके अनुसार बड़े दुखी हुए॥ १९-२०॥
तब देवताओंकी सदा भलाई करनेवाले मैंने
कश्यपको साथ लेकर वहाँ पहुँचकर शान्तिकी बात
कहकर देवताओंको उस वज़ांगसे छुड़ाया॥ २१॥
तत्पश्चात्. शुद्धात्मा, निर्विकार वह शिवभक्त
वज़्ांग देवताओंको मुक्त करके प्रसन्तचित्त होकर
आदरपूर्वक कहने लगा--॥ २२॥
जे ५४
श्रीशिवमहापुराण
. जङ्उवाच | वज्रांग बोला-यह इन बढ़ा द उवाच
इन्द्रो दुष्टः प्रजाघाती मातुर्मे स्वार्थसाधकः।
स फलं प्रा्तवानद्य स्वराज्यं हि करोतु सः॥ २३
मातुराज्ञावशाद् ब्रह्मन्कृतमेतन्मयाखिलम्।
न मे भोगाभिलाषो वै कस्यचिद्धुवनस्य हि॥ २४
तत्त्वसारं विधे ब्रूहि मह्यं वेदविदांवर।
येन स्यां सुसुखी नित्यं निर्विकारः प्रसन्नधीः ॥ २५
तच्छुत्वाहं मुनेऽवोचं सात्त्विको भाव उच्यते।
तत्त्वसार इति प्रीत्या सृजाम्येकां वरां स्त्रियम्॥ २६
वराङ्गीं नाम तां दत्त्वा तस्मै दितिसुताय वै।
अयां स्वधाम सुप्रीतः कश्यपस्तत्पितापि च॥ २७
ततो दैत्यः स वज्राङ्ग: सात्त्विक भावमाश्रितः।
आसुरं भावमुत्सृज्य निर्वैरः सुखमामवान्॥ २८
ज बभूव वरांग्या हि हृदि भावोऽथ सात्त्विक:।
सकामा स्वपतिं भेजे श्रद्धया विविधं सती॥ २९
अथ तत्सेवनादाशु संतुष्टोऽभून्महाप्रभुः।
स वज्राङ्ग: पतिस्तस्या उवाच वचनं तदा॥ ३०
वज्राङ्ग उवाच
किमिच्छसि प्रिये ब्रूहि किं ते मनसि वर्तते।
तच्छुत्वानम्य तं प्राह सा पत्तिं स्वमनोरथम्॥ ३१
वरांग्युवाच
चेत् प्रसन्नोऽभवस्त्वं वै सुतं मे देहि सत्पते।
महाबलं त्रिलोकस्य जेतारं हरिदुःखदम्॥ ३२
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा प्रियावाक्यं विस्मितोऽभूत्स आकुलः।
उवाच हृदि स ज्ञानी सात्त्विको वैरवर्जितः॥ ३३ | सोचने
[अ १
वज्रांग बोला--यह इन्द्र बड़ा स्वाथी
दुष्ट है । इसने ही मेरी माताकी सन्तानोंको नष्ट
है, इसको अपने कर्मका फल मिल गया, अब क
अपना राज्यपालन करे॥ २३॥ म
हे ब्रह्मन्! यह सारा कार्य मैंने माताकी आज्ञ
किया है। मुझे किसी भुवनके भोगकी अभिलाष
नहीं है॥ २४॥
हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मन्! आप मुझे वेदत
सार बताइये, जिससे मैं सदा परम सुखी, विकार
तथा प्रसन्नचित्त हो जाऊँ॥ २५॥
हे मुने! यह सुनकर मैंने उससे कहा-जे
सात्त्विक भाव है, वही तत्त्वसार है। मैंने [तुम्ह
लिये] प्रसननतापूर्वक एक सुन्दर स्त्रीका निर्माण
किया है॥ २६॥
उस बरांगी नामवाली स्त्रीको मैंने उस दितिपु्रको
प्रदानकर उसके पिताको अत्यन्त प्रसन्नकर मैं अपने
घर चला गया और कश्यप भी अपने स्थानको लौट
गये॥ २७॥
तब वह दैत्य वञ्रांग सात्त्विक भावसे युक्त हो
गया और राक्षसी भावको छोड़कर वैररहित हो सुख
भोगने लगा ॥ २८॥
किंतु वरांगीके हृदयमें सात्त्विक भावका उदय
नहीं हुआ और वह सकाम होकर श्रद्धापूर्वक अपने
पतिको अनेक प्रकारसे सेवा करने लगी ॥ २९॥
वरांगीका पति महाप्रभु वह वज्रांग उसकी
सन्तुष्ट हो गया और उससे कहने लगा-॥ ३०॥
वज्ांग बोला--हे प्रिये! तुम क्या चाहती ह,
तुम्हारे मनमें क्या [विचार] है? मुझे बताओ | तब
विनम्र होकर पतिसे अपने मनोरथको कहा--॥ २१
वरांगी बोली--हे सत्पते! यदि आप [
प्रसन्न हैं, तो मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो महाबल
रो जीतनेवाला तथा इन्द्रको दुःख दैवी
॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले--अपनी पत्नीका यह हि
चुनकर वह व्याकुल तथा आश्चर्यचकित हों ता
वैररहित, ज्ञानी एबं सात्त्विक वह वज्रांग अपने
चने लगा--॥ ३३ ॥
अ० १४]
प्रिबेच्छति विरोधं वै सुरैमें न हि रोचते।
किं कुर्या हि क्व गच्छेयं कथं नश्येन्न मे पण: ॥ ३४
प्रियामनोरथश्चैव पूर्णः स्यात् त्रिजगद्भवेत्।
क्लेशयुङ नितरां भूयो देवाश्च मुनयस्तथा॥ ३५
ज पूर्ण: स्यात्प्रियाकामस्तदा मे नरको भवेत्।
द्विधापि धर्महानिवै भवतीत्यनुशुश्रुवान्॥ ३६
वत्राङ्ग इत्थं बभ्राम स मुने धर्मसंकटे।
बलाबलं द्वयोस्तत्र विचिचिंत च बुद्धितः ॥ ३७
शिवेच्छया स हि मुने वाकयं मेने स्त्रियों बुध:।
तथास्त्विति वच: प्राह प्रियां प्रति स दैत्यराट् ॥ ३८
तदर्थमकरोत्तीब्रं तपोऽन्यद् दुष्करं स तु।
मां समुद्दिश्य सुप्रीत्या बहुवर्ष जितेन्द्रियः ॥ ३९
वरं दातुमगां तस्मै दृष्ट्वाहं तत्तपो महत्।
वरं ब्रूहि ह्यबोचं तं सुप्रसन्नेन चेतसा॥ ४०
वदरङगस्तु तदा प्रीतं मां दृष्टवा खे स्थितं विभुम्।
सुप्रणम्य बहु स्तुत्वा बरं वब्रे प्रियाहितम्॥ ४१
वज्राङ्ग उवाच
सुतं देहि स्वमातु्मे महाहितकरं प्रभो।
महाबलं सुप्रतापं सुसमर्थं तपोनिधिम्॥ ४२
ब्रह्मोवाच
इत्याकण्य या ण्य च तद्वाक्यं तथास्त्वित्यब्रवं मुने।
स्वधाम तददत्त्वा विमनाः संस्मरन् शिवम् ॥ ४३
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५५५
मेरी प्रिया देवताओंसे विरोध करना चाहती है,
मुझे यह अच्छा नहीं लगता। अब मैं क्या करूँ,
कहाँ जाऊँ और कौन ऐसा उपाय करूँ, जिससे मेरी
प्रतिज्ञा नष्ट न हो॥ ३४॥
यदि प्रियाका मनोरथ पूर्ण होता है, तो तीनों
लोक कष्टमें पड़ जायँगे तथा देवता और मुनि भी
दुखी हो जायँगे॥ ३५॥
परंतु यदि प्रियाका मनोरथ पूर्ण नहीं हुआ, तो
मुझे नरक भोगना पड़ेगा। दोनों ही प्रकारसे धर्मकी
हानि होगी, ऐसा मैंने [ धर्मशास्त्रोंसे] सुना है॥ ३६॥
हे मुने! इस तरह धर्मसंकटमें पड़ा हुआ वह
वज्रांग भ्रममें पड़ गया, वह अपनी बुद्धिसे दोनों
बातोंके उचित-अनुचित [पक्षों]-पर विचार करने
लगा॥ ३७॥
हे मुने! [उस समय] उस बुद्धिमान् वज्रांगने
शिवकी इच्छासे स्त्रीकी बात मान ली। उस दैत्यराजने
प्रियासे कहा-ठीक है, ऐसा ही होगा॥ ३८॥
तत्पश्चात् उसने इस निमित्त जितेन्द्रिय होकर
मेरे उद्देश्यसे बहुत वर्षांतक प्रीतिपूर्वक तप किया ॥ ३९॥
तब उसका महातप देखकर उसे वर प्रदान
करनेके लिये मैं गया और प्रसन्नमनसे मैंने उससे
कहा-वर माँगो॥ ४०॥
उस समय वज़ांगने प्रसन्न हुए मुझ विभुको
आकाशमें स्थित देखकर प्रणाम करके नाना प्रकारकी
स्तुतिकर प्रियाके लिये हितकारी वर माँगा॥ ४१॥
वज्रांग बोला--हे प्रभो! आप मुझे ऐसा
पुत्र दीजिये, जो अपनी माताका तथा मेरा परम हित
करनेवाला, महाबली, महाप्रतापी, सर्वसमर्थ और
तपोनिधि हो॥ ४२॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! उसका यह वचन
सुनकर मैंने “तथास्तु' कहा और इस प्रकार उसे वर
देकर शिवका स्मरण करते हुए उदास होकर मैं अपने
स्थानको लौट आया॥ ४३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रु्रसंहिताया तृतीये पार्वती खण्डे तारकोत्पतौ वज़ाड़ोत्पत्तितपोवर्णन नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
॥ इस प्रकार ्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें तारककी उत्पत्तिके प्रसंगमें
वज्जांगकी उत्पत्ति और उसकी तपस्याका वर्णन नामक चाँदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
--<>*९**
हे ५६
श्रीशिवमहापुराण
[ = = कचः १९
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
वरांगीके पुत्र तारकासुरकी उत्पत्ति, तारकासुरकी तपस्या एवं ब्रह्माजीद्वारा उसे
बरप्राप्ति, वरदानके प्रभावसे तीनों लोकोंपर उसका अत्याचार
ब्रह्मोवाच
अथ सा गर्भमाधत्त वराङ्गी तत्पुरादरात्।
स ववर्धाभ्यंतरे हि बहुवषेः सुतेजसा॥ १
ततः: सा समये पूर्णं वराङ्गी सुषुवे सुतम्।
महाकायं महावीर्य प्रज्वलन्तं दिशो दश॥ २
तदैव च महोत्पाता बभूनुर्दुःखहेतवः।
जायमाने सुते तस्मिन्वरांग्याः सुरदुःखदे॥ ३
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च सर्वलोकभयंकराः।
अनर्थसूचकास्तात त्रिविधाः तान्त्रवीम्यहम्॥ ४
सोल्काश्चाशनयः पेतुर्महाशब्दा भयंकराः।
उदयं चक्रुरुत्कृष्टाः केतवो दुःखदायकाः॥ ५
चचाल वसुधा साद्रिर्जज्चलुः सकला दिश: ।
चुक्षुभुः सरितः सर्वाः सागराश्च विशेषतः॥ ६
हूत्कारानीरयन् घोरान्खरस्पर्शो मरुद्रवौ।
उन्मूलयन्महावृक्षान्वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ७
सराह्वोः सूर्यविध्वोस्तु मुहुः परिधयोऽभवन्।
'महाभयस्य विप्रेन्द्र सूचकाः सुखहारकाः॥ ८
महीश्रविवरेभ्यश्च निर्घाता भयसूचकाः।
रथनिह्णादतुल्याश्च जज्ञिरेऽवसरे ततः॥ ९
सृगालोलूकटंकारैर्वमन्त्यो मुखतोऽनलम्।
अंतग्रामेषु विकटं प्रणेदुरशिवाः शिवाः॥ १०
यतस्ततो ग्रामसिंहा उन्नमय्य शिरोधराम्।
सङ्गीतवद्रोदनवद्वयमुञ्चन्विविधान् रवान्॥ ११
खार्काररभसा मत्ताः खुरेर्ध्नन्तो रसां खराः।
वरूथशः तदा तात पर्यधावन्नितस्ततः॥ १२
ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर वरांगीने आदर
गर्भ धारण किया। वह बहुत वर्षोतक परम तेजे
भीतर ही बढ़ता रहा । तत्पश्चात् समय पूर होनेए
वरांगीने विशालकाय, महाबलवान् तथा आपने तेग
दसों दिशाओंको दीप्त करनेवाले पुत्रको उत्पन
किया॥ १-२॥
देवताओंको दु:ख देनेवाले उस वरांगीपुत्रके
उत्पन्न होनेपर दुःखके हेतु महान् उत्पात होने लो।
हे तात! उस समय स्वर्ग, भूमि तथा आकाशमें सभी
लोकोंको भयभीत करनेवाले अनर्थसूचक तीन प्रकारे
उत्पात हुए, मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ॥ ३-४॥
[आकाशसे] महान् शब्द करते हुए भयंका
उल्कायुक्त वञ्र गिरने लगे और जगत्को दुः ख देनेवाले
अनेक सुतीक्ष्ण केतु उदय हो गये । पर्वतसहित पृथ्वी
चलायमान हो गयी, सभी दिशाएँ प्रज्वलित हो गर्यी, सभ
नदियाँ एवं विशेषकर समुद्र क्षुब्ध होने लगे ॥ ५-६॥
भयंकर हू-हू शब्द करते हुए तीक्ष्ण स्पर्शवाली
हवा बहने लगी और धूल उड़ाती एवं वृक्षो
उखाड़ती हुई आँधी चलने लगी । हे विप्रेद्ध! राहुसहित
सूर्य और चन्रमाके ऊपर बार-बार मण्डल पड़ने लगे
जो महाभयके सूचक तथा सुखका नाश करवाते
थे॥ ७-८॥
उस समय पर्वतोंकी गुफाओंसे रथकी नेमिके
समान घर्घर एवं भयसूचक महान् शब्द होते लॉ!
सियार एवं उल्लू अपने मुखसे भयानक टंकारयु
शब्द करते हुए अग्नि उगलने लगे और
गाँवोंके भीतर घुसकर अत्यन्त अमंगल तथा महाभ
शब्द करने लगीं॥ ९-१०॥
कुत्ते जहाँ तहँ गर्दन उठाकर संगीतके समात अँ.
रुदनके समान अनेक प्रकारके शब्द करने लगे॥ १४!
हे तात! गधे रेंकनेके भयानक शब्दसे
होकर अपने खुरोंसे पृथिवीको खोदते हुए झु
शुण्ड इधर-उधर दौड़ने लगे॥ १२॥
अ० १५]
ख़गा उदपतन्नीडाद् रासभत्रस्तमानसाः।
क्रोशंतो व्यग्रचित्ताश्च स्थितिमापुर्न कुत्रचित्॥ १३
शकृम्मूत्रमकार्षुश्च गोष्ठेऽरण्ये भयाकुलाः।
बश्रमुः स्थितिमापुर्नो पशवस्ताडिता इव॥ १४
गाबोऽत्रसन्नसृग्दोहा बाष्पनेत्रा भयाकुलाः।
तोयदा अभवंस्तत्र भयदाः पूयवर्षिणः॥ १५
व्यरुदन्प्रतिमास्तत्र देवानामुत्पतिष्णवः।
विनानिलं द्रुमाः पेतुर्ग्रंहयुद्धं बभूव खे॥ १६
इत्यादिका बहूत्पाता जज्ञिरे मुनिसत्तम।
अज्ञानिनो जनास्तत्र मेनिरे विश्वसम्प्लवम्॥ १७
अथ प्रजापतिर्नामाकरोत्तस्यासुरस्य वै।
तारकेति विचायैव कश्यपो हि महौजसः॥ १८
महावीरः स सहसा व्यज्यमानात्मपौरुषः।
ववृधेऽत्यश्सारेण कायेनाद्रिपतिर्यथा॥ १९
अथो स तारको दैत्यो महाबलपराक्रमः।
तपः कर्तु जनन्याश्चाज्ञां ययाचे महामनाः॥ २०
प्राप्ाज्ञः स महामायी मायिनामपि मोहकः ।
सर्वदेवजयं कर्तु तपोऽर्थं मन आदधे॥ २१
मधोर्वनमुपागम्य गुर्वाज्ञाप्रतिपालकः।
विधिमुद्दिश्य विधिवत्तपस्तेपे सुदारुणम्॥ २२
ऊ्ध्वबाहुश्चैकपादो रविं पश्यन्स चक्षुषा।
शतवर्षं तपश्चक्रे दूढचित्तो दृढव्रतः॥ २३
अड्गुट्टेन भुवं स्पृष्ट्वा शतवर्षं च तादूशः।
तषे तपो दृढात्मा स तारकोऽसुरराट् प्रभुः ॥ २४
रतवर्ष जलं प्राश्नन् शतवर्षं च वायुभुक्।
शतवर्षं जले तिष्ठन् शतं च स्थंडिलेऽतपत्॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५५७
पक्षी घोसलोंसे उड़ने लगे। गदहे भयभीत हो
गये और व्याकुलचित्त होकर भयानक शब्द करने
लगे। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल रही थी॥ १३॥
पशु ताड़ित हुएके समान अपने गोष्ठमें और
अरण्यमें भयभीत होकर बारंबार मल-मूत्रका त्याग करने
लगे और जहाँ-तहाँ इंधरसे उधर भागने लगे। वे एक
जगह ठहरते नहीं थे । गायें भयसे आक्रान्त हो उठी, उनके
स्तनोंसे रुधिर निकलने लगा, नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित
हो उठी और वे व्याकुल हो गयीं। बादल भी भय
उत्पन्न करते हुए पीवकी वर्षा करने लगे॥ १४-१५ ॥
देवताओंकी प्रतिमाएँ उछलकर रोने लगीं, बिना
आँधीके वृक्ष गिरने लगे और आकाशे ग्रहोंका युद्ध होने
लगा। हे मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार अनेक उत्पात होने लगे।
अज्ञानी लोग उस समय यह समझ बैठे कि विश्वप्रलय हो
रहा है । तदनन्तर प्रजापति कश्यपने विचार करके उस
महातेजस्वी असुरका नाम तारक रखा॥ १६--१८॥
वह महावीर सहसा अपने पौरुषको प्रकट करता
हुआ वज्रतुल्य शरीरसे पर्वतराजके समान बढ़ने
लगा॥ १९॥
तत्पश्चात् उस महाबली, महापराक्रमी तथा
मनस्वी तारक दैत्यने तपस्या करनेके लिये मातासे
आज्ञा माँगी। मायावियोंको भी मोहित करनेवाले उस
महामायावी दैत्यने अपनी मातासे आज्ञा प्राप्तकर सभी
देवताओंपर विजय प्राप्त करनेके लिये अपने मनमें तप
करनेका विचार किया॥ २०-२१॥
गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला वह दैत्य
मधुवनमें जाकर ब्रह्माजीको लक्ष्य करके विधिपूर्वक
अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगा॥ २२॥
उस दृढ़ब्रत दैत्यने चित्तको स्थिरकर नेत्रोंद्वारा
सूर्यको देखते हुए अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर
एक पैरपर खड़े होकर सौ वर्षपर्यन्त तपस्या की ॥ २३॥
तदनन्तर पैरके अँगूठेसे भूमिको टेककर
दृढ़चित्तताले तथा ऐश्वर्यशाली महान् असुरराज
तारकने उसी प्रकार सौ वर्षतक तपस्या की॥ २४॥
सौ वर्षतक जल पीकर, सौ वर्षतक वायु पीकर,
सौ वर्षतक जलमें खड़ा रहकर और सौ वर्षतक
स्थण्डिलपर रहकर उसने तपस्या की॥ २५॥
न ५८
्रीशिवमहापुराण
[ __ = ¬ कायसा ` `` श्
शतवर्ष तथा चाग्नौ शतवर्षमधोमुखः।
शतवर्ष तु हस्तस्य तलेन च भुवं स्थितः॥ २६
शतवर्ष तु वृक्षस्य शाखामालम्ब्य वै मुने।
पादाभ्यां शुचिधूमं हि पिबंश्चाधोमुखस्तथा॥ २७
एवं कष्टतरं तेपे सुतपः स तु दैत्यराट्।
काममुहिश्य विधिवच्छृण्वतामपि दुस्सहम्॥ २८
तत्रैवं तपतस्तस्य महत्तेजो विनिस्सृतम्।
शिरसः सर्वसंसरपि महोपद्रवकृन्मुने॥ २९
तेनैव देवलोकास्ते दग्धप्राया बभूविरे।
अभितो दुःखमापन्नाः सर्वे देवर्षयो मुने॥ ३०
इन्द्रश्च भयमापेदेऽधिकं देवेश्वरस्तदा।
'तपस्यत्यद्य कश्चिद्वे मत्पदं धर्षयिष्यति॥ ३१
अकांडे चैव ब्रह्माण्डं संहरिष्यत्ययं प्रभुः।
इति संशयमापन्ना निश्चयं नोपलेभिरे॥ ३२
ततः सर्वे सुसंमन्त्र्य मिथस्ते निर्जरर्षयः।
मल्लोकमगमन्भीता दीना मां समुपस्थिताः ॥ ३३
मां प्रणम्य सुसंस्तूय सर्वे ते क्लिष्टचेतसः।
कृतस्त्वञ्जलयो मह्यं वृत्तं सर्वं न्यवेदयन्॥ ३४
अहं सर्वं सुनिश्चित्य कारणं तस्य सद्धिया।
खरं दातुं गतस्तत्र यत्र तप्यति सोऽसुरः॥ ३५
अवोचं वचनं तं वै वरं ब्रूहीत्यहं मुने।
तपस्तप्तं त्वया तीव्रं नादेयं विद्यते तव॥ ३६
इत्येवं मद्वचः श्रुत्वा तारकः स म्रहासुरः।
मां प्रणम्य सुसंस्तूय वरं वब्रेऽतिदारुणम्॥ ३७
तारक उवाच
त्वयि प्रसन्ने वरदे किमसाध्यं भ्रवेन्मम।
अतो याचे वरं त्वत्तः शृणु तन्मे पितामह॥ ३८
सौ वर्षतक अग्निके बीचमें, सौ ने
ओर मुख करके और सौ वर्षतक ली
पृथ्वीपर स्थित होकर वह तपस्या करता रहा| हे र
वह सौ वर्षतक वृक्षकी शाखाको दोनों पैरोसे पकक
नीचेकी ओर मुख करके पवित्र धूमका पान क
रहा॥ २६-२७॥
इस प्रकार उस असुरराजने अपने मनोरे
लक्ष्य करके सुननेवालोंको भी सर्वथा दुःसह जा
पड्नेवाला अत्यन्त कठिन तथा कष्टकर तप किया॥ १/।
हे मुने! इस प्रकार तप करते हुए उसके सि
चारों दिशाओंमें फैलनेवाला एक महान् उपद्रव
महातेज निकला ॥ २९॥
हे मुने! उस तेजसे सभी देवलोक प्राय: जतो
लगे और चारों ओर समस्त देवता तथा ऋषिगण बडे
दुखी हुए॥ ३०॥
उस समय देवराज इन्द्र अधिक भयभीत हुए कि
निश्चय ही इस समय कोई तप कर रहा है, वह में
पदको भी छीन लेगा॥ ३१॥
वह ऐश्वर्यशाली तो असमयमें ही ब्रह्माण्डका
संहार कर डालेगा-इस प्रकार सन्देहमें पड़े हुए [देवता]
लोग कुछ भी निश्चय नहीं कर पा रहे थे॥३९॥
तदनन्तर सभी देवता एवं ऋषि परस्पर विचा
करके भयभीत एवं दीम होकर मेरे लोकमें पहुँचे और
मेरे सामने उपस्थित हुए॥ ३३॥
व्यथित चित्तवाले उन सभीने प्रणामकर मेरी सुत
करके हाथ जोड़कर सारा वृत्तान्त मुझसे कहा॥ १४
मैं भी सद्बुद्धिसे [उनकी व्यग्रताका] सम
कारण जानकर जिस स्थानपर असुर तप कर रहा 4.
उस स्थानपर उसे वर देनेके लिये गया॥ ३५॥
हे मुने! मैंने उससे कहा-- [हे दैत्य!] तुमने हो
तपस्या की है, अतः वर माँगों, मुझे कोई भी क
तुम्हारे लिये अदेय नहीं है तब मेरा वचन सतर्क
महान् असुर तारकने मुझे प्रणाम करके तथा मेरी सुति
अत्यन्त कठिन वर माँगा ॥ ३६-३७॥ जा
तारक बोला-हे पितामह ! वर देनेवाले है.
हो जानेपर मेरे लिये क्या असाध्य हो सरव |!
अत: मैं आपसे वर माँगता हूँ, उसे मुझसे सुनिये॥ टे
अ० १५ ]
यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम।
देयं वरद्वयं मह्मं कृपां कृत्वा ममोपरि॥ ३९
त्वया च निर्मिते लोके सकलेऽस्मिन्महाप्रभो।
मत्तुल्यो बलवान्तूनं न भवेत्कोऽपि वै पुमान्॥ ४०
शिववीर्यसमुत्पन्नः rr सेनापतिर्यदा।
भूत्वा शस्त्रं घि तदा मे मरणं भवेत्॥ ४९
इत्युक्तो5थ तदा तेन देत्येनाहं मुनीश्वर।
बरे च तादृशं दत्त्वा स्वलोकमगमं द्रुतम्॥ ४२
दैत्योऽपि स वरं लब्ध्वा मनसेप्सितमुत्तमम्।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा शोणिताख्यपुरं गतः॥ ४३
अभिषिक्तस्तदा राज्ये त्रैलोक्यस्यासुरैः सह।
शुक्रेण दैत्यगुरुणाज्ञया मे स महासुरः॥ ४४
ततस्तु स महादैत्योऽभवत् त्रैलोक्यनायकः।
स्वाज्ञां प्रवर्तयामास पीडयन्सचराचरम्॥ ४५
राज्यं चकार विधिवत्त्रिलोकस्य स तारकः।
प्रजाश्च पालयामास पीडयन्निर्जरादिकान्॥ ४६
ततः स तारको दैत्यस्तेषां रलान्युपाददे।
इनद्रादिलोकपालानां स्वतो दत्तानि तद्भयात्॥ ४७
इन्धेणैरावतस्तस्य भयात्तस्मै समर्पित: ।
कुबेरेण तदा दत्ता निधयो नवसंख्यकाः॥ ४८
वरुणेन हया: शुभ्रा ऋषिभिः कामकृत्तथा।
इन्रेणोच्चैः श्रवा दिव्यो भयात्तस्मै समर्पितः ॥ ४९
यत्र यत्र शुभं वस्तु दृष्टं तेनासुरेण हि।
तत्तद् गृहीतं तरसा निस्सारस्त्रिभवोऽभवत्॥ ५०
समुद्राश्च तथा रत्लान्यदुस्तस्मै भयान्मुने।
अकृष्टपच्यासीत्पथ्ी प्रजाः कामदुघाखिलाः ॥ ५१
सूर्यश्च तपते तद्गत्तद् दुःखं न यथा भवेत्।
पैंड्रस्तु प्रभया दृश्यो वायुः सर्वानुकूल्यवान्॥ ५२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५५९
हे देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि
वर देना चाहते हैं, तो मेरे ऊपर कृपा करके मुझे
दो वर दीजिये॥ ३९ ॥
है महाप्रभो! आपके बनाये हुए इस समस्त
लोकमें कोई भी पुरुष मेरे समान बलवान् न हो और
शिवजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र देवताओंका
सेनापति बनकर जब मेरे ऊपर शस्त्र प्रहार करे, तब
मेरी मृत्यु हो॥ ४०-४१॥
हे मुनीश्वर! जब उस दैत्यने मुझसे इस प्रकार
कहा, तब मैं उसे उसी प्रकारका वर देकर शोप्रतापूर्वक
अपने स्थानको चला गया॥ ४२॥
वह दैत्य भी मनोवांछित उत्तम वर प्राप्तकर अत्यन्त
प्रसन्न होकर शोणित नामक पुरको चला गया ॥ ४३ ॥
उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्यने मेरी आज्ञासे असुरेंके
साथ जाकर त्रिलोकीके राज्यपर उस महान् असुरका
अभिषेक किया | तब वह महादैत्य त्रैलोक्याधिपति हो
गयां और चराचरको पीडित करता हुआ अपनी आज्ञा
चलाने लगा। इस प्रकार वह तारक विधिपूर्वक त्रैलोक्यका
राज्य करने लगा और देवता आदिको पीड़ा पहुँचाता
हुआ प्रजापालन करने लगा ॥ ४४--४६॥
तदनन्तर उस तारकासुरने इन्द्र आदि लोकपालोंके
रत्लोंको ग्रहण कर लिया, उन्होंने उसके भयसे [रत्न]
स्वयं प्रदान किये॥ ४७॥
इन्द्रने उसके भयसे उसे ऐरावत हाथी समर्पित
कर दिया और कुबेरने नौ निधियाँ दे दीं। वरुणने
श्वेतवर्णके घोड़े, ऋषियोंने कामधेनु और इन्द्रने
उच्चै:श्रवा नामक दिव्य घोड़ा भयके कारण उसे
समर्पित कर दिया ॥ ४८-४९ ॥
उस असुरने जहाँ-जहाँ अच्छी वस्तुएँ देखीं,
उन्हें बलपूर्वक हरण कर लिया। इस प्रकार त्रिलोकी
सर्वथा निःसार हो गयी ॥ ५०॥
हे मुने ! समुद्रोने भी भयसे उसे समस्त रत्न प्रदान
कर दिये, बिना जोते-बोये ही पृथिवी अन्न प्रदान करने
लगी और सभी प्रजाओंके मनोरथ पूर्ण हो गये ॥ ५१॥
सूर्य उतना ही तपते थे, जिससे किसीको कष्ट
न हो, चन्द्रमा उजाला करते रहते और वायु सबके
अनुकूल ही चलता था॥५२॥
न ६०
श्रीशिवमहापुराण
देवाचा चैव चद र्य पितृणां च परस्य च। | उसुमा असुर देवताओं, पि ० चैव यदू द्रव्यं पितृणां च परस्य च।
तत्सर्व समुपादत्तमसुरेण दुरात्मना॥ ५३
वशीकृत्य स लोकांस्त्रीन्स्वयमिन्रो बभूव ह।
अद्वितीयः प्रभुश्चासीद्राज्यं चक्रेऽद्भुतं वशी॥ ५४
निस्सार्य सकलान्देवान्दैत्यानस्थापयत्ततः।
स्वयं नियोजयामास देवयोनीन् स्वकर्मणि॥ ५५
अथ तद्बाधिता देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।
मुने मां शरणं जग्मुरनाथा अतिविह्वला: ॥ ५६
[3s ५
उस दुरात्मा असुरे देवताओं, पितरं तथा असन
जो भी द्रव्य था, वह सब हरण कर लिया। त्ता
इस प्रकार वह तीनों लोकोंको अपने अधीनक
स्वयं इन्द्र बन बैठा। वह इन्द्रियोंको वशमें
अद्वितीय राजा हुआ और अद्भुत प्रकारसे राज्य के
लगा॥ ५४॥
उसने समस्त देवताओंको हटाकर उनकी जाह
दैत्योको नियुक्त कर दिया और देवताओंको अप
कर्में नियुक्त किया। हे मुने! तदनन्तर उसमे पी
हुए इन्द्र आदि समस्त देवगण अनाथ तथा अलमत
व्याकुल होकर मेरी शरणमें आये ॥ ५५-५६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे तारकासुरतपोराज्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय यार्वतीखण्डमें तारकासुरकी
तपस्या एवं उसके राज्यका वर्णन नामक पन््हवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
तारकासुरसे उत्पीडित देवताओंको ब्रह्माजीद्वारा सान्त्वना प्रदान करना
ब्रह्मोवाच
अथ ते निर्जरा: सर्वे सुप्रणम्य प्रजेशवरम्।
तुष्टुवुः परया भक्त्या तारकेण प्रपीडिताः॥ ९
अहं श्रुत्वामरनुतिं यथार्था हृदयङ्गमाम्।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा प्रत्यवोचं दिवौकसः॥ २
स्वागतं स्वाधिकारा वै निर्विघ्नाः सन्ति वः सुराः।
किमर्थमागता यूयमत्र सर्वे वदन्तु मे॥ ३
इति श्रुत्वा वचो मे ते नत्वा सर्वे दिवोकस:।
मामूचुर्नतका दीनास्तारकेण प्रपीडिताः॥ ४
देवा ऊचुः
लोकेश तारको दैत्यो वरेण तब दर्पितः।
निरस्यास्मान्हठात्स्थानान्यग्रहीन्नो बलात्स्वयम्॥ ५
भवतः किमु न ज्ञातं दुःखं यन्न उपस्थितम्।
तहुःखं नाशय क्षिप्रं वयं ते शरणं गताः॥ ६
अहर्निशं बाधतेऽस्मान् यत्र तत्रास्थितान्स वै।
'पलायमानाः पश्यामो यत्र तत्रापि तारकम्॥ ७
ब्रह्माजी बोले--उसके बाद तारकासुरसे पीडि
वे समस्त देवता मुझ प्रजापतिको भलीभाँति प्रणामक
परम भक्तिसे स्तुति करने लगे॥ १॥
देवताओंकी यथार्थ एवं हृदयग्राही सरस स्तुति
सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर मैंने उन देवताओं
कहा-- ॥ २॥
हे देवताओं! आपलोगोंका स्वागत है। आपलोगॅके
अधिकार निर्विघ्न तो हैं ? आप सब यहाँ किंस तिमि
आये हैं, मुझसे कहिये। मेरी यह बात सुतक
तारकासुरसे पीड़ित वे सभी देवता मुझे प्रणाम क
विनयी हो दीनतापूर्वक मुझसे कहने लगे--॥ २४
देवता बोले--हे लोकेश! आपके
अभिमानमें भरे हुए तारक असुरने हठपूर्वक
अपने स्थानोंसे वंचितकर उन्हें बलपूर्वक स्वयं ग्रहण
लिया है। हमलोगोंके समक्ष जो दु:ख उपस्थित माह
क्या आप उसे नहीं जानते हैं ? हमलोग आपकी शर
आये हैं, उस दुःखका शीघ्र निवारण कीजिये ॥ ५
हमलोग जहाँ कहीं भी जाते हैं, वह असुर, है|
दिन हमलोगोंको पीड़ित करता है। हम जहाँ
भागकर जाते हैं, वहाँ तारकको ही देखते हैं॥ ९"
अ० १६]
तारकान्नश्च॒ यद्दुःखं संभूतं सकलेश्वर।
तेन सर्वे वयं तात पीडिता विकला अति॥ ८
अग्निर्यमोऽथ वरूणो निर्क्रतिर्वायुरेव च।
अन्ये दिक्पतयश्चापि सर्वे तद्वशगामिनः॥ ९
सर्वे मनुष्यधर्माणः सर्वैः परिकरेर्युताः।
सेवन्ते तं महादैत्यं न स्वतंत्राः कदाचन॥ १०
एवं तेनार्दिता देवा वशगास्तस्य सर्वदा।
तदिच्छाकार्यनिरताः सर्वे तस्यानुजीविनः॥ ११
यावत्यो वनिताः सर्वा ये चाप्यप्सरसां गणा: ।
सर्वास्तानग्रहीदैत्यस्तारकोऽसौ महाबली॥ १२
न यज्ञाः संप्रवर्तन्ते न तपस्यन्ति तापसाः।
दानधर्मादिकं किंचिन्न लोकेषु प्रवर्तते॥ १३
तस्य सेनापतिः क्रौंचो महापाप्यस्ति दानव: ।
स पातालतलं गत्वा बाधते त्वनिशं प्रजाः॥ १४
तेन नस्तारकेणेदं सकलं भुवनत्रयम्।
हतं हठाज्ञगद्धातः पापेनाकरुणात्मना॥ १५
वयं च तत्र यास्यामो यत्स्थानं त्वं विनिर्दिशेः ।
स्वस्थास्तद्वारितास्तेन लोकनाथ सुरारिणा॥ १६
त्वं नो गतिश्च शास्ता च धाता त्राता त्वमेव हि।
वयं सर्वे तारकाख्यवह्वौ दग्धाः सुविहलाः॥ १७
तेन क्रूरा उपाया न: सर्वे हतबलाः कृताः।
विकारे सांनिपाते वा वीर्यवन्त्यौषधानि च॥ १८
त्रास्माकं जयाशा हि हरिचक्रे सुदर्शने।
तत्कुंठितमभूत्तस्य कंठे पुष्पमिवार्पितम्॥ १९
ब्रह्मोवाच
त्येतद्वचनं श्रुत्वा निर्जराणामहं मुने।
प्रत्यवोचं सुरान्सर्वास्तत्कालसदूशं वचः॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड)
५६१
हे सर्वेश्वर! हमलोगोंके समक्ष तारकासुरसे जैसा
भय उपस्थित हो गया है, वह दुःख सहा नहीं जा रहा
है। हमलोग उसी पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल हैं ॥ ८॥
अग्नि, यम, वरुण, निर्क्रति, वायु एवं अन्य
समस्त दिक्पाल उसके वशमें हो गये हैं। सभी देवता
अपने समस्त परिकरोंसहित मनुष्यधर्मा हो गये हैं और
उसको सेवा करते हैं। वे किसी प्रकार भी स्वतन्त्र
नहीं हैं॥ ९-१०॥
इस प्रकार उससे पीडित होकर सभी देवता सदा
उसके वशवर्ती हो गये हैं और उसकी इच्छाके अनुसार
कार्य करते हैं तथा उसके अनुजीवी हो गये हैं ॥ ११॥
उस महाबली तारके जितनी भी सुन्दर स्त्रियाँ
हैं तथा अप्सराएँ हैं, उन सबको ग्रहण कर लिया
है॥ १२॥
अब यज्ञ-याग सम्पन्न नहीं होते, तपस्वी लोग
तपस्या भी नहीं कर पाते। लोकोंमें दान, धर्म आदि
कुछ भी नहीं हो रहा है। उसका सेनापति दानव क्रौंच
अत्यन्त पापी है। वह पाताललोकमें जाकर प्रजाओंको
निरन्तर पीड़ित करता है | हे जगद्धाता! उस निष्करुण
तथा पापी तारकने हमारे सम्पूर्ण त्रिलोकको बलपूर्वक
अपने वशमें कर लिया हैं। अब आप ही जो स्थान
बतायें, वहाँ हमलोग जायै। हे लोकनाथ! उस
देवशत्रुने हमलोगोंको अपने-अपने स्थानोंसे हरा दिया
है। अब आप ही हमलोगोंके शरणदाता हैं। आप ही
हमारे शासक, रक्षक तथा पोषक हैं। हम सभी लोग
तारक नामक अग्निमें दग्ध होकर बहुत व्याकुल हो
रहे हैं॥ १३--१७॥
जिस प्रकार सन्निपात नामक विकारमें बलवान्
औषधियाँ भी निष्फल हो जाती हैं, उसी प्रकार उसने
हमारे सभी कठोर उपायोंको निष्फल कर दिया
है॥ १८॥
भगवान् विष्णुके जिस सुदर्शन नामक चक्रसे
हमलोगोंको विजयकी आशा थी, वह उसके कण्ठमें
पुष्पके समान लगकर कुण्ठित हो गया है॥ १९॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! देवताओंके इस
वचनको सुनकर मैं सभी देवताओंसे समयोचित बात
कहने लगा-॥ २०॥
६२
श्रीशिवमहापुराण
[ व ल री र
ब्रह्मोवाच
ममैव वचसा दैत्यस्तारकाख्यः समेधितः।
न मत्तस्तस्य हननं युज्यते हि दिबौकसः॥ २
ततो नैव वधो योग्यो यतो वृद्द्िमुपागतः।
विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसांप्रतम्॥ २२
युष्माकं चाखिलं कार्यं कर्तु योग्यो हि शंकरः।
किन्तु स्वयं न शक्तो हि प्रतिकर्तु प्रचोदितः ॥ २३
तारकाख्यस्तु पापेन स्वयमेष्यति संक्षयम्
यथा यूयं संविदध्वमुपदेशकरस्त्वहम्॥ २४
न मया तारको वध्यो हरिणापि हरेण च।
नान्येनापि सुरैर्वापि मद्वरात्सत्यमुच्यते॥ २५
शिववीर्यसमुत्पन्नो यदि स्यात्तनयः सुराः।
स एव तारकाख्यस्य हन्ता दैत्यस्य नापर:॥ २६
यमुपायमहं वच्मि तं कुरुध्वं सुरोत्तमाः।
महादेवप्रसादेन सिद्ध्रिमेष्यति स ध्रुवम्॥ २७
सती दाक्षायणी पूर्व त्यक्तदेहा तु याभवत्।
सोत्पन्ना मेनकागर्भात्सा कथा विदिता हि व:॥ २८
तस्या अवश्यं गिरिशः करिष्यति करग्रहम्।
तत्कुरुध्वमुपायं च तथापि त्रिदिबौोकसः॥ २९
तथा विदध्वं सुतरां तस्यां तु परियत्नत:।
पार्वत्यां मेनकाजायां रेतःप्रतिनिपातने॥ ३०
तमूर्ध्वरेतसं शंभुं सैव प्रच्युतरेतसम्।
कर्तु समर्था नान्यास्ति तथा काप्यबला बलात् ॥ ३१ | हैं
सा सुता गिरिराजस्य सांप्रतं प्रौढयौवना।
तपस्यन्तं हिमगिरौ नित्यं संसेवते हरम्॥ ३२
वाक्याद्द्रिमवतः काली स्वपितुर्हठतश्शिवा।
सखीभ्यां सेवते सार्धं ध्यानस्थं परमेश्वरम्॥ ३३
तामग्रतोऽर्चमानां वै त्रैलोक्ये वरवर्णिनीम्।
ध्यानासक्तो महेशो हि मनसापि न हीयते॥ ३४
ब्रह्माजी बोले--हे देवगणो! मेरे वरदा
कारण ही वह तारक नामक दैत्य बलवान् हुआ है|
अत: मेरे द्वारा उसका वध उचित नहीं है। जिस
द्वारा वह वृद्धिको प्राप्त हुआ है, उसीसे है
उचित नहीं है। विषवृक्षको भी बढ़ाकर उसे स्व
काटना अनुचित है॥ २१-२२॥
शिवजी ही आपलोगोंका सारा कार्य का
सकनेयोग्य हैं, किंतु वे स्वयं कुछ नहीं करेंगे, प्रणा
करनेपर वे इसका प्रतीकार करनेमें समर्थ हैं॥ २३।
तारकासुर स्वयं अपने पापसे नष्ट होगा। ग
जैसा उपदेश करता हूँ, वैसा आपलोग करें॥ २४।
मेरे वरके प्रभावसे न मैं, न विष्णु, न शंकर, व
दूसरा कोई और न सभी देवता ही तारकका वध का
सकते हैं, यह मैं सत्य कह रहा हूँ। हे देवताओ! यदि
शिवजीके वीर्यसे कोई पुत्र उत्पन्न हो, तो बही तारक
दैत्यका वध कर सकता है, दूसरा नहीं ॥ २५-२६॥
हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं जो उपाय बता रहा हँ
उसे आपलोग कीजिये, वह उपाय महादेवजीकौ
कृपासे अवश्य सिद्ध होगा। पूर्वकालमें जिन दक्षकना
सतीने [दक्षके यज्ञमें] अपने शरीरका त्याग किया
था, वे ही [इस समय] मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं
यह बात आपलोगोंको ज्ञात ही है॥ २७-२८॥
हे देवगणो ! महादेवजी उनका पाणिग्रहण अवश
करेंगे, तथापि आपलोग भी उसका उपाय करें॥ २९॥
आपलोग यत्तपूर्वक ऐसा उपाय कीजिये कि
मेनाकी पुत्री पार्वतीमें शिवजीके वीर्यका आर्ध
हो ॥ ३०॥
ऊर्ध्वरेता शंकरको च्युतवीर्य करनेमें वे ही सम
, कोई अन्य स्त्री समर्थ नहीं है॥३१॥
पूर्ण यौवनवाली चे गिरिराजपुत्री इस सर
हिमालयपर तपस्या करते हुए शंकरकी नित्य
करती हैं॥ ३२॥
अपने पिता हिमवानके कहनेसे वे काली शिन
अपनी दो सखियोंके साथ ध्यानपरायण परर
शिवको हठपूर्वक सेवा कर रही हें । सेवामें तत्पर
-सुन्दरीको सामने देखकर ध्यानमग्न
मनसे भी विचलित नहीं होते॥ ३३-३४॥
अ० १६]
आर्या समीहेत यथा स कालीं चन्द्रशेखरः ।
तथा विधध्वं त्रिदशा न चिरादेव यत्नत: ॥ ३५
स्थानं गत्वाथ दैत्यस्य तमहं तारकं तत: ।
निवारयिष्ये कुहठात्स्वस्थानं गच्छतामराः॥ ३६
इत्युक्त्वाहं सुरान् शीघ्रं तारकाख्यासुरस्य वै।
उपसङ्गम्य सुप्रीत्या समाभाष्येदमब्रवम्॥ ३७
ब्रह्मोवाच
तेजःसारमिमं स्वर्ग राज्यं त्वं परिपासि न: ।
यदर्थं सुतपस्तप्तं वाञ्छसि त्वं ततोऽधिकम् ॥ ३८
वरश्चाप्यवरो दत्तो न मया स्वर्गराज्यता।
तस्मात्स्वर्गं परित्यज्य क्षितौ राज्यं समाचर॥ ३९
देवयोग्यानि तत्रैव कार्याणि निखिलान्यपि।
भ्रविष्यन्त्यसुरश्रेष्ठ नात्र कार्या विचारणा॥ ४०
इत्युक्त्वाहं च संबोध्यासुरं तं सकलेश्वरः।
स्मृत्वा शिवां च सशिवं तत्रान्तर्धानमागतः॥ ४१
तारकोऽपि परित्यज्य स्वर्ग क्षितिमथाभ्यगात्।
शोणिताख्यपुरे स्थित्वा सर्वराज्यं चकार सः॥ ४२
देवाः सर्वेऽपि तच्छुत्वा मद्वाक्यं सुप्रणम्य माम्।
शक्रस्थानं ययुः प्रीत्या शक्रेण सुसमाहिताः ॥ ४३
तत्र गत्वा मिलित्वा च विचार्य च परस्परम्।
ते सर्वे मरुतः प्रीत्या मघवन्तं वचोऽब्रुवन्॥ ४४
देवा ऊचुः
शम्भोर्यथा शिवायां वै रुचिर्जायेत कामतः।
मधवंस्ते प्रकर्तव्यं ब्रह्मोक्तं सर्वमेव तत्॥ ४५
ब्रह्मोवाच
इत्येवं सर्वृत्तान्तं विनिवेद्य सुरेश्वरम्।
जम्मुस्ते सर्वतो देवाः स्व॑ स्वं स्थानं मुदान्विताः॥ ४६
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५६३
हे देवताओ ! वे चन्द्रशेखर जिस प्रकार कालीको
भार्यारूपमें स्वीकार करें, आपलोग शीघ्र ही वैसा
प्रयत्न करें। मैं भी उस दैत्यके स्थानपर जाकर उस
तारकको दुरग्रहसे रोकूँगा । हे देवताओ! अब आपलोग
अपने स्थानको जाइये। देवताओंसे इस प्रकार कहकर
मैं शीघ्र ही तारक नामक असुरके पास जाकर उसे
प्रेमपूर्वक बुलाकर कहने लगा-- ॥ ३५--३७॥
ब्रह्माजी बोले-[हे तारक!] तुम तेजोंके
सारस्वरूप इस स्वर्गका राज्य कर रहे हो। जिसके
लिये तुमने उत्तम तपस्या की थी, उससे भी अधिककी
इच्छा रखते हो॥ ३८॥
मैंने [तुम्हें] इससे छोटा ही वर दिया था, मैंने
तुम्हें स्वर्गका राज्य नहीं दिया था, इसलिये तुम
स्वर्गका राज्य छोड़कर पृथिवीपर राज्य करो॥ ३९॥
हे असुरश्रेष्ठ ! इसमें तुम किसी प्रकार विचार मत
करो, वहाँ भी बहुत-से देवताओंके योग्य कार्य हैं ॥ ४० ॥
सभीका ईश्वर मैं इस प्रकार उस असुरसे
कहकर और उसे समझाकर शिवासहित शिवका
ध्यान करके वहीं अन्तर्धान हो गया। उसके बाद
तारक भी स्वर्गको छोड़कर पृथिवीपर आ गया और
वह शोणित नामक नगरमें रहकर राज्य करने लगा।
सभी देवगण भी मेरा वचन सुनकर मुझे सादर प्रणाम
करके समाहितचित्त हो इन्द्रके साथ इन्द्रपुरीको
गये॥ ४१--४३ ॥
वहाँ जाकर मिल करके आपसमें विचार करके
उन सब देवताओंने इन्द्रसे प्रेमपूर्वक कहा- ॥ ४४॥
देवता बोले--हे इन्द्र! जिस प्रकार भगवान्
शंकर सकाम होकर शिवाकी अभिलाषा करें, ब्रह्माजीके
द्वारा बताया हुआ वह सारा प्रयत्त आपको करना
चाहिये ॥ ४५॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार इन्द्रसे सम्पूर्ण
वृत्तान्त निवेदित करके वे देवता प्रसन्नतापूर्वक सब
ओर अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ४६॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयाया रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे देवसांत्वनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६ ॥
---+**»+*+7 *
के ६४
्रीशिवमहापुराण
[अ क ० ` ` ७
अथ सप्तदशोऽध्यायः
इन्द्रके स्मरण करनेपर कामदेवका उपस्थित होना, शिवको तपसे
विचलित करनेके लिये इन्द्रद्वारा कामदेबको भेजना
ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु देवेषु शक्रः सस्मार वै स्मरम्।
पीडितस्तारकेनाति दैत्येन च दुरात्मना॥ १
आगतस्तत्क्षणात्कामः सवसन्तो रतिप्रियः।
सावलेपो युतो रत्या त्रैलोक्यविजयी प्रभुः॥ २
प्रणामं च ततः कृत्वा स्थित्वा तत्पुरतः स्मरः।
महोन्नतमनास्तात साञ्जलिः शक्रमब्रवीत्॥ ३
काम उवाच
किं कार्य ते समुत्पन्नं स्मृतोऽहं केन हेतुना।
तत् त्वं कथय देवेश तत्कर्तुं समुपागतः॥ ४
ब्रह्मोवाच
तत्छुत्वा वचनं तस्य कंदर्पस्य सुरेश्वरः।
उवाच वचनं प्रीत्या युक्तं युक्तमिति स्तुवन्॥ ५
शक्र उवाच
तव साधु समारम्भो यन्मे कार्यमुपस्थितम्।
तत्कर्तुमुद्यतोऽसि त्वं धन्योऽसि मकरध्वज॥ ६
प्रस्तुतं श्ृणु मद्वाक्यं कथयामि तवाग्रतः।
मदीयं चैव यत्कार्यं त्वदीयं तन्न चान्यथा॥ ७
मित्राणि मम सन्त्येव बहूनि सुमहान्ति च।
परं तु स्मर सन्मित्र त्वत्तुल्यं न हि कुत्रचित्॥ ८
जयार्थं मे द्वयं तात निर्मितं वज्रमुत्तमम्।
वज्रं च निष्फलं स्याद्वै त्वं तु नैव कदाचन॥ ९
यतो हितं प्रजायेत ततः को नु प्रियः परः।
तस्मान्मित्रवरस्त्वं हि मत्कार्य कर्तुमर्हसि॥ १०
मम दुःखं समुत्पन्नमसाध्यं चापि कालजम्।
केनापि नैव तच्छक्यं दूरीकर्तुं त्वया विना॥ ११
ब्रह्माजी बोले--उन देवताओंके चले जा
दुरात्मा तारकासुरसे अत्यन्त पीडित हुए इन्र काम्न
स्मरण किया। उसी समय वसन्तको साथ लेका
रतिपति त्रैलोक्यविजयी समर्थ कामदेव रतिके साध
साभिमान वहाँ उपस्थित हुआ ॥ १-२॥
हे तात! प्रणाम करके उनके समक्ष खद
होकर हाथ जोड़कर वह महामनस्वी काम इनसे
कहने लगा-॥ ३॥
काम बोला-हे देवेश! आपको कौन-सा
कार्य आ पड़ा है, आपने किस कारणसे मेरा स्मरण
किया है, उसे शीघ्र ही कहिये, मैं उसे करनेके लिये
ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ॥ ४॥
ब्रह्माजी बोले-उस कामके इस वचाको
सुनकर बहुत अच्छा, बहुत अच्छा-यह कहकर
देवराज प्रेमपूर्वक यह बचन कहने लगे-॥५॥
इन्द्र बोले-मेरा जिस प्रकारका कार्य उपस्थित
हुआ है, उसको करनेमें तुम्हीं समर्थ हो, हे मकरध्वज!
तुम धन्य हो, जो उसे करनेके लिये उद्यत हो॥६॥
मेरे प्रस्तुत वाक्यको सुनो, मैं तुम्हारे सामा
कह रहा हूँ, मेरा जो कार्य है, वह तुम्हारा ही है
इसमें सन्देह नहीं है। मेरे बहुत-से महान् मित्र ह
किंतु हे काम! तुम्हारे समान उत्तम मित्र कहीँ भी तह
है॥ ७-८॥
हे तात! विजय प्राप्त करनेके लिये मेरे पास दो
ही उपाय हैं, एक वज्र और दूसरे तुम, जिसमें वर
तो [कदाचित्] निष्फल भी हो जाता है, किंतु ही
कभी निष्फल होनेवाले नहीं हो॥ ९॥
जिससे अपना हित हो, उससे प्रिय और कौर रै
सकता है ? इसलिये तुम मेरे सर्वश्रेष्ठ मित्र हो, £.
अवश्य ही मेरा कार्य सम्पन्न कर सकते हो ॥ १०
समयानुसार मेरे सामने असाध्य दुःख ब
गया है, तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी उसे दूर की
समर्थ नहीं है॥ ११॥
अ० १७]
दातुः परीक्षा दुर्भिक्षे रणे शूरस्य जायते।
आपत्काले तु मित्रस्याशक्तौ स्त्रीणां कुलस्य हि॥ १२
विनये संकटे प्रासेऽवितथस्य परोक्षतः।
सुस्नेहस्य तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम्॥ १३
प्राप्तायां वै ममापत्ताववार्यायां परेण हि।
परीक्षा च त्वदीयाद्य मित्रवर्य भविष्यति॥ १४
न केवलं मदीयं च कार्यमस्ति सुखाबहम्।
किं तु सर्वसुरादीनां कार्यमेतन्न संशयः॥ १५
ब्रह्मोवाच
इत्येतन्मघवद्वाक्यं श्रुत्वा तु मकरध्वजः।
उवाच प्रेमगंभीरं वाक्यं सुस्मितपूर्वकम्॥ १६
काम उवाच
किमर्थमित्थं वदसि नोत्तरं वच्म्यहं तव।
उपकृत्कृत्रिमं लोके दृश्यते कथ्यते न च॥ १७
सङ्कटे बहु यो ब्रूते स किं कार्य करिष्यति।
तथापि च महाराज कथयामि शृणु प्रभो॥ १८
पदं ते कर्षितुं यो वै तपस्तपति दारुणम्।
पातयिष्याम्यहं तं च शत्रुं ते मित्र सर्वथा॥ १९
क्षणेन भ्रंशयिष्यामि कटाक्षेण वरस्त्रियाः।
देवर्षिदानवादीश्च नराणां गणना न मे॥ २०
वज्र तिष्ठतु दूरे वै शस्तराण्यन्यान्यनेकशः।
किं ते कार्य करिष्यन्ति मयि मित्र उपस्थिते॥ २१
बरह्माणं वा हरिं वापि भ्रष्टं कुर्यां न संशयः।
अन्येषां गणना नास्ति पातयेयं हरं त्वपि॥ २२
पञ्चैव मृदवो बाणास्ते च पुष्पमया मम।
चापस्त्रिधा पुष्पमयश्शि्जिनी भ्रमरार्जिता॥ २३
बले सुदयिता मे हि संतः सचिवः स्मृतः।
अहे पञ्चबलो देव मित्रं मम सुधानिधिः॥ २४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५६५
दुर्भिक्ष पड्नेपर दानीकी, युद्धस्थलमें
शूरवीरकी, आपत्तिकालमें मित्रकी, असमर्थ होनेपर
स्त्रियोंकी तथा कुलकी, जम्रतामें तथा संकटके
उपस्थित होनेपर सत्यकी और उत्तम स्नेहकी परीक्षा
परोक्षकालमें होती है, यह अन्यथा नहीं है, यह सत्य
कहा गया है॥ १२-१३॥
हे मित्रवर्य! दूसरेके द्वारा दूर न की जा
सकनेवाली मेरी इस विपत्तिके आ पड्नेपर आज
तुम्हारी परीक्षा होगी ॥ १४॥
सुखको प्राप्ति करानेवाला यह कार्य केवल मेरा
ही नहीं है, अपितु यह सभी देवता आदिका कार्य है,
इसमें सन्देह नहीं है॥ १५॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार इन्द्रके इस वचनको
सुनकर कामदेव मुसकराते हुए प्रेमयुक्त वचन कहने
लगा-॥ १६॥
काम बोला--हे देवराज! आप इस प्रकारकी
बातें क्यों कर रहे हैं ? में आपको उत्तर नहीं दे सकता।
बनावटी मित्र ही लोकमें देखे जाते हैं, वास्तविक
उपकारीके विषयमें कुछ कहा नहीं जाता हैं ॥ १७॥
जो [मित्र] संकटमें बहुत बातें करता है, वह
क्या कार्य करेगा, फिर भी हे महाराज! हे प्रभो! में
कुछ कह रहा हूँ, उसे आप सुनें॥ १८॥
हे मित्र! जो आपका पद् छीननेके लिये कठोर
तपस्या कर रहा है, मैं आपके उस शत्रुको तपसे
सर्वथा च्युत कर दूँगा। चाहे वह देवता, ऋषि एवं
दानव आदि कोई हो, उसे क्षणभरमें सुन्दर स्त्रीके
कटाक्षसे भ्रष्ट कर दूँगा, फिर मनुष्योंकी तो मेरे सामने
कोई गणना ही नहीं है॥ १९-२०॥
आपके वज्र और अन्य बहुत-से शस्त्र दूर ही रहें।
मेरे-जैसे मित्रके रहते वे आपका क्या कार्य कर सकते
हैं। मैं ब्रह्मा तथा विष्णुको भौ विचलित कर सकता हूँ ।
[अधिक क्या कहूँ] मैं शंकरको भी भ्रष्ट कर सकता
हूँ, औरोंकी तो गणना ही नहीं है॥ २१-२२॥
मेरे पास पाँच ही कोमल बाण हैं और वे भी
पुष्पनिर्मित हैँ, तीन प्रकारवाला मेरा धनुष भी
पुष्पमय है, उसकी डोरी भ्रमरोसे युक्त है। मेरा बल
सुन्दर स्त्री है तथा वसन्त मेरा सचिव कहा गया है।
ह ६६
श्रीशिवमहापुराण
[3s ककल्ला य `
सेनाथिपश्च शृङ्गारो हावभावाश्च सैनिकाः।
सर्वे मे मृदवः शक्र अहं चापि तथाविधः॥ २५
यद्येन पूर्यते कार्य धीमांस्तत्तेन योजयेत्।
मम योग्यं तु यत्कार्यं सर्व तन्मे नियोजय॥ २६
ब्रह्मोवाच
इत्येवं तु वचस्तस्य श्रुत्वा शक्रः सुहर्षितः।
उवाच प्रणमन्वाचा कामं कांतासुखावहम्॥ २७
शक्र उवाच
यत्कार्यं मनसोद्दिष्टं मया तात मनोभव।
कर्त्तु तत् त्वं समर्थोऽसि नान्यस्मात्तस्य सम्भव: ॥ २८
शृणु काम प्रवक्ष्यामि यथार्थ मित्रसत्तम।
यदर्थे च स्पृहा जाता तव चाद्य मनोभव॥ २९
तारकाख्यो महादैत्यो ब्रह्मणो वरमद्भुतम्।
अभूतजेयः संप्राप्य सर्वेषामपि दुःखदः॥ ३०
तेन संपीड्यते लोको नष्टा धर्मा ह्ानेकश: ।
दुःखिता निर्जराः सर्वे ऋषयश्च तथाखिलाः॥ ३१
देवैश्च सकलैस्तेन कृतं युद्धं यथाबलम्।
सर्वेषां चायुधान्यत्र विफलान्यभवन्पुरा॥ ३२
भग्न: पाशो जलेशस्य हरिचक्रं सुदर्शनम्।
'तत्कुण्ठितमभूत्तस्य कण्ठे क्षिं च विष्णुना॥ ३३
एतस्य मरणं प्रोक्तं प्रजेशेन दुरात्मनः।
शम्भोर्वीयोद्भवाद्वालान्महायोगीश्वरस्य हि॥ ३४
एतत्कार्यं त्वया साधु कर्तव्यं सुप्रयत्ततः।
ततः स्यान्मत्रवर्याति देवानां नः परं सुखम्॥ ३५
ममापि विहितं तस्मात्सर्वलोकसुखावहम्।
मित्रधर्म हृदि स्मृत्वा कर्तुमर्हसि सांप्रतम्॥ ३६
शंभुः स गिरिराजे हि तपः परममास्थितः।
स॒ प्रभुर्नापि कामेन स्वतंत्रः परमेश्वरः । ३७
हे देव! इस प्रकार मैं पंचबल [पाँच बलोंबाला] द्
चन्द्रमा मेरा मित्र है, शृंगार मेरा सेनापति है और दा
भाव मेरे सैनिक हैं। हे इन्द्र! ये सभी मेरे उपक
मूदु हैं और मैं भी उसी प्रकारका हूँ ॥ २३-२५
जिससे जो कार्य पूर्ण हो, व्यक्ति
चाहिये कि उसको उसी कार्यमें नियुक्त करे। आ;
[हे इन्द्र!] मेरे योग्य जो भी कार्य हो, उसमें आ
मुझे नियुक्त करें ॥ २६॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] इस प्रकार उसके
वचनको सुनकर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो उठे औ
वाणीसे सत्कार करते हुए वे स्त्रयोंको सुख देनेवाते
कामसे कहने लगे ॥ २७॥
शक्र बोले--हे तात! हे कामदेव ! मैंने जो काई
[अपने] मनमें सोचा है, उसे करनेमें केवल तुम ही
समर्थ हो, वह कार्य दूसरेसे होनेवाला नहीं है॥ २८॥
हे काम! हे मित्रवर्य! हे मनोभव ! जिस कार्यके
लिये आज तुम्हारी आवश्यकता हुई है, उसे मैं यथा
रूपसे कह रहा हूँ, तुम उसे सुनो। इस समय तारक
नामक महादैत्य ब्रह्मासे अद्भुत वरदान पाकर अजेयहे
गया है और सभीको पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ २९-३०॥
बह सारे संसारको पीड़ा दे रहा है, [उसके
कारण] सभी धर्म भी नष्ट हो गये हैं, सभी देवता
तथा ऋषिगण दुःखित हैं ॥ ३१॥
देवताऑने अपने बलके अनुसार उससे युद्ध भी किष
किंतु सभीके शस्त्र उसके सामने व्यर्थ हो गये॥ ३९॥
वरुणका पाश टूट गया और विष्णुके ह
उसके कण्ठपर प्रहार किया गया, किंतु उनका व
सुदर्शन चक्र भी कुण्ठित हो गया । ब्रह्माजीने दुरी
दैत्यकी मृत्युका निर्धारण महायोगीश्वर शिवके
उत्पन्न हुए पुत्रके द्वारा किया है । अब तुम्हें
इस कार्यको अच्छी तरह करना चाहिये । हैं मित्र!
कार्यसे देवताओंको महान् सुख होगा॥ ३३-२
अतः तुम हृदयमें मित्रधर्मका स्मरण करके
लिये भी हितकर तथा सभी लोकोंको सुख दे
इस कार्यको इसी समय सम्पन्न करो॥ ३६॥
वे परमेश्वर प्रभु कामनासे परे हैं। वे श
परम तप कर रहे हैं॥ १
समय
अ० १८]
तत्समीपे च देवार्थं पार्वती स्वसखीयुता।
सेवमाना तिष्ठतीति पित्राज्ञसा मया श्रुतम्॥ ३८
यथा तस्यां रुचिस्तस्य शिवस्य नियतात्मनः।
जायेत नितरां मार तथा कार्य त्वया श्रुवम्॥ ३९
इति कृत्वा कृती स्यास्त्वं सर्व दु:खं विनड्क्ष्यति।
लोके स्थायी प्रतापस्ते भविष्यति न चान्यथा॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः स तु कामो हि प्रफुल्लमुखपंकजः।
प्रेणोवाचेति देवेशं करिष्यामि न संशयः॥ ४१
इत्युक्त्वा वचनं तस्मै तथेत्योमिति तद्वचः।
अग्रहीत्तरसा कामः शिवमायाविमोहितः॥ ४२
यत्र योगीश्वरः स्ाक्षात्तप्यते परमं तपः।
जगाम तत्र सुप्रीतः सदारः सवसन्तकः॥ ४३
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५६७
मैंने ऐसा सुना है कि उनके समीप ही पार्वती
अपने पितासे आज्ञा लेकर अपनी सखियोंके साथ
उन्हें प्रसन्नकर अपना पति बनानेके उद्देश्यसे सेवापरायण
रहती हैं ॥ ३८॥
है काम! इस प्रकारका उपाय करना चाहिये,
जिससे कि चित्तको वशमें रखनेवाले शिवजीकी
अभिरुचि पार्वतीमें हो जाय । ऐसा करके तुम कृतकृत्य
हो जाओगे और सारा दु:ख नष्ट हो जायगा। तुम्हारी
कीर्ति भी संसारमें चिरस्थायी हो जायगी, इसमें सन्देह
नहीं है॥ ३९-४० ॥
ब्रह्माजी बोले--इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर
कामदेवका मुखकमल खिल उठा और उसने
प्रेमपूर्वक इन्द्रसे कहा-मैं [आपका यह कार्य]
निःसन्देह करूँगा॥ ४१॥
शिवको मायासे मोहित कामदेवने उनके वचनको
“ओम्'-ऐसा कहकर शीप्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया।
तत्पश्चात् जहाँ साक्षात् योगीश्वर शंकर कठोर तप
कर रहे थे, वहाँ प्रसन्नचित्त होकर अपनी पत्नी तथा
वसन्तको साथ लेकर कामदेव पहुँच गया ॥ ४२-४३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
शक्रकामसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोउ ध्याय: ॥ १७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
इन्द्रकामदेवसंवादवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १७॥
— oo re
अथाष्टादशोऽध्यायः
कामदेवद्वारा असमयमें वसन्त-ऋतुका प्रभाव प्रकट करना, कुछ क्षणके लिये
शिवका मोहित होना, पुनः
ब्रह्मोवाच
तत्र गत्वा स्मरो गर्वी शिवमायाविमोहितः।
मोहकः स मधोश्चादौ धर्म विस्तारयन्स्थितः ॥ १
वसंतस्य च यो धर्म: प्रससार स सर्वतः।
तपःस्थाने महेशस्यौषधिप्रस्थे मुनीश्वर॥ २
वनानि च प्रफुल्लानि पादपानां महामुने।
आसन्विशेषतस्तत्र तत्प्रभावान्मुनीश्वर॥ ३
बैराग्य-भाव धारण करना
ब्रह्माजी बोले-शिवजीकी मायासे मोहित
होकर वह महाभिमानी तथा मोह उत्पन्न करनेवाला
काम शिवजीके समीप जाकर वसन्त-ऋतुके गुण-
धर्मको फैलाता हुआ वहाँ स्थित हो गया॥ १॥
हे मुनीश्वर! वसन्तका जो प्रभाव है, वह
महेशके तप:स्थान औषधिशिखरपर सभी ओर फैल
गया॥ २॥
हे महामुने! हे मुनीश्वर! वहाँ उसके प्रभावसे
पादपोंके वन विशेषरूपसे पुष्पित हो उठे॥ ३॥
के ६८
श्रीशिवमहापुराण
हु १, OOOO IS
पुष्पाणि सहकाराणामशोकवनिकासु वे।
विरेजुस्सुस्मरोह्दीपकराणि सुरभीण्यपि॥ ४
कैरवाणि च पुष्पाणि भ्रमराकलितानि च।
बभूवुर्मदनावेशकराणि च विशेषतः॥ ५
सुकामोद्दीपनकरं कोकिलाकलकूजितम्।
आसीदति सुरम्यं हि मनोहरमतिप्रियम्॥ ६
भ्रमराणां तथा शब्दा विविधा अभवम्मुने।
मनोहराश्च सर्वेषां कामोहीपकरा अपि॥ ७
चंद्रस्य विशदा कांतिर्विकीर्णा हि समन्ततः।
कामिनां कामिनीनां च दूतिका इव साभवत्॥ ८
मानिनां प्रेरणायासीत्तत्काले कालदीपिका।
मारुतश्च सुखः साधो ववौ विरहिणोऽप्रियः॥ ९
एवं वसंतविस्तारो मदनावेशकारकः।
वनौकसां तदा तत्र मुनीनां दुस्सहोऽत्यभूत्॥ १०
अचेतसामपि तदा कामासक्तिरभून्मुने।
सुचेतसां हि जीवानां सेति किं वर्ण्यते कथा॥ ११
एवं चकार स मधुः स्वप्रभावं सुदुस्सहम्।
सर्वेषां चैव जीवानां कामोहीपनकारकः॥ १२
अकालनिर्मितं तात मधोर्वाक्ष्य हरस्तदा।
आश्चर्य परमं मेने स्वलीलात्ततनुः प्रभुः॥ ९३
अथ लीलाकरस्तत्र तपः परमदुष्करम्
तताप स वशीशो हि हरो दुःखहरः प्रभुः १४
वसंते प्रसृते तत्र कामो रतिसमन्वितः।
चूतं बाणं समाकृष्य स्थितस्तद्वामपार्श्वंतः॥ १५
स्वप्रभावं वितस्तार मोहयन्सकलान् जनान्।
रत्या युक्तं तदा कामं दृष्ट्वा को वा न मोहितः॥ १६
एवं प्रवृत्तसुरतौ श्रृङ्गारोऽपि गणैः सह।
हावभावयुतस्तत्र प्रविवेश हरान्तिकम्॥ १७
अशोकको वाटिकाओंमें सहकारोंके कामोद
तथा सुगन्धित पुष्प विराजने लगे। भौरोंसे धिरे ह
कुमुदके पुष्प विशेषरूपसे कामावेशको नवक
हो गये॥ ४-५॥ क
[उस समय] कोयलोंका कलरव कामकर
अत्यधिक उद्दीप्त करनेवाला, सुरम्य, मनोहर और
अतिप्रिय हो गया॥ ६॥
हे मुने! भौंरोंक अनेक प्रकारके शब्द होने लगे
जो सबके मनको हर लेनेवाले तथा काम-वासनाको
उत्तेजित करनेवाले थे। चन्द्रमाकी मनोहर ज्योत्जा
चारों ओर फैल गयी, वह कामियों तथा कामिनियोंकी
दूतीके समान हो गयी। वह [ज्योत्स्ना] मानीजनोंको
रति आदिके लिये प्रेरित तथा रतिकालको और भी उद्देत
करनेवाली थी। हे साधो! [उस समय] विरहीजनके
लिये अप्रिय सुखकारी वायु बहने लगी॥ ७--९॥
इस प्रकार कामावेशको बढ़ानेवाला वह वसन्तका
विस्तार वहाँ वनमें रहनेवाले मुनियोंके लिये भी
अत्यन्त असह्य हो गया॥ १०॥
हे मुने! उस समय जड़ पदार्थोमें भी जब कामका
संचार होने लगा, तब सचेतन प्राणियोंकी कथाका कित
प्रकार वर्णन किया जाय। इस प्रकार सभी प्राणियोके
लिये कामको उद्दीप्त करनेवाले उस वसन्तने अपता
अत्यन्त दुस्सह प्रभाव उत्पन्न किया ॥ ११-१२॥
हे तात! तब अपनी लीलाके लिये शरीर धार
करनेवाले प्रभु शंकरे असमयमें उस वसन्तकें ्रभावको
देखकर इसे महान् आश्चर्य समझा॥ १३॥
इसके बाद लीला करनेवाले तथा दुःखहरं
करनेवाले परम संयमी प्रभु शिब परम दुष्कर तपस
करने लगे॥ १४॥
तदनन्तर वहाँ वसन्तके फैल जानेपर
वह काम आम्रमंजरीका बाण चढ़ाकर उनके बॉर्यी भ
खड़ा हो गया और प्राणियोंको मोहित करता हुआ
प्रभाव फैलाने लगा | उस समय रतिसहित
भला कौन [प्राणी] मोहित नहीं हुआ॥ १५१६
इस प्रकार उनके कामक्रीडामें प्रवृत्त हों जाती
शृंगार भी हाव-भावसे युक्त होकर अपने गणो
शिवजीके समीप पहुँचा॥ १७॥
अ० १८]
मदनः प्रकटस्तत्र न्यवसच्चित्तगो बहि:।
न दृष्टवांस्तदा शंभोश्छिद्रं येन प्रविश्यते॥ १८
यदा चाप्राप्तविवरस्तस्मिन्योगिवरे स्मर: ।
महादेवे तदा सोऽभून्महाभयविमोहितः॥ १९
|
ध्यानस्थं शंकरं को वा समासादयितुं क्षमः॥ २०
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सखीभ्यां संयुता शिवा।
जगाम शिवपूजार्थं नीत्वा पुष्पाण्यनेकशः॥ २१
पृथिव्यां यादृशं लोकैः सौन्दर्य वर्ण्यते महत्।
तत्सर्वमधिकं तस्यां पार्वत्यामस्ति निश्चितम्॥ २२
आर्तवाणि सुपुष्पाणि धृतानि च तया यदा।
तत्सौन्दर्यं कथं वर्ण्यमपि वर्षशतेरपि॥ २३
यदा शिवसमीपे तु गता सा पर्वतात्मजा।
तदैव शंकरो ध्यानं त्यक्त्वा क्षणमवस्थितः॥ २४
तच्छिद्रं प्राप्य मदनः प्रथमं हर्षणेन तु।
बाणेन हर्षयामास पार्श्वस्थं चन्द्रशेखरम्॥ २५
ृङ्गारैश्च तदा भावैः सहिता पार्वती हरम्।
जगाम कामसाहाय्ये मुने सुरभिणा सह॥ २६
तदैवाकृष्य तच्चापं रुच्यर्थ शूलधारिणः।
हुतं पुष्पशरं तस्मै स्मरोऽमुञ्जत्सुसंयतः॥ २७
यथा निरंतरं नित्यमागच्छति तथा शिवम्।
ते नमस्कृत्य तत्पूजां कृत्वा तत्पुरतः स्थिता॥ २८
सा दृष्टा पार्वती तत्र प्रभुणा गिरिशेन हि।
तदाङ्कानि स्त्रीस्वभावात्सुलजया॥ २९
शग
वरं तस्या विधिदत्तं पुरा प्रभु:।
वर्णयामास तदङ्कानि मुदा मुने॥ ३०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५६९
चित्तमें निवास करनेवाला कामदेव वहाँ बाहर
प्रकट हो गया, उस समय वह शंकरमें कोई छिद्र नहीं
देख पाया, जिससे वह प्रवेश कर सके॥ १८॥
जब कामदेवने उन योगिश्रेष्ठ महादेवमें छिद्र नहीं
पाया, तब वह महान् भयसे विमोहित हो गया॥ १९॥
धधकती हुई ज्चालावाली अग्निके समान
भालनेत्रसे युक्त ध्यानस्थ शंकरके पास जानेमें कौन
समर्थ है ?॥ २०॥
इसी समय पार्वती भी दो सखियोंके साथ अनेक
प्रकारके पुष्प लेकर शिवकी पूजा करनेके लिये वहाँ
पहुँच गयीं। लोग पृथिवीपर जिसःजिस प्रकारके
महान् सौन्दर्यका वर्णन करते हैं, वह सब तथा उससे
भी अधिक सौन्दर्य उन पार्वतीजीमें है॥ २१-२२॥
उन्होंने ऋतुकालीन सुन्दर पुष्पोंको धारण किया
था, उनकी सुन्दरताका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी कैसे
किया जा सकता है ! जिस समय वे पार्वती शिवजीके
समीप पहुँची, उस समय शिवजी क्षणभरके लिये
ध्यान त्यागकर अवस्थित हो गये॥ २३-२४॥
उस छिद्रको पाकर कामने पहले [अपने]
हर्षण नामक बाणसे समीपस्थ शंकरको हर्षित कर
दिया॥ २५॥
हे मुने! उस समय पार्वती भी श्रृंगार एवं भावोंसे
युक्त होकर मलयानिलके साथ [मानो] कामकी
सहायता करनेके लिये शिवके सन्निकट गयी हुई
थीं॥ २६॥
उसी समय कामदेवने शूलधारी शिवको [पार्वतीमें]
रुचि उत्पन्न करनेके लिये अपना धनुष खींचकर शीघ्र
ही बड़ी सावधानीसे उनपर पुष्प-बाण छोड़ा॥ २७॥
जिस प्रकार पार्वती नित्य निरन्तर शिवजीके
पास आती थीं, उसी प्रकार आकर उन्हें प्रणाम करके
उनकी पूजाकर वे उनके सामने खड़ी हो गयीं॥ २८॥
उस समय प्रभु शंकरने स्त्रीस्वभाववश
'लज्ञाके कारण अपने अंगोंको ढकती हुई उन पार्वतीको
वहाँ देखा॥ २९॥
हे मुने! पूर्व समयमें पार्वतीको ब्रह्मके द्वारा दिये
गये वरदानका भलीभाँति स्मरण करके प्रभु शिव भी
ग्रसन्ततापूर्वक उनके अंगोंका वर्णन करने लगे॥ ३०॥
जे 9०
श्रीशिवमहापुराण
[अर === = क यायाय ` सी
शिव उवाच
किं मुखं किं शशांकश्च किं जेत्रे चोत्पले च किम्।
भ्रुकुट्यो धनुषी चेते कंदर्पस्य महात्मनः॥ ३१
अधरः किं च बिंबं किं किं नासा शुकचंचुका।
किं स्वरः कोकिलालापः किं मध्यं चाथ वेदिका॥ ३२
किं गतिर्वण्यते ह्यस्याः किं रूपं वर्ण्यते मुहुः ।
पुष्पाणि किं च वर्ण्यन्ते वस्त्राणि च तथा पुन: ॥ ३३
'लालित्यं चारु यत्सृष्टौ तदेकत्र विनिर्मितम्।
सर्वथा रमणीयानि सर्वाङ्गानि न संशयः॥ ३४
अहो धन्यतरा चेयं पार्वत्यद्भुतरूपिणी।
एतत्समा न त्रैलोक्ये नारी कापि सुरूपिणी॥ ३५
सुलावण्यनिधिश्चेयमद्भुताङ्गानि बिभ्रती।
विमोहिनी मुनीनां च महासुखविवर्धिनी॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वर्णयित्वा तु तदङ्गानि मुषुर्मुहुः।
विधिदत्तवराध्यासाद्धरस्तु विरराम ह॥ ३७
हस्तं सस्त्रांते यावदचालयत शंकरः।
स्त्रीस्वभावाच्च सा तत्र लज्जिता दूरतो गता॥ ३८
विवृण्वती निजाङ्गानि पश्यंती च मुहुर्मुहुः।
सुवीक्षणैर्महामोदात्सुस्मिताभूच्छिवा मुने॥ ३९
एवं चेष्टां तदा दृष्ट्या शंभुमोहमुपागतः।
उवाच वचनं चैवं महालीलो महेश्वरः॥ ४०
अस्या दर्शनमात्रेण महानंदो भवत्यलम्।
यदालिङ्गनमेतस्याः कुर्या किन्तु 'ततः सुखम्॥ ४९
क्षणमात्रं विचार्येत्थं संपूज्य गिरिजां तत: ।
प्रबुद्धः स महायोगी सुविरक्तो जगाविति॥ ४२
किं जातं चरितं चित्रं किमहं मोहमागतः।
कामेन विकृतश्चाद्य भूत्वापि प्रभुरीश्वरः॥ ४३
ईश्वरोऽहं यदीच्छेयं पराङ्गस्पर्शनं खलु।
तर्हि कोऽन्योऽक्षमः क्षुद्रः किं किं नैव करिष्यति ४४
शिवजी बोले--यह मुख है या }
नेत्र हैं अथवा दो कमल और ये दोनों क
महात्मा कामदेवके धनुष, यह अधर है ह र्य
यह नासिका है या तोतेकी चोंच है, यह स्वर हेय
कोकिलकी मनोहर कूक है और यह मध्या
[कमर] है या वेदी है॥ ३१-३२॥
इसकी चालका कया वर्णन किया जाय, इसके
रूपका क्या वर्णन किया जाय और इसके पुष्पं तथा
वस्त्रोंका भी क्या वर्णन किया जाय!॥ ३३॥
सृष्टिमें जितनी उत्तम सुन्दरता है, वह एकत्रितक
इसमें रच दी गयी है। इसके सभी अंग सब प्रका
रमणीय हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३४॥
अहो! अद्भुत रूपवाली यह पार्वती धन्य है,
तीनों लोकोंमें इसके समान सुन्दर रूपवाली कोई भी
स्त्री नहीं है। अद्भुत अंगोंको धारण करनेवाली यह
लावण्यकी निधि है। यह मुनियोंको भी मोहनेवाली
और महासुखको बढानेवाली है ॥ ३५-३६॥
ब्रह्माजी बोलेइस प्रकार बार-बार उनके
अंगोंका वर्णन करके शिवजी ब्रह्माको दिये गये वरदानका
स्मरणकर मौन हो गये । उस समय ज्यों ही शंकरजीते
उनके वस्त्रोका स्पर्श किया, वे पार्वती स्त्रीस्वभावके
कारण लज्जित होकर कुछ दूर चली गयीं॥ ३७:३८॥
हे मुने! अपने अंगोंको छिपाती हुई तथा तीपण
कटाक्षोसे बार-बार [शिवजीकी ओर] देखती हुई वे
शिवा महामोदके कारण मुसकराने लगीं॥ ३९॥ ल
उनको इस चेष्टाको देखकर शंकरजी
पड़ गये और तब महान् लीला करनेवाले
यह वचन कहा--जब इसके दर्शनमात्रसे इतता अपि
आनन्द प्राप्त हो रहा है, तब यदि मैं इसका
प्राप्त करूँ तो कितना सुख प्राप्त होगा। इस
क्षणभर विचारकर गिरिजाकी प्रशंसा करके वे
बोधयुक्त हुए और विरक्त हो बोले- ॥ ४०-४१
यह कैसा विचित्र चरित्र हो गया ? क्या मैं
प्राप्त हो गया । प्रभु तथा ईश्वर होकर भी कामके gi
मैं विकारयुक्त हो गया। मैं ईश्वर हूँ और यदि र
अंगस्पर्शकी मेरी यह इच्छा है, तो अन्य अकष /
शुद्र पुरुष क्या-क्या [अनर्थ] नहीं करेगा॥ ४२
अ० १९]
एवं वैराग्यमासाद्य पर्यङ्कासादनं च तत्।
वारयामास सर्वात्मा परेशः किं पतेदिह॥ ४५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५७१
इस प्रकार वैराग्यभावको प्राप्तकर उन सर्वात्माने
पर्यंक एवं आसनका परित्याग कर दिया; क्योकि क्या
परमेश्वर पतित हो सकता है! ॥ ४५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे' कामकृतविकारवर्णनं नामाष्टादशोउ ध्याय: ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
कामकृतविकारवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८ ॥
अथेकोनविंशो$ध्याय:
भगवान् शिवकी नेत्रज्वालासे कामदेवका भस्म होना और रतिका विलाप,
देवताओंद्वारा रतिको सान्त्वना प्रदान करना और भगवान्
शिवसे कामको जीवित करनेकी प्रार्थना करना
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग किं जातं तदनन्तरम्।
कथय त्वं प्रसादेन तां कथां पापनाशिनीम्॥ ९
ब्रह्मोवाच
शरूयतां सा कथा तात यज्जातं तदनन्तरम्।
तब स्ेहात्प्रवक्ष्यामि शिवलीलां मुदाबहाम्॥ २
धैय॑स्य व्यसनं दृष्ट्वा महायोगी महेश्वरः।
विचिचिन्त मनस्येवं वरिस्मितोऽति ततः परम्॥ ३
शिव उवाच
किमु विघ्नाः समुत्पन्नाः कुर्वतस्तप उत्तमम्।
केन मे विकृतं चित्तं कृतमत्र कुकर्मिणा॥ ४
कुवर्णनं मया प्रीत्या परस्त्र्युपरि वै कृतम्।
जातो धर्मविरोधोउत्र श्रुतिसीमा विलंधिता॥ ५
विचित्य ब्रह्मोवाच
य महायोगी परमेशः सतां गतिः।
विलोकयामास परितः शंकितस्तदा॥ ६
वामभागे स्थितं कामं ददर्शाकृष्टबाणकम्।
अवशर क्षेपुकामं हि गर्वितं मूढचेतसम्॥ ७
ते दृष्ट्वा तादृशं कामं गिरीशस्य परात्मनः।
सेजातः क्रोधसंमर्दस्तत्क्षणादपि - नारद॥ ८
जारदजी बोले हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग!
इसके अनन्तर फिर क्या हुआ? आप मुझपर दयाकर
इस पापको विनष्ट करनेवाली कथाका पुनः वर्णन
कीजिये ॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-हे तात! इसके अनन्तर जो
हुआ, उसे आप सुनें। मैं आपके स्नेहवश आनन्ददायक
शिवलीलाका वर्णन करूँगा। [हे नारद!] उसके बाद
महायोगी महेश्वर [अपने] धैर्यके नाशको देखकर
अत्यन्त विस्मित हो मनमें इस प्रकार विचार करने
लगे॥ २-३॥
शिवजी बोले--मैं तो उत्तम तपस्या कर रहा
था, उसमें विघ्न कैसे आ गया! किस कुकमीने यहाँ
मेरे चित्तमें विकार पैदा कर दिया है! मैंने दूसरेकी
स्त्रीके विषयमें प्रेमपूर्वक निन्दित वर्णन किया। यह तो
धर्मका विरोध हो गया और शास्त्रमर्यादाका उल्लंघन
हुआ॥ ४-५॥
ब्रह्माजी बोले-तब सञ्जनोंके एकमात्र
रक्षक महायोगी परमेश्वर शिव इस प्रकार विचारकर
शंकित हो सम्पूर्ण दिशाओंको ओर देखने लगे।
इसी समय वामभागमें बाण खाँचे खडे हुए कामपर
उनकी दृष्टि पड़ी। वह मूढ़चित्त मदन अपनी शक्तिके
गर्वसे चूर होकर पुनः अपना बाण छोड्ना ही चाह
रहा था॥ ६-७॥
हे नारद! उस अवस्थामें कामपर दृष्टि पड़ते ही
परमात्मा गिरीशको तत्काल क्रोध उत्पन्न हो गया॥ ८॥
न ७२
श्रीशिवमहापुराण
[अ क `
कामः स्थितोऽन्तरिक्षे स धृत्वा तत्सशरं धनुः।
चिक्षेपास्त्रं दुर्निवारममोघं शंकरे मुने॥ ९
बभूवामोघमस्त्रं तु मोघं तत्परमात्मनि।
समशाम्यत्ततस्तस्मिन्संकरुद्धे परमेश्वरे॥ १०
मोघीभूते शिवे स्वेऽस्त्रे भयमापाशु मन्मथ: ।
चकम्पे च पुरः स्थित्वा दृष्ट्वा मृत्युंजयं प्रभुम्॥ ११
सस्मार त्रिदशान्सर्वान्शाक्रादीन्भयविह्वलः।
स स्मरो मुनिशार्दूल स्वप्रयासे निरर्थके॥ १२
कामेन सुस्मृता देवाः शक्राद्यास्ते मुनीश्वर।
आययुः सकलास्ते हि शंभुं नत्वा च तुष्टुवुः॥ १३
स्तुतिं कुर्वत्सु देवेषु क्रद्धस्याति हरस्य हि।
तृतीयात्तस्य नेत्राद्वै निस्ससार ततो महान्॥ १४
ललाटमध्यगात्तस्मात्सवह्निर्द्तसम्भव: |
जज्वालोर्ध्वशिखो दीप्तः प्रलयाग्रिसमप्रभ: ॥ १५
उत्पत्य गगने तूर्ण निपत्य धरणीतले।
श्रामं भ्रामं स्वपरितः पपात मेदिनीं परि॥ १६
भस्मसात्कृतवान्साधो मदनं तावदेव हि।
यावच्च मरुतां वाचः क्षम्यतां क्षम्यतामिति॥ १७
हते तस्मिन्स्मरे वीरे देवा दुःखमुपागताः।
* रूरुदुर्विह्ृलाश्चातिक्रोशंतः किमभूदिति १८
श्वेताङ्का विकृतात्मा च गिरिराजसुता तदा।
जगाम मंदिरं स्वं च समादाय सखीजनम्॥ १९
क्षणमात्रं रतिस्तत्र विसंज्ञा साभवत्तदा।
भर्तृमृत्युजदुःखेन पतिता सा मृता इव॥ २०
जातायां चैव संज्ञायां रतिरत्यंतविह्णला।
व्रिललाप तदा तत्रोच्चरन्ती विविधं वचः॥ २१
हे मुने! इधर, आकाशमें बाणसहित धनुष लेक,
खड़े हुए कामने भगवान् शंकरपर अपना दुर्निवार १
अमोघ अस्त्र छोड दिया। परमात्मा शिवपर ह
अमोघ अस्त्र व्यर्थ हो गया। कुपित हुए परे
पास जाते ही वह शान्त हो गया॥९-१०॥
तदनन्तर भगवान् शिवपर अपने अस्त्रके व्य
हो जानेपर मन्मथको बड़ा भय हुआ। भगवान्
मृत्युंजयको देखकर उनके सामने खड़ा होकर क
काँप उठा। हे मुनिश्रेष्ठ ! वह कामदेव अपने प्रयासके
निष्फल हो जानेपर भयसे व्याकुल होकर इन्र आदि
सभी देवताओंका स्मरण करने लगा॥ ११-१२॥
हे मुनीश्वर! कामदेवके स्मरण करनेपर वे इनर
आदि सब देवता आ गये और शम्भुको प्रणाम
उनकी स्तुति करने लगे॥ १३॥
देवता स्तुति करं 'ही रहे थे कि कुपित हुए
भगवान् शिवके ललाटके मध्यभागमें स्थित तृतीय
नत्रसे बड़ी भारी आगकी ज्वाला तत्काल प्रकट होक
निकली । वे ज्वालाएँ ऊपरकी ओर उठ रही थीं। बह
आग धू-धू करके जलने लगी। उसकी ज्योत
प्रलयाग्निके समान मालूम पड़ती थी॥ १४-१५॥
वह ज्वाला तत्काल ही आकाशमें उछलकर पृथ्वीम
गिरकर फिर अपने चारों ओर चक्कर कारती हुई कामदेव
जा गिरी। हे साधो! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये, ह
बात जबतक देवताओंने कही, तबतक उस
कामदेवको जलाकर राख कर दिया ॥ १६-१७॥
उस वीर कामदेवके मारे जानेपर देवता
बड़ा दुःख हुआ। वे व्याकुल होकर, यह क्या है
इस प्रकार कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करते ४
रोने-बिलखने लगे। उस समय घबरायी हुई पार्वती
समस्त शरीर सफेद पड़ गया और वे सखियोंकी सी
लेकर अपने भवनको चली गयीं। [कामदेवे
जानेपर] रति वहाँ क्षणभरके लिये अचेत हो गै
पतिके मृत्युजनित दु:खसे वह मरी हुईकी भाति पी
रही॥ १८--२०॥
[थोड़ी देरमें] चेतना आनेपर अत्यन्त ह
होकर वह रति उस समय तरह-तरहकी बातें
हुई विलाप करने लगी॥ २१॥
अ० १९]
रतिरुवाच
क्रिं करोमि क्व गच्छामि किं कृतं दैवतैरिह।
मत्स्वामिनं समाहूय नाशयामासुरुद्धतम्॥ २२
हा हा नाथ स्मर स्वामिन्प्राणप्रिय सुखप्रद।
इदं तु किमभूदत्र हा हा प्रिय प्रियेति च॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्थं विलपती सा तु वदन्ती बहुधा वचः।
हस्तौ पादौ तदास्फाल्य केशानत्रोटयत्तदा॥ २४
तद्विलापं तदा श्रुत्वा तत्र सर्वे वनेचराः।
अभवन्दुःखिताः सर्वे स्थावरा अपि नारद॥ २५
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवाः शक्रादयोऽखिलाः।
रतिमूचुः समाश्वास्य संस्मरन्तो महेश्वरम्॥ २६
देवा ऊचुः
किंचिद्धस्म गृहीत्वा तु रक्ष यलाद्भयं त्यज।
जीवयिष्यति स स्वामी लप्स्यसे त्वं पुनः प्रियम्॥ २७
सुखदाता न कोऽप्यस्ति दुःखदाता न कश्चन।
सर्वोऽपि स्वकृतं भुंक्ते देवान् शोचसि वै वृथा॥ २८
ब्रह्मोवाच
इत्याश्वास्य रतिं देवाः सर्वे शिवमुपागताः।
सूप्रसाद्य शिवं भक्त्या वचनं चेदमब्रुवन्॥ २९
देवा ऊचुः
भगवन् श्रूयतामेतद्वचनं नः शुभं प्रभो।
कृपां कृत्वा महेशान शरणागतवत्सल॥ ३०
सुविचारय सुप्रीत्या कृतिं कामस्य शंकर।
कामेनैतत्कृतं यत्र न स्वार्थ तन्महेश्वर॥ ३१
दुष्टेन पीडितेर्देवैस्तारकेणाखिलैर्विभो।
कर्म तत्कारितं नाथ नान्यथा विद्धि शंकर॥ ३२
रतिरेकाकिनी देव विलापं दुःखिता सती।
केरोति गिरिश त्वं च तामाश्वासय सर्वद॥ ३३
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५७३
रति बोली--मै क्या करूं? कहाँ जाऊँ ? देवताओंने
यह क्या किया, मेरे उद्धत स्वामीको बुलाकर उन्होंने
नष्ट करा दिया। हाय! हाय! हे नाथ! हे स्मर! हे
स्वामिन्। हे प्राणप्रिय! हे सुखप्रद! हे प्रिय! हे प्रिय!
यह यहाँ क्या हो गया?॥ २२-२३॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार रोती-बिलखती
और अनेक प्रकारकी बातें कहती हुई वह हाथ-पैर
पटककर सिरके बालोंको नोंचने लगी॥ २४॥
हे नारद! उस समय उसका विलाप सुनकर वहाँ
रहनेवाले समस्त वनवासी तथा सभी स्थावर प्राणी भी
दुखी हो गये। इसी बीच इन्द्र आदि समस्त देवता
महेश्वरका स्मरण करते हुए रतिको आश्वस्त करके
उससे कहने लगे--॥ २५-२६॥
देवता बोले--थोड़ा-सा भस्म लेकर उसे
यलपूर्वक रखो और भय छोड़ दो। वे स्वामी
महादेवजी [कामदेवको] जीवित कर देंगे और तुम
पतिको पुन: प्राप्त कर लोगी॥ २७॥
कोई न सुख देनेवाला है और न कोई दुःख ही
देनेवाला है। सब लोग अपनी करनीका फल भोगते
हैं। तुम देवताओंको दोष देकर व्यर्थ ही शोक
करती हो ॥ २८॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार रतिको समझा-
बुझाकर सब देवता भगवान् शिवके समीप आये और उन्हें
भक्तिसे प्रसन्न करके यह वचन कहने लगे-- ॥ २९॥
देवता बोले--हे भगवन्! हे प्रभो! हे महेशान!
हे शरणागतवत्सल! आप कृपा करके हमारे इस शुभ
वचनको सुनिये॥३०॥
हे शंकर! आप कामदेवके कृत्यपर भलीभाँति
अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक विचार कीजिये। हे महेश्वर!
कामने जों यह कार्य किया है, इसमें उसका कोई
स्वार्थ नहीं था॥ ३१॥
हे विभो! दुष्ट तारकासुरसे पीड़ित हुए सब
देवताओंने मिलकर उससे यह कार्य कराया है। हे
नाथ! हे शंकर! इसे आप अन्यथा न समझें॥ ३२॥
सब कुछ प्रदान करनेवाले हे देव! हे गिरिश!
साध्वी रति अकेली अति दुखी होकर विलाप कर रही
है, आप उसे सान्त्वना प्रदान कौजिये॥ ३३॥
न ७४
श्रीशिवमहापुराण
[अ २ या 5७ १
संहारं कर्तुकामोऽसि क्रोधेनानेन शंकर।
दैवतैः सह सर्वेषां हतवांस्तं यदि स्मरम्॥ ३४
दुःखं तस्या रतेर्दृष्ट्वा नष्टप्रायाश्र देवताः।
तस्मात्त्वया च कर्तव्यं रत्याश्शोकापनोदनम्॥ ३५
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां प्रसन्नो भगवान् शिवः।
देवानां सकलानां च वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३६
शिव उवाच
देवाश्च ऋषयः सर्वे मद्वचः श्ृणुतादरात्।
मत्कोपेन च यज्जातं तत्तथा नान्यथा भवेत्॥ ३७
अनङ्गस्तावदेव स्यात्कामो रतिपतिः प्रभुः।
यावच्चावतरेत्कृष्णो धरण्यां रुक्मिणीपतिः॥ ३८
द्वारकायां यदा स्थित्वा पुत्रानुत्पादयिष्यति।
'तदा कृष्णस्तु रुक्मिण्यां काममुत्पादयिष्यति॥ ३९
प्रद्युप्नं नाम तस्यैव भविष्यति न संशयः।
जातमात्रं तु तं पुत्रं शंबरः संहरिष्यति॥ ४०
हृत्वा प्रास्य समुद्रं तं शंबरो दानवोकत्तमः।
मृतं ज्ञात्वा वृथा मूढो नगरं स्वं गमिष्यति॥ ४१
तावच्च नगरं तस्य रते स्थेयं यथासुखम्।
तत्रैव स्वपतेः प्राप्तिः प्रद्युम्नस्य भविष्यति॥ ४२
तत्र कामो मिलित्वा तं हत्वा शम्बरमाहवे।
भविष्यति सुखी देवाः प्र्युम्नाख्यः स्वकामिनीम्॥ ४३
तदीयं चैव यद्. द्रव्यं नीत्वा स नगरं पुनः।
गमिष्यति तया सार्ध देवाः सत्यं वचो मम॥ ४४
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचः शंभोर्देवा ऊचुः प्रणम्य तम्।
किंचिदुच्छवसिताश्चित्ते करौ बद्ध्वा नताङ्गकाः॥ ४५
हे शंकर! यदि इस क्रोधके द्वारा आफ
कामदेवको मार डाला, तो हम यही समझेंगे कि.
देवताओंसहित समस्त प्राणियोंका अभी सहा
डालना चाहते हैं ॥ ३४॥ ४
उस रतिका दुःख देखकर देवता नष्टप्राय हे
गये है । इसलिये आपको रतिका शोक दूर कर देन
चाहिये ॥ ३५॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] उन सम्पू
देवताओंका यह वचन सुनकर भगवान् शिव प्रसन
हो गये और यह वचन कहने लगे-॥३६॥
शिवजी बोले--हे देवताओ और क्रुषियो!
आप सब आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये। मेरे क्रोधे
जो कुछ हो गया है, वह तो अन्यथा नहीं हो सकता
तथापि रतिका शक्तिशाली पति कामदेव तभीतक
अनंग रहेगा, जबतक रुक्मिणीपति श्रीकृष्णका धसीए
अवतार नहीं हो जाता॥ ३७-३८ ॥
जब श्रीकृष्ण द्वारकामें रहकर पुत्रोंको उत्पन क,
तब ये रुक्मिणीके गर्भसे कामको भी जन्म देंगे॥३९॥
उस कामका ही नाम [उस समय] प्रदयुम
होगा, इसमें संशय नहीं है। उस पुत्रके जन्म लेते ही
शम्बरासुर उसे हर लेगा। हरण करके दानवश्रेष्ठ मूर्
शम्बर उसे समुद्रमें फॅंककर और उसे मरा हुआ
जानकर वृथा ही अपने नगरको लौट जायगा | हे से!
तुम्हें उस समयतक शम्बरासुरके नगरमें सुखपूर्वक
निवास करना चाहिये, वहींपर तुम्हें अपने प
प्र्युम्नकी प्राप्ति होगी ॥ ४०-४२॥
हे देवताओ! वहाँ युद्धमें उस शम्बरासुरका व
करके कामदेव अपनी पत्लीको प्राप्त करके
होगा॥४३॥
हे देवताओ! प्रद्युम्न नामधारी वह की
शम्बरासुरका जो भी धन होगा, उसे लेकर उस रति
साथ [अपने] नगरमें जायगा, मेरा यह कथन सरव
सत्य होगा॥ ४४॥ र
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] शिवजीकी रा
बात सुनकर देवताओंके चित्तमें कुछ खा 5
और वे सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके
जोड़कर उनसे कहने लगे--॥ ४५॥
अ० २० ]
देवा ऊचुः
महादेव करुणासागर प्रभो।
शीघ्रं जीवय कामं त्वं रक्ष प्राणान् रतेहर॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यामरवचः प्रसन्नः
पुनर्बभाषे -करूणासागरः
शिव उवाच
हे देवाः सुप्रसन्नोऽस्मि जीवयिष्यामि चान्तरे।
काम: स मद्गणो भूत्वा विहरिष्यति नित्यशः ॥ ४८
नाख्येयमिदमाख्यानं कस्यचित्पुरतः सुराः।
गच्छत स्वस्थलं दुखं नाशयिष्यामि सर्वतः॥ ४९
परमेश्वरः।
सकलेश्वरः ॥ ४७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रो देवानां स्तुवतां तदा।
सर्वे देवाः सुप्रसन्ना बभूवुर्गतविस्मया: ॥ ५०
ततस्तां च समाश्वास्य रुद्रस्य वचने स्थिताः।
उक्त्वा वचस्तदीयं च स्वं स्वं धाम ययुर्मुने॥ ५१
कामपली समादिष्टं नगरं सा गता तदा।
प्रतीक्षमाणा तं कालं रुद्रादिष्टं मुनीश्वर॥ ५२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५७५
देवता बोले--हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणा-
सागर हे प्रभो! हे हर! आप कामदेवको शीघ्र जीवित
कर दीजिये तथा रतिके प्राणोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४६॥
ब्रह्माजी बोले--देवताओंकी यह बात सुनकर
सबके स्वामी करुणासागर परमेश्वर शिव प्रसन्न
होकर पुन: कहने लगे-॥ ४७॥
शिवजी बोले--हे देवताओ ! मैं बहुत प्रसन्न
हूँ, मैं कामको सबके हृदयमें जीवित कर दूँगा और
सदा मेरा गण होकर विहार करेगा॥ ४८॥
हे देवताओ! आपलोग इस आख्यानको किसीके
सामने मत कहियेगा, आपलोग अपने स्थानको जाइये, मैं
सब प्रकारसे [आपलोगोंके] दुःखका नाश करूँगा ॥ ४९ ॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर रुद्रदेव
देवताओंके स्तुति करते-करते ही अन्तर्धान हो गये । तब
सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न तथा सन्देहरहित हो गये ॥ ५० ॥
हे मुने! तदनन्तर रुद्रकी बातपर भरोसा करके
वे देवता रतिको आश्वासन देकर तथा उससे उनका
वचन कहकर अपने-अपने धामको चले गये। हे
मुनीश्वर! तब वह कामपत्नी शिवके बताये हुए
नगरको चली गयी तथा रुद्रके बताये गये समयकी
प्रतीक्षा करने लगी ॥ ५१-५२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे कामनाशवर्णतं नामैकोतरविंशोऽध्यायः ॥ १९॥
॥ इस प्रकार ्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
कामनाशवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
शिवकी क्रोधाग्निका वडवारूप-धारण और ब्रह्माद्वारा उसे समुद्रको समर्पित करना
नारद उवाच
विधे नेत्रसमुद्धृतवह्निज्वाला हरस्य सा।
गता कुत्र बद त्वं तच्चरितं शशिमौलिनः॥ १
ब्रह्मोवाच
यदा भस्म चकाराशु तृतीयनयनानलः।
: कामं प्रजज्वाल सर्वतो विफलस्तदा॥ २
हाहाकारो महानासीत्. त्रैलोक्ये सचराचरे।
शरणं मां ययुर्हुतम्॥ २
जारदजी बोले-हे विधे! भगवान् हर्के [तृतीय]
नेत्रसे निकली हुई वह अग्निकी ज्वाला कहाँ गयी ?
आप चन्द्रशेखरके उस चरित्रको कहिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] जब भगवान्
रुद्रके तीसरे नेत्रसे प्रकट हुई अग्निने कामदेवको शीघ्र
ही जलाकर राख कर दिया, उसके अनन्तर वह बिना
किसी प्रयोजनके ही सब ओर फैलने लगी॥ २॥
चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें महान्.
हाहाकार मच गया। हे तात! तब सम्पूर्ण देवता और
ऋषि शीघ्र ही मेरी शरणमें आये॥३॥
स
श्रीशिवमहापुराण
[अ० SN NE Ee लना ते tj
सर्वे निवेदयामासुस्तहुःखं मह्यमाकुलाः।
सुप्रणम्य सुसंस्तूय करो बद्ध्वा नताननाः॥ ४
तच्छुत्वाहं शिवं स्मृत्वा तद्धेतुं सुविमृश्य च।
गतस्तत्र विनीतात्मा त्रिलोकावनहेतवे॥ ५
संदग्धुकामः स शुचि््चालामालातिदीपितः।
स्तंभितोऽरं मया शंभुप्रसादाप्तसुतेजसा॥ ६
अथ क्रोधमयं वह्निं दग्धुकामं जगत्त्रयम्।
वाडवं तमकार्ष च सौम्यज्वालामुखं मुने॥ ७
तं वाडवतनुमहं समादाय शिवेच्छया।
सागरं समगां लोकहिताय जगतां पतिः॥ ८
आगतं मां समालोक्य सागरस्सांजलिर्मुने।
धृत्वा च पौरुषं रूपमागतः संनिधिं मम॥ ९
सुप्रणम्याथ मां सिंधुः संस्तूय च यथाविधि।
स मामुवाच सुप्रीत्या सर्वलोकपितामहम् १०
सागर उवाच
किमर्थमागतोऽसि त्वं ब्रह्मनत्राखिलाधिप।
तन्निदेशय सुप्रीत्या मत्वा मां च स्वसेवकम्॥ ११
अथाहं सागरवचः श्रुत्वा प्रीतिपुरस्सरम्।
प्रावोचं शंकरं स्मृत्वा लौकिकं हितमावहन्॥ १२
ब्रह्मोवाच
श्रृणु तात महाधीमन्सर्वलोकहितावह।
'वच्म्यहं प्रीतितः सिंधो शिवेच्छाप्रेरितो हृदा॥ १३
अयं क्रोधो महेशस्य वाडवात्मा महाप्रभुः ।
दग्ध्वा कामं द्रुतं सर्व दग्धुकामोऽभवत्ततः॥ १४
उन सबने व्याकुल होकर मस्तक झुकाकर ३ के
हाथ जोड़कर मुझे प्रणामकर विधिवत् मेरी
करके अपना दुःख निवेदन किया॥ ४॥ हि
उसको सुनकर शिवका स्मरणकर और उमे
व न तीनों
हेतुका भलीभाँति विचारकर ` लोकोंकी रङ्ग
करनेके लिये मैं विनीत भावसे वहाँ पहुँचा॥५॥
वह अग्नि ज्चालामालासे अत्यन्त उदव
हो जगत्को जला देनेके लिये उद्यत थी, परंतु
शिवकी कृपासे प्राप्त हुए उत्तम तेजके द्वारा मैंने उप
तत्काल स्तम्भित कर दिया॥ ६॥
हे मुने! मैंने त्रिलोकीको दग्ध करनेकी इच्छ
रखनेवाली उस क्रोधमय अग्निको सौम्य ज्चालामुखबाते
घोड़ेके रूपमें परिवर्तित कर दिया॥ ७॥
भगवान् शिवकी इच्छासे उस वाडव-शरीरवाली
अग्निको लेकर जगत्पति मैं लोकहितके लिये समुद्रके
पास गया॥ ८॥
हे मुने! मुझे आया हुआ देखकर समुद्र एक
दिव्य पुरुषका रूप धारण करके हाथ जोड़कर में
पास आया॥ ९॥
मुझ सम्पूर्ण लोकोंके पितामहकी भलीभाँ
स्तुति करके वह सिन्धु मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कह
'लगा-॥ १०॥
सागर बोला--हे ब्रह्मन्! हे सर्वेश्वर! आ!
यहाँ किसलिये आये हैं ? मुझे अपना सेवक सम
आप प्रीतिपूर्वक उसे कहिये॥ ११॥
सागरको बात सुनकर शंकरका स्मरण कफ
लोकहितका ध्यान रखते हुए मैं उससे
कहने लगा-॥ १२॥
ब्रह्माजी बोले-हे तात! हे महाबु
सम्पूर्ण लोकोंके हितकारी! हे सिन्धो! मैं सिव
इच्छासे प्रेरित हो हदयसे परीतिपूर्वक तुमसे की i
हूँ, सुनो॥ १३॥
यह महेश्वरका क्रोध है, जो महान् झि
अश्वके रूपमें यहाँ उपस्थित है। यह आमद
दग्ध करके शीघ्र सम्पूर्ण जगतको जला डाली
लिये उद्यत हो गया था॥ १४॥
अ० २१]
प्रार्थितो$हं सुरैः शीघ्रं पीडितैः शंकरेच्छया।
तत्रागत्य दरुतं तं वै तात स्तंभितवान् शुचिम्॥ १५
वाडवं रूपमाधत्त तमादायागतोउत्र ह।
निर्दिशामि जलाधार त्वामहं करुणाकर: ॥ १६
अयं क्रोधो महेशस्य वाडवं रूपमाश्रितः।
ज्वालामुखस्त्वया धार्यो यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १७
यदात्राहं समागम्य वत्स्यामि सरितां पते।
तदा त्वया परित्याज्यः क्रोधोऽयं शाङ्करोऽद्धुतः॥ १८
भोजनं तोयमेतस्य तव नित्यं भविष्यति।
यलादेवावधार्योऽयं यथा नोपेति चांतरम्॥ १९
इत्युक्तो हि मया सिंधुरंगीचक्रे तदा श्रुवम्।
ग्रहीतुं वाडवं वह्निं रौद्रं चाशक्यमन्यतः॥ २०
ततः प्रविष्टो जलधौ स वाडवतनुः शुचिः।
बायाँधान्सुदहंस्तस्य ज्चालामालाभिदीपितः॥ २१
ततः संतुष्टचेतस्कः स्वं धामाहं गतो मुने।
अन्तर्धानमगात्सिंधुर्दिव्यरूप: प्रणम्य माम्॥ २२
स्वास्थ्यं प्राप जगत्सर्व निर्मुक्तं तद्भवाद्भयात्।
देवा बभूवुः सुखिनो मुनयश्च महामुने॥ २३
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५७७
हे तात ! तब पीड़ित हुए देवताओंने शंकरकी इच्छासे
मेरी प्रार्थना की और मैंने शीघ्र वहाँ आकर अग्निको
स्तम्भित किया । फिर इसने घोड़ेका रूप धारण किया और
इसे लेकर मैं यहाँ आया । हे जलाधार! [ जगत्पर] दया
करनेवाला मैं तुम्हें यह आदेश दे रहा हूँ॥ १५-१६॥
महेश्वरके इस क्रोधको, जो घोड़ेका रूप धारण
करके मुखसे ज्वाला प्रकट करता हुआ खड़ा है, तुम
प्रलयकालपर्यन्त धारण किये रहो॥ १७॥
हे सरित्पते! जब मैं यहाँ आकर निवास करूँगा,
तब तुम शंकरके इस अद्भुत क्रोधको छोड़ देना॥ १८॥
तुम्हारा जल ही इसका प्रतिदिनका भोजन
होगा। तुम यलपूर्वक इसे धारण किये रहना, जिससे
यह अन्यत्र न जा सके॥ १९॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] इस प्रकार मेरे
कहनेपर समुद्रने [रुद्रके क्रोधाग्निरूप] वडवानलको
धारण करना स्वीकार किया, जो दूसरेके लिये
असम्भव था॥ २०॥
उसके अनन्तर वाडव शरीरवाली वह अग्नि
समुद्रमें प्रविष्ट हुई और ज्वालामालाओंसे प्रदीप्त हो
उस सागरकी जलराशिका दहन करने लगी॥ २१॥
हे मुने! तदनन्तर सन्तुष्टचित्त होकर मैं अपने
धामको चला आया और दिव्य रूपधारी वह समुद्र
मुझे प्रणाम करके अन्तर्धान हो गया । महामुने ! रुद्रकी
उस क्रोधाग्निके भयसे छूटकर सम्पूर्ण जगत् स्वस्थताका
अनुभव करने लगा और देवता तथा मुनिगण सुखी
हो गये॥ २२-२३॥
इत श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदरसंहितायाँ तृतीये पार्वतीखण्डे वडवानलचरितवर्णतं नाम विंशो5 ध्यायः ॥ २०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
वडवानलचरितवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
अथैकविंशोऽध्यायः
कामदेवके भस्म हो जानेपर पार्वतीका अपने घर आगमन, हिमवान् तथा मेनाद्वारा उन्हे
धैर्य प्रदान करना, नारदद्वारा पार्वतीको पंचाक्षर मन्नका उपदेश
विधे नारद उवाच
तात महाप्राज्ञ विष्णुशिष्य त्रिलोककृत्
कथा प्रोक्ता शंकरस्य महात्मनः॥ १
२०३;
२3 बाहर ण मा DAT Section 20-I-Front
नारदजी बोले--हे विधे! हे तात! हे
महाप्राज्ञ! हे विष्णुशिष्य! हे त्रिलोककर्ता! आपने
महात्मा शंकरकी यह विलक्षण कथा सुनायी।
५७८
श्रीशिवमहापुराण
[अ क 5 जा मन लइकल्कइकश. १
भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निना।
तस्मिन्प्रविष्ट जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः॥ २
किं चकार ततो देवी पार्वती कुधरात्मजा।
गता कुत्र सखीभ्यां सा तद्गदाद्य दयानिधे॥ ३
ब्रह्मोवाच
शृणु तात महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः।
महोतिकारकस्येव स्वामिनो मम चादरात्॥ ४
यदादहच्छंभुनेत्रोद्भवो हि मदनं शुचिः।
महाशब्दोऽद्भुतोऽभूद्रै येनाकाशः प्रपूरितः॥ ५
तेन शब्देन महता कामं दग्धं समीक्ष्य च।
सखीभ्यां सह भीता सा ययो स्वगृहमाकुला॥ ६
तेन॒ शब्देन हिमवान्परिवारसमन्वितः।
विस्मितोऽभूदतिक्लिषटः सुतां स्मृत्वा गतां तत: ॥ ७
जगाम शोकं शैलेशो सुतां दृष्ट्वातिविह्नलाम्।
रुदन्ती शंभुविरहादाससादाचलेशवरः॥ ८
आसाद्य पाणिना तस्या मार्जयन्नयनद्वयम्।
मा बिभीहि शिवेऽरोदीरित्युक्तवा तां तदाग्रहीत्॥ ९
क्रोडे कृत्वा सुतां शीघ्रं हिमवानचलेश्वरः।
स्वमालयमथानिन्ये सांत्वयन्नतिविह्वलाम्॥ १०
अंतर्हिते स्मरं दग्ध्वा हरे तद्विरहाच्छिवा।
विकलाभूद् भृशं सा वै लेभे शर्म न कुत्रचित् ॥ ११
पिवुर्गृहं तदा गत्वा मिलित्वा मातरं शिवा।
पुनर्जातं तदा मेने स्वात्मानं सा धरात्मजा॥ १२
निनिंद च स्वरूपं सा हा हत्तास्मीत्यथाब्रवीत्।
सखीभिर्बोधिता चापि न बुबोध गिरीन्द्रजा॥ १३
शिवके तृतीय नेत्रकी अग्निसे कामदेवके
जानेपर और [पुनः] उस अग्निके समुद्रम
जानेपर फिर क्या हुआ ?॥ १-२॥
तदनन्तर हिमालयपुत्री पार्वतीदेवीने
और वे अपनी दोनों सखियोंके साथ कहाँ गयी
दयानिधे! अब आप इसे बताइये ॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले-हे तात! हे महाप्रज्ञ!
आप महान् लीला करनेवाले मेरे स्वामी
चरित्रको आदरपूर्वक सुनिये। भगवान् शंकरके नेत्रे
उत्पन्न हुई अग्निने जब कामदेवको जला दिया, त
महान् अद्भुत महाशब्द प्रकर हुआ, जिससे आकाश
पूर्णरूपसे गूँज उठा॥ ४-५॥
उस महान् शब्दके साथ ही कामदेवको दाध
हुआ देखकर भयभीत और व्याकुल हुई पार्वती अणी
दोनों सखियोंके साथ अपने घर चली गयीं॥६॥
उस शब्दसे परिवारसहित हिमवान् भी बढ़े
आश्चर्यमें पड़ गये और वहाँ गयी हुई अपनी पुत्रीक
स्मरण करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ। [इतनेमें ही
पार्वती भी आ गयीं] । वे शम्भुके विरहसे रो रही थीं।
अपनी पुत्रीको अत्यन्त विह्ल देखकर शैल
हिमवानूको बड़ा शोक हुआ और वे शीघ्र ही उनके
पास पहुँचे। वे हाथसे उनकी दोनों आँखोंको पोंछक
बोले-हे शिवे! डरो मत, रोओ मत--ऐसा कही
उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद पर्वतराज हिमवार
अत्यन्त विहल हुई पुत्री पार्वतीको शीघ्र ही ग
उठा लिया और वे उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने |
ले आये॥७--१०॥
कामदेवका दाह करके महादेवजीके ह. |
हो जानेपर उनके विरहसे पार्वती अत्यन्त टो
गयीं और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल
थी॥११॥
पिताके घर जाकर जब वे अपनी मती
मिलीं, उस समय पार्वतीने अपना नया जरस 5
माना॥ १२॥
वे अपने रूपकी निन्दा करने लगीं और की
लगीं। हाय! मैं मारी गयी। सखियोंके १३
वे गिरिराजकुमारी कुछ समझ नहीँ पाती थी
भस है.
|
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2223 Shivmahapuranam_Part I_Section-20- अ
सर्वधा
अ० २१]
च पिबंती च सा स्नाती गच्छती शिवा ।
तिठठन्ती च सखीमध्ये न किंचित्सुखमाप ह॥ १४
थ्रक्स्वरूपं मदीयं च तथा जन्म च कर्म च।
इति ब्रुवंती सततं स्मरन्ती हरचेष्टितम्॥ १५
एवं सा पार्वती शंभुविरहात् क्लिष्टमानसा।
सुखं न लेभे किंचिद्वाब्रवीच्छिवशिवेति च॥ १६
निवसंती पितुर्गेहे पिनाकिगतचेतना।
शुशोचाथ शिवा तात मुमोह च मुषुर्मुहुः॥ १७
शैलाधिराजोऽप्यथ मेनकापि
मैनाकमुख्यास्तनयाश्च
सांत्वयामासुरदीनसत्त्वा
हरं विसस्मार तथापि नो सा॥ १८
अथ देवमुने धीमन्हिमवत्प्रस्तरे तदा।
नियोजितो बलभिदागमस्त्वं कामचारतः॥ १९
ततस्त्वं पूजितस्तेन भूधरेण महात्मना।
कुशलं पृष्टवांस्तं बै तदाविष्टो वरासने॥ २०
ततः प्रोवाच शैलेशः कन्याचरितमादितः।
हसेवान्वितं कामदहन॑ च हरेण ह॥ २९
सर्वे।
तां
शु्वावोचो मुने त्वं तु तं शैलेशं शिवं भज।
तमामंत्र्योदतिष्ठस्त्वं संस्मृत्य मनसा शिवम्॥ २२
तं समुत्सृज्य रहसि कालीं तामगमस्त्वरा।
ज्ञानी त्व॑ मुने शिववल्लभः॥ २३
आसाद्य कालीं संबोध्य तद्धिते स्थित आदरात्।
अवोचस्त्वं वचस्तथ्यं सर्वेषां ज्ञानिनां वरः॥ २४
नारद उवाच
पु कालि बचो मे हि सत्यं वच्मि दयारतः।
था ते हितकरं निर्विकारं सुकामदम्॥ २५
` २23 SIV abar oe वि की यया
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५७९
वे सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, चलते-
फिरते और सखियोंके बीचमें बैठते समय किंचिन्मात्र
भी सुखका अनुभव नहीं करती थीं। मेरे स्वरूप, जन्म
तथा कर्मको धिक्कार है--ऐसा कहती हुई वे सदा
महादेवजीकी प्रत्येक चेष्टाका चिन्तन करती रहती
था॥ १४-१५॥
इस प्रकार वे पार्वती भगवान् शिवके विरहसे
मन-ही-मन अत्यन्त क्लेशका अनुभव करतीं और
किंचिन्मात्र भी सुख नहीं पाती थीं, वे सदा शिव-शिव
कहा करती थीं॥ १६॥
पिताके घरमें रहकर भी वे चित्तसे पिनाकपाणि
भगवान् शंकरके पास पहुँची रहती थीं। हे तात!
शिवा शोकमग्न हो बारंबार मूच्छित हो जाती थीं॥ १७॥
शैलराज हिमवान्, उनकी पत्नी मेनका तथा उनके
मैनाक आदि सभी पुत्र, जो बड़े उदारचित्त थे, उन्हें
सदा सान्त्वना देते रहते थे तथापि वे भगवान् शंकरको
भूल न सकीं। हे बुद्धिमान् देवर्षे | तदनन्तर [एक दिन]
इन्द्रकी प्रेरणासे इच्छानुसार घूमते हुए आप हिमालय-
पर्वतपर पहुँचे । उस समय महात्मा हिमवानूने आपका
सत्कार किया। तब आप [उनके द्वारा दिये हुए] उत्तम
आसनपर बैठकर उनसे कुशल पूछने लगे ॥ १८--२० ॥
उसके बाद पर्वतराज हिमवानने अपनी कन्याके
चरित्रका आरम्भसे वर्णन किया कि किस तरह उसने
महादेवजीकी सेवा की और किस तरह हरके द्वारा
'कामदेवका दहन हुआ॥ २१॥
हे मुने! यह सब सुनकर आपने गिरिराजसे
कहा--हे शैलेश्वर! भगवान् शिवका भजन कीजिये।
फिर उनसे विदा लेकर आप उठे और मन-ही-मन
शिवका स्मरणकर शैलराजको छोड़कर शीघ्र ही
एकान्तमें कालीके पास आ गये। हे मुने! आप
लोकोपकारी, ज्ञानी तथा शिवके प्रिय भक्त हैं,
ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः कालीके समीप जाकर उसे
सम्बोधित करके उसीके हितमें स्थित हो उससे
यह वचन कहने लगे-॥ २२-२४॥
नारदजी बोले-हे कालि! तुम मेरी बात
सुनो। मैं दयावश यह सत्य बात कह रहा हूँ। मेरा
वचन तुम्हारे लिये सर्वथा हितकर, निर्दोष तथा उत्तम
५८०
श्रीशिवमहापुराण
[अ क क्क 0 0 ` १
सेवितश्च॒ महादेवस्त्वयेह तपसा विना।
गर्ववत्या 'यदध्वंसीद्दीनानुग्रहकारक: ॥ २६
विरक्तश्च स ते स्वामी महायोगी महेश्वर: ।
विसृष्टवान्स्मरं दग्ध्वा त्वां शिवे भक्तवत्सल: ॥ २७
तस्मात्त्वं सुतपोयुक्ता चिरमाराधयेश्वरम्।
तपसा संस्कृतां रुद्रः स द्वितीयां करिष्यति॥ २८
त्वं चापि शंकरं शम्भुं न त्यक्ष्यसि कदाचन।
नान्यं पतिं हठाद्ेवि ग्रहीष्यसि शिवादृते॥ २९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यवचस्ते हि मुने सा भूथरात्मजा।
किंचिदुच्छवसिता काली प्राह त्वां सांजलिर्मुदा॥ ३०
शिवोवाच
त्वं तु सर्वज्ञ जगतामुपकारकर प्रभो।
रुद्रस्याराधनार्थाय मंत्रं देहि मुने हि मे॥ ३१
न सिध्यति क्रिया कापि सर्वेषां सदुरुं विना।
मया श्रुता पुरा सत्यं श्रुतिरेषा सनातनी॥ ३२
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्याः पार्वत्या मुनिसत्तमः।
पंचाक्षरं शम्भुमन्त्रं विधिपूर्वमुपादिशः॥ ३३
अवोचश्च वचस्तां त्वं श्रद्धामुत्पादयन्मुने।
प्रभावं मन्त्रराजस्य तस्य सर्वाधिकं मुने॥ ३४
नारद उवाच
श्रृणु देवि मनोरस्य प्रभावं परमाद्भुतम्।
यस्य श्रवणमात्रेण शंकरः सुप्रसीदति॥ ३५
मंत्रोऽयं सर्वमंत्राणामधिराजश्च कामदः।
भुक्तिमुक्तिप्रदोऽत्यन्तं शंकरस्य महाप्रियः॥ ३६
सुभगे येन जप्तेन विधिना सोऽचिराद् दरुतम्।
आराधित स्ते प्रत्यक्षो भविष्यति शिवो ध्रुवम्॥ ३७
वस्तुओंको देनेवाला होगा। तुमने यहाँ
सेवा अवश्य की थी, परंतु बिना नव
होकर की थी। दीनोंपरं अनुग्रह करनेवाले कु
तुम्हारे उसी गर्वको नष्ट किया है। हे शिवे।
स्वामी महेश्वर विरक्त और महायोगी हैं, उन
कामदेवको जलाकर तुम्हें [सकुशल] छोड यि
है॥ २५--२७॥
इसलिये तुम उत्तम तपस्यामें निरत हे
चिरकालतक महेश्वरकी आराधना करो | तपस्या
द्वारा संस्कारयुक्त हो जानेपर रुद्रदेव तुम्हें अपनी भाय
अवश्य बनायेंगे और तुम भी कभी उन कल्याणका
शम्भुका परित्याग नहीं करोगी। हे देवि ! तुम हठपू्क
शिवजीके अतिरिक्त किसी दूसरेको पतिरूपमें सीरा
नहीं करोगी॥ २८-२९ ॥ |
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! आपकी यह बात सुनक
गिरिराजकुमारी काली कुछ उच्छास लेती हुई हा
जोड़कर आपसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगीं--॥ ३०॥
शिवा बोलीं--हे सर्वज्ञ! जगतका उपका
करनेवाले हे प्रभो! हे मुने! रुद्रदेवकी आराधे
लिये मुझे किसी मन्त्रका उपदेश कीजिये; क्योंकि
सद्गुरुके बिना किसीकी कोई भी क्रिया सिद्ध कं
होती--ऐसा मैंने सुन रखा है और यही सनातन शत
भी है॥ ३१-३२॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! पार्वतीका यह वर्ष
सुनकर आप मुनिश्रेष्ठने पंचाक्षर मन्त्र [नमः रिवर
का उन्हें विधिपूर्वक उपदेश दिया और हे मु
मन्त्रराजमें श्रद्धा उत्पन्न करनेहेतु आपने उसका सब
अधिक प्रभाव बताया। हे मुने! आपने उनसे
वचन कहा--॥ ३३-३४॥
नारदजी बोले--हे देवि! इस मतके अर,
अद्धुत प्रभावको सुनो, जिसके सुननेमात्रसे शंकर
प्रसन्न हो जाते हैं। यह मन्त्रराज सब मत्री कं
मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला, शंकरको बहुत री
तथा साधकको भोग और मोक्ष देनेवाला हैं॥ २ त
हे सौभाग्यशालिनि | इसका विधिपूर्वक ज
तुम्हारे द्वारा आराधित हुए भगवान् शिव अवर
५
शीघ्र ही तुम्हारी आँखोंके सामने प्रकट हो जाये १
2 i
2223 Shivmahapuranam. part L-Section205 7 0
अ० २२]
च तद्रूपं नियमस्था शराक्षरम्।
जप मतत्रं शिवे त्वं हि संतुष्यति शिवो द्रुतम्॥ ३८
कुरु तपः साध्वि तपःसाध्यो महेश्वर: ।
तपस्येव फलं सवै प्राप्यते नान्यथा क्वचित् ॥ ३९
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा तदा कालीं नारद त्वं शिवप्रियः।
यादृच्छिकोऽगमस्त्वं तु स्वर्ग देवहिते रतः॥ ४०
पार्वती च तदा श्रुत्वा वचनं तव नारद।
सुप्रसन्ना तदा प्राप पंचाक्षरमनूत्तमम्॥ ४१
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५८१
हे शिवे! नियमोंमें तत्पर रहकर उनके स्वरूपका
चिन्तन करती हुई तुम पंचाक्षर मन्त्रका जप करो,
इससे शिव शीघ्र ही सन्तुष्ट होंगे॥ ३८॥
हे साध्वि! इस प्रकार तुम तपस्या करो, क्योंकि
तपस्यासे महेश्वर बशमें हो सकते हैं? तपस्यासे
ही सबको मनोनुकूल फलकी प्राप्ति होती है, अन्यथा
नहीं॥ ३९॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! कालीसे इस प्रकार
कहकर भगवान् शिवके प्रिय [भक्त], इच्छानुसार
विचरण करनेवाले तथा देवताओंके हितमें तत्पर
रहनेवाले आपने स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। हे
नारद! तब आपकी बातको सुनकर पार्वती बहुत
प्रसन्न हुईं; क्योंकि उन्हें परम उत्तम पंचाक्षर मन्त्रराजकी
प्राप्ति हो गयी थी॥ ४०-४१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे नारदोपदेशो नामैकविंशोउ ध्याय: ॥ २९॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
नारदोपदेशवर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
पार्वतीकी तपस्या एवं उसके प्रभावका वर्णन
ब्रह्मोवाच
त्वयि देवमुने याते पार्वती हृष्टमानसा।
तपःसाध्यं हरं मेने तपोऽर्थं मन आदधे॥ १
ततः सख्यौ समादाय जयां च विजयां तथा।
मातरं पितरं चैव सखीभ्यां पर्यपृच्छत॥ २
प्रथमं पितरं गत्वा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
पर्यपूच्छत्सुप्रणम्य विनयेन समन्विता॥ ३
सख्यावूचतुः
हिमवन् शूयता पुत्रीबचनं कथ्यतेऽधुना।
स्वयं चैव देहस्य रूपस्यापि तथा पुनः॥ ४
*वतो हि कुलस्यास्य साफल्यं कर्तुमिच्छति।
पसा साधनीयोऽसौ नान्यथा दृश्यतां व्रजेत्॥ ५
ब्रह्माजी बोले--हे देवर्षे! आपके चले जानेपर
प्रसन्नचित्त पार्वतीने शिवजीको तपस्यासे ही साध्य
माना और तपस्या करनेका मन बना लिया । तदनन्तर
पार्वतीने अपनी जया एवं विजया नामक सखियोंके
द्वारा अपनी माता मेना तथा पिता हिमालयसे तप
करनेकी आज्ञा माँगी॥ १-२॥
उन दोनों सखियोंने सबसे पहले पर्वतराज
हिमालयके पास जाकर जम्रतापूर्वक भक्तिभावसे
प्रणामकर पूछा--॥ ३॥
सखियाँ बोलीं--हे हिमालय! आपको पुत्री
पार्वती, जो आपसे कुछ कहना चाह रही है, उसे
सुनिये। यह आपकी पुत्री अपने शरीर, रूप तथा
आपके कुलको [भगवान्शंकरकी आराधनासे] सफल
बनाना चाहती है। वे शंकर तपस्यासे ही साध्य हैं,
अन्य उपायसे उनका दर्शन सम्भव नहीं है ॥ ४-५॥
के ८२
श्रीशिवमहापुराण
[अ ककत वकक याला 00
तस्माच्च पर्वतश्रेष्ठ देयाज्ञा भवताधुना।
तपः करोतु गिरिजा वनं गत्वेति सादरम्॥ ६
ब्रह्मोवाच
इत्येवं च तदा पृष्टः सखीभ्यां मुनिसत्तम।
पार्वत्या सुविचार्याथ गिरिराजोऽब्रवीदिदम्॥ ७
हिमालय उवाच
मह्यं च रोचतेऽत्यर्थं मेनाये रुच्यतां पुनः।
यथेदं भवितव्यं च किमतः परमुत्तमम्॥ ८
साफल्यं तु मदीयस्य कुलस्य च न संशयः।
मात्रे तु रुच्यते चेद्वै ततः शुभतरं नु किम्॥ ९
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं पित्रा प्रोक्तं श्रुत्वा तु ते तदा।
जग्मतुर्मातरं सख्यौ तदाज्ञसे तया सह॥ १०
गत्वा तु मातरं तस्याः पार्वत्यास्ते च जारद।
सुप्रणम्य करौ बध्वोचतुर्वचनमाद्रात्॥ १९
सख्यावूचतुः
मातस्त्वं वचनं पुत्र्याः श्रृणु देवि नमोऽस्तु ते।
सुप्रसन्नतया तद्वै श्रुत्वा कर्तुमिहाहसि॥ १२
तप्तुकामा तु ते पुत्री शिवार्थं परमं तप: ।
प्राप्तानुज्ञा पितुश्चैव तुभ्यं च परिपृच्छति॥ १३
इयं स्वरूपसाफल्यं कर्तुकामा पतिव्रते
त्वदाज्ञा यदि जायेत तप्यते च तथा तपः॥ १४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा च तत: सख्यो तृष्णीमास्तां मुनीश्वर।
नाङ्गीचकार मेना सा तद्वाक्यं खिन्नमानसा॥ १५
ततः सा पार्वती प्राह स्वयमेवाथ मातरम्।
करौ बद्ध्वा विनीतात्मा स्मृत्वा शिवपदांबुजम्॥ १६
पार्वत्युवाच
मातस्तप्तुं गमिष्यामि प्रातः प्राप्तुं महेश्वरम्।
अजुजानीहि मां गन्तुं तपसेऽद्य तपोवनम्॥ १७
हे गिरिराज! इसलिये आपको इसी समय आप
प्रदान करनी चाहिये, जिससे गिरिजा बनें जाकर
आदरपूर्वक तपस्या करे ॥ ६॥ ५
ब्रह्माजी बोले--हे मुनिश्रेष्ठ।
सखियोंके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर
भलीभाँति विचारकर यह कहने लगे--॥७॥
हिमालय बोले--मुझे तो यह बात अच्छे
लगती है, परंतु यदि पार्वतीकी माताको यह ब्र
अच्छी लगे तो ऐसा ही होना चाहिये। यदि ऐसा हे
तो इससे बढ़कर और कया बात हो सकती है॥८|
यदि पार्वतीकी माताको यह बात रुचिकर लगे, ते
इसमें हम तथा हमारा कुल दोनों ही धन्य हो जायँगे। झामे
बढकर और शुभकारक कौन-सी उत्तम बात होगी॥९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार दोनों सखि
पार्वतीके पिताके वचनको सुनकर पार्वतीकी मातासे
आज्ञा लेनेके लिये उनके साथ वहाँ गयीं । हे नारद!
पार्बतीकी माताके पास जाकर प्रणामकर हाथ जोड़कर
आदरपूर्वक उनसे यह वचन कहने लगीं-- ॥ १०-११॥
सखियाँ बोलीं--हे देवि! आपको नमस्कार
है। हे मातः! आप पार्वतीके वचनको सुनें और उपे
सुनकर प्रसनतापूर्वक स्वीकार करें॥ १२॥
आपकी यह पुत्री शिवजीको प्राप्त करे]
तपस्या करना चाहती है। इसे तप करनेकी आज्ञा पितरे
प्राप्त हो गयी है। अब आपसे पूछ रही है॥ १३॥
हे पतिव्रते! यह [उत्तम पति प्राप्त करे]
अपने स्वरूपको सफल बनाना चाहती है, अतः
आपकी आज्ञा हो, तो यह तपस्या करे॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! इस प्रकार क
सखियाँ चुप हो गयीं। मेना [यह बात सुते *
खिन्न मनवालौ हो गयीं और उन्होंने इस जाति
अस्वीकार कर दिया। तब वे पार्वती शिव
चरणकमलोंका ध्यानकर हाथ जोड़कर
होकर अपनी मातासे स्वयं कहने लगीं-- ॥ १४
पार्वती बोलीं--हे मातः! मैं
करनेके लिये प्रातःकाल तपस्याहेतु तपौ
चाहती हूँ, अतः आप मुझे जानेके लिये
आज्ञा प्रदान कीजिये॥ १७॥
१६॥
अ० २२]
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचः पुत्र्या मेना दु:खमुपागता।
सोपाहूय तदा पुत्रीमुबाच विकला सती॥ १८
मेनोवाच
दुःखितासि शिवे पुत्रि तपस्तप्तुं पुरा यदि।
तपश्चर गृहेऽद्य त्वं न बहिर्गच्छ पार्वति॥ १९
कुत्र यासि तपः कर्तु देवाः सन्ति गृहे मम।
तीर्थानि च समस्तानि क्षेत्राणि विविधानि च॥ २०
कर्तव्यो न हठः पुत्रि गंतव्यं न बहिः क्वचित्।
साधितं किं त्वया पूर्व पुनः किं साधयिष्यसि॥ २१
शरीरं कोमलं वत्से तपस्तु कठिनं महत्।
एतस्मात्तु त्वया कार्य तपोऽत्र न बहिब्रज॥ २२
स्त्रीणां तपोवनगतिर्न श्रुता कामनार्थिनी।
तस्मात्तं पुत्रि मा कार्षी: तपोऽर्थं गमनं प्रति॥ २३
ब्रह्मोवाच
इत्येवं बहुधा पुत्री तन्मात्रा विनिवारिता।
संवदे न सुखं किंचिद्विनाराध्य महेश्वरम्॥ २४
तपोनिषिद्धा तपसे बनं गन्तुं च मेनया।
हेतुना तेन सोमेति नाम प्राप शिवा तदा॥ २५
अध तां दुःखितां ज्ञत्वा मेना शैलप्रिया शिवाम्।
निदेशं सा ददौ तस्याः पार्वत्यास्तपसे मुने॥ २६
मातुराज्ञां च संप्राप्य सुव्रता मुनिसत्तम।
तत: स्वांते सुखं लेभे पार्वती स्मृतशंकरा॥ २७
मातरं पितरे साथ प्रणिपत्य मुदा शिवा।
पखीभ्यां च शिवं स्मृत्वा तपस्तप्तुं समदरता ॥ २८
हिरा मतान्यनेकानि वस्त्राणि विविधानि च।
धृतान्याशु मौज्जीं बदध्वा तु शोभनाम्॥ २९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५८३
ब्रह्माजी बोले-पुत्रीकी यह बात सुनकर मेना
दुखी हो गयीं और विकल होकर पुत्रीको अपने पास
बुलाकर कहने लगीं ॥ १८॥
मेना बोलीं -हे शिवे! हे पुत्रि! यदि तुम दुखी
हो और तपस्या करना चाहती हो, तो घरमें ही तपस्या
करो, हे पार्वति! अब बाहर मत जाओ॥ १९॥
जब मेरे घरमें ही सब देवता, तीर्थ तथा समस्त
क्षेत्र विद्यमान हैं, तो तप करनेके लिये तुम अन्यत्र
कहाँ जा रही हो? हे पुत्रि! तुम हठ मत करो और
न तो कहीं बाहर जाओ। तुमने पहले क्या सिद्ध कर
लिया और अब क्या सिद्ध करोगी ? हे वत्से! तुम्हारा
शरीर कोमल है और तपस्या तो बड़ा कठिन कार्य
है। इसलिये तुम यहीं तपस्या करो। कहीं बाहर मत
जाओ॥२०-२२॥
मनोकामनाकी पूर्तिके लिये स्त्रियोंक वन जानेकी
बात तो मैंने नहीं सुनी है, इसलिये हे पुत्रि! तपस्या
करनेके लिये वनगमनका विचार मत करो॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार उनकी माताने
अनेक प्रकारसे पुत्रीको बन जानेके लिये मना किया,
किंतु शंकरजीकी आराधनाके बिना कहीं भी उन
पार्वतीको शान्ति नहीं मिली॥ २४॥
मेनाने बार-बार तपस्याके निमित्त वन जानेसे
उन्हें रोका, इसी कारणसे शिवाने 'उमा' नाम प्राप्त
किया॥ २५॥
हे मुने! इसके बाद तपस्याकी अनुमति न
मिलनेसे उन शिवाको दुखी जानकर शैलप्रिया मेनाने
पार्वतीको तप करनेके लिये आज्ञा प्रदान कर दी ॥ २६॥
हे मुनिश्रेष्ठ! माताकी आज्ञा पाकर उत्तम
ब्रतवाली पार्वतीने शंकरका स्मरण करते हुए अपने
मनमें बड़े सुखका अनुभव किया ॥ २७॥
तदनन्तर शिवा माता-पिताको प्रसन्नतापूर्वक
प्रणामकर अपनी दोनों सखियोंको साथ लेकर
'शिवजीका स्मरण करके तपस्या करनेके लिये वनकी
ओर चलीं॥ २८॥
उन्होंने अनेक प्रकारके विचारों, प्रिय वस्तुओं
तथा नाना प्रकारके वस्त्रोंका परित्यागकर मौंजी,
मेखला बाँधकर सुन्दर वल्कलको धारण कर लिया
र ८
श्रीशिवमहापुराण
[अ ल््त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्च्त्त ल प णा च्य बय रे |
हित्वा हारं तथा चर्म मृगस्य परमं धृतम्।
जगाम तपसे तत्र गङ्गावतरणं प्रति॥ ३०
शंभुना कुर्वता ध्यानं यत्र दग्धो मनोभवः।
गङ्गावतरणो नाम प्रस्थो हिमवतः स च॥ ३१
हरशून्योऽथ ददृशे स प्रस्थो हिमभूभृतः ।
काल्या तत्रेत्य भोस्तात पार्वत्या जगदम्बया॥ ३२
यत्र स्थित्वा पुरा शंभुः तप्तवान्दुस्तरं तप: ।
तत्र क्षणं तु सा स्थित्वा बभूव विरहार्दिता॥ ३३
हा हरेति शिवा तत्र रुदन्ती सा गिरेः सुता।
विललापातिदुःसखार्ता चिन्ताशोकसमन्विता॥ ३४
ततश्रिरेण सा मोहं धैर्यात्संस्तभ्य पार्वती ।
नियमायाभवत्तत्र दीक्षिता हिमवत्सुता॥ ३५
तपश्चकार सा तत्र श्रृंगितीर्थ महोत्तमे।
गौरीशिखर नामासीत्तत्तपःकरणाब्द्धि तत्॥ ३६
सुंदराश्च द्रुमास्तत्र पवित्राश्शिवया मुने।
आरोपिताः परीक्षार्थं तपसः फलभागिनः॥ ३७
भूमिशुद्धिं ततः कृत्वा वेदीं निर्माय सुंदरी।
तथा तपः समारब्धं मुनीनामपि दुष्करम्॥ ३८
विगृह्य मनसा सर्वाणीन्द्रियाणि सहाशु सा।
समुपस्थानिके तत्र चकार परमं तपः॥ ३९
ग्रीष्मे च परितो वहि प्रज्चलन्तं दिवानिशम्।
कृत्वा तस्थौ च तन्मध्ये सततं जपती मनुम्॥ ४०
सततं चैव वर्षासु स्थंडिले सुस्थिरासना।
शिलापृष्ठे च संसिक्ता बभूव जलधारया॥ ४१
शीते जलांतरे शश्वत्तस्थौ सा भक्तितत्परा।
अनाहारातपत्तत्र नीहारेषु निशासु च॥ ४२
एवं तपः प्रकुर्वाणा पंचाक्षरजपे रता।
दध्यौ शिवं शिवा तत्र सर्वकामफलप्रदम्॥ ४३
और बहुमूल्य हार उतारकर मृगचर्म धारण
लिया। इसके बाद वे तपस्या करनेके लिये ग
नामक स्थानपर चली गयीं॥ २९-३०॥
ध्यान करते हुए शंकरने जहाँ कामदेवको जतक्ष
भस्म कर दिया था, वही हिमालयका गंगावतरण नमन
शिखर है। हे तात! काली हिमवत्प्रदेशके शि
स्थित उसी गंगावतरण नामक स्थानपर गयीं और
पार्वती कालौने उसे शिवजीसे रहित देखा॥ ३१.३)
जहाँ स्थित रहकर शिवजीने अत्यन्त कठिन त.
किया था, उस स्थानपर जाकर वे क्षणभरके हि
शिवविरहसे व्याकुल हो उठीं। उस समय वे ह्न
शंकर! इस प्रकार कहकर रोती हुई चिन्ता त्य
शोकसे युक्त होकर अत्यन्त दु:खित हो विलाप कले
लगीं॥ ३३-३४॥
इसके अनन्तर बहुत समयके बाद हिमालयपुतर
पार्वती धैर्यपूर्वक मोहका त्याग करके नियममें दीक्षि
हुई॥ ३५॥
वे उस महान् उत्तम शृंगी तीर्थमें तपस्या के
'लगीं। उस स्थानमें गौरीके तपस्या करनेके काण
उसका गौरीशंकर-ऐसा नाम पड़ा॥ ३६॥
हे मुने! वहाँ पार्वतीने अपनी तपस्याकी
परीक्षाके लिये अनेक प्रकारके पवित्र, सुन्दर प
फलवान् वृक्ष लगाये। उन सुन्दरीने भूमिशुद्धि भ
चेदीका निर्माण करके मनके साथ समस्त इदयं
रोककर उसी स्थानपर मुनियोंके लिये भी कर्णि
तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३७-३९॥
वे ग्रीष््कालमें दिन-रात अग्नि प्रज्वलितक
उसके बीचमें बैठकर पंचाग्नि तापती हुई
महामन्त्रका जप करती थीं॥ ४०॥
वे वर्षाके समय पत्थरकी च्यावर
सुस्थिर आसन लगाकर बैठी हुई खु का
नीचे जलकी धारा सहन करतीं और ल
होकर निराहार रहकर वे शीतकालकी प
निरन्तर शीतल जलमें निवास करतीं ॥ ४१४ त
इस प्रकार पंचाक्षर मन्त्रके जपमें रत जरी
करती हुई वे सम्पूर्ण मनोवांछित फलके दाता तो
ध्यान करने लगी। वे प्रतिदिन अवकाश रि
अ० २२ ]
स्वारोपितान्शुभान्वृक्षान््सखीभिस्सिज्ञती मुदा।
प्रत्यहं सावकाशे सा तत्रातिथ्यमकल्पयत्॥ ४४
बातश्ैव तथा शीतवृष्टिश्च विविधा तथा।
दुस्सहोऽपि तथा घर्म्मस्तया सेहे सुचित्तया॥ ४५
दुःखं च विविधं तत्र गणितं न तयागतम्।
केवलं मन आधाय शिवे सासीत्त्थिता मुने॥ ४६
प्रथमं फलभोगेन द्वितीयं पर्णभोजनेः।
तपः प्रकुर्वती देवी क्रमान्निन्येऽमिताः समाः ॥ ४७
ततः पर्णान्यपि शिवा निरस्य हिमवत्सुता।
निराहाराभवद्देवी तपश्चरणसंरता॥ ४८
आहारे त्यक्तपर्णाभूद्यस्माद्धिमवतः सुता।
तेन देवैरपर्णेति कथ्चिता नामतः शिवा॥ ४९
एकपादस्थिता सासीच्छिवं संस्मृत्य पार्वती।
पंचाक्षरं जपन्ती च मनुं तेपे तपो महत्॥ ५०
चीरवल्कलसंवीता जटासंघातधारिणी।
शिवचिंतनसंसक्ता जिगाय तपसा मुनीन्॥ ५१
एवं तस्यास्तपस्यन्त्या चिन्तयन्त्या महेश्वरम्।
औणि वर्षसहस्त्राणि जग्मुः काल्यास्तपोवने॥ ५२
ष्टिव्षसहस्त्राणि यत्र तेपे तपो हरः।
तत्र क्षणमथोषित्वा चिंतयामास सा शिवा॥ ५३
नियमस्था महादेव किं मां जानासि नाधुना।
येनाहं सुचिरे तेन नानुयाता तपोरता॥ ५४
लोके वेदे च गिरिशो मुनिभिर्गीयते सदा।
शकर: स हि सर्वज्ञ: सर्वात्मा सर्वदर्शनः॥ ५५
र्वभतिप्रदो देव: सर्वभावानुभावनः।
नित्यं सर्वकलेशनिवारणः॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५८५
अपने द्वारा लगाये गये सुन्दर वृक्षोंको सखियोंके साथ
प्रसन्नतापूर्वक सींचती थीं तथा अतिथिसत्कार भी
करती थीं ॥ ४३-४४॥
शुद्धचित्तवाली वे पार्वती आँधी, सर्दी,
अनेक प्रकारकी वर्षा तथा असह्य धूप बिना कष्ट माने
सहन करती थीं ॥ ४५ ॥
हे मुने! इस प्रकार उनके ऊपर अनेक प्रकारके
दुःख आये, परंतु उन्होंने उनकी कुछ भी परवाह नहीं की ।
वे केवल शिवमें मन लगाकर वहाँ स्थित थीं ॥ ४६ ॥
इस प्रकार तप करती हुई देवीने पहले फलाहारसे,
फिर पत्तेके आहारसे क्रमशः अनेक वर्ष बिताये॥ ४७॥
तदनन्तर हिमालयपुत्री शिवा देवी पत्ते भी
छोड़कर सर्वथा निराहार रहकर तपस्यामें लीन रहने
लगीं॥ ४८ ॥
जब उन हिमालयपुत्री शिवाने पत्ते खाना भी
छोड़ दिया, तब वे शिवा देवताओंके द्वारा 'अपर्णा'
कही जाने लगीं॥ ४९॥
इसके बाद पार्वती भगवान् शिवका ध्यान करके
एक पैरपर खड़ी होकर पंचाक्षरमन्त्रका जप करती
हुई कठोर तपस्या करने लगीं। उनके अंग चीर और
वल्कलसे ढँके थे, वे सिरपर जटाजूटको धारण किये
हुए थीं । इस प्रकार शिवजीके चिन्तनमें लगी हुई पार्वतीने
तपस्याके द्वारा मुनियोंको भी जीत लिया॥ ५०-५१॥
इस प्रकार तप करती हुई तथा महेश्वरका
चिन्तन करती हुई उन कालीने तीन हजार वर्ष इस
तपोवनमें बिता दिये। जहाँपर शंकरजीने साठ हजार
वर्षतक तपस्या की थी, उस स्थानपर कुछ क्षण
रूककर वे अपने मनमें विचार करने लगीं॥ ५२-५३॥
हे महादेव! क्या आप तपस्यामें संलग्न हुई मुझे
नहीं जानते, जो कि मुझे तपस्यामें लीन हुए इतने वर्ष
बीत गये फिर भी आपने मेरी सुधि न ली। लोक एवं
वेदमें मुनियोंके द्वार सदा गान किया जाता है कि भगवान्
शंकर सर्वज्ञ, सर्वात्मा तथा सर्वदर्शन हैं ॥ ५४-५५॥
वे देव समस्त ऐश्वर्यको प्रदान करनेवाले,
सब प्रकारके भावोंसे प्राप्त होनेवाले, भक्तोंके मनोरथ
सदा पूर्ण करनेवाले तथा सभी प्रकारके कष्टोंको दूर
करनेवाले हैं॥ ५६॥
के ८६
श्रीशिवमहापुराण [
अ ¬ = ¬ = = ` `` १
सर्वकामान्परित्यज्य यदि चाहं वृषध्वजे।
अनुरक्ता तदा सोऽत्र संप्रसीदतु शंकरः॥ ५७
यदि नारदतंत्रोक्तमंत्रो जप्त: शराक्षरः।
सुभक्त्या विधिना नित्यं संप्रसीदतु शंकर: ॥ ५८
यदि भक्त्या शिवस्याहं निर्विकारा यथोदितम्।
सर्वेश्वरस्य चात्यन्तं संप्रसीदतु शंकरः॥ ५९
एवं चिंतयती नित्यं तेपे सा सुचिरं तपः।
अधोमुखी निर्विकारा जटावल्कलधारिणी॥ ६०
तथा तया तपस्तप्तं मुनीनामपि दुष्करम्।
स्मृत्वा च पुरुषास्तत्र परमं विस्मयं गताः॥ ६१
तत्तपोदर्शनार्थ हि समाजग्मुश्च तेऽखिलाः।
धन्यान्निजान्मन्यमाना जगदुश्चेति सम्मताः॥ ६२
महतां धर्मवृद्धेषु गमनं श्रेय उच्यते।
प्रमाणं तपसो नास्ति मान्यो धर्मः सदा बुधै: ॥ ६३
श्रुत्वा दृष्ट्वा तपोऽस्यास्तु किमन्यैः क्रियते तप: ।
अस्मात्तपोऽधिकं लोके न भूतं न भविष्यति॥ ६४
जल्पन्त इति ते सर्वे सुप्रशस्य शिवातपः।
जगमुः स्वं धाम मुदिताः कठिनाङ्भाश्च ये ह्मपि॥ ६५
अन्यच्छूणु महर्षे त्वं प्रभावं तपसोऽधुना।
पार्वत्या जगदम्बायाः पराश्चर्यकरं महत्॥ ६६
तदाश्रमगता ये च स्वभावेन विरोधिनः।
तेऽप्यासंस्तत्प्रभावेण विरोधरहितास्तदा॥ ६७
सिंहा ' गावश्च सततं रागादिदोषसंयुताः।
तन्महिम्ना च ते तत्र नाबाधन्त परस्परम्॥ ६८
अथान्ये च मुनिश्रेष्ठ मार्जारा मूषकादयः।
निसर्गद्विरिणो यत्र विक्रियंते स्म न क्वचित्॥ ६९
यदि मैं अपनी सारी कामनाओंका त्यागकर |
वृषध्वज शंकरमें अनुरक्त हूँ, तो वे शंकर न
प्रसन्न हों। यदि मैंने उत्तम भक्तिके साथ विधि
नित्य नारदतन्त्रोक्त पंचाक्षर मन्त्रका जप किया है र
वे शिवजी मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ५७-५८॥ '
यदि मैंने विकाररहित होकर भक्तिपूर्वक सर्वेश
शिवका यथोक्त चिन्तन किया है, तो बे शकष
[मुझपर] परम प्रसन्न हों॥ ५९॥
इस तरह नित्य अपने मनमें सोचती हुई उन्ह)
नीचेकी ओर मुख किये एवं जटा-वल्कल धारक
निर्तिकार होकर दीर्घकालतक तप किया॥६०॥
इस तरह उन्होंने मुनियोंके लिये भी दुप्का
तपस्या कौ, जिसका स्मरणकर वहाँ सभी पुरुष पए
विस्मयमें पड़ गये । उनकी तपस्या देखनेके लिये सभ
लोग वहाँ उपस्थित हो गये और अपनेको धन्य मागे
हुए एक स्वरसे कहने लगे॥ ६१-६२॥
धर्मवृद्धोंके पास बड़े लोगोंका जाना कल्याणका
कहा गया है। तपस्यामें कोई प्रमाण नहीं है,
विद्ठानोंको सदा धर्मका मान करना चाहिये॥ ६३॥
इसकी तपस्याको सुनकर तथा देखकर [ऐस
ज्ञात होता है कि] अन्य लोग क्या तप कर सकते हैं
संसारमें इसके तपसे बढ़कर कोई तप न तो हुआ है
और न होगा। इस प्रकार कहते हुए पार्वतीके तपौ
प्रशंसाकर कठोर अंगवाले वे तपस्वी तथा अन्य जी
प्रसन्न हो अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ६४६५!
[ ब्रह्माजी बोले ] हे महर्षे! अब आ
जगदम्बा पार्वतीकी तपस्याके अन्य बडे परभण
सुनिये, जो महान् आश्चर्यजनक चरित्र है॥ ६६ i
पार्वतीके आश्रममें रहनेवाले समस्त ज bs
स्वभावसे ही परस्पर विरोधी थे, वे भी 8
तपस्याके प्रभावसे वैररहित हो गये॥ ६७॥
निरन्तर राग आदि दोषसे युक्त रहनेवाले बै
और गौ आदि भी वहाँ उनकी तपस्याकी
परस्पर बाधा नहीं पहुँचाते थे॥ ६८॥ र
हे मुनिश्रेष्ठ! मार्जार, मूषक आदि भी त
स्वभावसे आपसमें वैर करनेवाले हैं, वे भी हा
दूसरेके प्रति] कभी विकारभाव नहीं रखते थै॥
अ० २३ ग
वृक्षाश्र सफलास्तत्र तृणानि विविधानि च।
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५८७
हे मुनिसत्तम! वहाँ फलयुक्त वृक्ष, विविध
पुष्पाणि च विचित्राणि तत्रासन्सुनिसत्तम॥ ७० | प्रकारके तृण और विचित्र पुष्प उत्पन्न हो गये ॥७०॥
तद्रनं च तदा सर्व कैलासेनोपमान्वितम्।
जातं च तपसस्तस्याः सिद्धिरूपमभूत्तदा॥ ७१ | लगा॥ ७१
क सम्पूर्ण वन उनकी तपस्याकी सिद्धिके
रूपमें हो गया और कैलासके समान मालूम पड़ने
I
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डेपार्वतीतपोवर्णनं नाम द्वार्विशो5 ध्याय: ॥ २२॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
यार्वतीतपस्यावर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥
अथ त्रयोबिंशोऽध्यायः
हिमालय आदिका तपस्यानिरत पार्वतीके पास जाना, पार्वतीका पिता हिमालय आदिको
अपने तपके विषयमें दृढ़ निश्चयकी बात बताना, पार्वतीके तपके प्रभावसे त्रैलोक्यका
संतप्त होना, सभी देवताओंका भगवान् शंकरके पास जाना
ब्रह्मोवाच
एवं तपत्यां पार्वत्यां शिवप्राप्तौ मुनीश्वर।
चिरकालो व्यतीयाय प्रादुर्भूतो हरो न हि॥ १
हिमालयस्तदागत्य पार्वतीं कृतनिश्चयाम्।
सभार्यः ससुतामात्य उवाच परमेश्वरीम्॥ २
हिमालय उवाच
मा खिद्यतां महाभागे तपसानेन पार्वति।
रुद्रो न दृश्यते बाले विरक्तो नात्र संशयः॥ ३
त्वं तन्वी सुकुमाराङ्गी तपसा च विमोहिता।
भविष्यसि न संदेहः सत्यं सत्यं वदामि ते॥ ४
पसमुत्तष्ठ चैहि त्वं स्वगृहं वरवर्णिनि।
कि तेन तब रुद्रेण येन दग्धः पुरा स्मरः॥
~
अतो हि निर्विकारत्वात्त्वामादातु वरां हरः।
देवेशि तं कथं प्रार्थयिष्यसि॥ ६
यो यथा चंद्रो ग्रहीतुं न हि शक्यते।
दुर्गमं शंभुं जानीहि त्वमिहानधे॥ ७
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! शिवजीकी
प्राप्तिके लिये इस प्रकार तपस्या करती हुई पार्वतीका
बहुत समय व्यतीत हो गया, तो भी शंकर प्रकट
नहीं हुए॥ १॥
तब अपने संकल्पमें दृढ़ निश्चयवाली परमेश्वरी
पार्वतीके समीप अपनी भार्या, पुत्र तथा मन्त्रियांसहित
आकर गिरिराज हिमालय उनसे कहने लगे-॥ २॥
हिमालय बोले-हे महाभागे! हे पार्वति!
तुम इस तपसे दुखी मत होओ, हे बाले! रुद्र विरक्त
हैं, इसलिये तुम्हें दर्शन नहीं दे रहे हैं, इसमें सन्देह
नहीं है॥३॥
दुनली-पतली तथा सुकुमार अंगोंबाली तुम
इस तपस्यासे मूच्छित हो जाओगी, इसमें सन्देह नहीं
है, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ४॥
इसलिये हे वरवर्णिनि! तुम उठो और अपने
घर चलो। उन रुद्रसे तुम्हार कौन-सा प्रयोजन
सिद्ध होगा, जिन्होंने पहले कामदेवको ही भस्म कर
दिया है ?॥५॥
जब र्निंविकार होनेके कारण वे शिव तुम्हें ग्रहण
करने नहीं आयेंगे, तो हे देवेशि! तुम उनसे प्रार्थना
भी क्यों करोगी? जिस प्रकार आकाशमें रहनेवाले
चद्भमाको ग्रहण नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार
हे अनघे! तुम शिवजीको भी दुर्गम समझो ॥ ६:७॥
न ८८
श्रीशिवमहापुराण
[अ ˆ ० 5 ८. ` यायातः ` ` |
ब्रह्मोवाच
तथैव मेनया चोक्ता तथा सह्याद्रिणा सती।
मेरुणा मंदरेणैव मैनाकेन तथैव सा॥ ८
एवमन्यैः क्षिति्चैश्च क्राँचादिभिरनातुरा।
तथैव गिरिजा प्रोक्ता नानावादविधायिभिः॥ ९
एवं प्रोक्ता यदा तन्वी सा सर्वे: तपसि स्थिता।
उवाच प्रहसंत्येव हिमवंतं शुचिस्मिता॥ ९०
पार्वत्युवाच
पुरा प्रोक्तं मया तात मात: किं विस्मृतं त्वया।
अधुनापि प्रतिज्ञां च श्रृणुध्वं मम बांधवाः॥ ११
विरक्तोऽसौ महादेवो येन दग्धो रुषा स्मर: ।
तं तोषयामि तपसा शंकरं भक्तवत्सलम्॥ १२
सर्वे भवन्तो गच्छन्तु स्वं स्वं धाम प्रहर्षिताः।
भविष्यत्येव तुष्टोऽसौ नात्र कार्या विचारणा ॥ १३
दग्धो हि मदनो येन येन दग्धं गिरेर्वनम्।
तमानयिष्ये चात्रैव तपसा केवलेन हि॥ १४
तपोबलेन महता सुसेव्यो हि सदाशिवः।
जानीध्वं हि महाभागाः सत्यं सत्यं वदामि व: ॥ १५
ब्रह्मोवाच
आभाष्य चेवं गिरिजा च मेनकां
मैनाकबंधुं पितरं हिमालयम्।
तुष्णीं बभूवाशु सुभाषिणी शिवा
समंदर पर्वतराजबालिका॥ १६
जग्मुस्तथोक्ताः शिवया हि पर्वता
यथागतेनापि विचक्षणास्ते।
प्रशंसमाना गिरिजां ;
सुविस्मिता हेमनगेशवराद्याः॥ १७
गतेषु तेषु सर्वेषु सखीभिः परिवारिता।
तपस्तेपे तदधिकं परमार्थसुनिश्चया॥ १८
तपसा महता तेन तप्तमासीच्चराचरम्।
त्रैलोक्यं हि मुनिश्रेष्ठ सदेवासुरमानुषम्॥ १९
तदा सुरासुराः सर्वे यक्षकिन्नरचारणाः।
सिद्धाः साध्याश्च मुनयो विद्याधरमहोरगाः॥ २०
सप्रजापतयश्चैव गुह्यकाश्च तथापरे।
कष्टात् कष्टतरं प्राः कारणं न विदुः स्म ततू॥ २१
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार मेना ७.
मेरु, मन्दार एवं मैनाकने भी उन सती सतीको का.
समझाया, अन्य क्रौँचादि पर्वतोंने भी ब
कारणोंको प्रदर्शित करते हुए आतुरतासे रहित
पार्वतीको समझाया॥ ८-९॥ भे
इस प्रकार सब लोगोंके समझा लेनेके बाद तपस
संलग्न वे पवित्र मुसकानवाली तन्वी पार्वती हँसती हू
[अपने पिता] हिमालयसे कहने लगीं--॥ १०॥
पार्वती बोलीं--हे माता! हे पिता! मैंने शे
बात पहले कही थी, क्या आपलोग उसे भूल गये
बन्थुगण! इस समय आपलोग भी मेरी प्रतिज्ञा सुने
जिन्होंने क्रोधसे कामदेवको जला दिया १
महादेव निश्चय ही विरक्त हैं, किंतु उन भक्तवत्सत
शंकरको मैं अपनी तपस्यासे सन्तुष्ट करूँगी॥१२॥
आप सभी लोग परम प्रसन्न होकर अपने अपने घाले
जायँ। वे अवश्य ही प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नही!
जिन्होंने कामदेवको भस्म कर दिया तथा जिन्होंने पीके
वनको भी जला दिया, उन सदाशिवको मैं केवल अपनी
तपस्यासे यहाँ अवश्य बुलाउँगी । हे महाभागो! वे सदारिव
महान् तपोबलसे अवश्य प्रसन्न हो जाते हैं, यह निरि
जानिये, मैं आपलोगोंसे सत्य कह रही हूँ॥ १३-१
ब्रह्माजी बोले--पर्वतराजकी पुत्री सुभाषिण
पार्वती अपनी माता मेनका, भाई मैनाक, मर्दी
तथा पिता हिमालयसे इतना कहकर चुप हो गय!
इस प्रकार जब शिवाने उनसे कहा, तब वे वि
हिमनग आदि पर्वत बार-बार गिरिजाकी प्रशंसा कर
हुए जहाँसे आये थे, वहाँ अत्यन्त विस्मित हो
गये॥ १६-१७॥
उन सबके चले जानेपर सखियोंसहित वे पा
परमार्थके निश्चयसे युक्त हो और अधिक दू
महान् तपस्या करने लगीं। हे मुनिश्रेष्ठ! उस
तपस्यासे देवता, असुर एवं
त्रैलोक्य सन्तप्त हो उठा॥ १८-१९॥ वार
उस समय समस्त सुर, असुर, यक्ष, कि |
सिद्ध, साध्य, मुनि, विद्याधर, महान् उरग, प्रजापति क्रि
गुह्यक तथा अन्य प्राणी बडे कष्टको प्राप्त है
वे इसका कारण न समझ सके॥ २०-२१ ॥
अ० २३]
सर्वे मिलित्वा शक्राद्या गुरुमामंत्र्य विहला:।
सुमेर तप्तसर्वाड्रा विधिं मां शरणं ययु:॥ २२
तत्र गत्वा प्रणम्याशु विह्वला नष्टसुत्विष: ।
ऊचुः सर्वे च संस्तूय ह्यौकपद्येन मां हि ते॥ २३
देवा ऊचुः
त्वया सृष्टमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम्।
संतप्तमति कस्माद्वै न ज्ञातं कारणं विभो॥ २४
तद् ब्रूहि कारणं ब्रह्मन् ज्ञातुमर्हसि नः प्रभो।
दग्धीभूततनून्देवान् त्वत्तो नान्योऽस्ति रक्षकः॥ २५
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषामहं स्मृत्वा शिवं हृदा।
विचार्य मनसा सर्व गिरिजायास्तपः फलम्॥ २६
दग्धं विश्वमिति ज्ञात्वा तैः सवैरिह सादरात्।
हरये तत्कथयितुं क्षीराब्धिमगमं द्रुतम्॥ २७
तत्र गत्वा हरि दृष्ट्या विलसन्तं सुखासने।
सुप्रणम्य सुसंस्तूय प्रावोचं सांजलिः सुरैः॥ २८
आहि त्राहि महाविष्णो तप्तान्न: शरणागतान्।
तपसोग्रेण पार्वत्यास्तपन्त्याः परमेण हि॥ २९
इत्याकर्ण्यं वचस्तेषामस्मदादिदिवौकसाम्।
शेषासने समाविष्ट्ोऽस्मानुवाच रमेश्वरः॥ ३०
ज्ञात विष्णुरुवाच
शोतं सर्व निदानं मे पार्वतीतपसोऽद्य वै।
: सहितस्त्वद्य व्रजामि परमेश्वरम्॥ ३९
महादेव प्रार्थयामो गिरिजाप्रापणाय तम्।
भणिग्रहार्थमधुना लोकानां स्वस्तयेऽमराः॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५८९
तपते हुए समस्त अंगवाले तथा व्याकुल वे
सभी इन्ध आदि परस्पर मिलकर गुरु बृहस्पतिसे
परामर्श करके मुझ ब्रह्माकी शरणमें सुमेरु पर्वतपर
। नष्ट कान्तिवाले तथा व्याकुल वे सब वहाँ
पहुँचकर शीघ्र प्रणाम करके तथा स्तुति करके एक
साथ मुझसे कहने लगे-॥ २२-२३॥
देवता बोले-हे विभो! इस चराचर सम्पूर्ण
जगतका आपने ही निर्माण किया है, किंतु इस समय
यह सारी सृष्टि क्यों जल रही है, इसका कारण ज्ञात
नहीं हो पा रहा है॥ २४॥
हे प्रभो! हे ब्रह्मन! इसका कारण आप
बताइये; क्योंकि आप ही इसे जाननेमें समर्थ हैं । हम
देवगणोंका सारा शरीर जल रहा है। दग्ध होते हुए
शरीरवाले हम देवताओंका आपके अतिरिक्त कोई
अन्य रक्षक नहीं है॥ २५॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार देवताओंकी बातको
सुनकर मैं शिवजीका स्मरणकर हृदयमें सोचने लगा
कि यह सब पार्वतीकी तपस्याका फल है॥ २६॥
सारा विश्व जल जायगा, यह जानकर मैं
भगवान् विष्णुसे निवेदन करनेके लिये उन सभीके
साथ आदरपूर्वक शीघ्र क्षीरसागर गया॥ २७॥
देवगणोंके साथ वहाँ जाकर मैंने देखा कि
नारायण सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हैं, उस
समय मैं उन्हें प्रणामकर तथा स्तुति करके हाथ
जोड़कर कहने लगा- ॥ २८॥
हे महाविष्णो! तपस्यामें संलग्न पार्वतीकी परम
कठोर तपस्यासे हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं, अत: हम
शरणागतोंकी आप रक्षा कीजिये॥ २९॥
हम देवताओंका यह वचन सुनकर शेषासनपर
बैठे हुए रमेश्वर हमलोगोंसे कहने लगे ॥ ३०॥
विष्णुजी बोले-मैंने सारा कारण जान लिया
है। आप सब लोग पार्वतीकी तपस्यासे सन्तप्त हो रहे
हैं, अतः मैं आपलोगोंके साथ अभी परमेश्वरके पास
चल रहा हूँ। हे देवगणो! हमलोग सदाशिवके समीप
चलकर उनसे प्रार्थना करें कि वे पार्वतीका पाणिग्रहण
करें; क्योंकि शिवजीके द्वारा पार्वतीका पाणिग्रहण
करनेपर ही लोकका कल्याण होगा॥ ३१-३२॥
ल ९०
श्रीशिवमहापुराण
[अ ननका स्लयामानाना्याकाााा
वरं दातुं शिवाये हि देवदेवः पिनाकथृक्।
यथा चेष्यति तत्रैव करिष्यामोऽधुना हि तत्॥ ३३
तस्माद् वयं गमिष्यामो यत्र रुद्रो महाप्रभुः।
तपसोग्रेण संयुक्तोऽद्यास्ते परममङ्गलः॥ ३४
ब्रह्मोवाच
विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा सर्व ऊचुः सुरादयः।
महाभीता हठात् कुद्धाहग्धुकामात् लयंकरात्॥ ३५
देवा ऊचुः
महाभयंकरं क्रुद्धं कालानलसमप्रभम्।
ज यास्यामो वयं सर्वे विरूपाक्षं महाप्रभुम्॥ ३६
यथा दग्धः पुरा तेन मदनो दुरतिक्रमः ।
तथैव क्रोधयुक्तो न: स धक्ष्यति न संशय: ॥ ३७
ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य वचस्तेषां शक्रादीनां रमेश्वरः।
सांत्वयंस्तान्सुरान्सर्वान्प्रोवाच स हरिर्मुने॥ ३८
हरिरुवाच
हे सुरा मद्वचः प्रीत्या श्ृणुताद्रतोऽखिलाः।
न वो धक्ष्यति स स्वामी देवानां भयनाशनः॥ ३९
तस्माद्धवद्धिर्गन्तव्यं मया सार्धं विचक्षणैः
शंभुं शुभकरं मत्वा शरणं तस्य सुप्रभोः॥ ४०
शिवं पुराणं पुरुषं ह्यधीशं
वरेण्यरूपं हि परं पुराणम्।
तपो जुषाणं परमात्मरूपं
परात्परं तं शरणं व्रजामः॥ ४१
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तास्तदा देवा विष्णुना प्रभविष्णुना।
जग्मुः सर्वे तेन सह द्रष्टुकामाः पिनाकिनम् ॥ ४२
प्रथमं शैलपुत्र्यास्तत्तपो द्रष्टं तदाश्रमम्।
जग्मुर्मार्गवशात्सर्वे विष्ण्वाद्याः सकुतूहलाः ॥ ४३
पार्वत्याः सुतपो दृष्ट्वा तेजसा व्यापृतास्तदा।
प्रणेमुस्तां जगद्धात्रीं तेजोरूपां तपःस्थिताम्॥ ४४
देवाधिदेव पिनाकधारी सदाशिव पार्वतीको
प्रदान करनेके लिये जिस प्रकार उद्यत हों, उसी
उपाय हमलोगोंको इस समय करना चाहिये॥ ३+ |
इसलिये अब हमलोग उस स्थानपर २७ |
जहाँ परम मंगल महाप्रभु रुद्र इस समय उग्र तपस
लीन हैं ॥ ३४॥
ब्रह्माजी बोले--विष्णुजीकी वह का
सुनकर प्रलय करनेवाले और क्रोधपूर्वक हठसे कामेन |
नष्ट करनेवाले शंकरसे भयभीत वे देवता विषये
कहने लगे- ॥ ३५॥
'देबतागण बोले [हे विष्णो!] महाभयंका,
क्रोधी, कालाग्निके समान प्रभावाले तथा विह्न
महाप्रभुके पास हमलोग नहीं जायँगे; क्योंकि उन्ह
जिस प्रकार दुराधर्ष कामदेवको भस्म कर दिया, उस
प्रकार क्रोधमें भरकर वे हमलोगोंको भी भस्म का
देंगे, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३६-३७॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! इन्द्रादि देवताओं
यह बात सुनकर वे विष्णु उन सभी देवताओंकी
धीरज बँधाते हुए कहने लगे-॥ ३८॥
विष्णुजी बोले-हे देवगणो! आप सभी लो]
आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये, वे सदाशिव आपलोगॉगे
भस्म नहीं करेंगे; क्योंकि वे देवताओंके भयको त.
करनेवाले हैं। इसलिये आप सभी बुद्धिमा लो
शम्भुको कल्याणकारी मानकर मेरे साथ उन पश
प्रभुके पास चलिये॥ ३९-४०॥
चे शिव ही पुराणपुरुष, सबके अधीश्वर, सो
श्रेष्ठ, तपस्या करनेवाले, पसमात्मस्वरूप और ह
हैं, हमलोगोंको उन्हींका आश्रय लेना चाहिये॥ के
ब्रह्माजी बोले--जब सर्वसमर्थ विष्ण
प्रकार देवगणोंसे कहा, तब वे सब उनके
पिनाकी भगवान् सदाशिवके दर्शन करनेकी नश
जात 'पडनेके र्का
चले। विष्णु आदि देवगण मार्गमें पड़" .
सर्वप्रथम कुतूहलवश उस आश्रममें गये, जरि
तपस्या कर रही थीं॥ ४२-४३॥ ता
तदनन्तर सभी देवताओंने पार्वती ह
देखकर उनके तेजसे व्यापृत हो तेजोरूपवाली आ
तपमें अधिष्ठित उन जगदम्बाको प्रणाम किग
षे
अ० २४ ]
: साक्षात्सिद्धितनोः सुरा: ।
जम्मुस्तत्र तदा ते च य॒त्रास्ते वृषभध्वज:॥ ४५
तत्र गत्वा च ते देवास्त्वां मुने प्रैषयंस्तदा।
पश्यन्तो दूरतस्तस्थुः कामभस्मकृतो हरात्॥ ४६
नारद त्वं शिवस्थानं तदा गत्वाभयः सदा।
शिवभक्तो विशेषेण प्रसन्नं दृष्टवान् प्रभुम्॥ ४७
पुनरागत्य यत्नेन देवानाहूय तांस्तत: ।
निनाय शंकरस्थानं तदा विष्णवादिकान्मुने॥ ४८
अध विष्णवादयः सर्वे तत्र गत्वा शिवं प्रभुम्
ददृशुः सुखमासीनं प्रसन्नं भक्तवत्सलम्॥ ४९
योगपट्टस्थितं शंभुं गणैश्च परिवारितम्
तपोरूपं दधानं च परमेश्वररूपिणम्॥ ५०
ततो विष्णुर्मयान्ये च सुरसिद्धमुनीश्वराः।
प्रणम्य तुष्टुवुः सूक्तैवेदोपनिषदन्वितैः॥ ५१
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५९१
साक्षात् सिद्धिका शरीर धारण करनेवाली उन पार्वतीके
तपकी प्रशंसा करते हुए वे देवगण वहाँ गये, जहाँ
वृषध्वज थे ॥ ४४-४५॥
हे मुने! वहाँ पहुँचकर उन देवताओंने [सर्वप्रथम]
आपको शिवके समीप भेजा और वे स्वयं कामको
नष्ट करनेवाले भगवान् शंकरको देखते हुए दूर ही
स्थित रहे। उस समय हे नारद! विशेषरूपसे शिवभक्त
आपने निर्भय होकर शिवजीके स्थानपर जाकर
शिवजीको प्रसन्न मुद्रामें देखा । हे मुने! तदनन्तर लौटकर
यलपूर्वक उन विष्णु आदि देवताओंको बुलाकर आप
शिवजीके स्थानपर उन्हें ले गये ॥ ४६-४८॥
तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवताओंने शिवजीके
स्थानमें जाकर प्रसन्न मनसे उन भक्तवत्सल भगवान्
सदाशिवको सुखपूर्वक बैठे हुए देखा। वे योगासन
लगाये हुए अपने गणोंसे घिरे थे । वे परमेश्वररूपी शंकर
साक्षात् तपस्याके विग्रहवान् रूप थे ॥ ४९-५०॥
तब विष्णु एवं मेरे साथ रहनेवाले अन्य देव,
मुनि तथा सिद्धगण उन परमेश्वर शिवजीको प्रणामकर
वेद एवं उपनिषदोंके सूक्तोद्वारा उनकी स्तुति करने
लगे॥५१॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदसंहिताया तृतीये पर्वती खण्डे पार्वतीसांत्वनशिवदेवदर्शनवर्णन॑ नाम त्रयोविशोऽध्याय; ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत दवितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीसान्त्वन-
शिवदेवदर्शनवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
—S
अथ चतुर्विशोऽध्यायः
देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह 'करनेका अनुरोध, भगवानका
विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः
प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना
देवा ऊचुः
नेमो रुद्राय देवाय मदनांतकराय च।
शुत्याय भूरिभासाय त्रिनेत्राय नमो नमः॥ १
भीमाय भीमाक्षाय नमो नमः।
महादेवाय प्रभवे त्रिविष्टपतये नमः॥ २
खे नाथ: सर्वलोकानां पिता माता त्वमीश्वरः।
शेभुरीश: शंकरोऽसि दयालुस्त्वं विशेषतः॥ ३
देवता बोले-कामदेवको विनष्ट करनेवाले
रुद्र देवताको नमस्कार है, स्तुतिके योग्य, अत्यन्त
तेजस्वी तथा त्रिनेत्रको बार-बार नमस्कार है॥ १॥
शिपिविष्ट, भीम एवं भीमाक्षको बार-बार
नमस्कार है। महादेव, प्रभु तथा स्वर्गपतिको नमस्कार
॥२॥
आप सभी लोकोंके नाथ और माता-पिता
हैं। आप ईश्वर, शम्भु, ईश, शंकर तथा विशेष
रूपसे दयालु हैं ॥ ३॥
न ९२
श्रीशिवमहापुराण
IE ल्त्त्त्त्त्त्त्त्त्तत्त् जतकननानलकप `` `
त्वं धाता सर्वजगतां त्रातुमर्हसि नः प्रभो।
त्वां विना कः समर्थोऽस्ति दुःखनाशे महेश्वर॥ ४
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सुराणां नन्दिकेश्वरः ।
कृपया परया युक्तो विज्ञसुं शंभुमारभत्॥ ५
नंदिकेश्वर उवाच
विष्णबादयः सुरगणा मुनिसिद्धसंघा-
सत्वां द्रष्टुमेव सुरवर्य विशेषयन्ति।
कायांर्थिनोऽसुरवरैः परिभर्त्स्यमाना:
सम्यक् पराभवपदं परमं प्रपन्नाः॥ ६
तस्मात्त्वया हि सर्वेश त्रातव्या मुनयः सुरा: ।
दीनबंधुर्विशेषेण त्वमुक्तो भक्तवत्सलः॥ ७
ब्रह्मोवाच
एवं दयावता शंभुर्विज्ञप्तो नंदिना भृशम्।
शनैः शनैरुपरमद्धयानादुन्मील्य चाक्षिणी॥ ८
ईशोऽथोपरतः शंभुस्तदा परमक्रोविदः।
समाधेः परमात्मासौ सुरान्सर्वानुवाच ह॥ ९
शंभुरुवाच
कस्माद्यूयं समायाता मत्समीपं सुरेश्वराः।
हरिब्रह्मादयः सर्वे ब्रूत कारणमाशु तत्॥ १०
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचः शम्भोः सर्वे देवा मुदान्विताः।
विष्णोर्विलोकयामासुर्मुखं विज्ञसिहेतवे॥ ११
अथ विष्णुर्महाभक्तो देवानां हितकारकः।
मदीरितमुवाचेदं सुरकार्यं महत्तमम्॥ १२
विष्णुरुवाच
तारकेण कृतं शंभो देवानां परमाद्भुतम्।
कष्टात्कष्टतरं देवा विज्ञप्तुं सर्व आगताः॥ ९३
हे शंभो तव पुत्रेणौरसेन हि भविष्यति।
निहतस्तारको दैत्यो नान्यथा मम भाषितम्॥ १४
आप ही सब जगत्को धारण
अतएव हे प्रभो! आप हमलोगोंकी रक्षा कोळ
हे परमेश्वर! आपके अतिरिक्त और कौन इ
दूर करनेमें समर्थ है॥ ४॥ |
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद!] उन देवताओंक
यह वचन सुनकर परम कृपासे युक्त होकर नन्दक
शिवजीसे निवेदन करने लगे- ॥ ५॥
नन्दिकेश्वर बोले-हे सुरवर्य! सिद्ध मु
विष्णु आदि देवगण दैत्योंसे पराजित एवं तिरस्कृत
आपकी शरणमें आये हैं और वे आपके दर्शको
इच्छा करते हैं ॥ ६॥
इसलिये हे सर्वेश! आप [शरणागत हुए] ज्ञ
देवताओं तथा मुनियोंकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आए
विशेषरूपसे दीनबन्धु और भक्तवत्सल कहे गवे |
हैं॥७॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार जब दयातु
नन्दिकेश्वरने बार-बार शिवजीसे निवेदन किया, तब
उन्होंने धीरे-धीरे अपने नेत्र खोलकर समाधिका त्या
किया॥ ८ ॥
उसके बाद समाधिसे उपरत हुए वे महाञ
परमात्मा शम्भु सभी देवताओंसे कहने लगे=॥९॥
शम्भु बोले--आप सभी ब्रह्मा, विष्णु आदि
सुरेश्वर मेरे पास किसलिये आये हैं ? उस कारणकी
शीघ्र कहिये॥ १०॥
ब्रह्माजी बोले--शिवजीके इस वचनको सुर
सभी देवता प्रसन्न हो गये और विज्ञप्तिके ए
विष्णुके मुखकी ओर देखने लगे॥११॥
तब शिवके परम भक्त तथा देवताओंके हिर
विष्णु मेरे द्वारा कहे गये देवताओंके इस बहुत *
कार्यका निवेदन करने लगे-॥ १२॥ ज्ञ
विष्णुजी बोले--हे शम्भो! तारके
देवताओंको अत्यन्त अद्भुत दुःख प्राप्त I
इसी कारण सभी देवता आपसे निवेदन करी
आये हुए हैं॥ १३॥ उतत
हे शम्भो! आपके द्वार जो औरस पुत हा
होगा, उसीके द्वारा तारकासुरका वध होगा,
कथन अन्यथा नहीं हो सकता॥ १४॥
अ० २४]
विचार्येत्थं महादेव कृपां कुरु नमोऽस्तु ते।
देवान्समुद्धर स्वामिन् कष्टात्तारकनिर्मितात्॥ १५
तस्मात्त्वया गिरिजा देव शंभो
ग्रहीतव्या पाणिना दक्षिणेन।
पाणिग्रहेणैव महानुभावा
दत्तां गिरीन्द्रेण च तां कुरुष्व॥ १६
विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नो हात्रवीच्छिव:।
दर्शयन् सद्गतिं तेषां सर्वेषां योगतत्परः ॥ १७
शिव उवाच
यदा मे स्वीकृता देवी गिरिजा सर्वसुंदरी।
तदा सर्वे सुरेन्द्राशच मुनयो ऋषयस्तदा॥ १८
सकामाश्च भविष्यंति न क्षमाश्च परे पथि।
जीवयिष्यति दुर्गा सा पाणिग्रहणतः स्मरम्॥ १९
मदनो हि मया दग्धः सर्वेषां कार्यसिद्धये।
ब्रह्मणो बचनाद्विष्णो नात्र कार्या विचारणा॥ २०
एवं विमृश्य मनसा कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
सुधीः सर्वैश्च देवेन्द्र हठं नो कर्तुमर्हसि॥ २१
दग्धे कामे मया विष्णो सुरकार्य महत् कृतम्।
र्वे तिष्ठन्तु निष्कामा मया सह सुनिश्चितम्॥ २२
यथाहं च सुराः सर्वे तथा यूयमयलतः।
तपः परमसंयुक्ताः करिष्यध्वं सुदुष्करम्॥ २३
यूयं समाधिना तेन मदनेन विना सुराः।
परमानंदसंयुक्ता निर्विकारा भवंतु वै॥
पुरावृत्तं स्मरकृतं विस्मृतं यद विधे हरे।
महेन्द्र मुनयो देवा यत्तत्सर्व विमृश्यताम्॥ २५
महाधनुर्धरेणे मदनेन हठात्सुराः।
सवेषां ध्यानविध्वंसः कृतस्तेन पुरामराः॥ २६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५९३
हे महादेव! आपको नमस्कार है, आप इस
बातका विचारकर देवताओंपर दया कीजिये। हे
स्वामिन्! तारकासुरसे उत्पन्न इस महाकष्टसे देवताओंका
उद्धार कीजिये ॥ १५॥
इसीलिये हे देव! हे शम्भो! आपको स्वयं
गिरिजाका दाहिने हाथसे पाणिग्रहण करना चाहिये;
क्योंकि गिरिराज हिमालय आपको पाणिग्रहणके द्वारा
ही गिरिजाको प्रदान करना चाहते हैं, अत: आप उसे
स्वीकार कीजिये ॥ १६॥
विष्णुके इस वचनको सुनकर योगमें तत्पर
भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उनकी सद्गतिके
लिये उत्तम उपदेश करते हुए कहने लगे ॥ १७॥
शिवजी बोले [हे देवताओ!] जब मैं सर्वसुन्दरी
गिरिजादेवीको स्वीकार करूँगा, तब सभी देवता,
मुनि तथा ऋषि सकाम हो जायँगे। फिर तो ये परमार्थ
मार्गपर चल न सकेंगे । मेरे पाणिग्रहणसे ये दुर्गा मृत
कामदेवको पुनः जीवित कर देंगी ॥ १८-१९ ॥
मैंने सबकी कार्यसिद्धिके लिये ही कामदेवको
जलाया है। हे विष्णो ! ब्रह्माके वचनानुसार ही मैंने यह
कार्य सम्मादित किया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥
हे देवेन्द्र! आप इस कार्याकार्यकी परिस्थितिमें
मनसे तत्त्वका विचार करके मेरे विवाहका हठ छोड़
दीजिये॥ २१॥
हे विष्णो! मैंने कामदेवको जलाकर देवताओंका
बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है। अब उचित यही
होगा कि मेरे साथ समस्त देवगण सुनिश्चित रूपसे
निष्काम होकर निवास करें। हे देवताओ! जिस प्रकार
मैं तपस्या करता हूँ, उसी प्रकार आपलोग भी
सहजरूपसे कठोर तपमें निरत हो जाइये॥ २२-२३॥
अब तो कामदेव नहीं रहा, इसलिये हे
देवताओ! आपलोग निर्विघ्न समाधि लगाकर आनन्दयुक्त
निर्विकार भावसे निवास कीजिये । हे विधे! हे विष्णो!
हे महेन्द्र! हे मुनिगण! हे देवगण! आपलोगोंने पूर्व
समयमें कामदेवके द्वारा किये गये सारे कार्यको भुला
दिया है, उन सबपर विचार कीजिये॥ २४-२५॥
हे देवताओं! पहले इस महाधनुर्धर कामदेवने
हठसे सभी देवताओंका ध्यान नष्ट कर दिया था॥ २६॥
त ९४
श्रीशिवमहापुराण
[अ लकर कल
कामो हि नरकायैव तस्मात् क्रोधोऽभिजायते।
क्रोधाद्भवति संमोहो मोहाच्च भ्रंशते तप:॥ २७
कामक्रोधौ परित्याज्यो भवद्भिः सुरसत्तमैः।
सर्वैरेव च मन्तव्यं मद्वाक्यं नान्यथा क्वचित्॥ २८
ब्रह्मोवाच
एवं विश्राव्य भगवान् महादेवो वृषध्वजः।
सुरान् प्रवाचयामास विधिविष्णू तथा मुनीन्॥ २९
तूष्णींभूतोऽभवच्छंभुर्ध्यानमाश्रित्य वै पुनः।
आस्ते पुरा यथा स्थाणुर्गणैश्च परिवारितः॥ ३०
स्वात्मानमात्मना शंभुरात्मन्येव व्यचिन्तयत्।
निरंजनं निराभासं निर्विकारं निरामयम्॥ ३१
परात्परतरं नित्यं निर्ममं निरग्रहम्।
शब्दातीतं निर्गुणं च ज्ञानगम्यं परात्परम्॥ ३२
एवं स्वरूपं परमं चिन्तयन् ध्यानमास्थितः।
परमानंदसंमग्नो बभूव बहुसूतिकृत्॥ ३३
ध्यानस्थितं च सर्वेशं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः।
हरिशक्रादयः सर्वे नंदिनं प्रोचुरानताः॥ ३४
देवा ऊचुः
किं वयं करवामाद्य विरक्तो ध्यानमास्थितः।
शंभुस्त्वं शंकरसखः सर्वज्ञः शुचिसेवकः॥ ३५
केनोपायेन गिरिशः प्रसन्नः स्यादृणाधिप।
तदुपायं समाचक्ष्व वयं त्वच्छरणं गताः॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इति विज्ञापितो देवैर्मुने हर्यादिभिस्तदा।
परत्युवाच सुरांस्तान्स नंदी शंभुप्रियो गण: ॥ ३७
नंदीश्वर उवाच
हे हरे हे विधे शक्र निर्जरा मुनयस्तथा।
श्रृणुध्वं वचनं मे हि शिवसंतोषकारकम्॥ ३८
यदि वो हठ एवाद्य शिवदारपरिग्रहे।
अतिदीनतया सर्वे सुनुतिं कुरुतादरात्॥ ३९
काम ही नरकका द्वार है, कामसे क्रोध उत्पन
होता है, क्रोधसे मोह होता है और मोहसे तप विनर
हो जाता है। अत: आप सभी श्रेष्ठ देवताओंको का, |
एवं क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये । आए |
सभीको मेरी यह बात स्वीकार करनी चाहिये; क्योंकि
मेरी बात कभी असत्य नहीं सिद्ध होती॥ २७-२८
ब्रह्माजी बोले--[ हे नारद !] वृषभध्वज
महादेवजी इस प्रकार कहनेके बाद विधाता,
मुनिगण तथा देवताओंसे उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे॥ २९।..
तब अपने गणोंसे घिरे हुए वे शम्भु चुपचाप
होकर समाधिमें स्थित हो स्थाणुके समान अचल हो
गये॥ ३०॥
वे शम्भु अपने अन्तःकरणमें अपने निरंजन,
निराभास, निर्विकार एवं निरामय स्वरूपका ध्यान
करने लगे। जो सबसे परे, नित्य, निर्मम, विग्रहरहित,
शब्दातीत, निर्गुण, ज्ञानगम्य तथा परात्पर है॥ ३१-३२॥
इस प्रकार अनेक जगतूकी सृष्टि करनेवाले वे
अपने परम रूपका चिन्तन करते हुए ध्यानमें स्थित
हो परमानन्दमें निमग्न हो गये | उस समय विष्णु, इद्र
आदि सभी देवता शंकरजीको ध्यानमें स्थित देखकर
विनम्र होकर नन्दिकेश्वरसे कहने लगे- ॥ ३३-३४॥
देवता बोले [हे नन्दिकेशवर!] शिवजी विरक्त
होकर ध्यानमें मग्न हैं। अब हमलोगोंको
क्या करना चाहिये? आप शंकरके सखा, सर्वज्ञ एवं
इनके पवित्र सेवक हैं ॥ ३५॥ मलोग
हे गणाधिप! शिवजी किस उपायसे हमलोगॉपर
प्रसन्न होंगे, उस उपायको शीघ्र बताइये। हमलोग
आपकी शरणमें आये हैं॥ ३६॥ जे
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! जब इन्दि देवता.
इस प्रकार नन्दीसे निवेदन किया, तब शिवजीके
गण नन्दी उन देवताओंसे कहने लगे=॥ ३७॥ ह
नन्दीश्वर बोले--हे हरे! हे विधे! हे इंड
देवताओ! हे मुनियो! आपलोग शिवजीकी
करनेवाला मेरा वचन सुनें ॥ ३८॥
यदि आपलोगोंका ऐसा ही हठ है कि
स्त्रीका पाणिग्रहण करें, तो अत्यन्त दीनभावसे
सभी शिवजीकी उत्तम स्तुति करें॥ ३९॥
शिवजी
आ
अ० २४]
भ्क्तेव॑श्यो महादेवो न साधारणतः सुरा: ।
अकार्यमपि सद्भक्त्या करोति परमेश्वर: ॥ ४०
एवं कुरुत सर्वे हि विधिविष्णुमुखा: सुरा:।
यथागतेन मार्गेणान्यथा गच्छत मा चिरम्॥ ४९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य मुने विष्णवादयः सुरा: ।
तथेति मत्त्वा सुप्रीत्या शंकरं तुष्टुबुर्हि ते॥ ४२
देबदेब महादेव करुणासागर प्रभो।
समुद्धर महाक्लेशात् त्राहि नः शरणागतान्॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्येवं बहुदीनोक्त्या तुष्टुवुः शंकरं सुराः।
रुरुदुः सुस्वरं सर्वे प्रेमव्याकुलमानसाः॥ ४४
हरिर्मया सुदीनोक्त्या सुविज्ञप्तं चकार ह।
संस्मरन्मनसा शंभुं भक्त्या परमयान्वितः ॥ ४५
सुरैरेवं स्तुतः शंभुर्हरिणा च मया भृशम्।
भक्तवात्सल्यतो ध्यानाद्विरतोऽभून्महेश्वरः॥ ४६
उवाच सुप्रसन्नात्मा हर्यादीन्हर्षयन्हरः।
विलोक्य करुणादृष्ट्या शंकरो भक्तवत्सल: ॥ ४७
शंकर उवाच
हे हरे हे विधे देवाः शक्राद्या युगपत्समे।
किमर्थमागता यूयं सत्यं ब्रूत ममाग्रतः ॥ ४८
हरिरुवाच
सर्वज्ञस्त्वं महेशान त्तन्तर्याम्यखिलेश्वरः।
किं न जानासि चित्तस्थं तथा वच्य्यपि शासनात्॥ ४९
तारकासुरतो दुःखं संभूतं विविधं मृड।
सर्वेषां नस्तदर्थं हि प्रसन्नोऽकारि वै सुरैः ॥
शिवा सा जनिता शेलात्त्वदर्थ हि हिमालयात्।
त्या त्वदुद्धवात्पुत्रात्तस्य मृत्युर्न चान्यथा ॥ ५९
इति दत्तो ब्रह्मणा हि तस्मै दैत्याय यद्वरः।
पदन्यस्मादमृत्युः स बाधते निखिलं जगत्॥ ५२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५९५
हे देवताओ! महादेव भक्तिद्वारा वशमें हो
जाते हैं, अन्य साधारण उपायोंसे वशीभूत नहीं होते । वे
परमेश्वर उत्तम भक्तिसे अकार्य भी कर सकते हैं॥ ४०॥
हे ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओ | आपलोग ऐसा
ही कीजिये, अन्यथा जहाँसे आये हैं, वहीं शीघ्र ही
चले जाइये, विलम्ब न कीजिये ॥ ४१॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने ! उनकी यह बात सुनकर
विष्णु आदि वे देवता उस बातको मानकर अत्यन्त प्रेमसे
शंकरका स्तवन करने लगे-हे देवदेव, हे महादेव, हे
करुणासागर, हे प्रभो ! महान् क्लेशसे हमलोगोंका उद्धार
कीजिये, हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४२-४३॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार बहुत ही दीन
हो देवताओंने शिवजीकी स्तुति की और वे सब
व्याकुलचित्त होकर उच्च स्वरसे रोने लगे॥ ४४॥
मुझे साथ लेकर विष्णुने मनसे शिवजीका स्मरण
करते हुए परम भक्तिसे युक्त होकर दीन वचनोंसे शम्भुसे
प्रार्थना की। इस प्रकार जब मैंने, विष्णुने तथा सभी
देवताओंने शम्भुकी स्तुति की, तब भक्तवात्सल्यके
कारण वे महेश्वर ध्यानसे विरत हो गये। तदनन्तर
प्रसन्नचित्त होकर दुःखोंका हरण करनेवाले वे भक्त-
वत्सल शंकर विष्णु आदि देवगणोंको हर्षित करते हुए
करुणाभरी दृष्टिसे देखकर कहने लगे- ॥ ४५--४७॥
शंकर बोले-हे हरे! हे विधे! हे इन्द्रादि
देवताओ! आप सब एक साथ किसलिये आये हैं, मेरे
सामने सच-सच बताइये॥ ४८॥
विष्णु बोले-हे महेश्वर! आप सर्वज्ञ, अन्तर्यामी
तथा अखिलेशवर हैं । क्या आप हमारे मनकी बात नहीं
जानते, फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार निवेदन कर रहा
हूँ। हे मूड! हम सब देवताओंको तारकासुरसे महान्
दुःख प्राप्त हो रहा है, इसीलिये हम देवताओंने आपको
प्रसन्न किया है वे शिवा आपके लिये ही हिमालयको
कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई हैं; क्योंकि आपके द्वारा
पार्वतीसे उत्पन्न पुत्रके द्वारा ही तारकासुरकी मृत्यु
होनेवाली है, यह बात अन्यथा नहीं है ॥ ४९--५१॥
ब्रह्माजीने उस तारकासुरको इसी प्रकारका वरदान
दे रखा है। वह अन्य किसीके द्वारा मारा नहीं जायगा,
यही कारण है कि वह सबको पीड़ित कर रहा है॥ ५२ ॥
रे ९६
श्रीशिवमहापुराण
[अ क) र ४
जारदस्य निदेशात्सा करोति कठिनं तपः।
तत्तेजसाखिलं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ५३
वरं दातुं शिवायै हि गच्छ त्वं परमेश्वर
देवदुःखं जहि स्वामिन्नस्माकं सुखमावह॥ ५४
देवानां मे महोत्साहो हृदये चास्ति शंकर।
विवाहं तव संद्रष्टुं तत्त्वं कुरु यथोचितम्॥ ५५
रत्यै यद्भवता दत्तो वरस्तस्य परात्पर।
प्राोऽवसर एवाशु सफलं स्वपणं कुरू॥ ५६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा तं प्रणम्यैव विष्णुर्देवा महर्षयः।
संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः संतसथुस्तत्पुरोऽखिलाः ॥ ५७
भक्ताधीनः शंकरोऽपि श्रुत्वा देववचस्तदा।
विहस्य प्रत्युवाचाशु वेदमर्यादरक्षक: ॥ ५८
शंकर उवाच
हे हरे हे विधे देवाः शृणुतादरतोऽखिलाः।
यथोच्ितमहं वच्मि सविशेषं विवेकतः॥ ५९
जोचितं हि विधानं वै विवाहकरणं नृणाम्।
महानिगडसंज्ञो हि विवाहो दृढबन्धनः॥ ६०
कुसङ्गा बहवो लोके स्त्रीसङ्गस्तत्र चाधिकः ।
उद्धेरेत्सकलेर्बन्थेन ्सत्रीसङ्भात्प्रमुच्यते॥ ६१
लोहदारुमयैः पाशे्दृढै बद्धोऽपि मुच्यते।
स्त्र्यादिपाशसुसंबद्धो मुच्यते न कदाचन॥ ६२
वर्धन्ते विषयाः शशB्वन्महाबंधनकारिणः ।
विषयाक्रांतमनसः स्वप्ने मोक्षोऽपि दुलभः ॥ ६३
सुखमिच्छति चेत्प्राज्ञो विधिवद्रिषयांस्त्यजेत्।
विषवद्विषयानाहुर्विषयैयैर्निहन्यते ॥ ६४
इस समय देवर्षि नारदके के
तपस्या कर रही हैं और उनके तेजसे चाचि
समस्त त्रैलोक्य व्याप्त हो रहा है॥५३॥ £
इसलिये हे परमेश्वर! आप शिवाको चर देने
जाइये। हे स्वामिन्! ऐसा करके हम देवताओं
दुःख दूर कीजिये तथा हमलोगोंको सुखी कीजिये॥ ५४)
हे शंकर! देवताओंके और मेरे मनमें आपका
विवाह देखनेके लिये महान् उत्साह है, अत: आप उठे
उचित रूपसे कीजिये | हे परात्पर! आपने रतिको जे
वरदान दिया है, उसका भी अवसर उपस्थित हो गया |
है, आप अपनी प्रतिज्ञाको सफल कीजिये॥ ५५-५६॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणामक
तथा अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके
विष्णु आदि देवता और महर्षि सब-के-सब उनके
सामने खड़े हो गये। तब वेदकी मर्यादाकी रक्षा
करनेवाले तथा भक्तोंक अधीन रहनेवाले शिवजी भी |
देवताओंके वचनको सुनकर हँस करके शीघ्र कहने
लगे--॥ ५७-५८॥
शंकर बोले--हे हरे! हे विधे! हे देवताओ!
मैं ज्ञानसे युक्त और यथोचित बातें कहता हूँ, उसे
आप सब आदरपूर्वक सुनें। विवाह करना ममुष्योंके
लिये उचित विधान नहीं है; क्योंकि विवाह बेड़ीके
समान अत्यन्त कठिन दृढ़बन्धन है। संसारमें बहुतसे
कुसंग हैं, परंतु उनमें स्त्रीसंग सबसे बढ़कर हैं
क्योंकि मनुष्य सभी प्रकारके बन्धनोंसे छुटकारा प्रा
कर सकता है, किंतु सत्रीसंगसे उसका छुटकार वरै
होता॥ ५९-६१॥ ह;
लोहे तथा लकड़ीके पाशोंमें दृढ़तापूर्वक Ei
हुआ पुरुष उससे छुटकारा पा सकता है, किंतु ख
आदिके पाशमें बँधा हुआ कभी मुक्त नहीं
है॥ ६२॥ ह)
[स्तरीसंगसे] महाबन्धनकारी विषय तिर द्वो
बढ़ते रहते हैं, विषयोंसे आक्रान्त मतवालैकी
भी मोक्ष दुर्लभ हो जाता है॥६३॥
यदि बुद्धिमान् पुरुष सुख प्राप्त करना चाहे,
विषयोंको भलीभाँति छोड़ दे। जिन विषयोंसे
जाता है, वे विषय विषके समान कहे गये हैं
॥ ६४
अ० २४]
जनो विषयिणा साकं वार्तातः पतति क्षणात्।
विषयं प्राहुराचार्याः ॥६५
यद्यप्येबं हि जानामि सर्व ज्ञानं विशेषत: ।
तथाप्यहं करिष्यामि प्रार्थनां सफलां च व:॥ ६६
भ्रक्ताधीनोऽहमेवास्मि तद्वशात्सर्वकार्यकृत्।
अयथोचितकर्ता हि प्रसिद्धो भुवनत्रये॥ ६७
कामरूपाधिपस्यैव पणश्च सफलः कृतः।
सुदक्षिणस्य भूपस्य भवबंधगतस्य हि॥ ६८
गौतमक्लेशकर्ताहं त्र्यंबकात्मा सुखावहः।
तत्कष्टप्रददुष्टानां शापदायी विशेषतः ॥ ६९
विषं पीतं सुरार्थं हि भक्तवत्सलभावधृक्।
देवकष्ट हृतं यत्नात्सर्वदैव मया सुराः॥ ७०
भक्तार्थमसहं कष्टं बहुशो बहुयलतः।
विश्वानरमुनेर्दुःखं हृतं गृहपतिर्भवन्॥ ७१
किं बहूक्तेन च हरे विधे सत्यं ब्रवीम्यहम्।
मत्पणोऽस्तीति यूयं वै सर्वे जानीथ तत्त्वतः ॥ ७२
यदा यदा विपत्तिर्हि भक्तानां भवति क्वचित्।
तदा तदा हराम्याशु तत्क्षणात्सर्वशः सदा॥ ७३
जानेऽहं तारकाददु:खं सर्वेषां वः समुत्थितम्।
असुरात्तद्धरिष्यामि सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ ७४
जास्ति यद्यपि मे काचिद्विवाहकरणे रुचिः।
गिरिजां पुत्रोत्पादनहेतवे॥ ७५
गच्छत स्वगृहाण्येव निर्भयाः सकलाः सुराः।
ब: साधयिष्यामि नात्र कार्या विचारणा॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५९७
मोक्षकी कामना करनेवाला पुरुष विषयी पुरुषोंके
साथ वार्ता करेमात्रसे क्षणभरमें ही पतित हो जाता
है। आचार्योने विषयवासनाको शर्करासे आलिप्त
इन्द्रायनफलके समान (आपातमधुर) कहा है ॥ ६५॥
यद्यपि मैं समस्त ज्ञान विशेष रूपसे जानता हूँ,
फिर भी मैं आपलोगोंकी प्रार्थनाको सफल करूँगा॥ ६६॥
तीनों लोकोंमें मेरी प्रसिद्धि है कि मैं भक्तोंके
वशमें होनेसे सभी प्रकारके उचित-अनुचित कार्य
करता हूँ॥ ६७॥
मैंने कामरूप देशके राजाकी प्रतिज्ञा सफल की
और भव-बन्धनमें पड़े हुए राजा सुदक्षिणका प्रण मैंने
पूरा किया॥ ६८॥
मैंने गौतमको क्लेश दिया, मैं त्र्यम्बकात्मा
सबको सुख देनेवाला हूँ और जो भक्तोंको दुःख
देनेवाले हैं, उन दुष्टोंको विशेष रूपसे कष्ट तथा शाप
प्रदान करता हूँ॥ ६९॥
मैंने अपनी भक्तवत्सलताका भाव प्रकट करनेके
लिये ही विषपान किया था। हे देवताओ ! मैंने यत्लसे
सदैव ही देवताओंके कष्टोंको दूर किया है॥\७०॥
मैने भक्तोंके लिये बहुत बार अनेक कष्ट उठाया
है। मैंने विश्वानर मुनिके घर गृहपतिके रूपमें जन्म
लेकर उनके दुःखको दूर किया है। हे हरे! हे विधे!
में अधिक क्या कहूँ। मैं सत्य कहता हूँ और मेरी जो
प्रतिज्ञा है, उसे भी आपलोग अच्छी तरह जानते
हैं ॥ ७१-७२॥
जब-जब मेरे भक्तोंपर किसी प्रकारक विपत्ति
आती है, तब-तब मैं उन्हें शीघ्र ही सब प्रकारसे दूर
कर देता हूँ॥ ७३॥
इस समय तारकासुरके द्वार जो विपत्ति आपलोगोंपर
आ पड़ी है, उसे भी मैं जानता हूँ। उस दु:खको भी
मैं दूर कर दूँगा, यह मैं सत्यःसत्य कह रहा हूँ॥ ७४॥
यद्यपि मुझे विवाहमें कोई इच्छा नहीं है, तो
भी [आपलोगोंके लिये] पुत्रं उत्पन्न करनेहेतु
गिरिजासे विवाह करूँगा। हे देवताओ! अब
आपलोग निडर होकर अपने-अपने घरोंको जाइये।
मैं आपलोगोंका कार्य सिद्ध करूँगा। इसमें सन्देह
नहीं करना चाहिये॥ ७५-७६॥
ड ९८
्रीशिवमहापुराण
OOOO SN [अ० २५
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा मौनमास्थाय समाधिस्थोऽभवद्धरः।
सर्वे विष्णवादयो देवाः स्वधामानि ययुर्मुने॥ ७७ | समस्त देवता अपने-अपने धामोंको लौट गये \
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! ऐसा कहका क्र |
पुनः मौन धारणकर समाधिस्थ हो गये और विषु
॥ ७७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां सुद्धसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीविवाहस्वीकारो नाम चतुर्विशोऽ ध्याय: ॥ रे
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें |
पार्वतीविवाहस्वीकार नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः |
भगवान् शंकरकी आज्ञासे सप्तर्षियोंद्वारा पार्वतीके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा
करना और वह वृत्तान्त भगवान् शिवको बताकर स्वर्गलोक जाना
नारद उवाच
गतेषु तेषु देवेषु विधिविष्णवादिकेषु च।
सर्वेषु मुनिषु प्रीत्या किं बभूव ततः परम्॥ १
कि कृतं शंभुना तात वरं दातुं समागतः।
कियत्कालेन च कथं तद्वद प्रीतिमावह॥ २
ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु देवेषु ब्रह्मादिषु निजाश्रमम्।
तत्तपः सुपरीक्षार्थं समाधिस्थोऽभवद्भवः॥ ३
स्वात्मानमात्मना कृत्वा स्वात्मन्येव व्यचिन्तयत्
परात्परतरं स्वस्थं निर्मायं निरवग्रहम्॥ ४
'तद्वस्तुभूतो भगवानीश्वरो वृषभध्वज:।
अविज्ञातगतिः सूतिः स हरः परमेश्वरः॥ ५
ब्रह्मोवाच
गिरिजा हि तदा तात तताप परमं तपः।
तपसा तेन रुद्रोऽपि परं विस्मयमागतः॥ ६
समाधेश्चलितस्सोऽभूद्भक्ताधीनोऽपि नान्यथा।
वसिष्ठादीन्मुनीन्सस सस्मार सूतिकृद्धरः॥ ७
सप्तापि मुनयः शीघ्रमाययुः स्मृतिमात्रतः।
प्रसन्नवदनाः सर्वे वर्णयन्तो विधिं बहु॥ ८
प्रणम्य तं महेशानं तुष्टुवुर्हर्षनिर्भरा: ।
वाण्या गद्रदया बद्धकरा विनतकंधराः॥ ९
सत्॒र्षय ऊचुः
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
जाता वयं सुधन्या हि त्वया यदधुना स्मृताः ॥ ९०
नारदजी बोले- [हे ब्रहमन्!] उन ब्रह्मा, विषु
आदि देवताओं तथा सभी मुनियोंके प्रेमपूर्वक चले जाने
फिर क्या हुआ? हे तात! शिवने क्या किया और फि
कितने समयके बाद तथा किस प्रकार वर देनेके लिये
आये, उसे बताइये और प्रीति प्रदान कीजिये ॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले--उन ब्रह्मा आदि देवताओंकि अपने
अपने आश्रमोंको चले जानेपर पार्वतीकी तपस्याकी
परीक्षा करनेके लिये शिवजी समाधिस्थ हो गये॥ ३॥
उन्होंने अपने आत्मासे ही परमात्मामें परात्पर,
निरवग्रह, आत्मस्थित ज्योतिको धारणकर विचार
किया॥४॥
स्तुतः वे शिव ही भगवान्, ईश्वर, वृषभध्वज'
अविज्ञातगति, जगत्स्रष्टा, हर एवं परमेश्वर हँ ॥५॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! उसी समय पार्वतीने
भी महाघोर तपस्या प्रारम्भ की, उस तपसे शंकर भौ
अत्यन्त विस्मित हो गये। भक्तोंके अधीन रहनेवात
वे समाधिसे विचलित हो गये। तब उन जात
हरने वसिष्ठादि सप्तर्षियोंका स्मरण किया। 5";
वे सभी सप्तर्षि भी शिवजीके स्मरण के
प्रसन्नमुख होकर अपने भाग्यकी बहुत साही
हुए वहाँ शीघ्र ही उपस्थित हो गये। उन
प्रणाम करके वे हर्षपूर्वक गद्गद वाणीसे ९!
जोड़कर तथा सिर झुकाकर स्तुति करने लगे॥ i र
सप्तर्षि बोले-हे देवदेव! हे मह 3
करुणासागर! हे प्रभो! हमलोग धन्य हो गे
आपने आज हमलोगोंका स्मरण किया॥ १" ॥
अ० २५]
क्रमर्थ संस्मृता नाथ शासनं देहि तद्धि नः।
स्वदाससदृशीं स्वामिन्कृपां कुरु नमोऽस्तु ते॥ १९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य मुनीनां तु विज्ञप्ति करुणानिधिः।
प्रोवाच विहसन््रीत्या प्रोत्फुल्लनयनाम्बुजः ॥ १२
महेश्वर उवाच
है सप्तमुनयस्ताताः शृणुतारं वचो मम।
अस्मद्धितकरा यूयं सर्वज्ञानविचक्षणाः॥ १३
तपश्चरति देवेशी पार्वती गिरिजाधुना।
गौरीशिखरसंज्ञे हि पर्वते दृढमानसा॥ १४
मां पतिं प्राप्तुकामा हि सा सखीसेविता द्विजा: ।
सर्वान्कामान्विहायान्यान्परं निश्चयमागता॥ १५
तत्र गच्छत यूयं मच्छासनान्मुनिसत्तमाः।
परीक्षां दृढतायास्तत्कुरुत प्रेमचेतसः॥ १६
सर्वथा छलसंयुक्तं वचनीयं वचश्च वः।
न संशयः प्रकर्तव्यः शासनान्मम सुव्रताः १७
ब्रह्मोवाच
इत्याज्ञाश्च मुनयो जग्मुस्तत्र द्रुतं हि ते।
यत्र राजति सा दीपा जगन्माता नगात्मजा॥ १८
तत्र दृष्टा शिवा साक्षात्तपःसिद््ररिवापरा।
मृतां परमतेजस्का विलसन्ती सुतेजसा॥ १९
हदा प्रणम्य तां ते तु ऋषयस्सप्त सुत्रता: ।
सनता वचनं प्रोचुः पूजिताश्च विशेषतः॥ २०
ऋषय ऊचुः
शृणु शैलसुते देवि किमर्थं तप्यते तपः।
इच्छसि त्वं सुरं क॑ च किं फलं तद्वदाधुना॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सा शिवा देवी गिरीन्द्रतनया द्विजैः।
बच: सत्यं सुगूढमपि तत्पुरः ॥ २२
पार्वत्युवाच
पुनोश््वरा: संशृणुत मद्वाक्यं प्रीतितो हृदा
भवीमि स्वविचारं वै चिंतितो यो धिया स्वया॥ २
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
५९९
हे नाथ! आपने किसलिये स्मरण किया है, हम
लोगोंको आज्ञा दीजिये हे स्वरामिन्। अपने दासके समान
ही हमलोगोंपर कृपा कीजिये, आपको प्रणाम है ॥ ११॥
ब्रह्माजी बोले--मुनियोंकी इस विज्ञप्तिको
सुनकर विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले वे
करुणानिधि हंसते हुए प्रेमपूर्वक कहने लगे ॥ १२॥
महेश्वर बोले--हे सप्तर्षिण! आपलोग सभी
प्रकारके ज्ञानमें विचक्षण हैं तथा मेरा हित करनेवाले
हैं। हे तात! मेरी बात शीघ्र सुनिये॥ १३॥
इस समय गौरीशिखर नामक पर्वतपर देवेशी
पार्वती गिरिजा अत्यन्त दृढ़ चित्तसे तपस्या कर
रही है॥ १४॥
हे ऋषियो! सखियोंसे सेवित उसने अपनी
समस्त कामनाओंका त्यागकर बड़ी दृढ़ताके साथ मुझे
अपना पति बनानेके लिये निश्चय कर लिया है ॥ १५॥
हे मुनिश्रेष्ठो! आपलोग मेरी आज्ञासे वहाँ जाइये
और उसके प्रेम एवं दृढ़ताकी परीक्षा कीजिये॥ १६॥
हे सुव्रतो! मेरी आज्ञा है कि आपलोग उससे सर्वथा
छलयुक्त वचन कहिये, इसमें संशय न कीजिये ॥ १७॥
ब्रह्माजी बोले-शिवजीकी आज्ञा प्राप्तकर
मुनिगण उसी समय उस स्थानपर गये, जहाँ जगन्माता
पार्वती तपस्या कर रही थीं । उन लोगोंने वहाँ साक्षात्
दूसरी तपःसिद्धिके समान, तेजसे देदीप्यमान और
'परमतेजकी मूर्तिस्वरूपा पार्वतीको देखा॥ १८-१९॥
हे सुक्रतो! उन सप्तर्षियोंने हृदयसे पार्वतीको
प्रणाम करके उनसे विशेष रूपसे सत्कृत हो विनम्र
होकर यह वचन कहा-॥ २०॥
ऋषिगण बोले-हे शैलसुते! देवि! सुनो, तुम
किस उद्देश्यसे तपस्या कर रही हो? तुम किस
देवताको प्रसन्न करना चाहती हों और क्या फल
चाहती हो, उसे इस समय बताओ॥ २१॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] जब उन सप्तर्षियोंने
इस प्रकार देवी पार्वतीसे कहा, तब वे सत्य तथा अत्यन्त
गोपनीय वचन उनके सामने कहने लगीं- ॥ २२॥
पार्वती बोलीं-हे मुनीश्वरो! मैंने अपनी
बुद्धिसे जो विचार किया है, उसे आपके समक्ष प्रकट
करती हूँ। आपलोग प्रेमपूर्वक मेरी बात सुनें॥ २३॥
ड ००
श्रीशिवमहापुराण
[अ १ ` ` ९९७९७ `` ० का
करिष्यथ प्रहासं मे श्रुत्वा वाचो ह्यसंभवाः।
संकोचो वर्णनाह्विप्रा भवत्येव करोमि किम्॥ २४
इदं मनो हि सुदृढमवशं परकर्मकृत्।
जलोपरि महाभित्तिं चिकीर्षति महोन्नताम्॥ २५
सुरर्षेः शासनं प्राप्य करोमि सुदृढं तपः।
रूद्रः पतिर्भवेन्मे हि विधायेति मनोरथम्॥ २६
अपक्षो मन्मनःपक्षी व्योझ्षि उड्डीयते हठात्।
तदाशां शंकरः स्वामी पिपक्तु करुणानिधिः ॥ २७
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या व्रिहस्य मुनयश्च ते।
सम्मान्य गिरिजां प्रीत्या प्रोचुश्छलवचो मृषा॥ २८
ऋषय ऊचुः
ज ज्ञातं तस्य चरितं वृथापण्डितमानिनः।
देवर्षेः क्रूरमनसः सुज्ञा भूत्वाप्यगात्मजे॥ २९
नारद: कूटवादी च परचित्तप्रमंथकः।
तस्य वार्ताश्रवणतो हानिर्भवति सर्वथा॥ ३०
तत्र त्वं श्रृणु सद्बुद्ध्या चेतिहासं सुशोभितम्।
क्रमात्त्वां बोधयंतो हि प्रीत्या तमुपधारय॥ ३१
ब्रह्मपुत्रो हि यो दक्षः सुषुवे पितुराज्ञया।
स्वपल्यामयुतं पुत्रानयुंक्त तपसि प्रियान्॥ ३२
ते सुताः पश्चिमदिशि नारायणसरो गताः।
तपोऽथ ते प्रतिज्ञाय नारदस्तत्र वै ययौ॥ ३३
कूटोपदेशमाश्राव्य तत्र तान्नारदो मुनिः।
तदाज्ञया च ते सर्वे पितुर्न गृहमाययुः॥ ३४
तच्छुत्वा कुपितो दक्षः पित्राश्चासितमानसः।
उत्पाद्य पुत्रान्प्रायुङ्क्त सहस्त्रप्रमितांस्तत:॥ ३५
तेऽपि तत्र गताः पुत्राः तपोऽर्थं पितुराज्ञया।
नारदोऽपि ययौ तत्र पुनस्तत्स्वोपदेशकृत्॥ ३६
| चशमें हो गया है और जलके ऊपर बहुत ऊँची दीवा.
हे विप्रो! आपलोग मेरी असम्भव बात सुनकर |
परिहास करेंगे, इसलिये उसे कहनेमें भी मुझे संकोच |
हो रहा है, पर मैं क्या करूँ? आपलोगोंके पूछने
कह रही हूँ.॥ २४॥
मेरा यह मन बड़ी दृढ्तासे हठपूर्वक दूसोके
उठाना चाहता है। सदाशिव ही पति हों |
मनोरथ लेकर देवर्षि नारदकी आज्ञा प्राप्त करके मै
अति कठोर व्रत कर रही हूँ। इसमें मेरे मनरूपी |
पक्षीको यद्यपि पंख नहीं हैं, फिर भी यह हह पूर्वक
आकाशमें उड्ना चाहता है। करुणासागर स्वामी
शंकर मेरी उस आशाको पूर्ण करें॥ २५-२७॥
ब्रह्माजी बोले-उनकी यह बात सुनकर वे
मुनि गिरिजाका सम्मान करके हँसकर प्रेमपूर्वक
मिथ्या तथा छलयुक्त वचन कहने लगे॥ २८॥
ऋषिगण बोले--हे पर्वतराजपुत्रि! बुद्धिमती होक
भी तुमने व्यर्थ ही अपनेको पण्डित माननेवाले तथा क्रू
चित्तवाले उस देवर्षि नारदका चरित्र नहीं जाना है॥ २९॥
बह नारद तो मिथ्यावादी और दूसरेके चित्तको
भुलावेमें डालनेवाला है, उसकी बात सुननेसे सर्वया
हानि ही होती है। उस नारदके सम्बन्धमें एक सु
इतिहास हमलोग कह रहे हैं, उसको तुम उत्तम
बुद्धिसे सुनो और प्रेमपूर्वक उसे अपने हृदयमें धार
करो॥ ३०-३१॥
ब्रह्माके पुत्र दक्षने अपने पिताकी आज्ञासे अफ
पलीसे दस हजार प्रिय पुत्र उत्पन्न किये और उनकी
तपस्यामें नियुक्त किया । तपस्याके लिये प्रतिज्ञा करके
वे दक्षपुत्र पश्चिम दिशामें नारायण सरोवरपर गये,
भी वहाँ पहुँच गये। उन नारदने उन्हें मिथ्या उपदे
देकर विरक्त कर दिया और उनकी आज्ञासे नै 5
अपने पिताके घर लौटकर नहीं आये॥ ३२-१५
यह समाचार सुनकर दक्ष अत्यन्त व्या
उठे | ब्रह्मदेवने उन्हें धैर्य प्रदान किया । a भर
पुनः एक हजार पुत्र उत्पन्न किये और उन अदा
तपकार्यमें नियुक्त किया | वे भी अपने पिताकी हच
वहीं तप करनेके लिये गये । पुनः नारद वहीं
और उन्हें भी अपना उपदेश दिया॥ ३५-१६
अ० २५]
द्दौ तदुपदेशं ते तेभ्यो भ्रातृपथं ययु:।
आययुर्न पितुर्गेहे भिक्षुवृत्तिरताश्च ते॥ ३७
इत्थं नारदसदवृत्तिर्विश्रुता शैलकन्यके।
अन्या शृणु हि तदवृत्तिं वैराग्यकरणीं नृणाम्॥ ३८
विद्याधरश्चित्रकेतुर्यो बभूव पुराकरोत्।
स्वोपदेशमयं दत्त्वा तस्मै शून्यं च तदगृहम्॥ ३९
्रह्मदाय स्वोपदेशान्हिरण्यकशिपोः परम्।
दत्त्वा दुःखं ददौ चायं परबुद्धिप्रभेदक:॥ ४०
मुनिना निजविद्या यच्छाविता कर्णरोचना।
स स्वगेहं विहायाशु भिक्षां चरति प्रायशः ॥ ४१
नारदो मलिनात्मा हि सर्वदोज्ज्चलदेहवान्।
जानीमस्तं विशेषेण वयं तत्सहवासिनः॥ ४२
बकं साधुं वर्णयन्ति स मत्स्यानत्ति सर्वथा।
सहवासी विजानीयाच्चरित्रं सहवासिनाम्॥ ४३
लब्ध्वा तदुपदेशं हि त्वमपि प्राज्ञसंमता।
वृथैव मूर्खीभूता त्वं तपश्चरसि दुष्करम्॥ ४४
यदर्थमीदूशं बाले करोषि विपुलं तपः।
सोदासीनो निर्विकारो मदनारिर्न संशयः॥ ४५
अमङ्गलवपुर्धारी निल॑ज्जोऽसदनोऽकुली।
कुवेषी प्रेतभूतादिसङ्गी नग्नो हि शूलभृत्॥ ४६
स धूर्तस्तव विज्ञानं विनाश्य निजमायया।
सदयुक्त्या कारयामास चै तपः॥ ४७
ह ह बरं लब्ध्वा किं सुखं संभविष्यति।
विचारं कुरु देवेशि त्वमेव गिरिजात्मजे॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६०१
[उसका उपदेश मानकर] वे भी अपने भाइयोंके
मार्गपर चले गये और भिक्षावृत्तिमें संलग्न हो गये। वे
पुन: अपने पिताके घर नहीं आये। नारदका यह चरित्र
है, जो जगत्में प्रसिद्ध है । हे शैलपुत्रि ! मनुष्योंको विरक्त
करनेवाले उनके अन्य चरित्रको भी सुनो ॥ ३७-३८ ॥
पूर्व समयमें एक विद्याधर था, जो चित्रकेतु
नामका राजा हुआ था। उसको भी इसी नारदने
उपदेश देकर उसका घर सूना कर दिया। प्रह्मादको
उपदेश देकर हिरण्यकशिपुसे नाना प्रकारके दुःख
दिलवाये। इस प्रकार वह [उलटा उपदेश देकर]
दूसरोंकी बुद्धि फेर देता है ॥ ३९-४०॥
इस नारदने कानोंको प्रिय लगनेवाली अपनी
विद्या जिन-जिन लोगोंको सुनायी, वे शीघ्र ही प्रायः
अपना घर छोड़कर भिक्षा माँगने लगे॥ ४१ ॥
वे नारद यद्यपि देखनेमें बड़े सज्जन लगते हैं,
किंतु उनका मन मलिन है, हमलोग उनके साथ रहनेके
कारण उनका चरित्र विशेषरूपसे जानते हैं ॥ ४२ ॥
बगुलेके श्वेत वर्ण शरीरकों देखकर सब लोग
उसे साधु कहते हैं। फिर भी क्या वह मछली नहीं
खाता। साथमें रहनेवाला ही साथ रहनेवालोंका
[वास्तविक] चरित्र जानता है ॥ ४३॥
तुम तो परम बुद्धिमती हो, फिर कैसे उनके उपदेशमें
फँसकर मूर्खोकी तरह कठिन तपस्यामें लग गयी !॥ ४४॥
है बाले! यह परम दुःखकी बात है कि तुम
जिसे अपना पति बनानेके लिये इतना कठिन तप कर
रही हो, वह कामदेवका शत्रु है और उदासीन तथा
निर्विकार है॥ ४५॥
वह अमंगल वेष धारण करनेवाला शिव निर्लज्ज
है, उसके घरका तथा कुलका आज तक किसीको
पता नहीं है, वह कुवेषी, भूत एवं प्रेतादिका साथ
करनेवाला, त्रिशूल धारण करनेवाला और नग्न
रहनेवाला है॥ ४६॥
उस धूर्त नारदने अपनी मायासे तुम्हारे ज्ञानको
नष्ट करके बड़ी युक्तिसे तुम्हें मोहित कर दिया और
तुमसे तपस्या 'करवायी ॥ ४७॥
ऐसे वरको प्राप्तकर तुम्हें क्या सुख मिलेगा?
हे देवेशि! हे पार्वति! तुम्हीं विचार करो॥४८॥
नड ०२
श्रीशिवमहापुराण
[अण का णी `
प्रथमं दक्षजां साध्वीं विवाह्य सुधिया सतीम्।
निर्वाहं कृतवान्नैव मूढः किंचिद्दिनानि हि॥ ४९
तां तथैव स वै दोषं दत्त्वात्याक्षीत् स्वयं प्रभुः।
ध्यायन्स्वरूपमकलमशोकमरमत्सुखी ॥ ५०
एकल: परनिर्वाणो ह्यसड्ठो$द्रय एव च।
तेन नार्या: कथं देवि निर्वाह: संभविष्यति॥ ५१
अद्यापि शासनं प्राप्य गृहमायाहि दुर्मतिम्।
त्यजास्माकं महाभागे भविष्यति च शं तव॥ ५२
त्वद्योग्यो हि वरो विष्णुः सर्वसद्गुणवान्प्रभुः
वैकुण्ठवासी लक्ष्मीशो नानाक्रीडाविशारदः॥ ५३
तेन ते कारयिष्यामो विवाहं सर्वसौख्यदम्।
इतीदूशं त्यज हठं सुखिता भव पार्वति॥ ५४
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा पार्वती जगदम्बिका।
विहस्य च पुनः प्राह मुनीन् ज्ञानविशारदान्॥ ५५
यार्वत्युवाच
सत्यं भवद्भिः कथितं स्वज्ञानेन मुनीश्वराः ।
परंतु मे हठो नैव मुक्तो भवति हे द्विजाः ॥ ५६
स्वतनोः शैलजातत्वात्काठिन्यं सहजं स्थितम्।
इत्थं विचार्य सुधिया मां निषेद्धुं न चार्हथ ॥ ५७
सुर्षे्वचनं पथ्यं त्यक्ष्ये नैव कदाचन।
गुरूणां वचनं पथ्यमिति वेदविदो विदुः॥ ५८
गुरूणां वचनं सत्यमिति येषां दृढा मति: ।
तेषामिहामुत्र सुखं परमं नासुखं क्वचित् ॥ ५९
गुरूणां वचनं सत्यमिति यद्धूदये न धीः।
इहामुत्रापि तेषां हि दुःखं न च सुखं क्वचित् ॥ ६०
मूढ़ शिवने सद्बुद्धिसे दक्षकन्या सतीसे पह
विवाह करके कुछ दिन भी उसका निर्वाह नहीं |
और सतीको ही दोष लगाकर उसका स्वयं त्याग क |
दिया। वे तो अपने अकल, अशोक स्वरूपका ध्यान के
हुए सुखी होकर रमण करते रहे । वे तो अकेले, परिव |
असंग तथा अद्वैत हैं, हे देवि! उनके साथ स्त्रीका निह |
किस प्रकार सम्भव होगा ?॥ ४९--५१ ॥
अब भी तुम हमारी बात मानकर घर चनन
जाओ और अपनी दुर्बुद्धिका त्याग कर दो। हे |
महाभागे! [ऐसा करनेसे] तुम्हारा कल्याण होगा॥५२॥ |
तुम्हारे योग्य वर विष्णु हैं, सभी सद्गुणो
सम्पन्न वे प्रभु वैकुण्ठमें निवास करनेवाले, लक्ष्मीके
ईश और नाना प्रकारकी क्रीड़ाओंमें कुशल हैं॥५३॥
हमलोग तुम्हारा विवाह उन विष्णुसे कराये,
वह विवाह सब प्रकारके सुखोंको देनेवाला है। है
पार्वति! तुम इस प्रकारके हठका परित्याग करो और |
सुखी हो जाओ॥ ५४॥
ब्रह्माजी बोले-इस वचनको सुनकर जगदम्बा |
पार्वती हँसकर उन ज्ञानविशारद मुनियोंसे पुनः कहे |
लगीं-- ॥ ५५॥
पार्वती बोलीं--हे मुनिगण! आपलोग यद्यपि
अपने विचारसे सत्य कह रहे हैं, किंतु हे दविज! मेर
हठ नहीं छूटेगा॥ ५६॥ नील
पर्वतसे उत्पन्न होनेके कारण मेरे इस शरीर
काठिन्य एवं हठका होना स्वाभाविक है, ऐसा
बुद्धिसे विचारक हे ब्राह्मणो ! मुझे तपस्यासे मना में
कोजिये॥ ५७॥ र
मेरे लिये नारदजीका वचन सर्वथा हितकर है।
उनका परित्याग कदापि नहीं करूंगी । वेदवेत्ता
कहते हैं कि गुरुका वचन कल्याणकारी होता हैं॥ ५०
जिन लोगोंने बुद्धिसे यह निश्चित किया
गुरुके वचन सर्वदा सत्य हैं, उनको इस ली
परलोकमें सदैव सुख प्राप्त होता है। उन्हें कभी ४
होता ही नहीं ॥ ५९॥
जिन लोगेकि हृदयमें यह विचार नही हैं कि प.
वचन सत्य होता है, उन्हें इस लोक एवं
दुःख ही दुःख होता है, उन्हें सुख कभी नहीं होता
६०॥
अ० २५ ]
सर्वथा न परित्याज्यं गुरूणां वचनं द्विजा:।
गृहं वसेद्वा शून्यं स्यान्मे हठः सुखदः सदा॥ ६१
यद्भवद्धिः सुभणितं वचनं मुनिसत्तमाः।
तदन्यथा तद्विवेके वर्णयामि समासतः॥ ६२
गुणालयो विहारी च विष्णुः सत्यं प्रकीर्तितः।
सदाशिवोऽगुणः प्रोक्तस्तत्र कारणमुच्यते॥ ६३
शिवो ब्रह्माविकारः स भक्तहेतोर्धृताकृतिः।
प्रभुतां लौकिकीं नैव संदर्शयितुमिच्छति॥ ६४
अतः परमहंसानां धार्यते सुप्रिया गतिः।
अवधूतस्वरूपेण परानंदेन शंभुना॥ ६५
भूषणादिरुचिर्मायालिप्तानां ब्रह्मणो न च।
स प्रभुर्निगुणो5जो निर्मायोऽलक्ष्यगतिर्विराट्॥ ६६
धर्मजात्यादिभिः शम्भुर्नानुगृह्णाति वै द्विजाः।
गुरोरनुग्रहेणैब शिवं जानामि तत्त्वतः ॥ ६७
चेच्छिवः स हि मे विप्रा विवाहं न करिष्यति।
अविवाहा सदाहं स्यां सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ ६८
उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे
प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्निः।
विकसति यदि पदां पर्वताग्रे शिलायां
ने हि चलति हठो मे सत्यमेतद् ब्रवीमि॥
ब्रह्मोवाच
इतुका तान्प्रणम्याशु मुनीन्सा पर्वतात्मजा।
शिवं स्मृत्वा निर्विकारेण चेतसा॥ ४०
ऋषयोऽपीत्थमाज्ञाय गिरिजायाः सुनिश्चयम्।
प्रोचुर्जयगिरं तत्र ददुश्वाशिषमुत्तमाम् ॥ ७१
अथ प्रणम्य तां देवीं मुनयो हृष्टमानसा:।
शिवस्थानं रुतं जम्मुस्तत्परीक्षाकरा मुने॥ ७२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६०३
हे ब्राह्मणो! गुरुओंके वचनका किसी प्रकार
त्याग नहीं करना चाहिये। चाहे घर बसे अथवा
उजड़े--यह हठ मुझे सदा सुख देनेवाला है॥ ६१॥
हे मुनिसत्तमो! आपलोगोंने जो वचन कहा
है, उस विषयमें मैं संक्षेपमें अपना विचार प्रकट
करती हूँ॥ ६२॥
आपलोगोंने जो विष्णुको सर्वगुणसम्पन्न,
वैकुण्ठमें विहार करनेवाला तथा सदाशिवको
निर्गुण एवं निर्विकार कहा है, वह सत्य ही है,
इसका कारण मैं आपलोगोंको बताती हूँ। शिव
परब्रह्म एवं विकाररहित हैं, वे भक्तोंक लिये ही
शरीर धारण करते हैं। वे प्रभु कभी भी सांसारिक
प्रभुता दिखानेकी इच्छा नहीं करते। अतः परमानन्द
शम्भु अवधूतस्वरूपसे परमहंसोंकी प्रिय गति धारण
करते हैं॥ ६३-६५॥
मायामें लिप्त रहनेवालोंको ही भूषणादिमें
अभिरुचि होती है, ब्रह्मको किसी प्रकारकी कोई
अभिरुचि नहीं होती। वे सदाशिव प्रभु निर्गुण, अज,
मायारहित, अलक्ष्यगति एवं विराट् हैं॥ ६६॥
हे द्विजो! धर्म, जाति आदिके द्वारा ही शम्भुका
अनुग्रह नहीं होता है, मैं तो गुरुके अनुग्रहसे ही
शिवको तत्त्वपूर्वक जानती हूँ। हे ब्राह्मणो! यदि शंकर
मेरे साथ विवाह नहीं करेंगे, तो मैं सर्वदा अविवाहित
रहुँगी, यह मैं सत्य-सत्य कहती हूँ॥ ६७-६८॥
चाहे सूर्य पश्चिम दिशामें उदय हो, सुमेरु
चलायमान हो जाय, अग्नि शीतल हो जाय, पर्वतपर
कमल खिलने लगें, किंतु मेरा हठ नहीं डिगेगा, यह
मैं सत्य कहती हूँ॥ ६९॥
ब्रह्माजी बोले-यह कहकर और उन
मुनियोंको प्रणाम करके वे पार्वती विकाररहित
चित्तसे शिवजीका स्मरणकर मौन हो गयीं। तदनन्तर
ऋषियोंने भी पार्वतीका यह निश्चय जानकर उनकी
जयजयकार की और उन्हें उत्तम आशीर्वाद प्रदान
किया। हे मुने! शिवाकी परीक्षा करनेवाले वे मुनिगण
उन देवीको प्रणामं करके प्रसन्नचित्त होकर शीघ्र ही
शिवस्थानको चले गये॥ ७०-७२॥
त o¥
श्रीशिवमहापुराण
|
तत्र गत्वा शिवं नत्वा वृत्तान्तं विनिवेद्य ततू।
तदाज्ञां समनुप्राप्य स्वलोंकं जग्मुरादरात्॥ ७३ | आदरपूर्वक स्वर्गलोकको चले गये॥ ७३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्दसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे सप्तर्षिकृतपरीक्षावर्षन॑ नाम पञ्चविंशोऽध्यायः; IR,
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें के
सप्तर्षिकृतपरीक्षावर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
पार्वतीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शिवका जटाधारी ब्राह्मणका
वेष धारणकर पार्वतीके समीप जाना, शिव-पार्वती-संवाद
ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु मुनिषु स्वं लोकं शंकरः स्वयम्।
परीक्षितुं तपो देव्या ऐच्छत्सूतिकरः प्रभुः॥ १
परीक्षाछदाना शांुर्द्रष्टुं तां तुष्टमानसः।
जटिलं रूपमास्थाय स ययौ पार्वतीवनम्॥ २
अतीव स्थविरो विप्रदेहधारी स्वतेजसा।
प्रज्वलन्मनसा हृष्टो दंडी छत्री बभूव सः॥ ३
तत्रापश्यत्स्थितां देवीं सखीभिः परिवारिताम्।
वेदिकोपरि शुद्धां तां शिवामिव विधोः कलाम्॥ ४
शंभुनिरीक्ष्य तां देवीं ब्रह्मचारिस्वरूपवान्।
उपकंठं ययौ प्रीत्या तदासौ भक्तवत्सलः॥ ५
आगतं तं तदा दृष्ट्वा ब्राह्मणं तेजसाद्भुतम्।
अपूजयच्छिवा देवी सर्वपूजोपहारकैः॥ ६
सुसत्कृतं संविधाभिः पूजितं परया मुदा।
पार्वती कुशल प्रीत्या पप्रच्छ द्विजमादरात्॥ ७
पार्वत्युवाच
ब्रह्मचारिस्वरूपेण कस्त्वं हि कुत आगत: ।
इदं वनं भासयसे वद् वेदविदां वर॥ ८
विप्र उवाच
अहमिच्छाभिगामी च वृद्धो विप्रतनुः सुधीः ।
तपस्वी सुखदोऽन्येषामुपकारी न संशय:॥ ९
[अ ~ = = या यानाः ``
वे लोग वहाँ जाकर शिवको प्रणाम करके |
वत्तान्तका निवेदनकर उनकी आज्ञा प्राप्त के
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उन मुनियोंके अपे.
अपने लोक चले जानेपर जगत्स्रष्टा प्रभु शिवने स्वयं
पार्वतीके तपकी परीक्षा लेनेकी इच्छा की॥१॥ ।
प्रसन्नचित्त वे शिवजी परीक्षाके बहाने उन्हे देखनेके
लिये जटाधारीरूप धारणकर पार्वतीके वनमें गये॥ २॥
उन्होंने प्रसन्न मनसे बूढ़े ब्राह्मणका वेष धारण
किया और अपने तेजसे देदीप्यमान हो दण्ड तथा छा
धारण कर लिया था॥ ३॥
वहाँपर उन्होंने सखियोंसे घिरी हुई उन विशुद्ध
पार्वतीको वेदीपर बैठी हुई साक्षात् चन्रकलाके समाग
देखा॥ ४॥
तब ब्रह्मचारीका रूप धारण किये हुए वे
भक्तवत्सल शिव उन देवीको देखकर प्रेमपूर्वक उनके
समीप गये॥ ५॥
उस अपूर्व तेजस्वी ब्राह्मणको आया हुँ
देखकर शिवादेबीने सभी प्रकारकी पूजासामग्री
उनका पूजन किया। इस प्रकार भलीभाँति पर्णी
सत्कार करनेके अनन्तर पार्वतीजी प्रसन्नताके सांथ प
ब्राह्मणसे आदरपूर्वक कुशल पूछने लगीं-- | 57
पार्वती बोलीं--हे ब्राह्मण! ब्रह्मचारीका ह?
धारण किये हुए आप कौन हैं और कहाँसे आबे
आप इस वनको प्रकाशित कर रहे हैं | हे वेदैर
शरेष्ठ! यह सब मुझसे कहिये॥ ८॥
ब्राह्मण बोले मैं वृद्ध ब्राह्मणकां शरीर बुढा
किये अपने इच्छानुसार चलनेवाला एक उरी
तपस्वी हूँ, मैं दूसरोंको सुख देनेवाला तथा
उपकार करनेवाला हूँ, इसमें संशय नहीं है॥
९॥
अ० २६ ]
का त्वं कस्यासि तनया किमर्थं विजने वने।
तपश्चरसि दुर्धर्षं मुनिभिः प्रपदैरपि॥ १०
न बाला न च वृद्धासि तरुणी भासि शोभना।
क्रथं पतिं विना तीक्ष्णं तपश्चरसि वै वने॥ १९
किं त्वं तपस्विनी भद्रे कस्यचित्सहचारिणी।
तपस्वी स न पुष्णाति देवि त्वां च गतोऽन्यतः॥ १२
वद कस्य कुले जाता कः पिता तव काभिधा।
मरहासौभाग्यरूपा त्वं वृथा तव तपोरतिः॥ १३
किं त्वं वेदप्रसूर्लक्ष्मीः किं सुरूपा सरस्वती।
एतासु मध्ये का वा त्वं नाहं तर्कितुमुत्सहे ॥ १४
पार्वत्युवाच
नाहं वेदप्रसूर्विप्र न लक्ष्मीश्च सरस्वती।
अहं हिमाचलसुता सांप्रतं नाम पार्वती॥ १५
पुरा दक्षसुता जाता सती नामान्यजन्मनि।
योगेन त्यक्तदेहाहं यत्पित्रा निन्दितः पतिः॥ १६
अत्र जन्मनि संप्राप्तः शिवोऽपि विधिवेभवात्।
मा त्यक्त्वा भस्मसात्कृत्य मन्मथं स जगाम ह॥ १७
प्रयाते शंकरे तापोद्विजिताह पितुर्गृहात्।
आगता तपसे विप्र सुदूढा स्वर्णदीतटे॥
कृत्वा तप: कठोरं च सुचिरं प्राणवल्लभम्।
भे प्राप्याग्रो विविक्षन्ती त्वां दृष्ट्वा संस्थिता क्षणम्॥ १९
गच्छ तवं प्रविशाम्यग्नौ शिवेनाड्रीकृता न हि।
श्र यत्र जनुर्लप्स्ये वरिष्यामि शिवं वरम्॥ २०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६०५
तुम कौन हो और किसकी कन्या हो, इस निर्जन
वनमें अकेली रहकर इतनी कठिन तपस्या क्यों कर
रही हो, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर है॥ १०॥
तुम न तो बाला हो, न ही वृद्धा, तुम तो सर्वथा
तरुणी जान पड़ती हो | पतिके बिना इस वनमें इतनी
कठोर तपस्या क्यों कर रही हो? हे भद्रे! क्या तुम
किसी तपस्वीकी सहचारिणी हो, जो इतनी घोर
तपस्यामें निमग्न हो। क्या वह तपस्वी तुम्हारा पोषण
नहीं करता अथवा तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चला गया
है ?॥ ११-१२॥
तुम किसके कुलमें उत्पन्न हुई हो, तुम्हारे
पिता कौन हैं तथा तुम्हारा क्या नाम है, यह बताओ,
तुम तो सौभाग्य-शालिनी हो, तपस्यामें तुम्हारी आसक्ति
तो व्यर्थ ही हैं॥ १३॥
क्या तुम वेदोंकी जन्मदात्री सावित्री हो या महालक्ष्मी
हो अथवा सुन्दर रूप धारण किये हुए सरस्वती हो!
इनमें तुम कौन हो! में अनुमान नहीँ कर पा रहा हूँ॥ १४॥
पार्वती बोलीं--हे विप्र! न तो मैं सावित्री हूँ, न
महालक्ष्मी और न ही सरस्वती ही हूँ । मैं हिमालयको
पुत्री हूँ और मेरा वर्तमान जाम पार्वती है ॥ १५॥
पूर्वजन्ममें मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय मेरा
नाम सती था। मेरे पिताने मेरे पतिकी निन्दा की थी,
इसलिये मैंने [योगमार्गका अवलम्बनकर] अपना
शरीर त्याग दिया था। मैंने इस जन्ममें भी भाग्यवश
शिवजीको ही प्राप्त किया, परंतु वे कामदेवको
जलाकर मुझे छोड़कर चले गये। हे विप्र! शंकरजीके
चले जानेपर मैं कष्टसे उद्टिग्न हो गयी और तपके
लिये दृढ़ होकर पिताके घरसे गंगाके तटपर चली
आयी॥ १६--१८॥
बहुत समयतक कठोर तपस्या करनेके बाद भी
मेरे प्राणवल्लभ सदाशिव मुझे प्राप्त नहीं हुए, इस
कारण मैं अग्निमें प्रवेश करना चाहती थी, किंतु
आपको देखकर क्षणमात्रके लिये रुक गयी॥ १९॥
अब आप जाइये। शिवजीने मुझे अंगीकार नहीं
किया, इसलिये मैं अब अग्निमें प्रवेश करूँगी। मैं
जहाँ जहाँ जन्म लूँगी, वहाँ भी शिवको ही वररूपमें
प्राप्त करूँगी॥ २०॥
न्य ०६
श्रीशिवमहापुराण
[अ व जमा काका यी
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा पार्वती बह्नौ तत्पुरः प्रविवेश सा।
निषिध्यमाना पुरतो ब्राह्मणेन पुनः पुनः॥ २१
वहिप्रवेशं कुर्वत्याः पार्वत्यास्तत्प्रभावतः।
बभूव तत्क्षणं सद्यो वह्निश्चन्दनपङ्कवत्॥ २२
क्षणं तदन्तरे स्थित्वा ह्युत्पतन्तीं दिवं द्विजः।
पुनः पप्रच्छ सहसा विहसन्सुतनुं शिवः॥ २३
द्विज उवाच
अहो तपस्ते किं भत्रे न बुद्धं किञ्चिदेव हि।
ज दग्धो वह्निना देहो न च प्राप्तं मनीषितम्॥ २४
अतः सत्यं निकामं वै वद् देवि मनोरथम्।
ममाग्रे विप्रवर्यस्य सर्वानंदप्रदस्य हि॥ २५
यथाविधि त्वया देवि कीर्त्यतां सर्वथात्मना।
तस्मान्मैत्री च संजाता कार्य गोप्यं त्वया न हि॥ २६
किमिच्छसि वरं देवि प्रष्टुमिच्छाम्यतःपरम्।
त्वय्येव तदसौ देवि फलं सर्व प्रदृश्यते॥ २७
परार्थे च तपश्चैद्दे तिष्ठेत्तु तप एव तत्।
रत्नं हस्ते समादाय हित्वा काचस्तु संचितः ॥ २८
ईदृशं तव सौन्दर्य कथं व्यर्थीकृतं त्वया।
हित्वा वस्त्राण्यनेकानि चर्मादि च धृतं त्वया॥ २९
तत्सर्व कारणं ब्रूहि तपसस्त्वस्य सत्यतः।
तच्छुत्वा विप्रवर्योऽहं यथा हर्षमवाण्नुयाम्॥ ३०
ब्रह्मोवाच
इति पृष्टा तदा तेन सखीं प्रैरयताम्बिका।
तन्मुखेनैव तत्सर्वं कथयामास सुक्रता॥ ३१
तया च प्रेरिता तत्र पार्वत्या विजयाभिधा।
प्राणप्रिया सुव्रतज्ञा सखी जटिलमत्रवीत्॥ ३२
सख्युवाच
श्रृणु साधो प्रवक्ष्यामि पार्वतीचरितं परम्।
हेतुं च तपसस्सर्व यदि त्वं श्रोतुमिच्छसि॥ ३३
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर पारी |
ब्रह्मचारीद्वार बारम्बार निषेध करनेपर भी अग्निमे क.
गयीं । पार्वतीके अग्निमें प्रवेश करते ही उनकी तपस्ये
प्रभावसे वह अग्नि उसी समय शीघ्र ही चन्दनके
शीतल हो गयी | क्षणभर अग्निमें रहनेके बाद ज्यों हवे
चुलोक जानेको उद्यत हुई, तब [विप्ररूप] शिव हँस
हुए उन सुन्दरांगीसे सहसा पूछने लगे-- ॥ २१ २३॥
द्विज बोले--हे भद्रे! तुम्हारी यह कैसी तपस्या
है ? मुझे तो तुम्हारी इस तपस्याका कुछ भी फल नहीं
जान पड़ता। इस अग्निने तुम्हारे शरीरको भी मह |
जलाया और तुम्हारा मनोरथ भी प्राप्त नहीं हुआ॥ २४॥ |
इसलिये हे देवि! सब प्रकारका आनन्द प्रदान
करनेवाले मुझ विप्रवरके सामने तुम अपना मनोर
ठीकसे कहो, हे देवि! तुम पूर्णरूपसे इस बातको
यथाविधि कह दो। [परस्पर बातचीतसे] हमारौः
तुम्हारी मित्रता हो गयी, अतः तुम्हें इस बातको
गोपनीय नहीं रखना चाहिये॥ २५-२६॥
हे देवि! इसके पश्चात् मैं पूछना चाहता हूँ कि
तुम कौन-सा वरदान चाहती हो ? हे देवि! मुझे सा
वरदानका फल तुम्हींमें दिखायी पड़ रहा है॥ २७॥
यह तपस्या यदि तुमने दूसरेके लिये की है, तो वह
सारा-का-सारा तुम्हारा तप व्यर्थ हो गया और तुमने हाथ
रत्नको ले करके उसे खोकर पुन: काँच धारण किया॥ २८॥
इस प्रकारकी अपनी सुन्दरता तुमने वब
क्यों कर दी ? अनेक प्रकारके वस्त्र त्यागकर तुमने यह
मृगचर्म क्यों धारण किया ? इसलिये तुम इस तपस्या
सारा कारण सत्य-सत्य बताओ, जिससे कि उसे सुरि"
ब्राह्मणोमें श्रेष्ठ मैं प्रसन्नता प्राप्त करूँ॥ २९:३०
ब्रह्माजी बोले--जब इस प्रकार उस
पार्वतीसे पूछा, तब उन सुत्रताने अपनी सखीकी |
किया और उसके मुखसे सारा वृत्तान्त ससव त
तदनन्तर उस पार्वतीसे प्रेरित होकर विज
प्राणोंके समान प्रिय तथा उत्तम त्रतको जाननेवाली i
नामकी सखी उस ब्रह्मचारीसे कहने लगी- | २.
सखी बोली--हे साधो! यदि आप इस प
श्रेष्ठ चरित्र एवं इसकी तपस्याका समस्त
जानना चाहते है, तो मैं उसे कहूँगी, आप सुग
३३ ||
अ० २६]
सखी मे गिरिराजस्य सुतेयं हिमभूभृतः।
ख्याता वै पार्वती नाम्ना तस्या मातास्ति मेनका ॥ ३४
ऊढेयं न च केनापि न वाञ्छति शिवात्परम्।
त्रीणि वर्षसहस्राणि तपश्चरणसाधिनी॥ ३५
तदर्थ मेऽनया सख्या प्रारब्धं तप ईदूशम्।
तदत्र कारणं वक्ष्ये शृणु साधो द्विजोत्तम॥ ३६
हितवेनदरप्रमुखान्देवान् हरि ब्रह्माणमेव च।
पतिं पिनाकपाणिं वै प्राप्तुमिच्छति पार्वती॥ ३७
इयं सखी मदीया वै वृक्षानारोपयत्पुरा।
तेषु सर्वेषु संजातं फलपुष्पादिकं द्विज॥ ३८
रूपसार्थाय जनककुलालंकरणाय च।
समुद्दिश्य महेशानं कामस्यानुग्रहाय च॥ ३९
मत्सखी नारदादेशात्तपस्तपति दारुणम्।
मनोरथं कुतस्तस्या न फलिष्यति तापस॥ ४०
त्ते पृष्टं द्विजश्रेष्ठ मत्सख्या मनसीप्सितम्
मया ख्यातं च तत्प्रीत्या किमन्यच्छरोतुमिच्छसि॥ ४१
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा विजयाया यथार्थतः।
मुने स जटिलो रुद्रो बिहसन्वाक्यमब्रवीत्॥ ४२
जटिल उवाच
सख्येदं कथितं तत्र परिहासोऽनुमीयते।
यथार्थ चेत्तदा देवी स्वमुखेनाभिभाषताम्॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ते च तदा तेन जटिलेन द्विजन्मना।
उवाच पार्वती देवी स्वमुखेनैव तं द्विजम्॥ ४४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६०७
यह मेरी सखी पर्वतराज हिमालयकी पुत्री है और
नामसे प्रसिद्ध है। इसकी माता मेनका है ॥ ३४॥
अभीतक इसका विवाह किसीके साथ नहीं
हुआ है, यह शिवजीको छोड़कर दूसरेको अपना पति
नहीं बनाना चाहती। यह तीन हजार वर्षसे तपस्या
कर रही है। हे साधो! हे द्विजोत्तम! उन्हींके लिये
मेरी सखीने ऐसा तप आरम्भ किया है, इसका भी
कारण मैं आपसे कहती हूँ आप सुनें। यह पार्वती
इन्द्रादि प्रमुख देवताओं एवं ब्रह्मा, विष्णु आदिको
छोड़कर केवल पिनाकपाणि शंकरको ही पतिरूपमें
प्राप्त करनेकी इच्छा करती है ॥ ३५-३७॥
हे द्विज! तपस्या प्रारम्भ करनेके पूर्व मेरी सखीने
जिन वृक्षोंको लगाया था, उन सबमें फूल, फल आदि
आ गये हैं [अतः प्रतीत होता हैं कि मेरी सखीके
मनोरथ पूर्ण होनेका समय आ गया है |] ॥ ३८॥
यह मेरी सखी नारदजीके उपदेशानुसार अपने
रूपको सार्थक करनेके लिये, अपने पिताके कुलको
अलंकृत करनेके लिये और कामदेवपर अनुग्रह
करनेके लिये महेश्वरके उद्देश्यसे कठिन तप कर
रही है, हे तापस! कया इसका मनोरथ सफल नहीं
होगा ?॥ ३९-४०॥
हे ह्विजश्रेष्ठ! आपने मेरी सखीके जिस मनोरथको
पूछा था, उसे मैने प्रीतिपूर्वक कह दिया, अब आप
और क्या सुनना चाहते हैं ?॥ ४१॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! विजयाकी इस यथार्थ
बातको सुनकर वे जटाधारी रुद्र हँसते हुए यह वचन
कहने लगे-- ॥ ४२॥
जटिल बोले-सखीके द्वारा जो यह कहा
गया है, वह तो परिहास मालूम पड़ता है, यदि यह
यथार्थ है, तो देवी अपने मुखसे कहें ॥४३॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार जब जटाधारी
ब्राहमणने कहा, तब पार्वतीदेवी अपने मुखसे ही उन
ब्राह्मणसे कहने लगीं॥ ४४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
शिवाजटिलसंवादो नाम बड्विंशोऽध्यायः ॥ २६॥ मती
द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्ड १
मकी ७ ण्या gs अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
गवारजांटल
इ
[अ एफ हज स्य वी पु
अथ सप्तविंशोऽध्यायः
जटाधारी ब्राह्मणद्वारा पार्वतीके समक्ष शिवजीके स्वरूपकी निन्दा करना
पार्वत्युवाच
शृणु द्विजेन्द्र जटिल मद्वृत्तं निखिलं खलु ।
सख्युक्तं मेऽद्य यत्सत्यं तत्तथैव न चान्यथा॥ १
मनसा वचसा साक्षात्कर्मणा पतिभावतः।
सत्यं ब्रवीमि नोऽसत्यं वृतो वै शंकरो मया॥ २
जानामि दुर्लभं वस्तु कथं प्राप्यं मया भवेत्।
तथापि मन औत्सुक्यात्तप्यतेऽद्य तपो मया॥ ३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा वचनं तस्मे स्थिता सा गिरिजा तदा।
उवाच ब्राह्मणस्तत्र तच्छुत्वा पार्वतीवचः॥ ४
ब्राह्मण उवाच
एतावत्कालपर्यन्तं ममेच्छा महती ह्याभूत्।
किं वस्तु कांक्षती देवी कुरुते सुमहत्तपः॥ ५
'तज्ज्ञात्वा निखिलं देवि श्रुत्वा त्वन्मुखपंकजात्।
इतो गच्छाम्यहं स्थानाद्यथेच्छसि तथा कुरू॥ ६
न कथ्यते त्वया महां मित्रत्वं निष्फलं भवेत्।
यथा कार्य तथा भावि कथनीयं सुखेन च॥ ७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा वचनं तस्य यावदरन्तुमियेष सः।
तावच्च पार्वती देवी प्रणम्योवाच तं द्विजम् ८
पार्वत्युवाच
किं गमिष्यसि विप्रेन्ध स्थितो भव हितं वद।
इत्युक्ते च तया तत्र स्थित्वोवाच स दण्डधृक्॥ ९
द्विज उवाच
यदि श्रोतुमना देवि मां स्थापयसि भक्तितः।
वदामि तत्त्वं तत्सर्वं येन ते वयुनं भवेत्॥ १०
जानाम्यहं महादेवं सर्वथा गुरुधर्मतः।
प्रवदामि यथार्थं हि सावधानतया श्रृणु॥ १९
वृषध्वजो महादेवो भस्मदिग्धो जटाधरः।
व्याघ्रचर्माम्बरधरः संवीतो गजकृत्तिना॥ १२
पार्वती बोलीं हे द्विजेन्द्र! हे जटिल! मे
वृत्तान्त सुनें। इस समय मेरी सखीने जो कुछ भी
है, वह सब सत्य है, कुछ भी झूठा नहीं है॥ १॥ का
मैंने मन, वचन एवं कर्मसे शंकरजीका |
पतिभावसे वरण किया है, यह बात मैं सत्य कहत
हूँ, असत्य नहीं। में जानती हूँ कि दुर्लभ वस्तु ने
कैसे प्राप्त हो सकती है, फिर भी मनकी उत्सुकता
मैं इस समय तप कर रही हूँ॥ २-३॥ |
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार उस ब्रह्मचागैसे
कहकर गिरिजा चुप हो गयीं। तब वे ब्राह्मण
पार्वतीकी बात सुनकर कहने लगे- ॥ ४॥
ब्राह्मण बोले--अभीतक मुझे यह बड़ी इच्छा
थी कि यह देवी किस वस्तुको प्राप्त करनेके लिये
अत्यन्त कठिन तप कर रही है॥५॥
हे देवि! तुम्हारे मुखकमलसे सारी बातें सुनक
और उसे जानकर अब मैं यहाँसे जाना चाहता हूँ
अब तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही करो॥६॥
यदि तुम मुझसे इन बातोंको न कहती, तो मित्रत
व्यर्थ हो जाती। कार्य तो होनहारके अनुसार होता है
इसलिये सुखपूर्वक उसे कहना चाहिये ॥७॥
ब्रह्माजी बोले- [हे नारद!] इस प्रकार कहके
ज्यों ही उस ब्राह्मणने जानेकी इच्छा की, तभी पाव
देवी प्रणाम करके उन ह्विजसे कहने लगौं-॥॥
पार्वती बोलीं हे विप्रेन्द्र! आप क्यों जा हे
हैं, ठहरिये और मेरे हितकी बात कहिये। उनके ऐरी
कहनेपर वे दण्डधारी रुककर कहने लगे-॥१॥
ब्राह्मण बोले हे देवि! यदि तुम स
करती हो और भक्तिपूर्वक मुझे रोकता हो, तो मे ह
वह सब तत्त्व कहता हूँ, जिससे [उनके निहा
भलीभाँति जानकारी हो जायगी । मैं गुरुप्रसादसे क
अच्छी तरहसे जानता हूँ | जो बात सत्य है, उसकी
रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो ॥ १०-११ ॥
महादेव बैलकी सवारी करते हैं, भरम दै
हैं, जटा धारण किये रहते हैं, व्याघ्रचर्म धार
हैं और हाथीका चमड़ा ओढते हैं ॥ १२॥
अ० २७]
सपोधेः सर्वगात्रेषु वेष्टित: ।
दरषदिग्धोऽभक्ष्यभक्षो विरूपाक्षो विभीषणः ॥ १३
अव्यक्तजन्मा सततं गृहभोगविवर्जितः।
दिगंबरो दशभुजो भूतप्रेतान्वितस्सदा॥ १४
क्रेन वा कारणेन त्वं तं भर्तारं समीहसे।
कव ज्ञानं ते गतं देवि तद्वदाद्य विचारतः॥ १५
पूर्व श्रुत॑ मया चैव व्रतं तस्य भयंकरम्।
श्रृणु ते निगदाम्यद्य यदि ते श्रवणे रुचि:॥ १६
दक्षस्य दुहिता साध्वी सती वृषभवाहनम्।
वव्रे पतिं पुरा दैवात्तत्संभोगः परिश्रुतः ॥ १७
कपालिजायेति सती दक्षेण परिवर्जिता।
यज्ञे भागप्रदानाय शंभुश्चापि विवर्जितः॥ १८
सा तथैवापमानेन भृशं कोपाकुला सती।
तत्याजासूर्त्रियाँस्तत्र तया त्यक्तश्च शंकरः॥ १९
त्वं स्त्रीरलं तव पिता राजा निखिलभूभृताम्।
तथाविधं पतिं कस्मादुग्रेण तपसेहसे॥
दत्त्वा सुवर्णमुद्रा च ग्रहीतुं काचमिच्छसि।
हित्वा च चंदनं शुभ्रं कर्दमं लेप्तुमिच्छसि॥ २१
सूर्यतेजः परित्यज्य खद्योतद्युतिमिच्छसि।
चीनांशुकं विहायैव चर्माम्बरमिहेच्छसि॥ २२
गृहवासं परित्यज्य वनवासं समीहसे।
लोहमिच्छसि देवेशि त्यक्त्वा शेवधिमुत्तमम्॥ २३
इख्रादिलोकपालांश्च हित्वा शिवमनुव्रता।
नैतत्यूक्त हि लोकेषु विरुद्धं दृश्यतेऽधुना॥ २४
कव त्वं कमलपत्राक्षी क्वासौ वै त्रिविलोचनः।
शेशांकवदना त्वं च पंचवक्त्रः शिवः स्मृतः ॥ २५
2223 Shivmahapuranam part Section_2l-l-Front
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६०९
वे कपाल धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण शरीरमें
साँप लपेटे रहते हैं। वे विष पीनेवाले, अभक्ष्यका भक्षण
करनेवाले, विरूपाक्ष और महाभयंकर हैं॥ १३॥
उनके जन्मका किसीको पता नहीं है और वे
गृहस्थोचित भोगसे सर्वथा रहित हैं। वे दिगम्बर,
दशभुजावाले तथा भूत-प्रेतोंक साथ निवास करते
हैं॥ १४॥
हे देवि! तुम किस कारणसे उन्हें अपना पति
बनाना चाहती हो, तुम्हारा ज्ञान कहाँ खो गया है, इसे
विचारकर मुझसे इस समय कहो--मैन पूर्व समयमें भी
उनका भयंकर चरित्र सुना है । यदि तुम्हें उसे सुननेकी
इच्छा हो, तो मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो॥ १५-१६॥
पहले दक्षकन्या साध्वी सतीने वृषभवाहन शिवका
वरण किया था, उसके साथ उन्होंने जैसा व्यवहार किया,
वह बात भी तुमने सुनी होगी ।दक्षने स्वयं अपनी कन्याको
इसीलिये नहीं बुलाया कि वह कपालीकी पली है और
यज्ञमें शिवजीको भाग भी नहीं दिया॥ १७-१८॥
इस अपमानसे अत्यन्त क्रुद्ध हुई सतीने अपने
प्रिय प्राण त्याग दिये और उसने शंकरजीको भी छोड़
दिया॥ १९॥
तुम सभी स्त्रयोमें रत्न हो और तुम्हारे पिता भी
पर्वतोंके राजा हैं, फिर उग्र तपस्याके द्वारा तुम इस
प्रकारके पतिको क्यों प्राप्त करना चाहती हो ?॥ २०॥
तुम सुवर्णको मुद्रा देकर काँच क्यों ग्रहण करना
चाहती हो और सुन्दर चन्दनको छोड़कर कीचड़ लगानेकी
इच्छा क्यों कर रही हो? सूर्यका तेज छोड़कर तुम
जुगनूका प्रकाश क्यों चाहती हो और रेशमी वस्त्रको
त्यागकर चमड़ा क्यों पहनना चाहती हो ?॥ २१-२२॥
घरमें रहना छोड़कर वनमें रहना चाहती हो और
हे देवेशि! उत्तम खजानेको छोड़कर 'लोहेकी इच्छा
करती हो | जो तुम इन्द्र आदि लोकपालोंको छोड़कर
शिवमें अनुरक्त हुई हो, यह तो उचित नहीं है और यह
लोकके सर्वथा विरुद्ध दिखायी पड़ता है॥ २३-२४॥
कहाँ तुम कमलके समान विशाल नेत्रवाली हो
और कहाँ वे भयंकर तीन नेत्रवाले हैं। तुम चन्द्रमाके
समान मुखवाली हो तथा वे शिव पाँच मुखवाले कहे
गये हैं॥ २५॥
६१०
श्रीशिवमहापुराण
श्र
[ऋ भा ता 777 कहे
वेणी शिरसि ते दिव्या सर्पिणीव विभासिता।
जटाजूटं शिवस्यैव प्रसिद्धं परिचक्षते॥ २
चंदनं च त्वदीयाङ्के चिताभस्म शिवस्य च।
क्व दुकूलं त्वदीयं वै शाङ्करं क्व गजाजिनम्॥ २७
क्व भूषणानि दिव्यानि कब सर्पाः शंकरस्य च।
क्व चरा देवता: सर्वाः क्व च भूतबलिप्रिय: ॥ २८
क्व वा मृदङ्गवादश्च क्व च तडमरुस्तथा।
क्व च भेरीकलापश्च क्व च शृङ्गरवोऽशुभः ॥ २९
कव च ढक्कामयः शब्दो गलनादः क्व चाशुभः।
भवत्याश्च शिवस्यैव न युक्तं रूपमुत्तमम्॥ ३०
यदि द्रव्यं भवेत्तस्य कथं स्यात्स दिगम्बरः।
वाहनं च बलीवर्दः सामग्री कापि तस्य न॥ ३१
वरेषु ये गुणाः प्रोक्ता नारीणां सुखदायकाः।
तन्मध्ये हि विरूपाक्षे एकोऽपि न गुणः स्मृतः॥ ३२
तवापि कामो दयितो दग्धस्तेन हरेण च।
अनाद्रस्तदा दृष्टो हित्वा त्वामन्यतो गतः॥ ३३
जातिर्न दृश्यते तस्य विद्या ज्ञानं तथैव च।
सहायाश्च पिशाचा हि विषं कण्ठे हि दृश्यते॥ ३४
एकाकी च सदा नित्यं विरागी च विशेषत:।
तस्मात्त्वं हि हरेणैव मनो योक्तुं न चाहसि॥ ३५
कव च हारस्त्वदीयो वै क्व च तन्मुण्डमालिका।
अङ्गरागः कव ते दिव्यः चिताभस्म क्व तत्तनौ ॥ ३६
सर्व विरुद्धं रूपादि तब देवि हरस्य च।
मह्यं ज रोचते ह्येतद्यदिच्छसि तथा कुरु॥ ३७
असद्वस्तु च यत्किंचित् तत्सर्व स्वयमीहसे।
निवर्तय मनस्तस्मान्नो चेदिच्छसि तत्कुरु ॥ ३८
तुम्हारे सिरपर सर्पिणीके समान वेणी
है और शिवका जटाजूट तो प्रसिद्ध ही है॥ र
तुम्हारे शरीरमें चन्दनका लेप और शक
शरीरमें चिताका भस्म लगा रहता.है। कहाँ
दुकूल और कहाँ शंकरका गजचर्म! कहाँ [तुषो] |
दिव्य आभूषण और कहाँ शंकरके सर्प! कहाँ सभं |
देवता तुम्हारे सेवक तथा कहाँ भूतों तथा बलिको फि
समझनेवाला वह शिव!॥ २७-२८॥
कहाँ [तुम्हें सुख देनेवाला] मृदंगवाद्य और कह
डमरू ? कहाँ तुम्हारी भेरीकी ध्वनि और कहाँ उनके
अशुभदायक श्रृंगीका शब्द ! कहाँ तुम्हारा ढक्का नामड़
बाजेका शब्द और उनका अशुभ गलेका शब्द! तुम्हा |
रूप उत्तम है और शिवका रूप नहीं है॥ २९-३०॥ |
यदि उनके पास द्रव्य होता तो वे दिगम्बर कैसे
होते, उनका वाहन भी बैल है तथा उनके पास औ
कोई सामग्री भी नहीं है। स्त्रियोंको सुख देनेवाले जे
गुण वरोंमें बताये गये हैं, उनमेंसे एक भी गुण
विरूपाक्ष शिवमें नहीं कहा गया है॥ ३१-३२॥
उन्होंने तुम्हारे अत्यन्त प्रिय कामदेवको भी भ
कर दिया। उस समय तुमने अपना अनादर भी देख
लिया कि वे तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चले गये॥ ३३
उनकी जातिका पता नहीं हैं, उसी प्रका!
उनके ज्ञान तथा विद्याका भी पता नहीं, पिशाच ही
उनके सहायक हैं और उनके गलेमें विष दिखायी
पड़ता है ॥ ३४॥
वे विशेष रूपसे विरक्त हैं, इसलिये अकेत
रहते हैं। अत: तुम शंकरके साथ अपना मत मी
जोड़ो ॥ ३५॥ १
कहाँ तुम्हारा हार और कहाँ उनकी मुण्डा,
कहाँ तुम्हारा दिव्य अंगराग और कहाँ उनके शण
चिताभस्म ! ॥ ३६ ॥ द
हे देवि! तुम्हारा और शंकरका रूप आदि र
कुछ एक-दूसरेके विपरीत है, मुझे तो यह अच्छा ही
लगता, अब तुम जैसा चाहती हो, वैसा करो॥ * ५
जो कुछ भी असद् वस्तु है, वह सब तुम तो |
चाह रही हो। तुम उससे अपना मन हॅट |
अन्यथा जो चाहती हो, उसे करो॥ ३८॥
ड
2223 Shivmabapuranam, part I_Section-2l-l-
अ० २८]
ब्रह्मोवाच
यें वचनं श्रुत्वा तस्य विप्रस्य पार्वती।
उवाच
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६११
ब्रह्माजी बोले--उस ब्राह्मणके इस प्रकारके
वचन सुनकर पार्वती कुपित मनसे उन शिवनिन्दक
क्रुद्धमनसा शिवनिन्दापरं द्विजम्॥३९ | ब्राह्मणसे कहने लगीं--॥ ३९॥
दी श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रदसंहिताया तृतीये पार्वतीखण्डे ब्रह्मचाखितारणवाक््यवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
ब्रह्मचारिग्रतारणवाक्यवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २७॥
= २०
अथाष्टाबिंशोऽध्यायः
पार्वतीद्वारा परमेश्वर शिवकी महत्ता प्रतिपादित करना और रोषपूर्वक जटाधारी
ब्रा्णको फटकारना, शिवका पार्वतीके समक्ष प्रकट होना
पार्वत्युवाच
एतावद्धि मया ज्ञातं कञ्चिदन्योऽयमागतः।
इदानीं सकलं ज्ञातमवध्यस्त्वं विशेषतः॥ १
त्वयोक्तं विदितं देव तदलीकं न चान्यथा।
यदि त्वयोदितं स्याद्वै विरुद्धं नोच्यते त्वया॥ २
कदाचिद् दृश्यते तादृक् वेषधारी महेश्वरः।
स्वलीलया परब्रह्म स्वरागोपात्तविग्रहः॥ ३
ब्रह्मचारिस्वरूपेण प्रतारयितुमुद्यतः।
आगतश्छलसंयुक्तं वचोऽवादीः कुयुक्तितः॥ ४
शंकरस्य स्वरूपं तु जानामि सुविशेषतः।
शिवतत्त्वमतो वच्मि सुविचार्य यथार्हतः॥ ५
वस्तुतो निर्गुणो ब्रह्म सगुणः कारणेन सः।
कुतो जातिर्भवेत्तस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ ६
| सर्वासां हि विद्यानामधिष्ठानं सदाशिवः।
किं तस्य विद्यया कार्य पूर्णस्य परमात्मनः॥ ७
वदा उच्छ्वासरूपेण पुरा दत्ताश्च विष्णवे।
शभुना तेन कल्यादौ तत्समः कोऽस्ति सुप्रभुः। ८
ेषामादिभूतस्य वयोमानं कुतस्ततः।
अकृतिस्तु ततो जाता किं शक्तेस्तस्य कारणम्॥ ९
a Shivmanapuranam part L_Section_2l-2-FrOn
पार्वतीजी बोलीं--मैं तो यही समझती थी कि
यह कोई अन्य ही आया है, किंतु अब मैंने सब कुछ
जान लिया है। [क्रोध तो बहुत आ रहा है, किंतु
ब्रह्मचारी होनेसे] तुम विशेषरूपसे अवध्य हो॥ १॥
हे देव! आपने जो कहा है, उसे मैंने जान
लिया, वह सब मिथ्या है, इसके अतिरिक्त कुछ
नहीं। यदि आप शिवजीको जानते होते, तो ऐसी
विरुद्ध बातें नहीं करते॥ २॥
महेश्वर, जो इस प्रकारका वेष धारण करते हुए
देखे जाते हैं, उसका यही कारण है कि वे लीला करनेके
लिये ही वैसा वेष धारण करते हैं। आप ब्रह्मचारीका
रूप धारणकर मुझे छलना चाहते हैं, इसीलिये कुतर्कसे
भरी हुई ऐसी बातें मुझसे कह रहे हैं ॥ ३-४॥
शंकरके स्वरूपको मैं विशेष रूपसे जानती हूँ,
इसलिये विचारकर यथार्थ रूपसे शिवतत्त्व कहती हूँ ॥ ५॥
वस्तुत: वे निर्गुण ब्रह्म हैं और कारणवश सगुण
हो जाते हैं। जो निर्गुण होकर मायासे सगुणरूप धारण
करता है, उसका जन्म किस प्रकारसे सम्भव है? ॥ ६॥
वे सदाशिव सभी विद्याओंके अधिष्ठान हैं,
उन पूर्ण परमात्माको विद्यासे क्या प्रयोजन ? कल्पके
आदिमे उन्हीं सदाशिवने सर्वप्रथम विष्णुको उच्छ्रासरूपसे
बेद प्रदान किये थे, उनके समान कौन परम प्रभु
हे ?॥ ७-८॥
जो सबका आदिकारण है, उसकी अवस्थाका
प्रमाण कौन कर सकता है। यह प्रकृति तो उन्हींसे
उत्पन्न हुई है, फिर उनकी शक्तिका दूसरा कारण क्या
हो सकता है ?॥ ९॥
श्रीशिवमहापुराण
६१२
ये भजंति च तं प्रीत्या शक्तीशं शंकरं सदा।
तस्मै शक्तित्रयं शंभुः स ददाति सदाव्ययम्॥ १
तस्यैव भजनाज्जीवो मृत्युं जयति निर्भयः।
तस्मान्मृत्युञयं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये॥ ११
तस्यैव पक्षपातेन विष्णुर्विष्णुत्वमाप्नुयात्।
ब्रह्मत्वं च यथा ब्रह्मा देवा देवत्वमेव च॥ १२
दर्शनार्थं शिवस्यादौ यथा गच्छति देवराट्।
भूतादयस्तत्परस्य द्वारपालाः शिवस्य तु॥ १३
दण्डैश्च मुकुटं विद्धं मृष्टं भवति सर्वतः।
किं तस्य बहुपक्षेण स्वयमेव महाप्रभु:॥ १४
कल्याणरूपिणस्तस्य सेवयेह न किं भवेत्।
किं न्यूनं तस्य देवस्य मामिच्छति सदाशिवः ॥ १५
सप्तजन्मदरिब्रः स्यात्सेवेद्यो यदि शंकरम्।
तम्यैतत्सेवनाल्लोके लक्ष्मीः स्यादनपायिनी ॥ १६
यदग्रे सिद्धयोऽष्टौ च नित्यं नृत्यंति तोषितुम्।
अवाङ्मुखाः सदा तत्र तद्धित दुर्लभं कुतः॥ १७
यद्यस्य मङ्गलानीह सेवते शंकरस्य न।
तथापि मङ्गलं तस्य स्मरणादेव जायत्े॥ १८
यस्य पूजाप्रभावेण कामाः सिद्धयति सर्वश: ।
कुतो विकारस्तस्यास्ति निर्षिकारस्य सर्वदा॥ १९
शिवेति मङ्गलं नाम मुखे यस्य निरन्तरम्।
तस्यव दर्शनादन्ये पवित्रा: सन्ति सर्वदा॥ २०
यद्यपूतं भवेद्भस्म चितायाश्च त्वयोदितम्
नित्यमस्याङ्गगं देवैः शिरोभिर्धार्यते 'कथम्॥ २१
_
[अ ` ` `` ` माका
जो लोग प्रेमपूर्वक शक्तिके पति उन
भजन करते हैं, उनको शिवजी सदा ही अ नि
तीनों शक्तियाँ (क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति और उहा
हैं )
प्रदान करते हैं ॥ १०॥
जीव उन्हींके भजनसे निर्भय होकर मृ
जीत लेता है, इसलिये त्रिलोकीमें उनका मृत्युंजय ना
प्रसिद्ध है॥ ११॥
उन्हींके पक्षमें रहनेसे विष्णुने विष्णुत्व प्रप
किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व तथा देवताओंने देवत्व प्र
किया है॥ १२॥
देवताओंमे प्रमुख इन्द्र जब भगवान् शिके
दर्शनार्थ जाते हैं, तब भगवान् शिवके जो द्वारपाल एव
भूत आदि हैं, सादर उनके दण्डोंमें धिसा गया इन्रम
मुकुट सब प्रकारसे उज्ज्वल हो उठता है। उनके
विषयमें बहुत बात करनेसे क्या? वे तो स्वयं प्र
हैं॥ १३-१४॥
उन कल्याणस्वरूप शिवजीकी सेवा करनेसे इ
लोकमें क्या नहीं सिद्ध हो जाता है। उन देवके पास
किस बातकी कमी है, जो वे सदाशिव मेरी इच्छ |
करें॥ १५॥ |
जो सात जन्मोंका दरिद्र हो, वह भी याद |
शंकरकी सेवा करे, तो उनकी इस सेवासे उसे लोकम |
स्थिर रहनेवाली लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है॥ १६॥
जिन्हे सन्तुष्ट करनेके लिये आठों सिद्धिया सी
नीचेकी ओर मुख किये जिनके आगे सदा नृत्य कलै
हैं, उनसे हित होना कहाँसे दुर्लभ है ?॥ १७॥
यद्यपि समस्त मंगल उन शिवजीकी सेवा त
करते अर्थात् वे मंगलवेश धारण नहीं करते, तो
उनके स्मरणमात्रसे ही पुरुषका मंगल होता है॥ ९८
जिनकी पूजाके प्रभावसे निरन्तर समस्त का)
पूर्ण हो जाती हैं, उन निर्विकार शंकरमें विकार -।
हो सकता है ? जिसके मुखसे 'शिव' यह मंगल
निरन्तर निकलता है, उस पुरुषके दर्शनमात्रसे
प्राणी सदा पवित्र हो जाते हैं॥ १९-२०॥ कि
[हे ब्रह्मचारिन्!] जैसा आपने येह शि
भस्म अपवित्र होती है, तो देवगण उनके अं
भस्म सिरपर नित्य क्यों धारण करते हैं ?॥ २९॥
>> 2:
2223 Shivmahapuranam. रात $द्लॉणा 2
अ० २८]
रो देवो जगतां कर्ता भर्ता हर्ता गुणान्वितः ।
निर्गुण: शिवसंज्ञश्च स विज्ञेयः कथं भवेत् ॥ २२
ब्रह्मणो रूपं शिवस्य परमात्मनः।
तत्कथं हि विजानन्ति त्वादृशास्तद्बहिर्मुखाः ॥ २३
श्र पापाश्च वेदेभ्यो ये विनिर्गताः।
तत्त्व ते नैव जानन्ति शिवस्यागुणरूपिणः॥ २४
शिवनिन्दां करोतीह तत्त्वमज्ञाय यः पुमान्।
आजन्मसंचितं पुण्यं भस्मीभवति तस्य तत् ॥ २५
त्वया निंदा कृता यात्र हरस्यामिततेजसः।
त्वत्यूजा च कृता यन्मे तस्मात्पापं भजाम्यहम्॥ २६
शिवविद्वेषिणं दृष्ट्वा सचैलं स्नानमाचरेत्।
शिवविद्वेषिणं दृष्ट्वा प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ २७
ररे दुष्ट त्वया चोक्तमहं जानामि शंकरम्।
निश्चयेन न विज्ञातश्शिव एव सनातनः॥ २८
यथा तथा भवेद्रुद्रो यथा वा बहुरूपवान्।
ममाभीष्टतमो नित्यं निर्विकारी सतां प्रियः ॥ २९
विष्ण्ब्रह्मापि न समः तस्य क्वापि महात्मनः।
कुतोऽन्ये निर्जराद्याश्च कालाधीनाः सदैव ते॥ ३०
इति बुद्ध्या समालोक्य स्वया सत्या सुतत्त्वत: ।
शिवार्थं वनमागत्य करोमि विपुलं तपः॥
स एव परमेशानः सर्वेशो भक्तवत्सलः।
संप्राप्तु मेऽभिलाषो हि दीनानुग्रहकारकम्॥ ३२
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा गिरिजा सा हि गिरीश्वरसुता मुने।
शिवं दध्यौ निर्विकारेण चेतसा॥ ३२
पैदाकर्ण्य वचो देव्या ब्रह्मचारी स वै द्विजः।
फर्वचनमाख्यातुं यावदेव प्रचक्रमे॥ ३४
उवाच गिरिजा तावत्स्वसखीं विजयां द्रुतम्।
; 'शिवनिंदापराङ्मुखी॥ ३५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६१३
के जो देव जगतूका कर्ता, भर्ता तथा हर्ता है,
गुणोंसे संयुक्त है, निर्गुण तथा शिव है, उसे कोई किस
प्रकार जान सकता है ? ब्रह्मस्वरूप परमात्मा शिवजीका
रूप सदा निर्गुण है। अतः आपके सदृश शिवद्रोही
उन्हें किस प्रकार जान सकते हैं ?॥ २२-२३॥
जोदुराचारी, महापापी, वेद एवं देवतासे विमुख हैं, वे
निर्गुणरूपवाले शिवके तत्त्वको नहीं जान सकते ॥ २४॥
जो पुरुष तत्त्वको न जानकर शिवकी निन्दा करता
है, उसका जन्मपर्यन्त संचित किया गया पुण्य भस्म हो
जाता है। आपने इस समय जो महातेजस्वी शिवकी
निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है, इसका
पाप मुझे भी लग गया है । शिवजीकी निन्दा करनेवालेको
देखकर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये और शिवद्रोहीको
देखते ही प्रायश्चित्त भी करना चाहिये ॥ २५-२७॥
अरे दुष्ट! तुमने जो कहा कि मैं शिवको जानता
हूँ, तुम्हें तो निश्चित रूपसे सनातन शिवजीका कुछ
ज्ञान नहीं है। बे रुद्र चाहे किसी भी स्वरूपवाले हों,
रूपवान् हों अथवा अरूपी हों, वे सजनोंके प्रिय
निर्विकारी प्रभु मेरे तो सर्वस्व हैं और मुझे अत्यन्त
प्रिय हैं॥ २८-२९॥
उन महात्मा सदाशिवकी ब्रह्मा, विष्णु भी किसी
प्रकार समता नहीं कर सकते, फिर जो सर्वदा कालके
अधीन अन्य देवता आदि हैं, वे किस प्रकार उनकी
समता कर सकते हैं ?॥३०॥
इस प्रकार अपनी सत्य बुद्धिसे विचारकर मैं
उन शिवकी प्राप्तिहेतु वनमें आकर घोर तपस्या कर
रही हूँ॥ ३१॥
वे ही परमेश्वर, सर्वेश एवं भक्तवत्सल हैं।
दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले उन्हींको प्राप्त करनेकी
मेरी इच्छा है॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! इस प्रकार वे गिरिराजपुत्री
मौन हो गयीं और निर्विकार चित्तसे पुनः शिवजीका ध्यान
करने लगीं । तदनन्तर वे ब्राह्मण पार्वतीके इस प्रकारके
वचनको सुनकर पुनः ज्यों ही कुछ कहनेको उद्यत हुए,
उसी समय शिवजीमें मन लगाये हुए और शिवजीकी
निन्दासे पराङ्मुख रहनेवाली पार्वती अपनी विजया नामकी
सखीसे शीघ्रतापूर्वक कहने लगीं ॥ ३३-३५॥
श्रीशिवमहापुराण
६१४
[अ _ ` ` `` २०७ ९७९ ह: `
गिरिजोवाच
बारणीयः प्रयलेन सख्ययं हि द्विजाधमः।
पुनर्वक्तुमनाश्रैव शिवनिंदा करिष्यति॥
न केवलं भवेत्पापं निन्दां कर्तुश्शिवस्य हि।
यो वे श्रृणोति तन्निन्दां पापभाक् स भवेदिह ॥ ३७
शिबनिन्दाकरो वध्यः सर्वथा शिवकिंकरैः।
ब्राह्मणश्रेत्स वै त्याज्यो गन्तव्यं तत्स्थलाद् द्रुतम् ॥ ३८
अयं दुष्टः पुनर्निन्दां करिष्यति शिवस्य हि।
ब्राह्मणत्वादवध्यश्चेत्त्याज्योऽदृश्यश्च सर्वथा॥ ३९
हित्वेतत्स्थलमद्यैव यास्यामोऽन्यत्र मा चिरम्।
यथा संभाषणं न स्यादनेनाऽविदुषा पुन: ॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा चोमया यावत्पादमुत्क्षिप्यते मुने।
असौ तावच्छिवः साक्षादालंबे प्रियया स्वयम्॥ ४१
कृत्वा स्वरूपं सुभगं शिवाध्यानं यथा तथा।
दर्शयित्वा शिवायै तामुवाचावाङ्मुखीं शिव: ॥ ४२
शिव उवाच
कुत्र यास्यसि मां हित्वा न त्व त्याज्या मया पुनः।
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि नादेयं विद्यते तव॥ ४३
अद्यप्रभृति ते दासः तपोभिः क्रीत एव ते।
क्रीतोऽस्मि तव सौन्दर्यात्क्षणमेकं युगाय ते॥ ४४
त्यज्यतां च त्वया लज्जा मम पली सनातनी।
गिरिजे त्वं हि सद्बुध्या विचारय महेश्वरि॥ ४५
मया परीक्षितासि त्वं बहुधा दृढमानसे।
तत्क्षमस्वापराधं मे :॥ ४६
न त्वादृशी प्रणयिनीं पश्यामि च त्रिलोकके।
सर्वथाहं तवाधीनः स्वकामः पूर्यतां शिवे॥ ४७
पार्वती बोलीं--हे सखि! नोलनेकी इच्छ
यह द्विजाधम पुनः शिवकी निन्दा करेगा, अत: इसे र
पूर्वक रोको; क्योंकि केवल शिवकी निन्दा करो
ही पाप नहीं लगता, अपितु जो उनकी निन्दाको क|
है, वह भी पापका भागी होता है॥ ३६-३७। |
शिवभक्तोंको चाहिये कि वे |
दें। यदि वह ब्राह्मण है, तो उसका त्याग कर देना चाहि |
और उस स्थानसे अन्यत्र चले जाना चाहिये॥ ३८।
यह दुष्ट पुनः शिवजीकी निन्दा करेगा, ब्राह्म
होनेके कारण यह अवध्य है, अत: इसका त्यागका |
अन्यत्र चलना चाहिये, जहाँ जानेपर यह फुः
दिखायी न पड़े॥ ३९॥ |
अब इस स्थानको छोड़कर हमलोग अविलम |
दूसरे स्थानपर चलेंगे, जिससे इस मूर्ख ब्राह्मणसे पुः; |
सम्भाषण न करना पड़े ॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने ! इतना कहनेके अनतत |
ज्यों ही पार्वतीने अन्यत्र जानेके लिये अपना पैर उठाया
इतमेमें ब्रह्मचारीस्वरूप साक्षात् शिवजीने पार्वतीको |
पकड़ लिया। उन शिवने उस समय जैसा पार्वती |
ध्यान कर रही थीं, उसी प्रकारका अत्यन्त सुन्दर रूप
धारणकर उन्हें दर्शन दिया और पुनः नीचेकी ओर मुख
की हुई पार्वतीसे वे शिव कहने लगे--॥ ४१-४१॥
शिवजी बोले--[हे देवि!] तुम मु |
छोड़कर कहाँ जा रही हो ? मैं तुम्हें नहीं छोड़ेँगा। |
तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ, मेरे द्वारा तुम्हारे लिये कुछ भी
अदेय नहीं है॥ ४३॥
आजसे मैं तुम्हारे तपोंसे तुम्हारा खरीदा इ
दास हो गया । तुमने अपने सौन्दर्यसे मुझे मोल ले ल
है, तुम्हारे बिना एक क्षण भी युगके समान है कर
हे गिरिजे! तुम लज्जाका त्याग करो, तुम तो दी
सनातन पत्नी हो। हे महेश्वरि! इसे तुम की
सदूबुद्धिसे स्वयं विचार करो। हे दृढ़ मनवाली!
तुम्हारी अनेक प्रकारसे परीक्षा की, मुझ की
|
अनुसरण करनेवालेके इस अपराधको क्षमा हँ
तुम्हारी-जैसी पतिव्रता सती त्रिलोकमें कीं त |
देखी। हे शिवे! मैं सर्वथा तुम्हारे अधीत हँ "|
अपनी कामना पूर्ण करो ॥ ४५--४७॥
अ० २९]
प्रिये मत्सकाशं पत्नी त्वं मे वरस्तव।
त्वया साकं दरुतं यास्ये स्वगृहं पर्वतोत्तमम्॥ ४८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ते देवदेवेन पार्वती मुदमाप सा।
तपोजातं तु यत्कष्टं तज्जहौ च पुरातनम्॥ ४९
सर्व: श्रमो विनष्टोऽभूत्सत्यास्तु मुनिसत्तम।
फले जाते श्रमः पूर्वो जन्तोर्नाशमवाप्नुयात्॥ ५०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६१५
हे प्रिये! तुम मेरे पास आओ, तुम मेरी पत्नी हो
तथा मैं तुम्हारा वर हूँ, अब मैं तुम्हें अपने साथ लेकर
पर्वतोंमें उत्तम अपने घर कैलासको चलूँगा॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोले--देवदेव शंकरजीके इस प्रकार
कहनेपर पार्वतीको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और उन्हें
पूर्व समयमें तपस्याके कारण जो दुःख हुआ था, वह
तत्क्षण ही दूर हो गया। हे मुनिसत्तम! पार्वतीका सारा
श्रम दूर हो गया; क्योंकि फलके प्राप्त हो जानेपर
प्राणीका पूर्वमें किया हुआ सारा श्रम नष्ट हो जाता
है ॥ ४९-५० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसांहितायां तृतीये पार्वती ण्डे पार्वत्या शिवरूपदर्शनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीको
शिवरूपदर्शन नामक अट्टाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
Sree
अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः
शिव और पार्वतीका संवाद, विवाहविषयक पार्वतीके अनुरोधको शिवद्वारा स्वीकार करना
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग किं जातं तदनन्तरम्।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथय त्वं शिवायशः॥ १
ब्रह्मोवाच
देवर्षे श्रूयतां सम्यक् कथयामि कथां मुदा।
तां महापापसंहत्री शिवभक्तिविवर्धिनीम्॥ २
पार्वती वचनं श्रुत्वा हरस्य परमात्मनः।
दृष्ट्वानन्दकरं रूपं जहर्षातीव च द्विज॥ ३
प्रत्युवाच महासाध्वी स्वोपकण्ठस्थितं विभुम्।
अतीव सुखिता देवी प्रीत्युत्फुल्लानना शिवा॥ ४
र पार्वत्युवाच
त्वं नाथो मम देवेश त्वया किं विस्मृतं पुरा।
दक्षयज्ञविनाशं हि यदर्थ कृतवान्हठात्॥ ५
स त्वं साहं समुत्पन्ना मेनायां कार्यसिद्धये।
देवानां देवदेवेश तारकाप्तासुखात्मनाम्॥ ६
यदि प्रसन्नो देवेश करोषि च कृपां यदि।
पतिर्भव ममेशान मम वाक्यं कुरु प्रभो ७
नारदूजी बोले--हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग!
इसके बाद फिर क्या हुआ? मैं वह सब सुनना चाहता
हूँ, आप शिवाके चरित्रको कहिये॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-हे देवर्षे! सुनिये, मैं इस
कथाको प्रसन्नतापूर्वक कह रहा हूँ। यह कथा पापका
नाश करनेवाली तथा शिवमें भक्ति बढानेवाली है॥ २॥
हे द्विज! परमात्मा हरका वचन सुनकर और
उनके परमानन्दकारी रूपको देखकर पार्वतीजी परम
आनन्दित हो गयीं। स्नेहके कारण उनके नेत्रकमल
खिल उठे | उसके बाद वे महासाध्वी सुखी हो प्रसन्नतासे
अपने समीप खडे प्रभुसे कहने लगीं॥ ३-४॥
पार्वती बोलीं-हे देवेश! आप तो मेरे
नाथ हैं, क्या आप इस बातको भूल गये कि मेरे ही
निमित्त आपने दक्षके यज्ञका विनाश किया था।
यद्यपि आप तो वही हैं, किंतु मैं देवताओंकी
कार्यसिद्विके लिये मेनासे पुनः उत्पन्न हुई हूँ। हे
देवदेवेश! देवतागण तारक असुरसे इस समय अत्यन्त
पीड़ित हो रहे हैं॥५-६॥
हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि
मुझपर कृपा करना चाहते हैं, तो हे महेशान! हे
प्रभो! आप मेरे पति बनिये और मेरा वचन मानिये।
६१६
पितुर्गेहे मया सम्यग्गम्यते त्वदनुज्ञया ।
प्रसिद्धं क्रियतां तद्वै विशुद्धं परमं यशः॥
गन्तव्यं भवता नाथ हिमवत्पा््वतः प्रभो।
याचस्व मां ततो भिक्षुर्भूत्वा लीलाविशारदः॥ ९
तथा त्वया प्रकर्तव्यं लोकेषु ख्यापयन् यशः।
पितुर्मे सफलं सर्व कुरुष्वैवं गृहाश्रमम्॥ १०
ऋषिभिर्बोधितः प्रीत्या स्वबन्धुपरिवारितः।
करिष्यति न संदेहस्तव वाक्यं पिता मम॥ ११
दक्षकन्या पुराहं वै पित्रा दत्ता यदा तव।
यथोक्तविधिना तत्र विवाहो न कृतस्त्वया॥ १२
न ग्रहाः पूजितास्तेन दक्षेण जनकेन मे।
ग्रहाणां विषयस्तेन सच्छिद्रोऽयं महानभूत्॥ १३
तस्माद्यथोक्तविधिना कर्तुमर्हसि मे प्रभो।
विवाहं त्वं महादेव देवानां कार्यसिद्धये॥ १४
विवाहस्य यथा रीतिः कर्तव्या सा तथा ध्रुवम्।
जानातु हिमवान् सम्यक् कृतं पुत्र्या शुभं तपः॥ १५
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा सुप्रसन्नः सदाशिवः।
प्रोवाच वचनं प्रीत्या गिरिजां प्रहसन्निव॥ १६
शिव उवाच
श्रृणु देवि महेशानि परमं वचनं मम।
यथोचितं सुमाङ्गल्यमविकारि तथा कुरु॥ १७
ब्रह्मादिकानि भूतानि त्वनित्यानि वरानने।
दृष्टं यत्सर्वमेतच्य नश्वरं विद्धि भामिनि ॥ १८
एकोऽनेकत्वमापन्नो निर्गुणो हि गुणान्वितः ।
स्वज्योल्नया यो विभाति 'परज्योत्त्नान्वितो$भवत्॥ १९
स्वतन्त्रः परतत््श्च त्वया देवि कृतो हाहम्।
सर्वकत्री च प्रकृतिर्महामाया त्वमेव हि॥ २०
श्रीशिवमहापुराण
[अ = = प्या ` ९
इस समय आप मुझे पिताके घर जानेकी आजचे
अब आप अपना विशुद्ध और उत्कृष्ट यश जात
प्रसिद्ध करें ॥ ७-८ ॥
हे नाथ | हे प्रभो! अनेक लीलाओंको करना
आपको भिक्षु बनकर मेरे पिताके पास जाना चाहि
और उनसे मुझे माँगना चाहिये। आपको अपे
यशका लोकमें विस्तार करते हुए ऐसा उपाय कल
चाहिये, जिससे मेरे पिताका गृहस्थाश्रम सफल हे
जाय । ऋषियोंने मेरे पिताको समझा दिया है, इसलिये
बन्थुजनों एवं परिवारसे युक्त मेरे पिता आपकी बात
निःसन्देह मान जायँगे॥ ९-११॥
पूर्व समयमें जब मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय
भी मेरे पिताने मुझे आपको ही दिया था, किंतु उप
समय आपने यथोक्त विधिसे मुझसे विवाह नहीं किया
था। उस समय मेरे पिता दक्षने विधिपूर्वक ग्रहोंका
पूजन नहीं किया था। उन ग्रहोंके कारण ही विवाहम
विघ्न हुआ॥ १२-१३॥
अतः हे प्रभो! हे महादेव देवताओंकी कार्यसिद्धिके |
लिये आप यथोक्त रीतिसे मेरे साथ विवाह कीजिये॥ १४॥
विवाहको जो विधि है, उसे अवश्य कला
चाहिये, जिससे हिमवान् जान लें कि कि मेरी पुरी |
उत्तम तपस्या की है॥ १५॥
ब्रह्माजी बोले-यह वचन सुनकर सदाशिव
अत्यन्त प्रसन्न हो गये और वे हँसते हुए प्रेमपूर्वक
पार्वतीसे यह वचन कहने लगे-॥ १६॥
शिवजी बोले--हे देवि! हे महेशाति! ग
उत्तम बात सुनो, जिससे विवाहमें किसी प्रकाल
बाधा न हो, वैसा उचित मंगल कार्य करो
भामिनि! इस जगात्में ब्रह्मा आदिसे लेकर हि
स्थावर तथा जंगम पदार्थ दिखायी पड़ते हैं, कहे
अनित्य तथा नश्वर समझो॥ १७-१८॥ ओं
यह एक निर्गुण ब्रह्म ही सगुण रूप धारणकर ज
रूपमें परिवर्तित हो गया है, यही स्वयं 2 द
सत्तासे प्रकाशित होते हुए भी पर प्रकाशसे ह
गया है। हे देवि! मैं सदा स्वतन्त्र हूँ, पर उ
परतन्त्र बना दिया है; क्योंकि सब कुछ
महामाया प्रकृति तुम्हीं हो॥ १९-२०॥
अ० २९ ]
ग्रायामयं कृतमिदं च जगत्समग्रं
सर्वात्मना हि विधृतं परया स्वबुद्धया।
सर्वात्मभिः सुकृतिभिः
संसिक्तमात्मनि गुणैः
के ग्रहाः के ऋतुगणाः के वान्येऽपि त्वया ग्रहाः।
किमुक्तं चाधुना देवि शिवार्थं वरवर्णिनि॥ २२
परमात्मभावैः
परिवेष्टितञ्च॥ २१
गुणकार्यप्रभेदेनावाभ्यां प्रादुर्भवः कृतः।
भरक्तहेतोर्जगत्यस्मिन्भक्तवत्सलभावतः ॥२३
त्वं हि वै प्रकृतिः सूक्ष्मा रजः सत्त्वतमोमयी।
व्यापारदक्षा सततं सगुणा निर्गुणापि च॥ २४
सर्वेषामिह भूतानामहमात्मा सुमध्यमे।
निर्विकारी निरीहश्च भक्तेच्छोपात्तविग्रहः॥ २५
हिमालयं न गच्छेयं जनकं तव शैलजे।
ततस्त्वां भिक्षुको भूत्वा न याचेयं कथंचन॥ २६
महागुणैर्गरिष्ठोऽपि महात्मापि गिरीन्द्रजे।
देहीति वचनात्सद्यः पुरुषो याति लाघवम्॥ २७
इतथं ज्ञत्वा तु कल्याणि किमस्माकं वदस्यथ।
कार्य त्वदाज्ञया भद्रे यथेच्छसि तथा कुरु ॥
ब्रह्मोवाच
तेनोक्तापि महादेवी सा साध्वी कमलेक्षणा।
जगाद शंकरं भक्त्या सुप्रणम्य पुनः पुनः ॥ २९
पार्वत्युवाच
त्वमात्मा प्रकृतिश्चाहं नात्र कार्या विचारणा।
स्वतन्त्रौ भक्तवशगौ निर्गुणो सगुणावपि॥ ३०
प्रयलेन त्वया शम्भो कार्य वाक्यं मम प्रभो।
याचस्व मां हिमगिरेः सौभाग्यं देहि शङ्कर॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६१७
यह सम्पूर्ण जगत् मायाके द्वारा रचित है
और सर्वात्मा परमात्माने अपनी श्रेष्ठ बुद्धिके द्वारा इसे
धारण कर रखा है। सभी पवित्र आत्माएँ, जो
परमात्माके स्वरूपको प्राप्त कर चुकी हैं और सदा
मेरे साथ अभेदभावसे रहती हैं, उनसे तथा अपने
गुणोंसे यह संसार घिरा हुआ है॥ २१॥
हे देवि! इस जगतमें तुम्हें छोड़कर न तो कोई
ग्रह है, न तो कोई ऋतु है। हे वरवर्णिनि ! तुम शिवके
लिये ग्रहोंकी बात क्यों करती हो ?॥ २२॥
हम दोनों भक्तोंके लिये भक्तवत्सलतावश गुण-
कार्यके भेदसे प्रकट हुए हैं। रज, सत्त्व तथा तमोमयी
तुम सूक्ष्म प्रकृति हो, निरन्तर जगतके कार्यमें दक्ष हो
और सगुण तथा निर्गुण रूपवाली हो॥ २३-२४॥
हे सुमध्यमे! सभी प्राणियोंकी आत्मा मैं ही
हूँ। मैं सर्वथा निर्विकार तथा निरीह होकर भी
भक्तोंक लिये ही शरीर धारण करता हूँ। किंतु हे
शैलपुत्रि! मैं तुम्हारे पिता हिमालयके पास नहीं
जाऊँगा और न तो भिक्षुकका रूप धारणकर उनसे
तुमको माँगूँगा॥ २५-२६॥
है गिरिजे! महान् गुणोंसे वरिष्ठ कोई कितना
भी बड़ा क्यों न हो, वह 'दीजिये'-इस शब्दका
उच्चारण करते ही लघुताको प्राप्त हो जाता है। हे
कल्याणि! इस बातको जानते हुए भी तुम मुझसे इस
प्रकारकी बात क्यों करती हो? हे भद्रे! यह कार्य तो
तुम्हारे आज्ञानुसार हीं मुझे करना है, अतः तुम जैसा
चाहती हो, वैसा करो॥ २७-२८॥
ब्रह्माजी बोले--उनके द्वारा यह कहे
जानेपर कमलके समान नेत्रोंवाली साध्वी महादेवी
भक्तिपूर्वक शंकरजीको बार-बार प्रणामकर उनसे पुन:
कहने लगीं--॥ २९॥
पार्वती बोलीं-[हे महेश्वर!] आप आत्मा
हैं और मैं प्रकृति हूँ, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये।
हम दोनों स्वतन्त्र एवं गुणरहित होकर भी भक्तके
वशमें होकर सगुण रूप धारण करते रहते हैं॥ ३०॥
हे शम्भो! हे प्रभो! आपको मेरी बात प्रयत्नपूर्वक
मान लेनी चाहिये । अतः हे शंकर! आप हिमालयसे
याचना कीजिये, मुझे सौभाग्य प्रदान कीजिये॥ ३१॥
६१८
कृपां कुरु महेशान तव भक्तास्मि नित्यशः।
तव पत्नी सदा नाथ ह्यहं जन्मनि जन्मनि॥
त्वं ब्रह्म परमात्मा हि निर्गुणः प्रकृतेः परः।
निर्विकारी निरीहश्च स्वतन्त्रः परमेश्वर: ॥ ३३
तथापि सगुणोऽपीह भक्तोद्धारपरायणः।
विहारी स्वात्मनि रतो नानालीलाविशारदः॥ ३४
सर्वथा त्वामहं जाने महादेव महेश्वर।
किमुक्तेन च सर्वज्ञ बहुना हि दयां कुरु॥ ३५
विस्तारय यशो लोके कृत्वा लीलां महाद्भुताम्
यत्सुगीय जना नाथाञ्जसोत्तीर्णा भवाम्बुधिम्॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इत्येवमुक्त्वा गिरिजा सुप्रणम्य पुनः पुनः।
विरराम महेशानं नतस्कन्धा कृताञ्जलिः॥ ३७
इत्येवमुक्तः स॒ तया महात्मा
महेश्वरो 'लोकविडम्बनाय।
तथेति मत्वा प्रहसन् बभूव
मुदान्वितः कर्तुमनास्तदेव॥ ३८
ततो सुप्रहर्षितः ।
कैलासं प्रययौ काल्या विरहाकृष्टमानसः॥ ३९
तत्र गत्वा महेशानो नऱ्द्यादिभ्य: स ऊचिवान्।
वृत्तान्तं सकलं तं वै परमानन्दनिर्भरः ॥ ४०
तेऽपि श्रुत्वा गणाः सर्वे भैरवाद्याश्च सर्वशः।
बभूवुः सुखिनोऽत्यन्तं विदधुः परमोत्सवम्॥ ४९
का सुमङ्गलं तत्र बभूवातीव नारद।
सर्वेषां दु:खनाशो$भूदुद्र: प्रापापि संमुदम्॥ ४२
श्रीशिवमहापुराण
[अ न कका प्या
हे महेश्वर! आप मुझपर दया करें, मे ७]
नित्य भक्त हूँ। हे नाथ! मैं सदा जन्म- जन्माला
आपकी पली हूँ । आप ब्रह्म, परमात्मा, निर्गुण,
परे, विकाररहित, इच्छारहित, स्वतन्त्र तथा
हैं, तथापि भक्तोंके उद्धारके लिये आप सगुण र्त
धारण करते हैं। आप आत्मपरायण होकर भी विहा
करनेवाले तथा नाना प्रकारकी लीलामें निपुण हैं। ह |
महादेव! हे महेश्वर! मैं आपको सर्वथा जानती हूं
हे सर्वज्ञ! बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन, आप मुन्नप |
दया कीजिये॥ ३२-३५ ॥ |
हे नाथ! आप अद्भुत लीलाकर संसारम अपने |
यशका विस्तार कोजिये, जिसका गान करके आपके |
भक्त इस संसाररूपी समुद्रसे अनायास ही पार हो
जायँ॥ ३६॥ |
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर गिरिजा |
शंकरजीको बारंबार हाथ जोड़कर सिर झुकाकर |
प्रणाम करके मौन हो गयीं ॥ ३७॥
पार्वतीने जब इस प्रकार कहा, तब लोकविडम्बनाके |
निमित्त शंकरजीने हँसते हुए प्रसन्न होकर ऐसा ही |
होगा-यह कहकर वे वैसा करनेके लिये उद्यत हो |
गये॥ ३८॥
उसके बाद वे शम्भु प्रसन्न हो अन्तर्धान हो गये
और कालीके विरहसे आकृष्टचित्तबाले वे कैलासबो |
चले गये॥ ३९॥
वहाँ जाकर उन महेश्वरने परमानन्दमें तिम है
यह सारा वृत्तान्त नन्दीश्वरादि गणोंको बताया | ४९
इस वृत्तान्तको सुनकर वे सम्पूर्ण भैखारि
गण भी बहुत सुखी हुए और महान् उत्सव
लगे॥ ४१॥
हे नारद! उस समय वहाँ महामंगल हो
लगा, सबका दुःख दूर हो गया और रुद्रकों भी
अ० ३०]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६१९
नह अथ त्रिंशोऽध्यायः
पार्वतीके पिताके घरमें आनेपर महामहोत्सवका होना, महादेवजीका नटरूप धारणकर
वहाँ उपस्थित होना तथा अनेक लीलाएँ दिखाना, शिदद्वारा पार्वतीकी याचना,
किंतु माता-पिताके द्वारा मना करनेपर अन्तर्धान हो जाना
नारद उवाच
विधे तात महाभाग धन्यस्त्वं परमार्थदृक् ।
अद्धतेयं कथाश्रावि त्वदनुग्रहतो मया॥ १
गते हरे स्वशैले हि पार्वती सर्वमङ्गला।
किं चकार गता कुत्र तन्मे बद महामते॥ २
ब्रह्मोवाच
श्रृणु सुप्रीतितस्तात यज्जातं तदनन्तरम्।
हरे गते निजस्थाने तद् वदामि शिवं स्मरन्॥ ३
पार्वत्यपि सखी युक्ता रूपं कृत्वा तु सार्थकम्।
जगाम स्वपितुर्गेहं महादेवेति वादिनी॥ ४
पार्वत्यागमनं श्रुत्वा मेना च स हिमाचलः।
दिव्यं यानं समारुह्य प्रययौ हर्षविह्लल:॥ ५
पुरोहितश्च पौराश्च सख्यश्चैवाप्यनेकशः।
सम्बन्धिनस्तथान्ये च सर्वे ते च समाययुः॥ ६
भ्रातः सकला जम्मुमैनाकप्रमुखास्तदा।
जयशब्दं प्रब्रुवन्तो महाहर्षसमन्विताः॥ ७
संस्थाप्य मङ्कलघटं राजवर्त्मनि राजिते।
चन्दनागरुकस्तूरीफलशाखासमन्विते ॥ ८
सुपुरोधाब्राह्मणेश्च मुनिभिब्रह्मवादिभिः।
जारीभिनर्तकीभिश्च गजेन्द्रादिसुशोभितै
परितः परितो रंभास्तम्भवृन्दसमन्विते
पतिपुत्रवतीयोधित्समूहेरदीपहस्तकैः
द्विजबृन्दैश्न॒ संयुक्ते कुर्वद्धिर्मडुलध्वनिम्!
नानाप्रकारवाद्येश्च शंखध्वनिभिरन्विते॥ ११
एतस्मिन्नन्तरे दुर्गाजगाम स्वपुरान्तिकम्।
विशंती नगरं देबी ददर्शं पितरौ पुनः॥
सुप्रसन्नौ प्रधावन्तौ हर्षविह—लमानसौ।
देष्ट्वा काली सुप्रहष्टा स्वालिभिः प्रणनाम तौ॥ १३
॥ १०
नारदजी बोले--हे विधे! हे तात! हे महाभाग!
परमार्थके ज्ञाता आप धन्य हैं, आपकी कृपासे मैंने यह
अद्भुत कथा सुनी । जब शिवजी कैलास चले गये, तब
सर्वमंगला पार्वतीने क्या किया और वे पुनः कहाँ
गयीं ? हे महामते! मुझसे कहिये॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! हरके अपने स्थान
चले जानेके बाद जो कुछ हुआ, उसे प्रेमपूर्वक सुनो,
मैं शिवजीका स्मरणकर उसे कह रहा हूँ॥३॥
पार्वती अपना रूप सार्थककर 'महादेव' शब्दका
उच्चारण करती हुई पिताके घर अपनी सखियोंके
साथ गयीं। पार्वतीके आगमनका समाचार सुनते ही
मेना तथा हिमालय दिव्य विमानपर चढ़कर हर्षसे
विहृल हो उनकी अगवानीके लिये चले ॥ ४-५॥
उस समय पुरोहित, पुरवासी, अनेक सखियाँ
तथा अन्य दूसरे सब सम्बन्धी आये। मैनाक आदि
सभी भाई महाप्रसन्न हो “जय' शब्दका उच्चारण
करने लगे॥ ६-७॥
चन्दन, अगरु, कस्तूरी, फल तथा वृक्षको
शाखाओंसे युक्त राजमार्गको अपूर्व सजावटसे सम्पन्नकर
स्थान-स्थानपर मंगलघट स्थापित कराया गया॥ ८॥
सारा राजमार्ग पुरोहित, ब्राह्मण, ब्रह्मवेत्ता, मुनियों,
नर्तकियों एवं बड़े-बड़े गजेऱद्रॉसे खचाखच भर गया॥ ९॥
जगहःजगहपर केलेके खम्भे लगाये गये और
चारों ओर पतिःपुत्रवती स्त्रियाँ हाथमें दीपक लिये हुए
खडी हो गयीं। ब्राह्मणोंका समूह मंगलपाठपूर्वक
चेदोंका उद्घोष कर रहा था। अनेक प्रकारके वाद्य
तथा शंखकी ध्वनि हो रही थी। इसी बीच दुर्गा देवी
अपने नगरके समीप आयीं और प्रवेश करते ही उन्होंने
सर्वप्रथम अपने माता-पिताका पुनः दर्शन किया। उन
कालीको देखकर माता-पिता हर्षसे विहल हो प्रसन्नतासे
दौड़ पड़े। पुनः पार्वतीने भी उनको देखकर सखियोंसहित
उन्हें प्रणाम किया॥ १०--१३॥
६२०
श्रीशिवमहापुराण
[अ र
तौ सम्पूर्णाशिषं दत्त्वा चक्रतुस्तौ स्ववक्षसि।
हे वत्से त्वेवमुच्चार्य रुदन्तौ प्रेमविह्ृलौ॥
ततः स्वकीया अप्यस्या अन्या नार्योऽपि संमुदा।
भ्रातृस्त्रियोऽपि सुप्रीत्या दूढालिङ्गनमादधुः॥ १५
साधितं हि त्वया सम्यक् सुकार्य कुलतारणम्।
त्वत्सदाचरणेनापि पाविताः स्माखिला वयम् ॥ १६
इति सर्वे सुप्रशंस्य प्रणेमुस्तां प्रहर्षिताः।
चन्दनैः सुप्रसूनैश्च समानर्चुः शिवां मुदा॥ १७
तस्मिन्नवसरे देवा विमानस्था मुदाम्बरे।
पुष्पवृष्टिं शुभां चकरुर्नत्वा तां तुष्टुवुः स्तवैः॥ १८
तदा तां च रथे स्थाप्य सर्वे शोभान्विते वरे।
पुरं प्रवेशयामासुः सर्वे विप्रादयो मुदा॥ १९
अथ विप्राः पुरोधाश्च सख्यो5न्याश्व स्त्रियः शिवाम्।
गृहं प्रवेशयामासुर्बहुमानपुरस्सरम्॥ २०
स्त्रियो निर्मञ्छनं चक्रुर्विप्रा युयुजुराशिषः।
हिमवान्मेनका माता मुमोदाति मुनीश्वर॥ २१
स्वाश्रमं सफलं मेने कुपुत्रातपुत्रिका वरा।
हिमवान्नारदं त्वां च संस्तुवन् साधु साध्विति॥ २२
ब्राह्मणोभ्यश्च बंदिभ्यः पर्वतेन्रों धनं ददौ।
मङ्गलं पाठयामास स द्विजेभ्यो महोत्सवम्॥ २३
एवं स्वकन्यया हृष्टौ पितरौ भ्रातरस्तथा।
जामयश्च महाप्रीत्या समूषुः प्राङ्गणे मुने॥ २४
ततः स हिमवान् तात सुप्रहृष्टाः प्रसत्रधी;।
सम्मान्य सकलान्प्रीत्या स्त्रातुं गङ्गां जगाम ह॥ २५
एतस्मिन्नन्तरे शंभुः सुलीलो भक्तवत्सलः।
सुनर्तकनटो भूत्वा मेनकासंनिधिं ययौ॥ २६
शृङ्गं वामे करे धृत्वा दक्षिणे डमरुं तथा ।
पृष्ठे कंथां रक्तवासा जृत्यगानविशारद्; ॥ २७
माता-पिताने आशीर्वाद देकर कालीको ड
गोदमे ले लिया और 'हे वत्से! इल
उच्चारणकर स्नेहसे विह्वल हो रोने लगे॥ १४।
तदनन्तर इनके अपने सगे-सम्बन्धियोंकी सिके
तथा FE आदिकी पत्नियोने नि भी प्रीतिपूर्वक पीक
दृढ़ आलिंगन किया और उन्होंने कहा--तुमने कुलन्न
तारनेका कार्य भलीभाँति सम्पन्न किया | तुम्हारे जल
सदाचरणसे हम सभी पवित्र हो गयीं॥ १५-१६॥
इस प्रकार गिरिजाको प्रशंसाकर सभी लोगो)
उन्हें प्रणाम किया और चन्दन तथा उत्तम पुष्कर
द्वारा प्रसन्नतासे उनका पूजन करने लगे॥ १७।
उसी समय विमानोंमें बैठे हुए देवगण भरी
आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने लगे और पार्वतीको
नमस्कारकर स्तोत्रेंसे उनकी स्तुति करने लगे। उसके बाद
ब्राह्मण आदि प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारकी शोभसे
सुसज्जित रथमें पार्वतीको बैठाकर नगरमें ले गये और
ब्राह्मण, पुरोहित, स्त्रियों तथा सखियोंने बडे प्रेमके साध
आदरपूर्वक उनको घरमें प्रवेश कराया॥ १८-१०॥
स्त्रियाँ मंगलाचार करने लगीं और ब्राह्मण
आशीर्वाद देने लगे। हे मुनीश्वर! उस समय मात
मेनका तथा पिता हिमवान्कों अत्यन्त प्रसन्नता ह
उन्होंने गृहस्थाश्रमको सफल माना और कहा कि
कुपुत्रकी अपेक्षा पुत्री ही अच्छी होती है। तदतता
वे हिमालय, आप नारदको भी साधुवाद देते हुए |
प्रशंसा करने लगे॥ २१-२२॥ |
पर्वतराज हिमालयने ब्राह्मणों एवं बन्दीजनोंकी
बहुत-सा धन दिया और ब्राह्मणोंद्रारा मंगल
कराया, बहुत बड़ा उत्सव किया॥ २३॥
हे मुने! इस प्रकार प्रसन्न हुए माता-पिता;
सभी सम्बन्धीगण पार्वतीके साथ आँगनमें बैठे ॥ १४१
हे तात! तत्पश्चात् हिमालय परम प्रसर
ह सम्बन्धियोंका प्रेमपूर्वक सम्मानकर रंगाला
गवे॥ २५॥
उसी समय लीला करनेमें तत्पर भवर
भगवान् शंकर सुन्दर नाचनेवाले नटका रूप भ
समीप पहुंचे। वे बाएँ हाथमें रंगी, दहि “
डमरू तथा पीठपर गुदड़ी धारण करके रक्तरस
अ० ३० |
ऽसौ मेनाया प्राङ्गणे मुदा।
चक्रे सुनृत्यं विविधं गानं चातिमनोहरम्॥ २८
ङ्गं च डमरुं तत्र वादयामास सुध्वनिम्।
महतीं विविधां तत्र स चकार मनोहराम्॥ २९
तां द्रष्टु नागराः सर्वे पुरुषाश्च स्त्रियस्तथा।
आजग्मुः सहसा तत्र बाला वृद्धा अपि क्षुवम्॥ ३०
श्रुत्वा सुगीतं तद् दृष्ट्वा सुनृत्यं च मनोहरम्।
सहसा मुमुहुः सर्वे मेनापि च तदा मुने॥ ३१
मूर्च्छा संप्राप सा दुर्गा विलोक्य हृदि शंकरम्।
त्रिशूलादिकचिह्णानि बिभ्रतं चातिसुन्दरम्॥ ३२
विभूतिभूषितं रम्यमस्थिमालासमन्वितम्।
त्रिलोचनोज्ज्चलद्वक्त्रं नागयज्ञोपवीतकम्॥ ३३
वरं वृण्वित्युक्तवन्तं गौरवर्ण महेश्वरम्।
दीनबन्धुं दयासिन्धुं सर्वथा सुमनोहरम्॥ ३४
हृदयस्थं हरे दृष्ट्वेदूशं सा प्रणनाम तम्।
वरं वब्रे मानसं हि पतिर्मे त्वं भवेति च॥ ३५
वरं दत्त्वा शिवां चाथ तादूशं प्रीतितो हृदा।
अन्तर्धाय पुनस्तत्र सुननर्त स भिक्षुकः॥ ३६
ततो मेना सुरत्लानि स्वर्णपात्रस्थितानि च।
तस्मै दातुं ययौ प्रीत्या तद्भतिप्रीतमानसः॥ ३७
तानि न स्वीचकारासौ भिक्षां याचे शिवां च ताम्।
पुनः सुनृत्यं गानञ्च कौतुकात्कर्तुमुद्यतः॥ ३८
मेना तद्ठचनं श्रुत्वा चुकोपाति सुविस्मिता।
भिक्षुक भर्त्सयामास बहिष्कर्तुमियेष सा॥ ३९
एतस्मिन्नन्तरे तत्र गङ्गातो गिरिराययौ।
ददर्श पुरतो भिक्षु प्राड्रणस्थं नराकृतिम्॥
भुत्या मेनामुखाद् वत्तं तत्सर्व सुचुकोप सः।
आज्ञां चकारानुचरान्बहिष्कर्तु तं नटम्॥ ४१
महाग्निमिव दुःस्पर्शः प्रज्चलन्तं सुतेजसम्।
^ शशाक बहिष्कर्तु कोऽपि तं मुनिसत्तम॥ ४९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६२१
हुए थे । नृत्य-गानमें प्रवीण चे शिवजी मेनाके आँगनमें
बड़ी प्रसन्नताके साथ अनेक प्रकारका मनोहर नृत्य
एवं गान करने लगे॥ २६--२८॥
वे सुन्दर ध्वनिसे श्रृंगी तथा डमरू बजाने लगे
और नाना प्रकारकी मनोहर लीला करने लगे॥ २९॥
उस लीलाको देखनेके लिये सभी नगर-निवासी
स्त्री-पुरुष, बालक तथा वृद्ध सहसा वहाँ आ गये॥ ३०॥
हे मुने! उस मनोहर नृत्यको देखकर एवं गीतको
सुनकर सभी लोग तथा मेना भी अत्यन्त मोहित हो गयीं।
त्रिशूल आदि चिहसे युक्त एवं अत्यन्त मनोहर रूप
धारण करनेवाले उस नटको देखकर पार्वती भी उन्हें
हृदयसे शंकर जानकर मूच्छित हो गयीं ॥ ३१-३२॥
विभूतिसे विभूषित होनेके कारण अत्यन्त मनोहर,
अस्थिमालासे समन्वित, त्रिलोचन, देदीप्यमान मुख-
मण्डलवाले, नागका यज्ञोपवीत धारण किये हुए, गौरवर्ण,
दीनबन्धु, दयासागर, सर्वथा मनोहर और “वर माँगो'
इस प्रकार कहते हुए उन हृदयस्थ महेश््वरको देखकर
पार्वतीने उन्हें प्रणाम किया और मनमें वर माँगा कि
आप ही हमारे पति हों॥ ३३-३५॥
इस प्रकार हदयसे पार्वतीको प्रीतिपूर्वक वर
देकर शिवजी अन्तर्धान होकर पुनः भिक्षुकका रूप
धारणकर नृत्य करने लगे। तब उस नृत्यसे प्रसन्न
होकर मेना सोनेके पात्रमें बहुत-सारे रत्न रखकर बड़े
प्रेमसे उस भिक्षुकको देनेके लिये गयीं, किंतु भिक्षुकने
उन्हें स्वीकार नहीं किया और भिक्षामें शिवाको माँगा
तथा पुनः नृत्य-गान करने लगे॥ ३६--३८॥
मेना भिक्षुकके वचनको सुनकर विस्मित हो
क्रोधसे भर गयीं । वे भिक्षुककी भर्त्सना करने लगीं और
उन्होंने उसे बाहर निकालनेकी इच्छा की । इसी समय
हिमालय भी गंगाजीसे आ गये और उन्होंने नरको
आकृतिवाले भिक्षुको आँगनमें स्थित देखा॥ ३९-४०॥
मेनाद्वार सभी बातोंको जानकर हिमालयको
बड़ा क्रोध आया। उन्होंने भिक्षुकको घरसे बाहर
निकालनेके लिये अपने सेवकोंको आज्ञा दी ॥ ४१॥
किंतु हे मुनिसत्तम! प्रलयाग्निके समान जलते
हुए तेजसे अत्यन्त दुःसह उस भिक्षुकको बाहर
निकालनेमें कोई भी समर्थ नहीं हुआ॥४२॥
६२२
श्रीशिवमहापुराण
[अः व ` कक क यची
'ततः स भिक्षुकस्तात नानालीलाविशारदः।
दर्शयामास शैलाय स्वप्रभावमनन्तकम्॥
शैलो ददर्श तं तत्र विष्णुरूपधरं द्रुतम्।
किरीटिनं कुण्डलिनं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम्॥ ४४
यद्यत्पुष्पादिकं दत्तं पूजाकाले गदाभृते।
गात्रे शिरसि तत्सर्व भिक्षुकस्य ददर्श ह॥ ४५
ततो ददर्श जगतां स्तरष्टारं स चतुर्मुखम्।
रक्तवर्ण पठन्तं च श्ररुतिसूक्तं गिरीश्वरः॥ ४६
ततः सूर्यस्वरूपं च जगच्तक्षुस्स्वरूपकम्।
ददर्श गिरिराजः स क्षणं कोतुककारिणम्॥ ४७
ततो ददर्श तं तात रुद्ररूपं महाद्भुतम्।
पार्वती सहितं रम्यं विहसन्तं सुतेजसम्॥ ४८
ततस्तेजस्स्वरूपं च निराकारं निरंजनम्।
निरुपाधि निरीहं च महाद्धुतमरूपकम्॥ ४९
एवं बहूनि रूपाणि तस्य तत्र ददर्श सः।
सुविस्मितो बभूवाशु परमानन्दसंयुतः॥ ५०
अथासौ भिक्षुवयों हि तस्माततस्याश्च सूतिकृत्।
भिक्षां ययाचे दुर्गा तां नान्यज्जग्राह किञ्जन॥ ५९
न स्वीचकार शैलेन्द्रो मोहितश्शिवमायया।
भिक्षुः किंचिन्न जग्राह तत्रैवान्तर्दधे ततः॥ ५२
तदा बभूव सुज्ञानं मेनाशैलेशयोरिति।
आवां शिवो वञ्चयित्वा स्वस्थानं गतवाऱग्रभु:॥ ५३
तयोर्विचिन्त्य तत्रैवं शिवे भक्तिरभूत्परा।
महामोक्षकरी दिव्या सर्वानन्दप्रदायिनी॥ ५४ शिवजीमें
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां स्रसंहितागां तीव पार्वतीखण्डे पार्वतीप्रत्यागमन्महोत्सववर्णन नाम तरोऽ ध्यायः ॥ ९ /
॥ हस पकार शिवमहापुराणके अतर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें |
हे तात! उस समय अनेक लीलाओंमे खो
उस भिक्षुकने पर्वतराज हिमालयको अपना आ
प्रभाव दिखाया। हिमालयने देखा कि वह ४,
तत्क्षण किरीट, कुण्डल, पीताम्बर तथा चतु श
धारणकर विष्णुके स्वरूपमें हो गया है ॥ ४३.४,
विष्णुपूजाके लिये उन्होंने जो-जो पुष्पादि अप
किये थे, वह सभी पूजोपहारकी सामग्री विष्णुरूपधा
इन भिक्षुकके सिर एवं गलेमें पड़ी हुई उन्होंने देखी । धप
तत्पश्चात् गिरिराजने देखा कि उस भिक्षुके
रक्तवर्ण होकर वेदोंके सूक्तं उच्चारण करते हुए, चतुभुज |
जगत्स्रष्टा ब्रह्माका रूप धारण कर लिया है ॥ ४६॥
पुनः गिरीश्वरने एक क्षण बाद देखा कि क्
जगच्वक्षु सूर्यके रूपमें परिवर्तित हो गया। इस प्रका |
उन्होंने क्षण-क्षणमें रूप बदलकर. कौतुक करते हुए |
उस भिक्षुको देखा। हे तात! तत्पश्चात् हिमाल |
देखा कि वह भिक्षुक अद्भुत रूप धारण किये हुए र |
हो गया है, जो पार्वतीसहित परम मनोहर अपने तेजसे |
प्रकाशित हो रहा हे ॥ ४७-४८॥ |
तदनन्तर उन्होंने निराकार, निरंजन, निरुपाधि, |
निरीह, परम अद्भुत, तेजस्वरूपमें परिवर्तित होते हुए
उस भिक्षुकको देखा। इस प्रकार जब हिमालयने उस
भिक्षुके अनेक विस्मयकारक रूप देखे, तब वे |
आनन्दयुक्त होकर आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४९-५०॥
उसके बाद पुन: भिक्षुकरूपधारी उन सृष्टिक |
शिवजीने हिमालयसे दुर्गाकी याचना की और कुछ कं
माँग, किंतु शिवमायासे मोहित होनेके कारण हिमालय
उसे स्वीकार नहीं किया, भिक्षुकने भी और कुछ ग्रह
नहीं किया और वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ ५१-५१
तब मेना और शैलराजको ज्ञान हुआ
प्रभु शंकरजी हम दोनोंको बंचितकर अपने
चले गये॥ ५३॥
इस बातका विचार करके उन दोतोंको दि
सवांनन्दप्रदायिनी तथा परम मोक्ष देनेवाली परा
अ० ३१] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२३
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
देबताओंके 'कहनेपर शिवका ब्राह्मण-वेषमें हिमालयके यहाँ जाना और शिवकी निन्दा करना
ब्रह्मोवाच
तो ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार मेना
तयोर्भक्ति शिवे ज्ञात्वा परामव्यभिचारिणीम्। शैलराजकी शिवमें अनन्य भक्ति देखकर इन्द्र
सर्वे शक्रादयो देवाञ्जिचिन्तुरिति नारद॥ १ | आदि सभी देवताओंने विचार किया॥ १॥
ज दाऊ > देवता बोले--यदि हिमालय शिवजीमें अनन्य
Fo श्वेत्कन्यां तसम प्रदास्यति। | भक्तिपूर्वक शंकरजीको अपनी कन्या देंगे तो भारतमें
रुवं निर्वाणतां सद्यः स प्राप्स्यति च भारते॥ २ | अवश्य ही निर्वाण पद प्राप्त कर लेंगे॥ २॥
अनन्तरताधारश्चेत्पृथ्वीं त्यक्त्वा प्रयास्यति। यदि इन अनन्त रलोंसे पूर्ण वे हिमालय
रलगर्भाभिधा भूमिर्मिथ्यैव भविता भ्रुवम्॥ ३
स्थावरत्वं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय सः।
कन्यां शूलभृते दत्त्वा शिवलोकं गमिष्यति॥ ४
महादेवस्य सारूप्यं लप्स्यते नात्र संशयः।
तत्र भुक्त्वा वरान्भोगांस्ततो मोक्षमवाप्स्यति॥ ५
ब्रह्मोवाच
इत्यालोच्य सुराः सर्वे कृत्वा चामन्त्रणं मिथः।
प्रस्थापयितुमैच्छंस्ते गुरुं तत्र सुविस्मिताः ॥ ६
ततः शक्रादयो देवाः सर्वे गुरुनिकेतनम्।
जग्मुः प्रीत्या सविनया नारद स्वार्थसाधकाः॥ ७
गत्वा तत्र गुरुं नत्वा सर्वे देवाः सवासवाः।
चक्रुर्निवेदनं तस्मै गुरवे वृत्तमादरात्॥ ८
देवा ऊचुः
गुरो हिमालयगृहं गच्छास्मत्कार्यसिद्धये।
तत्र गत्वा प्रयलेन कुरु निन्दां च शूलिनः॥ ९
पिनाकिना बिना दुर्गा बरं जान्यं वरिष्यति।
सुतां दत्त्वा फलं तूर्णं लभिष्यति॥ १०
कालेनैवाधुना शैल इदानीं भुवि तिष्ठतु।
अनेकरलाधारं तं स्थापय त्वं क्षितौ गुरो॥ ११
वसुन्धराको त्यागकर चले जायेगे, तो निश्चय ही इस
पृथिवीका रलगर्भा-यह नाम व्यर्थ हो जायगा।
इस स्थावररूपको छोड्कर दिव्यरूप धारणकर और
अपनी कन्या शूलधारी शंकरको देकर वे अवश्य ही
शिवलोक चले जायँगे॥ ३-४॥
उन्हें शिवलोकमें सारूप्य मुक्ति प्राप्त होगी,
इसमें संशय नहीं । वहाँ अनेक प्रकारके श्रेष्ठ भोगोंको
भोगकर वे मुक्त हो जायँगे॥५॥
ब्रह्माजी बोले--यह कहकर वे सभी देवता
इस बातका विचारकर विस्मित हो परस्पर मन्त्रणा
करके बृहस्पतिको हिमालयके पास भेजनेकी इच्छा
करने लगे॥ ६॥
हे नारद! तब इन्द्रादि सभी देवता स्वार्थ-
साधनक इच्छासे विनम्र होकर प्रीतिपूर्वक बृहस्मतिके
घर गये॥७॥
चे देवता वहाँ जाकर बृहस्पतिको प्रणाम करके
आदरपूर्वक उन गुरुसे सारा वृत्तान्त कहने लगे ॥ ८॥
देवता बोले-हे गुरो! आप हमलोगोंकी
कार्यसिद्धिके लिये हिमालयके पास जाइये और वहाँ
जाकर प्रयत्नपूर्वक शिवकी निन्दा कौजिये॥ ९॥
पार्वती शिवके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण
नहीं करेंगी और वे हिमालय बिना इच्छाके ही अपनी
कन्या पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करेंगे और
शीघ्र ही इसका फल प्राप्त कर लेंगे। हे गुरो ! हमलोगोंकी
इच्छा है कि हिमालय अभी पृथिवीपर निवास
करें। अत: आप अनेक रलोंको धारण करनेवाले उन
हिमालयको पृथ्वीपर स्थापित कोजिये॥ १०-११॥
६२४
श्रीशिवमहापुराण
ES स्य क यय क `
ब्रह्मोवाच
इति देववचः श्रुत्वा प्रददौ कर्णयोः करम्।
न स्वीचकार स गुरुः स्मरन्नाम शिवेति च॥ १
अथ स्मृत्वा महादेवं बृहस्तिरुदारधीः।
उवाच देववर्याश्च धिकूकृत्वा च पुनः पुनः॥ १३
बृहस्पतिरुवाच
सर्वे देवाः स्वार्थपराः परार्थध्वंसकारकाः।
कृत्वा शंकरनिंदां हि यास्यामि नरकं श्रुवम् ॥ १४
कश्चिन्मध्ये च युष्माकं गच्छेच्छैलान्तिकं सुराः ।
संपादयेत्स्वाभिमतं शैलेन्द्रं प्रतिबोध्य च॥ १५
अनिच्छया सुतां दत्त्वा सुखं तिष्ठतु भारते।
तस्मै भवत्या सुतां दत्त्वा मोक्ष प्राप्स्यति निश्चितम्॥ १६
पश्चात्समर्षयः सर्वे बोधयिष्यन्ति पर्वतम्।
पिनाकिना विना दुर्गा वरं नान्यं बरिष्यति॥ १७
अथवा गच्छत सुरा ब्रह्मलोकं सवासवाः।
वृत्तं कथयत स्वं तत्स वः कार्य करिष्यति॥ १८
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा ते समालोच्याजम्मुर्मम सभां सुरा: ।
सर्वे निवेदयाञ्जक्रुर्नत्वा तटूतमादरात्॥ १९
देवानां तद्वचः श्रुत्वा शिवनिन्दाकरं तदा ।
वेदवक्ता विलप्याहं तानबोचं सुरान्मुने॥ २०
ब्रह्मोवाच
नाहं कर्तु क्षमो वत्सा: शिवनिन््दां सुदुस्सहाम्।
संपद्विनाशरूपां च विपदां बीजरूपिणीम्॥ २१
सुरा गच्छत कैलासं सन्तोषयत शंकरम्।
प्रस्थापयत तं शीघ्रं हिमालयगृहं प्रति॥ २२ और
स. गच्छेदुपशैलेशमात्मनिन्दां करोतु वै।
परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे मता॥ २३
ब्रह्माजी बोले_देवगणोंकी
सुनकर बृहस्पतिने अपने कानोंपर हाथ रख ह
और शिवजीका नाम-स्मरण करते हुए उन्होंने च
बातको स्वीकार नहीं किया । उदारबुद्धिवाले वृह
महादेवजीका स्मरणकर श्रेष्ठ देवताओंको बार.
धिक्कारते हुए कहने लगे--॥ १२-१३॥
बृहस्पति बोले--हे देवताओ! तुमलो।
स्वार्थसाधक और दूसरेके कार्यको बिनष्ट करनेवाले
हो। शंकरजीकी निन्दा करके मैं निश्चित रूपसे नऊ
चला जाऊँगा॥ १४॥
इसलिये आपलोगोंमेंसे कोई हिमालयके पास
जाकर हिमालयको समझाकर अपना कार्य सिद्ध को,
जिससे वे अनिच्छापूर्वक अपनी कन्या शिवजीको
देकर भारतमें निवास करें; क्योंकि भक्तिपूर्वक क्या
देकर वे निश्चित ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे ॥ १५-१६॥
बादमें सप्तर्षि पर्वतराजको समझायेंगे कि यह
पार्वती शिवजीको छोड़कर दूसरे किसीका वरण नहीं
करेगी ॥ १७॥
अथवा हे देवताओ! आपलोग इनद्रके साथ
ब्रह्ललोकको जायँ और अपना सारा वृत्तान्त ब्रह्मजीको
बतायें, वे ही आपलोगोंका कार्य सम्पन्न करेंगे॥ १८
ब्रह्माजी बोले--यह सुनकर और विचारक
वे सभी देवता मेरी सभामें आये और प्रणामका
आदरपूर्वक अपना सारा वृत्तान्त उन्होंने मुझसे निवेदन
किया॥ १९॥
हे मुने! तब देवताओंकी उस शत
निन्दाविषयक बातको सुनकर वेदवक्ता मैं दुखी हो
उन देवताओंसे कहने लगा ॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले- हे वत्सो! में शिवजीको दुर
निन्दा नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि शिवजीकी पि
i विनाश करनेवाली एवं विपत्तियोंका का
॥२१॥ E
इसलिये हे देवताओ।! आपलोग कैलासपर ग”
र शिवको सन्तुष्ट करें तथा उन्हींको अपी
घर भेजिये। वे ही स्वयं हिमालयके घर जाकर अ
निन्दा करें; क्योंकि परनिन्दा विनाशके लिंगे ॥
आत्मनिन्दा यशके लिये कही गयी है॥ २९९९
अ० ३१]
ब्रह्मोवाच
मद्वचो देवा मां प्रणम्य मुदा च ते।
कैलासं प्रययुः शीघ्रं शैलानामधिपं गिरिम्॥ २४
तत्र गत्वा शिवं दृष्ट्वा प्रणम्य नतमस्तकाः।
सुकृतांजलयः सर्वे तुष्टुवुस्तं सुरा हरम्॥ २५
देवा ऊचुः
देवदेव महादेव करुणाकर शंकर।
वयं त्वां शरणापन्नाः कृपां कुरू नमोऽस्तु ते॥ २६
त्वं भक्तवत्सलः स्वामिन्भक्तकार्यकरः सदा।
दीनोद्धरः कृपासिन्धुर्भक्तापद्विनिमोचकः॥ २७
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महेशानं सर्वे देवाः सवासवाः।
सर्व निवेदयांचक्रुस्तद्वृत्तं तत आदरात्॥ २८
तच्छुत्वा देववचनं स्वीचकार महेश्वरः।
देवान् सुयापयामास तानाश््वास्य विहस्य सः॥ २९
देवा मुमुदिरे सर्वे शीघ्रं गत्वा स्वमंदिरम्।
सिद्धं मत्वा स्वकार्य हि प्रशंसन्तः सदाशिवम्॥ ३०
ततः स भगवाञ्छम्भुर्महेशो भक्तवत्सलः।
प्रययौ शैलभूपं च मायेशो निर्विकारवान्॥ ३१
यदा शैलः सभामध्ये समुवास मुदान्वितः।
बधुवगैः परिवृतः पार्वतीसहितः स्वयम्॥ ३२
एतस्मिन्नन्तरे तत्र ह्याजगाम सदाशिवः।
दण्डी छत्री दिव्यवासा बिभ्रत्तिलकमुज्ज्वलम्॥ ३३
करे स्फटिकमालां च शालग्रामं गले दधत्।
जपन्नाम हरेर्भक्त्या साधुवेषधरो द्विज:॥ ३४
तं च दृष्ट्वा समुत्तस्थौ सगणोऽपि हिमालयः।
जाम दण्डवद्भूमौ भक्त्यातिथिमपूर्वकम्॥ ३५
नाम पार्वती भक्त्या प्राणेशं विप्ररूपिणम्।
शोत्वा तं मनसा देवी तुष्टाव परया मुदा॥ ३६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६२५
ब्रह्माजी बोले--वे देवता मेरी बात सुनकर
प्रेमसे मुझे प्रणामकर शीघ्र ही शैलराज कैलासः
पर्वतपर गये ॥ २४॥
वहाँ जाकर शिवजीको देखकर सिर झुकाकर
शिवजीको प्रणाम करके हाथ जोड़कर वे सभी देवता
उन शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥ २५॥
देवता बोले-हे देवदेव! हे महादेव! हे
करुणाकर! हे शंकर! हम सब आपकी शरणमें हैं,
आपको प्रणाम है, हमलोगोंपर कृपा कीजिये॥ २६॥
हे स्वामिन्! आप भक्तवत्सल हैं, सदा भक्तोंका
कार्य करनेवाले, दीनोंका उद्धार करनेवाले, कृपासिन्धु
और भक्तोंकी आपत्ति दूर करनेवाले हैं॥ २७॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार इन्द्रादि देवगणोंने
शिवजीकी स्तुति करके बड़े आदरके साथ अपना
सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन किया॥ २८॥
देवताओंकी उस बातको सुनकर शिवजीने उसे
स्वीकार कर लिया और उन्होंने हँसकर देवताओंको
आश्वासन देकर उन्हें विदा कर दिया॥ २९॥
तब सभी देवगण प्रसन्न हो गये और अपना कार्य
सिद्ध जानकर शिवजीकी प्रशंसा करते हुए वे अपने
स्थानको चले गये ।तब वे भक्तवत्सल, मायेश, निर्विकार
महेश्वर भगवान् शम्भु शैलराजके पास गये ॥ ३०-३१॥
उस समय गिरिराज अपने बन्धुवर्गोके साथ
पार्वतीसहित प्रसन्न मनसे सभामें विराजमान थे॥ ३२॥
उसी समय दण्ड, छत्र एवं दिव्य वस्त्र धारण
किये तथा उज्ज्वल तिलक लगाये हुए भगवान्
सदाशिव उनकी सभामें आ गये॥ ३३॥
वे एक हाथमें स्फटिककी माला और गलेमें
शालग्रामशिला धारण किये हुए थे। वे भली प्रकार
ब्राह्मणका वेष धारणकर नारायणके नामका जप कर्
रहे थे॥ ३४॥
उन्हें देखकर हिमालय सभासदोंके साथ खड़े हो
गये और उन्होंने भूतलपर दण्डके समान पड्कर भक्तिः
भावसे उन अपूर्व अतिथिको साष्टांग प्रणाम किया ॥ ३५॥
ब्राह्मणवेषधारी शिवजीको अपना प्राणेश्वर
समझकर पार्वतीने प्रणाम किया और हदयसे परम
प्रसन्नतासे उनकी स्तुति को ॥ ३६॥
६२६
श्रीशिवमहापुराण
[अ Cs अ पर.
आशिषं युयुजे विप्रः सर्वेषां प्रीतितश्शिवः।
शिवाया अधिकं तात मनोऽभिलषितं हृदा॥ ३७
मधुपर्कादिकं सर्व जग्राह ब्राह्मणो मुदा।
दत्तं शैलाधिराजेन हिमागेन महादरात्॥ ३८
पप्रच्छ कुशलं चास्य हिमाद्रिः पर्वतोत्तमः।
तं द्विजेन्द्रं महाप्रीत्या सम्मूज्य विधिवन्मुने ॥ ३९
पुनः पप्रच्छ शैलेशस्तं ततः को भवानिति।
उवाच शीघ्रं विप्रेज्धो गिरीन्द्रं सादरं वचः॥ ४०
विप्रेद्ध उवाच
ब्राह्मणोऽहं गिरिश्रेष्ठ वैष्णवो बुधसत्तम:।
घटिकीं वृत्तिमाश्रित्य भ्रमामि धरणीतले॥ ४१
मनोयायी सर्वगामी सर्वज्ञोऽहं गुरोर्बलात्।
परोपकारी शुद्धात्मा दयासिम्धुर्विकारहा॥ ४२
मया ज्ञातं हराय त्त्वं स्वसुतां दातुमिच्छसि।
इमां पद्मसमां दिव्यां वररूपां सुलक्षणाम्॥ ४३
निराश्रयायासङ्गाय कुरूपायागुणाय च।
श्मशानवासिने व्यालग्राहिरूपाय योगिने॥ ४४
दिग्वाससे कुगात्राय व्यालभूषणधारिणे।
अज्ञातकुलनाम्ते च कुशीलायाविहारिणे॥ ४५
विभूतिदिग्धदेहाय संक्रुद्धायाविवेकिने।
अज्ञातवयसेऽतीव कुजटाधारिणे सदा॥ ४६
सर्वाश्रयाय भ्रमिणे नागहाराय भिक्षवे।
'कुमार्गनिरतायाथ वेदाऽध्वत्यागिने हठात्॥ ४७
इयं ते बुद्धिरचला न हि मङ्घलदा खलु।
विबोध ज्ञानिनां श्रेष्ठ नारायणकुलोद्धव॥ ४८
ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले उन डू
बड़े प्रेम'पूर्वक उन सबको आशीर्वाद दिया भौ
विशेषकर पार्वतीको हृदयसे उनका मनोवांछि
आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ३७॥
उन ब्राह्मणने शैलाधिराज हिमवानूके द्रा
बड़े आदरके साथ दिये गये मधुपर्क आदिको प्रमे
ग्रहण किया॥ ३८॥
हे मुने! इस प्रकार प्रेमपूर्वक उन द्विजेद्रक
विधिवत् पूजन करनेके पश्चात् पर्वतश्रेष्ठ हिमालय
उनका कुशल पूछने लगे। पर्वतराजने उनसे पूछा कि
आप कौन हैं? तब विप्रे्र गिरिराजसे आदरपूर्वक
शीघ्र यह वचन कहने लगे-- ॥ ३९-४०॥
विप्रेन्द्र बोले--हे गिरिश्रेष्ठ! मैं बुद्धिमान
श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण हूँ और ज्योतिषवृत्तिका सहाए
लेकर पृथिवीतलमें विचरण करता हूँ॥ ४१॥
मैं अपने गुरुकी कृपासे मनके समान सर्वत्र
चलनेवाला, सर्वत्र गमन करनेवाला, सर्वज्ञ, परोपकारी,
शुद्ध मनवाला, दयासिन्धु तथा विकारका ताश
करनेवाला हूँ॥ ४२॥
मुझे ज्ञात हुआ है कि आप कमलके समाग,
दिव्य, उत्तम रूपवाली तथा सर्वलक्षणसम्पन अपनी
यह कन्या आश्रयरहित, असंग, कुरूप, गुणही
३मशानमें रहनेवाले, सर्पधारी, योगी, नग्न, मलिन
शरीरवाले, सर्पका आभूषण धारण करनेवाले; अ
कुल तथा नामवाले, कुशील, विहारमें रुचिं १
रखनेवाले, विभूतिसे लिप्त देहवाले, अर्ब
क्रोधी, अज्ञानी, अज्ञात आयुवाले, सदा विकृत 77
धारण करनेवाले, सबको आश्रय देनेवाले, भ्रमणशी
नागोंका हार पहननेवाले, भिक्षुक, कुा्गमे तिर (र
हठपूर्वक वैदिक मार्गका त्याग करनेवाले शिवी दै
चाहते हैं॥ ४३--४७॥
[है हिमालय!] आपका यह अटल त
अवश्य ही मंगलदायक नहीँ है। नारयण
उत्पन तथा ज्ञानियोंे श्रेष्ठ [गिरिराज !] आप ई
विचार कीजिये॥ ४८॥
अ० ३२]
न ते पात्रानुरूपश्च पार्वतीदानकर्मणि।
महाजनः स्मेरमुखः श्रुतमात्राद्धविष्यति॥ ४९
पश्य शैलाधिप त्वं च न तस्यैको ऽस्ति बान्धवः ।
प्रहारलाकरः त्वं च तस्य किञ्चिद्धनं न हि॥ ५०
बान्धवान्मेनकां कुश्रपते शीघ्र सुतांस्तथा।
सर्वान्युच्छ प्रयत्नेन पण्डितान्पार्वतीं विना॥ ५१
रोगिणो नौषधं शश्चद्रोचते गिरिसत्तम।
कुपथ्यं रोचतेऽभीक्ष्णं महादोषकरं सदा॥ ५२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा ब्राह्मण: शीघ्र स वे भुक्त्वा मुदान्वितः।
जगाम स्वालयं शान्तो नानालीलाकरश्शिवः॥ ५३
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६२७
पार्वतीके दानकर्ममें वे आपके इस दानके
अनुरूप पात्र नहीं हैं। बड़े लोग इस बातको सुनकर
आपकी हँसी करेंगे। देखिये, उनका कोई बन्धुः
बान्धव नहीं है और आप पर्वतराज हैं, उनके पास
कुछ भी नहीं है और आप रत्नाकर हैं ॥ ४९-५०॥
हे शैलाधिराज! आप पार्वतीको छोड़कर
[इस विषयमें] बान्धवोंसे, मेनासे, पुत्रोंसे और सभी
पण्डितोंसे प्रयत्नपूर्वक शीघ्रतासे पूछिये ॥ ५१॥
हे गिरिसत्तम! रोगीको सर्वदा औषधि अच्छी
नहीं लगती, अपितु महादोषकारक कुपथ्य ही सदा
बहुत अच्छा लगता है॥५२॥
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर नाना प्रकारकी
लीला करनेवाले विप्ररूप शिव प्रसन्नतापूर्वक भोजनकर
शान्तचित्त हो शीघ्र अपने घर चले गये॥ ५३॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवमायावर्णनं नामैकत्रिंशोऽ ध्यायः ॥ ३१॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
शिवमायावर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३१॥
अथ द्रात्रिंशोऽध्यायः
ब्राह्मण-वेषधारी शिवद्वारा शिवस्वरूपकी निन्दा सुनकर मेनाका कोपभवनमें गमन,
शिवद्वारा सप्तर्षियोंका स्मरण और उन्हें हिमालयके घर भेजना, हिमालयकी
शोभाका वर्णन तथा हिमालयद्वारा समप्तर्षियोंका स्वागत
ब्रह्मोवाच
ब्राह्मणस्य वच: श्रुत्वा मेनोवाच हिमालयम्।
शोकेनासाधुनयना हृदयेन विदूयता॥ १
मेनोवाच
शृणु शैलेन्द्र मद्वाक्यं परिणामे सुखावहम्।
पृच्छ शैववरान्सर्वान्किमुक्तं ब्राह्मणेन ह॥ २
कृता शम्भोवैष्णवेन द्विजन्मना।
श्रुत्वा तां मे मनोऽतीव निर्विणणं हि नगेश्वर॥ ३
तस्मै रुद्राय शैलेश न दास्यामि सुतामहम्।
कुकूपशीलनाम्ने हि सुलक्षणयुतां निजाम्॥ ४
मे मन्यसे वचो चेन्मे मरिष्यामि न संशयः।
क्ष्यामि च गृहं सद्यो भक्षयिष्यामि वा विषम् ५
गले बदध्वांबिकां रज्ज्वा यास्यामि गहनं वनम्।
महाम्बुधौ मज्जयिष्ये तस्मै दास्यामि नो सुताम्॥ ६
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] ब्राह्मणका यह
वचन सुनकर [अश्रुपूर्ण नेत्रोंवाली] मेना व्यथित
मनसे हिमालयसे कहने लगीं--॥ १॥
मेना बोलीं--हे शैलेन्द्र! परिणाममें सुख प्रदान
करनेवाले मेरे वचनको सुनें, सभी श्रेष्ठ शैवोंसे पूछिये
कि इस ब्राह्मणने क्या कह दिया?॥ २॥
हे नगेश्वर! इस विष्णुभक्त ब्राह्मणने शिवजीकी
निन्दा की है; उसे सुनकर मेरा मन अत्यन्त दुखी है॥ ३॥
हे शैलेश्वर! मैं कुत्सित रूप एवं शीलवाले
उस रुद्रको अपनी सुलक्षणा कन्या नहीं ूँगी॥ ४॥
यदि आप मेरे वचनको नहीं मानेंगे, तो इसमें सन्देह
नहीँ कि मैं मर जाऊँगी, तुरंत घर छोड़ दूँगी अथवा
विष खा लूँगी अथवा अम्बिकाके गलेमें रस्सी बाँधकर
घोर वनमें चली जाऊँगी अथवा उसे महासागरमें डुबो
दूँगी, किंतु उसको अपनी कन्या नहीं दूँगी॥ ५-६॥
श्रीशिवमहापुराण
६२८
[अ न रख"
इत्युक्त्वाशु तथा गत्वा मेना कोपालयं शुचा।
त्यक्त्वा हारं रुदन्ती सा चकार शयनं भुवि॥ ७
एतस्मिन्नन्तरे तात शम्भुना सप्त एव ते।
संस्मृता ऋषयः सद्यो विरहव्याकुलात्मना॥ ८
ऋषयश्चैव ते सर्वे शम्भुना संस्मृता यदा।
तदाजम्मुः स्वयं सद्यः कल्पवृक्षा इवापरे॥ ९
अरुन्धती तथायाता साक्षात्सिद्धिरिवापरा।
तान्दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्विजहो स्वजपं हरः॥ १०
स्थित्वाग्रे ऋषयः श्रेष्ठा नत्वा स्तुत्वा शिवं मुने।
मेनिरे च तदात्मानं कृतार्थं ते तपस्विनः ॥ ११
ततो विस्मयमापन्ना नमस्कृत्य स्थिताः पुनः।
प्रोचुः प्राञ्जलयस्ते वै शिवं लोकनमस्कृतम्॥ १२
ऋषय ऊचुः
सर्वोत्कृष्ट महाराज सार्वभौम दिवौकसाम्
स्वभाग्यं वण्यतेऽस्माभिः किं पुनः सकलोत्तमम्॥ १३
तपस्तसं त्रिधा पूर्व॑ वेदाध्ययनमुत्तमम्।
अग्नयश्च हुताः पूर्वं तीर्थानि विविधानि च॥ १४
वाङ्मन:कायजं किंचित्पुण्यं स्मरणसम्भवम्।
तत्सर्वं सङ्गतं चाद्य स्मरणानुग्रहात्तव॥ १५
यो वै भजति नित्यं.त्वां कृतकृत्यो भवेन्नरः।
किं पुण्यं वण्यते तेषां येषां च स्मरणं तव॥ १६
सर्वोत्कृष्टा वयं जाताः स्मरणात्ते सदाशिव।
मनोरथपथं नैव गच्छसि त्वं कथंचन॥ १७
वामनस्य फलं यद्वण्जन्मान्धस्य दृशौ यथा।
'वाचालत्वं च मूकस्य रंकस्य निधिदर्शनम्॥ १८
'पङ्गोर्गिरिवराक्रान्तिर्वन्ध्यायाः 'प्रसवस्तथा।
दर्शनं भवतस्तद्वज्नातं नो दुर्लभं प्रभो॥ १९
इस प्रकार कहकर शोकसे सन्तप्त वे मेना
कोपभवनमें जाकर हार उतारकर रोती हुईं भ
लेट गयीं ॥७॥
हे तात! उसी समय [कालीके]
व्याकुल हुए शंकरजीने शीघ्र ही उन सप्तक
स्मरण किया॥ ८ ॥
जब शिवजीने उन सभी ऋषियोंका स्प
किया, तब वे दूसरे कल्पवृक्षके समान तत्काल बह
उपस्थित हो गये और साक्षात् सिद्धिके समान अरूक्वा
भी वहाँ आ गयीं | सूर्यके समान तेजस्वी उन ऋषियों
देखकर शिवजीने अपना जप छोड़ दिया॥ ९-१०॥
हे मुने! वे श्रेष्ठ तपस्वी ऋषि शिवजीके आगे
खड़े होकर उन्हें प्रणामकर उनको स्तुति करके
अपनेको कृतार्थ समझने लगे॥ ११॥
तत्पश्चात् विस्मयमें पड़कर वे पुनः लोकतमस्कृत
शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़कर सामने खडे
होकर उनसे कहने लगे ॥ १२॥
ऋषिगण बोले--हे सर्वोत्कृष्ट! हे देवताओंके
सम्राट्! हे महाराज! हमलोग अपने सर्वोत्तम भाग्यकी
सराहना किस प्रकार करें ॥ १३॥
हमलोगोंने जो पूर्व समयमें [कायिक, वाचिक तथा
मानसिक] तीनों प्रकारकी तपस्या की है, उत्तम वेदाध्यय
किया है, अग्निहोत्र किया है तथा नाना प्रकारके तीर्थ
किये हैं और ज्ञानपूर्वक वाणी, मन तथा शरीरसे जे
कुछ भी पुण्य किया है, वह सब आज आपके स्मरण
अनुग्रहके प्रभावसे सफल हो गया॥ १४-१५॥
जो मनुष्य आपका नित्य स्मरण करता दै, व
कृतकृत्य हो जाता है, तब उसके पुण्यका क्या वर्ण
किया जाय, जिसका स्मरण आप करते हैं॥ १६
हे सदाशिव! आपके द्वारा स्मरण किये
हमलोग सर्वोत्कृष्ट हो गये हैं,आप तो
मनोरथमार्गमें किसी प्रकार आते ही नहीं हैं॥ १४१
जिस प्रकार बौनेको फल प्राप्त हो बा
जन्माऱ्थको नेत्रकी प्राप्ति होती है, गृंगेको वाणी ५.३
जाती है, कंगालको निधिदर्शन हो जाता है, वे
पहाड़पर चढ्नेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है तथा |
प्रसव सम्भव हो जाता है, उसी प्रकार हे प्रभो! शा
आपका यह दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया॥ १८
अ० ३२]
अद्यप्रभृति लोकेषु मान्याः पूज्या मुनीएवरा:।
ज्ञातास्ते दर्शनादेव स्वमुच्चैः पदमाश्रिताः ॥ २०
अत्र किं बहुनोक्तेन सर्वथा मान्यतां गता:।
दर्शनात्तव देवेश सर्वदेवेशवरस्य हि॥२१
पूर्णानां किञ्च कर्तव्यमस्ति चेत्परमा कृपा।
सदृशं सेवकानां तु देयं कार्य त्वया शुभम्॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा तेषां शम्भुर्महेश्वरः।
लौकिकाचारमाश्रित्य रम्यं वाक्यमुपाददे॥ २३
शिव उवाच
ऋषयश्च सदा पूज्या भवन्तश्च विशेषतः।
युष्माकं कारणाद्रिप्राः स्मरणं च मया कृतम्॥ २४
मम्रावस्था भवद्भिश्च ज्ञायते ह्युपकारिका।
साधनीया विशेषेण लोकानां सिद्धिहेतवे॥ २५
देवानां दुःखमुत्पन्नं तारकात्सुदुरात्मनः।
ब्रह्मणा च वरो दत्तः किं करोमि दुरासदः॥ २६
मूर्तयोऽष्टौ च याः प्रोक्ता मदीयाः परमर्षयः।
ताः सर्वा उपकाराय न तु स्वार्थाय तत्स्फुटम्॥ २७
तथा च कर्तुकामोऽहं विवाह शिवया सह।
तया बै सुतपस्तप्तं दुष्करं परमर्षिभिः॥ २८
तस्यै परं फलं देयमभौष्टें तद्धितावहम्।
एतादृशः पणो मे हि भक्तानन्दप्रदः स्फुटम्॥ २९
पर्वतीवचनाद्भक्षुूपो यातो गिरेगृहम्।
अहे पावितवान्कालीं यतो लीलाबिशारदः॥ ३०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६२९
ज आजसे अब हम मुनीश्वर आपके दर्शनसे
में मान्य एवं पूज्य हो गये तथा ऊँची पदवीको
प्राप्त हो गये॥ २०॥
हे देवेश! बहुत कहनेसे क्या? आप
सर्वदेवेश्वरके दर्शनसे हम सर्वथा मान्यताको
प्राप्त हो गये॥ २१॥
आफ-जैसे पूर्ण परमात्माको किसीसे प्रयोजन
ही क्या है? किंतु यदि हम सेवकोंपर कृपा करना
ही हैं, तो हम सबके योग्य कार्यके लिये आज्ञा प्रदान
कोजिये॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले--तब उनकी इस बातको सुनकर
लोकाचारका आश्रय लेकर महेश्वर शम्भु मनोहर
वचन कहने लगे-॥ २३॥
शिवजी बोले-हे महर्षियो! ऋषिजन हर
तरहसे पूज्य हैं, आपलोग तो विशेष रूपसे पूज्य हैं।
हे विप्रो! कुछ कारणवश मैंने आपलोगोंका स्मरण
किया है॥ २४॥
आप सब जानते हैं कि मेरी स्थिति सदैव ही
परोपकार करनेवाली है और विशेषकर लोकोपकारके
लिये तो मुझे यह सब करना हीं पड़ता है॥ २५॥
इस समय दुरात्मा तारकासुरसे देवताओंके समक्ष
दुःख उत्पन्न हो गया है, क्या करूँ, ब्रह्माजीने उसे
बड़ा विकट वरदान दे रखा है॥ २६॥
हे महर्षियो! मेरी जो आठ प्रकारकी मूर्तियाँ
(पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र तथा
यजमान) कही गयी हैं, वे सब भी परोपकारके
निमित्त ही हैं, स्वार्थके लिये नहीं हैं, यह बात तो
स्पष्ट है॥ २७॥
[इस परोपकारके लिये ही] मैं पार्वतीके
साथ विवाह करना चाहता हूँ; उसने भी महर्षियोंके
कहनेसे दुष्कर कठोर तप किया हैं॥ २८॥
उसके इच्छानुसार उसका हितकारक फल
मुझे अवश्य देना चाहिये; क्योंकि भक्तोंको आनन्द
देनेवाली मेरी यह स्पष्ट प्रतिज्ञा है॥ २९॥
मैं पार्वतीके वचनानुसार भिक्षुकका रूप
घारणकर हिमालयके घर गया था और मुझ लीलाप्रवीणने
कालीको पवित्र किया था॥३०॥
६३०
मां ज्ञात्वा तौ परं ब्रह्म दम्पती परभक्तितः।
दातुकामाबभूतां च स्वसुतां वेद्रीतितः॥ ३१
देवप्रेरणयाहं वै कृतवानस्मि निन्दनम्
तदा स्वस्य च तद्रक्तिं विहन्तुं वैष्णवात्मना॥ ३२
तच्छुत्वा तौ सुनिर्विण्णौ तद्धीनौ संबभूवतुः ।
स्वकन्यां नेच्छतो दातुं मह्यं हि मुनयोऽधुना॥ ३३
तस्माद्भवन्तो गच्छन्तु हिमाचलगृहं श्रुवम्।
तत्र गत्वा गिरिवरं तत्पत्नीं च प्रबोधय। ३४
कथनीयं प्रयतेन वचनं वेदसम्मितम्।
सर्वथा करणीयं तद्यथा स्यात्कार्यमुत्तमम्॥ ३५
उद्वाहं कर्तुमिच्छामि तत्पुत्र्या सह सत्तमाः।
स्वीकृतस्तद्विवाहो मे वरो दत्तश्च तादृशः ॥ ३६
अत्र किं बहुनोक्तेन बोधनीयो हिमालयः।
तथा मेना च बोद्धव्या देवानां स्याद्धितं यथा॥ ३७
भवद्भिः कल्पितो यो वै विधिः स्यादधिकस्ततः।
भवतां चैव कार्य तु भवन्तः कार्यभागिनः॥ ३८
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा मुनयस्तेऽमलाशयाः।
आनन्दं लेभिरे सर्वे प्रभुणानुग्रहीकृताः॥ ३९
वयं धन्या अभूवंश्च कृतकृत्याश्च सर्वथा।
बंद्या जाताश्च सर्वेषां पूजनीया विशेषत: ॥ ४०
ब्रह्मणा विष्णुना यो वै वन्द्यः सर्वार्थसाधकः ।
सो$स्माऱ्प्रेषयते प्रेष्यान्काये लोकसुखावहे ॥ ४१
अयं वै जगतां स्वामी पिता सा जननी मता।
अयं युक्तश्च सम्बन्धो वर्धतां चन्द्रवत्सदा॥ ४२
श्रीशिवमहापुराण
[30 FR
वे स्त्री-पुरुष मुझे परब्रह्म जानकर वेदर
सद्भक्तिसे अपनी कन्या मुझे देनेके लिये ष
त्प
हो गये ॥ ३१॥
उसके बाद देवताओंकी प्रेरणासे वैष्णव भु
रूप धारणकर मैं उन दोनोंसे अपनी निन्दा के
लगा। उससे मेर प्रति उनकी भक्ति नष्ट हो गयी॥ ३२
उसे सुनकर वे बड़े दुखी हो गये और मे
भक्तिसे विमुख हो गये। हे मुनिगणो! अब वे मु
अपनी कन्या नहीं देना चाहते हैं ॥ ३३॥
इसलिये! आपलोग निश्चित रूपसे हिमाल्रयकरे
घर जाये और वहाँ जाकर गिरिश्रेष्ठ हिमालय औ
उनकी पत्नीको समझायें ॥ ३४॥
आपलोग प्रयत्नपूर्वक वेदसम्मत वचन उनमे
कहें और सर्वथा वही करें, जिससे यह उत्तम कार्य
सिद्ध हो जाय॥ ३५॥
हे मुनिसत्तमो! मैं उनकी पुत्रीके साथ विवाह
करना चाहता हूँ। मैंने [देवताओं एवं विणुके
कहनेसे] विवाह करना स्वीकार कर लिया है और
[पार्वतीको] वैसा वर भी दे दिया है॥ ३६॥
अन मैं अधिक क्या कहूँ, आपलोग हिमालय तश
मेनाको समझाइये, जिससे देवताओंका हित हो॥ १)
आपलोगोंने जिस प्रकारकी विधिकी कल्पना के
है, उससे भी अधिक होनी चाहिये, यह आपलोगोंका हैं
कार्ये है और इस कार्यके भागी आपलोग ही हैं॥ १८।
ब्रह्माजी बोले इस प्रकारके वचनको सुर
स्वच्छ अन्तःकरणवाले वे सभी महर्षि प्रभुसे
हो आनन्दको प्राप्त हुए॥ ३९॥
[वे ऋषि परस्पर कहने लगे] हमलोग स
धन्य तथा कृतकृत्य हो गये और विशेष रूपसे
वन्दनीय एवं पूजनीय हो गये॥ ४०॥ ही
जो ब्रह्मा तथा विष्णुके भी वन्दनीय है
सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले हैं, वे स
अपना दूत बनाकर लोकको सुख प्रदान
कार्यके लिये भेज रहे हैं॥ ४१॥ 3
ये शिवजी लोकोंके स्वामी एवं पिता हैं
[पार्वती] जगतूकी माता कही गयी हैं। [इ दती! a
उचित सम्बन्ध सर्वदा चन्रमाके समान बढ़ता रे"
अ० ३२]
ब्रह्मोवाच
ऋषयो दिव्या नमस्कृत्य शिवं तदा।
गता आकाशमार्गेण यत्रास्ति हिमवत्पुरम्॥ ४३
दृष्ट्वा तां च पुरीं दिव्यां ऋषयस्तेऽतिविस्मिताः।
बर्णयन्तश्च स्वं पुण्यमब्रुवन्वै परस्परम्॥ ४४
ऋषय ऊचुः
पुण्यवन्तो वयं धन्या दृष्ट्वैतद्धिमवत्पुरम्।
यस्मादेवंविधे कार्ये शिवेनैव नियोजिताः ॥ ४५
अलकायाश्च स्वर्गाच्च भोगवत्यास्तथा पुनः।
बिशेषेणामरावत्या दृश्यते पुरमुत्तमम्॥ ४६
सुगृहाणि सुरम्याणि स्फटिकैर्विविधैर्वरेः।
मणिभिर्वा विचित्राणि रचितान्यङ्गणानि च॥ ४७
सूर्यकान्ताश्च मणयश्चन्द्रकान्तास्तथैव च।
गृहे गृहे विचित्राश्च वृक्षाः स्वर्गसमुद्धवाः॥ ४८
तोरणानां तथा लक्ष्मीर्दृश्यते च गृहे गृहे।
विविधानि विचित्राणि शुकहंसैर्विमानकैः॥ ४९
वितानानि विचित्राणि चैलवत्तोरणैः सह।
जलाशयान्यनेकानि दीर्घिका विविधा: स्थिताः ॥ ५०
उद्यानानि विचित्राणि प्रसन्नैः पूजितान्यथ।
जराश्च देवता: सर्वे स्त्रियश्चाप्सरसस्तथा॥ ५१
कर्मभूमौ याज्ञिकाश्च पौराणाः स्वर्गकाम्यया।
कुर्वन्ति ते वृथा सर्वे विहाय हिमवत्पुरम्॥ ५२
यावन्न दृष्टमेतच्च तावत्स्वर्गपरा नराः।
दृष्टमेतद्यदा विप्राः किं स्वर्गेण प्रयोजनम्॥ ५३
ब्रह्मोवाच
वर्णयन्तः पुरं च तत्।
गता हेमालयं सर्वे गृहं सर्वसमृद्धिमत्॥ ५४
गटा सूर्यसंकाशान् हिमवान्विस्मितोउब्रवीत्।
देणदाकाशमारगस्थानमुनीन्स सुतेजसः॥ ५५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६३१
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर वे दिव्य ऋषि
शिवजीको प्रणामकर आकाशमार्गसे वहाँ गये, जहाँ
हिमालयका नगर है। उस दिव्य पुरीको देखते ही ऋषिगण
आश््चर्यसे चकित हो गये और अपने पुण्यका वर्णन
करते हुए परस्पर कहने लगे- ॥ ४३-४४॥
ऋषि बोले-हिमालयके इस नगरको
देखकर हम सभी पुण्यवान् एवं धन्य हो गये; क्योंकि
स्वयं शिवजीने इस प्रकारके कार्यमें हमलोगोंको
नियुक्त किया है॥ ४५॥
यह [हिमालयकी] पुरी तो अलका, स्वर्ग,
भोगवती तथा विशेषकर अमरावतीसे भी उत्तम
दिखायी पड़ती है॥ ४६॥
इस पुरीके अत्यन्त मनोहर एवं विचित्र घर और
आँगन स्फटिक तथा नाना प्रकारकी उत्तम मणियोंसे
बनाये गये हैं। इस पुरीके प्रत्येक घरमें सूर्यकान्त एवं
चन्द्रकान्त मणियाँ विद्यमान हैं तथा अद्भुत स्वर्गीय
वृक्ष लगे हुए हैं॥ ४७-४८॥
तोरणोंकी शोभा घर-घरमें दिखायी दे रही है।
इस पुरके विमानोंमें तोते तथा हंस बोल रहे हैं ॥ ४९॥
विचित्र प्रकारके वितान चित्र-विचित्र कपड़ोंके
बने हैं, जिनमें बन्दनवार बँधे हैं। वहाँ अनेक
जलाशय तथा विविध बावलियाँ हैं ॥ ५०॥
वहाँ विचित्र उद्यान हैं, जिनका लोग प्रसन्नचित्त
होकर सेवन करते हैं। यहाँके सभी पुरुष देवताके
सदृश तथा स्त्रियाँ अप्सराओंके सदृश हैं॥ ५१॥
हिमालयके पुरको छोड़कर स्वर्गकी कामनासे
कर्मभूमिमें याज्ञिक एवं पौराणिक लोग व्यर्थ ही
अनुष्ठान करते रहते हैं ॥५२॥
हे विप्रो! मनुष्योंको स्वर्गकी तभीतक कामना
रहती है, जबतक उन्होंने इस पुरीको नहीं देखा, जब
इसे देख लिया, तो स्वर्गसे क्या प्रयोजन ?॥ ५३॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार उस
पुरीका वर्णन करते हुए वे सभी ऋषि सब प्रकारकी
समृद्धिसे युक्त हिमालयके घर पहुँचे ॥ ५४॥
आकाशमार्गसे आते हुए सूर्यके समान अत्यन्त
तेजस्वी उन सात ऋषियोंको दूरसे ही देखकर
हिमवान् विस्मित हो [मनमें] कहने लगे ॥ ५५॥
६३२
श्रीशिवमहापुराण
[आ6 ह ` नी 75"
हिमवानुवाच
सप्तैते सूर्यसंकाशाः समायान्ति मदन्तिके।
पूजा कार्या प्रयलेन मुनीनां च मयाधुना॥ ५६
वयं धन्या गृहस्थाश्च सर्वेषां सुखदायिनः।
येषां गृहे समायान्ति महात्मानो यदीदुशाः ॥ ५७
ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे चेवाकाशादेत्य भुवि स्थितान्।
सम्मुखे हिमवान्दृष्ट्वा ययौ मानपुरस्सरम्॥ ५८
कृतांजलिर्नतस्कन्धः सप्र्षीन्सुप्रणम्य सः।
पूजां चकार तेषां वै बहुमानपुरस्सरम्॥ ५९
हिताः सप्तर्षयस्ते च हिमवन्तं नगेश्वरम्।
गृहीत्वोचुः प्रसन्नास्या वचनं मङ्गलालयम्॥ ६०
यथाग्रतश्च तान्कृत्वा धन्यो मम गृहाश्रमः।
इत्युक्त्वासनमानीय ददौ भक्तिपुरस्सरम्॥ ६९
आसनेषूपविष्टेषु तदाज्ञप्तः स्वयं स्थितः।
उवाच हिमवांस्तत्र मुनीन् ज्योतिर्मयांस्तदा॥ ६२
हिमालय उवाच
धन्यो हि कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं मम्।
लोकेषु दर्शनीयोऽहं बहुतीर्थसमो मतः॥ ६३
यस्माद्भवन्तो मद्गेहमागता विष्णुरूपिणः।
पूर्णानां भवतां कार्य कृपणानां गृहेषु किम्॥ ६४
तथापि किञ्चित्कार्यं च सदृशं सेवकस्य मे।
कथनीयं सुदयया सफलं स्याज्जनुर्मम॥ ६५
हिमवान् बोले_ये सूर्यके समान तेस
सप्तर्षिगण मेरे पास आ रहे हैं, मुझे ड्स
प्रयत्नपूर्वक इन मुनियोंकी पूजा करनी चाहिये ॥फ)
हम गृहस्थलोग धन्य हैं, जिनके घर सभी
सुख प्रदान करनेवाले इस प्रकारके महात्मा [स्वी
आते हैं॥ ५७॥
ब्रह्माजी बोले--इसी बीच आकाशसे उत्तका
पृथिवीपर स्थित हुए उन सबको अपने सम्मुख देखका
हिमालय सम्मानपूर्वक उनके पास गये॥५८॥
उन्होंने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर उ
सप्तर्षियोंको प्रणाम करके पुनः बड़े सम्मानके साध
उनकी पूजा को॥५९॥
उस पूजाको स्वीकार करके हित करनेवाले
प्रसन्नमुख सम्तर्षियोंने गिरिराज हिमालयसे कुशल-
मंगल पूछा॥ ६०॥
मेरा गृहस्थाश्रम धन्य हो गया-हिमालयने ऐसा
कहकर उन्हें आगे करके आसन लाकर भक्तिपूर्वक
समर्पित किया।आसनोंपर उनके बैठ जानेपर पुन: उनसे
आज्ञा लेकर वे हिमालय स्वयं भी बैठ गये और इसके
बाद तेजस्वी ऋषियोंसे कहने लगे- ॥ ६१-६२॥
हिमालय बोले--मैं धन्य तथा कृतकृत्य हे
गया, मेरा जीवन सफल हो गया, मैं लोकोंमें दर्शी
तथा अनेक तीर्थोके समान हो गया हूँ; कोरि
विष्णुस्बरूप आपलोग मेरे घर पधारे हैं। कृपण
षरोमें [हर प्रकारसे] परिपूर्ण आपलोगोंको कौर
कार्य हो सकता है? तो भी मुझ सेवकके योग्य जे
कुछ कार्य हो, उसे दयापूर्वक कहिये, जिससे ह
जन्म सफल हो जाय॥ ६३--६५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रसंहितयां तृतीये पर्वतीखण्डे सम्तप्यगिमनवर्णने नाम दवात्रिशोऽ ध्यायः ॥ है
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुदरसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें सप्तर्षियोका
आगमनवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥
ee
अथ त्रसस्त्रिंशोऽध्यायः
बसिष्ठपत्नी अरुन्धती द्वारा मेनाको समझाना तथा सप्तर्षियोद्वारा हिमालयको शिवमाहात्य बत
वि फु ऋषि बोले-[हे हिमालय!] शिवजी १
जगत्पिता शिवः प्रोक्तो जगन्माता शिवा मता। (| पिता कहे गये हं य पार्वती जगत्की माता मी
तस्माहेया त्वया कन्या शंकराय महात्मने॥ ९ | गयी हैं। इसलिये आप अपनी कन्या महात्मा र
अ० ३३]
एवं कृत्वा हिमगिरे सार्थकं ते भवेज्जनु:।
जगदुरोगुरुस्त्वं हि भविष्यसि न संशय:॥ २
ब्रह्मोवाच
ई वचनमाकर्ण्य सप्तर्षीणां मुनीश्वर।
परणम्य तान्करो बद्ध्वा गिरिराजोऽब्रवीदिदम्॥ ३
हिमालय उवाच
सप्तर्षयो महाभागा भवद्धिरर्यदुदीरितम्।
तत््माणीकृतं मे हि पुरैव गिरिशेच्छया॥ ४
इदानीमेक आगत्य विप्रो वैष्णवधर्मवान्।
शिवमुद्दिश्य सुप्रीत्या विपरीतं वचोऽब्रवीत्॥ ५
तदारभ्य शिवामाता ज्ञानभ्रष्टा बभूव ह।
सुताविवाहं रुद्रेण योगिना तेन नेच्छति॥ ६
कोपागारमगात्सा हि सुतसा मलिनाम्बरा।
कृत्वा महाहठं विप्रा बोध्यमानापि नाबुधत्॥ ७
अहं च ज्ञानविभ्रष्टो जातोऽहं सत्यमीर्यते।
दातुं सुतां महेशाय नेच्छामि भिक्षुूपिणे॥ ८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा शैलराजस्तु शिवमायाविमोहितः।
तूष्णीं बभूव तत्रस्थो मुनीनां मध्यतो मुने॥ ९
सर्वे सप्र्षयस्ते हि शिवमायां प्रशस्य वै।
प्रेषयामासुरथ तां मेनकां प्रत्यरुन्धतीम्॥ १०
अथ पत्युः समादाय निदेशं ज्ञानदा हि सा।
जगामारुन्धती तूर्ण यत्र मेना च पार्वती॥ ११
गत्वा ददर्श मेनां तां शयानां शोकमूच्छिताम्।
उवाच मधुरं साध्वी सावधाना हितं वचः॥ १२
अरुन्धत्युवाच
उत्तिष्ठ मेनके साध्वि त्वदगृहेऽहमरुन्धती।
आगता मुनयश्चापि सप्तायाताः कृपालवः॥ १३
ब्रह्मोवाच
अरुन्धतीस्वरं श्रुत्वा शीघ्रमुत्थाय मेनका।
उवाच शिरसा नत्वा तां पद्मामिव तेजसा॥ १४
मेनोवाच
अहोऽच्य किमिदं पुण्यमस्माकं पुण्यजन्मनाम्।
वेधूर्जगद्विधे. पत्नी वसिष्ठस्थागतेह बै॥ १५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६३३
प्रदान कर दीजिये। हे हिमालय! ऐसा करनेसे आपका
जन्म सफल हो जायगा और आप जगदगुरुके भी गुरु
हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! ऋषियोंके इस
प्रकारके वचनको सुनकर उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर
गिरिराज यह कहने लगे-॥ ३॥
हिमालय बोले-हे महाभाग्यवान् सप्तर्षिगण !
आपलोगोंने जैसा कहा है, उसे मैंने शिवजीकी
इच्छासे पहले ही स्वीकार कर लिया था। [किंतु हे
प्रभो!] इसी समय एक वैष्णवधर्मी ब्राह्मणने यहाँ
आकर शिवजीको लक्ष्य करके प्रेमपूर्वक उनके
विपरीत वचन कहा है॥ ४-५॥
तभी से शिवाकी माता ज्ञानसे भ्रष्ट हो गयी हैं
और अपनी पुत्रीका विवाह उन योगी रुद्रसे नहीं करना
चाहती हैं । हे विप्रो! वे अत्यन्त दुखी होकर मैले वस्त्र
धारणकर बड़ा हठ करके कोपभवनमें चली गयी हैं और
समझानेपर भी नहीं समझ रही हैं । में सत्य कह रहा हूँ.
कि मैं भी ज्ञानभ्रष्ट हो गया हूँ और अब में भिक्षुकरूपधारी
महेश्वरकों कन्या नहीं देना चाहता हँ | ६--८॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! शिवको मायासे मोहित
शैलराज इस प्रकार कहकर चुप हो गये और
मुनियोंके बीच बैठ गये॥ ९॥
उसके बाद उन सभी सप्तर्षियोंने शिवमायाकी
प्रशंसा करके उन मेनाके पास अरुन्धतीको भेजा॥ १०॥
'पतिकी आज्ञा पाकर ज्ञानदात्री अरुन्धती शीघ्र
ही वहाँ गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं॥ ११॥
वहाँ जाकर अरुन्धतीने शोकसे मूच्छित होकर
[पृथिवीपर] सोयी हुई मेनाको देखा तब उन पतित्रताने
सावधानीपूर्वक हितकर वचन कहा- ॥ १२॥
अरुन्धती बोली--हे साध्वि मेनके! उठिये, मैं
अरुन्धती आपके घर आयी हूँ तथा कृपालु सप्तर्षिगण
भी आये हुए हैं॥ १३॥
ब्रह्माजी बोले--अरुन्धतीका स्वर सुनकर शीघ्रतासे
उठकर महालक्ष्मीके समान तेजयुक्त अरुन्धतीको सिर
झुकाकर प्रणाम करके मेनका कहने लगीं-॥ १४॥
मेना बोलीं -अहो ! आज हम पुण्यवानोंका यह
कितना बड़ा पुण्य है, जो जगत्के विधाताकी पुत्रवधू
एवं वसिष्ठकी पत्नी मेरे घर स्वयं आयी हैं ॥ १५॥
६३४
श्रीशिवमहापुराण
किमर्थमागता देवि तन्मे ब्रूहि विशेषतः।
अहं दासीसमा ते हि ससुता करुणां कुरु॥ १६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता मेनका साध्वी बोधयित्वा च तां बहु।
तत्रागता च सुप्रीत्या यत्र सप्तर्षयोऽपि ते॥ १७
अथ शैलेशवरं ते च बोधयामासुरादरात्।
स्मृत्वा शिवपदददन्द्रं सर्वे वाक्यविशारदाः ॥ १८
ऋषय ऊचुः
शैलेन्द्र श्रूयतां वाक्यमस्माकं शुभकारणम्।
शिवाय पार्वतीं देहि संहर्तुः श्वशुरो भव॥ १९
अयाचितारं सर्वेशं प्रार्थयामास यलतः।
तारकस्य विनाशाय ब्रह्मा सम्बन्धकर्मणि॥ २०
जोत्सुको दारसंयोगे शंकरो योगिनां वरः।
विधेः प्रार्थनया देवस्तव कन्यां ग्रहीष्यति॥ २९
हुहितुस्ते तपस्तप्तं प्रतिज्ञानं चकार सः।
हेतुह्दयेन योगीन्द्रो विवाहं च करिष्यति॥ २२
ब्रह्मोवाच
ऋषीणां वचनं श्रुत्वा प्रहस्य स हिमालय: ।
उवाच किञ्चिद्धीतस्तु परं विनयपूर्वकम्॥ २३
हिमालय उवाच
शिवस्य राजसामग्रीं न हि पश्यामि काञ्जन।
कञ्चिदाश्रयमैश्वर्यं कं वा स्वजनबान्धवम्॥ २४
नेच्छाम्यतिविनिर्लिप्तयोगिने स्वां सुतामहम्।
यूयं वेदविधातुश्च पुत्रा वदत निश्चितम्॥ २५
वरायाननुरूपाय पिता कन्यां ददाति चेत्।
'कामान्मोहाद्भयाल्लोभात्स नष्टो नरकं ब्रजेत्॥ २६
ज हि दास्याम्यहं कन्यामिच्छया शूलपाणये।
यद्विधानं भवेद्योग्यमृषयस्तद्' विधीयताम्॥ २७
[अ `` यानाच्या `
हे देवि! आप किसलिये आयी हैं उसे मु
विशेष रूपसे कहिये। पुत्री पार्वतीसहित मै आफ्न
दासीके समान हूँ, आप कृपा कीजिये॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले--जब मेनाने इस प्रकार कह
तब साध्वी अरुन्धती उन्हें बहुत समझाकर परेम”
वहाँ गयीं, जहाँ सप्तर्षिगण विराजमान थे। के
वाक्यविशारद सभी महर्षिगण भी शिवके व
स्मरण करके आदरके साथ गिरिराजको समद्या
लगे॥ १७-१८॥ र
ऋषि बोले--हे शैलराज! आप हमलोगॉक
शुभकारक वचन सुनें, आप पार्वतीका विवाह शिवे
साथ कर दीजिये और संहारकर्ता शिवजीके झु
बन जाइये। तारकासुरके वधके निमित्त ब्रह्माजीने इस
विवाहको करनेके लिये उन अयाचक सर्वेश्वरसे प्रयल-
पूर्वक प्रार्थना की है। यद्यपि योगियोंमें श्रेष्ठ होनेके
कारण सदाशिव इस दारसंग्रह-कार्यके लिये उत्सुक
नहीं हैं, किंतु ब्रह्माजीके द्वारा बहुत प्रार्थना केप
वे आपकी इस कन्याको ग्रहण करेंगे॥ १९-११
आपकी कन्याने भी [शिवजीको वररूपमे प्रप
करनेहेतु] बड़ा तप किया है, इसीलिये उन्होंने उह
वर दिया है, इन्हीं दो कारणोंसे वे योगीन्द्र विवाह
करेंगे॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले-ऋषियोंकी यह बात सुर
हिमालय हँस करके फिर कुछ भयभीत होक
विनयपूर्वक इस प्रकार कहने लगे- ॥ २३॥
हिमालय बोले--मैं शिवके पास कोई रजे
सामग्री नहीं देख रहा हुँ, न उनका कोई आश्र
ऐश्वर्य ही दिखायी पड़ रहा है और न तो कोई उनकी म
सम्बन्धी ही दिखायी पड़ता है मैं अत्यन्त निर्लिप्त यो
अपनी पुत्री नहीं देना चाहता हूँ । आपलोग तो हद
पुत्र हैं, आपलोग ही निश्चित बात बतायें ॥ ९४९
यदि पिता काम, मोह, भय तथा लोभवश
कन्या प्रतिकूल वरको प्रदान करता है, तो व्ह
होकर नरकमें जाता है॥ २६॥
, मै स्वेच्छासे इस कन्याको शंकरकी
दूँगा, हे ऋषियो! अब जो उचित विधात दी,
आपलोग करें| २७॥
र
डं
अ० ३३]
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य हिमागस्य मुनीश्वर।
प्रत्युवाच वसिष्ठस्तं तेषां वाक्यविशारदः ॥ २८
वसिष्ठ उवाच
भृणु शैलेश मद्वाक्यं सर्वथा ते हिताबहम्।
धर्माविरुद्धं सत्यं च परत्रेह मुदावहम्॥ २९
वचनं त्रिविधं शैल लौकिके वैदिकेऽपि च।
सर्व जानाति शास्त्रज्ञो निर्मलज्ञानचक्षुषा॥ ३०
असत्यमहितं पश्चातसांप्रतं श्रुतिसुन्दरम्।
सुबुद्धिर्वक्ति शत्रुर्ह हितं नैव कदाचन॥ ३१
आदावप्रीतिजनकं परिणामे सुखाबहम्।
दयालुर्धर्मशीलो हि बोधयत्येव बांधवः॥ ३२
रूतिमात्रात्सुधातुल्यं सर्वकालसुखावहम्।
सत्यसारं हितकरं वचनं श्रेष्ठमीप्सितम्॥ ३३
एवं च त्रिविधं शैल नीतिशास्त्रोदितं वचः।
कथ्घतां त्रिषु मध्ये किं ब्रुवे वाक्यं त्वदीष्सितम्॥ ३४
ब्राह्मसम्पद्विहीनश्च
तत्त्वज्ञानसमुद्रेषु
शंकरस्त्रिदशेश्वर: ।
सन्निमग्नैकमानसः॥ ३५
सानानन्दस्येश्वरस्य ब्राह्मवस्तुषु का स्पृहा ।
गृही ददाति स्वसुतां राज्यसम्पत्तिशालिने॥ ३६
कन्यका दुःखिने दत्त्वा कन्याघाती भवेत्पिता।
को वेद शंकरो दु:खी कुबेरो यस्य किंकरः॥ ३७
शभडलीलया सृष्टि स्रष्टं हर्तृ क्षमो हि सः।
निर्गुण: परमात्मा च परेशः प्रकृतेः परः॥ ३८
यस्य च्च त्रिविधा a |
मूर्तिर्विधातुः सृष्टिकर्मणि
ष्टिसथत्यन्तजननी ब्रह्मविष्णुहराभिधा ॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६३५
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! हिमालयके इस
प्रकारके वचनको सुनकर उन ऋषियोंमें वाक्यविशारद
वसिष्ठजी उनसे कहने लगे--॥ २८॥
वसिष्ठजी बोले--हे शैलेन्द्र! आप मेरी बात
सुनिये, जो आपके लिये सर्वथा हितकर, धर्मके
अनुकूल, सत्य और इस लोक तथा परलोकमें आनन्द
प्रदान करनेवाली है। हे शैल! लोक एवं वेदमें तीन
प्रकारके वचन होते हैं, शास्त्रका ज्ञाता अपने निर्मल
ज्ञानरूपी नेत्रसे उन सबको जानता है ॥ २९-३०॥
जो वचन सुननेमें सुन्दर लगे, पर असत्य एवं
अहितकारी हो, ऐसा वचन बुद्धिमान् शत्रु बोलते हैं।
ऐसा वचन किसी प्रकार हितकारी नहीं होता॥ ३१॥
जो वचन आरम्भमें अप्रिय लगनेवाला हो, किंतु
परिणाममें सुखकारी हो, ऐसा वचन दयालु तथा
धर्मशील बन्धु ही कहता है | सुननेमें अमृतके समान,
सभी कालमें सुखदायक, सत्यका सारस्वरूप तथा
हितकारक वचन श्रेष्ठ होता है ॥ ३२-३३॥
हे शैल ! इस प्रकार तीन तरहके वचन नीतिशास्त्रमें
कहे गये हैं । अब आप ही बताइये कि इन तीन प्रकारके
वचनोंमें हमलोग किस प्रकारका वचन बोलें, जो आपके
अनुकूल हो। देवताओंके स्वामी शंकरजी ब्रह्मज्ञानसे
सम्पन्न हैं। रजोगुणी सम्पत्तिसे विहीन हैं, उनका मन
तत्त्वज्ञानके समुद्रमें सदा निमग्न रहता है ॥ ३४-३५ ॥
ऐसे ज्ञान तथा आनन्दके ईश्वर सदाशिवको
रजोगुणी वस्तुओंकी इच्छा किस प्रकार हो सकती है,
गृहस्थ अपनी कन्या राजसम्पत्तिशालीको देता है॥ ३६॥
पिता यदि अपनी कन्या किसी दीन-दुखीको देता
है, तो वह कन्याघाती होता है अर्थात् उसे कन्याके
वधका पाप लगता है । हे हिमालय! कौन कहता है कि
शंकर दुखी हैं, कुबेर जिनके दास हैं॥ ३७॥
वे शिवजी तो अपनी भंगिमाकी लीलामात्रसे
संसारका सृजन और संहार करनेमें समर्थ हैं। वे
निर्गुण, परमात्मा, परमेश्वर और प्रकृतिसे [सर्वथा]
परे हैं॥ ३८॥
सृष्टिकार्य करनेके लिये जिनकी तीन मूर्तियाँ
ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वररूपसे जगत्की उत्पत्ति,
पालन तथा संहार करती हैं ॥ ३९॥
६३६
श्रीशिवमहापुराण
[अ व छा सा लक कक
ब्रह्मा च ब्रह्मलोकस्थो विष्णु: क्षीरोदवासकृत्।
हरः कैलासनिलयः सर्वाः शिवविभूतय: ॥ ४०
धत्ते च त्रिविधा मूर्तीः प्रकृतिः शिवसम्भवा।
अंशेन लीलया सृष्टो कलया बहुधा अपि॥ ४९
मुखोद्भवा स्वयं वाणी वागधिष्ठातृदेवता।
वक्षःस्थलोद्भवा लक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥ ४२
शिवा तेजस्सु देवानामाविर्भावं चकार सा।
निहत्य दानवाससर्वान्देवेभ्यश्च श्रियं ददो ॥ ४३
प्राप कल्पान्तरे जन्म जठरे दक्षयोषितः।
नाम्ना सती हरं प्राप दक्षस्तस्मै ददौ च ताम्॥ ४४
देहं तत्याज योगेन श्रुत्वा सा भर्तृनिन्दनम्।
साद्य त्वत्तस्तु मेनायां जज्ञे जठरतश्शिवा॥ ४५
शिवा शिवस्य पलीयं शैल जन्मनि जन्मनि।
कल्पे कल्पे बुद्धिरूपा ज्ञानिनां जननी परा॥ ४६
जायते स्म सदा सिद्धा सिद्धिदा सिद्धिरूपिणी।
सत्या अस्थि चिताभस्म भक्त्या धत्ते हरः स्वयम्॥ ४७
अतस्त्वं स्वेच्छया कन्यां देहि भद्रां हराय च।
अथवा सा स्वयं कान्तस्थाने यास्यत्यदास्यसि॥ ४८
कृत्वा प्रतिज्ञा देवेशो दृष्ट्वा व्लेशमसंख्यकम्।
दुहितुस्ते तपःस्थानमाजगाम द्विजात्मकः॥ ४९
तामाश्वास्य वरं दत्त्वा जगाम निजमन्दिरम्।
तत््रार्थनावशाच्छम्भुर्ययाचे त्वां शिवां गिरे॥ ५०
ब्रह्मा ब्रह्मलोकमें रहते हैं, विष्णु क्षसा
वास करते हैं और हर कैलासमें निवास करते हैं,
सभी शिवजीकी विभूतियाँ हें ॥ ४०॥
यह सारी प्रकृति शिवजीसे ही उत्पन ह
है, जो A प्रकारकी होकर es जगतूको ध
करती है। वह प्रकृति इस जगत्में अपनी लीले
अंशावतारों तथा कलावतारोंके रूपोंमें अनेक प्रका
प्रतीत होती है ॥ ४१ ॥
उनकी वाणीरूप प्रकृति मुखसे उत्पन्न हुईं हैं,
जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी लक्ष्मीूप
प्रकृति वक्षःस्थलसे आविर्भूत हुई हैं, जो समूर्ण
सम्पत्तिको अधिष्ठात्री हैं ॥ ४२॥
उनकी शिवा नामकी प्रकृति देवताओंके तेजसे
प्रादुर्भूत हुई हैं, जो सभी दानवोंका वधकर देवताओंके
लिये महालक्ष्मी प्रदान करती हैं ॥ ४३ ॥
ये ही शिवा इसके पूर्वकल्पमें दक्षकी पीके
उदरसे जन्म लेकर सती नामसे विख्यात हुई। दक्षने
शंकरजीको ही दिया था, किंतु उस जन्ममें पिताके
द्वारा शिवजीकी निन्दा सुनकर उन्होंने अपने शरीरको
योगके द्वारा त्याग दिया। वही शिवा अब इस समय
आपके द्वारा मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं ॥ ४४-४५॥
हे शैलराज! इस प्रकार वे शिवा प्रत्येक
शिवजीको पत्नी रही हैं, वे प्रतिकल्पमें बुद्धिस्वष्पा
तथा ज्ञानियोंकी माता हैं ॥ ४६॥
बही सिद्धा, सिद्धिदात्री एवं
रूपसे सदा प्रादुर्भूत होती हैं। शिवजी सतीकी असि
तथा उनकी चिताकी भस्म उनके प्रेमके कारण प
धारण करते हैं ॥ ४७ ॥
इसलिये आप अपनी इच्छासे इस कल्याणी ७,
शंकरके निमित्त प्रदान कीजिये, अन्यथा आप नहीं
तो भी वह स्वयं अपने पतिके पास चली जायगी॥ ४८"
वे देवेश प्रतिज्ञा करके और यह देख
आपकी कन्याने असंख्य कलेश प्राप्त किये, i
ब्रा्मणका रूप धारणकर उसके तपःस्थानपर १ रा
और उसे आश्वस्त करके वर देकर अपने स्था.
लौट आये। हे पर्वत! उसके प्रार्थना करनेपर
शिवजी आपसे शिवाको माँग रहे हैं॥ ४९-५०
आ० ३३]
अङ्गीकृतं युवाभ्यां तच्छिवभक्तिरतात्मना।
विपरीतमतिर्जाता वद् कस्माद्रीशवर॥ ५१
तद्वत्वा प्रभुणा देवप्रार्थितेन त्वदन्तिकम्।
प्रस्थापिता वयं शीघ्रं ऋषयः साप्यरुन्धती॥ ५२
शिक्षयामो वयं त्वां हि देहि रुद्राय पार्वतीम्।
एवंकृते महानन्दो भविष्यति गिरे तव॥ ५३
शिवां शिवाय शैलेन्द्र स्वेच्छया चेन्न दास्यसि।
भविता तद्विवाहोऽत्र भवितव्यबलेन हि॥ ५४
बरं ददौ शिवायै स तपन्त्यै तात शंकरः।
न हीशवरप्रतिज्ञातं विपरीताय कल्पते॥ ५५
अहो प्रतिज्ञा दुर्लङ्घ्या साधूनामीशवर्तिनाम्।
सर्वेषां जगतां मध्ये किमीशस्य पुनर्गिरे॥ ५६
एको महेन्द्रः शैलानां पक्षांश्चिच्छेद लीलया।
पार्वती लीलया मेरोः शृङ्गभङ्गं चकार च॥ ५७
एकार्थे नहि शैलेश नश्याः सर्वा हि सम्पदः।
एकं त्यजेत्कुलस्यार्थे श्रुतिरेषा सनातनी॥ ५८
दत्वा विप्राय स्वसुतामनरण्यो नुपेश्वरः।
ब्रह्मणाद्भयमापन्नो ररक्ष निजसम्पदम्॥ ५९
तमाशु बोधयामासुर्नीतिशास्त्रविदो जनाः।
गुरवो ज्ञातिसत्तमाः॥ ६०
शैलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च।
सर्वान् बंधुवर्गान् वशं कुरु सुरानपि॥ ६१
ब्रह्मोवाच
रैयाकर्ण्य वसिष्ठस्य वचनं स प्रहस्य च।
नृपवार्ताञ्ञ हृदयेन विदूयता॥ ६२
रद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
>> ताल." रख: ३७
उस समय आप दोनोंने शिवभक्तिमें निरत रहनेके
कारण उन्हें पार्वतीको देना स्वीकार भी कर लिया,
किंतु हे गिरीश्वर! अब आप दोनोंकी ऐसी विपरीत
बुद्धि क्यों हो गयी, इसे बताइये | जब सदाशिव पार्वतीकी
प्रार्थनाहेतु तुम्हारे पास आये थे और तुमने उसे अस्वीकार
कर दिया, तब यहाँसे लौटकर उन्होंने हम ऋषियोंको
तथा अरुन्धतीको शीघ्र ही भेजा है॥ ५१-५२॥
इसलिये हमलोग आपको उपदेश देते हैं कि आप
इस पार्वतीको शीघ्रतासे रुद्रको प्रदान कीजिये | हे शैल!
ऐसा करनेसे आपको महान् आनन्दकी प्राप्ति होगी ॥ ५३॥
हे शैलेन्द्र! यदि आप इस शिवाको शिवके लिये
अपनी इच्छासे नहीं देंगे, तो भी भवितव्यताके बलसे
यह विवाह अवश्य ही होगा॥ ५४॥
है तात! इन शंकरने तप करती हुई इस
शिवाको वरदान दिया है, ईश्वरकी प्रतिज्ञा कभी
निष्फल नहीं होती ॥ ५५॥
जब ईश्वरके उपासक महात्माओंकी प्रतिज्ञा
कभी विफल नहीं होती, तो फिर सारे संसारके
अधिपति इन ईश्वरकी प्रतिज्ञाकी बात ही क्या !॥ ५६॥
जब अकेले महेन्द्रने लीलासे ही पर्वतोंके पंख
काट डाले और पार्वतीने अकेले ही मेरुका शिखर
ढहा दिया, तो उन सर्वेश्वरकी प्रतिज्ञा कैसे निष्फल
हो सकती है ?॥ ५७॥
हे शैलेन्द्र ! एकके कारण सारी सम्पत्तिका नाश
नहीं करना चाहिये, यह सनातनी श्रुति है कि कुलकी
रक्षाके लिये एकका त्याग कर देना चाहिये ॥ ५८॥
[हे शैलेश्वर !] [पूर्व कालमें] अनरण्य नामक
राजेशवरने अपनी कन्या ब्राह्मणको देकर उसके
शापके भयसे अपनी सम्मत्तिकी रक्षा की थी॥५९॥
ब्राह्मणके शापसे भयभीत हुए उस राजाको
नीतिशास्त्रके ज्ञाता गुरुजनोंने एवं श्रेष्ठ बन्धुओंने समझाया
था। हे शैलराज! इसी प्रकार आप भी अपनी इस कन्याको
शिवके निमित्त देकर समस्त बन्धुवर्गाकी रक्षा कीजिये
तथा देवताओंको अपने वशमें कीजिये ॥ ६०-६१॥
ब्रह्माजी बोले-वसिष्ठके इस वचनको सुनकर
कुछ हँस करके व्यथित हदयसे उन्होने राजा अनरण्यका
वृत्तान्त पूछा॥ ६२॥
६३८
श्रीशिवमहापुराण
[अ० प स्स्स य्य ९ ९७२ `
हिमालय उवाच
कस्य वंशोद्धवो ब्रह्मन् अनरण्यो नृपश्च सः।
सुतां दत्त्वा स च कथं ररक्षाखिलसम्पद: ॥ ६३
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा बसिष्ठस्तु शैलवाक्यं प्रसन्नधीः।
हिमालय बोले-हे ब्रह्मन्! बह अन
राजा किसके वंशमें उत्पन्न हुआ था और न
अपनी कन्याको देकर किस प्रकार सम्पूर्ण समति
रक्षा की थी ?॥ ६३॥
ब्रह्माजी बोले--हिमालयके इस प्रकारके कक्ष
सुनकर वसिष्ठजी प्रसन्नचित्त होकर राजा अनरण्यक
प्रोवाच गिरये तस्मै नृपवात्तां सुखावहाम्॥ ६४ | सुखदायक वृत्तान्त उनसे कहने लगे--॥६४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वगीखण्डे गिरिसांत्वनो नाम तरयस्त्रिंशो5 ध्याव: ॥ ३३)
॥ इस प्रकार श्रीशिवप्रहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डपें
गिरिसात्चन नामक तँतीसवाँ अध्याव पूर्ण हुआ॥ ३३ ॥
— ०० +प
अथ चतुस्त्रिशो5ध्याय:
सप्तर्षियोंद्वारा हिमालयको राजा अनरण्यका आख्यान सुनाकर
पार्वतीका विवाह शिवसे करनेकी प्रेरणा देना
वसिष्ठ उवाच
मनोर्वशोद्भवो राजा सोऽनरण्यो नुपेशवरः।
इन्द्रसावर्णिसंज्ञस्य चतुर्दशमितस्य हि॥ १
अनरण्यो नुपश्रेष्ठः सप्तद्रीपमहीपतिः।
शम्भुभक्तो विशेषेण मङ्गलारण्यजो बली॥ २
भृगुं पुरोधसं कृत्वा शतं यज्ञांश्चकार सः।
न स्वीचकार शक्रत्वं दीयमानं सुरैरपि॥ ३
बभूवुः शतपुत्राश्च राज्ञस्तस्य हिमालय।
कन्यैका सुन्दरी नाम्ना पद्मा पद्मालया समा॥ ४
'य: स्नेहः पुत्रशतके कन्यायाञ्च ततोऽधिकः ।
नृपस्य तस्य तस्यां हि बभूव नगसत्तम॥ ५
प्राणाधिका प्रियतमा महिष्यः सर्वयोषित: ।
नृपस्य पल्यः पञ्चासन्सर्वाः सोभाग्यसंयुताः॥ ६
सा कन्या यौवनस्था च बभूव स्वपितुगृहि।
पत्रं प्रस्थापयामास सुवरानयनाय सः॥ ७
वसिष्ठजी बोले [हे गिरिश्रेष्ठ !] इन्द्रसावर्णि
नामक चौदहवें मनुके वंशमें बह अनरण्य नामक राजा
उत्पन्न हुआ था॥ १॥
वह राजराजेश्वर तथा सातों द्वीपोंका सप्रार
था। वह मंगलारण्यका पुत्र अनरण्य महाबलवान् एवं
बिशेषरूपसे शिवजीका भक्त था। उसने महर्षि भगुको
अपना पुरोहित बनाकर एक सौ यज्ञ किये और
देवताओंके द्वारा इद्धपद दिये जानेपर भी उसने उमे
स्वीकार नहीँ किया॥ २-३॥
हे हिमालय! उस राजाके सौ पुत्र उत्पत ह
थे और लक्ष्मीसदृश सुन्दर एक पद्मा नामकी करी
उत्पन्न हुई ॥ ४॥
हे नगश्रेष्ठ! उस राजाका जो प्रेम अपने स
पुत्रोके प्रति था, उससे भी अधिक उस क्याप हैं
करता था॥५॥
उस अनरण्य राजाकी सर्वसौभागयशातिग
पाँच रानियाँ थीं, जो राजाको प्राणोंसे भी अधि
प्रिय थीं॥ ६॥
जिस समय वह कन्या पिताके घरमें र
प्राप्त हुई, तब राजाने उसके लिये उत्तम वीं |
करनेहेतु [अपने दूतोंसे] पत्र भेजा॥७॥
अ० ३४]
पिप्पलादर्षिर्गन्तु स्वाश्रममुत्सुकः।
तपःस्थाने निर्जने च गन्धर्वं स ददर्श ह॥ ८
स्त्रीयुत॑ मग्नचित्तं च शृङ्गारे रससागरे।
विहरन्तं महाप्रेम्णा कामशास्त्रविशारदम्॥ ९
दृष्ट्वा तं मुनिशार्दूलः सकामः संबभूव सः।
तपःस्वदत्तचित्तश्चाचिंतयद्दारसङ्ग्रहम् ॥१०
एवंवृत्तस्य तस्यैव पिप्पलादस्य सन्मुनेः।
कियत्कालो गतस्तत्र कामोन्मधितचेतसः॥ ११
एकदा पुष्पभद्रायां स्नातुं गच्छन्मुनीश्वरः।
ददर्श पद्यां युवतीं पद्मामिव मनोरमाम्॥ १२
केयं कन्येति पप्रच्छ समीपस्थाञ्जनान्मुनिः।
जना निवेदयाञ्जकरुर्नत्वा शापनियन्त्रिताः॥ १३
जना ऊचुः
अनरण्यसुतेयं वै पद्मा नाम रमापरा।
वरारोहा प्रार्थ्यमाना नृपश्रेष्ठेगुणालया ॥ १४
ब्रह्मोवाच
hE मुनिर्वाक्यं जनानां तथ्यवादिनाम्।
मनसि तल्लिप्सुरभवच्च सः॥ १५
मनिः स्नात्वाभीष्टदेवं सम्पूज्य विधिवच्छिवम्।
जगाम कामी भिक्षार्थमनरण्यसभां गिरे॥ १६
रजा शीध्रं मुनिं दृष्ट्वा प्रणनाम भयाकुलः।
मधुपकांदिकं दत्त्वा पूजयामास भक्तितः ॥ १७
कामातसर्व गृहीत्वा च ययाचे कन्यकां मुनिः।
सो बभूव नृपतिः किञ्चिनिर्वक्तुमक्षमः॥ १८
नि्वयाचे कन्यां स तां देहीति नृपेश्वर।
अन्यथा भस्मसात्सर्व करिष्यामि क्षणेन च॥ १९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
क -> + ...000000403, ३९
एक समय ऋषि पिप्पलाद जब अपने आश्रम
जानेके लिये तत्पर थे, तभी तपस्याके योग्य एक
निर्जन स्थानमें उन्होंने कामकलामें निपुण तथा स्त्रीके
साथ शरृंगाररसके सागरमें निमग्न हो बड़े प्रेमसे विहार
करते हुए एक गन्धर्वको देखा॥ ८-९॥
वे मुनिश्रेष्ठ उसे देखकर कामके वशीभूत हो
गये और तपसे चित्त हटाकर दारसंग्रहकी चित्तामें
पड़ गये॥ १०॥
इस प्रकार कामसे व्याकुलचित्त हुए उन श्रेष्ठ
मुनि पिप्पलादका कुछ समय बीत गया॥ ११॥
एक समय जब वे मुनिश्रेष्ठ पुष्पभद्रा नदीमें
स्नान करनेके लिये जा रहे थे, तब उन्होंने लक्ष्मीके
समान मनोरम युवती पद्माकों देखा॥ १२॥
उसके बाद मुनिने आस-पासके लोगोंसे पूछा
कि यह किसकी कन्या है, तब शापके भयसे व्याकुल
उन लोगोंने नमस्कार करके बताया॥ १३॥
लोग बोले--यह [राजा] अनरण्यकी पद्मा
नामक कन्या है, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान
है, श्रेष्ठ राजागण गुणोंकी निधिस्वरूपा इस सुन्दरीको
पानेकी इच्छा कर रहे हैं॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार वे मुनि उन
सत्यवादी मनुष्योंकी बात सुनकर अत्यन्त व्याकुल
हो उठे और मनमें उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने
लगे॥ १५॥
हे गिरे! उसके बाद मुनि स्नानकर विधिपूर्वक
अपने इष्टदेव शंकरका विधिवत् पूजन करके
कामके वशीभूत हो भिक्षाके लिये अनरण्यकी सभामें
गये॥ १६॥
राजाने मुनिकों देखते ही भयभीत होकर
प्रणाम किया और मधुपर्कादि देकर भक्तिपूर्वक उनकी
पूजा की॥ १७॥
पूजा-ग्रहण करनेके अनन्तर मुनिने कन्याकी
याचना की, तब राजा [इस बातको सुनकर] अवाक्
हो गया और कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हुआ॥ १८॥
उन मुनिने कन्याको माँगा और कहा-हे
नृपेश्वर! तुम अपनी कन्या हमें दे दो, अन्यथा मैं
क्षणभरमें सब कुछ भस्म कर दूँगा॥ १९॥
६४०
श्रीशिवमहापुराण
IE डळ ककी. ` `
सर्वे बभूवुराच्छन्ना गणास्तत्तेजसा मुने।
रुदोद राजा सगणो दृष्ट्वा विप्रं जरातुरम्॥ २०
महिष्यो रुरुदुस्सर्वा इतिकर्तव्यताक्षमाः।
मूर्च्छामाप महाराज्ञी कन्यामाता शुचाकुला॥ २१
'बभूवुस्तनयाः सर्वे शोकाकुलितमानसाः।
सर्व शोकाकुलं जातं जृपसम्बन्थि शेलप॥ २२
एतस्मिन्नन्तरे प्राज्ञो द्विजो गुरुरनुत्तमः।
पुरोहितश्च मतिमान् आगतो नृपसन्निधिम्॥ २३
राजा प्रणम्य सम्पूज्य रूदोद च तयोः पुरः।
सर्व निवेदयाञ्चक्रे पप्रच्छोचितमाशु तत्॥ २४
अथ राज्ञो गुरुर्विप्र: पण्डितश्च पुरोहितः।
अपि द्वौ शास्त्रनीतिज्ञौ बोधयामासतुर्नृपम्॥ २५
शोकाकुलांश्च महिषीर्नृपबालांश्च कन्यकाम्।
उत्तमां नीतिमादूत्य सर्वेषां हितकारिणीम्॥ २६
गुरुषुरोधसावूचतुः
श्रृणु राजन्महाप्राज्ञ वचो नौ सद्धितावहम्।
मा शुचः सपरीवारः शास्त्रे कुरु मतिं सतीम्॥ २७
अद्य वाब्ददिनान्ते वा दातव्या कन्यका नृप।
पात्राय विप्रायान्यस्मै कस्मेचिद्वा विशेषत: ॥ २८
सत्पात्रं ब्राह्मणादन्यं न पश्यावो जगत्रये।
सुतां दत्त्वा च मुनये रक्ष स्वां सर्वसम्पदम्॥ २९
राजन्नेकनिमित्तेन सर्वसंपद्विनश्यति।
सर्व रक्षति तं त्यक्त्वा विना तं शरणागतम्॥ ३०
वसिष्ट उवाच
राजा प्राज्ञवच: श्रुत्वा विलप्य च मुहुर्मुहु: ।
कन्यां सालंकृतां कृत्वा मुनीन्द्राय ददौ किल॥ ३१
[उस समय] हे मुने! मुनिके तेजसे (राज
सब सेवक हक्के-बवके हो गये और बृद्धावस्थासे जी
उस विप्रको देखकर परिकरोंसहित राजा रोने लगे॥ ल
सभी रानियोंको भी कुछ सूझ नहीं रहा था, बे र
लगीं | कन्याकी माता महारानी शोकसे व्यथित होक
मूच्छित हो गयीं, राजाके सभी पुत्र भी शोकसे आकुत्त
चित्तवाले हो गये । है शैलपति ! इस प्रकार राजाके सभ
सगे-सम्बन्धी शोकसे व्याकुल हो गये | २१-२२॥
इसी समय महापण्डित, बुद्धिमान् तथा सर्वोत्तम ग्र
एवं पुरोहित ब्राह्मण--दोनों राजाके समीप आये॥ २३।
राजाने प्रणामकर उनका पूजन करके उ
दोनोंके आगे रुदन किया और अपना सारा वृत्तान
निवेदन किया एवं पूछा कि [इस समय] जो उचित
हो, उसको जल्दीसे बताइये ॥ २४॥
तब राजाके नीतिशास्त्रज्ञ पण्डित गुरु तथा ब्राह्मण
पुरोहित दोनोंने राजाको तथा शोकसे व्याकुल रानिये,
राजपुत्रों तथा उस कन्याको सभीके हितकारक तथा
नीतियुक्त वाक्योंसे आदरपूर्वक समझाया॥ २५-२६॥
गुरु तथा पुरोहित बोले-हे राजन्! हे
महाप्राज्ञ! आप हमारी हितकारी बात सुनिये, आ
परिवारके सहित शोक मत कीजिये और शास्त्र
अपनी बुद्धि लगाइये ॥ २७॥
हे राजन्! आज ही अथवा एक वर्षके बाद आपकी
अपनी कन्या किसी-न-किसी पात्रको देनी ही है, १
पात्र चाहे ब्राह्मण हो अथवा अन्य कोई हो॥ २८!
किंतु हम इस ब्राह्मणसे बढ़कर सुन्दर पात्र है
त्रिलोकीमें अन्यको नहीं देख रहे हैं, अतः आप अ
कन्या इन मुनिको देकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिकी स
कोजिये॥ २९॥
हे राजन्। [यदि ऐसा नहीं करेंगे तो] एके
कारण तुम्हारी सारी सम्पत्ति नष्ट हो जायगी | उस एक
'त्याकर सबकी रक्षा करो | शरणागतका त्याग ह
चाहिये, चाहे उसके लिये सब कुछ नष्ट हो जाय॥ क
वसिष्ठजी बोले--राजाने उन
दिला
अलं
बुद्धिमानोंकी बात सुनकर बार-बार
उस कन्याको [वस्त्र तथा आभूषणसे]
मुनीन्रको दे दिया॥ ३१॥
अ० ३५]
क्रान्तां गृहीत्वा स मुनिर्विवाह्य विधिवदिरे।
पद्मां पद्मोपमां तां वै मुदितः स्वालयं ययौ॥ ३२
राजा सर्वान्परित्यज्य दत्त्वा वृद्धाय चात्मजाम्।
उललानिं चित्ते समाधाय जगाम तपसे वनम्॥ ३३
तद्धार्यापि वनं याते प्राणनाथे तदा गिरे।
रतश्च दुहितुः शोकात्प्रणांस्तत्याज सुन्दरी ॥ ३४
पूज्या: पुत्राश्च भृत्याश्च मूर्च्छामापुर्नृपं विना।
शुशुचुः श्वाससंयुक्ता ज्ञात्वा सर्वेऽपरे जना:॥ ३५
अनरण्यो वनं गत्वा तपस्तप्त्वाति शंकरम्।
समाराध्य ययौ भक्त्या शिवलोकमनामयम्॥ ३६
नृपस्य कीर्तिमान्नाम्ना ज्येष्ठपुत्रोऽथ धार्मिकः।
पुत्रवत्पालयामास प्रजा राज्यं चकार ह॥ ३७
इति ते कथितं शैलानरण्यचरितं शुभम्।
कऱ्यां दत्त्वा यथारक्षद्वंशं चाप्यखिलं धनम्॥ ३८
शैलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च।
रक्ष सर्वकुलं सर्वान् वशान् कुरु सुरानपि॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६४१
हे गिरे! इस प्रकार उस कन्यासे विधानपूर्वक
विवाहकर महर्षि पिप्पलाद महालक्ष्मीके समान उस
पञ्माको लेकर प्रसन्नतासे युक्त अपने घर चले गये ॥ ३२॥
इधर, राजा उस वृद्धको अपनी कन्या प्रदान
करके सभी लोगोंको छोड़कर मनमें ग्लानि रखकर
तपस्याके लिये वनमें चले गये॥ ३३॥
हे गिरे! अपने प्राणनाथके वन चले जानेपर
उनकी भार्याने भी पति तथा कन्याके शोकसे प्राण
त्याग दिये ॥ ३४॥
राजाके पूज्य लोग, पुत्र, सेवक राजाके बिना मूच्छित
हो गये तथा अन्य सभी पुरवासी एवं दूसरे लोग यह
सब जानकर उच्छास लेकर शोक करने लगे ॥ ३५॥
[राजा] अनरण्य वनमें जाकर कठोर तप करके
भक्तिपूर्वक शंकरकी आराधनाकर शाश्वत शिवलोकको
चला गया। तदनन्तर राजाका कीर्तिमान् नामक
धार्मिक ज्येष्ठ पुत्र राज्य करने लगा और पुत्रके समान
प्रजाका पालन करने लगा॥ ३६-३७॥
हे शैल। मैंने अनरण्यका यह शुभ चरित्र आपसे
कहा, जिस प्रकार अपनी कन्या प्रदानकर उन्होंने
अपने वंशकी तथा सम्पूर्ण धनकी रक्षा की॥ ३८॥
इसी प्रकार हे शैलराज! आप भी अपनी कन्या
शंकरजीको देकर अपने समस्त कुलको रक्षा कीजिये
और सभी देवताओंको भी वशमें कीजिये॥ ३९॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां सदरसंहितावां तृतीये यार्वतीखण्डेऽनरण्यचरितवर्णतं
नाम चतुस्त्रंशोऽ ध्यायः ॥ ३४॥ Tw
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
अनरण्यचरितवर्णन नामक चाँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
धर्मराजद्वारा मुनि पिप्पलादकी भार्या सती पद्माके पातिब्रत्यकी परीक्षा, पद्याद्वारा धर्मराजको
शाप प्रदान करना तथा पुनः चारों युगोंमें शापको
धर्मराजद्वारा पद्माको अनेक वर प्रदान करता
दृष्टान्तद्वारा अपनी पुत्री
नारद उवाच
अनरण्यस्य चरितं सुतादानसमन्वितम्।
वैखा गिरिवरस्तात किं चकार च तद्वद
223 Shivmahapuranam. Part ISection-22-l-Front
गापकी व्यवस्था करना, पातिव्रत्यसे प्रसन्न हो
, महर्षि बसिष्ठद्वारा हिमवानसे पद्माके
शिवको सौंपनेके लिये कहना
नारदजी बोले--हे तात! अनरण्यके कन्यादान-
सम्बन्धी चरित्रको सुनकर गिरिश्रेष्ठने क्या किया,
९ | उसे कहिये॥ १॥
श्रीशिवमहापुराण
६४२
[ = =` ` _ ऽयक ` न
ब्रह्मोवाच
अनरण्यस्य चरितं कन्यादानसमन्वितम्।
श्रुत्वा पप्रच्छ शैलेशो वसिष्ठं साञ्जलिः पुनः॥
शैलेश उवाच
वसिष्ठ मुनिशार्दूल ब्रह्मपुत्र कृपानिधे।
अनरण्यचरित्रं ते कथितं परमाद्भृतम्॥ ३
अनरण्यसुता यस्मात् पिप्पलादं मुनिं पतिम्।
सम्प्राप्य किमकाषीत्सा तच्चरित्रं मुदाबहम्॥ ४
वसिष्ठ उवाच
पिप्पलादो मुनिवरो वयसा जर्जरोऽधिकः।
गत्वा निजाश्रमं नार्यानरण्यसुतया तया॥ ५
उवास तत्र सुप्रीत्या तपस्वी नातिलम्पटः।
तत्रारण्ये गिरिवरे स नित्यं निजधर्मकृत्॥ ६
अथानरण्यकन्या सा सिषेवे भक्तितो मुनिम्।
कर्मणा मनसा वाचा लक्ष्मीर्नारायणं यथा॥ ७
एकदा स्वर्णदी स्नातुं गच्छती सुस्मितां च ताम्।
ददर्श पथि धर्मश्च मायया जृपरूपधृक्् ॥ ८
चारुरलरथस्थश्च नानालङ्कारभूषितः।
नवीनयौवनए ः ॥ ९
दष्ट्वा तां सुन्दरीं पद्मामुवाच स वृषो विभुः।
विज्ञातुं भावमन्तःस्थं तस्याश्च मुनियोषितः ॥ १०
धर्म उवाच
अयि सुन्दरि लक्ष्मीचे राजयोग्ये मनोहरे।
अतीव योवनस्थे च कामिनि स्थिरयोबने॥ १९
जरातुरस्य वृद्धस्य पिप्पलादस्य वै मुनेः।
सत्यं वदामि तन्वङ्गि समीपे नैव राजसे॥ १२
विप्रं तपस्सु निरतं निर्घृणं मरणोन्मुखम्।
त्यक्त्वा मां पश्य राजेन्द्रं रतिशूरं स्मरातुरम्॥ १३
प्राष्नोति सुन्दरी पुण्यात्सोन्दर्य पूर्वजन्मन:।
सफलं तद्भवेत्सर्वं रसिकालिङ्गनेन च॥ ९४
ब्रह्माजी बोले--हे तात! अनरण्यका
सम्बन्धी चरित्र सुनकर गिरिराजने रष केणे
वसिष्ठजीसे पुन: पूछा--॥ २॥
शैलेश बोले--हे वसिष्ठ! हे मुनिशारून!;
ब्रह्मपुत्र! हे कृपानिधे ! आपने अनरण्यका परम अ
चरित्र कहा॥ ३॥
तदनन्तर अनरण्यकी कन्याने पिप्पलाद मे
पतिरूपमे प्राप्त करनेके अनन्तर कया किया ळ्
सुखदायक चरित्र आप कहिये ॥ ४।
वसिष्ठजी बोले-अवस्थासे जर्जर मुन
पिप्पलाद अनरण्यकी उस कन्याके साथ अपने अङ्ग
जाकर बड़े प्रेमसे निवास करने लगे । हे गिरिराज!
वहाँ वनमें श्रेष्ठ पर्वतपर इन्द्रयोंको बशमें के
तपस्यापरायण हो नित्य अपने धर्मका पालन कसे
लगे॥ ५-६॥
वह अनरण्यकन्या भी मन, वचन तथा कमी
भक्तिपूर्वक मुनिकी सेवा करने लगी, जिस प्रका
लक्ष्मी जारायणकी सेवा करती है। किसी समय ज
वह सुस्मित-भाषिणी गंगास्नान करने जा रही थी, क
मायासे मनुष्यरूप धारण किये धर्मराजने उसे रं
देखा॥ ७-८॥ ह|
वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे भूषित, मनोहर एल
जटित रथपर विराजमान थे । वे नवयौवनसे समत ए
कामदेवके समान अत्यन्त कमनीय थे। प्रभु धर्म श॑
सुन्दरी पद्माको देखकर उस मुनिपत्नीके अन्तःकरण
भाव जाननेके लिये उससे कहने लगे-॥ ९११
धर्म बोले- हे सुन्दरि! हे राजयोग्ये! हे मगो
हे नवीन यौवनवाली ! हे कामिनि! हे नित्य युवावर
रहनेवालौ ! तुम तो साक्षात् लक्ष्मी हो॥ ११॥
हे तन्वंगि! मैं सत्य कहता हूँ कि तुम जर हा
पिणलाद मुनिके समीप शोभित नहीं हो रही ही।
तुम तपस्यामें लगे हुए, क्रोधी तथा 2.
ब्राह्मणको त्यागकर मुझ राजेन्द्र,
एवं कामातुरकी ओर देखो॥ १३॥ गये पुर
सुन्दरी स्त्री अपने पूर्वजन्ममें किये किंतु कह
प्रभावसे ही सौन्दर्यको प्राप्त करती है। किं १ हा
किसी रसिकके आलिंगनसे ही सफल होता है।
रः
अ० ३५]
|
किंकरं कुरु मां कान्ते सम्परित्यज्य तं पतिम्॥ १५
निर्जने कानने रम्ये शेले शैले नदीतटे।
विहरस्व मया सार्ध जन्मेदं सफलं कुरु॥ १६
वसिष्ठ उवाच
इत्येवमुक्तवन्तं सा स्वरथादवरुह्य च।
ृहीतुमुत्सुकं हस्ते तमुवाच पतित्रता॥ १७
पद्योवाच
गच्छ दूरं गच्छ दूरं पापिष्ठस्त्व॑ नराधिप।
मां चेत्पश्यसि कामेन सद्यो नष्टो भविष्यसि॥ १८
पिप्पलादं मुनिश्रेष्ठं तपसा पूतविग्रहम्।
त्यक्त्वा कथं भजेयं त्वा स्त्रीजितं रतिलम्पटम्॥ १९
सतरीजितस्पर्शमात्रेण सर्व पुण्यं प्रणश्यति।
स्त्रीजितः परपापी च तद्दर्शनमघावहम्॥ २०
सत्क्रियो हाशुचिर्नित्यं स पुमान् यः स्त्रिया जित: ।
निन्दन्ति पितरो देवा मानवा: सकलाश्च तम्॥ २१
तस्य किं ज्ञानसुतपोजपहोमप्रपूजनैः।
विद्यया दानतः किं वा स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ २२
मातरं मां स्त्रियो भावं कृत्वा येन ब्रवीषि ह।
भविष्यति क्षयस्तेन कालेन मम शापतः॥ २३
वसिष्ट उवाच
श्रुत्वा धर्मः सतीशापं जृपमूर्ति विहाय च।
धृत्वा स्वमूर्तिं देवेशः कम्पमान उवाच सः॥
धर्म उवाच
मातर्जानीहि मां धर्म ज्ञानिनां च गुरोगुरुम्।
पससत्रीमातृबुद्धि च कुर्वन्तं सततं सति॥ २५
अहं तवान्तरं ज्ञातुमागतस्तव सन्निधिम्
प्रवाहं च मनो जाने तथापि विधिनोदितः॥ २६
कृतं मे दमनं साध्वि न विरुद्धं यथोचितम्।
शास्तिः समुत्पथस्थानामीश्वरेण विनिर्मिता॥ २७
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रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६४३
हे कान्ते! तुम इस जरा-जर्जर पतिको छोड़कर
हजारों स्त्रयोंके कान्त तथा कामशास्त्रके विशारद
मुझे अपना किंकर बनाओ और निर्जन मनोहर वनमें,
पर्वतपर तथा नदीके तटपर मेरे साथ विहार करो तथा
इस जन्मको सफल करो॥ १५-१६॥
वसिष्ठजी बोले-इस प्रकार कहकर वे ज्यों
ही रथसे उतरकर उसका हाथ पकड़ना ही चाहते थे
कि वह पतिव्रता कहने लगी ॥ १७॥
पद्या बोली--हे राजन्! तुम तो बड़े पापी हो, दूर
हट जाओ, दूर हट जाओ, यदि तुमने मुझे और सकाम
भावसे देखा, तो शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ १८॥
मैं तपस्यासे पवित्र शरीरवाले उन मुनिश्रेष्ठ
पिप्पलादको छोड़कर परस्त्रीगामी एवं स्त्रीके वशमें
रहनेवाले तुमको कैसे स्वीकार कर सकती हूँ ?॥ १९॥
स्त्रीके वशमें रहनेवालेके स्पर्शमात्रसे सारा पुण्य
नष्ट हो जाता हैं। जो स्त्रीजित तथा दूसरेकी हत्या
करनेवाला पापी है, उसका दर्शन भी पाप उत्पन्न करनेवाला
होता है। जो पुरुष स्त्रीके वशमें रहनेवाला है, वह
सत्कर्ममें लगे रहनेपर भी सदा अपवित्र है । पितर, देवता
तथा सभी मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं॥ २०-२१॥
जिसका मन स्त्रयोंके द्वारा हर लिया गया है,
उसके ज्ञान, उत्तम तप, जप, होम, पूजन, विद्या तथा
दानसे क्या लाभ है ! तुमने माताके समान मुझमें स्त्रीकी
भावनासे जो इस प्रकारकी बात कही है, इसलिये समय
आनेपर मेरे शापसे तुम्हारा नाश हो जायगा॥ २२-२३॥
बसिष्ठजी बोले-सतीके शापको सुनकर वे
देवेश धर्मराज राजाका रूप त्यागकर अपना स्वरूप
धारणकर काँपते हुए कहने लगे--॥ २४॥
धर्म बोले-हे मातः! हे सति! आप मुझे
्ञानियोंके गुरुओंका भी गुरु तथा परायी स्त्रीमें सर्वदा
मातृबुद्धि रखनेवाला समझें॥ २५॥
मैं आपके मनोभावकी परीक्षा लेनेके लिये आपके
पास आया था और आपका अभिप्राय जान लिया, किंतु
हे साध्वि! विधिसे प्रेरित होकर आपने [शाप देकर]
मेरा गर्व नष्ट किया। यह तो आपने उचित ही किया,
कोई विरुद्ध कार्य नहीं किया। इस प्रकारका शासन
उन्मार्गगामियोंके लिये ईश्वरद्वारा निर्मित है ॥ २६-२७॥
६४४
श्रीशिवमहापुराण
[अ ० आ आ RS, ५
स्वयं प्रदाता सर्वेभ्यः सुखदुःखवरान्क्षमः।
सम्पदं विपदं यो हि नमस्तस्मै शिवाय हि॥ २८
शत्रुं मित्रं संविधातुं प्रीतिं च कलहं क्षमः।
स्रष्टुं ष्टुं च यस्सृष्टिं नमस्तस्मै शिवाय हि॥ २९
येन शुक्लीकृतं क्षीरं जले शीत्यं कृतं पुरा।
दाहीकृतो हुताशश्च नमस्तस्मै शिवाय हि॥ ३०
प्रकृतिर्निर्मिता येन तत्त्वानि महदादितः।
ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या नमस्तस्मे शिवाय हि॥ ३१
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा पुरतस्तस्यास्तस्थौ धमों जगद्गुरुः ।
किञ्चिन्नोवाच चकितस्तत्पातिब्रत्यतोषितः॥ ३२
पद्मापि नृपकन्या सा पिप्पलादप्रिया तदा।
साध्वी तं धर्ममाज्ञाय विस्मितोवाच पर्वत॥ ३३
पद्मोवाच
त्वमेव धर्म सर्वेषां साक्षी निखिलकर्मणाम्।
कथं मनो मे विज्ञातुं विडम्बयसि मां विभो॥ ३४
यत्तत्सर्वं कृतं ब्रह्मन् नापराधो बभूव मे।
त्वं च शमो मयाज्ञानात्स्त्रीस्वभावाद वृथा वृष ॥ ३५
का व्यवस्था भवत्तस्य चिन्तयामीति साम्प्रतम्।
चित्ते स्फुरतु सा बुद्धिर्यया शं संल्लभामि वै॥ ३६
आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्तु वायवः।
तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन॥ ३७
सत्ये पूर्णश्चतुष्पादः पौर्णमास्यां यथा शशी ।
विराजसे देवराज सर्वकालं दिवानिशम्॥ ३८
त्वं च नष्टो भवसि चेत्सृष्टिनाशो भवेत्तदा।
इतिकर्तव्यतामूडा वृथापि च वदाम्यहम्॥ ३९
पादक्षयश्च भविता त्रेतायां च सुरोत्तम।
पादोऽपरे द्वापरे च तृतीयोऽपि कलौ विभो॥ ४०
'कलिशेषेऽखिलाश्छिन्ना भविष्यन्ति तवाङ््नयः।
पुनः सत्ये समायाते परिपूर्णो भविष्यसि॥ ४१
जो स्वयं सबको महान् सुख-दु:ख देनेबाले :
और सम्पत्ति तथा विपत्ति देनेमें समर्थ हैं, उन शिक
प्रति नमस्कार है । जो शत्रु, मित्र, प्रीति तथा
विधान करनेमें और सृष्टिका a संहार कशे
समर्थ हैं, उन शिवको नमस्कार है॥ २८-२९ ।
जिन्होंने पूर्वकालमें दूधको शुक्लवर्णका बरा
जलमें शैत्य उत्पन्न किया और अग्निको
प्रदान की, उन शिवको नमस्कार है । जिन्होंने
महत् आदि तत्त्वोंका एवं ब्रह्मा, विष्णु-महेश आदिक
निर्माण किया है, उन शिवको नमस्कार है॥ ३ ०३१)
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर
धर्मराज उस पतिव्रताके आगे खडे हो गये । वे उसके
पातित्रत्यसे सन्तुष्ट होकर आश्चर्यसे चकित रह गये औ
कुछ भी नहीं बोल सके। हे पर्वत! तब अनरण्यक
कन्या तथा पिप्पलादकी पत्नी वह साध्वी पद्मा उन्हें धर्म
जानकर चकित होकर कहने लगी-- ॥ ३२-३३॥
पद्या बोली--हे धर्म! आप ही सबके समस
कर्मोके साक्षी हैं, हे विभो! आपने मेरे मनका भाव
जाननेके लिये कपटरूप क्यों धारण किया ?॥ ३४।
हे ब्रह्मन्! यह जो कुछ मैंने किया, उसमें म
अपराध नहीं है। हे धर्म! मैंने अज्ञानसे स्त्रीस्वभाव
कारण आपको व्यर्थ ही शाप दे दिया॥ ३५॥
मैं इस समय यही सोच रही हूँ कि उस
क्या व्यवस्था होनी चाहिये, मेरे चित्तमें अब वह बुं
स्फुरित हो, जिससे मैं शान्ति प्राप्त करूँ॥ ३६॥
यह आकाश, सभी दिशाएँ तथा वायु भले ह
नष्ट हो जागे, किंतु पतिब्रताका शाप कभी 7
नहीं होता॥ ३७॥ |
हे देवराज! आप सत्ययुगमें अपने चारे
सभी समय पूर्णमासीके चन््रमाके समान दि
शोभित रहते हैं। यदि आप नष्ट हो जाय, १४
सृष्टिका ही नाश हो जायगा। किंकर्तव्यविंमूर्
मैने यह झूठा शाप दे दिया है॥ ३८-३९॥
हे सुरोत्तम! हे विभो! [अब आप मेरे
दो पाद और 'कलियुगमें तीन पाद नष्ट होगा
अन्तमें आपके सभी पाद नष्ट हो जायेगे | ह
सत्ययुग आनेपर आप: पुनः पूर्ण हो जायँगे ॥ ४.
ह
व्यवस्था सुनिये |] त्रेतायुगमें आपका प
अ० ३५]
सत्ये सर्वव्यापकस्त्वं तदन्येषु च कुत्रचित्।
युगव्यवस्थया स त्वं भविष्यसि यथा तथा॥ ४२
इत्येवं वचनं सत्यं ममास्तु सुखदं तव।
म्यहं पतिसेवायै गच्छ त्वं स्वगृहं विभो॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः सन्ुष्टोऽभूद् वृषः स वै।
तदेवंवादिनीं साध्वीमुवाच विधिनन्दन॥ ४४
धर्म उवाच
धन्यासि पतिभक्तासि स्वस्ति तेऽस्तु पतिब्रते।
बरं गृहाण त्वत्स्वामी त्वत्परित्राणकारणात्॥ ४५
युबा भवतु ते भर्ता रतिशूरश्च धार्मिकः।
रूपवान् गुणवान्वाग्मी संततस्थिरयौवनः ॥ ४६
चिरञ्जीवी स भवतु मार्कण्डेयात्परश्शुभे।
कुबेराद्धनवांश्चैव शक्रादैश्वर्यवानपि॥ ४७
शिवभक्तो हरिसमस्सिद्धस्तु कपिलात्परः।
बुद्ध्या बृहस्पतिसमः समत्वेन विधेः सम: ॥ ४८
स्वामिसौभाग्यसंयुक्ता भव त्वं जीवनावधि।
तथा च सुभगे देवि त्वं भव स्थिरयौवना॥ ४९
माता त्वं दशपुत्राणां गुणिनां चिरजीविनाम्
स्वभर्तुरधिकानां च भविष्यसि न संशयः॥ ५०
गृहा भवन्तु ते साध्वि सर्वसम्पत्समन्विताः।
प्रकाशवन्तः सततं कुबेरभवनाधिकाः॥ ५१
वसिष्ठ उवाच
इत्येवमुक्त्वा सन्तस्थौ धर्मः स गिरिसत्तम।
सा तं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य स्वगृहं ययौ॥
धर्मस्तथाशिषो दत्त्वा जगाम निजमन्दिरम्।
प्रशशंस च तां प्रीत्या पद्मा संसदि संसदि॥ ५३
सा रेमे स्वामिना सार्ध यूना रहसि सन्ततम्।
पश्चाद् बभूवुः सत्पुत्रास्तद्ध्तुरधिका गुणैः॥ ५४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६४५
सत्ययुगमें आप सर्वव्यापक रहेंगे और अन्य युगोंमें
युग-व्यवस्थानुसार आप कहीं-कहीं जैसे-तैसे घटते-
बढ़ते रहेंगे मेरा यह सत्य वचन आपके लिये सुखदायक
हो। हे विभो! अब मैं अपने पतिकी सेवाके लिये जा
रही हूँ और आप अपने घर जायँ॥ ४२-४३॥
ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मपुत्र नारद! पद्माके इस
वचनको सुनकर धर्मराज प्रसन्न हो गये और इस
प्रकार कहनेवाली उस साध्वीसे कहने लगे ॥ ४४॥
धर्म बोले-हे पतिव्रते! तुम धन्य हो, तुम पतिभक्त
हो, तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर स्वीकार करो।
तुम्हारा स्वामी तुम्हारी रक्षा करनेके कारण युवा हो
जाय | तुम्हारा पति रतिमें शूर, धार्मिक, रूपवान्, गुणवान्,
वक्ता और सदा स्थिर यौवनवाला हो॥ ४५-४६॥
हे शुभे! वह मार्कण्डेयसे भी बढ़कर चिरंजीवी
हो, कुबेरसे भी अधिक धनवान् तथा इन्द्रसे भी
अधिक ऐश्वर्यशाली रहे | वह विष्णुके समान शिवभक्त,
कपिलके समान सिद्ध, बुद्धिमें बृहस्पतिके समान तथा
समदर्शितामें ब्रह्मदेवके समान हो ॥ ४७-४८॥
तुम जीवनपर्यन्त स्वामीके सौभाग्यसे संयुक्त
रहो और हे सुभगे! हे देवि! तुम्हारा भी यौवन
स्थिर रहे ॥ ४९॥
तुम अपने पतिसे भी अधिक चिरंजीवी एवं
गुणवान् दस पुत्रोंकी माता होओगी, इसमें सन्देह
नहीं है॥५०॥
हे साध्वि! तुम्हारे घर नाना प्रकारकी सम्पत्तिसे
पूर्ण, निरन्तर प्रकाशयुक्त तथा कुबेरके भवनसे भी
श्रेष्ठ हों ॥ ५१॥
वसिष्ठ बोले--हे गिरित्रेष्ठ ! इस प्रकार कहकर
धर्मराज चुप होकर खड़े हो गये और वह भी उनकी
प्रदक्षिणाकर उन्हें प्रणाम करके अपने घर चली
गयी॥५२॥
भर्मराज भी [पद्माको] आशीर्वाद देकर अपने
घर चले गये और वे प्रत्येक सभामें प्रसन्न मनसे
पद्माकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर वह [पद्मा]
अपने युवा स्वामीके साथ नित्य एकान्तमें रमण करने
लगी । बादमें उसके पतिसे भी अधिक गुणवान् उत्तम
पुत्र उत्पन्न हुए॥ ५३-५४॥
श्रीशिवमहापुराण
६४८६
[अ 0) ` न्स य स नात्या.
बभूब सकला सम्पदम्पत्योः सुखवर्धिनी।
सर्वानन्दवृद्धिकरी परत्रेह च शर्मणे॥५५
शैलेन्द्र कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम्।
दम्पत्योश्च तयोः प्रीत्या श्रुतं ते परमाद्रात्॥ ५६
बुद्ध्वा तत्त्वं सुतां देहि पार्वतीमीश्वराय च।
कुरुषं त्यज शैलेन्द्र मेनया स्वस्त्रिया सह॥ ५७
सप्ताहे समतीते तु दुर्लभेऽतिशुभे क्षणे।
लग्नाधिपे च लग्नस्थे चन्द्रे स्वतनयान्विते॥ ५८
मुदिते रोहिणीयुक्ते विशुद्धे चन्द्रतारके ।
मार्गमासे चन्रवारे सर्वदोषविवर्मिते॥ ५९
सर्वसदग्रहसंसृष्टेऽसदग्रहरृष्टिवर्जिते ।
सदपत्यप्रदे जीवे पतिसोभाग्यदायिनि॥ ६०
जगदम्बा जगत्पित्रे मूलप्रकृतिमीश्वरीम्।
कन्यां प्रदाय गिरिजां कृती त्वं भव पर्वत॥ ६१
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो वसिष्ठो ज्ञानिसत्तम:।
विरराम शिवं स्मृत्वा नानालीलाकरं प्रभुम्॥ ६२
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
पन्रापिष्पलादचरितवर्णनं नाम पञ्चत्रिशोऽध्यायः ॥ ३५॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
नामक पैतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
—— ee
आ अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः
02 हिमवानूका शिवके साथ अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय क्ला
सप्तर्षियोंद्वारा शिवके पास जाकर उन्हे सम्पूर्ण वृत्तान्त बताकर अपने धामको जी
ब्रह्मोवाच
बसिष्ठस्य वच: श्रुत्वा सगणोऽपि हिमालयः ।
विस्मितो भार्यया शैलानुबाच स गिरीश्वरः ॥ १
स्त्री एवं पुरुषोंको सुख देनेवाली सारी सया
उनके पास हो गयी, जो सब प्रकारके आन
बढानेवाली और इस लोक तथा परलोकमें कल्य
कारिणी हुई॥ ५५॥ न
हे शैलेन्द्र! उन दोनों स्त्री-पुरुषोंका यह स
पुरातन इतिहास मैंने आपसे वर्णन किया और आफे
इसे अत्यन्त आदरपूर्वक सुना ॥ ५६॥
अतः आप इस चरित्रको जानकर अपनी कन्य
पार्वतीको शिवजीको प्रदान कीजिये और हे शैलेद्र।
अपनी स्त्री मेनाके सहित अपना हठ छोड़ दीजिये॥५७।
एक सप्ताह बीतनेपर एक दुर्लभ उत्तम शुभयोग
आ रहा है। उस लग्नमें लग्नका स्वामी स्वयं अपने
घरमें स्थित है और चन्द्रमा भी अपने पुत्र बुधके साध
स्थित रहेगा। चन्द्रमा रोहिणीयुक्त होगा, इसलिये चद
तथा तारागणोंका योग भी उत्तम है । मार्गशीर्षका महीना
है, उसमें भी सर्वदोषविवर्जित चन्द्रवारका दिन है, वह
लग्न सभी उत्तम ग्रहोंसे युक्त तथा नीच ग्रहोंकी दृष्टि
रहित है । उस शुभ लग्नमें बृहस्पति उत्तम सन्तान तथा
पतिका सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५८--६०॥
हे पर्वत! [ऐसे शुभ लग्नमें] अपनी कन्या मूत
प्रकृतिरूपा ईश्वरी जगदम्बाको जगत्पिता शिवे
लिये प्रदान करके आप कृतार्थ हो जायँगे॥६१॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] यह कह
जानियोंमें श्रेष्ठ मुनिशारदूल वसिष्ठजी अनेक लील
करनेवाले प्रभु शिवका स्मरण करके चुप हो गये॥ ६९
ब्रह्माजी बोले--वसिष्ठजीकी बात ह
अपने गणों एवं भार्यासहित विस्मित होकर
हिमालय पर्वतोंसे कहने लगे=॥ १॥
अ० ३६]
हिमालय उवाच
हे मेरो गिरिराटू सह्य गन्धमादन मन्दर।
मैनाक विन्ध्य शैलेन्द्राः सर्वे शृणुत मद्ठच:॥ २
वसिष्ठो हि वदत्येवं किं मे कार्य विचार्यते।
यथा तथा च शंसध्वं निर्णीय मनसाखिलम्॥ ३
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा वचनं तस्य सुमेरुप्रमुखाश्च ते।
रचुर्हिमालयं प्रीत्या सुनिणीय महीधराः॥ ४
शैला ऊचुः
अधुना किं विमर्शेन कृतं कार्य तथेव हि।
उत्पन्नेयं महाभाग देवकार्यार्थमेव हि॥ ५
प्रदातव्या शिवायेति शिवस्यार्थेऽवतारिणी।
अनयाराधितो रूद्रो रुद्रेण यदि भाषिता॥ ६
ब्रह्मोवाच
एतच्छुत्वा वचस्तेषां मेर्वादीनां हिमाचलः।
सुप्रसन्नतरोऽभूद् वै जहास गिरिजा हृदि॥ ७
अरुन्धती च तां मेनां बोधयामास कारणात्।
नानावाक्यसमूहेनेतिहासेर्विविधैरपि ॥ ८
अथ सा मेनका शैलपली बुदध्वा प्रसन्नधी:।
मुनीनरुन्धतीं शैलं भोजयित्वा बुभोज च॥ ९
अथ शैलवरो ज्ञानी सुसंसेव्य मुनींश्च तान्।
उवाच साञ्जलिः प्रीत्या प्रसन्नात्मा गतभ्रमः ॥ १०
हिमाचल उवाच
सपर्षयो महाभागा वचः शृणुत मामकम्।
मे गतः सर्वः शिवयोश्चरितं श्रुतम्॥ १
मदीयं च शरीरं वै पत्नी मेना सुता सुताः।
ऋद्धिः सिद्धिश्न ान्यद्वै शिवस्यैव न चान्यथा॥ १२
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा स तदा पुत्री दष्ट्वा तत्सादरं च ताम्।
तदङ्गानि क्र्ष्युत्सद्धे ज्यवेशयत्॥ १२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६४७
क हिमालय बोले--हे गिरिराज मेरो! हे सह्य!
हे गन्धमादन! हे मन्दर! हे मैनाक! हे विन्ध्य! हे
पर्वतेश््वरो! आप सब लोग मेरी बात सुनें। वसिष्ठजी
ऐसा कह रहे हैं। अब मुझको क्या करना चाहिये ।
इस सम्बन्धमें आपलोग विचार करें और मनसे
सब बातोंका निर्णय करके जैसा ठीक हो, वैसा
बताइये ॥ २-३॥
ब्रह्माजी बोले--उनकी बात सुनकर सुमेरु
आदि वे पर्वत भलीभाँति निर्णय करके प्रेमपूर्वक
हिमालयसे कहने लगे-॥ ४॥
पर्वत बोले-इस समय बहुत विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है, कार्य तो हो ही गया है। हे
महाभाग! यह [कन्या] देवताओंके कार्यके लिये ही
उत्पन्न हुई है। इसका अवतार ही जब शिवके लिये
हुआ है, तो इसे शिवजीको ही देना चाहिये। इसने
रुद्रकी आराधना की है और रुद्रने इसे स्वीकृति भी
दी है॥५-६॥
ब्रह्माजी बोले--मेरु आदि पर्वतोंकी यह बात
सुनकर हिमालयको बड़ी प्रसन्नता हुई और गिरिजा
भी मन-ही-मन हँसने लगीं। अरुन्धतीने [शिवः
पार्वतीके विवाहके लिये] अनेक प्रकारके वचनों तथा
विविध इतिहासोंसे उन मेनाको समझाया ॥ ७-८॥
तब शैलपत्नी मेना सब कुछ समझ गयीं और
प्रसन्नचित्त हो गयीं। उन्होंने मुनियों, अरुन्धती तथा
हिमालयको भोजन कराकर स्वयं भोजन किया॥ ९॥
तदनन्तर ज्ञानी गिरिश्रेष्ठ उन मुनियोंकी सेवा
करके प्रसन्तचित्त और भ्रमरहित होकर हाथ जोड़कर
प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे--॥ १०॥
हिमालय बोले--हे महाभाग्यवान् सप्तर्षिगण!
आपलोग मेरी बात सुनिये, मैंने शिवा और शिवजीका
सारा चरित्र सुन लिया, जिससे मेरा सारा सन्देह दूर
हो गया है। मेरा यह शरीर, पली मेना, पुत्री, पुत्र,
ऋद्धि, सिद्धि तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, वह
सब शिवका ही है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ११-१२॥
ब्रह्माजी बोले-उन्होंने इस प्रकार कहकर
उस पुत्रीकी ओर आदरपूर्वक देखकर उसके अंगोंको
[अलंकारोंसे] सुसज्जितकर उसे ऋषियोंकी गोदमें
६४८
श्रीशिबमहापुराण
[अ पा
उवाच च पुनः प्रीत्या शैलराज ऋषींस्तदा
अयं भागो मया तस्मै दातव्य इति निश्चितम् ॥ १४
ऋषय ऊचुः
शंकरो भिक्षुकस्तेऽथ स्वयं दाता भवान् गिरे।
भैक्ष्यञ्च पार्वती देवी किमतः परमुत्तमम्॥ १५
हिमवन् शिखराणान्ते यद्धेतोः सदूशी गतिः।
धन्यस्त्वं सर्वशैलानामधिपः सर्वतो वरः॥ १६
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा तु कन्यायै मुनयो विमलाशयाः।
आशिषं दत्तवन्तस्ते शिवाय सुखदा भव॥ १७
स्पृष्ट्वा करेण तां तत्र कल्याणं ते भविष्यति।
शुक्लपक्षे यथा चन्द्रो वर्धन्तां त्वद्गुणास्तथा॥ १८
इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे दत्त्वा ते गिरये मुदा।
पुष्पाणि फलयुक्तानि प्रत्ययं चक्रिरे तदा॥ १९
अरुन्धती तदा तत्र मेनां सा सुमुखी मुदा।
गुणैश्च लोभयामास शिवस्य परमा सती॥ २०
हरिद्राकुंकुमैः शैलश्मश्रूणि प्रत्यमार्जयत्।
मङ्गलायनमुत्तमम्॥ २१
ततश्च ते चतुर्थेऽह्नि संधार्यं लग्रमुत्तमम्।
परस्परं च सन्तुष्य संजग्मुः शिबसन्निधिम्॥ २२
तत्र गत्वा शिवं नत्वा स्तुत्वा विविधसूक्तिभिः।
ऊचुः सर्वे वसिष्ठाद्या मुनयः परमेश्वरम्॥ २३
ऋषय ऊचुः
देवदेव महादेव परमेश महाप्रभो।
शृण्वस्मद्गचनं प्रीत्या यत्कृतं सेवकैस्तव॥ २४
बोधितो गिरिराजश्च मेना विविधसूक्तिभिः।
सेतिहासं महेशान प्रबुद्धोऽसौ न संशयः॥ २५
वाक्यदत्ता गिरीन्द्रेण पार्वती ते हि नान्यथा।
बैठा दिया। तदनन्तर शैलराजने पुनः प्रेमसे आणो
कहा--मुझे शंकरका यह भाग उन्हें अवश्य देश
ऐसा मैंने निश्चय किया है॥ १३-१४॥
ऋषि बोले-हे गिरे! भगवान् शंकर ग्रह
होनेके कारण भिक्षुक हैं, आप कन्यादान दे |
कारण दाता हैं और देवी पार्वती भिक्षा हैं, अब इसे
उत्तम और क्या बात हो सकती है। हे हिमालय!
जिस प्रकार सभी शिखरोंसे ऊँचे होनेके बा
आपके शिखरोंकी श्रेष्ठता है, उसी प्रकार आप भ |
सम्पूर्ण पर्वतोंके अधिपति होनेके कारण सबसे उत्तम
हैं तथा धन्य हैं॥ १५-१६॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार कहकर निर्मल
मनवाले मुनियोंने हाथसे स्पर्श करके कन्याको आशीर्वाद
दिया कि शिवको सुख देनेवाली बनो, तुम्हा
कल्याण हो। जिस प्रकार शुक्लपक्षका चन्द्रमा बढ़त
है, उसी प्रकार तुम्हारे गुणोंकी वृद्धि हो॥ १७-१८॥
इस प्रकार कहकर उन सभी मुनये
प्रसन्नतापूर्वक हिमालयको [ आशीर्वाद रूपमें] फूल
तथा फल अर्पित करके विश्वास उत्पन्न कराया॥ १९॥
परम पतिव्रता सुमुखी अरुन्धतीने शिवजीके
गुणोंसे मेनाको प्रलोभित किया॥ २०॥ द
तदनन्तर हिमालयन दाढ़ीमें हरिद्रा तथा कुंकुमत
मार्जन किया और लौकिकाचारपूर्वक सारा मं
किया॥ २१॥
तदनन्तर चौथे दिन शुभ लग्नका निश्चय
परस्पर सन्तुष्ट हो वे [मुनिगण] शिवजीके प
गये॥ २२॥ न
वहाँ जाकर शिवजीको प्रणामकर ऑर
सूक्तोसे उनकी स्तुतिकर वे वसिष्ठ आदि सभी ग
कहने लगे॥ २३॥
ऋषि बोले- हे देवदेव ! हे महादेव! हे pe
हे महाप्रभो ! आपके सेवक हम लोगोंने जो कि"
उस बातको प्रेमसे सुनिये॥ २४॥
हे महेशान! हमलोगोंने इतिहासपूर्वक
प्रकारके उत्तम वचनोंसे पर्वतराज [हिमालय] ज
मेनाको बहुत समझाया, जिससे वे समझ र
सन्देह नहीं रहा । गिरीद्धने वारदान देकर
है
अ० ३७]
उद्गाहाय प्रगच्छ त्वं गणेर्देवैश्च संयुतः॥ २६
गच्छ शीघ्रं महादेव हिमाचलगृहं प्रभो।
विवाहय यथा रीतिः पार्वतीमात्मजन्मने॥ २७
ब्रह्मोवाच
'चचनं तेषां लौकिकाचारतत्परः।
प्रहष्टाममा महेशानः प्रहस्येदमुवाच सः॥ २८
महेश उवाच
विवाहो हि महाभागा न दृष्टो न श्रुतो मया।
यथा पुरा भवद्भिस्तद्विधिः प्रोच्यो विशेषतः ॥ २९
ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य महेशस्य लौकिकं वचनं शुभम्।
प्रत्यूचुः प्रहसन्तस्ते देवदेवं सदाशिवम्॥ ३०
ऋषय ऊचुः
विष्णुमाहूय वै शीघ्रं ससमाजं विशेषतः।
ब्रह्माणं ससुतं प्रीत्या तथा देवं शतक्रतुम्॥ ३१
तथा ऋषिगणान्सर्वान् यक्षगन्धर्वकिन्नरान्।
सिद्धान् विद्याधरांश्चैव तथा चैवाप्सरोगणान्॥ ३२
एतांश्चान्यान्प्रभो सर्वानानयस्वेह सादरम्।
सर्वे संसाधयिष्यन्ति त्वत्कार्य ते न संशयः॥ ३३
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा सप्त ऋषयस्तदाज्ञा प्राप्य ते मुदा।
स्वधाम प्रययुः सर्वे शंसन्तः शाङ्करीं गतिम्॥ ३४
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६४९
की है कि यह पार्वती आपकी है। अब आप
अपने गणों तथा देवताओंको लेकर विवाहके लिये
चलिये॥ २५-२६॥
हे महादेव! हे प्रभो! आप शीघ्र ही विवाहके
लिये हिमालयके घर चलिये तथा सन्तान-उत्पादनके
लिये रीतिके अनुसार पार्वतीसे विवाह कीजिये ॥ २७॥
ब्रह्माजी बोले--उनकी यह बात सुनकर शिवजी
प्रसन्नचित्त हो गये और लौकिकाचारमें तत्पर होकर
हँसते हुए इस प्रकार कहने लगे-॥ २८॥
महेश बोले-हे महाभाग! मैंने तो विवाह न
देखा है और न सुना है, आपलोग ही जैसी विधि
देखे-सुने हैं, उसे बताइये ॥ २९॥
ब्रह्माजी बोले--शिवजीके लौकिक शुभ
वचनको सुनकर वे देवाधिदेव सदाशिवसे हँसते
हुए कहने लगे-॥ ३०॥
ऋषि बोले--हे प्रभो! आप समाजसहित विष्णुको
विशेष रूपसे शीघ्र बुलाकर पुत्रसहित ब्रह्माजी,
इन्द्रदेव, सभी ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध,
विद्याधर, अप्सरा-इन सबको तथा अन्य लोगोंको
आदरपूर्वक यहाँ बुलाइये। वे सब आपका कार्य सिद्ध
करेंगे, इसमें सन्देह नहीं है॥ ३१-३३॥
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर उनकी आज्ञा लेकर
वे सभी सप्तर्षि शिवजीकी महिमाका वर्णन करते हुए
प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये॥ ३४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
सपर्षिवचनं नाम पद्तरिशोऽ ध्यायः ॥ ३६॥
॥ इस प्रकार
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
सप्तर्षिवचन नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥
—— ee
अथ सपत्रिंशोऽध्यायः
विवाहकी सामग्रियोंकी
हिमालयद्वारा विवाहके लिये लग्नपत्रिकाप्रेषण, i
तैयारी तथा अनेक पर्वतों एवं नदियोंका दिव्य रूपमें
सपरिवार हिमालयके घर आगमन
नारद उवाच
तात प्राज्ञ बदेदानीं सप्तर्षिषु गतेषु च।
कृत्वा कृपां प्रभो॥ ९
नारदजी बोले--हे तात! हे महाप्राज्ञ हे प्रभो!
अब आप कृपाकर मुझे यह बताइये कि उन सप्त्षियोंके
चले जानेके बाद हिमालयने क्या किसा ?॥ १॥
श्रीशिवमहापुराण
६५०
ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु मुनिषु सप्तस्वपि मुनीश्वर।
सारुन्धतीषु हिमवान् यदकार्षीद् ब्रवीमि ते॥ २
तत आमन्त्य स्वक्षातृन् मेर्वादीन् ससुतप्रियः।
महामनाः स मुमुदे हिमवान् पर्वतेशवरः॥ ३
'तदाज्ञप्स्तत: प्रीत्या हिमवान् लग्नपत्रिकाम्।
लेखयामास सुप्रीत्या गर्गेण स्वपुरोधसा॥ ४
अथ प्रस्थापयामास तां शिवाय स पत्रिकाम्
जानाविधास्तु सामग्रथः स्वजनैर्मुदितात्मभिः॥
ते जनास्तत्र गत्वा च कैलासे शिवसन्निधिम्।
ददुः शिवाय तत्पत्रं तिलकं संविधाय च॥ ६
नक
सम्मानिता विशेषेण प्रभुणा च यथोचितम्।
सर्वे ते प्रीतिमनस आजग्मुः शेलसन्रिधिम्॥ ७
सम्मानितान्विशेषेण महेशेनागतान् जनान्।
दृष्ट्वा सुहर्षितान् शैलो मुमोदातीव चेतसि॥ ८
ततो निमन्त्रणं चक्रे स्वबन्धूनां प्रमोदितः।
जानादेशस्थितानां च निखिलानां सुखास्पदम्॥ ९
ततः स कारयामास स्वननसङ्ग्रहमाद्रात्।
नानाविधाश्च॒साम्ग्रीर्विवाहकरणोचिताः॥ १०
तण्डुलानां बहून् शैलान् पृथुकानां तथैव च।
गुडानां शर्कराणां च लवणानां तथैव च॥ १ २
क्षीराणां च घृतानां च दध्नां वापीश्रकार सः।
यवादिधान्यपिष्टानां लङ्डुकानां तथैव च॥ १२
शष्कुलीनां स्वस्तिकानां शर्कराणां तथैव च)
अमृतेक्षुससानां च तत्र वापीश्चकार सः॥ १३
बह्वहैयङ्गवानां उहा च ह्यासवानां तथैव च।
श॑ महास्वादुरसाँस्तथा॥ १४
नानाव्यञ्जनवस्तूनि गणदेवहितानि च।
अमूल्यनानावस्त्राणि वहिशौचानि यानि च॥ १५
मणिरलप्रकाराणि सुवर्णरजतानि च ।
द्रव्याण्येतानि चान्यानि सडूगृह्य विधिपूर्वकम्॥ १६
मङ्गलं कर्तुमारेभे गिरिर्मगलकृद्दिने।
संस्कारं कारयामासुः पार्वत्याः पर्वतस्त्रियः ॥ १७
[अ =¬ = `= =` 55 ७७ `
ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! अर्धी
उन सप्तर्षियोंक चले जानेपर हिमालयने जो क्षि
उसे मैं आपसे कह रहा हूँ । उसके बाद महाम
गिरिराज हिमालय प्रिय पुत्रोसहित अपने मेह ञि |
बन्धुओंकों बुलाकर बड़े प्रसन्न हुए॥ २-३॥
उनसे आज्ञा लेनेके बाद हिमालयने
अपने पुरोहित गर्गजीसे लग्नपत्रिका लिखवावी औ |
उन्होने प्रसन्न मनवाले अपने सेवकोंसे अनेक प्रकारक
सामग्रियों तथा उस लग्नपत्रिकाको बड़े प्रेमसे शिवजी
पास भिजवाया॥ ४-५॥
उन लोगोंने कैलासंपर शिवजीके समीप जाक
उनको तिलक लगाकर वह पत्रिका उन्हें प्रदान
की॥ ६॥
भगवान् सदाशिवने उन लोगोंका विशेष रूपमे
यथोचित सम्मान किया और प्रसन्नतापूर्वक वे सभ
लोग हिमालयके पास लौट आये | हिमालय भी शिवजीके
दवारा विशेष रूपसे सम्मानित हुए हर्षित लोगोंको देखका
मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ७-८॥
तत्पश्चात् उन्होंने भी अनेक देशोंमें रहनेवाले
अपने सम्बन्धियोंको बड़े प्रेमके साथ सुखदायक
निमन्त्रण भेजा। उसके बाद उन्होंने आदरसे उत्तम
अन्न तथा विवाहके लिये अनेक प्रकारकी उपयोगी
सामग्रियाँ एकत्रित कीं ॥ ९-१०॥
उन्होंने चावल, चिउड़ा, गुड़, शर्करा तथा
जमकका पहाड़ लगवा दिया। दूध, घी, दहीकी वापी
'बनवाकर उन्होंने जौ आदिका आटा, लू, पू
स्वस्तिक, शर्कराका प्रभूत-संग्रह करवाया और
समान स्वादिष्ट इक्षुससकी वापी बनवा दी तथा मर्कर्ड
आसवोंका समूह एवं महास्वादिष्ट पक््वालों
रसोंका ढेर लगवा दिया॥ ११--१४॥
शिवजीके गणों तथा देवताओंके लिये हिरी
अनेक प्रकारके व्यंजन, वस्तुएँ तथा
किये गये अनेक प्रकारके बहुमूल्य वल
अकारकी मणियाँ रतन, सुवर्ण तथा चाँदी--इग
तथा अन्य वस्तुओंको विधिपूर्वक एकत्रित >,
गिरिराजने मंगलदायक दिनमें मंगलाचार प्रारम्भ री
पर्वतोंकी स्त्रियाँ पार्वतीका संस्कार करने
अ० ३७ ]
ता मङ्गलं मुदा चक्रुर्भूषिता भूषणैः स्वयम् ।
पुरद्रिजस्त्रियो दृष्टा लोकाचारं प्रचक्रिरे॥ १८
सोत्सवं विविधं तत्र सुमङ्गलपुरस्सरम्।
हिमालयोऽपि दृष्टात्मा कृत्वाचारं सुमडुलम्॥ १९
सर्वभावेन सुप्रीतो बन्धुवर्गागमोत्सुकः।
एतस्मिन्नन्तरे तस्य बान्धवाश्च निमन्त्रिताः ॥ २०
आजग्मुः सस्त्रियो हृष्टाः ससुताः सपरिच्छदाः।
तदेव श्रृणु देवर्षे गिर्यागमनमादृतः॥ २१
वर्णयामि समासेन शिवप्रीतिविवृद्धये।
देवालयगिरियों हि दिव्यरूपधरो महान्॥ २२
जानारत्नपरिभ्राजत्समाजः सपरिच्छदः ।
नानामणिमहारलसारमादाय यलतः॥ २३
सुवेषालंकृतः श्रीमान् जगाम स हिमालयम्।
मन्दरः सर्वशोभाढ्यः सनारीतनयो गिरिः॥ २४
सूपायनानि सङ्गृह्य जगाम विविधानि च।
अस्ताचलोऽपि दिव्यात्मा सोपायन उदारधीः ॥ २५
बहुशोभासमायुक्त आजगाम मुदान्वितः।
उदयाचल आदाय सद्रत्नानि मणीनपि॥ २६
अत्युत्कृष्टपरीवार आजगाम महासुखी।
मलयो गिरिराजो हि सपरीवार आदूतः॥ २७
सुदिव्यरचनायुक्त आययौ बहुसद्वलः।
सद्यो दर्दुरनामा च मुदितः सकलत्रकः॥ २८
बहुशोभान्वितस्तात ययौ हिमगिरेर्गृहम्।
निषदोऽपि प्रहृष्टात्मा सपरिच्छद आययो॥
समुतस्त्रीगणः प्रीत्या ययौ हिमगिरेर्गृहम्।
आजगाम महाभाग्यो भूधरो गन्धमादनः ॥ ३०
केरवीरस्तथचैवापि महाविभवसंयुतः।
महेद्र: पर्वतश्रेष्ठ आजगाम हिमालयम्॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६५१
वे स्वयं अनेक प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित
होकर प्रसन्नतापूर्वक मंगलाचार करने लगीं। नगरमें
रहनेवाली द्विजस्त्रियाँ भी प्रसन्न होकर उत्सव तथा
मंगलाचारके साथ अनेक प्रकारके लोकाचार करने
लगीं॥ १५--१८१/२॥
हिमालय भी प्रसन्नचित्त होकर प्रेमके
साथ समस्त मंगलाचारकर बम्धुवर्गोके आनेकी
प्रतीक्षा करने लगे। इसी बीच निमन्त्रित उनके सभी
बान्धव अपनी स्त्रियों, पुत्रों तथा सेवकोंसहित
प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ गये। हे देवर्षे! अब उन
पर्वतोंका आगमन आदरपूर्वक सुनिये। मैं शिवजीकी
प्रीति बढ़ानेके लिये संक्षेपसे इसका वर्णन कर रहा
हूँ॥ १९-२११/२॥
सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ तथा श्रीमान् देवालय
नामक पर्वत सुन्दर वेषसे अलंकृत होकर दिव्य रूप
धारणकर अनेक प्रकारके रत्नोंसे देदीप्यमान अपने
समाज तथा कुटुम्बके साथ अनेक मणियों तथा
बहुमूल्य रलोंको लेकर हिमालयके यहाँ पहुँचे।
सम्पूर्ण शोभासे संयुक्त मन्दराचल अनेक प्रकारके
उत्तम उपहारोंको लेकर अपनी स्त्री तथा पुत्रोंसहित
हिमालयके पास गये । उदारबुद्धिवाले तथा दिव्यात्मा
अस्ताचल पर्वत भी महान् शोभासे युक्त हो विविध
प्रकारकी भेंटसामग्री लेकर प्रसन्ततापूर्वक हिमालयके
निकट आये। उसी प्रकार हर्षोल्लाससे समन्वित
उदयाचल भी सभी प्रकारके उत्तम रत्न तथा मणियोंको
लेकर अत्युत्तम परिवारके साथ आये। मलयाचल भी
आदरपूर्वक अत्यन्त दिव्य रचनासे युक्त हो बहुत-सी
सेना तथा परिवारसहित हिमालयके यहाँ आये। हे
तात! दर्दर नामक पर्वत भी प्रसन्न हो अपनी पलीके
साथ महान् शोभासे युक्त होकर हिमालयके घर शीघ्र
पहुँचे। निषद पर्वत भी प्रसन्नचित्त होकर अपने
परिवारजनोंके साथ हिमालयके घर आये। इसी प्रकार
महाभाग्यवान् गन्धमादन पर्वत भी पुत्र तथा स्त्रियोंके
साथ प्रसननतासे हिमालयके घर आये । महान् ऐश्वर्यसे
समन्वित होकर करवीर तथा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र भी
'हिमालयके घर आये॥ २२-३१॥
६५२
सगणः ससुतस्त्रीको बहुशोभासमन्वितः ।
पारियात्रो हि हृष्टात्मा मणिरलाकरैर्युतः॥ ३२
सगणः सपरीवार आययौ हिमभूधरम्।
क्रौञ्जः पर्वतराजो हि महाबलपरिच्छदः।
आजगाम गिरिश्रेष्ठः समुपायन आदृतः॥ ३३
पुरुषोत्तमशैलोऽपि सपरिच्छद आदूतः।
महोपायनमादायाजगाम हिमभूधरम्॥ ३४
नीलः सलील: ससुतः सस्त्रीको द्रव्यसंयुत: ।
आजगाम हिमागस्य गृहमानन्दसंयुतः॥ ३५
त्रिकूटञ्चित्रकूटोऽपि वेंकट: श्रीगिरिस्तथा।
गोकामुखो नारदश्च हिमगेहमुपागमत्॥ ३६
विन्ध्यश्च पर्वतश्रेष्ठो नानासम्पत्समन्वितः।
आजगाम प्रहष्टात्मा सदारतनयः शुभः ॥ ३७
कालंजरो महाशैलो बहुहर्षसमन्वित: ।
बहुभिः स्वगणैः प्रीत्याजगाम हिमभूधरम्॥ ३८
कैलासस्तु महाशैलो महाहर्षसमन्वितः।
आजगाम कृपां कृत्वा सर्वोपरि लसत्प्रभुः॥ ३९
अन्येऽपि भूभृतो ये हि द्वीपेष्वन्येष्वपि द्विज।
इहापि येऽचलाः सर्वे आययुस्ते हिमालयम् ॥ ४०
निमन्त्रिता नगास्तत्र तेन पूर्व मुदा मुने।
आययुर्निखिला: प्रीत्या विवाहश्शिवयोरिति॥ ४१
तदा सर्वे समायाताः शोणभद्रादयः 'खलु।
बहुशोभा महाप्रीत्या विवाहश्शिवयोरिति॥ ४२
न्यः सर्वाः समायाता नानालंकारसंयुताः ।
दिव्यरूपधराः प्रीत्या ॥ ४३
गोदावरी च यमुना ब्रहसत्रीवेणिका तथा।
आययो हिमशेलं वै TE
्रीशिवमहापुराण i 3] OTT Sus,
शो
अनेक प्रकारकी शोभासे सम्पन्न र
प्रसल-चित्त होकर अनेक गणों, पुत्रों एवं सो
साथ लेकर मणि तथा रत्नोंकी खानसे युक्त :
हिमालयके पास गये। गिरिश्रेष्ठ पर्वतराज र
अपनी सेना तथा सेवकोंको लेकर अपने पुत्रं
तथा परिवारसहित प्रसन्न हो भेंटसामग्रीसे युक्त
आदरपूर्वक हिमालयके घर गये ॥ ३२-३३ ॥
पुरुषोत्तम पर्वत भी अपने समाजसहित ब
आदरके साथ बहुत-सी भेंट-सामग्री लेकर हिमालये
पास आये। नीलपर्वत भी अपनी स्त्री तथा पुत्रके सा
बहुत-सा द्रव्य लेकर आनन्दित होकर हिमालयके प्रा
आयें॥ ३४-३५॥
त्रिकूट, चित्रकूट, बेंकर, श्रीगिरि, गोकामुख
तथा नारद-ये पर्वत भी हिमालयके घर आगे।
पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य भी अत्यन्त प्रसन्तचित्त होकर अपे
स्त्री-पुत्रोंसहित नाना प्रकारकी सम्पत्तिसे युक्त हो
हिमालयके घर आये॥ ३६-३७॥
महाशैल कालंजर अपने अनेक गणोंके
साथ प्रसन्नता-पूर्वक हिमालयके घर आये। कैलात
नामक महापर्वत भी बड़ी प्रसन्नताके साथ कृपापूर्वक
हिमालयके घर आये। वे सभी पर्वतोंकी अपेक्ष
अधिक शोभासम्पन्न थे॥ ३८-३९॥
हे नारद! इसी प्रकार अन्य द्वीपॉमें रहनेवात
तथा भारतवर्षमें रहनेवाले जो अन्य पर्वत थे, वे स
हिमालयके घर आये। हे मुने! हिमालये जि
पर्वतोंको पहले ही प्रेमसे आमन्त्रित किया था, वे स॑
यह सोचकर कि यह शिवा-शिवका विवाह ®
प्रसन्ततापूर्वक वहाँ आये ॥ ४०-४१॥
शिवा-शिवका विवाह हो रहा है-यह जा.
उस समय शोणभद्रादि सभी नद अनेक शो
होकर बड़ी प्रसलताके साथ वहाँ आये॥ ४२
शिवा-शिवका विवाह हो रहा है- यह भत
सभी नदियाँ दिव्य रूप धारण करके नाता शबि
अलंकारोंसे युक्त हो प्रेमपूर्वक वहाँ यावी द
शिवका विवाह हो रहा है--यह जानकर |
यमुना, ब्रह्मस्त्री तथा वेणिका
आयीं ॥ ४३-४४॥
अ० ३८ ]
गङ्गा तु सुमहाप्रीत्या नानालंकारसंयुता।
दिव्यरूपाययौ प्रीत्या विवाहश्शिवयोरिति॥ ४५
नर्मदा तु महामोदा रुद्रकन्या सरिद्वरा।
महाप्रीत्याजगामाशु विवाहश्शिवयोरिति॥ ४६
आगतैस्तैस्ततः सैः सर्वतो हिमभूधरम्।
संकुलासीत्पुरी दिव्या सर्वशोभासमन्विता॥ ४७
महोत्सवा लसत्केतुध्वजातोरणकाधिका।
वितानविनिवृत्तार्का तथा नानालसत्प्रभा॥ ४८
हिमालयोऽपि सुप्रीत्यादरेण विविधेन च।
तेषां चकार सम्मानं तासां चैव यथायथम्॥ ४९
सर्वान्निवासयामास सुस्थानेषु पृथक् पृथक् ।
सामग्रीभिरनेकाभिस्तोषयामास कृत्स्नशः ॥ ५०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६५३
शिवा-शिवका विवाह हो रहा है--यह जानकर
गंगाजी भी महाप्रसन्न हो दिव्य रूप धारण करके अनेक
प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित हो वहाँ आयीं ॥ ४५॥
शिवा-शिवका विवाह हो रहा है--यह जानकर
सरिताओंमें शरेष्ठ, अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेवाली,
रुद्रकी कन्या नर्मदा भी बड़े प्रेमसे शीघ्र वहाँ आ
गर्या ॥ ४६॥
उस समय हिमालयके यहाँ आये हुए उन सभी
लोगोंसे वह दिव्य तथा सभी शोभासे युक्त पुरी भर
गयी । वह महोत्सवसे युक्त हो गयी, उसमें नाना प्रकारके
केतु, ध्वज एवं तोरण सुशोभित होने लगे, नाना प्रकारके
वितानोंसे सूर्यका प्रकाश रुक गया और वह पुरी रंग-
बिरंगे रत्नोंकी छटासे पूर्ण हो गयी ॥ ४७-४८॥
हिमालयने भी प्रभूत आदरके साथ अत्यन्त
प्रेमपूर्वक उन स्त्रियों तथा पुरुषोंका यथोचित सम्मान
किया। उन्होंने सभी लोगोंको अलग-अलग उत्तम
स्थानोंपर निवास प्रदान किया और अनेक प्रकारकी
सामग्रियोंसे उन्हें पूर्णरूपसे सन्तुष्ट किया ॥ ४९-५०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
लग्नपत्रसंग्रेणसामग्रीसङ्ग्रहशैलागमतवर्णतं नाम सपत्रिँशोऽ ध्याय: ॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तरगत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें लग्नपत्रसम्प्रेषणसामग्रीसंग्रह-
शैलागमनवर्णन नामक सँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः
हिमालयपुरीकी सजावट, विश्वकर्माद्वारा दिव्यमण्डप एवं देवताओंके
निवासके लिये दिव्यलोकोंका निर्माण करना
ब्रह्मोवाच
अथ शैलेश्वरः प्रीतो हिमवान्मुनिसत्तम।
स्वपुरं रचयामास विचित्रं परमोत्सवम्॥ ९
सिक्तमार्ग संस्कृतं च शोभितं परमद्धिभिः।
हरि द्वारि च रम्भादि मङ्गलं द्रव्यसंयुतम्॥ २
प्राङ्गणं रचयामास रम्भास्तंभसमन्वितम्।
ब्रह्माजी बोले-हे मुनिसत्तम! इसके बाद
हिमालयने प्रसन्न होकर महोत्सवसम्पन्त अपने नगरको
विचित्र प्रकारसे सजाया॥ १॥
उन्होंने सभी मार्गोपर जलका छिड्काव
कराया और सभी प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धिसे जगरको
अलंकृतकर प्रत्येक द्वारको केलेके खम्भे तथा
मंगलद्रव्योंसे सुसज्जित किया॥ २॥
आँगनमें केलेके खम्भे लगवाये गये। रेशमी
भागोंमें. आमका पल्लव बाँधकर बंदनवार, जिसमें
मालतीकी माला बँधी हुई थी, लटकाया गया और
६५४ श्रीशिवमहापुराण [अ च...
कत्या
शोभितं मद्ठलद्रव्येश्वतुर्दिक्षु स्थितैः शुभेः॥ ४ | उस आँगनको चारों दिशाओंमें कल्याणकारी मं
तथैव सर्वं परया मुदान्वितः सुशोभित किया गया। पर्वतराजने महाप्रभा
श्रक्रे गिरीन्द्रः स्वसुतार्थमेव।
पुरस्कृत्य महाप्रभावं
प्रस्तावयोग्यं च सुमङ्गलं हि॥ ५
आहूय विश्वकर्माणं कारयामास सादरम्।
मण्डपं च सुविस्तीर्णं वेदिकादिमनोहरम्॥ ६
गर्ग
अयुतेन सुरषें तद्योजनानां च विस्तृतम्।
अनेकलक्षणोपेतं नानाश्चर्यसमन्वितम्॥ ७
स्थावरं जङ्गमं सर्वं सदृशं तैर्मनोहरम्।
सर्वतोऽद्भुतसर्वस्वं नानावस्तुचमत्कृतम्॥ ८
जङ्गमं विजितं तत्र स्थावरेण विशेषतः।
जङ्गमेन च तत्रासीजितं स्थावरमेव हि॥ ९
पयसा च जिता तत्र स्थलभूमिर्न चान्यथा।
जलं किं हि स्थलं किं हिन बिदुः केऽपि कोविदाः ॥ ९०
क्वचित्सिंहाः कृत्रिमाश्च ववचित्सारसपंक्तयः।
क्वचिच्छिखण्डिनस्तत्र कृत्रिमाश्च मनोहराः ॥ १९
क्वचित्स्त्रिय: कृत्रिमाश्च जृत्यनत्यः पुरुषैस्सह।
मोहयन्त्यो जनान्स्वान्पश्यन्त्यः कृत्रिमास्तथा॥ १२
तथा तेनैव विधिना द्वारपाला मनोहरा: ।
हस्तैर्धनूंषि चोद्धृत्य स्थावरा जड़मोपमा: ॥ १३
द्वारि pi कृत्रिमा रचिताद्भुता।
सर्वलक्षणसंपुक्तागता साक्षात्पयोर्णवात्॥ १४
गजाश्वालडकृता ह्यासन्कृत्रिमा अकृतोपमाः।
तथाश्वाः सादिभिश्चैव गजाश्च गजसादिधि:॥ १५
रथा रथिभिराकृष्टा महाश्चर्यसमन्विताः।
वाहनानि तथान्यानि पत्तयः कृत्रिमास्तथा॥ १६
गर्गाचार्यके आज्ञानुसार अपनी कन्याके विवाह
निमित्त परम प्रसन्नतासे युक्त हो सारी सामग्री कद
सभी प्रकारके मंगलद्रव्य एकत्रित किये॥ सडा
उन्होंने विश्वकर्माको आदरपूर्वक बुलाकर
विस्तृत मण्डप तथा मनोहर वेदिका आदिका तिम
कराया ॥ ६॥
हे देवर्षे! वह [मण्डप] दस हजार योज
लम्बा, अनेक लक्षणोंसे युक्त तथा अनेक आशव
परिपूर्ण था। स्थावर चित्रकी रचना जंगमके सट
ही होनेसे वह मण्डप चारों ओर अद्भुत पदाधोग
परिपूर्ण हो गया॥ ७-८॥
स्थावर रचनाने विशेष रूपसे जंगमको तध
जंगम रचनाने स्थावर रचनाको पराजित कर दिय
था॥९॥
जलकी रचनासे स्थलभूमि जीत ली गयी। बढ़े
बड़े विशेषज्ञोंको भी पता नहीं लगता था कि कहं
जल है और कहाँ स्थल है॥ १०॥
कहींपर कृत्रिम सिंह तथा सारसोंकी पंक्ति बगे
हुई थी तथा कहीं अत्यन्त मनोहर कृत्रिम मोर बो
इए थे॥ ११॥
कहीं पुरुषोंके साथ नाचती हुई स्त्रियोंके चित
बनाये गये थे, वे कृत्रिम स्त्रियाँ अपनी दृष्टिसे देखी
हुए पुरुषोंको मानो मोह रही थीं॥ १२॥
इसी प्रकार हाथमें धनुष धारण किये मवी
द्वारपाल स्थावर होकर भी जंगमके सदृश
होते थे॥ १३॥
क्षोरसागरसे उत्पन्न हुई सर्वलक्षणयुक्त स
लक्ष्मीके समान अद्भुत कृत्रिम महालक्ष्मी द
बनायी गयी थी॥ १४॥ दिखा
अलंकृत हाथी वास्तविक हाथीके समात i
पड़ते थे। इसी प्रकार घुड़सवारोंसे समन्वित जी
रथा गजारोहियोंसे युक्त गज और रथे
युक्त रथ समतामें किसी प्रकार जीवधारीसे %
अनेक प्रकारके वाहन तथा पैदल कृत्रिम हते:
अकृत्रिम-जैसे प्रतीत होते थे॥ १५-१६॥
अ० ३८ ]
देवानां च मुनीनां च तेन प्रीतात्मना मुने॥ १७
महाद्वारि स्थितो नन्दी कृत्रिमश्च कृतो मुने।
शुद्धस्फटिकसंकाशो यथा नन्दी तथैव स:॥ १८
तस्योपरि महादिव्यं पुष्पकं रत्नभूषितम्।
राजितं पल्लवैः शुभ्रैश्चामरैश्च सुशोभितम्॥ १९
वामपार्श्वे गजौ द्वौ च शुद्धकाश्मीरसन्निभौ।
चतुर्दन्तो षष्टिवषौ भेदमानौ महाप्रभौ॥ २०
तथैवार्कनिभो तेन कृतौ चाश्चौ महाप्रभो।
चामरालंकृतौ दिव्यो दिव्यालङ्कारभूषितौ॥ २१
दंशिता वररत्नाढ्या लोकपालास्तथैव च।
सर्वे देवा यथार्थ वै कृता वै विश्वकर्मणा॥ २२
तथा हि ऋषयः सर्वे भृग्वाद्याश्च तपोधनाः।
अन्ये हयुपसुरास्तद्वत्सिद्धाश्चान्येऽपि वै कृताः ॥ २३
विष्णुश्च पार्षदैः सवेर्गरुडाख्यैः समन्वितः ।
कृत्रिमो निर्मितस्तद्वत्परमाश्चर्यरूपवान्॥ २४
तथैवाहं सुतै्वेदैस्सिद्धैश्च परिवारितः।
कृत्रिमो निर्मितस्तद्वत्पठन्सूक्तानि नारद॥ २५
ऐरावतगजारूढ:
कृत्रिमो
शक्रः स्वदलसंयुतः।
निर्मितस्तद्वत्रिपूर्णेन्दुसंनिभः॥ २६
किं बहूक्तेन देवर्षे सर्वो वै विश्वकर्मणा।
हिमागप्रेरितनाशु क्लृप्तः सुरसमाजकः॥ २७
एवंभूत: कृतस्तेन मण्डपो दिव्यरूपवान्।
अनेकाश्चवर्यसम्भूतो महान्देवविमोहनः ॥ २८
अथाजञप्तो गिरीशेन विश्वकर्मा महामतिः।
निवासार्थं सुरादीनां तत्तल्लोकान् हि यत्नतः॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६५५
हे मुने! उन प्रसन्नचित्त विश्वकर्माने देवताओं
और मुनियोंको मोहित करनेके लिये यह सब किया
था॥ १७॥
हे मुने! महाद्वारपर शुद्ध स्फटिकके समान
अत्यन्त उज्ज्वल नन्दीका चित्र बनाया गया था,
वह साक्षात् नन्दीके ही समान था। उसके ऊपर
महादिव्य, रत्नजटित एवं मनोहर पल्लवों तथा चामरोंसे
शोभायमान पुष्पक विमान रखा हुआ था॥ १८-१९॥
द्वारके बायें भागमें शुद्ध काश्मीरी रंगके चार
दाँतवाले दो हाथी बनाये गये थे, जो महाकान्तिमान्
तथा साठ वर्षके थे और एक-दूसरेसे भिड़े हुए
थे॥२०॥
उसी प्रकार सूर्यके समान महाकान्तिमान् तथा
दिव्य दो घोडे भी बनाये गये थे, जो चँबरों तथा दिव्य
अलंकारोंसे सुसज्जित थे॥ २१॥
विश्वकर्माने श्रेष्ठ रलोंसे विभूषित यथार्थ रूपवाले
सभी लोकपालों तथा देवताओंको बनाया था॥ २२॥
इसी प्रकार तपोधन भृगु आदि ऋषियों, अन्य
उपदेवताओं, सिद्धों तथा अन्य लोगोंके भी चित्रोंका
निर्माण किया गया था। कृत्रिम विष्णु अपने गरुड आदि
पार्षदोंके साथ इस प्रकारके बनाये गये थे कि उनको
देखनेसे महान् आश्चर्य प्रतीत हो रहा था॥ २३-२४॥
हे नारद! इसी प्रकार अपने पुत्रों, वेदों एवं
परिवारके साथ सूक्तपाठ करते हुए मुझ ब्रह्माके
चित्रका भी निर्माण कराया गया था। विश्वकर्माने
ऐरावतपर चढ़े हुए अपने दलसहित इनद्रका निर्माण
क्रिया था, जो पूर्णचन्द्रके समान प्रकाशित हो रहे
थे॥ २५-२६॥
हे देवर्षे! बहुत कहनेसे क्या लाभ ? विश्वकर्मानि
हिमालयसे प्रेरित होकर सम्पूर्ण देवसमाजकी शीघ्र ही
रचना की थी। इस प्रकार दिव्य रूपसे युक्त,
देवताओंको मोहित करनेवाले तथा अनेक आश्चर्योसे
परिपूर्ण उस विशाल मण्डपका निर्माण विश्वकर्मानि
किया॥ २७-२८॥
इसके अनन्तर महाबुद्धिमान् विश्वकर्माने
हिमालयकी आज्ञा पाकर देवताओं आदिके निवासके
लिये यलपूर्वक उनके लोकोंकी रचना की॥ २९॥
६५६
श्रीशिवमहापुराण
[अ OR.
तत्रैव च महामञ्चाः सुप्रभाः परमाद्ुताः।
रचिता: सुखदा दिव्यास्तेषां वै विश्वकर्मणा ॥ ३०
तथा स सत्यलोकं वै विरेचे क्षणतोऽद्भुतम्।
दीप्त्या परमया युक्तं निवासार्थं स्वयम्भुवः॥ ३१
तथैव विष्णोस्त्वपरं वैकुण्ठाख्यं महोज्ज्वलम्।
विरेचे क्षणतो दिव्यं नानाश्रर्यसमन्वितम्॥ ३२
अमरेशगृहं दिव्यं तथैवाद्भुतमुत्तमम्।
विरेचे विश्वकर्मासौ सर्वैश्वर्यसमन्वितम्॥ ३३
गृहाणि लोकपालानां विरेचे सुन्दराणि च।
तद्वत्स प्रीतितो दिव्यान्यदद्भुतानि महान्ति च॥ ३४
अन्येषाममराणां च सर्वेषां क्रमशस्तथा।
सदनानि विचित्राणि रचितानि च तेन वै॥ ३५
विश्वकर्मा महाबुद्धिः प्राप्तशम्भुमहावरः।
विरेचे क्षणतः सर्व शिवतुष्ट्यर्थमेब च॥ ३६
तथैव चित्रं परमं महोज्ज्वलं
महाप्रभं देववरैः सुपूजितम्।
गिरीशचिहं शिवलोकसंस्थितं
सुशोभितं शम्भुगृहं चकार॥ ३७
एवंभूता कृता तेन रचना विश्वकर्मणा।
विचित्रा शिवतुष्टयर्थं पराश्चर्या महोज्ज्वला ॥ ३८
एवं कृत्वाखिलं चेदं व्यवहारं च लौकिकम्।
पर्यैक्षिष्ट मुदा शम्भ्वागमनं स हिमाचल: ॥ ३९
इति प्रोक्तमशेषेण वृत्तान्तं प्रमुदाबहम्।
हिमालयस्य देवर्षे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ४०
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदरसंहितायां तृतीये पार्वगीखण्डे मण्डपादिरचनावर्णनं नामाष्त्रिशोऽ ध्यायः ॥ ३८
विश्वकर्मनि देवताओंको सुख देनेवाले; अल
प्रभावाले, परम आश्चर्यकारक तथा दिव्य मंचोंका १
निर्माण किया॥ ३०॥
उन्होंने ब्रह्माके निवासके लिये षण
परम दीप्तिसे युक्त अद्भुत सत्यलोककी रचना क
डाली ॥ ३१॥
उसी प्रकार उन्होंने विष्णुके लिये बैकुण्ठ जापक
स्थान क्षणमात्रमें बनाया, जो अति उज्ज्वल, दि
तथा नाना प्रकारके आश्चर्यसे युक्त था॥३२॥
उन विश्वकर्माने सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे युक्त,
अत्यन्त अद्भुत, दिव्य तथा उत्तम इन्द्रभवनका निर्माण
किया॥ ३३॥
उसी प्रकार उन्होंने लोकपालोंके लिये सुन्द,
दिव्य, अद्भुत तथा महान् गृहोंकी प्रीतिपूर्वक रचना
की॥ ३४॥
उन्होंने अन्य देवताओंके लिये क्रमश:
विचित्र गृहोंकी रचना की। शिवजीसे वर प्राण
करनेके कारण महानुद्धिमान् विश्वकर्माने क्षणभर
शिवजीकी प्रसन्नताके लिये सारे स्थानका निर्माण
किया॥ ३५-३६॥
उन्होंने शिवलोकमें रहनेवाले, परम उज्ज्वल
महान् प्रभाबाले, श्रेष्ठ देवताओंसे पूजित, गिरीशके
चिहोंसे युक्त तथा शोभासम्पन्न शिवगृहका तिमे
किया॥ ३७॥
उन विशश्वकर्माने शिवजीकी प्रसननताके
लिये इस प्रकारकी विचित्र, परम आश्चर्य पुर
तथा परमोज्ज्वल रचना की थी। इस प्रकार क॑
सारा लौकिक व्यवहार करके वे हिमालय
प्रेमसे शिवके आगमनकी प्रतीक्षा के ती
हे देवर्षे! मैंने हिमालयका आनन्ददायक व
पूर्णरूपसे कह दिया, अब आप और क्या
चाहते हैं ?॥ ३८--४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके यार्वतीखण्डमे
ie तृतीय पार्वतीखण्डमें
मण्डपादिरचनावर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
Tee
अ० ३९]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
६५७
भगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन
तथा शिवका मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे बाहर निकलना
नारद उवाच
विधे तात महाप्राज्ञ विष्णुशिष्य नमोऽस्तु ते।
अद्भुतेयं कथाश्रावि त्वत्तोऽस्माभिः कृपानिधे॥ १
इदानीं श्रोतुमिच्छामि चरितं शशिमौलिनः।
वैवाहिकं सुमाङ्गल्यं सर्वाघौघविनाशनम्॥ २
किं चकार महादेवः प्राप्य मङ्गलपत्रिकाम्।
तां श्रावय कथां दिव्यां शङ्करस्य परात्मनः॥ ३
ब्रह्मोवाच
श्रृणु वत्स महाप्राज्ञ शाङ्करं परमं यशः।
यच्चकार महादेवः प्राप्य मङ्गलपत्रिकाम्॥ ४
अथ शम्भुर्गृहीत्वा तां मुदा मङ्गलपत्रिकाम्।
विजहास प्रहृष्टात्मा मानं तेषां व्यधाद्विभुः॥ ५
वाचयित्वा च तां सम्यरस्वीचकार विधानतः ।
तजनान्यापयामास बहुसम्मान्य चादृत:॥ ६
उवाच मुनिवर्गास्तान्कार्य सम्यक् कृतं शुभम्
आगन्तव्यं विवाहे मे विवाहः स्वीकृतो मया॥ ७
इत्याकर्ण्यं बच: शम्भोः प्रहष्टास्ते प्रणम्य तम्।
परिक्रम्य ययुर्धाम शंसन्तः स्वं विधिं परम्॥ ८
अथ देवेश्वरः शम्भुः सामरस्तवां मने बरुतम्।
लौकिकाचारमाश्रित्य महालीलाकरः प्रभुः ॥ ९
मागतः परप्रीत्या प्रशंसंस्त्वं विधिं परम्।
'णमंश्च नतस्कन्धो विनीतात्मा कृताञ्जलिः ॥ १०
अस्तोस्सुजयशब्दानि समुच्चार्य मुहुर्मुहुः
नारदजी बोले-हे विष्णुशिष्य! हे महाप्राज्ञ!
हे तात! हे विधे! आपको प्रणाम है। हे कृपानिधे!
हमलोगोंने आपसे यह अद्भुत कथा सुनी। अब मैं
शिवजीके वैवाहिक चरित्रको सुनना चाहता हूँ, जो
परम मंगलदायक तथा सब प्रकारकी पापणाशिका
विनाश करनेवाला है॥ १-२॥
मंगलपत्रिका प्राप्त करनेके बाद महादेवजीने
क्या किया? परमात्मा शिवजीकी वह दिव्य कथा
सुनाइये॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले-हे वत्स! हे महाप्राज्ञ!
महादेवजीने मंगलपत्रिका प्राप्त करनेके पश्चात् जो
किया, भगवान् शंकरके उस यशको सुनिये॥ ४॥
विभु शिवजी प्रसन्नतापूर्वक मंगलपत्रिका ग्रहणकर
जोरसे हँसे और उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर उन लग्नपत्रिका
लानेवालोंका बड़ा स्वागत-सम्मान किया॥ ५॥
उन्होंने उस लग्नपत्रिकाको सम्यक् पढ़कर
विधि-विधानसे स्वीकार किया तथा उन लोगोंको
आदरसे बहुत सम्मानितकर विदा कर दिया। उन्होंने
सप्तर्षियोसे कहा कि आपलोगोंने यह परम कल्याणकारी
कार्य ठीकसे सम्पन्न किया। अब मैंने विवाह स्वीकार
कर लिया है, अतः मेरे विवाहमें आपलोग [ अवश्य]
आइयेगा॥ ६-७॥
शिवजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर वे परम
प्रसन्न हो गये और उनको प्रणामकर तथा उनकी
प्रदक्षिणा करके अपने परम भाग्यकी सराहना करते
हुए अपने घर चले गये। हे मुने! तब महान् लीला
करनेवाले, देवताओंके सहित देवेश्वर प्रभु शिवजीने
लौकिकाचारका आश्रयण करते हुए शीघ्र आपका
स्मरण किया॥८-९॥
उस समय आप अपने सौभाग्यकी प्रशंसा करते
हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आये और हाथ
जोड़कर सिर झुकाकर विनम्रतासे उन्हें प्रणाम करते
हुए बारम्बार 'जय' शब्दका उच्चारण करके आपने
६५८
श्रीशिबमहापुराण
[अ का. RN
निदेशं प्रार्थयंस्तस्य प्रशंसंस्त्वं विधिं मुने॥ ११
ततः शम्भुःप्हष्टात्मा दर्शयँल्लौकिकीं गतिम्।
उवाच मुनिवर्य त्वां प्रीणयन् शुभया गिरा॥ १२
शिव उवाच
परीत्या शृणु मुनिश्रेष्ठ ह्यस्मत्तोऽद्य वदामि ते।
ब्रुवे तत्त्वां प्रियो मे यद्भक्तराजशिरोमणिः॥ १३
कृतं महत्तपो देव्या पार्वत्या तव शासनात्।
तस्यै वरो मया दत्तः पतित्वे तोषितेन वै॥ १४
करिष्येऽहं विवाहं च तस्या वश्यो हि भक्तितः।
सपर्षिभिः साधितं च तल्लग्नं शोधितं च तैः॥ १५
अद्यतः सप्तमे चाह्नि तद्भविष्यति नारद।
महोत्सवं करिष्यामि लौकिकीं गतिमाश्रित:॥ १६
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य शंकरस्य परात्मनः।
प्रसन्नधीः प्रभुं नत्वा तात त्वं वाक्यमब्रवीः॥ १७
नारद उवाच
भवतस्तु ब्रतमिदं भक्तवश्यो भवान्मतः।
सम्यक् कृतं च भवता पार्वतीमानसेप्सितम्॥ १८
कार्य मत्सदृशं किञ्जित्कथनीयं त्वया विभो।
मत्वा स्वसेवकं मां हि कृपां कुरु नमोऽस्तु ते॥ १९
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तस्तु त्वया शम्भुः शंकरो भक्तवत्सलः।
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा सादरं त्वां मुनीश्वर॥ २०
शिव उवाच
विष्णुप्रभृतिदेवांश्च मुनीन् सिद्धानपि ्रुवम्।
त्वं त्तिमन्त्रय मद्राण्या मुनेऽन्यानपि सर्वतः॥ २१
सर्व आयान्तु सोत्साहाः सर्वशोभासमन्विताः।
सस्त्रीसुतगणाः प्रीत्या मम शासनगौरवात्॥ २२
उनकी स्तुति की। हे मुने! उसके बाद अपने भाक
प्रशंसा करते हुए शिवजीसे आज्ञा प्रदान करनेके व
आपने निवेदन किया॥ १०-११॥
हे मुनिवर! तब प्रसन्नचित्त होकर लौकिक
गतिको दिखाते हुए शुभ वचनोंसे आपको प्रसने
करते हुए शिवजी कहने लगे--॥ १२॥
शिवजी बोले--हे मुनिश्रेष्ठ! मैं जो कहत
हूँ, उसे प्रेमपूर्वक सुनिये। आप मेरे परमप्रिय तथा
भक्तराजशिरोमणि हैं, इसलिये आपसे कहता हूँ॥ १३|
आपकी आज्ञासे पार्वतीने जिस प्रकारकी महाग
तपस्या की थी, उससे सन्तुष्ट होकर मैंने उसे पति
बननेके लिये वरदान दे दिया है॥ १४॥
मैं उसकी भक्तिके वशीभूत होकर अब विबाह
करना चाहता हूँ। सप्तर्षियोंने सारा कार्य सम्पन्न का
दिया है और विवाहका लग्न भी निश्चित कर दिया
है॥ १५॥
हे नारद! वह विवाह आजके सातवें दिन होगा
मैं लोकरीतिका आश्रय लेकर [वैवाहिक] महोत्सव
करूँगा॥ १६॥
ब्रह्माजी बोले--हे तात! इस प्रकार परमात्मा
शंकरका वचन सुनकर आप परम प्रसन हो उग
प्रभुको प्रणाम करके यह वचन कहने लगे--॥ १४॥
नारदजी बोले--आपका यह ब्रत है कि आ
भक्तोके अधीन रहते हैं और ऐसा सभीका मत भी है
इसलिये आपने यह उचित ही किया; क्योंकि
यही चाहती भी थीं। हे विभो ! अब मेरे योग्य जो कॉ
कार्य हो, आप मुझे बताइये, आपको प्रणाम है, आ.
मुझे अपना सेवक मानकर कृपा कीजिये ॥ १८११
ब्रह्माजी बोले है मुनीश्वर! जब आपने
इस प्रकार कहा, तब भक्तवत्सल शिवजी रसत्व
होकर आदरपूर्वक आपसे कहने लगे= ॥ २०॥
शिवजी बोले--हे मुने! आप i
विष्णु आदि देवों, मुनियों, सिद्धों तथा अन्य
भी चारों ओर निमन्त्रण दीजिये | मेरी हे
हुए उपर्युक्त सभी लोग उत्साह तथा शोभा हे
अपनी स्त्री, पुत्र तथा गणोंके सहित इस
आयें॥ २१-२२॥
अ० ३९]
नागमिष्यन्ति ये त्वत्र मद्विवाहोत्सवे मुने।
ते स्वकीया न मन्तव्या मया देवादयः खलु॥ २३
ब्रह्मोवाच
इतीशाज्ञा ततो धृत्वा भवान् शङ्करवल्लभः।
सर्वान्निमन्त्रयामास तं तं गत्वा द्रुतं मुने॥ २४
शम्भूपकण्ठमागत्य द्रुतं मुनिवरो भवान्।
तद् हूत्यात्तत्र सन्तस्थौ तदाज्ञां प्राप्य नारद॥ २५
शिवोऽपि तस्थौ सोत्कण्ठस्तदागमनलालसः।
स्वगणैः सोत्सवैः सवैरनृत्यद्भिः सर्वतो दिशम्॥ २६
एतस्मिन्नेव काले तु रचयित्वा स्ववेषकम्।
आजगामाच्युतः शीघ्रं कैलासं सपरिच्छदः॥ २७
शिवं प्रणम्य सद्भक्त्या सदारः सदलो मुदा।
तदाज्ञां प्राप्य सन्तस्थौ सुस्थाने प्रीतमानसः ॥ २८
तथाहं स्वगणैराशु कैलासमगमं मुदा।
प्रभुं प्रणम्यातिष्ठं वे सानन्दः स्वगणान्वितः॥ २९
इन्रादयो लोकपाला आययुः सपरिच्छदाः।
तथैवालंकृतास्सर्वे सोत्सवास्सकलत्रकाः ॥ ३०
तथैवं मुनयो नागास्सिद्धा उपसुरास्तथा।
आययुश्चापरेऽपीह सोत्सवाः सुनिमन्त्रिताः॥ ३९
महेश्वरस्तदा तत्रागतानां च पृथक् पृथक्।
स्वेषाममराद्यानां सत्कारं व्यदधान्मुदा॥ ३२
अथोत्सवो महानासीत्कैलासे परमोऽद्भुतः।
गेत्यादिके तदा चक्रुर्यथायोग्यं सुरस्त्रियः ॥ ३३
एतस्मिन्समये देवा विष्ण्वाद्या ये समागताः।
तरां कारयितुं शम्भोस्तत्रोषुस्तेऽखिला मुने॥ ३४
शिवाज्ञप्तास्तदा सर्वे मदीयमिति यन्त्रिताः।
शिवकार्यमिदं सर्व चक्रिरे शिवसेवतम्॥ ३५
भातर: सप्त तास्तत्र शिवभूषाविधिं परम्!
च मुदा युक्ता यथायोग्यं तथा पुनः ॥ २६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६५९
हे मुने! जो इस विवाहोत्सवमें सम्मिलित नहीं
होंगे, उन्हें में अपना नहीं मानूँगा, चाहे वे देवता ही
क्यों न हों॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! ईश्वरकी इस आज्ञाको
स्वीकार करके शिवप्रिय आपने शीघ्रतासे उन-उनके
यहाँ जाकर सबको निमन्त्रण दे दिया॥ २४॥
हे नारद! इस प्रकार शिवजीके दूतका कार्य
शीघ्रतासे सम्पन्नकर शिवजीके पास आकर आप मुनिवर
उनको आज्ञासे वहीं बैठ गये। शिवजी भी उन लोगोंके
आगमनको प्रतीक्षा करने लगे। उनके गण सभी जगह
नृत्य-गान-पूर्वक उत्सव करने लगे॥ २५-२६॥
इसी समय अत्यन्त सुन्दर वेश-भूषासे सुसज्जित
होकर भगवान् विष्णु अपने परिकरोंके साथ कैलास
आये॥ २७॥
वे अपनी भार्या तथा पार्षदोंके साथ भक्तिपूर्वक
प्रणामकर उनकी आज्ञा प्राप्त करके प्रसन्नचित्त हो बैठ
गये। उसके बाद मैं भी अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक
कैलासपर्वतपर गया और प्रभुको प्रणाम करके अपने
गणोंसहित आनन्दित हो बैठ गया॥ २८-२९॥
इन्द्र आदि लोकपाल भी अपनी पत्नियों तथा
सेवकोंके सहित नाना प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत
हो उत्सव मनाते हुए वहाँ आये॥ ३०॥
इसी प्रकार निमन्त्रित मुनि, नाग, सिद्ध तथा
उपदेव एवं अन्य दूसरे लोग भी वहाँ आये॥ ३१॥
उस समय महेश्वरने वहाँ आये उन सभी देवता
आदिका प्रसन्नतासे पृथक्-पृथक् सत्कार किया॥ ३२॥
उस समय कैलासपर देवस्त्रयोंने यथायोग्य नृत्य
आदि करना प्रारम्भ कर दिया तथा वहाँ अद्भुत एवं
महान् उत्सव होने लगा॥ ३३॥
हे मुने! इसी समय जो विष्णु आदि देवगण
शिवके यहाँ आये हुए थे, वे सब शिवकी वरयात्राकी
तैयारी करानेके लिये प्रसन्नतासे निवास करने लगे ॥ ३४॥
उस समय शिवजीकी आज्ञासे आये हुए सभी
लोग शिवजीके कार्यको यह मेरा ही कार्य है--ऐसा
समझकर शिवकी सेवा करने लगे॥ ३५॥
सप्तमातृकाओंने शिवजीके विवाहका दूलह वेष
बड़े प्रेमसे शिवजीके अनुरूप सजाया॥ ३६॥
६६०
श्रीशिवमहापुराण
[ शा :ख:+ श
तस्य स्वाभाविको वेषो भूषाविधिरभूत्तदा।
तस्येच्छया मुनिश्रेष्ठ परमेशस्य सुप्रभोः॥
चन्द्रश्च मुकुटस्थाने सान्निध्यमकरोत्तदा।
लोचनं सुन्दरं ह्यासीत्ततीयं तिलकं शुभम्॥ ३८
कर्णाभरणरूपौ च यौ हि सपौं प्रकीर्तितो।
कुण्डलेऽभवतां तस्य नानारलान्विते मुने॥ ३९
अन्याङ्गसंस्थिताः सर्पाः तदङ्ाभरणानि च।
बभूबुरतिरम्याणि नानारलमयानि च॥ ४०
विभूतिरंगरागोऽभूच्चन्दनादिसमुद्भवः ।
तहुकूलमभूद्दिव्य॑ गजचर्मादि सुन्दरम्॥ ४१
ईदृशं सुन्दरं रूपं जातं वर्णातिदुष्करम्।
ईश्वरोऽपि स्वयं साक्षादैश्वर्य लब्धवान् स्वतः ॥ ४२
ततश्च सर्वे सुरपक्षदानवा
नागाः पतङ्गाप्सरसो महर्षयः।
समेत्य सर्वे शिवसन्निधिं तदा
महोत्सवाः ग्रोचुरहो मुदान्विताः॥ ४३
सर्व ऊचुः
गच्छ गच्छ महादेव विवाहार्थ महेश्वर।
. गिरिजाया महादेव्याः सहास्माभिः कृपां कुरु॥ ४४
ततो विष्णुरुवाचेदं प्रस्तावसदृशं वचः।
प्रणम्य शंकरं भक्त्या विज्ञानप्रीतमानसः॥ ४५
विष्णुरुवाच
देवदेव महादेव शरणागतवत्सल।
कार्यकर्ता स्वभक्तानां विज्ञप्ति शृणु मे प्रभो॥ ४६
गृह्योक्तविधिना शम्भो स्वविवाहस्य शंकर।
गिरीशसुतया देव्या कर्म कर्तुमिहाहसि॥ ४७
त्वया च क्रियमाणे तु विवाहस्य विधौ हर।
स एव हि तथा लोके सर्वः सुख्यातिमाप्नुयात्॥ ४८
मण्डपस्थापनं नान्दीमुखं तत्कुलधर्मतः ।
कारय प्रीतितो नाथ लोके स्वं ख्यापयन् यशः ॥ ४९ कीजिये
हे मुनिश्रेष्ठ! परमेश्वर प्रभुकी इच्छसे है
स्वाभाविक वेषको भूषणोंसे सजाया गया | रा
सप्तमातृकाओंने मुकुटे स्थानपर ज्म |
बाँध दिया। उनके ललारमें रहनेवाला तीसरा $
तिलकरूपसे शोभित किया गया॥ ३८॥
हे मुने! नाना रलोंसे देदीप्यमान दोसा
दोनों कानोंको अलंकृत करनेवाले कुण्डलके क्म
शोभित हुए॥ ३९॥
उनके अंगमें निवास करनेवाले अन्य सर्प अक
रलोसे युक्त आभूषणोंके समान सुशोभित हुए॥ ४
उनके शरीरमें लगी हुई विभूति चन्दनादि पदा
उत्पन्न उत्तम अंगराग हो गया। उनका परम मुद्धा
गजचर्म दिव्य दुकूलके समान हो गया॥४१॥
उस समय शिवजीका ऐसा सुन्दर रूप हो गय,
जो अवर्णनीय था। वे साक्षात् ईश्वर हैं, अत: उन्ह
सभी ऐश्वर्य धारण कर लिया था। उस समय सभ
देवता, दानव, नाग, पन्नग, अप्सराएँ तथा महि
उत्सवसे युक्त होकर शिवजीके समीप जाकर प्रसत
हो कहने लगे॥ ४२-४३॥
सभी लोग कहने लगे--हे महादेव! हे
महेश्वर। हिमालयपुत्री महादेवी पाबंतीसे विवाह
करनेके लिये आप हम सभीके साथ कृपाएूर्व्
प्रस्थान करें॥ ४४॥
तदुपरान्त शिवतत्त्वको जाननेके कारण प्रसर
चित्तवाले विष्णुने भक्तिपूर्वक शिवजीको प्रणाम
उस प्रस्तावके अनुरूप कहना प्रारम्भ किया॥ ४
विष्णु बोले-हे देवदेव! हे महादेव! र
शरणागतवत्सल! आप आपने भक्तोंका मनोरथ प
करनेवाले हैं। अत: हे प्रभो! मेरा निवेदन सुनें॥ ६
हे शम्भो! हे शंकर! आप गृह्यसूत्रकी
गिरीशसुता देवी पार्वतीके साथ अपने विवाहका
कीजियें। हे हर! यदि आप गृह्मसूत्रकी वि
विवाहकर्म करेंगे, तो सारे लोकमें इसी वाद
विवाहकी विधि प्रसिद्ध हो जायगी। हे ताथ! ६
आप अपने यशकी घोषणा करते हुए कुल
अनुसार मण्डपस्थापन तथा जान्दीमुखः कृत्य
॥ ४७४९ ||
आ० ३९ |
ब्रह्मोवाच
एवमुक्तस्तदा शम्भुर्विष्णुना परमेश्वर: ।
लौकिकाचारनिरतो विधिना तच्चकार स: ॥ ५०
अहं ह्यधिकृतस्तेन सर्वमभ्युदयोचितम्।
अकुर्व मुनिभिः प्रीत्या तत्र तत्कर्म चादरात्॥ ५१
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो भागुरिर्गुरुः।
कण्वो बृहस्पतिः शक्तिर्जमदग्निः पराशरः॥ ५२
मार्कण्डेयश्शिलापाकोऽरूणपालोऽकृतश्रमः।
अगस्त्यश्च्यवनो गर्गश्शिलादोऽथ महामुने॥ ५३
दधीचिरुपमन्युश्च भरद्वाजोऽकृतब्रणः।
पिपलादो5थ कुशिकः कौत्सो व्यासः सशिष्यकः॥ ५४
एते चान्ये च बहव आगताश्शिवसन्निधिम्।
मया सुनोदितास्तत्र चक्रुस्ते विधिवत्क्रियाम्॥ ५५
वेदोक्तविधिना सर्वे वेदवेदाङ्गपारगाः।
रक्षां चक्रुमहेशस्य कृत्वा कौतुकमङ्गलम्॥ ५६
ऋग्यजुस्सामसूक्तैस्तु तथा नानाविधैः परैः।
मङ्गलानि च भूरीणि चक्रुः परीत्यर्षयोऽखिलाः ॥ ५७
ग्रहाणां पूजनं प्रीत्या चक्रुस्ते शम्भुना मया।
मण्डलस्थसुराणां च सर्वेषां विघ्नशान्तये॥ ५८
ततश्शिवः सुसन्तुष्टः कृत्वा सर्वं यथोचितम्।
लौकिकं वैदिकं कर्म ननाम च मुदा द्विजान्॥ ५९
अथ सर्वेश्वरो विप्रान्देवान्कृत्वा पुरस्सरान्।
निस्ससार मुदा तस्मात्कैलासात्पर्वतोत्तमात्॥ ६०
बहिः केलासकुधराच्छम्भुस्तस्थौ मुदान्वितः ।
देवैः सह द्विजैश्चैव नानास्वीकारकः प्रभुः ॥ ६१
तेदोत्सबो महानासीत्तत्र देवादिभिः कृतः।
सनुष्टयर्थं महेशस्य गानवाद्यसुनृत्यकः॥ ६२
त श्रोशिवमहापुरणे द्वितीयायां खसहितायां तीये पर्वरीखण्डे
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत
देवागमन,
रद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६६१
ब्रह्माजी बोले--विष्णुके द्वारा इस प्रकार कहे
जानेपर परमेश्वर शंकरजीने समस्त लौकिकाचार मुझ
ब्रह्माके द्वारा सम्पन्न करवाया। [हे नारद्!] उन्होंने
सारे अभ्युदयका कार्यभार मेरे ऊपर सौंप दिया और
मैंने भी मुनियोंके साथ प्रेमपूर्वक सभी कृत्योंको पूरा
किया॥ ५०-५१॥
हे महामुने! कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम,
भागुरि, गुरु, कण्व, बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि,
पराशर, मार्कण्डेय, शिलापाक, अरुणपाल, अकृतश्रम,
आगस्त्य, च्यवन, गर्ग, शिलाद, दधीचि, उपमन्यु,
भ्राज, अकृतव्रण, पिप्पलाद, कुशिक, कौत्स, शिष्योंके
सहित व्यास-ये तथा अन्य बहुत-से ऋषिगण
शिवजीके समीप आये और मेरी प्रेरणासे उन्होंने
विधिवत् क्रिया सम्पन्न की ॥ ५२-५५॥
वेद-वेदांगके पारगामी उन ऋषियोंने शिवजीका
समस्त कौतुक-मंगलकर वेदरीतिके अनुसार उनकी
रक्षाका विधान किया। उन सम्पूर्ण ऋषियोंने ऋक्,
यजुः, साम एवं अन्य जाना प्रकारके रक्षोघ्नसूक्तोसे
अनेक प्रकारसे मंगलपाठ किये । उन्होंने विघ्नशान्तिके
लिये मुझसे तथा श्रीशिवजीसे मण्डपस्थ देवताओं
तथा समस्त ग्रहोंका पूजन करवाया | ५६-५८॥
इस प्रकार शिवजीने प्रसन्न होकर समस्त
लौकिक कुलाचार तथा वैदिक विधिका सम्पादनकर
प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको प्रणाम किया। उसके
बाद देवताओं और ब्राह्मणोंको आगेकर सर्वेश्वर
शिवजी अपने पर्वतोत्तम कैलाससे प्रसन्नतापूर्वक
चले ॥ ५९-६० ॥
लीला करनेमें प्रवीण वे शिवजी उन देवताओं
तथा ब्राह्मणोंक साथ कैलासके बहिर्भागमें आकर
प्रेमसे स्थित हो गये॥ ६१॥
देवताओंने उस समय महेशकी प्रसन्नताके लिये
अनेक प्रकारके गाने-बजाने तथा नृत्य-सम्बन्धी अनेक
प्रकारके उत्सव किये॥ ६२॥
देवतिमत्रणदेवागमनशिवयात्रवर्णन नामैकोनचत्वारिंशोठ ध्याय: ॥ ३९॥
देवनिमित्रणदेवागमनशिवयात्रावर्णने
द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवनिमन्वण,
नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
->><<२५०५०५५-7
६६२
श्रीशिवमहापुराण
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः
[ INI %
पम
शिवबरातकी शोभा, भगवान् शिवका बरात लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान
ब्रह्मोवाच
अथ शम्भुः समाहूय नन्द्यादीन्सकलानाणान्।
आज्ञापयामास मुदा गन्तुं स्वेन च तत्र बै॥ १
शिव उवाच
अपि यूयं सह मया सङ्कच्छध्वं गिरेः पुरम्।
कियद्रणानिहास्थाप्य महोत्सवपुरस्सरम्॥ २
ब्रह्मोवाच
अथ ते समनुज्ञा गणेशा निर्ययुर्मुदा।
स्वं स्वं बलमुपादाय तान् कथंचिद्ददाम्यहम्॥ ३
अभ्यगाच्छंखकर्णश्च गणकोट्या गणेश्वरः ।
शिवेन सार्धे सङ्गन्तुं हिमाचलपुरं प्रति॥ ४
दशकोट्या केकराक्षो गणानां स महोत्सवः ।
अष्टकोट्या च विकृतो गणानां गणनायकः॥ ५
चतुष्कोट्या विशाखश्च गणानां गणनायकः ।
पारिजातश्च नवभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः॥ ६
षष्टिः सर्वान्तकः श्रीमान् तथैव विकृतानन: ।
गणानां दुन्दुभोऽष्टाभिः कोटिभिर्गणनायक:॥ ७
पञ्चभिश्च कपालाख्यो गणेश: कोटिभिस्तथा।
षड्भिस्सन्दारको वीरो गणानां कोटिभिर्मुने॥ ८
कोटिकोटिभिरेवेह कन्दुकः कुण्डकस्तथा।
विष्टम्भो गाणपोऽष्टाभिगंणानां कोटिभिस्तथा॥ ९
सहस्त्रकोट्या गणपः पिप्पलो मुदितो ययौ।
तथा सनादको वीरो गणेशो मुनिसत्तम॥ १०
आवेशनस्तथाष्टाभिः कोटिभिर्गणनायकः।
महाकेश: सहस्रेण कोटीनां गणपो ययौ॥ ११
कुण्डो द्वादशकोट्या हि तथा पर्वतको मुने।
अष्टाभिः कोटिभिर्वीरः समगाच्चन्द्रतापनः॥ १२
कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन चै।
कोटीनां गणनाथो हि तथैवाग्निकनामक:॥ १३
ब्रह्माजी बोले तदनन्तर भगवान् शमभु
आदि सब गणोंको बुलाकर अपने साथ उन्हें कं
चलनेकी आज्ञा दी ॥ १॥ क
शिवजी बोले--तुमलोग कुछ गणोंको कं
रोककर महोत्सव करते हुए मेरे साथ हिमाचलपुरभे
चलो॥ २॥
ब्रह्माजी बोले--शिवजीकी आज्ञा पाकर सभ
गणेश्वर अपनी-अपनी टोली लेकर प्रसन्नतापूर्वक चलो
लगे, मैं कुछ अंशमें उनका वर्णन करता हुँ-॥३॥
शंखकर्ण नामक गणेश्वर अपने एक केइ
गणोंसहित शिवजीके साथ हिमालयपुरीको चलनेके लिग
उद्यत हुआ। केकराक्ष नामक गणराज दस करोड़ गणेके
साथ महान् उत्सवसे चला। इसी प्रकार विकृत नामक
गणराज भी आठ करोड़ गणोंके साथ चला॥ ४५॥
गणनायक विशाख चार करोड़ गणोंके साथ तथ
गणश्रेष्ठ पारिजात नौ करोड़ गणोंके साथ चले॥६।
श्रीमान् सर्वान्तक तथा विकृतानन साठ-सा
करोड़ गण लेकर चले। दुन्दुभ नामक गणनायक
आठ करोड़ गणोंके साथ चला। हे मुने! कपाल नाम
गणेश्वर पाँच करोड़ गणोंके साथ और वीर सब्द
छः करोड़ गणोंको साथ लेकर चले ॥ ७:८॥ ee
कन्दुक तथा कुण्डक एक-एक करोड़ ग
साथ और गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ गणोके स
चले॥ ९॥
हे मुनिसत्तम! पिप्पल नामक गणेश्वर रश
सहस्रकोटि गणोंके साथ और इतने ही गणोंके सॉ
बौर गणेश्वर सनादक प्रसन्नतापूर्वक चले॥ १०॥
गणेश्वर आवेशन आठ करोड़ गणोंके साथ
कोटि गणोके साथ चले ॥ १९
हे मुने! इसी प्रकार कुण्ड और प
करोड़ गणोंको तथा वीर चन्द्रतापन आठ %
गणोंको साथ लेकर चले॥ १२॥
काल, कालक, महाकाल तथा अग्निक
॥
गणनायक सौ-सौ करोड़ गणोंको साथ लेकर चली *
अ० ४० ]
कोट्यग्रिमुख एवागाद् गणानां गणनायक: ।
आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चेव घनावह:॥ १४
सन्नाहः शतकोट्या हि कुमुदो गणपस्तथा।
अम्रोघः कोकिलश्चैव शतकोट्या गणाधिपः ॥ १५
सुमनः 'कोटिकोट्या च गणानां गणनायक: ।
काकपादोदरः कोटिषष्ट्या सन्तानकस्तथा॥ १६
महाबलश्च नवभिर्मधुपिङ्गश्च कोकिलः।
नीलो नवत्या कोटीनां पूर्णभद्रस्तथैव च॥ १७
सप्तकोट्या चतुर्वक्त्र: करणो विंशकोटिभि: ।
यबौ नवतिकोट्या तु गणेशानोऽहिरोमकः॥ १८
यज्चाक्षः शतमन्युश्च मेघमन्युश्च नारद।
तावत्कोट्या ययुः सर्वे गणेशा हि पृथक् पृथक् ॥ १९
काष्ठाङ्गुषठश्चतुःषष्ट्या कोटीनां गणनायकः।
विरूपाक्ष: सुकेशश्च वृषभश्च सनातनः॥ २०
तालकेतुः षडास्यश्च चञ्च्चास्यश्च सनातनः।
संवर्तकस्तथा चैत्रो लकुलीशः स्वयम्प्रभुः॥ २१
लोकान्तकश्च दीप्तात्मा तथा दैत्यान्तको मुने।
देवो भृंगिरिटिः श्रीमान्देवदेवप्रियस्तथा॥ २२
अशनिर्भानुकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रशः।
ययुः शिवविवाहार्थं शिवेन सहसोत्सवाः॥ २३
भूतकोटिसहस्रेण प्रमथाः कोटिभिस्त्रिभिः ।
बोरभद्रश्वतुःषष्ट्या रोमजानान्त्रिकोटिभिः॥ २४
कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विशतिभिर्वृताः।
तत्र जग्मुश्च नन्द्याद्या गणपाः शंकरोत्सवे॥ २५
क्षेत्रपालो भैरवश्च॒ कोटिकोटिगण्युतः।
उद्वाहः शंकरस्येत्याययौ प्रीत्या महोत्सवः ॥ २६
एते चान्ये च गणपा असङ्ख्याता महाबलाः।
त्र जम्मुमहाप्रीत्या सोत्साहा: शंकरोत्सवे॥ २७
सर्वे ;
सहस्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः।
चेन्रेखाबतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः ॥ २८
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६६३
इसी प्रकार अग्निमुख, आदित्यमूर्धा तथा घनावह
एक-एक करोड़ गणोंको साथ लेकर चले ॥ १४॥
सन्नाह, कुमुद, अमोघ और कोकिल नामक
गणराज सौ-सौ करोड़ गण लेकर चले। गणाध्यक्ष सुमन्त्र
करोड़ों-करोड़ों गणोंको लेकर तथा काकपादोदर एवं
सन्तानक साठ करोड़ गणोंको लेकर चले ॥ १५-१६॥
महाबल नौ करोड़ और मधुपिंग, कोकिल, नील
तथा पूर्णभद्र नब्त्रे करोड़ गणोंके साथ चले॥ १७॥
चतुर्वक्त्र सात करोड़, करण बीस करोड़ तथा
गणेश्वर नब्बे करोड़ गणोंके साथ चले॥ १८॥
इसी प्रकार हे नारद! यज्चाक्ष, शतमन्यु एवं
मेघमन्यु-ये सभी गणेश्वर नब्बे-नब्बे करोड़ गणोंके
साथ पृथक्-पृथक् चले॥ १९॥
गणनायक काष्ठांगुष्ठ, विरूपाक्ष, सुकेश, सनातन
और वृषभ चौंसठ करोड़ गणोंके साथ चले॥ २०॥
हे मुने! तालकेतु, षण्मुख, चंचुमुख, सनातन,
संवर्तक, चैत्र, लकुलीश, स्वयंप्रभु, लोकान्तक,
दीप्तात्मा, दैत्यान्तक, देव भृंगिरिटि, श्रीमान्, देवदेवप्रिय,
अशनि, भानुक आदि चौंसठ हजार गणोंके साथ बड़े
उत्साहसे शिवजीके विवाहके लिये उनके साथ
चले॥ २१-२३॥
प्रमथगण सहस्रों भूतगणोंके साथ तथा तीन
करोड़ अपने गणोंके साथ चले। वीरभद्र चौंसठ
करोड़ गणोंके साथ तथा तीन करोड़ रोमज प्रेतगणोंको
साथ लेकर चले॥ २४॥
इसी प्रकार नन्दी आदि गणेश्वर भी एक
सौ बीस हजार करोड़ गणोंसे युक्त होकर शंकरके
उत्सवमें चले॥ २५॥
यह शंकरका विवाह-महोत्सव है--ऐसा जानकर
क्षेत्रपाल, भैरव करोड़-करोड़ गणोंके साथ प्रीतिपूर्वक
आये। ये गण तथा शिवके असंख्य गण जो अत्यन्त
बलवान् थे, वे उत्साह तथा प्रीतिसे युक्त हो शिवजीके
विवाहोत्सवमें वहाँ गये॥ २६-२७॥
इन सभी गणेश्वरोंके हजारों हाथ थे तथा
वे सिरपर जटामुकुट धारण किये हुए थे। वे
मस्तकपर चन्द्ररेखा धारण किये हुए थे, नीले
कण्ठसे युक्त थे तथा तीन नेत्रोंवाले थे। वे सब
६६४
रुद्राक्षाभरणाः सर्वे तथा सद्भस्मधारिणः।
हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलंकृताः ॥२९
ब्रह्मविष्णिवन्द्रसंकाशा अणिमादिगुणेर्युताः।
सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्र ¥रेजुर्गणेश्वराः॥ ३०
पृथिवीचारिणः केचित् केचित्पातालचारिणः।
केचिद्व्योमचराः केचित्सपस्वर्गचरा मुने॥ ३१
किं बहूक्तेन देवर्षे सर्वलोकनिवासिनः।
आययुः स्वगणाः शम्भोः प्रीत्या वै शङ्करोत्सवे॥ ३२
इत्थं देवेर्गणैश्रान्यैः सहितः शङ्करः प्रभुः ।
ययौ हिमगिरिपुरं विवाहार्थं निजस्य वै॥ ३३
यदा जगाम सर्वेशो विवाहार्थं सुरादिभिः।
तदा तत्र ह्यभूद् वृत्तं तच्छृणु त्वं मुनीश्वर॥ ३४
रुद्रस्य भगिनी भूत्वा चण्डी सूत्सवसंयुता।
तत्राजगाम सुप्रीत्या परेषां सुभयावहा॥ ३५
प्रेतासनसमारूढा सर्पाभरणभूषिता।
पूर्ण कलशमादाय हैमं मूर्धनि महाप्रभम्॥ ३६
स्वपरीवारसंयुक्ता दीप्तास्या दीप्तलोचना।
कुतूहलं प्रकुर्वन्ती जातहर्षां महाबला॥ ३७
तत्र भूतगणा दिव्या विरूपाः कोटिशो मुने।
विराजन्ते स्म बहुशः तथा जानाविधास्तदा॥ ३८
तैः समेताग्रतश्चण्डी जगाम विकृतानना।
कुतूहलान्विता प्रीता प्रीत्युपद्रवकारिणी॥ ३९
चण्ड्या सर्वे रुद्रगणाः पृष्ठतश्च कृतास्तदा।
कोट्येकादशसंख्याका रोद्रारद्रप्रियाश्च ते॥ ४०
तदा डमरुनिर्धोषेव्यातमासीज्जगतत्रयम्।
भेरीझंकारशब्देन शंखानां निनदेन च॥ ४१
श्रीशिवमहापुराण
[ = गज %
आभूषणके रूपमें रुद्राक्ष धारण किये हुए थे।
भस्म लगाये हुए थे। हार, कुण्डल, कह
मुकुटसे अलंकृत थे। इस प्रकार ब्रह्मा वि र
इनद्रके समान अणिमादि गुणोंसे अलंकृत कोटि र
समान देदीप्यमान वे सभी गणेश्वर शोभासे समि
थे॥ २८--३० ॥
हे मुने! इनमें कुछ पृथिवीप, कु
पातालमें चलनेवाले तथा कोई आकाशगामी तभ
कोई सप्तस्वर्गमें विचरण करनेवाले थे। हे देव [पं
बहुत वर्णन क्या करूँ, सभी लोकोंमें रहनाले ३
सभी गणेश्वर शिवके विवाहका महोत्सव देखो
लिये बड़े प्रेमसे आये॥ ३१-३२॥
इस प्रकार इन देवताओं तथा गणोंसे युक्त भावा
सदाशिवने अपना विवाह करनेके लिये हिमालय
नगरको प्रस्थान किया। हे मुनीश्वर! जिस सम
सर्वेश्वर शिवजी देवताओं एवं गणोंके साथ विवाहके
लिये चले, उस समयका वृत्तान्त सुनिये॥ ३३-३४।
शत्रुओंको भय देनेवाली चण्डी रुद्रकी भी |
बनकर उत्सव मनाती हुई बड़े प्रेमके साथ वही
आयी॥ ३५॥
वह चण्डी प्रेतके आसनपर सवार थी; सर्पी
आभूषण पहने हुई थी और सिरपर महादेदीप्यमा
जलपूर्ण कलश धारण किये हुई थी। वह अपी
परिवारसे युक्त थी। उसके मुख तथा नेत्रसे अमिक
ज्वाला निकल रही थी। वह बलशालिनी हषे दरण
होकर नाना प्रकारके कुतूहल कर रही थी॥ ३६२४४
हे मुने! वहाँ विकृत वेष धारण किये ह
अनेक प्रकारके करोड़ों दिव्य भूतगण शोभित
रहे थे॥३८॥
इन भूतगणोंको साथ लेकर ki
मुखवाली उपद्रवकारिणी वह चण्डी कुतूहल
हुई प्रसननतापूर्वक वहाँ गयी॥ ३९॥ व
उस चण्डीने रुद्रमें अनन्य प्रीति का
Cl हजार करोड़ रुद्रगणोंको अपने पीछे
लया॥ ४०॥
उस समय डमरूके शब्द, भेरियोंकी गा
और शंखोंके नादसे तीनों लोक गूँज रहे थे॥
अ० ४०]
तदा दुन्दुभिनिर्घोषेः शब्दः 'कोलाहलो$भवत्।
कर्वज्ञगन्मङ्गलं च नाशयेन्मङ्गलेतरत्॥ ४२
गणानां पृष्ठतो भूत्वा सर्वे देवाः समुत्सुकाः ।
अन्वयुः सर्वसिद्धाश्च लोकपालादिका मुने॥ ४३
मध्ये व्रजन् रमेशोऽथ गरुडासनमाश्रितः।
शुशुभे श्रियमाणेन छत्रेण महता मुने॥ ४४
चामरैवीज्यमानोऽसौ स्वगणैः परिवारितः।
पार्षदैर्विलसद्भिश्च स्वभूषाविधिभूषितः॥ ४५
तथाहमप्यशोभं वै व्रजन्मार्गे विराजितः।
वेदमूर्तिधरैः शास्त्रैः पुराणैरागमैस्तथा॥ ४६
सनकादिमहासिद्धैः सप्रजापतिभिः सुतैः।
परिवारैः संयुतो हि शिवसेवनतत्परः॥ ४७
स्वसैन्यमध्यगः शक्र ऐरावतगजस्थितः।
जानाविभूषितोऽत्यन्तं व्रजन् रेजे सुरेश्वरः॥ ४८
तदा तु व्रजमानास्ते ऋषयो बहवश्च ते।
विरेजुरतिसोत्कण्ठाः शिवस्योद्वाहनं प्रति॥ ४९
शाकिन्यो यातुधानाश्च वेतालाब्रह्मराक्षसाः।
भूतप्रेतपिशाचाश्च॒ तथान्ये प्रमथादय: ॥ ५०
तुम्बुरुर्नारदो हाहाहूहूश्रेत्यादयो वराः।
गन्धर्वा: किन्नरा जममुर्वाद्यानाध्माय हर्षिताः॥ ५१
जगतो मातरः सर्वा देवकन्याश्च सर्वशः।
गायत्री चैव सावित्री लक्ष्मीरन्याः सुरस्त्रियः ५२
एताश्चान्याश्च देवानां पलयो भवमातरः।
उद्वाहः शंकरस्येति जग्मुः सर्वा मुदान्विताः ॥ ५३
शुद्धस्फटिकसंकाशो वृषभः सर्वसुन्दरः।
यो धर्म उच्यते वेदैः शास्त्रः सिद्धमहर्षिभिः ॥ ५४
महादेवो वृषभं धर्मवत्सलः।
शुशुभेऽतीव देवर्षिसेवितः सकलेब्र॑जन्॥ ५५
समेतैः सकलेर्महर्षिभि-
बभौ महेशो बहुशोऽत्यलंकृतः।
हिमालयाह्ृस्य याहूस्य धरस्य संव्रजन्
पाणिग्रहार्थ सदनं 'शिवायाः॥ ५६
रुद्रसंहिता ( पार्बतीखण्ड )
६६५
इसी प्रकार दुन्दुभिके निर्घोषसे बहुत बड़ा
कोलाहल हुआ, जो जगत्में मंगल करनेवाला तथा
अमंगलका विनाशक था। मुने! बरातमें गणोंके पीछे
होकर सभी देवता, सिद्धगण तथा लोकपाल अत्यन्त
उत्कण्ठाके साथ चलने लगे ॥ ४२-४३॥
हे मुने! बरातके मध्यभागमें बहुत बड़े छत्रसे
शोभित गरुड़ासनपर बैठे हुए भगवान् वैकुण्ठनाथ
विष्णु विविध प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होकर चल
रहे थे। उनके अगल-बगल पार्षद घेरे हुए थे तथा
उनके दोनों ओर चँवर डुलाये जा रहे थे॥ ४४-४५॥
विग्रहधारी वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों तथा
सनक आदि महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों और परिवारके
साथ मैं भी शिवजीकी सेवामें तत्पर हो मार्गमें
शोभासम्पन्न होकर चल रहा था। ऐरावत हाथीपर
आरूढ़ देवराज इन्द्र अनेक प्रकारके आभूषणोंसे
विभूषित होकर सेनाके मध्यमें चलते हुए शोभा पा
रहे थे॥ ४६-४८॥
उस समय विवाह देखनेकी उत्कण्ठासे
बहुत-से ऋषिगण भी मार्गमें जाते हुए शोभा पा रहे
थे॥४९॥
इसी प्रकार शाकिनी, यातुधान, वेताल,
ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, प्रमथ, तुम्बुरु, नारद,
हाहा, हूहू आदि श्रेष्ठ गन्धर्व एवं किन्नरगण हर्षित
होकर बाजा बजाते हुए चले॥ ५०-५१॥
सम्पूर्ण जगतूकी माताएँ, देवकन्याएँ, गायत्री,
सावित्री, लक्ष्मी, अन्य देवस्त्रियाँ-ये सब तथा
अन्य देवपत्नियाँ और जगन्माताएँ शंकरजीका
विवाह हो रहा है--ऐसा जानकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँ
गयी ॥ ५२-५३॥
शुद्ध स्फटिके समान सर्वसुन्दर वृषभ, जिसे
वेदों, शास्त्रों तथा मह्षियोंने धर्म कहा है, उसपर
सवार होकर धर्मवत्सल भगवान् शिवजी सम्पूर्ण
देवगणों तथा ऋषियोंसे सेवित हो मार्गमें चलते हुए
अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। इन सभी देवगणों,
महर्षियों तथा गणोंके साथ अलंकृत हुए शिवजी
पार्वतीसे विवाह करनेके लिये हिमाचलके घर जाते
हुए मार्गमे अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे॥ ५४-५६॥
६६६ श्रीशिवमहापुराण [ की
हे नारद! इस अकार त ती
वरयात्रा-प्रस्थानका आपसे वर्णन किया |
हिमालयके नगरमें जो शिवचरित्र हुआ, र |
हिमालयपुरोद्भूतं सद्वृत्तं शृणु नारद॥ ५७ | वृत्तान्तको सुनिये॥ ५७॥ न्य
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्धसाहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवयात्रावर्णन॑ नाम चत्वारिंशोऽध्याव;
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
शिवयात्रावर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
— ore
अधैकचत्वारिंशोऽध्यायः
नारदद्वारा हिमालयगृहमें जाकर विश्वकर्माद्वारा बनाये गये विवाहमण्डपका दर्शनकर
मोहित होना और वापस आकर उस विचित्र रचनाका वर्णन करना
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले--हे मुने! उसके बाद आपसों
ततः सम्मत्र्य च मिथः प्राप्याज्ञां शांकरीं हरिः। विचार-विमर्शकर शंकरजीकी आज्ञा लेकर भावा
मुने त्वां प्रेषयामास प्रथमं कुधरालयम्॥ ९ | विष्णुने पहले आपको हिमालयके घर भेजा!
अथ पण्यः सवश गतस दादर नारद! भगवान् श्रीहरिकी प्रेमपूर्ण प्रेरणासे सवे
कणा ता हिमाचलगृह ति बह शिवको प्रणामकर आप बरातसे आगे हिमालयके
४ नगरको चले॥ १-२॥
त्वं मुनेऽपश्य आत्मानं गत्वा तदत्रीडयान्वितम्। हे मुने! वहाँ जाकर आपने विश्वकद्र
कृत्रिमं रचितं तत्र विस्मितो विश्वकर्मणा॥ ३ | रचित लजाकी मुद्रासे युक्त अपनी कृत्रिम मूर्त देख
और उसे देखते ही आप विस्मित हो गये। हे
शरन्तस्त्वमात्मना तेन कृत्रिमेण महामुने। महामुने! विश्वकर्माद्वारा बनायी गयी अपनी मूर्तिको
अवलोकपरः सोऽभूच्चरितं विश्वकर्मण:॥ ४ देखकर तथा विशवकर्माका सारा चरित्र जानकर आ
सुवर्णकलशेर्जुष्टं रम्भादिबहुशोभितम्,
शु eA ॥ ५ | मण्डपमे प्रवेश किया ॥ ३--५॥
सहस्त्रस्तम्भसंयुक्त नव परमाद्भुतम्। वह मण्डप अति अद्भुत, नाना प्रकारके विश
वेदिकां च तथा दृष्ट्वा विस्मयं त्वं मुने हाया: ॥ ६ | अलंकृत तथा हजारों खम्भोंसे युक्त था। उसमें ब
हुई वेदी देखकर आप आश्चर्यमें पड़ गये॥६॥
इत्युक्तं शम्भुचरितं गमनं परमोत्सवम्।
lop
तदावोचश्च स मुने नारद त्वं नगेश्वरम्। हे मुने! हे नारद कारण
! हे नारद! उस विस्मयके कार
विस्मितोऽतीव मनसि नष्टज्ञानो विमूढधी:॥ ७ | ज्ञान एवं बुद्धि नष्ट हो गयी, पुनः आपने
पूछा-- ॥ ७॥
आगतास्ते किमधुना देवा विष्णुपुरोगमाः। है हिमालय! कया इस समय विष्णु आदि यी
तथा महर्षयः सर्वे सिद्धा उपसुरास्तथा॥ ८ | देवता, महर्षि, सिद्ध एवं गन्धर्व यहाँ पहुँच गये
तिल रत
महादेवो वृषारूढो गणैश्च परिवारित:। | होकर गणे „१ विवाहहेतु श्वेत जुके हैं?
कि गणेशवरोसे युक्त सदाशिव पधार चुके हैं“
आगतः किं विवाहार्थं वद तथ्यं नगेश्वर ९ | बात आप सत्य-सत्य कहिये॥ ८-९॥
अ० ४१]
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा तव विस्मितचेतसः।
उवाच त्वां मुने तथ्यं वाक्यं स हिमवान् गिरिः ॥ १०
हिमवानुवाच
हे नारद महाप्राज्ञागतो नेवाधुना शिवः।
विवाहार्थ च पार्वत्याः सगणः सवरातकः॥ १९
विश्वकर्मकृतं चित्रं विद्धि नारद सद्धिया।
बिस्मयं त्यज देवर्षे स्वस्थो भव शिवं स्मर॥ १२
भुक्त्वा विश्रम्य सुप्रीतः कृपां कृत्वा ममोपरि।
मैनाकादिधरैः सार्धं गच्छ त्वं शंकरान्तिकम्॥ १३
एभिस्समेतो गिरिभिर्महामते
संप्रार्थ्य शीघ्रं शिवमत्र चानय।
देवैः समेतं च महर्षिसंघैः
सुरासुरैरचितपादपल्लवम् ॥ १४
ब्रह्मोवाच
तथेति चोक्त्वागम आशु हि त्वं
तदेव तैः शैलसुतादिभिश्च।
तत्रत्यकृत्यं सुविधाय भुक्त्वा
महामनास्त्वं शिवसन्निधानम्॥ १५
तत्र दृष्टो महादेवो देवादिपरिवारितः।
जमस्कृतस्त्वया दीप्तः शैलैस्तैर्भक्तितश्च वै॥ १६
तदा मया विष्णुना च सर्वे देवाः सवासवाः।
पप्रच्छुस्त्वां मुने सर्वे रुद्रस्यानुचरास्तथा॥ १७
विस्मिता; पर्वतान्दष्ट्वा सन्देहाकुलमानसाः।
पैनाकसहामेवां्यान्नानालंकारसंयुतान् ॥ १८
देवा ऊचुः
है नारद महाप्राज्ञ विस्मितस्त्वं हि दृश्यसे।
सेत्कृतोऽसि हिमागेन किं न वा वद विस्तरात्॥ १९
एते कस्मात्समायाताः पर्वता इह सत्तमाः।
मैनाकसहामेवाद्या: सुप्रतापाः स्वलंकृता:॥ २०
कन्या दास्यति शैलोऽसौ शंभवे वा न नारद।
हिमालयगृहे तात किं भवत्यद्य तद्वद॥ २१
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६६७
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! विस्मितचित्त हुए
आपके इस प्रकारके वचनको सुनकर पर्वत हिमालय
आपसे तथ्ययुक्त वचन कहने लगे--॥ १०॥
हिमवान् बोले--हे नारद! हे महाप्राज्ञ! अभी
पार्वतीके व्रिवाहके लिये अपने गणों तथा बरातियोंको
लेकर शिवजी नहीं आये हैं॥ ११॥
हे नारद! आप उत्तम बुद्धिसे विश्वकर्माके
द्वारा रचित चित्र जानिये। हे देवर्षे! आप आश्चर्यका
त्याग कीजिये, स्वस्थ हो जाइये और शिवका स्मरण
कीजिये॥ १२॥
आप मुझपर कृपाकर भोजन तथा विश्राम करके
मैनाक आदि पर्वतोंके साथ शंकरके समीप जाना॥ १३॥
हे महामते! जिनके चरणकमलकी अर्चना देवता
तथा असुर भी किया करते हैं, उन शिवकी प्रार्थनाकर आप
इन पर्वतोंको साथ लेकर देवताओं तथा महर्षियोंसहित
उन्हें यहाँ शीघ्र ले आइये॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद!] तब आपने “तथास्तु'
कहा और वहाँका सारा कृत्य अच्छी तरह सम्पन्नकर
भोजन करके महामनस्वी आप हिमालयके पुत्रोंसहित
बड़ी प्रसन्ततासे शीघ्र शिवजीके समीप गये॥ १५॥
वहाँ आपने देवताओंसे घिरे हुए महादेवजीको
देखा। आपने तथा उन पर्वतोंने भक्तिसे उन कान्तिमान्.
शिवको प्रणाम किया॥ १६॥
तत्पश्चात् हे मुने! अनेक प्रकारके अलंकारोंसे
युक्त मैनाक, सह्य, मेरु आदि पर्वतोंको देखकर
सन्देहसे आकुल मनवाले मैंने, विष्णुने तथा इन्द्रसे
युक्त देवताओं एवं रुद्रानुचरोंने विस्मित होकर आपसे
पूछा-॥ १७-१८॥
देवता बोले-हे नारद! हे महाप्राज्ञ! आप तो
आश््चर्यसे चकित दिखायी पड़ते हैं, हिमालयने
आपका सत्कार किया या नहीं। हमलोगोंको यह
विस्तारपूर्वक बताइये | ये महाबली मैनाक, सह्य तथा
मेरु आदि पर्वत अनेक अलंकार धारणकर यहाँ किस
उद्देश्यसे आये हैं। हें नारद! आप यह भी बताइये कि
पर्वतराज हिमालयका विचार शिवजीको कन्या देनेका
हे या नहीं ? हे तात! इस समय हिमालयके यहाँ क्या
हो रहा है, यह सब विस्तारसे कहिये॥ १९-२१॥
६६८
श्रीशिवमहापुराण
ओ का नत
इति सन्दिग्धमनसामस्माकं च दिवौकसाम्।
चद् त्वं पृच्छमानानां सन्देहं हर सुव्रत॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां विष्णवादीनान्दिवोकसाम्।
अवोचस्तान्मुने त्वं हि विस्मितस्त्वाष्ट्रमायया॥ २३
एकान्तमाश्रित्य च मां हि विष्णु-
मभाषथा वाक्यमिदं मुने त्वम्।
शचीपतिं सर्वसुरेशवरं वे
पक्षच्छिदं पूर्वरिपुं धराणाम्॥ २४
नारद उवाच
त्वष्टा कृतं तद्विकृतं विचित्रं
विमोहनं सर्वदिबौकसां हि।
येनैव सर्वान्स विमोहितुं सुरान्
समिच्छति प्रेम एव युक्त्या॥ २५
पुरा कृतं तस्य विमोहनं त्वया
सुविस्मृतं तत् सकलं शचीपते।
तस्मादसौ त्वां विजिगीषुरेव
गृहे ध्रुवं तस्य गिरे्महात्मनः॥ २६
अहं विमोहितस्तेन प्रतिरूपेण भास्वता।
तथा विष्णुः कृतस्तेन ब्रह्मा शक्रोऽपि तादृश: ॥ २७
कि बहूक्तेन देवेश सर्वदेवगणाः कृताः।
कृत्रिमाश्चित्ररुपेण न किंचिदवशेषितम्॥ २८
विमोहनार्थं सर्वेषां देवानां च विशेषतः।
कृता माया चित्रमयी परिहासविकारिणी॥ २९
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा वचनं तस्य देवेदद्रो वाक्यब्रवीत्।
विष्णुं प्रति तदा शीघ्र भयाकुलतनुरहरिम्॥ ३०
देवे उवाच
देवदेव रमानाथ त्वष्टा मां निहनिष्यति।
पुत्रशोकेन तप्तोऽसौ व्याजेनानेन नान्यथा॥ ३१
ब्रह्मोवाच
त्रस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः।
उवाच प्रहसन् वाक्यं शक्रमाश्चासयंस्तदा॥ ३२
हे सुब्रत हम देवताओंका मन अनेक रे
सन्देहसे ग्रस्त हो रहा है, इसलिये हमलोग आप
पूछ रहे हैं, आप हमारा सन्देह दूर करें॥ ३), "
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! उन विष्णु
देवताओंका वचन सुनकर विश्वकर्माकी
विस्मित हुए आपने उनसे कहा--॥ २३।
हे मुने! आप मुझ विष्णुको और सभी देवताओंडे
ईश्वर शचीके पति, पर्वतोंके पूर्व शत्रु तथा पवते
पक्षको काटनेवाले इन्द्रको एकान्तमें बुलाकर कहे
लगे--॥ २४॥
नारदजी बोले--विश्वकर्माने हिमालये घर
जैसी कारीगरी की है, उसे देखते ही सभी देवाण
मोहित हो जायँगे। वे हिमालय तो उस कारीगरीके
कौशलसे सारे देवताओंको प्रेमपूर्वक युक्तिसे मोहित
करना चाहते हैं ॥ २५॥
हे शचीपते! आपने पूर्वकालमें विश्वकर्माको
भुलावेमें डाल दिया था, क्या उसे आप भूल गये हँ?
इसलिये वे आज आपको जीतनेकी इच्छासे हिमालयके
घरमें विराजमान हैं। उन्होंने मेरा ऐसा चित्र बतावा
है कि उसे देखकर मैं तो मोहित हो गया हूँ। इस
प्रकार उन्होंने विष्णु, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि देवताओंके
चित्रका भी निर्माण किया है॥ २६-२७॥
हे देवेश! अधिक कहनेसे क्या! उन
सभी देवगणोंका चित्र इतनी कुशलतासे बनाया है कि
वह यथार्थ देवताओंके रूपसे किंचिन्मात्र भी मित
नहीं जान पड़ता | उन्होंने परिहास करनेके लिये सगै
देवताओंकी यह मायामयी चित्ररचना की है,
देवताओंको मोह उत्पन्न हो जाय॥ २८-२९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार नारदकें
सुनकर भयसे व्याकुल शरीरबाले देवेद्धने वु
ओर देखकर शीघ्रतासे कहा--॥ ३०॥
देवेन्द्र बोले--हे देवदेव! हे रमानाथ! त्वष्ट
शेकसे व्याकुल हो मुझसे द्रोह करता है
ऐसा न हो कि वह इसी बहाने मेरा वध कर दे॥ प
ब्रह्माजी बोले--उनका यह वचत रस
देवाधिदेव जनार्दन उन्हें समझाते हु
लगे-॥ ३२॥
अहि |
माहे
आ० ४१]
विष्णुरुवाच
निवातकवचैः पूर्व मोहितोऽसि शचीपते।
महाविद्याबलेनेब दानवैः पूर्ववैरिभिः॥ ३३
पर्वतो हिमवानेष तथान्येऽखिलपर्वताः।
विपक्षा हि कृताः सर्वे मम वाक्याच्च वासव॥ ३४
तेश्नुस्मृत्या तु वै दृष्ट्वा मायया गिरयो ह्यमी।
जेतुमिच्छन्ति ये मूढा न भेतव्यमरावपि॥ ३५
ईश्वरो नो हि सर्वेषां शंकरो भक्तवत्सलः।
सर्वथा कुशलं शक्र करिष्यति न संशयः॥ ३६
ब्रह्मोवाच
एवं संवदमानं तं शक्रं विकृतमानसम्।
हरिणोक्तश्च गिरिशो लौकिकीं गतिमाश्रितः॥ ३७
ईश्वर उवाच
हे हरे हे सुरेशान किं ब्रूथो$द्य परस्परम्।
इत्युक्त्वा तौ महेशानो मुने त्वां प्रत्युवाच स: ॥ ३८
किं नु वक्ति महाशैलो यथार्थ वद नारद।
वृत्तान्तं सकलं ब्रूहि न गोप्यं कर्तुमहसि॥ ३९
ददाति वा नैव ददाति शेलः
सुतां स्वकीयां वद तच्च शीघ्रम्।
किं ते दृष्टं किं कृतं तत्र गत्वा
प्रीत्या सर्व॑ तद्वदाश्वद्य तात॥ ४०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः शम्भुना तत्र मुने त्वं देवदर्शनः।
सर्व रहस्यवोचो वै यद् दृष्टं तत्र मण्डपे॥ ४१
नारद उवाच
देवदेव महादेव श्रृणु मद्वचनं शुभम्।
जास्ति विघ्नभयं नाथ विवाहे किंचिदेव हि॥ ४२
अवश्यमेव शैलेशसतुभ्यं दास्यति कन्यकाम्।
चामानयितुमायाता इमे शैला न संशयः॥ ४३
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६६९
विष्णुजी बोले-हे शचीपते! आपके वैरी
निवातःकवचादि दानवगणोंने महाविद्याके बलसे
पूर्वसमयमें भी आपको मोहित किया था। हे वासव!
इसी प्रकार आपने मेरी आज्ञासे पर्वतराज हिमालयके
तथा अन्य दूसरे पर्वतोंके पंखका छेदन कर दिया है।
इस कारण ये पर्वत भी उसी मायाको देखकर तथा
सुनकर आपको जीतनेकी इच्छा करते हैं। ये सभी
मूर्ख हैं और पराक्रम नहीं जानते हैं, अतः आप इनसे
भयभीत न हों ॥ ३३-३५॥
हे देवेन्द्र! इसमें कोई भी सन्देह नहीं
कि भक्तवत्सल भगवान् सदाशिव. हम सभीका
मंगल करेंगे॥ ३६॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार व्याकुल हुए इन्द्रको
देखकर विष्णुने उन्हें समझाया। तब लौकिक
गतिका आश्रय लेनेवाले भगवान् शिव उनसे कहने
लगे--॥ ३७॥
ईश्वर बोले-हे हरे! हे सुरपते! आपलोग आपसमें
क्या विचार-विमर्श कर रहे हैं ? [ब्रह्माजी बोले]
उन दोनोंसे इस प्रकार कहकर हे मुने! पुनः उन्होंने
आपसे कहा-हे नारद! महाशैलने क्या कहा है,
आप यथार्थ रूपसे सारा वृत्तान्त कहिये, आप उसे
गुप्त न रखें॥ ३८-३९॥
आप शीघ्नतासे बताइये कि शैलराजकी कन्या
देनेकी इच्छा है अथवा नहीं ? हे तात! आपने वहाँ
जाकर क्या देखा और क्या किया? यह सारा वृत्तान्त
प्रेमपूर्वक कहिये ॥ ४०॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! जब शिवजीने आपसे
यह कहा, तब दिव्य दृष्टिवाले आपने मण्डपमें जो कुछ
देखा था, वह सब एकान्तमें इस प्रकार कहा- ॥ ४१ ॥
नारदजी बोले-हे देवदेव! हे महादेव! आप
मेरा शुभ वचन सुनें। इस विवाहमें किसी प्रकारके
विघ्न दिखायी नहीं पड़ते और न तो किसी प्रकारका
भय ही है॥ ४२॥
शैलराज निश्चित रूपसे आपको ही अपनी
कन्या देना चाहते हैं और ये पर्वत इसी निमित्त
आपको लेनेकी इच्छासे यहाँ आये हैं, इसमें सन्देह
नहीं है॥४३॥
६७०
श्रीशिवमहापुराण [
स्क्लक र श्
किन्तु ह्यमरमोहार्थं माया विरचिताद्भुता।
कुतूहलार्थ सर्वज्ञ न कश्रिद्विघ्तसम्भव:॥ ४४
विचित्रं मण्डपं गेहे5कार्षीत्तस्य तदाज्ञया।
विश्वकर्मा महामायी नानाश्चर्यमयं विभो॥ ४५
सर्वदेवसमाजश्च॒ कृतस्तत्र विमोहनः।
तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप्तोऽहं तन्मायाविमोहितः ॥ ४६
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा तट्टचस्तात लोकाचारकरः प्रभुः।
हर्यादीन्प्रहसन् शम्भुरुवाच सकलान्सुरान्॥ ४७
ईश्वर उवाच
कन्यां दास्यति चेन्मह्यं पर्वतो हि हिमाचलः ।
मायया मम किं कार्य वद् विष्णो यथातथम्॥ ४८
हे ब्रह्मन् शक्र मुनयः सुरा ब्रूत यथार्थतः।
मायया मम किं कार्य कन्यां दास्यति चेद्विरिः ॥ ४९
केनाप्युपायेन फलं हि साध्यः
मित्युच्यते पण्डितै्न्यायविदभिः।
तस्मात्सवैर्गम्यतां शीघ्रमेव
कार्यार्थिभिर्विष्णुपुरोगमैश्च
ब्रह्मोवाच
एवं संवदमानोऽसौ देवैः शम्भुरभूत्तदा।
कृतः स्मरेणेव वशी वशं वा प्राकृतो नरः॥ ५१
अथ शम्भ्वाज्ञया सर्वे विष्णवाद्या निर्जरास्तदा।
ऋषयश्च महात्मानो ययुर्मोहभ्रमाबहम्॥ ५२
पुरस्कृत्य मुने त्वां च पर्वतांस्तान्सविस्मया: ।
॥५०
हिमाद्रेश्व तदा जमग्मुर्मन्दिरं परमाद्भुतम्॥ ५३ | पर्वतोंको
अथ विष्णवादिसंयुक्तो मुदितैः स्वबलेर्युत: ।
आजगामोपहेमागपुर॑ प्रमुदितो हरः॥ ५४
हे सर्वज्ञ! परंतु एक बात यह है किक.
वहाँ सभी देवताओंको मोहित केके ह
अद्भुत माया रची गयी है । इसके अतिरिक्त ग |
किसी प्रकारके विघ्नकी सम्भावना नहीं है
हे विभो! महामाया करनेवाले दि विश्वकर्मा)
हिमालयकी आज्ञासे उनके घरमें महान् आचर
मण्डपकी रचना की है। उस मण्डपमें वि्वकमनि्
देवसमाजके चित्रका निर्माण किया है, उसे देखकर
मोहित होकर आश्चर्यमें पड़ गया हूँ ॥ ४५-४६ ।
ब्रह्माजी बोले-नारदका वचन सुगा
लोकाचार करनेवाले प्रभु शिवजी विष्णु आर
देवताओंसे हँसते हुए कहने लगे-- ॥ ४७॥
ईश्वर बोले हे विष्णो! यदि पर्वत हिमालग
मुझे अपनी कन्या देंगे, तो आप यथार्थ रूपसे बताये
कि मुझे मायासे क्या प्रयोजन है ?॥ ४८॥
हे ब्रह्मन्! हे शक्र! हे मुनिगण तथा हे देवताओ!
आपलोग यथार्थ रूपसे कहिये कि हिमालय मुझे अफ
कन्या दे रहे हैं, तो मायासे मेरा क्या प्रयोजन है ?॥४९॥
न्यायशास्त्रके जानकार पण्डितोंने कहा है कि
जिस किसी उपायसे अपने साध्यको प्राप्त कल
जाहिये। अतः आप सभी विष्णु आदि देवगण झ
कार्यसिद्धिकी इच्छासे शीघ्र ही चलें॥५०॥
ब्रह्माजी बोले--देवताओंसे इस प्रकार 'कहनेवाते
जितेन्रिय भगवान् सदाशिवको कामदेवने साधारण मु
समान अपने वशमें कर लिया। उसके बाद शिवजी
आज्ञासे विष्णु आदि देवता एवं ऋषिगण भ्रात तथ
मोहित करनेवाले हिमालय-गृहकी ओर गये ॥ ५१५२
है मुने! उन देवताओंने आप नारदको तथा
को आगेकर आश्चर्यचकित हो हिमालयके
परम अद्भुत मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया॥ ५९
इस प्रकार हर्षमें भरे हुए विष्णु आदि देवताओं
प्रसनतासे युक्त अपने गणेंके साथ वे शिवजी
होकर हिमालयके नगरके समीप आ गये॥५४॥
॥४४॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रदसंहिताया तृतीये पर्वतीखण्डे मण्डप्रचनावर्षन गायैकचत्वार्थिशध्याक ॐ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय
मण्डपरचनावर्णन नामक इकतालीसवा
ee
'य रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१ ॥
आ० ४२]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
20-०० “ “ “ “ ४“ 9१
अथ द्विचत्वारिंशो5ध्याय:
हिमालयद्वारा प्रेषित मूर्तिमान् पर्वतों और ब्राह्मणोंद्वारा
राब ह्मणोंद्वारा बरातकी
अगवानी, देवताओं और पर्वतोंके मिलापका वर्णन
ब्रह्मोवाच
अथाकर्ण्य गिरीशश्च निजपुर्युपकण्ठतः।
ग्राप्तमीशं सर्वगं वै मुमुदेऽति हिमालयः॥ १
अथ सम्भृतसम्भारः सम्भाषां कर्तुमीश्वरम्।
शैलान्प्रस्थापयामास ब्राह्मणानपि सर्वशः॥ २
स्वयं जगाम सद्भक्त्या प्राणेप्सुं द्रष्टुमी श्वरम्।
भक्त्युद्तमना: शैलः प्रशंसन् स्वविधिं मुदा॥ ३
देवसेनां तदा दृष्ट्वा हिमवान्विस्मयं गत: ।
जगाम सम्मुखस्तत्र धन्योऽहमिति चिन्तयन्॥ ४
देवा हि तदबलं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गताः।
आनन्दं परमं प्रपुर्देवाश्च गिरयस्तथा॥ ५
पर्वतानां महासेना देवानां च तथा मुने।
प्रिलित्वा विरराजेव पूर्वपश्चिमसागरौ॥ ६
परस्परं मिलित्वा ते देवाश्च पर्वतास्तथा।
कृतकृत्यं तथात्मानं मेनिरे परया मुदा॥ ७
अधेश्वरं पुरो दृष्ट्या प्रणनाम हिमालयः।
सरवे प्रणेमुर्गिरयो ब्राह्मणाश्च सदाशिवम्॥ ८
वृषभस्थं प्रसन्नास्यं नानाभरणभूषितम् ।
दिव्यावयवलावण्यप्रकाशितदिगन्तरम् ॥ ९
सुसूक्ष्माहतसत्पड्वस्त्रशोभितविग्रहम्_ ।
सद्रलविलसन्मौलिं विहसन्तं शुचिप्रभम्॥ १०
भूषाभूताहियुक्ताङ्गमद्भुतावयवप्रभम् ।
दिव्यति सुरेशैश्च सेवितं करचामरैः॥ ११
वामस्थिताच्युतं दक्षभागस्थितविधिं प्रभुम्।
पृष्ठपाश्व॑स्थितसुरादिकम्॥ १२
गोनाविधसुराद्येश्व संस्तुतं लोकशंकरम्।
ब्रह्माजी बोले-गिरिराज हिमालय सर्वव्यापी
शिवजीको अपने नगरके निकट आया हुआ सुनकर
बड़े प्रसन्न हुए॥ १॥
तदनन्तर उन्होंने सभी सामग्री एकत्रित करके
परमेश्वरकी अगवानी करनेके लिये बहुत-से ब्राह्मणों
तथा पर्वतोंको भेजा और प्राणोंसे प्रिय ईश्वरका दर्शन
करनेके लिये भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले वे हिमालय
अपने भाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक स्वयं
भी गये॥ २-३॥
उस समय देवसेनाको देखकर हिमवान् विस्मित
हो गये और मैं धन्य हँ--ऐसा सोचते हुए वे उनके
सामने गये। देवता भी हिमालयकी [विशाल] सेनाको
देखकर आश्चर्यचकित हो गये। इस प्रकार देवताओं
तथा पर्वतोंको परम आनन्द प्राप्त हुआ॥ ४-५॥
हे मुने! [उस समय] देवताओं तथा पर्वतोंकी
विशाल सेना मिलकर पूर्व तथा पश्चिम सागरके समान
शोभित हुई | वे देवता तथा पर्वत परस्पर मिलकर बड़ी
प्रसन्नतासे अपनेको कृतकृत्य मानने लगे ॥ ६-७॥
उसके बाद हिमालयने ईश्वरको सामने देखकर
उन्हें प्रणाम किया और सभी पर्वतों तथा ब्राह्मणोंनें भी
सदाशिवको प्रणाम किया॥८॥
हिमालयने वृषभपर सवार, प्रसन्न मुखवाले,
नानालंकारोंसे शोभित, अपने दिव्य शरीरकी शोभासे
दिगन्तरोंको प्रकाशित करनेवाले, अत्यन्त सूक्ष्म तथा
नवीन रेशमी सस्त्रसे शोभित विग्रहवाले, सिरपर
रत्नोंसे जटित मुकुट धारण किये हुए, हँसते हुए, शुभ्र
कान्तिवाले, सर्पोके अलंकारोंसे सुशोभित अंगवाले,
अंगोंकी अद्भुत प्रभावाले, दिव्य कान्तिसे सम्पन्न,
हाथोंमें चँवर धारण किये देवताओंद्वारा सेवित, बायीं
ओर अच्युत, दाहिनी ओर ब्रह्मा, पृष्ठभागमें इन्द्र और
पीछे तथा पार्श्वभागमें देवता आदिसे शोभायमान,
अनेकविध देवता आदिके द्वारा स्तुत, संसारका कल्याण
करनेवाले, अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले,
६७२
स्वहेत्वात्ततनुं ब्रह्म सर्वेशं वरदायकम्॥ १३
सगुणं निर्गुणं चापि भक्ताधीनं कृपाकरम्।
प्रकृतेः पुरुषस्यापि परं सच्चित्सुखात्मकम्॥ १४
प्रभोर्दक्षिणभागे तु ददर्श हरिमच्युतम्।
विनतातनयारूढं नानाभूषणभूषितम्॥
प्रभोश्च वामभागे तु मुने मां सन्ददर्श ह।
चतुर्मुखं महाशोभं स्वपरीवारसंयुतम्॥ १६
एतौ सुरेश्वरौ दृष्ट्वा शिवस्यातिप्रियौ सदा।
प्रणनाम गिरीशश्च सपरीवार आदरात्॥ १७
तथा शिवस्य पृष्ठे च पार्श्वयोः सुविराजितान्।
देवादी-प्रणनामासौ दृष्ट्या गिरिवरेश्वरः ॥ १८
शिवाज्ञया पुरो भूत्वा जगाम स्वपुरं गिरिः।
शेषहर्यात्मभूः शीघ्रं मुनिभिर्निर्जरादिभिः॥ १९
सर्वे मुनिसुराद्याश्च गच्छन्तः प्रभुणा सह।
गिरेः पुरं समुदिताः शाशंसुर्बह नारद्॥ २०
रचिते शिखरे रम्ये संस्थाप्य देवतादिकम्।
जगाम हिम्ाँस्तत्र यत्रास्ति विधिवेदिका॥ २१
कारयित्वा विशेषेण चतुष्कं तोरणेर्युतम्।
स्नानदानादिकं कृत्वा परीक्षामकरोत्तदा॥ २२
स्वपुत्रान्प्रेषयामास शिवस्य निकटे तथा।
हिमो विष्णवादिसम्पूणंवर्गयुक्तस्य शैलराट्॥ २३
कर्तुमैच्छद्वराचारं महोत्सवपुरस्सरम्।
महाहर्षयुतः सर्वबन्धुयुग्धिमशैलराट् ॥२४
अथ ते गिरिपुत्राश्च तत्र गत्वा प्रणम्य तम्।
सस्ववर्ग प्ररर्थनान्तामूचुः शैलेश्वरस्य वै॥ २५
्रीशिवमहापुराण
[ MF 5 __ %
ब्रह्मस्वरूप, सर्वेश्वर, वर प्रदान करने करनेवाले गि
तथा सगुण रूपवाले, भक्तोंके अधीन रहनेवाले
करनेवाले, प्रकृति तथा पुरुषसे भी फे |
सच्चिदानन्दस्वरूप शिवको देखा॥ ९-१४॥
हिमालयने प्रभुके दक्षिण भागमें गरुड्प सक्ष
तथा नाना प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित अक
श्रीहरिको देखा॥ १५॥
हे मुने! उन्होंने प्रभुके वामभागमे चा
मुखवाले, महान् शोभावाले तथा अपने पाखा
युक्त मुझे देखा॥ १६॥
इस प्रकार शिवके परम प्रिय हम द
सुरेश्वरोंको देखकर गिरीशने परिवारसहित आदर
प्रणाम किया॥ १७॥
फिर गिरीश्वरने देवाधिदेव सदाशिवके पीहे
तथा पार्श्वभागमें स्थित हुए सभी देवताओंको प्रणा
किया॥ १८॥
इसके बाद शिवजीकी आज्ञासे गिरिर
हिमालय आगे होकर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए
तदनन्तर शेष, विष्णु तथा ब्रह्मा भी देवताओंके सांध
नगरमें गये॥ १९॥
हे नारद! प्रभुके साथ जाते हुए सभी मुनि
देवता आदि एवं देवगण परम प्रसन्न हो हिमालये
नगरकी प्रशंसा करने लगे। उसके बाद हिमा
सुरम्य तथा निवासके योग्य बनाये गये अपने शिख
देवता आदिको ठहराकर स्वयं वहाँ चले गये, पर
वेदी बनी थी ॥ २०-२१॥
उसे चौकोर तथा तोरणोंसे विशेष है
सुसज्ञित कराकर स्नान-दानादि क्रियाकर ॐ
[विधिपूर्वक] वहाँका निरीक्षण किया॥ २२॥
तदनन्तर पर्वतराज हिमालयने विष्णु रे
| वसे युक्त शिवके समीप अपने
जा ॥ २३॥
वे पर्वतराज परम प्रसन्न हो अपने बा
आध महात् उत्सवपूर्वक बरका यथोचित जरी
करना चाहते थे। तब उन पर्वतपुत्रोंने वरही र
अपने वगॉके सहित विराजमान उन शिवकी i
करके शैलेश्वरकी वह प्रार्थना सुनायी ॥ ९४९१
अ० ४३]
ततस्ते स्वालयं जग्मुः शेलपुत्रास्तदाज्ञया।
शैलराजाय संचख्युः ते चायान्तीति हर्षिताः ॥ २६
अथ देवाः प्रर्थनान्तां गिरेः श्रुत्वातिहर्षिताः।
मुने विष्वादयः सर्वे सेश्वरा मुमुदुर्भृशम्॥ २७
कृत्वा सुवेषं सर्वेऽपि निर्जरा मुनयो गणाः।
गमनं चक्रुरन्येऽपि प्रभुणा गिरिराङ्गृहम्॥ २८
तस्मिन्नवसरे मेना द्रष्टुकामाभवच्छिवम्।
प्रभोराह्णाययामास मुने त्वां मुनिसत्तमम्॥ २९
अगमस्त्वं मुने तत्र प्रभुणा प्रेरितस्तदा।
मनसा शिवहद्धेतुं पूर्ण कर्तु तमिच्छता॥ ३०
त्वां प्रणम्य मुने मेना प्राह विस्मितमानसा।
द्रष्टुकामा प्रभो रूपं शंकरस्य मदापहम्॥ ३१
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६७३
तत्पश्चात् वे पर्वतपुत्र उनकी आज्ञासे अपने घर
चले गये और प्रसन्न होकर शैलराजसे बोले कि अब
लोग आ रहे हैं। हे मुने! इसपर शिवजीसहित विष्णु
आदि समस्त देवता गिरिराजकी वह प्रार्थना सुनकर
परम प्रसन्न और अत्यन्त आह्वादित हो गये। उसके
बाद सभी देवता, मुनि, गण तथा अन्य लोग उत्तम
वेशभूषा धारण करके प्रभुके साथ पर्वतराजके घर
गये॥ २६-२८॥
उस अवसरपर मेनाने शिवजीको देखना चाहा
और हे मुने! प्रभुको देखनेके लिये उन्होंने आप
मुनिश्रेष्ठको बुलवाया। तब हे मुने! आप प्रभुसे प्रेरित
होकर शिवजीके हृदयकी बात पूर्ण करनेकी इच्छासे
युक्त मनसे वहाँ गये॥ २९-३०॥
हे मुने! आपको प्रणाम करके विस्मित मनवाली
मेना भगवान् शंकरके मदविनाशक रूपको देखनेकी
इच्छासे [आपसे] कहने लगीं॥ ३१॥
इति श्रीशिवमहापुदणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ततीय पार्वती खण्डे देवगिरिमिलापवर्णतं नाम दविचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवताओं तथा
पर्वतोंका मिलाप-वर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
मेनाद्वारा शिवको देखनेके लिये महलकी छतपर जाना, नारदद्वारा सबका
दर्शन कराना, शिवद्वारा अद्भुत लीलाका प्रदर्शन, शिवगणों तथा
शिवके भयंकर वेषको देखकर मेनाका मूर्च्छित होना
मेनोवाच
निरीक्षिष्यामि प्रथमं मुने तं गिरिजापतिम्।
कीदूशं शिवरूपं हि यदर्थे तप उत्तमम्॥ १
ब्रह्मोवाच
इत्यज्ञानपरा सा च दर्शनार्थ शिवस्य च।
त्वया मुने समं सद्ाश्चन्द्रशालां समागता॥ २
शिवोऽपि च तदा तस्यां ज्ञात्वाहंकारमात्मन:।
ग्रह विष्णुं च मां तात लीलां कृत्वाद्धुतां प्रभुः ॥ २
शिव उवाच
भदाजञया युवां तातौ सदेवौ च पृथवमृथक्।
"च्छं हि गिरिद्वारं वयं पश्चाद. व्रजेमहि॥ ४
2223 Shivmahapuranam Part J Section_23_l-Front
मेना बोलां-हे मुने! मैं पहले गिरिजाके
होनेवाले पतिको देखूँगी । जिनके लिये उसके द्वारा उत्तम
तप किया गया है, उन शिवका रूप कैसा है ?॥ १॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! इस प्रकार अज्ञानके
वशीभूत वे मेना शिवका दर्शन करनेके लिये
आपके साथ शीघ्र ही चन्द्रशालापर गयीं। हे तात!
उस समय प्रभु शिवजी भी अपने प्रति उनके
अहंकारको जानकर अद्भुत लीला करके मुझसे और
विष्णुसे बोले-- ॥ २-३॥
शिवजीने कहा-हे तात! आप दोनों मेरी
आज्ञसे देवताओंके साथ अलग-अलग पर्वत हिमालयके
दरवाजेपर चलें। हमलोग बादमें चलेंगे॥ ४॥
६७४
श्रीशिवमहापुराण
श्या, | हाजी बोले-सर उप जे
इत्याकर्ण्य हरिः सर्वानाहूयोवाच तन्मया: ।
सुराः सर्वे तथैवाशु गमनं चक्रुरुत्सुका: ॥
स्थितां शिरोगृहे मेनां मुने विश्वेश्वरस्त्वया।
तथैव दर्शयामास हद्विभ्रंशो यथा भवेत्॥ ६
एतस्मिन् समये मेना सेनां च परमां शुभाम्।
निरीक्षन्ती मुने दृष्ट्वा सामान्यं हर्षिताभवत्॥ ७
प्रथमं चैव गन्धर्वाः सुन्दराः सुभगास्तदा।
आयाताः शुभवस्त्राढ्या नानालंकारभूषिताः॥ ८
नानावाहनसंयुक्ता नानावाद्यपरायणा: ।
पताकाभिर्विचित्राभिरप्सरोगणसंयुता: ॥ ९
अथ दृष्ट्वा वसुं तत्र तत्पतिं परमप्रभुम्।
मेना प्रहर्षिता ह्यासीच्छिवो5यमिति चाब्रवीत॥ ९०
शिवस्य गणका एते न शिवोऽयं शिवापति:।
इत्येवं त्वं ततस्तां वै अवोच ऋषिसत्तम॥ ११
एवं श्रुत्वा तदा मेना विचारे तत्पराभवत्।
इतश्चाभ्यधिको यो वे स च कीदुग्भविष्यति॥ १२
एतस्मिन्नन्तरे यक्षा मणिग्रीवादयश्च ये।
तेषां सेना तया दृष्टा शोभापि द्विगुणीकृता॥ १३
तत्पतिं च मणिग्रीवं दृष्ट्वा शोभान्वितं हि सा।
अयं रुद्रः शिवास्वामी मेना प्राहेति हर्षिता॥ १४
जायं रुद्रः शिवास्वामी सेवकोऽयं शिवस्य वै।
इत्यवोचोऽगपत्यै त्वं तावद्वह्निः स आगत: ॥ १५
ततोऽपि द्विगुणां शोभा दष्ट्वा तस्य च साब्रवीत्।॥
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमद्रवीः ॥। १६
तावद्यमः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभः।
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता ॥ १७
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावन्निर्ऋतिरागतः।
बिभ्राणो द्विगुणां शोभां शुभः पुण्यजनप्रभुः ॥ १८
[3 ४ |
ब्रह्माजी बोले--यह सुनकर |
देवगणोंको बुलाकर वैसा करनेको कहा। च|
सभी देवता शिवमें चित्त लगाये हुए .
चलने लगे॥५॥ ह उसु |
हे मुने! उसी समय शिवजीके दर्शनकी इज
मेना भी तुमको साथ लेकर महलकी अवी
चढ़ गयीं। तब तुम उन्हें इस प्रकार दिखाने लो.
जिससे उनका हृदय विदीर्ण हो। हे मुने। उप प
परम शुभ सेनाको देखती हुई मेना सामान्य
हर्षित हो उठीं॥ ६-७॥
सबसे पहले सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए, सुभा,
शुभ, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, विविध
बाहनोंसे युक्त, अनेक प्रकारके बाजे बजानेमे तत्स
और विचित्र पताकाओं तथा अप्सराओंको अपने साध
लिये हुए गन्धर्व आये। उस समय मेना गर्व
परमप्रभु वसुको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं और
उन्होंने पूछा कि क्या ये शिवजी हैं ?॥ ८-१०॥
हे ऋषिश्रेष्ठ! तब आपने उनसे यह कहा-
ये शिवजीके गण हैं, शिवाके पति शंकरजी नहँ
हैं॥ ११॥
यह सुनकर मेनाने विचार किया कि जो इनसे
भी अधिक श्रेष्ठ है, वह कैसा होगा॥ १२॥
उसी समय जो मणिग्रीव आदि यक्ष %
उनकी सेनाको उन्होंने देखा, जिनकी शोभा ग्म
दुगुनी थी॥ १३॥
यक्षाधिपति मणिग्रीवको अत्यन्त शोभासे समवि
देखकर ये शिवास्वामी रुद्र हैं--मेनाने हर्षित ही
ऐसा कहा। हे नारद! तब तुमने कहा--ये शिवा
रुद्र नही हैं, ये तो शिवके सेवक हैं। उसी सर
अग्निदेव आ गये। मणिग्रीवकी अपेक्षा उनकी ८
शोभा देखकर मेनाने पूछा-क्या ये ही गि
स्वामी रुद्र हैं त आपने कहा--नहीं ॥ १४-
तत्पश्चात् उनकी भी शोभासे द्विगुणित शोभा त
यम आये । उन्हें देखकर प्रसन्न होकर मेनाने कह
क्या ये रुद्र है? तब आपने उनसे कहा- तही,
समय उनसे भी द्विगुणित शोभा धारण
पुण्यजनोंके प्रभु शुभ निति आये॥ १७-१८॥
स्म
न ४३]
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता।
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावद्रुण आगतः॥ १९
ततोऽपि द्विगुणां शोभां दृष्ट्वा तस्य च सान्रवीत्।
ङद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवीः॥ २०
तावद्वायुः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभ:।
त॑ दष्ट्वा प्राह सा मेना रूद्रोऽयमिति हर्षिता॥ २१
नेति त्वमब्रवीस्तां बै तावद्धनद आगतः।
ततोऽपि द्विगुणां शोभां बिभ्राणो गुह्यकाधिपः ॥ २२
त॑ दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता।
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावदीशान आगतः॥ २३
ततोऽपि द्विगुणां शोभां दृष्ट्वा तस्य च साब्रवीत्।
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवी:॥ २४
तावदिन्द्रः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभः।
सर्वामरवरो नानादिव्यभास्त्रिदिवेश्वरः ॥ २५
तं दृष्ट्वा शंकरः सोऽयमिति सा प्राह मेनका।
शक्रः सुरपतिश्चायं स नेति त्वं तदाब्रवीः॥ २६
ताबच्चन्द्रः समायातः शोभां तदद्विगुणां दधत्।
दृष्ट्वा तं प्राह रुद्रोऽयं तां तु नेति त्वमब्रवीः॥ २७
तावत्सूर्यः समायातः शोभां तदद्विगुणां दधत्।
दृष्ट्वा तं प्राह सा सोऽयं तां तु नेति त्वमब्रवी: ॥ २८
तावत्समागतास्तत्र भृग्वाद्याश्च मुनीश्वराः।
तेजसो राशयः सर्वे स्वशिष्यगणसंयुताः॥ २९
तमध्ये चैव वागीशं दृष्ट्वा सा प्राह मेनका।
रदरोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवी:॥ ३०
ताबद्रह्या समायातः तेजसां राशिरुत्तमः।
भ्षिवर्यसुतः साक्षाद्धर्मपुंज इव स्तुतः॥
द्वा भां तं तदा मेना महाहर्षवती मुने।
सोऽयं शिवापति: प्रह तां तु नेति त्वमब्रवीः ॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६७५
उन्हें देखकर मेनाने प्रसन्न होकर कहा-क्या
ये रुद्र है ? तब आपने उनसे कहा--नहीं । तभी वरुण
आ गये। निर्क्रतिसे भी दुगुनी शोभा उनकी देखकर
उन मेनाने कहा--ये गिरिजास्वामी रुद्र हैं? तब
आपने कहा--नहीं॥ १९-२०॥
तदनन्तर उनसे भी दुगुनी शोभा धारण किये
वायुदेव वहाँ आये। उनको देखकर मेनाने हर्षित
होकर कहा-क्या ये ही रुद्र हैं? तब आपने उनसे
कहा-नहीं। उसी समय गुह्मकपति कुबेर उनसे भी
दूनी शोभा धारण किये हुए वहाँ आये॥ २१-२२॥
उनको देखकर प्रसन्न हो उन मेनाने कहा--
क्या ये ही रुद्र हैं? तब आपने उनसे कहा--नहीं।
इतनेमें ईशानदेव आ गये ॥ २३॥
कुबेरसे भी दुगुनी उनकी शोभा देखकर
मेनाने कहा-क्या ये गिरिजापति रुद्र हैं, तब आपने
कहा--नहीं ॥ २४॥
तदनन्तर उनसे भी दुगुनी शोभासे सम्पन्न, सभी
देवताओंमें श्रेष्ठ, अनेक प्रकारकी दिव्य कान्तिवाले
और स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र आये॥ २५॥
उनको देखकर वे मेना बोलीं--क्या ये ही शंकर
हैं? तब आपने कहा-ये देवराज इन्र हैं, वे नहीं हैं॥ २६॥
तब उनसे भी दुगुनी शोभा धारण करनेवाले
चन्द्रमा आये। उन्हें देखकर मेना बोलीं-क्या ये ही
रुद्र हैं? तब आपने कहा--नहीं। इसके बाद उनसे
भी दुगुनी शोभा धारण करनेवाले सूर्य आये। उन्हें
देखकर मेनानें कहा-कया ये ही शिव हैं ? आपने
कहा-नहीं ॥ २७-२८॥
इतनेमें तेजोराशि भृगु आदि मुनीश्वर अपने
शिष्योंसहित वहाँ पहुँच गये॥ २९॥
उनके मध्यमें बृहस्पतिको देखकर मेना
बोली--ये ही गिरिजापति रुद्र हैं ? तब आपने कहा--
नहीं॥ ३०॥
उसके बाद तेजोंकी महाराशि तथा साक्षात्
धर्मके पुंजके समान मैं ब्रह्मा स्तुत होता हुआ ऋषियों
तथा पुत्रके सहित उपस्थित हुआ। हे मुने! मुझे देखकर
मेना बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने कहा-क्या ये ही
शिव हैं तब आपने उनसे कहा-नहीं ॥ ३१-३२॥
६७६
श्रीशिवमहापुराण
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विष्णुर्देवः समागतः।
सर्वशोभान्वितः श्रीमान्मेघश्यामश्चतुर्भुजः॥ ३३
'कोटिकन्दर्पलावण्यः पीताम्बरधरः स्वराट्।
राजीवलोचनः शान्तः पक्षीन्रवरवाहनः॥ ३४
शंखादिलक्षणेर्युक्तो मुकुटादिविभूषितः।
श्रीवत्सवक्षा लक्ष्मीशो ह्यप्रमेयप्रभान्वितः॥ ३५
तं दृष्ट्या चकिताक्ष्यासीन्महाहर्षेण साब्रवीत्।
सोऽयं शिवापतिः साक्षाच्छिवो वै नात्र संशयः ॥ ३६
अथ त्वं मेनकावाक्यमाकण्योवाच ऊतिकृत्।
जायं शिवापतिरयं किन्त्वयं केशवो हरिः॥ ३७
शंकराखिलकार्यस्य हाधिकारी च तत्तप्रियः।
अतोऽधिको वरो ज्ञेयः स शिवः पार्वतीपतिः ॥ ३८
तच्छोभां वर्णितुं मेने मया नैव हि शक्यते।
स एवाखिलब्रह्माणडपतिः सर्वेश्वरः स्वराट्॥ ३९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मेना मेने च तां शुभाम्।
महाधनां भाग्यवती कुलत्रयसुखावहाम्॥ ४०
उवाच च प्रसन्नास्या प्रीतियुक्तेन चेतसा।
स्वभाग्यमधिकं चापि वर्णयन्ती मुहुर्मुहुः ॥ ४९
मेनोवाच
धन्याहं सर्वथा जाता पार्वत्या जन्मनाधुना।
धन्यो गिरीश्वरोऽप्यद्य सर्व॑ धन्यतमं मम॥ ४२
ये ये दृष्टा मया देवा नायका: सुप्रभान्विताः।
एतेषां यः पतिः सोऽत्र पतिरस्या भविष्यति॥ ४३
अस्याः किं वर्ण्यते भाग्यमपि वर्षशतैरपि।
वर्णितुं शक्यते नैव तत्प्रभुप्राप्तिदर्शनात्॥ ४४
[ IIo
इसी बीच सम्पूर्ण शोभासे युक्त,
समान श्याम वर्णवाले, चार वजातो ह
कामदेवके समान कमनीय, पीताम्बर धारण किये हु
अपने तेजसे प्रकाशित, कमलनयन
श्रेष्ठ गरुड़पर सवार, शंख आदि लक्षणोसे
मुकुट आदिसे विभूषित, वक्ष:स्थलपर
चिह्न धारण किये हुए, अप्रमेय कान्तिसे समन
लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु वहाँ आये॥ ३३-३५॥
उनको देखकर उनके नेत्र चकित हो गये और.
उन्होंने हर्षसे भरकर कहा--ये ही साक्षात् गिरिजा
शिव हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६॥
तब मेनकाका वचन सुनकर परम कौतु
आपने कहा-वे शिवापति नहीं हैं, अपितु ये केशव
विष्णु हैं॥ ३७॥
ये शंकरजीके समस्त कार्योके अधिकारी तथ
उनके प्रिय हैं, उन पार्वतीपति शिवको इनसे भ॑
अधिक श्रेष्ठ समझना चाहिये हे मेने! उनकी शोभका
वर्णन मैं नहीं कर सकता, चे ही समस्त ब्रह्माण्डे
अधिपति, सर्वेश्वर तथा स्वराट् हैं ॥ ३८-३९॥
ब्रह्माजी बोले--नारदके वचनको सुनकर न
उसको [पार्वतीको] महाधनवती, भाग्यवती, तीने
कुलों (पितृकुल, मातूकुल तथा पतिकुल)-को सुड
देनेवाली तथा कल्याणकारिणी समझा॥ ४०॥ ,
उसके बाद प्रीतियुक्त चित्तसे प्रसत्त मुखवात
मेना बार-बार अपने भाग्यकी बड़ाई करती हुई
लगीं ॥ ४१॥ ;
मेना बोलीं _पार्वतीके जन्मसें इस सम
सर्वथा धन्य हो गयी, गिरीश्वर भी आज ध
गये, मेरा सब कुछ धन्य हो गया। उत्तम ग
युक्त जिन-जिन देवताओं एवं प
देखा-इन सबके जो स्वामी हैं, वे ही इसके
होंगे॥ ४२-४३॥ कं
उसके भाग्यका क्या वर्णन किया जाय!
डार भगवान् शिवको पतिरूपमें प्राप्त दी
कारण सौ वर्षोमें भी पार्वतीके सौभाग्यकी
नहीं किया जा सकता॥ ४४॥
न ४३]
ब्रह्मोवाच
इत्यवादीच्च सा मेना प्रेमनिर्भरमानसा।
तावत्समागतो रूद्रोऽद्भुतोतिकारकः प्रभुः ॥ ४५
मेनागर्वापहारकाः।
आत्मानं दर्शयन् मायानिर्लिप्ं निर्विकारकम्॥ ४६
तमागतमभिप्रेत्या नारद् त्वं मुने तदा।
परेनामबोचः सुप्रीत्या दर्शयंस्तं शिवापतिम्॥ ४७
नारद उवाच
अवं स शंकरः साक्षाद् दृश्यतां सुन्दरि त्वया।
यदर्थे शिवया तप्तं तपोऽति विपिने महत्॥ ४८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता हर्षिता मेना तं ददर्श मुदा प्रभुम्।
अद्भुताकृतिमीशानमद्भुतानुगमद्धुतम्_ ॥४९
तावदेवं समायाता रुद्रसेना महाद्धुता।
भूतप्रेतादिसंयुक्ता जानागणसमन्विता॥ ५०
वात्यारूपध्षराः केचित्पताकामर्मरस्वनाः।
वक्रतुंडास्तत्र केचिद्विरूपाश्रापे तथा॥५१
कराला: शश्रुलाः केचित्केचित्खज्ञा हालोचना:।
दण्डपाशधराः केचित्केचिन्मुद्रपाणयः॥ ५२
विरुद्धवाहनाः केचिच्छुंगनादनिनादिनः |
डमरोर्वादिन: केचित्केचिद्रोमुखवादिनः॥ ५३
अपुखा; विमुखाः केचित्केचिद् बहुमुखा गणा:।
अकरा विकरा: केचित्केचिद् बहुकरा गणा: ॥
अनेत्रा बहुनेत्राश्व विशिराः कुशिरास्तथा।
बहुकर्णाश्र नानावेषधरा गणाः॥ ५५
शैयादिविकृताकारा अनेके प्रबला गणाः।
तात महावीरा भयंकराः ५६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६७७
ब्रह्माजी बोले--प्रेमसे परिपूर्ण चित्तवाली मेना
जब इस प्रकार कह रही थीं, उसी समय सब कुछ
करनेमें सर्वथा समर्थ प्रभु रुद्र अद्भुत वेष धारणकर
आ गये॥ ४५॥
हे तात! उनके गण भी अद्भुत थे, जो मेनाके
गर्वको दूर करनेवाले थे। उस समय प्रभु रुद्र अपनेको
मायासे निर्लिप्त तथा निर्विकार दिखा रहे थे ॥ ४६॥
हे नारद! हे मुने! उस समय उनको आया
देखकर परम प्रेमसे आप शिवाके पति शंकरको
दिखाते हुए मेनासे कहने लगे--॥ ४७॥
नारदजी बोले-हे सुन्दरि! आप देखिये, ये
ही वे साक्षात् शंकर हैं, जिनके निमित्त वनमें पार्वतीने
कठिन तप किया था॥ ४८॥
ब्रह्माजी बोले-नारदके वचनको सुनकर
मेना हर्षित होकर अद्भुत आकृतिवाले, अद्भुत गणोंसे
युक्त तथा आश्चर्यजनक प्रभु शिवजीको देखने
लगीं ॥ ४९॥
उसी समय भूत-प्रेत आदिसे युक्त तथा नाना
प्रकारके गणोंसे समन्वित अत्यन्त अद्भुत रुद्रसेना
आ पहुँची ॥ ५०॥
उनमें कोई आँधीके समान रूप धारण किये हुए
थे, कोई पताकाके समान मर्मर शब्द कर रहे थे, कोई
वक्रतुण्ड थे तथा कोई विकृत रूपवाले, कोई विकराल
थे, कोई बड़ी दाढ़ी-मूँछवाले थे, कोई लँगडे थे, कोई
अन्धे थे, कोई हाथमें दण्ड, पाश तथा कोई मुद्गर
धारण किये हुए थे, कोई विरुद्ध वाहनपर सवार थे,
कोई शृंगीनाद कर रहे थे, कोई डमरू बजा रहे थे,
कोई गोमुख बजा रहे थे, कोई मुखरहित थे, कोई
विकट मुखवाले थे, कोई गण बहुत मुखवाले थे, कोई
हाथसे रहित थे, कोई विकृत हाथवाले थे, कोई गण
बहुत हाथोंवाले थे। कोई नेत्रहीन, कोई बहुत
नेत्रवाले, कोई बिना सिरके, कोई विकृत सिरवाले,
कोई कर्णहीन तथा कोई बहुत कानवाले थे। सभी
गण जाना प्रकारके वेष धारण किये हुए थे। इसी
प्रकार और भी विकृत आकारवाले अनेक प्रबल गण
थे। हे तात! वे असंख्य, बड़े वीर और भयंकर
थे॥५१-५६॥
६७८
अङ्गुल्या दर्शयंस्त्वं तां मुने रुद्रगणांस्ततः।
हरस्य सेवकान्पश्य हरं चापि वरानने॥ ५७
असंख्यातान् गणान् दृष्ट्वा भूतप्रेतादिकान् मुने।
तत्क्षणादभवत्सा बे मेनका त्राससंकुला॥ ५८
तन्मध्ये शंकरं चैव निर्गुणं गुणवत्तरम्।
वृषभस्थं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं भूतिभूषितम्॥ ५९
कपर्दिनं चन्द्रमौलिं दशहस्तं कपालिनम्।
व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च पिनाकवरपाणिनम्॥ ६०
शूलयुक्तं विरूपाक्षं विकृताकारमाकुलम्।
गजचर्म वसानं हि वीक्ष्य त्रेसे शिवाप्रसूः ॥ ६१
चकितां कम्पसंयुक्तां विह्वला विभ्रमद्भियम्।
शिवोऽयमिति चाङ्गुल्या दर्शयंस्तं त्वमब्रवी: ॥ ६२
त्वदीयं तद्वचः श्रुत्वा वाताहतलता इव।
सा पपात ड्रुतं भूमौ मेना दुःखभरा सती॥ ६३
किमिदं विकृतं दृष्ट्वा वञ्जिताहं दुराग्रहे।
इत्युक्त्वा मूर्च्छिता तत्र मेनका साभवतक्षणात्॥ ६४
अथ प्रयलेर्विविधैः सखीभिरुपसेविता।
लेभे संज्ञां शनैमेंना गिरीश्चरप्रिया तदा॥ ६५
श्रीशिवमहापुराण
[अ य पान ब
उसके बाद हे मुने! आपने मेनाको र्रा |
अँगुलीसे दिखाते हुए कहा-हे वरानने नि
अगुः हुए हे वरानने! आए ष
शंकरके गणोंको और शंकरको भी देखिये) था
हे मुने! भूत-प्रेत आदि असंख्य गणोंको दे
वे मेना तत्क्षण भयसे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं॥ पश
उन गणोंके मध्य निर्गुण, परम गुणी, वृषभ
सवार, पाँच मुख तथा तीन नेत्रवाले, शिवविभूतिे
विभूषित, जटाजूटसे युक्त, मस्तकमें चन्द्रकलासे शोभ
दस भुजाओंसे युक्त, कपाल धारण किदे, व्याप्रचर्मक
उत्तरीय धारण किये हुए, हाथमें श्रेष्ठ पिनाक धात
किये हुए, शूलसे युक्त, विरूप नेत्रवाले, विकृत
आकारवाले, व्याकुल तथा गजचर्म ओढे हुए शिव
देखकर पार्वतीकी माता भयभीत हो उठीं॥ ५९-६१]
उसके अनन्तर आश्चर्यचकित, कापती हुई, व्यकुल
तथा भ्रमित बुद्धिवाली उन मेनाको अँगुलीके संकेते
शिवजीकी ओर दिखाते हुए आपने कहा-ये ही
शिव हैं। आपके उस वचनको सुनते ही वे सती मेत
दुःखित होकर वायुके झोंकेसे गिरी हुई लताके समाग
शीघ्र ही पृथिवीपर गिर पड़ीं। इस विकृत रूपको
देखकर दुराग्रहमें फँसकर मैं ठगी गयी-ऐसा कहक
वे मेना क्षणमात्रमें मूच्छित हो गयीं ॥ ६२-६४॥
उसके बाद सखियोंके द्वारा अनेक प्रकारके
प्रयलोंसे उपचार करनेपर हिमालयप्रिया मेनाको धीर
धीरे चैतन्य प्राप्त हुआ॥ ६५॥
इति श्रीशिवमहाएयणे द्ितीयायां र्दसंहितायां तृतीये पार्वती खण्डे शिवाद्धतलीलावर्णन नाम त्रिचत्यािशोऽ ध्या: ॥ २
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवकी
अद्भुत लीलाका वर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
— See
अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
शिवजीके रूपको देखकर मेनाका विलाप, पार्वती तथा नारद आदि सभीको फटकार!
शिवके साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, विष्णुद्वारा मेनाको समझाना
ब्रह्मोवाच
संज्ञां लब्ध्वा तत: सा च मेना शैलप्रिया सती।
विललापातिसंक्षुब्धा तिरस्कारमथाकरोत्॥ १ लगीं और
तत्र तावत्सवपुतरांश्च निनिन्द स्खलिता मुहुः।
प्रथमं सा ततः पुत्रीं कथयामास दुर्बच:॥ २ बाद
ब्रह्माजी बोले-_ [हे नारद!] चेतना प्राप्त
सती मेना अत्यन्त क्षुब्ध होकर विलाप ब
सबका तिरस्कार करने लगीं । उन्होंने
होकर सर्वप्रथम अपने पुत्रोंकी निन्दा की और ई
द वे अपनी पुत्रको दुर्वचन कहने लगीं॥ १९
> ४४]
मेनोवाच
मुन पुरा त्वया प्रोक्तं वरिष्यति शिवा शिवम्।
पश्चाद्धिमवतः कृत्यं पूजार्थं विनिबेशितम्॥ ३
ततो दृष्टं फलं सत्यं विपरीतमनर्थकम्।
मुनेऽधमाहं दुर्बुद्धे सर्वथा वञ्चिता त्वया॥ ४
पुनस्तया तपस्तप्तं दुष्करं मुनिभिश्च यत्।
तस्य लब्धं फलं ह्येतत्पश्यतां दुःखदायकम्॥ ५
किं करोमि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहताम्।
कुलादिकं विनष्टं मे विहतं जीवितं मम॥ ६
कव गता ऋषयो दिव्याः श्मश्रूणि त्रोटयाम्यहम्।
तपस्विनी च या पत्नी सा धूर्ता स्वयमागता॥ ७
केषाञ्जैवापराधेन सर्व॑ नष्टं ममाधुना।
इत्युक्त्वा वीक्ष्य च सुतामुवाच वचनं कटु॥ ८
किं कृतं ते सुते दुष्टे कर्म दुःखकरं मम।
हेम दत्वा त्वयानीतः काचो वे दुष्टया स्वयम्॥ ९
हित्वा तु चन्दनं भूयो लेपितः कर्दमस्त्वया।
हंसमु्टीय काको वै गृहीतो हस्तपञ्जरे॥ १०
हित्वा ब्रह्मजलं दूरे पीतं कूपोदकं त्वया।
सूर्य हित्वा तु खद्योतो गृहीतो यत्तस्त्वया॥ ११
तण्डुलांश्च तथा हित्वा कृतं वै तुषभक्षणम्।
प्रक्षिप्याज्यं तथा तैलं कारण्डं भुक्तमादरात्॥ १
सिंहसेवां तथा मुवत्वा शृगालः सेवितस्त्वया।
ब्रह्मविद्या तथा मुक्त्वा कुगाथा च श्रुता त्वया ॥ ९३
गृहे यज्ञविभूतिं हि दूरीकृत्य सुमङ्गलाम्।
गृहीतं च चिताभस्म त्वया पुत्रि ह्यमङ्गलम्॥ ९४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६७९
मेना बोली--हे मुने! पहले आपने ही कहा
था कि यह पार्वती शिवको वरण करेगी। तत्पश्चात्
हिमवान्से कहकर आपने उसे तपस्याके कार्यमें
लगाया॥ ३॥
उसका तो प्रतिकूल एवं अनर्थकारी परिणाम
दिखायी पड़ा, यह सत्य है। हे दुष्टबुद्धिवाले मुने!
आपने मुझ अधमको सर्वथा धोखा दिया॥४॥
हे मुने! उसने मुनियोंके द्वारा असाध्य परम
दुष्कर जो तप किया, उसका यह फल प्राप्त हुआ,
जो देखनेवालोंको भी दुःख देनेवाला है । अब मैं क्या
करूँ और कहाँ जाऊँ? कौन मेरे दु:खको दूर करेगा,
मेरा कुल आदिं नष्ट हो गया, मेरा जीवन भी नष्ट
हो गया॥५-६॥
वे दिव्य ऋषि कहाँ गये ? मैं उनकी दाढ़ी-मूँछ
उखाड़ लूँ। जो वसिष्ठपली तपस्विनी है, वह धूर्त
यहाँ स्वयं आयी थी॥७॥
किनके अपराधसे मेरा सब कुछ नष्ट हो
गया-एऐसा कहकर पुत्रीकी ओर देखकर वे कटु
वचन कहने लगीं॥ ८॥
हे सुते! हे दुष्टे! तुमने मुझे दुःख देनेवाला कर्म
क्यों किया? तुझ दुष्टने स्वयं सोना देकर काँच
ले लिया!॥ ९॥
चन्दनको छोड़कर तुमने अपने शरीरमें
कीचड़का लेप कर लिया! हंसको उड़ाकर तुमने
पिंजड़ेमें कौआ ग्रहण कर लिया!॥ १०॥
गंगाजलको दूर छोड़कर तुमने कुएँका जल पी
लिया और सूर्यको छोड़कर प्रयत्नपूर्वक जुगनू ग्रहण
कर लिया!॥ ११॥
चावलोंका त्यागकर भूसी खा ली और घीको
छोड़कर आदरपूर्वक कारण्डका तेल पी लिया!॥ १२॥
सिंहकी सेवा छोड़कर तुमने शृगालकी सेवा की
और ब्रह्मविद्याका त्यागकर तुमने कुत्सित गाथा
सुनी!॥ १३॥
है पुत्रि! तुमने घरकी परम मांगलिक
यज्ञविभूतिकों छोड़कर अमंगल चिताभस्मको धारण
किया!॥ १४॥
६८०
सर्वान् देववरांस्त्यकत्वा विष्णवादीन्परमेश्वरान्।
कृतं त्वया कुबुद्धया वै शिवार्थं तप ईदृशम्॥ १५
धिक्त्वां च तव बुद्दि च धिग्रूपं चरितं तव।
धिक् चोपदेशकर्तारं धिक्सख्यावपि ते तथा॥ १६
आवां च धिक्तथा पुत्रि यो ते जन्मप्रवर्तकौ।
धिक्ते नारद बुद्धि च सपर्षीश्च कुबुद्धिदान्॥ १७
धिक्कुलं धिक् क्रियादाक्षयं सर्व धिग्यत्कृतं त्वया ।
गृहं तु धुक्षितं त्वेतन्मरणं तु ममेव हि॥ १८
पर्वतानामयं राजा नायातु निकटे मम।
सप्तर्षयः स्वयं नेव दर्शयन्तु मुखं मम॥ १९
साधितं किं च सवेस्तु मिलित्वा घातितं कुलम्।
बन्ध्याहं न कथं जाता गर्भो न गलितः कथम्॥ २०
अथो न वा मृता चाहे पुत्रिका न मृता कथम्।
राक्षसाद्ये: कथं नो वा भक्षिता गगने पुनः ॥ २१
छेदयामि शिरस्तेऽद्य किं करोमि कलेवरैः।
त्यक्त्वा त्वां च कुतो यायां हाहा मे जीवितं हतम्॥ २२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा पतिता सा च मेना भूमौ विमूर्छिता।
व्याकुला शोकरोषाद्यैर्न गता भर्तृसन्निधौ॥ २३
हाहाकारो महानासीत्तस्मिन्काले मुनीश्वर।
सर्वे समागतास्तत्र क्रमात्तत्सन्निधौ सुराः॥ २४
पुरा देवमुने चाहमागतस्तु स्वयं तदा।
मां दृष्ट्वा त्वं वचस्तां वै प्रावोच ऋषिसत्तम ॥ २५
श्रीशिवमहापुराण
[ रा निगा w
विष्णु आदि परमेश्वरों तथा र्ठ देका
छोड़कर तुमने कुबुद्धिसे शिवके निमित्त ऐसा ह
किया !॥ १५॥ i
तुम्हें तथा तुम्हारी बुद्धिको धिक्कार है, तुझा
रूप तथा आचरणको धिक्कार है, तुम्हें अ
देनेवालेको धिक्कार है और तुम्हारी उन सखियोंके
भी धिक्कार है! हे पुत्रि! जो तुमको जन्म देरा
हैं--ऐसे हम दोनोंको धिक्कार है। हे नारद! आपके
बुद्धिको धिक्कार है और कुबुद्धि देनेवाले सपति
धिक्कार है!॥ १६-१७॥
कुलको धिक्कार है, तुम्हारी कार्यकुशलताको
धिक्कार है, तुमने जो कुछ किया, उस सबके
धिक्कार है, तुमने घरको नष्ट कर दिया, अब तो मे
मरण ही है॥ १८॥
ये पर्वतराज मेरे निकट न आयें और स्वयं
सप्तर्षिगण भी मुझे अपना मुँह न दिखायें॥ १९॥
सब लोगोंने मिलकर यह क्या किया, जिसमे
मेरा कुल ही नष्ट हो गया। मैं वन्ध्या क्यों न हुई
मेरा गर्भ क्यों नहीं गिर गया। मैं ही क्यों नहीं मा
गयी अधवा मेरी पुत्री ही क्यों नहीं मर गी!
आकाशमें [ले जाकर] राक्षसोंने उसे क्यों नहीं ख
लिया ?॥ २०-२१॥
आज मैं तुम्हारा सिर काट डालूँ, अब मुझे स
शरीरसे कया करना है, किंतु क्या करूँ, तुम्हें त्यागक!
भी कहाँ जाऊँ? हाय! मेरा जीवन ही 7
हो गया॥ २२॥
ब्रह्माजी बोले-_इस प्रकार कहकर वे गै
मूच्छित हो पृथिवीपर गिर पड़ीं। वे शोक तथ
रोष आदिसे व्याकुल होनेके कारण पतिके पास *
सका ॥ २३॥
हे मुनीश्वर! उस समय सारे घरमें pl
मच गया, फिर सब देवता बारी-बारीसे वहीं
समीप आये॥ २४॥ ]
हे देवमुने! पहले मैं स्वयं ही [उनके स
आया | तब हे ऋषिश्रेष्ठ। मुझे देखकर आएं के
वचन कहने लगे-॥ २५॥
के डड]
नारद उवाच
यथार्थ सुंदरं रूपं न ज्ञातं ते शिवस्य वै।
लीलयेदं थृतं रूपं न यथार्थं शिवेन च॥ २६
तस्मात्क्रोधं परित्यज्य स्वस्था भव पतित्रते।
कार्य कुरु हठं त्यक्त्वा शिवां देहि शिवाय च॥ २७
ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य वचस्ते सा मेना त्वां वाक्यमब्रवीत्।
उत्तिष्ठेतो गच्छ दूरं दुष्टाधमवरो भवान्॥ २८
इत्युक्ते तु तया देवा इन्द्राद्याः सकलाः क्रमात्।
समागत्य च दिक्पाला वचनं चेदमब्रुवन्॥ २९
देवा ऊचुः
हे मेने पितृकन्ये हि श्रृण्वस्मद्गबचनं मुदा।
अयं वै परमः साक्षाच्छिवः परसुखावहः॥ ३०
कृपया च भवत्पुत्र्यास्तपो दृष्ट्वातिदुस्सहम्।
दर्शनं दत्तवान् शम्भुर्वरं सद्भक्तवत्सलः॥ ३१
ब्रह्मोवाच
अधोवाच सुरान्मेना विलप्याति मुहुर्मुहुः ।
न देया तु मया कन्या गिरिशायोग्ररूपिणे॥ ३२
किमर्थं तु भवन्तश्च सर्वे देवा: प्रवञ्चिताः।
रूपमस्याः परन्नाम व्यर्थीकर्तु समुद्यताः॥ ३३
इत्युक्ते च तया तत्र ऋषयः सप्त एव हि।
ऊचुस्ते वच आगत्य वसिष्ठाद्या मुनीश्वर॥ ३४
सप्तर्षय ऊचुः
कार्य साधयितुं प्राप्ताः पितृकन्ये गिरिप्रिये।
विरुद्ध चात्र युक्तार्थ कथं मन्यामहे वयम्॥ ३५
अयं वै परमो लाभो दर्शनं शंकरस्य यत्।
दानपात्र स ते भूत्वागतस्तव च मंदिरम्॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता तैस्ततो मेना मुनिवाक्यं मृषाकरोत्।
प्रत्युवाच च रुष्टा सा तानृषीन् ज्ञानदुर्बला॥ ३७
मेनोवाच
शस्त्रादयोर्घातयिष्ये5हं न दास्ये शंकराय ताम्।
दूर गच्छत सर्वे हि नागन्तव्यं मदन्तिके ॥ ३८
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६८१
नारदजी बोले--[हे मेने!] तुमने शिवजीके
वास्तविक सुन्दर रूपको नहीं पहचाना, शिवजीने यह
रूप लीलासे धारण किया है, यह उनका यथार्थ रूप
नहीं है। हे पतित्रते! इसलिये तुम क्रोध छोड़कर
स्वस्थ हो जाओ और हठ छोड़कर कार्य करो तथा
पार्वतीको शंकरके निमित्त प्रदान करो॥ २६-२७॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! तब आपका वचन
सुनकर मेनाने आपसे यह वाक्य कहा--तुम बड़े दुष्ट एवं
अधम हो, उठो और यहाँसे दूर चले जाओ | उनके इस
प्रकार कहनेपर समस्त इन्द्रादि देवता तथा दिक्पाल क्रमसे
आकर मेनासे यह वचन कहने लगे-- ॥ २८-२९ ॥
देवता बोले--हे मेने! हे पितृकन्ये ! प्रसन्न होकर
तुम हमारी बात सुनो। ये दूसरोंको सुख देनेवाले
साक्षात् शिवजी हैं। भक्तवत्सल इन भगवान् शिवने
तुम्हारी पुत्रीका अत्यन्त कठिन तप देखकर कृपापूर्वक
उसे दर्शन देकर वर प्रदान किया॥ ३०-३१॥
ब्रह्माजी बोले--इसके बाद मेना बारंबार बहुत
विलाप करके देवताओंसे बोली--भयानक रूपवाले
शिवको मैं अपनी कन्या नहीं दूँगी॥ ३२॥
आप सभी देवगण किसलिये प्रपंचमें पड़े हैं
और इसके श्रेष्ठ रूपको व्यर्थ करनेके लिये तत्पर
हैं ?॥ ३३॥
हे मुनीश्वर! उनके इस प्रकार कहनेपर सभी
बसिष्ठादि सप्तर्षि वहाँ आकर उनसे यह वचन कहने
लगे॥ ३४॥
सप्तर्षि बोले हे पितृकन्ये! हे गिरिप्रिये ! हम
कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं, जो बात ठीक हैं, उसे
हम विपरीत कैसे मान सकते हैं ? यह सबसे बड़ा लाभ
है, जो आपको शंकरजीका दर्शन प्राप्त हुआ और वे
दानके पात्र होकर आपके घर आये हैं ॥ ३५-३६॥
ब्रह्माजी बोले-उनके इस प्रकार कहनेपर
मेनाने उन मुनियोंके वचनको झूठा समझ लिया और
वे अज्ञानतावश रुष्ट होकर उन ऋषियोंसे इस प्रकार
कहने लगीं-॥ ३७॥
मेना बोलीं--मैं शस्त्र आदिसे उसका वध कर
डालूँगी, किंतु शंकरके निमित्त उसे नहीं दूँगी। आप
सभी दूर चले जाइये और मेरे पास मत आइयेगा॥ ३८॥
६८२
श्रीशिवमहापुराण
[3 ६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा विररामाशु सा विलप्यातिविह्वला।
हाहाकारो महानासीत्तत्र तद्वृत्ततो मुने॥ ३९
ततो हिमालयस्तत्राजगामातिसमाकुलः।
तां च बोधयितुं प्रीत्या प्राह तत्त्वं च दर्शयन्॥ ४०
हिमालय उवाच
शृणु मेने वचो मेऽद्य विकलासि कथं प्रिये।
के के समागता गेहं कथं चेतान्विनिन्दसि।॥ ४९
शंकरं त्वं न जानासि रूपं दृष्ट्वासि विह्ृला।
विकटं तस्य शंभोस्तु नानारूपाभिधस्य हि॥ ४२
स शंकरो मया ज्ञातः सर्वेषां प्रतिपालकः।
पूज्यानां पूज्य एवासौ कर्तानुग्रहनिग्रहौ॥ ४३
हठं न कुरु मुञ्च त्वं दुःखं प्राणप्रियेऽनघे।
उत्तिष्ठारं तथा कार्य कर्तुमर्हसि सुव्रते॥ ४४
यद्वै द्वारगतः शंभुः पुरा विकटरूपधृक्।
जानालीलां च कृतवान् चेतयामि च तामिमाम् ॥ ४५
तन्माहात्म्यं परं दृष्ट्वा कन्यां दातुं त्वया मया।
अङ्गीकृतं तदा देवि तत्प्रमाणं कुरु प्रिये॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा सोऽद्रिनाथो हि विरराम ततो मुने।
तदाकर्ण्य शिवामाता मेनोवाच हिमालयम्॥ ४७
मेनोवाच
मद्वचः श्रूयतां नाथ तथा कर्तृ त्वमर्हसि।
गृहीत्वा तनुजां चैनां बदध्वा कण्ठे तु पार्वतीम् ॥ ४८
अधः पातय निःशंकं दास्ये तां न हराय हि।
तथैनामथवा नाथ गत्वा वै सागरे सुताम्॥ ४९
निमज्जय दयां त्यक्त्वा ततोऽद्रीश सुखी भव।
यदि दास्यसि पुत्रीं त्वं रूद्राय विकटात्मने।
तर्हि त्यक्ष्याम्यहं स्वामित्निश्चयेन कलेवरम्॥ ५०
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर वे मेन
हो गयीं और पुनः विलाप करके अत्यन्त व्या
उठीं। हे मुने ! उस समय इस समाचारसे बड़ा ष
मच गया। तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल होकर हिमाल
मेनाको समझानेके लिये वहाँ आये और तत्त्वकी बा
कहते हुए प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे ॥ ३९-६७ ॥
हिमालय बोले--हे मेने! हे प्रिये!
आज व्याकुल क्यों हो गयी, मेरी बात सुनो, तुझा
घर कौन-कौन लोग आये हैं, तुम इनकी निनदा क
करती हो ?॥ ४१॥
तुम शंकरको [अच्छी तरह] नहीं जानती हो
अनेक रूप और नामवाले उन शंकरके विकर रूपक्े
देखकर व्याकुल हो गयी हो | उन शंकरको मैं जानत
हूँ। वे सबका पालन करनेवाले, पूज्योंके भी पूज्य औ
निग्रह तथा अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ ४२-४३॥
हे प्राणप्रिये! हे पुण्यशीले! हठ मत को
और दुःखका त्याग करो। हे सुब्रते ! शीघ्रतासे उवे,
कार्य करो॥ ४४॥
तुम मेरी बात मानो, ये शंकर विकट रुप
धारणकर द्वारपर जो आये हैं, वे अपनी लीला ही
दिखा रहे हैं ॥ ४५॥
हे देवि! पहले हम दोनोंने उनका श्रेष्ठ माहात्व
देखकर ही कन्या देना स्वीकार किया था। हे प्र!
अब उस बातको सत्यरूपसे प्रमाणित करो ॥ ४६॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! इस प्रकार कह
उन पर्वतराज हिमालयने मौन धारण कर लिया
यह सुनकर पार्वतीकी माता मेना हिमालयसे कही
'लगीं- ॥ ४७॥
मेना बोली--हे नाथ! मेरी बात सुगिये
आप वैसा ही कीजिये, इस अपनी कन्या प
पकड़कर कण्ठमें रस्सी बाँधकर निःशंक हो
गिरा दीजिये, किंतु मैं शिवको उसे नहीं ढूँगी
है नाथ! हे पर्वतराज! इस कन्याको लें है.
दयारहित होकर समुद्रमें डुबो दीजिये और इसके
सुखी हो जाइये। ऐसा करनेसे ही सुख सिल
स्वामिन्! यदि आप भयंकर रूपवाले रुद्रकों पुत्र ठ
तो मैं निश्चित रूपसे शरीर त्याग दूँगी ॥ ४८
न ४४]
ब्रह्मोवाच
युक्ते च तदा तत्र वचने मेनया हठात्।
उवाच वचनं रम्यं पार्वती स्वयमागता॥ ५१
पार्वत्युवाच
ग्रातस्ते विपरीता हि बुद्धिर्जाताशुभावहा।
धर्मावलम्बनात्त्वं हि कथं धर्म जहासि वै॥ ५२
अयं रुद्रोऽपरः साक्षात्सर्वप्रभव ईश्वरः।
शम्भुः सुरूपः सुखदः सर्वश्रुतिषु वर्णितः॥ ५३
महेशः शंकरश्चायं सर्वदेवप्रभुः स्वराट्
जानारूपाभिधो मातईरिर्ब्रह्मादिसेवितः॥ ५४
अधिष्ठानं च सर्वेषां कर्ता हर्ता च स प्रभुः।
निर्विकारी त्रिदेवेशो ह्ाविनाशी सनातनः ॥ ५५
यदर्थे देवताः सर्वा आयाता किंकरीकृताः।
दारि ते सोत्सवाश्चाद्य किमतोऽन्यत्परं सुखम्॥ ५६
उत्तिष्ठातः प्रयत्नेन जीवितं सफलं कुरु।
देहि मां त्वं शिवायास्मै स्वाश्रमं कुरु सार्थकम्॥ ५७
देहि मां परमेशाय शंकराय जनन्यहो।
स्वीकुरु त्वमिमं मातर्विनयं मे ब्रवीमि ते॥ ५८
चेन्न दास्यसि तस्मै मां न वृणेऽन्यमहं वरम्।
भागं लभेत्कथं सहं शृगालः परवंचक:॥
मनसा वचसा मातः कर्मणा च हरः स्वयम्।
मया वृतो वृतश्चैव यदिच्छसि तथा कुरु ॥ ६०
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं शिवावाक्यं मेना शैलेश्वरप्रिया।
सुविलप्य महाक्रुद्धा गृहीत्वा 'तत्कलेवरम्॥ ६१
: कूर्परैश्रैव दन्तान्धर्षयती च सा।
ताडयामास तां पुत्री विह्ललातिरुषान्विता ॥ ६२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६८३
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! जब मेना हठपूर्वक
यह बात कह रही थीं, उसी समय पार्वती स्वयं आ
गयीं और मनोहर वचन कहने लगीं ॥ ५१॥
पार्वती बोलीं--हे मात: ! आपकी बुद्धि विपरीत
तथा अमंगलकारिणी कैसे हो गयी ? धर्मका अवलम्बन
करनेवाली होनेपर भी आप धर्मका त्याग क्यों कर
रही हैं ? ये रुद्र सबसे श्रेष्ठ, साक्षात् ईश्वर, सबको
उत्पन्न करनेवाले, शम्भु, सुन्दर रूपवाले, सुख देनेवाले
तथा सभी श्रुतियोंमें वर्णित हें ॥ ५२-५३॥
हे मातः! ये ही महेश कल्याण करनेवाले,
सर्वदेवोंके प्रभु तथा स्वराट् हैं। नाना प्रकारके रूप
एवं नामवाले और ब्रह्मा एवं विष्णु आदिसे भी
सेवित हैं ॥ ५४॥
वे सबके कर्ता, हर्ता, अधिष्ठान, निर्विकारी,
त्रिदेवेश, अविनाशी तथा सनातन हैं। इन्हींके लिये
सभी देवगण दासके समान होकर तुम्हारे द्वारपर
उत्सव करते हुए आये हैं। अब इससे बढ़कर और
क्या सुख होगा ?॥ ५५-५६॥
अतः हे मातः! प्रयत्नपूर्वक उठिये और
अपने जीवनको सफल कीजिये, आप इन शंकरजीके
निमित्त मुझे प्रदान कीजिये और अपना गृहस्थाश्रम
सफल बनाइये। हे जननि! आज आप मुझे परमेश्वर
शंकरके निमित्त प्रदान कीजिये। हे मातः! मैं आपसे
कह रही हूँ, आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार
कीजिये ॥ ५७-५८॥
यदि आपने मुझे इनको नहीं दिया, तो मैं
किसी दूसरेका पतिके रूपमें वरण नहीं करूँगी।
परवंचक शृगाल सिंहके भागको किस प्रकार प्राप्त
कर सकता है ?॥ ५९॥
हे मातः! मैंने स्वयं मन, वचन तथा कर्मसे
शिवजीका वरण कर लिया है, अब आप जैसा
चाहती हैं, वैसा कीजिये॥ ६०॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] पार्वतीका यह
वचन सुनकर पर्वतराजकी प्रिया मेना बहुत विलापकर
अत्यन्त करुद्ध होकर उनके शरीरको पकड़कर दाँतोंको
'कटकटाती हुई व्याकुल तथा रोषयुक्त होकर मुक्के
तथा केहुनोंसे पुत्रीको मारने लगीं ॥ ६१-६२॥
६८४
श्रीशिवमहापुराण
[अ IOI
ये तत्र ऋषयस्तात त्वदाद्याश्वापरे मुने।
तद्धस्तात्तां परिच्छिद्य निन्युर्दूरतरं ततः॥ ६३
तान्वै तथाविधान्दृष्ट्वा भर्त्सयित्वा पुनः पुन: ।
उवाच श्रावयन्ती सा दुर्वचो निखिलान्पुनः॥ ६४
मेनोवाच
किमेनां हि करिष्येऽहं दुष्टाग्रहवतीं शिवाम्।
दास्याम्यस्यै गरं तीव्रं कूपे क्षेप्स्यामि वा ध्रुवम् ॥ ६५
छेत्स्यामि कालीमथवा शस्त्रास्त्रेभूरिखण्डश: ।
निमज्जयिष्ये वा सिन्धौ स्वसुतां पार्वतीं खलु॥ ६६
अथवा स्वशरीरं हि त्यक्ष्याम्याश्वन्यथा भ्रुवम्।
ज दास्ये शम्भवे कन्यां दुर्गा विकटरूपिणे ॥ ६७
वरोऽयं कीदूशो भीमोऽनया लब्धश्च दुष्टया।
कारितश्चोपहासो मे गिरेश्रापि कुलस्य हि॥ ६८
न माता न पिता भ्राता न बन्धुरगोत्रजोऽपि हि।
नो सुरूपं न चातुर्यं न गृहं वास्य किंचन॥ ६९
न वस्त्रं नाप्यलङ्काराः सहायाः केऽपि तस्य न।
वाहनं न शुभं हास्य न वयो न धनं तथा॥ ७०
ज पावित्र्यं न विद्या च कीदृशः काय आर्तिद: ।
किं विलोक्य मया पुत्री देयास्मै स्यात्सुमङ्गला ॥ ७१
ब्रह्मोवाच
इत्यादि सुविलप्याथ बहुशो मेनका तदा।
रूरोदोच्चेर्मुने सा हि दुःखशोकपरिप्लुता॥ ७२
अथाहं द्वुतमागत्याकथयं मेनकां च ताम्।
शिवतत्त्वं च परमं कुज्ञानहरमुत्तमम्। ७३
ब्रह्मोवाच
श्रोतव्यं प्रीतितो मेने मदीयं वचनं शुभम्।
यस्य श्रवणतः प्रीत्या कुबुद्धिस्ते विनश्यति ॥ ७४
शङ्करो जगतः कर्ता भर्ता हर्ता तथैव च।
ज त्वं जानासि तद्रूपं कथं दुःखं समीहसे॥ ७५
हे तात! हे मुने! तदनन्तर वहाँपर तुम तथा
जो ऋषि थे, वे मेनाके हाथसे पार्वतीको झडे
ले गये। उन सबको वैसा करते देखकर कि र
फटकारकर वे मेना उन्हें सुनाती हुई पुन: क
कहने लगीं ॥ ६३-६४॥
मेना बोलीं--हाय ! इस दुराग्रहशील पाकीक्
अब मैं क्या करूँ? अब निश्चय ही या तो इसे तत
विष दे दूँगी या कुएँमें डाल दूँगी ॥ ६५॥
अथवा अस्त्र-शस्त्रोंसे काटकर इस कालके
टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगी अथवा अपनी पुत्री झु
पार्वतीको समुद्रमें डुबो दूँगी। अथवा में शो
ही निश्चित स्वयं अपना शरीर त्याग दूँगी, किंग
विकट रूपधारी शिवको अपनी कन्या दुर्गा नहँ
दूँगी ॥ ६६-६७॥
इस दुष्टाने यह कैसा विकराल वर पाया है।
ऐसा करके इसने मेरा, गिरिराजका तथा इस कुलक
उपहास करा दिया ॥ ६८॥
इस [शंकर]-के न माता हैं, न पिता हैं, न भाई
हैं, न गोत्रमें उत्पन्न बन्धु हैं, न तो इसका सुन्दर रू
है, न तो इसमें चतुराई ही है, न इसके पास घर है, त
वस्त्र है, न अलंकार है, इसका कोई सहायक भी नहीं
हैं, इसका वाहन भी अच्छा नहीं है, इसकी वय भै
[विवाहयोग्य] नहीं है। इसके पास धन भी नहीँ है।
न इसमें पवित्रता है, न विद्या है, इसका कष्टदायक
कैसा शरीर है, फिर [इसका] क्या देखकर मैं
अपनी सुमंगली पुत्री प्रदान करूँ ?॥ ६९--७१॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! इस प्रकार कह
विलाप करके दु:ख तथा शोकसे व्याप्त होकर वे
जोरूजोरसे रोने लगीं। उसके बाद मैं शीघ्रतासें अर्क
उन मेनासे अज्ञानका हरण करनेवाले श्रेष्ठ तथा
वर्णन करने लगा॥ ७२-७३॥
ब्रह्माजी बोले--हे मेने! आप आप
शुभ वचनको सुनिये, जिसके प्रेमपूर्वक सुननेसे
कुबुद्धि नष्ट हो जायगी॥७४॥ देव
शंकर 'जगतूकी सृष्टि करनेवाले, पालन रा
तथा विनाश करनेवाले हैं। आप उनके रूपकी i
जानती हैं और दुःख क्यों उठा रही हैं ?॥४*
गन ४४]
च नानालीलाकरः प्रभुः।
सर्वस्वामी स्वतन्त्रश्च मायाधीशोऽविकल्पकः ॥ ७६
इति विज्ञाय मेने त्वं शिवां देहि शिवाय वै।
कुहठं त्यज कुञ्ञानं सर्वकार्यविनाशनम्॥ ७७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सा मया मेना विलपन्ती मुहु्मुहुः।
लजां किंचिच्छनैस्त्यक्त्वा मुने मां वाक्यमब्रवीत् ॥ ७८
मेनोवाच
किमर्थ तु भवान्ब्रह्मन् रूपमस्या महावरम्।
व्यर्थीकरोति किमियं हन्यतां न स्वयं शिवा॥ ७९
ज वक्तव्यं च भवता शिवाय प्रतिदीयताम्।
नदास्ये$हं शिवायैनां स्वसुतां प्राणवल्लभाम्॥ ८०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ते तु तदा सिद्धाः सनकाद्या महामुने।
समागत्य महाप्रीत्या वचनं हीदमन्रुवन्॥ ८१
सिद्धा ऊचुः
अयं वै परमः साक्षाच्छिवः परसुखावहः।
कृपया च भवत्पुत्र्ये दर्शनं दत्तवान्प्रभुः॥ ८२
ब्रह्मोवाच
अथोवाच तु तान्मेना विलप्य च मुहुमुहुः ।
ज देया तु मया सम्यग्गिरिशायोग्ररूपिणे॥ ८३
किमर्थं तु भवन्तश्च सर्वे सिद्धाः प्रपञ्चिनः।
रूपमस्याः परं नाम व्यर्थीकर्तु समुद्यता:॥ ८४
इत्युक्ते च तया तत्र मुनेऽहं चकितोऽभवम्।
सरवे विस्मयमापन्ना देवसिद्धर्षिमानवाः ॥ ८५
एतस्मिन्समये तस्या हठं श्रुत्वा दूढं महत्
हृतं शिवप्रियो विष्णुः समागत्याब्रवीदिदम्॥ ८६
विष्णुरुवाच
पितृणां च प्रिया पुत्री मानसी गुणसंयुता।
पेली हिमवतः साक्षाद्रह्मण: कुलमुत्तमम्
महायास्तादृशा लोके धन्या ह्यसि वदामि किम्!
र्स्याधारभूतासि कथं धर्म जहासि हि॥ ८८
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६८५
ये प्रभु अनेक रूप तथा नामवाले, विविध लीला
करनेवाले, सबके स्वामी, स्वतन्त्र, मायाधीश तथा
विकल्पसे रहित हैं। हे मेने! ऐसा जानकर आप
शिवाको शिवजीके लिये प्रदान कीजिये और सभी
कार्यका नाश करनेवाले इस दुराग्रह तथा दुर्बुद्धिका
त्याग कोजिये॥ ७६-७७॥
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! मेरे ऐसा कहनेपर वे
मेना बार-बार विलाप करती हुई शनैः-शनैः लज्जा
त्यागकर मुझसे कहने लगीं- ॥ ७८॥
मेना बोलीं-हे ब्रह्मन्! आप इसके अति
शरेष्ठ रूपको किसलिये व्यर्थ कर रहे हैं? आप
इस शिवाको स्वयं मार क्यों नहीं डालते? आप
ऐसा न कहिये कि इसे शिवको दे दीजिये, मैं
अपनी इस प्राणप्रिया पुत्रीको शिवके निमित्त नहीं
दूँगी ॥ ७९-८०॥
ब्रह्माजी बोले-हे महामुने! तब उनके ऐसा
'कहनेपर सनक आदि सिद्ध आकर [मेनासे] प्रेमपूर्वक
यह वचन कहने लगे-॥ ८१॥
सिद्ध बोले-ये परम सुख प्रदान करनेवाले
साक्षात् परमात्मा शिव हैं। इन प्रभुने कृपा करके
आपकी पुत्रीको दर्शन दिया है॥ ८२॥
ब्रह्माजी बोले--तब मेनाने बार-बार विलाप
करते हुए उनसे भी कहा कि मैं भयंकर रूपवाले
शंकरको इसे नहीं दूँगी ॥ ८३॥
प्रपंचवाले आप सभी सिद्ध लोग इसके श्रेष्ठ
रूपको व्यर्थ करनेके लिये क्यों उद्यत हुए हैं ?॥ ८४॥
हे मुने! उनके ऐसा कहनेपर मैं चकित हो गया
और सभी देव, सिद्ध, ऋषि तथा मनुष्य भी आश्चर्यमें
पड़ गयें। इसी समय उनके दृढ़ तथा महान् हठको
सुनकर शिवके प्रिय विष्णुजी शीघ्र ही वहाँ आकर
यह कहने लगे-॥ ८५-८६॥
विष्णुजी बोले-आप पितरोंकी प्रिय मानसी
कन्या हैं, गुणोंसे युक्त हैं और साक्षात् हिमालयको
ल्ली हैं, आपका अत्यन्त पवित्र ब्रह्मकुल है। वैसे ही
आपके सहायक भी हैं, इसलिये आप लोकमें धन्य
हैं, में विशेष क्या कहुँ। आप धर्मकी आधारभूत हैं,
तो आप धर्मका त्याग क्यों कर रही हैं ?॥ ८७-८८॥
६८६
विरुद्धं कथ्यते किं नु त्वयैव सुविचार्यताम्॥ ८
शिवं त्वं न च जानासि निर्गुणः सगुणः स हि।
विरूपः ससुरूपो हि सर्वसेव्यः सतां गतिः॥ ९०
तेनैव निर्मिता देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
तत्पार्श्वे च तदा तेन निर्मितः पुरुषोत्तमः॥ ९१
ताभ्यां चाहं तथा ब्रह्मा ततश्च गुणरूपतः।
अवतीर्य स्वयं रुद्रो लोकानां हितकारकः ॥ ९२
ततो वेदास्तथा देवा यत्किंचिद् दृश्यते जगत्।
स्थावरं जङ्गमं चैव तत्सर्वं शंकरादभूत्॥ ९३
तद्रूपं वर्णितं केन ज्ञायते केन वा पुनः।
मया च ब्रह्मणा यस्य हन्तो लब्धश्च नैव हि॥ ९४
आन्रहास्तम्बपर्यत॑ यत्किञ्चिद् दूश्यते जगत्।
तत्सर्वं च शिवं विद्धि नात्र कार्या विचारणा ॥ ९५
स॒ एवेदूक्सुरूपेणावतीणो निजलीलया।
शिवातपःप्रभावाद्धि तव द्वारि समागतः॥ ९६
तस्मात्वं हिमवत्पत्नि दुःखं मुञ्च शिवं भज।
भविष्यति महानन्दः क्लेशो यास्यति संक्षयम्. ॥ ९७
ब्रह्मोवाच
एवं प्रबोधितायास्तु मेनकाया अभून्मुने।
तस्यास्तु कोमलं किंचिन्मनो विष्णुप्रबोधितम्॥ ९८
परं हठं न तत्याज कन्यां दातुं हराय न।
स्वीचकार तदा मेना शिवमायाविमोहिता॥ ९९
उवाच च हरि मेना किञ्चिदबुद्धा गिरिप्रिया।
श्रुत्वा विष्णुवचो रम्यं गिरिजाजननी हिसा॥ १००
यदि रम्यतनुः सः स्यात्तदा देया मया सुता।
नान्यथा कोटिशो यलैव॑च्मि सत्यं दृढे वच: ॥ १०१
*श्रीशिवमहापुराण
[ चा नत लक्स.
धू
देवैश्च ऋषिभिश्चैव ब्रह्मणा वा मया तथा । भला, आप ही विचार करें कि
ऋषि, ब्रह्माजी तथा मैं विरुद्ध त बे
आप शिवजीको नहीं जानती हैं। वे निगुण स
सजनोको शरण देनेवाल
कुरूप, सुरूप, सज्जनोंको शरण देनेवाले तथा सभ
सेव्य हैं ॥ ८९-९०॥
उन्होंने ही मूल प्रकृति इही
निर्माण किया और उस समय उनके बगलमे जे
पुरुषोत्तमकी भी रचना की। तदनन्तर उन तेन
में तथा ब्रह्मा अपने गुण तथा रूपके अनुसार उत्तन
हुए हैं। किंतु वे रुद्र स्वयं अवतरित होकर लोम
हित करते हैं॥ ९१-९२॥
वेद, देवता तथा जो कुछ स्थावर-जंगमन्न
जगत् दिखायी देता है, वह सब शिवजीसे ही उत्पन
हुआ है। उनके स्वरूपका वर्णन किसने किया है औ
उसे कौन जान सकता है? मैं तथा ब्रह्माजी भी उनबा
अन्त न पा सके॥ ९३-९४॥
ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखा
देता है, उस सबको शिव समझिये, इसमें सन्देह नं
करना चाहिये। अपनी लीलासे इस प्रकारके मुद
रूपसे अवतीर्ण हुए वे [शिव] पार्वतीके तफे
प्रभावसे ही आपके द्वारपर आये हैं॥ ९५-९६॥
इसलिये हे हिमालयपत्नि! आप दुःखका त्या
कोजिये और शिवजीका भजन कीजिये, (ऐस
करनेसे] महान् आनन्द प्राप्त होगा और क्लेश त
हो जायगा॥ ९७॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार सा
उन मेनाका विष्णुप्रबोधित मन कुछ कोमलं
गया ॥ ९८॥
किंतु उस समय शिवकी मायासे विमो
मनाने हठका परित्याग नहीं किया और शिवी १
देना स्वीकार नहीं किया॥ ९९॥ ठा
पार्वतीको माता गिरिप्रिया उन मेनाने
मनोहर वचनको सुनकर कुछ उदबुद् गत
विष्णुजीसे कहा--यदि वे सुन्दर शरीर धारण करोगे
अपनी कन्या दे सकती हूँ, अन्यथा व्वा
प्रयलोंसे भी मैं नहीं दूंगी। मैं सत्य तथा दू
कहती हू ॥ १००-१० १॥
नी ४५]
ब्रह्मोवाच
इत्युकत्वा बचनं मेना तूष्णीमास दृढव्रता।
शिवेच्छाप्रेरिता धन्या तथा याखिलमोहिनी॥ १०२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६८७
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] जो सबको
मोहनेवाली है, उस शिवेच्छासे प्रेरित हुई धन्य तथा
दृढ़ ब्रतवाली वे मेना इस प्रकार कहकर चुप हो
गयीं॥ १०२॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे मेनाप्रबोधवर्णन नाम चतुश्चत्वारिोऽ ध्यायः ॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
मेनाप्रबोधवर्णन नामक चाँवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥
अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता
और क्षमा-प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियोंका शिवके रूपका दर्शन
करके जन्म और जीवनको सफल मानना
ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे त्वं हि विष्णुना प्रेरितो ब्रुतम्।
अनुकूलयितुं शंभुमयास्तन्निकटे मुने॥
तत्र गत्वा स बै रुद्रो भवता सूप्रबोधितः।
स्तोत्र्नानाविधै: स्तुत्वा देवकार्यचिकीर्षया॥
श्रुत्वा त्वद्ठचनं प्रीत्या शंभुना धृतमद्भुतम्।
स्वरूपमुत्तमं दिव्यं कृपालुत्वं च दर्शितम्॥
तद् दष्ट्वा सुन्दरं शम्भुं स्वरूपं मन्मथाधिकम्।
अत्यहष्यो मुने त्वं हि लावण्यपरमायनम्॥
स्तोत्रेनानाविधै: स्तुत्वा परमानन्दसंयुतः।
आगच्छस्त्वं मुने तत्र यत्र मेना स्थिताखिलैः॥
तत्रागत्य सुप्रसन्नो मुनेऽतिप्रेमसंकुलः।
हष॑यस्तां शैलपलीं मेनां त्वं वाक्यमब्रवीः॥
नारद उवाच
मेने पश्य विशालाक्षि शिवरूपमनुत्तमम्
कृता शिवेन तेनैव सुकृपा करुणात्मता॥
ब्रह्मोवाच
शुत सा तद्वचो मेना विस्मिता शैलकामिनी।
शिवरूपं तत्परमानन्ददायकम्
सर्वावयवसुन्दरम्।
विचित्रवसनं चात्र नानाभूषणभूषितम्॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! इसी समय आप
विष्णुजीसे प्रेरित होकर शिवजीको प्रसन्न करनेके
लिये शीघ्र उनके पास गये। वहाँ जाकर देवकार्य
करनेकी इच्छासे आपने अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे
स्तुति करके रुद्रको भली भाँति समझाया। तब सदाशिव
शम्भुने आपकी बात सुनकर अपनी कृपालुता दिखायी
और प्रेमपूर्वक अद्भुत दिव्य तथा उत्तम स्वरूप धारण
कर लिया॥ १-३॥
कामदेवसे भी अधिक कमनीय, लावण्यके परम
निधि तथा सुन्दर रूपवाले उन शिवको देखकर हे मुने!
आप अत्यन्त प्रसन्न हो गये और परमानन्दसे युक्त हो
अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुतिकर आप पुनः
वहाँ आये, जहाँ मेना सभी लोगोंके साथ थीं ॥ ४-५॥
हे मुने! वहाँ आकर अत्यन्त हर्षित तथा
प्रेमयुक्त आप हिमालयकी पली मेनाको हर्षित करते
हुए यह वचन कहने लगे-॥ ६॥
जारदजी बोले-हे विशाल नेत्रोंवाली मेने!
आप शिवजीके अत्युत्तम रूपको देखिये, उन्हीं करुणामय
शंकरने यह महती कृपा की है ॥७॥
ब्रह्माजी बोले--यह बात सुनकर शैलकामिनी
मेना विस्मित हो परमानन्द प्रदान करनेवाले शिवरूपको
देखने लगीं। वह रूप करोड़ों सूर्यके समान कान्तिमान्,
सभी अंगोंसे सुन्दर, विचित्र वस्त्रसे युक्त, अनेक
आधूषणोंसे अलंकृत, अत्यन्त प्रसन्न, सुन्दर हास्यसे
श्रीशिवमहापुराण
६९० [क
आ जा कमाकाणालाळळ
तस्येव सफलं जन्म तस्यैव सफला: क्रियाः! | सफल है एवं उसीकी क्रियाएँ सफल हैं, तह
येन दृष्टः शिवः साक्षात्सर्वपापप्रणाशकः ॥ ३६
पार्वत्या साधितं सर्व शिवार्थे यत्तपः कृतम् ।
धन्येयं कृतकृत्येयं शिवा प्राप्य शिवं पतिम्॥ ३७
यदीदं युगलं ब्रह्मा न युञ्ज्याच्छिवयोर्मुदा।
तदा च सकलोऽप्यस्य श्रमो निष्फलतामियात्॥ ३८
सम्यक् कृतं तथा चात्र योजितं युग्ममुत्तमम्।
सर्वेषां सार्थता जाता सर्वकार्यसमुद्भवा॥ ३९
विना तु तपसा शम्भोर्दर्शनं दुर्लभं नृणाम्।
दर्शनाच्छंकरस्यैव सर्वे याताः कृतार्थताम्॥ ४०
लक्ष्मीर्नारायणं लेभे यथा वै स्वामिनं पुरा।
तथासौ पार्वती देवी हरं प्राप्य सुभूषिता॥ ४९
ब्रह्माणं च यथा लेभे स्वामिनं वै सरस्वती।
तथासौ पार्वती देवी हरं प्राप्य सुभूषिता॥ ४२
वयं धन्याः स्त्रियः सर्वाः पुरुषाः सकला वरा: ।
ये ये पश्यन्ति सर्वेशं शंकरं गिरिजापतिम्॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्थमुक्त्वा तु वचनं चन्दनैश्ाक्षतैरपि।
शिवं समर्चयामासुर्लाजान्ववृषुरादरात्॥ इ
तस्थुस्तत्र स्त्रियः सर्वा मेनया सह सोत्सुकाः ।
वर्णयन्त्योऽधिकं भागयं मेनायाश्च गिरेरपि॥ ४५
'कथास्तथाविधाः शृणवंस्तद्वामावर्णिताः शुभा: ।
्रष्टोऽभूत््रभुः सर्वेर्मुने विष्णवादिभिस्तदा॥ ४६
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुदरसंहितायां
सुरवास्युत्सववर्णनं
7 त करनेवाले साक्षात् शिवका दशी
पार्वतीने सब कुछ सिद्ध कर लिया, जो उक
शिवके लिये तप किया । यह पार्वती शिवको पतियों
प्राप्तकर धन्य तथा कृतकृत्य हो गयी॥ ३७ |
यदि ब्रह्मा प्रसन्नतापूर्वक शिवाः शिन
इस जोड़ीको न मिलाते तो, उनका सम्पूर्ण श्रम व्यं
हो जाता॥ ३८॥
इन्होंने बहुत ठीक किया, जो यहाँ उत्त
जोड़ीका संयोग करा दिया। इससे सभीके समल
कार्योंकी सार्थकता हो गयी। बिना तपस्याके मनुष्णोंगे
शिवजीका दर्शन दुर्लभ है, [आज] शिवजीके दर्शे
ही सभी लोग कृतार्थ हो गये। जिस प्रकार पूर्व
समयमें लक्ष्मीने नारायणको पतिरूपमें प्राप्त किया थ,
उसी प्रकार ये पार्वती देवी भी शिवको प्राता
सुशोभित हो गयीं॥ ३९--४१॥
जिस प्रकार सरस्वतीने ब्रह्माको पतिहपों
पाया था, वैसे ही पार्वती देवी शंकरको प्रापक
सुशोभित हो गयीं॥ ४२॥
हम सभी स्त्रियाँ धन्य हैं तथा सभी पुरुष पन
हैं, जो-जो गिरिजापति सर्वेश्वर शिवका दर्शन का
रहे हैं॥ ४३॥
ब्रह्माजी बोले [हे नारद !] ऐसा कहकर
लोगोंने चन्दन एवं अक्षतसे शिवजीका पूजत कि
और आदरपूर्वक उनके ऊपर लाजाकी वर्षा की | ४
उसके अनन्तर सभी स्त्रियाँ उत्सुक होकर मेते
ताथ खड ही और हिमालय तथा मेनाके महा |
सराहना करने लगीं । हे मुने! स्त्रियोंके द्वारा कही 7
उस प्रकारकी शुभ बातोंको सुनकर विष्णु आरि
देवताओंके साथ प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ॐ
तृतीये पार्वतीखण्डे शिवसुन्दरस्वरूप-
४६॥
गाम पञ्चचत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुडसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डये शिवके सुद
स्वरूप और पुरवासियोंके उत्सवका वर्णन नामक
अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४५ ॥
er
गन ४६]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
नगरमें बरातियोंका प्रवेश, द्वाराचार तथा पार्वतीद्वारा कुलदेवताका पूजन
ब्रह्मोवाच
अथ शंभुः प्रसन्नात्मा सदूतं स्वगणैः सुरे: ।
स्ैरन्यैरिरेर्धाम जगाम सकुतूहलम्॥ १
मेनापि स्त्रीगणैस्तेश्च हिमाचलवरप्रिया।
तत उत्थाय स्वगृहाभ्यंतरं सा जगाम ह॥ २
नीराजनार्थं शम्भोश्च दीपपात्रकरा सती।
सर्वर्षस्त्रीगणैस्साकमगच्छद् द्वारमादरात् ॥ ३
तत्रागतं महेशानं शंकरं गिरिजावरम्।
ददर्श प्रीतितो मेना सेवितं सकलैः सुरैः॥ ४
चारुचंपकवर्णाभं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम्।
इंषद्धास्यप्रसन्नास्यं रत्मस्वर्णादिभूषितम्॥ ५
मालतीमालया युक्तं सद्रतमुकुटोज्ज्चलम्।
सत्कंठाभरणं चारुवलयाङ्गदभूषितम्॥ ६
वह्विशौचेनातुलेन त्वतिसूक्ष्मेण चारुणा।
अमूल्यवस्त्रयुग्मेन विचित्रेणातिराजितम्॥ ७
चदनागरूकस्तूरीचारुकुंकुमभूषितम् ।
रलदर्पणहस्तं च कञज्जलोज्ज्चललोचनम्॥ ८
सर्वस्वप्रभयाच्छन्नमतीव सुमनोहरम्।
अतीव तरुणं रम्यं भूषिताङ्गश्च भूषितम्॥ ९
कामिनीकांतमव्यग्रं कोटिचन्द्राननांबुजम्।
कोटिस्मराधिकतनुच्छविं सर्वागसुन्दरम्॥ १०
ईदृग्विधं सुदेवं तं स्थितं स्वपुरतः प्रभुम्।
दष्ट्वा जामातरं मेना जहौ शोकं मुदान्विता ॥ ११
प्रशशंस स्वभाग्यं सा गिरिजां भूधरं कुलम्!
कृतार्थमात्मानं जहर्ष च पुनः पुनः॥ १२
ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर शिवजी प्रसन्नचित्त
होकर अपने गणों, देवताओं, दूतं तथा अन्य सभी
लोगोंके साथ कुतूहलपूर्वक हिमालयके घर गये ॥ १॥
हिमालयकी श्रेष्ठ प्रिया मेना भी सभी स्त्रियोंके
साथ उठकर अपने घरके अन्दर गयीं ॥ २॥
इसके बाद बे सती शिवजीकी आरतीके लिये
हाथमें दीपक लेकर सभी ऋषियोंकी स्त्रियोंको साथ
लेकर आदरपूर्वक द्वारपर आयीं॥ ३॥
वहाँ मेनाने द्वापर आये हुए, सभी
देवताओंसे सेवित गिरिजापति महेश्वर शिवको
बड़े प्रेमसे देखा॥ ४॥
सुन्दर चम्पक पुष्पके वर्णके समान आभावाले,
पाँच मुखवाले, तीन नेत्रवाले, मन्द मुसकान तथा
प्रसन्ततायुक्त मुखवाले, रत्न तथां सुवर्ण आदिसे
शोभित, मालतीकी मालासे युक्त, उत्तम रत्नोंसे जटित
मुकुटसे प्रकाशित, गलेमें सुन्दर हार धारण किये हुए,
सुन्दर कंगन तथा बाजूबन्दसे सुशोभित, अग्तिके समान
देदीप्यमान, अनुपम, अत्यन्त सूक्ष्म, मनोहर, बहुमूल्य तथा
विचित्र युग्म वस्त्र धारण किये हुए, चन्दन-अगरु-
कस्तूरी तथा सुन्दर कुमकुमके लेपसे शोभित, हाथमें
रलमय दर्पण लिये हुए, कजलके कारण कान्तिमान्
नेत्रवाले, सम्पूर्ण प्रभासे आच्छन्न, अत्यन्त मनोहर,
पूर्ण यौवनवाले, रम्य, सजे हुए अंगोंसे विभूषित,
स्त्रियोंकों सुन्दर लगनेवाले, व्यग्रतासें रहित, करोड़ों
चन्रमाके समान मुखकमलवाले, करोड़ों कामदेवसे
भी अधिक शरीरकी छविवाले तथा सर्वागसुन्दर-इस
प्रकारके अपने जामाता सुन्दर देव प्रभु शिवको अपने
आगे स्थित देखकर मेनाने अपना शोक त्याग दिया
और वे आनन्दमें भर गयीं॥ ५-११॥
चे अपने भाग्य, गिरिजा तथा पर्वतके कुलकी
प्रशंसा करने लगीं । उन्होंने अपनेको कृतार्थ माना और
वे बार-बार प्रसन्न होने लगीं॥ १२॥
६९२
श्रीशिवमहापुराण
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नीराजनं चकारासौ प्रफुल्लवदना सती।
अवलोकपरा तत्र मेना जामातरं मुदा॥ १३
गिरिजोक्तमनुस्मृत्य मेना विस्मयमागता।
मनसैव ह्युवाचेदं हर्षफुल्लाननाम्बुजा॥ १४
यद्वै पुरोक्तं च तया पार्वत्या मम तत्र च।
ततोऽधिकं प्रपश्यामि सौन्दर्यं परमेशितुः॥ १५
महेशस्य सुलावण्यमनिर्वाच्यं च संप्रति।
एवं विस्मयमापन्ना मेना स्वगृहमायया॥ १६
प्रशशंसुर्युवतयो धन्या धन्या गिरेः सुता।
दुर्गा भगवतीत्येवमूचुः काश्चन कन्यकाः ॥ १७
न दृष्टो वर इत्येवमस्माभिर्दानगोचरः।
धन्या हि गिरिजादेवीमूचुः काश्चन कन्यकाः ॥ १८
जगुर्गन्धर्वप्रवरा ननृतुश्वाप्सरोगणा: ।
दृष्ट्वा शंकररूपं च प्रहष्टा: सर्वदेवता:॥ १९
नानाप्रकारवाद्यानि वादका मधुराक्षरम्।
जानाप्रकारशिल्पेन वादयामासुरादरात्॥ २०
हिमाचलोऽपि मुदितो द्वाराचारमथाकरोत्।
मेनापि सर्वनारीभिर्महोत्सवपुरस्सरम्॥ २१
'परपूच्छां चकारासौ मुदिता स्वगृहं ययौ।
शिवो निवेदितं स्थानं जगाम गणनिर्जरैः॥ २२
एतस्मिन्नन्तरे दुर्गा शैलान्तःपुरचारिकाः।
बहिर्जग्मुः समादाय पूजितुं कुलदेवताम्॥ २३
तत्र तां ददृशुर्देवा निमेषरहिता मुदा।
सुनीलाञ्जनवर्णाभां स्वाङ्गश्च प्रतिभूषिताम्॥ २४
त्रनेत्रादृतनेत्रां तामन्यवारितलोचनाम्।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सकटाक्षां मनोहराम्॥ २५
सुचारुकबरीभारां चारुपत्रकशोभिताम्।
तब वे सती मेना प्रसन्नमुख होकर आशी >:
लगीं और आनन्दपूर्वक उन्हें देखने लगी! ३
मेना गिरिजाकी कही हुई बातका स्मरणकर वि
हो गयीं। उनका मुखकमल हर्षके कारण खिल स
और बे अपने मनमें कहने लगीं--उस पार्वतीने मुझे
पूर्वमे जो कहा था, मैं तो उससे भी अधिक सोर
परमेश्वरका देख रही हूँ। इस समय महेश
सौन्दर्य तो वर्णनसे परे है। इस प्रकार विस्मित ह
मेना अपने घरके भीतर गयीं ॥ १३-१६॥
युवतियाँ प्रशंसा करने लगीं कि गिरिजा धर
हैं, धन्य हैं और कुछ कन्याओंने तो यह कहा कि
ये साक्षात् भगवती दुर्गा हैं ॥ १७॥
कुछ कन्याएँ तो इस प्रकार कहने लगीं कि ये
गिरिजा धन्य हैं, जो इन्हें मनोहर पति प्राप्त हुआ।
हमलोगोंने तो इस प्रकारके मनोहर वरका दर्शन हं
नहीं किया है॥ १८ ॥
[उस समय] श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे, अप्पर
नृत्य करने लगीं। सभी देवता शंकरजीके रूपको
देखकर अत्यन्त हर्षित हो गये॥ १९॥
बाजा बजानेवाले अनेक प्रकारके कौशल
मधुर ध्वनिमें आदरपूर्वक अनेक प्रकारके वा
बजाने लगे॥ २०॥
इसके बाद हिमालयने भी प्रसन्न होक
द्वाराचार किया। मेनाने भी आनन्दित होकर सर
स्तरयोके साथ महोत्सवपूर्वक परिछन किया।
वे अपने घरमें चली गयीं। इसके बाद
अपने गणों और देवताओंके साथ निर्दिष्ट स्थर
चले गये॥ २१-२२॥ 3
इसी बीच हिमालयके अन्तःपुरकी पा
दुर्गाको साथ लेकर कुलदेवताकी पूजा करके
बाहर गयीं॥ २३॥
वहाँपर देवताओंने प्रेमपूर्वक अपलक र
नील अंजनके समान वर्णवाली, अपने अंगोंसे विष
शिवजीके द्वारा आदृत, तीन नेत्रोंवाली, bd
अतिरिक्त] अन्यके ऊपरसे हटे हुए नेत्रवाली, टा
मन्द हासयुक्त तथा प्रसन मुखमण्डलवाली, वा
मनोहर, सुन्दर केशपाशवाली, सुन्दर पर
बट ४६]
कस्तूरीबिन्दुभिस्सार्ध सिन्दूरबिन्दुशोभिताम्॥ २६
रलेखसारहारेण वक्षसा सुविराजिताम्।
रलकेयूरवलयां रत्लनकङ्कणमंडिताम्॥ २७
सद्रलकुण्डलाभ्यां च चारुगण्डस्थलोज्ज्चलाम्।
म्णिरलप्रभामुष्टरिदन्तराजिविराजिताम् ॥२८
च रलयावकसंयुताम्।
रलदर्पणहस्तां च क्रीडापद्राविभूषिताम्॥ २९
चन्दनागुरुकस्तूरीकुंकुमेनातिच्चिताम् ।
क्वणन्मंजीरपादां च रत्तांघ्रितलराजिताम्॥ ३०
प्रणेमुः शिरसा देवीं भक्तियुक्ताः समेनकाम्।
सर्वे सुरादयो दृष्ट्या जगदाद्यां जगत्प्रसूम्॥ ३१
त्रिनेत्रो नेत्रकोणेन तां ददर्श मुदान्वितः।
शिव: सत्याकृतिं दृष्ट्वा विजहौ विरहज्चरम्॥ ३२
शिवः सर्व विसस्मार शिवासंन्यस्तलोचनः।
पुलकांचितसर्वाङ्गो हर्षाद्रौरीविलोचनः॥ ३३
अथ काली बहिः पुर्या गत्वा पूज्य कुलाम्बिकाम्।
विवेश भवनं रम्यं स्वपितुस्सद्विजाङ्गना॥ ३४
शङ्करोऽपि सुरैः सार्ध हरिणा ब्रह्मणा तथा।
हिमाचलसमुद्दिष्ट॑ स्वस्थानमगमन्मुदा॥ ३५
त्र सर्वे सुखं तस्थुः सेवन्तः शङ्करं यथा।
सम्मानिता गिरीशेन नानाविधसुसम्पदा॥ ३६
श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयाया खसंहितायों तीये
॥ इस प्रकार
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६९३
शोभित, कस्तूरी-बिन्दुसहित सिन्दूरबिन्दुसे शोभित,
वक्षःस्थलपर श्रेष्ठ रलोंके हारसे सुशोभित, रत्ननिर्मित
बाजूबन्द॒ धारण करनेवाली, रलमय कंकणोंसे
मण्डित, श्रेष्ठ रलोंके कुण्डलोंसे प्रकाशित, सुन्दर
कपोलवाली, मणि एवं रत्नोंकी कान्तिको फीकी
कर देनेवाली दन्तपंक्तिसे सुशोभित, मनोहर
बिम्बफलके समान अधरोष्ठवाली, रलोंके यावक
(महावर)-से युक्त, हाथमें रत्नमय दर्पण धारण
को हुई, क्रीड़ाके लिये कमलसे विभूषित, चन्दन-
अगरु-कस्तूरी तथा कुमकुमके लेपसे सुशोभित,
मधुर शब्द करते हुए घुँघरुओंसे युक्त चरणोंवाली
तथा र्क्तवर्णके पादतलसे शोभित उन देवीको
देखा॥ २४-३०॥
उस समय सभी देवता आदिने जगतूकी
आदिस्वरूपा तथा जगतूको उत्पन्न करनेवाली देवीको
देखकर भक्तियुक्त हो सिर झुकाकर मेनासहित उन्हें
प्रणाम किया॥ ३१॥
त्रिनेत्र शंकरने भी उन्हें अपने नेत्रके कोणसे
देखा और सतीके रूपको देखकर विरहज्चरको त्याग
दिया॥ ३२॥
शिवापर टिकाये हुए नेत्रवाले शिव सब
कुछ भूल गये। गौरीको देखनेसे हर्षके कारण
उनके सभी अंग पुलकित हो उठे। इस प्रकार
कालीने नगरके बाहर जाकर कुलदेवीका पूजनकर
द्रिजपल्नियोंके साथ अपने पिताके रम्य घरमें प्रवेश
'किया॥ ३३-३४॥
शंकरजी भी देवताओं, ब्रह्मा तथा विष्णुके
साथ हिमालयके द्वारा निर्दिष्ट अपने स्थानपर
प्रसन्ततापूर्वक चले गये ॥ ३५॥
बहाँपर सभी लोग गिरीशके द्वारा नाना
प्रकारकी सम्पत्तिसे सम्मानित होकर शंकरजीकी
सेवा करते हुए सुखपूर्वक ठहर गये॥ ३६॥
पार्वतीखण्डे वरागमादिवर्णन नाम कट्चत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४६॥
रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें वरके
ie बर्णन नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४६॥
आगमन आदिका
——
६९४
श्रीशिवमहापुराण
[अः च्य ळ्या `
अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
पाणिग्रहणके लिये हिमालयके घर शिवके गमनोत्सवका वर्णन
ब्रह्मोवाच
ततः शैलवरः सोऽपि प्रीत्या दुर्गोपबीतकम्।
कारयामास सोत्साहं वेदमन्त्रेश्शिवस्य च॥ १
अथ विष्ण्वादयो देवा मुनयः सकुतूहलम्।
हिमाचलप्रार्थनया विवेशान्तर्गृहं गिरेः॥ २
श्रुत्याचारं भवाचारं विधाय च यथार्थतः।
शिवामलंकृतां चक्रुः शिवदत्तविभूषणैः॥ ३
प्रथमं स्नापयित्वा तां भूषयित्वाथ सर्वशः।
नीराजिता सखीभिश्च विप्रपलीभिरेव च॥ ४
वरवर्णिनी।
शङ्करप्रिया॥ ५
अहताम्बरयुग्मेन शोभिता
विरराज महाशैलदुहिता
कंचुकी परमा दिव्या नानारला्विताद्भुता।
विधृता च तया देव्या विलसन्त्यधिकं मुने॥ ६
सा बभार तदा हारं दिव्यरतसमन्वितम्।
बलयानि महार्हाणि शुद्धचामीकराणि च॥ ७
स्थिता तत्रैव सुभगा ध्यायन्ती मनसा शिवम्।
शुशुभेऽति महाशैलकन्यका त्रिजगत्प्रसूः॥ ८
तदोत्सवो महानासीदुभयत्र मुदावहः।
दानं बभूव विविधं ब्राह्मणेभ्यो विवर्णितम्॥ ९
अन्येषां द्रव्यदानं च बभूव विविधं महत्।
गीतवाद्यविनोदश्च तत्रोत्सवपुरस्सरम्॥ १०
अथ विष्णुरहं धाता शक्राद्या अमरास्तथा।
मुनयश्च महाप्रीत्या निखिलाः सोत्सवा मुदा॥ ११
सुप्रणम्य शिवां भक्त्या स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्।
सम्प्राप्य हिमगिर्याज्ञां स्वं स्वं स्थानं समाश्रिताः ॥ १२
एतस्मिन्नन्तरे तत्र ज्योतिःशास्त्रविशारदः।
हिमवन्तं गिरीन््रं तं गर्गो वाक्यमभाषत॥ १३
ब्रह्माजी बोले--तदनन्तर शैलराजने सनता
बड़े उत्साहसे वेदमन्त्रोके द्वारा शिवा एवं शिवी
उपनयन-संस्कार सम्पन्न कराया। तदनन्तर विश
आदि देवताओं एवं मुनियोंने हिमालयके द्वारा ग्रथ
किये जानेपर उनके घरके भीतर प्रवेश किया॥ १२
उन लोगोंने लोक तथा वेदरीतिको यथार्थ रूपे
सम्पन्नकर शिवके द्वारा दिये गये आभूषणोंसे पाकी
अलंकृत किया। सखियों और ब्राह्मणोंकी पियो
पहले पार्वतीको स्नान कराकर पुनः सभी प्रका
सजाकर उनकी आरती उतारी। शंकरप्रिया तथ
गिरिराजसुता वरवर्णिनी पार्वती उस समय दो गूल
वस्त्र धारण किये हुए अत्यन्त शोभित हो हह
थीं॥ ३-५॥
हे मुने ! उन देवीने अनेक प्रकारके रलोंसे जग
परम दिव्य तथा अद्भुत कंचुकी धारण की, जिससे वे
अधिक शोभा पाने लगीं। तदनन्तर उन्होंने दिन
रलोंसे जड़ा हुआ हार तथा शुद्ध सुवर्णके बने हुए
बहुमूल्य कंकणोंको भी धारण किया॥ ६-७॥
तीनों जगत्को उत्पन्न करनेवाली तथा महाशैलकी
कन्या सौभाग्यवती चे पार्वती मनमें शिवजीका था
करते हुए वहींपर बैठी हुई अत्यन्त शोभित होने लगीं॥
उस समय दोनों पक्षोमें आनन्ददायक मर्ह
उत्सव हुआ और [उभयपक्षसे] नाना प्रकारके
दान ब्राहमणोंको दिये गये। इसी प्रकार लोगोंकी भै
अनेक प्रकारके दान दिये गये और वहाँ
गीत, वाद्य एवं विनोद सम्पन्न हुए॥ ९-१०॥ है
तब मैं ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र स
देवगण तथा सभी मुनिलोग बड़ी ड
आनन्दपूर्वक उत्सव मनाकर भक्तिपूर्वक त
प्रणामकर तथा शिवजीके चरणकमलोंका हा
हिमालयकी आज्ञा प्राप्त करके अपने-अपने प |
बैठ गये। इसी समय वहाँ ज्योतिःशास्त्रे १.
विद्वान् गर्गाचार्य उन गिरिराज हिमालयसे रद
कहने लगे-॥ ११--१३॥
डे ४७]
गर्ग उवाच
हिमाचल धराधीश स्वामिन् कालीपित: प्रभो।
पाणिग्रहार्थ शंभुं चानय त्वं निजमंदिरम्॥ १४
ब्रह्मोवाच
अध तं समयं ज्ञात्वा कन्यादानोचितं गिरिः।
निवेदितं च गर्गेण मुमुदेऽतीव चेतसि॥ १५
प्रहीधरान्द्रिांश्चैव परानपि मुदा गिरिः।
प्रेषयामास सुप्रीत्या शिवानयनकाम्यया॥ १६
ते पर्वता द्विजाश्चैव सर्वमङ्गलपाणयः।
संजग्मुः सोत्सवाः प्रीत्या यत्र देवो महेश्वरः॥ १७
तदा वादित्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा।
महोत्साहोऽभवत्तत्र गीतनृत्यान्वितेन हि॥ १८
श्रृत्वा वादित्रनिर्घोषं सर्वे शंकरसेवकाः।
उत्थितास्त्वैकपद्येन सदेवर्षिगणा मुदा॥ १९
परस्परं समूचुस्ते हर्षनिर्भरमानसाः।
अत्रागच्छन्ति गिरयः शिवानयनकाम्यया॥ २०
पाणिग्रहणकालो हि नूनं सद्यः समागतः।
महद्भाग्यं हि सर्वेषां संप्राप्तमिह मन्महे॥ २१
धन्या वयं विशेषेण विवाहं शिवयोर्थुवम्।
अक्ष्याम: परमप्रीत्या जगतां मङ्गलालयम्॥ २२
र ब्रह्मोवाच
एवं यावदभूत्तेषां संवादस्तत्र चादरात्।
पावत्सर्वे समायाताः पर्वतेनद्रस्य मंत्रिणः ॥ २३
तेगत्वा ्रर्थयाञ्जक्रः शिवं विष्णवादिकानपि।
केन्यादानोचितः कालो वर्तते गम्यतामिति॥ २४
तै सव मुने विष्णवादयोऽखिलाः।
सुद जयेत्यूचुर्गिरि दुतम्॥ २५
शिवोऽपि मुमुदेऽतीव कालीप्रापणलालसः।
' चकार तच्चिह्नं मनस्येवाद्धुताकृतिः॥ २६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
>> सलालतत पल | ० ० ० ०9०9£__ 2 ९५
गर्ग बोले--हे हिमालय! हे धराधीश! हे
स्वामिन्। हे कालीके पिता! हे प्रभो! अब आप
पाणिग्रहणके निमित्त शिवजीको अपने घरपर ले
आइये॥ १४॥
ब्रह्माजी बोले--तत्पश्चात् गर्गके द्वारा निर्देश
किये गये कन्यादानके लिये उचित समयको जानकर
हिमालय मनमें अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १५॥
हिमालयने आनन्दित होकर [उसी समय]
पर्वतों, द्विजों तथा अन्य लोगोंको भी अत्यन्त प्रेमके
साथ शिवजीको बुलानेकी इच्छासे भेजा। वे पर्वत
तथा ब्राह्मण हाथोंमें सभी मांगलिक वस्तुएँ लेकर
महान् उत्सव करते हुए प्रेमपूर्वक वहाँ गये, जहाँ
भगवान् महेश्वर थे॥ १६-१७॥
उस समय गीत-जृत्यसहित वाद्यध्वनि तथा वेदध्वनिसे
महान् उत्सव होने लगा॥ १८॥
वाद्योंके शब्दको सुनकर शंकरजीके सभी सेवक,
देवता, ऋषि तथा गण आनन्दित होकर एक साथ ही
उठ खड़े हुए और वे हर्षसे परिपूर्ण होकर परस्पर
कहने लगे-शिवजीको बुलानेकी इच्छासे [गिरिराजके
द्वारा भेजे गये] पर्वत यहाँ आ रहे हैं॥ १९-२०॥
निश्चय ही पाणिग्रहणका काल शीघ्र उपस्थित
हो गया है, अतः सभीका महाभाग्य उपस्थित हो गया है--
ऐसा हमलोग मानते हैं । हमलोग विशेष रूपसे धन्य हैं,
क्योंकि हमलोग संसारके मंगलोंके स्थानस्वरूप शिवा-
शिवके बिवाहको अत्यन्त प्रेमसे देखेंगे॥ २१-२२॥
ब्रह्माजी बोले-जब आदरपूर्वक उनका
यह संवाद हो रहा था, उसी समय गिरिराजके सभी
मन्त्री वहाँ आ गये। उन लोगोंने जा करके विष्णु
आदि तथा शंकरसे प्रार्थना की कि कन्यादानका
उचित समय उपस्थित हो गया है, अब आप लोग
चलें॥ २३-२४॥
यह सुनकर वे विष्णु आदि सभी देवता मन-ही-
मन अत्यन्त प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे गिरिराज
हिमालयकी जय-जयकार करने लगे॥ २५॥
इधर, शिवजी भी कालीको प्राप्त करनेकी
लालसासे अत्यन्त प्रसन्न हो उठे, किंतु अद्भुत
रूपवाले उन शिवने उसके लक्षणको मनमें गुप्त रखा।
६९६
अथ स्नानं कृतं तेन मङ्गलद्रव्यसंयुतम्।
शूलिना सुप्रसन्नेन लोकानुग्रहकारिणा॥ २७
स्नातः सुवाससा युक्तः सवैस्तैः परिवारितः ।
आरोपितो वृषस्कन्धे लोकपालैः सुसेवितः ॥ २८
पुरस्कृत्य प्रभुं सर्वे जग्मुहिमगिरेगृहम्।
वाद्यानि वादयन्तश्च कृतवन्तः कुतूहलम्॥ २९
हिमागप्रेषिता विप्रास्तथा ते पर्वतोत्तमाः।
शम्भोरग्रचरा ह्यासन्कुतूहलसमन्विताः॥ ३०
बभौ छत्रेण महता श्रियमाणो हि मूर्धनि।
चामरैवीज्यमानोऽसौ सवितानो महेश्वरः॥ ३१
अहं विष्णुस्तथा चेद्रो लोकपालास्तथैव च।
अग्रगाः स्मातिशोभन्ते श्रिया परमया श्रिताः॥ ३२
ततः शङ्खाश्च भ्यश्च पटहानकगोमुखाः।
पुनः पुनरवाद्यन्त वादित्राणि महोत्सवे॥ ३३
तथैव गायकाः सर्वे जगुः परममङ्गलम्।
नर्तक्यो ननृतुः सर्वा नानातालसमन्विता: ॥ ३४
एभिस्समेतो जगदेकबन्धु-
र्ययौ तदानीं परमेशवर्चसा।
सुसेव्यमानः सकलैः सुरेश्वरैः
विकीर्यमाणः कुसुमैश्च हर्षितैः॥ ३५
सम्पूजितस्तदा शम्भुः प्रविष्टो यज्ञमण्डपम्।
संस्तूयमानो बह्वीभिः स्तुतिभिः परमेश्वरः॥ ३६
वृषादुत्तारयामासुर्महेशं पर्वतोत्तमाः ।
निन्युर्गृहान्तरं प्रीत्या महोत्सवपुरस्सरम्॥ ३७
` हिमालयोऽपि सम्प्रासं सदेवगणमीश्वरम्।
प्रणम्य विधिवद्भक्त्या नीराजनमथाकरोत्॥ ३८
श्रीशिवमहापुराण
[अ = 3
इसके उपरान्त लोकपर कृपा करनेवाले
परम प्रसन्न होकर मांगलिक द्रव्ये युक्त कु
स्नान किया॥ २६-२७॥
सभी लोकपालोंने स्नान किये हुए तथा मु
वस्त्रसे युक्त उन शिवको चारों ओरसे घेरकर उनके
सेवा की तथा उन्हें वृषभके स्कन्धपर बैठाया। इ
बाद प्रभुको आगे करके सभी लोग हिमालयके भ
ओर चल पडे वे वाद्य बजाते हुए कुतूहल क हे
थे॥ २८-२९॥
उस समय हिमालयके द्वारा भेजे गये ब्रह्म
तथा श्रेष्ठ पर्वतगण कुतूहलसे युक्त होकर शिवजीके
आगे-आगे चल रहे थे। मस्तकपर विशाल छा
लगाये हुए, चँवर डुलाये जाते एवं वितानसे युक्त वे
महेश्वर अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उस समय
आगे-आगे चलते हुए मैं, विष्णु, इन्द्र तथा समस
लोकपाल परम ऐश्वर्यसे युक्त होकर सुशोभित हो ऐ
थे॥ ३०-३२॥
उस महोत्सवमें शंख, भेरियाँ, नगाड़े, बड़े बे
ढोल तथा गोमुख आदि बाजे बार-बार बज रहे थे॥ ३२
सभी गायक भी मंगलगीत गा रहे थे तथा सभ
नर्तकियाँ अनेक प्रकारके तालोंके साथ 7१
रही थीं॥ ३४॥
उस समय इन सभीके साथ जगतके एक
बन्धु शिन परम तेजसे युक्त होकर समस्त ह
सुरेश्वरोंके द्वारा सेवित होते हुए तथा अपने ऊपर ki
विकीर्ण किये जाते हुए चल रहे थे॥ ३५॥
तत्पश्चात् सभी लोगोंसे भली-भाँति
होकर शम्भुने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, उसे. i
सभी लोग उन परमेश्वरकी नाना प्रकारके लोग |
स्तुति कर रहे थे॥ ३६॥ र
श्रेष्ठ पर्वतोने शिवजीको वृषभसे उत »
प्रेमके साथ महोत्सवपूर्वक उन्हें घरके भीत
गये॥ ३७॥
हिमालयने भी देवताओं तथा ख
आये हुए ईश्वरको विधिवत् भक्तिपूर्वक
किया और उनकी आरती उतारी॥ ३८॥
४७]
सर्वान्सुरान्मुनीनन्यान् प्रणम्य समहोत्सव:
सम्मानमकरोत्तेषां प्रशंसन्स्वविधिं मुदा॥ ३९
सोडगः साच्युतमीशानं सुपाद्यार्घ्यपुरस्सरम्।
सदेवमुख्यवर्ग च निनाय स्वालयान्तरम्॥ ४०
्राङ्गणो स्थापयामास रत्नसिंहासनेषु तान्।
सर्वान्विष्णुं च मामीशं विशिष्टाश्च विशेषतः ॥ ४९
सखीभिर्मेनया प्रीत्या ब्राह्मणस्त्रीभिरिव च।
अन्याभिश्च पुरन्ध्रीभिश्चक्रे नीराजनं मुदा॥ ४२
पुरोधसा कृत्यविदा शंकराय महात्मने।
मधुपर्कादिकं यद्यत्कृत्यं तत्तत्कृतं मुदा॥ ४३
मया स नोदितस्तत्र पुरोधाः कृतवांस्तदा।
सुमङ्गलं च यत्कर्म प्रस्तावसदृशं मुने॥ ४४
अन्र्वेद्यां महाप्रीत्या सम्प्रविश्य हिमाद्रिणा।
यत्र सा पार्वती कन्या सर्वाभरणभूषिता॥ ४५
वेदिकोपरि तन्वङ्गी संस्थिता सुविराजिता।
तत्र नीतो महादेवो विष्णुना च मया सह॥ ४६
लग्नं निरीक्षमाणास्ते वाचस्पतिपुरोगमाः।
कन्यादानोचितं तत्र बभूवुः परमोत्सवाः॥ ४७
तत्रोपविष्टो गर्गश्च यत्रास्ति घटिकालयम्।
यावच्छेषा घटी तावत्कृतं प्रणवभाषणम्॥ ४८
पुण्याहं प्रबदन् गर्गः समादश्रेऽञ्जलिं मुदा।
पावत्यक्षतपूर्ण च ववृषे च शिवोपरि॥ ४९
तया सम्पूजितो रुद्रो दधयक्षतकुशाम्बुभिः।
परमोदारया तत्र पार्वत्या रुचिरास्यया॥ ५०
विलोकयन्ती तं शम्भुं यस्यार्थे परमं तपः।
कृतं पुरा महाप्रीत्या विरराज शिवाति सा॥ ५१
मया सुने तदोक्तस्तु गगादिमुनिभिश्च सः।
शिवां शम्भुः लौकिकाचारसंरतः॥ ५२
एवं परस्परं तौ वै पार्वतीपरमेश्वरौ।
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड)
६९७
[इसी प्रकार] उत्साहयुक्त होकर उन्होंने सभी
देवताओं, मुनियों तथा अन्य लोगोंको प्रणामकर अपने
भाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रेमपूर्वक उन सबका
सम्मान किया॥ ३९॥
वे हिमालय विष्णु और प्रमुख देवसमुदाय-
सहित ईशानको उत्तम पाद्य तथा अर्ध्य प्रदानकर उन्हें
अपने घरमें ले गये और उन्होंने आँगनमें रके
सिंहासनपर विशेष-विशेष देवताओंको, मुझे, विष्णुको,
ईशको तथा सभी विशिष्ट लोगोंको आदरपूर्वक
बेठाया ॥ ४०-४१ ॥
मेनाने भी बड़े प्रेमसे अपनी सखियों, ब्राह्मणस्त्रियों
तथा अन्य पुरन्श्रियोंक साथ मुदित होकर शिवजीकी
आरती उतारी। कर्मकाण्डके ज्ञाता पुरोहितने मधुपर्कः
दान आदि जो-जो कृत्य था, वह सब महात्मा
शंकरके लिये सम्पन्न किया॥ ४२-४३॥
हे मुने! पुरोहितने मेरे द्वारा प्रेरित होकर प्रस्तावके
अनुकूल जो मांगलिक कार्य था, उसे किया॥ ४४॥
उसके बाद अन्तर्वेदीमें बड़े प्रेमसे प्रविष्ट होकर
हिमालय वेदीके ऊपर समस्त आभूषणोंसे विभूषित
तन्वंगी कन्या पार्वती जहाँ विराजमान थीं, वहाँ विष्णु
तथा मेरे साथ महादेवजीको ले गये। उस समय वहाँ
बृहस्पति आदि देवता कन्यादानोचित लग्नको प्रतीक्षा
करते हुए अत्यन्त आनन्दित हो रहे थे ॥ ४५-४७॥
जहाँ घटिकायन्त्र स्थापित था, वहींपर गर्गाचार्य
बैठे हुए थे। विवाहकी घड़ी आनेतक वे प्रणवका
जप कर रहे थे। गर्गाचार्यने पुण्याहवाचन करते हुए
अक्षतोंको पार्वतीको अंजलिमें दिया, तब पार्वतीने
प्रेमपूर्वक शिवके ऊपर अक्षतोंको वर्षा की। इसके
बाद परम उदार तथा सुन्दर मुखवाली उन पार्वतीने
दही, अक्षत तथा कुशके जलसे शिवजीकी पूजा
की ॥ ४८-५०॥
जिनके लिये उन शिवाने पूर्वकालसे अत्यन्त
कठोर तप किया था, उन शम्भुको प्रेमपूर्वक देखती
हुई वे अत्यन्त शोभित हो रही थीं। हे मुने! तदनन्तर
मेरे एवं गर्ग आदि मुनियोंके कहनेपर सदाशिवने
लौकिक विधिका आश्रयणकर पार्वतीका पूजन किया।
इस प्रकार जगन्मय पार्वती तथा परमेश्वर परस्पर
६९८ श्रीशिवमहापुराण [3 ` ` हट... पम
अर्चयन्तौ तदानीं च शुशुभाते जगन्मयौ॥ ५३ | एक-दूसरेका सत्कार करते हुए परम शोभाक ग्रा
हो रहे थे। लक्ष्मी आदि देवियोंने त्रैलोक्यकी शत
त्रैलोक्यलक्ष्म्या संवीतौ निरीक्षन्तौ परस्परम्। समन्वित होकर एक-दूसरेकी ओर देखते भाते
तदा नीराजितो लक्ष्म्यादिभि: स्त्रीभिर्विशेषतः ॥ ५४ | दोनोंकी विशेषरूपसे आरती उतारी॥ दर
तथापरा वै द्विजयोषितश्च तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी स्त्रियों तथा नाने
नीराजयामासुरथो पुरस्त्रिय: । अन्य स्त्रियोंने उनको आरती की। उस समय शि
शिवां च शम्भुं च विलोकयन्त्योऽ- तथा शिवको उत्सुकतापूर्वक देखती हुई वे स
ापुर्मुदं ताः सकला महोत्सवम्॥ ५५ | बहुत आनन्दित हुई ॥ ५५॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
शिवहिमगिरिगरहाभ्यन्तरगमनोत्सववर्णतं नाम सप्तचत्वारिशोऽ ध्यायः ॥ ४७॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय ार्वतीखण्डमें हिमालयके
घर शिवके गमनोत्सवका वर्णन नामक सँतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥
SP
अथाष्टचत्वारिशोऽध्यायः
शिव-पार्वतीके विवाहका प्रारम्भ, हिमालयद्वारा शिवके गोत्रके विषयमे प्रश्न होनेपर
जारदजीके द्वारा उत्तरके रूपमें शिवमाहात्म्य प्रतिपादित करना, हर्षयुक्त
हिमालयद्वारा कन्यादानकर विविध उपहार प्रदान करना
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले-इसी समय वहाँ गर्गा
एतस्मिन्नन्तरे तत्र गर्गाचार्यप्रणोदितः। | प्रेरित हो मेनासहित हिमवान् कन्यादान कलेत
हिमवान्मेनया सार्धं कन्यां दातुं प्रचक्रमे॥ उद्यत हुए॥ १॥
हैम॑ भूषणोंसे शोभि
हैमं कलशमादाय मेना चार्धागमाश्रिता। ह 6 आ
ताः
हिमाद्रेश्व महाभागा वस्त्राभरणभूषिता॥ २ हाभागा मेना सोनेका कलश लेकर प
दाहिने भागमें बैठ गयीं। तत्पश्चात् पुरोहित
पाद्यादिभिस्ततः शैलः प्रहृष्टः सपुरोहितः। | सहित हिमालयने प्रसन्न होकर पाद्य
गाज व
तं बरं वरयामास वस्त्रचंदनभूषणैः॥ ३ A तथा आभूषणसे उन वरक
-३॥
ततो हिमाद्रिणा प्रोक्ता द्विजास्तिथ्यादिकीर्तने। इसके बाद हिमालयने ब्राह्मणोंसे कहा
प्रयोगो भण्यतां तावदस्मिन्समय आगते॥ ४ [कन्या-दानका] यह समय उपस्थित हो ग
अतः आपलोग संकल्पके आदिका
'तथेति चोक्ता ते सर्वे कालज्ञा द्विजसत्तमाः। दा वकती, ज्ञा है
तिथ्यादिकीर्तनं चक्रः प्रीत्या परमनिर्वृताः॥ ५ | ब्राह्मण निश्चिन्त होकर प्रेमपूर्वक तिथि
उच्चारण करने लगे॥ ४-५॥
ततो हिमाचलः ग्रीत्या शंभुना प्रेरितो हृदा। तब सृष्टिकर्ता परमेश्वर शम्भुके दवार हे
सूतीकृतपरेशेन विहसन् शंभुमब्रबीत्॥ ६ | प्रेरित हुए हिमालयने हँसते हुए प्रसनताके |
स्वगोत्रं कथ्यतां शम्भो प्रवरश्च कुलं तथा। कहा. हे शम्यो! अन आप अ वि
दं प्रवर, कहिंये,
नाम वेदं तथा शाखां माकार्षी: समयात्ययम्॥ ७ | मत र ET
-७॥
>“
कु ४८]
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य हिमाद्रेः शंकरस्तदा।
विमुखः सद्योऽप्यशोच्यः शोच्यतां गत:॥ ८
सुरवरैर्मुनिभिस्तदानीं
गंधर्वयक्षगणसिद्धगणैस्तथैव ।
दृष्टो निरुत्तरमुखो भगवान्महेशोऽ-
कार्षीस्सुहास्यमथ तत्र स नारद त्वम्॥ ९
ब्रीणामवादयंस्त्वं हि ब्रह्माविज्ञोऽथ नारद।
शिवेन प्रेरितस्तत्र मनसा शंभुमानसः॥ १०
तदा निवारितो धीमान् पर्वतेनद्रेण वै हठात्।
विष्णुना च मया देवैर्मुनिभिश्चाखिलैस्तथा॥ ११
न निवृत्तोऽभवस्त्वं हि स यदा शंकरेच्छया।
इति प्रोक्तोऽद्रिणा तर्हि वीणां मा वादयाधुना॥ १२
सुनिषिद्धो हठात्तेन देवर्षे त्वं यदा बुध।
प्रत्यवोचो गिरीशं तं सुसंस्मृत्य महेश्वरम्॥ १३
नारद उवाच
त्वं हि मूढत्वमापन्नो न जानासि च किंचन।
वाच्ये महेशविषयेऽतीवासि त्वं बहिर्मुखः॥ १४
त्वया पृष्टो हरः साक्षात्स्वगोत्रकथनं प्रति।
समयेऽस्मिंस्तदत्यंतमुपहासकरं वचः॥ १५
अस्य गोत्रं कुलं नाम नैव जानन्ति पर्वत।
विषणुब्रह्माद्योऽपीह परेषां का कथा स्मृता॥ १६
यस्येकदिवसे शैल ब्रह्मकोटिर्लयं गता।
स एव शंकरसतेद्य दृष्टः कालीतपोबलात्॥ १७
अरूपोऽयं परब्रह्म निर्गुणः प्रकृतेः परः।
निराकारो निर्विकारी मायाधीशः परात्परः ॥ १८
अगोत्रकुलनामा हि स्वतंत्रो भक्तवत्सलः।
पेदिच्छिया हि सगुणः सुतनुर्बहुनामभृत्॥ १९
em गोत्रहीनश्च कुलहीनः कुलीनकः।
तपसा सोऽद्य जामाता ते न संशयः ॥ २०
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
६९९
ब्रह्माजी बोले--उन हिमालयकी यह बात सुनकर
भगवान् शंकर प्रसन्न होते हुए भी उदास हो गये और
शोकके योग्य न होते हुए भी शोकयुक्त हो गये॥ ८॥
उस समय श्रेष्ठ देवताओं, मुनियों, गन्धर्वो,
यक्षों तथा सिद्धोंने जब शंकरको निरुत्तरमुख देखा,
तब हे नारद! आपने सुन्दर हास्य किया। हे नारद!
उस समय ब्रह्मवेत्ता तथा शिवजीमें आसक्त चित्तवाले
आपने शिवजीके द्वारा मनसे प्रेरित होकर वीणा
बजायी। उस समय पर्वतराज, विष्णु, मैंने, देवताओं
तथा सभी मुनियोंने आप बुद्धिमान्को ऐसा करनेसे
हठपूर्वक रोका॥ ९-११.॥
किंतु जब शिवजीको इच्छासे आप नहीं माने,
तब [पुनः] हिमालयने आपसे कहा-इस समय आप
वीणा मत बजाइये। हे बुद्धिमान्! हे देवर्षे ! जब उन्होंने
हठपूर्वक आपको मना किया, तब आप महेश्वरका
स्मरण करके हिमालयसे कहने लगे ॥ १२-१३॥
नारदजी बोले [हे पर्वतराज !] आप मूढ़तासे
युक्त हैं, अत: कुछ भी नहीं जानते। महेश्वरके
विषयमें कथनीय बातोंसे आप सर्वथा अनभिज्ञ हैं॥ १४॥
आपने इस समय जो इन साक्षात् महेश्वरसे
गोत्र बतानेके लिये कहा हैं, वह वचन अत्यन्त
हास्यास्पद है॥ १५॥
हे पर्वत! ब्रह्मा, विष्णु आदि भी इनका गोत्र,
कुल, नाम नहीं जानते, दूसरोंकी क्या बात कही
जाय!॥ १६॥
हे शैल! जिनके एक दिनमें करोड़ों ब्रह्मा
लयको प्राप्त हो जाते हैं, उन शंकरका दर्शन आपने
आज कालीके तपके प्रभावसे ही किया है॥ १७॥
ये प्रकृतिसे परे, परब्रह्म, अरूप, निर्गुण, निराकार,
निर्विकार, मायाधीश तथा परात्पर हैं ॥ १८॥
ये स्वतन्त्र, भक्तवत्सल और गोत्र, कुल तथा नामसे
सर्वथा रहित हैं। ये अपनी इच्छासे ही सगुण, सुन्दर
शरीरवाले तथा अनेक नामवाले हो जाते हैं॥ १९॥
ये गोत्रहीन होते हुए भी श्रेष्ठ गोत्रवाले
हैं, कुलहीन होते हुए भी उत्तम 'कुलवाले हैं और
आज पार्वतीके तपसे आपके जामाता हुए हैं, इसमें
सन्देह नहीं ॥ २०॥
७००
श्रीशिवमहापुराण
[3s
'लीलाविहारिणा तेन मोहितं सचराचरम्
नो जानाति शिवं कोऽपि प्राज्ञोऽपि गिरिसत्तम ॥ २१
लिङ्काकृतेर्महेशस्य केन दृष्टं न मस्तकम्।
विष्णुर्गत्वा हि पातालं तदैनं नाप विस्मितः॥ २२
किं बहूक्त्या नगश्रेष्ठ शिवमाया दुरत्यया।
तदधीनास्त्रयो लोका हरिब्रह्मादयोऽपि च॥ २३
तस्मात्त्वया शिवातात सुविचार्य प्रयत्नत: ।
ज कर्तव्यो विमर्शोऽत्र त्वेवंविधवरे मनाक् ॥ २४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा त्वं मुने ज्ञानी शिवेच्छाकार्यकारकः ।
प्रत्यवोचः पुनस्तं वै शेलेद्रं हर्षयन् गिरा॥ २५
नारद उवाच
श्रृणु तात महाशैल शिवाजनक मद्वचः।
तच्छुत्वा तनयां देवीं देहि त्वं शंकराय हि॥ २६
सगुणस्य महेशस्य लीलया रूपधारिण: ।
गोत्रं कुलं विजानीहि नादमेव हि केवलम्॥ २७
शिवो नादमय: सत्यं नादः शिवमयस्तथा।
उभयोरन्तरं नास्ति नादस्य च शिवस्य च॥ २८
सृष्टौ प्रथमजत्वाद्धि लीलासगुणरूपिणः।
शिवान्नादस्य शैलेन्द्र सर्वोत्कृष्टस्ततः स हि॥ २९
अतो हि वादिता वीणा प्रेरितेन मयाद्य वै।
सर्वेश्वरेण मनसा शंकरेण हिमालय॥ ३०
ब्रह्मोवाच
हाला एल उ वचस्तत्तु गिरीश्वर; |
गतविस्मयमानसः ॥ ३१
अथ विष्णुप्रभूतयः सुराश्च मुनयस्तथा।
साधु साध्विति ते सर्वे प्रोचुर्विगतविस्मया:॥ ३२
| उन 'लीलाविहारीने चरचर ॐ चराचरसहित `
मोहित कर रखा है। हे गिरिसत्तम। कोरी
ज्ञानी भी इन्हें नहीं जानता । ब्रह्माजी भी णो
आकृतिवाले महेशके मस्तकको नहीं देख रे
विष्णु भी पातालतक जाकर इन्हें नहीं प्राप्त कर क
और आश्चर्यचकित हो गये॥ २१-२२॥
हे गिरिश्रेष्ठ! अधिक कहनेसे क्या ला
शिवजीकी माया बड़ी दुस्तर है । त्रैलोक्य और विषु
ब्रह्म आदि भी उसी [माया]-के अधीन है ॥ २३)
इसलिये हे पार्वतीतात ! प्रयत्नपूर्वक भली-भाँ
विचार करके आप वरके गोत्र, कुल एवं इस प्रकाफे
'वरके सम्बन्धमें थोड़ा भी सन्देह मत कीजिये ॥ २४॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने! ऐसा कहकर जग
तथा शिवकी इच्छासे कार्य करनेवाले आप पर्वतराजगो
[अपनी] वाणीसे हर्षित करते हुए पुन: उनसे कहे
लगे-॥ २५॥
नारदजी बोले--हे तात! हे महाशैत! हे
शिवाजनक! आप मेरी बात सुनिये तथा उसे सुनका
शंकरजीको अपनी कन्या प्रदान कीजिये॥ २६॥
[अपनी] लीलासे अनेक रूप धारण
करनेवाले सगुण महेशका गोत्र तथा कुल केवल १९
ही जानिये ॥ २७॥
शिव नादमय हैं और नाद भी शिवमय है
यही सत्य है। शिव तथा नाद--इन दोगॉम ४
नहीं है॥ २८॥
सष्टिके आरम्भमे लीलासे सगुण रूप वा
करनेवाले शिवके द्वारा सर्वप्रथम नादकी
होनेके कारण वह सर्वश्रेष्ठ है॥ २९॥ सह
इसलिये हे हिमालय! अपने मतम, से व
शिवे प्रेरित होकर मैंने आज वीणा बजावी है,
ब्रह्माजी बोले--हे मुने! गिरीश्वर ह
आपका यह वचन सुनकर सन्तुष्ट हो गये
मनका विस्मय जाता रहा॥ ३१॥
तब विष्णु आदि वे देवता एवं मुर्ति सर
हो 'साधु-साधु '--ऐसा कहने लगे॥३२॥
कक ४८]
महेश्वरस्य गांभीर्य ज्ञात्वा सर्वे विचक्षणा: ।
सविस्मया महामोदान्विताः प्रोचुः परस्परम्॥ ३३
गरस्याज्ञया जगदिदं च विशालमेव
जातं परात्परतरो निजबोधरूपः।
शर्वः स्वतंत्रगतिकृत्परभावगम्यः
सोऽसौ त्रिलोकपतिरद्य च नः सुदृष्टः ॥ ३४
अथ ते पर्वतश्रेष्ठा मेर्वाद्या जातसंभ्रमाः।
ऊचुस्ते चैकपद्योन हिमवंतं नगेश्वरम्॥ ३५
पर्वता ऊचुः
कन्यादाने स्थीयतां चाद्य शेल-
नाथोक्त्या किं कार्यनाशस्तवेव।
सत्यं ब्रूमो नात्र कार्यो विमर्शः
तस्मात्कन्या दीयतामीश्वराय॥ ३६
ब्रह्मोवाच
तच्छत्वा वचनं तेषां सुहृदां स हिमालयः।
स्वकन्यादानमकरोच्छिवाय विधिनोदितः॥ ३७
इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर।
भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥ ३८
तस्मै रूद्राय महते मंत्रेणानेन दत्तवान्
हिमाचलो निजां कन्यां पार्वतीं त्रिजगत्प्रसूम्॥ ३९
इत्थं शिवाकरं शैल: शिवहस्ते निधाय च।
मुमोदातीव मनसि तीर्णकाममहार्णव: ॥ ४०
वेदमंत्रण गिरिशो गिरिजाकरपङ्कजम्।
जग्राह स्वकरेणाशु प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ ४१
कषितिं संस्पृश्य कामस्य कोऽदादिति मनुं मुने ।
पपाठ शंकर: प्रीत्या दर्शयँल्लौकिकीं गतिम्॥ ४२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७०१
सभी विद्वान् लोग महेश्वरके गाम्भीर्यको
जानकर विस्मित होकर परम आनन्दमें निमग्न हो
परस्पर कहने लगे। जिनकी आज्ञासे यह विशाल
जगत् उत्पन्न हुआ है और जो परसे भी परे,
निजबोधस्वरूप हैं, स्वतन्त्र गतिवाले एवं उत्कृष्ट
भावसे जाननेयोग्य हैं, उन त्रिलोकपति शिवको
आज हमलोगोंने भलीभाँति देखा॥ ३३-३४॥
तदनन्तर वे सुमेरु आदि सभी श्रेष्ठ पर्वत
सन्देहरहित होकर एक साथ पर्वतराज हिमालयसे
कहने लगे-॥ ३५॥
पर्वत बोले-हे शैलराज! अब आप कन्यादान
करनेके लिये समुद्यत हो जाइये । विवादसे क्या लाभ!
ऐसा करनेसे [निश्चय ही] आपके कार्यमें बाधा
होगी। हमलोग सत्य कहते हैं, अब आपको विचार
नहीं करना चाहिये, अतः आप शिवको कन्या प्रदान
कीजिये॥ ३६॥
ब्रह्माजी बोले--उन सुहृदोंकी वह बात सुनकर
विधिसे प्रेरित होकर हिमालयने शिवको अपनी कन्याका
दान कर दिया॥ ३७॥
[उन्होंने कहा--] हे परमेश्वर! मैं अपनी
कन्या आपको दे रहा हूँ, हे सकलेश्वर! आप भार्याके
रूपमें इसे ग्रहण कीजिये और प्रसन्न होइये॥ ३८॥
इस प्रकार तीनों लोकोंको उत्पन्न करनेवाली
अपनी कन्या पार्वतीको हिमालयने इस मन्त्रसे उन
महान् शिवको अर्पण कर दिया॥३९॥
इस प्रकार पार्वतीका हाथ शिवजीके हाथमें
रखकर वे हिमालय मनमें बहुत प्रसन्न हुए, मानो
उन्होंने इच्छारूपी महासागरको पार कर लिया हो | ४०॥
पर्वतपर शयन करनेवाले परमेश्वरने प्रसन्न
होकर अपने हाथसे वेदमन्त्रके द्वारा पार्वतीका
करकमल ग्रहण किया। हे मुने! लौकिक गति
प्रदर्शित करते हुए पृथिवीका स्पर्शकर महादेवने भी
'कोऽदात्'ˆ इस कामसम्बन्धी मन्त्रका प्रेमपूर्वक
पाठ कियां॥ ४१-४२ ॥
करता है। पूरा मन्त्र इस प्रकार ल प करता है। पूण मतल इस प्रका है कोऽदातकस्मा
अदा्तामोऽदात्कामायादात्कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता काम्ैतत्ते।' (शु? जुर्वेदसंहिता ७। ४८)
छ०२
श्रीशिवमहापुराण
[ का _ सकी w
महोत्सवो महानासीत्सर्वत्र प्रमुदावहः।
बभूव जयसंरावो दिवि भूम्यन्तरिक्षके॥ ४३
साधुशब्दं नमः शब्दं चक्रः सर्ेऽतिहर्षिताः।
गंधर्वा: सुजगुः प्रीत्या ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ४४
हिमाचलस्य पौरा हि मुमुदुश्चाति चेतसि।
मङ्गलं महदासीद्वे महोत्सवपुरस्सरम्॥ ४५
अहं विष्णुश्च शक्रश्च निर्जरा मुनयोऽखिलाः।
हर्षिता ह्यभवंश्चाति प्रफुल्लवदनाम्बुजाः॥ ४६
अथ शैलवरः सोऽदात्सुप्रसन्नो हिमाचलः।
शिवाय कन्यादानस्य साङ्गतां सुयथोचिताम्॥ ४७
ततो बन्धुजनास्तस्य शिवां सम्पूज्य भक्तितः।
ददुः शिवाय सदद्रव्यं नानाविधिविधानतः ॥ ४८
हिमालयस्तुष्टमनाः पार्वतीशिवप्रीतये।
जानाविधानि द्रव्याणि ददौ तत्र मुनीएवर॥ ४९
यौतुकानि ददौ तस्मै रलानि विविधानि च।
चारुरलविकाराणि पात्राणि विविधानि च॥ ५०
गवां लक्षं हयानां च सज्जितानां शतं तथा।
दासीनामनुरक्तानां लक्षं सद्द्रव्यभूषितम्॥ ५१
नागानां शतलक्षं हि रथानां च तथा मुने।
सुवर्णजटितानां च रलसारविनिर्मितम्॥ ५२
इत्थं हिमालयो द्त्वा स्वसुतां गिरिजां शिवाम्।
शिवाय परमेशाय विधिनाप कृतार्थताम् ॥ ५३
अथ शैलवरो माध्यंदिनोक्तस्तोत्रतो मुदा।
तुष्टाव परमेशानं सद्विरा सुकृताञ्जलिः॥ ५४
ततो वेदविदा तेनाज्प्ता मुनिगणास्तदा।
शिरोऽभिषेकं चक्रस्ते शिवायाः परमोत्सवा: ॥ ५५
देवाभिधानमुच्चार्य पर्युक्षणविधिं व्यधुः।
महोत्सवस्तदा चासीन्महानन्दकरो मुने॥ ५६
उस समय सर्वत्र आनन्ददायक
होने लगा और स्वर्ग, भूमि तथा अने
जयध्वनि होने लगी। सभी लोगोने आस १
होकर 'साधु' शब्द तथा 'नमः' शब्दका
किया, गन्धर्वगण प्रीतिपूर्वक गान करने लगे तष
अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ४३-४४॥
हिमालयके नगरके लोग भी अपने मनमें पा
आनन्दका अनुभव करने लगे। [उस समय] मह
उत्सवके साथ परम मंगल मनाया जाने लगा॥ ४५
मै, विष्णु, इन्द्र, देवता एवं सभी मुनिगण अतत
हर्षित हुए और सभीके मुखकमल खिल उठे॥४।
उसके बाद उन शैलराज हिमालयने आति प्रसन
होकर कन्यादानकी यथोचित सांगता शिवको प्रद
की ॥ ४७॥
तत्पश्चात् उनके बन्धुजनोंने भक्तिपूर्वक भत
भाँति पार्वतीका पूजनकर शिवजीको विधि-विधागे
अनेक प्रकारके उत्तम द्रव्य प्रदान किये । हे मुनीश्वा!
हिमालयने भी प्रसन्नचित्त होकर पार्वती तथा शिवौ
प्रसन्नताके लिये अनेक प्रकारके द्रव्य दिये ॥ ४८४६
उन्होंने उपहारस्वरूप नाना प्रकारके रल एव
उत्तम रत्नोंसे जड़े हुए विविध पात्र प्रदान किये।है
मुने! उन्होंने एक लाख सुसज्जित गायें, सजे-सजेशै
घोड़े, नाना रलोंसे विभूषित एक लाख अनुरागिणी द
दीं और एक करोड़ हाथी तथा सुवर्णजटित एवं उरण
रलोंे निर्मित रथ प्रदान किये। इस प्रकार पेर
शिवको विधिपूर्वक अपनी पुत्री शिवा गिरिजाकी पर
करके हिमालय कृतार्थ हो गये ॥ ५०-५३॥ वा
तत्पश्चात् पर्वतराजने हाथ जोड़कर श्रेष्ठ
माध्यन्दिनी शाखामें कहे गये स्तोंत्रसे तह
स्तुति की । इसके बाद वेदज्ञ हिमालयकी i:
मुनियोंने अतिप्रसन्न होकर शिवाके सिरपर जी
किया और देवताओंके नामका उच्चारणकर
न| ४९]
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
अथैकोनपञ्जाशत्तमोऽध्यायः
अग्निपरिक्रमा करते समय पार्वतीके पदनखको देखकर ब्रह्माका
बालखिल्योंकी ह्याका मोहग्रस्त होना,
बालखिल्योंकी उत्पत्ति, शिवका कुपित होना, देवताओंद्वारा {शिवस्तुति
ब्रह्मोवाच
अथो ममाज्ञया विप्रैः संस्थाप्यानलमीश्वरः।
होमं चकार तत्रैवमङ्के संस्थाप्य पार्वतीम्॥ १
ऋग्यजुस्साममन्त्रैश्चाहुतिं वह्नो ददौ शिव:
लाजाञ्जलिं ददौ कालीभ्राता मैनाकसंज्ञक:॥ २
अथ काली शिवश्चोभौ चक्रतुर्विधिवन्मुदा।
बह्विप्रदक्षिणां तात लोकाचारं विधाय च॥ ३
तत्राद्धुतमलञ्जक्रे चरितं गिरिजापतिः।
तदेव श्रृणु देवर्षे तवस्नेहाद् ब्रवीम्यहम्॥ ४
तस्मिन्नवसरे चाहं शिवमायाविमोहितः।
अपश्यं चरणे देव्या नखेन्दुं च मनोहरम्॥ ५
दर्शनात्तस्य च तदाभूवं देवमुने हाहम्।
मदनेन समाविष्टोऽतीव क्षुभितमानसः॥ ६
महुर्मुहुरपश्यं वै तदङ्गं स्मरमोहितः।
ततस्तदर्शनात्सद्यो वीर्यं मे प्रराच्युतद्धवि॥ ७
रेतसा क्षरता तेन लजञ्जितोऽहं पितामहः।
मुने व्यमर्द तच्छिशनं चरणाभ्यां हि गोपयन्॥ ८
तज्ज़ात्वा च महादेवश्चुकोपातीव नारद।
हन्तुमैच्छत्तदा शीघ्रं मां विधिं काममोहितम्॥ ९
हाहाकारो महानासीत्तत्र सर्वत्र नारद।
जनाश्चकम्पिरे सर्वे भयमायाति विश्वभृत्॥ १०
ततस्तं तुष्टुवुः शम्भुं विष्णवाद्या निर्जरा मुने।
सकोपं प्रज्चलन्तं च तेजसा हन्तुमुद्यतम्॥ ११
देवा ऊचुः
देवदेव जगद्व्यापिन् परमेश सदाशिव।
जगन्नाथ सम्प्रसीद जगन्मय॥ १२
सर्वेषामपि भावानां त्वमात्मा हेतुरीशवरः।
ऽव्ययो नित्यो निर्विकल्योऽक्षरः परः ॥ १२
आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः।
यतोऽव्ययः स नैतानि तत्सत्यं ब्रह्म चिद्धवान्॥ १४
ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद!] इसके अनन्तर
मेरी आज्ञासे ईश्वरने ब्राह्मणोंद्रार अग्निस्थापन करके
पार्वतीको अपने पास बैठाकर हवन किया। शिवने
ऋक्, साम तथा यजुर्वेदके मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दी
और कालीके भाई मैनाकने लाजाकी अंजलि दी। हे
तात! इसके बाद लोकाचारका विधानकर काली और
शिव दोनोंने प्रसन्नताके साथ विधिवत् अग्निकी
प्रदक्षिणा को। हे देवर्षे! उस समय गिरिजापति
शंकरने एक अद्भुत चरित्र किया, मैं आपके स्नेहके
कारण उसका वर्णन करता हूँ, आप सुनियें॥ १-४॥
उस समय शिवक़ी मायासे मोहित हुआ मैं
पार्वतीके चरणोंमें मनोहर नखचनद्रको देखने लगा॥ ५॥
हे देवमुने! उसके दर्शनसे मैं मोहित हो उठा
और मेरा मन अत्यन्त क्षुब्ध हो गया। मोहित होकर
मैं बार-बार उनके अंगोंको देखने लगा, तब उस
देखनेसे मेरा तेज शीघ्र ही पृथ्वीपर गिर गया और मैं
अत्यन्त लज्जित हो गया। यह देखकर महादेवजी
अत्यन्त कुपित हो गये और तब उन्होंने मुझ ब्रह्माको
शीघ्र मारनेकी इच्छा की॥ ६-९॥
हे नारद! वहाँ सर्वत्र बड़ा हाहाकार होने लगा,
सभी लोग काँपने लगे तथा विश्वको धारण करनेवाले
विष्णुको भय होने लगा॥ १०॥
हे मुने ! तब विष्णु आदि देवगण कोपयुक्त, अपने
तेजसे प्रज्वलित होते हुए और [मुझ ब्रह्माको] मारनेके
लिये उद्यत उन शिवजीकी स्तुति करने लगे॥ ११॥
देवता बोले-हे देवदेव! हे जगद्व्यापिन्! हे
परमेश! हे सदाशिव! हे जगत्पते! हे जगन्नाथ! हे
जगन्मय! आप प्रसन्न हों। आप सभी पदार्थोकी
आत्मा, सबके हेतु, ईश्वर, निर्विकार, अव्यय, नित्य,
निर्विकल्प, अक्षर तथा सबसे परे हैं। आप इस
जगत्के आदि, मध्य, अन्त एबं अभ्यन्तर तथा बाहर
विराजमान हैं, आप अव्यय, सनातन एवं तत्पद्वाच्य,
सच्चिदानन्द ब्रह्म हैं॥ १२-१४॥
७०४
श्रीशिवमहापुराण
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तवैव चरणाम्भोजं मुक्तिकामा दृढव्रताः।
विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते॥ १५
त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विशोकं निर्गुणं परम्।
आनंदमात्रमव्यग्रमविकारमनात्मकम् ॥ १६
विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमनस्य हि।
'तदपेक्षतयात्मेशोऽनपेक्षः सर्वदा विभुः॥ १७
एकस्त्वमेव सदसद् . द्यमद्रयमेव च।
स्वर्ण कृताकृतमिव वस्तुभेदो न चैव हि॥ १८
अज्ञानतस्त्वयि जनैर्विकल्पो विदितो यतः।
तस्माद् भ्रमप्रतीकारो निरुपाधेर्न हि स्वतः॥ १९
धन्या वयं महेशान तव दर्शनमात्रतः।
दृढभक्तजनानन्दप्रदः शम्भो दयां कुरु॥ २०
त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतेस्त्वं परः पुमान्।
विश्वेश्वरो जगन्नाथो निर्विकारः परात्परः॥ २१
योऽयं ब्रह्मास्ति रजसा विश्वमूर्तिः पितामहः।
त्वत्प्रसादात्प्रभो विष्णुः सत्त्वेन पुरुषोत्तमः॥ २२
कालाग्निरुद्रस्तमसा परमात्मा गुणैः परः।
सदाशिवो महेशानः सर्वव्यापी महेश्वर: ॥ २३
व्यक्तं महच्च भूतादिस्तम्मात्राणीन्द्रियाणि च।
त्वयैवाधिष्टितान्येव विश्वमूर्ते महेश्वर॥ २४
महादेव परेशान करुणाकर शंकर।
प्रसीद देवदेवेश प्रसीद पुरुषोत्तम॥ २५
वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजा:।
द्यौमूर्धा ते विभोर्नाभिः खं वायुनासिका तत: ॥ २६
'चक्षूंष्यग्नी रविस्सोम: केशा मेघास्तव प्रभो ।
नक्षत्रतारकाद्याश्च ग्रहाश्चैव विभूषणम्॥ २७
कथं स्तोष्यामि देवेश त्वां विभो परमेश्चर।
वाचामगोचरोऽसि त्वं मनसा चापि शंकर॥ २८
मुक्तिकी कामनावाले दृढ़ब्रत मुनिजन
संगका परित्यागकर आपके ही
करते हैं। आप अमृतस्वरूप, शोकरहित, नि
आनन्दमात्र, व्यग्रतारहित, निर्विकार, आत्मासे क,
तथा मायासे परे पूर्णब्रह्म ह ॥ १५-१६॥
आप संसारको उत्पत्ति, पालन तथा प्रलके
कारण हैं । इस संसारको आपकी अपेक्षा है, किंतु
व्यापक आप परमात्माको किसीकी अपेक्षा नहीं है॥ १५,
आप एक होते हुए भी सत् एवं असत् हैं, #
एवं अद्वैत हैं, गढ़े हुए तथा न गढ़े हुए स्वर्णे झी
वस्तुभेद नहीं है, वैसे ही आप भी हैं॥ १८॥
पुरुषोंने अज्ञानताके कारण आपमें विकल्प
आरोप किया है, इसलिये सोपाधिमें भ्रमका प्रतीका
किया जाता है, किंतु निरुपाधिमें नहीं ॥ १९॥
हे महेशान! हम सब आपके दर्शनमात्रसे धय
हो गये; क्योंकि आप दृढ़ भक्तोंको आनन्द प्रदान के
हैं, अतः हे शम्भो! हमलोगोंपर दया कीजिये॥ २०॥
आप आदि हैं, आप अनादि हैं, आप प्रकृति
परे पुरुष हैं । आप विश्वेश्वर, जगन्नाथ, निर्विकारं
परसे भी परे हैं । हे प्रभो! रजोगुणयुक्त ये जो विशव
पितामह ब्रह्मा हैं और सत्त्वगुणसे युक्त पुरुषोत्तम विमु
हैं, वे आपकी ही कृपासे हैं । कालागिन रुद्र तमोगुण
युक्त हैं, आप परमात्मा सभी गुणोंसे परे हैं, आप सदर
महेशान, सर्वव्यापी तथा महेश्वर हैं॥ २१-९२
हे विश्वमूर्ते! हे महेश्वर! व्यक्त मह
पंचभूत, तन्मात्राऐ एवं इन्द्रियाँ आपसे ही पिर
हैं॥ २४॥ णे
हे महादेव! हे परेशान! हे चा ह
शंकर! प्रसन्न होइये। हे देवदेवेश! पुरुषोत्तम! कं
हो जाइये। हे प्रभो! सातों समुद्र आपके वर
दिशाएँ आपकी महाभुजाएँ, चुलोक आर्ण
आकाश नाभि तथा वायु नासिका है॥ २५%
हे प्रभो! रवि-सोम-अग्नि आपके नेत्रा मे शा
केश और नक्षत्र-तारा-ग्रह आपके आभूषण क
हे शंकर! आप वाणी तथा मत
अगोचर हैं, अतः हे देवेश! हे विभो! है "|
हमलोग आपकी स्तुति किस प्रकार कर ॥ ९
सबा
पड ४९]
प्जास्याय च रुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये।
अ्यधिपाय वरिष्ठाय विद्यातत्त्वाय ते नमः॥ २९
अनिर्देश्याय नित्याय विद्युज्ज्चालाय रूपिणे।
अग्निवर्णाय देवाय शंकराय नमो नमः॥ ३०
बिदयुत्कोटिप्रतीकाशमष्टकोणं सुशोभनम्।
रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय नमो नम: ॥ ३१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तेषां प्रसन्नः परमेश्वर: ।
ब्रह्मणे मे ददौ शीघ्रमभयं भक्तवत्सलः॥ ३२
अथ सर्वे सुरास्तत्र विष्णवाद्या मुनयस्तथा।
अभवन्सुस्मितास्तात चक्रुश्च परमोत्सवम्॥ ३३
मम तद्रेतसा तात मर्दितेन मुहुर्मुहु:।
अभवन्कणकास्तत्र भूरिशः परमोज्ज्चलाः॥ ३४
ऋषयो बहवो जाता बालखिल्या: सहस्त्रशः ।
कणकेस्तैश्च वीर्यस्य प्रज्वलद्भिः स्वतेजसा॥ ३५
अथ ते ऋषयः सर्वे उपतस्थुस्तदा मुने।
ममान्तिकं परप्रीत्या तात तातेति चाब्रुवन्॥ ३६
ईश्वरेच्छाप्रयुक्तेन प्रोक्तास्ते नारदेन हि।
बालखिल्यास्तु ते तत्र कोपयुक्तेन चेतसा॥ ३७
नारद उवाच
गच्छध्वं सङ्गता यूयं पर्वतं गन्धमादनम्।
न स्थातव्यं भवद्भिश्च न हि वोऽत्र प्रयोजनम्॥ ३८
तत्र तप्त्वा तपश्चाति भवितारो मुनीश्वराः।
सूर्यशिष्या: शिवस्यैवाज्ञया मे कथितं त्विदम्॥ ३९
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तास्ते तदा सर्वे बालखिल्याश्च पर्वतम्।
सत्वरं प्रययुर्नत्वा शंकरं गन्धमादनम् ४०
विष्णवादिभिस्तदाभूवं श्वासितोऽहं मुनीश्वर
निर्भयः 'परमेशानप्ररतैस्तै्महात्मभिः ॥ ४१
अस्तवं चापि सर्वेशं शंकरं भक्तवत्सलम्
सर्वकार्यकरं ज्ञात्वा दुष्टगर्वापहारकम्॥ ४२
रूद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७०५
पंचमुख, पचास करोड़ मूर्तिवाले, त्रिलोकेश,
एवं विद्यातत्त्वस्वरूप आप रुद्रको प्रणाम
है॥ २९॥
अनिर्देश्य, नित्य, विद्युज्ज्वालाके समान रूपवाले,
अग्निवर्ण एवं देवाधिदेव आप शंकरको बार-बार नमस्कार
है। करोड़ों विद्युतूके समान प्रकाशमान, अष्ट कोणवाले
तथा अत्यन्त सुन्दर रूपको धारण करके इस लोकमें
स्थित रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३०-३१॥
ब्रह्माजी बोले--उन [देवताओं ]-की यह बात
सुनकर प्रसन्न हुए भक्तवत्सल परमेश्वरने मुझ ब्रह्माको
शीघ्र ही अभय प्रदान कर दिया॥ ३२॥
हे तात! उसके बाद विष्णु आदि सभी देवता
तथा मुनिगण मन्द-मन्द हँसते हुए परम आनन्दित
हो उठे॥ ३३॥
हे तात! मेरे उस रेतसे अत्यन्त उज्ज्वल बहुत-
से कण हो गये और अपने तेजसे प्रज्वलित उन
कणोंसे बालखिल्य नामक हजारों ऋषि प्रकट हो
गये॥ ३४-३५॥
हे मुने! तब वे सभी ऋषि मेरे समीप खड़े हो
गये और बड़े प्रेमसे मुझे हे तात! हे तात! कहने
लगे॥ ३६॥
तब ईश्वरेच्छासे प्रेरित हुए नारदजी [आप]
क्रोधयुक्त चित्तसे उन बालखिल्य ऋषियोंसे कहने
लगे-- ॥ ३७॥
नारदजी बोले--अब आपलोग एक साथ ही
गन्धमादन पर्वतपर चले जाइये। आपलोग यहाँ मत
रुकिये; आपलोगोंका यहाँ [कोई] प्रयोजन नहीं है ॥ ३८॥
वहाँ कठोर तपस्या करके आपलोग मुनीश्वर
और सूर्यके शिष्य होंगे, मैंने यह बात शिवजीकी
आज्ञासे कही है॥ ३९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहे गये वे बालखिल्य
शंकरजीको नमस्कार करके शीघ्र ही गन्धमादन
मर्वतपर चले गये। हे मुनीश्वर! तब शिवजीके द्वारा
प्रेरित विष्णु आदिने मुझे बहुत समझाया और मैं निर्भय
हो गया और फिर सर्वेश शंकरको भक्तवत्सल, सम्पूर्ण
कार्योको करनेवाला तथा दुष्टोके गर्वको नष्ट करनेवाला
समझकर उनकी स्तुति करने लगा॥ ४०--४२॥
न ०६
वर. के देवदेत) हे. महादेवा 2) महादेव करुणासागर प्रभो।
त्वमेव कर्ता सर्वस्य भर्ता हर्ता च सर्वथा॥ ४३
त्वदिच्छया हि सकलं स्थितं हि सचराचरम्।
तन्त्यां यथा बलीवर्दा मया ज्ञातं विशेषत: ॥ ४४
इत्येवमुक्त्वा सोऽहं वै प्रणामं च कृताझलि:।
अन्येऽपि तुष्टुवुः सर्वे विष्णवाद्यास्तं महेश्वरम्॥ ४५
अथाकर्ण्य नुतिं शुद्धां मम दीनतया तदा।
विष्ण्वादीनां च सर्वेषां प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः॥ ४६
ददौ सोऽतिवरं मह्यामभयं प्रीतमानसः ।
्रीशिवमहापुराण
सर्वे सुखमतीवापुरत्यामोदमहं मुने॥ ४७
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रदसंहितयां तृतीये पर्वतीखण्डे विधिमोहवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥४९॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमे ब्रह्माके
मोहका वर्णन नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४९॥
— ee
अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
शिवा-शिवके विवाहकृत्यसम्पादनके अनन्तर देवियोंका शिवसे मधुर वार्तालाप
ब्रह्मोवाच
ततश्चाहं मुनिगणैः शेषकृत्यं शिवाज्ञया।
अकार्ष नारद प्रीत्या शिवाशिवविवाहतः॥ २
तयोः शिरोऽभिषेकश्च बभूवादरतस्ततः।
श्रुवस्य दर्शनं विप्राः 'कारयामासुरादरात्॥
इदयालम्भनं कर्म बभूव तदनन्तरम्।
स्वस्तिपाठश्च विप्रेनद्र महोत्सवपुरस्सरः॥ ३
शिवाशिरसि सिन्दूरं ददौ शम्भुद्विजाज़या।
तदानीं बभूव ह॥ ४
२
ततो विप्राज्ञया तौ द्वावेकासनसमास्थितौ।
लेभाते परमां शोभां भक्तचित्तमुदावहाम्॥
[अ र
हे देवदेव! हे महादेव! हे >
हे प्रभो! आप ही सब प्रकारसे सबके के
तथा हर्ता हैं ॥ ४३ ॥ “पं
मैंने यह अच्छी तरह जान लिया है हि
जिस प्रकार बलवान् बैल नाथनेसे वशमें होक
है, उसी प्रकार यह सारा चराचर जगत् आफ्ने |
इच्छासे स्थित है॥ ४४॥
इस प्रकार कहकर हाथ जोड़ मैंने शिवम
प्रणाम किया और विष्णु आदि अन्य सभीने भी ज़
महेश्वरकी स्तुति को॥ ४५॥
तब दीनभावसे की गयी विष्णु आदि तशे
देवताओंकी तथा मेरी शुद्ध स्तुति सुनकर महेश
प्रसन्न हो गये ॥ ४६ ॥
हे मुने ! उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुझे अत्रि
अभयदान दिया, सभीने महान् सुख प्राप्त किया और
मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई॥४७॥
ब्रह्माजी बोले--हे नारद! तदनन्तर गै
शिवजीकी आज्ञासे मुनियोंके साथ परम्रीति
शिवाशिवके विवाहके शेष कृत्योंका सम
किया। उन दोनोंके सिरपर आदरपूर्वक मार्त”
अभिषेक हुआ और ब्राह्मणोंने आदरके साथ क
धुवदर्शन कराया १-२॥ हे
है विप्रेद्र | उसके बाद हृदयालम्भनका |
तथा बड़े महोत्सवके साथ स्वस्तिवाचन हुआ
ब्राह्मणोंकी आज्ञासे शम्भुने शिवाकी pe)
सिन्दूर लगाया, उस समय गिरिजा अ
अवर्णनीय रूपवती हो गयीं। तत्पश्चात् रे
आज्ञासे दोनों एक आसनपर विराजमान र
भक्तोके चित्तको आनन्द देनेवाली अपूर्व
सम्पन्न हो गये ॥ ४-५॥
अ० ५० J
ततः स्वस्थानमागत्य संस्त्रवप्राशनं मुदा।
्रक्रतस्तौ निदेशान्मेऽद्धुतलीलाकरौ मुने॥
त्यं निवृत्ते विधिवद्यज्ञे वैवाहिके शिवः।
ब्रह्मणे पूर्णपात्रं मे ददौ लोककृते प्रभुः॥
६
७
गोदानं विधिवच्छम्भुराचार्याय ददौ तत:।
महादानानि च प्रीत्या यानि मङ्गलदानि वै॥
ततः शतसुवर्ण' च विप्रेभ्यः स ददौ पृथक् ।
बहुभ्यो रलकोटीश्व नानाद्रव्याण्यनेकश: ॥
८
९
तदानीममराः सर्वे परे जीवाश्चराचराः।
ममुदुश्रेतसातीव बभूवाति जयध्वनिः॥ १०
मङ्कलध्वनिगानं च बभूव बहु सर्वतः।
वाद्यध्वनिरभूद्रम्यो सर्वानन्दप्रवर्धनः॥ ११
हरिर्मयाथ देवाश्च मुनयश्चापरेऽखिलाः।
गिरिमामन्त्र्य सुप्रीत्या स्वस्थानं प्रययुर्द्रुतम् ॥ १२
तदानीं शेलनगरे स्त्रियश्च मुदिता वरम्।
शिवाशिबौ समानीय ययुः कुहवरालयम्॥ १३
लौक्रिकाचारमाजहुस्ताः स्त्रियस्तत्र चादृताः।
महोत्साहो बभूवाथ सर्वतः प्रमुदावहः॥ १४
अथ तास्तौ समानीय दम्पती जनशंकरो।
वासालयं महादिव्यं भवाचारं व्यधुर्मुदा॥ १५
अथो समीपमागत्य शेलेन्द्रनगरस्त्रियः।
निवृत्य मङ्घलं कर्म प्रापयन्दम्पती गृहम्॥ १६
कृत्वा जयध्वनिं चअक्रुर्ग्रन्थिनिमोंचनादिकम् |
सस्मितास्सकटाक्षाश्र पुलकाझ्िितविग्रहा: ॥ ९७
र न 2: चीकी आहुति देकर खुवामें अवशिष्ट
जाता है। प्रोक्षणीपात्रमें डाले हुए घीको ही
शेलवप्राशन' कहा गया है।
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७०७
हे मुने! तदनन्तर अद्भुत लीला करनेवाले
दोनोंने अपने स्थानपर आकर मेरी आज्ञासे
प्रसन्नतापूर्वक संख्र॒व*-प्राशन किया। इस प्रकार
बिवाह-यज्ञके विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर प्रभु शिवने
मुझ लोककर्ता ब्रह्माको पूर्णपात्रका दान किया।
तत्पश्चात् शिवजीने आचार्यको विधिपूर्वक गोदान
दिया तथा मंगल प्रदान करनेवाले जो अन्य महादान
हैं, उन्हें भी बड़े प्रेमसे दिया॥ ६-८॥
उसके बाद उन्होंने बहुत-से ब्राह्मणोंको
अलग-अलग सौ-सौ स्वर्णमुद्राएँ, करोड़ों रत्न तथा
अनेक प्रकारके द्रव्य दिये। उस समय सभी देवगण
एवं अन्य चराचर जीव हृदयसे अत्यन्त प्रसन्न हुए
और जोर-जोरसे जयध्वनि होने लगी। सभी ओर
मंगलध्वनिके साथ गान होने लगा और सबके
आनन्दको बढानेवाली स्म्य वाद्य-ध्वनि होने लगी।
उसके बाद मेरे साथ विष्णु, देवता, मुनिगण तथा
अन्य लोग हिमालयसे आज्ञा लेकर प्रसन्ततापूर्वक
अपने-अपने निवासस्थानको गये॥ ९-१२॥
उस समय हिमालयके नगरकी स्त्रियाँ प्रसन्न
होकर शिवा एवं शिवको लेकर दिव्य कोहवर-घरमें
गयीं॥ १३॥
वहाँपर वे स्त्रियाँ आदरके साथ लौकिकाचार
करने लगीं। चारों ओर आनन्द प्रदान करनेवाला
महान् उत्साह फैल गया। उसके बाद उन सबने
लोगोंका कल्याण करनेवाले उन शिव-शिवाको
महादिव्य निवासस्थानमें ले जाकर प्रसन्नतापूर्वक
लौकिकाचार किया॥ १४-१५ ॥
तत्पश्चात् हिमालयके नगरकी स्त्रियाँ
समीपमें आकर मंगलकर्म करके दम्पतीको घरमें
ले गयीं॥ १६॥
वे जय-जयकारकर ग्रन्थिःबन्धन खोलने लगीं।
उस समय वे कटाक्ष करती हुई मन्द-मन्द हँस रही
थीं और उनका शरीर रोमांचित हो रहा था॥ १७॥
जलयुक्त त द पालना डतको विधि है। पेक आहति डालनेकी विधि है | प्रत्येक आहुतिमें
Er कहते हैं। अत्तमें यजमान उसे पीता है। इसीको
७०८
श्रीशिवमहापुराण
= _ == तञ ता तणाः ` ५७
वासगेहं सम्प्रविश्य मुमुहुः कामिनीवराः।
प्रशंसन्त्यः स्वभाग्यानि पश्यन्त्यः परमेश्वरम्॥ १८
महासुरूपवेषं च सर्वलावण्यसंयुतम्।
नवीनयौवनस्थं च कामनीचित्तमोहनम्॥ १९
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यं सकटाक्षं सुसुन्दरम्।
सुसूक्ष्मवासो बिभ्राणं नानारलविभूषितम्॥ २०
तदानीं दिव्यनार्यश्च षोडशारं समाययुः।
तौ दम्पती च संद्रष्टुं महाद्रपुरस्सरम्॥ २१
सरस्वती च लक्ष्मीश्च सावित्री जाह्नवी तथा।
अदितिश्च शची चेव लोपामुद्राप्यरुन्धती॥ २२
अहल्या तुलसी स्वाहा रोहिणी च वसुन्धरा।
शतरूपा च संज्ञा च रतिरेताः सुरस्त्रियः ॥ २३
देवकन्या नागकन्या मुनिकन्या मनोहराः।
तत्र या या: स्थितास्तासां सङ्ख्यां कर्तु च कः क्षमः ॥ २४
ताभी रलासने दत्ते तत्रोवास शिवो मुदा।
तमूचुः क्रमतो देव्यः सुहासं मधुरं वचः ॥ २५
सरस्वत्युवाच
प्राप्ता सती महादेवाधुना प्राणाधिका मुदा।
दष्ट्वा प्रियास्यं चन्द्रभं सन्तापं त्यज कामुक ॥ २६
'कालं गमय कालेश सतीसंश्लेषपूर्वकम्।
विश्लेषस्ते न भविता सर्वकालं समाश्रिता ॥ २७
लक्ष्मीरुवाच
लज्जां विहाय देवेश सतीं कृत्वा स्ववक्षसि।
तिष्ठ तां प्रति का लज्जा प्राणा यान्ति यया विना॥ २८
सावित्रुवाच
भोजयित्वा सतीं शम्भो शीघ्रत्वं भुङ् कष्व मा खिद; ।
तदाचम्य सकर्पूरं तांबूलं देहि सादरम्॥ २९
वे श्रेष्ठ स्त्रियाँ वासगृहमें प्रवेश करते हो मो
हो गयीं और सुन्दर रूप तथा वेषबाले सफ
लावण्यसे युक्त, नवीन यौवनसे परिपूर्ण, कि
चित्तको मोहित करनेवाले, मन्द-मन्द
प्रसन्न मुख-मण्डलवाले, कटाक्षयुक्त, अत्यन्त
अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण किये हुए और ओइ
रलोंसे विभूषित परमेश्वरको देखती हुई अपने-अपने
भाग्यको प्रशंसा करने लगीं॥ १८--२०॥
उस समय सोलह दिव्य नारियाँ बड़े आदे
साथ इन दम्पतीको देखनेके लिये शीघ्र ही पु
गयीं। सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, जाहूवो, अति,
शची, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या, तुलसी, स्ह,
रोहिणी, वसुन्धरा, शतरूपा, संज्ञा और रति-ये
देवस्त्रियाँ हैं। अन्य जो-जो मनोहर देवकन्याएँ एव
मुनिकन्याएँ वहाँ स्थित थीं, उनकी गणना करें
कौन समर्थ है॥ २१-२४॥
उनके द्वारा दिये गये रत्नके आसनपर शिव
प्रसन्नताके साथ बैठे | इसके बाद सब देवियाँ क्रमपे
मन्दःमन्द हँसती हुई उनसे मधुर वचन कहने लगीं॥ २५॥
सरस्वती बोलीं--हे महादेव! अब प्राणोसे भ
अधिक प्यारी सतीदेवी आपको प्राप्त हो गयी है
हे कामुक! इनके चनद्रमाके समान आभावाले प्रिव
मुखको प्रसन्नतापूर्वक देखकर आप सन्तापको त्या
दीजिये ॥ २६॥
हे कालेश! आप इस सतीका आलिंगन क
हुए अपना समय व्यतीत कीजिये। सभी समय
आश्रित रहनेवाली इस सखीसे आपका वियोग
होगा॥ २७॥ वि
लक्ष्मी बोलीं--हे देवेश! अब लजाका त्त
सतोको अपने वक्षःस्थलमें स्थित कीजिये, है
बिना आपके प्राण निकल रहे थे, उसके प्रति
सी लजा।॥ २८॥ भरी
सावित्री बोलीं--हे शम्भो! सतीकी हि
कराकर आप भी शीघ्र भोजन कीजिये, किसी ©
खेद मत कीजिये और आचमन करके
आदरसे कपूरमिश्रित ताम्बूल दीजिये॥ २९॥
अ० ५० ]
जाह्नव्युवाच
स्वर्णकांतिकरां धृत्वा केशान्मार्जय योषित:।
कामिन्या: स्वामिसौभाग्यसुखं नात: परं भवेत् ॥ ३०
अदितिरुवाच
भोजनान्ते शिवे शम्भुं मुखशुद्भ्यर्थमादरात्।
जलं देहि महाप्रीत्या दम्पतिप्रेम दुर्लभम्॥ ३१
शच्युवाच
कृत्वा विलापं यद्धेतोः शिवां कृत्वा च वक्षसि।
यो बभ्रामानिशं मोहात् का लजा ते प्रियां प्रति॥ ३२
लोपामुद्रोवाच
व्यवहारोऽस्ति च स्त्रीणां भुवत्वा वासगृहे शिव।
दत्त्वा शिवायै ताम्बूलं शयनं कर्तुमहसि॥ ३३
अरुन्धत्युवाच
मया दत्तां सतीं मेना तुभ्यं दातुमनीप्मिता।
विविधं बोध्यित्वेमां सुरतिं कर्तुमहसि॥ ३४
अहल्योवाच
वृद्धावस्था परित्यज्य ह्यतीव तरुणो भव।
येन मेनानुमन्येत त्वां सुतार्षितमानसा॥ ३५
ठुलस्युवाच
मती त्वया परित्यक्ता कामो दग्धः पुरा कृतः।
कथं तदा वसिष्ठश्च प्रभो प्रस्थापितोऽधुना॥ ३६
स्वाहोवाच
स्थिरो भव महादेव स्त्रीणां वचसि साम्प्रतम्।
विवाहे व्यवहारोऽस्ति पुरन्ध्रीणां प्रगल्भता ॥ ३७
रोहिण्युवाच
कामं पूरय पार्वत्याः कामशास्त्रविशारद।
कुरु पारं स्वयं कामी कामिनीकामसागरम्॥ ३८
वसुन्धरोवाच
जानासि भावं भावज्ञ कामार्तानां च योषिताम्।
१ च स्वं स्वामिनं शम्भो ईश्वरं पाति सन्ततम्॥ ३९
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७०९
जाह्नवी बोलीं-अब इस सुवर्णकान्तिवाली
पार्वतीके केशोंको पकड़कर सँवारिये; क्योंकि कामिनी
्त्रियोंका इससे बढ़कर और कोई पतिसे प्राप्त
होनेवाला सौभाग्यसुख नहीं होता॥ ३०॥
अदिति बोलीं-हे शिवे! आप भोजनके
| शुद्ध करनेके लिये शम्भुको अति प्रेमसे
जल प्रदान कीजिये; क्योंकि दम्पतीका परस्पर प्रेम
[सर्वथा] दुर्लभ है॥ ३१॥
शची बोलीं-जिसके लिये आप मोहवश
विलाप करते-करते [दरःदर] भटक रहे थे, उस
शिवाको वक्षःस्थलपर धारण कीजिये, उस प्रियाके
प्रति आपको लज्जा क्यों ?॥ ३२॥
लोपामुद्रा बोलीं-हे शंकर! भोजन करके
आप वासगृहमें जाइये, यह स्त्रियोंका व्यवहार है।
आप शिवाको ताम्बूल देकर शयन कीजिये ॥ ३३॥
अरुन्धती बोलीं--हे शिव! मेना आपके निमित्त
पार्वतीको देना नहीं चाहती थीं, किंतु मेरे बहुत
समझानेपर उन्होंने पार्वतीको देना स्वीकार किया,
अब आप इनसे अधिक प्रेम कीजिये ॥ ३४॥
अहल्या बोलीं-अब आप वृद्धावस्थाको
छोड़कर पूर्ण युवा हो जाइये, जिससे कन्या देनेवाली
इस मेनाको पुत्रीदानसे सन्तुष्टि प्राप्त हो जाय ॥ ३५॥
तुलसी बोलीं-हे प्रभो! आपने पूर्वकालमें
सतीका त्याग किया, उसके बाद कामदेवको जलाया,
अब आपने [पार्वतीको प्राप्त करनेके लिये] हिमालयके
घर वसिष्ठको कैसे भेजा ?॥ ३६॥
स्वाहा बोलीं--हे महादेव! अब आप स्त्रियोंके
वचनमें स्थिर हो जाइये; क्योंकि विवाहमें स्त्रियोंकी
प्रगल्भता एक व्यवहार होता है॥३७॥
रोहिणी बोलीं--हे कामशास्त्रविशारद! अब
आप पार्वतीकी कामना पूर्ण कीजिये, आप स्वयं कामी
हैं, अतः कामिनीके कामसागरको पार कौजिये॥ ३८॥
बसुश्वरा बोलीं--हे भावज्ञ! आप कामार्त
स्त्रियॉके भावको जानते हैं। हे शम्भो! स्त्री अपने
स्वामीकी ईश्वरभावसे निरन्तर सेवा करती है, वह
'पतिके अतिरिक्त अपनी किसी भी वस्तुको रक्षा करना
नहीं चाहती॥ ३९॥
७१०
शतरूपोवाच
भोगं दिव्यं विना भुक्त्वा न हि तुष्येत्क्षुधातुरः ।
येन तुष्टिभवेच्छंभो तत्कर्तुमुचितं स्त्रिया: ॥ ४०
संज्ञोवाच
तूर्ण प्रस्थापय प्रीत्या पार्वत्या सह शङ्करम्।
रत्नप्रदीपं ताम्बूलं तल्पं निर्माय निर्जने॥ ४१
ब्रह्मोवाच
स्त्रीणां तद्चनं श्रुत्वा ता उवाच शिवः स्वयम्।
निर्विकारश्च भगवान्योगीन्दराणां गुरोगुरुः ॥ ४२
शंकर उवाच
देव्यो न ब्रूत वचनमेवंभूतं ममान्तिकम्।
जगतां मातरः साध्व्यः पुत्रे चपलता कथम्॥ ४३
ब्रह्मोवाच
शङ्करस्य वचः श्रुत्वा लज्जिता: सुरयोषितः।
बभूवुः सम्भ्रमात्तृष्णीं चित्रपुत्तलिका यथा ॥ ४४
भुक्त्वा भिष्टान्नमाचम्य महेशो हृष्टमानसः।
सकर्पूरं च तांबूलं बुभुजे भार्यया सह॥ ४५
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
श्रीशिवमहापुराण
[ "च 0000020 मयाचा + ५१
शतरूपा बोलीं--भूखसे तड़पता
दिव्य सुखका भोग किये बिना सन्तुष्ट >. जि
अतः हे शम्भो ! जिससे स्त्रीको सन्तुष्टि हो आके
वही करना उचित है॥४०॥ ' आने
संज्ञा बोलीं -[ हे सखि!] रत्नदीपक
एकान्तमें पलंग बिछाकर और उसपर ताम्बूल
परम प्रीतिसे शीघ्रतापूर्वक शिवाके साग वी
स्थापित करो॥ ४१॥
ब्रह्माजी बोले--स्त्रियोंक वे वचन सुनका
निर्विकार एवं महान् योगियोंके गुरुके भी गुरु भगवा
शंकरजी उनसे स्वयं कहने लगे ॥ ४२॥
शंकरजी बोले-हे देवियो! मेरे समीप इ
प्रकारके वचनको आपलोग न बोलें, आप प्रब
पतित्रताएँ एवं जगत्की माताएं हैं, फिर पुत्रके विषमं
इस प्रकारकी चपलता क्यों ?॥ ४३॥
ब्रह्माजी बोले--शंकरकी यह बात सुनक
सभौ देवस्त्रियाँ लज्जित हो गयीं और सम्भ्रमके काण
चित्रलिखित पुतलियोंकी भाँति चुप हो गयीं॥४४॥
तदनन्तर मिष्टान्न ग्रहणकर आचमनक
प्रसन्नचित्त महेशने पार्वतीके साथ कर्पूरयुक्त पानका
सेवन किया॥ ४५॥
वतीखण्डे परिहासवर्णत नाम पञ्चाशत्तमोऽ ध्यायः ॥५०॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहायुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
परिहासवर्णन नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५० ॥
अथैकपञ्जाशत्तमोऽध्यायः
रतिके अनुरोधपर श्रीशंकरका कामदेवको जीवित करना, देवताओंद्वारा शिवस्तुति
अ ब्रह्माजी बोले--उस अवसरपर अनुकूल स
तस्मिन्नवसरे ज्ञात्वानुकूलं समयं रतिः। | जानकर प्रसनतासे पूर्ण रति दीनवत्सल शंकरसे कहै
सुप्रसन्ना च तं प्राह शङ्करं दीनवत्सलम्॥ ९ | लगी ॥ १॥
रतिरुवाच रति बोली-- [हे भगवन् !] पार्वतीकी र
गृहीत्वा पार्वतीं प्राप्त सौभाग्यमतिदुलभम्। करके आपने परम दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त वर
किमर्थ प्राणनाथो मे निस्स्वार्थ भस्मसात्कृतः ॥ .. श्राणनाथकों आपने व्यर्थ ही भस्म
[?॥ २॥
जीवयात्र पतिं मे हि कामव्यापारमात्मनि। अपने मनमें विचार करके मेरे पतिकी ला
कुरू दूरं च सन्तापं समविश्लेषहेतुकम्॥ ३
कर दीजिये और समानरूपसे वियोगके
सन्तापको दूर कीजिये॥ ३॥
अ० ५९ ]
एतस्मिन् सुखिनो निखिला जना: ।
अहमेका महेशान दुःखिनी स्वपतिं विना॥ ४
सनाथां कुरु मां देव प्रसन्नो भव शङ्कर।
स्वोक्ते सत्यं विधेहि त्वं दीनबन्धो पर प्रभो॥ ५
त्वां विना कः समर्थोऽत्र त्रैलोक्ये सचराचरे।
नाशने मम दुःखस्य ज्ञात्वेति करुणां कुरु॥ ६
सोत्सवे स्वविवाहेऽस्मिन्सर्वानन्दप्रदायिनि।
सोत्सवामपि मां नाथ कुरु दीनकृपाकर॥ ७
जीविते मम नाथे हि पार्वत्या प्रियया सह।
सुविहारः प्रपूर्णश्च भविष्यति न संशयः॥ ८
सर्वं कर्तु समर्थोऽसि यतस्त्वं परमेश्वरः।
किं बहूक्त्यात्र सर्वेश जीवयाशु पतिं मम॥ ९
ब्रह्मोवाच
तदित्युक्त्वा कामभस्म ददौ सग्रन्थिबन्धनम्।
रुदोद पुरतः शम्भोर्नाथ नाशेत्युदीर्यं च॥ १०
रतिरोदनमाक्ण्यंसरस्वत्यादयः स्त्रिय: ।
रुरुहुः सकला देव्यः प्रोचुर्दीनतरं वच: ॥ १९
देव्य ऊचुः
भक्तवत्सलनामा त्वं दीनबन्धुर्दयानिधिः।
कामं जीवय सोत्साहां रतिं कुरु नमोऽस्तु ते॥ १२
ब्रह्मोवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रसञ्नोऽभूनमहेश्वरः।
फैपादृष्टि चकाराशु करुणासागरः प्रभुः॥ १३
पेधदृष्ट्या शूलभृतो भस्मतो निर्गतः स्मरः।
सुन्दरोऽद्धुतमूर्तिमान्॥ १४
रे च तदाकारं सस्मितं सधनुश्शरम्।
श्चा पति रततिस्तं च प्रणनाम महेश्वरम्॥ १५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
$ ल क्या... ९
हे महेश्वर! इस विवाहोत्सवमें सभी लोग सुखी
हैं, केवल मैं ही अपने पतिके बिना दुखी हूँ॥ ४॥
हे देव! मुझे सनाथ कीजिये। हे शंकर! अब
आप प्रसन्न होइये। हे दीनबन्धो! हे परप्रभो! अपने
वचनको आप सत्य कीजिये॥५॥
इस चराचर त्रिलोकीमें आपके बिना कौन मेरा
दुःख दूर करनेमें समर्थ है, ऐसा जानकर मुझपर दया
कीजिये॥ ६ ॥
हे नाथ! हे दीनोंपर कृपा करनेवाले! सभीको
आनन्द देनेवाले उत्सवपूर्ण अपने इस विवाहमें मुझे
भी आनन्दित कीजिये॥ ७॥
मेरे पतिके जीवित होनेपर ही प्रिया पार्वतीके
साथ आपका विहार पूर्ण होगा, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८॥
आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, क्योंकि आप
परमेश्वर हैं। हे सर्वेश! बहुत कया कहूँ, आप मेरे
पतिको शीघ्र जीवित कीजिये॥ ९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर रतिने
अपने गाँठमें बँधी हुई कामकी भस्म उन्हें दे दी और
हे नाथ! हे नाथ! ऐसा कहकर उनके सामने विलाप
करने लगी॥ १०॥
रतिके रुदनको सुनकर [वहाँ उपस्थित] सरस्वती
आदि सभी स्त्रियाँ रोने लगीं और अत्यन्त दीन वचन
कहने लगीं ॥ ११॥
देवियाँ बोलीं [हे प्रभो!] आप भक्तवत्सल
नामवाले, दीनबन्धु और दयानिधि हैं, आप कामको
जीवित कर दीजिये तथा रतिको प्रसन्न कीजिये,
आपको नमस्कार है॥१२॥
ब्रह्माजी बोले--उनके इस वचनको सुनकर
महेश्वर प्रसन्न हो गये। उन करुणासागर प्रभुने शीघ्र
ही [उनपर] कृपादृष्टि की॥ १३॥
शूलधारी शिवजीकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही
भस्मसे उसी रूप-वेषःचिहृको धारण किये हुए, सुन्दर
तथा अद्भुत शरीरवाले कामदेव प्रकट हो गये॥ १४॥
उसी रूप तथा उसी आकारवाले, हास्ययुक्त एवं
धनुष-बाणयुक्त [अपने] पतिकों देखकर रतिने उन्हें
तथा महेश्वरको प्रणाम किंया॥ १५॥
७१२
कृतार्थाभूच्छिवं देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः।
प्राणनाथप्रदं पत्या जीवितेन पुनः पुनः ॥
'कामस्य स्तुतिमाकर्ण्यं सनारीकस्य शङ्करः।
प्रसन्नोऽभवदत्यंतमुवाच करुणार्द्रधी: ॥ १७
सङ्कर उवाच
प्रसन्नोऽहं तव स्तुत्या सनारीकस्य चित्तज।
स्वयंभव वरं ब्रूहि वाञ्छितं तद् ददामि ते॥ १८
ब्रह्मोवाच
इति शम्भुवचः श्रुत्वा महानंद: स्मरस्ततः।
उवाच साञ्जलिर्नप्रो गदूदाक्षरया गिरा॥ १९
काम उवाच
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो।
यदि प्रसन्नः सर्वेश ममानन्दकरो भव॥ २०
क्षमस्व मेऽपराधं हि यत्कृतश्च पुरा प्रभो।
स्वजनेषु परां प्रीतिं भक्ति देहि स्वपादयोः॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं स्मरवचः प्रसन्नः परमेश्वर: ।
ओमित्युक्त्वाब्रवीत्तं वै विहसन्करुणानिधिः॥ २२
ईश्वर उवाच
हे कामाहं प्रसन्नोऽस्मि भयं त्यज महामते।
गच्छ विष्णुसमीपं च बहिःस्थाने स्थितो भव॥ २३
ब्रह्मोवाच
तच्छुत्वा शिरसा नत्वा परिक्रम्य स्तुवन्विभुम्।
बहिर्गत्वा हरिं देवान् प्रणम्य समुपास्त स: ॥ २४
कामं सम्भाष्य देवाश्च ददुस्तस्मै शुभाशिषम्।
विष्ण्वादयः प्रसन्नास्ते प्रोचुः समृत्वा शिवं हृद्॥ २५
देवा ऊचुः
धन्यस्त्वं स्मर सन्दग्धः शिवेनानुग्रहीकृतः ।
जीवयामास सत्त्वांशकृपादृष्ट्याखिलेश्वर: ॥ २६
श्रीशिवमहापुराण
[ 7 ५१
वह कतार हो गयी और हाथ जो इक च.
जीवित पतिके साथ प्राणनाथ [कामदेव] को र
करनेवाले देव शंकरकी स्तुति करने लगी॥ १६॥
पत्नीसहित कामकी स्तुति सुनकर भगवान शंक
अत्यन्त प्रसन्न हो गये और करुणासे आद होका
कहने लगे--॥ १७॥
शंकरजी बोले--हे काम ! सत्रीसहित तु
स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। हे स्वयम्भव ! अब तुम अभीर
वर माँगो, मैं उसे तुम्हें देता हूँ॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले--शिवजीका ऐसा वचन सुनक
कामदेव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और विनम्र होक
हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोले ॥ १९॥
कामदेव बोले-हे देवदेव! हे महादेव! हे
करुणासागर! हे प्रभो! हे सर्वेश! यदि आप प्रसन
हैं, तो मुझे आनन्द प्रदान कीजिये॥ २०॥
हे प्रभो! मैने पूर्व समयमे जो अपराध किया है,
उसे क्षमा कीजिये। स्वजनोंमें परम प्रीति और अपने
चरणोंमें भक्ति दीजिये॥ २१॥
ब्रह्माजी बोले-कामदेवकी यह बात सुनकर
करुणासागर परमेश्वर प्रसन्न हो 'तथास्तु'-ऐसा
कहकर हँसते हुए उनसे पुनः कहने लगे ॥२१॥
ईश्वर बोले हे काम ! हे महामते! मैं तुमपर
प्रसन्न हूँ, तुम भयका त्याग करो और विष्णुके समौ
जाओ तथा बाहर स्थित हो जाओ॥ २३॥
ब्रह्माजी बोले--यह सुनकर वह कामदेव पि
झुकाकर परधुको प्रणाम करके परिक्रमाकर उनकी सूति
करते हुए बाहर जाकर विष्णु एवं अन्य देवता
प्रणामकर उनकी उपासना करने लगा॥ २४॥
देवताओंने कामदेवसे सम्भाषणकर
आशीष प्रदान किया, इसके बाद
हदयमें स्मरण करके वे विष्णु
उनसे कहने लगे-- ॥ २५॥
अदि
ञो
देवता बोले--हे काम! तुम धन्य ४००.
द्वारा दग्ध हो जानेके बाद el
अगुग्रहःपात्र बने और अखिलेश्वरने
कृपादृष्टिसे तुम्हें जीवित कर दिया॥ २६॥
अ० ५१
,खदो न चान्योऽस्ति यतः स्वकृतभुक् पुमान्।
काले रक्षा विवाहश्च निषेकः केन वार्यते॥ २७
ब्रह्मोवाच
ते च सम्मान्य तं सुखेनामरास्तदा ।
सन्तसथस्तत्र विष्णवाद्याः सर्वे लब्धमनोरथाः ॥ २८
सोऽपि प्रमुदितस्तत्र समुवास शिवाज्ञया।
जयशब्दो नमःशब्दः साधुशब्दो बभूव ह॥ २९
ततः शम्भूर्वासगेहे वामे संस्थाप्य पार्वतीम्।
मिष्ठान्न भोजयामास तं च सा च मुदान्विता ॥ ३०
अथ शम्भुर्भवाचारी तत्र कृत्यं विधाय तत्।
मेनामामन्त्य शैलं च जनवासं जगाम सः॥ ३१
महोत्सवस्तदा चासीद् वेदध्वनिरभून्मुने।
वाद्यानि वादयामासुर्जनाश्चतुर्विधानि च॥ ३२
शम्भुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च मुनींस्तदा ।
हरिं च मां भवाचाराह्वन्दितोऽभूत्सुरादिभिः॥ ३३
जयशब्दो बभूवाथ नमश्शब्दस्तथैव च।
वेदध्वनिश्च शुभदः सर्वविष्नविदारणः॥ ३४
अथ विष्णुरहं शक्रः सर्वे देवाश्च सर्षयः।
उपसुरा नागास्तुष्टुवुस्ते पृथक्पृथक् ॥ २५
देवा ऊचुः
जय शम्भोऽखिलाधार जय नाम महेश्वरी
जय रुद्र महादेव जय विश्वम्भर प्रभो॥ ३६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७१२३
कोई भी किसीको सुख-दुःख देनेवाला नहीं
पुरुष स्वयं अपने किये हुए कर्मका फल भोगता
है। समयके आनेपर रक्षा, विवाह तथा जन्म होता है,
उसे कौन रोक सकता है ?॥ २७॥
ब्रह्माजी बोले--ऐसा कहकर उनका सत्कार
करके सफल मनोरथवाले वे सभी विष्णु आदि
देवगण सुखपूर्वक वहीं स्थित हो गये ॥ २८॥
कामदेवने भी प्रमुदित होकर शिवजीकी आज्ञासे
वहीं निवास किया। उस समय जय शब्द, नमःशब्द
और साधु शब्द होने लगा॥ २९॥
उसके बाद शिवजीने अपने निवासगृहमें पार्वतीको
बायीं ओर बैठाकर उन्हें मिष्टानका भोजन कराया
और उन्होंने भी परम प्रसन्न होकर उन शिवजीको
भोजन कराया॥ ३०॥
इस प्रकार लोकाचारमें लगे हुए वे शम्भु
वहाँका कृत्य करके मेना तथा हिमालयसे आज्ञा
लेकर जनवासमें चले गये॥ ३१॥
हे मुने! उस समय महोत्सव होने लगा,
वेदध्वनि होने लगी तथा लोग चारों प्रकारके बाजे*
बजाने लगे ॥ ३२॥
शिवजीने अपने स्थानपर आकर मुनियोंको, मुझे
तथा विष्णुको प्रणाम किया। देवता आदिने लोकाचारके
कारण उनको भी प्रणामं किया॥ ३३॥
उस समय जय शब्द और नमः शब्दका
उच्चारण होने लगा और सभी प्रकारके विघ्नोंको दूर
करनेवाली मंगलदायिनी वेदध्वनि होने लगी ॥ ३४॥
विष्णु, मैं, इन्द्र, सभी देवगण, ऋषि, सिद्ध,
उपदेव एवं नाग अलग-अलग शिवजीकी स्तुति करने
लगे--॥ ३५॥
देवता बोले-हे शंकर! हे सर्वाधार! आपकी
जय हो। हे महेश्वर! आपकी जय हो। हे रुद्र! हें
महादेव! हे विश्वम्भर! हे प्रभो! आपकी जय हो।
* अमरकोशमें प्रकारके संसारके सभी प्राचीन
अमरकोशमें जो चार प्रकारके बाजे बताये Bs ह । 'तत' वह बाजा है, जिसमें तारका विस्तार हो-जैसे वीणा,
'आतद्ध' कहलाता है- जैसे ढोल, मृदंग, नगारा आदि। जिसमें
'हो, उसे 'सुधिर' कहते हैं जैसे वंश, शंख, विगुल, हारमोतियम
हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं--तत, आनद्ध, सुषिर औ
सितार आदि। जिसे चमड़ेसे मढ़ाकर कसा गया हो,
हो और उसमें हवा भरकर स्वर निकाला जाता
आहि काँसेके झाँझ आदिको 'घन' कहते हँ!
चीन अथवा णय अ वच उके अता वाद्य उन्हाँके अन्तर्गत
ड १४
्रीशिवमहापुराण
[3s = = ¬ ` आमाका सी
जय कालीपते स्वामिन् जयानन्दप्रवर्धक।
जय त्र्यम्बक सर्वेश जय मायापते विभो॥ ३७
जय निर्गुण निष्काम कारणातीत सर्वग।
जय लीलाखिलाधार धृतरूप नमोऽस्तु ते॥ ३८
जय स्वभक्तसत्कामप्रदेश करुणाकर।
जय सानन्दसद्रप जय मायागुणाकृते॥ ३९
जयोग्र मूड सर्वात्मन् दीनबन्धो दयानिधे।
जयाविकार मायेश वाङ्मनोऽतीतविग्रह। ४०
ब्रह्मोवाच
इति स्तुत्वा महेशानं गिरिजानायकं प्रभुम्।
सिषेविरे परप्रीत्या विष्छवाद्यास्ते यथोचितम्॥ ४१
अथ शम्भुर्महेशानो लीलात्ततनुरीश्वरः।
ददौ मानवरं तेषां सर्वेषां तत्र नारद॥ ४२
विष्णवाद्यास्तेऽखिलास्तात प्राप्याज्ञां परमेशितुः।
अतिहृष्टा: प्रसन्नास्याः स्वस्थानं जग्मुरादृता: ॥ ४३
हे कालीपते! हे स्वामिन्! हे आनन्दपरवर्धक।
जय हो। हे त्र्यम्बक! हे सर्वेश! आपकी जय
हे मायापते! हे विभो! आपकी जय हो॥ स्ह र
|
हे निर्गुण! हे निष्काम! हे कारणातीत
आधार! आपकी जय हो | हे अवतार धारण करेवा!
आपको नमस्कार है॥ ३८॥ |
ईश! हे करुणासागर! आपकी जय हो | हे आनन्दमय!
हे सुन्दररूपवाले ! आपकी जय हो। हे मायासे सण
रूप धारण करनेवाले! आपकी जय हो॥ ३९॥
हे उग्र! हे मृड! हे सर्वात्मन्! हे दीनबन्धो। हे
दयानिधे! आपकी जय हो। हे अविकार! हे मायेश!
हे वाणी तथा मनसे अतीत स्वरूपवाले! आपकी
जय हो ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] इस प्रका
गिरिजापति महेश्वर प्रभुकी स्तुतिकर वे विष्णु आदि
देवगण परम प्रीतिसे शिवजीकी यथोचित सेवा कले
लगे॥ ४१॥
है नारद! तब लीलासे शरीर धारण करनेवाले
महेश्वर भगवान् शम्भुने उन सबको श्रेष्ठ सम्मा
प्रदान किया॥ ४२॥ व
हे तात! इसके बाद वे विष्णु आदि सभी लोग
महेश्वरकी आज्ञा प्राप्त करके अत्यन्त हर्षित, प्रसनमु
तथा सम्मानित होकर अपने-अपने स्थानको चते
राये॥ ४३ ॥
ह शलिवमहाराण ब्रह्मगरदसंवादे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तीये पार्वतीखण्डे
नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१॥
कामसंजीवनवर्णन॑
काम्रसंजीवनवर्णन ऑशिवमहापुराणके अगत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
॥ इस प्रकार
कामसंजीवनवर्णन नामक
अथ शैलवरस्तात हिमवान्भाग्यसत्तमः
प्राङ्गणं रचयामास भोजनार्थं विचक्षणः र्
अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५१॥
अपने भक्तोंकी कामनाको पूर्ण करनेवाले ह ।
सर्वग! आपकी जय हो। हे सम्पूर्ण तौल
अ० ५२]
वर्जनं लेपनं सम्यक्कारयामास तस्य सः।
तर सुगन्धैरलञ्जक्रे नानावस्तुभिरादरात्॥ २
अध शैलः सुरान् सर्वानन्यानपि च सेश्वरान्।
ओोजनायाह्ृयामास पुत्रै शेले परैरपि॥ ३
गैलाह्रानमथाकर्ण्य स प्रभुः साच्युतो मुने।
रवैः सुरादिभिस्तत्र भोजनाय ययौ मुदा॥ ४
गिरि प्रभुं च सर्वास्तान् सुसत्कृत्य यथाविधि।
मुदोपवेशयामास सत्पीठेषु गृहान्तरे॥ ५
नानासुभोज्यवस्तूनि परिवेष्य च तत्पुनः।
मा्लिर्भोजनायाज्ञां चक्रे विज्ञपिमानतः॥ ६
अध सम्मानितास्तत्र देवा विष्णुपुरोगमाः ।
सदाशिवं पुरस्कृत्य बुभुजुः सकलाश्च ते॥
तदा सर्वे हि मिलिता ऐकपद्येन सर्वशः।
प॑क्तिभूताश्च बुभुजुर्विहसन्तः पृथक्पृथक् ॥ ८
७
नन्दिभृंगिबीरभद्रवीरभद्रगणाः पृथक् ।
बुभुजुस्ते महाभागाः कुतूहलसमन्विता:॥ ९
देवा: सेद्रा लोकपाला नानाशोभासमन्विताः।
बुभुजुस्ते महाभागा नानाहास्यरसैस्सह॥ १०
सर्वे च मुनयो विप्रा भृग्वाद्या ऋषयस्तथा।
बभुः प्रीतितः सर्वे पृथक् पंक्तिगतास्तदा॥ ११
तथा चण्डीगणा: सर्वे बुभुजुः कृतभोजनाः।
ेतूहलं प्रकुर्वन्तो नानाहास्यकरा मुदा॥ १२
र ते भुक्तवन्तश्चाचम्य सर्वे मुदान्विताः।
गता: प्रत्या विष्छवाद्याः सव॑ ्वमाश्रमम्॥ १२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७९ पी Ne
उन्होंने अच्छी प्रकारसे उसका मार्जन तथा
लेपन कराया और अनेक प्रकारकी सुगन्धित वस्तुओंसे
आदरपूर्वक उसे अलंकृत कराया ॥ २॥
तदनन्तर अपने पुत्रों तथा अन्य पर्वतोंद्वारा
शंकरजी-सहित सभी देवगणों तथा अन्य लोगोंको
भोजनके लिये बुलवाया॥ ३॥
हे मुने! हिमालयके आमन्त्रणको सुनकर विष्णु
तथा सभी देवता आदिके साथ वे प्रभु प्रसन्नताके साथ
भोजनके लिये वहाँ गये॥ ४॥
हिमालयने प्रभु तथा उन सभी देवगणोंका
यथोचित सत्कार करके घरके भीतर उत्तम आसनोंपर
प्रसन्नताके साथ बैठाया और उन्हें अनेक प्रकारकी
सुभोज्य वस्तुओंको परोसकर नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर
भोजनके लिये प्रार्थना की ॥ ५-६॥
उसके बाद विष्णु आदि सभी देवता [हिमालयसे]
इस प्रकार सम्मानित होकर सदाशिवको आगेकर
भोजन करने लगे॥ ७॥
उस समय सभी देवगण मिलकर एक साथ
पंक्तिबद्ध होकर [परस्पर] हास्य करते हुए अलग-
अलग भोजन करने लगे॥ ८ ॥
महाभाग नन्दी, भृंगी, वीरभद्र तथा वीरभद्रके
गण पृथक् होकर कौतूहलमें भरकर भोजन करने
लगे॥९॥
अनेक प्रकारकी शोभासे सम्पन्न महाभाग इन्द्र
आदि लोकपाल तथा देवगण अनेक प्रकारके हास-
परिहासके साथ भोजन करने लगे॥ १०॥
सभी मुनि, ब्राह्मण तथा भृगु आदि
ऋषिगण आनन्दके साथ पृथक् पंक्तिमें बैठकर भोजन
करने लगे॥ ११॥
इसी प्रकार चण्डीके सभी गणोंने भी भोजन
किया। वे भोजन करनेके बाद प्रसन्नतापूर्वक कौतूहल
करते हुए अनेक प्रकारके हास-परिहास कर रहे
ik प्त तरह विष्णु आदि उन सभी देवताओंने
आतन्दके साथ भोजन किया, फिर आचमन करके
विश्रामके लिये वे प्रसन्ततापूर्वक अपने-अपने
निवासस्थानको चले गये॥ १३॥
के १६
श्रीशिवमहापुराण
[अ न क्स या > ऱ् णी
मेनाज़या स्त्रियः साध्व्यः शिवं सम्प्रार्थ्य भक्तित: ।
गेहे निवासयामासुर्वासाख्ये परमोत्सवे॥ १४
रत्नसिंहासने शम्भुः मेनादत्ते मनोहरे।
सन्निधाय मुदा युक्तो ददृशे वासमन्दिरम्॥ १५
रत्लप्रदीपशतकेर््वलद्भि््चलितं श्रिया।
रत्पात्रघटाकीर्ण मुक्तामणिविराजितम्॥ १६
रत्नदर्पणशोभाढ्यं मण्डितं श्रेतचामरैः।
मुक्तामणिसुमालाभिर्वेष्टितं परमद्द्रिमत्॥ १७
अनौपम्यं महादिव्यं विचित्रं सुमनोहरम्
चित्ताह्णादकरं नानारचनारचितस्थलम्॥ १८
शिवदत्तवरस्यैव प्रभावमतुलं परम्।
दर्शयन्तं समुल्लासि शिवलोकाभिधानकम्॥ १९
जानासुगन्थसददरव्यै्वासितं सुप्रकाशकम्।
चन्दनागरुसंयुक्तं पुष्पशय्यासमन्वितम्॥ २०
जानाचित्रविचित्राढ्यं निर्मितं विश्वकर्मणा।
रलेन्द्रसाररचितैराचितं हारकैर्वरैः॥ २९
कुत्रचित्सुरनिर्माणं वैकुण्ठं सुमनोहरम्।
कुत्रचिच्च ब्रह्मलोकं लोकपालपुरं क्वचित्॥ २२
कैलासं कुत्रचिद्रम्यं कुत्रचिच्छक्रमन्तिरम्।
कुत्रचिच्छिवलोकं च सर्वोपरि विराजितम्॥ २३
एतादृशं गृहं सर्व दृष्ट्वाश्वर्य महेश्वर: |
प्रशंसन् हिमशैलेशं परितुष्टो बभूव ह॥ २४
तत्रातिरमणीये च रलपर्यङ्क उत्तमे।
आशिष्ट मुदा युक्तो लीलया परमेश्वरः॥२५
इधर, मेनाकी आज्ञासे सभी
स्त्रियाँ भक्तिपूर्वक शिवसे प्रार्थनाकर वास
परमानन्ददायक निवासगृहमें ले गयीं ॥ १४॥
Ce मेनाके द्वारा दिये गये मनोहर रल
सिंहासनपर बैठकर प्रसन्नतापूर्वक शिवजी वासगृहे
देखने लगे॥ १५॥
वह गृह सैकड़ों जलते हुए रत्नदीपकोंसे प्रकाशित
तथा शोभासम्पन्न था, वहाँ अनेक प्रकारके रलो
पात्र विराज रहे थे, उसमें स्थान-स्थानपर मोती तथ
मणियाँ लगी हुई थीं। वह रत्ोंके दर्पणकी शोभे
युक्त था, वह श्वेत वर्णके चँवरोंसे मण्डित था, उपने
मोतियों और मणियोंकी मालाएँ लगी हुई थीं। बह
परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनुपम, महादिव्य, विक्ति,
अत्यन्त मनोहर तथा चित्तको प्रसन्न करनेवाला धा
और उसके प्रत्येक स्थलमें नाना प्रकारकी कारगर |
की गयी थी॥ १६-१८॥
वह गृह शिवके द्वारा दिये गये वरका अतुलनीय
प्रभाव प्रकट कर रहा था और शोभासे समन
होनेके कारण उस गृहका शिवलोक नामकरण किया
गया था॥ १९॥
वह अनेक प्रकारके सुगन्धित उत्तम द्वयम
सुवासित, उत्तम प्रकाशसे युक्त, चन्दन-अगरुयुक्त तथी
पुष्पको शय्यासे समन्वित था॥ २०॥
वह गृह विश्वकर्माके द्वारा रचित नाना प्रकार्क
चित्रोंकी विचित्रतासे युक्त था, उसमें सभी उत्तम रला
सारोंसे रचित श्रेष्ठ हारोंके ढेर लगे हुए थे॥ २१॥
कहीं देवताओंके लिये अत्यन्त मनोहर वै
बना हुआ था, कहीं ब्रह्मलोक बना हुआ था, नर
लोकपालोंका पुर बना हुआ था, कहीं मनोहर कैं
बना हुआ था, कहीं इन्द्रका मन्दिर बना हुआ थी
कहीं सबके ऊपर शिवलोक सुशोभित ही
था॥ २२-२३॥
आश्चर्यचकित करनेवाले ऐसे घरको दे
शिवजी गिरिराज हिमालयकी प्रशंसा करते ह
प्रसन्न हो गये॥ २४॥ डम
उसके बाद शिवजीने परम रमणीय ते |
रलपपर्यकपर प्रसन्न हो लीलापूर्वक शयन किया
अ० ५२]
श्र स्वभ्नातृन्भोजयामास कृत्स्नशः।
सर्वानन्यां श्र सुप्रीत्या शेषकृत्यं चकार ह॥ २६
खं कुर्वति शैलेशे स्वपिति प्रेष्ठ ईश्वरे।
द्यतीता रजनी सर्वा प्रातःकालो बभूव ह॥ २७
अध प्रभातकाले च धृत्युत्साहपरायणाः।
नानाप्रकारवाद्यानि वादयाञ्चक्रिरे जनाः॥ २८
सर्वे सुराः समुत्तस्थुर्विष्णवाद्याः सुमुदान्विताः।
स्वेट संस्मृत्य देवेशं सज्जीभूताः ससंभ्रमाः ॥ २९
स्ववाहनानि सज्जानि कैलासं गन्तुमुत्सुकाः।
कृत्वा सम्प्रेषयामासुर्धर्म शिवसमीपत: ॥ ३०
बासगेहमथागत्य धर्मो नारायणाज्ञया।
उवाच शंकरं योगी योगीशं समयोचितम्॥ ३९
धर्म उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते भव नः प्रमथाधिप।
जनावासं समागच्छ कृतार्थं कुरु तत्र तान्॥ ३२
ब्रह्मोवाच
इति धर्मवचः श्रुत्वा विजहास महेश्वरः।
ददर्श कृपया दृष्ट्या तल्पमुज्झाञ्चकार ह॥ ३३
उवाच विहसन् धर्म त्वमग्रे गच्छ तत्र ह।
अहमप्यागमिष्यामि द्रुतमेव न संशयः॥ ३४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः शंकरेणाथ जनावासं जगाम सः।
स्वयं गन्तुमना आसीत्तित्र शम्भुरपि प्रभुः॥ ३५
तेज्ात्वा स्त्रीगण: सोऽसौ तत्रागच्छन्महोत्सवः।
चक्रे मङ्गलगानं हि पश्यन् शम्भुपदद्वयम्॥ ३६
अथ शम्भूर्भवाचारी प्रातःकृत्यं विधाय च।
कुध्रं च जनावासं जगाम सः॥ ३७
महोत्सवस्तदा चासीीद्वेदध्वनिरभूनमुने।
वाद्यानि चादयामासुर्जनाश्जतुर्विधानि च॥ ३८
शम्भुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च मुनींस्तदा।
र च मां भवाचाराद वन्दितोऽभूत्सुरादिभिः ॥
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७९७
हिमालयने अपने सभी भाइयोंको तथा अन्य
लोगोंको बडे प्रेमसे भोजन कराया तथा शेष कृत्य पूर्ण
किया॥ २६॥
इस प्रकार हिमालयको सब कार्य पूर्ण करते हुए
एवं ईश्वर शिवजीके शयन करते हुए सारी रात बीत
गयी और प्रभातकाल उपस्थित हो गया॥ २७॥
तब प्रातःकाल होनेपर धैर्य एवं उत्साहसे भरे
हुए लोग अनेक प्रकारके बाजे बजाने लगे॥ २८॥
विष्णु आदि सभी देवगण उठ गये और अपने
इष्टदेव शंकरका स्मरणकर प्रसन्नताके साथ शीघ्रतासे
सञ्जित होकर तैयार हो गये। अपने-अपने वाहनोंको
सजाकर कैलास जानेके लिये उत्सुक उन लोगोंने
शिवजीके समीप धर्मको भेजा | तत्पश्चात् नारायणकी
आज्ञासे निवासगृहमें आकर योगी धर्म योगीश्वर
शंकरसे समयोचित वचन कहने लगे ॥ २९--३१॥
धर्म बोले--हे भव! उठिये, उठिये, आपका
कल्याण हो। हे प्रमथाधिप! जनवासेमें चलिये और
वहाँ उन सभीको कृतार्थ कीजिये॥ ३२॥
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] धर्मराजके इस
वचनको सुनकर शिवजी हँसे । उन्होने कृपादृष्टिसे धर्मकी
ओर देखा और शय्याका परित्याग किया | वे हँसते हुए
धर्मसे कहने लगे--तुम आगे चलो, मैं भी वहाँ शीघ्र ही
आऊँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३३-३४॥
ब्रह्माजी बोले--शंकरजीके द्वारा इस प्रकार
कहे जानेपर धर्मराज जनवासेमें गये और बादमें स्वयं
प्रभु शंकरजी भी वहाँ जानेका विचार करने लगे॥ ३५॥
इसे जानकर स्त्रियाँ आनन्दमें भरकर वहाँ पहुँच
गयीं और शिवके दोनों चरणोंको देखती हुई मंगलगान
करने लगीं | इसके बाद वे शिवजी लोकाचार प्रदर्शित
करते हुए प्रातःकृत्य करके मेना एवं पर्वतराजसे
आज्ञा लेकर जनवासेमें गये॥ ३६-३७॥
हे मुने! उस समय महोत्सव होने लगा,
बेदध्वनि होने लगी और लोग चारों प्रकारके बाजे
बजाने लगे॥ ३८॥
“के 'शिवजीने अपने स्थानपर आकर मुनियोंको, मुझे
तथा विष्णुको प्रणाम किया तथा देवता आदिने भी
लौकिक आचारवश उनकी वन्दना की॥ ३९॥
के
७१८ श्रीशिवमहापुर [अ न न सिख" कल |
[उस समय चारों ओर] जय शब्द
और मंगलदायक वेदध्वनि होने लगी, इस प्रव |
बेदध्वनिश्च शुभदो महाकोलाहलोऽभवत्॥ ४० | महान् कोलाहल व्याप्त हो गया॥ ४०॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां र्द्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे वरवर्गभोजनः |
शिवशयनवर्णन॑ ताम द्विपज्चाशत्तमो5ध्यायः ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय यार्वतीखण्डमें वरवर्गका
भोजन और शिवशयन-वर्णन नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥
जयशब्दो बभूवाथ नमःशब्दस्तथैव च।
अथ त्रिपञ्जाशत्तमोऽध्यायः
चतुर्थीकर्म, बरातका कई दिनोंतक ठहरना, सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका
'बरातको विदा करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी कन्या
सौंपना तथा बरातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले-- [हे नारद!] तदनन्तर विभु
अथ विष्ण्वादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः। आदि सभी देवगण एवं तपोधन मुनिगण आवश्यक
कृत्वावश्यककर्माणि यात्रां सन्तेनिरे गिरेः॥ १ | कर्म करके हिमालयसे प्रस्थान करनेका उपक्रम कले
लगे॥ १॥
ततो गिरिवरः स्तात्वा स्वेष्टं सम्पूज्य यत्नत: । हिमालय भी स्नानकर अपने इष्टदेवकी यलपूरषक
पौरबन्धून्समाहूय जनवासं ययौ मुदा॥ २ | पूजा करके नगरवासियों एवं बन्धुवर्गोंको बुलाकर
द प्रसन्तापूर्वक जनवासेमें गये। उन्होंने शंकरजीका
तत्र प्रभुं प्रपूज्याथ चक्रे सम्प्रार्थनां मुदा। विधिवत् पूजन करके आनन्दपूर्वक प्रार्थना की-आप
कियददिनानि सन्तिष्ठ मेहे सकलैः सह॥ ३ | इन सभीके साथ कुछ दिनतक मेरे घरपर तिवस
कोजिये॥ २-३॥
विलोकनेन ते शम्भो कृतार्थोऽहं न संशयः। हे शम्भो! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ तथा धत
धन्यश्च यस्य मद्रेहे आयातोऽसि सुरैः सह॥ ४ | हो गया हूँ, इसमें संशय नहीं है, जो कि आप
देवताओंके साथ मेरे घर आये हैं ॥ ४॥
ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले-शैलराजने इस प्रकार ब
इत्युकत्वा बहु शैलेशः करौ बद्वा प्रणम्य च] | कहकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके विष्णु
प्रभुं निमन्त्रयामास सह विष्णुसुरादिभि:॥ ।, | देवगणोंके साथ प्रभुको आमन्त्रित किया।
अथ ते मनसा गत्वा शिवं संयुतमादरात् आदरके साथ मनमें शिवजीका
प्रत्यूचुर्मुनयो देवा हृष्टा विष्णुसुरादिभिः |; त सहित देवता तथा मुनिगण प्रसन्नतापूर्वक हिमाल
देवा ऊचु कहने लगे-॥ ५-६॥
धन्यस्त्वं गिरिशार्दूल तव कीर्तिमंहीयसी। देवता बोले हे गिरिराज! आप धन्य ह
त्वत्समो न त्रिलोकेषु कोऽपि पुण्यतमो जन:॥ ७ | की कौति महान् है, तीनों लोकोमें आपके ते
यस्य द्वारि महेशानः परब्रह्म सतां गतिः। तव. कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके द्वारपर
समागतः सदासैश्च कृपया भक्तवत्पल:॥ ति देनेवाले, भक्तवत्सल एवं परब्रह्म महेश्वर
साथ कृपा करके पधारे॥ ७-८ ॥
अ० ५३
जनावासो तिरम्यश्व सम्मानो विविधः कृत:।
भोजनानि त्वपूर्वाणि न वर्ण्यानि गिरीएवर॥ ९
चित्र न खलु तत्रास्ति यत्र देवी शिवाम्बिका।
परिपूर्णमशेषं च वयं धन्या यदागताः॥ १०
ब्रह्मोवाच
इत्थं परस्परं तत्र प्रशंसाभवदुत्तमा।
उत्सवो विविधो जातो वेदसाधुजयध्वनि:॥ ११
अभून्मङ्घलगानं च ननर्ताप्सरसाङ्गणः।
नुतिं चक्कुर्मागधाद्या द्रव्यदानमभूद् बहु॥ ९२
तत आमन्त्र्य देवेशं स्वगेहमगमद्विरिः।
भ्रोजनोत्सवमारेभे नानाविधिविधानतः॥ १३
भोजनार्थ प्रभुं प्रीत्यानयामास यथोचितम्।
परिवारसमेतं च सकुतूहलमीश्वरम्॥ ९४
प्रक्षाल्य चरणौ शम्भोर्विष्णोर्मम वरादरात्।
सर्वेषाममराणां च मुनीनां च यथार्थतः॥ १५
परेषां च गतानां च गिरीशो मण्डपान्तरे।
आमयामास सुप्रीत्या तांस्तान्बन्धुभिरन्वितः॥ १६
सुरसैविविधान्नैश्ञ तर्पयामास तान् गिरिः।
बुभुजुरनिखिलास्ते वै शम्भुना विष्णुना मया॥ १७
तदानीं पुरनार्यश्च गालीदानं व्यधुर्मुदा।
मृदुवाण्या हसन्त्यश्च पश्यन्त्यो यत्नतश्च तान्॥ १८
तै भुकत्वाचम्य विधिवद्विरिमामन्य नारद।
सथानं प्रययुः सर्वे मुदितास्तृमतिमागताः॥ १९
शथे तृतीये घस्रेऽपि मानितास्तेऽभवम्मुने।
गिरीश्वरेण वरिधिवद्दानमानादरादिभिः॥ २०
चतुथे दिवसे प्राप्ते चतुर्थीकर्म शुद्धितः।
रद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७१९
आपने [हमें उहरनेके लिये] मनोहर जनवासा
दिया एवं विविध सम्मान किया। हे गिरीश्वर! आपने
उत्तम भोजन दिये, जो अवर्णनीय हैं॥ ९॥
वहाँ कोई आश्चर्य नहीं, जहाँ [साक्षात्]
अम्बिका शिवादेवी हैं। सब कुछ सर्वथा परिपूर्ण है,
कुछ भी शेष नहीं रहा, हमलोग धन्य हैं, जो यहाँपर
आ गये॥ १०॥
ब्रह्माजी बोले-[हे नारद!] इस प्रकार वहाँ
परस्पर एक-दूसरेकी उत्तम प्रशंसा हुई। उस समय
वैदिक मन्त्रों, साधु तथा जय शब्दकी ध्वनि होने लगी
और जाना प्रकारके उत्सव होने लगे॥ ११॥
मंगलगान होने लगा, अप्सराएँ नाचने लगीं,
मागध स्तुति करने लगे और द्रव्योंका पर्याप्त दान
हुआ॥ १२॥
तत्पश्चात् देवेशका आमन्त्रणकर हिमालय अपने
घर गये और अनेक विधि-विधानोंसे भोजनोत्सवकी
तैयारी करने लगे॥ १३॥
वे कुतूहलपूर्वक परिवारसहित प्रभु शंकरको
भोजन करानेके लिये प्रेमके साथ ले आये॥ १४॥
परम आदरसे शिवजीके, विष्णुके, मेरे, सभी
देवताओंके, मुनियोंके तथा अन्य गये हुए लोगोंके
चरणोंको धोकर बन्धु-बान्धवोंसहित गिरिराजने बडे
ग्रेमसे उन सबको मण्डपके भीतर [आसन देकर]
बैठाया॥ १५-१६॥
विष्णु, सदाशिव एवं मुझ ब्रह्मासहित समस्त
लोग भोजन करने लगे। [इस प्रकार] गिरिराजने
रसीले विविध अनोंसे उन सबको तृप्त किया। उस
समय नगरकी नारियाँ हँसती हुई एवं उन सभीकी
ओर यलसे देखती हुई मधुर वाणीमें गालियाँ देने
लगीं॥ १७-१८॥
है नारद! इस प्रकार सब लोग विधिवत् भोजन
करके आचमनकर गिरिराजसे आज्ञा लेकर प्रसन्नता
एवं तृप्तिसे युक्त हो अपने-अपने स्थानको चले
गये ॥
गये ॥ तं ] इसी प्रकार तीसरे दिन भी गिरिराजने
विधिवत् दान, सम्मान एवं आदर आदिके द्वारा उनका
सत्कार किया। चौथा दिन प्राप्त होनेपर बड़ी शुद्धताके
र २०
श्रीशिवमहापुराण
[3s ` = = ` ७ मा
बभूव विधिवद्येन विना खण्डित एव सः॥ २१
उत्सवो विविधश्चासीत्साधुवादजयध्वनिः।
बहुदानं सुगानं च नर्तनं विविधं तथा॥ २२
पञ्चमे दिवसे प्राप्ते सर्वे देवा मुदान्विताः।
विज्ञप्तिं चक्रिरे शैलं यात्रार्थमतिप्रेमतः॥ २३
'तदाकर्ण्य गिरीशश्रोवाच देवान् कृताञ्जलिः ।
कियहिनानि तिष्ठन्तु कृपां कुर्वन्तु मां सुराः॥ २४
इत्युकत्वा स्नेहतस्ताँश्च प्रभुं विष्णुं च मां परान्।
वासयामास दिवसान् बहून्नित्यं समादरात्॥ २५
इत्थं व्यतीयुर्दिवसा बहवो वसतां च तत्।
सपर्षीन्प्रेषयामासु्गिरीशान्ते ततः सुराः॥ २६
ते तं सम्बोधयामासुरमेनां च समयोचितम्।
शिवतत्त्वं परं प्रोचुः प्रशंसन्विधिवन्मुदा॥ २७
अङ्गीकृतं गिरीशेन तत्तद्वोधनतो मुने।
वात्रार्थमगमच्छम्भुः शैलेशं सामरादिकः॥ २८
यात्रां कुर्वति देवेशे स्वशैलं सामरे शिवे।
उच्चैः रुदोद सा मेना तमुवाच कृपानिध्चिम्॥ २९
मेनोवाच
कृपानिधे कृपां कृत्वा शिवां सम्पालयिष्यसि।
सहस्त्रदोषं पार्वत्या आशुतोषः क्षमिष्यसि॥ ३०
त्वत्पादाम्बुजभक्ता च मद्वत्सा जन्मजन्मनि।
स्वप्ने ज्ञाने स्मृतिर्नास्त महादेवं प्रभुं विना॥ ३९
त्वद्धक्तिश्रुतिमात्रेण हर्षाश्रुपुलकान्विता ।
त्वन्निन्दया भवेन्मौना मृत्युंजय मृता इव॥ २२
साथ चतुर्थी कर्म विधिवत् सम्पन्न हुआ, जिसके कि
वह उत्सब अधूरा ही रह जाता। उस समय उ
प्रकारका उत्सव, जयजयकार तथा साधु शब्दोका
उच्चारण, नाना प्रकारका दान, गान एवं नृत्य होव
लगा॥ २०--२२॥
पाँचवाँ दिन प्राप्त होनेपर प्रसन्न हुए
देवताओंने बड़े प्रेमके साथ गिरिराजसे विदाईके लव
निवेदन किया। यह सुनकर हिमालयने हाथ जोडन
देवताओंसे कहा-हे देवताओ! अभी आपलोग बुछ
दिन और रहें तथा मेरे ऊपर कृपा करें॥ २३-२४॥
ऐसा कहकर उन्होंने बड़े स्नेहसे शंकर, विष्णु
मुझ ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंको बहुत दिनोंतक बढ़े
आदरके साथ ठहराया॥ २५॥
इस प्रकार निवास करते हुए जब बहुत दि |
बीत गये, तब देवताओंने हिमालयके पास सप्तर्षियोंको
भेजा ॥ २६॥
उन्होंने गिरिराज तथा मेनाको समयोचित बाते
कहकर समझाया और प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक
श्रेष्ठ शिवतत्त्वको विधिवत् प्रतिपादित किया॥ २७॥
हे मुने! उनके समझानेसे हिमालये उसे
स्वीकार कर लिया। तब शिवजी विदा होनेके लिये
देवताओंसहित हिमालयके घर गये॥ २८॥
जब देवेश शिव देवताओंसहित आगे
कैलासपर्वतके लिये यात्रा करने लगे, तब मेता उँगे
स्वरसे रोने लगीं और कृपासागर शंकरजीसे कहीं
लगीं-॥ २९॥
मेना बोलीं कृपानिधे! आप कृपा क |
भलीभाँति शिवाका पालन कीजियेगा,
आशुतोष हैं, अत: पार्वतीके हजारों दोषोंको बम
॥ ३०॥
हे प्रभो! यह मेरी कन्या जत्म-जत्माती
आपके चरणकमलकी भक्त है, आप महादेव रु
छोड़कर इसे सोते अथवा जागते समय भी 8
स्मरण नहीं रहता। हे मृत्युंजय! आपकी
ही यह हर्षके आँसू गिराती हुई प
हो जाती है और आपकी निन्दासे यह मौत
मृतकके समान हो जाती है॥ ३१-३२॥
अ० ह. J
ब्रह्मोवाच
मेनका तस्मै समर्प्य स्वसुतां तदा।
अलुच्चै रोदनं कृत्वा मूर्च्छामाप तयोः पुरः॥ ३३
अध मेनां बोधयित्वा तामामच्त्य गिरिं तथा।
चकार यात्रां देवैश्च महोत्सवपुरस्सरम्॥ ३४
अध ते निर्जराः सर्वे प्रभुणा स्वगणैः सह।
त्रा प्रचक्रिरे तूष्णीं गिरिं प्रति शिवं दधुः॥ ३५
हिमाचलपुरीबाह्योपवने हर्षिताः सुरा: ।
सेश्वराः सोत्सवास्तस्थुः पयैषन्त शिवागमम्॥ ३६
इत्युक्ता शिवसद्यात्रा देवैस्सह मुनीश्वर।
आकर्णय शिवायात्रां विरहोत्सवसंयुताम्॥ ३७
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७२१
ब्रह्माजी बोले--तब ऐसा कहकर मेना उन्हें
अपनी पुत्रीको समर्पितकर जोर-जोरसे रुदन करके
उन दोनोंके सामने मूच्छित हो गयीं। तदनन्तर शंकरने
मेनाको समझा करके और उनसे तथा हिमालयसे
आज्ञा लेकर देवगणोंके साथ महोत्सवपूर्वक यात्रा
की ॥ ३३-३४॥
तदनन्तर सभी देवताओंने हिमालयके कल्याणको
कामना करते हुए प्रभु तथा अपने गणोंके साथ मौन
हो प्रस्थान किया॥ ३५॥
[कुछ दूर जाकर] हर्षित देवता हिमालयकी
पुरीके बाहर बगीचेमें शिवजीसहित आनन्दपूर्वक ठहर
गये और शिवाके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ३६॥
हे मुनीश्वर! इस प्रकार देवगणोंके सहित
शिवकी उत्तम यात्राका वृत्तान्त मैने आपसे कह दिया।
अब उत्सव तथा [विदाईके अनन्तर होनेवाले]
विरहसे युक्त शिवाकी यात्रा सुनिये ॥ ३७॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवयात्रावर्णनं नाम त्रिमञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
शिवयात्रावर्णन नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३ ॥
अथ चतुःपञ्जाशत्तमोऽध्यायः
मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मणपलीका पार्वतीको पातिव्रतधर्मका उपदेश देना
ब्रह्मोवाच
अथ सपर्षयस्ते च प्रोचुर्हिमगिरीश्वरम्।
कार्य स्वात्मजादेव्या यात्रामद्योचितां गिरे॥ १
इति श्रुत्वा गिरीशो हि बुदध्वा तद्विरहं परम्।
विषण्णो$भून्महाप्रेम्णा कियत्कालं मुनीश्वर २
कियत्कालेन सम्प्राप्य चेतनां शैलराद् ततः।
पेथास्त्विति गिरामुक्त्वा मेनां सन्देशमब्रवीत्॥ ३
शैलसन्देशमाकर्ण्य॑ हर्षशोकवशा मुने।
मेना संयापयामास कर्तुमासीत्समुद्यता॥ ४
ब्रह्माजी बोले-उसके बाद सप्तर्षियोंने
हिमालयसे कहा--आज गिरिजाकी विदाईके लिये
उत्तम मुहूर्त है, अतः आप अपनी पुत्री पार्वतीकी
विदाई कर दीजिये॥ १॥
हे मुनीश्वर! यह बात सुनकर वे हिमालय
नार्वतीवियोगजन्य दुःखका स्मरणकर कुछ देरके
लिये व्याकुल हो गये॥ २॥
फिर कुछ कालके अनन्तर चेतना प्राप्त होनेपर
' ऐसा ही होगा'--यह कहकर उन्होंने मेनाको सन्देश
भेजा॥ ३॥
हे मुने। शैलका सन्देश सुनकर मेना हर्ष तथा
शोकसे युक्त हो गयीं और गिरिजाको विदा करानेके
लिये उद्यत हो गयीं॥ ४॥
मड २२
शरुतिस्वकुलजाचारं चचार विधिवन्मुने।
उत्सवं विविधं तत्र सा मेना क्षितिभृत्प्रिया॥ ५
गिरिजां भूषयामास नानारलांशुकेवरैः।
द्वादशाभरणैश्चैव भृङ्ारैनृपसम्मितेः॥ ६
मेनामनोगतिं बुद्ध्वा साध्व्येका द्विजकामिनी।
गिरिजां शिक्षयामास पातित्रत्यव्रतं परम्॥
द्विजपल्युवाच
गिरिजे श्रृणु सुप्रीत्या मद्ठचो धर्मवर्धनम्।
इहामुत्रानन्दकरं श्रृण्वतां च सुखप्रदम्॥ ८
धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषतः।
पावनी सर्वलोकानां सर्वपापोघनाशिनी॥ ९
सेवते या पतिं प्रेम्णा परमेश्वरवच्छिवे।
इह भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते पत्या शिवां गतिम्॥ १०
पतिब्रता च सावित्री लोपामुद्रा हारुन्धती।
शाण्डिल्या शतरूपानसूया लक्ष्मी: स्वधा सती॥ ११
संज्ञा च सुमतिः श्रद्धा मेना स्वाहा तथैव च।
अन्या बह्योऽपि साध्यो हि नक्ता विसतारजाद्भयात्॥ १२
पातित्रत्यवृषेणैव ता गताः सर्वपूज्यताम्।
ब्रहमविष्णुहरैश्रापि मान्या जाता मुनीश्वरैः॥ १३
सेव्यस्त्वया पतिस्तस्मात्सर्वदा शङ्करः प्रभुः ।
दीनानुग्रहकर्ता च सर्वसेव्यः सतां गतिः॥ १४
महान्पतिब्रताधर्मः
नोदितः ॥
यथैव वर्ण्यते श्रेष्ठो न तथान्योऽस्ति निश्चितम्। ।१५
श्रीशिवमरहापुराण
[अ ` = = == == का `
हे मुने! हिमाचलप्रिया उन मेनाने
तथा अपने कुलकी रीति सम्पन्न की, फिर पार्वती
यात्राके निमित्त वे नाना प्रकारके मंगलविधान कले
लगीं॥ ५॥
उन्होंने पार्वतीको अनेक रलं तथा श्रेष्ठ वस्त
और राजकुलोचित श्रृंगारों तथा उत्तमोत्तम द्वादश
आभरणोंसे अलंकृत किया। तदनन्तर मेनाके मनक
बात जानकर एक पतित्रता ब्राह्मणपत्नी गिरिजाकर
श्रेष्ठ पातिव्रत-धर्मका उपदेश देने लगी-॥ ६.७॥
ब्राह्मणपत्नी बोली-हे गिरिजे! तुम प्रेमपूर्वक
मेरा यह वचन सुनो । मेरे ये वचन स्त्रयोंको इस लोक
तथा परलोकमें सुख देनेवाले हैं तथा इनके सुननेसे भी
स्त्रियोंका कल्याण हो जाता है॥ ८॥
इस जगत्में पतिव्रता नारी ही धन्य है, इसके
अतिरिक्त और कोई नारी यूजाके योग्य नहीं है। वह
सब लोगोंको पवित्र करनेवाली तथा समस्त पापोंको
दूर करनेवाली है॥ ९॥
हे शिवे! जो स्त्री अपने स्वामीकौ
पस्मेश्वरके समान सेवा करती है, वह यहाँ अनेक
भोगोंको भोगकर अन्तमें पतिके साथ उत्तम गतिको
प्राप्त होती है॥ १०॥
सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिल्य
शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा सुमति,
श्रद्धा, मेना और स्वाहा आदि बहुत-सी पतित्रत?
हैं, जिन्हें विस्तारके भयसे यहाँ नहीं कह ह
हूँ॥ ११-१२॥
ये सभी पातित्रत्यधर्मके प्रभावसे ही जाएँ
मान्य तथा पूज्य हुई | ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर एवं अस
मुनीश्वरोंने भी इनका सम्मान किया है॥ १३॥
इसलिये तुम्हें अपने पति शंकरकी विशेष
सेवा करनी चाहिये; क्योंकि ये दीनोपर ह
करनेवाले एवं पूज्य होनेके कारण सबके सेव्य है
सञ्जनोंके गतिदाता हैं ॥ १४॥ री
पतित्रताओंका धर्म महान् है, जिसका ह
तियं तथा स्मृतियोंमें भरा हुआ है। नि
पातित्रत्यधर्म जितना श्रेष्ठ है, उतना अन्य
नहीं है॥ १५॥
प्रथम वेद
आ० ५४]
भुं्यादधक्ते प्रिये पत्यौ पातिव्रत्यपरायणा।
तिछेत्तस्मिज्छिवे नारी सर्वथा सति तिष्ठति॥ १६
स्वप्यात्स्वपिति सा नित्यं बुध्येत्तु प्रथमं सुधीः ।
सर्वदा तरिद्धातं कुर्यांदकैतवगतिः प्रिया ॥ ९७
अनलंकृतमात्मानं दर्शयेन्न क्वचिच्छिवे।
कार्यार्थ प्रोषिते तस्मिन् भवेन्मण्डनवर्जिता॥ १८
पत्युर्नान न गृह्णीयात् कदाचन पतिब्रता।
आक्रुष्टापि न चाक्रोशेत्प्रसीदेत्ताडितापि च।
हन्यतामिति च जूयात्स्वामिन्निति कृपां कुरू ॥ १९
आहूता गृहकार्याणि त्यक्त्वा गच्छेत्तदन्तिकम्।
सत्वरं साञ्जलिः प्रीत्या सुप्रणम्य वदेदिति॥ २०
किमर्थ व्याहृता नाथ स प्रसादो विधीयताम्।
तदादिष्टा चरेत्कर्म सुप्रसन्नेन चेतसा॥ २१
चिरं तिष्ठेन्न च द्वारे गच्छेन्नैव परालये।
आदाय तत्त्वं यत्किंचित्कस्मैचिन्नार्पयेत्ववचित्॥ २२
पूजोपकरणं सर्वमनुक्ता साधयेत्स्वयम्।
प्रतक्षमाणावसरं यथाकालोचितं हितम्॥ २३
न गक्तेत्तीर्थयात्रां वै पत्याज्ञां न विना क्वचित्
दूरतो वर्जयेत्सा हि समाजोत्सवदर्शनम्॥ २४
तानी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत्।
तीर्थानि क्षेत्राणि च न संशयः॥ २५
प्यात्सा भर्तुरुच्छिष्टमिष्टमत्नादिकं च यत्।
इत्युक्त्वा पतिदत्तं 'पतिव्रता॥ २६
अविभज्य न चाशनीयाद्देवपित्रतिधिष्वपि।
परिचारकवर्गेषु गोषु भिक्षुकुलेषु च॥२७
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७२३
स्त्रीको चाहिये कि जब अपना प्रिय पति भोजन
कर ले, तब स्वयं पतिभक्तिमें परायण होकर भोजन
करे। हे शिव! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्रीको
भी खड़ा ही रहना चाहिये॥ १६॥
पतिके सो जानेपर स्वयं शयन करे और उसके
उउनेसे पहले स्वयं जाग जाय, पतिका सर्वदा
छलरहित हो हित करे। हे शिवे! कभी अलंकारसे
रहित हो अपने स्वामीके सम्मुख न जाय। जब स्वामी
कार्यवश परदेश चला जाय, तो कभी शरीरका
संस्कार एबं शृंगार न करे॥ १७-१८॥
पतित्रता स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका नाम कभी
न ले, पतिके द्वारा क्रुद्ध होकर कठोर वचन कहनेपर भी
उसे बुरा वचन न कहे और पतिके शासित करनेपर भी
प्रसन्न रहे । उस समय भी यही कहे कि स्वामिन्! और
अधिक दण्ड देकर मेरे ऊपर कृपा कीजिये॥ १९॥
पतिके बुलानेपर घरका सारा कामकाज
छोड़कर उनके समीप जाय और शीघ्रतासे प्रणामकर
हाथ जोड़कर उनसे प्रेमपूर्वक कहे। हे स्वामिन्!
आपने किसलिये बुलाया है, कृपाकर आज्ञा दीजिये,
इसके बाद उस आज्ञाको प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न करना
चाहिये॥ २०-२१॥
दरवाजेपर खड़ी होकर बहुत कालतक इधर-उधर
नदेखे और न तो दूसरेके घर जाय | किसीका भेद लेकर
किसी अन्यके सामने उसको प्रकाशित न करे॥ २२॥
बिना कहे ही पतिके लिये पूजनकी सामग्री प्रस्तुत
करे और पतिके हितके लिये निरन्तर अवसरकी प्रतीक्षा
करती रहे । पतिकी आज्ञाके बिना कभी भी तीर्थयात्राके
लिये न जाय और किसी समाज तथा उत्सवको देखनेके
लिये भी न जाय। जिस स्त्रीको तीर्थयात्राकी इच्छा हो,
वह अपने स्वामीका चरणामृत लेकर सत्तुष्ट हो जाय;
क्योंकि पतिके चरणोदकमें सभी तीर्थ एवं क्षेत्र निवास
करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३--२५॥
'पतिके भोजन करनेके पश्चात् उसका उच्छिष्ट
जो भी इष्ट अनादि हो, उसे पतिप्रदत्त महाप्रसाद
समझकर पतित्रता स्त्री भोजन करे। देवता, पितर,
अतिथि, सेवक, गौ एवं भिक्षुकको बिना दिये अनका
भोजन न करे॥ २६-२७॥
ड २४
श्रीशिवमहापुराण
[अ प्त न्यायाला
संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्ययपराङ्मुखी।
भवेत्सा सर्वदा देवी पतिव्रतपरायणा॥ २८
कुर्यात्पत्यननुज्ञाता नोपवासत्रतादिकम्।
अन्यथा तत्फलं नास्ति परत्र नरकं ब्रजेत्॥ २९
सुखपूर्व सुखासीनं रममाणं यदृच्छया।
आतन्तरेष्वपि कार्येषु पतिं नोत्थापयेत्ववचित्॥ ३०
क्लीबं वा दुरवस्थं वा व्याधितं वृद्धमेव च।
सुखितं दुःखितं वापि पतिमेकं न लंघयेत्॥ ३१
स्त्रीधर्मिणी त्रिरात्रं च स्वमुखं नैव दर्शयेत्।
स्ववाक्यं श्रावयेन्नापि यावत् स्नानान्न शुध्यति॥ ३२
सुस्नाता भर्तृवदनमीक्षेतान्यस्य न क्वचित्।
अथवा मनसि ध्यात्वा पतिं भानुं विलोकयेत् ॥ ३३
हरिद्राकुङ्कुमं चैव सिन्दूरं कजलादिकम्।
कूर्पासकं च ताम्बूलं माङ्गल्याभरणादिकम्॥ ३४
केशसंस्कारकबरीकरकणांदिभूषणम् ।
भर्तुरायुष्यमिच्छन्ती दूरयेन्न पतिब्रता॥ ३५
ज रजक्या न बन्धक्या तथा श्रमणया न च।
ज च दुर्भगया क्वापि सखित्वं कारयेत् क्वचित्॥ ३६
पतिविद्वेषिणीं नारीं न सा संभाषयेत् क्वचित्।
नैकाकिनी क्वचित्तिष्ठेन्नरना स्नायान्न च क्वचित् ॥ ३७
नोलूखले न मुसले न वर्द्धन्यां दृषह्मपि।
न यंत्रके न देहल्यां सती न प्रवसेत् क्वचित्॥ ३८
विना व्यवायसमयं प्रागलभ्यं नाचरेत् क्वचित्।
यत्र यत्र रुचिर्भर्तुस्तत्र प्रेमवती भवेत् ॥ ३९
हृष्टाहष्टे विषण्णा स्याद्रिषण्णास्ये प्रिये प्रिया ।
पतिव्रता भवेद्देवी सदा पतिहितेषिणी॥४०
घरकी समग्र सामग्री ठीक तरहसे रखे जि
उत्साहयुक्त तथा सावधान रहे और अधिक व्यय >
इस प्रकार सर्वदा पातित्रत्यधर्मका पालन करे॥ क
पतिकी आज्ञाके बिना कोई उपवास तथा र |
करे, अन्यथा उसका फल नहीं होता और इ.
नरकको प्राप्ति होती है । सुखपूर्वक आनन्दे ब
तथा अपनी इच्छासे रमण करते हुए पतिको आ
कार्य आ पड्नेपर भी न उठाये । पति कलीब, दुतम
पड़ा हुआ, वृद्ध, रोगी, सुखी अथवा दुखी चाहे जै
ही क्यों न हो, उसका अपमान न करे॥ २९--३१॥
मासिक धर्म प्राप्त हो जानेपर आरग्भसे तीन
रात्रिपर्यनन अपना मुख पतिको न दिखाये और
जबतक चौथे दिन स्नानसे शुद्ध न हो, अपना शद
भी न सुनाये॥ ३२॥
ऋतुस्नान करनेके पश्चात् पतिका ही मुख
देखे, कभी अन्यका मुख न देखे अथवा पतिके न
होनेपर पतिका ध्यानकर सूर्यका दर्शन करे॥ ३३॥
पतिके आयुष्यकी इच्छा करनेवाली पतित्रता
स्त्रीको हरिद्रा, कुंकुम, सिन्दूर, काजल, कूर्पासक,
ताम्बूल, मांगलिक आभूषण, केशोंका संस्कार, केशपाश
बनाना, हाथमें कंगन एवं कानोंमें कर्णफूल तित्य
धारण करना चाहिये, इसका परित्याग कभी किसी भी
अवस्थामें न करे॥ ३४-३५ ॥
धोबिन, वन्ध्या, व्यभिचारिणी, संन्यातिनी
अथवा दुर्भाग्ययुक्त स्त्रीसे कभी मित्रता न करे। जे
स्त्री अपने पतिसे द्वेष करती हो, उससे बातचीत *
करे, कभी अकेली न रहे और न नग्न होकर
स्नान करे॥ ३६-३७॥
ओखली, मूसल, बुहारी (झाड), सिल, लो
तथा देहलीपर सती स्त्री कभी न बैठे॥ ३८॥
सहवासके अतिरिक्त और कं
के धृष्टता न करे। अपना पति प्रेत
प्रेम
करे॥३९॥ दू
पतिके प्रसन्न होनेपर प्रसन्न रहे,
होनेपर दुखी रहे तथा पतिके प्रियमें ही अ
समझे। इस प्रकार पतित्रता स्त्री सदैव पतिके
इच्छा करे ॥४०॥
आ० ५४ ]
भवेत्पुण्या संपत्सु च विपत्सु च।
विकृति स्वात्मन: क्वापि न कुर्याद्धैर्यधारिणी ॥ ४९
ऽपि च पतित्रता।
पतिं नास्तीति न ब्रूयादायासेषु न योजयेत्॥ ४२ |
विधे्विष्णो्हराद्वापि
पतिरेकोऽधिको मतः।
प्रतिब्रताया देवेशि स्वपतिश्शिव एव च॥ ४३
ब्रतोपवासनियमं पतिमुल्लंघ्य याचरेत्।
आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता निरयमृच्छति॥ ४४
उक्ता प्रत्युत्तरं दद्याद्या नारी क्रोधतत्परा।
सरमा जायते ग्रामे शृगाली निर्जने वने॥ ४५
उच्यासनं न सेवेत न व्रजेद्दुष्टसन्निधो।
न च कातरवाक्यानि वदेन्नारी पतिं क्ाचित्॥ ४६
अपवादं न च ब्रूयात्कलहं दूरतस्त्यजेत्।
गुरूणां सन्निधौ क्वापि नोच्चेर्ब्ूयान्न वै हसेत्॥ ४७
बाह्यादायान्तमालोक्य त्वरितान्ननलाशनैः।
ताम्बूलैर्वसनैश्रापि पादसंवाहनादिभिः ॥ ४८
तथैव चाटुवचनैः खेदसन्नोदनैः परेः।
या प्रियं प्रीणयेत््रीता त्रिलोकी प्रीणिता तया॥ ४९
मितं ददाति जनको मितं भ्राता मितं सुतः।
अमितस्य हि दातारं भर्तारं पूजयेत्सदा॥ ५०
भर्ता देवो गुरुर्भतां धर्मतीर्थव्रतानि च।
तस्मात्सर्व परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्॥ ५१
या भर्तारं परित्यज्य रहश्चरति दुर्मतिः।
उलूकी जायते क्रूरा वृक्षकोटरशायिनी॥५२
ताडिता ताडितुं चेच्छेत्सा व्याघ्री वृषदंशिका।
कटाक्षयतति यान्यं वै केकराक्षी तु सा भवेत्॥ ५३
या भर्तारं परित्यज्य मिष्टमश्नाति केवलम्।
वा सूकरी भूयाद्वल्गुर्वापि स्वविड्भुजा॥ ५४
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७२५
पतित्रता स्त्री सदैव सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों
अवस्थाओंमें एकरूप रहे । विकार उपस्थित होनेपर
कभी विकृत न हो और सदैव धैर्य धारण को ॥ ४१॥
घी, नमक, तेल आदिके न होनेपर भी पतित्रता
स्त्री पतिसे ' नहीं है '--ऐसा न कहे और पतिको किसी
असाध्य कार्यमें नियुक्त न करे । ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवसे
भी अधिक पतिका महत्त्व है । अत: हे देवेशि ! पतिव्रता
अपने पतिको साक्षात् शिवस्वरूप ही समझे ॥ ४२-४३॥
पतिको आज्ञाका उल्लंघन करके जो स्त्री ब्रत,
उपवास तथा नियमादिका आचरण करती है, वह अपने
पतिकी आयुका हरण करती है और मरनेपर नरक प्राप्त
करती है। जो स्त्री क्रुद्ध होकर पतिकें कुछ कहनेपर
उसका प्रत्युत्तर करती है, वह ग्रामकी कुतिया अथवा
निर्जन वनमें श्रुगाली होती है ॥ ४४-४५ ॥
स्त्रीको चाहिये कि वह पतिसे ऊँचे स्थानपर न
बैठे, दुष्योके समीप न जाय और कभी भी पतिसे कातर
वाक्य न कहे | किसीकी निन्दा या आक्षेपयुक्त बात न
कहे, दूरसे ही कलहका परित्याग करे, गुरुजनोंके समीप
कभी जोरसे न बोले और न जोरसे हँसे ॥ ४६-४७॥
पतिको बाहरसे आया हुआ देखकर शौप्रतासे
अन्न, जल, भोजन, ताम्बूल, वस्त्र, पादसंवाहन, खेद
दूर करनेवाले मीठे वचनके द्वारा जो स्त्री अपने
स्वामीको प्रसन्न रखती है, मानो उसने त्रैलोक्यको
प्रसन्न कर लिया॥ ४८-४९ ॥
माता, पिता, पुत्र, भाई तो स्त्रीको बहुत थोड़ा ही
सुख देते हैं, परंतु पति तो अपरिमित सुख देता है। इसलिये
स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका सदैव पूजन करे ॥ ५० ॥
पति ही देवता, गुरु, भर्ता, धर्म, तीर्थ एवं ब्रतादि
सब कुछ है। इसलिये सब कुछ छोड़कर एकमात्र
पतिका ही पूजन करे। जो दुष्ट स्त्री अपने पतिको
छोड़कर एकात्तमें दूसरेके पास जाती है, वह वृक्षके
कोटरमें रहनेवाली उलूकी होती है॥५१-५२॥
जो स्वामीके द्वारा ताडून करनेपर स्वयं भी ताडन
करना चाहती है, वह वृषभभक्षिणी व्याघ्री होती है।
जो अपने पतिको छोड़कर अन्यसे कटाक्ष करती है,
वह केकराक्षी होती है। जो अपने पतिको बिना दिये
मिष्टान खा लेती है, वह ग्रामसूकरी अथवा अपनी
विष्ठा खानेवाली वल्गु (बकरी) होती है॥ ५३-५४॥
न २६
या तुं कृत्य प्रियं ब्रूयान् मूका सा जायते खलु।
या सपलीं सदेरष्येत दुर्भगा सा पुनः पुनः॥ ५५
दृष्टिं बिलुप्य भर्तुर्या कञ्चिदन्यं समीक्षते।
काणा च विमुखी चापि कुरूपापि च जायते॥ ५६
जीवहीनो यथा देहः क्षणादशुचितां व्रजेत्।
भर्तृहीना तथा योषित्सुस्नाताप्यशुकिः सदा॥ ५७
सा धन्या जननी लोके स धन्यो जनकः पिता।
धन्यः स च पतिर्यस्य गृहे देवी पतिव्रता॥ ५८
'पितृवंश्याः मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः।
पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्ग सौख्यानि भुंजते॥ ५९
शीलभङ्गेन दुर्वृत्ताः पातयन्ति कुलत्रयम्।
पितुर्मातुस्तथा पत्युरिहामुत्रापि दुःखिता॥ ६०
पतिब्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद्धुवम्।
तत्र तत्र भवेत्सा हि पापहन्त्री सुपावनी॥ ६१
विभुः पतित्रतास्पर्श कुरुते भानुमानपि।
सोमो गन्धवहश्चापि स्वपावित्र्याय नान्यथा॥ ६२
आपः पतिव्रतास्पर्शमभिलष्यन्ति सर्वदा।
अद्य जाड्यविनाशो नो जातस्त्वद्यान्यपावना: ॥ ६३
भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च।
भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या सन्तानवृद्धये ॥ ६४
गृहे गृहे न किं नायों रूपलावण्यगर्विता. i
परं विश्वेशभक्त्यैव लभ्यते स्त्री पतिब्रता॥ दष
श्रीशिवमहापुराण
[3s Oe स्माल
जो अपने पतिको 'तू' कहकर बोलती १
वह जन्मान्तरमें गूँगी होती है और जो न.
सपत्नी (सौत)-से डाह करती है, वह बारंबार हि
होती है॥ ५५॥
जो अपने स्वामीकी दृष्टि बचाकर किसी अय
पुरुषको देखती है, वह काणी, कुमुखी तथा कुरुष
होती है॥५६॥
जैसे जीवके बिना देह क्षणमात्रमें अशुचि हे
जाता है, उसी प्रकार अपने स्वामीके बिना स्त्री अच्छी
तरह स्नान करनेपर भी अपवित्र ही रहती है॥ ५७॥
इस लोकमें उसको भाता धन्य है और उसके
पिता भी धन्य हैं तथा उसका वह पति भी धन्य है,
जिसके घरमें तिब्रता स्त्रीका निवास होता है ॥ ५८॥
पतिव्रता स्त्रीके पुण्यसे उसके पितृवंश,
मातृवंश तथा पतिबंशके तीन-तीन पूर्वज स्वर्गमें सुख
भोगते हैं॥५९॥
दुराचारिणी स्त्रियाँ अपने दुराचरणके ड्र
माता-पिता तथा पति--इन तीनों कुलोंको नरके
गिराती हैं और वे इस लोक तथा परलोकमें सदैव
दुखी रहती हैं॥ ६०॥
पतित्रताके चरण जहाँ-जहाँ पड़ते हैं, वहा
वहाँकी पृथिवी सदा पापका हरण करनेवाली तथ
अत्यन्त पवित्र हो जाती है | सर्वव्यापक सूर्य, चर्बी
तथा वायु भी अपनी पवित्रताके लिये ही पति्रतर
स्पर्श करते हैं, अन्य किसी कारणसे नहाँ ॥ ६६६९५
जल तो सदैव पतित्रताका स्पर्श चाहते है
कहते हैं कि आज इस पतित्रताके स्मर्शसे
जड़ता नष्ट हो गयी और हमें दूसरेको पवित्र ही
योग्यता प्राप्त हुई। भार्या गृहस्थका मूल हैं, भा
सुखका मूल है, धर्मफलकी प्राप्ति एवं सतार
लिये भार्याकी अत्यन्त आवश्यकता हैं। वीं रो
रूप, लावण्यका गर्व करनेवाली स्त्रियाँ ७.
नहीं हैं, किंतु विश्वेश्वरमें भक्ति करनेसे ही
स्त्री प्राप्त होती है॥ ६३--६५॥
अ० ५४ ]
परलोकस्त्वयं लोको जीयते भार्यया द्वयम्।
देवपित्रतिथीज्यादि जाभार्यः कर्म चाईति॥ ६६
: स हि विज्ञेयो यस्य गेहे पतिब्रता।
ग्रस्यतेऽन्यान्प्रतिदिनं राक्षस्या जरया यथा॥ ६७
यथा गङ्गावगाहेन शरीरं पावनं भवेत्।
तथा पतिद्रतां दृष्ट्या सकलं पावनं भवेत्॥ ६८
न गड्डया तया भेदो या नारी पतिदेवता।
उमाशिवसमौ साक्षात्तस्मात्तौ पूजयेद् बुध:॥ ६९
तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तप: ।
फलं पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे ॥ ७०
एवं पतिव्रताधमों वर्णितस्ते गिरीन्द्रजे।
तद्भेदान् शृणु सुप्रीत्या सावधानतयाद्य मे॥ ७९
चतुर्विधास्ताः कथिता नायों देवि पतिव्रताः।
| उत्तमादिविभेदेन स्मरतां पापहारिकाः॥ ७२
उत्तमा मध्यमा चेव निकृष्टातिनिकृष्टिका।
तासां लक्षणानि सावधानतया श्रूणु॥ ७३
स्वणेपि यन्मनो नित्यं स्वपतिं पश्यति भ्रुवम्
णयं परपतिं भद्रे उत्तमा सा प्रकीर्तिता॥ ७४
या पितृभ्रातृसुतबत् परं पश्यति सब्द्धिया।
सा हि कथिता शैलजे वै पतिब्रता॥ ७५
पुरवा स्वधर्म मनसा व्यभिचारं करोति न।
कृष्टा कथिता सा हि सुचित्रा च पार्वति॥ ७६
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड)
७२७
भार्याके द्वारा ही इस लोक तथा परलोक--दोनों
लोकोंपर विजय प्राप्त की जा सकती है। देवकर्म,
पितृकर्म, अतिथिकर्म तथा यज्ञकर्म बिना भार्याके
फलवान् नहीं होता। गृहस्थ उसीको कहते हैं, जिसके
घरमें पतित्रता स्त्रीका निवास है, अन्य स्त्रियाँ तो
प्रतिदिन जरा राक्षसीके समान पुरुषको ग्रसती रहती
हैं ॥ ६६-६७ ॥
जिस प्रकार गंगास्नानसे शरीर पवित्र हो
जाता है, उसी प्रकार पतित्रता स्त्रीके दर्शनमात्रसे सब
कुछ पवित्र हो जाता है॥६८॥
गंगा तथा पतित्रता स्त्रीमें कोई भेद नहीं है। वे
दोनों स्त्री-पुरुष शिव तथा पार्वतीके तुल्य हैं, अतः
बुद्धिमान् पुरुषको उनका पूजन करना चाहिये ॥ ६९॥
पति ॐकार है, तो स्त्री श्रुति वेद है, पति
तप है, तो स्त्री क्षमा है, स्त्री सत्क्रिया है, तो पति
उसका फल है। हे शिवे! इस प्रकारके दम्पती धन्य
हैं॥ ७०॥
हे पार्वति! इस प्रकारसे मैंने तुमसे पातित्रत्य-
धर्मका निरूपण किया। अब उन पतित्रताओके भेद
सावधानीके साथ प्रेमपूर्वक सुनो॥ ७१ ॥
उत्तम आदिके भेदसे पतित्रता स्त्रियाँ चार
प्रकारकी कही गयी हैं । जिनके स्मरणसे पाप नष्ट हो
जाते हैं ॥ ७२॥
उत्तम, मध्यम, निकृष्ट तथा अतिनिकृष्ट-[ये
चार भेद पतिब्रताओंके होते हैं।। अब मैं उनका
लक्षण कह रहा हूँ, सावधान होकर उसका श्रवण
करो॥ ७३॥
जिसका मन स्वप्नमें भी अपने पतिको ही
देखता है और कभी परपतिमें नहीं जाता; हे भद्रे!
वह उत्तम पतित्रता कही गयी है। जो दूसरोंके
'पतियोंको पिता, भ्राता तथा पुत्रके समान सद्बुद्धिसे
देखती है, हे पार्वति! वह मध्यम पतिव्रता कही गयी
है॥ ७४-७५॥
हे पार्वति! जो स्त्री मनमें अपना धर्म समझकर
व्यभिचार नहीं करती, वह सुन्दर चरित्रवाली स्त्री
निकृष्ट पतिब्रता (अधमा) कही गयी है॥ ७६॥
७२८
पत्युः कुलस्य च भयाद्वग्रभिचारं करोति न।
पतिव्रताऽधमा सा हि कथिता पूर्वसूरिभिः ॥ ७७
चतुर्विधा अपि शिवे पापहन्त्यः पतिब्रताः।
पावनाः सर्वलोकानामिहामुत्रापि हर्षिताः ॥ ७८
'पातिव्रत्यप्रभावेणात्रिस्त्रिया त्रिसुरार्थनात्।
जीवितो विप्र एको हि मृतो वाराहशापतः॥ ७९
एवं ज्ञात्वा शिवे नित्यं कर्तव्यं पतिसेवनम्।
त्वया शैलात्मजे प्रीत्या सर्वकामप्रदं सदा॥ ८०
जगदम्बा महेशी त्वं शिवः साक्षात्पतिस्तव।
तव स्मरणतो नार्यो भवन्ति हि पतित्रताः ॥ ८९
त्वदग्रे कथनेनानेन किं देवि प्रयोजनम्।
तथापि कथितं मेऽद्य जगदाचारतः शिवे॥ ८२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा विररामासो द्विजस्त्री सुप्रणम्य ताम्।
शिवां मुदमतिप्राप पार्वती शङ्करप्रिया॥ ८३
श्रीशिवमहापुराण
क्क ७ ककय `
जो मनमें इच्छा रहते हुए भी पत्ति एकु
भयसे व्यभिचार नहीं करती, उसको पुरातन लोन
अति-निकृष्ट पतिव्रता कहा है॥ ७७॥ ५]
हे शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिर
पापहरण करनेवाली हैं, सम्पूर्ण लोकोंको पक
करनेवाली हैं और इस लोक एवं परलोकमे आनर्
प्रदान करनेवाली हैं ॥ ७८ ॥
'पातिब्रत्यके प्रभावसे ही अत्रिप्रिया अनसूयाने
तीनों देवताओंकी प्रार्थनापर वाराहके शापसे मरे ह
ब्राह्मणको जीवनदान दिया था॥ ७९॥
हे शिवे! ऐसा जानकर तुमको नित्य प्रेमपूर्वक
अपने पतिकी सेवा करनी चाहिये; क्योंकि हे शैलपुत्रि
ऐसा करनेसे तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे॥ ८०॥
तुम तो साक्षात् जगतूकी भाता तथा महेश्वरी हो
और जगत्पिता महेश्वर तुम्हारे साक्षात् पति हैं। तुमह
नामके स्मरणमात्रसे स्त्रियाँ पतिव्रता होंगी॥ ८१॥
हे देवि! तुम्हारे आगे इस कथनसे क्या प्रयोजन!
फिर भी हे शिवे! संसारके आचरणके अनुसार मैने
तुम्हें यह सब कहा है॥ ८२॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार कहकर के
द्विजपत्ली भगवतीको प्रणामकर मौन हो गयी और
उस उपदेशके श्रवणसे शंकरप्रिया शिवा अत
प्रसन्नचित्त हो गयीं ॥८३॥
इति pi स््रसहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
पतित्रताधर्मवर्णनं नाम चतु;पञ्चाशत्तमोऽ ध्यायः ॥ ५४॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें
नामक चाँवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५४॥
णण**७०-०-०------
अथ
शिव-पार्वती तथा बरातकी विदाई, भगवान्
कैलासपर रहना और शिव-
ब्रह्मोवाच
अथ सा ब्राह्मणी देव्ये शिक्षयित्वा ब्रतं च तत्।
प्रोवाच मेनामामन्त्र्य यात्रामस्याश्भ 'कारय॥ ९
ऽध्यायः
न् शिवका समस्त देवताओंको विदा कके
श्रवणकी महिमा
ब्रह्माजी बोले--[हे नारद!] इसे
ब्राह्मणीने देवी पार्वतीको पातित्रत्यधर्मका pe
देकर मेनाको बुलाकर कहा-अब इनकी
तैयारी कीजिये॥ १॥
अ० ५५]
च सम्प्रोच्य प्रेमवश्या बभूव सा।
रतिं धृत्वाहूय कालीं विश्लेषविरहाकुला॥ २
अत्युच्च रोदनं चक्रे संश्लिष्य च पुनः पुन: ।
पार्वत्यपि रुरोदोच्चेरुच्चरन्ती कृपाबच:॥ ३
शैलप्रिया शिवा चापि मूर्च्छामाप शुचार्दिता।
मूरच्छाम्प्रापुर्देवपत्य: पार्वत्या रोदनेन च॥ ४
सर्वाश्च रूरुदुर्नार्यः सर्वमासीदचेतनम्।
स्वयं रुरोद योगीशो गच्छन्कोऽन्यः पर: प्रभु: ॥ ५
एतस्मिन्नन्तरे शीषघ्रमाजगाम हिमालयः।
स सर्वतनयैस्तत्र सचिवैश्च द्विजैः परैः॥ ६
स्वयं रुरोद मोहेन वत्सां कृत्वा स्ववक्षसि।
कव यासीत्येवमुच्चार्य शून्यं कृत्वा मुहुर्मुहुः ॥ ७
| ततः पुरोहितो विप्रैरध्यात्मविद्यया सुखम्।
सर्वानप्रबोधयामास कृपया ज्ञानवत्तरः॥ ८
जनाम पार्वती भक्त्या मातरं पितरं गुरुम्
महामाया भवाचाराद्रुरदोच्चेमुहुर्मुहः॥ ९
पावत्या रोदनेनैव रुरुदुः सर्वयोषितः।
नितरां जननी मेना यामयो भ्रातरस्तथा
पुनः पुनः शिवामाता यामयोऽन्याश्च योषितः।
भातरो जनकः प्रेम्णा रुरुदुर्बद्धसोहदाः
i विप्राः समागत्य बोधयामासुरादरात्।
लेणं निवेदयामासुरयात्रायाः सुखदं परम्
तो हिमालयो मेनां धृत्वा धैर्य विवेकतः
शिबिकामानयामास शिबारोहणहेतवे॥ १३
शिवापारोहयामासुस्तत्र विप्राडडनाश्व ताम।
आशिष प्रददुः सर्वाः पिता माता द्विजास्तथा॥ १४
॥१०
।११
।१२
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७ क च्य क य शनि मिमी शिशििकि कक ९
मेनाने भी ' तथास्तु' कहा और वे प्रेमसे विभोर
हो गयीं। तदनन्तर धैर्य धारणकर कालीको बुलाकर
उसके विरहसे व्याकुल हो उठीं, उस समय वे मेना
पार्वतीको बारंबार गले लगाकर ऊँचे स्वरमें रोने लगीं
और पार्वती भी दीनवचन कहती हुई ऊँचे स्वरसे रोने
लगीं॥ २-३॥
शोकव्यथित होकर शैलप्रिया मेना और
पार्वती मूच्छित हो गयीं। पार्वतीके रोनेके शब्दसे
सभी देवपत्नियाँ भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं।
उस समय सभी देवस्त्रयाँ रोने लगीं तथा अचेत हो
गयीं। विदा होते हुए स्वयं योगीश्वर भी रो पड़े, तब
दूसरोंकी क्या बात।॥ ४-५॥
इसी समय बड़ी शीघ्रताके साथ हिमालय भी
अपने सभी पुत्रों, मन्त्रियों तथा अन्य ब्राह्मणोंके साथ
वहाँ आ पहुँचे। उस समय हिमालय भी पार्वतीको
गोदमें लेकर मोहवश रोने लगे। हे वत्से। इस घरको
शून्यकर तुम कहाँ जा रही हो ? इस प्रकार कह करके
वे बारंबार रोने लगे॥ ६-७॥
तब ब्राह्मणोंके साथ उनके ज्ञानी तथा श्रेष्ठ
पुरोहितने उनपर कृपाकर अध्यात्मविद्याका उपदेश
देकर उन्हें समझाया। महामाया पार्वतीने [विदाईके
समय] माता-पिता तथा गुरुजनोंको भक्तिपूर्वक
प्रणाम किया और वे लोकाचारवश जोर-जोरसे रोने
लगीं॥ ८-९॥
पार्वतीके रोनेसे वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ,
माता मेना, सगे-सम्बन्धी तथा अन्य भी रोने लगे॥ १०॥
इस प्रकार पार्वतीको माता, सगे-सम्बन्धी
तथा अन्य स्त्रियाँ, भाई, पिता तथा सखियाँ अत्यन्त
प्रेमवश बार-बार रोते रहे। उस समय ब्राह्मणोंने आकर
सबको आदरपूर्वक समझाया और कहा कि यात्राके
लिये सुखदायी लग्नवेला आ गयी है। तब हिमालयने
मेनाकों धीरज बँधाया और स्वयं विवेकयुक्त
होकर पार्वतीके चढ्नेके लिये शिविका मँगवायी।
तदनन्तर ब्राह्मणस्त्रियोंने पार्वतीको पालकीमें चढ़ाया
और माता-पिता, ब्राह्मण आदि सबने आशीर्वाद प्रदान
किया॥ ११--१४॥
७३०
महाराज््युपचाराँश्च ददो मेना गिरिस्तथा।
जानाद्रव्यसमूहं च परेषां दुर्लभं शुभम्॥ १५
शिवा नत्वा गुरून्सर्वान् जनकं जननीं तथा।
द्विजाऱ्पुरोहितं यामीस्त्रीस्तथान्या ययौ मुने॥ १६
हिमाचलोऽपि ससुतोऽगच्छत्स्नेहवशो बुधः।
प्राप्तस्तत्र प्रभुर्यत्र सामरः प्रीतिमावहन्॥ ९७
प्रीत्याभिरेभिरे सर्वे महोत्सवपुरस्सरम्।
प्रभुं प्रणेमुस्ते भक्त्या प्रशंसन्तोऽविशन्पुरीम्॥ १८
जातिस्मरा स्मारयामि नित्यं स्मरसि चेद्वद ।
लीलया त्वां च देवेशि सदा प्राणप्रिया मम॥ १९
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं महेशस्य स्वनाथस्याथ पार्वती।
शङ्करस्य प्रिया नित्यं सस्मितोवाच सा सती॥ २०
पार्वत्युवाच
सर्व स्मरामि प्राणेश मौनीभूतो भवेति च।
प्रस्तावोचितमद्याशु कार्यं कुरु नमोऽस्तु ते॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य प्रियावाक्यं सुधाधाराशतोपमम्।
मुमुदेऽतीव विश्वेशो लौकिकाचारतत्परः ॥ २२
शिवः सम्भृतसम्भारो जानावस्तुमनोहरम्।
भोजयामास देवांश्च नारायणपुरोगमान्॥ २३
तथान्यान्निखिलाऱ्परीत्या स्वविवाहसमागतान्।
भोजयामास सुरसमन्नं बहुविधं प्रभुः॥ २४
ततो भुक्त्वा च ते देवा जानारलविभूषिता; ।
सस्त्रीकाः सगणाः सर्वे प्रणेमुश्वंद्रशेखरम्॥ २५
श्रीशिवमहापुराण
[अ का >>
मेना और हिमालयने महारानियोंके योग्य खत
पार्वतीको प्रदान किये और अन्योके लिये चा
दुर्लभ द्रव्यसमूह दिये । हे मुने ! पार्वतीने अप
पिता, गुरुजन, ब्राह्मण, पुरोहित, सम्बन्धी एं सि
प्रणाम करके प्रस्थान किया॥ १५-१६॥
परम बुद्धिमान् हिमालय भी अपने पुत्रोके साथ
प्रेमसे विभोर होकर पालकीके साथ चले और व्ह
पहुँचे, जहाँ सभी देवता ठहरे हुए थे॥ १७॥
तत्पश्चात् सभी लोगोंने भक्तिसे सदाशिवळे
प्रणाम किया और प्रशंसा करते हुए अपने नर्न
चले आये। तब पार्वतीके कैलास पहुँचते ही पी
लोगोंने बहुत बड़ा उत्सव किया। [शिवजीने पार्वतीके
साथ अपने स्थानपर पहुँचकर कहा--] हे देवेश!
मैं तुम्हें पूर्वजन्मका स्मरण करा रहा हूँ और यदि तुप
अपनी लीलासे उसे स्मरण करती हो, तो बताओ तुम
तो आजसे नहीं, जन्म-जन्मान्तरसे मेरी प्राणप्रिय
हो॥ १८-१९॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार अपने स्वामी महेशका
वचन सुनकर हँसती हुई शिवप्रिया पार्वती कहो
लगीं-- ॥ २०॥
पार्वती बोलीं--हे प्राणेश्वर! मुझे सभी बोकर
स्मरण है, किंतु हे भव! इस समय आप चुप रहिये
और आज जो कार्य उपस्थित है, उसीको शौ
कीजिये, आपको नमस्कार है॥ २१॥
ब्रह्माजी बोले--इस प्रकार प्रिया रवते
सैकड़ों सुधाधाराओंके समान वचनको a,
विश्वेश्वर प्रसन्न हो गये और लौकिकाचाए संत"
हो गये॥ २२॥ जा
शिवजीने अनेक प्रकारकी भोजन
एकत्रितकर नारायण आदि सभी देवगणोंको टी
मनोहर भोज्य-वस्तुओंका भोजन कराया!
अपने विवाहमें आये हुए सभी लोगोंको
विधिवत् उत्तम रससे सम्पन्न भोजन करा
भोजन करके नाना रत्नोंसे विभूषित सभी भत समी ह
अपनी स्त्रियों तथा गणोंके साथ
किया ॥ २३-२५ ॥
|
अ० ५५ ]
तत्य वाग्भिरिष्टाभिः परिक्रम्य मुदान्विताः।
प्रशंसन्तो विवाह च स्वधामानि ययुस्तत:॥ २६
नारायणं मुने मां च प्रणनाम शिव: स्वयम्।
लौकिकाचारमाश्रित्य यथा विष्णुश्च कश्यपम्॥ २७
मयाश्लिष्याशिषं दत्त्वा शिवस्य पुनरग्रतः।
रत्वा वै तं परं ब्रह्म चक्रे च स्तुतिरुत्तमा॥ २८
तमामन््य मया चरिष्णुः साञ्जलिः शिवयोर्मुदा।
प्रशंसंस्तद्विवाहं च जगाम स्वालयं परम्॥ २९
शिवोऽपि स्वगिरौ तस्थौ पार्वत्या विहरन् मुदा ।
सवें गणाः सुखं प्रापुरतीव स्वभजन् शिवौ ॥ ३० |
इत्येवं कथितस्तात शिवोद्वाहः सुमङ्गलः।
शोकघ्नो हर्षजनक आयुष्यो धनवर्द्धनः॥ ३१
य इमं शृणुयान्नित्यं शुचिस्तदृतमानसः।
शरावयेद्वाथ नियमाच्छिवलोकमवाण्नुयात्॥ ३२
३दपाख्यानमाख्यातमद्भुतं
मङ्गलायनम्।
सर्वविघ्नप्रशमनं
सर्वव्याधिविनाशनम्॥ ३३
भेशस्यं स्वर्ग्यमायुष्यं पुत्रपौत्रकरं परम्।
संवंकामप्रदं चेह भुक्तिदं मुक्तिदं सदा॥ ३४
अपपृत्युप्रशमन॑ महाशान्तिकर॑ शुभम्।
संवंदुःस्वष्नशमनं बुद्धिप्रज्ञादिसाधनम्॥ २५
रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड )
७२१
तदनन्तर उन्होंने प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक
शिवजीकी स्तुति करते हुए उनकी परिक्रमा की
तथा विवाहकी प्रशंसा करते हुए वे सभी अपने-
अपने स्थानोंको चले गये। हे मुने! शिवजीने
मुज्ञे तथा विष्णुजीको उसी प्रकार प्रणाम किया,
जैसे लोकाचारसे विष्णुजी कश्यपको प्रणाम करते
हैं॥ २६-२७॥
मैंने उन्हें गले लगाकर उनको आशीर्वाद दिया,
फिर शंकरको परब्रह्म जानकर उनके आगे खडे
होकर मैंने उनकी स्तुति की । इसके पश्चात् मैं तथा
विष्णु शिवा एवं शिवजीको हाथ जोड़कर प्रणामकर
विवाहकी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानोंको
चले गये॥ २८-२९॥
इधर, शिवजी भी पार्वतीके साथ आनन्द-
विहार करते हुए अपने निवासभूत कैलासमें रहने
लगे और उनके सभी गण आनन्दपूर्वक प्रेमसे
शिवा-शिवकी आराधना करने लगे। हे तात! इस
प्रकार मैंने शिवा एवं शिवके विवाहका आपसे
वर्णन किया, यह विवाह परम मंगलदायक, शोक-
नाशक, आनन्ददायक तथा धन एवं आयुकी वृद्धि
करनेवाला है ॥ ३०-३१॥
जो पवित्र होकर शिवजीमें मन लगाकर
नित्य इस विवाहचरित्रको नियमपूर्वक सुनता है
अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह अवश्य ही
शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। मेरा कहा हुआ
यह आख्यान अद्भुत, मंगलका धाम, सभी
विघ्नोंका नाश करनेवाला, समस्त व्याधियोंको
दूर करनेवाला, यश देनेवाला, स्वर्ग देनेवाला, आयु
प्रदान करनेवाला, पुत्र-पौत्रोंकों बढ़ानेवाला, सभी
कामनाओंको सिद्ध करनेवाला, भोग और मोक्ष
देनेवाला, अपमूत्युको दूर करनेवाला, महाशान्ति
प्रदान करनेवाला, कल्याणकारक, समस्त दुःस्वप्नोंको
शान्त करनेवाला और बुद्धिज्ञान आदिकी वृद्धि
करनेवाला है ॥३२--२५॥ -
७३२
श्रीशिवमहापुराण
[अ = == = ७८ काका 2 ``
शिवोत्सवेषु सर्वेषु पठितव्यं प्रयत्नतः।
शुभेप्सुभिर्जनेः प्रीत्या शिवसन्तोषकारणम्॥ ३६
पठेत््रतिष्ठाकाले तु देवादीनां विशेषतः।
शिवस्य सर्वकार्यस्य प्रारम्भे च सुप्रीतितः॥ ३७
शृणुयाद्वा शुचिर्भूत्वा चरितं शिवयोश्शिवम्।
सिध्यन्ति सर्वकार्याणि सत्यं सत्यं न संशय: ॥ ३८
आक्का २ ``
अपने शुभकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको नै
कल्याण-कारक उत्सवोंमें प्रयत्नपूर्वक प्रेमके सा
शिवको सन्तुष्ट करनेवाले इस आख्यानका जा
करना चाहिये॥ ३६॥
विशेष रूपसे देवता आदिकी प्रतिष्ठाके
और शिवके सभी कार्योके प्रारम्भमें प्रेमसे र
आख्यानका पाठ करना चाहिये। जो पवित्र होक
शिवा-शिवके इस चरित्रको सुनता है, उसके सभी
कार्य सिद्ध हो जाते हैं, यह सत्य है, सत्य है, इसमे
संशय नहीं है॥ ३७-३८॥
इति श्रीशिवमहापुराणे ब्रह्मनारदसंवादे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे
शिवकैलासगमतवर्णतं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽ ध्यायः ॥ ५५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके ब्रह्मा-नारद-संवादके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके
तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवकैलासगमनवर्णन नामक
पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५॥
So
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयसुद्रसंहितायां तृतीयः पार्वतीखण्डः समाप्तः॥
॥ द्वितीय रुब्रसंहिताका तृतीय पार्वतीखण्ड पूर्ण हुआ॥
— ee
॥ 3% >
श्रीसाम्बशिवाय नम:॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नम: ॥
श्रीशिवमहापुराण म पट
द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थ: कुमारखण्डः
अथ प्रथमोऽध्यायः
कैलासपर भगवान् शिव एवं पार्वतीका विहार
बन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं
पूर्ण पूर्णकरं परपूर्णनिखिलैश्वयेकवासं शिवम्।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं
विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकुपयोपात्ताकृतिं शंकरम्॥
नारद उवाच
विवाहयित्वा गिरिजां शंकरो लोकशंकरः।
गत्वा स्वपर्वतं ब्रह्मन् किमकार्षीद्धि तद्वद॥
कथं हि तनयो जज्ञे शिवस्य परमात्मनः ।
यदर्थमात्मारामोऽपि समुवाह शिवां प्रभुः॥
तारकस्य कथं ब्रह्मन् वधो5भूददेवशंकर।
एतत्सर्वमशेषेण वद् कृत्वा दयां मयि॥
सूत उवाच
शत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदस्य प्रजापतिः।
ुप्रसन्नमना: स्मृत्वा शंकरं प्रत्युवाच ह॥
चर ब्रह्मोवाच
घेत भृणु वक्ष्यामि शशिमोलेस्तु नारद।
थां दिव्यां तारकासुरसद्वधम्॥
am कथयाम्यद्य कथां पापप्रणाशिनीम्
शुतवा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो ध्रुवम्॥
वन्दना करनेसे जिनका मन प्रसन्न हो जाता है,
जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्रिय है, जो सबको प्रेम प्रदान
करनेवाले हैं, स्वयं पूर्ण हैं, दूसरोंकी अभिलाषाको भी
पूर्ण करते हैं, सम्पूर्ण संसिद्ध ऐश्वर्यके एकमात्र स्थान
हैं, स्वयं सत्यस्वरूप हैं, सत्यमय हैं, जिनका सत्तात्मक
ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित है, जो सत्यप्रिय एवं सबको
सत्य प्रदान करनेवाले हैं, ब्रह्मा-विष्णु जिनकी वन्दना
करते हैं और जो अपनी कृपासे ही विग्रह धारण करते
हैं--ऐसे नित्य शिवकी हम वन्दना करते हैं ॥ १॥
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! लोककल्याणकारी
शंकरने पार्वतीसे विवाह करनेके पश्चात् कैलास
जाकर क्या किया, उस वृत्तान्तको हमें सुनाइये॥ २॥
जिस पुत्रके निमित्त आत्माराम होते हुए भी
उन्होंने पार्वतीसे विवाह किया, उन परमात्मा शिवको
किस प्रकार पुत्र उत्पन्न हुआ ? देवताओंका कल्याण
करनेवाले हे ब्रह्मन्! तारकासुरका वध किस प्रकार
हुआ? मेरे ऊपर कृपाकर यह सारी बात विस्तारसे
कहिये॥ ३-४॥
सूतजी बोले-नारदके इस प्रकारके वचनको
सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने शिवजीका स्मरणकर प्रसन्न
मनसे कहा- ॥५॥
ब्रह्माजी बोले-_हे नारद! चद्धशेखर भगवान्
शिवजीके चरित्रको बताता हूँ, आप सुने, मं कार्तिकियकी
उत्पत्तिकी दिव्य कथा तथा उनके द्वारा किये गये
तारकासुरके वधका वृत्तान्त भी कहता हूँ॥६॥
| मैं जिस कथाको कह रहा हूँ, उसे सुनिये, वह
कथा समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाली है जिसे
सुनकर निश्चय ही मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त
हो जाता है॥७॥
७३४
इदमाख्यानमनघं रहस्यं परमाद्धुतम्।
'पापसंतापहरणं सर्वविघध्नविनाशनम्॥ ८
सर्वमंगलदं सारं सर्वश्रुतिमनोहरम्।
सुखदं मोक्षबीजं च कर्ममूलनिकृन्तनम्॥ ९
कैलासमागत्य शिवां विवाह्य
शोभां प्रपेदे नितरां शिवोऽपि।
विचारयामास च देवकृत्यं
पीडां जनस्यापि च देवकृत्ये॥ १०
शिवः स भगवान् साक्षात्कैलासमगमद्यदा।
सोख्यं च विविधं चक्रुर्गणाः सर्वे सुहर्षिता: ॥ ११
महोत्सवो महानासीच्छिवे कैलासमागते।
देवाः स्वविषयं प्राप्ता हर्षनिर्भरमानसाः॥ १२
अथ शंभुर्महादेवो गृहीत्वा गिरिजां शिवाम्।
जगाम निर्जनं स्थानं महादिव्यं मनोहरम्॥ १३
शाय्यां रतिकरीं कृत्वा पुष्पचन्दनचर्चिताम्।
अद्भुतां तत्र परमां भोगवस्त्वन्वितां शुभाम्॥ १४
स रेमे तत्र भगवान् शांभुर्गिरिजया सह।
सहस्त्रवर्षपर्यनत॑ देवमानेन म्रानदः॥ १५
दुर्गाङ्गस्पर्शमात्रेण लीलया मूर्च्छितः शिव:।
मूर्च्छिता सा शिवस्पर्शादबुबुधे न दिवानिशम् ॥ १६
हरे भोगप्रवृत्ते तु लोकधर्मप्रबर्तिनि।
महान् कालो व्यतीयाय तयो: क्षण इवानघ १७
अथ सर्वे सुरास्तात एकत्रीभूय चैकदा।
मंत्रयाञ्जक्ररागत्य मेरौ शक्रपुरोगमाः॥ १८
सुरा ऊचुः
विवाहं कृतवाज्छंभुरस्मत्कार्यार्थमी श्वर: ।
योगीश्वरो निर्विकारो स्वात्मारामो निरंजनः ॥ १९
श्रीशिवमहापुराण
[ ऊ = या
यह आख्यान पापरहित, गोपनीय, हळ >>
'पाप-सन्तापको दूर करनेवाला तथा सभी प्राक
विनष्ट करनेवाला है । यह सभी प्रकारके मंगलो द
पुराणोंका सारभूत अंश तथा सबके कानोंको ता
करनेवाला, आनन्दको बढ़ानेवाला, मोक्षका बोजओर
कर्ममूलका विनाश करनेवाला है ॥ ८-९॥ |
शिवजी शिवासे विवाहकर कैलासपर आक
अत्यन्त शोभित हुए और देवगणोंके कार्यसाधनका व्क
करने लगे। उन्होंने तारकासुरके द्वारा दी गयी अफ
भक्तजनोंकी पीड़ाके विषयमे भी विचार किया॥१।
इधर शिवजी जब कैलासपर पहुँचे, तब उनके
गण प्रसन्न होकर उनको नानाविध सुख प्रदान करे
लगे॥ ११॥
शिवजीके कैलास पहुँचते ही महान् उत्सव होने
लगा। सब देवगण प्रसन्नमन होकर अपने-अपने
स्थानको चले गये। इसके बाद महादेव सदाशिव
गिरिकन्या शिवाको साथ लेकर महादिव्य, मनोहा
एवं निर्जन स्थानमें चले गये। वहाँ उन्होंने रतिको
बढानेवाली शय्याका निर्माणकर उसे पुष्प त्ष
चन्दनसे सुशोभित किया। उस अद्भुत मनोहर शय्या
समीप नाना प्रकारकी भोगसामग्री भी स्थापित का
दी॥ १२-१४॥
उसी शय्यापर मान देनेवाले भगवान् श
पार्वतीके साथ देवताओंके वर्षपरिमाणके अनुसार ए
हजार वर्षतक विहार करते रहे। भगवती पार्वती
अंगके स्मर्शमात्रसे भगवान् सदाशिव री
मूच्छित हो गये । भगवती पार्वती भी भगवान्
स्पर्शसे मूच्छित हो गयीं। इस प्रकार उन्हें दिनरात
ज्ञान नहीं रहा॥ १५-१६॥ >
हे अनघ! लोकधर्मका प्रवर्तन क
शिवजीके भोगमें प्रवृत्त होनेपर उन दोनोंका
समय भी क्षणमात्रके समान बीत गया॥ १४ Ey
हे तात! तब एक समय इन्द्रादि स्न
पर्वतपर एकत्र होकर विचार करने लगे॥ ९८,
देवता बोले--यद्यपि शिव योगीश्वर वि
आत्माराम तथा मायारहित हैं, फिर भी दै. |
कल्याणके लिये भगवान् शंकरने विवाह किया है॥
र्न
अण ९ ]
न जानीमो$त्र कारणम्।
विलंब: क्रियते तेन कथं देवेशवरेण ह॥ २०
ब्रह्मोवाच
एतस्मित्रन्तरे देवा नारदाद्वेवदर्शनात्।
बुबुधुस्तन्मितं भोगं तयोश्च रममाणयोः॥ २१
चिं ज्ञात्वा तयोभोगं चिंतामापुः सुराश्च ते।
ब्रह्माणं मां पुरस्कृत्य ययुर्नारायणान्तिकम्॥ २२
तं नत्वा कथितं सर्वं मया वृत्तांतमीप्सितम्।
सन्तस्थिरे सर्वदेवाः चित्रे पुत्तलिका यथा॥ २३
सहस्रवर्षपर्यन्तं देवमानेन शंकरः।
रतौ रतश्च निश्चेष्टो योगी विरमते न हि॥ २४
श्रीभगवानुवाच
चिन्ता नास्ति जगद्धातः सर्व भद्रं भविष्यति।
शरणं ब्रज देवेश शंकरस्य महाप्रभोः॥ २५
महेशशरणापन्ना ये जना मनसा मुदा।
तेषा प्रजेश भक्तानां न कुतश्चिद्भयं क्वचित्॥ २६
शृंगारभंगः समये भविता नाधुना विधे।
' कालप्रयुक्तं कार्य च सिद्धि प्राप्नोति नान्यथा॥ २७
शम्भोः सम्भोगमिष्टं को भद्रां कर्तुमिहेश्वरः।
पूर्ण वर्षसहस्रे च स्वेच्छया हि विरंस्यति॥ २८
स्रपुंसो रतिविच्छेदमुपायेन करोति यः।
पस्य स्त्रीपुत्रयोभेंदो भवेज्ञन्मनि जन्मनि॥ २९
'ष्ञानो नष्टकीर्तिरलक्ष्मीको भवेदिह।
यात्यन्ते कालसूत्रं वर्षलक्षं स पातकी॥ ३०
'भायुक्तं शक्रमिमं चकार विरतं रतौ।
हा दुर्वासास्तत्स्त्रीभेदो बभूब ह॥ ३१
स संप्राप्य विषेव्य शुभपाणिकाम्।
दिव्य वर्षसहस्रं च विजहौ विरहज्चरम्॥ ३२
रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड )
9 © पारी ५
किंतु अबतक इनको कोई पुत्र नहीं हुआ,
इसका कारण ज्ञात नहीं हो रहा है। वे भगवान्
देवेश्वर विलम्ब क्यों कर रहे हैं ?॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले--इसी बीच देवदर्शन नारदसे
देवताओंने शिवा और शिवके परिमित भोगकालको
जाना॥ २१॥
तब उनके भोगकालको दीर्घकालीन जानकर
देवता बड़े चिन्तित हुए, फिर मुझ ब्रह्माको आगे
करके वे विष्णुके समीप गये॥ २२॥
मैंने नारायणको प्रणामकर सारा अभीष्ट वृत्तान्त
उनसे निवेदित किया। देवतालोग तो चित्रलिखित
पुत्तलिकाके समान खड़े रहे ॥ २३॥
[हे नारायण !] योगीश्वर शंकरजी देवताओंके
वर्षके परिमाणके अनुसार एक हजार वर्षपर्यन्त
विहारपरायण हैं॥ २४॥
भगवान् विष्णु बोले--हे जगतूके
विधाता ! चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। सब
कुछ कल्याणकारी ही होगा। हे देवेश! आप महाप्रभु
शंकरकी शरणमें जाइये॥ २५॥
जो मनुष्य प्रसन्न मनसे शंकरकी शरणमें
जाते हैं; हे प्रजापते! शंकरके उन अनन्य भक्तोंको
कहींसे कोई भय नहीं होता। हे विधे! उनके श्रृंगारका
रसभंग समयसे होगा, अभी नहीं। जो कार्य ठीक
समयमें किया जाता है, वही सफल होता है, अन्यथा
नहीं॥ २६-२७॥
भगवान् शंकरके अभीष्टको भग्न करनेमें कौन
समर्थ है? हजार वर्ष पूर्ण होनेपर वे स्वयं निवृत्त हो
जायँगे॥ २८॥
जो रतिको भंग करता है, उसे जन्म-जन्मान्तरमें
स्त्री तथा पुत्रसे वियोग प्राप्त होता है। उस भेदकर्ता
पुरुषका ज्ञान नष्ट हो जाता है, कीर्ति नष्ट हो जाती
है और वह दरिद्र हो जाता है ds एक लाख
वर्षतक कालसूत्र नामक नरकमे रहता ह ॥ २९-३०॥
इसी कारण महामुतौद्भ दुर्वासाको स्त्रीसे
वियोग हुआ। फिर उन्होंने दूसरी मंगलमय करु
'कमलोंवाली स्त्रीको प्राप्त करके वियोगजन्य
दुःखको दूर किया। घृताचीपर आसक्त 'कामदेवको
७३६
श्रीशिवमहापुराण
[ व कक 7 ` ` १
घृताच्या सह संश्लिष्ट कामं वारितवान् गुरुः।
षण्मासाभ्यंतरे चन्द्रस्तस्य पत्नीं जहार ह॥ ३३
पुनश््शिबं समाराध्य कृत्वा तारामयं रणम्।
तारां सगर्भा संप्राप्य विजहौ विरहज्चरम्॥ ३४
मोहिनीसहितं चन्द्रं चकार विरतं रतौ।
'महर्षिगौतमस्तस्य स्त्रीविच्छेदो बभूव ह॥ ३५
हरिश्चन्द्रो हालिकं च वृषल्या सह संयुतम्।
वारयामास निश्चेष्टं निर्जने तत्फलं श्ृणु॥ ३६
भ्रष्ट: स्त्रपुत्रराज्येभ्यो विश्वामित्रेण ताडितः।
ततः शिवं समाराध्य मुक्तो भूतो हि कश्मलात्॥ ३७
अजामिलं द्विजश्रेष्ठं वृषल्या सह संयुतम्।
न भिया वारयामासुः सुरास्तां चापि केचन॥ ३८
सर्व निषेकसाध्यं च निषेको बलवान् विधे।
निषेकफलदो बै स निषेकः केन वार्यते॥ ३९
दिव्यं वर्षसहस्त्रं च शंभोः संभोगकर्म तत्।
पूर्णे वर्षसहस्रे च गत्वा तत्र सुरेश्वराः ॥ ४०
येन वीर्य पतेद्धूमो तत् करिष्यथ निश्चितम्।
तत्र वीर्ये च भविता स्कन्दनामा प्रभोः सुतः ॥ ४९
अधुना स्वगृहं गच्छ विधे सुरगणैः सह।
करोतु शंभुः संभोगं पार्वत्या सह निर्जने॥ ४२
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा कमलाकान्त: शाधघ्रंस्वान्तःपुरं ययौ।
स्वालयं प्रययुर्देवा मया सह मुनीश्वर॥ ४३
शक्तिशक्तिमतोश्राथ विहारेणाति च क्षितिः।
भाराक्रांता चकंपे सा सशेषापि सकच्छपा ॥ ४४
कच्छपस्य हि भारेण सर्वाधारः समीरण:।
स्तंभितोऽथ त्रिलोकाश्च बभुवुर्भयविह्लाः ॥ ४५
अथ सर्वे मया देवा हरेश्च शरणं ययु:।
सर्व॑ निवेदयाञ्जकुस्तदवृत्तं दीनमानसा॥ ४६
बृहस्पतिके द्वारा मना करने पर वह्या
पत्नी-हरणका दुःख मिला । फिर उन्होंने शिव
आराधनाकर ताराको प्राप्त किया, जिससे ज
विरहव्यथा दूर हुई॥ ३१--३४॥ ष
महर्षि गौतमने मोहिनीमें आसक्त चड्कन
वियुक्त किया, इस कारण उनका स्त्रीसे वियोग
हालिकको वृषलीमें कामासक्त देखकर हरिश्चन्ा
निषेध किये जानेपर उन्हें विश्वामित्रका कोपभाजा
बनना पड़ा और वे स्त्री-पुत्र तथा राज्यसे भी
हो गये। फिर उन्होंने शिवाराधनकर इस कषे
छुटकारा प्राप्त किया॥ ३५--३७॥
वृषलीमें आसक्त हुए द्विजश्रेष्ठ अजामिलक्े
तथा उस वृषलीको भयके कारण किसी देवताने भं
मना नहीं किया। निषेक (वीर्यसिंचन)-से सब कुछ
साध्य है। हे विधे! निषेक बलवान् है, निषेक ही फत
देनेवाला है, उस निषेकका कौन निवारण कर सकत
है?॥ ३८-३९॥
शंकरजीके भोगका वह काल देवताओंके वे
हजार वर्षपर्यन्तका था। हे देवगणो! एक हा
दिव्य वर्ष पूर्ण हो जानेपर आपलोग वहाँ जाकर झ
प्रकारका उपाय करें, जिससे उनका तेज पृथ्वी
गिरे। उसी तेजसे प्रभु शंकरका स्कन्द नामक प
उत्पन्न होगा॥ ४०-४१॥ pe
अतः हे ब्रह्मन्! इस समय आप इन देवता
साथ लेकर अपने स्थानको लौट जायँ और
एकान्तमें पार्वतीके साथ आनन्दविहार करें॥ ४१)
ब्रह्माजी बोले--हे मुनीश्वर! इस प्रकार कह.
लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु शीघ्र ही अपने अतः
चले गये और मेरे साथ सभी देवता अपने-अपने.
चले गये। इस प्रकार बहुत दिनोंतक शरि
शक्तिमानके विहारसे भाराक्रान्त यह पृथ्वी २
कच्छपके धारण करनेपर भी काँप उठी ॥ ४९.
तब कच्छपके भारसे आक्रान्त सबका रे
पवन स्तम्भित हो गया, जिससे सम्पूर्ण भर
व्याकुल हो उठा। फिर सभी देवता मेरे साथ टा
विष्णुकी शरणमें गये और दुखी मनवाले 2६ «|
वृत्तान्तको भगवान् विष्णुसे निवेदित किया **
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देवा ऊचुः
रमानाथ सर्वावनकर प्रभो।
रक्ष नः शरणापन्नान् भयव्याकुलमानसान्॥ ४७
स्तंभितस्त्रिजगत्प्राणो न जाने केन हेतुना।
द्याकुलं मुनिभिलेंखेस्त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४८
ब्रह्मोवाच
सकला देवा मया सह मुनीश्वर।
दीनास्तस्थुः पुरो विष्णोमानीभूताः सुदु:खिता: ॥ ४९
तदाकर्ण्य समादाय सुरान्नः सकलान् हरिः।
जगाम पर्वतं शीघ्रं कैलासं शिववल्लभम्॥ ५०
तत्र गत्वा हरिर्देवैर्मया च सुरवल्लभः।
ययौ शिववरस्थानं शंकरं द्रष्टुकाम्यया॥ ५१
तत्र दृष्ट्वा शिवं विष्णुर्न सुरैविस्मितोऽभवत्।
तत्र स्थितान् शिवगणान् पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ ५२
विष्णुरुवाच
हे शांकरा: शिवः कुत्र गतः सर्वप्रभुर्गणाः।
निवेदयत नः प्रीत्या हुःखितान्वै कृपालवः॥ ५३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्यं वचस्तस्य सामरस्य हरेर्गणा:।
प्रोचु: परीत्या गणास्ते हि शंकरस्य रमापतिम्॥ ५४
शिवगणा ऊचुः
हेरे शृणु शिवप्रीत्या यथार्थ ब्रूमहे वयम्।
ब्रह्मणा निर्जरैः सार्द्ध वृत्तान्तमखिलं च यत्॥ ५५
सर्वेश्वरो महादेवो जगाम गिरिजालयम्।
संस्थाप्य नोऽत्र सुप्रीत्या नानालीलाविशारद: ॥ ५६
पदगुहाभ्यन्तरे शंभु: किं करोति महेश्वरः।
गे जानीमो रमानाथ व्यतीयुर्बहवः समाः ॥ ५७
ब्रह्मोवाच
शुचेति वचनं तेषां स विष्णुः सामरो मया।
ऽति मुनिश्रेष्ठ शिवद्वारं जगाम ह॥ ५८
रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड )
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देवता बोले--हे देवदेव | हे रमानाथ ! हे सर्वरक्षक
प्रभो! हमलोग भयसे व्याकुलचित्त हो आपकी शरणमें
| आये हुए हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ ४७॥
पता नहीं, किस कारणसे तीनों लोकोंके प्राणभूत
वायुदेव स्तम्भित हो गये हैं तथा मुनि एवं देव-
गणोंके सहित सारा चराचर त्रैलोक्य व्याकुल हो गया
है! ॥ ४८॥
ब्रह